भारत में मंहगी दवाओं के नाम पर फार्मा लूट NMC ने फार्मा लॉबी के दबाव में वापस लिया जेनेरिक दवा का फैसला

भारत में मंहगी दवाओं के नाम पर फार्मा लूट NMC ने फार्मा लॉबी के दबाव में  वापस लिया जेनेरिक दवा का फैसला

भाई राकेश 'भारत' सह-सम्पादक
एवं मुख्य केन्द्रीय प्रभारी- भारत स्वाभिमान

   पूरी दुनिया के लोगों को अपने स्वास्थ्य की रक्षा के लिए अलग-अलग प्रकार की दवाइयां खानी पड़ती हैं। दवाइयों के ऊपर लोग अपनी आय का 10% से लेकर 25% तक खर्च करते हैं। कम से कम माना जाए तो पूरी दुनिया में लगभग 200 लाख करोड़ रुपए का कारोबार केवल दवाओं का है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी यह मानता है कि दुनिया के अनेकों देश जहाँ पर गरीबी है करोड़ों मरीजों की जान इसलिए चली जाती है कि वह दवा नहीं खरीद पाते और दवाओं उपचार के अभाव में प्रतिवर्ष दुनिया में करोड़ों लोग मर जाते हैं।

फार्मा का जाल, हर घर में दवाओं की आवश्यक्ता

कोरोना की महामारी में तथा वर्तमान समय में बढ़ती लाइफ़ स्टाइल डिजीज के कारण हर घर में नई-नई बीमारियां पैदा हो रही हैं। नई-नई बीमारियों के कारण दवाइयां हर घर का जरूरी हिस्सा बन गई हैं। और लोग अपनी आमदनी का एक बड़ा हिस्सा दवाइयों के ऊपर खर्च कर रहे हैं।
लोगों तक स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन जेनेरिक दवाओं के निर्बाध आवागमन के पक्ष में है तथा वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य के अधिकार के क्रियान्वयन के लिए जेनेरिक दवाओं को आवश्यक मानता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन जीवन की रक्षा से जुड़ी जैसे एड्स या कैंसर की दवाओं को पूरी दुनिया में न्यूनतम मूल्य पर उपलब्ध करवाने का पक्षधर है।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में जेनेरिक दवाओं का महत्व कितना है इस बात का अंदाजा आप इसी से लगा लीजिए कि विश्व स्वास्थ्य संगठन यह कहता है कि यदि विकासशील और विकसित देशों में हम जेनेरिक दवाएं अनिवार्य कर दें तो स्वास्थ्य खर्च में हम 70% तक की कमी ला सकते हैं।

पेटेंट ब्रांडेड दवाएं क्यों होती हैं महंगी

ब्रांडेड दवाओं में दवा कंपनियों का मुनाफा बहुत ज्यादा होता है तथा कमीशन मेडिकल स्टोर से लेकर डॉक्टर तक सुनियोजित तरीके से बांटा जाता है। उपहार दिए जाते हैं, मेडिकल के सेमिनार किए  जाते हैं, डॉक्टर्स को बड़े-बड़े इंटरनेशनल पैकेज के ऊपर हॉलीडे के लिए विदेशों में भेजा जाता है। यह लाखों करोड़ों का खर्च ब्रांडेड दवाओं में सेल्स प्रमोशन के नाम पर मार्केटिंग के नाम पर किया जाता है और यह सब करते-करते ब्रांडेड दवाएं जेनेरिक दवाओं से 10 से लेकर 100 गुना तक महंगी हो जाती हैं।
जेनेरिक दवा-जेनेरिक दवाओं को International Nonproprietary Names (INN) मेडिसिन भी कहते हैं। इन दवाओं का निर्माण ब्रांडेड दवाओं के समान ही किया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एसेंशियल ड्रग की सूची के मापदंडों के अनुसार इनका निर्माण किया जाता है, यह विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है।

क्या है जेनेरिक दवा?

अनुसंधान एवं नवाचार (Research & innovation) के बाद किसी दवा का निर्माण किया जाता है। दवा की खोज करने वाली कंपनी उसका पेटेंट लेती है, वह पेटेंट लगभग 20 वर्ष के लिए होता है। 20 वर्ष तक केवल वही कंपनी दवा बनाती है। पेटेंट की समाप्ति के बाद कोई भी दूसरी कंपनी या देश उस दवा का निर्माण कर सकता है। ऐसी दवाओं को जेनेरिक दवाई कहा जाता है। यह जेनेरिक दवाएं किसी प्रसिद्ध नाम के साथ या नाम के बिना बेची जाती हैं। इसकी उपयोगिता फॉर्मूलेशन पेटेंट दवाओं के समान ही होती है क्योंकि जेनेरिक दवा उत्पादन करने वाली कंपनी का खर्च रिसर्च मार्केटिंग में नहीं होता। इसलिए इनकी कीमतें पेटेंट ब्रांडेड दवाओं से कई गुना कम होती हैं। साथ ही बहुत बार जेनेरिक दवाओं की कीमत का नियंत्रण सरकार भी करती है। पेटेंट वाली ब्रांडेड दवाओं के मूल्य का नियंत्रण सरकार के पास नहीं होता, कंपनी खुद तय करती हैं कि वह कितना मुनाफा कमाएंगे। इन जेनेरिक दवाओं का फार्मूला क्योंकि मूल दवा के अनुसार ही होता है इसलिए इनका प्रभाव भी किसी भी पेटेंटेड ब्रांडेड दवा के बराबर ही होता है।

क्यों सस्ती होती है जेनेरिक दवाएं?

जेनेरिक दवाइयों का नाम उस दवा में उपस्थित एक्टिव इनग्रेडिएंट अर्थात सक्रिय घटक के आधार पर एक विशेषज्ञ समिति द्वारा तय किया जाता है। किसी भी  दवा का जेनेरिक नाम पूरी दुनिया में एक ही होता है, जैसे- बुखार कम करने वाली दवा का जेनेरिक नाम या एक्टिव इनग्रेडिएंट का नाम पेरासिटामोल है। तो पूरी दुनिया में बुखार की दवा का ब्रांड नेम कोई भी हो सकता है लेकिन जेनेरिक नाम एक ही होगा पेरासिटामोल।
देश की लगभग सभी नामी दवा कंपनियां भी ब्रांडेड के साथ-साथ कम कीमत वाली जेनेरिक दवाई भी बनाती हैं, लेकिन ज्यादा लाभ के चक्कर में डॉक्टर केवल ब्रांडेड दवाओं का ही नाम लिखता है तथा कंपनियां या मेडिकल स्टोर संचालक भी लोगों को इसकी जानकारी नहीं देते जिसके कारण मरीजों को केमिस्ट से महंगी दवाई खरीदनी पड़ती है।

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जेनेरिक दवा निर्माण करने वाले निर्माताओं को दवा की खोज उसके प्रीक्लिनिकल क्लिनिकल कंट्रोल ट्रायल के लिए अतिरिक्त पैसा खर्च नहीं करना पड़ता। इस कारण भी जेनेरिक दवा ब्रांडेड पेटेंट दवा से सस्ती होती हैं।
ब्रांडेड दवाओं का प्रचार-प्रसार कंपनी अपने मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव के माध्यम से अधिक मुनाफा कमाने के लिए करती है लेकिन जेनेरिक दवाओं का प्रचार-प्रसार ना तो दवा कंपनी करती है तथा ना ही चिकित्सक कमीशन नहीं मिलने के कारण जेनेरिक दवाओं को प्रचारित-प्रसारित करना चाहते हैं। यदि कोई मरीज किसी केमिस्ट से जेनेरिक दवा की मांग भी करता है तो दवा विक्रेता इनकी उपलब्धता को इनकार कर देते हैं। ब्रांडेड दवाओं का कारोबार मार्केटिंग के कारण तो बढ़ता ही है, साथ ही डॉक्टर को ब्रांडेड दवा लिखने का जो लाभ मिलता है उसके आधार पर इनका प्रचार-प्रसार बिक्री लगातार बढ़ती चली जाती है।

जेनेरिक दवाओं से किस प्रकार लाभ हो सकता है?

उदाहरण के लिए 2013 में, जैसे ब्लड कैंसर की नोवार्टिस फार्मा कंपनी की ग्लिवेक (Glivec) ब्रांड नाम की दवा की कीमत लगभग 1,20,000 है जबकि उसी सक्रिय घटक तत्व अथवा साल्ट की बनी हुई दूसरी दवा वीनेट (Veenat) के महीने भर की कीमत केवल 11,400 रुपए प्रति माह है। वहीं सिपला इस दवा के बराबर जेनेरिक दवा इमाटीब (Imatib) केवल 8,000 में उपलब्ध करवाता है तथा ग्लेनमार्क इसी दवा को 5,720 रुपए में उपलब्ध करवा देता है।
इस उदाहरण से आप समझ सकते हैं कि एक मरीज जिसको 1 महीने का खर्च 1,14,000 करना था वह उसी दवा जेनेरिक रूप में केवल 5,720 रुपए में भी प्राप्त कर सकता है। जिसका प्रभाव जिसका लाभ जिस की गुणवत्ता उसी 1,14,000 की दवा वाली है। जिससे किसी मरीज की 1 महीने की दवा की कीमत में मरीज 20 महीने तक अपना उपचार करवा सकता है अर्थात जेनेरिक दवा ब्रांडेड दवा से 20 गुना सस्ती है।
इसी प्रकार बी-कॉम्प्लेक्स का जेनेरिक कैप्सूल या टेबलेट लेते हैं तो 10 पैसे की आती है तथा ब्रांडेड टेबलेट 2 से लेकर 35 रुपए तक की आती है, पेरासिटामोल 500 mg सामान्य टेबलेट जेनेरिक 10 पैसे की आती है, वही ब्रांडेड में वह 1 से 2 रुपए की हो जाती है। सेट्रिजीन नाम का एक साल्ट की जेनेरिक दवा 20 पैसे की एक टेबलेट आती है तथा ब्रांडेड 5 रुपए की एक टेबलेट आती है। कोई भी प्रोटीन पाउडर या सामान्य मल्टीविटामिन जेनेरिक जो 30-35 में मिलता है, ब्रांडेड होते ही उसकी कीमत 200 से लेकर 600 से 700 हो जाती है।

ब्रांडेड दवाओं के माध्यम से लूट

भारत सरकार ने फार्मास्यूटिकल विभाग के माध्यम से जन औषधि केंद्रों की स्थापना का कार्य 2008 में शुरू किया जिसका उद्देश्य था मरीजों को खुदरा दुकानों के माध्यम से उचित सस्ती कीमत पर गैर ब्रांडेड जेनेरिक दवाएं उपलब्ध करवाई जाए। लेकिन यदि डॉक्टर  दवा लिखते हुए दवा का जेनेरिक नाम या दवा का एक्टिव इनग्रेडिएंट नहीं लिखता है तो मरीज को मजबूर होकर वही ब्रांडेड दवाएं महंगी दवाएं खरीदनी पड़ती हैं जिससे सरकार की इस पहल का वह लाभ नहीं मिल पाया जो मिलना चाहिए, क्योंकि डॉक्टर अपने मुनाफे के चक्कर में जेनेरिक दवाएं लिखने में संकोच करते हैं। जेनेरिक दवा लिखने पर उनको किसी भी प्रकार से बिक्री करवाने का कमीशन या उपहार आदि नहीं मिल पाता, जिससे उनको लगता है कि जेनेरिक दवा लिखने से उनको नुकसान होगा।
ऑल इंडिया ऑर्गेनाइजेशन ऑफ केमिस्ट एंड ड्रजिस्ट ऑर्गेनाइजिंग सेक्रेट्री संदीप जी का कहना है कि देश में दो लाख करोड़ रुपए की फार्मेसी इंडस्ट्री है जिसमें अभी जेनेरिक दवाओं का शेयर प्रतिशत केवल 10% है।
विशेषज्ञ कहते हैं कि दवाइयां साल्ट और मॉलिक्यूल से बनती हैं, दवा खरीदते हुए ट्रेड या नाम का महत्व नहीं है। वही साल्ट या मॉलिक्यूल वही असर करेंगे जो ब्रांडेड दवा के अंदर मौजूद साल्ट में यूज करते हैं। जेनेरिक दवाओं का असर भी ब्रांडेड दवा जैसा ही होता है तथा जेनेरिक दवाओं के साइड इफेक्ट भी ब्रांडेड दवाओं के जैसे ही होते हैं।

सुप्रीम कोर्ट का जेनेरिक दवा से सम्बंधित निर्देश

2002 में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा जारी आचार संहिता में चिकित्सकों से केवल उनके जेनेरिक नाम से ही दवाएं लिखने का आह्वान किया गया।
अमेरिका खुद 40% से अधिक अपनी जेनेरिक दवाएं भारत से खरीदता है स्वयं ब्रिटेन अपनी 25% से अधिक जेनेरिक दवाइयां भारत से खरीदता है। भारत पूरी दुनिया में जेनेरिक दवाइयों  की आपूर्ति करने में अग्रणी स्थान पर है। भारत को दुनिया की फार्मेसी कहा जाता है लेकिन कितनी विडंबना है कि भारत देश में ऐसा कोई कानून नहीं है जहां पर चिकित्सक अनिवार्य तौर पर जेनेरिक दवाओं को लिखें।
देश के जागरूक लोग समय-समय पर जेनेरिक दवाओं के उपयोग की अनिवार्यता  की मांग करते रहे हैं। एक एक्टिविस्ट किशन चंद जैन जी की जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदी वाला और मनोज मिश्रा की बेंच ने 19 अगस्त को जेनेरिक दवाओं के पक्ष में नोटिस जारी किया। किशन चंद जैन जी ने अपनी याचिका में यह मांग की थी कि कम से कम जिन दवाओं का पेटेंट नहीं है उनके व्यवसाय के नाम पर रोक लगाई जाए, जैसे- यदि बाजार से पेरासिटामोल की टेबलेट लेते हैं तो वह 10 पैसे की आती है और उसी को यदि उसके ब्रांड नेम के नाम से लेते हैं तो उसकी कीमत कई गुना ज्यादा बढ़ जाती है। याचिका में यह भी मांग उठाई गई थी उन डॉक्टरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए जो जेनेरिक दवाओं का नाम स्पष्ट कैपिटल लेटर्स में नहीं लिखते।
भारतीय चिकित्सा परिषद ने अक्टूबर 2016 में भी डॉक्टरों के लिए एक आदर्श आचार संहिता में संशोधन की सिफारिश की कि प्रत्येक चिकित्सक को साफ-साफ पढऩे योग्य जेनेरिक नामों के साथ दवाएं लिखनी चाहिए। जो जेनेरिक दवाओं के उपयोग को बढ़ावा देगा।
विगत दिनों 2 अगस्त 2023 को भारत सरकार में नेशनल मेडिकल कमीशन द्वारा यह नियम बनाया गया कि प्रत्येक रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर को स्पष्ट रूप से जेनेरिक नामों में ही दवा का प्रयोग करना है, वह किसी भी प्रकार का ब्रांडेड पेटेंट नाम नहीं लिख सकता। साथ ही रेगुलेशन ने यह भी कहा कि कोई भी रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर अनावश्यक दवाओं को तथा बिना जरूरत की खुराक को नहीं लिखे, केवल तर्कसंगत दवाएं ही लिखनी चाहिए।
अगर इस नियम का उल्लंघन किया जाता है तो डॉक्टर को चेतावनी दी जाएगी तथा बार-बार नियम का उल्लंघन करने पर उनका लाइसेंस भी कुछ समय के लिए रद्द किया जा सकता है। इसके साथ ही  नेशनल मेडिकल कमीशन द्वारा चिकित्सकों को यह भी कहा गया कि डॉक्टर किसी ऐसे सेमिनार वर्कशॉप या कान्फ्रेंस में शामिल नहीं हो पाएंगे जिन्हें फार्मा कंपनियां या संबंधित हेल्थ सेक्टर ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से स्पॉन्सर किया हो। साथ ही डॉक्टर्स उसका परिवार फार्मा कंपनी या उनके प्रतिनिधियों से किसी भी प्रकार के गिफ्ट उपहार लेने के ऊपर भी बैन लगाया गया।

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन का बेतुका विरोध

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने इस फैसले का तत्काल कड़ा विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि जेनेरिक दवाओं की गुणवत्ता की जांच 0.1 प्रतिशत से भी कम होती है, उनकी गुणवत्ता की गारंटी नहीं होने के कारण मरीजों के स्वास्थ्य को नुकसान हो सकता है। जब तक सरकार बाजार की सारी दवाइयों की गुणवत्ता का भरोसा नहीं दिला देती तब तक जेनेरिक दवा लिखने के नियम को टाल देना चाहिए। जेनेरिक दवाओं की गुणवत्ता की जानकारी डॉक्टर को नहीं होती, ब्रांडेड पेटेंट दवाएं बहुत अच्छी गुणवत्ता की होती है इसलिए वह महंगी होती हैं। जेनेरिक दवा लिखने के कारण से मरीज का नुकसान होगा, ढ्ढरू्र ने खुले शब्दों में सरकार के इस फैसले का विरोध करना शुरू किया तथा विरोध में माहौल बनाने के लिए अलग-अलग प्रेस कॉन्फ्रेंस करके इसे डॉक्टरों के साथ अन्याय बताया तथा कहा कि इससे मरीजों को हानि होगी। उल्टा कुछ चिकित्सकों के संगठनों ने तो यह भी कहना शुरू किया कि जेनेरिक दवा लिखने का नियम बनाना डॉक्टर्स के ऊपर अन्याय है तथा इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने कहा कि जेनेरिक दवाएं लिखने से जो मरीजों पर असर नहीं होगा उसकी जिम्मेदारी सरकार ले।

जेनेरिक दवाओं से लाभ

जबकि जेनेरिक दवा की वकालत करने वाले जागरूक लोगों को कहना है कि इससे मरीजों को हानि नहीं बल्कि लाभ होगा मरीजों के इलाज का खर्च 70-80% तक कम हो जाएगा। चिकित्सक खुद किसी भी ब्रांडेड कंपनी के अंदर जाकर भी उसकी गुणवत्ता की जांच नहीं करते लेकिन क्योंकि कोई ब्रांडेड कंपनी उनको गिफ्ट और उपहार दे देती हैं तो वही दवा उनके लिए बहुत उच्च गुणवत्ता की हो जाती है। इसलिए मरीजों की वकालत करते हुए एक समूह की मांग थी कि सरकार को कड़ाई पूर्वक अपने फैसले को लागू करना चाहिए ताकि स्वास्थ्य के क्षेत्र में इस लूट से देश की जनता को बचाया जा सके।

भारत में जेनेरिक दवाओं की स्थिति गुणवत्ता

भारत में वर्तमान में जेनेरिक दवाइयों का बाजार लगभग 2,00,000 करोड़ है जो लगभग 7% की दर से बढ़ रहा है। भारत जैसे देश में जहाँ लोगों के पास स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करने के लिए आवश्यक धन नहीं है वहाँ अभी भी जेनेरिक दवाइयों को अनिवार्य करके लोगों के दवाओं का खर्च बहुत हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
कई देशों के बाजार में भारत की जेनेरिक दवाओं की हिस्सेदारी 90% तक है। आज भारत में बनी जेनेरिक दवाओं की मांग अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जापान, ब्रिटेन, समेत दुनिया के विकसित और विकासशील देशों में है। वित्तीय वर्ष 2017-18 में USFDA ने विश्व भर के विभिन्न देशों की 323 दवा नमूनों की जांच की थी जिसमें 100 से ज्यादा भारत की जेनेरिक दवाओं के नमूने थे USFDA की रिपोर्ट के अनुसार सभी नमूने यूएस फार्मोकॉपिया के अनुसार सही पाए गए। अगर हम अमेरिका में भारत की जेनेरिक दवाओं की खपत के मामले में देखें तो भारत की जेनेरिक दवाओं की गुणवत्ता पर किसी भी प्रकार से कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता।
USFDA ने नए मैन्युफैक्चरिंग प्लांट के जुड़े हुए मानकों को सही पाते हुए भारत की ज्यादातर दवा कंपनियों को क्लीन चिट दी और पिछले कुछ वर्षों से वैश्विक स्तर पर भारत को दुनिया की फार्मेसी कहा जाता है और भारत के दवा निर्माताओं की विश्वसनीयता पूरी दुनिया में बहुत है इसका उदाहरण यह है कि पिछले 10 वर्षों में SFDA द्वारा भारत में बनी दवाइयों के मामलों की जांच में 400% तक कमी आई है।
वर्ष 2019-20 में 20 बिलियन अमेरिकी डालर (1 लाख 60 हजार करोड़ रुपए) मूल्य की दवाओं का भारत ने दुनिया को निर्यात किया। इतने बड़े निर्यात को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि भारत में जेनेरिक दवाओं की गुणवत्ता खराब है। यदि गुणवत्ता खराब होती तो पूरी दुनिया भारत से जेनेरिक दवाएं आयात नहीं करती। आज पूरी दुनिया भारत की जेनेरिक दवाओं का लाभ उठा रही है और खुद भारत में ऐसा कोई नियम कानून नहीं है कि मरीजों को लूट से बचाकर जेनेरिक दवाओं के उपयोग को अनिवार्य किया जाये।

अमेरिका में जेनेरिक दवा का प्रयोग

अकेले 2014 में जेनेरिक फार्मास्यूटिकल एसोसिएशन के विश्लेषण के अनुसार संयुक्त राज्य अमेरिका के 4.3 बिलियन  डॉक्टर प्रिसक्रिप्शन में 88% जेनेरिक दवाओं के थे। इसका अर्थ है कि अमेरिका में 88% डॉक्टर अपने प्रशिक्षण में जेनेरिक दवाएं लिखते हैं। इसी प्रकार वर्ष 2012 में भी अमेरिका में लिखे गए 4% प्रिसक्रिप्शन केवल जेनेरिक दवाओं के थे, अकेले 2010 में अमेरिकी स्वास्थ्य प्रणाली में जेनेरिक दवाओं के उपयोग से 158 बिलियन डॉलर की बचत हुई हर हफ्ते औसतन 3 बिलियन डॉलर की बचत अर्थात 24,000 करोड़ रुपए की शुद्ध बचत केवल जेनेरिक दवाओं के प्रयोग से अमेरिका में की गई। अकेले 2014 में संयुक्त राज्य अमेरिका में जेनेरिक दवाओं के उपयोग से स्वास्थ्य देखभाल में 254 बिलियन अमेरिकी डॉलर अर्थात 20 लाख करोड रुपए की बचत हुई।
अमेरिका में भी जेनेरिक दवाओं का प्रचार प्रसार नियम बनाकर तथा जागरूकता फैलाकर ही किया गया है। 1984 में अमेरिका में केवल 14त्न प्रिसक्रिप्शन जेनेरिक दवाओं के होते थे। 2006 में बढ़कर या 66% तक हो गए और 2011 में अमेरिका में डॉक्टरों ने 83त्न दवाएं जेनेरिक लिखी।

भारत में ब्रांडेड दवाओं के नाम पर लूट

भारत की लगभग 7% आबादी नियमित तौर पर किसी ना किसी बीमारी की दवा खाती है औसत तौर पर देखा जाए तो एक परिवार की साल भर की दवाइयों का औसत खर्च लगभग 3,638 रुपए है। भारत में ऐसे बहुत से मामले आए जहाँ पर खास ब्रांड की दवा लिखने के लिए  कुछ डॉक्टर दस बीस प्रतिशत से लेकर 40-50% तक कमीशन लेते हैं। जो फार्मा कंपनी उनको ज्यादा कमीशन देती है उसी फार्मा कंपनी की दवा वह अपने मेडिकल स्टोर पर रखते हैं तथा मरीज के पर्चे पर जेनेरिक दवा या साल्ट का नाम ना लिखकर उस खास ब्रांड का नाम लिखते हैं जो पूरे शहर में मरीज को किसी दूसरी दुकान पर नहीं मिलती तथा केवल चिकित्सक के उसी खास मेडिकल स्टोर पर वह दवा मिलती है। ऐसी दवाओं के माध्यम से मरीजों के साथ खुली लूट होती है।

72% लोग मानते हैं कि उनका डॉक्टर कमीशन लेता है

एक सर्वे के मुताबिक सर्वेक्षण में शामिल 60% लोगों का मानना है कि चिकित्सकों को ब्रांडेड दवा एवं उसका जेनेरिक दोनों नामों का उल्लेख साथ में करना चाहिए ताकि लोगों के पास दवा खरीदते समय दवाओं की उपलब्धता एवं उनके मूल्य के आधार पर निर्णय लिया जा सके।
इसी सर्वे में 72% लोग ऐसे थे जिनका मानना था कि उनके चिकित्सक विभिन्न माध्यमों से जैसे जांच करने वाली लेबोरेटरी से, नर्सिंग होम से, हॉस्पिटल से, दवा कंपनियों से, केमिस्ट से, कमीशन लेते हैं।

नेशनल मेडिकल कमिशन ने लिया फैसला वापस

जेनेरिक दवा अनिवार्य रूप से लिखने का फैसला लागू करते ही इंडियन मेडिकल एसोसिएशन तथा फेडरेशन ऑफ रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन ने केंद्र सरकार में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडाविया जी से संपर्क करके अपना विरोध जताया। फैसले के कुछ ही दिनों बाद नेशनल मेडिकल कमीशन ने डॉक्टरों के जेनेरिक दवा लिखने की अनिवार्यता वाले फैसले पर रोक लगा दी तथा कहा कि जेनेरिक दवा के साथ अन्य दवाएं भी डॉक्टर लिख सकते हैं।
 

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