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                <title>जनवरी - योग संदेश</title>
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                            <item>
                <title>सफलता के सूत्र</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="center"><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण</span></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1478/safalta-ke-sutra"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/094.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सभी लोग अपने जीवन में सफल होना चाहते हैं। कई बार लोग मुझसे सफलता के सूत्र जानना चाहते हैं। उनकी जिज्ञासाओं को ध्यान में रखते हुए हम यहाँ सफलता के कुछ सूत्र प्रस्तुत कर रहे हैं-</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">एक ही जिन्दगी में व्यक्ति सारे कामों में सफल नहीं हो सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जिसमें वह सफल हो सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे करने के लिए भी उसके पास आधारभूत ज्ञान का होना अनिवार्य है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी वस्तु की प्राप्ति की इच्छा जितनी तीव्र होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति उतनी ही शीघ्रता से कर्म कर उस वस्तु को प्राप्त कर लेगा।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">उपलब्धि और सुख की जितनी बड़ी चाह मन में होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे पूरा करने के लिए उतना ही बड़ा पुरुषार्थ भी करना पड़ेगा।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अकेले पुरुषार्थ से ही किसी को सफलता नहीं मिलती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु जो सफल होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना पुरुषार्थ के कदापि नहीं होते।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">मंजिल सदा उन्हीं को मिलती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो उसे पाने की राह पर चलते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">योजनाबद्ध तरीके से पुरुषार्थ करके व्यक्ति सफलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्धि और सुख-शांति को प्राप्त कर सकता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">घंटे और मिनट देख-देखकर कार्य करने वाला व्यक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घंटे और मिनट के हिसाब से ही प्रगति कर पाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">शारीरिक-मानसिक शक्ति बढ़ाने के लिए पर्याप्त व्यायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान व विश्राम करने वाले व्यक्ति अपनी बढ़ी हुई शक्ति के द्वारा अधिक कार्य कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उतने ही अनुपात में सफलता भी पा लेते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिकूलता में भी बिना रुके तेजी से आगे बढऩे वाला व्यक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुकूलता में तो और भी तेजी से आगे बढ़ता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जो व्यक्ति जितना अधिक सांसारिक सुख-भोग की इच्छाओं में डूबता जाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह अपने लक्ष्य से उतना ही अधिक दूर होता जाएगा।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बड़े कार्य करने वाला व्यक्ति मोह-माया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ममता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभिमान और द्वेष आदि आंतरिक विकारों से परे होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">मोह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभिमान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वेष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंसा और झूठ आदि दुर्गुण जीवन में जितने कम होंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम परमात्मा के उतने ही निकट होंगे।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान के अनुरूप संकल्प</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संकल्प के अनुरूप इच्छा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इच्छा के अनुरूप कर्म और कर्म के अनुरूप ही फल प्राप्त होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">वैराग्य भाव हो तो व्यक्ति मुसीबतों में भी मस्ती से काम करता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">उत्साह हमारे अंदर बाधाओं से टकराने और तेज गति से काम करने का सामथ्र्य पैदा कर सफलता की ओर तेजी से ले जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कार्य के अच्छे से न होने का एक कारण मन की चंचलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे योगाभ्यास से दूर किया जा सकता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">काम करते समय यदि उससे मिलने वाले फल की इच्छा मन में बनी रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो काम पूर्ण एकाग्रता के साथ नहीं हो पाता।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">एकाग्रता होने पर ही विषय को देखना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समझना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">याद करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार में लाना और फिर सफलता पाना संभव है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि मन एकाग्र हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु बुद्धि और स्मृति कमजोर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो बहुत पढऩे पर भी ज्ञान और लाभ थोड़ा ही प्राप्त होगा।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सफल होने के लिए तीव्र स्मृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीव्र स्मृति के लिए एकाग्रता और एकाग्रता के लिए प्राणायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धारणा व ध्यान का अभ्यास जरूरी है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी विषय को अच्छी तरह देखना-सुनना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे अच्छे से समझना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समझे हुए को स्मृति में दृढ़ करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और फिर उसे ही व्यवहार में उतारना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही ज्ञान प्राप्ति का सर्वोत्तम तरीका है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">तत्काल सही फैसले लेने के लिए तीव्र बुद्धि का होना अनिवार्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि तीव्र बुद्धि के लिए अनिवार्य है स्वाध्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान और समाधि।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कार्य को तेज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर बहुत तेज और फिर सबसे तेज गति से करने वाला उसे सबसे पहले पूरा कर लेता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरों को कष्ट दिए बिना यदि सच्चाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईमानदारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्ठा और पूरी शक्ति से समर्पित होकर कार्य करते रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो सफलता के रास्ते अपने आप बनते जाते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">छोटी और अस्थायी सफलता तो व्यक्ति को अपनी कार्यदक्षता के कारण मिल सकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु बड़ी और स्थायी सफलता पाने के लिए श्रेष्ठ चरित्र व पूर्ण समर्पण भी साथ में होना अनिवार्य है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जब काम के प्रति श्रद्धा हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दृढ़ संकल्प हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे निरंतर समय दिया हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहनशीलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्साह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकाग्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैराग्य और पूरा समर्पण हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अविलंब सफलता की संभावना बढ़ जाती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिस्पर्धा हमेशा खुद से हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि हमारा हर अगला कदम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे पिछले कदम से बेहतर हो।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">हम खुद-ब-खुद बड़े नहीं बन जाते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि हमारे अच्छे कामों को देखकर समाज ही हमें बड़ा बनाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">काम में जितना अधिक समय देंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उतनी ही अधिक सफलता पाएंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन समय देने में अति कर देंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हानि भी उठाएँगे।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">भौतिक साधनों की अपेक्षा अपने चरित्र के सहारे बड़ा बनना ही समाज की दृष्टि में बड़ा बनना है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कार्य को अच्छा-बुरा होने के आधार पर  ही शुरू करें या त्याग करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि अपनी पसंद-नापसंद के आधार पर।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सफलता का कोई शॉर्टकट न पहले कभी था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न है और न आगे कभी होगा।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ी-बड़ी डिग्री हासिल कर लेना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफलता के शिखर पर पहँुचने के लिए अनिवार्य नहीं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">आदर्श व्यक्ति को सामने रखकर जब हम काम करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ये एहसास होता है कि उस स्तर तक पहुँचने के लिए हमें अभी और कितना तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ और साधना करनी है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">साधन भले ही कितने भी कम क्यों न हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थी को प्रगति से कोई नहीं रोक सकता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">काम कितना भी बड़ा क्यों न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग्य व्यक्तियों को जिम्मेदारियाँ बाँट देने से वह सरलता और तेजी से पूरा हो जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">एक क्षेत्र में जनता की श्रद्धा अर्जित किया हुआ योग्य व्यक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब दूसरे क्षेत्र में कदम रखता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह लोगों में अपने प्रति विद्यमान श्रद्धा के बलबूते अपेक्षाकृत कम समय व श्रम में सफल हो जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">काम कराने वाले के साथ यदि काम करने वाला भी बुद्धिमान हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इससे समय व श्रम की बचत होने के साथ-साथ काम तेजी से पूरा होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">एक विशेषज्ञ कम समय में ही बड़ा काम अच्छे से कर लेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि एक अनाड़ी बहुत समय लगाकर भी उसी काम को बनाने की बजाए बिगाड़ देगा।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि दिनचर्या व्यवस्थित होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जीवन व्यवस्थित होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन में एकाग्रता व शांति होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे सफलता की राह में बढऩा भी आसान होगा।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जनता की माँग के अनुरूप निर्मित उत्पाद बाजार में छा जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे दंतकांति टूथपेस्ट। इसका पेस्ट या जैल वाला रूप है नयी पीढ़ी के लिए और उसमें जो जड़ी-बूटी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे पुरानी पीढ़ी के लिए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि उत्पाद सस्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुणवत्तापूर्ण व उपयोगी हो और उत्पाद निर्माता की छवि ईमानदार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक व देशभक्त की हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उस उत्पाद के प्रति लोगों का विश्वास बढऩे से वह बाजार में छा जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक व्यक्ति का व्यापार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मात्र उसका व्यापार न होकर देश की अर्थव्यवस्था मजबूत बनाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोजगार बढ़ाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जनता के जीवन स्तर को ऊँचा उठाने और धर्म व संस्कृति के संरक्षण का एक माध्यम भी होता है।  </span></h5>
</li>
</ul>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1478/safalta-ke-sutra</link>
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                <pubDate>Tue, 01 Jan 2019 21:57:16 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आवासीय शिक्षण संस्थान 'पतंजलि गुरुकुलम्’ का उद्घाटन</title>
                                    <description><![CDATA[<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#C2E0F4;border-color:#C2E0F4;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(194,224,244);">
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि गुरुकुलम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्या की गंगोत्री है: श्री मोहन भागवत</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ की आत्मा है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि गुरुकुलम्</span>’ : <span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्रता के बाद सर्वप्रथम पतंजलि ने स्वदेशी के श्रेष्ठ विकल्प प्रस्तुत किये : आचार्य महामण्डलेश्वर</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति के पुनर्जागरण का प्रार</span><span lang="hi" xml:lang="hi"></span><span lang="hi" xml:lang="hi">भ है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि गुरुकुलम्</span>’: <span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य आचार्य बालकृष्ण जी महाराज</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैदिक संस्कृति की पुन:</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिष्ठापना हेतु शिक्षा के क्षेत्र में अभिनव क्रांति </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि गुरुकुलम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">आवासीय शिक्षण संस्थान का उद्घाटन वैदिक सनातन हिन्दू धर्म संस्कृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभ्यता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कार और उसकी संवेदनाओं के संरक्षक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सबल सम्पोषक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरसंघ चालक श्री</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1479/avasiya-shikshan-sansthan-patanjali-gurukulam-ka-udghatan"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/043.jpg" alt=""></a><br /><table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#C2E0F4;border-color:#C2E0F4;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(194,224,244);">
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि गुरुकुलम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्या की गंगोत्री है: श्री मोहन भागवत</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ की आत्मा है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि गुरुकुलम्</span>’ : <span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्रता के बाद सर्वप्रथम पतंजलि ने स्वदेशी के श्रेष्ठ विकल्प प्रस्तुत किये : आचार्य महामण्डलेश्वर</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति के पुनर्जागरण का प्रार</span><span lang="hi" xml:lang="hi"></span><span lang="hi" xml:lang="hi">भ है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि गुरुकुलम्</span>’: <span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य आचार्य बालकृष्ण जी महाराज</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैदिक संस्कृति की पुन:</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिष्ठापना हेतु शिक्षा के क्षेत्र में अभिनव क्रांति </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि गुरुकुलम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">आवासीय शिक्षण संस्थान का उद्घाटन वैदिक सनातन हिन्दू धर्म संस्कृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभ्यता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कार और उसकी संवेदनाओं के संरक्षक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सबल सम्पोषक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरसंघ चालक श्री मोहन भागवत जी के कर कमलों द्वारा सम्पन्न हुआ। योगग्राम के समीप शहर के कोलाहल से दूर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पहाड़ों की तलहटी व नदी के तट पर स्थित यह गुरुकुलम् प्रकृति की सुरम्य गोद में स्थित है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो प्राचीन गुरुकुलों का स्मरण कराता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके उद्घाटन अवसर पर श्री भागवत ने कहा कि गुरुकुल अपने आप में एक विशिष्ट शब्द है। गुरुकुल में गुरु अपने छात्रों को अपना कुलवाहक मानकर तैयार करते हैं तथा दीक्षित कर उन्हें मनुष्य बनाते हैं। गुरुकुल में विद्यार्थियों को पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ मनुष्यता के गुण सिखाये जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें श्रेष्ठ नागरिक बनाया जाता है। गुरुकुल में गुरु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुस्तकों के साथ-साथ अपने आचरण व व्यवहार से सिखाता है। गुरुकुल के उत्कृष्ट यशस्वी प्रयोग निरन्तर चलने चाहिए। श्री भागवत ने कहा कि पतंजलि गुुरुकुलम् से निकले छात्र गाँव-गाँव में गुरुकुलों की स्थापना करेंगे। यह गुरुकुल विद्या की गंगोत्री है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ से एक अखण्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अजस्र ऊर्जा का स्रोत निकलेगा। उन्होंने कहा कि ज्ञान अनंत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल विषयों को गिनकर ज्ञान का आँकलन नहीं किया जा सकता। आज विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भौतिकी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रसायन आदि अनेक विषयों का ज्ञान विद्यार्थियों को दिया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु यह सम्पूर्ण ज्ञान नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान वह है जो मनुष्य को मनुष्य बनाए। नैतिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मौलिक तथा संस्कृतिपरक ज्ञान प्रदान करने वाले संस्थानों का देश में अभाव है। उन्होंने कहा कि जन्म-जन्मांतर के पुण्य कर्मों से मनुष्य देह प्राप्त होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे व्यर्थ न गवाएँ। मनुष्य अपने कर्मों से ही श्रेष्ठ बन सकता है। जिसकी आत्मीयता का दायरा विश्वव्यापी हो गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह सर्वश्रेष्ठ मनुष्य है। भारत यह वैदिक ज्ञान पूरे विश्व को प्रदान करेगा।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/055.jpg" alt="05"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् राम की आत्मीयता का दायरा इतना विशाल था कि हम उनको भगवान् मानते हैं। राम किसी मत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्प्रदाय के नहीं थे। उन्हें भगवान् न मानने वाले भी उन्हें आदर्श पुरुष मानते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर पूज्य योगर्षि स्वामी रामदेव जी महाराज ने कहा कि हम आशंकित रहते थे कि भारत की इस गौरवमयी संस्कृति व ऋषियों की वैदिक ज्ञान परम्परा का क्या होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु इन नन्हे ऋषिकुमारों को देखकर लगता है कि </span>2050<span lang="hi" xml:lang="hi"> तक भारत पुन: विश्व गुरु बन जाएगा। ऋषियों की संस्कृति को अंगीकार कर ये ऋषिपुत्र निश्चित ही भारतीय संस्कृति के गौरवमयी इतिहास का पुनर्जागरण करेंगे। पतंजलि योगपीठ वैदिक संस्कृति का ध्वजवाहक तथा अपने पूर्वजों के संकल्पों व आदर्शों का वाहक है। उन्होंने कहा कि पतंजलि गुरुकुलम्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ की आत्मा है। राममंदिर के विषय में स्वामी जी महाराज ने कहा कि राम इस राष्ट्र की आन-बान-शान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति व आदर्श हैं। राम भारत के सभी सम्प्रदायों के पूर्वज हैं। राम इस देश का स्वभाव है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा हर भारतीय की रग-रग में बसे हैं।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/035.jpg" alt="03"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यक्रम में जूनापीठाधीश्वर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज ने कहा कि उपकरणों के युग में भी विवेकशील मानव ही श्रेष्ठ है। कृषि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद व शिक्षा के क्षेत्र में पतंजलि द्वारा किये प्रयोग दैवीय हैं। निरन्तरता से जारी ये प्रयोग इस बात का प्रमाण है कि यहाँ भागवत सत्ता मौजूद है। आज घर-घर में पतंजलि के स्वदेशी उत्पाद उपलब्ध हैं। स्वतंत्रता की अग्नि स्वदेशी की संवदेना की ही अग्नि थी। आजादी के बाद देश में वर्षों तक स्वदेशी की बात की गई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु पतंजलि ने सर्वप्रथम स्वदेशी को सर्वश्रेष्ठ विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया। मैं पतंजलि गुरुकुलम् में भारत का भविष्य देख रहा हूँ। यहाँ पढऩे वाले बच्चे देश के भविष्य को गढ़ेंगे। संस्कृत का महत्त्व बताते हुए उन्होंने कहा कि संस्कृत आज पूरे विश्व में प्रभावशाली भाषा के रूप में जानी जा रही है। अनेक देशों ने संस्कृत भाषा को अनिवार्य कर दिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें जर्मनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीदरलैण्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उरुग्वे आदि प्रमुख हैं। पतंजलि गुरुकुलम् की स्थापना से मैं आह्लादित हूँ कि अब कोई पाश्चात्य सभ्यता हमें दासता की जंजीरों में नहीं बाँध सकेगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने कहा कि यह मात्र एक संस्था का उद्घाटन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु एक संस्कृति के पुनर्जागरण का प्रारम्भ है। पतंजलि योगपीठ के माध्यम से अनेक क्षेत्रों यथा- योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राकृतिक चिकित्सा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुसंधान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृषि व स्वदेशी क्रान्ति के बाद अब शिक्षा क्रान्ति का शंखनाद हो रहा है। वैदिक गुरुकुलम्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्यकुलम्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि विश्वविद्यालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद महाविद्यालय व पतंजलि गुरुकुलम् हमारी शिक्षा की क्रान्ति के प्रमुख चरण हैं। आचार्य जी ने कहा कि श्री मोहन भागवत जी भारत की एकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अखण्डता व भारतीय संस्कृति के मूल्यों को आगे बढ़ाने के लिए पुरुषार्थरत हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यक्रम में पूज्य गुरुदेव आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज ने कहा कि हमारे जीवन में समृद्धि के साथ-साथ संस्कारों का सौन्दर्य भी हो। हमारे जीवन का अन्तिम लक्ष्य अपनी गहन शान्ति में रहते हुए अखण्ड पुरुषार्थ करना है। हम अपने जीवन में पूर्णता का अनुभव करते हुए मानवमात्र की सेवा को ही अपना परम धर्म मानें। उन्होंने कहा कि हम सभी सौभाग्यशाली हैं कि मानव निर्माण की इस पुण्यधरा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि गुरुकुलम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के उद्घाटन कार्यक्रम में सम्मिलित हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर पतंजलि गुरुकुलम् के छात्रों ने गीता व चाणक्य नीति के कण्ठस्थ श्लोकों तथा अष्टाध्यायी का वाचन किया। छात्र-छात्राओं ने योग की विभिन्न प्रस्तुतियाँ दीं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यक्रम में मुख्य केन्द्रीय प्रभारी साध्वी देवप्रिया जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ. जयदीप आर्य जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री राकेश कुमार जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुख्य महाप्रबंधक श्री ललित मोहन जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षेत्र के विधायक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निकटवर्ती गाँवों के प्रधान व हजारों की संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सरसंघ चालक अपने दो दिवसीय दौरे पर पतंजलि योगपीठ पधारे थे। इस दौरान इन्होंने पतंजलि द्वारा संचालित गतिविधियों का निरीक्षण भी किया। श्री भागवत ने पतंजलि फूड एवं हर्बल पार्क</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि अनुसंधान संस्थान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि हर्बल गार्डन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि गौशाला आदि परिसरों का भ्रमण कर पतंजलि द्वारा जनहित में किये जा रहे कार्यों की प्रशंसा की। उन्होंने पतंजलि हर्बल गार्डन में पौधा भी रोपित किया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>भारतीय शिक्षा </category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Jan 2019 21:54:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वक्ष, उदर, व त्वचा रोग निवारक आयुर्वेदिक घटक</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">आचार्य बालकृष्ण</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1480/vanaushadiyon-me-swasthya"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/355.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/tulsiii.jpg" alt="tulsiii"></img></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स</span><span lang="hi" xml:lang="hi">र्व रोगनिवारक जीवनीय शक्ति वर्धक तुलसी को प्रत्यक्ष देवी कहा गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि सर्वत्र सुलभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुगन्धित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुन्दर तथा इससे उपयोगी औषधि मनुष्य जाति के लिये कोई और नहीं है। तुलसी के धार्मिक महत्त्व के कारण हर-घर आँगन में इसके पौधे लगाये जाते हैं। तुलसी की कई प्रजातियाँ मिलती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें श्वेत व कृष्ण प्रमुख हैं। कृष्ण तुलसी के पत्र तथा शाखाएँ कुछ बैंगनी तथा कृष्ण आभा लिए होते हैं। इसके अतिरिक्त </span>Ocimum basilicum, O. gratissimum<span lang="hi" xml:lang="hi"> आदि जातियाँ भी काफी महत्त्व की हैं। चरक संहिता के श्वासघ्न दशेमानि तथा शिरोविरेचन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृमि व विष चिकित्सा के लिए अनेक स्थानों पर तुलसी का प्रयोग किया गया है तथा सुश्रुत संहिता में आचार्य सुश्रुत ने तुलसी के पत्तों को शिरोविरेचनार्थ प्रयोग करने के लिये कहा है।</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बाह्यस्वरूप</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसका साधारणतया </span>30-60<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी. तक ऊँचा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सीधा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुशाखित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुगन्धित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुलायम रोमश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुवर्षायु शाकीय पौधा अथवा क्षुप होता है। इसके काण्ड का अधोभाग कुछ काष्ठीय एवं शाखाएँ साधारणतया बैंगनी-रक्तवर्ण की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लगभग चतुष्कोणीय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सीधी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आरोही अथवा फैली हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुलायम रोमों से आवरित होती हैं। इसके पत्र सरल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विपरीत</span>, 2.5-6.3<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी. लम्बे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विभिन्न चौड़ाई के लगभग </span>1-3<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी. तक चौड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दीर्घवृत्ताकार-दीर्घायत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों पृष्ठ पर रोमश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूक्ष्म ग्रन्थिमय बिन्दुकित होते हैं। इसके पुष्प छोटे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वेत अथवा बैंगनी अथवा रक्त वर्ण के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सघन-चक्करदार अत्यधिक तनु</span>, 15-20<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी. लम्बे असीमाक्ष में होते हैं। इसके फल सूक्ष्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लगभग गोलाकार अथवा चौड़े दीर्घायत अथवा नुकीले अण्डाकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अल्प सम्पीडित होते हैं। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल जुलाई से अक्टूबर तक होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उपरोक्त वर्णित तुलसी की प्रजाति के अतिरिक्त निम्नलिखित प्रजाति का प्रयोग चिकित्सा के लिए किया जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>Ocimum americanum Linn.</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> (सुमञ्जरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वन्य बर्बरी)- </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह </span>25-60<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी. ऊँचा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शाखित तथा सुगन्धित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शाकीय पौधा है। इसका काण्ड काष्ठीय तथा चतुष्कोणीय होता है। पत्तियाँ </span>2.3-5<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी. लम्बी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भालाकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों किनारों पर संकरी तथा वृन्तयुक्त होती हैं। शाखाओं के अंत में लम्बी पुष्प मंजरी पर सफेद रंग के पुष्प आते हैं। इसके बीज गुलाबी रंग के होते हैं तथा पानी में भिगोने से चिपचिपे हो जाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसका पञ्चाङ्ग सुगन्धित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षुधावर्धक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दीपन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वातानुलोमक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वेदजनक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कवकरोधी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवाणुरोधी तथा उत्तेजक होता है।</span></h5>
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#ced4d9;border-color:#CED4D9;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(206,212,217);">
<h4 style="text-align:center;"><strong>श्रद्धेय स्वामी रामदेव जी महाराज का स्वानुभूत प्रयोग</strong></h4>
<h5 style="text-align:justify;">लसी की 7 पत्तियाँ तथा 5 लौंग लेकर उनके टुकड़े करके एक गिलास पानी में पकायें। पानी जब आधा शेष रह जाये, तब थोड़ा सा सेंधा नमक डालकर गर्म-गर्म पी जायें। यह काढ़ा पीकर कुछ समय के लिए वस्त्र ओढक़र पसीना आने दें। इससे ज्वर तुरन्त उतर जाता है तथा सर्दी, जुकाम व खाँसी भी ठीक हो जाती है। इस काढ़े को दिन में दो बार दो-तीन दिन तक ले सकते हैं। छोटे बच्चों को सर्दी-जुकाम होने पर तुलसी व 5-7 बूँद अदरक के रस में शहद मिलाकर चटाने से बच्चों का कफ, सर्दी, जुकाम ठीक हो जाता है। नवजात शिशु को यह अल्प मात्रा में दें।</h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">औषधीय प्रयोग एवं विधि</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">शिरो रोग</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी की छाया-शुष्क मंजरी के </span>1-2<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम चूर्ण को मधु के साथ खाने से शिरो रोग में लाभ होता है। तुलसी के </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> पत्तों को प्रतिदिन पानी के साथ निगलने से बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेधा तथा मस्तिष्क की शक्ति बढ़ती है। इसके तेल को </span>1-2<span lang="hi" xml:lang="hi"> बूँद नाक में टपकाने से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुराना सिर दर्द तथा अन्य सिर के रोग दूर होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिर में लगाने से जुएँ एवं लीखें मर जाती हैं और चेहरे पर मलने से चेहरे का रंग साफ  हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नेत्र रोग</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">5-10<span lang="hi" xml:lang="hi"> बूँद तुलसी पत्र स्वरस को दिन में कई बार आँखों में डालने से रतौंधी में लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नासा रोग</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी के पत्ते या मंजरी को मसलकर सूंघने से पीनस रोग का शमन होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कर्ण रोग</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी पत्र स्वरस को गर्म करके </span>2-2<span lang="hi" xml:lang="hi"> बूँद कान में टपकाने से कर्णशूल का शमन होता है। तुलसी के पत्ते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एरंड की कोंपलें और थोड़े नमक को पीसकर उसका गुनगुना लेप करने से कान के पीछे (कर्णशूल) की सूजन नष्ट होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मुख रोग</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">काली मिर्च और तुलसी के पत्तों की गोली बनाकर दाँत के नीचे रखने से दंतशूल दूर होता है। तुलसी के रस को हल्के गुनगुने पानी में मिलाकर कुल्ला करने से कण्ठ के रोगों में बहुत लाभ होता है। तुलसी रस युक्त जल में हल्दी और सेंधा नमक मिलाकर कुल्ला करने से भी मुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दाँत तथा गले के सब विकार दूर होते हैं। स्वरभंग में तुलसी की जड़ को मुलेठी की तरह चूसते रहने से लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">यकृत् व प्लीहा रोग</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1-2<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम तुलसी को पीसकर छाछ (तक्र) के साथ मिलाकर पीने से कामला (पीलिया) में लाभ होता है। तुलसी के पत्रों को पीसकर खाने से भी कामला में लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजननसंस्थान रोग</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">2-4<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम तुलसी मूल चूर्ण और जमीकन्द चूर्ण को मिलाकर </span>125-250<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिग्रा. की मात्रा में पान में रखकर खाने से स्तम्भन होता है। </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम तुलसी बीज को दूध के साथ सुबह-शाम सेवन करने से धातु दुर्बलता में लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अस्थिसंधि रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>2-4<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम तुलसी पञ्चाङ्ग चूर्ण का सुबह-शाम दूध के साथ सेवन करने से संधिशोथ एवं गठिया के दर्द में लाभ होता है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सियाटिका में तुलसी क्वाथ का पीड़ाग्रस्त वात नाड़ी पर बफारा दें। ऊध्र्वगत वात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्थिगतवात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संधिवात तथा पारद दोषजनित विकारों में इसके पञ्चाङ्ग का बफारा देने से लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वक्ष</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रो</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी पत्र (मंजरी सहित) </span>50<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अदरक </span>25<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम तथा कालीमिर्च </span>15<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम को </span>500<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली. जल में मिलाकर क्वाथ करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चौथाई शेष रहने पर छानकर तथा </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम छोटी इलायची बीजों का महीन चूर्ण मिलाकर </span>200<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम चीनी डालकर पकाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक तार की चाशनी हो जाने पर छानकर रख लें। इस शर्बत को आधी से डेढ़ चम्मच की मात्रा में बच्चों को तथा </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> से ४ चम्मच तक बड़ों को सेवन कराने से खाँसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काली खाँसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुक्कुर खाँसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गले की खराश आदि में फायदा होता है। इस शर्बत में गर्म पानी मिलाकर लेने से जुकाम तथा दमा में बहुत लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी की मंजरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोंठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्याज का रस और शहद मिलाकर चटाने से सूखी खाँसी और बच्चे के दमे में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#1c5a21;border-color:#1C5A21;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(28,90,33);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(255,255,255);"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/355.jpg" alt="35"></img></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(255,255,255);"><strong>तुलसी का पौधा मलेरिया प्रतिरोधी है। तुलसी के पौधों के सम्पर्क में आने से वायु में कुछ ऐसा प्रभाव उत्पन्न हो जाता है कि मलेरिया के मच्छर वहाँ से भाग जाते हैं, इसके पास नहीं फटकते हैं। मलेरिया में तुलसी के पत्तों का क्वाथ तीन-तीन घंटे के अन्तर से सेवन करें। </strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उदर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली. तुलसी पत्र स्वरस में समभाग अदरक स्वरस तथा </span>500<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिग्रा. इलायची चूर्ण मिलाकर लेने से उल्टियाँ बंद हो जाती हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> तुलसी पत्र तथा </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम जीरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों को पीसकर शहद मिलाकर दिन में </span>3-4<span lang="hi" xml:lang="hi"> बार चटाने से अतिसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मरोड़ तथा पेचिश में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>50-60<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली. तुलसी फाण्ट में जायफल का चूर्ण मिलाकर </span>3-4<span lang="hi" xml:lang="hi"> बार पीने से अतिसार में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी पत्र के स्वरस अथवा फाण्ट को दिन में तीन बार भोजन से पहले पिलाने से अजीर्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्निमांद्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बालकों की यकृत् प्लीहा की विकृतियों में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी की </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम मंजरी को पीसकर काले नमक के साथ दिन में </span>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>4<span lang="hi" xml:lang="hi"> बार देने से अपच में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वृक्कवस्ति</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग</span></strong></span></h5>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी के बीज १ ग्राम और जीरे का चूर्ण </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम लेकर उसमें </span>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम मिश्री मिलाकर सुबह-शाम दूध के साथ लेने से मूत्रदाह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूय तथा बस्ति शोथ में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी के बीज मसाने (गुर्दे) की पथरी में भी लाभदायक हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी के </span>1-2<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम पत्रों को पीसकर उसमें मधु मिलाकर सेवन करने से वृक्काश्मरी में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>10-20<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली. तुलसी पत्र स्वरस को प्रतिदिन प्रात: काल पीने से कुष्ठ रोग में लाभ होता है। तुलसी के पत्तों को नींबू के रस में पीसकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वातरक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ आदि पर लेप करने से लाभ होता है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी पत्र स्वरस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चूना तथा गाय का घी इन सभी को एक साथ घोंटकर लगाते रहने से भी कुष्ठ में लाभ होता है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी पत्रस्वरस (</span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> भाग)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नींबू रस (</span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> भाग)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कसौंदी पत्र स्वरस-(</span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> भाग)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीनों को बराबर-बराबर लेकर एक तांबे के बर्तन में डालकर चौबीस घंटे के लिये धूप में रख दें। गाढ़ा हो जाने पर लेप करने से श्वित्र रोग (सफेद दाग) में लाभ होता है। इसको चेहरे पर लगाने से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफेद दाग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">झाँई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चेहरे के दाग तथा अन्य चर्म विकार साफ  होकर चेहरा सुन्दर हो जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी की जड़ को पीसकर सोंठ मिलाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जल के साथ प्रात: लेने से कुष्ठ में लाभ होता है अथवा शहद के साथ दिन में </span>3-4<span lang="hi" xml:lang="hi"> बार चटाने से लाभ होता है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">घावों को शीघ्र भरने के लिये तुलसी के </span>10-20<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम पत्तों को उबालकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीसकर ठंडा करके लेप करना चाहिये। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी स्वरस का लेप करने से व्रणगत कृमियों का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली. तुलसी मूल स्वरस का प्रतिदिन सेवन करने से कुष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दद्रु आदि का शमन होता है। </span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वशरीर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>20<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम तुलसी बीजचूर्ण में </span>40<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम मिश्री मिलाकर महीन-महीन पीसकर </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम की मात्रा में शीत ऋतु में कुछ दिन सेवन करने से वात कफ  रोगों से बचाव होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुर्बलता दूर होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और स्नायु मंडल सशक्त होता है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी का पौधा मलेरिया प्रतिरोधी है। तुलसी के पौधों के सम्पर्क में आने से वायु में कुछ ऐसा प्रभाव उत्पन्न हो जाता है कि मलेरिया के मच्छर वहाँ से भाग जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके पास नहीं फटकते हैं। मलेरिया में तुलसी के पत्तों का क्वाथ तीन-तीन घंटे के अन्तर से सेवन करें। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>20<span lang="hi" xml:lang="hi"> तुलसी दल तथा </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> नग मिर्च दोनों का क्वाथ बनाकर सुबह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोपहर तथा शाम देने से सब प्रकार के ज्वरों में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी पत्र चूर्ण </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> भाग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुंठी चूर्ण </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> भाग तथा पिसी अजवायन </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> भाग को मिलाकर दिन में तीन बार सेवन करने से ज्वर का वेग कम होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बाल</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">लवंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी पत्र तथा टंकण के चूर्ण को पानी में मिलाकर बालकों को पिलाने से उदर विकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कास तथा कफजन्य ज्वर आदि विकारों का शमन होता है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी पत्र स्वरस का प्रयोग शिशुओं में होने वाले रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे- कास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिश्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अतिसार एवं छर्दि की चिकित्सा में किया जाता है।</span></h5>
</li>
</ul>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पोषक उत्पाद</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Jan 2019 21:52:54 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>लोकमङ्गल से आत्ममङ्गल</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">श्रद्धेय गुरुदेव आचार्य प्रद्युम</span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">न जी महाराज<span>  </span></span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1481/lokmangal-se-atmmangal"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/394.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पि</span><span lang="hi" xml:lang="hi">छले अंक में हमने लोकमङ्गल पर विस्तारपूर्वक चर्चा की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब हम आते हैं- आत्ममङ्गल पर। <strong><span style="color:rgb(186,55,42);">आत्ममङ्गल का अर्थ है- परमशान्ति</span></strong></span><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">, <span lang="hi" xml:lang="hi">दु:खमुक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अगाधप्रियता की प्राप्ति।</span></span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"> </span></strong>जहाँ लोकमङ्गल सामथ्र्य के द्वारा घटित होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस सामथ्र्य के सैकड़ों प्रकार हो सकते हैं- लेखक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वक्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैद्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृषक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यापक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्योगपति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुकानदार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुलिसकर्मी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लिपिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सैनिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनेता इत्यादि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ आत्ममङ्गल होता है- सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्याग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान (बोध) व प्रेम के द्वारा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ यह स्पष्ट तौर पर समझ लेना चाहिये कि सामथ्र्य और ज्ञान दोनों अलग-अलग हैं। सामथ्र्य एक शक्ति है और ज्ञान प्रकाश का एक रूप है। यह सदा ध्यातव्य है कि <span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>ज्ञान वह नहीं है जो जाना जाता है</strong></span></span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि वह है</span>, </strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>जिसके द्वारा जाना जाता है।</strong></span> हो सकता है कि किसी के पास शास्त्र का सामथ्र्य हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर ज्ञान न हो। इससे विपरीत भी हो सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान तो हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर शास्त्रीय सामथ्र्य न हो। कुछ ऐसे भी होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनके पास दोनों ही होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हीं को </span><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">'<span lang="hi" xml:lang="hi">श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ</span>’</span></strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे आचार्य शङ्कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी दयानन्द। महर्षि रमण ज्ञानी तो हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु उनके पास शास्त्र की पङिक्तश: व्याख्या करने का सामथ्र्य नहीं है। बहुत सारे विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर्स होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनके पास सामथ्र्य तो है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर वे स्वयं कहते हैं कि हम ज्ञानी नहीं हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान हमारे समक्ष हमारी भूल दिखाकर उसे मिटा देता है। हमारी भूल यह हो रही है कि हमें किसी से भी जो कुछ मिला है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसको हमने अपना समझ लिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने लिये समझ लिया और इससे भी आगे बढ़कर उसे अपना स्वरूप ही समझने लगे। ज्ञान हमें यह दिखाता है कि जिसका वियोग हो सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह हमारा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा वही है जो हमसे कभी वियुक्त न हो। ज्ञान हमें यह भी दिखाता है कि जिसको हम </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">यह</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं हो सकता।  अर्थात् ज्ञान देवता की कृपा से अपने से भिन्न वस्तु या व्यक्ति में ममकृति (मैं का भाव) चली जाती है और वही ज्ञान स्वयं के शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग्यता आदि में अहंकृति का नाश कर देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् ज्ञान हमारे शरीर के साथ हमारे तादात्म्य को तोड़ डालता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान ने हमारी भूल को मिटाया और हमें यह दिखाया कि अपना तो अपने में ही है और इस प्रकार वस्तु-व्यक्ति-पदार्थ-परिस्थिति से हटाकर हमें अकेला खड़ा कर दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् ज्ञान ने हमको इस समस्त संसार से बिना चाह के व अकिंचन बनाकर बिना साथी और बगैर सामान के बना दिया। हम सर्वथा निष्काम व अहंकार रहित हो गए। इस ज्ञान देवता की कृपा से हम केवल या अकेले (</span>Alone)<span lang="hi" xml:lang="hi"> हो गए। हमारी ऐसी स्थिति हो गई कि खोने के लिए कुछ बचा ही नहीं। जब खोने के लिए कुछ बचा ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भय भी जाता रहा। जब अपना करके कुछ शेष ही नहीं रहा अर्थात् कहीं ममता ही नहीं रही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो काम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोध और लोभ भी चला गया। इस प्रकार ज्ञान ने हमको निर्विकार बना दिया। अब हमें केवल इतना करना है कि ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो हमारा पथ प्रदर्शन कर रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका अनादर नहीं करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसको ठीक वैसे ही स्वीकार करना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसा वह है। ज्ञान का अनादर करते ही व्यक्ति के हाथ से आत्ममङ्गल छिन जाता है और आदर करते ही व्यक्ति तत्काल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि भविष्य में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभी वस्तुओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्तियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिस्थितियों से असङ्ग हो जाता है। असङ्ग होते ही स्वाधीन हो जाता है। जो हमारा निजस्वरूप है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह बच जाता है और जो आरोपित है या अध्यस्त है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह हट जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आत्ममङ्गल के लिये एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वह ज्ञान हमारे अनुभव में आ जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके प्रकाश में सब कुछ जाना जा रहा है। जो भी स्वीकृतियाँ हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनको वह ज्ञान हटा देता है। जो जानने में आ रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह स्वीकृति रूप होता है। श्रुति में कहा गया है- <strong><span style="color:rgb(186,55,42);">तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते</span></strong>। तदेव-शब्द से उस तत्व की ओर सङ्केत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो केवल प्रकाशक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकाश्य अर्थ तो यहाँ हो ही नहीं सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि उसका सङ्केत </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इदम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द से किया जा रहा है। प्रकाश्य से सम्पृक्त प्रकाशक भी नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: तदेव शब्द का अर्थ हुआ- शुद्ध प्रकाशके समस्त स्वीकृतियाँ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इदम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के ही अन्तर्गत आती हैं। यद्यपि स्वीकृतियों के दो रूप हैं- एक साधन रूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा असाधन रूप। जैसे- मैं कितना सुन्दर हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धनी हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेखक हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दानी हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भोगी हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसार का रक्षक (</span>Saviour)<span lang="hi" xml:lang="hi"> हूँ या इनके विपरीत कुरूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्धन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञानी या मूर्ख हूँ इत्यादि सब असाधन रूप स्वीकृतियाँ हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु कोई कहे कि मैं ब्रह्मचारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संन्यासी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तापस हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये सब साधन रूप स्वीकृतियाँ हैं। प्रारम्भ में साधन रूप स्वीकृतियों के द्वारा असाधन रूप स्वीकृतियों को हटाया जाता है और फिर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहं ब्रह्मास्मि</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">रूप अन्तिम वृत्त्यात्मक ज्ञान से उन साधन रूप स्वीकृतियों को भी हटा दिया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि वे भी तो आरोपित ही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा निज स्वरूप नहीं हैं। पुन: जैसे अग्नि लकड़ी को भस्म करके फिर स्वयं भी शान्त हो जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे ही वह ब्रह्म का<strong> </strong></span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहं ब्रह्मास्मि</span>’ </strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi">रूप वृत्त्यात्मक ज्ञान भी सभी स्वीकृतियों को मिटाकर स्वयं भी शान्त हो जाता है और मात्र शुद्ध प्रकाशक ज्ञान शेष रह जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहं ब्रह्मास्मि</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इस वृत्तिज्ञान को भी प्रकाशित किया था।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पूर्ण औपनिषद दर्शन इसी एक बात को समझाने के लिए प्रवृत्त है। जैसे-बृहदा. श्रुति (</span>3.8.11) <span lang="hi" xml:lang="hi">में याज्ञवल्क्य ने गार्गी के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा </span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">तद्वा एतदक्षरं गाग्र्यदृष्टं द्रष्ट्रश्रुतं श्रोत्रमतं मन्त्रविज्ञातं विज्ञातृ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्ति मन्तृ नान्यदतोऽस्ति विज्ञात्रेतस्मिन्नु खल्वक्षरे गाग्र्याकाश ओतश्च प्रोतश्चेति।</span></strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong> </strong></span>अर्थात् हे गार्गी! वह अक्षर तत्त्व अदृष्ट है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दृष्टि का विषय न होने के कारण वह किसी के द्वारा देखा नहीं गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु स्वयं दृष्टि स्वरूप होने के कारण द्रष्टा है। इसी प्रकार यह श्रोत्र (श्रवण इन्द्रिय) का अविषय होने के कारण सुना नहीं गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु स्वयं श्रुतिस्वरूप होने से श्रोता है। मन का अविषय होने के कारण यह अक्षर मनन का विषय नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु स्वयं मतिस्वरूप होने से मन्ता है। इसी तरह बुद्धि का अविषय होने के कारण विज्ञात नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु स्वयं विज्ञानस्वरूप होने के कारण विज्ञाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस अक्षर से भिन्न कोई द्रष्टा दर्शन क्रिया का कत्र्ता भी नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह अक्षर ही सर्वत्र दर्शन क्रिया का कत्र्ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार इससे भिन्न कोई श्रोता भी नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह अक्षर ही सर्वत्र श्रोता है। इससे भिन्न कोई मन्ता भी नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पूर्ण मनों के द्वारा सर्वत्र वह अक्षर ही मनन करने वाला है और इससे भिन्न कोई विज्ञाता (विज्ञान क्रिया का कत्र्ता) नहीं है। समस्त बुद्धियों के द्वारा वह अक्षर ही विज्ञान क्रिया का कत्र्ता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हे गार्गी! निश्चय ही इस अक्षर में ही आकाश ओत-प्रोत है। जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो क्षुधादि संसार धर्मों से अतीत सर्वान्तर आत्मा है और जिसमें आकाश ओत-प्रोत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह अक्षर ही पराकाष्ठा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह परागति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह परब्रह्म है और यही पृथिवी से लेकर आकाश तक समस्त सत्य का सत्य है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">केनोपनिषत् श्रुति में भी यही समझाया कि वह सदा ही विज्ञाता बना रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी भी मन-बुद्धि व इन्द्रियों का विषय न होने से विज्ञेय कोटि में नहीं आता। मन-बुद्धि-इन्द्रियों के द्वारा सूक्ष्म-स्थूल पदार्थ जाने जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर वह इनका विषय नहीं बन सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: उसको जानने का एक ही उपाय है कि इन्हें शान्त कर दिया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बस फिर वही शेष रह जाता है- <strong><span style="color:rgb(186,55,42);">अन्यदेव तद् विदितादथो अविदितादधि।</span></strong> (</span>1.3) <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् इस विशाल संसार में विदित-अविदित (स्थूल-सूक्ष्म) के रूप में जो पदार्थ हमारे ज्ञान के विषय बनते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह अक्षर तत्त्व उन सबसे भिन्न ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सदा विषयी ही बना रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी भी विषय नहीं बनता।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">छान्दोग्योपनिषत् श्रुति में भूमा की व्याख्या करते हुए इसी सत्य की तरफ  संकेत किया है- </span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाऽथ</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मत्र्यम्। (</span>7.24.1)</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् जैसे लोकव्यवहार में दृश्य से भिन्न अन्य एक देखने वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुनने वाला या जानने वाला होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब वह अन्य किसी एक-एक इन्द्रिय के द्वारा किसी अन्य द्रष्टव्य श्रोतव्य या ज्ञातव्य विषय को देखता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुनता या जानता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसा भूमातत्त्व में देखने-सुनने या जानने वाला नहीं होता है। वहाँ तो केवल बस वही होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके सिवा और कोई कुछ नहीं होता। अधिक से अधिक हम इतना ही कह सकते हैं- <span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>शिवं शान्तम् अद्वैतं प्रपञ्चोपशमम् (माण्डूक्य- </strong></span></span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>8) </strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वप्रपंच के निवृत्त होने पर शान्ति मात्र शेष रह जाती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>सनातन वैभव</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Jan 2019 21:51:55 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>आन्तरिक शक्तियों को कैसे प्रकट करें</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">साध्वी आचार्या देवप्रिया<span>  </span></span></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1482/antarik-shaktiyon-ko-kaise-prakat-kare"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/meditation-icon-removebg-preview.jpg" alt=""></a><br /><table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#3598DB;border-color:#3598DB;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(53,152,219);">
<h5 style="text-align:justify;"><strong>संसार में जितने भी महापुरुष हुए या वर्तमान में हैं, चाहे वे योग के क्षेत्र में हों, अध्यात्म के क्षेत्र में हों या किसी अन्य खेल आदि क्षेत्र में- सभी महान् व्यक्तियों के जीवन की एक बड़ी विशेषता है कि वे प्रतिदिन उस-उस ज्ञान या कला का अयास करते हैं। ज्ञान और अयास हमारे जीवन के दो महत्त्वपूर्ण पहलू हैं। ज्ञान की बहुत बड़ी महिमा है। सांख्य दर्शन में कहा है, ज्ञानान्मुक्ति: अर्थात् ज्ञान से ही मुक्ति (सब दु:खों से छुटकारा) होती है, ऋते ज्ञानान्न मुक्ति: अर्थात् ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं है। लेकिन ऐसा लगता है कि ज्ञान का परिणाम तभी सामने आता है, जब हम उसका अयास करते हैं। </strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>ज्ञान केवल जानने के लिए नहीं, वह जीने के लिए है। योग दर्शन में भी बताया कि हम अपने सारे दु:खों को, चित्तवृत्तियों को हटाना चाहते हैं, समाधि को पाना चाहते हैं, समस्याओं का समाधान करना चाहते हैं, तो हमें अयास और वैराग्य को धारण करना होगा। अभ्यासवैराग्याभयं तन्निरोध: (योगदर्शन-१.१२) - अभ्यास और वैराग्य से हम मन में आने वाले कष्टकारी विचारों या वृत्तियों को रोक सकते हैं। </strong></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ता में हम सबके प्रतिनिधि के रूप में अर्जुन ने भगवान् श्रीकृष्ण से पूछा कि आपकी सारी बातें ठीक हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसे जीएँ कैसे</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वहाँ श्रीकृष्ण ने  कहा- </span><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अभ्यासेन तु कौन्तेय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैराग्येण च गृह्यते।</span>‘ (</strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>गीता- ६/३५)</strong></span> अभ्यास और वैराग्य के द्वारा मन को रोक सकते हैं या नियन्त्रण में ला सकते हैं। ये दोनों शब्द वैदिक वाङ्मय में बहुत अधिक महत्वपूर्ण हैं। अपने कार्य में कुशलता व पूर्णता लाने के लिए अभ्यास की आवश्यकता होती है। हम सबको यह ज्ञान तो है कि योग करने से बुराइयाँ दूर होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग दूर होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम मनसा-वाचा-कर्मणा शुद्ध होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन यदि योग करेंगे नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो एक भी सिद्ध नहीं होगा। महर्षि दयानन्द ने भी अपने सच्चे स्वरूप को खोजने के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वर के सच्चे स्वरूप को खोजने के लिए आठ-आठ घण्टे समाधि का अभ्यास किया। क्या हम अपने जीवन में उस अभ्यास को महत्व दे रहे हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि पूछा जाए कि हम किस-किस प्रकार के अभ्यास करें</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जो हम सुबह से शाम तक जीते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे ठीक करने का अभ्यास करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे सुबह जल्दी उठने का अभ्यास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वाभाविक रूप से या अनियंत्रित रूप से चल रहे विचारों पर नियंत्रण का अभ्यास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग-प्राणायाम का अभ्यास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छा सोचने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छा बोलने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छा देखने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छा सुनने का अभ्यास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ठीक से खाने का अभ्यास और पुरुषार्थ करने का अभ्यास हम अपने जीवन में करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिस व्यक्ति को अपने जीवन में आगे बढऩा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देश व समाज के लिए कार्य करना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह व्यक्ति अच्छे विचारों का अभ्यास करता है। यदि हमारे विचार अनियंत्रित हों तो गंभीर बीमारियाँ हो सकती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये विचार मनुष्य को कहाँ से कहाँ ले जाकर रख देते हैं। उदाहरण स्वरूप यदि देखें तो श्री राम के राज्याभिषेक के समय मन्थरा के एक उल्टे विचार ने कैकेयी के मन में उल्टे विचारों की बाढ़ को जन्म दे दिया। कैकेयी के मन में तरह-तरह के प्रश्न और शंकाएँ उठने लगीं। फलस्वरूप एक विचार ने पूरा इतिहास ही बदल दिया। यह है गलत चिन्तन का परिणाम और यदि वे इससे उल्टा सोचते तो इतिहास कुछ और होता। अत: हम क्या सोचते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका हमारे मन पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज और राष्ट्र पर सीधा असर पड़ता है। प्रतिदिन घरों में होने वाले सास-बहू के झगड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पति-पत्नी के झगड़े केवल हमारे उल्टे चिन्तन के कारण होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बोलने के अभ्यास में जहाँ नहीं बोलना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ बोलते रहते हैं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ बोलना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ बोलते नहीं। जैसे- द्रौपदी चीर हरण के समय द्रोणाचार्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भीष्म पितामह आदि थोड़ा-सा भी बोल देते कि जो भी लड़ाई-झगड़ा करना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आप करो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मगर यह (द्रौपदी) हमारे कुल की वधु है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे कुल का सम्मान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह हम नहीं होने देंगे। यह एक वाक्य यदि बोल देते तो मर्यादाओं की इतनी हानि नहीं होती। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुबह उठने के अभ्यासों में हम यह सोचते रहते हैं कि महापुरुष सुबह जल्दी उठकर योग-आसन-प्राणायाम-ध्यान-भजन करते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं भी कल से उठकर ऐसा करूँगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सुबह उठ नहीं पाते हैं। अगले दिन अलार्म लगाकर सोते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सुबह अलार्म को बन्द करके पुन: सो जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और आठ बजे तक कैसे सोते रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पता ही नहीं चला। ऐसा क्यों</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा केवल इसलिए कि सुबह जल्दी उठने के अभ्यास को महत्त्व नहीं दिया। इस एक अभ्यास में शिथिलता के कारण योग-आसन-प्राणायाम आदि के भी अभ्यास नहीं हो पाते हैं। हम अक्सर इन कार्यों का चार्ट बना लेते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जल्दी उठ नहीं पाने के कारण सबके सब धरे रह जाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ के अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> का हमारे जीवन में अत्यंत महत्त्व है। आज समाज में पनप रहे भ्रष्टाचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लूट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डकैती के पीछे मुख्य कारण पुरुषार्थ न करने का अभ्यास है। पुरुषार्थी लोगों की समृद्ध व खुशहाल जीवन-शैली को देखकर पुरुषार्थ न करने वाले लोग बिना पुरुषार्थ के भी वैसा ही संसाधनपूर्ण खुशहाल जीवन जीना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन पुरुषार्थ का अभ्यास नहीं होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर वो दूसरों के धन को चुराते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धोखा करते हैं या भ्रष्टाचार करते हैं। यदि हमें भी वैसा ही समृद्धिपूर्ण जीवन जीना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उस व्यक्ति ने जैसा पुरुषार्थ का अभ्यास बनाया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमें भी वैसा ही अभ्यास बनाना होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और अपने बच्चों को भी कठिन परिश्रम का अभ्यास कराना पड़ेगा। पुरुषार्थ के अभाव के कारण ही आज अनेक प्रकार की बीमारियों की वृद्धि हो रही है। उदाहरण के रूप में दिल्ली में श्रद्धेय स्वामी जी महाराज के एक धनाढ्य भक्त रहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने अपने बच्चों को किसी भी प्रकार का कष्ट न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्दी-गर्मी का अहसास ही न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके लिए पूरे घर को ही वातानुकूलित बनवा दिया। उन बच्चों ने कभी बाहर की सर्दी-गर्मी को जाना ही नहीं। पाँच साल बाद जैसे ही उन्हें बच्ची को विद्यालय भेजना पड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बच्ची लगातार सर्दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जुकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नजला आदि रोगों से पीडि़त ही रहती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमेशा डॉक्टर के पास जाना पड़ता है। इसलिए हमें अपने बच्चों को प्रतिकूलताओं में जीने का भी अभ्यास कराना चाहिए। पुरुषार्थ से हमारी रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा सोने का अभ्यास भी ठीक होना चाहिए। आजकल बच्चे देर रात तक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ-कुछ तो तीन बजे तक पढ़ते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर वो दिन में १०-११ बजे तक सोते रहते हैं। धीरे-धीरे उनका स्वास्थ्य बिगड़ जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव रहने लगता है। हमारे ऋषि कहते हैं कि रात को जल्दी सो जाना चाहिए और सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर योग-प्राणायाम आदि करके पढऩा चाहिए। उस समय पढ़ा हुआ जल्दी स्मरण होता है। इसलिए हमारा समय पर सोने का अभ्यास होना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमें सहन करने का अभ्यास भी बनाना चाहिए। कभी-कभी छोटी-छोटी बात में खतरनाक झगड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मरने-मारने की स्थितियाँ बन जाती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कई घर तो छोटी सी बात को सहन न कर पाने के कारण ही टूट जाते हैं। अत: यदि हमें शान्तिपूर्वक जीवन बिताना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो सहन करने का अभ्यास भी करना पड़ेगा। हम ध्यान का अभ्यास भी करें। महर्षि दयानन्द ने ध्यान के अभ्यास पर बहुत अधिक बल दिया है। ध्यान केवल आधे घण्टे बैठकर मन्त्र पाठ करना ही नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि दिन भर उसी शान्त भाव में जीने का अभ्यास और दिन भर आने वाली प्रतिकूलताओं को सहन करने की तैयारी है ध्यान। इसी प्रकार हम स्वाध्याय का भी अ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"></span><span lang="hi" xml:lang="hi">यास करें। हमें अच्छे ग्रंथों के स्वाध्याय का अभ्यास भी करना चाहिए। महर्षि पतंजलि कहते हैं- </span><strong><span style="color:rgb(224,62,45);">'<span lang="hi" xml:lang="hi">तप:स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोग:’।</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विद्यार्थी जब अपने विद्याभ्यास को पूर्ण कर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उपनिषद् के ऋषि भी उन्हें उपदेश देते हैं-<strong> </strong></span><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां मा प्रमद’</span></strong></span> <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वाध्याय और प्रवचन (अपने ज्ञान को दूसरों में बाँटना) में प्रमाद मत करना। क्योंकि गुरु आश्रम में पढ़े हुए विषय को यदि घर जाकर अभ्यास नहीं किया तो वह सारा पढ़ा-पढ़ाया भूल जाएँगे। प्रवचन के लिए भी कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि यदि पढ़कर जाने हुए को दूसरों को नहीं बताया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह स्वयं दूसरों के प्रभाव में आ जाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अथवा उसकी पढ़ी हुई विद्या से संसार का जितना लाभ होना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान का प्रकाश फैलना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह नहीं फैल पाएगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वर के स्वरूप को जानने का अभ्यास हम करें। ईश्वर सब जगह है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निराकार है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वशक्तिमान है आदि अनेक गुण हम बताते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन वे गुण हममें प्रकट या अभिव्यक्त नहीं हो पाते हैं। इसी प्रकार हम कहते हैं कि ईश्वर हमारे अन्दर भी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाहर भी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं पूर्ण हूँ आदि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन यह अभिव्यक्त क्यों नहीं हो पा रहा है। ईश्वर महान् सहनशील है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर हम क्यों असहनशील हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्यों छोटी-छोटी बातों में भी पूर्ण असहज और दु:खी हो जाते हैं। हम कहते हैं कि </span>- <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सारा अस्तित्व ईश्वर ने ही पुरुषार्थ पूर्वक बनाया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर हम पुरुषार्थी क्यों नहीं हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि हमने उन ईश्वरीय शक्तियों को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन भागवत शक्तियों को अभिव्यक्त करने का अभ्यास नहीं किया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी हारमोनियम या अन्य वाद्ययन्त्र में सभी स्वर मौजूद रहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मगर उनकी अभिव्यक्ति तभी होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब उनका हम अभ्यास करते हैं। जिसने कभी अभ्यास नहीं किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह अचानक कोई मधुर स्वर नहीं निकाल पाता है। इसलिए इन ईश्वरीय गुणों को अपने अन्दर अभिव्यक्त करने के लिए हम अपने जीवन में पुरुषार्थ का अभ्यास बनाएँ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><br /></span><span lang="hi" xml:lang="hi"><br /></span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Jan 2019 21:50:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>क्या चाहते है हम</title>
                                    <description><![CDATA[<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#3598DB;border-color:#3598DB;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(53,152,219);">
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व में योग के पर्याय परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज का जीवन-संघर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग-आयुर्वेद व स्वदेशी की पुन:स्थापना के साथ-साथ जनसेवा की पवित्र भावना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने उनके जीवन और विचारों को दिव्य और जन-जन का प्रेरणा स्रोत बना दिया। ऐसे महामनीषी के पावन सान्निध्य में रहते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके अनुकरणीय दिव्य-जीवन और दिव्य-विचारों को संकलित कर अपनी विशिष्ट भावपूर्ण शैली में प्रस्तुत कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग संदेश परिवार के सदस्य डॉ. राधावल्लभ।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">- संपादक</span></strong></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#BA372A;border-color:#BA372A;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(186,55,42);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(255,255,255);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रिय पाठकों! ये मेरी जि़न्दगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यूँ तो आज भी किसी से अलग नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं फर्क है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो सिर्फ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान</span>Ó </strong></span></h5></td></tr></tbody></table>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1483/kya-chahate-hai-ham"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/124.jpg" alt=""></a><br /><table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#3598DB;border-color:#3598DB;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(53,152,219);">
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व में योग के पर्याय परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज का जीवन-संघर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग-आयुर्वेद व स्वदेशी की पुन:स्थापना के साथ-साथ जनसेवा की पवित्र भावना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने उनके जीवन और विचारों को दिव्य और जन-जन का प्रेरणा स्रोत बना दिया। ऐसे महामनीषी के पावन सान्निध्य में रहते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके अनुकरणीय दिव्य-जीवन और दिव्य-विचारों को संकलित कर अपनी विशिष्ट भावपूर्ण शैली में प्रस्तुत कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग संदेश परिवार के सदस्य डॉ. राधावल्लभ।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">- संपादक</span></strong></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#BA372A;border-color:#BA372A;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(186,55,42);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(255,255,255);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रिय पाठकों! ये मेरी जि़न्दगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यूँ तो आज भी किसी से अलग नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं फर्क है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो सिर्फ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान</span>Ó <span lang="hi" xml:lang="hi">का। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">यानि शास्त्रों की जानकारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका व्यावहारिक अनुभव या बोध। शास्त्रों का यही ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब मुझे गुरुजनों के श्रीमुख से मिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आचरण में लाने पर वही ज्ञान मेरे दिव्य-जीवन का निर्माता बन गया।</span></strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इस विवेक सम्मत</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> ज्ञान ने ही मुझे ब्रह्मचारी से संन्यासी बनाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी ज्ञान ने आज मुझे एक आदर्श के रूप में इस संसार में स्थापित भी कराया। ये ज्ञान ही तो है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने मेरा सारा जीवन ही बदल दिया। हाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो मैं कुछ हूँ। और अब इस मुकाम पर उसी ज्ञान को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं आपसे साझा कर रहा हू :-</span></strong></span></h5>
<h4 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सुख सब चाहते हैं</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब मैंने होश संभाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो सबसे पहले खुद से ये जानना चाहा- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं क्या चाहता हू और क्या नहीं</span>?<span lang="hi" xml:lang="hi">’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आखिर मेरे जीवन का लक्ष्य है क्या</span>?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मुझे आज भी याद हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बचपन के वो सुहाने दिन। वो मेरा गाँव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गाँव के बगीचे के खट्टे-मीठे आम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माँ के हाथों बने गोंद के लड्डू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तालाब में तैरने का वो आनंद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब याद है मुझे। उन दिनों यही सब तो मुझे पसंद था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और बचपन के मेरे बहुत से मित्रों को भी। लेकिन जब मैं कुछ बड़ा हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो मेरी ये पसंद बदल गई। तब मन में न वो गाँव रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न बगीचा और न ही कोई खेल। मुझे तो बस पढऩा और योगाभ्यास करना ही अच्छा लगने लगा। और इसीलिए मैं जा पहँुचा खानपुर गुरुकुल। हालांकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस उम्र के मेरे बहुत से मित्रों को सुन्दर कपड़े पहनना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोटर साइकिल पर सैर करना या फिर सिनेमा देखना अच्छा लगता था। कुछ मित्र ऐसे भी थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्हें खुद की तारीफ सुनना बहुत भाता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो किसी को परिवार के साथ सैर-सपाटा रास आता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और कई मित्र पैसे कमाने में ही खुशी महसूस करते थे। यहाँ पसंद भले ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सबकी अलग-अलग दिख रही हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन एक बात जो इन सब में बिल्कुल एक जैसी ही थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वो थी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सुख’</span><span lang="hi" xml:lang="hi">।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">असल में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन सब चीजों के जरिए हमें सुख मिलता था। इससे मैं ये जान गया कि मैं क्या चाहता हू। हाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुख मैं भी चाहता हू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुख दूसरे भी चाहते हैं। योगी हों या भोगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसार में सब </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सुख’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ही तो चाहते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ये जो सुख का अनुभव करने की इच्छा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही तो मानव मात्र की पहली इच्छा है। हम सुख चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए उन चीजों को भी चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो हमें सुख देती हैं। और उन्हीं सुखद चीजों को पाने के लिए हम दिन-रात भाग-दौड़ भी करते हैं।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>सनातन वैभव</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Jan 2019 21:48:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अनुभूति आपकी</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग व आयुर्वेद से कैंसर पर विजय</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मु</span><span lang="hi" xml:lang="hi">झे सर्वप्रथम 2006 में आहारनली के कैंसर के बारे में पता चला। मैंने पी.जी.आई. रोहतक में डॉ. कड़वासर से एलोपैथिक चिकित्सा में उपचार प्रारम्भ किया जिसमें कीमोथैरेपी मुख्य थी। बाद में मुझे सर्जरी कराने की सलाह दी गई किन्तु मैंने सर्जरी कराना उचित नहीं समझा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि मैंने सुना था कि यदि कैंसर सेल्स के साथ छेड़छाड़ की जाए तो ये तीव्र गति से बढ़ते हैं। उस समय मेरा वजन घटकर ३८ किग्रा. तथा हिमोग्लोबिन मात्र ५.५ ग्राम रह गया था। २००६ में ही मैंने राजीव गांधी अस्पताल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिल्ली में दिखाया</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1484/anubhuti-apki"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/343.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग व आयुर्वेद से कैंसर पर विजय</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मु</span><span lang="hi" xml:lang="hi">झे सर्वप्रथम 2006 में आहारनली के कैंसर के बारे में पता चला। मैंने पी.जी.आई. रोहतक में डॉ. कड़वासर से एलोपैथिक चिकित्सा में उपचार प्रारम्भ किया जिसमें कीमोथैरेपी मुख्य थी। बाद में मुझे सर्जरी कराने की सलाह दी गई किन्तु मैंने सर्जरी कराना उचित नहीं समझा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि मैंने सुना था कि यदि कैंसर सेल्स के साथ छेड़छाड़ की जाए तो ये तीव्र गति से बढ़ते हैं। उस समय मेरा वजन घटकर ३८ किग्रा. तथा हिमोग्लोबिन मात्र ५.५ ग्राम रह गया था। २००६ में ही मैंने राजीव गांधी अस्पताल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिल्ली में दिखाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर जयपुर में दिखाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु दोनों जगह सर्जरी ही एकमात्र उपाय बताया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फिर आचार्य बलदेव जी व स्वामी परमानन्द जी के कहने पर मैंने सालवान आश्रम के पतंजलि आयुर्वेद हॉस्पिटल में दिखाया। उससे पहले मैं पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज तथा श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज से मिला था। स्वामी जी ने मुझे योगाभ्यास और प्राणायाम करने को कहा। श्रद्धेय आचार्य जी ने कुछ विशेष औषधियों द्वारा उपचार करने की सलाह दी। शारीरिक कमजोरी के कारण उस समय मैं प्राणायाम करने में असमर्थ था। हुड्डा कॉम्प्लेक्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोहतक स्थित पतंजलि आरोग्य केन्द्र में डॉ. सुशीला की देख-रेख में मेरा उपचार प्रारम्भ हुआ। मैंने चिकित्सक के परामर्शानुसार सभी औषधियों का विधिवत सेवन किया। आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति पर पूर्ण आश्वस्त रहते हुए मैंने गिलोय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सदाबहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीम व पीपल के पत्ते आदि औषधि के रूप में लिये। आहार नली में गाँठ के कारण आहार अन्दर जा पाना अत्यन्त कठिन था। बूंद-बूंद कर औषधि लेता था। प्राणायाम करने में मेरी पत्नी हर सम्भव सहायता देती थी। मैंने थोड़े-थोड़े समय के अन्तराल पर रुक-रुक कर दो से ढाई घण्टे कपालभाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दो से तीन घण्टे अनुलोम-विलोम किया। दिन में ५ बार ५-५ उज्जायी प्राणायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">३ बार २१-२१ भ्रामरी तथा उद्गीथ प्राणायाम किया। योग का मुझे विशेष लाभ मिला। २००८ में मैं लगभग कैंसर के परास्त कर पूर्ण स्वस्थ हो चुका था। मैं अब भी निरन्तर योग व प्राणायाम का अभ्यास करता हूँ। अब मैं पूजा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हवन प्रतिदिन करता हूँ। मेरा वजन अब ७४ किग्रा. तथा हिमोग्लोबिन १६ ग्राम है। अब मैं पूर्ण स्वस्थ व सुखी जीवन का भरपूर आनन्द ले रहा हूँ। मैं पूर्ण आश्वस्त हूँ कि स्वामी जी महाराज योगबल पर कार्य करते हुए भारत को पुन: विश्वगुरु बनाएँगे। </span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">भवदीय</span>,</h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">संजय कुमार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोहतक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरियाणा</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वर्टिगो व कर्ण रोग से मिली मुक्ति</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शु</span><span lang="hi" xml:lang="hi">रू में मुझे अक्सर चक्कर आते रहते थे तथा सिर घूमता रहता था। कानों में साँय-साँय की आवाज गूँजती रहती थी। मैंने फरवरी २०१८ में कुरुक्षेत्र के एक स्थानीय चिकित्सालय में दिखाया जहाँ मुझे वर्टिगो की समस्या का पता चला। मैंने कई जगह उपचार कराया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु कोई आराम नहीं हुआ। मैं ८ मई २०१८ को हरिद्वार स्थित पतंजलि आयुर्वेद हॉस्पिटल आई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ डॉ. दयाशंकर ने मेरा उपचार किया। आयुर्वेदिक उपचार में मुझे चन्द्रप्रभा वटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विषतिन्दुक वटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सारिवादि वटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सारस्वतारिष्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बादाम रोगन तथा ब्राह्मीघृत इत्यादि दिये गये। प्राणायाम के क्रम में कुशल योगशिक्षकों के दिशानिर्देशन में भस्त्रिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कपालभाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुलोम-विलोम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रामरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्गीथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उज्जायी व बाह्य प्राणायाम आदि का अभ्यास कराया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका मुझे विशेष लाभ मिला। मात्र ४४ दिन के उपचार से ही मैं पूर्ण स्वस्थ अनुभव करने लगी। अब मुझे  चक्कर आना तथा कानों में आने वाली अजीब सी आवाज से पूर्ण निजात मिल गया है।</span></h5>
<h5 align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">भवदीया</span></h5>
<h5 align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">बीनू शर्मा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुरुक्षेत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरियाणा</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/473.jpg" alt="47"></img></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>दिव्य अनुभूति</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1484/anubhuti-apki</link>
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                <pubDate>Tue, 01 Jan 2019 21:45:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आध्यात्मिक जीवन की कसौटी 'व्यवहार’</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी अथर्वदेव</span></h5>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1485/adhyatmik-jivan-ki-kasauti-vyavhar"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/336.jpg" alt=""></a><br /><table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#B96AD9;border-color:#B96AD9;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(185,106,217);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(255,255,255);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">यह अमूल्य मानव जीवन ईश्वरीय अनुग्रह का सबसे सुंदर उदाहरण है। जब मानव इस परम अनु<br />कम्पा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> के प्रति कृतज्ञ होता है अर्थात् जब उसे इस जीवन की अमूल्यता का प्रकाश </span><span lang="hi" xml:lang="hi">होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब वह अनायास ही आध्यात्मिक पथ पर आरूढ़ हो जाता है तथा जीवन में लयबद्धता एवं अप्रतिरोध के साथ आगे बढ़ता है। उसे जीवन के प्रत्येक क्षण की अतुल्यता का बोध होता है और वह प्रतिपल जागरूक होकर प्रत्येक क्षण में अपना सर्वस्व लगा देता है।</span></strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">न</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ए सवेरे की नई ऊर्जा के साथ वह प्रमाद से रहित होकर अपने कत्र्तव्यों को फल की अपेक्षा न रखते हुए पूरा करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन ऐसी जिज्ञासा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसी पिपासा विरले लोगों में ही हुआ करती है। श्रीमद्भगवद्गीता (७/३) भी इस बात को प्रमाणित करती है-</span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद् यतति सिद्धये।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वत:।। </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् हजारों-लाखों की बेहोश भीड़ में किसी एक को होश आता है कि जीवन अमूल्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसको व्यर्थ गँवाने से बड़ा और क्या पाप हो सकता है। इस ज्ञान को पाकर वह आध्यात्मिक जीवन अर्थात् भागवत पथ पर अग्रसर होता है। इस सूचना मात्र से कार्य नहीं चलता कि जीवन अतुल्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे होश को बनाए रखने के लिए भी तो अपनी प्रकृति के महाप्रतिरोध का सामना करना पड़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन सब अनिष्ट आदतों को छोडऩा पड़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनका हमने इतने सालों तक खूब स्वागत सत्कार किया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्कार पूर्वक आतिथ्य दिया है। अब तक जिन संस्कारों के साथ हमने अपनत्व पैदा कर लिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब उनसे विरह सहन नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह जानते हुए भी कि वे हमारे लक्ष्य की रुकावटें मात्र हैं। फिर उन होश वालों में से भी कोई एक उस जीवन की पूर्णता को प्राप्त करता है और वो एक वही होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने अप्रमत्त होकर निरन्तर उस होश को बनाए रखा है। अब बात यह आती है कि हम कैसे जानें कि कोई व्यक्ति आध्यात्मिक पथ पर आरूढ़ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे जीवन दृष्टि मिल गई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका केवल एक ही उपाय है- व्यवहार। हम केवल व्यक्ति के व्यवहार से ही जान सकते हैं कि उसका जीवन कितना उन्नत है। उसके एक-एक व्यवहार से उसके प्रयासों की सिद्धि झलकती है। उसकी चेष्टा मात्र से उसके समूचे वातावरण को दिशा मिलती है। उसके कर्म ही उसके जीवन की पूर्णता को स्पष्ट कर देते हैं। वह </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्वेन क्रतुना संवदेत</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इस वेद ज्ञान को चरितार्थ करता है। यदि शास्त्रों की दृष्टि से हम देखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसका स्वरूप कुछ इस प्रकार होगा- </span></h5>
<h4 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महर्षि मनु के धर्म का पालयिता</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(224,62,45);" xml:lang="hi">महर्षि मनु ने धर्म के दस लक्षण दिए-</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(224,62,45);" xml:lang="hi">धृतिक्षमादमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(224,62,45);" xml:lang="hi">धीर्विद्यासत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">धृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षमा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्तेय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शौच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रिय-निग्रह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धैर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अक्रोध- ये धर्म के दस लक्षण उसके लक्ष्य बन जाते हैं। इसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए वह सदैव सजग व अप्रमत्त बना रहता है। ये धर्म के लक्षण उस मनुष्य के व्यवहार को अप्रतिम सौन्दर्य देते हैं तथा वह प्रत्येक के आकर्षण का केन्द्र बनकर सभी को दिव्य दृष्टि प्रदान करता है। </span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गीता का स्थितप्रज्ञ</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीमद्भगवद् गीता में अर्जुन ने पूछा कि हे केशव! वह कौन है जिसकी प्रज्ञा अथर्व है अर्थात् स्थिर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और उस स्थित प्रज्ञ का व्यवहार कैसा होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि व्यवहार ही तो होता है जो दूसरों के लिए प्रेरणा बनता है। उस स्थितप्रज्ञ की कृति कैसी होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह बात अर्जुन केवल इसलिए पूछ रहा है कि एक श्रेष्ठ व आदर्श व्यवहार का उसे पता लग सके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि गीता के तीसरे अध्याय में श्रेष्ठों के आचरण के अनुवर्तन की ही बात कही है। </span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीकृष्ण अर्जुन को स्थित प्रज्ञ का पूरा आचार-विचार व्यवहार बताते हुए कहते हैं कि वह सदा सजग रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समस्त वासनाओं का त्यागी होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विषयों की बाढ़ में कछुए की तरह अपने अंगों को समेट लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दु:खों में अनुद्विग्न रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुखों में तृष्णा नहीं रखता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोध से अछूता रहता है और मन का नियन्ता अर्थात् स्वामी होता है।</span></h5>
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#CED4D9;border-color:#CED4D9;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(206,212,217);">
<h4 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>महर्षि पतंजलि के यम नियमों का धारयिता</strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>वन दृष्टि को प्राप्त करने वाले व्यक्ति के व्यवहार में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह- ये पूरी तरह से प्रतिष्ठित हो जाते हैं। उसकी एक भी चेष्टा यमों के प्रतिकूल नहीं होती। और वह शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय व ईश्वर-प्रणिधान- इन 5 नियमों को धारण कर, उन्हें अपने जीवन में अवतरित कर दूसरों के लिए आदर्श बन जाता है।</strong></h5>
<p><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/marshi-patanjali-removebg-preview.jpg" alt="Marshi-Patanjali-removebg-preview"></img></strong></p>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार हमारे शास्त्रों में ये जितने भी प्रमाण बताए गए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका अंतिम लक्ष्य तो व्यवहार ही है। परम पूज्य स्वामी जी महाराज दृष्टि व कृति की बात कहते हैं। वे कहते हैं कि आपकी दृष्टि अर्थात् ज्ञान तभी सफल हो सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब आप उसे अपने कर्मों में अवतरित कर लेते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने आचरण में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने व्यवहार में उसे जीने लग जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी वह ज्ञान कहलाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्यथा तो वह एक सूचना मात्र है। अध्यात्म पथ पर यह एक बड़ी भ्रांति होती है कि हम केवल ज्ञान को विचारों तक ही सीमित रखकर स्वयं को साधक की संज्ञा देने लगते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर वास्तविकता यह है कि जब धरातल पर अर्थात् व्यवहार में हमारा शारीरिक व मानसिक विषयों से टकराव होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हमारे भीतर का साधक दम तोड़ देता है व उसे लाँघकर लोभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईष्र्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मात्सर्यभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहंकार ये सब स्वयं को स्वतंत्र कर लेते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कहने का तात्पर्य यही है कि विचार मात्र के संघर्ष में अपने जीवन के अतुलनीय क्षणों को मत गँवाओ। परम पूज्य स्वामी जी तीन सत्यों की तरफ ध्यान दिलाते हैं- जानना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जगाना व जीना। तो अगर जान भी लिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जगा भी लिया और जीया नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जानना व जगाना दोनों व्यर्थ हो जाएंगे। अत: स्वयं के प्रति पूर्ण ईमानदारी दिखाते हुए पूर्ण सजगता व धैर्य के साथ हम अपने सामथ्र्य को जानें व जगाएँ और उन्हें जीने के लिए प्रतिपल अपना सर्वस्व लगा दें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>सनातन वैभव</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1485/adhyatmik-jivan-ki-kasauti-vyavhar</link>
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                <pubDate>Tue, 01 Jan 2019 21:43:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पंचकर्म द्वारा कुष्ठ रोग की चिकित्सा</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">वैद्य केतन महाजन </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">विभागाध्यक्ष-पंचकर्म विभाग</span>, <span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">पतंजलि आयुर्वेद हॉस्पिटल</span></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1486/panchkarm-dwara-kushth-rog-ki-chikitsa"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/153.jpg" alt=""></a><br /><table style="border-collapse:collapse;width:100%;height:71px;border-width:1px;background-color:#F8CAC6;border-color:#F8CAC6;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8733%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(248,202,198);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ एक बहुदोष व्याधि है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें दोष अत्यधिक मात्रा में कुपित होते हैं। इसे रक्त प्रदोषज विकार तथा अष्टमहागद के अन्तर्गत लिया गया है। त्वचा में स्पर्श इन्द्रिय होने के कारण स्पर्श की अनुभूति होती है।</span></strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">त्व</span><span lang="hi" xml:lang="hi">चा मानव शरीर का सबसे बड़ा अंग है। त्वचा को देखकर शरीर की प्राकृत तथा विकृत अवस्था का पता लगाया जा सकता है। कुष्ठ शब्द को आमतौर पर त्वचा के विभिन्न रोगों केलिए इस्तेमाल किया जाता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">त्वच: कुर्वन्ति वैवण्र्यं दुष्टा: कुष्ठमुशन्ति तत्।। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अ.हृ.नि. १४/३</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो रोग त्वचा पर तेजी से फैलने वाला तथा त्वचा के प्राकृतिक वर्ण को विकृत करने वाला होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे कुष्ठ कहते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ एक बहुदोष व्याधि है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें दोष अत्यधिक मात्रा में कुपित होते हैं। इसे रक्त प्रदोषज विकार तथा अष्टमहागद के अन्तर्गत लिया गया है। त्वचा में स्पर्श इन्द्रिय होने के कारण स्पर्श की अनुभूति होती है। स्पर्श इन्द्रिय पर किसी भी प्रकार का प्रभाव मन को भी प्रभावित करता है। इसलिए कुष्ठ में शारीरिक तथा मानसिक दोनों ही दोष कारण बताए गए हैं। यह मनोदैहिक रोग (</span>Pshychosomatic Disorder)<span lang="hi" xml:lang="hi"> की श्रेणी में आता है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/455.jpg" alt="45"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पंचकर्म में दोषों को स्नेहन व स्वेदन द्वारा उत्क्लिष्ट करवा कर शरीर के निकटतम मार्ग (मुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नासिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुदा) से बाहर निकाला जाता है। पंचकर्म के अन्तर्गत वमन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विरेचन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बस्ति (अनुवासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निरूह)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नस्य की प्रक्रियाएँ आती हैं। पंचकर्म की प्रक्रियाओं को केवल शोधन के लिए नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु लंघन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बृंहण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेखन तथा शमन के लिए भी उपयोग में लाया जा सकता है।</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ की संप्राप्ति</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ के बताए गए निदान का अधिक मात्रा में सेवन करने से अग्रि तथा वात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कफ- ये तीनों दोष प्रभावित होते हैं। अग्रि और त्रिदोष प्रकुपित होकर पूरे शरीर में फैलकर त्वचा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माँस और लसिका को प्रकुपित करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे क्लेद उत्पत्ति होती है। इससे त्वचा के रंग का बदलना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खुजली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दाह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राग इत्यादि लक्षण उत्पन्न होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो शरीर के विभिन्न अंगों में कुष्ठ उत्पन्न करता है।</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ चिकित्सा</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ रोग की चिकित्सा उसमें पाए जाने वाले सबसे अधिक कुपित दोष के अनुसार की जाती है। कुष्ठ की चिकित्सा शुरू करने से पूर्व उसकी साध्यता या असाध्यता का भली-भाँति ज्ञान करना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एकदोषज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कफवातज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रसगत- सुख साध्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वातपित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कफपित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तमांसगत- कठिनता से साध्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेदोगत- याप्य और त्रिदोषज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्थि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मज्जा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुक्रगत- असाध्य माने जाते हैं। (च.चि. ७/३८)</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">वातोत्तरेषु सर्पिवमनं श्लेष्मोत्तरेषु कुष्ठेषु।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">पित्तोत्तरेषु मोक्षो रक्तस्य विरेचनं चाग्रे।। च.चि. ७/३९</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वातप्रधान कुष्ठ में- घृतपान का सेवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पित्तप्रधान कुष्ठ में- विरेचन तथा कफप्रधान कुष्ठ में- वमन कराया जाता है।</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ में स्नेहपान</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शोधनाङ्ग स्नेहपान- वमन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विरेचन आदि क्रियाओं से पहले शरीर में दोषों को उत्क्लिष्ट करवाने केलिए किया जाता है। कुष्ठ के स्निग्ध तथा रूक्ष दो प्रकार बताए गए हैं। रूक्ष कुष्ठ में स्नेहपान सम्यक् स्निग्ध लक्षण तक कराया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि स्निग्ध कुष्ठ में स्नेहपान कोष्ठस्निग्ध लक्षण तक कराया जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/502.jpg" alt="50"></img></span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ में स्वेदन</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ में तीक्ष्ण स्वेदन का निषेध बताया गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु मन्द स्वेदन जैसे- नाड़ी स्वेदन और प्रस्तर स्वेद कुष्ठ में उसकी अवस्था और लक्षण के अनुसार प्रयोग किए जा सकते हैं। द्रव स्वेद का उपयोग भी किया जा सकता है।</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ में शोधन </span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्यों ने कुष्ठ में शोधन का वर्णन (अ.हृ. १९/९६) करते हुए कहा है कि १५-१५ दिन में वमन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महीने में एक बार स्रंसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">६ महीने में रक्तमोक्षण तथा ३ दिन में नस्य करवाना चाहिये।</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ में वमन</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकुपित दोषों को मुख मार्ग से बाहर निकालना वमन कहलाता है। कफप्रधान कुष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आमाशय स्थित दोष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर के ऊध्र्व भाग में घाव आदि दोष तथा वसंत ऋतु में वमन कराया जाता है। वमन के लिए मदनफल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पटोल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निम्ब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुटज आदि औषधियों का प्रयोग किया जाता है। </span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ में विरेचन</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकुपित दोषों को गुदा मार्ग से बाहर निकालना विरेचन कहलाता है। पित्तप्रधान कुष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधोआमाशय स्थित दोष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पक्वाशय स्थित दोष तथा अधोदेह व्यक्त कुष्ठ में विरेचन कराया जाता है। विरेचन के लिए शरद ऋतु उत्तम मानी गई है। त्रिवृत्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आरग्वध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दन्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्रिफला आदि द्रव्यों का प्रयोग विरेचन के लिए किया जाता है। कुष्ठ में नित्य विरेचन का उल्लेख सुश्रुत संहिता में मिलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ अल्प बल वाले रोगी को ५</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">६</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">७ तथा ८ दिन तक विरेचन औषधि का प्रात:काल सेवन कराया जाता है।</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ में बस्ति</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ में बस्ति का निषेध बताया गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु जिस कुष्ठ में वात दोष प्रबल हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाल तथा वृद्ध में बस्ति का प्रयोग किया जा सकता है। तिक्त द्रव्यों से साधित निरुह बस्ति तथा मरिच्यादि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुड़ुच्यादि और कायाकल्प तेल की अनुवासन बस्ति का प्रयोग किया जा सकता है।</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ में नस्य</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नासिका में औषधि को डालकर ऊध्र्व जत्रु स्थित प्रकुपित दोषों को बाहर निकालना नस्य कहलाता है। कफप्रधान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृमिज तथा ऊध्र्व जत्रु स्थित कुष्ठ में नस्य का प्रयोग किया जाता है। सेंधा नमक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काली मिर्च</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विडंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिप्पली आदि द्रव्यों का नस्य के लिए प्रयोग किया जाता है।</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ में रक्तमोक्षण</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दूषित रक्त को शरीर से शस्त्र तथा अशस्त्र विधियों से बाहर निकालना रक्तमोक्षण कहलाता है। पित्तप्रधान तथा रक्तप्रधान दोषों में रक्तमोक्षण किया जाता है। सिरावेध प्रच्छन्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जलौका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शृंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अलाबु और घटियंत्र द्वारा रक्तमोक्षण किया जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आमतौर पर कुष्ठ को दुश्चिकित्सीय कहा गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु शोधन के माध्यम से इस रोग के लक्षणों पर काबू पाया जा सकता है। पंचकर्म के साथ शमन औषधि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रसायन तथा पथ्य का पालन करने से कुष्ठ रोग पर नियंत्रण पाया जा सकता है।</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ में पथ्य-अपथ्य</span></strong></span></h4>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ रोग में घृत का सेवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गौधूम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूँग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मसूर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शहद का सेवन लाभकारी है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">गन्ना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खट्टे पदार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उड़द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नवीन शाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुड़ का सेवन अहितकारी है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ के रोगी को मैथुन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माँस तथा मद्य का सेवन त्याग देना चाहिए। पुराने चावल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूँग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यव आदि अन्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिक्त रस वाला शाक हितकर होता है। (चक्रदत्त) </span></h5>
</li>
</ul>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>रोग विशेष</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1486/panchkarm-dwara-kushth-rog-ki-chikitsa</link>
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                <pubDate>Tue, 01 Jan 2019 21:41:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>देश में एक नवीन विचार क्रान्ति की आवश्यकता व महत्त्व</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज</span></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1487/desh-me-ek-navin-vichar-kranti-ki-avashyakta-v-mahatva"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/513.jpg" alt=""></a><br /><table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#F8CAC6;border-color:#F8CAC6;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8733%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(248,202,198);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">यह सर्वमान्य है कि आज भारत को एक नवीन विचार क्रान्ति की आवश्यकता है। प्राचीनकाल से ही भारत में अत्यंत सुव्यवस्थित राज्यतंत्र और राजनीतिक व्यवस्थाएँ रही हैं। लगभग सभी प्रकार की राजनीतिक व्यवस्थाओं का अनुभव दीर्घकाल से ही भारत के परिपक्व समाज को रहा है।</span></strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">रतीय समाज ने अपने प्रचंड और बहुमुखी पुरुषार्थ के द्वारा आधे भारत में छल-बल से कब्जा किए हुए इंग्लैंड के कतिपय धूर्त समूहों के द्वारा फैलाए गए ब्रिटिश राज्य को समाप्त किया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से इंग्लैंड आंतरिक रूप से पूरी तरह जर्जर हो चुका था। वस्तुत: उसकी और फ्रांस की रक्षा भारतीय सैनिकों ने ही की थी अन्यथा जर्मनी उनको पीस ही डालता। अंग्रेज लोग नेताजी सुभाषचंद्र बोस से बुरी तरह घबरा रहे थे और उन्हें इस बात की पूरी आशंका थी कि अचानक नेताजी पुन: एक नई शक्ति से प्रकट हो सकते हैं और तब हमारे इस ढहते हुए दुर्ग को अंतिम रूप से धक्का दे दिया जाएगा। इसलिए उन्होंने सोचा कि वह स्थिति आए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उससे पहले ही अपने प्रियजनों को भली भाँति ब्रिटिश शासन चलाने की जिम्मेदारी हस्तांतरित करके चले जाना चाहिये। इसीलिए पहले उसे ट्रांसफर ऑफ रेस्पोंसिबिलिटी कहा गया और बाद में जो लोग इस रेस्पोंसिबिलिटी को उनके एजेंट की तरह संभालने को तैयार हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उनके अनुरोध से इसे ट्रांसफर ऑफ  पॉवर कहा गया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस बीच जो लोग लंदन जाकर और अंग्रेजों से दोस्ती करके वहाँ की राजनीति सीख चुके थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके प्रति अपने आदर और बंधुभाव के कारण स्वदेशी भारतीय समाज उनके स्वभाव का अनुमान लगाने में विफल रहा और इसका फायदा उठाकर उन लोगों ने देश के साथ बहुत बड़ा छल किया। छल यह किया कि उन्होंने अंग्रेजों की व्यवस्थाओं को लगभग ज्यों का त्यों भारत में लागू कर दिया। जो व्यवस्था </span>15<span lang="hi" xml:lang="hi"> अगस्त</span>, 1947<span lang="hi" xml:lang="hi"> तक आधे भारत में थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे पूरे देश में लागू कर दिया गया। देश में उठे प्रचंड देशभक्ति के महान उत्साह का लाभ लेते हुए एक ओर जहाँ भारत के स्वदेशी राजाओं को भारत संघ में विलय के लिए सहमत कर लिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कि वे एक परिपक्व समाज के नाते यूँ ही मन बना चुके थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं दूसरी ओर उन्होंने पूरी तरह छल कौशल अपनाते हुए भारत के लोगों के वे अधिकार भी छीन लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो </span>15<span lang="hi" xml:lang="hi"> अगस्त</span>, 1947<span lang="hi" xml:lang="hi"> तक अंग्रेजों ने राजाओं को दे रखे थे तथा शेष </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi">२५ देशी रियासतों के लगभग सभी हिंदू राज्यों में उन्हें ये अधिकार प्राप्त ही थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे सब अधिकार नए राज्यकर्ताओं ने अचानक छीन लिए। यह था भारतीय ज्ञान परम्परा और समाज परम्परा को पूर्णत: त्याग देने का पाप और इन परम्पराओं के वाहक समाज  के सब अधिकार छीन लेने का पाप-पूर्ण कृत्य। अंग्रेजों की प्रेरणा से सीखी हुई इस नई राजनीति में इस सत्य का विचार नहीं किया गया कि इंग्लैंड जैसे छोटे से राज्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के बराबर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">में जो व्यवस्था चलती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह भारत में कैसे चलेगी तथा जब उस व्यवस्था के चलाने वाले लोग ही </span>90<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ष में यहाँ से लौटने को विवश कर दिए गए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हमारी क्या स्थिति होगी</span>?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तुत: ऊपरी तौर पर अंग्रेजों से विरोध का दिखावा करने के कारण उन्हें भारत के लोगों का जो प्रेम मिल रहा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उससे विभोर होकर वे इस भ्रम में आ गए और मान लिया कि हम इस विराट् भारतीय समाज को सदा के लिए मूर्ख बनाने में सफल हो जाएँगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो विश्व के नियमों के विषय में उनकी आश्चर्यजनक गैर जानकारी या अज्ञानता का प्रमाण  है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अंग्रेजों द्वारा बनाए </span>1935<span lang="hi" xml:lang="hi"> के इंडिया एक्ट का मोटे तौर पर अनुसरण करते हुए भारत का संविधान रचा गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर उसमें अनेक उदार व्यवस्थाएँ भी शामिल की गई थीं जिनके आधार पर भारत के लोग यथासमय संशोधन करते रह सकते थे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संपत्ति का जो मौलिक अधिकार संविधान में दिया गया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे भी कुशलता से काट दिया गया और एक प्रकार से छीन ही  लिया गया। इसके साथ ही अंग्रेजों ने जो दुष्कर्म किए थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें जारी रखा गया। जैसे भारत में अंग्रेजी शिक्षा और ज्ञान को बढ़ावा देना या ईसाई मिशनरियों को धर्मांतरण की छूट देना और हिंदुओं को यह छूट नहीं देना कि वह खुलकर ईसाइयों को हिंदू बनाएँ तथा साथ ही शिक्षा का पूरी तरह से सरकारीकरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अंग्रेजों ने भी कभी नहीं किया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह कर दिया गया। सोवियत संघ की तर्ज पर शिक्षा और संचार माध्यम पूरी तरह शासन के नियंत्रण में रखे गए और इसके साथ ही राज्य को राष्ट्र के सभी संसाधनों का स्वामी मान लिया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कि भारत के संपूर्ण इतिहास में भारतीय राजाओं के द्वारा कभी भी नहीं किया गया था।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इतना ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की अपनी जो परम्परा रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें कभी भी शासक के द्वारा कोई कानून नहीं बनाया जाता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई मनमाना नियम नहीं बनाया जाता था। समाज की परम्पराओं और सर्वमान्य नियमों को लागू करने का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज के परिपालन का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्णाश्रम धर्म और मर्यादा पालन का दायित्व शासकों का होता था।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नियम तो भारतीय समाज के विभिन्न समूह सार्वभौम मान्य नियमों के अनुशासन में सदा स्वयं बनाते रहते थे और भारतीय समाज को यह अनुभव था कि वह लाखों वर्षों से इन्हीं नियमों के अनुशासन में मर्यादापूर्वक भली-भाँति चल रहा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु उसे छोड़ दिया गया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राज्याभिषेक के समय सभी समूह अपने प्रतिनिधि के द्वारा शासन की स्वीकृति देते थे। शासन के द्वारा उनकी अपनी मर्यादाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मान्यताओं और नियमों के पालन की सुनिश्चित गारंटी दी जाती थी और यह परस्पर प्रीति का मामला था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसीलिए हमारे यहाँ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">राजा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द का प्रयोग होता रहा। जो हमारे बीच शोभित हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शोभायमान हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रिय लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुंदर लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे ही राजा कहते हैं और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">किंग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">वाले अर्थ में यहाँ राजा का कोई भी शब्द कभी प्रयोग में नहीं आया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गांधी जी के द्वारा भी भारत में इसकी कभी कोई कल्पना ही नहीं की गई थी और कहा था कि यह भारत के लोगों को मान्य नहीं होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु कांग्रेस के लोगों ने भारत की परम्परा को पूरी तरह अनदेखा करते हुए और स्वयं गांधी जी को पूरी तरह उपेक्षित करते हुए एक नई व्यवस्था आरोपित कर दी। उन लोगों ने गांधी जी को अपना मुख्य नेता बताया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह वस्तुत: झूठ था। इसके पग-पग पर प्रमाण मिलते हैं कि गांधी जी से उन्होंने कभी भी कोई प्रेरणा नहीं ली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल उनका उपयोग किया और यह बात स्वयं जवाहरलाल नेहरू ने कही थी कि कांग्रेस ने आपके विचारों पर कभी भी अपनी मुहर नहीं लगाई और कांग्रेस कार्यकारिणी ने आपके हिन्द स्वराज में व्यक्त विचारों के पक्ष में कभी कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रश्न है कि तब संविधान निर्माताओं ने यह जो कहा कि हम भारत के लोग स्वयं को यह संविधान अर्पित करते हैं और एक सार्वभौम लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या वह सच नहीं</span>?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह वाक्य यूँ तो संयुक्त राज्य अमेरिका से नकल किया गया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु सत्य यह है कि स्वाधीनता संग्राम के सभी नेतागण और तत्कालीन बड़े लोग भी सब तरह से सभ्य और सुसंस्कृत तथा देशभक्त लोग थे और ऐसा ही संविधान बनाना चाह रहे थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सब प्रकार से देश के लिए कल्याणकारी हो और जो अत्यंत लचीला हो और जिसे समय-समय पर बदला जा सके। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसा कि स्वयं संविधान की मसौदा समिति के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि यह संविधान के शासन संचालन की नियमावली है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुसार समय-समय पर सदा ही बदलते रहा जाएगा। देश की समस्याओं का दोष संविधान पर डालना असत्य है और अनुचित है। परन्तु यह तो अंकित करना ही पड़ेगा कि यह भारत के लोगों के द्वारा बनाई गई कोई विधि संहिता नहीं थी। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कतिपय भारतीयों द्वारा अंग्रेजी शिक्षा की प्रेरणा से अंग्रेजों से उनकी जिम्मेदारी का हस्तांतरण प्राप्त करने की दृष्टि से बनाई गई। यह शासन चलाने की नियमावली थी और उसकी बहुत प्रशंसा की जानी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु भारत के लोगों को तो विशेषकर जो यहाँ का मूल समाज है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सनातन धर्म अनुयायी या हिंदू समाज है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे तो यही अभ्यास है कि समस्त समाज की सहमति और सम्मति से शासन चले। इसका अर्थ होता है कि विराट् ज्ञान परम्पराओं और मर्यादा तथा नियम की सनातन परम्पराओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो संपूर्ण देश में अलग-अलग रूपों में प्रचलित और मान्य हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके अनुसार ही शासन चलेगा और शासन का दायित्व है उन नियमों की रक्षा करना और उनका भली-भाँति पालन हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह  देखना।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ लोग अपने मन से चाहे जितने उदार भाव रखें और वह कहीं एक जगह बैठकर सारे देश के लिए शासन की कोई नियमावली बना देंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह तो भारत में सदा से अकल्पित था और यह काम केवल अंग्रेजों ने इसलिए किया था कि वह भारत को अपना नहीं मानते थे। वे तो इंग्लैंड को अपना मानते थे और इंग्लैंड के हित की दृष्टि से उन्होंने इंडिया एक्ट </span>1935<span lang="hi" xml:lang="hi"> बनाया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह स्पष्ट है। जो लोग संविधान बना रहे थे यानी अंग्रेजों को दिखा रहे थे कि हम संविधान बना रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके मन में यह एक काम-चलाऊ और अस्थाई व्यवस्था ही थी। यह स्वयं जवाहरलाल नेहरू ने स्वीकार किया है। परन्तु घटनाओं और परिस्थितियों के प्रभाव से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे हम इसके लिए जवाहरलाल नेहरू की नीयत  जैसा कोई भाव मन में न रखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भी सोवियत संघ से प्रभावित होने के कारण अचानक उन्होंने एकाधिकारवादी अनेक व्यवस्थाएँ बनाईं और भारत में यहाँ की ज्ञान परम्पराओं को अमान्य कर दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रद्द कर दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें बीते दौर की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुराने समय की चीज मान लिया और पिछले </span>200<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों में यूरोप के अलग-अलग देशों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषकर इंग्लैंड में और संयुक्त राज्य अमेरिका में जो कुछ सोचा गया था और शासन चलाने के विषय में जो-जो विचार आए थे और नियम बनाए गए थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनको ही भारत में लागू करना उनके जीवन का ध्येय हो गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भले ही इसके पीछे उनके मन में सुशासन की ही कल्पना रही हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु यह न तो वैश्विक संदर्भ में उचित हुआ और न ही भारत की अपनी परम्पराओं को देखते हुए ऐसा करना किसी भी प्रकार से उचित था।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मुख्य बात यह है कि उन्होंने शिक्षा को भारतीय ज्ञान परम्परा से रहित कर दिया और इस प्रकार भारत में जो शिक्षा सरकार के द्वारा पूरी तरह नियंत्रण में रखकर भारत के भावी पीढ़ी के बच्चों को दी जाने लगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह उन्हें भारतीय ज्ञान परम्परा से पूरी तरह काटने के उद्देश्य से संचालित हो रही थी। यह काम सोवियत संघ की तरह इतनी व्यापकता से किया गया कि चार पीढिय़ाँ बीतते-बीतते अधिकांश भारतीय यह तथ्य ही भूल गए कि भारत की अपनी कोई विशाल ज्ञान परम्परा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो राजनीति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाजशास्त्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म शास्त्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वित्त  शास्त्र सहित जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में इंग्लैंड और यूरोप से कई गुना अधिक व्यापकता से व्यवस्थित व परिपूर्ण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके आधार पर ही हजारों साल से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि लाखों साल से भारत में व्यवस्था रही है और सुशासन रहा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसका परिणाम यह हुआ कि नई शिक्षा में शिक्षित लोग यह मानने लगे कि सदा यही शिक्षा चलेगी और सदा शासन की यही प्रणाली चलेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कि भारतीय समाज से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की ज्ञान परम्परा से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत के लोगों की परम्पराओं और मर्यादाओं से पूरी तरह उदासीन और विमुख होगी और जो लोग ऐसा भयंकर विचार रखते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे ही नई पार्टियाँ भी बनाने लगे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यही कारण है कि </span>70<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों में भारत में भारतीय ज्ञानपरम्परा और धर्मपरम्परा को केंद्र में रखकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की अपनी मर्यादा और परम्पराओं के प्रति सम्मान व्यक्त करने वाली एक भी राजनीतिक पार्टी अस्तित्व में नहीं आई।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बात तो लोकतंत्र की होती रही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु यह वस्तुत: इंग्लैंड और अन्य  यूरोपीय राष्ट्रों के संकरण से उत्पन्न एक चुना हुआ वर्ग था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे हम नया अभिजन वर्ग काम-चलाऊ तौर पर कह सकते हैं। यही वर्ग पिछले </span>70<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों से नई-नई पार्टियाँ बनाता रहा और आपस में ही सत्ता संघर्ष चलाता रहा है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार वर्तमान में भारत की जितनी भी राजनीतिक पार्टियाँ हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह इसी नए अभिजन वर्ग के किसी न किसी अंग या किसी न किसी घटक या समूह के द्वारा रचित और संचालित है। इसीलिए वे सदा अपने किसी विचारक के विचारों पर बल देते हैं। एक भी पार्टी ने यह नहीं कहा है कि हम भारत की अपनी ज्ञान परम्परा और मर्यादा तथा न्याय परम्परा और समाज संचालन तथा समाज व्यवस्था की परम्परा का पोषण करने का अपना कर्तव्य निभाएंगे। जबकि राज्य का सदा से ही भारत में यही कर्तव्य माना जाता रहा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में ऐसी विचार क्रान्ति का सृजन हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो भारतीय परम्परा से राज्य का जो कर्त्तव्य माना जाता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके पालन की घोषणा करे और स्पष्ट रूप से घोषित करे कि भारत की ज्ञानपरम्परा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाजपरम्परा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यायपरम्परा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोकव्यवस्था-परम्परा और समाज संचालन तथा राज्य संचालन की अपनी परम्पराओं का पालन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवर्धन तथा पोषण ही भारत के राज्य का कर्त्तव्य है। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र-चिंतन</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Jan 2019 21:39:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज व श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के अनुभूत प्रयोग</title>
                                    <description><![CDATA[<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#CED4D9;border-color:#CED4D9;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(206,212,217);">
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की एक-एक प्रक्रिया और एक-एक जड़ी-बूटी पर हमारे पूर्वजों ने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि-मुनियों ने लाखों-करोड़ों वर्षों तक निरन्तर अनुसंधान किया। ऐसी ही कुछ जड़ी-बूटियाँ जिनका प्रयोग परम पूज्य स्वामी रामदेवजी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्य बालकृष्णजी महाराज ने लाखों-करोड़ों रोगियों पर किया व उन्हें लाभप्रद पाया और उनको औषध दर्शन आदि पुस्तकों में स्थान दिया। इनमें संचित कुछ नुस्खे जो महत्वपूर्ण हैं और योगसाधक अपने मन-मस्तिष्क में उन्हें ताजा रखना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी माँग को ध्यान में रखकर प्रस्तुत है:-</span></strong></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जोड़ों के दर्द में रामबाण उपाय</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हल्दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेथी दाना तथा सौंठ १००-१०० ग्राम की मात्रा में लेकर चूर्ण कर</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1488/pujya-yogrishi-swami-ramdev-ji-maharaj-v-shradheya-acharya-balkrishana-ji-maharaj-ke-anubhut-prayog"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/225.jpg" alt=""></a><br /><table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#CED4D9;border-color:#CED4D9;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(206,212,217);">
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की एक-एक प्रक्रिया और एक-एक जड़ी-बूटी पर हमारे पूर्वजों ने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि-मुनियों ने लाखों-करोड़ों वर्षों तक निरन्तर अनुसंधान किया। ऐसी ही कुछ जड़ी-बूटियाँ जिनका प्रयोग परम पूज्य स्वामी रामदेवजी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्य बालकृष्णजी महाराज ने लाखों-करोड़ों रोगियों पर किया व उन्हें लाभप्रद पाया और उनको औषध दर्शन आदि पुस्तकों में स्थान दिया। इनमें संचित कुछ नुस्खे जो महत्वपूर्ण हैं और योगसाधक अपने मन-मस्तिष्क में उन्हें ताजा रखना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी माँग को ध्यान में रखकर प्रस्तुत है:-</span></strong></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जोड़ों के दर्द में रामबाण उपाय</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हल्दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेथी दाना तथा सौंठ १००-१०० ग्राम की मात्रा में लेकर चूर्ण कर लें। इन्हें मिलाकर १-१ चम्मच नाश्ते व शाम के खाने के बाद गुनगुने पानी से लें। इसके सेवन से जोड़ों के दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गठिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कमर दर्द आदि में विशेष लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा का मुख्य</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> स्रोत </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मूँगफली</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मूँगफली को तल कर खाने के स्थान पर पानी में भिगोकर खाएँ। रात को थोड़ी मूँगफली पानी में भिगोकर रख दें तथा सुबह नाश्ते में इसे चबा-चबाकर खाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह ऊर्जा का मु</span><span lang="hi" xml:lang="hi"></span><span lang="hi" xml:lang="hi">य स्रोत है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दही एक पौष्टिक आहार</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दही का सेवन मनुष्य के लिए अत्यन्त गुणकारी है। इसके सेवन से खून की कमी तथा शारीरिक दुर्बलता दूर होती है। दही का नियमित सेवन आँतों तथा पेट संबंधी रोगों में लाभदायक है। दही के सेवन से दाँत तथा हड्डियाँ मजबूत होती हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्मरणशक्ति वर्धक है  दूध व शहद का संयोग </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिदिन रात को सोते समय एक गिलास गुनगुने दूध में एक चम्मच शहद मिलाकर पीने से स्मरणशक्ति बढ़ती है तथा मस्तिष्क कुशाग्र होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मुँह की दुर्गन्ध में सहायक जीरा</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि आपके मुख से दुर्गन्ध आती है तो उसे दूर करने हेतु थोड़ा सा भुना जीरा धीरे-धीरे चूसते हुए चबा-चबाकर खाएँ। मुख दुर्गन्ध दूर करने में यह अचूक औषधि है। इसका कोई दुष्परिणाम भी नहीं है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विटामिन व पोषक तत्वों का भरपूर खजाना- नारियल पानी </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नारियल में विटामिन्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खनिज तथा अनेक पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। नारियल पानी पीने से उल्टी आना तथा अधिक प्यास लगना कम हो जाता है। डेंगू में भी नारियल पानी का सेवन उत्तम है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वादिष्ट तथा पौष्टिक राजमा</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राजमा एंटी ऑक्सिडेंट का कार्य करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: यह शरीर की गंदगी बाहर निकालने में सहायक है। यह पाचन तथा हड्डियों को मजबूत रखता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रोटीन का अच्छा स्रोत है तथा शरीर को मजबूती प्रदान करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है प्याज़ </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्याज़ में सल्फर पाया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। साथ ही प्याज कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि को रोकता है। कच्ची प्याज़ का सेवन अधिक उपयोगी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि भूनने से सल्फर नष्ट हो जाता है।  </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पोषक उत्पाद</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Jan 2019 21:37:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
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                <title>योग ग्राम</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">स्वामी नारायणदेव<span>  </span></span></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1489/yog-gram"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/145.jpg" alt=""></a><br /><table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#E03E2D;border-color:#E03E2D;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(224,62,45);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(255,255,255);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">परम पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज व आयुर्वेद मनीषी परम श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के दिव्य पावन संकल्पों व अखण्ड पुरुषार्थ के फलस्वरूप 5 जनवरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">1995 को रोपा गया पतंजलि का राष्ट्रसेवा रूपी पौधा आज विशाल शाखा-प्रशाखाओं से युक्त वटवृक्ष का रूप ले चुका है।</span></strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#236FA1;border-color:#236FA1;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(35,111,161);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(255,255,255);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विभिन्न प्रकल्पों के रूप में पतंजलि की लोक कल्याणकारी सेवाएँ आज पूरे देश के लिए आशा की किरण बनकर उभर रही हैं। इन्हीं प्रकल्पों में से एक है प्रकृति की गोद में बसा स्वास्थ्य का धाम </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योग ग्राम</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">।</span></strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नै</span><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्गिक उपचार केन्द्र </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग ग्राम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का उद्घाटन ०८ जून २००८ को उत्तराखण्ड के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री भुवनचंद्र खण्डूरी केद्वारा किया गया। आयुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा के समन्वय द्वारा समस्त पीडि़त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्रस्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असाध्य-रोगग्रस्त मानव जाति को शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक एवं आत्मिक स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्ति एवं समृद्धि प्रदान करना पतंजलि योगग्राम का परम उद्देश्य है। योग ग्राम पुरानी परम्परागत चिकित्सा पद्धति एवं नवीन निदान विज्ञान का अनूठा समन्वय है। विज्ञान तथा अध्यात्म जब एक-साथ मिलते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब जीवन विकसित होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खिलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरभित होता है। योग ग्राम में विज्ञान तथा अध्यात्म के समन्वय से अद्वितीय आरोग्य विज्ञान का विकास हो रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ पर रोगग्रस्त मानव जाति का तन-मन एवं चेतना के स्तर पर कायाकल्प किया जा रहा है। योग ग्राम एक ऐसा पूर्ण नशामुक्त व प्रदूषणमुक्त गाँव है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ सौ प्रतिशत विषमुक्त जैविक कृषि की जाती है और सैकड़ों गायों का सेवा कार्य किया जा रहा है। विश्वप्रसिद्ध प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्र </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">निरामयम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">भी इसी गाँव में स्थित है। रंगीन फव्वारों से सुसज्जित यह परिसर प्रसिद्ध </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">राजा जी नेशनल पार्क</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">से घिरा हुआ है। विदेश से भी प्रतिवर्ष हजारों लोग यहाँ योग-प्राणायाम-पंचकर्म व प्राकृतिक चिकित्सा का लाभ लेने आते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा संकल्प</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग एवं आयुर्वेद द्वारा आरोग्य एवं चेतना-जागरण का प्रकाश श्रद्धेय स्वामी रामदेव जी महाराज एवं आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने जिस प्रकार घर-घर पहुँचाया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह प्रकाश सतत स्वास्थ्य का पथ प्रशस्त करता रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभी स्वस्थ एवं सुखी हों तथा रोग निवारण के साथ स्वास्थ्य संरक्षण एवं स्वास्थ्य संवद्र्धन के इस विज्ञान एवं कला द्वारा राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य चेतना को एक नया संस्कार एवं नया आधार प्रदान करना इस केन्द्र का दिव्य संकल्प है। आरोग्य के साथ-साथ राष्ट्र व विश्व के लोगों का चरित्र निर्माण एवं नैतिक उत्थान करना हमारा ध्येय है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/244.jpg" alt="24"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य के मुख्य</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> आधारों का पोषण</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैदिक कालीन अरण्यवासी ऋषियों की सरल स्वाभाविक आश्रम आधारित जीवन पद्धति के आधार पर इस गाँव में आगन्तुक रोगियों तथा स्वास्थ्य साधकों की दिनचर्या का कार्यक्रम प्रात: साढ़े चार बजे से प्रारम्भ होकर रात्रि </span>9:30<span lang="hi" xml:lang="hi"> बजे स्वास्थ्य संवद्र्धक एवं स्वास्थ्य संरक्षक सृजनात्मक चिन्तन के साथ समाप्त होता है। स्वास्थ्य सम्बन्धी नित्य नवीन शोधों से परिपूर्ण व्याख्यान एवं नैसर्गिक जीवन शैली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संतुलित आहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्यक् विहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार तथा सम्यक् विश्राम की भूमि है योग ग्राम। यहाँ प्रकृति के पंच महाभूतों- अग्नि (सूर्य)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वायु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आकाश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जल एवं पृथ्वी के सम्यक् उपयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम एवं ध्यानादि अष्टांग योग के व्यावहारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सैद्धान्तिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दार्शनिक एवं आध्यात्मिक ज्ञान से रोगियों को सुसंस्कारित कर स्वस्थ जीवन में प्रतिष्ठित किया जाता है। रोगी यहाँ से रोग मुक्त तो होता ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही वह स्वयं अपना एवं अपने परिवार के लिए एक योग्य निसर्गोपचारक बन कर जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही सच्चाई है। वह समझ जाता है कि रोग क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग का कारण क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा उसका सही निदान एवं उपचार क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">रोगों से मुक्त रहकर वह स्वयं तथा अपने परिवार के साथ-साथ समाज व राष्ट्र को स्वस्थ रखने में सक्षम हो जाता है। जो लोग कई वर्षों से रोग तथा दवाइयों के चंगुल में फंसकर अभिशप्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग-संतप्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्रस्त जीवन जी रहे थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे आज योग ग्राम के सहयोग से सम्यक्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सशक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्फूर्त एवं स्वस्थ जीवन जी रहे हैं। इस प्रकार योग ग्राम में वैश्विक स्वास्थ्य निर्माण का अभूतपूर्व प्रयोग चल रहा है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग ग्राम में उपलब्ध है </span><span lang="hi" xml:lang="hi">असाध्य रोगों का उपचार</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग ग्राम में मोटापा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्लड प्रेशर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिल के रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दमा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गठिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जोड़ों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रीढ़ तथा कमर का दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थराइटिस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डायबिटीज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बवासीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिप्रेशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टेन्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गैस्ट्रिक समस्याएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोलाइटिस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लीवर तथा किडनी के रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अल्सर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिर दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रारम्भिक कैन्सर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माइग्रेन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनिद्रा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्दी-जुकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एलर्जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महिलाओं के रोग आदि अनेक साध्य एवं असाध्य बीमारियों का उपचार बिना दवा के योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा किया जाता है। यदि आप दवाइयाँ खा-खा कर तंग आ चुके हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समझ बैठे हैं कि रोग जाएगा ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो निराश न हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीघ्र योग ग्राम में सम्पर्क करें। परमात्मा ने मानवमात्र को आरोग्य का मौलिक व जन्मसिद्ध अधिकार दिया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य साधकों की आवासीय व्यवस्था</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस विशालतम हाइटेक योग निसर्गोपचार आश्रम योग ग्राम में पाँच सौ से अधिक स्वास्थ्य साधकों तथा रोगियों के रहने की अनुपम व्यवस्था है। ग्रामीण परिवेश में आधुनिकतम सुविधा एवं साधनों से सुसज्जित राजर्षि कुटिया (सुपर डीलक्स)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुनिराज कुटिया (डीलक्स)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महर्षि कुटिया (स्पेशल डीलक्स)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तपस्वी कुटिया (सेमी डीलक्स) व विरासती आश्रम कुटिया की व्यवस्था की गई है। योग के लिए विशाल मल्टीप्लेक्स कम्युनिटी हॉल तथा डाइनिंग हॉल आदि की व्यवस्था है। प्रत्येक स्वास्थ्य साधक का कक्ष रंगीन टीवी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ड्रेसिंग टेबल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गलीचा आदि आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित है। प्रत्येक वातानुकूलित कक्ष आधुनिक स्नान घर से सुसज्जित है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(0,0,0);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिकतम साधनों से सुसज्जित है </span><span lang="hi" xml:lang="hi">योगग्राम</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिन पंचमहाभूतों से मानव शरीर का सृजन हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हीं के अनूठे सम्यक् प्रयोग से योग ग्राम में रोग निवारण एवं स्वास्थ्य प्रदान किया जाता है। इनमें प्रमुख हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जल चिकित्सा (हाइड्रोथैरेपी) अनुभाग</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिस प्रकार पृथ्वी पर तथा शरीर में दो-तिहाई हिस्सा जल का है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी प्रकार प्राकृतिक चिकित्सा में दो-तिहाई जल चिकित्सा का उपयोग किया जाता है। इस अनुभाग के अन्तर्गत कटि स्नान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रीढ़ स्नान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्प्रे-स्पाइनल बाथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोटराइज्ड जेट स्पाइनल बाथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्टीम बाथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सौना बाथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हाइटेक कोलोन हाइड्रोथैरेपी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओजोन सौना तथा स्टीम बाथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जल तरंग अभ्यंग स्नान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भंवरकूप स्नान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्प्रिंकलर बाथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओजोन बुलबुला स्नान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्कुलर जेट हाइड्रो मसाज बाथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इमर्शन स्नान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गरम-ठण्डा अल्टरनेटिव जेट स्प्रे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हाइड्रो जेट-स्प्रे मसाज या डूश बाथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फुटबाथ एण्ड आर्म-बाथ (पाद हस्तस्नान)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिटिंग (बैठक) बाथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फुल शीट पैक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विभिन्न प्रकार के लपेट इत्यादि के द्वारा रोगी के शरीर में रक्त संचरण व पाचन तन्त्र को स्वस्थ किया जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/134.jpg" alt="13"></img></span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मिट्टी चिकित्सा (मडथैरेपी) अनुभाग</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अनुभाग में कॉस्मेटिक मड बाथ पूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मड-स्प्रे रोलर मसाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मड पैक कम्प्रेस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अलग-अलग मिट्टी की पट्टियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉस्मेटिक फेशल मडप्लास्टर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सैण्ड वाकिंग ट्रैक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सैण्ड बाथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेपर सैण्ड बाथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुल्तानी मिट्टी की मालिश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशाल लॉन में नंगे पैर घूमने वाली चिकित्सा इत्यादि दर्जनों चिकित्सा पद्धतियों की व्यवस्था की गई है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य (अग्रि तत्त्व) चिकित्सा अनुभाग</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य स्नान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रंगीन रश्मि चिकित्सा के अन्तर्गत सूर्य किरण से रंगीन बोतल आविष्ट जल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोमेटिक हाइड्रो एण्ड ऑयल थैरेपी आदि का प्रयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कलर थर्मोलियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्रीन हाउस थर्मोलियम इत्यादि प्रयोग सूर्य चिकित्सा के अन्तर्गत किए जाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मैग्नेट चिकित्सा अनुभाग</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैग्नेटिक एनर्जी बॉल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चश्मे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घुटने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कमर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिर की चुम्बकीय बेल्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टू-साइडेड मैट मैग्नेट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मल्टी मैग्नेट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैग्नेवाटर ग्लास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैग्नेटिक ईयर क्लिप्स तथा मैग्नेट चेयर इत्यादि अनेक उपकरणों की व्यवस्था भी उपलब्ध है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रोग निवारक स्वास्थ्यप्रद आहार चिकित्सा अनुभाग</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राकृतिक चिकित्सा में सबसे अधिक बल आहार पर दिया जाता है। यहाँ आने वाले सभी स्वास्थ्य साधक योगग्राम की आहार चिकित्सा की मुक्तकण्ठ से प्रशंसा करते हैं। यहाँ प्राकृतिक एवं आयुर्वेदिक सिद्धान्तों पर आधारित आधुनिक अनुसंधानों के अनुसार लगभग नौ सौ प्रकार के बायोएक्टिव फाइटोकेमिकल कम्पाउण्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विटामिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिनरल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माइक्रोन्यूट्रिएन्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एण्टी-ऑक्सीडेन्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एन्जाइम से संयुक्त विविध प्रकार के ताजे फल एवं ताजी हरी सब्जियों के रस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गेहूँ तथा जौ के पत्ते (जवारे) का रस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एण्टी डायबेटिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एण्टी एनीमिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एण्टी कार्डियक आदि अनेक प्रकार की रोटियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर्बल भुजिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छाछ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंकुरित अनाजों का दलिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खिचड़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सलाद चाट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राकृतिक मिष्ठान्न आदि विविध प्रकार के मनोहर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्यवर्धक व स्वादिष्ट व्यंजनों से सुसज्जित आहार चिकित्सा अनुभाग है। योग ग्राम में सभी प्रकार के आहार जैविक खेती से प्राप्त फल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शाक-सब्जियों एवं अनाजों से निर्मित होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे शीघ्र स्वास्थ्य लाभ होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन अनुभागों के अतिरिक्त पतंजलि योग ग्राम में प्राकृतिक चिकित्सा आधारित अनेक चिकित्सा अनुभाग हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ रोगियों का उपचार किया जाता है। इनमें वायु चिकित्सा अनुभाग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आकाश चिकित्सा अनुभाग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग चिकित्सा अनुभाग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक्यूपंक्चर एण्ड एक्यूप्रेशर अनुभाग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिरामिड चिकित्सा अनुभाग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रैकी चिकित्सा अनुभाग आदि प्रमुख हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग ग्राम की असाधारण </span><span lang="hi" xml:lang="hi">चिकित्सा विशेषताएँ</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कोलन इरीगेटर हाइड्रोथैरेपी</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कब्ज समस्त रोगों का कारण है तथा कब्ज को मिटाकर पेट की पूरी धुलाई तथा सिंचाई करने वाले कोलन इरीगेटर का अनुभव अनुपम है। ड्यूअल ऑपरेशन ग्रेविटी एण्ड प्रेशर मोड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्टीग्रेटिड डिसइन्फेक्शन सिस्टम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ट्रिपल वाटर प्यूरीफिकेशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऑटोमेटिक टेम्परेचर एण्ड प्रेशर कन्ट्रोल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फुल स्पेक्ट्रम व्यू ट्यूबलाइट तथा फ्लो-कंट्रोल एण्ड फ्लो-मीटर से संयुक्त विश्व की सर्वाधिक हाइटेक कोलोन थैरेपी की व्यवस्था की गई है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मड स्वीमिंग पूल</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मड मसाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कीचड़ स्नान देश का अद्वितीय दिलचस्प अनुभव है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें त्वचा विषमुक्त होकर कंचन की तरह निखर जाती है। इससे रोग प्रतिरोधक तथा सहन करने की क्षमता बढ़ जाती है तथा समस्त रोगों से बचाव होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ओजोन स्टीम सौना बाथ</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह शरीर को विषमुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोगाणुरहित करने का अनोखा प्रयोग है। ऑक्सीजन का ही सक्रिय एवं तीन परमाणु वाला (ट्राइवैलेंट) रूप है- ओजोन। ओजोन जर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बैक्टीरिया एवं वायरस तथा फंगस को नष्ट करके शरीर की रोग प्रतिरोधक जीवनी शक्ति को बढ़ा देता है। अब तक प्रयोगों से सिद्ध हुआ है कि ओजोन स्टीम सौना बाथ सौ प्रकार के रोगों को ठीक करने में सहायक है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एक्यूप्रेशर अनुभाग हाइड्रोएक्यूप्रेशरियम</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पैरों के तलुओं में समस्त अंगों का प्रतिनिधित्व करने वाले मेरिडियन पॉइन्ट होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्हें सक्रिय कर शरीर के अंग-प्रत्यंग को रोगमुक्त एवं स्वस्थ रखा जाता है। एक्यूप्रेशरियम के अन्तर्गत नाना प्रकार के नुकीले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चपटे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अण्डाकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिरामिड आदि ज्यामितीय आकार के पत्थरों को पानी के अन्दर स्थिर करके रोगी को इन पर </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>20<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिनट तक चलाया जाता है जिससे सारे शरीर में चुम्बकीय ऊर्जा प्रवाह तीव्र गति से नियमित एवं नियोजित होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सतत शोध एवं विकास अनुभाग</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग ग्राम में योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राकृतिक चिकित्सा एवं जड़ी-बूटियों के समन्वित प्रयोग से कैंसर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दमा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोटापा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थराइटिस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हाइपरटेन्शन तथा हृदय रोगों पर शोध कार्य चल रहा है। इन रोगों का सर्वसाध्य सहज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरल एवं सस्ता उपचार खोज कर उसे सर्वमान्य एवं सार्वभौम बनाने का प्रयास किया जा रहा है। इस दृष्टि से आधुनिक साधनों से सुसज्जित विश्वस्तरीय कम्प्यूटराइज्ड प्रयोगशाला है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ हर प्रकार की जाँच करने की सुविधाएँ हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">समूह सलाह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य स्वावलंबन </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशिक्षण एवं कार्यशाला</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रोगियों के मन में योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राकृतिक चिकित्सा एवं स्वास्थ्य से सम्बन्धित अनेक भ्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिज्ञासा एवं प्रश्न होते हैं। उनका समाधान वरिष्ठ चिकित्सकों के निर्देशन में सुबह-शाम एक घंटे के रोग निवारण एवं स्वास्थ्य प्रबंधन कार्यशाला में किया जाता है। </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्तिगत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारिवारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक एवं राष्ट्रीय स्वास्थ्य संवद्र्धन हो</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">यही इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का मुख्य लक्ष्य है। रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यात्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक स्वास्थ्य से सम्बन्धित खोज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनोविज्ञान आदि अनेक विषयों पर कार्यशाला एवं चर्चा होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ए.टी.एम. व हर्बल उत्पाद विक्रय पटल</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगग्राम में ए.टी.एम. की सुविधा भी उपलब्ध है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही योगग्राम की आधुनिकतम प्रयोगशाला में निर्मित ऑर्गेनिक तरीके से प्राप्त निरापद वनौषधियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शहद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पेशल हर्बल टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंकुरित अनाज का दलिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्राउन राइस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फ्लैक्स सीड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक्यूप्रेशर का सामान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा संबन्धी पुस्तकें</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वीमिंग सूट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टै्रक सूट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग क्रियाओं के लिए विशेष ड्रेस आदि अनेक उपचार एवं दैनिक उपयोगी साधनों को खरीदने की व्यवस्था है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">चिकित्सक तथा चिकित्सा व्यवस्था</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगग्राम में अनुभवी चिकित्सकों एवं उपचारकों की सेवा-समर्पित मिशनरी टीम द्वारा अहर्निश रोगियों की सेवा की जा रही है। रोगी हमारे लिए आराध्य भगवान् हैं। उनकी तन-मन से सेवा हमारा प्राथमिक कत्र्तव्य है- यही विचार योग ग्राम का मुख्य आधार स्तम्भ है। पुरुष तथा महिला रोगियों के निदान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिकित्सा एवं देख-रेख के लिए महिला तथा पुरुष डॉक्टर तथा उपचारक और उपचारिकाओं की अलग-अलग व्यवस्था है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महिला तथा पुरुषों का हाईटेक चिकित्सा कक्ष भी अलग-अलग है। योगग्राम में चिकित्सा पाने वाले ९० प्रतिशत रोगी पूर्ण रूप से स्वस्थ होकर जाते हैं। कैंसर की प्रथम स्टेज में रोगी को योगग्राम में १०० प्रतिशत लाभ मिलता है। यहाँ के चिकित्सकों व कर्मचारियों की विनम्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुस्कुराहट व व्यवहार की प्रशंसा यहाँ आने वाला प्रत्येक रोगी करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>इंटिग्रेटेड थेरेपी</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Jan 2019 21:35:38 +0530</pubDate>
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