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                <title> फरवरी - योग संदेश</title>
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                <description> फरवरी RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>आयरन की कमी को पूरा करेगा पतंजलि का डबल फोर्टिफाइड नमक</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">आचार्य  </span><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">बालकृष्ण</span></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1542/deficiency-of-iron"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/salt.jpg" alt=""></a><br /><table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#F8CAC6;border-color:#F8CAC6;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(248,202,198);">
<h5 style="text-align:justify;"><strong>पतंजलि देश का पहला ऐसा संस्थान है जो फोर्टिफिकेशन के साथ-साथ ऑर्गेनिक बायोफोर्टिफिकेशन पर काम कर रहा है।</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>इसके तहत प्राकृतिक रूप से बीज के अन्दर ही आवश्यक तत्त्वों जैसे- जिंक, आयरन, विटामिन्स, माइक्रोन्यूट्रिएंट्स का समावेश कर बायो फोर्टिफाइड सीड तैयार किये जा रहे हैं|</strong></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसन्नता व गौरव का विषय है कि पतंजलि ने योग व आयुर्वेद के माध्यम से करोड़ों लोगों को नया जीवन प्रदान किया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी इस यात्रा में करोड़ों देशवासियों का पुरुषार्थ है। योग व आयुर्वेद हमारे स्वास्थ्य की रक्षा में पूर्ण सक्षम हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी आज की असंतुलित जीवनचर्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदूषण एवं खाद्य उत्पादों की पोषकता में कमी आ जाने के कारण हमारे शरीर में विभिन्न प्रकार के तत्त्वों की कमी आ रही है। पतंजलि इस दिशा में वृहत् स्तर पर प्रयास कर रहा है। हमारे देश की महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्य संबंधी संस्था एफ.एस.एस.ए.आई. का कार्य न केवल गुणवत्तायुक्त खाद्य पदार्थों के लिए प्रमाण-पत्र प्रदान करना है अपितु उनका यह भी कार्य है कि देश में गुणवत्तायुक्त पदार्थ बनें और उन पदार्थों से लोग जुड़ें। देश में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैल रही है। वर्तमान में चल रहा सरकार का </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ईट राइट कार्यक्रम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">भी इसी दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे शास्त्रों में उल्लेख है- हितभुक्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋतभुक्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मितभुक्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् भोजन हितकारी हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सही माध्यम से कमाया हुआ हो और उचित मात्रा में खाया गया हो। आज तो कमाई भी शुद्ध नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लाभकारी भी नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मात्रा तो पता ही नहीं है। भोजन स्वादिष्ट हुआ तो जरूरत से ज्यादा खा लिया और स्वाद पसंद नहीं आया तो बीच में ही छोड़ दिया। दुनिया में अनाज को बर्बाद करने वालों में हमारा देश अग्रणी है। अत: आवश्यकता है कि हम सही खाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उचित खाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सही मार्ग से कमाकर खाएँ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश की स्वास्थ्य जरूरतों को ध्यान में रखते हुए हमने फोर्टिफिकेशन के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण पहल की है। हमने फोर्टिफाइड नमक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फोर्टिफाइड खाद्य तेल व बायोफोर्टिफिकेशन से इसकी शुरूआत की है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हिन्दुस्तान में फोर्टिफाइड नमक की बात बहुत पहले से की जा रही है। नमक में आयोडीन का प्रयोग इसका प्रथम प्रयोग था। यह बहुत कम लोगों को ही पता है कि फोर्टिफिकेशन है क्या। किसी भी पदार्थ के अन्दर ऐसी चीज डाल देना जिससे की दूसरे लाभ भी उसके साथ-साथ प्राप्त हो जाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर उस पदार्थ का स्वाद न बिगड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका मूल स्वरूप भी विकृत न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फोर्टिफिकेशन कहलाता है। आयोडीन का नमक में प्रयोग सभी जानते हैं। हमने आयोडीन के साथ-साथ आयरन को भी नमक में डाल दिया है। हम सब नमक तो खाते ही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे आयरन की कमी की पूर्ति होगी। आयरन और आयोडीन युक्त देश का डबल फोर्टिफाइड नमक पतंजलि का प्रथम प्रयास तथा एक सार्थक कदम है। यह एक अभियान है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हम देश के विकास की बात करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देश के स्वास्थ्य की बात करते हैं किन्तु हमें यह भी सोचना चाहिए कि इसमें हमारा क्या योगदान है। जब हम ऐसा प्रयास करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो पूरा देश स्वस्थ होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही अन्य लोगों को भी इससे प्रेरणा मिलती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फोर्टिफिकेशन तो एक बात हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम इससे आगे भी एक कार्य कर रहे हैं। दिल्ली में माननीय केंद्रीय कृषि मंत्री श्री राधा मोहन जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आई.सी.ए.आर. के डायरेक्टर जनरल डॉ. त्रिलोचन महापात्रा जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेके्रटरी श्री संजय अग्रवाल जी से बायोफोर्टिफिकेशन तथा बायोफोर्टिफाइड सीड पर विस्तृत चर्चा हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें हमने उनके ऑर्गेनिक शब्द जोडऩे की बात रखी अर्थात् ऑर्गेनिक बायोफोर्टिफाइड सीड। अब प्रश्न यह उठता है कि फोर्टिफिकेशन तथा बायोफोर्टिफिकेशन में क्या अन्तर है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">बायोफोर्टिफिकेशन द्वारा उत्पादित फूड कोई जेनेटिकली मोडिफाइड फूड नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके तहत प्राकृतिक रूप से बीज के अन्दर ही आवश्यक तत्त्वों जैसे- जिंक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयरन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विटामिन्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माइक्रोन्यूट्रिएंट्स का समावेश कर बायो फोर्टिफाइड सीड तैयार किये जा रहे हैं और पतंजलि देश का पहली ऐसा संस्थान है जो ऑर्गेनिक बायोफोर्टिफिकेशन पर काम कर रहा है। फोर्टिफिकेशन में तत्त्वों का समावेश पदार्थ या उत्पाद में किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि बॉयोफोर्टिफिकेशन में यह बीज में कर दिया जाता है। यह पूरी तरह से प्राकृतिक प्रक्रिया है। अभी हम लगभग २०० एकड़ कृषि भूमि में ऑर्गेनिक बायोफोर्टिफाइड बीज तैयार कर रहे हैं। ऐसे प्रयोग पतंजलि निरंतर करता रहेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब सरकार ने देश में लोगों के सही भोजन को उपलब्ध कराने की बात पर चर्चा प्रारम्भ की तो पाया कि देश में लोगों को सही भोजन उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। जहाँ अमेरिका ९० प्रतिशत तथा थाइलैण्ड ६० प्रतिशत फूड प्रोसेस करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं दुर्भाग्य का विषय है कि भारत कृषि प्रधान देश होते हुए भी मात्र ६-८ प्रतिशत ही फूड प्रोसेस कर पा रहा है। भारत सरकार ने देश के लोगों को अच्छा खाद्य मिले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खाद्य सुरक्षा उपलब्ध हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और किसानों के उत्पादों की बर्बादी न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके लिए उन्होंने मेगा फूड पार्क योजना की शुरूआत की। इस योजना में पतंजलि ने सहभागिता की। श्रद्धेय स्वामी जी के नेतृत्व में हमने उस अभियान को एक चुनौति के रूप में लिया। आज यह कहते हुए मुझे प्रसन्नता है कि इस देश में लगभग ६० मेगा फूड पार्क उस समय सरकार ने स्वीकृत किए थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें से पतंजलि द्वारा स्थापित फूड पार्क ही एकमात्र ऐसा मेगा फूड पार्क है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो न केवल बेहतरीन ढंग से कार्य कर रहा है अपितु देश के सर्वप्रथम व विश्व के सबसे बड़े फूड पार्क के रूप में जाना जाता है। उसी कड़ी में हमने देखा कि देश में उपलब्ध खाद्य में पोषकता व पोषणता का अभाव है। इसका मुख्य कारण रसायनयुक्त कृषि है जो हमारी कृषि भूमि को जहरीला बना रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे हमारे खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता में भी बहुत अधिक न्यूनता आ रही है। इसी कमी को पूरा करने के लिए पतंजलि प्रयासरत है। पतंजलि एकमात्र ऐसी संस्था जो पी.बी.आर.आई. के माध्यम से जैविक कृषि में ४ पेटेन्ट अपने नाम करा चुकी है। हम ऑर्गेनिक फार्मर्स ट्रेनिंग प्रोग्राम को पूरे देश में चला रहे हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक तो यह पक्ष था जिसमें हम कार्य कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा पक्ष है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो उत्पाद पहले से बाजार में उपलब्ध हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनमें हम प्राइमरी हेल्थ केयर के लिए क्या कर सकते हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके लिए देश में फोर्टिफिकेशन एक महत्त्वपूर्ण पहल है। यह हमारे लिए गर्व का विषय है कि श्रद्धेय स्वामी जी के नेतृत्व में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके आशीर्वाद से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके पुरुषार्थ से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके सहयोग से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी प्रेरणाओं से हमने इस कार्य को एक स्वरूप प्रदान करने का प्रयास किया। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मुझे प्रसन्नता है कि देश में पतंजलि ने सर्वप्रथम फोॢटफाइड खाद्य तेल उत्पादित किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें विटामिन-</span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ए’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">डी’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">समावेशित है। देश के नागरिकों में विटामिन-</span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ए’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">व </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">डी’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की कमी बहुत बढ़ रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे आप अपने खाद्य के माध्यम से बिना दवा के पूरा कर सकेंगे। यह पूरे देश को स्वस्थ रखने की दिशा में बड़ा कदम है।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category> फरवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 Feb 2019 21:54:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>स्वामी विवेकानंद जयंती 'राष्ट्रीय युवा दिवस’ पर जौनपुर में पतंजलि योगपीठ ने बनाये 3 विश्व कीर्तिमान</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">12 </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जनवरी को स्वामी विवेकानंद जयंती के अवसर पर वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जौनपुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर प्रदेश में उपस्थित एक लाख से अधिक योग साधकों ने पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज के मार्गदर्शन में पतंजलि योगपीठ द्वारा 3 विश्व रिकॉड्र्स बनाये गए। गोल्डन बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉड्र्स के भारतीय प्रतिनिधि श्री आलोक कुमार ने बतलाया कि पतंजलि योग पीठ द्वारा 3 विश्व रिकॉड्र्स बनाये गए हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर गोल्डन बुक ऑफ  वल्र्ड रिकॉड्र्स के भारतीय प्रतिनिधि श्री आलोक कुमार ने श्रद्धेय स्वामी रामदेव जी महाराज और कुलपति प्रो. राजाराम यादव  जी को अस्थाई प्रमाण-पत्र सौंपे। सॉफ्टवेयर द्वारा</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1543/%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A5%80-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%A6-%E0%A4%9C%E0%A4%AF%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%80--%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AF-%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%B5%E0%A4%BE-%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E2%80%99-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%9C%E0%A5%8C%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%9C%E0%A4%B2%E0%A4%BF-%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A4%AA%E0%A5%80%E0%A4%A0-%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%87-3-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5-%E0%A4%95%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/306.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">12 </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जनवरी को स्वामी विवेकानंद जयंती के अवसर पर वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जौनपुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर प्रदेश में उपस्थित एक लाख से अधिक योग साधकों ने पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज के मार्गदर्शन में पतंजलि योगपीठ द्वारा 3 विश्व रिकॉड्र्स बनाये गए। गोल्डन बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉड्र्स के भारतीय प्रतिनिधि श्री आलोक कुमार ने बतलाया कि पतंजलि योग पीठ द्वारा 3 विश्व रिकॉड्र्स बनाये गए हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर गोल्डन बुक ऑफ  वल्र्ड रिकॉड्र्स के भारतीय प्रतिनिधि श्री आलोक कुमार ने श्रद्धेय स्वामी रामदेव जी महाराज और कुलपति प्रो. राजाराम यादव  जी को अस्थाई प्रमाण-पत्र सौंपे। सॉफ्टवेयर द्वारा हेड काउंटिंग तथा अन्य सत्यापन के पश्चात् अंतिम प्रमाण-पत्र शीघ्र ही प्रदान किये जायेंगे। श्री आलोक कुमार ने कहा कि यह कार्यक्रम स्वामी विवेकानंद जयंती का अनुपम उपहार है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज ने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी विवेकानंद जयंती’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पर उनके अधूरे सपनों को पूरा करने का संकल्प व्यक्त किया तथा युवाओं को राष्ट्रनिर्माण में आगे आने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि युवा सच्चे मार्ग पर चलें और सभी को भी इस मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करें। भारत को विश्व गुरु बनाने के लिए अखंड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रचंड पुरुषार्थ की आवश्यकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे देश के युवाओं से ही गति मिल सकती है। उन्होंने कहा कि इसके लिए हमें पूज्य स्वामी विवेकानंद जी के ध्येय वाक्य </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">उठो! जागो! और तब तक चलते रहो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब तक मंजिल न मिल जाए’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का अनुसरण करना होगा। स्वामी जी ने कहा कि यह कार्य योग से ही सम्भव है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने कहा कि युवाओं के बलवान्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञावान्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय से श्रद्धावान्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐश्वर्य से धनवान् और चरित्रवान् होने पर ही भारत महान् होगा। उन्होंने शिविर में उपस्थित हजारों लोगों को जात-पात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मजहब के आधार पर भेदभाव न करने की शपथ दिलाई। इस अवसर पर पूज्य स्वामी यतीन्द्रानंद जी महाराज ने कहा कि योग जीवन से रोग को मिटाकर स्वास्थ्य के साथ संस्कार भी प्रदान करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यक्रम में विशेष योग सत्र के दौरान पूज्य स्वामी जी महाराज ने ताड़ासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीर्षासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वांगासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हलासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य नमस्कार तथा कपालभाति व अनुलोम-विलोम प्राणायाम का अभ्यास कराया। समारोह में आजमगढ़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मऊ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गाजीपुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जौनपुर जिले के महाविद्यालयों के राष्ट्रीय सेवा योजना के स्वयंसेवक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेविकाएँ भी शामिल रहे।</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महिला छात्रावास का शिलान्यास</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर अवैद्यनाथ संगोष्ठी भवन में योग गुरु स्वामी रामदेव जी महाराज ने सांदीपनि महिला छात्रावास का शिलान्यास किया। अवैद्यनाथ संगोष्ठी भवन में पतंजलि योगपीठ के विभिन्न संगठनों के कार्यकर्ताओं की बैठक हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें योगऋषि स्वामी जी महाराज ने कहा कि हमें ऐसे युवा व्यक्तित्व का निर्माण करना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो राष्ट्रधर्म के निर्वाह में सहायक हो।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category> फरवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 Feb 2019 21:52:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राष्ट्रीय युवा दिवस समारोह में आयोजित योग शिविर की झलकियाँ</title>
                                    <description><![CDATA[<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/483.jpg" alt="48" /></p>
<p><strong>जौनपुर योग शिविर में एक लाख से अधिक शिविरार्थियों को ताड़ासन का अभ्यास कराते पूज्य योगर्षि स्वामी रामदेव जी महाराज (बाएँ) तथा शिविरार्थियों को संबोधित करते वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर के कुलपति प्रो. राजाराम यादव जी (दाएँ) </strong></p>
<p><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/315.jpg" alt="31" /></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong>राष्ट्रीय युवा दिवस के सफल आयोजन की महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में उपस्थित पतंजलि योग समिति की मुख्य महिला केन्द्रीय प्रभारी साध्वी देवप्रिया जी, मुख्य केन्द्रीय प्रभारी श्री राकेश कुमार जी तथा आयोजक मंडल के सदस्यगण</strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/325.jpg" alt="32" /></strong></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/337.jpg" alt="33" /></p>
<p style="text-align:center;">अवैद्यनाथ संगोष्ठी भवन, जौनपुर में कार्यकत्र्ता बैठक में उपस्थित पतंजलि के विभिन्न संगठनों के कर्मठ कार्यकत्र्ता (बाएँ) तथा वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के छात्रों</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1544/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AF-%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%B5%E0%A4%BE-%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8-%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%B9-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%86%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%A4-%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97-%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%9D%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%81"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/493.jpg" alt=""></a><br /><p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/483.jpg" alt="48"></img></p>
<p><strong>जौनपुर योग शिविर में एक लाख से अधिक शिविरार्थियों को ताड़ासन का अभ्यास कराते पूज्य योगर्षि स्वामी रामदेव जी महाराज (बाएँ) तथा शिविरार्थियों को संबोधित करते वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर के कुलपति प्रो. राजाराम यादव जी (दाएँ) </strong></p>
<p><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/315.jpg" alt="31"></img></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong>राष्ट्रीय युवा दिवस के सफल आयोजन की महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में उपस्थित पतंजलि योग समिति की मुख्य महिला केन्द्रीय प्रभारी साध्वी देवप्रिया जी, मुख्य केन्द्रीय प्रभारी श्री राकेश कुमार जी तथा आयोजक मंडल के सदस्यगण</strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/325.jpg" alt="32"></img></strong></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/337.jpg" alt="33"></img></p>
<p style="text-align:center;">अवैद्यनाथ संगोष्ठी भवन, जौनपुर में कार्यकत्र्ता बैठक में उपस्थित पतंजलि के विभिन्न संगठनों के कर्मठ कार्यकत्र्ता (बाएँ) तथा वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के छात्रों को स्वामी विवेकानंद पुरस्कार प्रदान करते पूज्य स्वामी जी महाराज व अन्य गणमान्य (दाएँ)</p>
<p> </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category> फरवरी</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1544/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AF-%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%B5%E0%A4%BE-%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8-%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%B9-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%86%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%A4-%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97-%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%9D%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%81</link>
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                <pubDate>Fri, 01 Feb 2019 21:50:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पतंजलि के 24वें स्थापना दिवस पर ‘पतंजलि परिधान’ स्टोर का उद्घाटन</title>
                                    <description><![CDATA[<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#BA372A;border-color:#BA372A;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(186,55,42);">
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(236,240,241);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सशक्त स्वदेशी विकल्प के तौर पर पतंजलि परिधान देश को समर्पित : पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(236,240,241);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि परिधान’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय वेश-परिवेश में परिवर्तन की नवीन क्रांति : श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">5</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> जनवरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">1995 को परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज व श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने जनसेवा व राष्ट्रसेवा के उद्देश्य से पतंजलि योगपीठ संस्थान की स्थापना की थी। संस्थान के 24वें स्थापना दिवस पर पतंजलि योगपीठ परिवार ने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि परिधान’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">स्टोर के रूप में और एक कदम आगे बढ़ाया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका उद्घाटन पतंजलि योगपीठ स्थित आयुर्वेद भवन में परम पूज्य स्वामी रामदेव</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1545/%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%9C%E0%A4%B2%E0%A4%BF-%E0%A4%95%E0%A5%87-24%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E2%80%98%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%9C%E0%A4%B2%E0%A4%BF-%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E2%80%99-%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8B%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%89%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%98%E0%A4%BE%E0%A4%9F%E0%A4%A8"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/562.jpg" alt=""></a><br /><table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#BA372A;border-color:#BA372A;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(186,55,42);">
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(236,240,241);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सशक्त स्वदेशी विकल्प के तौर पर पतंजलि परिधान देश को समर्पित : पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(236,240,241);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि परिधान’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय वेश-परिवेश में परिवर्तन की नवीन क्रांति : श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">5</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> जनवरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">1995 को परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज व श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने जनसेवा व राष्ट्रसेवा के उद्देश्य से पतंजलि योगपीठ संस्थान की स्थापना की थी। संस्थान के 24वें स्थापना दिवस पर पतंजलि योगपीठ परिवार ने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि परिधान’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">स्टोर के रूप में और एक कदम आगे बढ़ाया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका उद्घाटन पतंजलि योगपीठ स्थित आयुर्वेद भवन में परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज तथा परम श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के कर-कमलों द्वारा सम्पन्न हुआ।</span></h5>
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#169179;border-color:#000000;" border="1"><colgroup><col style="width:50.0649%;" /><col style="width:50.0649%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(0,0,0);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(241,196,15);"><strong>07 लाख करोड़ के टेक्सटाइल बाजार पर विदेशी ब्राण्ड्स का कब्जा : पूज्य स्वामी जी महाराज</strong></span></h5>
</td>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(0,0,0);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(255,255,255);"><strong>पतंजलि विश्वस्तरीय गुणवत्ता, न्यूनतम मूल्य तथा लाभांश से सेवा के अपने आधारभूत सिद्धांतों पर अडिग : श्रद्धेय आचार्य जी महाराज</strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज ने कहा कि पतंजलि परिवार के साधना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा व संघर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग व कर्मयोग और मानव सेवा से राष्ट्र सेवा के 24 वर्ष पूर्ण हुए हैं। 24 वर्षों की इस सतत साधना एवं सेवा को आगे बढ़ाते हुए आने वाले 50 वर्षों के लिए हम तैयार हैं। वर्ष 2050 तक भारत को विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक महाशक्ति बनाने के लिए हम संकल्पित हैं। इसके लिए व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण की एक बहुत बड़ी भूमिका पतंजलि की रही है। हमारी अब तक की यात्रा से करोड़ों लोगों को स्वास्थ्य मिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें रोगमुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तनावमुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यसनमुक्त व्यक्ति बना कर एक दिव्य आध्यात्मिक जीवन जीने की पद्धति पतंजलि ने सिखाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें लाखों कार्यकर्ताओं और करोड़ों समर्थकों ने हमें ताकत देकर यहाँ तक पहुँचाया है। विश्व का सबसे बड़ा योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राकृतिक-चिकित्सा व अनुसंधान का केन्द्र पतंजलि ने बनाया। विश्व के नये कीर्तिमान हरिद्वार की इसी पावन धरा से बने हैं। स्वामी जी महाराज ने कहा कि लगभग 7 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का बाजार टेक्सटाइल सेक्टर का है। इसमें से 90 प्रतिशत से ज्यादा अन-ऑर्गेनाइज्ड सेक्टर में हैं। ऑर्गेनाइज्ड सेक्टर में जो ब्राण्डेड कपड़े मिलते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन पर भी विदेशी कम्पनियों का कब्जा है। विदेशी ब्राण्ड ने भारत में अपने पैर ऐसे पसारे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कि स्वदेशी ब्राण्ड का खड़ा होना ही बहुत मुश्किल था। हमने पतंजलि परिधान को एक सशक्त स्वदेशी विकल्प के तौर पर देश को समर्पित किया है।  स्वामी जी ने कहा कि आज टेक्सटाइल इण्डस्ट्री दम तोड़ रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुनकरों के पास काम नहीं है। इस पूरे अभियान में हमारा संकल्प है कि बुनकरों के हाथों को काम मिले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनको उनकी मेहनत का पूरा दाम मिले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनको सम्मान व स्वाभिमान के साथ जीने का हक मिले।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने कहा कि भारतवर्ष एक सांस्कृतिक विरासत का देश है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे कपड़ों और पहनावे का एक समृद्ध इतिहास है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो विविधता में एकता को दर्शाता है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक प्रत्येक राज्य का एक अनूठा पहनावा है। उन्होंने कहा कि हमें भारत के शिल्पकारों तथा बुनकरों पर गर्व है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो इतनी कुशलता से सामान्य से दिखने वाले कपड़े पर अपनी कलाकारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कढ़ाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुनाई और छपाई की तकनीकों से उन्हें एक अनूठा रूप देने में सक्षम हैं। आचार्य जी ने बताया कि पतंजलि परिधान में 1100 से अधिक विकल्प तथा 3500 से अधिक एस.यू.के. की विशाल वैरायटी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें पुरुषों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महिलाओं तथा बच्चों के लिए एथनिक-वीयर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इनर-वीयर एसेसरीज की पूरी रेंज है। उन्होंने बताया कि पतंजलि परिधान की तीन रेंज हैं- आस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कार तथा लिवफिट। लिवफिट ब्रांड में स्पोट्र्स-वीयर व योग-वीयर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आस्था ब्रांड में वुमेंस-वीयर और संस्कार ब्रांड में मेंस-वीयर आदि की व्यवस्था रहेगी। आचार्य जी ने कहा कि पतंजलि ने पतंजलि परिधान के रूप में भारतीय वेश और परिवेश में परिवर्तन के लिए एक नवीन क्रांति का सूत्रपात किया है। पतंजलि ने विश्वस्तरीय गुणवत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यूनतम मूल्य तथा लाभांश से सेवा के अपने आधारभूत सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए हर भारतीय के लिए परिधान की व्यवस्था की है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने कहा कि पतंजलि परिधान स्वदेशी के गौरव के साथ महिलाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खिलाडिय़ों तथा योगी भाई-बहनों के लिए परंपरागत वस्त्रों के अलावा आधुनिक भारतीयों की जरूरतों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इच्छाओं और महत्त्वाकांक्षाओं को भी पूरा करेगा। कार्यक्रम में पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज तथा श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने सहयोगियों व समर्थकों से मुलाकात की।</span></h5>
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#F1C40F;border-color:#F1C40F;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(241,196,15);">
<h3 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सद्वृत्त’</span></strong></span></h3>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आरोग्य की प्राप्ति के लिए आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">चरक संहिता’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के सूत्रस्थान के अन्तर्गत सद्वृत्त प्रकरण के महत्त्वपूर्ण अंश-</span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">देवगोब्राह्मणगुरुवृद्धसिद्धाचार्यानर्चयेत्। अग्निमुपचरेत्। ओषधी: प्रशस्ता धारयेत्। द्वौ कालावुपस्पृशेत्। मलायनेष्वभीक्ष्णं पादयोश्च वैमल्यमादध्यात्। त्रिपक्षस्य केशश्मश्रुलोमनखान् संहारयेत्। नित्यमनुपहतवासा: सुमना: सुगन्धि स्यात्। साधुवेश:</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसिद्धकेश:</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूर्धश्रोत्रघ्राणपादतैलनित्य:</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्वाभिभाषी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुमुख:।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:right;"><span lang="hi" xml:lang="hi">(सू. 8.१8)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दे</span><span lang="hi" xml:lang="hi">व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गौ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्राह्मण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्धजन और आचार्यों की पूजा एवं आदर-सत्कार करना चाहिए। अग्नि में प्रात: सायं हवन करे। उत्तम औषधि धारण करे। प्रात: सायं शरीर को जल स्पर्श करावे अर्थात् स्नान करे। मलमार्गों (नौ छिद्रों) और पैरों को बार-बार स्वच्छ करता रहे। एक पक्ष में तीन बार (प्रति पाँचवे दिन) केश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दाढ़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूँछ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोम और नखों को कटवाता रहे। सदा निर्मल और बिना फटे वस्त्र पहने। सदा प्रसन्न रहे और सुगन्ध (इत्र आदि) से सुगन्धित बना रहे। सज्जनों जैसा वेश धारण करे। बालों को सँवार कर रखे। शिर पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कानों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नासिका में और पैरों में नित्य तेल डाले। किसी से मिलने पर उसके बोलने के पहले ही कुशल-क्षेम पूछे। प्रसन्नवदन रहे।</span></strong></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>भावी कार्य योजना</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category> फरवरी</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1545/%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%9C%E0%A4%B2%E0%A4%BF-%E0%A4%95%E0%A5%87-24%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E2%80%98%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%9C%E0%A4%B2%E0%A4%BF-%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E2%80%99-%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8B%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%89%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%98%E0%A4%BE%E0%A4%9F%E0%A4%A8</link>
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                <pubDate>Fri, 01 Feb 2019 21:49:54 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राष्ट्रसेवा में पतंजलि के सेवा कार्य</title>
                                    <description><![CDATA[<ul style="list-style-type:square;">
<li class="MsoListParagraphCxSpFirst" style="text-indent:-0.25in;text-align:justify;">
<h5>·   <span lang="hi" xml:lang="hi">अब तक 500 विद्वान् व्याकरणाचार्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शनाचार्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगाचार्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्वान् व श्रेष्ठ संन्यासी व आचार्य पतंजलि योगपीठ के माध्यम से तैयार हो चुके हैं और अगले 5 वर्षों में 1000 से अधिक आदर्श योगी एवं कर्मयोगी संन्यासी तैयार करके ऋषियों के सच्चे उत्तराधिकारी भारत माता की सेवा में समर्पित करना पतंजलि का ध्येय है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">एक लाख से अधिक ग्राम समितियाँ पूरे देश में संगठित रूप से गाँवों में कार्यरत हैं। खण्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रखण्ड एवं वार्ड समितियों के अन्तर्गत तहसील व जिला समितियों के समन्वय से 95,225 ग्रामों में योग चिकित्सा शिविर लगाये गये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">5,260 नशा-मुक्ति शिविर</span>, </h5></li></ul>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><ul style="list-style-type:square;">
<li class="MsoListParagraphCxSpFirst" style="text-indent:-0.25in;text-align:justify;">
<h5>·   <span lang="hi" xml:lang="hi">अब तक 500 विद्वान् व्याकरणाचार्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शनाचार्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगाचार्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्वान् व श्रेष्ठ संन्यासी व आचार्य पतंजलि योगपीठ के माध्यम से तैयार हो चुके हैं और अगले 5 वर्षों में 1000 से अधिक आदर्श योगी एवं कर्मयोगी संन्यासी तैयार करके ऋषियों के सच्चे उत्तराधिकारी भारत माता की सेवा में समर्पित करना पतंजलि का ध्येय है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">एक लाख से अधिक ग्राम समितियाँ पूरे देश में संगठित रूप से गाँवों में कार्यरत हैं। खण्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रखण्ड एवं वार्ड समितियों के अन्तर्गत तहसील व जिला समितियों के समन्वय से 95,225 ग्रामों में योग चिकित्सा शिविर लगाये गये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">5,260 नशा-मुक्ति शिविर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">75,260 विद्यालयों में योग शिविर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">500 जिलों में स्वच्छता अभियान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आदर्श ग्राम निर्माण अभियान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">10 लाख औषधीय पौधों का रोपण एवं जड़ी-बूटी वितरण कार्यक्रम तथा 10 हजार यूनिट से अधिक रक्तदान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गरीब कन्या विवाह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">1000 से अधिक तहसीलों में स्वदेशी खेलकूद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग प्रतियोगिताओं एवं 10 हजार से अधिक किसानों को गौ-आधारित जैविक कृषि का प्रशिक्षण इत्यादि सेवा कार्य किए गए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">600 योग प्रचारक पूर्णकालिक रूप से पतंजलि योगपीठ की सेवाओं के प्रचार में अहर्निश संलग्न हैं। योग प्रचारकों द्वारा 3 वर्षों में 70 हजार गाँवों में योग शिविर लगाए गये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">51,763 स्वच्छता अभियान/जन जागरुकता रैलियाँ निकाली गई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">1,52,566 आरोग्य सभाएं तथा 65,462 योग शिविर व 30,112 वृक्षारोपण इत्यादि कार्यक्रम आयोजित किये जो कि एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">6 संगठन भारत स्वाभिमान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योग समिति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महिला पतंजलि योग समिति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युवा भारत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि किसान सेवा समिति व हाम्रो स्वाभिमान सम्पूर्ण भारत में सेवारत हैं एवं इनके विधिवत् जिला कार्यालय स्थापित हैं। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशिक्षित योग शिक्षक-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> हरिद्वार में आवासीय प्रशिक्षित लगभग 2.26 लाख शिक्षक तथा देशभर में प्रारम्भिक साप्ताहिक योग प्रशिक्षण प्राप्त लगभग 10 लाख सहयोगी योग शिक्षक हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पूर्ण भारत में 640 से अधिक जिला समितियाँ एवं 4560 तहसील समितियाँ सक्रियता से योग व राष्ट्र सेवा में कार्यरत हैं। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">1 करोड़ कार्यकर्ता-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> संगठन के लगभग 1 करोड़ कार्यकर्ता हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने संगठन में दान देकर सदस्यता ली है तथा संगठन में सेवा व सहयोग करते हैं। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">एक लाख योग कक्षाएं-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> इनके माध्यम से एक लाख से अधिक नि:शुल्क स्थायी योग कक्षाएं पूरे देश में चल रही हैं। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से 100 करोड़ से अधिक लोगों तक योग का संदेश पहुँचाया। रोगमुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जातिमुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नशा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमाद एवं अन्य बुराइयों से मुक्त व्यक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज एवं राष्ट्र के निर्माण में सेवा कार्य संचालित हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">रोजगार- 2 लाख किसानों व युवाओं को प्रत्यक्ष-परोक्ष रोजगार प्रदान किया गया।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत सरकार द्वारा आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस समारोह- </span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">2015 में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस पर योगर्षि श्रद्धेय स्वामी रामदेव जी महाराज के सान्निध्य में दिल्ली में भाग लेने वाले 35 हजार लोगों में से गैर-सरकारी संगठनों में सर्वाधिक भागीदारी 5 हजार 500 से अधिक पतंजलि योगपीठ की रही। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">2016 में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर चंडीगढ़ में भाग लेने वाले 32 हजार लोगों में सर्वाधिक भागीदारी 12 हजार से अधिक पतंजलि योगपीठ की रही।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">2017 में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर लखनऊ में भाग लेने वाले 51 हजार लोगों में 22 हजार 500 से अधिक भागीदारी पतंजलि योगपीठ की रही। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">2018 में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर देहरादून में भाग लेने वाले 50 हजार लोगों में भागीदारी 13 हजार से अधिक पतंजलि योगपीठ की रही।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस समारोह-</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">2015 में आयोजित करनाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरियाणा में 37 हजार से अधिक संख्या रही।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">2016 में श्रद्धेय स्वामी जी महाराज के सान्निध्य में आयोजित योग शिविर फरीदाबाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरियाणा में 2 लाख से अधिक संख्या रही।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">2017 में आपश्री के सान्निध्य में आयोजित अहमदाबाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुजरात में 4-5 लाख से अधिक संख्या रही।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार 2018 में आपश्री के सान्निध्य में आयोजित कोटा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजस्थान में 2 लाख से अधिक साधक संख्या रही।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व रिकॉर्ड-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> योग के क्षेत्र में 3 गिनीज बुक ऑफ  वल्र्ड रिकॉर्ड तथा 142 गोल्डन बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड स्थापित।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय युवा दिवस समारोह- दुर्ग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छत्तीसगढ़ में एक साथ 1 लाख 20 हजार युवाओं द्वारा सूर्य नमस्कार का वल्र्ड रिकॉर्ड बनाया गया। इसी प्रकार जौनपुर में भी ३ रिकॉर्ड बनाए गए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अनुसंधान-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> आपश्री के कर कमलों से लोकार्पित विश्व का प्रथम सर्वश्रेष्ठ आयुर्वेद शोध संस्थान पतंजलि रिसर्च इंस्टीट्यूट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व की सबसे बड़ी संस्थाएँ पतंजलि योगपीठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निरामयम्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि आयुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य फार्मेसी एवं राष्ट्रव्यापी संगठन के माध्यम से भारत माता की विनम्र सेवाएँ निरन्तर चल रही हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">आस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैदिक चैनल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोशल मीडिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ट्विटर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फेसबुक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यू-ट््यूब के माध्यम से करोड़ों लोगों को योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद स्वदेशी एवं ऋषि संस्कार से जोड़ा है।</span></h5>
</li>
</ul>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category> फरवरी</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1546/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%9C%E0%A4%B2%E0%A4%BF-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%B8%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF</link>
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                <pubDate>Fri, 01 Feb 2019 21:46:08 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वक्ष, उदर व प्रजनन संस्थान रोग निवारक आयुर्वेदिक घटक लवंग</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">आयुर्वेद मनीषी आचार्य <br />बालकृष्ण जी महाराज</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1547/vaksha-udar-v-prajanan-sansthan-rog-nivarak-ayurvedic-ghatak-lavang"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/024.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ल</span><span lang="hi" xml:lang="hi">वंग (लौंग) का मूल उत्पत्ति स्थल मलक्का द्वीप है। भारत के दक्षिण में केरल और तमिलनाडु में भी इसकी खेती की जाती है। भारतवर्ष में इसका अधिकांश आयात सिंगापुर से किया जाता है। लौंग के वृक्ष पर लगभग 9 वर्ष की आयु में फूल लगने शुरू हो जाते हैं। इसकी पुष्प कलियों को ही सुखाकर बाजार में लौंग के नाम से बेचते हैं। देवकुसुम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीसंज्ञ तथा श्रीप्रसूनक आदि नामों से आयुर्वेदीय निघण्टुओं से इसका उल्लेख मिलता है। चरक तथा सुश्रुत आदि प्राचीन आयुर्वेदीय संहिताओं में पान के साथ लौंग के सेवन का विधान किया गया है तथा गर्भिणी के वमन में इसे उत्तम औषधि बताया गया है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/cloves.jpg" alt="cloves"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बाह्य स्वरूप</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसका पिरामिड आकार का अथवा शंक्वाकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">9-12 मी. ऊँचा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सदाहरित वृक्ष होता है। इसका मुख्य काण्ड सीधा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कठोर तथा चौड़ा होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शाखाएँ अनेक होती हैं। इसकी तने की छाल-पाण्डुर पीताभ-धूसर वर्ण की तथा चिकनी होती है। इसके पत्र सरल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विपरीत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">7.5-15 सेमी. लम्बे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दीर्घ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अण्डाकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भालाकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों ओर नुकीले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों पृष्ठ पर चिकने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिन्दुकित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गहरे हरित वर्ण के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चमकीले तथा अध:पृष्ठ पर पाण्डुर वर्ण के होते हैं। इसकी पुष्प कलिका शाखाओं के अन्त पर छोटे गुच्छों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुगन्धित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हल्के नील-अरुण वर्ण के लगभग 6 मिमी. लम्बे होते हैं। सूखी हुई पुष्प कलिकाओं को लौंग कहा जाता है। लौंग 10-15 मिमी. लम्बी तथा रक्ताभ-बादामी वर्ण की होती है। इसके फल माँसल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लगभग 2-5 सेमी. लम्बे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">1-5 सेमी. स्थूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिकने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अण्डाकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दीर्घायत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गहरे गुलाबी से बैंगनी वर्ण के तथा बीज मुलायम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">1-5 सेमी. तक लम्बे होते हैं। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल जनवरी से मई तक होता है।</span></h5>
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#CED4D9;border-color:#CED4D9;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(206,212,217);">
<h4 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रासायनिक संघटन</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सकी शुष्क पुष्प कलिका में विटामिन-बी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रोटीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्बोहाइड्रेट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युजिनॉल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओलिऐनोलिक अ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"></span><span lang="hi" xml:lang="hi">ल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैरियोफाईलीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टैनिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युजिनॉल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाष्पशील तेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिरतेल तथा फॉस्फोरस पाया जाता है।</span></strong></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेदीय गुण-कर्म एवं प्रभाव</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लौंग चरपरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कड़वी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नेत्र के लिए हितकारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीतल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दीपन-पाचन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रुचिकारक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कफ-पित्त विकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तरोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तृष्णा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वमन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अफारा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास हिचकी और क्षय रोग का शमन करती है। लवंग तेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्निवर्धक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वातशामक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दन्तशूल तथा कफ शामक है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">लौंग के कुछ विशेष गुण </span></strong></span></h5>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">लौंग के सेवन से भूख बढ़ती है। आमाशय की रस क्रिया को बल मिलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भोजन के प्रति रुचि पैदा होती है और मन प्रसन्न होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">लौंग कृमिनाशक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन सूक्ष्म जन्तुओं के कारण से मनुष्य का पेट फूलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें यह नष्ट कर देती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे मनुष्य की रोग निवारण क्षमता बढ़ती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यह चेतना शक्ति को जागृत करती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यह शरीर की दुर्गन्ध को नष्ट करती है। शरीर के किसी भी बाह्य-अंग पर लेप करने से लौंग चेतना कारक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेदना नाशक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्रणशोधक और व्रणरोपक है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">लौंग मूत्रल है। यह मूत्रमार्ग की शुद्धि कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर के विजातीय द्रव्यों को मूत्र के द्वारा बाहर निकाल देती है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पत्र</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सार</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ओलिआनॉलिक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"></span><span lang="hi" xml:lang="hi">ल</span></strong></span></h4>
<ul style="list-style-type:circle;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">मधुमेह रहित और एस.टी.जैड. (स्ञ्र्जं) प्रेरित मधुमेही चूहों में उच्चरक्तशर्करारोधी क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पुष्प कलिका का एथेनॉलिक सार विस्टर (ङ्खद्बह्यह्लड्डह्म्) चूहों में मस्तिष्क उद्दीपनरोधी और शोथरोधी क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">लौंग का वाष्पशील तेल चूहों में व्याधिक्षमत्व उत्तेजक क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है। लौंग के सेवन से भूख बढ़ती है। आमाशय की रस क्रिया को बल मिलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भोजन के प्रति रुचि पैदा होती है और मन प्रसन्न होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">औषधीय प्रयोग एवं विधि</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">शिरो रोग</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">6 ग्राम लौंग को पानी में पीसकर सुखोष्ण (किंचित् गर्म) कर गाढ़ा लेप कनपटियों पर करने से शिर: शूल एवं आधाशीशी के दर्द में लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">नेत्र रोग</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लौंग को ताँबे के बर्तन में पीसकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शहद मिलाकर अंजन करने से नेत्र के सफेद भाग के रोग मिटते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मुख रोग</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लौंग तेल को रूई के फाहे में लगाकर दाँतों में लगाने से दंतशूल तथा दंतकृमियों का शमन होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वक्ष रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कफ  निष्कासन के लिये- लौंग के 2 ग्राम यवकुट (मोटा-मोटा कूटकर) किये हुये चूर्ण को 125 मिली. पानी में उबालें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चतुर्थांश शेष रहने पर इसे उतारकर छान लें और थोड़ा गर्म अवस्था में पी लें। यह कफ  को द्रवित कर निकाल देता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास की दुर्गन्ध- लौंग को मुँह में रखने से मुँह और श्वास की दुर्गन्ध मिटती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">दमा-लौंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आँकड़े के फूल और काला नमक को समभाग लेकर पीस लें। तत्पश्चात् चने के आकार की गोली बनाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुख में रखकर चूसने से दमा और श्वास नलिका के रोग मिटते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कुक्कुरकास- 3-4 नग लौंग को आग पर भूनकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीसकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शहद मिलाकर चाटने से कुक्कुर खाँसी मिटती है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उदर रोग</span></strong></span></h4>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">विसूचिका (हैजा)</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> जन्य तृष्णा- एक या डेढ़ ग्राम लौंग को करीब डेढ़ लीटर जल में डालकर उबालें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">2-3 उबाल आने पर नीचे उतार कर ढक देें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें से 20-25 मिली. जल को बार-बार पिलाने से विसूचिका जन्य तृष्णा का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अजीर्ण-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> 1 ग्राम लौंग और 3 ग्राम हरड़ को मिलाकर क्वाथ (काढ़ा) बनाकर उसमें थोड़ा-सा सेंधा नमक डालकर पिलाने से अजीर्ण तथा अतिसार में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">हृल्लास-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> लौंग को पानी के साथ पीसकर किंचित् उष्ण कर थोड़ा-थोड़ा पिलाने से हृल्लास (जी मिचलाना) और तृष्णा में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">क्षुधावर्धन हेतु-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> लौंग और छोटी पिप्पली दोनों को समभाग लेकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीसकर चूर्ण बना लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस चूर्ण को डेढ़ ग्राम की मात्रा में लेकर मधु मिलाकर प्रात: सायं चाटने से ज्वर जन्य मंदाग्नि व निर्बलता दूर होती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अफारे में-10 ग्राम लौंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">10 ग्राम सोंठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अजवायन और 10 ग्राम सेंधा नमक तथा 40 ग्राम गुड़ को पीसकर 325-325 मिग्रा. की गोलियाँ बना लें। १-१ गोली को दिन में 2-3 बार सेवन करने से अफारा व मंदाग्नि दूर होती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बदहजमी-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> लौंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुंठी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिर्च</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीपल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अजवायन 10-10 ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेंधा नमक 50 ग्राम तथा मिश्री 50 ग्राम को महीन पीसकर चीनी मिट्टी के बरतन में रखकर उसमें नींबू का रस इतना डालें कि सभी चूर्ण उसमें तर हो जायें। इसे धूप में सुखाकर सुरक्षित कर लें। इसे एक चम्मच भोजन के बाद सेवन करने से मुँह का स्वाद अच्छा हो जाता है तथा बदहजमी व खट्टी डकारें आदि बन्द हो जाती हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">1-2 ग्राम लौंग को यवकुट कर 100 मिली. जल में क्वाथ कर 20-25 मिली. शेष रहने पर इसे छानकर ठंडा कर पीने से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मंदाग्नि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अजीर्ण एवं हैजे में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">लौंग का फाण्ट या लौंग का तेल देने से अफारे में तुरन्त लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">लौंग के दरदरे 10 ग्राम चूर्ण को आधा लीटर उबलते हुये जल में डालकर ढक दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आधे घंटे बाद छान लें। 25-50 मिली. जल  को दिन में 3 बार पिलाने से उदरगतवात और अपच दूर होकर अग्नि प्रदीप्त होती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">लौंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोंठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">10-10 ग्राम तथा अजवायन व सेंधा नमक 12-12 ग्राम का चूर्ण कर डेढ़ ग्राम मात्रा को भोजन के बाद जल के साथ सेवन करें। यह अजीर्ण और अम्ल रोग नाशक है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजनन संस्थान रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">गर्भकाल में वमन- 1 ग्राम लवंग चूर्ण को मिश्री की चाशनी व अनार के रस मेें मिलाकर चाटने से गर्भवती स्त्री की उल्टी (वमन) बन्द होती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">लौंग का फाण्ट पिलाने से गर्भवती स्त्री की छर्दि (वमन) बन्द हो जाती है। ज्वर में यह फाण्ट न दें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">स्तम्भन के लिये- लौंग व जायफल को घिसकर नाभि पर लेप करने से स्त्री और पुरुष की स्तम्भन शक्ति बढ़ जाती है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अस्थिसंधि रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">वातजन्य शूल- लवंग की त्वचा को उष्णोदक के साथ पीसकर लेप करने से वातजन्य शूल का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">संधिवात-लौंग का तेल लगाने से संधिवात में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचा रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">5-6 लौंग और 10 ग्राम हल्दी को पीसकर लगाने से नासूर ठीक हो जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वशरीर रोग</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">दाह-2-4 नग लौंग को शीतल जल में पीसकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिश्री मिलाकर पीने से हृदय की दाह मिटती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वर-लौंग तथा चिरायता दोनों को समान भाग लेकर पानी में पीसकर पिलाने से ज्वर में लाभ होता है। </span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>रोगानुसार योग </category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category> फरवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 Feb 2019 21:44:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>लोकमङ्गल से आत्ममङ्गल</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">श्रद्धेय गुरुदेव आचार्य प्रद्यु</span><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi"></span><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">न जी महाराज<span>  </span></span></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1548/lokmangal-se-atammangal"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/216.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्त्र में अविनाशी परमात्मतत्त्व के स्वरूप को दर्शाने के लिए निषेधवाचक शब्दों का प्रयोग ही प्राय: मिलता है। उसका कारण यही है कि व्यक्ति की इस अज्ञान अवस्था में उस अक्षर अविनाशी तत्त्व का समस्त दृश्य के साथ तादात्म्य हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस तादात्म्य को हटाने या तोडऩे के लिए यह एक युक्ति या मार्ग निकाला गया। इस प्रक्रिया से साधक अपने उस केवल निज स्वरूप में पहुँच जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ दूसरा विषय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पदार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नाम तथा रूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ भी नहीं रहता।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रश्नोपनिषद् में भी उसके षोडश (सोलह) कला वाले स्वरूप का वर्णन करके उसके निष्कल (कलाओं से रहित) शुद्ध स्वरूप का दर्शन कराया गया है। प्राण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंचभूत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रिय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वीर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मंत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोक और नाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन कलाओं ने ब्रह्म के पारमार्थिक स्वरूप को ढक रखा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए इन्हें कला कहते हैं (कं ब्रह्म लीयते आच्छाद्यते यया सा कला) व्यक्ति का आत्ममङ्गल तो उस शुद्ध स्वरूप की उपलब्धि में ही निहित है। लोकमङ्गल से जीवन का आधा लक्ष्य ही पूरा होता है। अर्थात् लोकमङ्गल अपने से बाहर कुछ करने से सम्बद्ध है और आत्ममङ्गल अपने भीतर जानने से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह दोनों की स्थिति है। आत्ममङ्गल का कोई और भी उपाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मार्ग या साधन है अथवा केवल एक ही रास्ता है कि व्यक्ति किसी से कुछ न चाहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ न देखे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ न सुने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ न बोले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समस्त मन व इन्द्रियों के व्यापार से उपरत हो जाए और इस प्रकार बाहर से सर्वथा विमुख होकर आत्म-केन्द्रित हो जाए। हाँ! और भी है। जीव जब मनुष्य शरीर में इस संसार में आता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ऐसी असहाय अवस्था में होता है कि एक-एक क्षण उसकी देखभाल की आवश्यकता होती है। आरम्भ में तो माता-पिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुटुम्ब सब मिलकर मनुष्य को अपने प्रेम व साधनों से बढ़ाते हैं। धीरे-धीरे गुरुजन या समाज जैसे भी उसे मिलते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनसे कुछ शुभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ अशुभ सीखता हुआ कुछ करने लायक हो जाता है। यदि उसमें अज्ञान अधिक होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसके अनुपात में भोग-इच्छाएँ ही बलवती होती हैं। भोग रुचि के प्रबल होने पर व्यक्ति अधर्मपूर्वक भी अपनी उस भोग-रुचि को पूरा करने में लगा रहता है और इस प्रकार न चाहते हुए भी पाप संचय करता हुआ अपना अमङ्गल करता रहता है। यह एक सर्वमान्य सिद्धान्त है कि भोग की रुचि को लेकर अशुभ और पुण्य की रुचि को लेकर शुभ कार्य होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु यदि उसे सौभाग्यवश उत्तम कोटि के माता-पिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मित्रगण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज या गुरुजन मिल जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसकी बुद्धि धर्म की ओर अधिक अभिमुख रहती है और वह धर्मपूर्वक ही अपनी भोग-इच्छाओं को पूरा करना चाहता है। इस प्रक्रिया से पुण्य का संचय बढ़ते-बढ़ते आत्ममङ्गल की ओर अग्रसर होता रहता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पूर्ण रूप से आत्ममङ्गल तो तभी होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब व्यक्ति को कोई ज्ञानी पथ प्रदर्शक गुरु मिल जाए। वह गुरु किसी को माँ के रूप में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी को पिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मित्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साक्षात् गुरु या किसी भी रूप में मिल सकता है। वह गुरु अपने शिष्य का शास्त्र से भी परिचय करा देता है। इस प्रकार शास्त्र और गुरु दोनों मिलकर शिष्य की बुद्धि में ज्ञान का बीज बोते हैं। आगे चलकर यही बीज विकसित होता हुआ शिष्य की सत्ता के ऊपर छा जाता है। उसके हृदय में शुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पवित्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमरत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परम शान्ति की प्यास दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती है। बढ़ती हुई यह प्यास स्वयं मार्ग खोजती हुई साधक की उस माँग को पूरा कर देती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो वह व्यग्र होकर परम उत्कण्ठा के साथ खोज रहा होता है या चाह रहा होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्र व गुरुजन साधक का मार्गदर्शन करते हैं कि तुम्हारे पास विधान के अनुसार जो कुछ भी संचित हो गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके बदले में कुछ भी न चाहते हुए इच्छुक लोगों में उदारतापूर्वक बाँटते रहो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें तुम्हारे विवेक व सामथ्र्य का कुछ विरोध भी न हो। ऐसा करने से तुम्हारे चित्त की वह भूमि तैयार हो जाएगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें भागवत ज्ञान-ज्योति-प्रकाश-आनन्द-परमरस-परमतृप्ति अवतरित होगी। इस प्रकार निष्काम कर्म (सेवा) भी चित्तशुद्धि परम्परा से तुम्हारे आत्ममङ्गल के साधन बन जाएँगे। इस तरह निरन्तर चलते-चलते एक दिन तुम्हारा परम कल्याण हो जाएगा। साधक भी संचित पुण्यों के कारण प्राप्त उत्तम बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञा या मेधा के द्वारा शास्त्र या गुरुवाणी में पूर्ण विश्वास करता हुआ निर्दिष्ट पथ पर धैर्य से चलता रहता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भक्ति के माध्यम से भी आत्ममङ्गल घटित हो सकता है। तदर्थ दो शक्तियों का संयोग या मिलन आवश्यक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधक की अभीप्सा और भागवत कृपा। बाह्य गुरु व शास्त्र दोनों के सहयोग से साधक की प्यास सतेज होती जाती है। यह प्यास तत्त्व और भी अधिक तीव्र व बलवती हो जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब साधक अपनी प्राप्त विवेकबुद्धि के द्वारा इस संसार की अनित्यता या असारता का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षणिक सुखों से मिलने वाली अतृप्ति का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहं की पूर्ति करने में झेले गए अनन्त दु:खों का विचार करने में सक्षम होता है। इन सब के सहयोग से भगवत् प्राप्ति के लिए साधक में अनन्य प्रेम जाग्रत हो जाता है। यह प्रेम साधक की सभी अन्य इच्छाओं को खा जाता है। विषयों से भरा हुआ यह समग्र संसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कभी पहले उसे रस से परिपूर्ण दिखाई देता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब वह उसके लिए एकदम उल्टा हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब कुछ नीरसता में बदल जाता है। भगवान् के सिवाय उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता। न किसी से बात करना चाहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कोई खाने-पीने में रुचि है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कहीं घूमने की इच्छा होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न किसी सम्मान की ही चाह है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह इस तरह का दीवाना जैसा हो जाता है। बस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस व्याकुलतापूर्ण स्थिति या अवस्था की उत्तर अवस्था ही भगवत्प्राप्ति है। भगवत्प्राप्ति होने पर व्यक्ति शान्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समता में स्थित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समबुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वात्मभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरल (अहंमुक्त) हो जाता है। ऐसे व्यक्ति को शास्त्रकारों ने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कुशल’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">या ब्रह्म को जानने वाला </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ब्राह्मण’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सार्थक नाम दिया है। बृहदारण्यक श्रुति में याज्ञवल्क्य गार्गी को समझाते हुए कहते हैं कि जो इस अक्षर अविनाशी तत्त्व को बिना जाने इस संसार से प्रयाण करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह कृपण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेचारा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुत ही दीन है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्त में साररूप में संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि यदि उचित दृष्टि मिल जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो लोकमङ्गल व आत्ममङ्गल न तो एक-दूसरे के विरोधी हैं और न असहयोगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। साधक को यह दृष्टि मिल जाती है कि यह सृष्टि उस सृष्टिकर्ता का निवास स्थान है और सृष्टिकर्ता ही उसका प्रभु है। समस्त जीवगण अपने प्रभु के सेवक हैं या उसकी सन्तानें हैं। उन सबमें मनुष्य की स्थिति यह है कि वह अपने प्रभु का या अपने पिता का ही प्रतिरूप है। मनुष्य का यही सर्वोत्तम कत्र्तव्य है कि उसका यह शरीर विश्ववाटिका की खाद बन जाए और हृदय अपने प्रभु के लिए प्रेम से भर जाए और अहं अभिमान शून्य हो जाए अर्थात् अपने लिए किसी से कुछ न चाहे। इस समझ के साथ यदि कोई अपने जीवन को चलाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो स्वत: ही उभयविध मङ्गल साधित हो जाता है। इस दृष्टि में कर्मयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञानयोग व भक्तियोग तीनों ही इक्कठे हो जाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर से (स्थूल व सूक्ष्म शरीर दोनों से ही) कर्मयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि से ज्ञानयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन व अपने से भक्तियोग सम्पन्न होता है। ये तीनों योग भी सर्वथा एक-दूसरे से पृथक् नहीं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। केवल इतनी सी बात है कि एक की प्रमुखता रहती है और दूसरे दो सहयोगी। मनुष्यों का प्रारब्ध (कर्मप्रवाह) पृथक्-पृथक् होने से किसी में क्रिया के वेग की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी में विचार की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो किसी में भाव की प्रमुखता होती है। कर्मयोगी का साधन उदारता और कत्र्तव्यपरायणता है। वह प्राप्त सामथ्र्य को या तो भगवान् की समझता है या जगत् की। यदि वह इसे भगवान् की समझता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भगवान् के नाते और जगत् की समझता है तो जगत् के नाते अपनी सम्पूर्ण सामथ्र्य को सेवा में अर्पित कर देता है। साथ में अपने लिए किसी से कुछ चाहता नहीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जिस स्वाधीनता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वराज्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमरत्व की उसे माँग है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह किसी वस्तु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति या परिस्थिति के अधीन होकर नहीं मिल सकती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे तो पहले ही अपने में मौजूद हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: अपनी माँग को अपने में ही पाकर सन्तुष्ट हो जाता है। इसी का नाम है- ज्ञानयोग। सुने हुए प्रभु को अपना मानकर उसे अपने हृदय का प्यार अर्पित करने का नाम है भक्तियोग। अर्थात् प्रभु को अपना प्रेमास्पद स्वीकार करके अपने हृदय में उसकी अखण्ड स्मृति जगाकर नित्य प्रेम का दान करना ही भक्तियोग है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संक्षेप में मेरे पास जो कुछ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह जगत् का है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस बुद्धि से जगत् की सेवा का नाम कर्मयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु जगत् पति का समझकर जगत् की सेवा का नाम भक्तियोग और किसी का भी न समझकर अपने में अचाह हो जाने का नाम है ज्ञानयोग। ज्ञानयोगी भी कर्म करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">गुण ही गुणों में वर्त रहे हैं और मैं गुणों से असङ्ग हूँ’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इस भाव के साथ करता है। मनुष्य को जगत् के लिए भी उपयोगी होना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने लिए भी और प्रभु के लिए भी। वस्तुत: जिसका आत्ममङ्गल हो गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही सच्चे अर्थ में लोकमङ्गल कर सकता है। साक्षात् सच्चिदानन्द बनकर जीना ही आत्ममङ्गल का स्वरूप है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसी स्थिति में जीवन का निर्दोष हो जाना स्वाभाविक है। निर्दोष जीवन में लोकमङ्गल निहित ही है।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category> फरवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 Feb 2019 21:41:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आंतरिक शक्तियों को कैसे प्रकट करें</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">साध्वी आचार्या देवप्रिया</span></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1549/antarik-shaktiyon-ko-kaise-prakat-kare"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/443.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हम कहते हैं कि ईश्वर हम सबमें निहित है। वो हमारे अन्दर भी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाहर भी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब जगह विद्यमान है। किन्तु वह अभिव्यक्त क्यों नहीं हो रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिखाई क्यों नहीं दे रहा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">वाद्य यंत्रों में सभी स्वर मौजूद हैं किन्तु उन्हें वही बजा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने उनका अ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"></span><span lang="hi" xml:lang="hi">यास किया हो। अ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"></span><span lang="hi" xml:lang="hi">यास के अभाव में वाद्य यंत्रों से बेसुरा स्वर ही निकलेगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ई</span><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वर हमारे भीतर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं पूर्ण हूँ किन्तु यह अभिव्यक्त नहीं हो रहा। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सहोऽसि सहो मयि धेहि’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरी सहनशक्ति कम क्यों है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि ईश्वर तो महान् सहनशील</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षमाशील</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यायकारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परमपुरुषार्थी है। विष्णो: कर्माणि पश्यत। यह सारा कर्म ईश्वर का ही तो है। क्योंकि हमने भागवत शक्तियों को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वरीय शक्तियों को अभिव्यक्त करने का अभ्यास ही नहीं किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए ईश्वर हमारे अंदर होते हुए भी हम उसे अभिव्यक्त नहीं कर पाये। ये अभिव्यक्त होते हैं महर्षि दयानन्द के व्यक्तित्व से। क्योंकि महर्षि दयानन्द ने उन गुणों को अभिव्यक्त करने का घण्टों-घण्टों नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिपल अभ्यास किया है। वे अपने सभी व्या</span><span lang="hi" xml:lang="hi"></span><span lang="hi" xml:lang="hi">यानों में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यद भद्रं तन्न आसुव’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इस वेदवाक्य का उद्धरण देते थे। वे कहते थे कि इस दुनिया में जो भी अच्छा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह हमें ग्रहण करने का अ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"></span><span lang="hi" xml:lang="hi">यास करना चाहिए। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हम कहीं जाते हैं तो वहाँ कमियाँ ढूँढऩे लगते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे उदाहरण के तौर पर यदि हम न्यू-मुल्तान नगर आर्य समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिल्ली गये तो वहीं कमियाँ ढूँढऩे लगते हैं। कहते हैं कि वहाँ सब कुछ तो ठीक था किन्तु पानी के गिलास सभी जगह बिखरे पड़े थे। पतंजलि योगपीठ गये थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ सब कुछ तो ठीक था किन्तु जो पंखे लगे थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे विदेशी कम्पनियों के थे। अरे भाई! वो पंखे यदि २० वर्ष पूर्व किसी दानदाता ने दान दिये थे तो अब क्या उन्हें फेंक दें। किसी के घर जाते हैं तो कहते हैं कि उन सास-बहू की आपस में बनती नहीं है। वैसे तो दोनों मुस्कुरा रहे थे किन्तु वह सब बनावटीपन था। ये जो व्यक्ति बयान कर रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये आर्य समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ या उस अमुक व्यक्ति के घर की स्थिति को बयान नहीं कर रहा अपितु अपनी दृष्टि को बयाँ कर रहा है कि इस संसार को देखने की उसकी दृष्टि कैसी है। संसार को देखने का उसका अभ्यास कैसा है। जिसका देखने का अभ्यास सुन्दर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे कीचड़ में भी कमल दिखाई देता है। उसे कीचड़ दिखाई देता ही नहीं है। और जिसका देखने का अभ्यास सुन्दर नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे चन्द्रमा में भी दाग दिखाई देता है। ये सब हमारे अभ्यास का ही परिणाम है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सफलता को पचाने का अभ्यास</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अभ्यासों की इस कड़ी में हमें सफलता पाने पर न इतराने का अभ्यास और प्रतिकूलता आने पर न घबराने का अभ्यास करना है। व्यक्ति को जब थोड़ी सी सफलता प्राप्त होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थोड़ी अनुकूलता आती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यश मिलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुकीर्ति मिल जाती है तो वह भूल जाता है कि मैं कहाँ से चला था। वह भूल जाता है कि जो मुझे मिला है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह कहाँ से मिला है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैसे मिला है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और अभी भी मुझे जो मिल रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके पीछे कितने लोगों का आशीर्वाद है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">वह अपनी सफलता की कहानी भूल जाता है। वह एरोगेन्ट हो जाता है और थोड़े दिन में लोग उसे अपने जीवन से बाहर कर देते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अत: व्यक्ति को सफलता पचाने का अभ्यास भी होना चाहिए। अनुकूलताओं में भी अपने आप को स्थिर रखने का अभ्यास होना चाहिए। क्योंकि पौधे के ऊपर जो पुष्प खिला है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह तभी खिला जब तक जड़ से जुड़ा है। यदि वह जड़ की परवाह न करे और सोच ले कि जड़ का क्या अस्तित्व है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह तो मिट्टी में दबी पड़ी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोग तो मेरी वाह-वाह करते हैं। और जिस दिन वह अपनी जड़ों से कट जायेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी दिन सूख जायेगा। उस पुष्प की सुन्दरता और वाह-वाही के पीछे मिट्टी में दबी वो जड़ें हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कभी दिखती नहीं हैं। यही है अनुकूलताओं में अपने को स्थिर रखने का अभ्यास।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अनुकूलताओं के साथ-साथ जीवन में प्रतिकूलताएँ भी आती हैं। प्रतिकूलताओं में न घबराने का अभ्यास भी हमें होना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं तो व्यक्ति अवसाद में चला जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टूट जाता है। यह हम सबकी समस्या है। हम सब अच्छी-अच्छी बातें जानते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बोलते हैं किन्तु जब हमारे जीवन में प्रतिकूलताएँ आती हैं तो रोने लगते हैं। यदि थोड़े समझदार हैं तो दूसरों के सामने मुस्कुराते हैं और अन्दर एकांत में जाकर रो लेते हैं। किन्तु सहनशक्ति तो नहीं है ना। अन्दर रोयें या बाहर रोयें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये हमारी कमजोरी का प्रतीक तो है ही। शक्ति वही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्दर भी ईश्वर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाहर भी ईश्वर है किन्तु सत्संग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपासना उस अन्दर वाले अव्यक्त को सक्रिय कर देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभिव्यक्त कर देते हैं। अत: सत्संग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपासना का भी अभ्यास हमें होना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अपना अभिनय सही प्रकार से करने का अभ्यास</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हम सभी जीवन में अभिनय कर रहे हैं। एक उदाहरण के तौर पर एक प्रसंग प्रस्तुत है- एक व्यक्ति मंच पर अभिनय कर रहा था। उस अभिनय में उसका किरदार था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कि उसका जहाज पानी में डूब गया। उसके बीवी-बच्चे मर गये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका व्यापार नष्ट हो गया। इन सब घटनाओं से उसे हृदयाघात (हार्ट-अटैक) होता है और वह मर जाता है। वह व्यक्ति उस अभिनय को पूरी तन्मयता के साथ निभाता है। अब वह मंच पर मरणासन अवस्था में पड़ा है। उसके सगे संबंधी उसे चारों ओर से घेरे हुए हैं तथा रो रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिलख रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस व्यक्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कुछ लोग उसे उठाकर ले जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब भी वह उसी अवस्था में रहता है। किन्तु नाटक समाप्ति के थोड़ी देर बाद देखा तो वह मंच के नीचे खड़ा चाय पी रहा है। एक व्यक्ति ने बड़े अचरज से पूछा कि अभी कुछ देर पहले तो आप मर गये थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और अभी हँस रहे हैं। अभिनेता ने उस व्यक्ति को समझाया कि मैं तो मंच पर अभिनय कर रहा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह कहानी मेरी नहीं थी। फिर वह उस व्यक्ति को अपना परिचय देते हुए कहता है कि मैं तो अमुक स्थान पर रहता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा पूरा परिवार है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बीवी-बच्चे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनके भरण-पोषण के लिए मैं यह सब कर रहा हूँ। मेरी कहानी तो दूसरी है। किन्तु यदि महर्षि दयानन्द की दृष्टि से देखें तो पता चलेगा कि वह कहानी भी उसकी नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ भी वह किरदार ही निभा रहा है। कहीं पति का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं बेटे का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं भाई का तो कहीं बिजनेसमैन का। असली कहानी तो यह है कि मैं एक विशुद्ध आत्मा हूँ। इसमें न तो कुछ जोड़ा जा सकता है और न ही घटाया जा सकता है। आज से ५०-१०० साल पहले कोई और अभिनय करके चले गये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई और प्रधान थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज आप प्रधान हैं। आज से १०० साल पहले बोलने वाले कोई और थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज बोलने वाले कोई और हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कल कोई और होंगे। सब अभिनय कर रहे हैं। मंच पर ३ घंटे की कहानी वाला अभिनय तो बहुत अच्छा कर लेते हैं और अभिनय करने वाले को भी संतुष्टि मिलती है कि मैंने बहुत अच्छा अभिनय किया। दूसरे भी सराहना करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन यह सारा जीवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह संसार भी तो उस ईश्वर का ही रंगमंच है। हम इस मंच पर अभिनय कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये हम भूल जाते हैं। तब हमें लगता है कि मेरा सदा से यही अस्तित्व है। आप सोचें की बचपन से अभी तक हमने कितने अभिनय किए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी छोटे बच्चे का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी युवा का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी विद्यार्थी का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी वक्ता का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी पति का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी पत्नी का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कितने दोस्त हमें छोड़कर चले गए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कितने नए दोस्त हमारे साथ आए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये सब चलता रहता है। ये सब अभ्यास हमें करने हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छी सास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छी बहू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छा पति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छी पत्नी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छा पुत्र बनने का अभिनय करने का अभ्यास हमें करना है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category> फरवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 Feb 2019 21:40:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>क्या चाहते है हम</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ज</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ब हम अपने अंतर्मन की गहराइयों में झाँकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब अपने स्वभाव के बारे में ये भी जान जाते हैं कि मैं शुद्ध घी-दूध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हवा-पानी चाहता हूं। मैं अपने विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार और आसपास का वातावरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब कुछ शुद्ध ही चाहता हूं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशुद्ध कुछ भी नहीं। शुद्ध यानी साफ-सुथरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वच्छ-निर्मल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सही-सार्थक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म-संगत और न्याय-सम्मत।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्ध-सार्थक जीवन के आदर्श के रूप में कोई भी पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज के जीवन को देख सकता है कि जब भी उनके किसी सहयोगी ने बेईमानी-धोखेबाजी की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने उसे तत्काल अपने से दूर कर दिया।</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1550/kya-chahte-hai-ham"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/226.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ज</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ब हम अपने अंतर्मन की गहराइयों में झाँकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब अपने स्वभाव के बारे में ये भी जान जाते हैं कि मैं शुद्ध घी-दूध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हवा-पानी चाहता हूं। मैं अपने विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार और आसपास का वातावरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब कुछ शुद्ध ही चाहता हूं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशुद्ध कुछ भी नहीं। शुद्ध यानी साफ-सुथरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वच्छ-निर्मल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सही-सार्थक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म-संगत और न्याय-सम्मत।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्ध-सार्थक जीवन के आदर्श के रूप में कोई भी पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज के जीवन को देख सकता है कि जब भी उनके किसी सहयोगी ने बेईमानी-धोखेबाजी की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने उसे तत्काल अपने से दूर कर दिया। जब कभी उनके सामने धन प्राप्ति के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म की राह छोडऩे की नौबत आई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंनेे ऐसे धन को ही छोड़ दिया। फिर जब अवसर आया कुछ करने का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो योग और आयुर्वेद को बढ़ावा देने जैसे बड़े ही सार्थक और महान् लक्ष्यों की पूर्ति के लिए उन्होंने पतंजलि योगपीठ और पतंजलि आयुर्वेद की स्थापना की। यह सब देखकर और जानकर हम इस निष्कर्ष पर पहुचते हैं कि हम लौकिक सुख-साधनों को चाहते तो जरूर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सिर्फ उनके शुद्धतम रूप में और इन शुद्ध सुख-साधनों को भी हम अपने शुद्ध-व्यवहार के द्वारा ही अर्जित करना चाहते हैं।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/234.jpg" alt="23"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा इसलिए भी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जो जितना ज्यादा शुद्ध होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वो परिणाम में उतना ही ज्यादा फलदायी और सुखदायी होगा। इसके ठीक विपरीत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो जितना ज्यादा अशुद्ध होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वो उतना ही ज्यादा दुखदायी होगा। शुद्धता... यही हमारी दूसरी इच्छा है। शुद्धता में सार्थकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए हम विचारों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्मों और चीजों को उनके शुद्ध रूप में अपनाकर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">निर्मल-जीवन’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राप्ति की अपनी इच्छा पूरी किया करते हैं।</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामित्व सब चाहते हैं</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हम यह भी देखते हैं या जानते हैं कि लोग सुखद व शुद्ध चीजों पर स्वयं का पूरा स्वामित्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्चस्व या अधिकार चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे किराए का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खुद का मकान चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पति-पत्नी एक-दूसरे पर पूरा अधिकार चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मालिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नौकरों को अपने अधीन रखना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सबको अपना प्रशंसक भी बनाना चाहते हैं और सहयोगी भी। वे सभी ऐसा इसलिए चाहते हैं ताकि बिना किसी बाधा के उनसे सुख और लाभ प्राप्त कर सकें और एक आज़ाद जि़न्दगी भी जी सकें। दूसरों का स्वामी बनने में ही प्राय: उन्हें स्वयं का विकास होता हुआ नजर आता है। ये स्वामित्व की इच्छा ही हमारी तीसरी इच्छा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें हम घर-परिवार सहित सुख के सारे साधनों पर अपना पूर्ण </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामित्व’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बनाए रखना चाहते हैं। आप अपनी संस्था या कंपनी पर पूर्ण अधिकार रखें ताकि समाज हित में उसका उपयोग पूर्ण स्वतंत्रता से कर सकें। </span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थायित्व </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सब चाहते हैं</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन पथ पर बढ़ते हुए हम यह भी देखते हैं कि हम जिन चीजों का प्रयोग करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे यदि सुखद हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्ध हों और हमारे आधिपत्य में भी हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ऐसी स्थिति में हमारी तीनों </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">चाहतें’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जरूर पूरी हो जाती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन एक चाहत फिर भी बाकी रह जाती है। और वो है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थायित्व या स्थिरता। हम हमेशा चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कि जब तक हम जीवित हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक हमारी सारी सुखद व शुद्ध चीजें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे ही पास बनी रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे कभी भी हमसे अलग न हों और न ही कभी नष्ट हों। ऐसा इसलिए ताकि हम लम्बे समय तक उनका उपभोग कर उनसे सुख व लाभ लेते रहें। तभी तो लोग प्राइवेट नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरकारी नौकरी चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कच्चा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पक्का मकान चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ अज्ञानी व्यक्ति तो यहाँ तक भी चाहने लगते हंै कि उनका नश्वर शरीर सदा जीवित रहे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नौकरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मकान या व्यवहार आदि साधन कोई भी हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन यहाँ चाह तो स्थायित्व प्राप्ति की ही होती है। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्थायित्व</span>Ó <span lang="hi" xml:lang="hi">की चाह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही हमारी चौथी इच्छा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे पूरा करने के लिए हम अपने जीवन में स्थायित्व-स्थिरता देने वाली वस्तुओंं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहारों और विचारों को अपनाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मित्रों! इस संदर्भ में पूज्य स्वामी जी का एक महत्त्वपूर्ण संदेश यही है कि हमें अपने जीवन में शांति के लिए मन को स्थिर बनाना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि राष्ट्र में स्थिरता के लिए जन-जन में प्रेम व स्वदेशी की भावना विकसित करने और कानून व्यवस्था बनाए रखने का प्रयत्न करना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>सनातन वैभव</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category> फरवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 Feb 2019 21:38:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अपनी प्राथमिकताओं को पहचानें</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">स्वामी अथर्वदेव<span>  </span></span></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1551/apni-prathmiktaon-ko-pahachane"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/253.jpg" alt=""></a><br /><table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#BA372A;border-color:#BA372A;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(186,55,42);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(236,240,241);"><strong>प्रभु-अनुग्रह से यह मानव-जीवन सबसे श्रेष्ठ है और इसकी श्रेष्ठता का भान जिस समय व्यक्ति को होता है, उसी समय से जीवन अप्रतिरोध के साथ निरन्तर उन्नति करता है। ईश्वर की अनुकपा से मानव को अप्रतिम कुशलता व क्षमता का अमूल्य भंडार मिला है, लेकिन इस भंडार को पाने के लिए मनुष्य को क्या करना चाहिए, जिससे वह जीवन में कुशल बन सके, स्वयं के साथ-साथ संपूर्ण समाज व राष्ट्र की उन्नति कर सके।</strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ह</span><span lang="hi" xml:lang="hi">मारे ऋषियों ने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे शुभचिन्तक महापुरुषों ने जीवन की उलझी गुत्थियों को सुलझाकर हमें निरन्तर प्रगति की राह दिखाई। उन्होंने अनेक मार्ग बतलाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन कुछ मार्ग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ दिशाएँ सभी ने समान रूप से दिखलाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनमें से कुछ दिशाएँ तो विश्व के प्रत्येक मनुष्य के लिए अत्यन्त आवश्यक हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि वह भौतिक या आध्यात्मिक जीवन में उन्नति करना चाहता है। </span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी प्राथमिकताओं को पहचानें </span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ प्राथमिकताएँ ऐसी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सभी मनुष्यों के लिए आवश्यक हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे- </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">चरित्र </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मानव जीवन को श्रेष्ठ बनाने में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वहित समर्पित बनाने में सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">चरित्र’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का होता है। कोई भी मनुष्य चाहे किसी भी जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्प्रदाय से संबंध रखता हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका चरित्र निष्कलंक व निष्कपट होना चाहिए। अपनी शालीनता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विनम्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भद्रता को कभी भी न्यून नहीं होने देना चाहिए। इस तरह चरित्र हमारी सबसे पहली प्राथमिकता है। श्रद्धेय स्वामी जी महाराज एक बात को बार-बार कहते हैं कि विद्वान् हर कोई नहीं बन सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु धर्मात्मा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चरित्रवान् तो सभी बन सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि किसी भी संत को उसका चरित्र ही संत बनाता है। हमें चरित्र विकास में स्वयं का अधिकांश समय लगाना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि चरित्र बहुत व्यापक शब्द है। इसमें हमारी समस्त चेष्टाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे समस्त कर्तव्य समाहित हो जाते हैं। हमारा संपूर्ण व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे वह वाणी से हो या शरीर से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी बौद्धिक गतिविधि हो या शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन समस्त चेष्टाओं का परिणाम हमारा चरित्र होता है। इसलिए शुद्ध चरित्र निर्माण को अपनी प्राथमिकता बनाकर उसे अपने अतीत से बेहतर बनाना चाहिए। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अभ्यास</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अभ्यास भी चरित्र की तरह बहुत व्यापक शब्द है। हमारी सारी चेष्टाएँ हमारे पुराने अभ्यासों का ही परिणाम हैं। यहाँ तक कि हमारे विचार भी हमारे अभ्यासों का ही नतीजा हैं। सभी महापुरुषों या श्रेष्ठ व्यक्तियों के जीवन को यदि आप देखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आप पाएँगे कि सभी के अभ्यास कितने कुशल हैं। उनके एक-एक अभ्यास में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण प्रामाणिकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण निष्ठा व पूर्ण कत्र्तव्य परायणता दृष्टिगोचर होती है।</span></h5>
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#BA372A;border-color:#BA372A;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(186,55,42);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(236,240,241);"><strong>हमारा संपूर्ण व्यवहार, चाहे वह वाणी से हो या शरीर से, हमारी बौद्धिक गतिविधि हो या शारीरिक, इन समस्त चेष्टाओं का परिणाम हमारा चरित्र होता है। इसलिए शुद्ध चरित्र निर्माण को अपनी प्राथमिकता बनाकर उसे अपने अतीत से बेहतर बनाना चाहिए।</strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्येक मनुष्य की प्रकृति पृथक् होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि सभी के अभ्यास व पुरुषार्थ पृथक् होते हैं। यदि कोई भी एक बुरा अभ्यास या गलत जगह किया हुआ पुरुषार्थ दृढ़ हो जाता है अर्थात् वह हमारे स्वभाव में आ जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जीवन अवनति की राह पर आरूढ़ हो जाता है। फिर उस गलत अभ्यास के हम इतने आदी हो जाते हैं कि वह सामान्य जागरुकता से खत्म नहीं होता। इसके लिए हमें परम पुरुषार्थ व परम जागरुकता रखनी पड़ती है। प्रत्येक मनुष्य की हर समय कुछ प्राथमिकताएँ होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे प्राथमिकताएँ हर एक  व्यक्ति की अलग-अलग होती हैं। वेे बहुत ही श्रेष्ठ या अनुकरणीय भी हो सकती हैं या फिर हीन व अशोभनीय भी हो सकती हैं। अत: मनसा-वाचा-कर्मणा हमारे अभ्यास अत्यंत पवित्र हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आसुरी सम्पदा से मुक्त हों। आसुरी सम्पदा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कि गीता (१६/४) में वर्णित है- </span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span style="color:rgb(224,62,45);"><span lang="hi" xml:lang="hi">द</span><span lang="hi" xml:lang="hi"></span><span lang="hi" xml:lang="hi">भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोध: पारुष्यमेव च।</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span style="color:rgb(224,62,45);"><span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ स</span><span lang="hi" xml:lang="hi"></span><span lang="hi" xml:lang="hi">पदमासुरीम्।।</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन आसुरी सम्पदाओं से पूर्णतया मुक्त होकर जीने के अभ्यास को हमें प्राथमिकता देनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि ये मानव जीवन को जड़ बना देती हैं। उसके जीवन का सारा चैतन्य छीन लेती हैं तथा व्यक्ति एक यंत्र की भाँति कार्य करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कि पूर्ण रूप से पराधीन होता है। इसलिए अभ्यास को पूर्ण रूप से शुद्ध व कुशल बनाना हमारी प्राथमिकता है। वह अभ्यास चाहे ब्रह्म मुहूर्त में उठने का हो या वरिष्ठों केअभिवादन का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा छोटे से छोटा अभ्यास भी संपूर्णतया परिमार्जित व संस्कारित होना चाहिए। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">समय प्रबंधन व सदुपयोग </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी भी क्षेत्र (Field) का व्यक्ति हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे वह आध्यात्मिक पथ का पथिक हो या वह भौतिकता के मार्ग का चयनकर्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि उसे उस क्षेत्र के श्रेष्ठ शिखर पर आरोहण कर उसे पाना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो चरित्र व अभ्यासों के साथ उसे समय प्रबंधन व उसका सदुपयोग भी करना होगा। यह भी एक अभ्यास ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर प्रधानता के कारण पृथक् रूप से इसका वर्णन आवश्यक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि बिना समय प्रबंधन के व्यक्ति का निर्माण कदापि नहीं हो सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही प्रत्येक कुशलता को पाने के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पूर्णता को पाने के लिए एक निश्चित समय में निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कि बिना समय प्रबंधन के नहीं हो सकता है। अब इसमें एक समस्या यह </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भी आती है कि समय का प्रबंधन तो कर लिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर सदुपयोग नहीं हो पाता। उसके लिए हमें ही जागरूक होना पड़ेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि शिखर भी तो हमें ही चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान को उपजाऊ बनाओ</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि हम ईमानदारी से स्वयं का अवलोकन करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हम पाएँगे कि हमारा अधिकांश समय या तो अतीत की चिन्ताओं में बीतता है या भविष्य की कल्पनाओं में। हमने वर्तमान को नहीं संभाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे उपजाऊ नहीं बनाया। यही हमारे सारे दु:खों का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी आत्मग्लानि का मुख्य कारण है और आत्मग्लानि को शास्त्रों में मृत्यु कहा गया है। जो हम सोचते हैं और कर नहीं पाते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो तत्क्षण हमारे अंदर मृत्यु घटित होती है। हमारे संकल्पों की मृत्यु ही हमारी मृत्यु है। इसलिए यदि इस मृत्यु से पार जाना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वर्तमान को बाँझ होने से बचाना होगा। वर्तमान को हमें सींचना होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब जाकर हमारे संकल्पों की चेतना जीवित रह सकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्यथा मृत्यु़ सदैव प्रतीक्षारत है। अत: वर्तमान की जागरुकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सजगता हमारी प्राथमिकता है। इसे जीवन में धारण कर हम आत्मोन्नति का सफल मार्ग चयन कर सकते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार हमें जीवन में इसी तरह की प्राथमिकताएँ तय करनी पड़ेंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सार्वभौमिक व सार्वकालिक हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जीवन इतना विराट है कि यदि मनुष्य केवल चिंतन करे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उम्र भर का समय जीवन के क्षेत्रों के चिंतन मात्र में निकल सकता है। अत: चाणक्य नीति के श्लोक में जिस तरह सारभूत अमृत की उपासना की बात कही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी तरह हम अपनी प्राथमिकताओं की भी उपासना करें अर्थात् उनका वरण करें। </span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span style="color:rgb(224,62,45);"><span lang="hi" xml:lang="hi">अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्या</span>,</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(224,62,45);" xml:lang="hi">अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(224,62,45);" xml:lang="hi">यत्सारभूतं तदुपासनीयं</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span style="color:rgb(224,62,45);"><span lang="hi" xml:lang="hi">हंसो यथा क्षीरमिवा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"></span><span lang="hi" xml:lang="hi">बुमध्यात्।।</span></span></strong></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category> फरवरी</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1551/apni-prathmiktaon-ko-pahachane</link>
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                <pubDate>Fri, 01 Feb 2019 21:36:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title> पतंजलि से मिला नया जीवन</title>
                                    <description><![CDATA[<h4 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  <span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>पतंजलि से मिला नया जीवन</strong></span></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मु</span><span lang="hi" xml:lang="hi">झे चलने-फिरने में काफी कठिनाई होने लगी थी। अपने मल-मूत्र विसर्जन अंगों पर भी नियंत्रण नहीं रह गया था। मुझे मल-मूत्र विसर्जन का पता ही नहीं चलता था। मैंने चण्डीगढ़ स्थित पी.जी.आई. में जाँच कराई तो पता चला कि मुझे स्पाइनल ड्यूरल फिस्टुला नाम की बीमारी है। २ वर्ष पूर्व मैं पतंजलि में उपचार के लिए आया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ डॉ. केतन महाजन ने मेरा उपचार प्रारम्भ किया। अश्वगंधा कैप्सूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैशोर गुग्गुलु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चन्द्रप्रभा वटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिलाजीत रसायन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकांगवीर रस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रवाल पिष्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोय सत् आदि आयुर्वेदिक औषधियों का मुझ पर</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1552/patanjali-se-mila-naya-kivan"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/356.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> <span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>पतंजलि से मिला नया जीवन</strong></span></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मु</span><span lang="hi" xml:lang="hi">झे चलने-फिरने में काफी कठिनाई होने लगी थी। अपने मल-मूत्र विसर्जन अंगों पर भी नियंत्रण नहीं रह गया था। मुझे मल-मूत्र विसर्जन का पता ही नहीं चलता था। मैंने चण्डीगढ़ स्थित पी.जी.आई. में जाँच कराई तो पता चला कि मुझे स्पाइनल ड्यूरल फिस्टुला नाम की बीमारी है। २ वर्ष पूर्व मैं पतंजलि में उपचार के लिए आया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ डॉ. केतन महाजन ने मेरा उपचार प्रारम्भ किया। अश्वगंधा कैप्सूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैशोर गुग्गुलु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चन्द्रप्रभा वटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिलाजीत रसायन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकांगवीर रस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रवाल पिष्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोय सत् आदि आयुर्वेदिक औषधियों का मुझ पर चमत्कारी प्रभाव हुआ तथा अब मैं बिना किसी सहारे के चलने-फिरने में समर्थ हूँ। मल-मूत्र विसर्जन अंगों पर अब मेरा नियंत्रण है तथा मैं काफी स्वस्थ अनुभव कर रहा हूँ। </span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">भवदीय : रणजीत श्याम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोहाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंजाब</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"> </h5>
<h4 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">फिस्टुला का सफल उपचार</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मु </span><span lang="hi" xml:lang="hi">झे अक्सर कब्ज़ रहती थी। पिछले ६ महीने से कभी-कभी रक्तस्राव भी हो रहा था। चिकित्सक से परामर्श करने पर मुझे पता चला कि मैं फिस्टुला (भगंदर) रोग से पीडि़त हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस कारण कई और समस्याएँ भी उत्पन्न हो गई थीं। इसके उपचार हेतु मैं पतंजलि योगपीठ आया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ डॉ. सौरभ शर्मा ने शल्य चिकित्सा (सर्जरी) कराने का सुझाव दिया। मैंने उनके दिशानिर्देशन अनुसार उपचार प्रारम्भ किया। आयुर्वेदिक उपचार में अर्शकल्प वटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्रिफला गुग्गुलु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोय घन वटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीड़ांतक वटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभयारिष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदरकल्प चूर्ण तथा जात्यादि तेल को शामिल किया गया। लगभग ३ महीने के उपचार के बाद अब मेरे घाव भी भर गये हैं तथा मैं पूर्ण स्वस्थ अनुभव कर रहा हूँ। </span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">भवदीय : ओम् पाल सिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कनखल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h4 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बोन मैरो की समस्या का पतंजलि में मिला समाधान</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मु</span><span lang="hi" xml:lang="hi">झे मात्र ९ वर्ष की आयु में ही बोन मैरो की भयानक व्याधि ने घेर लिया था। इसके लिए मैंने कई चिकित्सकों को दिखाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर कोई स्थाई समाधान नहीं मिल सका। फिर मैंने पतंजलि से उपचार प्रारम्भ किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ डॉ. प्रियंका वाधवा ने संजीवनी वटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोय घन वटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वकल्प क्वाथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुलेठी चूर्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सप्तामृत लौह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुक्ता पिष्टी आदि औषधियों को उपचार प्रक्रिया में शामिल किया। घरेलू उपचार में मुझे गेहूँ के ज्वारे का रस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीम-तुलसी स्वरस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घृतकुमारी रस का प्रयोग करने की सलाह दी। अब मुझे ७० प्रतिशत आराम है। आशा है कि जल्द ही इस असाध्य रोग से मैं पूर्ण मुक्त  हो जाऊँगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">भवदीय : कार्तिक कक्कड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुरादाबाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर प्रदेश</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>दिव्य अनुभूति</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category> फरवरी</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1552/patanjali-se-mila-naya-kivan</link>
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                <pubDate>Fri, 01 Feb 2019 21:33:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आयुर्वेद में है उच्च रक्तचाप का पूर्ण निदान</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">वैद्य नृपेन्द्र पाण्डेय<span> , </span></span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">स्वस्थवृत्त विभाग</span>, </strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">पतंजलि आयुर्वेद महाविद्यालय</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">हरिद्वार</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1553/ayurved-me-hai-uchch-raktchap-ka-purn-nidan"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/madhunashini-vati.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">च्च रक्तचाप यानि हाइपरटेंशन आज पूरी दुनिया में एक गंभीर समस्या बनी हुई है। आम भाषा में इसे हाई ब्लड प्रेशर भी कहते हैं। यह एक जानलेवा बीमारी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें बाहर से कोई लक्षण या खतरा दिखाई नहीं देता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जब ये अनियंत्रित होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो शरीर के दूसरे अंगों पर खतरनाक दुष्प्रभाव छोड़ता है। पहले यह माना जाता था कि यह समस्या सिर्फ  ज्यादा उम्र के लोगों को ही होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन बदलते परिवेश में ये युवाओं में भी फैलती जा रही है। उच्च रक्तचाप संबंधी विभिन्न आँकड़े निम्रानुसार हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/bldp.jpg" alt="bldp"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में प्रत्येक तीन में से एक वयस्क व्यक्ति को उच्च रक्तचाप की समस्या है और कुल जितने लोगों को उच्च रक्तचाप होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें से दो-तिहाई (</span>2/3<span lang="hi" xml:lang="hi"> तक) की उम्र </span>60<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ष से कम होती है। भारत में इस समय लगभग आठ से दस करोड़ लोग उच्च रक्तचाप से पीडि़त हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनमें से आधे लोगों को तो ये मालूम ही नहीं कि उनको उच्च रक्तचाप है। जिनको मालूम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनमें भी अधिकांश तो चिकित्सा ही नहीं करवाते और जो चिकित्सा करा रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनमें भी कई लोग आधी-अधूरी चिकित्सा करा रहे हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद में उच्च रक्तचाप का वर्णन एक स्वतंत्र व्याधि के रूप में नहीं मिलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन हम आयुर्वेद के माध्यम से उच्च रक्तचाप को बेहतर तरीके से नियंत्रित कर सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय हमारे शरीर के लिए पंप के रूप में कार्य करता है और रक्त को पूरे शरीर में संचारित करता है। संचरण के समय होने वाले रक्त के दबाव को रक्तचाप यानि ब्लड प्रेशर कहते हैं। शरीर की रचना और आयु के अनुसार विभिन्न व्यक्तियों में रक्तचाप में मामूली अंतर हो सकता है। रक्तचाप दैनिक प्रक्रियाओं से प्रभावित होता है। यदि व्यक्ति का रक्तचाप </span>140/90 mm of Hg<span lang="hi" xml:lang="hi"> या अधिक हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इसे हाइपरटेंशन या उच्च रक्तचाप की अवस्था कहते हैं। प्री-हाइपरटेंशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हाइपरटेंशन से पहले की अवस्था को कहा जाता है और इसे </span>120-139 mm Hg<span lang="hi" xml:lang="hi"> और </span>systolic 80-89 mm Hg<span lang="hi" xml:lang="hi"> के बीच </span>diastolic<span lang="hi" xml:lang="hi"> रक्तचाप के रूप में परिभाषित किया जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाइपरटेंशन को </span>Silent Killer<span lang="hi" xml:lang="hi"> भी कहा जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि उच्च रक्तचाप से ग्रस्त लगभग </span>90<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत रोगियों में इसके कोई लक्षण नहीं होते। अधिकतर मामलों में उच्च रक्तचाप का कोई कारण स्पष्ट नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे </span>Essential<span lang="hi" xml:lang="hi"> या </span>Primary Hypertension<span lang="hi" xml:lang="hi"> कहते हैं। जबकि कुछ अन्य मामलों में </span>Secondary Hypertension<span lang="hi" xml:lang="hi"> होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यानि किसी बीमारी की वजह से या किसी अन्य कारण से व्यक्ति को उच्च रक्तचाप की समस्या हो सकती है।</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रतचाप को प्रभावित करने वाले कारक</span></strong></span></h4>
<p><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/622.jpg" alt="62"></img></span></strong></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे तो </span>90<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत उच्च रक्तचाप के मरीजों में कोई लक्षण नहीं होते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन कुछ रोगियों में सिर दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चक्कर आना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थकान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उल्टी आना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रम की स्थिति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिखाई देने में समस्या आदि लक्षण मिल सकते हैं। यदि उच्च रक्तचाप को पहचानकर इसका सही इलाज न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो रक्तचाप का बढ़ा हुआ स्तर हमारे पूरे शरीर पर प्रभाव डालता है और हृदय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मस्तिष्क</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुर्दे व आँखों जैसे महत्त्वपूर्ण अंगों को क्षति पहुँचाता है।</span></h5>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">लकवा (</span>Stroke/Brain attack)<span lang="hi" xml:lang="hi"> की अधिक संभावना</span></strong></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हृदयाघात (</span>Heart attack)<span lang="hi" xml:lang="hi"> का खतरा अधिक</span></strong></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गुर्दे खराब या फेल </span>(Kidney failure)<span lang="hi" xml:lang="hi"> होने की अधिक संभावना</span></strong></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मस्तिष्क की नस फट सकती है </span>(Haemorrhage)</strong></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अंधता (</span>Blindness)</strong></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ चिकित्सक उच्च रक्तचाप की श्रेणी में मरीज की एक बार की रीडिंग (</span>140/90 mm Hg <span lang="hi" xml:lang="hi"> या कुछ ऊपर) आने पर ही हाई ब्लड प्रेशर की </span>diagnosis<span lang="hi" xml:lang="hi"> बनाकर इलाज भी शुरू कर देते हैं। ऐसा कदापि नहीं करना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि ब्लडप्रेशर यदि लगातार कुछ दिनों तक बढ़ा हुआ मिलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ही इस निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए कि किसी को उच्च रक्तचाप है और फिऱ तदनुरूप औषधियाँ शुरू करनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि औषधियों की आवश्यकता हो तो।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च रक्तचाप हम तब कहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब हमें </span>Sustained elevation<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यानि कि किसी व्यक्ति का ब्लड प्रेशर लगातार कई दिनों तक बढ़ा रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ही उसे हम उच्च रक्तचाप का मरीज मानकर उसकी चिकित्सा प्रारम्भ कर सकते हैं। सामान्यत: जब ब्लड प्रेशर </span>140/90 mm Hg<span lang="hi" xml:lang="hi"> से ऊपर लगातार रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दवा शुरू कर देनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन क्कह्म्द्ग ॥</span>4<span lang="hi" xml:lang="hi">श्चद्गह्म्ह्लद्गठ्ठह्यद्बशठ्ठ वाली अवस्था में (</span>140/90 mm Hg<span lang="hi" xml:lang="hi"> से कम होने पर) सिर्फ  खानपान और जीवनशैली में बदलाव कर ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने का प्रयास करना चाहिए। ब्लड प्रेशर की </span>Pre-Hypertension<span lang="hi" xml:lang="hi"> और </span>Stage-I Hypertension<span lang="hi" xml:lang="hi"> को हम आयुर्वेद के माध्यम से बहुत बेहतर तरीके से नियंत्रित कर सकते हैं। आयुर्वेद में रोग के कारणों का इलाज किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि लक्षणों का। कुछ मरीज उच्च रक्तचाप का पता चलने पर स्वत: ही आयुर्वेदिक दवा लेकर अपना इलाज शुरू कर देते हैं। इसके बाद कई बार गंभीर परिणाम भुगतने पड़ते हैं। दवा का चुनाव रोग के कारण पर निर्भर करता है। अत: खुद अपना इलाज करने का प्रयास न करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि किसी वैद्य से ही परामर्श लें और उसी के अनुसार दवा का सेवन करें। उच्च रक्तचाप के रोगी अपने खान-पान और जीवन शैली में बदलाव कर इस समस्या से काफी हद तक छुटकारा पा सकते हैं। उच्च रक्तचाप के मरीज नियमित व्यायाम करें। इसके लिए प्राणायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आसन और ध्यान करें। प्राणायाम में अनुलोम-विलोम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रामरी और उद्गीथ प्राणायाम विशेष लाभकारी हैं। आसनों में शवासन विशेष लाभ प्रदान करता है। गायत्री मंत्र का पाठ करने से भी लाभ होता है। नियमित रूप से रक्तचाप की जाँच करवाएँ। संतुलित मात्रा में आहार लें। मौसमानुसार फल और हरी सब्जियों का सेवन लाभदायक है। नाश्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोपहर का खाना और रात्रि का भोजन समय से करने की आदत डालें। नियंत्रित जीवन शैली अपनाएँ (रात्रि में समय से सोयें व समय से सुबह उठें)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरी नींद लेने का प्रयास करें।</span></h5>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/madhunashini-vati.jpg" alt="Madhunashini-Vati"></img></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हँसना (</span>Laughter)<span lang="hi" xml:lang="hi"> उच्च रक्तचाप के रोगियों के लिए विशेष लाभदायक है। इसलिए जब भी हँसने का अवसर मिले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खुलकर हँस लें।</span></h5>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5>  <span lang="hi" xml:lang="hi">लौकी का जूस पीएँ।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>  <span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव को कम करें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>  <span lang="hi" xml:lang="hi">आहार में नमक का प्रयोग कम करें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>  <span lang="hi" xml:lang="hi">वसायुक्त आहार से परहेज करें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>  <span lang="hi" xml:lang="hi">धूम्रपान व शराब का सेवन न करें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>  <span lang="hi" xml:lang="hi">वजन नियंत्रित रखें। मोटापे से बचें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>  <span lang="hi" xml:lang="hi">स्मार्ट फोन का अति आवश्यक होने पर ही उपयोग करें।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च रक्तचाप से पीडि़त लाखों-करोड़ों रोगियों ने सुबह-शाम २-२ गोली मुक्तावटी खाली पेट लेकर व योगाभ्यास करके बी.पी. को जड़ से खत्म किया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च रक्तचाप के रोगियों हेतु कुछ विशेष लाभकारी आयुर्वेदिक औषधियों में मुख्य रूप से मुक्तावटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेधावटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्राह्मी चूर्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शंखपुष्पी चूर्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्जुनारिष्ट आदि हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन किसी भी आयुर्वेदिक औषधि को बिना वैद्यकीय परामर्श के न लें। पतंजलि के सभी आरोग्य केन्द्रों पर कुशल व समर्पित वैद्यों द्वारा नि:शुल्क परामर्श सदा उपलब्ध रहता है।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category> फरवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 Feb 2019 21:31:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
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