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                <title>अप्रैल - योग संदेश</title>
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                <description>अप्रैल RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>परम पूज्य योगऋषि स्वामीजी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य ...</title>
                                    <description><![CDATA[<h4 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संन्यासी का संकल्प</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;">1.  <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">संतान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि-ऋषिकाओं का वंशज एवं उनका आध्यात्मिक उत्तराधिकारी व प्रतिनिधि हूँ। भारत मेरी माँ है। </span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अमृतस्य पुत्रा:। माताभूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या: (वेद)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषिणां प्रतिरूपोऽहम्। तत्त्वमसि। अयमात्मा ब्रह्म। शिवोऽहम्। अहं ब्रह्मास्मि ।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">        <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं अपने नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभाव सच्चिदानन्द स्वरूप में प्रतिष्ठित रहते हुए आचरण की दिव्यता को सदा अक्षुण्ण रखूँगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">2.   <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं गुरु चेतना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि चेतना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भागवतचेतना एवं आत्मचेतना के उच्च दिव्य भाव में ही सदा प्रतिष्ठित रहते हुए भीतर से पूर्ण शान्त एवं बाहर से पूर्ण पुरुषार्थ व परमार्थमय दिव्य आचरण व निष्काम सेवा करते हुए सबको स्वधर्म</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1989/shashwat-pragya-sanyasi-ka-sankalp"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-08/13.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संन्यासी का संकल्प</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;">1.  <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">संतान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि-ऋषिकाओं का वंशज एवं उनका आध्यात्मिक उत्तराधिकारी व प्रतिनिधि हूँ। भारत मेरी माँ है। </span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अमृतस्य पुत्रा:। माताभूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या: (वेद)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषिणां प्रतिरूपोऽहम्। तत्त्वमसि। अयमात्मा ब्रह्म। शिवोऽहम्। अहं ब्रह्मास्मि ।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">    <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं अपने नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभाव सच्चिदानन्द स्वरूप में प्रतिष्ठित रहते हुए आचरण की दिव्यता को सदा अक्षुण्ण रखूँगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">2.   <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं गुरु चेतना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि चेतना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भागवतचेतना एवं आत्मचेतना के उच्च दिव्य भाव में ही सदा प्रतिष्ठित रहते हुए भीतर से पूर्ण शान्त एवं बाहर से पूर्ण पुरुषार्थ व परमार्थमय दिव्य आचरण व निष्काम सेवा करते हुए सबको स्वधर्म में लगाकर धर्म की प्रतिष्ठा एवं अधर्म की निवृत्ति करुँगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">3.   <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु की पूर्ण शरणागति में रहते हुए गुरु मर्यादा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्र मर्यादा एवं भगवान् के विधान की मर्यादा का एक बार भी अतिक्रमण नहीं करुँगा। प्रारब्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभ्यास दोष या अन्य किसी भी अत्यन्त प्रतिकूल स्थिति में भी अपना आपा (निजता) नहीं खोऊँगा और एकक्षण के लिए भी यदि प्रमाद हुआ तो उसके अगले ही क्षण विवेक वैराग्य पूर्वक पुन: अपने आत्मधर्म व अध्यात्म स्वरूप में लौट आऊँगा। इस पूर्ण दिव्य पराधीनता एवं दिव्य स्वाधीनता में सदा प्रतिष्ठित रहूँगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">4.  <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्तेय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब्रह्मचर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिग्रह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशुचिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असंतोष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विलासिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मविमुखता एवं नास्तिकता- इन दस स्थूल दोषों से सदा मुक्त रहकर </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> यम एवं </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> नियमों का पूर्ण पालन करते हुए योग एवं कर्मयोग के मार्ग पर पूर्णपवित्रता से पूर्णपुरुषार्थ करते हुए मोक्षप्राप्ति के द्वारा जीवन में पूर्णता व आत्मबोध प्राप्त करुँगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:center;">         <strong><span lang="hi" style="color:rgb(224,62,45);" xml:lang="hi">परिणामतापसंस्कारदु:खैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दु:खमेव सर्वं विवेकिन:। </span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">   <span lang="hi" xml:lang="hi">वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम्। ओं सर्वं खल्विदं ब्रह्म।  इन दोनों भावों या साधनों से अपनी साधना को साधते हुए अपने अस्तित्व को पूर्ण शुद्ध करके आत्मबोध प्राप्त करुँगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">5.  <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं पारमार्थिक एवं व्यावहारिक (भौतिक) सत्यों के अनुरूप सम्यक् मति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भक्ति एवं कृति से मुक्ति या जीवनमुक्ति की स्थिति में रहूँगा। गुरुनिष्ठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्तव्यनिष्ठा एवं ध्येयनिष्ठा में निरन्तरता- यही मेरे जीवन का प्रयोजन रहेगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">6.  <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं शुद्धज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्धकर्म का अनुसरण करुँगा। केवल ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल भक्ति एवं केवल कर्मादि की मिथ्या भ्रान्तियों में नहीं फसूँगा। गुरुओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेदादि शास्त्रों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सनातन सत्य प्रतीकों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रस्वाभिमान एवं स्वदेशी का पूर्ण सात्त्विक आग्रह रखते हुए एकत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहअस्तित्व एवं विश्वबन्धुत्व की भारतीय संस्कृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभ्यता एवं वैज्ञानिक परम्पराओं के प्रति पूर्ण श्रद्धा व गौरव रखूँगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">7.  <strong> <span style="color:rgb(224,62,45);">''<span lang="hi" xml:lang="hi">पुत्रैषणा वित्तैषणा लोकैषणा मया परित्यक्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मत्त: सर्वभूतेभ्योऽभयमस्तु स्वाहा। </span></span></strong>‘<span lang="hi" xml:lang="hi">इस संन्यास संकल्प को सदा स्मरण रखते हुए सभी अविवेकपूर्ण कामनाओं एवं विषय भोगों से मुक्त रहकर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">संन्यासी होना दुनिया का सबसे बड़ा उत्तरदायित्व व गौरव है</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इस सत्य को सदा स्मरण रखूँगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">     <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि मेरी एक छोटी सी भूल से मेरी करोड़ों वर्ष पुरानी गौरवशाली महान् ऋषि परम्परा व संन्यास परम्परा कलंकित हो जायेगी और इसकी कभी भी क्षतिपूत्र्ति नहीं हो पायेगी। अत: मैं सदा जागरूक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुनिष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रनिष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मनिष्ठ रहकर संन्यास धर्म का प्रामाणिकता से पालन करुँगा।</span></h5>
<p> </p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-08/april-2018-1.jpg" alt="april 2018 1" width="855" height="1134"></img></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शाश्वत प्रज्ञा</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2018</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Apr 2018 21:59:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पतंजलि में पहली बार संन्यास दीक्षा</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span lang="hi" xml:lang="hi">      <strong> संन्यासी</strong></span><strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">होना दुनियाँ का सबसे बड़ा उत्तरदायित्व है और मानव जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। समस्त ऋषि ज्ञान परम्परा व सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिए यह गौरव का विषय है कि लोक कल्याण मात्र अर्थात् परमार्थ मात्र की भावना से प्रतिष्ठापित संस्थान पतंजलि योगपीठ में परमश्रद्धेय श्री स्वामी जी महाराज की प्रेरणा एवं आशीर्वाद से प्रथम बार संन्यास दीक्षा का महान् आयोजन किया जा रहा है। संन्यास परम्परा हमारे पूर्वज ऋषि-ऋषिकाओं की वह आदर्श गरिमामयी और वरणीय परम्परा है जिसमें </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वसुधैव कुटुम्बकम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की भावना को आधार बनाकर एक पिण्ड में सिमटी हुई चेतना को पूरे ब्रह्माण्ड में विस्तृत</span></strong></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1990/patanjali-me-pahali-baar-sanyas-diksha"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-08/523.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;" align="center"><span lang="hi" xml:lang="hi">   <strong> संन्यासी</strong></span><strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">होना दुनियाँ का सबसे बड़ा उत्तरदायित्व है और मानव जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। समस्त ऋषि ज्ञान परम्परा व सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिए यह गौरव का विषय है कि लोक कल्याण मात्र अर्थात् परमार्थ मात्र की भावना से प्रतिष्ठापित संस्थान पतंजलि योगपीठ में परमश्रद्धेय श्री स्वामी जी महाराज की प्रेरणा एवं आशीर्वाद से प्रथम बार संन्यास दीक्षा का महान् आयोजन किया जा रहा है। संन्यास परम्परा हमारे पूर्वज ऋषि-ऋषिकाओं की वह आदर्श गरिमामयी और वरणीय परम्परा है जिसमें </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वसुधैव कुटुम्बकम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की भावना को आधार बनाकर एक पिण्ड में सिमटी हुई चेतना को पूरे ब्रह्माण्ड में विस्तृत कर देना होता है अर्थात् ये मार्ग </span>Self Realization <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> Collective Realization<span lang="hi" xml:lang="hi"> का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यष्टि से समष्टि के उत्थान का है। एक सच्चे संन्यासी का हृदय सदा समष्टि के प्रति उद्घाटित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणापूर्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वात्सल्य पूर्ण और प्रेम पूर्ण रहता है। वह समष्टि को सदा पक्षपात रहित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यायपूर्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यथार्थ और समग्रता से देखता और आचरण करता है। वह सदा </span><span style="color:rgb(35,111,161);">'<span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया: सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग् भवेत्</span>’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसी पवित्र और कल्याणकारी भावनाओं से आप्लावित रहकर अपना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने परिवार का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र का और समस्त विश्व का कल्याण करता है।</span></strong></h5>
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#CED4D9;border-color:#CED4D9;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(206,212,217);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>शास्त्र कहते हैं कि जिस कुल, खानदान में एक भी व्यक्ति  संन्यासी हो जाता है तो उसका सारा कुल पवित्र हो जाता है। </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>जननी कृतार्थ हो जाती है और उसके संन्यास के प्रताप से सम्पूर्ण वसुन्धरा पुण्यों से भर जाती है।</strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    प</span><span lang="hi" xml:lang="hi">रम पूज्य प्रात: स्मरणीय श्रद्धेय श्री स्वामी जी महाराज का स्वप्र है कि इस धरती पर रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति से लेकर परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र और समस्त विश्व उन्नति के चरम उत्कर्ष को छुए परन्तु उसकी नींव आध्यात्मिक हो  क्योंकि बिना अध्यात्म के उन्नति वास्तविक उन्नति नहीं अपितु विनाशोन्मुखता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। अध्यात्म रहित विकास उस प्रकृति के प्रति घोर अन्याय है जिसने प्राणिमात्र को जीवन  जीने योग्य वातावरण दिया। जियो और जीने दो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस विचार को परिष्कृत करके ऐसे समझना चाहिये कि जीने दो और जियो। क्योंकि सबकी उन्नति में आत्मोन्नति को देखना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी इच्छा करना और एक आध्यात्मिक विश्व बनाने के लिए सर्वात्मना समर्पित होकर अहर्निश पुरुषार्थरत रहना ही हमारी वास्तविक गुरुदक्षिणा है। श्रद्धेय श्री स्वामी जी महाराज का सपना एक आध्यात्मिक भारत व आध्यात्मिक विश्व बनाने का है और गुरु के ऐसे पवित्र और सर्वमंगलकारी सपने को अपना सपना बनाकर उसके लिए जीने से बढ़कर जीवन में और कुछ नहीं है। हमारे पूर्वज ऋषि-ऋषिकाओं की पवित्र सनातन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गरिमामयी और वरणीय संन्यास परम्परा एक आध्यात्मिक व्यक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक समाज और एक आध्यात्मिक भारत बनाने के लिए आधार है। शास्त्र कहते हैं कि जिस कुल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खानदान में एक भी व्यक्ति संन्यासी हो जाता है तो उसका सारा कुल पवित्र हो जाता है। जननी कृतार्थ हो जाती है और उसके संन्यास के प्रताप से सम्पूर्ण वसुन्धरा पुण्यों से भर जाती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कुलं पवित्रं जननी कृतार्था वसुन्धरा पुण्यवती च तेन।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">असारसंवित्सुखसागरेऽस्मिन् लीनं परे ब्रह्मणि यस्य चेत:।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परम श्रद्धेय स्वामी जी महाराज की प्रेरणा व अनन्त आशीर्वाद से भारतवर्ष को जगद्गुरु पद पर पुन: प्रतिष्ठापित करने के लिए व एक आध्यात्मिक भारत के निर्माण के लिए पतंजलि योगपीठ के द्वारा पिछले लगभग २५ वर्षों से माँ भारती की सेवा में अहर्निश सेवारत रहते हुए अनेक प्रयास किये गए। उन्हीं प्रयासों में एक वैदिक ऋषि ज्ञान परम्परा के प्रकल्प के रूप वैदिक गुरुकुलम् व वैदिक कन्या गुरुकुलम् हैं जहाँ ऐसी दिव्य आत्माएँ ऋषि ज्ञान परम्परा को आत्मसात् करती हैं जिनका लक्ष्य है इस समष्टि को दिव्यता से भर देना और बदले में अपने लिए कुछ न चाहना। अर्थात् ब्रह्मचर्याश्रम से सीधे संन्यासाश्रम का वरण करना और ब्रह्मचर्य काल में अर्जित शक्तियों का उपयोग समष्टि के कल्याण केलिए करना। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्राह्मण ग्रन्थ में कहा है-</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेत्  वनाद्वा गृहाद्वा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत्।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महर्षि दयानन्द ने भी सत्यार्थ प्रकाश में कहा है कि- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">जो ब्रह्मचर्य से संन्यासी होकर जगत् को सत्य शिक्षा करके जितनी उन्नति कर सकता है उतनी गृहस्थ वा वानप्रस्थ आश्रम करके संन्यासाश्रमी नहीं कर सकता।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि ब्रह्मचर्याश्रम में संचित समस्त शक्तियाँ बिना बिखरे ही पूर्ण रूपेण लोक कल्याण में लग जाती है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अत्यन्त प्रसन्नता व गौरव का विषय है कि इस वर्ष श्रद्धेय श्री स्वामी जी महाराज के संन्यास दीक्षा दिवस अर्थात् रामनवमी के पावन अवसर पर लगभग 88 भाई-बहन संन्यास की दीक्षा लेकर पतंजलि योगपीठ अर्थात् ऋषि-ऋषिकाओं के संकल्पो को मूत्र्त रूप देने के लिए संकल्पित हो रहे हैं।</span></h5>
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#C2E0F4;border-color:#C2E0F4;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(194,224,244);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>पतंजलि के प्रयासों में एक वैदिक ऋषि ज्ञान परम्परा के प्रकल्प के रूप वैदिक गुरुकुलम् व वैदिक कन्या गुरुकुलम् भी हैं जहाँ ऐसी दिव्य आत्माएँ ऋषि ज्ञान परम्परा को आत्मसात् करती हैं जिनका लक्ष्य है इस समष्टि को दिव्यता से भर देना और बदले में अपने लिए कुछ न चाहना।</strong></span></h5>
<p><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-08/51.jpg" alt="51"></img></strong></span></p>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषियों-महर्षियों की पावनी संन्यास परम्परा की शृंखला में पतंजलि योगपीठ के द्वारा किया गया ये पवित्र प्रयास भविष्य में भारतवर्ष को विश्व पटल पर एक आध्यात्मिक और समृद्ध राष्ट्र के रूप में स्थापित करने में अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। वेद में भी ये उद्घोष किया है-</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भद्रमिच्छन्ति ऋषय: स्वर्विदस्तपो दीक्षामुपनिषेदुरग्रे।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ततो राष्ट्रं बलमोजश्च जातं तदस्मै देवा उपसंनमन्तु।। अथर्व. १९/४१/१</span></strong></span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2018</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Apr 2018 21:57:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पतंजलि आयुर्वेद महाविद्यालय का वार्षिकोत्सव  उल्लास – 2018 तथा नवनिर्मित आर्युवेद भवन का उद्घाटन</title>
                                    <description><![CDATA[<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि एक पॉवर हाउस के रूप में देश व विश्व को ऊर्जा प्रदान कर रहा है: </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मा. मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">  <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद भवन का उद्घाटन करते हुए उत्तराखण्ड के माननीय मुख्यमंत्री श्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने कहा कि पतंजलि योगपीठ एक पॉवर हाउस के रूप में देश को ही नहीं अपितु पूरे विश्व को ऊर्जा प्रदान कर रहा है। जैसे बिजली से अनेकों सृजन के कार्य किये जाते हैं उसी प्रकार पतंजलि की शक्ति से अनेकों समाजसेवी कार्य किये जा रहे हैं। श्री रावत ने कहा कि देश को दिशा प्रदान करने का कार्य युवा संन्यासी करेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके ऊपर बहुत बड़ा</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1991/patanjali-ayurved-mahavidyalaya-ka-varshikotsav-ullas-2018-tatha-navnirmit-ayurved-bhawan-ka-udghatan"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-08/71.jpg" alt=""></a><br /><ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि एक पॉवर हाउस के रूप में देश व विश्व को ऊर्जा प्रदान कर रहा है: </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मा. मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"> <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद भवन का उद्घाटन करते हुए उत्तराखण्ड के माननीय मुख्यमंत्री श्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने कहा कि पतंजलि योगपीठ एक पॉवर हाउस के रूप में देश को ही नहीं अपितु पूरे विश्व को ऊर्जा प्रदान कर रहा है। जैसे बिजली से अनेकों सृजन के कार्य किये जाते हैं उसी प्रकार पतंजलि की शक्ति से अनेकों समाजसेवी कार्य किये जा रहे हैं। श्री रावत ने कहा कि देश को दिशा प्रदान करने का कार्य युवा संन्यासी करेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके ऊपर बहुत बड़ा दायित्व है। हम अपने चरित्र को संन्यासियों के समान उन्नत करें तथा स्वयं को वेदों के अनुकूल बनायें। स्वयं के चरित्र से विश्व को चरित्र की शिक्षा दें। इसी से भारत के विश्वगुरु बनने का मार्ग प्रशस्त होगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर श्री रावत ने कहा कि देश संक्रमण काल (परिवर्तन काल) से गुजर रहा है। पतंजलि योगपीठ तथा भारत स्वाभिमान जैसे संगठन देश को प्रगति के पथ पर ले जाने का कार्य कर रहे हैं। श्री रावत ने कहा कि कोई भी व्यक्ति अयोग्य नहीं है। कोई किसी कार्य में निपुण है तो कोई किसी अन्य में। कमी है तो मात्र योजक की। हम सौभाग्यशाली हैं कि हमें स्वामी जी तथा आचार्यश्री जैसे दो महान् योजक मिले हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज ने कहा कि देश को किसी राजा महाराजा ने नहीं बनाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देश को तो ऋषियों ने अपने तप व दीक्षा से बनाया है। ऋषियों ने तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सात्विक संवेदना तथा दिव्य ज्ञान से भारत का निर्माण किया है। हम राजनैतिक या व्यवसायिक परम्परा के उत्तराधिकारी नहीं अपितु ऋषियों के उत्तराधिकारी हैं। उद्योग तो मात्र हमारा साधन है किन्तु देशभक्त श्रेष्ठ व्यक्तित्व बनाना हमारा साध्य है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि मैं </span>100<span lang="hi" xml:lang="hi"> नचिकेता बनाना चाहता हूँ। महर्षि दयानन्द व महर्षि अरविन्द का स्वप्न भी कुछ ऐसा ही था किन्तु यह संकल्प पूर्ण न हो सका। इस अधूरे संकल्प को पूर्ण करने का कार्य पतंजलि कर रहा है। आगामी राम नवमी के अवसर पर संन्यास धर्म का पालन करने वाले </span>50<span lang="hi" xml:lang="hi"> से अधिक श्रेष्ठ व्यक्ति ऋषियों के उत्तराधिकारी के रूप में तैयार हो रहे हैं। हम भीतर से योगी तथा बाहर से कर्मयोगी बनकर वैदिक साम्राज्य की प्रतिष्ठा करें। पतंजलि योगपीठ आध्यात्मिक भारत और आध्यात्मिक विश्व बनाने की ओर प्रयासरत है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी जी ने कहा कि मल्टीनेशनल कम्पनियों ने करोड़ों का कैमिकल का बाजार बनाया जबकि पतंजलि ने कृषि उत्पादों का वृहद् बाजार बनाया जिससे किसान सीधे-सीधे लाभान्वित हुआ। अब हमारा लक्ष्य आयुर्वेदिक औषधियों को एविडेंस बेस्ड मेडिसिन के रूप में मान्यता दिलाना है। इसके लिए समय-समय पर पतंजलि रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा मूल्यांकन किया जायेगा। पश्चिम ने तकनीक तथा चीन ने प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग करके अपनी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ किया है। भारत के पास योग व आयुर्वेद की शक्ति है जिसके द्वारा हम विश्व को स्वास्थ्य प्रदान करने के साथ-साथ आर्थिक रूप से भी मजबूत बनें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने कहा कि पतंजलि आज एक नया मुकाम व आयाम स्थापित करने जा रहा है। प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद का स्वरूप पहले एक टूटी झोंपड़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ दवा की शीशी तथा एक लम्बी दाढ़ी वाले वैद्य के रूप में ही सीमित था। पतंजलि के प्रयासों से आज आयुर्वेद सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा पद्धति के रूप में अपनी पहचान बनाने में सफल रहा है। रोगियों की पूर्ण चिकित्सा के साथ-साथ स्वस्थ व्यक्ति रोगी न बने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका सम्पूर्ण विधान केवल आयुर्वेद में ही है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्यश्री ने कहा कि आयुर्वेद के क्षेत्र में पतंजलि पहली ऐसी संस्था है जिसने आयुर्वेद को एविडेंस बेस्ड बनाने का कार्य किया। देशभर में लगभग </span>1500<span lang="hi" xml:lang="hi"> चिकित्सालयों पर रोगियों की पैथोलॉजिकल जाँच रिपोर्ट तथा उनका क्षेत्र व प्रांत आदि के अनुसार ई.एम.आर. सिस्टम से सम्पूर्ण डाटा कलैक्शन का कार्य पतंजलि योगपीठ कर रहा है। प्रकाशन के क्षेत्र में भी वल्र्ड हर्बल इन्साइक्लोपीडिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राचीन पाण्डुलिपि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निघण्टु तथा वनौषधियों पर शोध आदि के प्रकाशन का कार्य पतंजलि अनुसंधान संस्थान के माध्यम से किया जा रहा है। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद सिद्धांत रहस्य</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का प्रकाशन देश-विदेश की लगभग </span>75<span lang="hi" xml:lang="hi"> भाषाओं में किया जा चुका है। जिन देशों में लोग आयुर्वेद के नाम से परिचित नहीं थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ भी आयुर्वेद अपनी दस्तक दे चुका है। यह मात्र यात्रा की शुरुआत है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्यश्री ने कहा कि पतंजलि नित नये रोजगार का सृजन कर रहा है। आज हरिद्वार पतंजलि मुख्यालय में लगभग </span>23,557<span lang="hi" xml:lang="hi"> कर्मचारी कार्यरत हैं जबकि प्रत्यक्ष रूप से देशभर में </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> लाख तथा अप्रत्यक्ष रूप से </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> लाख व्यक्तियों को रोजगार मिल रहा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">माननीय आयुष एवं वन मंत्री उत्तराखण्ड सरकार श्री हरकसिंह रावत ने कहा कि पूज्य स्वामी जी व श्रद्धेय आचार्यश्री योग व आयुर्वेद के पर्यायवाची हैं। योग कोई नया शब्द नहीं है। वेदों से लेकर रामायण व महाभारत में योग व आयुर्वेद का विस्तृत वर्णन है। ये प्राचीन विधाएं लगभग लुप्त हो चुकी थीं। आज योग और आयुर्वेद नई ऊँचाईयों को प्राप्त कर रहा है। ऐसी उड़ान शायद ही किसी चिकित्सा पद्धति को मिली हो जो योग व आयुर्वेद को मिली है। यह उड़ान पतंजलि के सत्प्रयासों से ही सम्भव हो सकी है। स्वामी जी ने पूरी दुनिया को हैलो के स्थान पर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ओम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">बोलना सिखा दिया है। ऐलोपैथी चिकित्सा महंगी चिकित्सा पद्धति है वहीं आयुर्वेद सभी वर्ग के व्यक्तियों के लिए सुलभ है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर गोल्डन बुक ऑफ  वल्र्ड रिकार्ड ने पतंजलि को पांच नये विश्व कीर्तिमानों के सर्टिफिकेट्स जारी किये। ये विश्व कीर्तिमान पतंजलि को लार्जेस्ट डाटा कलेक्शन इन आयुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लार्जेस्ट चेन ऑफ  आयुर्वेदिक सेन्टर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लार्जेस्ट प्रोसेसिंग ऑफ  शिलाजीत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लार्जेस्ट प्रोसेसिंग ऑफ  गिलोय तथा लार्जेस्ट प्रोसेसिंग ऑफ  एलोवेरा के लिए प्रदान किये गये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यक्रम में माननीय आयुष सचिव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत सरकार वैद्य राजेश कोटेचा ने कहा कि भगीरथ ने अपने तप से पृथ्वी पर गंगा का अवतरण कराया था आज पूज्य स्वामी जी तथा श्रद्धेय आचार्यश्री ने योग व आयुर्वेद का पुन: अवतरण किया है। पतंजलि के कारण आज मल्टीनेशनल कम्पनियाँ भयभीत हैं। उन्होंने कहा कि स्वामी जी आज एक बड़े प्रोडक्शन हाउस के रूप में विद्यमान हैं। पूरा देश उनसे ऊर्जा प्राप्त कर रहा है। इस प्रोडक्शन हाउस से न जाने कितने स्वामी जी व आचार्य जी बनकर निकलेंगे तथा राष्ट्र की सेवा करेंगे। उन्होंने कहा कि इस काल को देशहित में कैपिटलाईज्ड करना चाहिए जो सरकार के साथ हमारा संयुक्त दायित्व है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्री कोटेचा ने कहा कि एक ट्राई पार्टी एम.ओ.यू. की कार्य योजना जल्द तैयार की जायेगी जिसमें भारत सरकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ तथा आयुर्वेद विश्वविद्यालय उत्तराखण्ड को मिलकर कार्य करना होगा। इसमें पाण्डुलिपियों को संरक्षित करने से लेकर आयुर्वेदिक औषधियों को एविडेंस बेस्ड मेडिसिन के रूप में मान्यता दिलाना शामिल होगा। माननीय कुलपति उत्तराखण्ड आयुर्वेद विश्वविद्यालय डॉ. अभिमन्यु कुमार ने कहा कि स्वामी जी महाराज के रूप में हमारे पास एक ऐसा वल्र्ड रिकार्ड है जो गोल्डन बुक ऑफ  वल्र्ड रिकार्ड के सभी रिकार्ड से बढ़कर है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">माननीय उच्च शिक्षा मंत्री श्री धनसिंह रावत ने कहा कि स्वामी जी और आचार्यश्री की जोड़ी बेजोड़ है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री योजना के तहत </span>100<span lang="hi" xml:lang="hi"> बच्चों को फैलोशिप के लिए हमने आचार्यश्री से सहयोग का आग्रह किया तो आचार्यश्री ने इसके लिए सहर्ष स्वीकृति दी। इसी वर्ष पतंजलि में ज्ञानकुम्भ का भी आयोजन किया जाना है जो एक बड़ा कार्य है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शहरी विकास मंत्री श्री मदन कौशिक ने कहा कि </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi">वीं सदी भारत की सदी होगी जिसमें पतंजलि योगपीठ की विशेष भूमिका होगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यक्रम में पतंजलि आयुर्वेद महाविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने योग व सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से उपस्थित महानुभावों का मन मोह लिया।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-08/91.jpg" alt="91"></img></span></p>
<h6 style="text-align:center;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> <strong>आयुर्वेद भवन के उद्घाटन अवसर पर ऋषिद्वय के साथ दीप प्रज्ज्वलन व कुलगान करते उत्तराखण्ड मुख्यमंत्री, मंत्रीगण व गणमान्य</strong></span></h6>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-08/90.jpg" alt="90"></img></span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-08/92.jpg" alt="92"></img></span></p>
<p style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य महाराजश्री के साथ आयुर्वेद भवन का निरीक्षण करते प्रदेश मुख्यमंत्री व कैबिनेट मंत्रीगण (बाँये) तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करती आयुर्वेद महाविद्यालय की छात्राएँ</span></strong></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-08/93.jpg" alt="93"></img></span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-08/94.jpg" alt="94"></img></span></p>
<p style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गोल्डन बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड प्रस्तुत करते पूज्य महाराजश्री, गोल्डन बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड के प्रतिनिधि तथा गणमान्य अतिथिगण</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्था समाचार</category>
                                            <category>2018</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Apr 2018 21:56:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्रजनन सस्थान, उदर व वात रोग निवारक आयुर्वेदिक घटक एरण्ड</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ए</span><span lang="hi" xml:lang="hi">रण्ड कृषिजन्य या वन्यज भूमि में 2000 मी की ऊंचाई तक पाए जाते हैं। इसके बीजों की मींगी से जो तेल प्राप्त होता है वह एक निरापद रेचक है। कोष्ठशुद्धि के लिए यह एक परमोपयोगी औषधि है। इसके साथ ही यह उत्तम वात-शामक औषधि है। वात-प्रकोप से उत्पन्न कब्ज में तथा वात-व्याधियों में इसका उपयोग कम मात्रा में औषधि के रूप में भी कर सकते हैं। अर्श</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगंदर तथा गुदभ्रंश के रोगियों में एरंडपाक के सेवन से बिना जोर लगाए मल साफ  होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे रोगी को उक्त व्याधियों से होने वाले दैनिक कष्ट से मुक्ति मिल</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1992/prajanan-sasthan-udar-v-vaat-rog-nivarak-ayurvedic-ghatak-arand"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-08/arandi.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ए</span><span lang="hi" xml:lang="hi">रण्ड कृषिजन्य या वन्यज भूमि में 2000 मी की ऊंचाई तक पाए जाते हैं। इसके बीजों की मींगी से जो तेल प्राप्त होता है वह एक निरापद रेचक है। कोष्ठशुद्धि के लिए यह एक परमोपयोगी औषधि है। इसके साथ ही यह उत्तम वात-शामक औषधि है। वात-प्रकोप से उत्पन्न कब्ज में तथा वात-व्याधियों में इसका उपयोग कम मात्रा में औषधि के रूप में भी कर सकते हैं। अर्श</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगंदर तथा गुदभ्रंश के रोगियों में एरंडपाक के सेवन से बिना जोर लगाए मल साफ  होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे रोगी को उक्त व्याधियों से होने वाले दैनिक कष्ट से मुक्ति मिल जाती है। औषधि-कर्म के साथ ही यह पोषण का भी कार्य करता है। एरण्ड रक्त और श्वेत दो प्रकार का होता है। जिन वृक्षों के बीज बड़े होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका तेल जलाने के काम आता है और जिनके बीज छोटे होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका तेल औषधि में प्रयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त व्याघ्रएरण्ड का प्रयोग भी चिकित्सा के लिए किया जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-08/arandi.jpg" alt="arandi"></img></span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बाह्यस्वरूप</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसका 3-5 मी. ऊँचा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकवर्षायु अथवा बहुवर्षायु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अरोमिल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">झाड़ीदार गुल्म अथवा वृक्षक होता है। इसका काण्ड पोला अथवा मज्जायुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राय: जल्दी टूटने वाला होता है। इसकी काण्डत्वक् पतली धूसर-भूरे वर्ण की होती है। इसके पत्र चौड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हस्ताकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">7 पालिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरित अथवा रक्ताभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">30-60 सेमी व्यास के होते हैं। इसके फल गोलाकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">1.2-2.5 सेमी लम्बे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधारणतया मुलायम कंटकों द्वारा आवरित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीन भागों में स्फुटित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विभिन्न आकार एवं वर्ण के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिकने तथा धब्बेदार होते हैं। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल सितम्बर से अप्रैल तक होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेदीय गुण-कर्म एवं प्रभाव</span></strong></span></h5>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">एरण्ड कफवातशामक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पित्त-वर्धक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शोथहर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेदना-स्थापक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंगमर्दप्रशमनकारक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भेदन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्नेहन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृमिनि:सारक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कफघ्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूत्रविशोधक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्तन्यजनन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुक्रशोधक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गर्भाशय-शोधक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठघ्न तथा ज्वरघ्न होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">एरंड तेल स्रोतों का शोधन करने वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचा के लिए हितकारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वृष्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वय:स्थापक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुक्रशोधक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योनिशोधक तथा कफवात शामक होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके पत्रों का मेथेनॉलसार मस्तिष्कगत उद्दीपनरोधी क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके पत्रों एवं बाह्यफलभित्ति का जलीय-सार कवकरोधी क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसका पत्र-सार अनॉक्सीकारक क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके मूल का ऐथेनॉलिक सार मधुमेहरोधी क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नेत्र रोग</span></strong></span></h5>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">नेत्र-विकार- एरंड तेल के अंजन से नेत्रों में जलस्राव होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए इसे नेत्र-विरेचक कहते हैं। 2 बूंद एरंड तेल को नेत्रों में डालने से इनके भीतर का कचरा निकल जाता है और आंखों की किरकरी बन्द हो जाती है। कुकूणक रोग में उसकी तीक्ष्णता भी कम होती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">एरंड-पत्रों को जौ के आटे के साथ पीसकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुल्टिस बनाकर आँखों पर बांधने से आंखों पर आई पित्त की सूजन (पित्तज-नेत्रशोथ) बिखर जाती है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-08/arrrr.jpg" alt="arrrr"></img></span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वक्ष रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कास-500 मिग्रा एरंड पत्र क्षार में 3 मिली तेल एवं समान भाग गुड़ मिलाकर चटाने से खांसी दूर हो जाती है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उदर रोग</span></strong></span></h5>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>उदर विकार -</strong></span> एरंड के बीजों की मींगी पीसकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चार गुना गाय के दूध में पकाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब खोवा की तरह हो जाए तो उसमें 2 भाग खांड मिलाकर या चीनी की चाशनी मिलाकर अवलेह बना लें। प्रतिदिन 10 ग्राम खाने से उदर विकारों का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जीर्ण उदर वेदना में रोज रात्रि को सोने के समय 200 मिली गुनगुने जल में एक नींबू का रस तथा 5-10 बूंद एरंड तेल डाल कर पीने से कुछ समय में जीर्ण उदर शूल दूर हो जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>प्रवाहिका -</strong></span> प्रवाहिका में आंव और रक्त गिरता है तो आरम्भ में ही 10 मिली एरंड तेल देने से आम का प्रकोप कम हो जाता है और खून का गिरना भी कम हो जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>एपैण्डिक्स -</strong></span> इस रोग के प्रारम्भ में ही एरंड तेल 5 से 10 मिली की मात्रा में प्रतिदिन देने से शल्य-क्रिया की आवश्यकता नहीं रहती।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>उदर-कृमि -</strong></span> एरंड के पत्तों का रस नित्य 2-3 बार बच्चे की गुदा में लगाने से उदरान्त्र कृमि (चुन्ने) मर जाते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>पेट की चर्बी -</strong></span> पेट पर बढ़ी हुई चर्बी को कम करने के लिए हरे एरंड की 20 से 50 ग्राम मूल को धोकर कूटकर 200 मिली पानी में पकाकर 50 मिली शेष रहने पर पानी को प्रतिदिन पीने से पेट की चर्बी कम होती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong><span style="color:rgb(45,194,107);">पित्तजगुल्म -</span></strong> पित्तजगुल्म एवं पैत्तिक शूल में यष्टिमधु के 20-30 मिली क्वाथ में 5-10 मिली एरंड तेल मिलाकर पिलाने से लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गुदा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>अ<span style="color:rgb(45,194,107);">र्श </span>- </strong></span>20-30 मिली एरण्ड पत्र क्वाथ में 15 मिली घृतकुमारी स्वरस मिलाकर प्रात: सायं सेवन करने से अर्श में लाभ होता है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">एरंड तेल और घृत कुमारी का स्वरस मिलाकर मस्सों पर लगाने से जलन शान्त हो जाती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">मस्से और गुदा की त्वचा फट जाने पर प्रतिदिन रात्रि को एरंड तेल लगाने से बहुत लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">यकृत्प्लीहा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>कामला -</strong></span> गर्भवती स्त्री को यदि कामला हो जाए और शुरूआती अवस्था हो तो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">10 मिली एरंड पत्र-स्वरस को प्रात: काल पांच दिन तक पिलाने से कामला में लाभ होता है तथा सूजन भी दूर हो जाती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">5 मिली एरंड पत्र स्वरस में 500 मिग्रा पीपल का चूर्ण मिला के नस्य देने से या अंजन करने से कामला रोग मिटता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">6 मिली एरण्ड मूल स्वरस में 250 मिली दूध मिलाकर पिलाने से कामला रोग मिटता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">20-30 मिली एरण्ड मूल क्वाथ में 2 चम्मच मधु मिलाकर पिलाने से कामला में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्लीहोदर-65 मिग्रा एरण्ड पञ्चांग भस्म को 20 मिली गोमूत्र में मिलाकर पिलाने से प्लीहोदर मिटता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वृक्कवस्ति</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>वृक्कशूल - </strong></span>एरण्ड की मींगी को पीसकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गर्म कर लेप करने से गुर्दे की पीड़ा व शोथ में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजननसंस्थान</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>स्तन-ग्रंथि -</strong></span> जब किसी स्त्री के स्तनों से दूध आना बन्द हो जाता है और स्तनों में गांठे पड़ जाती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब एरंड के 500 ग्राम पत्तों को 20 लीटर जल में घंटे भर उबालें तथा गुनगुने पानी की धार 15-20 मिनट स्तनों पर डाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एरंड तेल की मालिश करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उबले हुए पत्तों की महीन पुल्टिस स्तनों पर बांधे। गांठे बिखर जायेंगी और दूध का प्रवाह पुन: प्रारम्भ हो जाएगा।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>स्तन चुचुक विदारण -</strong></span> चुचुक के चारों ओर की त्वचा फट जाने पर एरंड तेल को लगाने से तुरन्त लाभ होता है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">तीन एरंड बीज गिरी को सिरके में पीसकर स्तन पर लगाने से स्तनशोथ में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>प्रसव कष्ट -</strong></span> प्रसव काल में कष्ट कम हो सके इसके लिए गर्भवती स्त्री को 5 मास बाद एरंड तेल का 15-15 दिन के अन्तर से हल्का जुलाब देते रहें। प्रसव के समय 25 मिली एरंड तेल को चाय या दूध में मिलाकर देने से प्रसव शीघ्र होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>योनिशूल/गर्भाशय शोथ -</strong></span> एरंड तेल में रूई का फाहा भिगोकर योनि में धारण करने से योनिशूल मिट जाती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>गर्भाशय - </strong></span>शोथ प्राय: प्रसव पश्चात् होता है। इसमें रुग्णा को बहुत तेज ज्वर होता है। ऐसी अवस्था में एरंड के पत्तों के वस्त्रपूत स्वरस में शुद्ध रूई का फाहा भिगोकर योनि में रखने से आराम होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>मासिकधर्म - </strong></span>एरंड के पत्तों को गर्म कर पेट पर बांधने से मासिक धर्म ठीक से होने लगता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>अण्डकोष वृद्धि - </strong></span>10 मिली एरंड तेल को 3 ग्राम गुग्गुल और 10 मिली गोमूत्र के साथ सुबह-शाम पीने से एवं वेदना-स्थान पर एरंड पत्र गर्म कर बांधने से पीड़ा शीघ्र मिटती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>कामेन्द्रिय की कमजोरी -</strong></span> एरण्ड बीज और तिल का तेल दोनों को समभाग लेकर पकाकर नित्य मूत्रेन्द्रिय पर मालिश करने से मूत्रेन्द्रिय की कमजोरी मिटती है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अस्थिसंधि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>गृध्रसी -</strong></span>10 ग्राम एरंड बीज गिरी को दूध में पकाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खीर बनाकर खिलाने से गृध्रसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कटिशूल तथा आमवात में लाभ होता है एवं इससे कोष्ठबद्धता में भी लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>नाड़ी -व्रण- </strong></span>एरण्ड की कोमल कोंपलों को पीसकर लेप करने से नाड़ी व्रण मिटता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>शबयाक्षत-</strong></span> एरंड तेल लगाने से शबयाक्षत बड़ी जल्दी मिटते हैं। बच्चों के उल्टी अतिसार और बुखार में एरंड तेल से अधिक लाभदायक कोई और वस्तु नहीं है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>चर्म रोग-</strong></span> 20 ग्राम एरण्ड मूल को 400 मिली पानी में पकाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काढ़ा बनाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">100 मिली शेष रहने पर उसे पिलाने से चर्म रोगों में लाभ होता है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>दुष्ट व्रण-</strong></span> एरण्ड पत्र को पीसकर व्रण पर लगाने से व्रण का शीघ्र रोपण होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>विद्रधि-</strong></span> एरण्ड मूल को पीसकर घी या तेल में मिलाकर कुछ गर्म कर गाढ़ा लेप करने से विद्रधि मिटती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>ति</strong><strong>ल- </strong></span>मस्से-एरण्ड पत्र के वृन्त पर थोड़ा चूना लगाकर तिल पर बार-बार घिसने से तिल तथा मस्से निकल जाते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>रोमकूपशोथ-</strong></span> रोमकूपशोथ में एरण्ड के पत्तों का उपनाह बांधने से लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>प्रदाह-</strong></span> एरण्ड पत्र को पीसकर लगाने से क्षत तथा प्रदाह में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>त्वचा रोग-</strong></span> एरण्ड मूल की छाल को पीसकर लगाने से त्वचा विकार तथा कटिशूल में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वशरीर रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>बादी की पीड़ा- </strong></span> एरंड और मेहंदी के पत्तों को पीसकर लेप करने से बादी की पीड़ा मिटती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>वातरक्त- </strong></span>10 मिली एरण्ड तेल को एक गिलास दूध के साथ सेवन करने से वातरक्त में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>रक्त के रोग-</strong></span> एरंड की मींगी 1 नग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूध 125 मिली तथा जल 250 मिली को मिलाकर औटाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूध मात्र शेष रहने पर 10 ग्राम खांड या मिश्री डालकर पिला दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार 1 गिरी से शुरू करके सात दिन तक 1-1 गिरी बढ़ाकर पुन: घटाते हुए 1 गिरी पर लाने से रक्त के रोग मिटते हैं। यह प्रयोग अत्यन्त वातशामक भी है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>नहरुवा- </strong></span>एरण्ड के पत्तों को गर्म कर बांधने से नहरुवे की सूजन उतर जाती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>वात-</strong></span> प्रकोप और वात-शूल-एरंड के बीजों को पीसकर लेप करने से छोटी सन्धियों और गठिया की सूजन मिटती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">वात रोग में एरंड तेल उत्तम गुणकारी है। कटिशूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गृध्रसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाश्र्वशूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय-शूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कफजशूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आमवात और सन्धिशोथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन सब रोगों में 10 ग्राम एरंड मूल और 5 ग्राम सोंठ चूर्ण का क्वाथ बना कर सेवन करना चाहिए तथा वेदना स्थल पर एरंड तेल की मालिश करनी चाहिए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>सूजन-</strong></span> किसी प्रकार की सूजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आमवात इत्यादि में एरंड के पत्तों को गर्म कर तेल चुपड़ कर बांधने से लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>दाह- </strong></span>ज्वर में होने वाले दाह में एरंड के पत्र धोकर साफ कर शरीर पर धारण कराने से दाह नष्ट हो जाती है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विष चिकित्सा</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>विषनाशक- </strong></span>30-50 मिली एरण्ड पत्र स्वरस पिलाकर वमन कराने से सांप तथा बिच्छू के विष में लाभ होता है। इसी प्रकार अफीम तथा दूसरी तरह के जहर में भी इससे लाभ होता है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">एरण्ड के 10-15 ग्राम फलों को पीस छान के पिलाने से अफीम का विष उतरता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विशेष</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">5-10 मिली लाल एरंड तेल में गर्म दूध मिलाकर पीने से योनिशूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुल्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वातरक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीर्णज्वर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कटि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पृष्ठ और कोष्ठशूल में लाभ होता है। बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आरोग्यता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्मृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल और आयु को बढ़ाता है और हृदय को बलवान् करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(45,194,107);" xml:lang="hi">सावधानी</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लाल एरंड के बीस बीजों की गिरी नशा पैदा करती है और ज्यादा खाने से बहुत वमन होता है एवं घबराहट या मूर्छा तक भी हो सकती है। यह आमाशय के लिए अहितकर होता है।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पोषक उत्पाद</category>
                                            <category>2018</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Apr 2018 21:55:11 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>ऋषिकेश की पावन भूमि पर गंगा रिसोर्ट, मुनी की रेती में आयोजित  अन्तरराष्ट्रीय योग महोत्सव</title>
                                    <description><![CDATA[<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">योग विद्या की छाया में आओ</span><span style="font-size:1.25rem;">,</span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi"> योग तुम्हें अभयदान देगा। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">-पूज्य भारत भूषण जी महाराज</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(226,12,109);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राण विद्या योग विद्या का मूल है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही ब्रह्म विद्या है। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">-पूज्य महाराजश्री</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;" align="center">  <span lang="hi" xml:lang="hi">उ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">त्तराखण्ड पर्यटन विकास बोर्ड व गढ़वाल मण्डल विकास निगम के संयुक्त तत्वावधान में गंगा रिसोर्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुनी की रेती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषिकेश में अंतरराष्ट्रीय योग महोत्सव का आयोजन किया गया जिसमें केवल भारत से ही नहीं अपितु दुनिया के अलग-अलग देशों से योग साधकों ने भाग लिया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर <span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>पूज्य भारत भूषण जी महाराज</strong></span> ने कहा कि गंगा के साथ योग की गंगा का यह अनुपम संगम है। उन्होंने</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1994/rishikesh-ki-pawan-bhumi-par-ganga-resort--muni-ki-reti-me-ayojiy-antarrashtriya-yog-mahotsav"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-08/272.jpg" alt=""></a><br /><ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">योग विद्या की छाया में आओ</span><span style="font-size:1.25rem;">,</span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi"> योग तुम्हें अभयदान देगा। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">-पूज्य भारत भूषण जी महाराज</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(226,12,109);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राण विद्या योग विद्या का मूल है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही ब्रह्म विद्या है। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">-पूज्य महाराजश्री</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"> <span lang="hi" xml:lang="hi">उ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">त्तराखण्ड पर्यटन विकास बोर्ड व गढ़वाल मण्डल विकास निगम के संयुक्त तत्वावधान में गंगा रिसोर्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुनी की रेती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषिकेश में अंतरराष्ट्रीय योग महोत्सव का आयोजन किया गया जिसमें केवल भारत से ही नहीं अपितु दुनिया के अलग-अलग देशों से योग साधकों ने भाग लिया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर <span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>पूज्य भारत भूषण जी महाराज</strong></span> ने कहा कि गंगा के साथ योग की गंगा का यह अनुपम संगम है। उन्होंने समस्त मानव जाति से आह्वान किया कि जगो! योग विद्या की छाया में आओ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग तुम्हें अभयदान देगा।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-08/301.jpg" alt="30"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्तरराष्ट्रीय योग महोत्सव के अन्तिम दिन हमें पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज का योग सत्र प्रसाद के रूप में मिला है। हम सभी अच्छे साधक बनें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आने वाली पीढिय़ों तक यह योग की गंगा पहुँचे और हम आत्मकल्याण के पथ पर अग्रसर हों।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग जब कन्दराओं तक सीमित था तब बाकि दुनिया उसका लाभ नहीं ले पा रही थी। आज यह सुलभ हो गया है। घर-घर पहुँच गया है। यह सिलसिला अनवरत् चले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग का प्रचार-प्रसार हो जिससे जनसामान्य लाभान्वित हो सके। ऋषियों से चला आ रहा योग ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक ऋषियों के पास आया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह हम सब के माध्यम से आने वाली पीढिय़ों के साथ पूरी दुनिया तक पहुँचे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे यह दुनिया जीने लायक बनी रहे तथा हम आत्मकल्याण के साथ विश्व कल्याण की परिकल्पना को मूर्त रूप दे सकें।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-08/363.jpg" alt="36"></img></span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-08/372.jpg" alt="37"></img></span></p>
<p style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज व पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज को सम्मानित करते उत्तराखण्ड के महामहिम राज्यपाल श्री के.के. पॉल</span></strong></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर क्रियायोग के प्रणेता <span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>पूज्य स्वामी शंकरानन्द जी महाराज</strong></span> ने योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज के प्रति अपनी कृतज्ञता तथा धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि स्वामी जी ने ऋषि पतंजलि के संदेश को प्रचारित-प्रसारित किया है। उनके मार्गदर्शन में पतंजलि योगपीठ यह कार्य बखूबी कर रही है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य विश्वकेतु जी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> ने अपना २२ वर्ष पुराना स्मरण बताया कि सन् १९९५ में स्वामी जी महाराज २० किमी. की दौड़ लगाते थे। उन्होंने योग के बल पर अपने शरीर तथा इन्द्रियों को अपने वश में किया है जो एक कठिन कार्य है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यक्रम में <strong><span style="color:rgb(224,62,45);">पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज</span></strong> ने साधकों को योग का सम्पूर्ण पैकेज कराया। योग-सत्र के दौरान स्वामी जी ने कहा कि प्राण विद्या योग विद्या का मूल है। यही ब्रह्म विद्या है। व्यक्ति दु:खी तभी होता है जब वह जीवन में कहीं न कहीं अपूर्णता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दु:ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दरिद्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अल्पता अनुभव करता है। योग हमें अपूर्णता से पूर्णता की ओर ले जाता है। हम स्वयं में और समष्टि में पूर्णता अनुभव करते हुए पूर्ण पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण श्रद्धा व पूर्ण परमार्थ के कार्य करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही योग है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही जीवन का लक्ष्य है। योग का मूल सिद्धान्त एकत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सह-अस्तित्व अैर विश्व बन्धुत्व है। हम योग के असीमित वैज्ञानिक प्रमाण रखते हैं। हमारे शास्त्रों में लिखा है कि योग से सभी बीमारियाँ ठीक होती हैं- <span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>न तस्य रोगो न जरा न मृत्यु: प्राप्तस्य योगाग्रिमयं शरीरम्।।</strong></span> लेकिन हमने योग से सभी रोगों को ठीक होते हुए हजारों-लाखों बार देखा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमने ऐसे लाखों प्रमाण प्राप्त किये हैं जिनमें योग से असाध्य से असाध्य रोग ठीक हुए हैं। स्वामी जी ने कहा कि योग को अब पूरी दुनिया आत्मसात् कर रही है। जो सुबह-सुबह योग करेगा उसके अच्छे दिन अवश्य आयेंगे क्योंकि शरीर का स्वास्थ्य और बुद्धि का स्वास्थ्य ही सबसे बड़ी आवश्यकता है जो योग के माध्यम से ही सम्भव है। योग से शरीर में स्फूर्ति मिलेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि सद्मार्ग की ओर अग्रसर होगी। बुरे विचार मन में  आने ही न पायेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग विद्या तुम्हें जीवन में समाधान देगी। </span></h5>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-08/272.jpg" alt="27"></img></p>
<p style="text-align:center;"><strong>प्रकृति की गोद ऋषिकेश में प्रात:कालीन योगसत्र का लाभ लेते योग साधक</strong></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-08/313.jpg" alt="31"></img></p>
<p style="text-align:center;"><strong>अंतरराष्ट्रीय योग महोत्सव के दौरान योग शिविर में साधकों का अभिवादन स्वीकार करते पूज्य महाराजश्री</strong></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-08/322.jpg" alt="32"></img></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-08/331.jpg" alt="33"></img></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-08/342.jpg" alt="34"></img></p>
<p style="text-align:center;"><strong>शिविर में पूज्य भारत भूषण जी महाराज का गले मिलकर स्वागत करते पूज्य महाराजश्री (बांये) तथा योग प्रतिभा का प्रदर्शन करते आचार्य विवेकानन्द जी (दांये)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
                                            <category>2018</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1994/rishikesh-ki-pawan-bhumi-par-ganga-resort--muni-ki-reti-me-ayojiy-antarrashtriya-yog-mahotsav</link>
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                <pubDate>Sun, 01 Apr 2018 21:53:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>समस्त दु:खों से मुक्ति का मार्ग आत्म बोध</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">श्रद्धेय गुरुदेव - आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1995/samast-dukhon-se-mukti-ka-marg-atmbodh"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-08/89.jpg" alt=""></a><br /><table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#ECCAFA;border-color:#ECCAFA;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(236,202,250);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(241,196,15);"><strong><span style="color:rgb(35,111,161);">बुद्धि जब बहुत सूक्ष्म होती है और स्थिर भी होती है तो ही वह निश्चय कर सकती है कि क्या ग्राह्य है और क्या त्याज्य। अर्थात् सुख-दु:ख, लाभ-हानि का ठीक-ठीक विवेचन कर सकती है। अन्यथा तात्कालिक सुख और तात्कालिक लाभ को परम सुख व परम लाभ मान बैठती है। बुद्धि को जैसा दिखाई देता है, तदनुकूल ही प्रवृत्ति-निवृत्ति होती है। जिसके परिणाम के रूप में सुख-दु:ख प्राप्त होते हैं</span>।</strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">   मनुष्य जीवन की दो स्थितियाँ होती हैं। एक ज्ञान प्राप्ति से पहले कर्म व भाव की स्थिति होती है और दूसरी पश्चात्। ज्ञानपूर्ववर्ती भाव या कर्म ज्ञान पाने के लिये साधन रूप होते हैं। किन्तु ज्ञानोत्तरवर्ती भाव या कर्म ज्ञान के फल होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">धर्मपथ का अर्थ है कर्तव्यपथ या कर्मपथ। कर्तव्यपथ का फैलाव परस्परता में होता है। भौतिक सहायता का आदान-प्रदान धर्मपथ की सहायता से होता है। सार रूप में ऐसा कह सकते हैं कि व्यष्टि या समष्टि </span>(Individually or Collectively)<span lang="hi" xml:lang="hi"> का सुख जिस साधन से बढ़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका नाम </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">है। इसके विपरीत जिससे दु:ख बढ़ता है उसका नाम है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अधर्म</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi"> किन्तु व्यक्ति यदि अपने को पूर्ण रूप से निर्दोष बनाना चाहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने जीवन से अधर्म (अनर्थ) का सर्वथा अन्त करना चाहता है तो उसका साधन </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्म को जानना</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi"> केवल धर्म से अधर्म की पूर्ण निवृत्ति नहीं हो सकती है। ब्रह्म क्योंकि असंग है ज्ञानरूप है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: ब्रह्म बोध की स्थिति में व्यक्ति सर्वत: असंग हो जाता है। फिर तो ब्रह्म को प्राप्त हुआ व्यक्ति क्या कठोर हृदय नहीं हो जाता</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह केवल आसक्ति से परे चला जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन का प्रारम्भ धर्मपथ से होता है और अन्त ब्रह्म में। महाभारत में वेदव्यासजी ने अपने पुत्र शुकदेव जी को समझाया <span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>द्वाविमावथ पन्थानौ यत्र वेद: प्रतिष्ठित:।</strong> <strong>प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो निवृत्तिश्च सुभावित:।</strong></span> शास्त्र भी दो बने हुये हैं- <span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>कर्ममीमांसा और ब्रह्ममीमांसा। न तो कर्ममीमांसा सबके लिये है और न ब्रह्ममीमांसा।</strong></span> बल्कि यह कहें ब्रह्ममीमांसा तो केवल इने-गिने लोगों के लिये ही है। सुपठित व्यक्ति अर्थात् बौद्धिक सामथ्र्य से सम्पन्न व्यक्ति ही कर्म का स्वरूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म के निष्पादन की विधि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म के साथ सम्बद्ध भाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म का प्रयोजन इत्यादि समझ सकता है। ब्रह्ममीमांसा में प्रवेश पाने के लिये व्यक्ति को संसार से वैराग्य होना चाहिये। सांसारिक सुखों के प्रति जिसमें थोड़ा सा भी राग शेष है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह ब्रह्ममीमांसा का अधिकारी नहीं है। त्रिविध एषणा का त्याग ही सुख का त्याग है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि जब बहुत सूक्ष्म होती है और स्थिर भी होती है तो ही वह निश्चय कर सकती है कि क्या ग्राह्य है और क्या त्याज्य। अर्थात् सुख-दु:ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लाभ-हानि का ठीक-ठीक विवेचन कर सकती है। अन्यथा तात्कालिक सुख और तात्कालिक लाभ को परम सुख व परम लाभ मान बैठती है। बुद्धि को जैसा दिखाई देता है</span>,</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">तदनुकूल</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ही</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रवृत्ति</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">निवृत्ति</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">होती</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">है।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">परिणाम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रूप</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सुख</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">दु</span><span lang="hi" xml:lang="hi">:</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ख</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राप्त</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">होते</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हैं।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अत्यन्त</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सूक्ष्म</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ही सांसारिक विषयों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुख लेने के लिये निर्मित या कल्पित सम्बन्धों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुख निमित्तक अनुष्ठित विविध क्रियाओं में दु:ख-दर्शन कर सकती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी अन्तरतम हृदय-गुहा में प्रवेश पाने के लिये एक बार तो बाह्य से पूर्णरूप से हटना ही पड़ता है। यहाँ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बाह्य</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द का अर्थ है- विविध कामनायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कामनायुक्त कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कामनामूलक सम्बन्ध इत्यादि। अपने अन्तरतम में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने स्वरूप में स्थित होने के पश्चात् तो कर्म या सम्बन्ध बाधक नहीं बनते।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">है</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। क्योंकि सभी शास्त्र सभी धर्मगुरु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभी सिद्धपुरुष उनकी महिमा गाते हैं। उनके होने में एक और भी पुख्ता प्रमाण है कि वे हम सब साधकों की माँग में हैं। संसार में जो वस्तु है ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी माँग नहीं हो सकती। जब वे हैं तो उनके दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका अनुभव कैसे हो</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुभव तो उन्हीं की कृपा पर आश्रित है कि वे कब हमें अपनी कृपा का पात्र समझेंगे। तो फिर उनकी कृपा पाने के लिये हम क्या कर सकते हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">हमें ऐसा क्या करना चाहिये कि वे प्रसन्न हो जायें</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">हम तो इतना ही कर सकते हैं कि अपनी माँग को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी अभीप्सा को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी चाह को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी आवश्यकता को जितना हो सके सतेज करें। अपने मन-बुद्धि को उनमें डाल दें। उनसे अलग कोई वस्तु बीच में आने लगे तो उसे अस्वीकार कर दें। उसी के होकर जीयें। उनके प्रति अपने प्रेम को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी आत्मीयता को बढ़ायें तथा बालक की तरह निश्चिन्त रहें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">दो प्रकार के साधक हैं- एक वे जो भूतकाल के आधार पर वर्तमान में भी अपने को पतित-अधम मानकर अपने आपको शुद्ध करना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीचे से </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">ऊपर आरोहण करते हैं। दूसरे वे हैं जो अपने भूतकाल को पतित और अधम कहते हैं किन्तु अपने वर्तमान को निर्दोष देखते हैं और उस निर्दोषता में जीते हैं। अब देखना यह है आखिर यह अशुद्धि है क्या</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐन्द्रिक विषयों की इच्छा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन के राग-द्वेष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरों के सुख-दु:खों का ध्यान न रखकर अपने को ही महत्त्व देना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने को विशेष दूसरों को अविशेष समझना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काम-क्रोध-लोभादि विकारों का बने रहना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाणी और मन के अशुभ कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहंकार (अध्यास) इत्यादि। इस सूची को कितना ही और भी बढ़ा कर देखा जा सकता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन के आरम्भ में न तो ज्ञान होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न संग ही अच्छा मिलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रियों की प्रवृत्ति भी बहिर्मुखी होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी भी उपाय से (धर्मपूर्वक या अधर्मपूर्वक) इन्द्रिय-सुख लेने का आकर्षण बहुत ही तीव्र होता है। आगे चलकर कुछ-कुछ बोध तो होने लगता है किन्तु तब तक अभ्यास दुष्ट हो चुके होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति अभ्यासों के द्वारा चलाया चलता है। शास्त्र से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु-आचार्यों से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्संग से जो ज्ञान होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह परोक्ष ही होता है अत: उसकी शक्ति बहुत ही अल्प होती है। इसलिये अपनी अशुद्धि को साफ करना व्यक्ति के लिये बहुत बड़ा दुष्कर कार्य हो जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">हाँ! जो एक तरफा निश्चय कर लेते हैं कि हमें तो किसी भी कीमत पर पूर्ण रूप से शुद्ध होना है। वे तो फिर किसी भी उपाय से शुद्ध हो ही जाते हैं। यह एक क्रम है। व्यक्ति जो कुछ सीखता है उस ज्ञान के अनुसार अपने को शुद्ध करना या जीना आरम्भ कर देता है। शुद्धि का ही अगला चरण मुक्ति है। जो मुक्त है वही आनन्द में जी सकता है। अन्यथा व्यक्ति अपने आपको सचेतन होकर देखने लगे तो अपने को सब तरफ से विविध प्रकार के बन्धनों (संस्कारों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्मों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्बन्धों) में जकड़ा हुआ पाता है। मुक्त अर्थात् स्वाधीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बद्ध = पराधीन। स्वाधीनता ही सुख है और पराधीनता दु:ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह एक सर्वजनविदित तथ्य है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">संन्यास दीक्षा के अवसर पर नव संन्यासी के मुख से एक बात बुलवायी जाती है कि </span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मत्त: सर्वभूतेभ्योऽभयमस्तु स्वाहा</span></strong></span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अब विचारणीय यह है कि कोई व्यक्ति सब भूतों को कैसे अभय कर सकता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका उत्तर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ यह वाक्य लिखा मिलता है वहीं आस-पास एक दूसरा वाक्य भी लिखा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें मिल जाता है। वहाँ लिखा है- आज से मैंने तीनों लोकों का त्याग कर दिया है <span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>(ओम् भू: संन्यस्तं मया</strong></span></span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओं भुव: संन्यस्तं मया</span>, </strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>ओं स्व: संन्यस्तं मया)</strong></span> अर्थात् तीनों लोकों के जड़ चेतन सभी पदार्थों से अपने विशेष सम्बन्ध का मैंने परित्याग कर दिया है। कठिनाई विशेष में ही होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामान्य सम्बन्धों में कोई कठिनाई नहीं होती। तथा वहीं यह एक दूसरा वाक्य भी पढा है- </span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पुत्रैषणा वित्तैषणा लोकैषणा मया परित्यक्ता</span></strong></span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मैंने आज तीनों एषणाओं के त्याग करने का निश्चय कर लिया है। मैं किसी भी वस्तु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिस्थिति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घटना से किसी प्रकार का सुख लेना नहीं चाहूँगा। आज से मेरी किसी के साथ कोई स्पर्धा नहीं रही। मैं किसी के लिये दूसरा बनकर नहीं जीऊँगा। क्योंकि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">द्वितीयाद् वै भयं भवति</span>’ (<span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह. 1.4.2)। पिता के लिये पुत्र या गुरु के लिये शिष्य दूसरा नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत परस्पर कोई भय नहीं होता।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">संसार में सब के सब लोग अपनी-अपनी विशिष्ट कामनाओं को पूरा करने में लगे हुये हैं। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">संसार</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">एक ऐसी दौड़ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें दौडऩे के लिये तो सभी ने भाग लिया हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब </span>Participants<span lang="hi" xml:lang="hi"> हैं। सब चाहते हैं कि हम सबसे आगे आयें। क्योंकि आगे आने वाले या </span>Top-twenty, Top fifty or Top-Hundred<span lang="hi" xml:lang="hi"> में जिनका नाम आता है उनको दूसरों से अधिक सुख-सुविधायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरों से अधिक सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरों से अधिक शक्ति </span>(Power) <span lang="hi" xml:lang="hi">मिलती है। यही तो मनुष्य चाहता है। इस प्रक्रिया में सब एक दूसरे से भयभीत रहते हैं कि इस या उस के कारण कहीं लिस्ट से नाम न कट जाये। जब व्यक्ति अपनी इच्छा से अपने आपको इस दौड़ से बाहर कर लेता है तो वह स्वयं दूसरों से निर्भय हो जाता है और दूसरे उससे। संसार को सामने रखकर यदि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">संन्यास</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को समझा जाये तो संन्यास एक ऐसी स्थिति का नाम है- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ न जीने की कोई इच्छा है और न ही मरने का भय</span>’, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसार में तो यह दोनों भाई-बहन की तरह साथ-साथ रहते हैं। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि संन्यासी एक अकर्मण्य का जीवन जीता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म से विमुख हो जाता है। विमुखता कामना से होती है न कि कर्म से। कामना के रहते कामना की पूर्ति में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सुख</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">होता है अपूर्ति में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">दु:ख</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">और अपूर्ति की सम्भावना में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भय</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। इसीलिये मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि सुख और भय एक सिक्के के दो पहलुओं की तरह हैं जिसको एक तरफ से देखें तो </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सुख</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">लिखा हुआ मिलता है और दूसरी तरफ से देखें तो </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भय</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वेद में कहा है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">तमेव विद्वान् न बिभाय मृत्यो:</span>’ (</strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>ऋग्.)</strong></span> अर्थात् आत्मा की नित्यता को जो जान लेता है वह उस मृत्यु से निर्भय हो जाता है जिससे सब भयभीत रहते हैं। हमें अपने लिये या अपनों के लिये बहुत कुछ करना होता है और मृत्यु आकर बीच में ही हस्तक्षेप करती है तो स्वाभाविक है कि भय आएगा ही। किन्तु जब कोई इच्छा ही शेष नहीं बची तो मृत्यु का आगमन आज हो या हजार साल बाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उससे क्या फर्क पड़ता है। इस विवेचन से भी यही पता चलता है कि मृत्यु जिसको सर्वहर (सब कुछ का हरण करने वाला) कहा गया है उससे भी व्यक्ति निर्भय उसी अवस्था में होता है जब उसे कुछ चाह नहीं रहती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाह्य इच्छायें शेष नहीं रहती और साथ में स्वयं के अस्तित्व को सदा नित्य देख रहा हो। अर्थात् चाहे कोई व्यक्ति हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई परिस्थिति विशेष हो या मृत्यु हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कामना है तो उसके बाधित होने की सम्भावना में भय तो होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसको कोई नहीं रोक सकता। स्वयं निर्भय होना हो तो कामना छोड़ दें। दूसरों को अभय करना हो तो उन्हें अपनी ओर से आश्वस्त कर दिया जाये कि मैं तुम्हारी कामनाओं में बाधक नहीं बनूँगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुम्हारे रास्ते में रोड़ा बनकर उपस्थित नहीं होऊँगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं तुम्हारे सुखों को थोड़ा-सा भी नहीं छीनूँगा।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु समाज में तो ऐसा देखने में आता है कि कितने ही ऐसे महापुरुष हुये हैं जिन्होंने सबको अभयदान दिया हुआ था किन्तु फिर भी लोगों ने उनको जहर दे दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मार डाला इत्यादि। यह भी तो यही प्रमाणित करता है कि उन अज्ञानियों ने ऐसा समझ लिया कि अमुक व्यक्ति हमारे जीवन में खतरा है। वे तो सारी मानव जाति को सामने रखकर काम कर रहे थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानवता के रहनुमा थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु कुछ लोगों ने ऐसा विपरीत समझ लिया कि इस व्यक्ति के रहते हमारा तो अस्तित्व ही खत्म हो जायेगा। अत: उन्होंने उन महापुरुषों के विरोध में ऐसा क्रूर कदम उठाया। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी-किसी महापुरुष की ऐसी भूमिका होती है कि वह मानव जाति में जो विकृतियाँ आ जाती हैं उन्हें ठीक करने के लिये या उनकी चीरफाड़ करने के लिये आगे आ जाते हैं। स्वार्थी लोगों की बुद्धि यह देख नहीं पाती। अज्ञानवश ऐसा होता है। अत: अज्ञानी व स्वार्थी लोग उन-उन महापुरुषों के वैरी हो जाते हैं। ऐसी घटनाओं में भी महापुरुष तो निर्भय ही रहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे कभी भी भयभीत नहीं होते। क्योंकि व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो वे किसी के साथ गलत नहीं कर रहे होते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और न ही अपनी किसी व्यक्तिगत इच्छा को पूरा कर रहे होते हैं। सो </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कामना नहीं तो भय भी नहीं</span>Ó <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सूत्र तो यहाँ भी अखण्डित रहता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">समाज से या स्टेट से व्यक्ति को भय लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह तो समझ में आता है क्योंकि वहाँ व्यक्ति का अपमान होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सजा मिलती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु शास्त्र से कुछ विरुद्ध आचरण करने में अथवा अपने ज्ञान के विपरीत आचरण में भी भय क्यों लगता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिये कि वह व्यक्ति ऐसा मानता है या जानता है कि तेरा अमूल्य मानव जीवन नष्ट हो रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निश्चित ही अगले जन्म में तुझे इसका दण्ड मिलेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह अद्भुत अवसर तेरे हाथ से सदा-सदा के लिये छिन जायेगा इत्यादि। अपने विश्वास या अपने ज्ञान के विरुद्ध आचरण करते हुये को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भय</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">और करने पर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चाताप</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">यह मंगलमय विधान की ओर से मनुष्य के लिये प्रदत्त एक सुन्दर व्यवस्था है कि मनुष्य उस अवस्था को प्राप्त हो जाये जहाँ नित्य नवरस है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी प्रकार का अभाव नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई दु:ख नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ किसी प्रकार की जड़ता नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ किञ्चित् भी शक्तिहीनता नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सदा आनन्द ही आनन्द है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिन्मय जीवन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण स्वाधीनता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समूचे अस्तित्व के प्रति सहृदयता व कृतज्ञता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परमशान्ति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिरविश्राम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमृत से भरा हुआ स्वर्णकलश है इत्यादि।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यह कितनी सुखद स्थिति है कि व्यक्ति सदा निर्भय रहे और दूसरों को भी उससे भय न हो। भगवान् ने गीता में इस स्थिति का वर्णन इन शब्दों में किया है- </span><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">'<span lang="hi" xml:lang="hi">यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च य:</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">निर्वैर: सर्वभूतेषु य: स मामेति पाण्डव</span>’</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">।</span></strong> इसमें इतना ही समझना है- हमें अपनी ओर से निर्वैर स्थिति में रहना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी ओर से किसी को भय नहीं देना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्तिगत कामनाओं से शून्य होकर जीना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी के लिये आतंक नहीं बनना है। फिर भी कोई हम से भयभीत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दु:खी है तो व्यक्ति का अपना अज्ञान है किन्तु फिर भी एक साधक को तो उनके प्रति करुणा ही रखनी है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सार बात यह है कि ईश्वरीय विधान में पूर्ण विश्वास हो तो भय से मुक्ति पायी जा सकती है या फिर अपनी अनश्वरता (नित्यता) का ठीक अनुभव हो गया हो तो भी। हम सभी प्रकार की कामनाओं के त्याग से भी भयमुक्त हो जाते हैं। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">है</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के प्रति समर्पण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो है उसकी सहज स्वीकायर्ता भयमुक्त कर देती है। विधान में विश्वास व्यक्ति को इसलिये निर्भय बना देता है कि मैं कुछ भी गलत करुँगा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे साथ भी कुछ गलत होगा नहीं। दूसरे भी उस व्यक्ति से क्यों भयभीत होंगे जिस ने किसी के भी जीवन में व्यक्तिगत हस्तक्षेप या उनके साथ स्पर्धा या लौकिक इच्छाओं को सदा के लिये छोड़ दिया है। अर्थात् किसी के साथ भी किसी प्रकार का संघर्ष न करने का निश्चय कर लिया है। एक राजनेता को किसी उत्तम खिलाड़ी से कभी भय नहीं होता बेशक वह ओलम्पिक स्वर्णपदक विजेता ही हो। हाँ! यदि उसे यह मालूम पड़ जाये कि यह खिलाड़ी बहुत लोकप्रिय है और अब राजनीति में आ रहा है तो तत्काल भय आरम्भ हो जायेगा।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संन्यास का अर्थ है- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">जागना</span>’</strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi">। अपनी अशुभ प्रवृत्तियों (मनसा-वाचा-कर्मणा)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने अशुुभ संस्कार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशुभ अभ्यासों के प्रति सचेत हो जाना ही यहाँ जागने से तात्पर्य है। जीवन के इस सतत प्रवाह में कभी तो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं तो पूर्ण विराम  </span>(Full Stop)<span lang="hi" xml:lang="hi"> लगना चाहिये। अनजाने में जो कुछ होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी ज्यादा चिन्ता नहीं करनी चाहिये। छोटे बच्चे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चीटियों ने उनका क्या बिगाड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु आराम से खेल-खेल में उनको मारते रहते हैं। किन्तु समझ आने पर भी यह खेल चलता रहे तो कितना दु:खद है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कितनी शोचनीय घटना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कितनी बेहोशी है। अत: साधक! सावधान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य जीवन रूपी इस महान् अवसर को हाथ से निकलने नहीं देना है। स्वयं जागना और फिर सोये हुये अपने साथियों को जगाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी में जीवन का सौभाग्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन की धन्यता छुपी है। प्रकृति माँ ने कृपा करके हमें यह अमूल्य उपहार दिया है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अन्त भला सो भला</span>’</strong></span> <span lang="hi" xml:lang="hi">यह उक्ति है तो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु विचारना यह है कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अन्त</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">का क्या पता कब आ जाये। वह तो पूर्णरूप से अनिश्चय के गर्भ में रहता है। हमें करना यह है कि जिस समय हमें होश आये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रारब्धवश स्वयं आ जाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी तेज धक्के से या तेज झटके से आ जाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी करुणामय गुरु के प्रेम पूर्ण दृष्टिपात से आ जाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस दयालु की किसी अहैतुकी अन्त:प्रेरणा से आ जाये। </span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    वह होश (आत्म-जागरण) फिर अज्ञान निद्रा में न बदले। यही सच्चा पुरुषार्थ है। यह जो सुनने में आता है कि व्यक्ति रोता हुआ संसार में आता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु उसके द्वारा जीवन का सचमुच सम्मान किया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह इस बात से प्रमाणित होगा कि वह हँसता हुआ यहाँ से जाये। हजार भूलें करने पर भी यदि आँखे बन्द होने से पहले-पहले प्रभु में अविचल स्थिति हो गई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मस्थ या स्वरूपस्थ हो गये तो सचमुच उन भूलों का कोई अर्थ नहीं है। समस्त दु:खों से मुक्ति का तो एकमात्र उपाय है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मबोध</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2018</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1995/samast-dukhon-se-mukti-ka-marg-atmbodh</link>
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                <pubDate>Sun, 01 Apr 2018 21:52:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अमेरिकी पत्रिका 'फोब्र्स’ की सूची में श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज को मिला देश में  14वाँ  स्थान</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वविख्यात अमेरिकी पत्रिका फोब्र्स प्रतिवर्ष प्रभावशाली अरबपतियों की सूची प्रकाशित करती है। गत वर्ष पत्रिका के अनुसार श्रद्धेय आचार्यश्री को देश में 19वाँ स्थान मिला था। इस वर्ष आचार्यश्री ने ५ पायदान की  लम्बी छलांग लगाते हुए देश में 14वाँ स्थान अर्जित किया है वहीं पर विश्व में आचार्यश्री का स्थान 274वाँ रहा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी ने पतंजलि आयुर्वेद की गुणवत्तायुक्त उपभोक्ता वस्तुओं की तेजी से बढ़ती माँग से अपना यह स्थान बनाया है। कम्पनी </span>1.65<span lang="hi" xml:lang="hi"> अरब डॉलर के वार्षिक राजस्व के साथ पतंजलि हर्बल टूथपेस्ट और कॉस्मेटिक्स से नूडल्स और जैम तक सब कुछ बनाती है। ऑनलाइन बिक्री</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1996/ameriki-patrika-forbes-ki-suchi-me-shradheya-acharya-balkrishna-ji-maharaj-ko-mila-desh-me-14van-sthan"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-08/412.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वविख्यात अमेरिकी पत्रिका फोब्र्स प्रतिवर्ष प्रभावशाली अरबपतियों की सूची प्रकाशित करती है। गत वर्ष पत्रिका के अनुसार श्रद्धेय आचार्यश्री को देश में 19वाँ स्थान मिला था। इस वर्ष आचार्यश्री ने ५ पायदान की  लम्बी छलांग लगाते हुए देश में 14वाँ स्थान अर्जित किया है वहीं पर विश्व में आचार्यश्री का स्थान 274वाँ रहा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी ने पतंजलि आयुर्वेद की गुणवत्तायुक्त उपभोक्ता वस्तुओं की तेजी से बढ़ती माँग से अपना यह स्थान बनाया है। कम्पनी </span>1.65<span lang="hi" xml:lang="hi"> अरब डॉलर के वार्षिक राजस्व के साथ पतंजलि हर्बल टूथपेस्ट और कॉस्मेटिक्स से नूडल्स और जैम तक सब कुछ बनाती है। ऑनलाइन बिक्री बढ़ाने के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि ने हाल ही में कई ई-कॉमर्स दिग्गजों जैसे एमेजॉन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फ्लिपकार्ट और बिगबास्केट के साथ समझौता किया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धेय आचार्यश्री का कहना है कि कम्पनी का संचालन राष्ट्रसेवा के लिए है। हम कम्पनी के लाभांश का १०० प्रतिशत चैरिटी में व्यय करने हेतु संकल्पित हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग सम्पूर्ण विश्व को भारत के ऋषियों की देन है। महर्षि पतंजलि ने मोक्ष कारक योग साधना को सुव्यवस्थित ढंग़ से योग दर्शन के ४ पादों में वर्णित किया है। योग विद्या अपने भीतर जीवन की सभी समस्याओं का समाधान एवं सभी प्रश्नों के उत्तर लिये हुए है। इस गुप्त एवं गुह्य ज्ञान को आदि काल से शिष्य अपनी गुरु परम्परा से प्राप्त करते आ रहे हैं और अपने शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन व बुद्धि का बल बढ़ाकर भौतिक क्षेत्र में लोकहित के बड़े-बड़े कार्य सम्पादित करते रहे हैं  और आत्मोन्नति के शिखर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मोक्ष</span>’  <span lang="hi" xml:lang="hi">को भी प्राप्त करते रहे हैं। आज के युग में परम पूज्य स्वामी जी महाराज इसके साक्षात् जीवन्त उदाहरण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने गुरु परम्परा से योग की शिक्षा प्राप्त करके लोकहित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोकसंग्रह के लिए देश-विदेश में सर्व कल्याणकारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सार्वभौमिक एवं पंथनिरपेक्ष भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया और कर रहे है। भारतीय मोक्ष विद्या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का लोहा आज पूरा विश्व मान रहा है जिसका श्रेय हमारे कोटि-कोटि ऋषि-मुनियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान के योगी महापुरुषों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग साधक एवं प्रचारक भाई-बहनों के साथ-साथ भारतीय वर्तमान प्रधानमंत्री श्री मोदी जी को जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने यू.एन.ओ में भारी मतों से २१ जून को विश्व योग दिवस के रूप में मनाने का सफल प्रस्ताव पारित किया और वे  स्वयं भी अपने जीवन में योग को उच्च महत्त्व देते हैं। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्था समाचार</category>
                                            <category>2018</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Apr 2018 21:50:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दावोस तक पतंजलि की योग यात्रा</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:right;" align="right">-<span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भरद्वाज</span></h5>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1997/davos-tak-patanjali-ki-yog-yatra"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-08/76.jpg" alt=""></a><br /><table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#BA372A;border-color:#BA372A;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(186,55,42);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(255,255,255);"><strong>सम्पूर्ण विश्व को भारत के ऋषियों की देन है। महर्षि पतंजलि ने मोक्ष कारक योग साधना को सुव्यवस्थित ढंग़ से योग दर्शन के ४ पादों में वर्णित किया है। योग विद्या अपने भीतर जीवन की सभी समस्याओं का समाधान एवं सभी प्रश्नों के उत्तर लिये हुए है। इस गुप्त एवं गुह्य ज्ञान को आदि काल से शिष्य अपनी गुरु परम्परा से प्राप्त करते आ रहे हैं और अपने शरीर, मन व बुद्धि का बल बढ़ाकर भौतिक क्षेत्र में लोकहित के बड़े-बड़े कार्य सम्पादित करते रहे हैं  और आत्मोन्नति के शिखर ‘मोक्ष’  को भी प्राप्त करते रहे हैं। आज के युग में परम पूज्य स्वामी जी महाराज इसके साक्षात् जीवन्त उदाहरण है, जिन्होंने गुरु परम्परा से योग की शिक्षा प्राप्त करके लोकहित, लोकसंग्रह के लिए देश-विदेश में सर्व कल्याणकारी, वैज्ञानिक, सार्वभौमिक एवं पंथनिरपेक्ष भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया और कर रहे है। भारतीय मोक्ष विद्या ‘योग’ का लोहा आज पूरा विश्व मान रहा है जिसका श्रेय हमारे कोटि-कोटि ऋषि-मुनियों, वर्तमान के योगी महापुरुषों, योग साधक एवं प्रचारक भाई-बहनों के साथ-साथ भारतीय वर्तमान प्रधानमंत्री श्री मोदी जी को जाता है, जिन्होंने यू.एन.ओ में भारी मतों से २१ जून को विश्व योग दिवस के रूप में मनाने का सफल प्रस्ताव पारित किया और वे  स्वयं भी अपने जीवन में योग को उच्च महत्त्व देते हैं। </strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दु</span><span lang="hi" xml:lang="hi">नियां में आज श्रेष्ठ बुद्धिजीवी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनेता एवं अन्य सभी गणमान्य योग में व्यक्ति की बाह्य एवं आन्तरिक समस्याओं का समाधान देख रहे है। इसका ताजा उदाहरण तब दिखा जब विश्वमान्य संस्था </span>World Economic Forum<span lang="hi" xml:lang="hi"> ने अपनी तीन दिवसीय वार्षिक सभा में भारतीय संस्कृति को केन्द्र में रखकर योग को विशेष स्थान दिया। जहाँ जाने का अवसर स्वयं मुझे एवं वैदिक गुरुकुलम् के आचार्य स्मित को पूज्य स्वामी जी ने दिया। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुकुलीय दिनचर्या में तो हर ब्रह्मचारी प्रात: 4 बजे उठकर नित्यकर्म से निवृत्त होकर प्रतिदिन १.५ घण्टे योगाभ्यास करता है उसके पश्चात् यज्ञादि क्रिया सम्पन्न करके पठन-पाठन करता है। ब्रह्मचारी के दिनचर्या पालन करने मात्र से बहुत सी विद्याओं में पारङ्गतता प्राप्त होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कौशल विकास होता है और शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि का सामथ्र्य विकसित होता है। उसके भीतर राष्ट्र भक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मातृ-पितृ भक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विनम्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्ठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृतज्ञता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वीरता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शौर्य-पराक्रम और पुरुषार्थ आदि के दैवीय गुण जागृत हो जाते हैं।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-08/76.jpg" alt="76"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन्हीं योग्यताओं के कारण परम पूज्य स्वामी जी ने हमें यह अवसर दिया। उन्होंने कहा कि आपको वल्र्ड इकॉनोमिक फोरम के तीन दिवसीय वार्षिक सभा में योग प्रशिक्षण के लिए जाना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ आपको हजारों की संख्या में आए  </span>CEOs<span lang="hi" xml:lang="hi"> को बर्फ में भी योग कराना होगा। इसके लिए योग्यता थी अंग्रेजी भाषा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बलिष्ठ शरीर और योगाभ्यास का ज्ञान जो कि तीनों ही हमारे पास थी। यह पहला अवसर था कि किसी बड़े अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन में योग प्रशिक्षण देने कोई गुरुकुल का ब्रह्मचारी बाहर गया हो। इस अवसर की महत्ता को देखकर और स्वयं इस कार्य का निमित्त बनने पर मन हर्षित और गौरवान्वित हुआ। स्वामी जी ने हमें वहाँ होने वाले ३ दिनों के ६ योग सत्रों का प्रारूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाषा शैली एवं अन्य महत्त्वपूर्ण मार्गदर्शन दिया और हमें आश्वस्त किया कि मुझे पूरा विश्वास है कि आप दावोस में अच्छा करेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा आशीर्वाद है।</span></h5>
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#F8CAC6;border-color:#F8CAC6;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(248,202,198);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>ब्रह्मचारी के दिनचर्या पालन करने मात्र से बहुत सी विद्याओं में पारङ्गतता प्राप्त होती है, कौशल विकास होता है और शरीर, मन, बुद्धि का सामथ्र्य विकसित होता है। उसके भीतर राष्ट्र भक्ति, मातृ-पितृ भक्ति, दया, विनम्रता, श्रद्धा, निष्ठा, कृतज्ञता, वीरता, शौर्य-पराक्रम और पुुरुषार्थ आदि के दैवीय गुण जागृत हो जाते हैं।</strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य स्मित जी ने तो अपनी पंचवर्षीय स्नातक की शिक्षा ऑस्टे्रलिया से प्राप्त की उसके बाद उनकी उत्कृष्ट इच्छा भारतीय ज्ञान परम्परा में दीक्षित होकर इसी के प्रचार-प्रसार और गुरुजनों के सान्निध्य में जीवन समर्पित करने की हुई। ऐसा ही कुछ मेरा भी रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु विदेश यात्रा का मेरा यह पहला अवसर था। </span>World Economic Forum (WEF)<span lang="hi" xml:lang="hi"> का मुख्यालय स्विट्जरलैण्ड के शहर दावोस में है जहाँ हर साल भारी हिमपात और अतुलनीय प्राकृतिक सौन्दर्य के बीच जनवरी मास में ३ दिन के लिए वे अपनी वार्षिक सभा रखते हैं। जहाँ विश्व के सबसे अमीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकतवर नेता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभिनेता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व के अर्थशास्त्री और मीडिया के लोग एकत्रित होते हैं। इस साल वहाँ करीब २५०० बड़ी कम्पनियों के </span>CEOs, <span lang="hi" xml:lang="hi">कई देशों के प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति आये। यह सत्र और भी विशेष इसलिए हो गया था क्योंकि बीस साल बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया एवं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी वहाँ अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। साथ ही इस बार पतंजलि योगपीठ ने भी वहाँ योग का झण्डा गाड़ा। ऐसा करने वाली पतंजलि योगपीठ पहली संस्था बनी। जिसका निमंत्रण स्वयं </span>(WEF)<span lang="hi" xml:lang="hi"> के अधिकारियों ने पतंजलि योगपीठ को दिया। पूज्य स्वामी जी महाराज का आशीर्वाद और भारत माता को नमन करके हम २१ जनवरी को स्विट्जरलैण्ड के लिए रवाना हुए।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-08/77.jpg" alt="77"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फ्लाईट सुबह ५ बजे ज्यूरिक एयरपोर्ट पहुँची। यात्रा लगभग 19 घण्टे की रही। स्विस समय भारतीय समय से साढ़े चार घण्टे पीछे है। ज्यूरिक एयरपोर्ट से पाँच घण्टे की यात्रा तय करके हम निश्चित स्थान </span>(WEF)<span lang="hi" xml:lang="hi"> के रजिस्टे्रशन केन्द्र दावोस पहुँचे। जहाँ बस से उतरते ही सब हम दोनों को ही अचरज से देखते रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि उस समय वहाँ बर्फ गिर रही थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तापमान लगभग -</span>12<span lang="hi" xml:lang="hi">०</span>c <span lang="hi" xml:lang="hi">था और हम दोनों थे केवल एक पतंजलि की टी-शर्ट और उत्तरीकटि वस्त्र में। कई देखते ही रहे पर कुछ से रहा नहीं गया तो आकर पूछने भी लगे </span>Don't You Feel Cold? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या आपको ठण्डी नहीं लगती</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">हम विनोद से कह देते कि उतनी नहीं जितनी आपको लगती है। वहाँ बर्फबारी काफी तेज हो रही थी। दावोस एक छोटा शहर है जो यूरोप की मशहूर एल्प्स पहाडिय़ों से घिरा हुआ है। पहाडिय़ाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुकानें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गाडिय़ाँ आदि सब बर्फ की मोटी चादर से ढके हुये थे। प्रकृति का ऐसा मनोरम विहङ्गग दृश्य देखते ही बनता था। आवासीय व्यवस्था भी अति सुन्दर और सर्व सुविधा युक्त थी। ङ्खश्वस्न से जुड़ी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इन्वेस्ट इंडिया</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">नामक भारतीय संस्था के हम अतिथि थे। रात्रि आठ बजे सब विशिष्ट अतिथि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नेता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभिनेता</span>, CEOs, <span lang="hi" xml:lang="hi">मीडिया कर्मी आदि वहाँ </span>WEF <span lang="hi" xml:lang="hi">के कॉन्फे्रंस हॉल में एकत्रित हुए जहाँ उद्घाटन समारोह एवं भारतीय रात्रि भोज की व्यवस्था थी। हम दोनों आचार्य वहाँ पर गये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हॉल में चहल-पहल थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु हमारे अन्दर पूर्ण शान्ति थी। हमारा मन ध्येय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपरिचित जगह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपरिचित लोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपरिचित रीति-रिवाज सब का निरीक्षण कर रहा था। हम अपने ही परिधान में परिचय दे रहे थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक अनादि संस्कृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम और सौहार्द का। क्योंकि श्वेत वर्ण इन्हीं गुणों का परिचायक है। हम कार्यक्रम स्थल पर पहँुच ही रहे थे कि दूरदर्शन के संवाददाता और ऑल इंडिय़ा रेडियो कि रेडियोजॉकी हमसे मिले और एक साक्षात्कार </span>(interview) <span lang="hi" xml:lang="hi">का निवेदन किया। दूरदर्शन का साक्षात्कार लगभग २० मिनट तक चला। उन्होंने पूछा कि आप यहाँ अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर योग सत्रों का आयोजन करेंगे। आपको कैसा लग रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपका सत्र कहाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कब होगा और कौन-कौन आयेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या-क्या सिखाएंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग के लाभ इत्यादि कई प्रश्न पूछे। हमने बताया कि योग आज विश्व प्रसिद्ध है और भारत की शक्ति और पहचान बन गया है। योग आज जिस स्तर पर पहुँचा है। उसका मुख्य श्रेय परम पूज्य योगऋषि और हमारे गुरु स्वामी रामदेव जी महाराज को जाता है। यह उनके अखण्ड प्रचण्ड पुरुषार्थ का फल है और हमारे योगी प्रधानमंत्री आदरणीय मोदी जी का भी योग के विश्वव्यापी प्रचार-प्रसार में पूरा साथ और सहयोग रहा है। आज विश्व की जनता का सौभाग्य है कि योग का दिव्य ज्ञान उन तक सुलभता से प्रचार माध्यमों के द्वारा पहँुच रहा है। करोड़ों लोगों ने इसका लाभ लिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने तन से स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन से शान्त और प्रसन्नचित्त होकर भौतिक क्षेत्र में गतिशील होकर अत्यधिक उन्नति प्राप्त की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग प्रचारक बनकर लोक सेवा की और जीवन को सार्थक किया। लोगों में इस विद्या के प्रति रुचि और जिज्ञासा बढ़ी है। इसकी सम्भावनाओं को देखकर योग जीवन के सभी पहलुओं को चाहे वह आन्तरिक हो या बाह्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भौतिक हो या आध्यात्मिक हर प्रकार से मनुष्य जीवन और व्यक्तित्व को स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुंदर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आकर्षक और आदर्श बनाता है। योग ही एक ऐसा माध्यम है जो सूत्र रूप में सम्पूर्ण विश्व को एकत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व बधुत्व और सह-अस्तित्व की भावना से जोडऩे की शक्ति रखता है। इसी की प्रेरणा से व्यक्ति से व्यक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति से राष्ट्र और फिर राष्ट्र से राष्ट्र एक दूसरे का हित रखते हुए सर्वहित में अपनी-अपनी उन्नति करेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि राष्ट्र तभी पूर्ण उन्नति कर पायेगा जब पड़ोसी देश उसका साथ देंगे। शान्ति और सौहार्द के साथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्नति के मार्ग पर किसी एक को भी पीछे छोडऩा अन्यों के लिए भी घातक सिद्ध हो सकता है। दूसरों की उन्नति में भी हमारी परोक्ष उन्नति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब का साथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सबका विकास यह नारा तो अच्छा है परन्तु यह तभी संभव है जब सब योग के सूत्र से बँधें और अनुभव करें कि इस वैविध्य से भरे संसार में एक ही ब्रह्म चेतना सर्वत्र व्याप्त है। सब को ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेरणा और प्रकाश दे रही है। मनुष्य जाति भी एक है अतएव किसको छोडऩा और किससे आगे निकलना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह भावना जब सभी में होगी तभी सब का साझा भविष्य सुन्दर और सफल होगा अन्यथा जो हो रहा है  वह अनन्त काल तक भी नहीं रुकेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चलता ही रहेगा क्योंकि अध्यात्म के प्रकाश के बिना भौतिकता अन्धी ही रहेगी। निर्बल और दरिद्र राष्ट्र कभी सुखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्त और समृद्ध नहीं हो सकता है। वह केवल नारे लगा सकता है न्याय पाने के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हक के लिए आन्दोलन कर सकता है या फिर उन्नत राष्ट्रों से रहम की भीख मांगता है और दलदल में घुसने के लिए। स्वामी जी एक बात सदैव अपने प्रवचनों में कहते हैं  कि राष्ट्रीय नागरिक सुखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुशल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्नत और समृद्ध होंगे तो राष्ट्र भी सुखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुशल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्नत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्ध और शक्तिशाली बनेगा और शक्तिशाली ही अपने राष्ट्र की अस्मिता और शान्ति बनाये रख सकता है। अन्यथा देश के बड़े नेता भी रोटी-पानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिजली की चिंता करते हुए दिखेंगे। WEF</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> की इस बार की थीम भी यही है कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">टूटे-फुटे विश्व में सबका साझा भविष्य</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। यह साझा भविष्य तभी सुरक्षित सम्भव है जब सब अपने को एक सूत्र से बंधा हुआ देखें जो अध्यात्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानवता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मा और इस सुरक्षित साझा भविष्य तक पहुँचने का मार्ग है योग। जरूरत है योग को अपने व्यक्तिगत जीवन में उतारने की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिदिन दिन की शुरूआत १ घण्टा योगाभ्यास और ध्यान (समयानुसार) और फिर दिनभर कर्मयोग करके जो प्राप्त हो उसमें सन्तुष्टि और अगले दिन फिर यही कार्य। इसे करने से दिखेगी योग की शक्ति इसी के प्रचारार्थ हम यहाँ आये है।  </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दूरदर्शन साक्षात्कार के बाद ऑल इण्डिया रेडियो से बातचीत हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लगभग सभी की नजरें हम पर ही थी क्योंकि एक तो हमारा पहनावा और दूसरा हमारा बेवाक देशीपन। </span>NDTV, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिन्दुस्तान  टाईमस </span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रिपब्लिक</span>, ANI, <span lang="hi" xml:lang="hi">इण्डिया न्यूज</span>, IBN, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज तक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इण्डिया टीवी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एबीपी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जी न्यूज आदि लगभग पन्द्रह न्यूज चैनलों ने हमारा साक्षात्कार लिया। एक पत्रकार ने हमसे पूछा कि यदि मोदी जी न होते तो क्या योग यहाँ तक पहुचता। हमने कहा कि क्यों नहीं पहुचता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोदी जी नहीं होते तो कोई और होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम न होते तो कोई और होता। इसके पीछे स्वामी जी जैसे हजारों महापुरुषों का पुरुषार्थ है और फिर यह काल प्रवाह किसी व्यक्ति पर निर्भर नहीं करता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह अपनी गति से चलता है और घटनाओं के निमित्त को स्वयं चुनता है। सभी पत्रकार साक्षात्कार से प्रसन्न और उत्साहित थे। उन्होंने कहा कि आप बहुत अच्छा बोलते है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमने कहा हम सत्य बोलते है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य नि:स्वार्थियों को स्वाभाविक रूप से कर्णप्रिय लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें हमारी नहीं अपने कानों की प्रशंसा कीजिए और हाँ यह भी सत्य है कि योग से व्यक्ति ऑल राउन्डर हो जाता है। माहौल खुशनुमा था जिसे हम और खुशनुमा बनाते चले गये। कई </span>WEF<span lang="hi" xml:lang="hi"> के स्वयं सेवी और विशिष्ट अतिथि भी हमसे हमारा कार्ड माँगते हम कहते हमारे पास तो जेब ही नहीं है और सब हँसने लगते परन्तु हम उनको प्राणायाम रहस्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार क्रान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद सिद्धान्त रहस्य आदि पुस्तकों की अंग्रेजी अनुवादित पुस्तकें और योग प्राणायाम आसन की </span>DVD<span lang="hi" xml:lang="hi"> अवश्य उपहार स्वरूप देते जिसे पाकर वे गद्गद् हो उठते और बारम्बार हमारा धन्यवाद और कृतज्ञता ज्ञापित करते। हमने वहाँ भारतीय भोजन का आनन्द लिया जो विशेष रूप से ताज होटल के शेफ स्टाफ ने बनाया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि इस बार </span>WEF<span lang="hi" xml:lang="hi"> ने भारतीयता को केन्द्र बिन्दु रखा था। वहाँ भी हमने अपनी गुरुकुलीय दिनचर्या के अनुसार सुबह उठकर नित्य कर्म कर प्राणायाम किया। घर काफी बड़ा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किचन था जहाँ सारा राशन उपलब्ध था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रूम के अन्दर आग जलाने को स्थान और चिमनी की भी व्यवस्था थी। उसे देखते ही मन में आया कि यहाँ तो यज्ञ हो सकता है। मैंने आचार्य स्मित से कहा हम यहाँ यज्ञ करेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्विट्जरलैण्ड में पहली बार वैदिक यज्ञ होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैदिक ऋचाएँ गूँजेंगी। उन्होंने कहा कि अच्छी बात है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर घृत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामग्री और पात्र कहाँ हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">पर अब कहाँ रुकने वाले थे उत्साही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ सोचा और कहा कुछ न कुछ तो कर ही लेंगे। किचन में गये एक प्लेट में चावल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिल और कुछ मीठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्य औषधीय पत्तियाँ मिलाकर हवन सामग्री बनाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक ग्लास में जल लिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आग जलाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेब काटकर प्रसाद बनाया और पूरी भावना से देव यज्ञ सम्पन्न किया। मन सन्तुष्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पवित्र और गौरवान्वित हुआ क्योंकि प्रभु भाव देखते हैं </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">रामहिं केवल </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> पियारा’।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> सुबह ६.३० पर हम  योग सत्र लेने के लिए निकले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रास्ते में फिर से सब की नजर हम पर ही रहती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ के लोग खुशदिल थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब नजरें मिलती तो मुस्कुराकर अभिवादन करते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हैलो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुडमार्निंग कहते। रास्ते की फिसलन से बचने के लिए वहाँ लोग जूते के नीचे कील लगा हुआ रबर का सोल पहनते हैं। एक बार गिरने के बाद हम भी पहनने लगे। टिकाने और हिमपात से बचने के लिए हमारे पास एक </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">छाता भी था। रास्ते पर जमी भारी बर्फ को हटाने के लिए बड़ी-बड़ी सरकारी गाडिय़ाँ लगती थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे छोटी मशीने वहाँ हर घर में थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घर के बाहर की बर्फ  हटाने के लिए। हम समय पर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इण्डिया इन्वेस्टमेंट सेन्टर’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पहुँचे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ योग कार्यक्रम था उसी समय आज तक न्यूज चैनल की टीम भी वहाँ पहुँची। उनके संवाददाता राहुल कवल जी ने कहा- कैसा हो यदि बाहर योग करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर इस कंपकंपी छुटा देने वाली सर्दी में क्या आप तैयार है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">हमने कहा  हाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम हमेशा तैयार रहते है। उस समय वहाँ बर्फीली हवाएँ चल रही थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो तापमान के और नीचे गिरा रही थी। सब ऊपर से नीचे तक ऊनी कपड़ो से ढके हुए थे। हमने धरती माता को नमन किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुवर को स्मरण किया और अपनी-अपनी योग मैट लेकर निकल गये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक जगह निश्चित करके योग मैट बिछायी और योग शुरू कर दिया। लगभग आधे घण्टे हमने वहाँ योगाभ्यास और साक्षात्कार दिया। राहुल जी ने पूछा क्या आपको ठण्ड नहीं लगती</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">हमने कहा कि योग के माध्यम से व्यक्ति अपने शुद्ध चिन्मय स्वरूप को जानता है तो उसकी सहनशक्ति स्वत: ही बढ़ जाती है। अत्यधिक ठण्ड और गर्मी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूख-प्यास आदि सहना योग के साधक के लिए बहुत स्थूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामान्य और अविशेष घटना है। योग का अन्तिम लक्ष्य है परम तत्व की प्राप्ति और उसमें नित्य स्थिति अर्थात् एकत्व। सब देख चकित थे और हमसे मिल कर अपनी शुभकामनाएँ दे रहे थे। बहुत से </span>CEOs<span lang="hi" xml:lang="hi">  ने योगग्राम और निरामयम् आकर प्राकृतिक चिकित्सा और योग प्राणायाम सीखने की इच्छा जताई। हमने सब को योग-साहित्य और आसन व प्राणायाम की </span>DVD<span lang="hi" xml:lang="hi"> उपहार स्वरूप भेंट दी। एक युवा बहन </span>Tijana Milogevic<span lang="hi" xml:lang="hi"> और उस जैसे कई युवा मिले जो भारत में आकार योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद की विद्या में पारङ्गत होकर पूरी दुनियां में इसके प्रचार-प्रसार के लिए कटिबद्ध थे। सबने पतंजलि योगपीठ हरिद्वार आकर सीखने की इच्छा प्रकट की। वहाँ की सरकारी व्यवस्था अति उत्तम थी। इतनी कठिन परिस्थितियों में भी बिजली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पानी की व्यवस्था निर्बाध गति से पहाड़ों के ऊपर भी उपलब्ध थी। वह भी साल के ३६५ दिन और २४ घण्टे। दुकानों में सब्जियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राशन आदि सारी दैनिक दिनचर्या की वस्तुएँ उपलब्ध थी। बस यहाँ से थोड़ी महंगी थी और चाहे कितनी भी बर्फबारी हो जाए ट्रेन को पाँच बजे निकलना है तो ५ बजकर २ मिनट नहीं होता अर्थात सिस्टम अत्यधिक शुद्ध और आदर्श। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे तीन दिन में कुल छ: सत्र हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक सुबह सात बजे एवं दूसरा सायंकाल चार बजे। सत्र पैंतालिस मिनट के होते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें हम शिथिलीकरण के अभ्यास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य नमस्कार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोगानुसार आसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम और ध्यान कराया। योग सत्रों का समापन हमने आध्यात्मिक और स्वस्थ जीवन जीने के सूत्र बताकर किया। योग करने वालों में कम्पनियों के </span>CEOs<span lang="hi" xml:lang="hi"> और वहाँ के स्थानीय लोग रहते थे। सभी को योग से नयी ऊर्जा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्साह और प्रेरणा मिली। सभी हमसे बहुत प्रसन्न थे। योग विद्या को सीखना और इसे अपने जीवन में उतारने के इच्छुक थे। वहाँ हमारा अन्तिम सत्र एल्प्स पहाड़ी के शिखर पर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">जेकब्ज हार्न’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नामक जगह पर रखा गया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ का तापमान-२०</span>0C<span lang="hi" xml:lang="hi"> था और ठण्डी हवाएँ उसे और कम कर रही थी। वहाँ से पूरे दावोस की बर्फ से ढकी हुई पहाडिय़ों क नज़ारा मोहक और अद्भुत था। जो देखते ही बनता था। वहां की कई यादें हमने अपने कैमरे में कैद की। अगली ही सुबह २६ को हम टे्रन से ज्यूरिक एयरपोर्ट पहुँचे और स्विट्जरलैण्ड की धरती को नमन करके अपने घर भारत आये। इस कार्य के निमित्त बनकर हम प्रसन्न थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु प्रसन्नता बनाएं रखने के लिए हमारा जीवन और हमारी कटिबद्धता है। भारत को विश्व गुरु बनाने की निष्काम और लोकहित की चाह मन में हो तो अवसर स्वयं आपके पास चलकर आते है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
                                            <category>2018</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Apr 2018 21:47:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अनुभूति आपकी</title>
                                    <description><![CDATA[<h4 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">निरामयम् की श्रेष्ठ चिकित्सा पद्धति से मिला आरोग्य</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मुकेश शुक्ला कम्पाला युगांडा से हूँ। मुझे हमेशा खाँसी बनी रहती थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वजन भी ज्यादा था और लंग्स में इन्फेक्शन था। मैं भारत का मूल निवासी हूँ तथा प्रति वर्ष भारत आता रहता हूँ। मैंने युगांडा में अपनी परेशानियों के लिए बहुत से ट्रीटमेंट लिये और मेडिसिन ली लेकिन हमेशा टेम्परेरी रिलीफ  मिला।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब मैं इस बार भारत आया तो मैंने देखा की स्वामीजी टीवी पर बोल रहे थे की हमारे यहाँ इसका स्थाई उपचार है तो मैंने सोचा क्यों न इस बार निरामयम्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगग्राम जाऊँ। मैं अपने परिवार</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1998/anubhuti-apki"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-08/592.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">निरामयम् की श्रेष्ठ चिकित्सा पद्धति से मिला आरोग्य</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मुकेश शुक्ला कम्पाला युगांडा से हूँ। मुझे हमेशा खाँसी बनी रहती थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वजन भी ज्यादा था और लंग्स में इन्फेक्शन था। मैं भारत का मूल निवासी हूँ तथा प्रति वर्ष भारत आता रहता हूँ। मैंने युगांडा में अपनी परेशानियों के लिए बहुत से ट्रीटमेंट लिये और मेडिसिन ली लेकिन हमेशा टेम्परेरी रिलीफ  मिला।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब मैं इस बार भारत आया तो मैंने देखा की स्वामीजी टीवी पर बोल रहे थे की हमारे यहाँ इसका स्थाई उपचार है तो मैंने सोचा क्यों न इस बार निरामयम्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगग्राम जाऊँ। मैं अपने परिवार के साथ आया और </span>7<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिन उपचार कराया। यहाँ पंचकर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">षटकर्म व प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति से मेरे शरीर का शुद्धिकरण किया गया। साथ ही योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम व ध्यान आदि से मुझे अत्यधिक लाभ मिला। निरामयम् का डाइट प्लान भी बहुत अच्छा है। रोगी को भोजन रोग के अनुसार दिया जाता है। उपचार के बाद मेरा वजन भी कम हुआ और मेरे परिवार ने भी स्वास्थ्य लाभ लिया। पहले मुझे विश्वास नहीं था कि प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति इतनी चमत्कारी है। </span></h5>
<h5 style="text-align:right;"> <span lang="hi" xml:lang="hi">भवदीय </span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">मुकेश शुक्ला </span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">कम्पाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युगाण्डा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h4 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">षट्कर्म चिकित्सा में है मधुमेह का निदान</span></strong></span></h4>
<p><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-08/691.jpg" alt="69"></img></span></strong></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मधुमेह रोगी हूँ। जब मैं यहाँ आया तो मुझे इन्सुलीन लेना पड़ता था। पतंजलि के योग एवं षट्कर्म विभाग में शोधन क्रियाओं तथा ध्यान से मुझे आशातीत लाभ हुआ। पतंजलि षट्कर्म विभाग की शोधन क्रियाओं में मुझे जलनेति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुञ्जर क्रिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शंख प्रक्षालन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान में त्राटक व योगनिद्रा तथा एक्युप्रेशर कराया गया। उपचार के उपरान्त मुझे इन्सुलीन से भी मुक्ति मिल गई। डॉ. सचिन त्यागी जी द्वारा निर्दिष्ट उचित दिनचर्या तथा खान-पान से अब मेरा शुगर लेवल कन्ट्रोल में है। अब मैं स्वयं को पूर्ण स्वस्थ अनुभव कर रहा हूँ।  </span></h5>
<h5 style="text-align:right;"> <span lang="hi" xml:lang="hi">भवदीय</span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्धराज पढ़ारिया</span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">मुम्बई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महाराष्ट्र।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>दिव्य अनुभूति</category>
                                            <category>2018</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Apr 2018 21:45:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>स्वास्थ्य के प्रसंग में महत्वपूर्ण तथ्य</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य विजयपाल प्रचेता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतञ्जलि योगपीठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार</span></h5>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1999/swasthya-ke-prasang-me-mahtvapurn-tathya"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-08/572.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">च</span><span lang="hi" xml:lang="hi">रकसंहिता आयुर्वेद का प्रमुख ग्रन्थ है। यह ऋषि परम्परा की चिरकाल से अनुभूत ज्ञानराशि का भण्डार है। इसमें आयुर्वेद एवं जीवनदर्शन विषयक अमूल्य शिक्षारत्न भरे पड़े हैं। चरकसंहिता के सूत्रस्थान के </span>25<span lang="hi" xml:lang="hi">वें अध्याय में रोगों के मूल कारण पर विचार कर निश्चित किया है कि अहितकारी आहार ही रोगों का मूल कारण है- </span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हिताहारोपयोग एव पुरुषस्य वृद्धिकरो भवति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहिताहारोपयोग: पुनव्र्याधिनिमित्तमिति।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right">(<span lang="hi" xml:lang="hi">चरक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूत्रस्थान-</span>25.31)</h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="right"> <span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ हितकारी आहार का स्वरूप इस प्रकार से बताया है कि जो आहार समावस्था में स्थित शरीर धातुओं को प्रकृतिस्थ रखता है तथा  विषम शरीर धातुओं को समावस्था में ला देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह हितकर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा इसके विपरीत अहितकर होता है। इसके उपरान्त वहाँ प्रश्न किया है कि ऐसे हितकारी आहार पदार्थ कौन से हैं जो सामान्यत: सबके लिए लाभकारी हों</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके उत्तर में आचार्य आत्रेय पुनर्वसु ऐसे पदार्थों को गिनाते हुए कहते हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बालि वाले धान्यों में लोहितशालि (लाल चावल) पथ्य की दृष्टि से सर्वोत्तम होते हैं। फली वाले धान्यों में मूंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जलों में अन्तरिक्ष से गिरा वर्षाजल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लवणों में सेंधा लवण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पत्रशाकों में जीवन्ती (डोडी) का शाक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घृतों में गाय का घृत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुग्धों में गाय का दुग्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेलों में तिल का तेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कन्दों में अदरक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फलों में मृद्वीका (मुनक्का) और ईख से बने पदार्थों में खाण्ड पथ्य की दृष्टि से सर्वोत्तम है। इसके अनन्तर आचार्य आत्रेय पुनर्वसु ऐसे अहितकारी पदार्थ भी गिनाते हैं जो अपथ्यता की दृष्टि से सबसे बढ़कर हैं तथा जिनसे सामान्यत: सभी को बचना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे इस प्रकार हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बालि वाले धान्यों में यवक (जई)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फली वाले धान्यों में उड़द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जलों में वर्षाकालीन  नदीजल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लवणों में ऊसर भूमि (साम्भर आदि) में बना लवण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शाकों में सरसों का शाक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घृतों में भेड़ का घृत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुग्धों में भेड़ का दुग्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फलों में लकुच (बड़हल)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कन्दों में आलू और ईख से बने पदार्थों में फाणित (राब) अपथ्यता की दृष्टि से सबसे बढ़कर हैं। अत: इनका अधिक सेवन हानिकारक हो सकता है। इसके आगे इसी अध्याय  में कुछ और सारगर्भित बातें बताई हैं । इनमें से कुछ चुनी हुई यहाँ प्रस्तुत हैं-</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्नं</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">वृत्तिकराणां</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रेष्ठम्</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"> <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर की वृत्ति (स्थिति) करने वालों में अन्न सबसे बढ़कर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् खानपान के बिना शरीर स्थिति (जीवन)  सम्भव नहीं है।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">क्षीरं</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवनीयानाम्</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">  <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवनी शक्ति देने वालों में दूध सर्वश्रेष्ठ है। संस्कृत में एक सुभाषित भी इस विषय में प्रसिद्ध है- सद्य: शक्तिकरं पय: अर्थात् दूध तुरन्त शक्ति देता है । </span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">मधु</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">श्लेष्मपित्तप्रशमनानाम्</span></span></strong></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">  <span lang="hi" xml:lang="hi">कफ  व पित्त का शमन करने वाले पदार्थों में मधु (शहद) सर्वश्रेष्ठ है ।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्पि</span><span lang="hi" xml:lang="hi">: </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वातपित्तप्रशमनानाम्</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">  <span lang="hi" xml:lang="hi">वात (वायु) और पित्त के प्रकोप को शान्त करने वालों पदार्थों में घृत सर्वोत्तम है।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तैलं वातश्लेष्मप्रशमनानाम्</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वात (वायु) और कफ  को शान्त करने वालों में तेल सर्वोत्तम है। तेलों में तिल का तेल सर्वश्रेष्ठ है।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वमनं श्लेष्महराणाम्</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर में जमे हुए कफ  को निकालने का सर्वश्रेष्ठ साधन वमन (उल्टी) करना है। </span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विरेचनं पित्तहराणाम्</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"> <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर में संचित अनावश्यक पित्त को निकालने का सर्वोत्तम उपाय विरेचन (जुलाब) लेना है। अर्थात् दस्त से संचित पित्त तुरन्त निकल जाता है ।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तिर्वातहराणाम्</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"> <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर में संचित अनावश्यक वात (वायु) को दूर करने का सर्वोत्तम उपाय बस्ति (गुदामार्ग से आयुर्वेद विधि से स्नेह/तेल) लेना है।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">व्यायाम: स्थैर्यकराणाम्</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर में दृढ़ता (बल) लाने वाले उपायों में व्यायाम करना सर्वश्रेष्ठ है। व्यायामशील व्यक्ति पर बुढ़ापे का अधिक असर नहीं होता तथा ढलती उम्र में भी उसके शरीर में दृढ़ता रहती है।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्षार: पुंस्त्वोपघातिनाम्</span></span></strong></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्षार (अत्यन्त खारी पदार्थ)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधिक लवण का सेवन पुंस्त्व या मर्दानी ताकत को नष्ट करने वालों में सबसे बढ़कर है।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अजाक्षीरं शोषघ्नस्तन्यसात्म्यरक्त-</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सांग्राहिकरक्तपित्तप्रशमनानाम्</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;">     <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षयरोग (तपेदिक) को नष्ट करने वाले पदार्थों में बकरी का दूध सर्वोत्तम है। इसी प्रकार माता के दूध की बराबरी करने वालों में तथा रक्तविकार का शमन करने वालों में भी बकरी का दूध सबसे बढ़कर है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">    <span lang="hi" xml:lang="hi">शिशुओं को माँ का दूध न मिलने की स्थिति में बकरी का दूध देना चाहिए। क्योंकि गाय भैंस के दूध की अपेक्षा बकरी का दूध हल्का होता है। वह माँ के दूध के समान सुपाच्य होता है। क्योंकि इसमें चिकनाई के कण माँ के दूध के समान छोटे-छोटे होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो बच्चों को आसानी से पच जाते हैं। गाय और भैंस के दूध में चिकनाई के कण बड़े बड़े होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्तन्यपायी शिशु इन्हें पचा नहीं पाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे  उनका हाजमा खराब हो जाता है। अत: पुराने समय में जिस शिशु की माँ का देहान्त हो जाता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे बकरी का दूध पिलाने का चलन था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो बहुत ही उचित एवं वैज्ञानिक था। भावप्रकाश में बकरी के दूध की प्रशंसा करते हुए लिखा है-</span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अजानामल्पकायत्वात् कटुतिक्तनिषेवणात्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>                                       स्तोकाम्बुपानाद् व्यायामात् सर्वरोगापहं पय:।।   (</strong></span>भावप्रकाश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुग्धवर्ग-</span>17)</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् बकरियों का शरीर हल्का होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे भागदौड़ करती रहती हैं और प्राय: कड़वे एवं तीखे पत्ते खाती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: उनका दूध सर्वरोगनाशक होता है।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आमलकं वय:स्थापनानाम्</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वय:स्थापक (बुढ़ापा रोकने वाले) पदार्थों में आंवला सर्वश्रेष्ठ है। आधुनिक खोज से भी यह सिद्ध हुआ कि आंवले में विटामिन-सी की मात्रा सर्वाधिक होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और यह आयु बढऩे से होने वाली कोशिकाओं की शिथिलता को रोकता है। अत: च्यवनप्राश से च्यवन ऋषि की वृद्धावस्था दूर हो गई थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह तथ्य आधुनिक अनुसन्धान द्वारा भी समर्थित है। केरल में आज भी आंवले के सेवन के साथ कुटीप्रवेश विधि द्वारा रसायन सेवन से वृद्धावस्था को दूर करने का प्रयोग सफलता पूर्वक किया जा रहा है।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हरीतकी पथ्यानाम्</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पथ्य पदार्थों में हरीतकी (हरड़)सर्वश्रेष्ठ है। अनुपान भेद से सब ऋतुओं में हरीतकी का सेवन करने से सब रोग दूर रहते हैं। हरीतकी के विषय में आयुर्वेद की यह उक्ति प्रसिद्ध है-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">माता यस्य गृहे नास्ति तस्य माता हरीतकी। कदाचित्  कुप्यति माता नोदरस्था हरीतकी।।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् जिसके माँ नहीं उसकी माँ हरीतकी है। माँ तो कभी बालक पर कुपित भी हो जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु उदरस्थित (पेट में गई) हरीतकी कभी कुपित नहीं होती अर्थात् हानि नहीं करती।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">अमृता वातहरदीपनीयविबन्धप्रशमनानाम्</span></span></strong></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वायु (वात) को दूर करने वाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूख जगाने वाले व कब्ज़ दूर करने वाले पदार्थों में अमृता (गिलोय की बेल) सबसे बढ़कर है। अमृता आयुर्वेद में वर्णित एक अद्भुत लता है। यह तीनों दोषों को सम अवस्था में लाने के कारण अतीव स्वास्थ्यप्रद व रसायन मानी जाती है।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">क्षीरघृताभ्यासो रसायनानाम्</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उचित मात्रा में दूध और घृत का नित्य सेवन करना रसायनों में सबसे बढ़कर है। आयुर्वेद में बुढ़ापा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुर्बलता व रोग दूर करने वाले भोज्य पदार्थ रसायन कहलाते हैं। ऐसे रसायनों में घृत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुग्ध सर्वोत्तम माने गये हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद के प्रसिद्ध विद्वान् लोलिम्बराज ने इसी तथ्य को प्रकारान्तर से निम्न श्लोक में कहा है-</span></h5>
<h5 style="text-align:center;">                <strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">सौभाग्यपुष्टिबलवीर्यविवर्धनानि कि सन्ति  नो  भुवि  बहूनि  रसायनानि। </span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">                <span lang="hi" xml:lang="hi">कन्दर्पवर्धिनि! परन्तु सिताज्ययुक्ताद् दुग्धादृते न मम कोऽपि मत: प्रयोग:।।</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">    <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् शरीर के सौभाग्य (सौन्दर्य)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुष्टि व बल वीर्य को बढ़ाने वाले बहुत से रसायन हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु मेरे मत में तो इन सबसे श्रेष्ठ खाण्ड व घृत मिला हुआ दूध ही है।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अतिमात्रशमनमामप्रदोषहेतूनाम्</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">   <span lang="hi" xml:lang="hi">आम (आंव) बनाने वाले कारणों में अधिक खाना सबसे बड़ा कारण है। </span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">यथाग्नि अभ्यवहारोऽग्निसन्धुक्षणानाम्</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"> <span lang="hi" xml:lang="hi">जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूख बढ़ाने वाले उपायों में सबसे बड़ा उपाय है भूख के अनुसार मितभोजन करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् अधिक न खाना।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">कालभोजनम् आरोग्यकराणाम्</span></span></strong></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समय पर भोजन करना आरोग्यकारक उपायों में सबसे श्रेष्ठ है।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वेगसन्धारणम् अनारोग्यकराणाम्</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अनारोग्य (अस्वास्थ्य) करने वाले कारणों में सबसे बड़ा कारण है मलमूत्रादि के वेग (दबाव) को रोकना। ऐसा करने से नाना रोग पैदा हो जाते हैं।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुभोजनं दुर्विपाककराणाम्</span></span></strong></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"> <span lang="hi" xml:lang="hi">अपच (बदहजमी) करने वाले कारणों में सबसे बढ़कर कारण है अधिक मात्रा में मिठाई आदि भारी भोजन करना।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अजीर्णाध्यशनं ग्रहणीदूषणानाम्</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पाचनतंत्र को विकृत करने वाले कारणों में अजीर्णाध्यशन अर्थात् पूर्वभोजन के पचे बिना ही ऊपर से भोजन कर लेना सबसे बड़ा कारण है। इससे वात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पित्त व कफ़-तीनों दोष प्रकुपित हो जाते हैं व नानाविध उदर रोग पैदा हो जाते हैं।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मचयर्म् आयुष्याणाम्</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आयु बढ़ाने वाले उपायों में ब्रह्मचर्य (सदाचारपूर्ण जीवन) सर्वोत्कृष्ट है। इस विषय में वाग्भट का निम्न कथन भी प्रसिद्ध है-     </span></h5>
<h5 style="text-align:center;">                <strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">धम्र्यं यशस्यमायुष्यं लोकद्वयरसायनम्। अनुमोदामहे ब्रह्मचर्यमेकान्तनिर्मलम्।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यश और आयु को बढ़ाने वाले तथा इहलोक और परलोक में सुखदायक ब्रह्मचर्य का हम सदा अनुमोदन (समर्थन) करते हैं।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विषादो रोगवर्धनानाम्</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"> <span lang="hi" xml:lang="hi">रोगी व्यक्ति के रोग को बढ़ाने वाले जो कारण हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनमें विषाद (तनाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हताशा)सबसे बड़ा कारण है ।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्नानं श्रमहराणाम्</span></span></strong></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">थकान दूर करने वाले साधनों में स्नान सबसे बढ़कर है। स्नान करने से रोमकूपों का मल दूर होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर को अधिक आक्सीजन मिलने से स्फ़ूर्ति आती है तथा भूख अच्छी लगती है । अत: प्रात: सायं स्नान करना बहुत आवश्यक व हितकारी है।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">निर्वृति: पुष्टिकराणाम्</span></span></strong></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर को पुष्ट करने वाले उपायों में निश्चिन्तता सबसे बढ़कर है। चरकसंहिता में अन्यत्र भी कहा है-</span></h5>
<h5 style="text-align:center;">               <span style="color:rgb(186,55,42);"> <strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अचिन्तनाच्च कार्याणां ध्रुवं सन्तर्पणेन च। स्वप्नप्रसंगाच्च नरो  वराह  इव  पुष्यति।। </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">                                                                                                                  (<span lang="hi" xml:lang="hi">चरक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूत्रस्थान-</span>21.34)</h5>
<h5 style="text-align:justify;">   <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् कार्यों की चिन्ता न करने से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूध दही आदि पौष्टिक भोजन  करने से व पर्याप्त नींद लेने से दुर्बल व्यक्ति भी सूअर की तरह हृष्ट-पुष्ट हो जाता है।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">मरुभूमिरारोग्यदेशानाम्</span></span></strong></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आरोग्यकारक देशों में मरुभूमि सर्वोत्तम है। मरुभूमि में अधिक नमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सडऩ व मक्खी-मच्छर न होने से रोग कम होते हैं। आयुर्वेद में अधिक जल वाले प्रदेश को अहितकर देशों में सबसे बढ़कर माना है।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">निर्देशकारित्वमातुरगुणानाम्</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रोगी व्यक्ति के गुणों में निर्देशकारिता (वैद्य के निर्देश का पालन) सबसे बड़ा गुण है।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नास्तिको वज्र्यानाम्</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महामुनि पाणिनि के अनुसार कर्मफल व इस पर आधारित पुनर्जन्म में विश्वास न करने वाला व्यक्ति नास्तिक कहलाता है। (अस्तिनास्तिदिष्टं मति:-अष्टाध्यायी-</span>4.4.60)<span lang="hi" xml:lang="hi">। किये हुए कर्म का फल भोगना पड़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस सिद्धान्त में नास्तिक व्यक्ति विश्वास नहीं करता। अत: वह निर्भय होकर बुरे से बुरा काम कर सकता है। ऐसा व्यक्ति त्याज्यों (छोडऩे योग्य जनों) में सर्वोपरि है। अर्थात् बुद्धि भ्रष्ट करने वाले ऐसे नास्तिक व्यक्ति से सर्वथा दूर रहना चाहिए।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">लौल्यं क्लेशकराणाम्</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लालच या अतिलोभ क्लेशकारणों में सबसे बढ़कर है। व्यवहार में यह विशेष रूप से देखने में आता है कि व्यक्ति लोभ के कारण संकटग्रस्त हो जाता है।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अव्यवसाय: कालातिपत्तिहेतूनाम्</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"> <span lang="hi" xml:lang="hi">अनिश्चय की स्थिति समय की बर्बादी करने वाला सबसे बड़ा कारण है। अर्थात् अनिश्चय की दशा में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लक्ष्य निर्धारित न होने की स्थिति में मनुष्य का अमूल्य समय व्यर्थ ही नष्ट होता रहता है। </span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">तद्विद्यसम्भाषा बुद्धिवर्धनानाम्</span></span></strong></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान बढ़ाने वाले उपायों में यह सबसे बढ़कर है कि जिस विषय में ज्ञान बढ़ाना चाहें उस विषय के विशेषज्ञ से वार्तालाप किया जाए। इससे सहज व शीघ्र ही तद्विषयक ज्ञान प्राप्त होता है।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य: शास्त्राधिगमहेतूनाम्</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">  <span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्रज्ञान के कारणों में आचार्य (गुरु) सबसे बढ़कर है।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेदोऽमृतानाम्</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">  <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन की विद्या देने वालों में आयुर्वेद सर्वोत्तम है। इसके अध्ययन से हम स्वस्थ सुखी व सात्त्विक जीवन की कला सीख लेते हैं।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">असद्ग्रहणं</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वाहितानाम्</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"> <span lang="hi" xml:lang="hi">मिथ्या दुराग्रह करना सर्वविध अहित करने वाले कारणों में सबसे बढ़कर है।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">संन्यास: सर्वसुखानाम्</span></span></strong></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सबसे अधिक सुखकारक उपायों में संन्यास (कामनाओं व काम्य कर्मों का त्याग) सबसे बढ़कर है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
                                            <category>2018</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Apr 2018 21:43:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>देश की बेटियों गुरुकुल तुम्हे बुला रहा</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मचारिणी साधना</span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैदिक कन्या गुरुकुलम्</span></h5>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2000/desh-ki-betiyan-gurukul-tumhe-bula-raha"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-08/062.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वति।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अप्रशस्ता इव स्मसि प्रशस्तिमम्ब नस्कृधि।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">(ऋग् २.४१.१६)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">‘हे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च कोटि का अध्यापन करने वाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अव्यक्त रहस्यमयी विद्याओं की कुशल उपदेशिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सद्विद्या से अतिशय प्रदीप्त करने वाली विदुषी! हमारे जीवन अप्रशस्त से हो गये हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तू अपने सदुपदेश से हमें प्रशस्ति प्रदान कर।</span>‘ <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसी आशा वैदिक युग में बेटियों से की जाती थी। हर शुभ कार्यों में बेटियों का स्थान सर्वोपरि था। बेटी का यज्ञ में अधिकार होना विवाद का विषय नहीं था। इसके अतिरिक्त ऋग्वेद के अन्य कई प्रसङ्ग भी यज्ञ में नारी का अधिकार सिद्ध करते हैं। ऋग्वेद २.६.५ में कहा है कि यदि यज्ञ करती हुई माता के पास घृत लेकर उसकी बेटी भी आ जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अध्वर्यु ऐसे ही प्रमुदित हो जाता है।  जैसे वर्षा होने पर जौ की खेती लहलहा उठती है वैदिक काल में बेटियों को देवी की तरह पूजा जाता था। इसका कारण है वैदिक शिक्षा और गुरुकुलीय परम्परा। वैदिक युग में बेटियों की शिक्षा श्रुति परम्परा पर आधारित थी न की मैकाले शिक्षा पद्धति पर गुरुकुल से बेटियां वेद शास्त्रों का अध्ययन कर समाज उत्थान का कार्य करती थी। इसी श्रुति परम्परा के ज्ञान से हमारे देश मे गार्गी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैत्रेयी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंबाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घोषा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सीता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुसूया जैसी बेटियों का निर्माण होता था।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मध्यकाल में बेटियों को इस विद्या से वंचित कर दिया गया। मुगलशासकों ने बेटियों को बस दासी बनाकर रखा तथा उनकी स्थिति बहुत ही दयनीय होने लगी। वेद का ज्ञान न होने के कारण उसे सत्य का ज्ञान नहीं हुआ और समाज के ठेकेदारों ने प्रथा चलाना शुरू किया। क्योंकि कोई अपने को कमजोर दिखाता है तब उस पर बलशाली शासन करता है। यही हमारी बहन बेटियों के साथ हुआ। उन्हें घर की चौखट से बाहर जाने का अधिकार नहीं दिया गया। उन्हें केवल भोग्या माना जाने लगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बन्द दीवारों में बेटियों की भावनाएँ कुण्ठित होने लगी तथा उस समय पाखण्डी पण्डित लोग पाराशरी और शीध्रबोध ग्रन्थों का प्रमाण देते हुये कहते थे- </span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">'<span lang="hi" xml:lang="hi">आरोहन्तु जनयो योनिम् अग्रे’</span> (<span lang="hi" xml:lang="hi">ऋग्वेद १०.१८.७)</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मन्त्र में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अग्रे’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के स्थान पर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अग्ने:’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पढ़कर तथा वेद ज्ञान विहीन बेटियों पर सती प्रथा को वेद का आदेश बताया तथा हमारी बेटियां इसे ईश्वर की आज्ञा मानकर पति के साथ चिता में कूद गई और अपनी प्राणों की आहूति दे बैठी। जबकि इस मन्त्र का शाब्दिक अर्थ है गृह प्रवेश में पत्नियाँ आगे-आगे चले। अग्रे को अग्ने: बता कर इन पाखण्डियों ने अर्थ का अनर्थ कर दिया। उसी प्रकार बाल विवाह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विधवा प्रथा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जौहर प्रथा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बलि प्रथा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दासी प्रथा जैसी कई प्रथाएँ हमारी बेटियों को झकझोरती रही और सत्य का ज्ञान न होने के कारण हमारी बेटियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस देश की कलियाँ उस प्रथा रूपी आग में झुलसती रही। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब तो जाग जाओ बेटियों! कब तक तुम्हें स्वामी दयानन्द आकर जगायेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कब तक राजा राममोहन राय सती प्रथा के विरोध का अलख जगायेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कब तक इस प्रथा की आग में झुलसती रहोगी। अगर हम मैकाले शिक्षा पद्धति का अनुसरण करती रही तो वह दिन दूर नहीं कि फिर से कोई पाखण्डी हम पर शासन करेगा। अभी समय है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने को पहचानो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी उस ऋषि परम्परा को पहचानो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पहन लो उन गहनों को जो तुम्हारे लिए परम पिता परमेश्वर ने गढ़े हैं। धारण करो उन गहनों को जो तुम्हारे पूर्वज ऋषियों ने तुम्हारे लिए बनाये हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुकुल परम्परा पर आधारित विद्या में ही वह ताकत है जो तुम्हें फिर से वैदिक युग के शिखर तक पहुँचा देगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुम्हें तुम्हारा खोया हुआ पद व सम्मान पुन: प्राप्त हो जायेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज के युग में हमारी जिन्दगी एक रेस बन चुकी है। इस भागम-भाग में हम अपना स्वरूप भूल चुके है। आत्म ज्ञान व तप साधना क्या होती है यह शब्द सबको नया सा लगता है। सत्य तो यह है कि नारी का सबसे बड़ा गहना उसका आत्मबल व तप साधना है। वह तप का ही परिणाम था जो महाप्रतापी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम उस बूढ़ी शबरी के चरणों पर गिर पड़े और कहने लगे- माँ मैं तुम्हारा दर्शन कर धन्य हो गया। उस बूढ़ी माँ शबरी में ऐसा क्या था जो भगवान् राम ने उनके चरण पकड़ लिये। उस माँ के पास न धन-दौलत थी न बैंक बैलेंस। बस था तो आत्मबल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यात्म ज्ञान व तप साधना। वही तप साधना थी माता अनुसूया की जो देवलोक से देवता भी उस माँ के पास खींचे चले आये और कहने लगे अपनी तप साधना से हमें अपना पुत्र बनाकर एक बार अपने आँचल में ले लो माँ। विदुषी स्त्री के वात्सल्य प्रेम का पान करने के लिए देवता भी तरसते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हम भी उस शबरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुसूया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गार्गी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऌऌमैत्रेयी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंबाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घोषा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैकेयी से कम नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम में भी वही शक्ति  है जो उन वीरांगनाओं में थी। बस देरी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे पहचानने की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे माँजने की। बस देरी है तो श्रुति परम्परा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैदिक परम्परा को अपनाने की। हम भी उसी भारत की बेटी है जहाँ आयरलैण्ड की लड़की भारत में आकर स्वामी विवेकानन्द की शिष्या बन कहती है मैं भारत की बेटी हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतवासी हूँ। जिसे हम भगिनी निवेदिता के नाम से जानते हैं। वह मुस्लिम धर्म की बेटी हजरत महल बेगम रणभूमि में अपनी वीरता प्रदर्शन कर कहती है धर्म मेरा मुस्लिम क्यों न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर मैं ऋषियों की बेटी हूँ। मेरी रगों में भारत का खून दौड़ रहा है। मैं एक क्षत्रिय हूँ। मैं भारत की बेटी हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाद में अवध की बेगम। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयरलैण्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तान की बेटियाँ भारत आकर गर्व से कहती है कि हम भारत की बेटियाँ हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महान् ऋषि-मुनि हमारे पूर्वज हैं। फिर हमने भारत में जन्म लिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत देश की भूमि रूपी गोद में खेले फिर क्यों भूल जाती है कि हमारी शिक्षा पद्धति मैकाले परम्परा नहीं श्रुति परम्परा है। हम भूल क्यों जाते है कि हमारा गहना बिंदिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चुड़ी-झुमका नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपनिषद्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्याकरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शन आदि हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यजुर्वेद ५.१० सूक्तमें कहा है-</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">'<span lang="hi" xml:lang="hi">सिँह्यसि सपत्नसाही देवेभ्य: कल्पस्व। सिँ्ह्यसि सपत्नसाही देवेभ्य: शुन्धस्व।</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">सिँह्यसि सपत्नसाही देवेभ्य: शुम्भस्व’</span> (<span lang="hi" xml:lang="hi">यजु. ५.१०)</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हे नारी! तू स्वयं को पहचान। तू शेरनी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तू शत्रु रूप मृगों को मर्दन करने वाली है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देवजनों के हितार्थ अपने अन्दर सामथ्र्य उत्पन्न कर। हे नारी! तू अविद्या आदि दोषों पर शेरनी की तरह टूटने वाली है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तू दिव्य गुणों के प्रचारार्थ स्वयं को शुद्ध कर। हे नारी! तू दुष्कर्मों एवं दुव्र्यसनों को शेरनी के समान विध्वस्त करने वाली है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धार्मिक जनों के हितार्थ स्वयं को दिव्य गुणों से अलङ्कृत कर। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आओ देश की बेटियों! गुरुकुल तुम्हें बुला रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन गहनों से अलंकृत करने के लिए जो तुम्हारे पिता परमात्मा ने तुम्हारे लिए गढ़े हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कदम बढ़ाओ उस गुरुकुल की ओर और धारण करो वेद शास्त्रों के ज्ञान को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि आने वाला युग फिर से वैदिक युग बन जाये। कर लो अपनी जड़े मजबूत ताकि आने वाली शाखा को कोई समाज का ठेकेदार हिला न पायें। गुरुकुल तुम्हारा स्वागत करता है। स्वामी दयानन्द जी के सपनों को अब स्वामी रामदेव जी महाराज पूरा कर रहे हैं। वो बुला रहे वैदिक युग की ओर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बस देरी है आपके एक कदम उठाने की।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2018</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Apr 2018 21:42:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पूज्यश्री स्वामी रामदेव जी महाराज व श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के अनुभूत प्रयोग</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">एक योग की प्रक्रिया और एक-एक जड़ी-बूटी पर हमारे पूर्वजों ने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि-मुनियों ने लाखों-करोड़ों वर्षों तक निरन्तर अनुसंधान किया। ऐसी ही कुछ जड़ी-बूटियाँ जिनका प्रयोग परम पूज्य स्वामी रामदेवजी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्य बालकृष्णजी ने लाखों-करोड़ों रोगियों पर किया व उन्हें लाभप्रद पाया और उनको औषध दर्शन आदि पुस्तकों में स्थान दिया। इनमें संचित कुछ नुस्खे जो महत्वपूर्ण हैं और योगसाधक अपने मन-मस्तिष्क में उन्हें ताजा रखना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी मांग को ध्यान में रखकर प्रस्तुत है:-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कॉलेस्ट्राल में पपीता अत्यन्त लाभकारी</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पपीता एन्टीऑक्सीडेन्ट तथा विटामिन-सी से परिपूर्ण होने के साथ ही फाईबर का भी अच्छा स्रोत</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2001/anubhut--prayog"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-08/682.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">एक योग की प्रक्रिया और एक-एक जड़ी-बूटी पर हमारे पूर्वजों ने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि-मुनियों ने लाखों-करोड़ों वर्षों तक निरन्तर अनुसंधान किया। ऐसी ही कुछ जड़ी-बूटियाँ जिनका प्रयोग परम पूज्य स्वामी रामदेवजी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्य बालकृष्णजी ने लाखों-करोड़ों रोगियों पर किया व उन्हें लाभप्रद पाया और उनको औषध दर्शन आदि पुस्तकों में स्थान दिया। इनमें संचित कुछ नुस्खे जो महत्वपूर्ण हैं और योगसाधक अपने मन-मस्तिष्क में उन्हें ताजा रखना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी मांग को ध्यान में रखकर प्रस्तुत है:-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कॉलेस्ट्राल में पपीता अत्यन्त लाभकारी</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पपीता एन्टीऑक्सीडेन्ट तथा विटामिन-सी से परिपूर्ण होने के साथ ही फाईबर का भी अच्छा स्रोत है। इसके सेवन से कॉलेस्ट्राल नियंत्रित होता है। प्रतिदिन पपीते का सेवन करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह अत्यन्त लाभदायक है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दाद दूर करे गेंदा</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गेंदे के फूलों का रस निकाल लें। दाद से प्रभावित स्थान पर यह रस प्रतिदिन दो से तीन बार लगाने से लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मोटापे की अचूक औषधि है जौ</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मोटापा घटाने के लिए भोजन में गेहूँ के स्थान पर जौ के आटे की रोटी का प्रयोग करें। जौ शरीर में चर्बी को कम करता है। चावल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आलू तथा तली हुई वस्तुओं के स्थान पर सलाद तथा हरी सब्जियों का सेवन करें। प्रतिदिन सुबह आधे घंटे सैर करने के साथ ही गुनगुने पानी में एक नींबू का रस तथा एक चम्मच शहद खाली पेट पीएँ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हरी सब्जियों में छिपा है कैंसर से बचाव</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हरी सब्जियों के सेवन से हृदय रोग का खतरा कम होने के साथ ही कैंसर से भी बचाव होता है। पचने में आसान होने के कारण ये पेट के गंभीर रोगों से भी हमें बचाती हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">उच्चरक्तचाप में प्रयोग करें मोटी सौंफ</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मोटी सौंफ पोटेशियम का अच्छा स्रोत है। यह उच्चरक्तचाप को सामान्य करती है। इसमें मौजूद फाइबर के कारण यह शरीर का वजन तथा कॉलेस्ट्राल भी नियंत्रित रखती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">शहद एक गुणकारी औषधि</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शहद स्वादिष्ट होने के साथ ही पोषक तत्वों से परिपूर्ण औषधि है। शहद के सेवन से शरीर में खून साफ रहता है तथा रक्तसंचरण भी सुचारू होता है। इसमें पाए जाने वाले एण्टीऑक्सीडेन्ट्स के कारण यह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाकर रोगों से हमारी रक्षा करता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि थकावट अनुभव कर रहे हों तो एक गिलास गुनगुने पानी में एक से दो चम्मच शहद मिलाकर पीने से बहुत लाभ होता है। इसे पीने से शरीर में स्फूर्ति का संचार होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय व अस्थियों को मजबूत करता है सेब</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सेब अत्यन्त गुणकारी है। हृदय रोगियों के लिए तो यह उत्तम है ही साथ ही अस्थियों को भी मजबूती प्रदान करता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि सेब का नियमित सेवन किया जाए तो हड्डियों के रोग जैसे ऑस्टियोपोरोसिस से बचाव होता है।  </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>दिव्य अनुभूति</category>
                                            <category>2018</category>
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                <pubDate>Sun, 01 Apr 2018 21:40:58 +0530</pubDate>
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