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                <title>जनवरी - योग संदेश</title>
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                <description>जनवरी RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...</title>
                                    <description><![CDATA[<h4 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मुक्ति का व्यावहारिक दर्शन व सिद्धान्त</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दि</span><span lang="hi" xml:lang="hi">व्य जीवन जीने के तीन सोपान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधन या उपाय हैं। योगी को जीवन में तीन सबसे बड़े कार्य करने होते हैं। एक आसन व व्यायाम से शरीर की शुद्धि तथा प्राणायाम व ध्यान से अन्त:करण या चित्त की शुद्धि एवं अष्टांग योग के अन्तर्गत यम-नियमों से आचरण की शुद्धि। जब एक मनुष्य की ये तीन शुद्धि हो जाती हैं तो वह मनुष्य देवता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महामानव या महापुरुष बन जाता है। उसका जीवन दिव्य जीवन बन जाता है। अर्थात् शारीरिक दु:ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक दु:ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदासी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परेशानी आदि</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2289/shashwat-pragya-janvary-2017"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/215.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मुक्ति का व्यावहारिक दर्शन व सिद्धान्त</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दि</span><span lang="hi" xml:lang="hi">व्य जीवन जीने के तीन सोपान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधन या उपाय हैं। योगी को जीवन में तीन सबसे बड़े कार्य करने होते हैं। एक आसन व व्यायाम से शरीर की शुद्धि तथा प्राणायाम व ध्यान से अन्त:करण या चित्त की शुद्धि एवं अष्टांग योग के अन्तर्गत यम-नियमों से आचरण की शुद्धि। जब एक मनुष्य की ये तीन शुद्धि हो जाती हैं तो वह मनुष्य देवता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महामानव या महापुरुष बन जाता है। उसका जीवन दिव्य जीवन बन जाता है। अर्थात् शारीरिक दु:ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक दु:ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदासी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परेशानी आदि तथा जीवन में आचरण स्वभाव आदि के दोष स्वरूप दूसरों से मिलने वाले समस्त दु:खों का नितान्त अभाव हो जाता है। सभी प्रकार के अज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दु:ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शोक आदि से मुक्त जीवन ही वास्तव में जीवन मुक्ति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही मुक्ति का मूल सिद्धांत है। जो व्यक्ति इस जीवन को फूलों की तरह खिलता हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हँसता हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुगन्धित (अपने सुकर्मों की गन्ध से) जीवन जीता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही जीवन मुक्त योगी है और इसी में जीवन मुक्त योगी को लक्षण हैं तथा वह निश्चित रूप से मरने के बाद भी मुक्त ही होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु जो यहाँ दु:ख से मुक्त नहीं हो पाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह मृत्यु के बाद मोक्ष को प्राप्त कर पायेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह कहा नहीं जा सकता।</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आसन व व्यायाम:</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">चिकित्सा विज्ञान के अब तक के अनुसंधान इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि कम से कम प्रत्येक स्वस्थ व्यक्ति को भी प्रतिदिन 20 से 30 मिनट आसन व व्यायाम अवश्य करना चाहिये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे कि रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुढ़ापा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दु:ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव व तनावजनित रोगादि से सर्वथा मुक्त रह सके।</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="right"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">गीता ६/७</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् जिसका आहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समस्त चेष्टाएं या क्रियाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निद्रा व जागरण सब युक्त हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उचित हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सन्तुलित हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके लिए यह योग दु:ख का नाशक बन जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कोई कितना ही बड़ा महापुरुष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तपस्वी क्यों न हो यदि वह आसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यायाम या आहार आदि की अवहेलना करेगा तो शारीरिक कष्टों से मुक्त हो ही नहीं सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस यथार्थ को झुठलाया नहीं जा सकता। अनेकों महापुरुषों का जीवन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्हें आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत ऊँचा जीवन जीते हुए भी आसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यायाम आदि के अभाव में सामान्य रोगों से लेकर कैन्सर आदि बड़े रोगों से उन्हें पीडि़त होना ही पड़ा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायामपूर्वक ध्यान:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिदिन कम से कम आधा घण्टा प्राणायाम पूर्वक ध्यान करने से अन्त:करण की शुद्धि होकर समाधि की प्राप्ति होती है। प्राणायाम का फल बताते हुए योगदर्शन में लिखा है-</span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">'<span lang="hi" xml:lang="hi">तत: क्षीयते प्रकाशावरणम्</span>’ (<span lang="hi" xml:lang="hi">योग. २/५२)</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणो ब्रह्मेति</span>’ (<span lang="hi" xml:lang="hi">उपनिषद्) अर्थात् जो संस्कार हमने क्रिया योग से तनू किये थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे ध्यान से समूल नष्ट हो जाते हैं। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योगाङ्गानुष्नादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिरावेवकख्याते:</span>’ (<span lang="hi" xml:lang="hi">योग. १/२८) अर्थात् प्राणायाम पूर्वक ध्यान से चित्त की अशुद्धि का क्षय होने पर ज्ञान का प्रकाश बढ़ता ही रहता है जब तक कि पूर्ण विवेक प्राप्त न हो जाये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम व ध्यान के अभ्यास के बिना किसी को भी इन्द्रिय व अन्त:करण की शुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन पर विजय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्तवृत्तियों का निरोध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मबोध व परमात्म तत्व का बोध हो ही नहीं सकता।</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अष्टांग योग के अन्तर्गत यम-नियमों का पालन:</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यम-नियमों का पालन करने से आत्मिक शुद्धि होती है। शुद्ध आत्मा का अन्तिम सत्य है आचरण की पवित्रता। </span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आचारहीन: न पुनन्ति वेदा:।</span>’ (</strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>ऋग्वेद)</strong></span> अर्थात् आचरण से हीन व्यक्ति को तो वेद की ऋचाएं भी पवित्र नहीं कर पाती हैं। आचरण की पवित्रता ही मनुष्य जीवन का परम पुरुषार्थ है।<span style="color:rgb(186,55,42);"> </span></span><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">'<span lang="hi" xml:lang="hi">अथ त्रिविधदु:खात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्त पुरुषार्थ:।</span>’</span></strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">आधिभौतिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आधिदैविक व आध्यात्मिक तीन प्रकार के दु:खों का सर्वथा अभाव ही परम पुरुषार्थ है। </span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।</span> </strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>स्वकर्मणा तमभ्यच्र्य सिद्धिं विन्दति मानव:।।</strong></span> (गीता १८/४६) अर्थात् जिससे सभी प्राणी जन्म लेते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे यह सारा जगत व्याप्त है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस परमात्मा की अपने कर्म से पूजा करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त कर लेता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">पवित्र मे शतायुषा</span>’ (<span lang="hi" xml:lang="hi">वेद) अर्थात् मैं पवित्रता पूर्वक जीते हुए सौ वर्ष की आयु को प्राप्त करूँ।</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">स्वे-स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर:।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">स्वकर्मनिरत: सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="right"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">गीता (१८/४५)</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अपने-अपने स्वकर्म में जो व्यक्ति लगा रहता है वह सिद्धि को प्राप्त कर लेता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अत: योगी आसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान व यम-नियमों का सतत पालन करते हुए अपने आचरण की दिव्यता व पवित्रता से स्वयं आनन्दित रहता हुआ सर्व जगत हितकारी बन जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यम-नियमों के पालन के बिना योगी होना तो बहुत ऊँची व बहुत दूर की बात है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह एक अच्छा इन्सान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छा माता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिष्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छा किसान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यापारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नेता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभिनेता व एक आदर्श नागरिक भी नहीं बन सकता है। यदि कोई व्यक्ति यम-नियमों के पालन के बिना अध्यात्म की बात करता है तो वह कोरा पाखण्ड ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि पूरा यम-नियम ही अध्यात्म की आधारशिला है। अध्यात्म के मूल सिद्धान्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रीति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीति व अध्यात्म का पूरा दर्शन यम-नियमों पर ही टिका हुआ है।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शाश्वत प्रज्ञा</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Jan 2017 21:59:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>धर्म का मर्म</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण</span></h5>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2290/dharm-ka-marm"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/056.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   संसार में विज्ञान (</span>Science<span lang="hi" xml:lang="hi">) या गणित (Maths) के फार्मूलों में किसी का मतभेद नहीं है। सभी मानते हैं कि 2 और 2</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चार ही होते हैं। </span>H<span lang="hi" xml:lang="hi">2</span>O<span lang="hi" xml:lang="hi"> अर्थात् दो गुणा हाइड्रोजन तथा एक गुणा ऑक्सीजन मिलाकर पानी ही बनता है यह भी सर्वमान्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि ये दृष्ट सत्य हैं लेकिन अदृष्ट सत्यों को लेकर दुनियां में बहुत भ्रान्तियां हैं और खासकर धर्म के नाम पर। धर्म का ठीक-ठीक बोध न होने के कारण संसार में बहुत संघर्ष है। वेद में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुरान में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाइबल में या गुरुग्रन्थ साहिब में क्या लिखा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुरान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाइबल आदि को मानने वाले लोग कैसे जीते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह महत्वपूर्ण है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">धा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">र्मिक लोगों का जीवन व आचरण कैसा है यह लोग देखना चाहते हैं। एक भगवान् का विधान है जो वेदादि ग्रन्थों में उपलब्ध होता है दूसरा संसार का विधान है जो संविधान में उपलब्ध होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों ही प्रकार के विधान का पालन करना ही ईश्वर की आज्ञापालन करना है। भगवान् का स्वरूप क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सद्भाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नैतिकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहिंसा ये सब भगवान् के ही रूप हैं। परमात्मा है इसका क्या प्रमाण है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">निकट से देखें तो मेरा स्वयं का होना अर्थात् शरीर में हर्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लीवर आदि अंग-प्रत्यंगों का अहर्निश क्रिया करना तथा रस रक्तादि धातुओं का निर्माण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माँ के गर्भ में शिशु का निर्माण आदि प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">और यदि बाहर देखें तो इस विशाल ब्रह्माण्ड की रचना जिसे बनाना तो दूर देखकर समझ पाना भी नामुमकिन है यह ईश्वर के होने का दृष्ट प्रमाण है। भगवान् का दर्शन क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी अन्तर्रात्मा में परमात्मा की प्रेरणा को अनुभव कर लेना ही उसका आन्तरिक दर्शन करना है। दूसरा इस बाह्य जगत में सर्वत्र उसकी कृति में उस कर्ता का अनुभव करना यह बाह्य दर्शन है। भगवान् का दर्शन होगया इसका क्या प्रमाण है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि किसी व्यक्ति के जीवन में बाह्य या आन्तरिक स्थायी ऐश्वर्य की उपलब्धि दिखाई दे तो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसने ईश्वर की कृपा को प्राप्त किया है इसका प्रमाण है तथा इसके अतिरिक्त यदि उसके जीवन में दिव्य ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अखण्ड निष्ठा व प्रचण्ड पुरुषार्थ दिखाई दें तो यह प्रमाणित करता है कि उसने ईश्वर का दर्शन किया है। त्रयी विद्या वेदों में दिव्य ज्ञान को ही ज्ञान योग (शुद्ध ज्ञान)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य प्रेम व अखण्ड निष्ठा को ही भक्ति योग (शुद्ध उपासना) तथा प्रचण्ड पुरुषार्थ को ही-कर्मयोग (शुद्ध कर्म) कहा गया है। भगवान् कहां रहते हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् सदा सब प्राणियों को सर्वत्र प्राप्त हैं- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ईशावास्यमिदं सर्वम्’</span> '<span lang="hi" xml:lang="hi">वासुदेव सर्वम्’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सियाराममय सब जग जानि।’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि वह सर्वत्र उपलब्ध है तो हम उसे प्राप्त क्यों नहीं कर पाते</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">दोषपूर्ण अन्त:करण से उसे नहीं पाया जा सकता। धर्म क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यतोऽभ्युदयनि:श्रेयस सिद्धि: स धर्म:।’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे अभ्युदय व नि:श्रेयस की सिद्धि हो वह धर्म है। अभ्युदय क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">समग्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बौद्धिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनैतिक दृष्टिकोण से मनुष्य व मनुष्येत्तर सबका विकास यह है समग्र विकास। अत: समग्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थायी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विकेन्द्रित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यायपूर्ण सात्विक समृद्धि ही अभ्युदय है। नि:श्रेयस क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">नि:=निशेष रूप से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रेयस=कल्याणकारी अर्थात् सम्पूर्ण रूप से जो शुभ या कल्याणकारी है अर्थात् योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यात्म व ध्यानादि के माध्यम से ज्ञान का प्रकाश पहले बुद्धि में हो जाये और फिर वह जीवन के आचरण में उतर जाये यही नि:श्रेयस है। धर्म का ठीक-ठीक बोध न होने से कहाँ संघर्ष होता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म का मर्म न जानने से सबसे बड़े संघर्ष के क्षेत्र हैं- १. साम्प्रदायिक संघर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">२. आर्थिक संघर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">३. राजनैतिक संघर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">४. शिक्षा में संघर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">५. रोग: दु:ख व स्वास्थ्य सम्बन्धी संघर्ष </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">1. साम्प्रदायिक संघर्ष:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">केवल मात्र मेरा सम्प्रदाय ही सर्वश्रेष्ठ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब मनुष्य मेरे ही सम्प्रदाय के अनुयायी बन जायें। केवल मेरे सम्प्रदाय को मानने से ही मोक्ष की प्राप्ति सम्भव है इत्यादि भ्रम के कारण धर्म परिवर्तन आदि का संघर्ष मनुष्य से उसके मानवाधिकार छीनने में लगा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">2. आर्थिक संघर्ष:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे पास अत्यधिक धन सम्पत्ति है इसलिए मैं ही सर्वश्रेष्ठ हूँ। मैं ही कुलीन हूँ। जबकि होना यह चाहिये कि मैं भी श्रेष्ठ हूँ तथा सभी दूसरे भी श्रेष्ठ हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">3. राजनैतिक संघर्ष:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मेरी पार्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके सिद्धान्त और एजेण्डा ही सर्वश्रेष्ठ हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी के चलते सब पार्टियों में संघर्ष है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">4. शिक्षा का संघर्ष:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा में बच्चों को अनिवार्य रूप से क्या पढ़ाया जाना चाहिये इसका ठीक-ठीक निर्णय न हो पाना तथा कुछ आर्थिक रूप से कमजोर मेधावी बच्चों को भी उच्च शिक्षा के अवसर न मिल पाना। अशिक्षा के कारण देश में सृजनात्मकता में न्यूनता का होना तथा कभी-कभी अयोग्य व्यक्तियों का ऊँचे पदों पर समासीन हो जाना।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">5. स्वास्थ्य सम्बन्धी संघर्ष:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य से सम्बन्धित जानकारी के अभाव में कितने ही लोग रोग व दु:खादि के कारण अकालमृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं या फिर बहुत सारा धन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय और शक्ति बीमारी के कारण नष्ट हो जाते हैं। ऐसे में पतञ्जलि का ध्येय क्या है</span>?</h5>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">तो उपरोक्त पाँचों प्रकार के संघर्षों को दूर कर सह अस्तित्व की भावना से युक्त व भाईचारा पूर्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक राष्ट्र का निर्माण करना यही हमारा ध्येय है। यही वेदों की व भारत के ऋषियों की दृष्टि भी रही है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी के माध्यम से आचरण की दिव्यता व श्रेष्ठता वाले नागरिक तैयार करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनका जीवन दिव्यता का एक दृष्टान्त बन सके क्योंकि गुण या दोष देखा-देखी बढ़ जाते हैं। देश में देखा-देखी योग व दिव्यता बढ़े तथा योग व कर्मयोग हमारा जीवन का ध्येय बन जाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह हमारा लक्ष्य है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बुरा विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुरी भावना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुरा कर्म इच्छा होने पर भी न करें तथा अच्छा कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छा विचार व भावना इच्छा न होने पर भी करें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य की ऊर्जा योग व कर्मयोग के माध्यम से नकारात्मकता से हटाकर सकारात्मक कार्यों में लगाना हमारा ध्येय है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">आजकल प्रचार का जमाना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अगर हम योग व स्वदेशी जैसी अच्छी बातों का भरपूर प्रचार नहीं करेंगे तो इन सबका दुष्प्रचार तो चलता ही रहेगा।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतञ्जलि का उत्तराधिकारी कौन होगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">पतञ्जलि का उत्तराधिकारी कोई व्यापारी नहीं अपितु ये विद्वान् सन्यासी पुरुष और महिलायें ही बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण की विरासत को सम्भालेंगे। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2290/dharm-ka-marm</link>
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                <pubDate>Sun, 01 Jan 2017 21:57:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अनेक रोगों में कारगर स्वदेशी वनौषधि 'श्वेत मूसली’</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2291/anek-rogon-me-kargar-swadeshi-vanaushadhi-shwet-musli"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/065.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वेत मूसली </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>की खेती मूलत</strong> उष्णकटिबंधीय यूरोप एवं पश्चिमी एशिया में तथा भारत में पश्चिम हिमालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंजाब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तराखण्ड में 1600 मी. की ऊँचाई तक तथा गुजरात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर प्रदेश एवं मध्य भारत में सामान्य रूप से की जाती है। सफेद मूसली के लिये दो तरह के पौधों का प्रयोग किया जाता है जो कि गुणों में लगभग समान होते हैं। इनमें प्रथम </span>Asparagus adscendens Roxb<span lang="hi" xml:lang="hi">. व दूसरा </span>Chlorophytum borivilianum Santapau &amp; Fernandes <span lang="hi" xml:lang="hi">नाम से जाना जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके पुष्प श्वेतवर्ण के होते हैं। इसकी मूल सफेद रंग की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लम्बी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">5-7 के गुच्छों में चिपचिपी तथा मधुर रसयुक्त होती है। बाजार में सफेद मूसली के नाम से इसकी जड़े बेची जाती हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/fgbfhd.jpg" alt="fgbfhd"></img></span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">A</span>sparagus adscendens Roxb.:</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सीधा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुशाखित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर्णपाती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुवर्षायु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शाकीय पौधा होता है। इसका काण्ड लम्बा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोटा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लगभग सीधा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अरोमिल तथा शाखाएँ झुकी हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आरोहणशील</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धूसर वर्ण की नालीदार एवं कांटे-12-18 मिमी लम्बे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सीधे मोटे होते हैं। इसके पत्र पतले नुकीले शतावर के पत्र जैसे तथा चमकीले हरित वर्ण के होते हैं। इसकी मूल मूलस्तम्भ से उत्पन्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोमश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वेत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लम्बी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफेद रंग की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">झुर्रीदार</span>,  <span lang="hi" xml:lang="hi">आसानी से टूटने वाली तथा 6 मिमी मोटी होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो जल में डालने से फूल जाती है। इसका पुष्पकाल अक्टूबर से फरवरी तक होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>Chlorophytum borivilianum Santapau &amp; Fernandes:</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में पाया जाता है। यह कंदीय मूल वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकवर्षायु अथवा द्विवर्षायु शाकीय पौधा होता है। इसके पत्र सरल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूलांकुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रेखीय-भालाकार अथवा अधोमुख अण्डाकार एकान्तर होते हैं। इसके पुष्प श्वेतवर्ण के होते हैं। इसकी मूल सफेद रंग की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लम्बी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">5-7 के गुच्छों में चिपचिपी तथा मधुर रसयुक्त होती है। बाजार में सफेद मूसली के नाम से इसकी जड़े बेची जाती हैं। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल नवम्बर से अप्रैल तक होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/405.jpg" alt="40"></img></span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रासायनिक संघटन:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके पौधे में सैपोनिन</span>, β-<span lang="hi" xml:lang="hi">सिटोस्टेरॉल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डायोसजेनिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एसपेरेनिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एस्पेरानिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एडस्केन्डिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एडस्केन्डोसाईड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जाइलोज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रेम्नोस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्लूकोस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पॉमिटिक अम्ल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्टियरिक अम्ल तथा यूरोनिक अम्ल पाया जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">औषधीय प्रयोग एवं विधि:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वक्ष रोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्तन्यवर्धनार्थ -</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> 2-4 ग्राम मूसली चूर्ण में समभाग मिश्री मिलाकर दूध के साथ सेवन करने से स्तन्य की वृद्धि होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उदर रोग:</span></strong></span></h5>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रवाहिका -</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> 2-4 ग्राम मूशली मूल चूर्ण को दुग्ध के साथ मिलाकर प्रयोग करने से अतिसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रवाहिका तथा अजीर्ण में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उदर विकार -</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> 1-2 ग्राम मूसली कंद चूर्ण का सेवन करने से अतिसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदावर्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदरशूल तथा अरुचि का शमन होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वृक्कवस्ति रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मूत्रकृच्छ्र -</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> 1-2 ग्र</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ाम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मूसली</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मूल</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">चूर्ण</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवन</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">करने</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मूत्रकृच्छ्र</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">शमन</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">होता</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजननसंस्थान संबंधी रोग:</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">(1-2 ग्राम) मूल चूर्ण में समभाग मिश्री मिलाकर सेवन करने से सामान्य दौर्बल्य तथा शुक्र दौर्बल्य का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>पूयमेह (सूजाक) -</strong> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">1-2 ग्राम मूल चूर्ण का सेवन करने से पूयमेह (सूजाक) में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>प्रदर-</strong>1</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> -2 ग्राम कंद चूर्ण का सेवन करने से श्वेत प्रदर में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दौर्बल्य -</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> 2-4 ग्राम कंद चूर्ण में मिश्री मिलाकर दुग्ध के साथ सेवन करने से हर प्रकार के दौर्बल्य लैंगिक दौर्बल्य का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वीर्य वर्धनार्थ -</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> 2-4 ग्राम मूसली चूर्ण में समभाग शर्करा मिलाकर गोदुग्ध के साथ सेवन करने से वीर्य की वृद्धि होती है तथा मूत्रकृच्छ्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूत्रदाह आदि मूत्र विकारों में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अस्थिसंधि रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आमवात -</span></strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"> म</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ूसली</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कंद</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पीसकर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">लगाने</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कंद</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">चूर्ण</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवन</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">करने</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आमवात</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">लाभ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">होता</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रसायन वाजीकरण:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वाजीकरण -</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> समभा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ग</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सफेद</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मूसली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुडूची सत्त्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कौंमच बीज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोखरू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेमलकंद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आंवला तथा शर्करा से निर्मित चूर्ण को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">2-4 ग्राम की मात्र में लेकर घी तथा दूध में मिलाकर पीने से वाजीकरण गुणों की वृद्धि होती है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेदिक गुण:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">1.   </span>Asparagus adscendens Roxb.<span lang="hi" xml:lang="hi">:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रजाति की सफेद मूसली मधुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उष्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वातशामक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वृष्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बृंहण तथा रसायन होती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यह पित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जलन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रम तथा गुदा रोग शामक होती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके पत्र कफनिस्सारक होते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसका काण्ड वाजीकारक होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसकी मूल प्रशामक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्ताल्पतारोधी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बलकारक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीतल तथा स्तन्यजनन होती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके कंदीय मूल में एक स्टेराइड युक्त सैपोनिन पाया जाता है जो परखनलीय परीक्षण में विविध रोगकारक सूक्ष्मजीवियों (</span>Pathogenic organisms<span lang="hi" xml:lang="hi">) की वृद्धि का निरोध करता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यह इन्सुलिन वर्धक क्रियाशीलता एवं स्टार्च के पाचन पर निरोधक प्रभाव प्रदर्शित </span><span lang="hi" xml:lang="hi">करता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके मूल का जलीय एवं एल्कोहॉलिक सार परखनलीय परीक्षण में सेटेरिया सेर्वि (</span>Setaria cervi<span lang="hi" xml:lang="hi">) के प्रति फाइलेरियारोधी क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">2.  </span>Chlorophytum borivilianum Santapau &amp; Fernandes<span lang="hi" xml:lang="hi">:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजाति का कंद मधुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्तंभक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कामोत्तेजक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मृदुकारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्तन्यजनन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कफनि:सारक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीतल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूत्रल तथा बलकारक होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यह मेदोरोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्श</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्ताल्पता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वासनलिकाप्रदाह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृद्विकार तथा मधुमेह में हितकर होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यह परखनलीय परीक्षण में तनावरोधी (</span>Antistress<span lang="hi" xml:lang="hi">) क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यह वेदनाशामक (</span>Analgesic<span lang="hi" xml:lang="hi">) गुण प्रदर्शित करती है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसका मूल सार शोथहर क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यह व्याधिक्षमत्ववर्धक क्रियाशीलता प्रदर्शित करती है। </span></h5>
</li>
</ul>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>दिव्य अनुभूति</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Jan 2017 21:55:18 +0530</pubDate>
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                <title>देश के अर्थ विश्लेषकों की दृष्टि में पतंजलि अभियान</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">        गोमुख </span><span lang="hi" xml:lang="hi">को देखकर किसी को आंकलन करना कठिन होता है कि हिमालय क्षेत्र से निकल कर भारत के विशाल मैदानी भूभाग के करोड़ों किसानों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गरीबों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असहायों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भक्तों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धालुओं को जीवनदान देती और गंगा जल के सामान्य से सागर को गंगासागर की प्रतिष्ठा दिलाने वाली गंगा का मूल यही है। पर इस विशाल प्रवाह के पीछे छिपा है महाराज भगीरथ का कठोर तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी संकल्पशीलता और उनकी लोक उद्धारक दृष्टि जिनकी शक्ति से हजारों वर्षों से संपूर्ण विश्व उस दिव्य जलधार का अभिसिंचन करता आ रहा है। इसी प्रकार पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज एवं</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2292/desh-ke-arth-vishleshakon-ki-drishti-me-patanjali-abhiyan"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/677.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    गोमुख </span><span lang="hi" xml:lang="hi">को देखकर किसी को आंकलन करना कठिन होता है कि हिमालय क्षेत्र से निकल कर भारत के विशाल मैदानी भूभाग के करोड़ों किसानों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गरीबों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असहायों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भक्तों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धालुओं को जीवनदान देती और गंगा जल के सामान्य से सागर को गंगासागर की प्रतिष्ठा दिलाने वाली गंगा का मूल यही है। पर इस विशाल प्रवाह के पीछे छिपा है महाराज भगीरथ का कठोर तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी संकल्पशीलता और उनकी लोक उद्धारक दृष्टि जिनकी शक्ति से हजारों वर्षों से संपूर्ण विश्व उस दिव्य जलधार का अभिसिंचन करता आ रहा है। इसी प्रकार पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज एवं ऋषिकल्प श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज की संकल्पनिष्ठा से उपजे पतंजलि योगपीठ के इस दिव्य अभियान को भी युग भगीरथ के तप पुरुषार्थ का ही युग प्रवाह कहना समीचीन होगा। मात्र २३ वर्ष में ही इस प्रवाह से अनगिनत योगनिष्ठ साधक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य संवर्धक चिकित्सक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद के विशेषज्ञ स्वदेशी के लाखों प्रचारक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत स्वाभिमान के करोड़ों राष्ट्रवती दिये हैं। इससे ऋषि प्रणीत भारतीय विधाओं को शक्ति मिली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नयी दृष्टि मिली। साथ ही देश आर्थिक समृद्धि की ओर ऐसा कदमताल करने लगा कि देश के अर्थ विश्लेषकों को इसका विश्लेषण करने हेतु प्रेरित किया। प्रस्तुत है उन्हीं विश्लेषकों की दृष्टि में पतंजलि का स्वदेशी अभियान                                                                                                                   - सहसंपादक</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">50 वर्षीय फिटनेस टे्रनर सौदामिनी पाणि कहती हैं- पतंजलि की ओर से आटा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुगर और दालों के तमाम विज्ञापन दिखाए जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जब भी हम स्टोर पर पहुँचते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ये आइटम आउट ऑफ स्टॉक हो चुके होते हैं। बिस्कुट और जूस जरूर उपलब्ध होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बाबा रामदेव की बिजनेस साधना</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="right"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">धमेन्द्र चौधरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नई दिल्ली- इंडिया टीवी</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पूरी दुनियां में अपने योग का लोहा मनवाने के बाद बाबा रामदेव जी महाराज अंतरराष्ट्रीय उत्पाद बनाने वाली कंपनियों को लोहे के चने चबाने जैसी चुनौती दे रहे हैं। स्वामी रामदेव जी महाराज ने साल 2006 में पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड की स्थापना की। आज इसके पास हर्बल चाय  और फ्रू ट जूस को लेकर टॉयलेटरीज प्रोडक्ट्स की एक बड़ी श्रृंखला है। पतंजलि आयुर्वेद एमएमसीजी सेक्टर में तेजी से आगे बढ़ रही है और एक  के बाद एक नये उत्पाद लांच करके बाजार में अपनी अलग पहचान और जगह बना रही है। कंपनी ने नेस्ले की मैगी को टक्कर देने के लिए </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">झटपट पकाओ बेफ्रिक खाओ’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के उद्घोष से </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि आटा नूडल्स’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को लांच किया। इसके अलावा पतंजलि ग्लोबल स्पोर्टर्स वियर ब्रांड नाइके और एडिडास को चुनौती देने के लिए योग-वियर कलैक्शन बाजार में उतारने की तैयारी में है। जिसका भारत में एफएमसीजी का सालाना करोबार 2.64 करोड़ रुपये का है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/801.jpg" alt="80"></img></span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बड़े ब्रांडो को पतंजलि दे रहा चुनौती:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बीते साल करीब 2500 करोड़ का राजस्व हासिल करने वाली पतंजलि आयुर्वेद अब </span>FMCG <span lang="hi" xml:lang="hi">बाजार के बडे प्लेयर्स को टक्कर देने के लिए तैयार है। कंपनी ने राजस्व के मामले में तमाम लिस्टेड एफएमसीजी कंपनियों मसलन इमामी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रोक्टर एंड गैम्बल और ज्योति लैब्स को पीछे छोड़ दिया है। मैनेजमेंट कंसल्टेंसी टेक्नोपार्क के डायरेक्टर अरविंद सिंघल ने कहा था कि अगर पतंजलि आयुर्वेद 5000 करोड़ रुपये राजस्व लक्ष्य के हासिल कर लेती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह देश की टॉप-56 एफएमसीजी कंपनियों की लिस्ट में शामिल हो जायेगी। वह इसे पूरा भी कर चुकी है। वहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हाल में किए गये प्रोडक्ट लांच की घोषणा को देखते हुए लगता है कि कंपनी अगले दो से तीन साल के अंदर टॉप-3 में शामिल हो जाएगी। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि के पास बड़ा रिटेल चेन:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">करीब 1.77 लाख रिटेल स्टोर के जरिये पतंजलि अपने उत्पादों की बिक्री कर रही है। यहीं नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने कारोबार का विस्तार करने के लिए पतंजलि ने फ्यूचर ग्रुप के साथ एक समझौता किया। इसके तहत देशभर में फ्यूचर ग्रुप के रिटेल स्टोर बिग बाजार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फूड बाजार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीलगिरी और फूड हॉल पर पतंजलि के प्रोडक्टस की बिक्री होनी है। 95 से अधिक शहरों में उपस्थिति के साथ फ्यूचर ग्रुप भारत की सबसे बड़े रिटेल ग्रुप में से एक है। ज्ञातव्य कि पतंजलि आयुर्वेद का मुख्यालय हरिद्वार (उत्तराखण्ड) में है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसकी शुरुआत मात्र 41 करोड़ </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पूंजी </span>से 2006 में की गई थी।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/354.jpg" alt="35"></img></strong></span></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>पतंजलि आयुर्वेद की ताकत</strong></span>:</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अंतरराष्ट्रीय ब्रोकरेज फर्म सीएलएसए की रिपोर्ट के मुताबिक पतंजलि की ताकत आम जनता तक सीधे पहुँच है। रिपोर्ट में कहा गया था कि कंपनी अपने प्रोडक्ट को बेचने के लिए पारंपरिक रास्ता अपना रही है और आने वाले वर्षो में इसे और तेज गति से बढ़ाने की तैयारी है। देश की एफएमसीजी कंपनियां आमतौर पर अपनी कमाई का 10-15 फीसदी हिस्सा विज्ञापन पर खर्च करती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि पतंजलि सिर्फ स्वामी रामदेव जी महाराज पर निर्भर है। हालांकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हाल के दिनों में पतंजलि ने टीवी और अखबार में विज्ञापन देने शुरु किये हैं। सीएलएसए के अनुसार पतंजलि के पास 20 करोड़ लोगों तक पहुँचने की क्षमता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कि डायरेक्ट या इंडायरेक्ट रूप से बाबा रामदेव के योग कार्यक्रम से जुड़े हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">देश के करोड़ों किराना स्टोर्स पर पहुँच की दिशा में पतंजलि अभियान</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="right"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">शेफाली भट्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नई दिल्ली- इकनॉमिक टाइम्स</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पेशे से कॉर्पोरेट टैक्स कंसल्टेंट मुंबई की निवासी चित्रा कार्तिक पिछले साल दिसंबर में जब केरल स्थित अपने अंकल के घर गई थी। उन्होंने देखा कि उनके अंकल ने घर के पहले फ्लोर पर पतंजलि की फे्रंचाइजी शुरु कर दी है। यह पतंजलि के उत्पादों का प्रभाव था कि उन्होंने तत्काल 1000</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> रुपये के सामान की खरीद कर ली। उन्होंने बहुत ज्यादा आईटम नहीं खरीदे थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए वह जल्दी ही समाप्त भी हो गये और दोबारा खरीददारी के लिए उन्हें मुंबई स्थित ग्रॉसरी स्टोर जाना पड़ा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">चित्रा कार्तिक कहती हैं कि कई सतह तक मैंने अपने घर के पास मौजूद रिटेल आऊटलेट्स पर पतंजलि के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">दंतकान्ति’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">टूथपेस्ट की खोज की। लेकिन यह कहीं नहीं मिला और आखिर मुझे हिमालय कंपनी के टूथपेस्ट से ही संतोष करना पड़ा। उन्होंने कहा वास्तव में दंतकांति मंजन काफी अच्छा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरी सास भी इसे पंसद करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन हमारे पास इसकी तलाश करने के लिए वक्त नहीं होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">चित्रा ऐसी अकेली नहीं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तमाम लोग हैं जो पतंजलि के उत्पादों का इस्तेमाल करना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उन्हें यह उपलब्ध नहीं हो पाते। 50 वर्षीय फिटनेस टे्रनर सौदामिनी पाणि कहती हैं- पतंजलि की ओर से आटा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुगर और दालों के तमाम विज्ञापन दिखाए जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जब भी हम स्टोर पर पहुँचते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ये आइटम आउट ऑफ स्टॉक हो चुके होते हैं। बिस्कुट और जूस जरूर उपलब्ध होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन मेरा सवाल है कि जब आप डिमांड पूरी नहीं कर सकते तो इतने प्रचार की क्या आवश्यकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस पर श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज बताते हैं कि 1200 पतंजलि चिकित्सालयों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">2500 आरोग्य केन्द्रों और 7,000</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> स्टोर गांव में होने के बाद भी हम सप्लाई नहीं दे पा रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमारी टीम टियर-1 और शहरों-शहरों  में 250 मेगा स्टोर खोलने की तैयारी में है। इसके अलावा पतंजलि बिग बाजार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रिलायंस रिटेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हाइपरसिटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्टार बाजार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डी-मार्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पेंसर्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपोलो फार्मेसी जैसे रिटेलर्स से भी करार करने की तैयारी में है। इनके जरिए पतंजलि को देशभर के 4,500</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> स्टोर्स तक अपनी पहुँच बनाने में सफलता मिल सकती है। इसके अलावा ऑनलाइन खरीददारी की सुविधा भी है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मल्टीनेशनल कम्पनियों की नींद हराम:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एफएमसीजी इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक पतंजलि के उत्पाद फिलहाल देशभर की करीब दो लाख किराना दुकानों पर उपलब्ध हैं। यद्यपि हिन्दुस्तान यूनिलीवर के मुकाबले यह 1/30 ही है। क्योंकि यूनिलीवर के प्रोडक्टस करीब 60 लाख किराना स्टोर्स पर मिल रहे हैं। लेकिन पतंजलि की ओर से लगातार बन रही पैठ से मल्टीनेशनल कंपनियों की नींद हराम हो गई है। कोलगेट और नेस्ले की बात करें तो जिन्हें स्वामी रामदेव जी महाराज ने हाल ही में पछाडने की बात कही थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इनके प्रोडक्टस क्रमश: 47 लाख और 35 लाख स्टोर्स पर मिलते हैं। ऐसे में यह आसानी से समझा जा सकता है कि पतंजलि इन्हें पछाडऩे के लिए किराना स्टोर्स पर पहुँच का अभियान चला सकती है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/474.jpg" alt="47"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उद्योग जगत में बदलाव का नया ट्रेंड पतंजलि</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="right"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">किरण सोमवंशी- इकानॉमिक टाईम्स</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक  दशक पहले मॉर्डन ट्रेड ने भारतीयों की खरीदारी का तरीका बदल दिया था। इसके बाद ईकामर्स और ऑनलाइन शॉपिंग का जमाना आया। अब पतंजलि आयुर्वेद बदलाव का नया टे्रंड लेकर आई है। इसने ब्रांडेड कंज्यूमर गुड्स सेक्टर में हलचल मचा दी है। पतंजलि की बढ़ती लोकप्रियता और उसके दमदार ब्रांड ने भारतीय एफएमसीजी सेक्टर को कुछ अहम सबक सिखाए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रांड प्रीमियम की जरुरत नहीं</span>?</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कंज्यूमर्स पर दमदार असर छोडऩे के लिए ब्रांड का प्रीमियम वसूल करना जरुरी नहीं है। क्योंकि पतंजलि के प्रोडक्टस दूसरी कंपनियों के उसी कैटेगरी के प्रोडक्टस से सस्ते हैं। इक्रीएट वैल्यू एडवाइजर्स के फाउंडर और मैरिको के फॉर्मर सीएफओ मिलिंद सरवटे कहते हैं</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रांडस का प्रीमियम वसूल करने और उस प्रीमियम का इस्तेमाल करके ज्यादा विज्ञापन देने के लॉजिक को पतंजलि ने उलट-पुलट कर दिया है।‘</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रोडक्टस की क्वालिटी ही USP</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि ने एक बार फिर से फोकस प्रोडक्ट की क्वालिटी पर ला दिया है। प्रोडक्टस के लिए जरुरी है कि वे विज्ञापनों के शोर से ऊपर उठकर कंज्यूमर्स को वैल्यू प्रोवाईड करें। पतंजलि के दो सबसे पॉपुलर ब्रांडस में घी और टूथपेस्ट हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि इस सेगमेट में पहले से ही देसी-विदेशी कॉम्पिटिटर्स हैं। स्पार्क कैपिटल की हालिया सेक्टर रिपोर्ट के मुताबिक मार्केट में मची उथल-पुथल शॉर्ट टर्म में मुश्किलें पैदा करने वाली होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इससे संपूर्ण एफएमसीजी प्रोडक्टस की गुणवत्ता पर फोकस बढ़ेगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मजबूत ब्रांड अंबेसडर:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग गुरु बाबा रामदेव जी महाराज खुद हर्बल और ऑर्गेनिक पतंजलि प्रोडक्टस को प्रमोट करते हैं। इससे साबित होता है कि सेलेब्रिटी के एंडोर्समेंट से प्रोडक्टस को तभी फायदा होता है जब प्रोडक्टस के साथ उनका गहरा जुड़ाव हो। यही कारण है कि बाबा रामदेव जी के प्रति जन श्रद्धा का लाभ पतंजलि को मिलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि पिछले साल मैगी के नूडल्स पर रोक लगने के बाद उसके ब्रांड अंबेसडर्स की भी कड़ी आलोचना हुई थी। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ग्राहक देवता है:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि के उभार ने एफएमसीजी कंपनियों को होशियार कर दिया की वह कंज्यूमर्स को कम कीमत पर बेहतर प्रोडक्टस मुहैया कराए। इसने एफएमसीजी कंपनियों को याद दिला दिया कि ग्राहकों की कीमत पर लंबे समय तक मोटा मार्जिन नहीं बनाया जा सकता। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि ने यह साबित कर दिया है कि इंडस्ट्री में किसी भी वक्तनया ट्रेंड शुरु किया जा सकता है। मार्केट में बहुत ज्यादा भीड़ होने और कमजोर डिमांड होने के बावजूद पतंजलि के प्रोडक्टस अपनी जगह बनाने में कामयाब रहे हैं। इंडस्ट्री टै्रक करने वाले एनालिस्ट ने कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे पता चलता है कि इंडस्ट्री में हमेशा नया करने का मौका होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">इसको दोहराना और कॉम्पिटिशन देना आसान नहीं है। </span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">मैनेजमेंट का अहम रोल:</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पिछले कुछ साल में पतंजलि बड़ी तेजी से ५००० करोड़ रुपये की एफएमसीजी कंपनी बन गई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि दूसरी कंपनियों को यहां तक पहुँचने में कई साल लगे। इस संदर्भ में सरवटे कहते हैं</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">फॉर्मल मैनेजमेंट स्ट्रक्चर बहुत ज्यादा जटिलता के चलते कई बार बिजनेस ग्रोथ को सुस्त बना देती है।</span>’</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">यह राज है पतंजलि की कामयाबी का</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">अतुल सेठी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नई दिल्ली- इकनॉमिक टाइम्स</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बाबा  रामदेव ने योगगुरु से लेकर ऐक्टिविजम और बिजनेस तक का लंबा सफर तय किया है। इन दिनों वह राजनीतिक बयानबाजी से दूरी बनाते नजर आ रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन पतंजलि और बिजनेस को लेकर उनकी ढेरों योजनाएं हैं।  पतंजलि की कामयाबी से वह काफी खुश भी हैं और इस सफलता की वजह बिजनेस में पारदर्शिता और जिम्मेदारी को बताते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रोडक्ट क्वालिटी को लेकर जिम्मेदार हूँ:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वह कहते है मल्टी नेशनल कंपनियां (</span>MNCs<span lang="hi" xml:lang="hi">) विज्ञापनों पर बहुत ज्यादा खर्च करती हैं। वे सिलेब्रिटीज को बै्रंड एंबैस्डर बनाती हैं और इसके एवज में उन्हें करोड़ों रुपये देती हैं। मैं सिर्फ कैमरे के सामने खड़ा होता हूँ और अपने प्रोडक्टस के बारे में बोलता हूँ। लोगों को मालूम है कि मैं प्रोडक्ट्स की क्वालिटी को लेकर जिम्मेदार हू। उन्होंने मुझे २०-२५ साल से संघर्ष करते हुए देखा है। उन्हें मालूम है कि बाबा रामदेव जमीन पर सोते हैं और उन्हें अपने लिए कुछ नहीं चाहिए। क्या किसी एमएनसी का सीईओ कैमरे के सामने खड़े होकर अपने प्रोडक्टस की जिम्मेदारी लेगा</span>?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी रामदेव जी महाराज के मुताबिक लोग उनके बैंरड में भरोसा करते हैं। उन्होंने कहा हम अपने प्रतिस्पर्धियों से कमतर नहीं बल्कि बेहतर टेक्नॉलजी का इस्तेमाल करते हैं। इसीलिए पतंजलि देश में काम कर रही कंपनियों से कहीं ज्यादा गुणवत्ता देने में सफल है। जल्द ही हम दुनियां भर में कामयाबी हासिल करेंगे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">लाभ नहीं चेरिटी:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा मकसद बिजनस से मिले प्रोफिट को चैरिटी के लिए इस्तेमाल करना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खासतौर पर शिक्षा के लिए। मैं चाहता हू कि हमारे प्रोफिट का ८०% हिस्सा शिक्षा में जाए। फैसले आचार्य बालकृष्ण ही लेते हैं। स्वामी रामदेव जी महाराज का मानना है कि अगर फैसला लेने वाले लोगों की संख्या ज्यादा हो तो योजनाएं कभी ठीक से लागू नहीं हो पाएंगी। उन्होंने कहा-पतंजलि को कभी कोई परिवार नहीं चलाएगा। हमारे पास ५०० से ज्यादा योगियों की टीम है। मेरे गुरु ने उन्हें इसी तरह प्रशिक्षित किया है जैसे उन्होनें मुझे किया था। हम कम से कम ५ हजार योगियों को टे्रनिंग देंगे जो आगे चलकर पतंजलि का कामकाज संभाल सकें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मूल में तप और कर्म योग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी दिनचर्या के बारे में बताते हुए बाबा रामदेव जी महाराज ने कहा कि मैं आमतौर पर सुबह चार बजे से पहले जग जाता हूँ। साढ़े चार बजे तक मैं योग कर रहा होता हू। दो घंटे तक योग और ध्यान करने के बाद मैं पतंजलि आयुर्वेद में बिताता हूँ। इसके बाद चार-पांच घंटे लोगों से बातें करता हूँ। मैं बहुत हल्का खाना खाता हूँ। सुबह नाश्ते में अंजीर या जूस लेता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लंच-डिनर में सब्जियां खाता हूँ। १८ साल का वक्त मैंने सिर्फ दूध और फल के सहारे बिताया है। अब मैं दूसरी चीजें भी खाने लगा  हूँ। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी रामदेव जी महाराज को खाली वक्त बहुत कम मिलता है। वह चाहते है कि लोग उन्हें एक कर्मयोगी संन्यासी के तौर पर याद करें। पतंजलि की प्रगति का राज भी उनके इन कथनों में ही छिपा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि का कैमिकल मुक्त पूजा सामग्री सेगमेंट</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि आयुर्वेद </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि आस्था’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नाम से नये बै्रंड के प्रोडक्ट्स में अगरबत्ती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामग्र्री</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तांबे का दीया वगैरह शामिल हैं। पतंजलि आयुर्वेद के मैनेङ्क्षजग डायरेक्टर श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने ईटी से कहा हम एक नया ब्रैंड आस्था तैयार कर रहे हैं। रिसर्च से पता चला है कि कई जमी-जमाई कंपनियां अगरबत्ती</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">धूप जैसे उत्पादों में कैमिकल का इस्तेमाल कर रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे कंज्यूमर को नुकसान हो रहा है। इस सेगमेंट में प्राकृतिक उत्पाद की जरुरत है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि के खादी में होगी महात्मा गांधी कीपूर्ण राजनीति चिंतनधारा</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रत्ना भूषण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नई दिल्ली- इकनॉमिक टाइम्स</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग गुरु रामदेव की क्लोदिंग सेक्टर में उतरने और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">खादी’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कपड़ों की मैन्युफैक्चरिंग की योजना को टेक्सटाइल इंडस्ट्री के बड़े नामों से पॉजिटिव रिस्पॉन्स मिला है। इंडस्ट्री के कुछ नामों ने अपने प्रोडक्ट्स के साथ पतंजलि से संपर्क किया है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सूत्रों ने बताया है कि इस सप्ताह की शुरुआत में रेमंड ग्रुप की एक टीम ने अपने प्रोडक्ट के सैंपल पतंजलि के एग्जिक्यूटिव्स को दिखाये थे। अहमदाबाद की टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरर अरविंद लिमिटेड ने भी बिजनेस की संभावनाओं को तलाशने के लिए पतंजलि से बातचीत की है</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज की </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">खादी’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के प्रोडक्शन में बड़े स्तर पर उतरने की योजना है।  स्वामी जी महाराज ने कहा है अगर हमारे देश में फैब इंडिया जैसी विदेशी कंपनियां खादी प्रोडक्टस बेच रही हैं तो यह महात्मा गांधी और उनकी राजनीतिक विचारधारा की हत्या है। पतंजलि की क्लोदिंग सेक्टर के लिए बड़ी योजनाएं हैं। लंगोट से लेकर कोट तक हर चीज बनाई जाएगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने कहा कि भारतीयों को पूरी तरह स्वदेशी बनना चाहिए।  </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बाबा रामदेव जी महाराज ने बताया कि इंडस्ट्री के कुछ नामों ने उनसे संम्पर्क किया है। कुछ मीटिंग हुई हैं। हम इसमें टेक्सटाइल इंडस्ट्री को साथ लेकर चलेंगे और यह एक सामूहिक कोशिश होगी। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">क्वालिटी प्रोडक्ट हमारा लक्ष्य:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि डायबिटीज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोटापे और अन्य बीमारियों से पीडि़त लोगों के लिए ऑर्गेनिक क्लोदिंग मैन्युफैक्चर करने के विकल्प भी तलाश रही है। पतंजलि के सीईओ श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी ने ईटी को बताया हम प्योर नेचुरल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऑर्गेनिक और हर्बल क्लादिंग की मैन्युफैक्चरिंग के लिए नेचुरल डाइज का इस्तेमाल करना चाहेंगे। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह पूछने पर कि क्या पतंजलि क्लादिंग को बेचने के लिए रिटेल आउटलेट्स खोलेगी। तो आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि इस पर अभी विचार किया जा रहा है। प्रत्येक चीज सर्वे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रिसर्च और डिवेलपमेंट प्रोसेस के बाद की जाएगी। उनका कहना था कि पतंजलि यह सुनिश्चित करेगी कि ग्राहकों के लिए क्वालिटी प्रोडक्टस पेश किए जाएं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्टाइल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजाइन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फैब्रिक में पूर्ण भारतीय होगी पतंजलि की </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी जीन्स’</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वसुधा वेणुगोपाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नई दिल्ली-इकनॉमिक टाइम्स</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिस्किट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टूथपेस्ट और शैम्पू जैसे तमाम उत्पाद लॉन्च करने के बाद योगऋषि बाबा रामदेव जी की कंपनी पतंजलि अब जीन्स लांच करने की तैयारी कर रही है। पतंजलि की यह स्वदेशी जीन्स महिलाएं एवं पुरुषों दोनों के लिए होगी। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह  स्वदेशी जीन्स भारतीय संस्कृति एवं परम्परा के मुताबिक होगी। इकनॉमिक टाइम्स से बातचीत में पतंजलि के सीईओ बालकृष्ण ने कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह जीन्स भारतीय महिलाओं के लिए लूज-फिट कंफर्टेबल होगी और यह अन्य भारतीय परिधानों की तरह ही दिखेंगी। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने कहा जीन्स पश्चिमी कॉन्सेप्ट है और हम इसके साथ दो चीजें कर सकते हैं या तो इसका बॉयकाट कर दें या फिर इसे अपना लें। दूसरा तरीका ये है कि अपनी जरुरत के हिसाब से इसे कस्टमाइज कर लिया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे हमारे टै्रडिशन के मुताबिक ढल जाए। श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने कहा कि भारतीय समाज में जीन्स की लोकप्रियता खासी बढ़ गई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे में इसे अलग नहीं किया जा सकता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण जी ने स्वदेशी जीन्स को लेकर कहा यह जीन्स अपने स्टाइल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजाइन और फैब्रिक में पूरी तरह भारतीय होगी। महिलाओं के लिए हमारी जीन्स थोड़ी लूज होगी ताकि वह भारतीय परम्परा के मुताबिक हो और आरामदायक भी हो। भारतीय परिवार हमारे स्वदेशी जीन्स के कॉन्सेप्ट को बेहद आरामदायक पाएंगे। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग गुरु के मुताबिक पतंजलि पारंपरिक और आधुनिक दोनों तरह के कपड़ों की मैन्युफैक्चरिंग करेगी। स्वामी रामदेव जी महाराज के मुताबिक यह प्लान कंपनी को ग्लोबल मार्केट में स्थापित करने के लिहाज से बेहद महत्त्वपूर्ण है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">2020 तक पतंजलि का एक लाख करोड़ का प्रोडक्शन लक्ष्य:</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नवभारत टाइम्स </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक मीडिया इवेंट में योगऋषि स्वामी रामदेव जी  ने कहा कि पतंजलि ने 2020 तक अपने उत्पादन को 1 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। पतंजलि बीते 4 साल में लगातार 100 प्रतिशत की ग्रोथ हासिल की है। इस साल भी हम इसी रफ्तार से आगे बढ़ रहे हैं। अगले दो से तीन साल में हमारा लक्ष्य इन हाउस प्रोडक्शन को 50,000</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ रुपये तक बढ़ाने का है। हम 2020 तक अपने प्रोडक्शन को 1,00,000</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ तक बढ़ाना चाहते हैं। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Jan 2017 21:53:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गुरुसत्ता, सेवा व संगठन की महिमा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">डॉ. सुमन</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">मुख्य महिला केन्द्रीय प्रभारी- पतंजलि योग समिति</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2293/gurusatta-seva-va-sangathan-ki-mahima"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/604.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   हम</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> सब अपनी-अपनी रुचि व सामथ्र्यानुसार पतंजलि योगपीठ हरिद्वार से जुड़े हैं। पतंजलि योगपीठ के बहुआयामी विस्तृत स्वरूप के परिचय से पूर्व हम यह जानने का प्रयास करें कि मूल रूप में पतंजलि योगपीठ क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">एक आध्यात्मिक संस्था है। इसका आधार क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ का मूल तत्व है सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस सेवा का माध्यम है-योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद एवं स्वदेशी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस त्रिविध सेवा का शरीर है- संगठन या संस्थान और उस संगठन एवं संस्थान रूपी शरीर के प्राण हैं आयुर्वेद शिरोमणि श्रद्धेय आचार्य श्री व इस शरीर की आत्मा है- एक शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बौद्धिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हार्दिक आत्मिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक व यौगिक दिव्य भागवत् शक्ति से सम्पन्न एक जागा हुआ सन्यासी। इस संस्थान का प्रारम्भ से लेकर आज तक तथा आगे भी मूल उद्देश्य है मानवता व समष्टि की सेवा।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> माध्यम है- संगठन और संस्थान तथा इस सबके पीछे दृष्ट शक्ति है-गुरु तथा अदृष्ट शक्ति है-भगवान् अत: इस संगठन या संस्थान से जुडऩे से पूर्व इन तीन तत्वों का (सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संगठन व गुरु की महिमा) बौद्धिक चिन्तन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान अवश्य ही कर लेेना चाहिये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारमार्थिक अर्थ तो सेवा करते-करते स्वत: ही हमारे समक्ष उपस्थित हो जायेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धेय स्वामी जी महाराज कहते हैं कि जीवन में जब हम किसी श्रोत्रिय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मनिष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समर्थ गुरु के पास जाते हैं तो हममें सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्ठा का भाव जागृत होता है गुरु के प्रति निष्ठा व सेवा का भाव होने से संगठित होकर जीवन में सेवा और साधना करते हुए हम पूर्णता की ओर आगे बढ़ते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>I<span lang="hi" xml:lang="hi">.)       गुरुतत्व की महिमा: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुतत्व के सन्दर्भ में तीन बातों पर हमारे सभी साधक भाई-बहनों को गंभीरता से विचार करके गुरु की शरणागति में ही एक आध्यात्मिक दिव्य जीवन जीने के लिए पूर्ण समर्पित या प्रतिबद्ध होना चाहिये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">1.       अदृष्ट सत्य का दर्शयिता:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ समर्थ गुरुसत्ता व ऋषि परम्परा के आश्रय के बिना जीवन में नये आध्यात्मिक सत्य घटित नहीं हो सकते क्योंकि आध्यात्मिक जीवन में दो तरह के सत्य हैं एक है- दृष्ट सत्य अर्थात् ईश्वर का ज्ञात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूत्र्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दृश्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्यक्ष तथा विश्वमय रूप का दर्शन तथा दूसरा है- अदृश्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमूत्र्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अव्यक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परोक्ष एवं विश्वातीत ब्रह्माण्ड की अनुभूति एक ब्रह्मवेता गुरु के सान्निध्य से ही हो सकती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">2.       दिव्य आलम्बन:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बिना सात्विक आलम्बन के आध्यात्मिक जीवन की यात्रा को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। आधार या आलम्बन के बिना दुनिया में किसी भी जड़ या चेतन तत्व का अस्तित्व नहीं है। सांसारिक जीवन हो या फिर आध्यात्मिक जीवन हमें कोई न कोई आश्रय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आधार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आलम्बन या सहारे की आवश्यकता होती ही है। आध्यात्मिक जीवन में भगवान् की प्राप्ति या भगवान् की अनुभूति के लिये प्रत्यक्ष गुरुसत्ता का आलम्बन ही एकमात्र मार्ग है। </span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(35,111,161);" xml:lang="hi">परीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्ब्राह्मणो निर्वेदमायापास्त्यकृत: कृतेन।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span style="color:rgb(35,111,161);"><span lang="hi" xml:lang="hi">तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्समित्पाणि: श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्।। (मुण्डक.-</span>1/12)</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कृत</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">से </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कृत</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">ही पाया जा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी उत्पत्ति है और विनाश है वही मिल सकता है। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कृत</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">से </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अकृत</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं मिलता। ब्रह्म तो </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अकृत</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी उत्पत्ति नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विनाश नहीं। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अकृत</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अक्रतु</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">ही पा सकता है। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">तमक्रतु: पश्यति</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। उस </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अकृत</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को जानने के लिए समित्पाणि होकर श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरु के चरणों में उपस्थित होना आवश्यक है। सभित्पाणि का अभिप्राय है हाथ में तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मचर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धा रूपी तीन समिधाएं लेकर गुरु के पास शिष्य जाये। गुरु अग्रि स्वरूप है और शिष्य उस ज्ञानाग्रि रूप गुरु में स्वयं को समर्पित करके तद्रूप होना चाहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्रि स्वरूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान स्वरूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु स्वरूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु का प्रतिरूप होना चाहता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">3.       शाश्वत का प्रतिनिधि:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् का हम वैज्ञानिक प्रत्यक्ष दृष्ट या मूत्र्त प्रमाणों से अस्तित्व सिद्ध नहीं कर सकते। आत्मकार्य सिद्धान्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सृष्टि चक्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्मफल व न्याय व्यवस्था सिद्धान्त आदि के आधार पर हम भगवान् का अस्तित्व मानते हैं। कारणाभावात् कार्याभाव: (वैशे- </span>1/32)<span lang="hi" xml:lang="hi">। अर्थात् कारण के अभाव से कार्य का अभाव हो जाता है जैसे धागे के अभाव में वस्त्र का अभाव तथा मिट्टी के अभाव में घड़े का अभाव दिखाई देता है। मिट्टी कारण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घड़ा कार्य है। इसी प्रकार यह संसार कार्य है और भगवान् इसका निमित्त कारण है। इसलिए संसार को देखकर इसके बनाने वाले ईश्वर का अनुमान तो होता है परन्तु वह कैसा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका ज्ञान तो केवल कोई समर्थ गुरु ही करा सकता है। मूलत: ब्रह्म एक अदृष्ट परम सत्य या परमसत्ता है। गुरु भगवान् की दिव्यता से अभिभूत ईश्वरीय ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वरीय संवदेना व ईश्वरीय शक्ति के मूर्त रूप होते हैं उनमें साधना व सेवा के द्वारा ईश्वरीय दिव्यता अवतरित हो जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे इस ईश्वरीय सत्ता या शाश्वत के प्रतिनिधि या प्रतिरूप या मूत्र्तरूप होते हैं। ऐसे समर्थ गुरुसत्ता या आप्त पुरुषों का पावन सान्निध्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्संग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मार्गदर्शन व शरणागति ही हमारे जीवन का परम सौभाग्य व परम कल्याण है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">4.       दिव्य रूपान्तरण का कर्ता:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु की महिमा को समझना यद्यपि भगवान् की महिमा को समझने जैसा है परन्तु फिर भी यथा शक्ति ग्रहण शीलता का प्रयास तो किया ही जा सकता है यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन का समस्त आमूल-चूल दिव्य रूपान्तरण करना चाहता है तो उसका एकमात्र आधार गुरु ही है। गुरुतत्व वह है जो हमारी आन्तरिक मूर्छा को तोड़कर हमें जगा दे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयं से परिचय करा दे और अन्त में अपने जैसा बना दें। गुरु उस पारस के समान नहीं है जो लोहे को सोना बना दें अपितु वह तो उस भृंगी कीट की भाँति है जो भिन्न-भिन्न जाति के कीड़े अपने मिट्टी के घर में बन्द करके एक निश्चित अवधि के बाद उन्हें अपने ही स्वरूप वाला बनाकर बाहर निकलता है और तब तक बाहर की बाकि सब अवाजें बंद करके उसे एक ही आवाज सुनाता है कि तू भृंगी है। हमारे दोषों के दर्शन तो अनेक लोग ऊँगली उठाकर करते-कराते रहते हैं परन्तु उनके उन आरोपों या दोषारोपण से कोई परिवर्तन जीवन में नहीं आ पाता है जबकि पूज्य आचार्य श्री व श्रद्धेय स्वामी जी महाराज की कृपा से करोड़ों लोगों के जीवन में भिन्न-भिन्न प्रकार के दिव्य परिवर्तन घटित हुए हैं। कई बार हम गुरु को ही नसीहत या सुझाव देने लगते हैं कि स्वामी जी देश में कुछ ऐसे भी लोग हैं जो दूर-दराज गाँवों में रहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गरीब हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्यादा पढ़े-लिखे भी नहीं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोगी होने पर इलाज भी नहीं करा पाते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमें उनके बारे में भी कुछ सोचना चाहिये। फिर स्वामी जी उत्तर देते हैं इस महान् कार्य को सम्पन्न करने के लिए ही मैंने तुम्हारा चयन किया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">5.       अनन्त धैर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम व करुणा के अवतार:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु के बारे में श्री अरविन्द लिखते हैं कि गुरु में माँ के समान अनन्त करुणा व प्रेम तथा पिता के समान अनन्त धैर्य होता है और इस रूप का दर्शन मैंने अपने गुरुदेव श्रद्धेय स्वामी जी महाराज में किया है। अत: भगवान् की अहैतुकी कृपा से ऐसा गुरु हमारे पास है। स्वयं भगवान् और गुरु आपके शरीर के माध्यम से एक बड़ी दिव्य अभिव्यक्ति करना चाहते हैं। क्या आप उन्हें वैसा करने देंगे</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि हाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आपको अपने भाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाणी और क्रिया में एकरूपता लाते हुए सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संगठन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्थान व गुरु की महिमा को जानते हुए निर्भय तथा निद्र्वन्द होकर पतंजलि योगपीठ से जुड़ जाना चाहिये। जब कभी चेतना का स्तर नीचे की ओर जाने लगे तो आपको दृढ़ता पूर्वक यह संकल्प दोहराना चाहिये कि </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं अपने भगवान् और गुरु की अमानत हूँ और कोई भी अशुभ मुझे छू नहीं सकता है</span>’’ <span lang="hi" xml:lang="hi">जब व्यक्ति गुरु के प्रति खुला हुआ या ग्रहणशील होता है तब गुरु कृपा उसके अन्दर तुरन्त प्रवेश कर जाती है और ऐसे चमत्कार घटित होते हैं कि वर्षों का कार्य कुछ दिनों में तथा कभी-कभी तो कुछ घंटों में भी सम्पन्न हो जाता है। व्यक्ति को लगता है कि मेरे जीवन में तो हँसते-खेलते सहज रूप से दिव्य रूपान्तरण घटित हो रहा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>II<span lang="hi" xml:lang="hi">.)      सेवा का स्वरुप: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">''<span lang="hi" xml:lang="hi">सेवाधर्म: परम गहनो योगिनामप्यगम्य।</span>‘’ <span lang="hi" xml:lang="hi">यद्यपि यह सेवा तत्व इतना गहन व गम्भीर है कि योगियों को भी यह बहुत कठिनता से ही समझ में आता है फिर भी इस तत्व के बारे में चिन्तन करना अत्यावश्यक है। सेवा से अभिप्राय है जब हम अपनी शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बौद्धिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाचिक या आत्मिक आदि किसी भी प्रकार की शक्ति को आंशिक रुप में बिना किसी स्वार्थ के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्म संतुष्टि हेतु दूसरों के हित के लिए खर्च करते हैं यह सेवा है। श्रद्धेय स्वामी सोमानन्द जी महाराज के शब्दों में अपनी ही इच्छा से दूसरे के दु:खों को गले से लगाना ही सेवा है। सेवा की कभी कीमत नहीं आंकी जा सकती है क्योंकि सेवा अमूल्य होती है। सेवा वह द्वार है जिसमें वह प्रवेश करके हम सहज ही उस आनन्द तक पहुँच जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ योगियों का बड़ी-बड़ी तपस्याएं करके पहुँचना सम्भव है। जो शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामथ्र्य व आनन्द किसी स्वामी (मालिक) को अत्यन्त अथक पुरुषार्थ करके प्राप्त हो पाता है वह एक सेवक को सहज ही उपलब्ध हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">1.       तीन प्रकार की सेवा:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तामसिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजसिक व सात्विक रुप में सेवा तीन प्रकार की होती है। योग और अध्यात्म के माध्यम से की जाने वाली सेवा सात्विक सेवा है। सात्विक वैचारिक सेवा के रूप में हमारे पूर्वज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि-मुनि-योगी प्रतिदिन प्रार्थना किया करते थे-</span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वे भद्राणि पश्यन्तु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मा कश्चिद् दु:खभाग् भवेत्</span>’’ <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जिस प्रकार का हम चिन्तन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी प्रकार की शक्तियों को हम इस धरती पर आकर्षित व अवतरित करने का आह्वान करते हैं। सेवा और कर्म में प्रकाश और अंधकार जैसा अंतर है। एक तरफ  सामान्य कर्म हमारे बन्धन का कारण है तो दूसरी तरफ  दिव्य कर्म या सेवा हमारी मुक्ति का द्वार है। आप अपने घर में झाड़ू लगाते हैं और एक मंदिर में जाकर लगाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक मकान अपने घर में बनाते हैं और दूसरा किसी मंदिर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आश्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्कूल या धर्मशाला में बनवाते हैं दोनों का अनुभव (स्नद्गद्गद्यद्बठ्ठद्द) अलग होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यद्यपि जागरूक न रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वहाँ भी अहंकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वार्थपरता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एषणा आदि का प्रवेश सेवा को नष्ट कर सकता है</span>,</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">2.       अनन्त सुख सौभाग्य का आधार सेवा:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्येक व्यक्ति को दिन भर में कम से कम एक दो घण्टे तो ऐसे सार्थक सृजनात्मक व लोक हितकारी कर्म अवश्य करने चाहिये जिनमें उनको सांसारिक दृष्टि से कोई फल मिलने की आशा नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु यह है बहुत आवश्यक क्योंकि यही नि:स्वार्थ सेवा हमारे इस जीवन के अदृष्ट सौभाग्य अर्थात् यह सेवा अनन्त गुणा होकर हमारे वैयक्तिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारिवारिक व्यवसायिक व अध्यात्मिक जीवन में सुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफलता व शान्ति का कारण बनती है तथा पुनर्जन्म में भी हमारे साथ जाती है पैसा तो इस जीवन का यही रह जाता है सेवारूपी पुण्य ही हमारे पुनर्जन्म के माता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफलता व समृद्धि का कारण बनती है। इसे ही समाज व शास्त्र में श्रेष्ठ प्रारब्ध या ऊँची किस्मत या भाग्य भी कहते हैं। सच्चा सेवा तत्व इस धरती पर भगवान् का वरदान है। परम सौभाग्यशाली हैं वे लोग जिन्हें यह अनमोल तत्व रत्न उपलब्ध हो गया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा का फल:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong><span style="color:rgb(35,111,161);">क.</span> बाह्य फल:</strong> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">योग एवं सेवा का फल क्या है- इसका इस संसार में सबसे बड़ा उदाहरण है पतंजलि योगपीठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य आचार्य श्री व श्रद्धेय स्वामी जी का जीवन। पतंजलि की सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक व आध्यात्मिक सफलता व पूज्य आचार्य श्री व श्रद्धेय स्वामी जी का पुण्यों से प्रकाशित दिव्य जीवन। जिसमें इस भौतिक व आध्यात्मिक जीवन की सफलता का एक आदर्श रूप दिखता है यह सब योग ध्यान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् की भक्ति उपासना एवं सेवा का ही तो फल है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ख. आन्तरिक फल:</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> जिस प्रकार अन्नादि आहार शरीर की पुष्टि एवं तृप्ति के कारण बनते हैं उसी प्रकार सेवा हमारे आन्तरिक अस्तित्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन-बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय व आत्मा की पुष्टि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तृप्ति व उत्कर्ष का कारण बनती है। एक सच्चे सेवक को अतिरिक्त साधन की आवश्यकता नहीं होती। हमारे आन्तरिक अस्तित्व की शुद्धि पवित्रता एवं अहंकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वेष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईष्र्या आदि दोषों के नाश का कारण बनती हैं क्योंकि सेवा करते समय व्यक्ति को विविध प्रकार के लोगों के बीच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विविध संस्कारों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मान्यताओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रुचियों व धारणाओं वाले व्यक्तियों के बीच रहना पड़ता है। वे अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थियाँ हमारे द्वन्दों की नाशक तथा द्वन्द सहन कर तपस्या करवाने की कारण बन जाती हैं। जागरूक सेवक व्यक्ति प्रत्येक घटना या परिस्थिति को भगवान् का उपहार समझकर स्वीकार करता है तथा उस उपहार को भगवान् का अनुग्रह कृपा सन्देश समझकर जीवन में आगे बढ़ जाता है। श्रद्धेय स्वामी सोमानन्द जी महाराज कहा करते थे- सेवक को ना कहने का अधिकार नहीं होता है। वे कहते थे- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सेवक तो कोई बिरला है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो आठों पहर रहे जाग</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अत: जिन आत्माओं को आगे जन्म-मरण का कारण तैयार नहीं करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई कर्माशय नहीं बनाना अपितु जीवन मुक्त होकर जीने की इच्छा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या फिर भगवान् ने उनको मोक्षाधिकारी के रूप में चुन लिया है केवल वही आत्माएं इस सेवा तत्व का या सेवाकर्म का चयन करती हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा के आदर्श:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">क. समष्टिगत दैवी शक्तियाँ:</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रकृति में धरती माता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चन्द्रमा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वायु आदि दिव्य शक्तियाँ हमारे लिए सेवा के आदर्श है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि इस सृष्टि में जो कुछ भी सृजन या क्रिया हो रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके मूल आधार ये दिव्य शक्तियां ही हैं। इनके अभाव में कोई भी कर्म होना सम्भव नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी ये मौन सेवा करते हुए कभी श्रेय लेने हेतु ताली नहीं बजवाना चाहते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मंच पर चढऩे की आकांक्षा नहीं रखते अपितु सब क्रियाओं का श्रेय हम मनुष्यों को लेने देते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ख. आदर्श महापुरुष:</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> चेतन आत्माओं में शबरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हनुमान जी आदि के उदाहरण हमारे लिए आदर्श है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन कुछ लोग रामायण और उसके उच्चादर्श चरित्रों को काल्पनिक मानते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे जड़ बुद्धि वाले लोग सेवा के आदर्श के रूप में साक्षात पूज्य आचार्य जी तथा श्रद्धेय स्वामी जी महाराज को देख सकते हैं। आज पतंजलि योगपीठ के माध्यम से जो कुछ भी इस देश और दुनिया में हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस सब क्रिया मात्र का मूल कारण हैं- पूज्य आचार्य जी व स्वामी जी महाराज की सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तप व पुरुषार्थ। परन्तु सब कुछ का मूल कारण होते हुए भी वे सदा श्रेय दूसरों को ही देते हैं। कभी भी हमने उनको कर्तृव्य के अहंकार से युक्त होते नहीं देखा अर्थात् सब कुछ करते हुए भी कुछ भी न करने जैसी विनम्रता इतना अखण्ड-प्रचण्ड पुरुषार्थ करने के बावजूद भी भाग्य या कर्माशय की कोई रेखा उन्होंने अपनी हथेली पर नहीं पडऩे दी। संसार में सबसे बड़ा सौभाग्यशाली वही है जिसके हाथ में कोई भाग्य की रेखा नहीं है अर्थात् जिसने पुण्यात्मक कर्माशय भी नहीं बनने दिया अपितु निष्काम सेवा से जीवन मुक्त पद को प्राप्त किया है। अखण्ड प्रसन्नता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विनम्रता व दिव्यता से युक्त उनका जीवन हमारे लिए सेवातत्व का उच्च आदर्श है। इसलिए सेवा करते समय शास्त्रदि का ज्ञान ज्यादा ना हो तो भी पूज्य आचार्य जी व श्रद्धेय स्वामी जी महाराज के आचरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाणी व व्यवहार व जीवन को अपने सामने रख लेना सेवातत्व के कोहिनूर से स्वत: परिचय हो जायेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>III<span lang="hi" xml:lang="hi">.) संगठन का स्वरूप:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य स्वामी जी महाराज बार-बार एक बात को कहते हैं कि योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यात्म एवं सामाजिक जीवन का एक बहुत बड़ा सत्य है कि मनुष्य इस धरती पर भगवान् की सर्वश्रेष्ठ रचना है तथा उसका इस संसार के प्रति सबसे बड़ा उत्तरदायित्व भी है। हमारे अस्तित्व अर्थात् हमारे जन्म से लेकर अन्तिम श्वास मृत्यु तक इस समष्टि समाज या संसार का हम पर बहुत बड़ा उपकार है। अत: एकाङ्गी जीवन व एकाङ्गी दृष्टिकोण यह जीवन के लिए शुभ नहीं होता। स्वयं योग करना तथा कराना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयं पुरुषार्थ व धर्मार्थ साधना व सेवा करना तथा कराना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयं सत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् व वेद के मार्ग पर चलना तथा औरों को चलाना स्वयं देशभक्त होना तथा दूसरों को भी राष्ट्रभक्त बनाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयं स्वदेशी का प्रयोग करना अन्यों को भी स्वदेशी के मार्ग पर लाना यह है- संगठन एवं संगठित जीवन का मूल सिद्धान्त। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संगठन उस शक्ति को कहते है- जिसमें अनेक दिव्य आत्माएं एक साथ किसी विराट् उद्देश्य की पूर्ति हेतु किसी एक आदर्श व्यक्तित्व के आदेशानुसार अपनी वाणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रियाएं व जीवन की यात्रा को आगे बढ़ाते हैं। ऋग्वेद का अन्तिम सूक्त </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">संगठन सूक्त</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भी हमें संगठन की महिमा को बतलाता है। संगठन में भिन्न आत्माएं होते हुए भी उन सबके विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्धान्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय तथा लक्ष्य एक समान होते हैं। जिस प्रकार रेलवे स्टेशन पर अनेकों प्लेटफॉर्म होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनेकों यात्री होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर उनमें से कुछ यात्री किसी एक विशेष प्लेटफॉर्म पर चुपचाप एकत्रित हो जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये वे यात्री हैं जिनकी यात्रा का लक्ष्य एक ही दिशा में है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी दिशा में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी ट्रेन से सबको आगे बढ़कर अपने लक्ष्य पर पहुँचना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए वे जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्ग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समूह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मजहब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रान्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाषा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेशभूषा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मान्यता आदि के सब दृश्य भेदों से ऊपर उठकर एक साथ आनन्द से ट्रेन में यात्रा करते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संगठन की महिमा:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संगठन का सबसे बड़ा जीवन्त उदाहरण है हमारा शरीर में करोड़ों सूक्ष्म कोशिकाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनसे बनने वाले ऊतक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवयव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्मेन्दियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञानेन्द्रियाँ एवं अन्त:करण चतुष्टय है। एक छोटे से पिण्ड में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड समाहित है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">क. किसी भी बड़ी उपलब्धि का आधार-संगठन:</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> व्यक्ति का अपना अस्तित्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज या सम्पूर्ण राष्ट्र एक संगठन का ही स्वरूप है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्तिगत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारिवारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक या राष्ट्रीय स्तर की कोई बड़ी उपलब्धि कभी भी संगठन के बिना उपलब्ध नहीं हो सकती है। जैसे व्यक्तिगत बड़ी उपलब्धि हेतु व्यक्ति को अपने भाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन-बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रियां</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय व आत्मा को एक ही प्लेटफार्म पर अर्थात् एक ही दिशा में लगाना होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि ये सब भिन्न-भिन्न दिशाओं में गति करें तो व्यक्तिगत रूप से कोई बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं हो सकती है इसी प्रकार परिवार के सब सदस्यों के एकमत होने से पारिवारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाज व राष्ट्र के किसी लक्ष्य विशेष के हेतु एकजुट होने से सामाजिक या राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी उपलब्धि हो सकती है। प्रकृति से भी हम संगठन की महिमा को समझ सकते हैं। चींटी या मधुमक्खी यद्यपि छोटा सा प्राणी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य उसकी तुलना में अत्यन्त विराट् है किन्तु वही छोटा सा प्राणी जब संगठन के रूप में संगठित हो जाता है तो बलवान् से बलवान् व्यक्ति भी उनकी शक्ति से डरकर उन्हें कोई क्षति पहुँचाने का दुस्साहस नहीं कर पाता। इसी प्रकार साधारण से दिखने वाले व्यक्ति भी जब किसी एक प्रबल नेतृत्व के सानिध्य में एकत्रित हो जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वे असाधारण कार्य कर दिखाते हैं। पतंजलि योगपीठ इसका साक्षात प्रमाण है। इसी प्रकार कौओं का या बन्दरों का संगठन भी जग विख्यात है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संगठन में गुरु निर्देश सर्वोपरि:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो व्यक्ति संगठन की शक्ति व महिमा को पहचानते हैं वे संगठन के निर्देशों का सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पावन वेदमंत्रों के समान करते हैं। महत्त्वपूर्ण यह नहीं होता कि वह निर्देश किसके माध्यम से मिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महत्त्वपूर्ण यह है कि- निर्देश मेरे गुरु का है और गुरु इस धरती पर भगवान् का ही सगुण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साकार रूप हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए एक तरह से यह निर्देश मेरे भगवान् का ही है। जो पुत्र अपने माता-पिता से अत्यन्त प्रीति व विश्वास करता है वह उनका पत्र मिलने पर यह ध्यान नहीं देता कि पत्र कौन-सा डाकिया लेकर आया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु उसका ध्यान तो इस पर होता है कि पत्र में क्या संदेश मेरे लिए आया है। इसी प्रकार संगठन में भी किसी एक गुरु के निर्देशानुसार सर्वहितकारी किसी बड़े लक्ष्य की प्राप्ति हेतु सब उसी दिशा में यथाशक्ति पुरुषार्थ करते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संगठन की कार्य पद्धति:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">अनासक्ति का भाव:</span></strong></span></h5>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"> संगठन में सेवा करने हेतु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संगठन के मूल व्यक्ति के प्रति श्रद्धा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्ठा व विश्वास तथा अपने व्यक्तिगत आसक्तियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आग्रहों व मान्यताओं का त्याग करना होता है। यदि अनासक्ति का भाव नहीं है तो व्यक्ति के माध्यम से कोई बड़ी अभिव्यक्ति नहीं हो पायेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संगठन कार्यों की शिथिलता का हेतु देते समय वह अपने ही परिवार की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुकान की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिजनेस की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मजबूरी गिनाता रहेगा। आसक्ति के कारण अपने विचारानुकूल </span>2-4<span lang="hi" xml:lang="hi"> लोगों के ग्रुप विशेष में ही अटककर रह जायेगा। आसक्ति के कारण दोष होने पर भी अयोग्य व्यक्ति का त्याग और योग्य व्यक्ति का सम्मान या स्वीकार नहीं कर पायेगा। संगठन में सेवा करने के लिए व्यक्ति को मोहन बनना पड़ेगा। अर्थात् मोह+न। मोहन नाम ईश्वर का है। वह सबसे प्रेम तो करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर मोह नहीं करता इसीलिए सबके साथ न्याय कर पाता है और इतने बड़े सृष्टि रूपी संगठन को कुशलता से चला पाता है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(0,0,0);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय की विशालता:</span></strong></span></h5>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(0,0,0);"> </span>संगठन में सेवा करने के लिए व्यक्ति को गणेश भी बनना पड़ता है अर्थात् </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">गणाना ईश इति गणेश</span><span lang="hi" xml:lang="hi">। गणेश  के बड़े कान व बड़ा पेट इस बात का प्रतीक है कि गण के स्वामी को सबकी पूरी बात सुननी चाहिये और सुनकर उसे अपने पेट में डालकर डायजेस्ट भी करना आना चाहिये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अगर ऐसा नहीं होगा तो किसी एक पक्ष की बात सुनकर वैसा आग्रह बनाकर दूसरे के साथ न्याय नहीं कर पायेगा और फलस्वरूप संगठन का विस्तार नहीं ह्रास ही होगा। संगठन में पूज्य आचार्य श्री व श्रद्धेय स्वामी जी महाराज सबसे ज्यादा सेवा निरन्तर करते हैं और उसका श्रेय कभी अपने मुख से स्वयं को नहीं देते सबका सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सबके साथ प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सबके साथ निर्वैर तथा निरहंकार अवस्था में रहते हुए संगठन के नेतृत्व का आदर्श</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। इस प्रकार का सेवानिष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्कपट आचरण करते हुए पिछले लगभग दो दशक में उन्होंने इस विराट् लक्ष्य की यात्रा को वर्तमान पड़ाव तक पहुँचाया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम सब उसका शतांश आचरण भी करें तो जीवन में संगठन के माध्यम से काफी बड़ी उपलब्धि को पाया जा सकता है।</span></h5>
</li>
</ul>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Jan 2017 21:52:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पतंजलि योगविज्ञान शिविर, नेपाल</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">योगऋषि स्वामी रामदेव</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2294/patanjali-yog-vigyan-shivir-nepal"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/324.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि देगा नेपाल के  हजारों युवकों को रोजगार :</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">नेपाल के राष्ट्रपति ने किया पतंजलि आयुर्वेद का उद्घाटन</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">लाखों नेपाल वासियों के बीच प्रधानमंत्री प्रचण्ड ने पूज्यवर के साथ किया योगाभ्यास</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नेपाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नवम्बर। पतंजलि योगपीठ द्वारा नेपाल में आयोजित शिविर में हजारों नेपाल वासियों ने सहभागिता की एवं पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज द्वारा बताये स्वस्थ जीवन के अनेक योगसूत्र सीखे। शिविर के प्रथम दिन नेपाल की राष्ट्रपति श्रीमती विद्यादेवी भंडारी पधारीं और वहां चल रहे पांच दिवसीय शिविर एवं पतंजलि आयुर्वेद का शिलान्यास किया। उन्होंने योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज से मुलाकात में स्वस्थ एवं समृद्धशाली नेपाल पर विशेष चर्चा की।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नेपाल के वीरगंज स्थित आदर्श नगर रंगशाला में योग विज्ञान शिविर में नेपाल के राष्ट्रपति ने कहा- नेपाल ऋषि-मुनियों की साधना स्थली है। नेपाल को प्रकृति ने अनुपम उपहार दिये हैं। यदि यहां के लोग योग को अपनाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो नेपाल में स्वस्थ समाज की स्थापना होगी।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/368.jpg" alt="36"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीमती भंडारी जी ने योग-आयुर्वेद के क्षेत्र में योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज की सराहना करते हुए कहा कि स्वामी रामदेव के प्रयास से दुनियां में योग के प्रति जागरूकता आई और विश्व के करोड़ों लोग इस योग से ऊर्जित हो निरोग बने हैं। वहीं आचार्य जी के पुरुषार्थ से नेपाल व दुनियां के अनेक देशों में पैदा होने वाली जड़ी बूटियों के प्रति वहां के लोगों में आयुर्वेदिक महत्व बढ़ा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज ने कहा नेपाल एक हजार वर्ष पुराना देश है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह देश अध्यात्म के लिए पूरी दुनियां में जाना जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यहां लोग जब बलि प्रथा अपनाते हैं तो कष्ट होता है। इसका कारण है धार्मिक त्रुटियां जिसे दूर करना हमारा भी धर्म है। स्वामी जी ने कहा अब नेपाल में वंशवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जातिवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माओवाद नहीं योगवाद चलेगा। जरूरत है शांति के लिए संविधान में सबको बराबरी का हक मिले।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज ने नेपाल वासियों के जीवन में निरोगता एवं समृद्धि लाने के लिए पतंजलि द्वारा हर संभव योगदान का संकल्प व्यक्त किया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने कहा नेपाल में प्राकृतिक वनौषधियों का अकूत भंडार है। नेपाल में उत्पादित होने वाली प्राकृतिक जड़ी-बूटियों एवं वनौषधियों के प्रसंस्करण पर बल देते हुए उन्होंने कहा इस प्रयोग से नेपाल के लाखों युवाओं को रोजगारोन्मुख किया जा सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हजारो युवाओं को रोजगार:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज नेपाल की राष्ट्रपति विद्या भंडारी के साथ दक्षिण नेपाल के बारा जिले में पतंजलि आयुर्वेद ग्रामोद्योग के नए संस्थान के उद्घाटन अवसर पर कहा कि वह नेपाल में अरबों रुपये का निवेश करेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे हजारों युवाओं के लिए रोजगार पैदा होंगे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी जी महाराज ने इस अवसर पर फेडरेशन ऑफ नेपाली चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के सदस्यों और अधिकारियों के साथ भी बातचीत की।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक अन्य सभा में नेपाल के प्रधानमंत्री श्री पुष्पकमल दहाल प्रचण्ड ने कहा पतंजलि आयुर्वेद ग्रामोद्योग में जैविक औषधियों और अन्य उत्पादों के विनिर्माण से बड़ी संख्या में स्वामी जी आयुर्वेदिक दवाओं का उत्पादन करेंगे और इससे हजारों युवाओं को प्रत्यक्ष रूप से और नेपाल के लाखों किसानों व अन्य गरीब वर्ग को अप्रत्यक्ष रोजगार प्राप्त होगा। आगे पतंजलि योगपीठ की स्थापना भी अब यहां के गांव-गांव में होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें लोगों को जड़ी-बूटी की खेती करने व स्वस्थ रहने के लिए नित्य योगाभ्यास से जोड़ा जायेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म बलि प्रथा की अनुमति नहीं देता:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">छिन्नमस्ता भगवती शक्तिपीठ साखड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सप्तरी में हजारों-लाखों को बलि प्रथा निवारण हेतु संकल्पित कराते हुए योगऋषि पूज्य स्वामी जी ने कहा कि नेपाल में बलि प्रथा बंद होनी चाहिए। क्योंकि कोई धर्म बलि प्रथा की अनुमति नहीं देता। वास्तव में श्रेष्ठ कर्म को धर्म मानकर कार्य करने से ही विकास संभव होगा। वास्तव में बलि प्रथा अंधविश्वास है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/324.jpg" alt="32"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञातव्य कि ऐतिहासिक गढ़ीमाई मेला पांच वर्ष में एक बार लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां करीब डेढ़ लाख पशुओं की बलि होती है। इसी प्रकार अनेक स्थल हैं। स्वामी जी ने कहा आगे भी वह बलि प्रथा रोकने के लिए मंदिर के पुजारी व प्रबुद्धजनों से बातचीत करके समाधान निकालते रहेंगे। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने कहा पतंजलि योगपीठ करोड़ों की आयुर्वेदिक औषधियां सस्ते दामों में नेपाल को भेजता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे योगपीठ को  प्रतिवर्ष ५० करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। नेपाल में उद्योग स्थापित होने से आयुर्वेदिक औषधियां सस्ते दामों में नेपाल को मिलेंगी और नेपाल स्वयं भी समृद्धशाली हेगा।</span></h5>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्था समाचार</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Jan 2017 21:50:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>स्वस्थ नेपाल-सशक्त नेपाल का उद्घोष करतीं वीरगंज,  नेपाल योगशिविर की दृश्यावलियां</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:center;"><strong>नेपाल में पतंजलि आयुर्वेद के शिलान्यास समारोह में मंचासीन नेपाल की राष्ट्रपति श्रीमती विद्यादेवी भंडारी, पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज, श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज एवं गणमान्य</strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/373.jpg" alt="37" /></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/525.jpg" alt="52" /></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong>बांये वीरगंज योगशिविर में पूज्यवर के सानिध्य में लाखों की संख्या में योगाभ्यास करती जनमेदिनी के बीच बाल प्रतिभाओं के  साथ मंचासीन योगाभ्यास करते नेपाल के प्रधानमंत्री श्री पुष्पदहल कमल प्रचण्ड जी व दायें नेपाल कार्यकर्ता गोष्ठी</strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/117.jpg" alt="11" /></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/535.jpg" alt="53" /></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong>नेपाल पहुंचने पर अपने आध्यात्मिक अभिभावक योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज का भावभरा स्वागत-सम्मान करते नेपाल पतंजलि योगपीठ के कार्यकर्तागण</strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/654.jpg" alt="65" /></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/437.jpg" alt="43" /></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong>  (बांये) पावन यज्ञ के साथ पतंजलि आयुर्वेद का</strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/516.jpg" alt="51" /></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/586.jpg" alt="58" /></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong>नेपाल</strong></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2295/swasth-nepal-sashakt-nepal-ka-udghosh-karti-viraganj-nepal-yogshivir-ki-drishyavaliyan"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/117.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:center;"><strong>नेपाल में पतंजलि आयुर्वेद के शिलान्यास समारोह में मंचासीन नेपाल की राष्ट्रपति श्रीमती विद्यादेवी भंडारी, पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज, श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज एवं गणमान्य</strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/373.jpg" alt="37"></img></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/525.jpg" alt="52"></img></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong>बांये वीरगंज योगशिविर में पूज्यवर के सानिध्य में लाखों की संख्या में योगाभ्यास करती जनमेदिनी के बीच बाल प्रतिभाओं के  साथ मंचासीन योगाभ्यास करते नेपाल के प्रधानमंत्री श्री पुष्पदहल कमल प्रचण्ड जी व दायें नेपाल कार्यकर्ता गोष्ठी</strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/117.jpg" alt="11"></img></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/535.jpg" alt="53"></img></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong>नेपाल पहुंचने पर अपने आध्यात्मिक अभिभावक योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज का भावभरा स्वागत-सम्मान करते नेपाल पतंजलि योगपीठ के कार्यकर्तागण</strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/654.jpg" alt="65"></img></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/437.jpg" alt="43"></img></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong> (बांये) पावन यज्ञ के साथ पतंजलि आयुर्वेद का शुभारम्भ करते पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज, श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज एवं अतिथिगण तथा पूज्यवर के गले लगकर आशीर्वाद लेते श्री प्रचण्ड जी, प्रधानमंत्री नेपाल (दांये)</strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/516.jpg" alt="51"></img></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/586.jpg" alt="58"></img></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong>नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री श्री झलनाथ खलान जी पूज्य स्वामी जी महाराज से आशीर्वाद लेते (बांये) तथा छिन्नमस्ता भगवती शक्तिपीठ साखड़ा, सप्तरी में ऋषियुग्म के सानिध्य में बलिप्रथा निवारण हेतु संकल्पित होती हजारों की जनमेदिनी (दांये)</strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/344.jpg" alt="34"></img></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong>  नेपाल योग शिविर के दौरान पतंजलि आंदोलन से जुड़े अनेक कार्यकर्ताओं के साथ रक्तदान करते पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज </strong></p>
<p style="text-align:center;"> </p>
<p style="text-align:center;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्था समाचार</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Jan 2017 21:48:54 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ज्ञान की जिज्ञासा बनाम प्रभुत्व की जिज्ञासा</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> इतिहास के प्रामाणिक स्रोतों और सन्दर्भों पर चर्चा से पूर्व कुछ अन्य मूलभूत तथ्य भी वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जानना आवश्यक है। यूरोप में विगत 200 वर्षों में ज्ञान की एक भूख जगी और उसी अवधि में ज्ञात यूरोपीय इतिहास में पहली बार राष्ट्र-राज्यों का उदय हुआ। यूरोप के लिए राष्ट्र-राज्य एक अद्भुत वस्तु थे। क्योंकि उनके ज्ञात इतिहास में एक भी बड़ा राष्ट्र-राज्य कभी हुआ ही नहीं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रोम (जिसका मूल नाम </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">रामस्’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">राम’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका अर्थ भगवान राम का नगर है) मूलत: एक छोटा-सा गाँव था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ पहले आस पास के कुछ गाँवों में</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2296/gyan-ki-jigyasa-banam-prabhutva-ki-jigyasa"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/295.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> इतिहास के प्रामाणिक स्रोतों और सन्दर्भों पर चर्चा से पूर्व कुछ अन्य मूलभूत तथ्य भी वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जानना आवश्यक है। यूरोप में विगत 200 वर्षों में ज्ञान की एक भूख जगी और उसी अवधि में ज्ञात यूरोपीय इतिहास में पहली बार राष्ट्र-राज्यों का उदय हुआ। यूरोप के लिए राष्ट्र-राज्य एक अद्भुत वस्तु थे। क्योंकि उनके ज्ञात इतिहास में एक भी बड़ा राष्ट्र-राज्य कभी हुआ ही नहीं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रोम (जिसका मूल नाम </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">रामस्’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">राम’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका अर्थ भगवान राम का नगर है) मूलत: एक छोटा-सा गाँव था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ पहले आस पास के कुछ गाँवों में भरतवंशी क्षत्रिय शकों ने आधिपत्य स्थापित किया और फिर क्रमश: कुछ समय के लिए वह विशाल क्षेत्र में भी फैला। परन्तु एक तो उसकी सीमा कभी भी स्थिर नहीं थी और दूसरे वह कोई राष्ट्र-राज्य नहीं था।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रोम साम्राज्य की चर्चा वे अवश्य करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु रोम (जिसका मूल नाम </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">रामस्’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">राम’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका अर्थ भगवान राम का नगर है) मूलत: एक छोटा-सा गाँव था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ पहले आसपास के कुछ गाँवों में भरतवंशी क्षत्रिय शकों ने आधिपत्य स्थापित किया और फिर क्रमश: कुछ समय के लिए वह विशाल क्षेत्र में भी फैला। परन्तु एक तो उसकी सीमा कभी भी स्थिर नहीं थी और दूसरे वह कोई राष्ट्र-राज्य नहीं था। एक फैलती और सिकुड़ती जागीर थी। बाद में केवल लोगों के चित्त में एक प्रभाव और प्रचार की दृष्टि से </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">होली रोमन एम्पायर</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की बात अवश्य की गयी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु सत्य यह है कि किसी एक इलाके को कभी भी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">होली रोमन एम्पायर’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं कहा गया। इस तथ्य का उल्लेख पिछले अंक में किया जा चुका है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यूरोप का जो वर्तमान क्षेत्र है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे यूरोप भी पहली बार 19वीं शताब्दी ईस्वी में ही कहा गया है। जैसा कि नॉर्मन डेविस की प्रसिद्ध पुस्तक </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">यूरोप : ए हिस्ट्री’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इण्ट्रोडक्शन’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में ही पृ.-7 पर लेखक ने स्पष्ट किया है कि यूरोप एक नितान्त आधुनिक </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आइडिया’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">है। (कुछ नकलची भारतीय नेता और बौद्धिक आजकल उसी नकल में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इण्डिया’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को भी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आइडिया’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि वह लाखों वर्षों से एक वास्तविक जीवन्त भौगोलिक सत्ता से सम्पन्न राष्ट्र है।) वस्तुत: जब विज्ञान की खोजों के 17वीं शताब्दी ईस्वी में फैलने के साथ क्रिश्चियनिटी बदनाम होने लगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">क्रिस्टेनडम’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की जगह </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">यूरोप’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नामक आइडिया फैलाया जाने लगा। 18वीं शताब्दी ईस्वी तक यूरोप नाम की कोई वस्तु विश्व में प्रसिद्ध नहीं थी। वह भौगोलिक क्षेत्र तो करोड़ों वर्षों से है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु उसका नाम यूरोप नहीं था। उसके नाम लगातार बदलते रहे हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस यूरोप को जो भी स्मृति विगत 200 वर्षों में है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें इसे कुल 2 प्रमुख राजनैतिक इकाइयाँ विदित हैं। पहला है- रोम साम्राज्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो नितान्त अस्थायी वस्तु-सत्ता रही और दूसरा है- नगर-राज्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यानी सिटी-स्टेट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अपने आकार और फैलाव में इस प्रकार के थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे हरिद्वार में कनखल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वालापुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मायापुरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सप्त-सरोवर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहादराबाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आदि अलग-अलग सिटी-स्टेट हों। यवन क्षेत्र के तथाकथित नगर-राज्यों की आबादी भी इन इलाकों से बहुत कम थी और आकार भी। उसी की निरन्तरता में वर्तमान में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वेटिकन सिटी’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नाम का एक राष्ट्र-राज्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी कुल आबादी 1 हज़ार से कम है और कुल क्षेत्रफल भी 50 हेक्टेयर से कम है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे यूरोप के लोगों ने जब ज्ञान की पहली झलक देखते ही ख्रीस्तपंथी जकडऩ से स्वयं को मुक्त कर दुनिया को देखना शुरू किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो चीन और भारत को देखकर वे विस्मित रह गये। वस्तुत: यूरोप के लोगों ने सबसे पहले विशाल राज्य भारत में ही देखे। आज तो यह तथ्य भी छिपाया जाता है कि भारत के राज्यों- त्रावणकोर-कोचीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विजयनगर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्वालियर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्दौर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जयपुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जोधपुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसलमेर आदि में अनेकों अंग्रेज़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फ्रेंच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जर्मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुर्तगीज और डच सैनिक सेवारत रहे थे। पहली बार आधुनिक अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान इन्हें वस्तुत: भारत से ही हुआ। यह इतना सुविदित तथ्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु भारत के लोगों के बीच इसे इस तरह छिपाया गया है कि इससे स्वयं पढ़े-लिखे भारतीय अवगत नहीं हैं और पहली बार सुनने पर चौंक जाते हैं। जबकि यूरोप का प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति यह तथ्य अच्छी तरह जानता है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/273.jpg" alt="27"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके साथ ही 18वीं शताब्दी के यूरोप के विषय में वे सामान्य तथ्य भी पढ़े-लिखे भारतीयों को ज्ञात नहीं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो यूरोप का प्रत्येक विद्यार्थी जानता है। उदाहरण के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">18वीं शताब्दी ईस्वी में जब कोई बाहरी व्यक्ति लंदन पहुँचता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह शहर की गंदगी और शोर से थक जाता था। लंदन के अधिकांश लोग 19वीं शताब्दी ईस्वी में भी कैसी भयंकर दशा में रहते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका सबसे प्रामाणिक वर्णन तो पढ़े-लिखे भारतीयों के एक बड़े अंश के आराध्य महापुरुष कार्ल माक्र्स ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पूँजी’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के अनेक अध्यायों में किया है। 17वीं शताब्दी ईस्वी के उत्तराद्र्ध में तो लंदन में फैली हुई आग ने शहर के बहुत बड़े इलाके को भस्म कर दिया था और वे उस आग पर काबू नहीं पा सके थे। उसके बाद हड़बड़ी में जो बेतरतीब बस्तियाँ बसीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे आधुनिक भारत के शहरों की गंदी बस्तियों से बहुत अधिक सँकरी और गंदी थीं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">18वीं शताब्दी तक यूरोप में जल निकासी और मल निकासी की कोई व्यवस्था नहीं थी। खुले गंदे नाले शहर के बीच बहते थे और शौच का कोई सुन्दर प्रबन्ध नहीं था। रात को एक ही पात्र में पूरे घर के लोग निपटते थे और सुबह खिड़की से सारा मल गलियों में फेंक देते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे दिनचढ़े देर तक साफ करने के लिए सुअरों के झुण्ड गलियों में छोड़े जाते थे। इसी कारण शहर के लोग दिन के 10 बजे के बाद ही बाहर निकलना पसन्द करते थे। सी.पी. मॉरिज़ ने 1782 ईस्वी में लिखा है कि- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">लंदन में जगह-जगह कसाइयों के ठेले हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो गंदी दशा में गोश्त की बिक्री करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चारों ओर बदबू फैली रहती है।’’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शहर में जगह-जगह गंदगी और मल के ढेर तथा मरे हुए जानवरों के शव पड़े रहते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें कुत्ते-बिल्ली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घोड़े और चूहे मुख्य थे। शहर में कहीं भी पानी की आपूर्ति के लिए धातु के पाइप नहीं थे। पेड़ के तनों की खोखल के द्वारा जगह-जगह पानी बाँटा जाता था। कुछ सम्पन्न इलाकों में इन खोखलों को जोड़कर ही पानी की आपूर्ति के लिए पाइप बनाये जाते थे। टेम्स नदी का पानी बहुत गंदा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मटमैला था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें शहर का मल भी गिरता था और जिसका पानी शहरी लोग पीते भी थे। साथ ही एक ओर से दूसरी ओर सामान लादकर पहुँचाने वाली छोटी-छोटी डोगियाँ भी चलती रहती थीं। वस्तुत: इस गंदे पानी से बचने के लिए ही शहर में शराब का चलन व्यापक हुआ। शुरू में सबसे ज्य़ादा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">जिन’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">चली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कि सस्ती और मटमैली होती थी। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">18वीं शताब्दी में सम्पूर्ण लंदन में एक भी निजी स्नानघर नहीं था। थोड़े से सामूहिक स्नानघर थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ एक ही जलपात्र होता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नहाने के बाद जो पानी बहता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह एक दूसरे जलपात्र में संचित कर पुन: पहले में डाल दिया जाता था। केवल राजमहल में स्नानघर था। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">18वीं शताब्दी ईस्वी में इंग्लैण्ड के लोग बड़े पैमाने पर कोयला जलाते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका धुँआ पूरे इलाके में छाया रहता था। ठण्ड होने के कारण वह कुहासा और धुँध बनकर दिनचढ़े देर तक फैला रहता था। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि 18वीं शताब्दी ईस्वी के प्रारम्भ तक यूरोप में शिक्षा केवल राजघरानों और पादरियों तक सीमित थी। 18वीं शताब्दी में पहली बार चर्च ने कुछ अन्य लोगों को भी बाइबिल पढऩे की अनुमति दी। जिसे </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">एनलाइटेनमेन्ट’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहा जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह वस्तुत: यूरोप में 18वीं शताब्दी ईस्वी में पहली बार उल्लेखनीय रूप में उदित हुआ। यह एनलाइटेनमेन्ट फैलाने वाले लोग स्वयं को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">फिलॉसफर’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते थे और खुद को यवन विद्वान सुकरात का अनुयायी बताते थे। ऐसा करते हुए वे चर्च की जकड़बन्दी से कुछ छूट पाने का प्रयास करते थे। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">फिलॉसफर्स’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ने चर्च द्वारा फैलाये गये विचार कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य मूलत: पापी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि वह स्त्री-पुरुष के मिलन से पैदा हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कि स्वयं में मूल पाप है’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के विरोध में यह कहना शुरू किया कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य दिव्य चेतना का अंश है और इसीलिए अच्छाई तथा दिव्यता मनुष्य की मूल प्रकृति है।‘</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सभी जानते हैं कि यह मूलत: भारतीय दृष्टि है और यह भी सभी जानते हैं कि हज़ारों वर्षों तक यवन क्षेत्र (जिसे केवल अंग्रेज़ी में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ग्रीस’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं और जो स्वयं को ऐलवंशी या हेला कहते हैं) भारतवर्ष के उत्तरापथ का एक जनपद था और सुकरात वस्तुत: भारतीय दार्शनिकों से सीखी गयी बातें ही बोलते थे। यवन क्षेत्र कभी भी मुख्य यूरोप से जुड़ा नहीं था। उसका सम्बन्ध सदा से भारत से ही था। केवल कुछ सौ वर्ष पूर्व मुख्य यूरोप के लोग यवनों के सम्पर्क में आये हैं। उससे पहले नहीं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार इन </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">फिलॉसफर्स’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ने चर्च से अपना सम्बन्ध बौद्धिक स्तर पर तोड़ दिया। यद्यपि शारीरिक और मानसिक स्तर पर उनका चर्च से सम्बन्ध बना रहा।  ज्ञान के इसी प्रसार के साथ वे लोग विश्व के विषय में विशेषकर भारत और अमेरिका के विषय में अधिक से अधिक जानकारियाँ संग्रहीत करने लगे और उन्हीं दिनों उन्होंने पहली बार भारत और अमेरिका में बड़े राज्य देखे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी प्रेरणा से 19वीं शताब्दी ईस्वी में पहली बार यूरोप में राष्ट्र-राज्य का उदय हुआ। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार यूरोपीय लोगों को यवन क्षेत्र और भारत की मुख्य भूमि के प्रभाव से जिज्ञासा के लिए प्रशस्त क्षेत्र मिला और वे किसी बच्चे की तरह हर चीज़ को जानने और सँजोने में लग गये। परन्तु चर्च और क्रिश्चियनिटी के दबाव से उनकी जिज्ञासा ज्ञानपरक उतनी नहीं रही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितनी कि शक्तिपरक हो गयी। सारी जिज्ञासा और उससे संग्रहीत जानकारी का उपयोग किस प्रकार अपनी और अपने पंथ की या समूह की शक्ति बढ़ाने के लिए किया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह विचार प्रधान हो गया और सचमुच सत्य क्या है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथ्य क्या हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे अविकल रूप में जानने की जिज्ञासा शमित-दमित होती गयी। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसकी छाया हम समस्त आधुनिक यूरोपीय एकेडमिक्स में और उनके भारतीय चेलों में पाते हैं। वहाँ जिज्ञासा ज्ञान की नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति के विस्तार की है। जिज्ञासा से इकठी की गयी जानकारियों को सत्य को जानने के स्थान पर अपनी प्रभुता बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करना ही आधुनिक शिक्षित चित्त का एक बड़ा लक्षण बन गया है। यद्यपि यह सामान्य कथन सब पर लागू नहीं होता। क्योंकि हम सभी जानते हैं कि सभी मनुष्य ब्रह्मा की संतानें हैं और वे मनुष्य ही हैं इसीलिए कि वे सब महाराज मनु के वंशज हैं। इसलिए मनुष्य भारत का हो या यूरोप का या अफ्रीका का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने मूल में तो सबमें तो एक आधारभूत एकता है। परन्तु अभिव्यक्त रूप शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कार और संस्कृति के प्रभाव से भिन्न-भिन्न होते रहते हैं। यही कारण है कि खुद भारत में भी यूरोप के आधुनिक अकादमिक लोगों की तरह प्रभुता के संवर्धन में जिज्ञासा की सामथ्र्य का उपयोग करने वाले लोग बहुत अधिक हो गये हैं और प्रशान्त विवेक के साथ सत्य की साधना करने वाले लोग अत्यल्प हो गये हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार जिज्ञासुओं के भी दो नितान्त भिन्न वर्ग हो गये हैं। एक है- ज्ञान की प्राप्ति का जिज्ञासु और दूसरा शक्ति के संवद्र्धन के लिए जिज्ञासु व्यक्ति। जब हम यूरोप के जिज्ञासुओं के विषय में चर्चा करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उनकी जिज्ञासा के इस स्वरूप को स्मरण रखना आवश्यक है कि उन्होंने अपने जिज्ञासा की तृप्ति के लिए जहाँ सराहनीय परिश्रम किया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं उनका प्रयोजन ज्ञान नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने समाज या पंथ या क्षेत्र की शक्ति का विस्तार है। इसीलिए संग्रहीत तथ्यों की प्रस्तुति और व्याख्या दोनों में ही वे अनेक प्रकार की वक्रताएँ करते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उनका तो यह स्वभाव है और संस्कार भी है। परन्तु जो लोग भारत में भारत के विषय में भी ऐसे प्रभुत्व-प्रेमी जिज्ञासुओं की बातों को ही आधारभूत प्रमाण मानकर सोचते अथवा बोलते और लिखते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन पर तो दया ही की जा सकती है।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Jan 2017 21:47:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गीता महोत्सव कुरुक्षेत्र</title>
                                    <description><![CDATA[<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/763.jpg" alt="76" /></p>
<p style="text-align:center;"><strong>हरियाणा सरकार द्वारा आयोजित कुरुक्षेत्र अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव के अवसर पर राजतंत्र, धर्मतंत्र व अध्यात्म तंत्र का गौरवपूर्ण समन्वय दर्शाते योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज, रेल मंत्री श्री सुरेश प्रभु, विविध पीठों के पीठाधीश्वर संतगण</strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/425.jpg" alt="42" /></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong>कुरुक्षेत्र अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव के स्मारिका विमोचन समारोह में योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज, श्री कप्तान सिंह सोलंकी राज्यपाल हरियाणा, श्री मनोहर लाल खट्टर, मुख्यमंत्री हरियाणा, केन्द्रीय रेल मंत्री श्री सुरेश प्रभु, श्री देवव्रत जी राज्यपाल हिमाचल प्रदेश, संतगण एवं अन्य गणमान्य </strong></p>
<p>  </p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2297/geeta-mahotsav-kurukshetra"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/425.jpg" alt=""></a><br /><p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/763.jpg" alt="76"></img></p>
<p style="text-align:center;"><strong>हरियाणा सरकार द्वारा आयोजित कुरुक्षेत्र अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव के अवसर पर राजतंत्र, धर्मतंत्र व अध्यात्म तंत्र का गौरवपूर्ण समन्वय दर्शाते योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज, रेल मंत्री श्री सुरेश प्रभु, विविध पीठों के पीठाधीश्वर संतगण</strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/425.jpg" alt="42"></img></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong>कुरुक्षेत्र अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव के स्मारिका विमोचन समारोह में योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज, श्री कप्तान सिंह सोलंकी राज्यपाल हरियाणा, श्री मनोहर लाल खट्टर, मुख्यमंत्री हरियाणा, केन्द्रीय रेल मंत्री श्री सुरेश प्रभु, श्री देवव्रत जी राज्यपाल हिमाचल प्रदेश, संतगण एवं अन्य गणमान्य </strong></p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>सनातन वैभव</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Jan 2017 21:45:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मत्त: सर्वभूतेभ्योऽभयमस्त</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सन्यास</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आश्रम में दीक्षित होते समय सर्वस्वत्याग की प्रक्रिया में व्यक्ति को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">एकै साधे सब सधे</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इस नियम के अनुसार इस </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की ही आहुति देनी होती है। क्योंकि का आशय है त्याग। तो प्रश्न उठता है कि त्याग किसका</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ऋषियों ने कहा अपने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का अर्थात् अपने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का। दूसरे शब्दों में कि हम सांसारिक वस्तुओं को आवश्यकतानुसार प्राप्त करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर उन वस्तुओं में आसक्त न हों। उनके साधन भाव को दृष्टि से ओझल न होने दें और सतर्क रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कि कहीं</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2298/mattah-sarvbhutebhyobhayamasya"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/447.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सन्यास</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आश्रम में दीक्षित होते समय सर्वस्वत्याग की प्रक्रिया में व्यक्ति को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">एकै साधे सब सधे</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इस नियम के अनुसार इस </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की ही आहुति देनी होती है। क्योंकि का आशय है त्याग। तो प्रश्न उठता है कि त्याग किसका</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ऋषियों ने कहा अपने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का अर्थात् अपने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का। दूसरे शब्दों में कि हम सांसारिक वस्तुओं को आवश्यकतानुसार प्राप्त करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर उन वस्तुओं में आसक्त न हों। उनके साधन भाव को दृष्टि से ओझल न होने दें और सतर्क रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कि कहीं साधन साध्य न बन जाये। जबकि होना यह चाहिए कि उन वस्तुओं को जो कुछ प्राप्त हुआ या प्राप्त होता है अथवा जो कुछ प्राप्त किया या प्राप्त करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम उस सबका प्रभु के चरणों में समर्पण करते रहें। पदार्थों व क्रियाओं के न्यासी (ट्रस्टी) बनकर रहें न कि उनके मालिक। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अस्मिता</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की अपने अन्दर ग्रन्थी न बनने दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि प्रिय वस्तु भी छूटे तो हमारे हृदय-समुद्र में दु:ख की छोटी सी भी लहर पैदा न होने पाए। किसी वस्तु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति या विचार के साथ सम्बन्धित होने या न होने में एकसम बने रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साक्षी (</span>Witness<span lang="hi" xml:lang="hi">) या उदासीन (</span>Indifferent<span lang="hi" xml:lang="hi">) तटस्थ द्रष्टा (</span>Seer<span lang="hi" xml:lang="hi">) बने रहें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज विश्व शांति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व सृजन व विश्व निर्माण के लिए संपूर्ण दिशा में ऐसी ही गूंज की जरूरत है। हम भी समय की पुकार सुनें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सं</span><span lang="hi" xml:lang="hi">न्यास आश्रम में दीक्षित होते समय सर्वस्वत्याग की प्रक्रिया में व्यक्ति को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">एकै साधे सब सधे’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इस नियम के अनुसार इस </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहम्’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की ही आहुति देनी होती है। क्योंकि का आशय है त्याग। तो प्रश्न उठता है कि त्याग किसका</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ऋषियों ने कहा अपने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहम्’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का अर्थात् अपने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का। दूसरे शब्दों में कि हम सांसारिक वस्तुओं को आवश्यकतानुसार प्राप्त करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर उन वस्तुओं में आसक्त न हों। उनके साधन भाव को दृष्टि से ओझल न होने दें और सतर्क रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कि कहीं साधन साध्य न बन जाये। जबकि होना यह चाहिए कि उन वस्तुओं को जो कुछ प्राप्त हुआ या प्राप्त होता है अथवा जो कुछ प्राप्त किया या प्राप्त करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम उस सबका प्रभु के चरणों में समर्पण करते रहें। पदार्थों व क्रियाओं के न्यासी (ट्रस्टी) बनकर रहें न कि उनके मालिक। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहम्’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अस्मिता’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की अपने अन्दर ग्रन्थी न बनने दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि प्रिय वस्तु भी छूटे तो हमारे हृदय-समुद्र में दु:ख की छोटी सी भी लहर पैदा न होने पाए। किसी वस्तु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति या विचार के साथ सम्बन्धित होने या न होने में एकसम बने रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साक्षी (</span>Witness<span lang="hi" xml:lang="hi">) या उदासीन (</span>Indifferent<span lang="hi" xml:lang="hi">) तटस्थ द्रष्टा (</span>Seer<span lang="hi" xml:lang="hi">) बने रहें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अथर्ववेद के एक मन्त्र में कहा गया है- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्तां पावमानी द्विजानाम्। आयु:</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजां पशुं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कीर्तिं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्रविणं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मवर्चसं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मह्यं दत्त्वा व्रजत ब्रह्मलोकम्’। (१९.७१.१) इस मन्त्र में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मया’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मह्यम्’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के द्वारा एक ही सत्य का संकेत हुआ है। आयु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पशु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कीर्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्रविण (धन)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मवर्चस (ब्रह्मतेज अर्थात् ब्रह्म का ज्ञान) ये सब व्यक्ति के द्वारा जीवन में पाने की चीजें हैं। वेदमाता ने प्राप्तव्य चीजों की सूची हमारे समक्ष रखी है और साथ में यह भी कह दिया कि ये सब चीजें अपने पास नहीं रखनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ तक कि ब्रह्मवर्चस भी। क्योंकि अपने पास रखने का अर्थ है- अपने अहं को पुष्ट करना। अर्पित कर देने का अर्थ है- निरहं (निरहङ्कार व निर्मम) हो जाना। इसके अतिरिक्त ब्रह्मलोक में जाने का कोई रास्ता नहीं है। इसीलिए संन्यास धर्म में दीक्षित होता हुआ संन्यासी अपने ऊपर ओढ़े हुए सभी लिबासों को उतार देता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कोई क्या छीनेगा</span>?</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो अकेला हो जाता है वही फिर सर्वगत सत्य के साथ एक हो सकता है। और जो साधक अकेला (केवल) होने की कला सीख लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही निर्भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वथा निर्भय रह सकता है। क्योंकि अकेले को कौन डरा सकता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">डरने के लिए तो कुछ पाने की चाह होनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके अतिरिक्त उस चाह में कोई बाधा उपस्थित होने की संभावना दिखाई देने लगे तो भी भय हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु जिसने वस्तु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार और यहाँ तक कि अपने शरीर से भी तादात्म्य हटा लिया हो तो अब उससे कोई क्या छीनेगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">और वह क्यों किसी से बाधित होगा</span>?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य चरक ने भय के कारणों पर विचार करते हुए सूत्ररूप में एक वचन बोला- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">असमर्थता भयकराणाम्’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात भयदायक जितने भी हेतु हो सकते हैं उनमें </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">असामथ्र्य’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृष्टतम है। जो व्यक्ति ज्ञान में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धन में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जनसमर्थन में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्या में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वक्तृता में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुणों में बढ़ा हुआ है वह किसी से क्यों डरेगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">असमर्थ अवस्था में ही व्यक्ति अपने आपको भयभीत पाता है। डायबेटिक व्यक्ति ही मीठे से डरेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ व्यक्ति क्यों डरेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कारण उस विषय में उसकी कमजोरी समाप्त हो गयी है किसी भी विषय में भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कमजोरी को और निर्भयता मजबूती को प्रकट करती है। यदि निर्बल लोगों के समक्ष बलवान् अपनी किसी प्रकार की शक्ति का प्रयोग करे- राजशक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धनशक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पदशक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन्त्रशक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तर्कशक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्याशक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शारीरिक शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन:शक्ति इत्यादि चाहे जो भी हो तो निर्बल व्यक्ति का भयभीत होना स्वाभाविक है कि यह मेरा कुछ छीन लेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा शोषण करेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुझे दबायेगा। पर संन्यासी का कोई क्या छीनेगा जिसका अपना कहा जाने योग्य कुछ है ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ बचा ही नहीं। संन्यासी ऐसा व्यक्तित्व है जो समस्त परिग्रह का त्याग कर सर्वथा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अपरिग्रही’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हो गया है तथा आगे के लिये भी वस्तु-व्यक्ति-विचार के संग्रह को स्थान नहीं देना चाहता।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयं समीक्षक बनें:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो व्यक्ति लौकिक स्तर पर कहीं खड़ा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह दूसरे किसी भी अपने से आगे निकल जाने में अपनी हानि देखता है। लोक का व्यवहार भी है कि कोई भी व्यक्ति अपने को पीछे नहीं देखना चाहता है। लोक का यह संघर्ष सर्वजनविदित है और सर्वजनसंवेद्य है। लौकिक व्यक्ति यही चाहता है- कि पुत्र से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिष्य से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धन से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पद से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिष्ठा से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति से मेरे ही नाम का सिक्का चले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं सबसे विशेष समझा जाऊँ। किसी भी उपाय से या शिष्ट सम्मत उपायों से मैं सबसे आगे निकलूँ। सबसे आगे निकलने में उसे सर्वातिशायी प्रसन्नता की अनुभूति होती है। जबकि संन्यासी अपनी इच्छा से संसार की इस दौड़ से अपने आपको अलग कर रहा होता है। वह सबको अभयदान दे रहा होता है कि ऐ संसार के लोगों! मैं अब आप लोगों की किसी प्रकार की हानि नहीं करूँगा। मैं आप लोगों के साथ किसी भी स्पर्धा में भाग नहीं लूँगा। संन्यास (त्याग) एक ऐसी इच्छा मुक्त पूर्ण स्थिति है कि इसमें दूसरों के समक्ष अपने आप को प्रमाणित करना नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल स्वयं ही अपने द्वारा अपना आकलन करते हुए अपने ऊपर कार्य करना होता है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/456.jpg" alt="45"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भय रहित हों:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीमद्भगवद्गीता में सदा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अभय’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रहना एक दैवी सम्पत्ति कहा गया है। भगवान् के भक्त के स्वरूप का चित्रण करते हुए कहा गया  कि  </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च य:’। (१२.१५) अर्थात् भगवान् के भक्त का एक प्रमुख लक्षण यह है कि उससे कोई भयभीत नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि दूसरों के जीवन में उसने व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप करना छोड़ दिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरों के साथ उसकी स्पर्धा समाप्त हो गयी है। जैसे किसी प्रसिद्ध खिलाड़ी ने खेल से संन्यास ले लिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब उसके साथी उससे क्यों भयभीत होंगे या एक उच्चकोटि के राजनेता ने राजनीति से अपने को मुक्त कर लिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो प्रतिष्पर्धी उसके साथी उससे तत्काल निर्भय हो जाते हैं। एक उद्योगपति उद्योग जगत् से मुक्त होकर संन्यासी बन जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो पहले जो उसके साथी उससे भयभीत रहते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे सब अब भय मुक्त हो जाते हैं। किसी चुनाव में एक सीट के लिये पाँच उम्मीदवार हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब एक दूसरे से भयभीत रहते हैं। उनमें से अपनी इच्छा से कोई एक या दो अपने को उस दौड़ से वापस कर लेते हैं तो withdraw वाले से अन्य सब निर्भय हो जाते हैं। इसी प्रकार वह स्वयं भी किसी से भयभीत नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि वह किसी भी प्रकार के सुख की अपेक्षा नहीं रखता। सुख की चाह के साथ भय सदा ही अविनाश भाव रूप से सम्बद्ध रहता है। इसके विपरीत मनुष्य के अन्दर जितना-जितना ज्ञान बढ़ता जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके अनुपात में ही उसमें लेने का भाव कम और देने का भाव अधिक होता जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संन्यासी की उच्चावस्था:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि विचार किया जाये कि मनुष्य दूसरों के लिये या अपने ही साथी भाइयों के लिए क्या-क्या दे सकता है तो बहुत सारी चीजें गिनाई जा सकती हैं- धन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके कार्यों का समर्थन (एक प्रकार का प्रोत्साहन)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा-संस्कार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पथ-प्रदर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समयदान और अभयदान। इन सभी को देने का अपना-अपना महत्त्व है। कुछ दानों में पदार्थ दिया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ में ज्ञान और कुछ में भाव। अभयदान एक उच्चकोटि का भाव है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका दान करने के लिए न पदार्थ की आवश्यकता होती है न समय की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल मन का एक विशेष भाव बनाना होता है। संन्यास दीक्षा में इसी उच्च भाव को सब प्राणियों तक फैलाने की बात कही गई है। यही संन्यासी की परम स्थिति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका फल है </span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>''</strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>मत्त: सर्वभूतेभ्योऽभयमस्तु’’</strong></span>। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वास्तम में एक सामान्य व्यक्ति भी जब संकल्पित होता है कि न तो मैं किसी भी विषय में किसी के साथ स्पर्धा के भाव में जीऊँगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न किसी की सत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पत्ति या सम्मान में बाधा डालूँगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्येक विषय में अपने लिए दूसरों से निरपेक्ष रहूँगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अचाह रहूँगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल जिज्ञासुओं की या दु:खियों की अपनी सम्पूर्ण सामथ्र्य से सेवा करता रहूँगा इत्यादि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसका भी यह संन्यास भाव की दिशा में प्रयास ही कहा जायेगा। आज विश्व शांति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व सृजन व विश्व निर्माण के लिए संपूर्ण दिशा में ऐसी ही गूंज की जरूरत है। हम भी समय की पुकार सुनें।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2298/mattah-sarvbhutebhyobhayamasya</link>
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                <pubDate>Sun, 01 Jan 2017 21:42:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज 'गंगा रत्न’ सम्मान से सम्मानित</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऋ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">षिकुल मैदान हरिद्वार में हरिद्वार नागरिक मंच द्वारा आयोजित द्वितीय गंगा महोत्सव पर परम श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी कुलपति पतंजली विश्वविद्यालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार को प्रथम राष्ट्रीय सम्मान </span><strong>''<span lang="hi" xml:lang="hi">गंगा रत्न’’</span> </strong><span lang="hi" xml:lang="hi">से सम्मानित किया गया। आयुर्वेद क्षेत्र में अनुपम योगदान के लिए आचार्यश्री को यह सम्मान प्रदान किया गया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर हरिद्वार नागरिक मंच के अध्यक्ष सतीश कुमार जैन ने बताया कि श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज आयुर्वेद के पुरोधा हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने प्राचीन आयुर्वेद को अपने ज्ञान व् शोध से समृद्ध किया है। उनके योगदान से भारत के वर्तमान एवं भविष्य की समृद्धि सम्भावित है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महामंत्री देवेन्द्र शर्मा</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2299/shradheya-acharya-balkrishana-ji-maharaj-ganga-ratn-samman-se-sammanit"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/014.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऋ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">षिकुल मैदान हरिद्वार में हरिद्वार नागरिक मंच द्वारा आयोजित द्वितीय गंगा महोत्सव पर परम श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी कुलपति पतंजली विश्वविद्यालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार को प्रथम राष्ट्रीय सम्मान </span><strong>''<span lang="hi" xml:lang="hi">गंगा रत्न’’</span> </strong><span lang="hi" xml:lang="hi">से सम्मानित किया गया। आयुर्वेद क्षेत्र में अनुपम योगदान के लिए आचार्यश्री को यह सम्मान प्रदान किया गया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर हरिद्वार नागरिक मंच के अध्यक्ष सतीश कुमार जैन ने बताया कि श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज आयुर्वेद के पुरोधा हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने प्राचीन आयुर्वेद को अपने ज्ञान व् शोध से समृद्ध किया है। उनके योगदान से भारत के वर्तमान एवं भविष्य की समृद्धि सम्भावित है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महामंत्री देवेन्द्र शर्मा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चेयरमैन गंगा महोत्सव समिति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जगदीश लाल पाहवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सचिव व डॉ. सुनील बत्रा ने परम श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज को गंगा रत्न सम्मान पत्र प्रदान किया।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/026.jpg" alt="02"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अपने उद्बोधन में श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी ने भारतीय संस्कृति व् आयुर्वेद की निरंतर सेवा करने का संकल्प दोहराया। उन्होने हरिद्वार नागरिक मंच के गंगा महोत्सव आयोजन की सराहना करते हुए कहा भारतीय संस्कृति की आधार है मां गंगा। इसकी पवित्रता और दिव्यता को स्थापित करने में ऐसे आयोजन महत्वपूर्ण साबित होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उपस्थित सभी साधु संतो ने श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी एवं भारतीय वैदिक ऋषि संस्कृति से जुड़े पतंजलि के कार्यों की प्रशंसा करते हुए अपनी शुभकामनाएं दी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धेय स्वामी विश्वेश्वरानंद जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूरत गिरी बंगला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गीतामनीषी श्री ज्ञानानंद जी महाराज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री धर्मदेव जी महाराज पाटोदी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री हरिचेतनानंद जी महाराज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री कोठारी मोहनदास जी महाराज बड़ा उदासीन अखाड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कनखल आदि संतगण इस विशेष क्षण के सहभागी रहे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्था समाचार</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Jan 2017 21:41:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नोएडा, उत्तर प्रदेश के फूड एवं हर्बल पार्क से 10 हजार लोगों को मिलेगा रोजगार : स्वामी रामदेव</title>
                                    <description><![CDATA[<ul>
<li>
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">फूड पार्क का सबसे ज्यादा फायदा किसानों को : आचार्य बालकृष्ण</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्वांचल व बुंदेलखंड में भी यह प्रोजेक्ट लगाना संभावित</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लखनऊ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नवम्बर -</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज व श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज सहित अनेक गणमान्यों की उपस्थिति में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने नोएडा में बनने वाले पतंजलि फूड एवं हर्बल पार्क का शिलान्यास किया। नए सचिवालय </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">लोकभवन’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में संपन्न हुए इस कार्यक्रम में स्वामी जी ने बताया कि इस प्रोजेक्ट का निर्माण दिसंबर से शुरू हो जाएगा और अगले साल के अंत तक पतंजलि फूड पार्क उत्पादन शुरू कर देगा। इससे</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2300/noida-uttar-pradesh-ke-food-evm-harbal-park-se-10-hajar-logon-ko-milega-rojgar"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/486.jpg" alt=""></a><br /><ul>
<li>
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">फूड पार्क का सबसे ज्यादा फायदा किसानों को : आचार्य बालकृष्ण</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्वांचल व बुंदेलखंड में भी यह प्रोजेक्ट लगाना संभावित</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लखनऊ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नवम्बर -</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज व श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज सहित अनेक गणमान्यों की उपस्थिति में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने नोएडा में बनने वाले पतंजलि फूड एवं हर्बल पार्क का शिलान्यास किया। नए सचिवालय </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">लोकभवन’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में संपन्न हुए इस कार्यक्रम में स्वामी जी ने बताया कि इस प्रोजेक्ट का निर्माण दिसंबर से शुरू हो जाएगा और अगले साल के अंत तक पतंजलि फूड पार्क उत्पादन शुरू कर देगा। इससे 10 हजार लोगों को प्रत्यक्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि एक लाख से ज्यादा लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलेगा। यह फूड पार्क नोएडा में यमुना एक्सप्रेस-वे अथॉरिटी क्षेत्र में बनेगा। जिसमें 1666.80 करोड़ रुपये का निवेश होगा।  पूज्य स्वामी जी ने पूर्वांचल व बुंदेलखंड में भी पतंजलि फूड एवं हर्बल पार्क की यूनिट लगाने की बात कही।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/136.jpg" alt="13"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने स्वामी रामदेव जी महाराज को फ्रांस की सबसे बड़ी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सब्जी मंडी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फूल और फल मंडी’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की तरह वहां मंडी विकसित करने का भी अनुरोध किया। उन्होंने कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी जी अपने अधिकारियों को फ्रांस भेजें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहां की मंडी का वे विश्लेषण करायें और नोएडा में वैसी ही मंडी स्थापित करने के लिए कदम बढ़ायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें प्रदेश सरकार पूरा सहयोग करेगी। क्योंकि इससे किसानों को बहुत फायदा होगा। उन्होंने पतंजलि को दुग्ध क्षेत्र में निवेश का भी अनुरोध किया। मुख्यमंत्री महोदय ने कहा आज सब्जी व दुग्ध क्षेत्र में निवेश की बहुत सख्त जरूरत है। क्योंकि हम स्कूली बच्चों को फल व दूध दे रहे हैं। इससे अप्रत्यक्ष रूप से किसानों की ही मदद हो रही है। पतंजलि हर्बल फूड पार्क से किसानों को और भी अधिक लाभ मिलेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव जी ने कहा बाबा रामदेव के उत्पाद अपनी क्वालिटी के लिए जाने जाते हैं। हमने सबसे तेज एक्सप्रेस-वे बनाया। इसके किनारे मंडियां बना रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका फायदा किसान पाएंगे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर पतंजलि फूड एवं हर्बल पार्क के नए प्रोजेक्ट के संबंध में प्रदेश सरकार और पतंजलि की ओर से एमओयू पर हस्ताक्षर भी हुए। सरकार की ओर से यमुना एक्सप्रेस-वे अथॉरिटी के चेयरमैन संजय अग्रवाल व पतंजलि की ओर से राकेश कुमार ने एमओयू पर हस्ताक्षर किये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर प्रदेश के पतंजलि हर्बल फूड पार्क की विशेषतायें:</span></strong></span></h5>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">455 एकड़ भूमि में कृषि आधारित उत्पाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खाद्य उत्पाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर्बल उत्पाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पशु आहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुग्ध उत्पाद एवं औषधीय उत्पाद की इकाईयाँ तथा रिसर्च एण्ड डेवलपमेन्ट सेन्टर की स्थापना।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यमुना प्राधिकरण क्षेत्र गौतमबुद्ध नगर में इस प्रोजेक्ट हेतु लगभग 1666.80 करोड़ का निवेश किया जायेगा।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">परियोजना से लगभग 10,000 (दस हजार) व्यक्ति यों को प्रत्यक्ष रोज़गार एवं लगभग 80,000 (अस्सी हजार) परिवारों को अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलेगा।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">परियोजना में लगभग 400 टन फल एवं सब्जियों का प्रतिदिन प्रसंस्करण किया जायेगा।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">परियोजना में जैविक गेहूँ से प्रतिदिन 750 टन आटे का उत्पादन किया जायेगा।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">फूड पार्क से प्रदेश में ऊसर एवं कम उपजाऊ जमीनों में ज्वार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाजरा एवं मोटे अनाजों के उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा जो किसानों के सकल आय वृद्धि में सहायक होगा।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">फूड पार्क की स्थापना से युवाओं का कौशल विकास होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थानीय व्यापार को बढ़ावा मिलेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक तकनीक से स्थानीय लोगों का परिचय बढ़ेगा तथा पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप से अन्य गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा। पतंजलि फूड एवं हर्बल पार्क परियोजना के अनुसार स्थानीय किसानों को बाजार की मुख्य धारा से जोडऩा भी पतंजलि का प्रमुख उद्देश्य है।</span></h5>
</li>
</ul>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्था समाचार</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Jan 2017 21:40:28 +0530</pubDate>
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                            </item>

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