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                <title>फरवरी - योग संदेश</title>
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                <description>फरवरी RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...</title>
                                    <description><![CDATA[<h4 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सफल आध्यात्मिक </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन का स्वरूप</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">1.   दिव्य जीवन:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रेष्ठ ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊँची निष्ठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अखण्ड प्रचण्ड पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्याग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तपस्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समर्पण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैत्री</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुदिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वात्सल्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफलता व उपलब्धियों से भरा पूर्ण अनुशासित दिव्यता युक्त आदर्श जीवन होना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रेय मार्ग पर चलने वाले साधक योगी संन्यासी का जीवन।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">2. सूनापन नहीं पूर्ण तृप्ति होनी चाहिए:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अधिकांश लोगों के जीवन में सूना-सूना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खालीपन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधूरापन या किसी भी प्रकार की एक गहरी असंतुष्टि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अतृप्ति अथवा असंतोष दिखाई देता है और उसी अतृप्ति को भरने के लिए व्यक्ति केवल बाहर</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2313/shashwat-pragya-feb-2017"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/605.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सफल आध्यात्मिक </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन का स्वरूप</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">1.   दिव्य जीवन:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रेष्ठ ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊँची निष्ठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अखण्ड प्रचण्ड पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्याग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तपस्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समर्पण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैत्री</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुदिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वात्सल्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफलता व उपलब्धियों से भरा पूर्ण अनुशासित दिव्यता युक्त आदर्श जीवन होना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रेय मार्ग पर चलने वाले साधक योगी संन्यासी का जीवन।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">2. सूनापन नहीं पूर्ण तृप्ति होनी चाहिए:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अधिकांश लोगों के जीवन में सूना-सूना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खालीपन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधूरापन या किसी भी प्रकार की एक गहरी असंतुष्टि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अतृप्ति अथवा असंतोष दिखाई देता है और उसी अतृप्ति को भरने के लिए व्यक्ति केवल बाहर की सत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भौतिक सुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भौतिक सम्बन्धों एवं बाह्य ऐश्वर्य पर केन्द्रित हो जाता है और परिणामत: पूर्ण सुखी नहीं हो पाता।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन का एक यह निभ्र्रान्त अकाट्य अटल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्विवादित शाश्वत सत्य है कि हम केवल बाह्य या केवल आन्तरिक सुख से पूर्ण सुखी व संतुष्ट नहीं हो सकते। यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति (उपनिषद्) अर्थात् जब तक हम स्वयं में तथा समष्टि में पूर्णता की अनुभूति नहीं करेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक जीवन में क्षणिक सुखों के चक्रव्यूह से बाहर निकल कर अपरा व परा विद्या के द्वारा पूर्णता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण सुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण शान्ति व पूर्ण संतुष्टि के साथ जीवन को नहीं जी सकते।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">3.   एकांङ्की नहीं समग्र दृष्टि होनी चाहिए:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">केवल भौतिकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल आध्यात्मिकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल भक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल राजयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल हठयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल ध्यान अथवा केवल समाधि ही पूर्ण सत्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल जगत् या केवल ब्रह्म ही सत्य है। इस प्रकार की एकाङ्की सोच या दृष्टि रखने वाला साधक स्वयं एक गहरी भ्रान्ति में जीता है तथा समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र व विश्व में भी जैसा जिसका सामथ्र्य है उतने स्तर पर भ्रान्तियां फैलाता है। हमारे पिण्ड से लेकर ब्रह्माण्ड तक परस्परतायें पूर्णता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वबन्धुत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहअस्तित्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकत्व एवं संगठित रूप से पूरा अस्तित्व चल रहा है। मूत्र्त-अमूत्र्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दृष्ट-अदृष्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञात एवं अज्ञात सत्यों अर्थात् भौतिकता व आध्यात्मिकता के प्रति एक समग्र एवं विवेकपूर्ण दृष्टिकोण रखना चाहिए। साथ ही समग्र व विवेकपूर्ण दृष्टिकोण के अनुरूप ही हमारा आचरण भी वैसा ही होना चाहिए। आचरण के बिना केवल दृष्टि या केवल निष्ठा मात्र से भी हम पूर्ण सत्य की अनुभूति नहीं कर सकते। अत: ज्ञान अर्थात् दृष्टि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म अर्थात् आचरण तथा उपासना अर्थात् भक्ति तीनों के प्रति हमारी पूर्ण सजगता होनी चाहिए। संतुलित व समग्र दृष्टि ही साधक को सत्य व परम सत्य तक ले जाती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">4.   योगी या साधक की कुशलताएं:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग:कर्मसु कौशलम्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समत्वं योग उच्यते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगश्चित्तवृत्ति निरोध:</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगोहि प्रभवाप्ययौ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग: समाधि:। योगोभवति दु:खहा। अयं तु परमोधर्मो यत् योगेन आत्मदर्शनम्। भौतिक जीवन में जो असफल रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग एवं अध्यात्म के मार्ग पर वह व्यक्ति कभी भी सफल नहीं हो सकता।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अत: असफल व्यक्ति के लिए न तो सांसारिक और न ही आध्यात्मिक जीवन में कुछ उपलब्ध हो पाता है। योगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संन्यासी या आध्यात्मिक मार्ग के पथिक व्यक्ति के जीवन में पूर्ण शुद्ध आचरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वक्तृत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्तृत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चरित्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान-विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग-अध्यात्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संगीत-साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्संग-स्वाध्याय एवं नेतृत्व की मूलभूत योग्यता व कुशलता तो अवश्य ही होनी चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगी के जीवन में उपरोक्त मूलभूत कुशलताएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर समय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्येक क्षेत्र में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकाग्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थूल दोषों का पूर्ण अभाव तथा मन के स्तर पर प्रसुप्त रहने वाले मानवीय दोषों दुर्बलताओं या पराधीनताओं का भी क्रमश: क्षय तथा निरन्तर सभी प्रकार के शुभ व दित्यता का उदय विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अविचलित प्रज्ञा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अविचलित श्रद्धा व निष्ठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अविचलित कर्म पुरुषार्थ वाला स्थितप्रज्ञ होना चाहिए। घी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्मृति विचलित नहीं होना चाहिए। यह प्रज्ञापराध योगी के जीवन की सबसे बड़ी बाधा है। योगी को जीवन मुक्त या विदेह जैसी स्थिति में जीवन का हर पल अभ्यास करना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे आत्मद्रष्टा व दिव्य कर्म का स्रष्टा होना चाहिए। योग का बाह्य व आन्तरिक पूरा जीवन सभी प्रकार की दिव्यता से युक्त होना चाहिए। परिस्थिति चाहे जैसी हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगी की मन:स्थिति सदा ऊँची व दिव्य ही होनी चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">5.  साधन व साध्य की शुचिता:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तामसिक व राजसिक लोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुख सम्बन्ध एवं विविध सफलता इन छ: प्रकार के लक्ष्यों को पाने के लिए जीवन में कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाते हैं अर्थात् इन लक्ष्यों या साध्यों की प्राप्ति हेतु सम्बन्धों को हिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">झूठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तार-तार कर देना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेईमानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छल-कपट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फूट डालना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोध व अहंकारादि दोषपूर्ण व अधर्मयुक्त आचरण करने में भी संकोच नहीं करते। योगी व्यक्ति को किसी भी प्रकार के भौतिक या आध्यात्मिक लक्ष्यों या साध्यों की प्राप्ति हेतु किसी भी प्रकार के अशुचितापूर्ण व अधर्मयुक्त साधन नहीं अपनाने चाहिए। सत्ता व सफलतादि की तरह ही धार्मिक कार्य जैसे गोशाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा या स्वास्थ्य केन्द्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भण्डारा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनाथालय या अन्य किसी भी प्रकार की गरीबों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असहायों या दु:खी जीव-जन्तुओं की सेवादि के कार्यों के लिए रिश्वत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेईमानी या बुरे लोगों से दान या सहयोग लेना आदि भी आध्यात्मिक दृष्टि से दोषपूर्ण है। देह के द्वारा एवं देह के लिए किए जाने वाले सभी शुभ कार्य भी साधन हैं तथा अन्तिम साध्य अन्त:करण की शुद्धि व जीवन मुक्ति ही है। यह दृष्टि साधक की निरन्तर बनी रहनी चाहिए। सभी जीवों व सभी मनुष्यों की चाहे वे किसी भी क्षेत्र में भौतिकता व आध्यात्मिकता को अपने-अपने विवेक के अनुसार प्राथमिकता देते हुए कार्य कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्तत: प्रत्येक आत्मका की अन्तिम प्यास या मांग तो पूर्ण शाश्वत परम सत्य व परम सुख-शान्ति की प्राप्ति ही है। जीवन की इस अनादि व अनन्त की यात्रा में अन्तत: व्यक्ति अभ्युदय से नि:श्रेयस की ओर बढ़ता है। यही मानवमात्र का मूल स्वभाव या हम सब आत्माओंकी मूल प्रकृति व अन्तिम परिणति है। जीवन की इस यात्रा में यह सत्य जिसको जितनी जल्दी समझ में आ जाऐगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य जीवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन मुक्ति व पूर्णता की यात्रा उतनी ही शीघ्र पूर्ण हो जायेगी। टुकड़ों-टुकड़ों में भौतिक या आध्यात्मिक जीवन के सत्यों को नहीं समझा जा सकता। अत: हमने यहाँ पांच बिन्दुओं या सन्दर्भों के माध्यम से जीवन के सत्य का समग्रता के साथ अभिव्यक्ति देने का प्रयत्न किया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक दृष्टि से जिसका जीवन सफल होगा उसके जीवन में भौतिक रूप से कम या अधिक आकार व प्रकार में सफलता अवश्य देखने को मिलेगी लेकिन आध्यात्मिकता के बिना तामसिक व राजसिक साधनों के द्वारा यदि कोई भौतिक सत्ता या सफलता आदि प्राप्त कभी कर लेता है तो उसके मन में जीवन में आन्तरिक सुख-शान्ति व संतोष कदापि नहीं हो सकता। सभी प्रकार के बाह्य ऐश्वर्य को तो आप पैसादि से खरीद या अर्जित कर सकते हो परन्तु आध्यात्मिक ऐश्वर्य को तो आप तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्याग व दिव्य आचरण के बिना किसी भी कीमत पर प्राप्त नहीं कर सकते।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिन आत्माओं ने इस दिव्य जीवन को श्रेय पथ को ही अपने जीवन का एकमात्र अन्तिम ध्येय मान लिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसी दिव्य आत्माओं के साथ हम एकात्म होकर इस यात्रा पर आगे बढऩा चाहते हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि इस यात्रा में हमें बहुत से सहयात्री मिलेंगे। अभ्यास दोष से कुछ साधक शिथिल भी पड़ेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु जिन दिव्य आत्माओं का प्रारब्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्साह व अभ्यास बहुत उन्नत है वे सौ प्रतिशत हमारे साथ इस दिव्य जीवन व दिव्य जगत की दिव्य यात्रा में पूर्ण प्रामाणिकता के साथ आगे बढ़ती रहेंगी। पारिवारिक व पारमार्थिक दृष्टि से सम्बन्धों का जो सम्यक् निर्वहन नहीं करता वह जीवन में कभी भी सुखी नहीं हो सकता। अत: जीवन के समस्त संघर्षों व साधनाओं में पारिवारिक या पारमार्थिक सम्बन्धों में विश्वासघात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्रोह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृतघ्नता का आचरण कदापि नहीं करना चाहिए। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शाश्वत प्रज्ञा</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>फरवरी</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2313/shashwat-pragya-feb-2017</link>
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                <pubDate>Wed, 01 Feb 2017 21:59:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पॉवर ऑफ़ पतंजलि</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2314/power-of-patanjali"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/385.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि को देश के लोगों ने बनाया है तथा पतंजलि का सब कुछ केवल और केवल देश के लिए ही है। इसीलिए पूरा देश पतंजलि को अपना मानता है। पतंजलि की सेवाओं के गौरवशाली 22 वर्ष पूर्ण होने पर हम समस्त देशवासियों केप्रति हृदय की गहराईयों से अनन्त कृतज्ञता प्रकट करते हैं।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">1.  पतंजलि एक ऋषि का नाम एवं ऋषि का काम है। पतंजलि योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी एवं वैदिक संस्कृति सभ्यता का महातीर्थ है। पतंजलि मानवसेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रसेवा व ईश्वरीय सेवा का संस्थान है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">2.  पतंजलि के राष्ट्रव्यापी पांच संगठन पतंजलि योग समिति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महिला पतंजलि योग समिति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत स्वाभिमान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युवा भारत एवं पतंजलि किसान सेवा समिति राष्ट्रभर में एक लाख से अधिक नि:शुल्क योग कक्षाओं का संचालन कर रहे हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">3.   पतंजलि ने हरिद्वार से लेकर देश के विभिन्न राज्यों में अब तक हजारों करोड़ रुपये के सेवा के कार्यों का प्रारंभ किया है। देश से लाखों करोड़ रुपये की लूट करने वाली विदेशी कंपनियों व देश के बड़े औद्योगिक घरानों ने देश की सेवा या चैरिटी के लिए कौन बड़े काम किए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये भी देश के सामने है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">4.  योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुदरती खेती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन में योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जड़ी-बूटियों एवं देसी गाय पर गहन अनुसंधान तथा गरीबों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनाथों व वंचित लोगों की सेवा के बहुत बड़े-बड़े कार्य कर रहे हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">5.  पतंजलि को देश के लोगों ने बनाया है तथा पतंजलि का सब कुछ केवल और केवल देश के लिए ही है। इसीलिए पूरा देश पतंजलि को अपना मानता है। पतंजलि की सेवाओं के गौरवशाली 22 वर्ष पूर्ण होने पर हम समस्त देशवासियों केप्रति हृदय की गहराईयों से अनन्त कृतज्ञता प्रकट करते हैं कि देशवासियों ने हमें इतनी बड़ी सेवा करने में समर्थ बनाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् के अनुग्रह से यह सेवा यज्ञ निरन्तर आगे बढ़ रहा है। हम भगवान् को साक्षी मानकर पूरी प्रामाणिकता के साथ एक ही बात सभी देशवासियों से कहना चाहते हैं कि देश ने हम पर जो विश्वास किया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस पर हम अन्तिम श्वास तक आंच नहीं आने देंगे। हम अपना सर्वस्व अर्पित व समर्पित करके भी देश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति व स्वाभिमान का झंडा ऊँचा रखेंगे तथा हमारे जाने के बाद भी हम एक ऐसी गौरवशाली शिष्य परम्परा छोड़कर जायेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो ऋषियों के सिद्धांतों पर चलकर युगों-युगों तक इस दिव्य आध्यात्मिक वैदिक ऋषि संस्कृति व परम्परा को अपने पूर्वजों की भांति अक्षुण्ण रखेंगे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>फरवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Feb 2017 21:57:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बहुरोग चिकित्सा में सहायक पिप्पली</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2315/bahurog-chikitsa-me-sahayak-pippali"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/655.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">     वैदेही कृष्णा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मागधी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चपला आदि पवित्र नामों से अलंकृत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुगन्धित पिप्पली भारतवर्ष के उष्ण प्रदेशों में उत्पन्न होती है। राजनिघंटुकार ने इसकी चार जातियों का वर्णन किया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु छोटी और बड़ी दो प्रकार की पिप्पली ही व्यवहार में आती हैं। बड़ी पिप्पली मलेशिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इंडोनेशिया और सिंगापुर से आयात की जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु छोटी पिप्पली भारतवर्ष में प्रचुर मात्रा में उत्पन्न होती है। इसका वर्षा-ऋतु में पुष्पागम होता है तथा शरद्-ऋतु में इसकी बेल फलों से लद जाती है। बाजारों में इसकी जड़ पीपला मूल के नाम से मिलती है। चरक एवं सुश्रुत दोनों ने विरेचन द्रव्यों में पिप्पली की गणना की है। सुश्रुत ने इसे पित्त प्रसादनी कहा है। यद्यपि पिप्पली न उष्ण है और न शीत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु वह अनुष्णशीत है। चरक संहिता के दीपनीय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तृप्तिघ्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिक्कानिग्रहण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कासहर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शूलप्रशमन तथा सुश्रुत संहिता के पिप्पल्यादि गण में भी इसका उल्लेख मिलता है।</span></h5>
<table style="border-collapse:collapse;width:100.026%;border-width:1px;background-color:#2dc26b;border-color:#2DC26B;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8555%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(45,194,107);">
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक नाम :  </span>Piper longum linn<span lang="hi" xml:lang="hi">. (पाइपर लाँगम) कुलनाम : </span>Piperaceae <span lang="hi" xml:lang="hi">(पाइपरेसी)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">अंग्रेजी नाम : </span>long pepper<span lang="hi" xml:lang="hi"> (लॉन्ग पैपर)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृत :  पिप्पली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मागधी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृष्णा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैदही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चपला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊषण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शौण्डी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोला तीक्ष्णतण्डुला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चञ्चला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोल्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उष्णा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तण्डुला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मगधा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊषणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृकला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कटुबीज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्यामा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूक्ष्मतण्डुला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दन्तकफा</span>;  <span lang="hi" xml:lang="hi">हिन्दी : पीपली पीपर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीपर</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">उर्दू : पिपल (</span>Pipal<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">उडिय़ा : बैदेही (B</span>aidehi<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">कोंकणी : पिपली (</span>Pipli<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">कन्नड़ : हिप्पली (॥</span>Hippali<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">गुजराती : पीपर (</span>Pipar<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीपरीमूल (</span>Piparimul<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">तेलुगु : पिप्पलु (</span>Pippalu<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिप्पलि (</span>Pippali<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">तमिल : टिपिलि (</span>Tipili<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिप्पली (</span>Pippilli<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">बंगाली : पीपुल (</span>Peppul<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिप्पली (</span>Pipali<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>;  <span lang="hi" xml:lang="hi">नेपाली : पीपला (</span>Pipla<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिपुल (</span>Pipool<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">पंजाबी : पिप्पलीमूल (</span>Piplamul<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">मराठी : पिंपली (</span>Pimpali<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">मलयालम : तिप्पली (</span>Tippali<span lang="hi" xml:lang="hi">)। अंग्रेजी : इण्डियन लोंग पीपर (</span>Indian long pepper<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ड्राईड कैटकिन्स (</span>Dried catkins<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">फारसी : फिलफिल दराज़ (</span>Filfil daraz<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">अरबी : दारफुलफुल (</span>Darfulful<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डाल फिलफिल (</span>Dalfilfil<span lang="hi" xml:lang="hi">).</span></strong></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पिप्पली में सुगंधित तेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाइपरीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिप्पलीर्टिन नामक क्षाराभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिसेमिन तथा पिप्पलीस्टिरॉल पाया जाता है। </span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">य</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ह सुगन्धित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आरोही अथवा भूमि पर फैलने वाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काष्ठीय मूलयुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुवर्षायु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आरोही लता है। इसका काण्ड संधियुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विसर्पी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सीधा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोमल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुशाखित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अरोमश होता है। इसकी शाखाएँ भूस्तारी अथवा आरोही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोमल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोणीय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुष्क अवस्था में गर्तयुक्त होती है। इसके पत्र सरल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकांतर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">5-12 सेमी लम्बे एवं 3-6 सेमी व्यास के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पान के पत्तों के जैसे चिकने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नुकीले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पृष्ठ भाग पर पांच शिराओं से युक्त नीचे के पत्र बड़े तथा ऊपर के पत्र छोटे होते हैं। इसके पुष्प सूक्ष्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकलिंगी कक्षीय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रथमतया हरित वर्ण के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चात् पीत वर्ण के होते हैं। इसके फल 2.5-3.8 सेमी लम्बे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">2-4 मिमी चौड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कच्चे शहतूत जैसे किन्तु छोटे व बारीक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पकने पर लाल रंग के व सूखने पर धूसर कृष्ण वर्ण के होते हैं। इसके फलों को ही पिप्पली कहते हैं। इसकी मूल काष्ठमय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्रन्थिल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कड़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आकार में कुछ-कुछ तगर के सदृश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृष्णाभ-धूसर वर्ण की तथा तोडऩे पर अन्दर से श्वेत वर्ण की होती है। यह स्वाद में तीक्ष्ण एवं चरपरी होती है। इसी में से शाखायें या उपमूल निकल कर भूमि पर फैलते हैं। मूल जितना वजनदार व मोटा होता है उतना ही अधिक गुणकारी माना जाता है। इसे ही पिप्पली मूल कहते हैं। बाजारों में जो पिप्पली मूल बिकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें मूल एवं गांठ सहित इसकी शाखाओं तथा काण्डों का ही मिश्रण रहता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रासायनिक संघटन:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें सुगंधित तैल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाइपरीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिप्पलीर्टिन नामक क्षाराभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिसेमिन तथा पिप्पलीस्टिरॉल पाया जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तैल में पाइपेरीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिप्पलीरटीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेसामिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्टीरॉल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डाईहायड्रोस्टिग्मा-स्टेरॉल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाईपरसाईड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हाइड्रोकार्बन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एवं सेस्क्यीटर्पीन पाया जाता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फल में वाष्पशील तैल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रेजिन</span>, N-<span lang="hi" xml:lang="hi">हेक्साडीकेन</span>, N-<span lang="hi" xml:lang="hi">हेक्टाडीकेन</span>, N-<span lang="hi" xml:lang="hi">ओक्टाडीकेन</span>, N-<span lang="hi" xml:lang="hi">नोनाडीकेन</span>, P-<span lang="hi" xml:lang="hi">मिथॉक्सीएसिटीफीनॉन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डाईहाईड्रोकार्वीओल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फेनीथाईल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मद्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोनोसाईक्लीक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिप्पलीरटीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ट्राईएकॉन्टेन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डाईहाईड्रोस्टीग्मास्टीरॉल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्लाईकोसाईड तथा मिथाईल सेस्क्यीटर्पीन पाया जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मूल में 2 क्षाराभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाईपरलॉन्ग्युमिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाईपरलॉन्ग्युमिनीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सीसेमिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाईपरीन एवं मिथाईल 3</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">4</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">5-ट्राईमिथॉक्सीन्नेमेटे पाया जाता है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/665.jpg" alt="66"></img></span></p>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">औषधीय प्रयोग एवं विधि:</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">शिरो रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">शिर:शूल-पिप्पली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काली मिर्च</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुनक्का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुलेठी और सोंठ चूर्ण को आपस में मिलाकर इसके 2 ग्राम चूर्ण को गाय के मक्खन में पकाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छान लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी एक से दो बूंद नाक में डालने से सिर की पीड़ा नष्ट होती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">आधासीसी-पीपल और वच चूर्ण को समभाग लेकर 3 ग्राम की मात्रा में नियमित रूप से दो बार दूध या गर्म जल के साथ सेवन करें आधासीसी की वेदना का शमन होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नेत्र रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">रतौंधी-प</span><span lang="hi" xml:lang="hi">िप्पली</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">काजल</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बनाकर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">लगाने</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अथवा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पिप्पली</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">गो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मूत्र</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">घिसकर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अंजन</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">करने</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रतौंधी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ी लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कर्ण रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कर्णशूल-प</span><span lang="hi" xml:lang="hi">िप्पली</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">चूर्ण</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्धूम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अंगारे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रखने</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">जो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">धुंआ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">निकले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे किसी नली द्वारा कान में प्रविष्ट कराने से शूल नष्ट हो जाता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मुख रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>दंतशूल- </strong>पिप्पली के 1-2 ग्राम चूर्ण में सेंधानमक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हल्दी और सरसों का तेल मिलाकर दांत पर लगाने से दंतशूल का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>दन्तहर्ष- </strong>3 ग्राम पिप्पली चूर्ण में 3 ग्राम मधु और घृत मिलाकर दिन में 3-4 बार दांतों पर लेप करने से दन्तहर्ष में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कण्ठ रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिश्याय व स्वर भंग पर-पीपल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीपलामूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काली मिर्च और सोंठ के समभाग चूर्ण को 2 ग्राम की मात्रा में लेकर शहद के साथ चटाते रहने से अथवा पिप्पली के क्वाथ में शहद मिलाकर थोड़ा-थोड़ा पिलाने से प्रतिश्याय में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वक्ष रोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास कास-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">एक ग्राम पिप्पली चूर्ण में दोगुना शहद मिलाकर चाटने से श्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिचकी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गले की खराश व प्लीहा रोग में लाभ होता है।  यह मधु पिप्पली योग कफरोग में बहुत लाभकारी है।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">1 ग्राम पिप्पली चूर्ण के साथ समभाग त्रिफला मिलाकर दिन में तीन बार सुबह खाली पेट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोपहर व रात्रि को भोजन से आधा घन्टा पहले शहद मिलाकर चाटने से हिचकी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कफ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वर और पीनस में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">3 ग्राम पिप्पली मूल चूर्ण में शहद मिलाकर दिन में तीन बार चटाने से श्वास रोग में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पिप्पली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीपलामूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोंठ और बहेड़ा को समभाग लेकर चूर्ण बना लें। इसे 3 ग्राम तक दिन में 3 बार शहद के साथ चटाने से खांसी नष्ट होती है। विशेषकर पुरानी खांसी व बार-बार होने वाली खांसी में यह अत्यन्त लाभप्रद है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">हिचकी-पिप्पली व मुलेठी चूर्ण को समभाग एकत्र कर उसमें चूर्ण के समभाग शक्कर मिलाकर रखें। इसे 3 ग्राम की मात्रा में लेकर सेवन करने से लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पीपलामूल और छोटी इलायची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बराबर-बराबर लेकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महीन चूर्ण बनाकर 3 ग्राम तक की मात्रा में घी के साथ प्रात:-सायं सेवन करने से विबन्ध तथा हृदय रोगों में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पिप्पली चूर्ण में बिजौरे नींबू की जड़ की छाल का चूर्ण बराबर मात्रा में मिलाकर रख लें। प्रात: काल खाली पेट 3 ग्राम इस चूर्ण को अर्जुन के काढ़े के साथ सेवन करने से हृदयशूल तथा दु:साध्य हृदय रोग में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पिप्पली चूर्ण में मधु मिलाकर प्रात: सेवन करने से कोलेस्ट्राल की मात्रा नियमित होती है तथा हृदय रोगों में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उदर रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>उदावर्त-</strong> पीपलामूल को पीसकर दूध और अडूसे के रस में मिलाकर पीने से उदावर्त में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>संग्रहणी-</strong> पिप्पली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भांग और सोंठ के समभाग चूर्ण को 2 ग्राम की मात्रा में लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे शहद मिलाकर दिन में दो या तीन बार भोजन से पहले सेवन करते रहने से भयंकर संग्रहणी व आंव नष्ट होती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>मरोड़-</strong> पीपल और छोटी हरड़ को बराबर-बराबर मिलाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीसकर एक चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम गर्म पानी से सेवन करने से पेट दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मरोड़ व दुर्गन्धयुक्त अतिसार का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>उदरशूल-</strong> पीपल के 2 ग्राम चूर्ण में 2 ग्राम काला नमक मिलाकर गर्म जल के साथ सेवन करने से उदरशूल मिटता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>आंत्रवृद्धि- </strong>पिप्पली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कूठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेर और गाय के गोबर को समभाग लेकर कांजी के साथ खूब महीन पीस कर लेप करने से लाभ होता है। यह प्रारम्भिक स्थिति में लाभ करता है। अधिक वृद्धि होने पर शल्य कर्म ही आंत्रवृद्धि की प्रमुख चिकित्सा है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>मंदाग्नि-</strong></span> 250 ग्राम पीपल और 250 ग्राम गुड़ का कल्क</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">1 किलो गाय का घी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">4 ली बकरी का दूध (न मिलने पर गाय का दूध) चारों को मंद आंच पर पकायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब केवल घी मात्र शेष रह जाये तो इस घी का प्रयोग मंदाग्नि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षय तथा कास में करें। 1 चम्मच दिन में तीन बार लें।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गुदा रोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अर्श-</strong>आधा चम्मच पिप्पली चूर्ण में समभाग भुना जीरा तथा थोड़ा सा सेंधानमक मिलाकर छाछ के साथ प्रात: खाली पेट सेवन करने से बवासीर रोग में आराम मिलता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">यकृतप्लीहा रोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>पांडुरोग- </strong>पांडुरोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्निमांद्य तथा धातुक्षय में एक भाग शहद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">2 भाग घी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">4 भाग पिप्पली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">8 भाग मिश्री</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">32 भाग दूध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दाल चीनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तमाल पत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इलायची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नागकेशर 6-6 भाग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सबको भली-भाँति मसलकर पकाकर लड्डू बना लें। प्रतिदिन एक लड्डू का सेवन करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>यकृत्- </strong>प्लीहा वृद्धि-2 से 4 ग्राम पिप्पली चूर्ण में 1 चम्मच शहद मिलाकर सुबह-शाम नियमित देने से यकृत् वृद्धि में लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजननसंस्थान रोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>आर्तव विकार-</strong> पिप्पली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोंठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मरिच और नागकेशर को समभाग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकर चूर्ण बना लें। 1-2 ग्राम चूर्ण को घी में मिलाकर दूध के साथ खाने से मासिक विकारों में लाभ होता है। इससे गर्भाशय गत विकार व शोथ का शमन होता है। मासिक धर्म के समय होने वाली वेदना व अंत:स्रावी ग्रन्थि (हार्मोन्स) के विकारों में भी यह लाभप्रद है। इसे दो तीन माह तक प्रात:-सायं सेवन करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>प्रसव कष्ट-</strong> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसव कष्ट में शीघ्र प्रसूति के लिए 3 ग्राम पीपलामूल में 3 ग्राम पुष्करमूल मिलाकर इसे 400 मिली पानी में पकाकर 100 मिली शेष रहने पर छानकर इसमें थोड़ा शहद व हींग मिला लें और पिलायें। इससे प्रसव पीड़ा बढ़कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीघ्र प्रसव हो जाता है। प्रसव के पश्चात् आंवल (अपरा/</span> Placenta<span lang="hi" xml:lang="hi">) गिराने के लिए भी तुरन्त उसी क्वाथ को ठण्डा करके पिला देना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अस्थिसंधि रोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>गृध्रसी व ऊरुस्तम्भ -</strong>3 ग्राम पिप्पली चूर्ण को 100 मिली गोमूत्र और 10 मिली अरंडी के तेल के साथ मिलाकर दिन में दो बार पिलाने से लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">शाखा रोग: </span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>ऊरुस्तम्भ-</strong> 3 ग्राम पिप्पली चूर्ण को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">15-20 मिली गोमूत्र अथवा 15-20 मिली दशमूल क्वाथ के साथ प्रात:-सायं सेवन करने से ऊरुस्तम्भ में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पिप्पली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिप्पलीमूल और भल्लातक-फल का समभाग चूर्ण (1-3 ग्राम) लेकर मधु के साथ प्रात: सायं सेवन करने से ऊरुस्तम्भ में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मानस रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अनिद्रा- </strong>पिप्पली मूल के महीन चूर्ण को 1 से 3 ग्राम तक की मात्रा में मिश्री या दुगुने गुड़ के साथ मिलाकर प्रात:-सायं सेवन करते रहने से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाचन संबंधी विकार दूर होकर अच्छी नींद आने लगती है। नींद के लिए वृद्ध लोग इस योग का प्रयोग विशेष रूप से कर सकते हैं।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वशरीर रोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>पीड़ा- </strong>शरीर के किसी भी अंग में पीड़ा हो तो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आधा चम्मच पिप्पली मूल चूर्ण को गर्म दूध या पानी के साथ सेवन करने से शीघ्र ही आराम मिलता है और नींद भी अच्छी आती है। उस दूध में आधा चम्मच हल्दी मिलाकर यदि प्रयोग किया जाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो चोट-मोच के दर्द में भी अत्यन्त लाभ होगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>मोटापा-</strong>2 ग्राम पिप्पली चूर्ण में मधु मिलाकर दिन में 3 बार कुछ हफ्ते तक नियमित रूप से सेवन कराने से मोटापा कम हो जाता है। पिप्पली चूर्ण के सेवन के एक घंटे तक जल को छोड़कर कुछ भी सेवन न करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>कासयुक्त ज्वर-</strong> पीपर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोंठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देवदारु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अडूसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नेत्रवाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीपरामूल तथा पोहकर मूल का क्वाथ बनाकर 10-20 मिली मात्रा में सेवन करने से श्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कासयुक्त ज्वर का शमन होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बाल रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चों के जब दांत निकलते हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस समय 1 ग्राम पिप्पली चूर्ण को 5 ग्राम शहद में मिलाकर मसूढ़ों पर घिसने से लाभ होगा।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि बालक अधिक रोता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे पिप्पली और त्रिफला के समभाग मिले हुए चूर्ण को 200 मिग्रा से एक ग्राम तक की मात्रा में घी और शहद मिलाकर सुबह-शाम चटाना चाहिए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">500 मिग्रा पिप्पली चूर्ण में मधु मिलाकर सेवन करने से कास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्लीहा विकार एवं हिक्का का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पिप्पली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोंठ और हरड़ के चूर्ण को समान मात्रा में लेकर लगभग 3 ग्राम चूर्ण को गुड़ में मिलाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें थोड़ा घी मिलाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूध के साथ दिन में दो बार खिलाने से दुग्ध की वृद्धि होती है। यह प्रयोग लगभग दो माह तक करें। </span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पोषक उत्पाद</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>फरवरी</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2315/bahurog-chikitsa-me-sahayak-pippali</link>
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                <pubDate>Wed, 01 Feb 2017 21:56:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भिलाई, छत्तीसगढ़  का पंच दिवसीय विश्वरिकॉर्ड योगाभ्यास शिविर</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के पावन सानिध्य एवं नेतृत्व मेंं भिलाई योगशिवि</span><span lang="hi" xml:lang="hi">र</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  में एक लाख लोगों ने एक स्थान पर योग व प्राणायाम के बनाये नौ विश्व रिकार्ड</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व रिकार्ड के लिए समर्पित रहा छत्तीसगढ़ का पतंजलि योग शिविर</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के मार्गदर्शन एवं सानिध्य में छत्तीसगढ़ प्रांत के भिलाई नगर में पतंजलि योग विज्ञान शिविर आयोजित हुआ। भिलाई के जंयती स्टेडियम के पास ३६ एकड़ के विशाल मैदान में यह शिविर रखा गया था। स्वामी विवेकानंद जी के 154 वें</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2316/bhilai-chhatisgarh-ka-panch-divasiya-vishwarecord-yogabhayas-shivir"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/216.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के पावन सानिध्य एवं नेतृत्व मेंं भिलाई योगशिवि</span><span lang="hi" xml:lang="hi">र</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> में एक लाख लोगों ने एक स्थान पर योग व प्राणायाम के बनाये नौ विश्व रिकार्ड</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व रिकार्ड के लिए समर्पित रहा छत्तीसगढ़ का पतंजलि योग शिविर</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के मार्गदर्शन एवं सानिध्य में छत्तीसगढ़ प्रांत के भिलाई नगर में पतंजलि योग विज्ञान शिविर आयोजित हुआ। भिलाई के जंयती स्टेडियम के पास ३६ एकड़ के विशाल मैदान में यह शिविर रखा गया था। स्वामी विवेकानंद जी के 154 वें जन्मोत्सव राष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर युवा शक्ति के अनूठे समन्वय से योग व प्राणायाम के 9 विश्व रिकार्ड बनाकर गरिमामयी इतिहास रचा गया। इस ऐतिहासिक आयोजन को आरम्भ करते हुए योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज ने युवा शक्तिका आहृान किया और कहा कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे शरीर फौलादी एवं हमारे संकल्प आत्मविजेता व हर क्षेत्र में विश्व विजेता बनने का होना चाहिए’।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/216.jpg" alt="21"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस शिविर में योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज व आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के पावन सानिध्य में लगभग एक लाख लोगों ने सहभागिता की। साथ ही इन  1 लाख लोगों ने एक साथ सामूहिक रूप से एक स्थान पर योग व प्राणायाम से संबधित ९ विश्व रिकार्ड बनाये।  जिसमें योग व प्राणायाम</span>,  <span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य नमस्कार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कपालभाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुलोम-विलोम आदि से जुड़े विश्व कीर्तिमान स्थापित किये गये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शिविर में 1 लाख से अधिक लोगों ने एक साथ 1 मिनट में 10 पुशअप लगाकर सामूहिक 10 लाख पुशअप का अनूठा पांचवा विश्व रिकार्ड बनाया और इस शिविर के माध्यम से छत्तीसगढ़ के प्रति अलौकिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जावान एवं उत्साह से भरे संकल्प को समर्पित किया।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/637.jpg" alt="63"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी क्रम में पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज के शिष्य सीकर (राजस्थान) के भाई जयपाल ने 141 मिनट तक शीर्षासन कर आज तक का छठा व नया विश्व कीर्तिमान बनाया तो वेद के नेति-नेति की धुन गुजायमान हो उठी। क्योंकि पिछले वर्ष स्वामी जी के ही  एक  शिष्य व पतंजलि विश्वविद्यालय के विद्यार्थी श्री व्योम झा द्वारा 90 मिनट तक शीर्षासन का रिकार्ड तोड़ा जा चुका था। तब भी फरीदाबाद का पूरा योग मैदान हर्ष ध्वनि से गूंज उठा था।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/457.jpg" alt="45"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य स्वामी जी के ही एक अन्य शिष्य भाई रोहतास ने फास्टेस्ट (सबसे तेज) पुशअप का सातवां विश्व रिकार्ड बनाया। उन्होंने 1000 पुशअप मात्र 19 मिनट 20 सेकेण्ड में लगाकर कनाडा के विलियम का 27 मिनट 40 सेकेण्ड में 1000 पुशअप का रिकार्ड तोड़ दिया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी क्रम में इस शिविर में आठवां व नवां विश्व रिकार्ड 50,000 से अधिक लोगों द्वारा सर्वांगासन एवं हलासन का एक साथ सामूहिक अभ्यास कर स्थापित किया गया।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/465.jpg" alt="46"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगशिविर में अत्यंत भावुक एवं प्रेरणादायी क्षण उस समय आया जब दिव्यांग गौकरण (जो हाथों से अपंग होने के साथ-साथ मूक एवं बधिर है) ने पैरों से अनुलोम-विलोम किया और फाईन आर्टिस्ट की प्रतिभा का परिचय देकर पैरों से स्वामी जी की पेटिंग बनाकर लोकार्पित की। यह युवा शक्ति के अदम्य संकल्प</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साहस व ऋषि सानिध्य का जीवंत उदाहरण था।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन सभी कीर्तिमानों को गोल्डन बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड में दर्ज किया गया। इसके लिए गोल्डन बुक के एशिया प्रमुख श्री मनोज विश्नोई के नेतृत्व में आब्जरवर्स की शीर्ष टीम मैदान में मौजूद रही तथा उनकी ओर से वल्र्ड स्टैण्डर्ड के ड्रोन कैमरों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वीडियोग्राफी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च तकनीक के मानिटिरिंग वाच एवं इक्विममेंट्स आदि की पूरी व्यवस्था की गई थी।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/536.jpg" alt="53"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगशिविर के विश्व रिकार्ड संबंधित पतंजलि की इस अवधारणा को सफल बनाने के लिए  भारत स्वाभिमान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योग समिति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महिला पतंजलि योग समिति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युवा भारत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसान सेवा समिति द्वारा इस आयोजन की वृहत तैयारी विगत दो माह से की जा रही थी। इस दौरान 50,000 विद्यार्थियों को आध्यात्मिक व बौद्धिक प्रशिक्षण के साथ-साथ राष्ट्र के आदर्श नायकों जैसे स्वामी दयानन्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी विवेकानन्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शहीद भगत सिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नेताजी सुभाष चन्द्र बोस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजगुरू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब्दुल हमीद आदि के जीवन गाथा का ज्ञान व परिचय कराया गया था। तत्पश्चात भारत स्वाभिमान के स्थापना दिवस ५ जनवरी के दिन एक विशाल सामूहिक परीक्षा आयोजित की गई थी। जिनमें १० शीर्ष विजेता विद्यार्थियों को योगशिविर के दौरान प्रदर्शन हेतु स्वीकृत किया गया। इस प्रकार सामूहिक शिविर में निर्णायकों के समक्ष सफल होने पर उन्हें छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह जी ने मंच से सम्मानित किया। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी दौरान छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री रमन सिंह एवं उच्च शिक्षा एवं राजस्व मंत्री श्री प्रेम प्रकाष्ठा पाण्डे जी की उपस्थिति में सबसे बडे योग सत्र का चौथा विश्व रिकार्ड भी बनाया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें 43 ब्लाक में बैठे 1 लाख से अधिक योग साधकों ने एक योग गुरू से एक साथ योग सीखा। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>फरवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Feb 2017 21:55:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>छत्तीसगढ़ में गठित होगा भारत का पहला योग आयोग</title>
                                    <description><![CDATA[<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सूरीनाम के उपराष्ट्रपति श्री अश्वीन अधीन ने अपनी धर्मपत्नी सहित छत्तीसगढ़ योग शिविर में की भागीदारी पूज्यवर से लिया आशीर्वाद</span></strong></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;" align="right"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ. रमन सिंह</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="right"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मुख्यमंत्री</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छत्तीसगढ़:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दुर्ग जिले के प्रसिद्ध नगर भिलाई में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज के साथ योगाभ्यास किया और छत्तीसगढ़ के विकास एवं समृद्धि के लिए पूज्यवर से आशीर्वाद लिया। इस अवसर पर पतंजलि के विश्वव्यापी अभियान की सराहना करते हुए मुख्यमंत्री महोदय ने कहा दुनिया भर में योगत्रषि ने योग की धूम मचाकर करोड़ों लोगों को स्वास्थ्य एवं सेवा से जोड़ा है। मुख्यमंत्री महोदय ने कहा पूज्य स्वामी जी व</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2317/chhatisgarh-me-gathit-hoga-bharat-ka-pahala-yog-ayog"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/475.jpg" alt=""></a><br /><ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सूरीनाम के उपराष्ट्रपति श्री अश्वीन अधीन ने अपनी धर्मपत्नी सहित छत्तीसगढ़ योग शिविर में की भागीदारी पूज्यवर से लिया आशीर्वाद</span></strong></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;" align="right"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ. रमन सिंह</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="right"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मुख्यमंत्री</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छत्तीसगढ़:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दुर्ग जिले के प्रसिद्ध नगर भिलाई में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज के साथ योगाभ्यास किया और छत्तीसगढ़ के विकास एवं समृद्धि के लिए पूज्यवर से आशीर्वाद लिया। इस अवसर पर पतंजलि के विश्वव्यापी अभियान की सराहना करते हुए मुख्यमंत्री महोदय ने कहा दुनिया भर में योगत्रषि ने योग की धूम मचाकर करोड़ों लोगों को स्वास्थ्य एवं सेवा से जोड़ा है। मुख्यमंत्री महोदय ने कहा पूज्य स्वामी जी व आचार्य बालकृष्ण जी के प्रयास से ही दुनिया में योग-आयुर्वेद को नयी पहचान व लोकप्रियता मिली है। उन्होंने कहा योग किसी भी स्मृति को संजोये रखने का ब्रह्मास्त्र है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मुख्यमंत्री महोदय ने पूज्य स्वामी जी की प्रेरणा से छत्तीसगढ़ में योगशिक्षा को बढ़ावा देने के लिए राज्य में योग आयोग स्थापित करने की घोषणा की। उन्होंने कहा ग्राम पंचायत और स्कूल स्तर तक योगक्रिया और योग शिक्षा को विस्तार देने में यह आयोग महत्वपूर्ण योगदान देगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर मुख्यमंत्री रमनसिंह ने पतंजलि फूड एण्ड हर्बल पार्क छत्तीसगढ़ प्रांत में लगाने के लिए स्वामी जी से निवेदन किया और स्वामी जी द्वारा स्वीकृति मिलने पर उन्होंने अधिकारियों से हर सम्भव सहयोग का निर्देश दिया तथा स्वयं इसके सफल संचालन हेतु अपना संकल्प व्यक्त किया। अगले ही दिन इस संदर्भ में पतंजलि एवं छत्तीसगढ़ सरकार के प्रमुख पदाधिकारियों के साथ मुख्यमंत्री महोदय ने बैठक कर योजना को अंतिम रूप भी प्रदान किया। उन्होंने कहा इसका सीधा फायदा किसानों को मिलेगा। छत्तीसगढ़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मुख्यमंत्री महोदय ने कहा महापुरुष और योगी दुनिया में एक बड़ा बदलाव लाने का कार्य करते हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज के प्रयासों से दुनियां के देशों में योग पहुंचाने का कीर्तिमान स्थापित हुआ है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="right"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="right"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">(संस्थापक अध्यक्ष- पतंजलि योगपीठ):</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज ने कहा इस योग शिविर में बने विश्व रिकार्ड से छत्तीसगढ़ एवं देश के करोड़ों लोगों का गौरव बढ़ा है। स्वामी जी ने कहा योग विस्तार तो हुआ पर इसे राजनीतिक पहचान मोदी जी के प्रयासों से मिली है। पर अब हम सबको मिलकर दुनियां में भोग के ग्लैमर की जगह योग के ग्लेमर को विखेरने की जरूरत है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी जी ने कहा कि कोई भी नेता या दल अच्छे दिन नहीं ला सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु अच्छे दिन के लिए सरकारों को अपने दायित्वों के प्रति इमानदारी से कार्य करना होगा। साथ ही पूज्यवर ने कहा देश की जनता सभी काम अपने राजनीतिक पार्टियों व नेता से ही कराना चाहती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसी सोच राष्ट्रहित में नहीं है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वास्तव में श्रेष्ठ राष्ट्र निर्माण के लिए सरकार व समाज दोनों को मिलकर काम करना होगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य स्वामी जी महाराज ने कहा कि आंतरिक व्यवस्था के लिए अपनाये कदम के बाद आशा है कि मोदी जी एक-एक करके विदेशों से भी कालाधन लाने का  प्रयास करेंगे। स्वामी जी ने कहा बड़े नोट के दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: 2000 के नोट छपना सरकार को शीघ्र ही बंद करना चाहिए। और सरकार को कैशलेस अर्थव्यवस्था की ओर तेजी से बढऩा चाहिए। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य स्वामी जी ने अनिवार्य मतदान को लोकतंत्र के लिए संजीवनी बताते हुए कहा कि इससे जबाब देही बनती है। कई देशों में इसकी व्यवस्था है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर भारत में इतनी राजनीतिक परिपक्वता अभी नही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: क्रमश: इस दिशा में प्रशिक्षण की आवश्यकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्यवर ने किया छत्तीसगढ़ क्रिकेट लीग का शुभारम्भ:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भिलाई के सेक्टर-1 स्थित स्टेडियम में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर हरभजन सिंह की गेंद पर योग ऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज द्वारा बल्लेबाजी करने के साथ छत्तीसगढ़ क्रिकेट लीग का शुभारम्भ हुआ। इस कार्यक्रम में पूज्यवर एवं अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर श्री हरभजन सिंह बतौर मुख्य अतिथि के रूप में सम्मिलित हुए। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर पूज्य स्वामी जी ने बताया कि देशज स्वदेशी खेलों का मुझे बचपन से ही शौक है। उन्होंने कहा मै प्रथम बार बतौर अतिथि किसी क्रिकेट स्टेडियम में आया हूँ। स्वामी जी ने कहा कि इस सीजीसीएल से छत्तीसगढ़ की राष्ट्रीय पहचान बनेगी। साथ ही स्वामी जी ने खिलाडिय़ों का उत्साहवर्धन करते हुए कहा कि खेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पालिटिक्स आदि जहाँ भी रहें अपना ध्वज ऊंचा करके रखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही जीवन का पुरुषार्थ धर्म और ऋषियों की संकल्पना है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="right"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धेय आचार्य </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बालकृष्ण जी महाराज</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="right"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">(महामंत्री</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ):</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ के महामंत्री श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने कहा कि छत्तीसगढ़ में पतंजलि फूड एवं हर्बल पार्क निर्मित होने से यहां के किसानों की समृद्धि बढ़ेगी और उनके कृषि उत्पादों का सही मूल्य मिलेगा। यहाँ लगने वाली पतंजलि की प्रोसेसिंग यूनिट से किसानों का उत्पाद औने-पौने दामों में खरीदनें वाले विचौलियों से निजात मिलेगी। आचार्य श्री ने कहा छत्तीसगढ़ में वनौषधियों का भंडार है और यहां के किसान मेहनती होने के साथ-साथ भावनाशील भी हैं। उनमें राष्ट्रहित पहले है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वहित बाद में। ऐसे में इन्हें थोड़ा प्रोत्साहन मिलने से छत्तीसगढ़ का कायाकल्प होने से नहीं रोका जा सकेगा। आचार्य श्री ने कहा पतंजलि के प्रत्येक पुरुषार्थ में राष्ट्रीय संकल्प निहित है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने कहा कि पतंजलि की ताकत का अहसास अब विदेशी कंपनियों को भी हो गया कि  करोड़ों रुपये की मार्केटिंग व ब्रांडिंग खर्च से देश की जनता को आकर्षित नहीं किया जा सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके लिए देश की करोड़ो जनता के प्रति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मां भारतीय के प्रति अंत: में प्यार जगाना होगा। श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने छत्तीसगढ़ के किसानों की कठिनाईयों का जिक्र करते हुए बताया कि बीते दिनों लागत नहीं मिलने के कारण यहां के कई क्षेत्रों के किसानों को मैंने टमाटर सड़क पर फेंकते देखा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी से यहाँ फूडपार्क प्लांट लगाने का विचार घुमड़ रहा था। अब इससे यहां के किसानों को सीधे लाभ मिलेगा और छत्तीसगढ़ के युवाओं को रोजगार भी मिलेगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्था समाचार</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>फरवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Feb 2017 21:54:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पतंजलि को मिले वल्र्ड रिकार्ड (21 जून 2016 से अब तक)</title>
                                    <description><![CDATA[<ul>
<li>
<h5>  <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व में सबसे अधिक प्रकाशित व बिकने वाली आयुर्वेदिक पुस्तक औषध दर्शन (1 करोड़ से अधिक )।</span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">एक व्यक्ति द्वारा सर्वाधिक लाईव कार्यक्रम का प्रसारण (योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज का सबसे लम्बे समय तक 10 वर्षों में 2000 से अधिक दिनों में 5000 घण्टे से अधिक का प्रसारण)।</span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व में एक स्थान पर सबसे कम जगह 7 एकड़ में सर्वाधिक 850 से अधिक प्रजातियों का आयुर्वेदिक औषधीय हर्बल गार्डन की स्थापना।</span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व का सबसे बड़ा योग भवन (850 लाख स्क्वायर फीट का पतंजलि योगपीठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फेस-2 में निर्मित योगभवन)। </span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व का प्रथम आयुर्वेदिक संग्रहालय (म्यूजियम)।</span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कैनवास पर (18 हजार</span></h5></li></ul>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><ul>
<li>
<h5> <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व में सबसे अधिक प्रकाशित व बिकने वाली आयुर्वेदिक पुस्तक औषध दर्शन (1 करोड़ से अधिक )।</span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">एक व्यक्ति द्वारा सर्वाधिक लाईव कार्यक्रम का प्रसारण (योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज का सबसे लम्बे समय तक 10 वर्षों में 2000 से अधिक दिनों में 5000 घण्टे से अधिक का प्रसारण)।</span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व में एक स्थान पर सबसे कम जगह 7 एकड़ में सर्वाधिक 850 से अधिक प्रजातियों का आयुर्वेदिक औषधीय हर्बल गार्डन की स्थापना।</span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व का सबसे बड़ा योग भवन (850 लाख स्क्वायर फीट का पतंजलि योगपीठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फेस-2 में निर्मित योगभवन)। </span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व का प्रथम आयुर्वेदिक संग्रहालय (म्यूजियम)।</span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कैनवास पर (18 हजार से अधिक) आयुर्वेदिक पेड़-पौधों की चित्रकारी (पेन्टींग) का संग्रह।</span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">आपदा पीडि़तों की राहत के लिए सबसे कम समय (मात्र 10 महीने) में सबसे बड़ा (1.5 लाख फीट) गैर सरकारी संस्था द्वारा निर्मित पुनस्र्थापना केन्द्र । पतंजलि का  मूल्याग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तराखण्ड  केंद्र।</span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व में प्रथम बार 63 हजार हर्बल पौधों के 4 लाख से अधिक नामों की 220 से अधिक भाषाओं के साथ ग्लोसरी।</span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व में एक समय में सम्पूर्ण भारत भर के विभिन्न स्थानों पर  सर्वाधिक संख्या में आयुर्वेदिक औषधीय पौधों का वितरण (4 अगस्त</span>, 2016<span lang="hi" xml:lang="hi"> को देशभर में 6 लाख से अधिक)</span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व में एक समय में एक स्थान पर सर्वाधिक संख्या में आयुर्वेदिक औषधीय पौधों का वितरण (4 अगस्त</span>, 2016<span lang="hi" xml:lang="hi"> को 1 लाख से अधिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार)</span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेदिक औषधीय (आँवला) की सर्वाधिक प्रोसेसिंग एवं उपयोग वर्ष 2015-16 में 30,000</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> टन से अधिक।</span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व में सबसे बड़ा आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों का वेयर हाउस - 3 लाख स्क्वायर फीट</span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जड़ी-बूटियों एवं आयूर्वेद पर विश्व में सर्वाधिक लम्बे समय से प्रसारित होने वाला प्रोग्राम (10 वर्षों से लगातार 40 मिनट प्रतिदिन)</span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद विषय पर सर्वाधिक फेसबुक पेज लाईक - 41,21,200</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> (पूज्य आचार्य बालकृष्ण जी महाराज) </span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">दिनांक 04 अगस्त</span>, 2016</h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">एक लेखक की पुस्तक सर्वाधिक प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित।</span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">एक पुस्तक का सर्वाधिक भाषाओं में अनुवादित रूप में एक दिन में विमोचन</span>, (17<span lang="hi" xml:lang="hi">) भाषाओं में- आयुर्वेद सिद्धान्त रहस्य।</span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अष्टांग आयुर्वेद के सिद्धान्त को प्रदर्शित करने वाला धातु का बना सबसे बड़ा वृक्ष का प्रतिरूप।</span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व का सबसे बड़ा प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्र- 125 एकड़</span>, 600<span lang="hi" xml:lang="hi"> लोगों की आवास व्यवस्था के साथ।</span></h5>
</li>
<li>
<h5> <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वाधिक तीव्र गति से (68 दिन) निर्मित 600 लोगों की आवासीय क्षमता वाला प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्र- योगग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार (68 दिन) में  निर्मित।</span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">एक दिन में सर्वाधिक विश्व रिकार्ड का आवेदन एक संस्था द्वारा।</span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि विश्वविद्यालय के रवि व्योम शंकर झा ने 89.08 मिनट तक शीर्षासन का विश्व रिकार्ड बनाया।</span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योग समिति के ब्रह्मचारी गोविन्द जी द्वारा 7 घंटे में लगातार 3100 बार सूर्य नमस्कार करके सर्वाधिक संख्या में लगातार सूर्य नमस्कार करने का वल्र्ड रिकार्ड बना। </span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि द्वारा 47 किग्रा. के साथ एक मिनट में 41 बार पुशअप लगाकर नया गोल्डन बुक  आफ वल्र्ड रिकॉर्ड स्थापित किया।</span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रथम बार 25 किग्रा. वजन के साथ एक दिन में 5125 पुशअप का नया विश्व रिकार्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि के रोहताश चौधरी द्वारा </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बनाया</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">गया।</span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वाधिक लोगों द्वारा एक साथ योग का विश्व रिकार्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगऋषि स्वामी रामदेवजी के मार्गदर्शन में लगभग 1,00,000</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> (1 लाख) लोगों द्वारा एक साथ योगाभ्यास करके। </span></h5>
</li>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यंग एचीवर कैटेगरी में श्री हर्षराम (14 वर्ष) द्वारा लगातार सामूहिक रूप से शीर्षासन करने का गोल्डन बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड।</span></h5>
</li>
</ul>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्था समाचार</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>फरवरी</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2318/patanjali-ko-mile-world-record</link>
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                <pubDate>Wed, 01 Feb 2017 21:53:45 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बोलती तस्वीरे</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:center;"><strong>दिल्ली के एक प्रतिभा सम्मान कार्यक्रम में पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज से आशीर्वाद लेते अंतरराष्ट्रीय बाक्सिंग चैम्पियन श्री बिजेन्दर सिंह व कुश्ती चैम्पियन श्री सुशील कुमार एवं अन्य खिलाड़ी </strong></h5>
<p><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/752.jpg" alt="75" /></strong></p>
<h5 style="text-align:center;"><strong>तेलांगाना प्रांत की राज्य स्तरीय कार्यकर्ता बैठक में सहभागिता करतीं भारत स्वाभिमान एवं पतंजलि योगपीठ की प्रमुख कार्यकर्ता बहिनें</strong></h5>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2319/bolti-tasveere"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/711.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:center;"><strong>दिल्ली के एक प्रतिभा सम्मान कार्यक्रम में पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज से आशीर्वाद लेते अंतरराष्ट्रीय बाक्सिंग चैम्पियन श्री बिजेन्दर सिंह व कुश्ती चैम्पियन श्री सुशील कुमार एवं अन्य खिलाड़ी </strong></h5>
<p><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/752.jpg" alt="75"></img></strong></p>
<h5 style="text-align:center;"><strong>तेलांगाना प्रांत की राज्य स्तरीय कार्यकर्ता बैठक में सहभागिता करतीं भारत स्वाभिमान एवं पतंजलि योगपीठ की प्रमुख कार्यकर्ता बहिनें</strong></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्था समाचार</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>फरवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Feb 2017 21:50:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भक्ति की शक्ति</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">डॉ. साध्वी देवप्रिया</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्षा</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">दर्शन विभाग</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">पतंजलि विश्वविद्यालय</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">हरिद्वार</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2320/bhakti-ki-shakti"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/526.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   यह</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सच है कि आध्यात्मिकता का प्राण है भक्ति </span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु भक्ति  का ठीक-ठीक स्वरूप न जानने के कारण भक्ति  के नाम पर कई बार-भ्रान्ति का शिकार भी व्यक्ति हो जाता है। क्योंकि भक्ति </span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्चना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आराधना व उपासना इन शब्दों का अर्थ बहुत नजदीक-नजदीक ही है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>भक्ति का स्वरू<span style="color:rgb(186,55,42);">प</span></strong>:</span></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृत में भञ्जो-आमर्दने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा भज्-सेवायाम् धातु से भक्ति शब्द की निष्पत्ति होती है। भञ्जो-आमर्दने का अर्थ है- भज्यते अहङ्कारो अनया सा भक्ति:। अर्थात् जिससे हमारा अहंकार टूटकर अपने आराध्य में विलीन हो जाता है वह भक्ति है। या फिर भज्यते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेव्यते अनया सा भक्ति:। जिससे ईश्वर का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य कर्मों का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तम गुणों का सेवन किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह भक्ति है। भक्ति का अभिप्राय है- पूर्ण समर्पण। भक्ति साधना भी है और साध्य भी है। भक्ति में दो मिलकर एक हो जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे नमक और पानी। एक सच्चे भक्त में द्वैत होते हुए भी अद्वैत ही घटित होता है। भक्ति की शुरुआत उपासना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्चना व प्रेम से होती है तथा अन्त उसी प्रकार के आचरण की अभिव्यक्ति से होता है। भक्ति का अभिप्राय है अभिव्यक्ति। यदि हमारी गुरु के प्रति भक्ति है तो गुरु जैसी वाणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्धान्त हमारे माध्यम से अभिव्यक्त हों। यह जितने अंश में घटित होता है उतने ही अंश में हमारी भक्ति होती है। ईश्वर भक्त वही है जिसके माध्यम से ईश्वरीय ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदनाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ सब कुछ करते हुए अकर्तृत्व भाव की अभिव्यक्ति होने लगे। राष्ट्रभक्ति का अभिप्राय है- राष्ट्र को मात्र एक भूमि का टुकड़ा न मानकर- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:</span>’’<span lang="hi" xml:lang="hi">। राष्ट्र को अपनी माँ के समान सम्माननीया मानकर उसकी सेवा करना तथा आवश्यकता पड़े तो अपना सर्वस्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने प्राण बलिदान करने में भी पीछे नहीं हटना। जब हमें आस्तिकता से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य गुणों से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वर से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सृष्टि से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समस्त प्राणियों से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा से और स्वयं प्रेम से भी प्रेम हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब भक्ति की शुरुआत होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भक्ति तत्त्व यद्यपि अपने मूल में एक ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथापि बाह्य दृष्टि से भक्ति के कई रूप दिखाई देते हैं। जैसे ईश्वर भक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुभक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पितृभक्ति व राष्ट्रभक्ति इत्यादि। भक्ति का यह अर्थ कदापि नहीं होता है कि हमने आपके लिए दीपक जला दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जलाभिषेक कर दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिलक लगा दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसाद बांट दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कावड़ चढ़ा दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">झण्डा चढ़ा दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बलि चढ़ा दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब आप भी हमारी मनोकामना पूरी करो और यदि आप हमारी इच्छा पूरी नहीं करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हम कहीं और प्रयास (ट्राई) करेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा आपका कोई सम्बन्ध नहीं है। इसमें तो भक्ति की गन्ध भी नहीं है। एक सच्चा भक्त तो सदा यही प्रार्थना करता है कि हे नाथ! जो मैं आप से मांगू वह कदापि मत देना क्योंकि मैं तो अल्पज्ञ हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे लिए जो आप कल्याणकारी समझें वही मुझे देना मैं आपकी भक्ति या सेवा के सिवाय और कुछ भी नहीं चाहता हूँ। भक्ति में तो भक्त अपने-आपका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को मिटा देना चाहता है। ईश्वर भक्त बोलता है- </span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">ओ३म् यदग्ने स्यामहं त्वं त्वं वा घा स्यामहम्। स्युष्टे सत्या इहाशिष:।। (ऋग्वेद- </span>8.44.23)</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् हे मेरे प्रभु! तुम </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">बन जाओ या मै </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">तू</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">बन जाऊँ अर्थात् मैं अपने अस्तित्व को आप में विलीन करके आपका ही प्रतिनिधि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिरूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूत्र्तरूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपके हाथों का एक दिव्ययन्त्र बन जाऊँ। और साथ ही भगवान् की भी यह प्रतिज्ञा है-</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">ओ३म् यदङ्ग दाशुषे त्वमग्ने भद्रं करिष्यसि। तवेतत् सत्यमङ्गिर:।</span> (<span lang="hi" xml:lang="hi">ऋग्वेद-</span>1/1/2)</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् ईश्वर जिसको अपना लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वीकार कर लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अङ्गीकार कर लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका सर्वदा सर्वत्र कल्याण ही होता है। गीता में भी भगवान् कृष्ण कहते हैं-हे अर्जुन!</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">मन्मना भव भद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिज्ञाने प्रियोऽसि मे। (गीता</span>18/65)</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">अनपेक्ष शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथ:।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वारम्भपरित्यागी यो भद्क्त: स मे प्रिय:। (गीता </span>12/16)</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">'<span lang="hi" xml:lang="hi">न मे भक्त: प्रणश्यति</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। (गीता </span>9.31)</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् मेरे भक्त का कभी नाश नहीं होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक सच्चा गुरुभक्त कहता है- हे मेरे गुरुदेव! मेरी इच्छा नहीं अपितु आपकी ही इच्छा पूर्ण हो। क्योंकि अल्पज्ञ होने के कारण मेरी इच्छा दोषपूर्ण हो सकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन आप तो साक्षात् उस शाश्वत के ही प्रतिनिधि हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए आपकी संकल्पना तो स्वयं ईश्वर की ही संकल्पना होने से दिव्य है। इसलिए वैदिक परम्परा में शिष्य को अन्तेवासी शब्द से सम्बोधित किया गया है अर्थात् गुरु के अन्दर निवास करने वाला अथवा जिसके अन्दर गुरु निवास करता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">''<span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्ममन्त:</span>’’ </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य उपनीत ब्रह्मचारी को अपने गर्भ में धारण करता है गुरु कहता है- </span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">मम व्रते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदयं ते दधामि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ममचित्तमनुचित्तं ते अस्तु।</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">मम वाचमेकमना जुषस्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बृहस्पतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम्</span>’’<span lang="hi" xml:lang="hi">।।</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् गुरु के व्रत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संकल्प</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचरण आदि के साथ शिष्य या भक्त तद्रूप हो जाता है। एक राष्ट्रभक्त अपना सर्वस्व मातृभूमि पर आहुत करके भी सोचता है कि ऐसे सैकड़ों जन्म मुझे मिलें ताकि मैं और भी अपने राष्ट्रदेव की पूजा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्चना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व सेवा कर सकूँ। </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">तेरा वैभव सदा रहे माँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम दिन चार रहें न रहें</span>’’<span lang="hi" xml:lang="hi">। श्री अरविन्द कहते थे- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">भारत माता मेरे लिए कोई भूमि का टुकड़ा नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि मेरी माँ है और उसकी छाती पर बैठकर कोई उसका रक्तपान करे तो भला मैं कैसे मौन रह सकता हूँ। अत: भक्ति का तात्पर्य है कि हम जिसके भक्त होते हैं उसके अस्तित्व के साथ <span style="color:rgb(0,0,0);">अपने</span> अस्तित्व को सर्वात्मना एकाकार कर दें। यद्यपि भक्ति और समर्पण एक ही दिन में पूर्ण नहीं होते अपितु उत्तरोत्तर बढ़ते जाते हैं। जिस अनुपात में हमारी भक्ति व समर्पण बढ़ते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी अनुपात में दिव्यता का अवतरण भक्त में होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आस्तिकता का अभिप्राय:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रयोजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लाभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फायदा या बड़े परिणाम की प्राप्ति के बिना कोई प्राणी पलक भी नहीं झपकता है। अत: प्रश्न उठता है कि हर प्राणी अपने ही कर्मों का अच्छा या बुरा फल भोगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें कोई परिवर्तन होना असम्भव है फिर भक्ति करने से क्या लाभ</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">सचमुच भक्ति का मतलब है अपने आपको मिटाना लेकिन यह व्यक्ति स्वयं को मिटाकर ही पूर्ण अभिव्यक्ति को प्राप्त होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्णता को प्राप्त कर पाता है- जैसे बीज मिट्टी में मिलकर वृक्ष के रूप में पूर्णता को प्राप्त कर पाता है। एक ईश्वर भक्त सर्वप्रथम अपने से ऊपर किसी महान् शक्ति के अस्तित्व को प्रामाणिकता से स्वीकार करके अपने जीवन में पूर्णता व दिव्यता को प्राप्त कर लेता है व सच्चा आस्तिक बन जाता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आस्तिक का अभिप्राय क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति देखता है मेरे अपने शरीर की रचना तथा उसकी कार्यपद्धति इतनी सूक्ष्म है कि उसे बनाना या चलाना तो दूर की बात उसे समझ पाना भी अत्यन्त कठिन है। इसी प्रकार बाहर के इस संसार की विशालता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियमितता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुन्दरता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनन्तता आदि को देखकर कार्य-कारण के नियम से किसी नियन्ता का अनुमान  होता है जो कि इस सृष्टि का कर्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियन्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पालनकर्ता फलप्रदाता न्यायकर्मी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दयालु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वज्ञ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वशक्तिमान् व सर्वव्यापक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह बहुत ही महान् है ऐसी धारणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वास और निष्ठा जब व्यक्ति के हृदय में उत्पन्न होती है तब वह उसके प्रति नतमस्तक होकर समर्पण करता है। इस सारी कायनात का जो स्वामी है उसी को वेदों में </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">भू:</span>’’ <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वरूप कहा है। भू:= प्राणों का भी प्राण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह तो उपलक्षण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भू: का पूर्ण अर्थ है इस सम्पूर्ण बाह्य व आन्तरिक सत्ता का स्वामी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब कोई अपने से महान् सत्ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भक्त देखता है कि मुझे कुछ बाह्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भौतिक दु:ख है और कुछ आन्तरिक आध्यात्मिक दु:ख हैं तथा  ईश्वर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भुव:</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वरूप है अर्थात् समस्त दु:खों का नाशक है और केवल दु:ख का नाश ही नहीं करता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्व:</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">सुख स्वरूप भी है। अनन्त आनन्द का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा का व सामथ्र्य का वह स्वामी है। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">तत् सवितु: वरेण्यम्</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। तब भक्त को लगता है कि वह समस्त सृष्टि का स्रष्टा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धारण-पोषण कर्ता व नियन्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वशक्तिमान् सविता देव ईश्वर ही वरण करने योग है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यहां वर का अर्थ श्रेष्ठ भी होता है। अत: ईश्वर ही सर्वश्रेष्ठत्तम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए मैं उसी का वरण करता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चयन करता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने-आपको सर्वभावेन उसी के चरणों में समर्पित करता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी की आराधना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपासना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा या भक्ति करने का संकल्प लेता हूँ। अत: भक्ति का लाभ है समस्त बाह्य एवं आन्तरिक दु:खों से मुक्ति। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भक्त सब दु:खों से मुक्त होकर एवं भगवान् की समस्त दिव्यताओं से युक्त होकर जीता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ईश्वर के उपासक भक्त की बुद्धि सत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय व पुरुषार्थ के ही मार्ग पर चलती है। एक क्षण के लिए भी ईश्वर भक्त विचलित नहीं होता। महर्षि दयानन्द कहते हैं- एक सच्चा ईश्वर भक्त पहाड़ के समान बड़ा दु:ख आने पर भी विचलित नहीं होता। वह वेदानुकूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि आप्त पुरुषों या गुरु के अनुकूल या आत्मानुकूल आचरण करता हुआ आध्यात्मिक दिव्य जीवन जीता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भक्ति का सर्वोपरि लाभ:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह एक सार्वभौमिक सत्य नियम है कि जिसकी हम उपासना करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका हम सेवन करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके गुणों का प्रभाव हममें अवतरित होने लगता है। जैसे आग के पास बैठने से ऊष्मा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जल के पास बैठने से शीतलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुगन्धित फूल के पास बैठने से सुगन्ध स्वत: ही हमारे अनुभव में आने लगती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी प्रकार </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भर्गो देवस्य धीमहि</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">भर्गस्वरूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्योति स्वरूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकाश स्वरूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञानस्वरूप उस देवाधिदेव का भर्ग अर्थात् बुद्धि में ईश्वरीय अनन्त ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय में ईश्वरीय अनन्त प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा व दिव्य संवेदनाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाणी में दिव्य ओज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हाथों में अनन्त ऊर्जा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामथ्र्य व पूरे जीवन में ईश्वरीय अलौकिक शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अखण्ड-प्रचण्ड पुरुषार्थ की क्षमता को यह भक्त सहज रूप में धारण कर पाता हैं ऐसा भक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि व उस पराशक्ति का सगुण साकार प्रतिरूप होकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूर्तरूप होकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस शाश्वत का प्रतिनिधि बनकर इस धरती पर एक दिव्यता का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिकता का साम्राज्य स्थापित करता है। उसके शरीर के रोम-रोम से दिव्यता प्रवाहित होने लगती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह वामन बीज से विराट् वृक्ष बनकर सम्पूर्ण समष्टि को सुखदायी छाँव प्रदान करता है। ऐसी ही महान् आत्माओं के लिए यह कथन किया जाता है- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">संत परमहितकारी जग में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भक्त परम हितकारी</span>’’<span lang="hi" xml:lang="hi">। यही भगवद् भक्ति ध्यान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाधि या अस्तिकता का सर्वोपरि लाभ है कि मनुष्य मानव शरीर में रहते हुए  समस्त प्रकार के शारीरिक रोगों से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब प्रकार के मन के अज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्धकारों से मुक्त होकर अपने जीवन व आचरण के माध्यम से सूर्य की भाँति जगत् में रहते हुए भी जगत् के समस्त दोषों से निर्लिप्त रहकर ईश्वरीय ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वरीय प्रेम व ईश्वरीय सामथ्र्य से युक्त होकर एक दिव्यता का संवाहक बन जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस दिव्य विरासत को पाकर भक्त अहङ्कार नहीं करता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु ईश्वर के प्रति अनन्त कृतज्ञता प्रकट करता हुआ प्रार्थना करता है- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">धियो यो न: प्रचोदयात्</span>’’ <span lang="hi" xml:lang="hi">हे नाथ! हे नारायण! यह सब आपका ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपसे ही है। आप ही इस समस्त दिव्य ऐश्वर्य के मालिक हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आप मेरी बुद्धि को सदा इस प्रकार का प्रेरणा प्रदान करते रहें कि मैं आपका एक यन्त्र या भक्त बनकर आप ही की सेवा में प्रतिपल समर्पित रहूँ। मैं आपको एक क्षण के लिए भी कभी भूलूं नहीं। आपके उपकारों के प्रति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपकी कृपा के प्रति सदा कृतज्ञ बना रहूँ। ऐसा भक्त सृष्टि के हर प्राणी में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर सम्बन्ध में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कण-कण में उसी ब्रह्म का साक्षात् अनुभव करता हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृतज्ञता व आनन्द से ओत प्रोत या लबा-लब भरा रहता है। सच्चे भक्त को सबकुछ ब्रह्ममय ही अनुभव होता है। वासुदेव: सर्वम्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओ३म् ईशावास्यमिदं सर्वम्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओऽम्-सर्वं खलु-इदं-ब्रह्म। सबके मूल में पूर्ण सत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण सुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्ति समृद्धि व आनन्द का मूलाधार तो एक परमेश्वर ही है।</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद् ब्रह्म पश्चाद् दक्षिणतश्चोत्तरेण।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">अधश्चोध्र्वं च प्रसूतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम्। (मुण्डक- </span>2.2.11)</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अमृत ब्रह्म ही सामने हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्म ही पीछे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्म ही दक्षिण में है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्म ही उत्तर में है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीचे ब्रह्म है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊपर ब्रह्म है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सम्पूर्ण विश्व-संसार में जो-कुछ भी वरिष्ठ हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब ब्रह्म-ही-ब्रह्म का प्रसार है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी का विस्तार है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस मन्त्र का अर्थ एक भक्त के जीवन में साक्षात् अनुभूत होने लगता है इसके विपरीत जो ईश्वर की सत्ता को स्वीकार न करके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नास्तिक बनकर जीवन यापन करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह इस जन्म में अनेक दु:खों का भोक्ता बनकर इस दुर्लभ अवसर मानव जीवन को व्यर्थ ही नष्ट कर लेता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नास्तिकता का स्वरूप:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो व्यक्ति ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं करता अपने आपको नास्तिक कहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके जीवन में दोषों का प्रवेश होने से वह स्वयं भी दु:खी होता है और समष्टि में भी दु:ख की ही तरंगों को प्रवाहित करता है। यद्यपि आस्तिक व नास्तिक के भेद को समझना आसान नहीं है। आस्तिक वह नहीं है जो मंदिर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मस्जिद या गुरुद्वारे जाकर कुछ पूजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्चन कर लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु जीवन में सत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मचर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुचिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सद्भाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईमानदारी व प्रेम का आचरण नहीं कर पाता और नास्तिक उस व्यक्ति को नहीं कहेंगे जो एक तथाकथित काल्पनिक साकार पाषाण प्रतिमा या देवी देवता को ईश्वर के रूप में नहीं मानता। कभी मंदिर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मस्जिद आदि भी नहीं जाता। धूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दीप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आदि अर्चन-तर्पण भी नहीं करता किन्तु जीवन में सत्य का पालन करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सृष्टि नियमों को स्वीकार करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचरण की शुचिता आदि का पालन करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वास्तव में वह व्यक्ति नास्तिक नहीं अपितु व्यवहार से तो आस्तिक ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल सैद्धान्तिक रूप में ईश्वर के स्वरूप से परिचित नहीं है। सैद्धान्तिक रूप से नास्तिक वह है जो दृष्ट के पीछे अदृष्ट सत्य को नहीं मानता।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नास्तिकता से हानि:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">संकीर्णता का दोष- जो व्यक्ति सिद्धांत व आचरण दोनों ही पक्षों में ईश्वर के स्वरूप को नहीं जानता या नहीं मानता उसका ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐश्वर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम आदि अत्यन्त सीमित हो जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके फलस्वरूप वह अत्यन्त संकीर्ण होकर समुद्र में रहकर भी केवल बूँद भर ही ग्रहण कर पाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अहंकार का दोष- ऐसा व्यक्ति अपने से ऊपर किसी महान् सत्ता को स्वीकार न करने के कारण अहंकार का पात्र बन जाता है और उसका यह बढ़ा हुआ अहंकार ही एक दिन उसके स्वयं के नाश का कारण बन जाता है। दुर्योधन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिरण्यकश्यपु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कंस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रावण व नहुष आदि इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कृतघ्नता का दोष- हमें जो कुछ भी मिला है और विशेष रूप से यह मानव शरीर जो मिला है वह ईश्वर की अहैतुकी कृपा का ही फल है तथा इसके साथ ही सूर्य-चन्द्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वायु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पृृथिवी आदि सृष्टि की समस्त दैवी-शक्तियों की सेवा या सुविधा हमें ईश्वर की अहैतुकी कृपा से ही मिली हैं और जब हम उसके उपकारों को स्वीकार नहीं करते हैं या उसकी आज्ञापालन नहीं करते हैं तो हम कृतघ्नता के दोष से दूषित हो जाते है और कृतघ्नता का फल बताते हुए नीतिकार कहते हैं-</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">नास्तिक: कृतघ्नश्च</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यश्च विश्वासघातक:।</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">ते नरा: नरकं यान्ति यावत् चन्द्रदिवाकरौ।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् नास्तिक व्यक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृतघ्न व्यक्ति तथा विश्वास को तोडऩे वाला ये तीन प्रकार के व्यक्ति तब तक नरक की यातना के भागी बनते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब तक ये सूरज-चांद रहेंगे। अत: हमें भक्ति के यथार्थ स्वरूप को समझकर ईश्वर की दिव्य शक्तियों का संवाहक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पात्र व भक्त बनने का प्रयास करना चाहिये। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>सनातन वैभव</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>फरवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Feb 2017 21:47:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>इम्यून पावर की कमजोरी दर्शाता है 'जुकाम’</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi"><span> </span>डॉ. नागेन्द्र कुमार </span>'</strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">नीरज’</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">निदेशक-पतं</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2321/immune-power-ki-kamjori-darshati-hai-jukam"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/374.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जुकाम </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा रोग है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी आज तक दवा तक नहीं खोजी जा सकी। यही नहीं औषधियों के प्रयोग से इस रोग का अधिक जटिल होना अलग रहस्य है। उपचार की दृष्टि से जुकाम के लिए कोई भी अंग्रेजी दवा न लें। पूर्ण विश्राम करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही प्रत्येक मौसम परिवर्तन पर अथवा जुकाम की सम्भावना होने पर गिलोय घनवटी का प्रयोग कर सकते हैं। शरीर के साथ पाचन-संस्थान को भी विश्राम दें। इस दृष्टि से 2-3 दिन नींबू-गरम पानी-शहद प्रत्येक ढ़ाई घंटे के अंतराल पर लेते रहें। पानी का खूब प्रयोग करें। पानी का तापमान शरीर के तापमान के बराबर हो। यदि नींबू+पानी+शहद पर रहना मुश्किल हो तो वैसी स्थिति में नीबू के फल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संतरे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मौसम्मी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चकोतरे से फलाहार करें। नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. लाइनसपालिंग ने जुकाम की सर्वोत्तम औषधि विटामिन-सी माना है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">व</span><span lang="hi" xml:lang="hi">र्जीनिया विश्वविद्यालय के डॉ. जैक एम. ग्वाल्टनी जूनियर और ओवन हैडली विभिन्न समुदायों पर किए गए अपने शोध कार्यों से इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि जुकाम का वायरस पीडि़त व्यक्ति के हाथ द्वारा संक्रमित होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि चुम्बन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छींक या खाँसी द्वारा। पीडि़त व्यक्ति कहीं हाथ रखे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर उस जगह स्वस्थ व्यक्ति हाथ रखे तो वह जुकाम से पीडि़त हो सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जुकाम के वायरस निर्जीव वस्तु पर भी 62 घंटे तक जीवित रहते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका के एक सर्वेक्षण के अनुसार जुकाम के कारण प्रतिवर्ष पाँच करोड़ श्रम-घण्टे बेकार जाते हैं। इससे मुक्ति के लिए डिस्पोजेबल रुमाल तैयार किया गया है। यह टिशू-रुमाल-क्लिनेंक्श की तरह तीन तह का होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसकी बीच वाली तह में वायरस अवरोधी सिड्रिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेलिक ऐसिड व सोडियम लोरिल सल्फेट नामक तीन रसायन हैं। ये मिनटों में जुकाम के हजारों वायरस को खत्म कर देते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जुकाम के समय छींक की सामान्य गति प्राय: 100 मील प्रति घण्टा होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि नाक में उपस्थित विजातीय विषाणु एवं टॉक्सिक पदार्थ तेजी से निकल कर बाहर जा सकें। कुछ लोगों में यह गति 174 मील प्रति घंटा तक देखी गयी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिस्टर रेगिनाल्ड कॉलमैन की छींक अब तक की सबसे अधिक शक्तिशाली 174 मील प्रति घंटा मापी गयी है। चिकित्सक इन्हें एक खास दुर्लभ एवं दुसाध्य प्रकार के साइनस रोग से ग्रस्त मानते हैं। रेगिनाल्ड कॉलमैन के नाक में कई दिनों तक विजातीय मलवा इकट्ठा रहता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके दबाव एवं उत्तेजना से उन्हें शक्तिशाली छींक आती थी। जब वे छींकते थे तो आसपास के लोगों को महसूस होता था कि कोई अंधड़ तूफान या भूचाल-सा आ गया है। इस रहस्यमय तूफानी छींक की गुत्थी वैज्ञानिक अभी तक नहीं सुलझा सके हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जुकाम यह सूचना देता है कि व्यक्ति की सुरक्षा-व्यवस्था (इम्यून पॉवर) काफी कमजोर हो गई है और शरीर के अन्दर टॉक्सिक ऑर्गेनिज्म अर्थात् दुश्मन अपना अड्डा जमाने में संलग्र हो गए हैं। आपने देखा होगा कि जब भी आप बीमार होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जिह्वा का स्वाद मारा जाता है और आप उसे उत्तेजित करने के लिए मसाले युक्त चटपटे आहार शुरू कर देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नमक की मात्रा बढ़ा देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुस्सा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिड़चिड़ापन तथा कामासक्ति बढ़ जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रात्रि का जागरण बढ़ जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्राम नहीं मिल पाता। बेमेल भोजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वातानुकूलित कमरे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यायाम तथा श्रम का अभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदूषित हवा में साँस लेना- यही तो चाहिए दुश्मनों को आक्रमण करने के लिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आयु का प्रभाव:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उम्र बढऩे के साथ-साथ जुकाम होने की दर कम हो जाती है। मिशिगन विश्वविद्यालय के डॉ. आर्नल्ड मोंटो 11 वर्ष तक 1000 लोगों पर शोध कार्य कर इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि 60 वर्ष की उम्र तक जुकाम होने की संभावना मात्र 0.5 प्रतिशत तक ही रहती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि जवान तथा बच्चे जुकाम से बार-बार पीडि़त होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कारण कि बच्चों में रोगों को बाहर करने की तीव्रता ज्यादा है। 20 से 30 वर्ष के लोग जुकाम-पीडि़त बच्चों के साथ रहने के कारण ज्यादा जुकाम पीडि़त होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो कुछ भी हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जुकाम की स्थिति में दवा लेकर नैसर्गिक विष-निष्कासन की प्रक्रिया में प्रतिरोध डालना मूर्खता के सिवाय कुछ </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">क्यों न लें औषधियाँ:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आम प्रचलित एण्टीबॉयोटिक्स औषधियाँ दुश्मन-जीवाणुओं के साथ प्रतिरक्षात्मक जीवाणुओं को भी समाप्त करने में लग जाती हैं। जहाँ शरीर की प्रतिरक्षात्मक व्यवस्था को दवा के पूर्व सिर्फ दुश्मनों से लडऩा पड़ रहा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दवा लेने पर दूसरा दुश्मन औषधि के रूप में पैदा हो जाता है। शरीर में पहले ही जहर भरा हुआ था। अब औषधियों के जहर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुश्मनों एवं मित्र कीटाणुओं के मृतअंश के कारण भयंकर मलबा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कूड़ा-कचरा शरीर में जमा हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर के सारे संस्थान अधिक विषाक्त हो जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर से दुर्गंध आने लगती है। ऐसी स्थिति में यदि रोगी को केवल दवा के सहारे रखा गया और प्राकृतिक चिकित्सा नहीं मिली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह असाध्य दमा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एम्फिजिमा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टी.बी.</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैंसर से ग्रस्त हो सकता है। इसलिए जुकाम रूपी खतरे का सायरन बजते ही सचेत हो जाएँ। पर यह अवश्य ध्यान रखें कि जुकाम के रूप में शरीर-शुद्धि के लिए मेहमान आया है। उसे पूर्ण सहयोग कर अपनी प्रतिरक्षात्मक पंक्ति सबल करने में लगें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">औषधि वैज्ञानियों ने जुकाम से लडऩे  के लिए कितनी ही जीवन-विरोधी औषधियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्जेक्शन तथा टीके आदि ईजाद किए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अभी तक जुकाम पर विजय प्राप्त नहीं हो सकी है। कारण एक को मारने को शस्त्र तैयार होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दुश्मन दूसरी फौज खड़ी कर लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिस पर पहले वाला शस्त्र प्रभावी नहीं हो पाता। बताते हैं वर्तमान में जुकाम पैदा करने वाले पृथक्-पृथक् गुण-धर्म वाले विषाणुओं की फौजों की संख्या 200 तक पहुँच चुकी है। इसमें सबसे सशक्त एवं प्रबल </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">रानो वायरस</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">फौज की टुकड़ी है। इसकी 113 प्रजातियाँ हैं। 60-70 प्रतिशत जुकाम का कारण </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">रानो-वायरस</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दुश्मन टुकड़ी ही है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रसाहार-फलाहार महत्त्वपूर्ण:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फलाहार मात्र से ही जुकाम चला जाता है। इसके अतिरिक्त चोकरदार मोटे आटे की रोटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उबली सब्जी तथा सलाद सुबह के भोजन में तथा सायंकालीन भोजन में सिर्फ फलाहार लें। सूप भी 3-4 बार ले सकते हैं। फलों में सेव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नाशपत्ती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पपीता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खीरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ककड़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तरबूज आदि मौसमानुसार जो भी सब्जी तथा फल मिले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लें। उपचार में पेट की पट्टी आधा घंटा</span>, 20<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिनट गरम-ठण्डा सेक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एनिमा के बाद 20 मिनट गरम पाद स्नान लेने से तीव्र जुकाम में शीघ्र लाभ मिलता है। यह क्रम 5 दिन तक लगातार करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उपवास में शरीर को विश्राम मिलता है तथा पाचन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवशोषण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सात्मीकरण की सारी शक्ति शरीर से जहर निकालने में लग जाती है। फिर 4-5 दिन में ही जुकाम चला जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योगग्राम के प्रयोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग ग्राम की चिकित्सकीय प्रयोगों को आप भी अपना सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो इस प्रकार है:- 15 दिन तक प्रात:काल कुंजर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जलनेति तथा सूत्रनेति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घृतनेति करें। रात्रि को सोते समय (50 ग्राम सरसों का तेल</span>, 1<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम कपूर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आधा नींबू का रस मिलाकर दोनों नाकों में 10-10 बूँद डालकर तेलनेति करें। रात्रि को सोते समय हथेलियों एवं पादतली पर 15-20 मिनट तक सरसों का तेल मसल कर सोयें।) तेलनेति के पहले व बाद में चेहरे का वाष्प स्नान लें। भगोने में नीम तथा नीलगिरी के पत्ते डालकर उबालें। भगोने को स्टूल पर रखकर ऊपर से कम्बल तथा तौलिए से ढँक कर चेहरे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिर को वाष्प दें। कान में सरसों का तेल डालें तथा नाभि पर भी लगाएँ। तीव्र जुकाम की स्थिति में भी 2-3 बार मुँह में ठण्डा पानी भर कर ठण्डे पानी से 10-15 बार चेहरे पर छींटे मारें। यह उपचार शीघ्र प्रभावी होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि के प्रयोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोय का क्वाथ या वटी का नियमित सेवन करने से सर्दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जुकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कफ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नज़ला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्थमा व श्वसन तन्त्र से सम्बन्धित रोग तो दूर होते ही हैं साथ ही गिलोय से मोटापा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्लेटलेट्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डेंगू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिकुनगुनिया पूर्णत: ठीक हो जाता है एवं इम्युनिटी को बढ़ाने के लिए यह एक प्रामाणिक रामबाण औषधि है। इसके अतिरिक्त पतंजलि अयुर्वेद निर्मित गिलोय घनवटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वरनाशक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वासारि आदि औषधियों के प्रयोग से शरीर का परिष्करण होकर भी जुकाम जैसा रोग दूर भागता है। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पतंजलि रिसर्च</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>फरवरी</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2321/immune-power-ki-kamjori-darshati-hai-jukam</link>
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                <pubDate>Wed, 01 Feb 2017 21:46:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सचित्र अभिव्यक्तियाँ</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:center;"><strong>आर्थिक समृद्धि के नये मापदण्ड विषय पर आयोजित एक विशेष मीडिया कार्यक्रम में मीडियाकर्मी के साथ परिचर्चा करते पतंजलि योगपीठ के महामंत्री श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज</strong></h5>
<p><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/274.jpg" alt="27" /></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong>गीता परिवार त्रिदशकपूर्ति कार्यक्रम में मंचासीन परम पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज, पूज्य स्वामी गोविदंदेव गिरी जी महाराज, अभिनेता गजेन्द्र चौहान व विशिष्ट अतिथिगण</strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2322/sachitra-abhivyaktiyan"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/027.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:center;"><strong>आर्थिक समृद्धि के नये मापदण्ड विषय पर आयोजित एक विशेष मीडिया कार्यक्रम में मीडियाकर्मी के साथ परिचर्चा करते पतंजलि योगपीठ के महामंत्री श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज</strong></h5>
<p><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/274.jpg" alt="27"></img></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong>गीता परिवार त्रिदशकपूर्ति कार्यक्रम में मंचासीन परम पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज, पूज्य स्वामी गोविदंदेव गिरी जी महाराज, अभिनेता गजेन्द्र चौहान व विशिष्ट अतिथिगण</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्था समाचार</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>फरवरी</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2322/sachitra-abhivyaktiyan</link>
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                <pubDate>Wed, 01 Feb 2017 21:45:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>श्रद्धा, भक्ति व प्रेम से जीवन में खिलता है बसंत</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi"><span> </span>आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2323/shradha-bhaktiv-prem-se-jivan-me-khilta-hai-basant"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/764.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  <strong>श्रद्धा </strong></span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">को न तो किसी परीक्षा का भय होता है और न ही यह किसी भी बड़े से बड़े प्रलोभन के सामने झुकना जानती है। यदि कभी श्रद्धा को किसी भी भय या प्रलोभन ने झुका दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या वह किसी भी कारण से विचलित हो गई तो समझना होगा कि वह अपने पैर ठीक से नहीं जमा पाई थी। कभी-कभी किसी तेजस्वी व्यक्ति की वाणी या उसके जीवन की सुन्दर छवि या कोई शास्त्र वचन हमारे हृदय में सीधा घुस जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसी स्थिति में हम उस महान व्यक्ति के लिये अपने आपको न्यौछावर कर देना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना बचाये अपने आप को दे डालना चाहते हैं। उसकी सेवा करने में अपने संपूर्ण जीवन की धन्यता समझते हैं। ऐसी श्रद्धा कभी भी वापस मुड़ कर नहीं देखती। किन्तु सदा-सर्वदा ऐसी श्रद्धा नहीं रहती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रारम्भ में वह आंशिक ही होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भी उसे बार-बार श्रवण-मनन के द्वारा या विचार के द्वारा बढ़ाया जा सकता है। ज्यों-ज्यों श्रद्धा बढ़ती जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन की कठिनाईयाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषकर अध्यात्म मार्ग की कठिनाईयाँ स्वत: ही कम होती चली जाती हैं। फिर यह श्रद्धा साधक को स्वयं सम्भालती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु श्रद्धा की महिमा को पूरा का पूरा बुद्धि से नहीं समझा जा सकता है।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वास्तव में कुछ चीजें ऐसी हैं कि जिन्हें तद्रूप होकर ही समझ सकते हैं- जैसे कि भगवान को समझने के लिये भगवन्मय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भक्ति को समझने के लिये भक्तिमय और प्रेम को समझने के लिये प्रेममय होना होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी प्रकार श्रद्धा को समझने के लिये श्रद्धामय होना होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भक्ति क्या है</span>? </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भक्ति के बिना जीवन नीरस हो जाता है। भक्ति से जीवन में सरसता आ जाती है। भगवान की भक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान की सेवा करने से हृदय शुद्ध होता है। भजन या सेवा का अर्थ है-दूसरे को भावना के स्तर पर आत्मसात करना। इस प्रकार भक्ति या उपासना से भजनीय या उपास्य के साथ अभिन्नता हो जाती है। भक्त अपनी शक्ति के द्वारा भगवान में तन्मय हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे उसमें भी आराध्य जैसी ही शान्तिमयता आदि गुण प्रकट होने लगते हैं। जब व्यक्ति किसी की सेवा करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसमें भी वह दु:खी के दु:ख या जरूरतमंद की जरूरत को आत्मसात् ही तो करता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भर्तृहरि ने नीति शतक में सेवधातु का एक प्रयोग किया है- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सेवस्व विद्वज्जनम्’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् तू विद्वज्जन का सेवन कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके निकट रह। लोक भाषा में भी एक प्रयोग मिलता है- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कबूतरी या मुर्गी अण्डा से रही है’</span> '<span lang="hi" xml:lang="hi">अण्डा सेना’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ सेवन का ही </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सेना’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अपभ्रंश हो गया है। उक्त प्रयोग में मुर्गी के द्वारा अण्डे की निकटता को दर्शाया जाता है। इसी प्रकार का आयुर्वेद में भी एक प्रयोग उपलब्ध होता है- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पथ्यं भजमानस्य’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पथ्य का सेवन करने वाले का अर्थात युक्ताहार-विहार का सेवन करने वाले का। इसी प्रकार </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान के गुण-कर्म-स्वभावों का धारण होना’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह भाव अपने प्रियतम इष्ट देव के प्रति भक्ति के रूप में प्रकट होता है और यही भाव पुत्रादि के प्रति वात्सल्य के रूप में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्राता आदि के प्रति स्नेह के रूप में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु या किसी पूज्य के प्रति श्रद्धा के रूप में हुआ करता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रश्न उठता है कि कोई किसी के निकट क्यों रहता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी से क्यों प्रेम करता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका हेतु कोई स्वार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई प्रयोजन सिद्धि आदि कुछ भी हो सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु जब अपने इष्ट देव में किसी भी लौकिक स्वार्थ के बिना ही परम-प्रेमरूपा भक्ति (निकटता) होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी उसे </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भक्ति’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नाम दिया जाता है। जब कोई किसी भी निकटता में रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो स्वाभाविक रूप से उसके धर्म निकट रहने वाले में आ ही जाते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम क्या है</span>? </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> '<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रिय’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से भाव अर्थ में जुडा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रिय क्या है</span>? '<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रीणाति’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इति प्रिय:। जो तृप्त कर दे वह प्रिय। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">तृप्ति देने वाला’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">यह हृदय का एक भाव विशेष भी हो सकता है और कोई व्यक्ति या पदार्थ भी। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सो प्रेम शब्द का अर्थ हुआ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रियस्व भाव: प्रे्रम अर्थात प्रियता’। अर्थात प्रियता और प्रेम समानार्थक हो गये। मनुष्यता के अभाव में जैसे मनुष्य का कोई अस्तित्व ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी प्रकार प्रियता (प्रेम) के अभाव में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रिय’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द के अर्थ की कोई कल्पना नहीं। सरलार्थ यह निकला कि पे्रम ही वह तत्त्व है जिसके होने से या जिसके रहते प्रिय अर्थात तृप्ति देने का गुण (भाव अर्थात् </span>Feeling<span lang="hi" xml:lang="hi">) अस्तित्व में आता है। अर्थात् जीवन से जिसे तृप्ति चाहिये उसे प्रेममय होकर जीना होगा। यह तृप्ति ही वैराग्य का आधार है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन की यह बसंता अवस्था ही सत्य की धारा में निमग्नता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें सम्पूर्ण व्यक्तित्व का कायाकल्प निहित है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दूरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मजबूरी से परे:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक महान् सन्त अपना अनुभव सुनाते हुए हैं- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धा-भक्ति-प्रेम दूरी-देरी-मजबूरी को समाप्त कर देती है’। श्रद्धा होने पर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">दूरी’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं रहती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यद्यपि श्रद्धेय अर्थात् किसी के द्वारा दिया गया उपदेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई महापुरुष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई देवता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई इष्ट मित्र अथवा स्वयं भगवान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई सिद्धान्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई प्राप्तव्य लक्ष्य बहुत दूर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं भी दिखाई नहीं दे रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु केवल उसके प्रति मानसिक लगाव (श्रद्धा) है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु वह लगाव ऐसा है कि मानसिक सान्निध्य के कारण दूरी रहती ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसा कि कहा गया है- </span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">जल में बसे कुमोदिनी चन्दा बसे अकास।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">जो जांही को भावता सो तांही के पास।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार भक्ति होने पर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">देरी</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">समाप्त हो जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि भक्ति में भजनीय के समीप होना होता है। समीप ही </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पहुँच</span><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi"> </span>गये तो अब मिलने में देरी क्या रही। दूसरी तरफ से कहें तो यह भी कहा जा सकता है कि यदि भगवत मिलन नहीं हो रहा है<span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">तो भक्ति जैसी होनी चाहिए वैसी नहीं हो रही</span><span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">अपितु भक्ति में कहीं कमी रह रही है। </span><span style="font-size:1.25rem;">'</span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">प्रेम में कोई मजबूरी नहीं</span><span style="font-size:1.25rem;"> </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">यह तो लौकिक सम्बन्धों में भी आसानी से देखा जा सकता है। प्रेम प्रेमी को प्रेम पात्र से सहज रूप से जोड़े रखता है</span><span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">वहाँ किसी भी प्रकार की कोई </span><span style="font-size:1.25rem;">'</span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">मजबूरी</span><span style="font-size:1.25rem;"> </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">नहीं होती। कितना भी कष्ट</span><span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">परेशानी आये तो भी व्यक्ति के मन में एक क्षण के लिये भी मजबूरी का भाव नहीं आता। छोटे बालक के साथ माता के व्यवहार को</span><span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">माता के आचरण को सामने रख कर प्रेम के इस मजबूरी रहित स्वरूप को समझा जा सकता है। यही अवस्था जब देश व राष्ट्र के साथ बनती है</span><span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">विश्व मानवता व जीव मात्र के प्रति जुड़ती है</span><span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">तो अखण्ड पुरुषार्थ का मार्ग प्रशस्त होता है</span><span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">विश्वनिर्माण के नव आयाम तैयार होते हैं</span><span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">ऐसी अवस्था में पहुँच कर सामान्य मानव</span><span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">महामानव बन जाता है</span><span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">क्योंकि तब मनुष्य के संपूर्ण अंग-अवयव खिल उठते हैं</span><span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">यही जीवन की वसंतावस्था है। तो आइये श्रद्धा</span><span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">भक्ति व प्रेम से खिलायें अपने भी जीवन का बसंत और करें ऋषित्व से ओत प्रोत राष्ट्र निर्माण।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>फरवरी</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2323/shradha-bhaktiv-prem-se-jivan-me-khilta-hai-basant</link>
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                <pubDate>Wed, 01 Feb 2017 21:43:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अनुभूति आपकी</title>
                                    <description><![CDATA[<h4 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग से ठीक किया पेन्क्रियाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लीवर व किडनी का कैंसर</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">65 वर्षीय सतीश अकेला का भी योग के चमत्कार से साक्षात्कार हो चुका है। बुढ़ापे में कैंसर ने जकड़ा तो एलोपैथी डाक्टरों ने हाथ खड़े  कर दिये। लोगों की सलाह पर योग का साथ पकड़ा तो अब जिंदगी चल पड़ी है और कैंसर से जंग जीतने के बाद अब वे लोगों को नित्य योगाभ्यास की सलाह देते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राप्ती नगर फेज फोर निवासी रेलवे कर्मी सतीश अकेला 2011 में सेवानिवृत्त हुए। 2014 में अपने पुत्र के पास होशंगाबाद गये थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं उनकी तबीयत अचानक खराब हो गई। उनकी</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2324/anubhuti-apki"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/553.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग से ठीक किया पेन्क्रियाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लीवर व किडनी का कैंसर</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">65 वर्षीय सतीश अकेला का भी योग के चमत्कार से साक्षात्कार हो चुका है। बुढ़ापे में कैंसर ने जकड़ा तो एलोपैथी डाक्टरों ने हाथ खड़े  कर दिये। लोगों की सलाह पर योग का साथ पकड़ा तो अब जिंदगी चल पड़ी है और कैंसर से जंग जीतने के बाद अब वे लोगों को नित्य योगाभ्यास की सलाह देते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राप्ती नगर फेज फोर निवासी रेलवे कर्मी सतीश अकेला 2011 में सेवानिवृत्त हुए। 2014 में अपने पुत्र के पास होशंगाबाद गये थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं उनकी तबीयत अचानक खराब हो गई। उनकी आवाज चली गई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">याददाश्त चली गई। न तो बोल पाते थे और न ही किसी को पहचान पाते थे। शरीर की त्वचा भी काली हो गई थी। जांच के बाद पता चला कि उनके पेन्क्रियाज में कैंसर है। करीब तीन लाख रुपया ईलाज में खर्च होने के बाद थोड़ा आराम हुआ तो वह गोरखपुर लौटे। यहां रेलवे अस्पताल में भी दिखाया। रेलवे की जांच में पता चला कि उनके लीवर व दांयी किडनी में शिष्ट (कैंसर) बन गये हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हालांकि अभी वे छोटे थे। सतीश ने किसी अच्छे अस्पताल में रेफर करने के लिए चिकित्सकों से कहा तो चिकित्सकों ने बताया कि इसका एलोपैथ में कोई इलाज नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं भी जाने से कोई फायदा नहीं होगा। इसी बीच वह पुन: होशंगाबाद चले गए। वहां उन्होंने पतंजलि योग समिति की महिला तहसील प्रभारी शेफालिका नाथ की के सुझाव से योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी द्वारा निर्देशित योगाभ्यास शुरू किया। इस दौरान वह होम्योपैथिक दवा खाते रहे। कुछ ही दिनों में वह बोलने लगे और उनकी याददाश्त भी ठीक होने लगी। धीरे-धीरे त्वचा का रंग बदलने लगा। बीच में कोई परेशानी उन्हें नहीं हुई। पांच माह बाद गोरखपुर आए तो पुन: रेलवे अस्पताल में जाकर जाँच कराई। जाँच रिपोर्ट चौकाने वाली थी। उनके पेन्क्रियाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लीवर व किडनी तीनों से शिष्ट गायब हो गये थे। अर्थात अब वह पूरी तरह स्वस्थ थे। ठीक होने के बाद भी उन्होंने योग का दामन नहीं छोड़ा। आज वे स्वयं भी लोगों को नियमित योगाभ्यास करते हैं और दूसरों को भी पतंजलि के योग शिविर लगाने की सलाह देते हैं।</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">4 माह में पित्त की थैली में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">गांठ से मिली निजात</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं जितेन्द्र कुमार निवासी दक्षिणपुरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिल्ली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उम्र ३८ वर्ष है। मेरे पित्त की थैली में गांठ थी। अनेक उपचार के बाद मैंने पतंजलि योगपीठ चिकित्सालय के चिकित्सक से संपर्क  किया। चिकित्सक डॉ. राकेश मिश्र जी ने ध्यान पूर्वक हमारी समस्या सुनने व रिपोर्ट देखने के बाद उपचार प्रारम्भ किया और मैंने पुन: चार माह बाद २६ नवम्बर को दिखाया तो गांठ लगभग ठीक हो चुकी थी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाँ इस अवधि में चिकित्सक के परामर्शानुसार आयुर्वेदिक औषधियाँ लीं व योग-प्राणायाम के अभ्यास को अनुशासित ढंग से किया। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं अपने स्वस्थ जीवन के लिए योगऋषि स्वामी रामदेव जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी को धन्यवाद देता हूँ जिनके योग-आयुर्वेद अभियान से हम जैसे लोगों को जीवन दान मिल रहा है।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>दिव्य अनुभूति</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>फरवरी</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2324/anubhuti-apki</link>
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                <pubDate>Wed, 01 Feb 2017 21:42:37 +0530</pubDate>
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