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                <title>अप्रैल - योग संदेश</title>
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                <description>अप्रैल RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...</title>
                                    <description><![CDATA[<h4 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>योगी का त्रैतवाद</strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;">हम सब आत्माएं स्वभाव से ही योगी है। योगेष्वर भगवान श्री कृष्ण ने गीता के आठवें अध्याय के तीसरे श्लोक में <strong>स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते</strong> कहकर अध्यात्म को ही हमारा मूल स्वभाव, मूल प्रकृति, अपनी निजता या अपना मूल स्वरूप कहा है। अतः हम सब ईष्वर की दिव्य सन्तानों या ऋषि-ऋषिकाओं की महान सन्तानों वंषजों ऋषि पुत्र-ऋषि पुत्रियों या ईश्वर के बेटा-बेटियों का यह सर्वोपरि लक्ष्य होना चाहिए कि हम जीवन में सबसे प्रथम योगी बनें। <strong>तस्मात् योग भव</strong>- अर्जुन। प्रत्येक योगी भाई-बहन को योग के कुछ मूलभूत सिद्धान्तों का यथार्थ बोध उनका अभ्यास व आचरण अवष्य करना चाहिए।</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2366/shashwat-pragya-april-2017"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/10.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>योगी का त्रैतवाद</strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;">हम सब आत्माएं स्वभाव से ही योगी है। योगेष्वर भगवान श्री कृष्ण ने गीता के आठवें अध्याय के तीसरे श्लोक में <strong>स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते</strong> कहकर अध्यात्म को ही हमारा मूल स्वभाव, मूल प्रकृति, अपनी निजता या अपना मूल स्वरूप कहा है। अतः हम सब ईष्वर की दिव्य सन्तानों या ऋषि-ऋषिकाओं की महान सन्तानों वंषजों ऋषि पुत्र-ऋषि पुत्रियों या ईश्वर के बेटा-बेटियों का यह सर्वोपरि लक्ष्य होना चाहिए कि हम जीवन में सबसे प्रथम योगी बनें। <strong>तस्मात् योग भव</strong>- अर्जुन। प्रत्येक योगी भाई-बहन को योग के कुछ मूलभूत सिद्धान्तों का यथार्थ बोध उनका अभ्यास व आचरण अवष्य करना चाहिए। योग, अध्यात्म व जीवन के इन मूलभूत सत्य सिद्धान्तों को हम सूत्र रूप में तीन सिद्धान्तों के रूप में सभी योगी आत्माओं के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि योग संदेश के सभी पाठकों को हमारी इस सेवा से साधना के पथ व जीवन पथ में अवश्य ही सहायता मिलेगी। <br />1- संम्पूर्ण अस्तित्व का मूल आधार कर्त्ता, नियन्ता व संहती भगवान् परमात्मा, जिन तत्वों से इस पूरे अस्तित्व की रचना करता है वह प्रकृति तथा जिसके लिए ये सारी रचना है वह हम सब आत्माएं हैं। इन तीन तत्वों का यथार्थ बोध ही त्रैतवाद है। <br />2- संम्पूर्ण दृष्ट - अदृष्ट अस्तित्व में एक ब्रह्मतत्व समान रूप से नित्य व्यापक है। वह सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर - अमर, नित्य अविनाषी, सर्वोपरिसत्ता है। यह योग का एकत्व है, परस्परता में पूरकता, कृतज्ञता सेवा एवं सुरक्षा आदि यह सहअस्तित्व है तथा सब जीव व जगत के साथ दिव्य प्रेम व करूणा यही विश्वबन्धुत्व है। एकत्व, सहअस्तित्व एवं विश्वबन्धुत्व ये योग की मूल विचारधारा या सिद्धान्त हैं। <br />3-  सत्य, प्रेम, करूणा, शुद्ध ज्ञान, शुद्ध कर्म एवं शुद्ध उपासना] ज्ञान योग, कर्मयोग एवं भक्तियोग, ईडा, पिडंग्ला एवं सुषुम्णा, अभीप्सा, त्याग एवं समर्पण ये योग की त्रिवेणी हैं। <br />4-   <strong>तपः स्वाध्याय ईश्वर प्राणिधानानि क्रियायोगः।</strong> योग दर्शन में साधन पाद के प्रथम सूत्र में महर्षि पतंजलि ने तप, स्वाध्याय एवं ईश्वर प्राणिधान को योग के प्रमुख तीन साधन व क्रिया योग कहा है। <br />5-   अज्ञान, अक्षग्ड़ां एवं अकर्मण्यता ये योग के तीन सबसे बडे़ बाधक तत्व या अवरोध है। भगवान तो हम सबको सदा सर्वत्र सब समय सर्वदा प्राप्त हैं जब ये तीन बाधांए हट जाती हैं तो ज्ञान, श्रद्धा एवं दिव्य कर्म, पुरुषार्थ व परमार्थ के द्वारा हम भगवान की अनुभूति कर लेते हैं।<br />6-   योगव्रती स्वदेशी व्रत व योव्रती बनकर हमें जीवन व जगत से रोग, दरिद्रता व पाप को मिटाकर स्वास्थ्य, समृद्धि व दिव्ययता से युक्त एक महान् परम वैभवशाली भारत बनाना है।<br />7-   प्रार्थना, श्रद्धा, भक्ति, समर्पण, पुरुषार्थ, कर्म, सेवा, तप व पुरुषार्थ चतुष्टय एवं परमार्थ निष्काम भाव से एक-एक पल भगवान के लिए जीना ये योग के तीन सोपान, सीढ़ियां या साधन हैं।<br />8-    व्रत, दीक्षा एवं श्रद्धा से सत्य एवं पारमार्थिक परम सत्य की अनुभूति की प्रक्रिया है। </h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">व्रतेन दीक्षामाप्तेति दीक्षया-आजनेति दक्षिणाम्। </span></strong><br /><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते।।</span></strong></h5>
<p><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-11/april-2017.jpg" alt="april 2017"></img></span></strong></p>
<p><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-11/april-20172.jpg" alt="april 20172"></img></span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शाश्वत प्रज्ञा</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Apr 2017 21:59:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण के अनुष्ठान में पतंजलि की भूमिका</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">आचार्य बालकृष्ण</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2367/vyakti-nirman-se-rashtra-nirman-ke-anushthan-me-patanjali-ki-bhumika"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/35.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">पतंजलि योगपीठ की ओर से हम ग्यारह सूत्रीय कार्यक्रम को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे हैं और हमारा संकल्प है कि हम आने वाले 25 से 50 वर्षों में भारत को विश्व की सर्वोच्च आध्यात्मिक व आर्थिक महाशक्ति के रूप में खड़ा कर पायेंगे। इस राष्ट्र महायज्ञ में सभी देशभक्त, विवेकशील, निष्ठावान, पुरुषार्थी व पराक्रमी देशवासियों के सहयोग से हम निरन्तर आगे बढ़ रहे हैं तथा सभी से आह्वान करते हैं कि जिस भी भाई-बहन के पास जितना समय, शक्ति व सामथ्र्य है, उसमें  से 10% तो सभी इस ईश्वरीय कार्य में सहयोग करें। <br /><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>1.    योग :</strong></span><br /><strong>  तस्मात् योगी भवार्जुन (गीता</strong>) भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं-अर्जुन सहित हम सबको सबसे पहले योगी बनना है। योग हमारा स्वभाव बन जाए।<strong> स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते (गीता-८.१३) </strong>अर्थात् जिस दिन देश व दुनियां की सभी आत्माएं भोर में जल्दी उठकर योग करना प्रारम्भ कर देंगी, उसी दिन से उनका जीवन दिव्य होना प्रारंभ हो जायेगा। मात्र एक योग के अभ्यास से हमारे स्वास्थ्य, समृद्धि, सफलता, सुख, शान्ति व सब प्रकार के शुभ व सौभाग्य के द्वार खुल जाते हैं। योग से सब निरोग होते हैं, यह तो योग की प्रथम उपलब्धि है। योग से व्यक्ति की उत्पादकता, सृजनात्मकता, सकारात्मकता व आध्यात्मिकता का पूर्ण विकास होता है और मानव देवत्व व ऋषित्व को प्राप्त कर लेता हैं। <br />मानव इस ब्रह्माण्ड की सबसे महत्त्वपूर्ण इकाई है और मनुष्य के पूर्ण विकास का यदि एक मात्र निर्विवादित, वैज्ञानिक, सार्वभौमिक, पंथ निरपेक्ष व सर्वसमावेशी उपाय है, तो वह योग ही है। अत: पतंजलि के सभी निष्ठावान कार्यकर्ताओं व करोड़ों श्रद्धालु समर्थ समर्थकों से भी हम यह आह्वान करते हैं कि योग करें व कराएं और इस बात को हमेशा सर्वोच्च प्राथमिकता दें। प्रत्येक गांव, गली, मौहल्ला, कॉलोनी, छोटे-बड़े शहर में योग की नियमित कक्षाएं चलें, इस पर सबको पूरे सामथ्र्य से जुट जाना है। हमारे लाखों कार्यकर्ता, योग-प्रचारक, संस्था व संगठन इस योग सेवा में लगे हैं। वे ही पतंजलि की मूल शक्ति हैं। <br /><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>2.    आयुर्वेद : </strong></span><br />वेदों से लेकर महर्षि चरक, सुश्रुत व धन्वन्तरि आदि महापुरुषों ने जिस आयुर्वेद का दिव्य ज्ञान हमें दिया, पतंजलि योगपीठ उस ऋषि परम्परा को निरन्तर आगे बढ़ा रहा है। विश्व भेषज संहिता से लेकर प्रामाणिक गंथों का प्रकाशन, आयुर्वेद अनुसंधान, पतंजलि चिकित्सालयों का विस्तार व विकास तथा कुशल आयुर्वेदिक चिकित्सा का निर्माण हमारी प्राथमिकता है। एक दिन वो भी आयेगा, जब देश व दुनियां में एलोपैथी से बड़ा आयुर्वेद बन जायेगा।<br /><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>3.    स्वदेशी :</strong></span><br />विदेशी कम्पनियों की लूट व गुलामी से मुक्ति का यह अभियान तेजी से आगे बढ़ रहा है। एक दौर था जब दुनियां के क्रूर देश राजनैतिक गुलामी व युद्ध के जरिए दुनियां को लूटते थे, लेकिन जब दुनियां मेें इस दुष्कृत्य, लूट, अत्याचार व अन्याय की निन्दा, तिरस्कार व प्रचण्ड विरोध होने लगा तो दुनियां की लूट की ताकतों ने व्यापार को हथियार बनाकर दुनियां को लूटना व गुलाम बनाना शुरु कर दिया। आज राजनैतिक आजादी होते हुए भी भारत की लगभग आधी अर्थव्यवस्था 50 लाख करोड़ से अधिक की अर्थसत्ता पर विदेशी कम्पनियों का कब्जा है। इस लूट, गुलामी या पराधीनता से मुक्ति दिलाना हमारे इस स्वदेशी अभियान का सर्वोपरि लक्ष्य है। इस अभियान से अर्जित अर्थ स्वार्थ नहीं परमार्थ के लिए है, क्योंकि हमारा लक्ष्य खुद का प्रोफिट व प्रोस्पेरिटी बढ़ाना नहीं, परोपकार करना है। इस स्वदेशी अभियान के वस्तु से लेकर विचार तक बहुत गम्भीर व व्यापक पहलू हैं। हम सभी बिन्दुओं पर कार्य कर रहे हैं और स्वदेशी को समग्रता के साथ आगे बढ़ा रहे हैं।</h5>
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#f8cac6;border-color:#F8CAC6;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(248,202,198);">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>वेदों से लेकर महर्षि चरक, सुश्रुत व धन्वन्तरि आदि महापुरुषों ने जिस आयुर्वेद का दिव्या ज्ञान हमें दिया, पतंजलि योगपीठ उस ऋषि परम्परा को निरंतर आगे बढ़ा रहा है...</strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>4.    नेचुरोपैथी :</strong></span><br />प्राकृतिक चिकित्सा पर भी योगग्राम एवं निरामयम् के माध्यम से हमनें बड़ा अभियान प्रारम्भ किया है। इसका देश के प्रत्येक प्रान्त में तथा धीरे-धीरे विश्वव्यापी विस्तार हमारा लक्ष्य है। सब ओर से निराश रोगियों व स्वास्थ्य साधकों के लिए योग एवं नेचुरोपैथी एक संजीवनी है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>5.    वैदिक परम्पराओं की पुन: प्रतिष्ठा :</strong></span><br />भारत मूलत: स्वभाव से ऋषि परम्परा का देश है। पंच महायज्ञ, चतुर्वर्णाश्रम धर्म, सोलह संस्कार, एकत्व, सहअस्तित्व व विश्व बन्धुत्व की हमारी सनातन परम्परा, संस्कृति व सभ्यता को राष्ट्र में पुन: प्रतिष्ठित करके भारत को प्रामाणिक रूप से पुन: ऋषियों का देश बनाना एक अन्तिम ध्येय है। हमारे सारे प्रयास व सेवाएं इस सत्य के चारों ओर हैं।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>6.    शिक्षा :</strong></span><br />आधुनिक शिक्षा एवं वैदिक संस्कारों के समन्वय से सर्वाङ्गीण, वैज्ञानिक व प्रगतिशील शिक्षा व्यवस्था को हम आगे बढ़ा रहे हैं। बहुत शीघ्र ही मैकाले की शिक्षा व्यवस्था का अन्त होगा। भारतीय शिक्षा बोर्ड की स्थापना के साथ ही शिक्षा के स्वदेशीकरण व आध्यात्मिकीकरण का कार्य पूरी ताकत से हम शुरु करने जा रहे हैं। दिव्य व्यक्तित्व युक्त नेतृत्व इस देश में तैयार किए बिना हम देश व दुनियां में कोई बड़ा कार्य नहीं कर सकते। संपूर्ण कार्यों को यदि हमें सही दिशा में ले जाना है तो उसकी सबसे पहली शर्त है हमारे पास एक श्रेष्ठ इंसान का होना नितान्त आवश्यक है और एक श्रेष्ठ, सभ्य, आदर्शभाव के निर्माण की एकमात्र आधारशिला शिक्षा ही है। देश में लाखों, करोड़ों श्रेष्ठ नागरिकों का निर्माण हम इस प्रक्रिया से करेंगे।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/65.jpg" alt="65"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>7.    स्वास्थ्य :</strong></span><br />स्वास्थ्य एक बहुत ही व्यापक विषय है। शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक आरोग्य के लिए हमारी सेवाएं निरन्तर आगे बढ़ रही हैं। हम सभी दिशाओं से इस सन्दर्भ में कार्य कर रहे हैं और अन्तत: हमारा लक्ष्य है कि विश्व के स्वास्थ्य की नीतियां भारत से बनें, ऐसा समर्थ भारत राष्ट्र हम बनाना चाहते हैं। वह दिन भी आयेगा जब WHO का मुख्यालय भारत में बन जायेगा। वैसे तो हमारा ये पुराना सपना है वल्र्ड बैंक, IMF, UNO, WHO तथा WTO का मुख्यालय एक दिन भारत में बनेगा। पूरे विश्व की श्रेष्ठ व न्याय पूर्ण नीतियां भारत में बनेंगी।<br /><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>8.    अनुसंधान : </strong></span><br />दुनियां का नेतृत्व वही देश कर रहा है जो अनुसंधान में आगे है। हमने पतंजलि अनुसंधान संस्थान में लगभग 500 करोड़ रुपये खर्च किये हैं तथा आगे भी योग, आयुर्वेद, जड़ी-बूटियों, खेती व वेदों के अनेक विषयों पर व्यापक अनुसंधान की हमारी योजना है। इस दिशा में हम पूरी प्राथमिकता, गम्भीरता व व्यापकता के साथ कार्य कर रहे हैं।<br /><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>9.    गो-अनुसंधान व संवर्धन : </strong></span><br />गोहत्या के कलंक से भारत माता मुक्त हो। गोवंश की रक्षा तथा गो-आधारित कृषि से भारत समृद्ध हो, यह सपना प्रत्येक भारतीय का है। जब हमारे देश की देशी गाय ब्राजील में 50-60 लीटर दूध देती है, तो हमारे यहां ऐसा क्यों नहीं। हम भारत के लगभग 13 करोड़ गोवंश को कैसे उन्नत बनाएं और उसे कत्लखानों में जाने से बचाएं, इसके लिए गो-आधारित अनुसंधान, उद्योग, कृषि एवं अन्य पहलुओं पर हम गंभीरता से कार्य कर रहे हैं। इसके शीघ्र ही व्यापक परिणाम देश को देखने को मिलेंगे।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>10.    कुदरती खेती : </strong></span><br />योग आधारित विषमुक्त कुदरती खेती, पशुपालन, डेयरी, जड़ी-बूटी कृषि, लघु उद्योग एवं गृह उद्योग आदि के माध्यम से हम गांव, गरीब, मजदूर, किसान एवं समग्रता के साथ ग्रामीण क्षेत्रों के विकास की दिशा में भी बहुत ही प्राथमिकता के साथ कार्य कर रहे हैं और आने वाले कुछ वर्षों में पतंजलि के विभिन्न सेवा प्रकल्पों के द्वारा इस दिशा में बहुत सी सेवाएं करने की योजना है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>11.    आध्यात्मिक राष्ट्र व विश्व का निर्माण : </strong></span><br />आध्यात्मिक व्यक्ति, आध्यात्मिक परिवार, समाज, राष्ट्र व अन्तत: आध्यात्मिक विश्व के निर्माण का मेरा अन्तिम लक्ष्य है। </h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>इन्द्रं वर्धनोऽप्तुर: कृष्णवन्तो विश्वमार्यम्। अपघ्नन्तोऽराव्ण:।। वेद।। </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">अर्थात् पूरे संसार में सब प्रकार का सुख, समृद्धि, शान्ति व दिव्यता हो, यही वेद का विधान है। यही धरती पर स्वर्ग का अवतरण है। सब मनुष्यों का ज्ञान, जीवन, चरित्र व आचरण पवित्र हो, सब ओर खुशहाली हो, कहीं पर भी अज्ञान, अभाव, अन्याय, क्रूरता, हिंसा, युद्ध व किसी प्रकार का अनाचार न हो, इसी लक्ष्य को केन्द्र में रखकर पतंजलि का समस्त पुरुषार्थ एवं निष्काम सेवाएं हैं। यह ईश्वरीय कार्य है और किसी भी एक व्यक्ति से यह सम्भव नहीं हो सकता। अत: अन्त में संक्षेप में हम यही कहेंगे कि सब पुण्यात्माओं को इस ईश्वरीय दिव्य कार्य में अपनी-अपनी छोटी या बड़ी भूमिका निभानी है। हम सभी योगी आध्यात्मिक अमृत सन्तानों, ऋषि-ऋषिकाओं के वंशजों से यही विनम्र प्रार्थना करते हैं कि आप जहाँ भी हैं, वहीं से इस महायज्ञ में अपने-अपने सामथ्र्य के अनुरूप पूर्ण सहयोग करें।</h5>
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#f8cac6;border-color:#F8CAC6;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(248,202,198);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>पूरे संसार में सब प्रकार का सुख, समृद्धि, शान्ति व दिव्यता हो, यही वेद का विधान है। यही धरती पर स्वर्ग का अवतरण है।</strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;">संस्था एवं संगठन की सेवाओं से जुड़कर निरन्तर इन सेवाओं में जब सब देशवासी सहयोग करेंगे, तो हम अपनी आँखों के सामने अपने हाथों से एक दिव्य व भव्य भारत तथा एक दिव्य व भव्य विश्व का सपना साकार होते हुए देखेंगे और इसी में हमारे जीवन की बड़ी उपलब्धियाँ व सफलतायें होंगी। मात्र छोटे-छोटे लक्ष्यों व उद्देश्यों के लिए जीवन जीना तो जीवन का अपमान है। हम सभी सात्विक पुण्यशील आत्माओं से आह्वान करते हैं कि वे स्वयं पतंजलि की इन संस्था व संगठनगत सेवाओं से जुड़ें तथा अन्यों को जुडऩे के लिए प्रेरित करें। वेदों में ईश्वर की भी यही आज्ञा है कि-</h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>संगच्छध्वं संवदध्वम् (संगठन सूक्त ऋग्वेद) </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">हम सब साथ मिलकर शुभ कार्यों को आगे बढ़ायें। वस्तुत: जब आसुरी शक्तियां संगठित होकर अशुभ, अधर्म व अन्याय में लगी हुई हैं, तो दैवी शक्तियां व योगी आत्माओं को भी पूर्ण रूप से संगठित होकर इस सेवा यज्ञ में एक महान् भूमिका अवश्य निभानी चाहिए। </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Apr 2017 21:57:35 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>विश्व स्तरीय प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र योगग्राम में 7 स्टार प्राकृतिक चिकित्सालय निरामयम् का भव्य उद्घाटन समारोह</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>विश्वस्तरीय केंद्र है पतंजलि का प्राकृतिक चिकित्सालय निरामयम्-अरुण जेटली, वित्तमंत्री, भारत सरकार</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>निरामयम् चिकित्सा केन्द्र नाम से जाना जाने वाला 7 स्टार सुविधाओं से युक्त विश्व स्तरीय यह प्राकृतिक चिकित्सालय योगग्राम परिसर का ही नवनिर्मित खण्ड है। निरामयम् स्थित प्राकृतिक व पंचकर्म चिकित्सा संकाय, मड थेरेपी कक्ष तथा योग व ध्यान कक्ष अपने में अनोखे है, क्योंकि दुनियां के विकसित देशों में इसी प्रकार की चिकित्सा सेवाएँ बहुत अधिक खर्च पर प्रदान की जा रही हैं। अत: योगग्राम की संकल्पना से अवगत होकर व्यक्ति इसका लाभ उठाये बिना रह नहीं सकता। </strong><br />हरिद्वार, 12 मार्च। निरामयम् चिकित्सा केन्द्र नाम से जाना</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2368/vishwa-stariya-chikitsa-kendra-yoggram-me-7-star-prakritik-chikitsalaya-niramayam-ka-bhavya-udghatan-samaroh"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/49.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>विश्वस्तरीय केंद्र है पतंजलि का प्राकृतिक चिकित्सालय निरामयम्-अरुण जेटली, वित्तमंत्री, भारत सरकार</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>निरामयम् चिकित्सा केन्द्र नाम से जाना जाने वाला 7 स्टार सुविधाओं से युक्त विश्व स्तरीय यह प्राकृतिक चिकित्सालय योगग्राम परिसर का ही नवनिर्मित खण्ड है। निरामयम् स्थित प्राकृतिक व पंचकर्म चिकित्सा संकाय, मड थेरेपी कक्ष तथा योग व ध्यान कक्ष अपने में अनोखे है, क्योंकि दुनियां के विकसित देशों में इसी प्रकार की चिकित्सा सेवाएँ बहुत अधिक खर्च पर प्रदान की जा रही हैं। अत: योगग्राम की संकल्पना से अवगत होकर व्यक्ति इसका लाभ उठाये बिना रह नहीं सकता। </strong><br />हरिद्वार, 12 मार्च। निरामयम् चिकित्सा केन्द्र नाम से जाना जाने वाला 7 स्टार सुविधाओं से युक्त विश्व स्तरीय यह प्राकृतिक चिकित्सालय योगग्राम परिसर का ही नवनिर्मित खण्ड है। योगग्राम के इस नये योग-प्राकृत-पंचकर्म चिकित्सा प्रकल्प 'निरामयम्’ का औपरचारिक रूप से उद्घाटन श्री अरुण जेटली, वित्त मंत्री, भारत सरकार के कर-कमलों द्वारा किया गया। उद्घाटन अवसर पर श्री जेटली जी ने निरामयम् चिकित्सा केन्द्र स्थित प्राकृत-पंचकर्म-चिकित्सा, मड थेरेपी कक्ष तथा योग व ध्यान केन्द्र का भ्रमण किया। इस अवसर पर निरामयम् की वेबसाइड का भी विमोचन किया गया। श्री जेटली ने कहा कि इस विश्व स्तरीय सुविधाओं से युक्त प्राकृतिक केंद्र निरामयम् के माध्यम से देश-विदेश के नागरिकों को प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति का लाभ मिलेगा।</h5>
<h5 style="text-align:justify;">उद्घाटन अवसर पर श्री अरुण जेटली ने कहा कि आज योगग्राम में एक नयी सुविधा परम पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज तथा श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने जोड़ी है, जो अपने में अनोखी है। क्योंकि दुनियाँ के विकसित देशों में इस प्रकार की चिकित्सा सेवाएँ बहुत अधिक खर्च पर प्रदान की जा रही हैं। योगग्राम की चिकित्सा सेवाओं के माध्यम से महंगी दवाओं तथा शल्य चिकित्सा से रोगियों को निजात मिलेगी। देश-विदेश में ऐसे कई केन्द्र हैं, परन्तु आज मैंने देखा कि इसमें धनवान व निर्धन दोनों प्रकार के लोग यहाँ की चिकित्सा सेवाओं का लाभ ले सकते हैं। वास्तव में लाभ रहित चिकित्सा सेवाओं के लिए निरामयम् की स्थापना हुई है। मैं उम्मीद करता हूँ कि आने वाले समय में निरामयम् एक बहुत बड़ी चिकित्सा सुविधा के रूप में विकसित होगा, जिसका लाभ देश ही नहीं विदेश के रोगियों को भी मिलेगा।<br />श्री जेटली ने कहा कि स्वामी जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। उन्होंने देश में बड़ी विदेशी कम्पनियों को घुटने टेकने पर विवश कर दिया, चिकित्सा सेवाऐं हों, देश की सुरक्षा की बात हो, समाज में स्वच्छता का विषय हो, योग को घर-घर पहुँचाने की बात हो, देश में शिक्षा की स्थिति की बात हो, अर्थशास्त्र आदि अनेक विषयों में स्वामी जी को महारथ हासिल है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/50.jpg" alt="50"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;">उद्घाटन कार्यक्रम के उपरान्त श्री जेटली ने पतंजलि फूड एवं हर्बल पार्क, पदार्था का भी भ्रमण किया। उन्होंने कहा कि देश में ऐसे बहुत कम फूड पार्क हैं जो सफल साबित हुए हैं। देश में फूड पार्क की कमी के कारण कृषि उत्पाद का लगभग 25 प्रतिशत व्यर्थ चला जाता है। उसका प्रसंस्करण कैसे हो, उसे कैसे दो-तीन महीने से 1 वर्ष तक कैसे सम्भाला जाये, हमारे डेयरी उत्पादों को कैसे खराब होने से बचाया जाये, जिससे देश व समाज के काम आये, यही सब देखने मैं यहाँ आया हूँ। यह बहुत बड़ी आवश्यकता है कि देश में ऐसे कई फूड पार्क बनें जिससे किसान व जनता दोनों का लाभ हो। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>यहाँ की परम्परा विदेशों से बेहतर: रजत</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">कार्यक्रम में आपकी अदालत तथा आज की बात से पहचान बनाने वाले श्री रजत शर्मा (इण्डिया टीवी) ने कहा कि मैं योगग्राम के इस नये स्वरूप को देखकर गर्व महसूस कर रहा हूँ। यहाँ चिकित्सा के तरीके विदेश से बेहतर हैं। उन्होंने कहा कि मैं विदेश में चिकित्सा सेवाओं का लाभ लेने के लिए जाता रहता था। आचार्य श्री को जब यह पता चला तो उन्होंने कहा कि मैं योगग्राम में ही विदेश से बेहतर चिकित्सा सेवाओं की व्यवस्था करूंगा, जिससे आपको विदेश नहीं जाना पड़ेगा। इसे उन्होंने चुनौती के तौर पर लिया और मूर्तरूप प्रदान किया है।<br />आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने उपस्थित श्रोताओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि योगग्राम में चिकित्सा सेवाओं का विस्तार देश के हर वर्ग के लोगों के लिए उपहार है। यहाँ देश-विदेश के लोगों को न्यूनतम मूल्यों पर उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधाओं का लाभ मिल सकेगा।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/56.jpg" alt="56"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;">इस अवसर पर योगगुरु स्वामी रामदेव जी महाराज ने निरामयम् के विषय में विस्तृत जानकारी देते हुए कहा कि जहाँ योगग्राम में पहले लगभग 400 लोगों के उपचार, आवास, भोजन, तथा सभी प्रकार की यथा-योग, आयुर्वेद, पंचकर्म व षट्कर्म चिकित्सा की व्यवस्था थी, उसमें करीब 100 लोगों की व्यवस्था का विस्तार किया गया है। उन्होंने बताया कि यह पूरा परिसर लगभग 100 एकड़ में फैला है। पतंजलि योगपीठ ने पिछले 8 सालों में योगग्राम में लगभग 100 करोड़ रुपये खर्च किये हैं। इसका उद्देश्य पैसा कमाना नहीं है। बल्कि निस्वार्थ भाव से लोगों को बेहतर चिकित्सा सेवाएँ प्रदान करना है। इस निरामयम् में 32 कक्ष का निर्माण कराया गया है, जिसमें 4 अतिविशिष्ट श्रेणी, 12 विशिष्ट श्रेणी तथा 16 एकल व्यवस्था के कक्ष हैं।<br />इस अवसर पर योगभवन में फूलों की होली विशेष आकर्षण का केन्द्र रही। कार्यक्रम में गुरुदेव आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज, स्वामी हरिचेतनानंद जी महाराज, मुख्य महाप्रबंधक (ट्रस्ट) श्री ललित मोहन जी सहित बड़ी संख्या में योगग्राम के कर्मचारीगण उपस्थित रहे। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्था समाचार</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Apr 2017 21:56:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
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                <title>आत्म स्पर्धा से दैवत्व जागरण का अभियान है योगग्राम</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2369/aatm-spardha-se-daivatva-jagaran-ka-bhiuman-hai-yoggram"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/52.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">       योगग्राम की कल्याणी योगधर्म धरा, पतंजलि योगपीठ में भारत की सामर्थ्यवान जागृत सत्ता, जिनके पास भारत की संस्कृति, संवेदना, सभ्यता, संस्कार और वैदिक मूल्य निरंतर चैतन्य हैं, ऐसे समर्थ पुरुष वंदनीय स्वामी जी महाराज के साथ ये यौगिक अभ्यास करते हुए मैं आनन्दित हूँ। योग में अभ्यास वैराग्य की बात कही गई है और हम जो कुछ भी हैं, अपने अभ्यास का परिणाम हैं। अपने सोच की फसल हैं, हम जो भी है उनके उत्पाद हैं। ये जो भी हमारा वर्तमान है, हमारी जीवंतता है हमारी सोच व अभ्यास का परिणाम है। हम वैसे बन जायेंगे जैसा हमारा अभ्यास होगा। वह अभ्यास  भी अविछिन्न हो, निरंतर हो, हमारी साधना के अभ्यास में गतिरोध न आए, इसलिए वो निरंतर हो। योगदर्शन में कहा गया है कि अभ्यास हमारा अविछिन्न् हो और दीर्घकालिक हो, लगातार हो तो परिणाम उत्तम आयेगा। पूज्य महाराज जी आपको कोई शारीरिक क्रियाएं करा रहे हैं, तो उसका लक्ष्य है कि मन की शुद्धि अथवा चित्त की एकाग्रता, बुद्धि में निर्णय की सामथ्र्य आए, आपके पास ओज, विद्या, विनय, विचार अथवा वैभव आए, इस दिशा में ये प्रयास है। बहुत अच्छी बात उन्होंने कहीं कि योग अपने में बड़े ऐश्वर्य को आकृर्षित करता है, जैसे-जैसे हमारे विचार पवित्र होंगे, हमारे आसपास ऐश्वर्यानुभूति होने लगेगी। <br />श्री मद्भागवत गीता में आया है कि जैसे श्री कृष्ण गोकुल में पहुँचे, वहाँ सभी के सभी समृद्ध हो गए और उन्हें समृद्धि की अनूभूति भी होने लगी। मैं कहता हूँ कि समृद्धि की एक अनुभूति भी आप में संतुष्टि ला सकती हैं। आप शांत रहें, तृप्त रहें, आप अपने में सहज रहें, ये एक बड़ी उपलब्धि है जीवन की। आप में तृप्ति बनी रहे, आप संतुष्ट बनें रहें। आप कुशाग्र बनें रहें, सहज बने रहें, ये योग से ही परिणाम निकल कर आता है। ये यौगिक परिणाम है। जब आप शांत बने रहेंगे, सहज बने रहेंगें तो आपके भीतर कोई हलचल नहीं होगी। महाराज ने इसी ऐश्वर्य की बात कही, वो हम सब यहाँ अनुभव कर भी रहे हैं। यह सत्य है कि जब हम किसी एक परिवेश का हिस्सा बन जाते हैं, तो हम भी वैसे अनुभव करने लगते हैं। एक अद्भुत परिवेश है योगग्राम में जो बड़ा निभ्रांत, निशंक, जिसमें कोई शंका नहीं। <br />योग से बड़ी उपलब्धि आती है, आप  योग क्रियायें कर रहें हैं, इन सारी क्रियाओं में और उसमें भी आहार की शुद्धि अति महत्त्वपूर्ण है। यहां एक सूक्ष्म आहार, एक सात्विक आहार मिल रहा है, वो भी बहुत सहायक है। आहार शुद्धि सतोशुद्धि। आहार से, अन्न से मन बनता हैं। और मन से सीधा-सीधा जीवन बनता है। जैसा आपका मन होगा, जीवन उसी दिशा में जायेगा। पवित्र मन के लिए, चित्त में एकाग्रता घटित हो, उसके लिए आहार भी बड़ा एक सहयोगी बनता है। कम से कम पूज्य स्वामी जी महाराज ने पूरे देश भर को एक आहार का भी बोध कराया। पूर्व ऋषि आहार पवित्र रखते थे। <br />एक दृष्टांत है कि जब मनु और सतरूपा को ऐसा लगा कि हमें एक बड़ा काम करना चाहिए। तो संन्यास लिया उन्होंने, गृहत्याग किया और गिरी कंदराओं में रहने लगे। उन्हें ऐसा लगा कि उनके भीतर एक कामना पैदा हो रही है कि धरती पर सत्ता का अवतरण हो, जो इस पूरी धरती पर लोकमंगल कर दे, तो नारायण अवतरण की परिकल्पना उनके भीतर पैदा हुई और उसके लिए उनके गुरु ने बताया की ये तभी संभव है जब आपका आहार पवित्र हो। तो आहार की साधना से उन्हें नारायण की प्राप्ति हो गई। ईश्वर उनके जीवन में घटित हो गया। जो आहार योगग्राम में है उससे विचार भी पवित्र बन रहें हैं। जैसे आपके विचार पवित्र बनेगें सत्व आपके भीतर आयेगा। तो अभयता भी आयेगी। <br />अभयता आपके भीतर आयेगी, फिर कोई फियर (डर) नहीं रहेगा। और हम जितने प्राणी हैं सब अभिनिवेश में रहते हैं, हम डर में रहते हैं। भय का अर्थ है खो जाने का डर कि हमारा मान, सम्मान, सत्ता, विभूति, शरीर, अनूकूलताएँ, संबंध, सम्पर्क जो कुछ भी, जिसमें हमारी अनुकूलताएँ छुपी हैं, वो चीज खो न जाए। जितने भी प्राणी हैं, हम सबको खो जाने का डर रहता है कि हमारी अनूकूलताएँ न खो जायें। आर्थिक अनूकूलताएँ, भौतिकी अनूकूलताएँ, हमारा सम्मान, हमारी प्रतिष्ठा, हमारा सौन्दर्य हमारा स्वास्थ्य, हमारा शरीर खो जाने का डर है। ये डर योग से चला जाता है। अभयता जीवन में आती है और ये बड़ी उपलब्धि है। आध्यात्म की बहुत बड़ी उपलिब्ध है, तो वो अभयता ही है कि हम अभ्यस्त हो जायें, हमें भय न लगे। चूंकि जो इन्स्क्यिोरिटी है ये हम सब में है। असुरक्षा की भावना बहुत लोगों में है, बड़े बड़े लोगों में भी रहती है और ये असुरक्षा की भावना वह है कि मेरा पद, प्रतिष्ठा, मेरी स्थिति न चली जाये। लोग वो बने रहना चाहते हैं। जो भी वर्चस्व, स्वामित्व जो कुछ भी जैसा है किसी और का न बन जाये, ये असुरक्षा की भावना योग से जाती है।<br />जीवन-निर्माण की दशा में आप साधन कर एक बड़े व्यक्तित्व का निर्माण आप यहाँ कर रहे हैं। स्थूल व्यक्तित्व तो ठीक हो ही रहा है यहाँ पर। स्थूल व्यक्तित्व का अर्थ है आपके शरीर के रोग पर, आपके भौतिकता, भावुकता, बोद्धिकता, आत्मीयता, आध्यात्मिकता और अलग-अलग व्यक्तित्व वो भी यहाँ ठीक हो रहा है। स्वामी जी का जो प्रयास है आपके लिए वो अभयता बनाने का है और ये बड़ी चीज है। योग से एक चीज और आती है निर्भरता। बहुत भार में, प्रेशर में, अपने आस-पास में कोई दबाव, एक बड़ा स्ट्रेस ऐसी कोई इन्जायटी जैसा की आप यहाँ अनुभव भी कर रहे हैं, कोई दबाव आप पर नहीं रहता।  भार आप पर नहीं रहता और जैसा कि मैंने कहा निर्भयता, निर्भारता के साथ एक चीज और आती है निश्चिंतता, आप बिलकुल निश्चिंत रहते हैं।<br />आपके आसपास में कुछ ऐसा नहीं रहता  कि आपमें कुछ संशय बना रहे। ये बड़ी चीज है जो आपको प्राप्त हो रही है। क्योंकि संशय भी हमारे जीवन का नाश कर देता है। हमारा अज्ञान, हमारा संशय, हमारा भ्रम, भय हमारे ही भीतर की दुर्बलताएं, आशक्ति यही तो हमारा नाश करती हैं। यही तो हमारी शत्रु हैं। भगवान ने गीता में कहा है कि जो नाश, जो पतन या जो पराभव है वो हमारे संशय के कारण है।<br />संशय आत्मा विनश्यति। प्रश्न उठता है कि हमारा कोई कैसे अहित कर सकता है, वास्तव में हमारा अहित तो हमारा संशय करता है, अज्ञान ही हमारा बड़ा शत्रु है, अज्ञान से ही दयनीय, दुर्बलता, अभाव, अल्पता अथवा अपने भीतर की दीनता की भावना पैदा होती है। हमारे भीतर की और प्रकार की दुविधाएं, जिससे दुर्बलताएँ पैदा होती हैं। ये योग हमारी दुर्बलताओं को दूर करता है। मानसिक दृष्टि से जब आप सबल बनेंगे। भौतिक दृष्टि से जब आप सबल बनेंगे। तो आपकी ये दुर्बलता भी चली जायेगी। संशय आप में नहीं रहेगा, अज्ञान आपके अंदर नहीं रहेगा, ये बड़ी चीज है। इससे बड़ी तो कोई उपलिब्ध हो ही नहीं सकती। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/49.jpg" alt="49"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;">हाँ स्वामी जी आपको आत्मचेता बना रहे हैं, आपके आत्मविश्वास को जागृत कर, आपको आत्मजय बना रहें हैं। आत्मजय तो मृत्युंजय होता है, एक प्रकार का आपके भीतर भौतिक जागरण हो रहा है, ये ध्यान रहे आपको जाने-अनजाने में इस बात का बोध रहे, यहाँ आपका व्यक्तित्व बन रहा है, बड़ा व्यक्तित्व। आज मैं छोटी सी नई बात और कहना चाह रहा हूँ कि ये स्पर्धा का युग है। ये युग है कम्पीटीशन का। आदमी आगे कैसे बढ़ सकता है, इसके लिए एक स्पर्धा तो रहनी ही चाहिए तभी तो पता लगेगा कि मैं आगे कहाँ पहुँचा या मैं कितना पीछे हूँ। यहां आत्म स्पर्धा आपको सिखाई जा रही, खुद से स्पर्धा कि मैं कल ऐसा था और आज ऐसा हूँ और मुझे कल और बेहतर होना है। एक नई बात यहाँ सीखने को मिल रही है वो है आत्मस्पर्धा कि कल तो ये स्थितियाँ थी मेरे शरीर की मेरा ऐसा वजन था या मेरा कुछ इस तरीके का शरीर था। आज मैं और अच्छा हो गया, तो आप देख रहे हैं यह एक आत्मस्पर्धा है। मैं एक नई फिलॉसाफी आपको दे रहा हूँ और वो ये है कि मेरा मुकाबला खुद से यानि अपना मुकाबला खुद से करो अर्थात् आज मैंने बेहतर किया, तो मैं जीत गया और कल बेहतर करूंगा तो वो मेरी महाजय होगी। नहीं कर सका तो मैं हार गया। आज बेहतर किया तो जीत गया और नहीं कर पाया तो यहीं हार गया। <br />महाराज जी हमसे रोज बेहतर करा रहे हैं तो मैं आज एक आत्मस्पर्धा देख रहा हूँ। दूसरे से नहीं स्वयं से आत्मस्पर्धा। दूसरों से तो ईष्र्या हो जाती है और ये ध्यान रहे, अगर आप अपने से ही मुकाबला रखेगें कि मुझे अच्छा होना है तो आप स्वास्थ्य की दृष्टि से, विचार व मानसिक दृष्टि से, भौतिक दृष्टि से, आत्मिक दृष्टि से और भाव जगत से भी सबल होंगे जो बड़ी चीज होगी। <br />आप विचार में बड़े बने, इससे बड़ी क्या चीज होगी, आप रहते विचारों में हैं, चित्त की जैसे बात बता रहे थे महाराज जी, तो जिसे सोना आता है या सोचना आता है, वह बड़ा व्यक्तित्व वाला हो जाता है। ध्यान रखना हम अपनी सोच का परिणाम हैं और आपनी सोच के परिणाम का आपको यहाँ अभ्यास कराया जा रहा है। उससे एक नई चीज भी देखने को मिल रही है। आप खुद से एक स्पर्धा कर रहे हैं कि मेरी ये स्थिति आज है, तो अब और अच्छा होना है। शास्त्र ऐसा कहते हैं कि अगर ये आत्म स्पर्धा करते रहे तो आपमें एक दिन दैवत्य जग जायेगा। आपके भीतर का जो क्षुप्त दैवत्व है आपके भीतर यह अनन्ता है, वो आपको प्राप्त होगी। हम अपने होने का अर्थ भी उजागर करें तो अपनी अज्ञानता को खोना व अजेयता को प्राप्त करना ही तो मनुष्यता है। अन्तता तो स्वयं में विद्यमान है, जो हम में सहज प्राप्त हुई है। भगवान स्वयं कहते हैं कि तू तो मेरा अंश है और तू वैसा ही सामथ्र्यवान है। मेरा अंश तुझमें है, तो तुझे अपनी आत्मसत्ता का बोध होगा, हम वैसे ही हो जायेगें, अनन्त हो जायेंगे। तो यहाँ एक आत्मस्पर्धा आपको प्राप्त हो रही है, रोज वैचारिक पवित्रता बन रही है। <br />एक सबसे बड़ी बात जो लोग कहते है कि  हम घर में ही कर लेगें। तो घर में नहीं समूह में आकर करो। किसी बड़े परिवेश में आकर करो। जैसे गरूड़ जी का आगमन हुआ आश्रम में तो वे सहज हो गए, ढेर सारे प्रश्न लेकर आए, न जाने कितनी शंकाए लेकर आए थे, न जाने कितने उनके पास भ्रम थे और वो बहुत बड़े आदमी थे, वो भगवान नारायण के पास रहते थे, वेद ध्वनि उनकी निकलती रहती थी, पर अभ्यास नहीं था। दुर्योधन कहते हैं-मेरी धर्म में प्रवृति नहीं है और हां मैं अधर्मी हूँ। ये जानता हूँ पर मेरी इसमें प्रवृत्ति नहीं होती। गुरूदेव ऐसा नहीं है कि मैं नहीं जानता कि धर्म क्या है? मैं जानता हूँ पर मेरी प्रवृति नहीं है। मुझे खूब अच्छी-अच्छी बातें आती हैं, मैं जानता हूँ भोर में जगना चाहिए, सतकर्म करने चाहिए, शुभ संकल्प में रहना चाहिए, यज्ञ, स्वाध्याय करो, दान दो, संयम में रहो, सदाचारी जीवन हो, पर मेरी प्रवृति नहीं बनती अत: ये अधर्म कर रहा हूँ, मैं ये भी मैं जानता हूँ, मुझमें निवृति नहीं है, ये जो रोज की चीज है, मैं बुरी बातों ये हट नहीं पा रहा हूँ, मैं निवृत नहीं हो पा रहा हूँ, तो उसके लिए भी परिवेश चाहिए। उसके लिए एक अलग वातावरण चाहिए।<br />यहाँ का अलग ही आनंद है, अलग ही अनुभव है, कुछ ऐसा लग रहा है चारो तरफ  प्रकृति खिली-खिली है और भोर में अलग ही आनंद होता है, तो आप यहाँ आएँ, यहाँ का परिवेश, यहाँ का वातावरण, यहाँ का वायुमण्डल, यहाँ की संगति यहाँ का एक परस्पर एक दूसरे के साथ आपका व्यवहार अलग है।आप भाग्यवान हैं, भाग्यशाली है। मुझे एक और बात कहनी है कि लोग वातावरण ढूढऩे जाते हैं और कुछ लोग वातावरण बना देते हैं, हमारे स्वामी जी जहाँ जाते गए, वहाँ उन्होंने वातावरण बना दिया। यौगिक वातावरण बना दिया। क्योंकि ये सामर्थ्यवान पुरुष हैं। 9 साल की आयु से जिसने योग न छोड़ा हो, जो योगधर्म महापुरुष हो, मुझे नहीं लगता कि उन्होंने चाहा होगा कि कुण्डली जागृत हो, आत्म साक्षात्कार हो या उनमें समाधि घटित हो। <br />वो सागर की तरह गंभीर हैं और ऐसा ही पूरे देश को बना रहे हैं। मुझे जो यहाँ अनुभव हुआ वो ये कि अभयता आपको प्राप्त होगी, अभ्यता की बड़ी उपलब्धि है कि आप अभ्यस्त हो जायें निश्चिंत हो जाये। निशंक हो जायें। निर्भार अनुभव करें, कोई आपके पास भार न हो, आप सहज हो जायें, स्वाभाविक हो जाये, प्राकृतिक हो जायें, नैसर्गिक हो जायें, अपने स्वरूप में आप लौटें, ये बड़ी बात है। <br />महाराज जी का अभियान तो आध्यात्मिक अभियान है। ये अभियान कोई यौगिक, शारीरिक, व्यायाम का अभियान नहीं है। ये केवल आर्थिक शुचिता और व्यवस्था परिवर्तन या केवल स्वाभिमान जागरण का ही अभियान नहीं है। ये अभियान महाराज जी का आध्यात्मिक अभियान है। और मैं बहुत ही विश्वास के साथ ये बात कहना चाहूंगा। इस धरती पर जितनी भी समस्याएँ हैं अथवा आज जैसे अनेक संकट हैं। जिसमें मेरे देश में जैसे कल्पना करो कि माओवाद है, नक्सलवाद है या पूरे संसार में आतंकवाद है, तो उसका अगर कोई समाधान है तो वो अध्यात्म है। और कोई समाधान नहीं हैं। हम उनका हृदय जीत लें। अगर हम नक्सलियों के पास जाये तो जो कुछ कठिनाईयां हैं उनके साथ संवाद हो और सही अंत:करण से एक सही मन से संवाद हो, तो माओवाद, नक्सलवाद और जितने भी आतंकवाद हैं इनको किसी और तरह से नहीं ठीक किया जा सकता। आध्यात्मिक गलियारे में ही उसके सूत्र हैं। जब कभी पूरे विश्व को एकता दी जायेगी। जब कभी पूरे विश्व को एक एकता के सूत्र में पूरे विश्व को एक परिवार का बोध दिया जा सकेगा तो वो राजनैतिक गलियारों से उसके सूत्र नहीं निकलेगें अपितु यहाँ से निकलेगें, पतंजलि योगपीठ से, योगग्राम से निकलेंगे। <br />क्योंकि यहा अध्यात्म का जागरण है। देखिए अध्यात्म में अपेक्षाएं नहीं रहती, निरपेक्ष रहता है आदमी अनपेक्ष। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/52.jpg" alt="52"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;">आप यहाँ एक अध्यात्म का जागरण देख रहें हैं। देखने में प्रथम दृष्टया लगता है कि योग का कार्यक्रम है, कोई कालेधन की चर्चा, व्यवस्था परिवर्तन की बात हुई। न ना ना ये मुझे बड़ा अभियान लगता है और ये दैवीय अभियान है। जब महापुरुष धरती पर आते हैं, तो उन्हें पहचान नहीं पाता कोई। वो बहुत सामान्य वेष में रहते हैं, सामान्य तो वो सहचर बनकर रहेंगें, वो सहपथिक बन कर रहेंगें और उन्हें कुछ ऐसा विशिष्ट बोध नहीं कराते। अपना विशिष्ट अपना एक विराट व्यक्तित्व वो कभी नहीं बतायेगी। वो धीरे-धीरे करके अनुभूत होता है। उसकी व्याप्ति से, उसकी अनुभूति से, उसकी विद्या से, उसके संकल्प से, उसके कार्य योजनाओं से और वो धीरे-धीरे किस तरह से रूपांतरण हो रहा है। मैं उनके कार्य में उनके संकल्प में, उनकी सोच में उनके पूरे अभियान में अध्यात्म का एक बड़ा संकल्प दिखाई देता है कि पूरे धरा पर एक आध्यात्मिक जागरण हो रहा है। ये तो सच है कि भारत ने अंगड़ाई तो ले ली है, ये तो सच है कि भारत अब जग गया है, ये सच है कि भारत अब कुछ और हो गया है, अब वैसा नहीं रहा भारत। चारों तरफ  परिवर्तन दिखाई दे रहा है, वो किसने सुलगाई आग, किसने लोगों को जंतर-मंतर की ओर आकर्षित किया, किसने लोगों को गली से लेकर और नेता तक बना दिया। वास्तव में व्यवस्था परिवर्तन का एक पलीता महाराज जी ने लगा दिया। सच मानिये मेरी बात का विश्वास कीजिए वो समर्थ पुरुष है और वो पूरे संसार में अध्यात्म का जागरण कर रहे हैं। वो एक प्रकार के युग द्रष्टा पुरूष हैं।<br />एक और बात जिसे बहुत ध्यान से सुनना कि हिमालय की, गिरी कंदराओं में गहुरों में बैठे ऋषि तो बोलने आयेगें नहीं, तो उन्हें अगर बोलना होगा तो किस मुख से बोलेगें, महाराज जी के मुख से बोलेंगे। वो तो प्राय: समाधि में, मौन में हैं। उनके पास स्वर नहीं हैं, संवाद नहीं हैं, वो गहन समाधि में बैठे हुए हैं और ईश्वर भी कैसे बाहर निकल कर आये, देवी बाहर कैसे निकल कर आए तो कई बार ईश्वर अपना संकल्प, देवता अपना संकल्प अथवा सिद्ध महापुरुष अपना संकल्प इसी के माध्यम से जागृत करते हैं। उसमें उनका स्वर जुड़ जाता है, संवाद जुड़ जाते हैं, ऐसा ही मेरा ये अनुभव है। पूज्य महाराज जी का विराट व्यक्तित्व तो है ही पर अनेक ऋषि उनमें अपनी ऊर्जा का भी निवेश कर रहे हैं। अनेक दैव सत्ता और स्वयं ने जैसे मानो अपनी सत्ता का भी निवेश किया है, जिससे लोक कल्याण हो। पूज्य महाराज जी के आह्वान को समझना निश्चित ही जीवन में भी परिवर्तन घटित होगा और विश्व उत्थान भी संभव बनेगा </h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Apr 2017 21:55:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
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                <title>सर्दी, खांसी, ज्वरादि असंख्य रोगों की नाशक श्यामा तुलसी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">आचार्य बालकृष्ण</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2370/sardi-khansi-jwaradi-asankhya-rogon-ki-nashak-shyama-tulsi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/33.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>वानस्पतिक नाम : </strong></span>ocimum sanctum linn. (ओसीमम् सेंक्टम्) Syn-Ocimum tenuiflorum Linn.; Ocimum monachorum Linn. कुलनाम : lamiaceae (लेमिएसी); अंग्रेजी नाम : Holy basil (होली बेसिल); संस्कृत- तुलसी, सुरसा, देवदुन्दुभि, अपेतराक्षसी सुलभ, बहुमञ्जरी, गौरी, भूतघ्नी; हिन्दी- तुलसी, वृन्दा;  उडिय़ा- तुलसी (Tulasi); कन्नड़- एरेड तुलसी (Ared tulsi); कारीटुलसी (Karitulasi); गुजराती-तुलसी(Tulasi); तेलुगु- गग्गेर चेट्टु (Gagger chettu); तमिल- तुलशी (Tulashi); नेपाली- तुलसी (Tulasi); बंगाली- तुलसी (Tulasi); मराठी- तुलसी (Tulas); मलयालम- कृष्ण तुलसी Krishantulasi); तुलसी (Tulasi); अंग्रेज़ी- थाई बेसिल(Thai basil), सेके्रड बेसिल Sacred basil); अरबी- दोहश (Dohsh)</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><br />सर्वरोग निवारक जीवनीय शक्ति वर्धक, औषधि तुलसी सर्वत्र सुलभ, सुगन्धित, सुन्दर तथा सर्वव्याप्त है। तुलसी की कई प्रजातियां मिलती हैं। जिनमें श्वेत व कृष्ण प्रमुख हैं। कृष्ण तुलसी के पत्र तथा शाखायें कुछ बैंगनी तथा कृष्ण आभा लिये होते हैं। चरक संहिता में श्वासघ्न दशेमानि तथा शिरोविरेचन, कृमि व विष चिकित्सा के लिए अनेक स्थानों पर तुलसी का प्रयोग बताया गया है। <br />श्याम तुलसी साधारणतया 30-60 सेमी ऊँचा, सीधा, बहुशाखित, सुगन्धित, मुलायम रोमश, बहुवर्षायु शाकीय पौधा होता है। इसके काण्ड का अधो भाग कदाचित् काष्ठीय एवं शाखाएँ साधारणतया बैंगनी-रक्त वर्णी, लगभग चतुष्कोणीय, सीधी, आरोही अथवा फैली हुई होती हैं। इसके पत्र सरल, विपरीत, 2-5-6-3 सेमी लम्बे, चौड़ाई लगभग 1 से 3 सेमी तक, दीर्घवृत्ताकार-दीर्घायत दोनों पृष्ठ पर रोमश, सूक्ष्म ग्रन्थिमय होते हैं। इसके पुष्प छोटे, श्वेत अथवा बैंगनी अथवा रक्तवर्णी, सघन-चक्करदार होते हैं। फल सूक्ष्म, गोलाकार अथवा चौड़े दीर्घायत, नुकीले अण्डाकार, अल्प सम्पीडित होते हैं। इसका पुष्प एवं फलकाल जुलाई से अक्टूबर तक होता है।<br />श्यामा तुलसी के पौधे में सिट्रिक, टारटरिक एवं मैलिक अम्ल पाया जाता है।<br />इसके तैल में युजिनॉल, मेथिल ईथर, टर्पेन-4-ऑल, डेक्किलडीहाईड, γ-सेलीनीन, निरोल, कैरियोफाईलिन, टर्पीनीन, एल्डीहाईड, β-पिनीन, केम्फीन, तथा α-पिनीन पाया जाता है। जबकि पत्र में यूजीनॉल, मेथिल चेवीकॉल तथा अवाष्पशील तैल पाया जाता है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;">इसके पत्र तथा पुष्प में कैडीनीन, लिमोनीन, युजिनोल, β-केरोटीन, अर्सोलिक अम्ल, गैलिक अम्ल, प्रोटोकैटेचुईक अम्ल, वैनेलिक अम्ल, कैफीक अम्ल, क्लोरोजेनिक अम्ल तथा रेसमेरिनिक अम्ल पाया जाता है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;">तुलसी के मूल में β-सिटोस्टेरॉल, ट्राइटरपीन्स और बीज तैल में सिटोस्टेरॉल, पॉल्मिटिक, स्टेएरिक, ऑलिक, लिनोलीक, एवं लिनोलिनिक अम्ल पाया जाता है। जबकि पञ्चाङ्ग में एस्कॉर्बिक अम्ल, कैरोटीन, एल्केलाइड्स, ग्लाइकोसाइड्स सेपानिन एवं टैनिन पाया जाता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/64.jpg" alt="64"></img></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>आयुर्वेदीय गुण-कर्म:</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">तुलसी पञ्चाङ्ग कफवात शामक, जन्तुघ्न, दुर्गन्ध नाशक, दीपन, पाचन, अनुलोमन, कृमिघ्न, कफघ्न, हृदयोत्तेजक, रक्तशोधक, स्वेदजनन, ज्वरघ्न व शोथहर होता है। तुलसी के बीज मूत्रल एवं बलकारक होते हैं।  पत्र प्रतिश्याय, वातश्लैष्मिक ज्वर एवं विषम ज्वर में लाभप्रद है। तुलसी का पञ्चाङ्ग श्वास, श्वसनी शोथ, कर्कटार्बुद (बड़ी आंत, यकृत, पित्ताशय), कवकरोग, हृदयविकार, प्रतिश्याय, विसूचिका, उदरशूल, विबन्ध, कास, ऐंठन, मानसिक अवसाद, त्वविकार, अतिसार, कष्टार्तव, अग्निमांद्य, श्वासकष्ट, कर्णशूल, मस्तिष्क रोग, आंत्ररोग, नासास्राव, ई- कोलाई संक्रमण, ज्वर, कवक संक्रमण, आमाशयिक रोग, सूजाक, अश्मरी, शिरोवेदना, ऊष्माघात, अद्र्धाङ्ग पक्षाघात, यकृत् विकार, हिक्का, उच्चरक्तचाप, अनिद्रा, श्वित्र, कटिशूल, मलेरिया, अक्षिरोग, कर्णरोग, पूतिनासा, आमवात, दद्रु, सर्पदंश, प्लीहारोग, शोथ, क्षय, आंत्रिकज्वर, व्रण, रतिज रोग, विषाणु संक्रमण, अधिमांस एवं कृमि रोग में लाभप्रद होता है।</h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>श्याम तुलसी का नाइसीरिया गोनोरी (neisseria gonorrhoeae) की वृद्धि को रोकता है। काण्ड, काण्ड कैलस (Stem callus) व पत्र का ऐथेनॉल तथा क्लोरोफार्म सत्त ट्रान्सकार्नियल (Transcorreal) विद्युत् आघात प्रेरित टॉनिक आक्षेप (Tonic convulsion) की रोकथाम में प्रभावकारी है। यही नहीं सत्त चूहों पर मेध्य (Nootropic) एवं स्मृति भ्रंशरोधी (anti-amnesic) क्रिया दर्शाता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>इसका एल्कोहॉलिक पत्र सत्त वेदनास्थापक क्रियाशीलता दर्शाता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>इसके पत्र का बैमजीन सत्त प्रतिवर्तित (Reversible) जननक्षमतारोधी प्रभाव प्रदर्शित करता है।</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>औषधीय प्रयोग विधि</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>शिरो रोग</strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>तुलसी की छाया शुष्क मंजरी के 1-2 ग्राम चूर्ण को मधु के साथ खाने से शिरो रोग में लाभ होता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>तुलसी के 5 पत्रें को प्रतिदिन पानी के साथ निगलने से बुद्धि, मेधा तथा मस्तिष्क की शक्ति बढ़ती है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>तुलसी तेल को 1-2 बूंद नाक में टपकाने से पुराना सिर दर्द तथा अन्य सिर संबंधी रोग दूर होते हैं।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>तुलसी के तेल को सिर में लगाने से जुएं व लीखें मर जाती हैं। तेल को मुंह पर मलने से चेहरे का रंग साफ  हो जाता है।</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>कर्ण रोग </strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>कर्णशूल- तुलसी पत्र स्वरस को गर्म करके 2-2 बूंद कान में टपकाने से कर्णशूल का शमन होता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>तुलसी के पत्ते, एरंड की कोंपले और चुटकी भर नमक को पीसकर कान पर उसका गुनगुना लेप करने से कान के पीछे (कर्णशूल) की सूजन नष्ट होती है।</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>मुख रोग</strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>दंतशूल-</strong> काली मिर्च और तुलसी के पत्तों की गोली बनाकर दांत के नीचे रखने से दंतशूल दूर होता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>तुलसी के रस को हल्के गुनगुने पानी में मिलाकर कुल्ला करने से कंठ के रोगों में  लाभ होता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>तुलसी रस युक्त जल में हल्दी और सेंधा नमक मिलाकर कुल्ला करने से मुख, दांत तथा गले के विकार दूर होते हैं।</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/60.jpg" alt="60"></img></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>वक्ष रोग</strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>सर्दी, खांसी, प्रतिश्याय एवं जुकाम- तुलसी पत्र (मंजरी सहित) 50 ग्राम, अदरक 25 ग्राम तथा  कालीमिर्च 15 ग्राम को 500 मिली जल में मिलाकर क्वााथ करें, चौथाई शेष रहने पर छाने तथा इसमें 10 ग्राम छोटी इलायची के बीजों को महीन चूर्ण डालें व 200 ग्राम चीनी डालकर पकायें और एक तार की चाशनी हो जाने पर छानकर रख लें।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>इस शर्बत का आधे से डेढ़ चम्मच की मात्र में बच्चों को तथा 2 से चार चम्मच तक बड़ों को सेवन कराने से, खांसी, श्वास, काली खांसी, कुक्कुर खांसी, गले की खराश आदि में फायदा होता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>इस शर्बत में गर्म पानी मिलाकर लेने से जुकाम तथा दमा में बहुत लाभ होता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>तुलसी की मंजरी, सोंठ, प्याज का रस और शहद मिलाकर चटाने से सूखी खांसी और बच्चे के दमे में लाभ होता है।</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>उदर रोग</strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>वमन- </strong>10 मिली तुलसी पत्र स्वरस में समभाग अदरक स्वरस तथा 500 मिग्रा इलायची चूर्ण मिलाकर लेने से छर्दि बंद हो जाती है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>अग्निमांद्य-</strong> तुलसी पत्र के स्वरस अथवा फाण्ट को दिन में तीन बार भोजन से पहले पिलाने से अजीर्ण, अग्निमांद्य, बालकों की यकृत् प्लीहा की विकृतियों में लाभ होता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>अपच-</strong> तुलसी की 2 ग्राम मंजरी को पीसकर काले नमक के साथ दिन में 3 से 4 बार देने से लाभ होता है।</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>प्रजनन संस्थान संबंधी रोग</strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>स्तम्भन- 2 से 4 ग्राम तुलसी मूल चूर्ण और जमीकन्द चूर्ण को मिलाकर 125-250 मिग्रा की मात्र में पान में रखकर खाने से स्तम्भन दोष मिटता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>प्रसवोत्तर शूल- तुलसी पत्र स्वरस में पुराना गुड़ तथा खाँड मिलाकर प्रसव होने के बाद तुरन्त पिलाने से प्रसव के बाद का शूल नष्ट होता है</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>नपुंसकता- समभाग तुलसी बीज चूर्ण अथवा मूल चूर्ण में बराबर की मात्र में गुड़ मिलाकर 1 से 3 ग्राम की मात्र में, गाय के दूध के साथ लगातार लेते रहने से एक माह या छ: सप्ताह में लाभ होता है।</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>अस्थिसंधि रोग </strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>वातव्याधि- 2 से 4 ग्राम तुलसी पञ्चाङ्ग चूर्ण का सुबह-शाम दूध के साथ सेवन करने से संधिशोथ एवं गठिया के दर्द में लाभ होता है।</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>त्वचा रोग</strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>कुष्ठ रोग-</strong> 10-20 मिली तुलसी पत्र स्वरस को प्रतिदिन प्रात: काल पीने से कुष्ठ रोग में लाभ होता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>तुलसी के पत्रें को नींबू के रस में पीसकर, दाद, वात रक्त, कुष्ठ आदि पर लेप करने से लाभ होता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>सफेद दाग झांई-</strong> तुलसी पत्रस्वरस, नींबू रस, कंसौदी पत्र स्वरस तीनों को बराबर-बराबर लेकर उसे तांबे के बरतन में डालकर चौबीस घंटे के लिये धूप में रख दें। गाढ़ा हो जाने पर रोगी को लेप करने से दाग तथा अन्य चर्म विकार साफ  होते हैं, इसे चेहरे पर भी लगाया जाता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>नाड़ीव्रण-</strong> तुलसी बीजों को पीसकर लेप करने से दाह तथा नाड़ीव्रण का शमन होता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>शीतपित्त-</strong> शरीर पर तुलसी स्वरस का लेप करने से शीतपित्त तथा उदर्द का शमन होता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>शक्ति वृद्धि के लिये-</strong> 20 ग्राम तुलसी बीज चूर्ण में 40 ग्राम मिश्री मिलाकर महीन-महीन पीस लें, इस मिश्रण को 1 ग्राम की मात्र में शीत ऋतु में कुछ दिन सेवन करने से वात-कफ  रोगों से बचाव होता है। दुर्बलता दूर होती है। शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है व स्नायु मंडल सशक्त होता है।</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>ज्वर रोग :</strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>मलेरिया ज्वर-</strong> तुलसी का पौधा मलेरिया प्रतिरोधी है। मलेरिया में तुलसी पत्रें का क्वाथ तीन-तीन घंटे के अन्तर से सेवन करें। तुलसी मूल क्वाथ को आधा औंस की मात्रा में दिन में दो बार देने से ज्वर तथा विषम ज्वर उतर जाता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>कफ प्रधान ज्वर-</strong> 21 नग तुलसी दल, 5 नग लवंग तथा अदरक रस 500 मिली को पीस छानकर गर्म करें, फिर इसमें 10 ग्राम मधु मिलाकर सेवन करें।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>आंत्र ज्वर-</strong> 10 तुलसी पत्र तथा  ½ व 1 ग्राम जावित्री को पीसकर शहद के साथ चटाने से लाभ होता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>साधारण ज्वर-</strong> तुलसी पत्र, श्वेत जीरा, छोटी पीपल तथा शक्कर, चारों को कूटकर प्रात:-सायं देने से लाभ होता है।</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>विष चिकित्सा :</strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>सर्पविष-</strong> 5 से 10 मिली तुलसी पत्र स्वरस को पिलाने से और इसकी मंजरी और जड़ों को बार-बार दंशित स्थान पर लेप करने से सर्पदंश की पीड़ा में लाभ मिलता है। अगर रोगी बेहोश हो गया हो, तो इसके रस को नाक में टपकाते रहना चाहिये।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>शिरोगत विष-</strong> विष का प्रभाव यदि शिर: प्रदेश में प्रतीत हो तो बन्धु, जीव, भारंगी तथा काली तुलसी मूल के स्वरस अथवा चूर्ण का नस्य देना च</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><strong> परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज का स्वानुभूत प्रयोग :</strong><br />   7 तुलसी के पत्र तथा 5 लौंग लेकर एक गिलास पानी में पकायें। पानी पककर जब आधा शेष रह जाये, तब थोड़ा सा सेंधा नमक डालकर गर्म-गर्म पी जायें। यह काढ़ा पीकर कुछ समय के लिए वस्त्र ओढ़कर पसीना ले लें। इससे ज्वर तुरन्त उतर जाता है तथा सर्दी, जुकाम व खांसी भी ठीक हो जाती है। इस काढ़े को दिन में दो बार दो तीन दिन तक ले सकते हैं। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>बाल रोग :</strong></span><br />   छोटे बच्चों को सर्दी जुकाम होने पर तुलसी व 5-7 बूंद अदरक रस को शहद में मिलाकर चटाने से बच्चों का कफ, सर्दी, जुकाम ठीक हो जाता है। पर नवजात शिशु को यह मिश्रण अल्प मात्रा में ही दें।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>विशेष: </strong><br />    हमारे ऋषियों को लाखों वर्ष पूर्व इसके औषधीय गुणों का ज्ञान हो गया था, इसलिए तुलसी को दैनिक जीवन में प्रयोग हेतु प्रमुख स्थान दिया गया। वानस्पतिक शास्त्र के अनुसार श्यामा और रामा तुलसी का एक ही नाम है, पर औषधीय गुणों में रामा तुलसी की तुलना में श्यामा तुलसी को महत्वपूर्ण माना जाता है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Apr 2017 21:53:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गांधी के समान बहुआयामी ज्ञान के धनी स्वामी रामदेव</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;">श्रद्धेय संत समाज, स्वामी बाबा रामदेव जी, आचार्य श्री बालकृष्ण जी, मेरे मित्र श्री रजत जी और योगग्राम में आये हुए मित्रों। स्वामी जी के न्यौते पर रजत जी और मैं आज योगग्राम देखने आए और यहाँ उसके एक विंग में एक नई सुविधा बनी है। एक अवसर और एक मौका मिला। जैसा रजत जी ने कहा कि पूरे विश्व में एक महोत्सव बन गया है कि प्राकृतिक तरीकों से चिकित्सा करायी जाय। भारत में सैकड़ों वर्षों से जो ज्ञान समाज ने इक्कठा किया, उसके माध्यम से लोगों का इलाज किया जाए, ऐसी आवश्यकता बन रही है। दवाई और ऑपरेशन</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2371/gandhi-ke-saman-bahuayami-gyan-ke-dhani-swami-ramdev"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/541.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">श्रद्धेय संत समाज, स्वामी बाबा रामदेव जी, आचार्य श्री बालकृष्ण जी, मेरे मित्र श्री रजत जी और योगग्राम में आये हुए मित्रों। स्वामी जी के न्यौते पर रजत जी और मैं आज योगग्राम देखने आए और यहाँ उसके एक विंग में एक नई सुविधा बनी है। एक अवसर और एक मौका मिला। जैसा रजत जी ने कहा कि पूरे विश्व में एक महोत्सव बन गया है कि प्राकृतिक तरीकों से चिकित्सा करायी जाय। भारत में सैकड़ों वर्षों से जो ज्ञान समाज ने इक्कठा किया, उसके माध्यम से लोगों का इलाज किया जाए, ऐसी आवश्यकता बन रही है। दवाई और ऑपरेशन के साथ तो इलाज होते ही हैं, पर इस प्रकार की सुविधाएँ अब दुनियाँ में बहुत विकसित हो रही हैं। हमारे यहाँ भी दक्षिण भारत में और कई अन्य स्थानों पर व एक-आध स्थान पर उत्तर भारत में भी ऐसी सुविधायें हैं, लेकिन योगग्राम में ये नया जोड़ अपने में अनुपम है। आने वाले कल में इसका बड़ा विस्तार होने वाला है। मुझे लगता है योगग्राम अपने आप में बहुत अद्भुत व सुविधा जनक है। दवाई और सर्जरी की आवश्यकता न पड़े, व्यक्ति अपना स्वास्थ्य ठीक रखे और इस माध्यम से कुछ समय निकाल कर अपने ऊपर भी खर्च करे। यही यहाँ का संकल्प है। वैसे हमारे समाज में एक परम्परा है कि जो लोग एक चीज के विशेषज्ञ होते हैं, वो अपना ध्यान केवल उसी दिशा में देते हैं। बहुत कम लोग होते हैं, जिनको जीवन में बहुत अन्य-अन्य विषयों के बारे में चिंता होती है, अगर हम हाल का इतिहास देखें तो एक नाम गांधी जी का आता है, शायद ही जीवन का कोई पक्ष था जिसके संबंध में वो नहीं लिखते थे। उन्होंने अर्थव्यवस्था पर भी लिख दिया, स्वास्थ्य पर भी लिख दिया, राजनीति पर लिखते ही थे। आज के युग में भी शायद ऐसे बहुत कम लोग हैं और शायद ये भी मानना पड़ेगा कि स्वामी बाबा रामदेव जी महाराज उनमें से एक हैं। मुझे मालूम नहीं कि इन्हें यह औपचारिक ज्ञान किसी स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय से मिला। स्वामी जी के गुरू जी बैठे हैं यहाँ, जहाँ से इन्हें ज्ञान मिला, वे ही बतायेंगे। </h5>
<h5 style="text-align:justify;">इस देश में 25 प्रतिशत जो पैदावार होती है, वह खेत से ही व्यर्थ जाती है। उसका नुकसान किसान को भी होता है, देश को भी होता है। वो सारा सामान प्रोसेस हो जाए और महीनों तक चले इसके बहुत सफल उदाहरण नहीं हैं। पिछले 20-30 साल से हम बजट उठाकर देख लें, तो कहा जाता है कि कोल्ड स्टोरेज बनेंगे, फूड प्रोसेस को प्रोत्साहन देंगे। लेकिन यह बहुत ज्यादा सफल नहीं हो पाया। जबकि इतने बड़े पैमाने पर पहला फूड पार्क देश का यह पतंजलि हर्बल फूडपार्क है। और कहें तो एक प्रकार से दुनियाँ की बड़ी से बड़ी कम्पनी इसके प्रोडक्ट के मुकाबले में कुछ  नहीं है। स्वामी जी व आचार्य जी ने ये प्रयोग करके दिखाया। इसी प्रकार हेल्थ टूरिज्म एक शब्द होता है, योगग्राम जैसी संस्था आने वाले दिन में उसका एक केन्द्र बन जाए तो आश्चर्य नहीं। </h5>
<h5 style="text-align:justify;">जब कभी देश हित, देश की सुरक्षा का विषय आता है, तो स्वामी जी के क्या विचार हैं, ये सब सुनने की प्रतीक्षा करते हैं। इन्होंने समाज में आंतरिक स्वच्छता आए इसके लिए योग को घर-घर पहुंचाने का काम किया। इतनी पुरानी हमारी सैंकड़ों सालों की विरासत थी, लेकिन उसे घर-घर तक पहुंचाने का काम स्वामी जी ने किया। </h5>
<h5 style="text-align:justify;">एक किस्सा स्वामी जी को याद होगा। आज से 5-6 साल पहले स्वामी जी की अर्थशास्त्र में भी रुचि हो गई और आपने एक दर्शन बनाया कुछ साथियों के साथ और सबसे अधिक बहस मेरे साथ इनकी हुई, हम लोग तब विपक्ष में थे, तब एक दिन अपना झोला लेकर रजत जी के घर घंटों तक मुझे समझाते रहे और मैं इनसे तर्क करता रहा, फिर इन्होंने कहा कि हम इस पर सार्वजनिक बहस करेंगे। तो हम दोनों दिल्ली के एक बड़े फिक्की ऑडिटोरियम में लगभग एक से डेढ़ हजार चार्टेड अकाउंटेट के बीच चर्चा प्रारम्भ की। वे सब स्वामी जी से और मुझसे घंटों प्रश्न पूछते रहे और बड़ी अच्छी बहस चलती रही । मैं इनको बताता रहा कि इसमें क्या कमजोरियां हैं और ये मुझे बताते रहे कि इसमें क्या ताकत है। मैं आज केवल इतना बता सकता हूँ कि उस बहस में से जो विचार निकले वो पूरे तो संभव नहीं थे, आज भी संभव नहीं हैं, लेकिन 3 चीजें इतनी महत्वपूर्ण आयीं कि उसने देश की दिशा बदल दी। उससे पहले इस पर कोई बहस नहीं करता था, वो उस चर्चा से आरंभ हुई थी । इनका आग्रह होता था कि बड़े नोट, पेपर करंसी को बिलकुल बंद कर दो। और ये तर्क दिया करते थे कि समाज में जितनी भी तकलीफें आती हैं, जैसे भ्रष्टाचार से लेकर कालाधन तक आदि आर्थिक तकलीफें, वो उसी में से उत्पन्न होती हैं, उसे समाप्त तो नहीं, लेकिन कम किया जा सकता है। अंतत: इस विचार ने स्वीकृति पकड़ी। </h5>
<h5 style="text-align:justify;">दूसरा तर्क होता था कि सारे टैक्स समाप्त करके केवल एक टैक्स रखो, एक आदमी के ऊपर एक टैक्स रहे। उससे आपका कलेक्शन भी ज्यादा होगा और टैक्स की चोरी भी नहीं होगी। व्यक्ति को तकलीफ  भी नहीं होगी, वह सब पूरा तो लागू नहीं हो पाया। जैसे कुछ डायरेक्ट टैक्सिस है, कुछ  इनडायरेक्ट टैक्सिस हैं, लेकिन आगामी पहली जुलाई से सारे इन्डायरेक्ट टैक्स समाप्त होकर केवल एक बचेगा और वही एण्ड में लगेगा, जिसे ट्रॉन्जेक्शन टैक्स आप कहा करते थे। ये ट्रॉन्जेक्शन टैक्स नहीं है, लेकिन दूसरे स्वरूप में आया है। मैं एक दिन इनको कह रहा था कि उस वक्त बड़ा हम लोगों का मतभेद रहता था, और स्वामी जी बार-बार कहते थे कि समाज में ऐसा प्रचार करें कि पेपर करेन्सी के स्थान पर प्लास्टिक करेन्सी की तरफ  लोग चले जाए। मुझे लगता है कि जैसा मैंने आरम्भ में कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा, स्वच्छता, देश हित, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, फूड पार्क, इन्डस्ट्री खेती तो मुझे आज तक समझ नहीं आ पायी, पर स्वामी जी के साथ इन सब विषयों पर चर्चा करने में आनंद जरूर आता था और आज भी आता है। यही नहीं इस समाज के अंदर जो भीतरी ताकत थी, इन्होंने पतंजलि के माध्यम से विश्व के सामने रख दिया, जिसके लिए बड़ी-बड़ी दुनिया की कम्पनियां लग जाती है। जिस ताकत का परिचय स्वामी जी,  आचार्य जी ने दिया है, हम सबके लिए ये श्रद्धा के पात्र हैं और मैं अपनी ओर से भी और पूरे समाज की ओर से आप दोनों का इस विशेष काम के लिए बहुत-बहुत आभार व्यक्त करता हूँ। </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्था समाचार</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Apr 2017 21:52:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पतंजलि योगग्राम में सात दिवसीय योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा शिविर 02 से 08 मार्च  </title>
                                    <description><![CDATA[<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>रोगमुक्त भारत हमारा स्वप्न है: स्वामी रामदेव महाराज</strong></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>पतंजलि आंदोलन के मूल केन्द्र से राष्ट्र निर्माण, विश्व निर्माण की मिलती है सहज प्रेरणा - प्रकाश झा, फिल्म निर्माता</strong></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>फिल्म निर्माता प्रकाश झा, जूना पीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरि सहित अनेक हस्तियों ने की योगग्राम शिविर में सहभागिता </strong></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/18.jpg" alt="18" /></h5>
<h5 style="text-align:justify;">हरिद्वार। विश्व के सबसे बड़े प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र योगग्राम का आवासीय योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा, षट्कर्म व पंचकर्म शिविर सम्पन्न हुआ। इस दौरान फिल्म निर्माता श्री प्रकाश झा, जूना अखाड़ा के प्रमुख श्री अवधेशानन्द गिरि जी महाराज सहित अनेक हस्तियों ने योगग्राम के शिविर में सहभागिता की। फिल्म निर्माता श्री प्रकाश झा ने पूज्य</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2372/patanjali-yoggram-me-saat-divasiya-yog-evm-prakritik-chikitsa-shivir-02-se-08-march"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/18.jpg" alt=""></a><br /><ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>रोगमुक्त भारत हमारा स्वप्न है: स्वामी रामदेव महाराज</strong></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>पतंजलि आंदोलन के मूल केन्द्र से राष्ट्र निर्माण, विश्व निर्माण की मिलती है सहज प्रेरणा - प्रकाश झा, फिल्म निर्माता</strong></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>फिल्म निर्माता प्रकाश झा, जूना पीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरि सहित अनेक हस्तियों ने की योगग्राम शिविर में सहभागिता </strong></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/18.jpg" alt="18"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;">हरिद्वार। विश्व के सबसे बड़े प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र योगग्राम का आवासीय योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा, षट्कर्म व पंचकर्म शिविर सम्पन्न हुआ। इस दौरान फिल्म निर्माता श्री प्रकाश झा, जूना अखाड़ा के प्रमुख श्री अवधेशानन्द गिरि जी महाराज सहित अनेक हस्तियों ने योगग्राम के शिविर में सहभागिता की। फिल्म निर्माता श्री प्रकाश झा ने पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज के मार्ग दर्शन में योग-प्राणायाम किया तथा भारतीय फिल्मों के माध्यम से भारत के प्राचीन गौरव को स्थापित करने हेतु पूज्यवर से आशीर्वाद मांगा। उन्होंने देश के आम जनमानस एवं युवा वर्ग को भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत फिल्मों से जोडऩे की सम्भावनाओं पर भी चर्चा की। इस अवसर पर जूना पीठाधीश्वर श्रद्धेय स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज योगग्राम की दिव्य प्राकृतिक चिकित्सा की प्रयोग पद्धति से अवगत हुए और पूज्यवर के साथ शिविरार्थियों को अपना आशीर्वचन भी दिया। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/27.jpg" alt="27"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/28.jpg" alt="28"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;">शिविर समापन पर हिन्दू हेरिटेज फाउण्डेशन दल के सदस्यों ने योगग्राम का भ्रमण कर विश्व के अनुपम प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र का अवलोकन किया और भविष्य में इससे लाभ उठाने का संकल्प व्यक्त किया। भ्रमण पर आये इन सदस्यों ने हाई ब्लडप्रेशर, डाइविटीज, हार्ट प्राब्लम्ब, अर्थ राइटिस, स्किन प्राब्लम्ब एवं क्रानिक स्टमक डिस आर्डर, मोटापा आदि रोगों से ग्रसित सैकड़ों शिविरार्थियों के साथ चर्चा कर उनके शिविर सम्बंधित अनुभवों को साझा किया। योगशिविर में ही लन्दन से अपनी मां के साथ पधारी सुश्री शांति बहिन जी ने योग एवं आयुर्वेदिक बनौषधीय चिकित्सा से उन्हें मिले पुनर्जीवन से संबंधित व्यक्तिगत अनुभव को साझा किया। उन्होंने बताया कि उन्हें ब्रेन हेमरेज हुआ था, उनका प्लेटलेट काउन्ट बहुत कम हो गया था, शरीर से रक्त रिसने लगा था। तब उन्होंने पूज्य योगऋषि से संपर्क किया और उनके निर्देशानुसार नियमित गिलोय का सेवन और नियमित प्राणायाम करने लगीं, कुछ ही माह में अनुकूल परिणाम आने लगे, आज वे पूरी तरह से स्वस्थ हैं।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/21.jpg" alt="21"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/19.jpg" alt="19"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/20.jpg" alt="20"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;">शिविर के दौरान फिल्म निर्माता श्री प्रकाश झा ने कहा पतंजलि आंदोलन के इस मूल केंद्र में योग, आयुर्वेद, भारतीय ऋषि संस्कृति, शिक्षा एवं स्वदेशी के मौलिक सिद्धांतों का सशक्त समावेश है। यहाँ आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को इससे राष्ट्र निर्माण से लेकर विश्व निर्माण की सहज प्रेरणा मिलती है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/73.jpg" alt="73"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;">इस दौरान देश-विदेश से पधारे शिविरार्थियों को पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज, पतंजलि योगपीठ के महामंत्री श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज एवं आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज सहित अनेक चिकित्सा विशेषज्ञों का भी मार्गदर्शन मिला। 02 से 08 मार्च तक चलने वाले इस शिविर में हाई ब्लडप्रेशर, डाइविटीज, हार्ट प्राब्लम्ब, अर्थ राइटिस, स्किन प्राब्लम्ब एवं क्रानिक स्टमक डिस आर्डर, मोटापा आदि रोगों से ग्रसित सैकड़ों की संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया। साथ ही वे लोग भी सहभागीदार बने जो अपने स्वास्थ्य का कायाकल्प कराना चाहते हैं। शिविर का लक्ष्य था कि विविध् रोगों से ग्रसित लोगों को योगग्राम की प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा रोग से पूर्ण छूटकारा दिलाना।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/29.jpg" alt="29"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;">इस अवसर पर योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज ने बतायाा कि रोग मुक्त भारत हमारा स्वप्न है। श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने कहा कि दुनियां के करोड़ों लोगों की आशा का केंद्र बनकर उभर रही है योगग्राम की प्राकृतिक चिकित्सा। शिविर में प्रात: पूज्य स्वामी जी द्वारा योगाभ्यास कराने के साथ-साथ यहाँ के योग्य चिकित्सक डॉ नागेन्द्र जी नीरज के मार्गदर्शन में रोगियों का उपचार किया गया। </h5>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/73.jpg" alt="73"></img><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/30.jpg" alt="30"></img></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/31.jpg" alt="31"></img></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Apr 2017 21:51:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ज्ञान और कर्म दोनों के बिना सुख असम्भव</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;">  यहाँ ज्ञान का आशय है जगत् और जीवन के बीच सामजस्य या सन्तुलन स्थापित करने वाले उन नियमों की जानकारी जिनकी परिणति जीवन में सुख के रूप में होती है। उन नियमों में कुछ दूसरों से तथा कुछ केवल अपने से ही संबंध रखते है, जैसे- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, दान व दया का सम्बन्ध दूसरों के साथ है। पर व्यक्ति यदि अकेला हो तो धर्म के इन रूपों की कोई आवश्यकता ही नहीं रह जायेगी। क्योंकि दूसरे व्यक्तियों के साथ सम्बन्ध में ही हिंसा - अहिंसा, सत्य-असत्य, चौर्य-अचौर्य, ब्रह्मचर्य-अब्रह्मचर्य, परिग्रह-अपरिग्रह, दान-अदान, दया व क्रूरता का अर्थ समझा<br />   <br />ज्ञान</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2373/gyan-aur-karm-donon-ke-bina-sukh-asambhav"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/67.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"> यहाँ ज्ञान का आशय है जगत् और जीवन के बीच सामजस्य या सन्तुलन स्थापित करने वाले उन नियमों की जानकारी जिनकी परिणति जीवन में सुख के रूप में होती है। उन नियमों में कुछ दूसरों से तथा कुछ केवल अपने से ही संबंध रखते है, जैसे- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, दान व दया का सम्बन्ध दूसरों के साथ है। पर व्यक्ति यदि अकेला हो तो धर्म के इन रूपों की कोई आवश्यकता ही नहीं रह जायेगी। क्योंकि दूसरे व्यक्तियों के साथ सम्बन्ध में ही हिंसा - अहिंसा, सत्य-असत्य, चौर्य-अचौर्य, ब्रह्मचर्य-अब्रह्मचर्य, परिग्रह-अपरिग्रह, दान-अदान, दया व क्रूरता का अर्थ समझा जा सकता है। दूसरे शौच-सन्तोष-तप-स्वाध्याय-ईश्वर प्रणिधान ये धर्म के वे रूप हैं, जो स्वयं व्यक्ति से ही सम्बन्ध रखते हैं। व्यक्ति केवल अकेला हो तो भी इनकी आवश्यकता है, क्योंकि पवित्रता, सन्तोष आदि के चरितार्थ होने के लिए सामाजिक पारस्परिकता की आवश्यकता नहीं है, बल्कि ये तो व्यक्ति की निजी वस्तुएँ हैं। इन गुणों के परिप्रेक्ष्य में व्यक्ति को स्वयं के द्वारा स्वयं का मूल्यांकन करना होता है। <br />   इसी प्रकार धैर्य-क्षमा-मनोनिग्रह-इन्द्रियसंयम, उत्तम बुद्वि, उत्तम विद्या या शिक्षा, अक्रोध आदि विशिष्ट गुण भी धर्म के स्वरूप को प्रकट करने वाले कहे जाते हैं। बुद्ध ने इन सभी नियमों को 'शील’ शब्द से अभिहित किया है। सार रूप में जीवन और जगत् (चाहे वैयक्तिक हो या सामाजिक) जिन नियमों के ऊपर टिका हुआ है, जिनके न होने से व्यक्ति का स्वरूप बिखर जाता है, सर्वथा विखण्डित हो जाता है, उन नियमों का नाम है 'धर्म’। प्रत्येक वस्तु का भी अपना एक धर्म होता है। उसी के आधार पर उस वस्तु का टिकाव या ठहराव होता है। यदि उसका धर्म न रहे तो वह वस्तु भी न रहेगी। जैसे अग्नि का धर्म है उष्णता, मधु का धर्म है मिठास, सूर्य का धर्म है ऊर्जा दान। इसी प्रकार मनुष्य का भी एक धर्म है जिसको 'मनुष्यता’ नाम से प्रकट किया जाता है। मनुष्यता में जिन-जिन अर्थों का समावेश है वे हैं- धृति, क्षम, इन्द्रियनिग्रह-मनोनिग्रह, सहयोग, शान्ति इत्यादि। यह हुआ धर्म का ज्ञान पक्ष। इसे व्यवहार में कर्म के रूप में प्रकट करना होता है। <br />ज्ञान धर्म का बौद्धिक स्वरूप है, तो कर्म  व्यावहारिक रूप। कोई व्यक्ति धर्म की उत्तम से उत्तम व्याख्या कर दे, बुद्धि के द्वारा उसे अच्छी प्रकार समझ ले और दूसरों को भी समझा दे, पर यदि वह व्याख्या कर्म में नहीं उतर पा रही, कर्म के साथ सुसंवादी न होकर विसंवादी है तो कहना होगा कि धर्म का शरीर प्रकट नहीं हो रहा या नहीं हो पा रहा। और शरीर के बिना केवल आत्मा से लाभ कैसे उठाया जा सकता है? इस विषय पर थोड़ा भी ध्यान दें तो बहुत सरलता से समझ में आता है कि शरीर के बिना आत्मा की स्थिति वैसी ही है जैसे विद्युत् तो है पर उसके प्रवाहित होने के लिए आगे कोई यन्त्र जैसे-बल्ब, पंखा, कोई बड़ी मशीन इत्यादि नहीं है। विद्युत् को चरितार्थ होने के लिए अवश्य ही कोई यन्त्र चाहिए। तद्वत् धर्म के स्वरूप का जो बौद्धिक-पक्ष 'ज्ञान रूप’ है, उसे भी सफल होने के लिए कर्म रूपी ढाँचे की आवश्यकता है, जहाँ ज्ञानरूपी विद्युत् कर्मरूपी यन्त्र में प्रकट हो सके। इसी प्रकार वे लोग भी अधूरे ही रहते हैं, जो कर्म करने में तो अन्धा-धुन्ध लगे रहते हैं, पर ज्ञान को कोई महत्त्व नहीं देते। उस अवस्था में उनके कर्म धर्म के विरुद्ध भी जाते रहते हैं। इसलिए उनको दु:खरूपी फल भोगना ही पड़ता है। यदि संतुलन न बन सका तो मतिभ्रम सुनिश्चित है और मतिभ्रम होने के बाद उसके पास की बड़ी से बड़ी धरोहरें भी मूल्यहीन साबित होने लगती हैं। अर्थात् जीवन पूर्णत: अमूल्य साबित होने लगता है। <br />श्री महाराज रूपक शैली में जीवन की अमूल्यता का दिग्दर्शन कराने वाली एक कहानी सुनाया करते हैं। कहानी इस प्रकार है कि एक व्यक्ति के पास चन्दन का वन था, पर अज्ञानतावश उसे यह नहीं पता था कि उसका वह वन इतना मूल्यवान् है। अत: वह मजदूरी आदि से किसी तरह जीवन जलाता रहा। एक दिन आजीविका का कोई उपाय न होने पर वह कुल्हाड़ी लेकर अपने चन्दन के जंगल में पहुँचा। लकडिय़ाँ काटकर उनका कोयला बनाया और निकटवर्ती शहर में लाकर बेचा। उसके बदले उसे जो पैसे मिले उनसे अपना तथा अपने परिवार के गुजारे का बन्दोबस्त किया। यह धन्धा उसे अधिक सरल लगा तथा वह नित्य ही यह क्रम दुहराने लगा और हँसी खुशी में अपना समय बिताने लगता है। आखिर एक दिन उसके चंदन का बाग उजड़ चुका था, बस कुछ ही पेड़ शेष बचे। तब उसके मन में विचार आया कि अब तो  पास में थोडे से पेड़ ही शेष रह गये हैं। इसलिए कोयला बनाने में खर्च होने वाली लकडिय़ों को बचाना चाहिए और लकड़ी को सीधे क्यों न बेचा जाये।<br />अत: उसने एक चंदन वृक्ष से कुछ लकडिय़ाँ काटकर अपने सिर पर उठाकर शहर में बेचने के लिए चला। चन्दन की लकडिय़ाँ देखकर बाजार में चन्दन के कई पारखी लोग व्यक्ति को घेर कर पूछने लगे कि भाई ये चन्दन की लकडिय़ाँ क्या बेचने के लिए हैं? इस व्यक्ति की स्वीकृति पाकर एक व्यक्ति उसे पाँच सौ रुपये निकालकर देने लगा, तो दूसरा छ: सौ, तीसरा सात सौ, छठे ने एक हजार रुपये की अधिकतम बोली लगा दी। इतने में एक और व्यक्ति आ पहुँचा, देखता है, यह तो बहुत पुराने पेड़ का एकदम असली चन्दन है, वास्तव में कीमती चीज है, वह सीधे ही 1500 रुपये बोल देता है। अब तो लकड़हारा उन सब की बातें सुनकर धाड़ मारकर रो पड़ा। <br />ये देखकर लोग हक्का-बक्का रहे गये और बोले तुझे अपनी चीज का कम पैसा दिखाई दे रहा है, तो मत दे। साफ-साफ बता, कितना पैसा माँग रहा है? तब लकड़हारे ने अपनी बीती कहानी सुनाई कि मैं तो अरबों का स्वामी था। मैंने यह क्या नादानी कर डाली? प्रतिदिन एक पेड़ को काटता और थोड़ी-सी सुविधा के लिए उनका कोयला बनाकर बेचता रहा। मैंने अपने बड़े जंगल को इसी प्रकार समाप्त कर डाला। क्यों मुझे होश नहीं आया? अब बहुत थोड़े पेड़ ही मेरे पास शेष बचे हैं। इसी बात को लेकर रो रहा हूँ।<br />श्री महाराज कहते हैं-केवल लकड़हारे की नासमझी ही नहीं, हमें अपनी नित्य प्रति की स्वयं की मूर्खता पर भी हँसना चाहिए। ऐसा न हो कि कहीं हम भी उस परम पिता के द्वारा दिये गये मनुष्य जीवन रूपी चन्दन-वन को अज्ञानता के कारण विषयों की आग में जलाकर कोयला बना रहे हो ? वास्तव में मनुष्य अपने ही हाथों इस महान् जीवन को कुछ थोड़े से सुखों के लिए सस्ते भाव में बेचे चला जा रहा है। इस उसका प्रकार सम्पूर्ण जीवन ही क्षुद्रताओं व तुच्छताओं में बीत जाता है। जब थोड़ा-सा समय शेष रहता है, तब आँखें खुलती हैं।<br />मनुष्य अपने तुच्छ अहम् की तृप्ति के लिए, अपनी तुच्छ इच्छाओं व मनोकामनाओं को पूरा करने के लिए क्या उस अज्ञानी लकड़हारे की तरह अपने ही हाथों अपने ऊपर कुल्हाड़ी नहीं बरसाता रहता? प्रात: से सायं तक यह सारी की सारी मारा-मारी, जो वह कर रहा है, क्या उसके अपने हाथों अमूल्य जीवन की बलि नहीं चढ़ायी जा रही? <br />वास्तव में सामान्यत: व्यक्तिया तो जमीन-जायदाद, रुपया-पैसा, भवन-निर्माण इत्यादि वस्तु-संग्रह में लगा रहता है या फिर शब्द-स्पर्श-रूप-रसादि के विषय-सुख में डूब जाता है अथवा लोगों में अपनी पहचान बनाने के लिए महान् संघर्ष करता है। यह सब पाने के लिए उसे किसी का कितना भी दिल दुखाना पड़े, वह निरन्तर करता चला जाता है। वास्तव में क्या यह जीवन रूपी चन्दन-वन इन्हीं सब अत्यन्त सतही चीजों को पाने के लिए मिला है? मनुष्य क्या कभी इस बात को देख पाता है कि उसका मन किस प्रकार दूसरों का शोषण व हिंसा करने में जुटा रहता है ? प्रश्न उठता है कि हिंसा के द्वारा जो उसके मन को सुख मिलता है, क्या वह उसके लिए दु:ख के परिणाम में नहीं बदल जाता? <br />क्या इस अमूल्य जीवन की यही कृतार्थता है कि हम सब निरन्तर इन्हीं द्वन्द्वों में अर्थात् आन्तरिक व बाह्य संघर्ष में जीते रहें? वास्तव में इस सृष्टि का सर्वोत्कृष्ट प्राणी मनुष्य कभी यह इच्छा क्यों नहीं करता कि मैं आन्तरिक स्वतन्त्रता कैसे प्राप्त करुँ? कभी यह विचार क्यों नहीं करता है कि जीवन की धन्यता वस्तु संग्रह और भोग में नहीं है, बल्कि सेवा में या ज्ञान में और पूर्ण स्वाधीन होने में है? वह भय मुक्त जीवन जीने के उपायों को खोजने के लिए भी प्रयास नहीं करता। यदि यह सब नहीं कर रहा है तो क्या स्पष्ट ही इस जीवन रूपी चन्दन-वन को कोयला बनाकर सस्ते भाव बेचने-जैसा नहीं हो रहा और उस लकड़हारे की भाँति क्या उसे अन्त समय में रोना नहीं पड़ेगा? <br />बुद्धिमान् व्यक्ति को अवश्य ही अपनी जीवन-यात्रा की दिशा का बोध प्राप्त करना चाहिए, अन्यथा सिवाय रोने व पश्चात्ताप करने के उसके पल्ले कुछ भी नहीं पडऩे वाला। क्योंकि उस लकड़हारे की तरह ज्ञानहीन कर्म में लगा रहने वाला मनुष्य न तो पूर्ण है, न कर्महीन ज्ञानी। वास्तव में जरूरी है ज्ञान व कर्म के समन्वय की, तभी व्यक्तित्व उत्थान से राष्ट्र निर्माण की कामना सफल होगी और व्यक्ति भी स्वयं को सुखी अनुभव कर पायेगा। तो आइये हम सब ज्ञान और कर्म दोनों के आवाहक बनें। </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>सनातन वैभव</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Apr 2017 21:50:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
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                <title>दूसरों के लिए चादर फैलाने वाले दो संत, जो परमात्मा से पाते हैं परम आशीर्वाद व ऐश्वर्य</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">स्वामी सत्यमित्रानन्द जी महाराज</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2374/dursaron-ke-liye-chadar-failane-wale-do-sant-jo-parmatma-se-paate-hai-parama-ashirwad-v-ashvarya"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/11.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">शैव हो, शाक्त हो, जैनी हो, बौद्ध हो, स्वामी रामदेव के बिना काम चलने वाला नहीं है, इसलिए सब लोग इनके मार्गदर्शन में अपने जीवन को स्वस्थ बनायें। ये दोनों निष्काम सेवा की प्रतिमूर्ति हैं। पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज की एक बड़ी विशेषता है, जो दुनिया के लोग नहीं जानते कि इतना करोड़ों का काम होने के बाद, इतना उदय होने के बाद भी स्वामी जी महाराज की चैरिटी है, वो 100 प्रतिशत है। जो कुछ बचता है, वह पूरा 100 प्रतिशत गरीबों को बाँटते हैं। एक विद्यालय में जाकर उन्होनें 1 करोड़ रूपये दे दिए। जहाँ जाते हैं, वो केवल देखते नहीं, देते हैं। ये बड़ी अच्छी बात है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/11.jpg" alt="11"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;">मैं एक विशेष बात कहना चाहता हूँ कि हम लोगों के पास पैसा क्यों कम आता है? क्योंकि हमारे पास जेब है। और जिसके पास जेब होती है, उनके पास पैसा कम आता है, जिसके पास चादर होती है, उसके पास पैसा ज्यादा आता है। स्वामी रामदेव जी जेब मुक्त हैं। अर्थात् ये दोनों अपनी चादर चौबीसों घंटे दूसरों की सेवा के लिए फैलाकर रखते हैं और परमात्मा इन्हें देता चला जाता है। भगवान करे कि टाटा, बिरला आदि जितने धनपति लोग हैं, ये सब लोग इस संन्यासी के सामने प्रण करें कि हमनें आपकी औषधियाँ खाई, आपका यश सुना, आपसे योगासन सीखा फिर भी व्यापार में हम हार गये, क्योंकि हमारी मुठ्ठी बंद है। अत: अब लोक के लिए, राष्ट्र के लिए, विश्व के हित के लिए हम अपनी मुट्ठी खोल कर रखेंगे।<br />मैं एक बात अपने संदर्भ में कहता हूँ कि मेरा यह 501 कुण्डीय महायज्ञ निश्चित रूप से गंगा माँ ने स्वयं कराया, उसमें जरा भी मेरा कोई श्रेय नहीं। क्योंकि मैं निरंतर दो महीनों से अस्वस्थ हूँं। पर मेरे संदर्भ में इन संतों द्वारा जितने गुणों का वर्णन किया गया है। ये सब इन महात्माओं के भीतर हैं, इसलिए वो गुण मेरे भीतर इनको दिखाई पड़ रहे हैं। मैंने जीवन भर श्रेष्ठ गुणों के विकास के लिए प्रयत्न किया, पर मैं 85 वर्ष की आयु में पुन: एक बार परमात्मा से प्रार्थना कर रहा हूँ कि इन महात्माओं ने जो गुण बताये हैं, उसमें मेरा अधिक विकास हो। मेरा केवल परमात्मा का स्मरण करते हुए शेष समय व्यतीत हो। मेरा आप सबसे भी निवेदन है कि अपने-अपने घरों में आप सब जाओ तो नित्य दो मिनट गंगा जी का ध्यान करना और देखना की उनकी लहरें आ रही हैं। और फिर अपने-अपने भगवान् का ध्यान करना, निश्चित ही आपका ध्यान परिपक्व हो जायेगा। संसार छूटेगा। स्वर्ग सोपान संगे, करल तरंगे देवी गंगे प्रसीद, उठे तरल तरंग गंगा माता, प्रसन्न हो का भाव जगेगा।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/23.jpg" alt="23"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;">आप सब लोगों को एक बात और कहता हूँ कि मैं जीवन के जिस काल में पहुंचा हूँ, उसमें एक काम करते हुए पहुंचा हूँ, वह है प्रमाणिकता से निरंतर भगवान का नाम लेना और दूसरी बात भगवान का नाम लेने के साथ में संसार के जितने प्राणी हैं उन सबको प्रणाम करना। मैं नित्य आप जितने संत हैं उनको प्रणाम करता हूँ, आप जितने गृहस्थ हैं सबको प्रणाम करता हूँ, क्योंकि मेरे जीवन में केवल दो ही बातें शेष रही । एक भगवान का नाम और आप सबका प्रणाम, आपसे भी प्रार्थना करूँगा कि आप सभी गंगा को भगवान का स्वरूप मानना। <br />आज मुझे यहाँ बड़ा सुन्दर कलश दिया गया। मैंने सोचा इस कलश को लेकर मैं क्या करूंगा। मेरे आचार्य बालकृष्ण जी को खाली मानपत्र मिला। लेकिन मानपत्र तो टांग दिया जायेगा। इसलिए वो पूरा का पूरा कलश मैं पतंजलि पीठ को समर्पित करता हूँ, क्योंकि वहाँ सेवा में लगेगा। <br />एक बात याद रखिए कईं लोगों ने उत्तराधिकारी शब्द का प्रयोग किया। पूज्य स्वामी अवधेशानन्द मेरे सर्वाधिकारी हैं और अब मैं भी उनसें पूछ के काम करता हूँ। जब आप अपना दायित्व किसी को दें देते हैं, तो आपका अंहकार उसमें इतना गलित होना चाहिए कि उसमें आप बीच में न आयें। उस पर पूरा विश्वास करें, मुझे अपने सर्वाधिकारी जूना पीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानन्द पर इसी स्तर का विश्वास है। ये मेरा इतना आदर करते हैं। मैं उनकी सेवा से अपने को अभिभूत अनुभव करता हूँ और सोचता हूँ कि मेरे ऊपर कहीं ये ऋण तो नहीं चढ़ रहा। मेरे पूर्व जन्म का यह पुण्य होगा, या मैंने बचपन से जो गंगा का स्नान किया और भगवान का नाम लिया, उसका प्रतिफल व परिणाम होगा। राम नाम कलि अभिमत दाता, हित परलोक लोक पित माता। मेरे जीवन में इस चौपाई की सिद्धि हुई। लोक में सब मिल रहा है, परलोक का निर्माण हो रहा है, क्योंकि अब वस्तु से आसक्ति कम होती जा रही है। भारत माता मन्दिर की व्यवस्था कभी देखने जाता नहीं हूँ, मेरे सर्वाधिकारी इतने योग्य हैं कि हम वहाँ आवें या न आवें, क्योंकि सूर्य हर जगह नहीं जाता सूर्य की किरणें हर जगह जाती हैं, मुझे विश्वास है उनका। उनका आत्मविश्वास मेरे लिए बड़े गौरव की बात है।<br />शायद मेरा नाम अब गिनीज बुक में आ जाये। क्योंकि अवधेशानन्द जी महाराज के 5 लाख शिष्य हैं वो सब मुझे दादा गुरू कहते हैं, तो दुनियाँ का सबसे बड़ा पितामह अगर कोई है तो वह सत्यामित्रानन्द हैं।<br />40 वर्ष पहले मैं सौराष्ट्र में गया, तो वहाँ हनुमान जी की एक मूर्ति देखी लंगड़े हनुमान। मैंने हनुमान जी से कहा महाराज रावण को लातें मारी, मेघनाथ को मारी, राक्षसों को मारी, पर आप लंगड़े हनुमान हो गये, मैंने प्रणाम तो किया, लेकिन अंत: आस्वस्ति कम थी। मन में ऐसा हुआ कि हनुमान जी भी लंगड़े हो गये हैं?<br />तब उन्होनें कहा कि बेटा जब 85 वर्ष का होगा तब तू भी लंगड़ा स्वामी होगा। आज हम बड़े मजे में लंगड़ेपन का आंनद ले रहे हैं।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/24.jpg" alt="24"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;">आपसे निवेदन है कि घर जाकर के रोना नहीं उदास मत होना। अकेले बैठ के खूब हंसना। कोई न मिले तो अपना चेहरा मिरर में देख कर किसी अपने दोस्त का मिमिकरी करना, हंसी अपने आप आ जायेगी। हंसना तुम्हारा धर्म है, भगवान को भूलना नहीं, भारत को भुलाना नहीं। राष्ट्र को उन्नति की ओर ले जाना। हमारे आचार्य अवधेशानन्द जी महाराज, ये तो निरंतर आकाश में सूर्य की भांति आगे बढऩे वाले हैं, क्योंकि उनके मित्र आचार्य रामदेव जी महाराज और आचार्य बालकृष्ण जी जो हैं। मैं मानता हूँ कि पतंजलि ही भारत माता है और जो भारत माता है, वो पूरी पतंजलि है। अत: दोनों को एकाकार स्वरूप में देखना। ज्ञान, योग, भक्ति, कर्म का यह एकीकरण राष्ट्र व लोक दोनों को सशक्त बनायेंगे, ऐसा मेरा विश्वास है। </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>सनातन वैभव</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Apr 2017 21:49:35 +0530</pubDate>
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                <title>योगऋषि की प्रमुख ताकतें हैं सरलता सहजता व शुद्धता </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">रजत शर्मा, चेयरमैन-इण्डिया टीवी</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2375/yog-rishi-ki-pramukh-takate-hai-saralta--sahajta-va-shudhata"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/53.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">योग ऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज, श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी, श्री अरुण जेटली जी व अन्य महानुभावों के साथ आज मैंने जो योगग्राम का नया स्वरूप देखा है, उसे देखकर मुझे बहुत गर्व हुआ। मैंने विदेश में, ऑस्ट्रिया में, जर्मनी में ऐसे बहुत सारे केन्द्र देखें हैं, जहाँ इस तरह की सुविधाएं होती हैं और मैं आप से कह सकता हूँ कि जो योगग्राम की सुविधाएं और योगग्राम में चिकित्सा के तरीके आज मैंने देखें हैं, वो उन सबसे कहीं बेहतर हैं। कुछ समय पहले मुझे ऑस्ट्रिया में एक ऐसे चिकित्सा केन्द्र में जाने का मौका मिला था, और जब आचार्य बालकृष्ण जी को यह पता चला, तो उन्होंने कहा था कि मैं इसे चुनौती के तौर पर स्वीकार करता हूँ। हम ऐसा केन्द्र बनायेंगे कि इस चिकित्सा के लिए आप कभी विदेश नहीं जायेंगे। चुनौती उन्होंने स्वीकार की और आज उसको पूरा कर लिया। मैं अपनी आँखों से इसे देख रहा हूँ। मैंने उन्हें इस बात का वादा किया है कि जब भी समय मिलेगा, मैं यहाँ आकर के इस योगग्राम में रहूंगा। कुछ दिन स्वास्थ्य लाभ के लिए योगग्राम का अनुशासन पालन करूंगा। मैं स्वामी जी के बारे में क्या कहूं, स्वामी जी ने देशभर में योग का जिस तरह से प्रचार-प्रसार किया, पूरी दुनिया में आयुर्वेद का प्रचार-प्रसार किया और बड़ी सरलता व सहजता से आज स्वदेशी का प्रचार कर रहे हैं। उनके इस अभियान की ताकत उनकी शुद्धता है। सरलता, सहजता, शुद्धता ये तीन स्वामी रामदेव के ऐसे गुण हैं, जिनका पूरे देश में क्या, पूरी दुनिया में कोई मुकाबला नहीं हैं। मेरी उनको बहुत-बहुत शुभकामनाएं हैं। स्वदेशी के अभियान में, आयुर्वेद के अभियान में, योग के अभियान में वो सफल हों, देश को, दुनिया को श्रेष्ठ मार्ग दिखाएँ, आशीर्वाद दें, यही मेरी कामना है। </h5>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/55.jpg" alt="55"></img></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
                                            <category>संस्था समाचार</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Apr 2017 21:46:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वैज्ञानिक एवं खगोल सम्मत है भारतीय काल गणना</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">विजय सिंह माली, प्रधानाचार्य रा.आ.उ.मा.वि. मगरतलाव (पाली)</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2376/vaigyanic-evm-khagol-sammat-hai-bharatiya-kal-gadna"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/04.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><strong>चैत्र शुक्ला प्रतिपदा (29 मार्च) से युगाब्द 5119, विक्रम संवत 2074 तथा शालिवाहन शक संवत 1939 का शुभारम्भ हुआ। अंग्रेजों के भारत में आने के पहले भारतीय जनसमुदाय इन्ही संवतो को मानता था। समाज की व्यवस्था थी ऐसी कि बिना किसी प्रचार के हर व्यक्ति को  तिथि, मास व वर्ष का ज्ञान हो जाता था। समाज की सम्पूर्ण गतिविधियाँ भारतीय कालगणना अनुसार बिना किसी कठिनाई के सहज रूप से संचालित होती थीं। आज भी समाज का बड़ा हिस्सा भारतीय तिथि क्रम के अनुसार ही अपने कार्यकलाप चलाता है। भारतीय गुरुकुल परम्परा का संचालन इसी पद्धति पर निर्भर है। पाश्चात्य कालगणना अर्थात ग्रेगेरियन कैलेण्डर की व्यापक घुसपैठ के बाद भी भारतीय कैलेण्डर का महत्व कम नहीं हुआ है।</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">पाश्चात्य कालगणना मैकाले प्रणीत शिक्षा प्रणाली के कारण हमारी जुबान पर भले ही हो, पर यह न तो सटीक वैज्ञानिक है, न ही पाश्चात्य कालगणना का प्रकृति से कोई सम्बन्ध है। इसका प्रारम्भ रोम में हुआ। पाश्चात्य कालगणना के आधार पर वर्तमान प्रचलित कैलेण्डर में सब कुछ अनेक बार बदला जा चुका है। वहाँ पर कभी घडिय़ों को पीछे किया गया, तो कभी वर्ष के मास 10 से 12 किए गए। कभी 3 सितम्बर को 14 सितम्बर किया गया, तो कभी वर्ष को 304 दिन से बढ़ाकर 360 और 365 दिन किये गये। इतना ही नहीं उनके मास आज भी 28, 29, 30 व 31 दिन के होते हैं। इन सब विसंगतियों का कारण पाश्चात्य कालगणना का कोई वैज्ञानिक आधार न होना है। वे माह की गणना चन्द्र की गति से करते हैं और वर्ष की गणना का आधार है सूर्य की गति। इसलिए 1 जनवरी , 25 दिसम्बर या 31 दिन को हर वर्ष सूर्य व चन्द्र की स्थिति एक ही होगी यह तय नहीं हैं। पहले 10 माह, फिर जुलाई, बाद में अगस्त माह जोड़कर बारह माह करना, पहले अपै्रल से वर्ष प्रारम्भ करना, फिर 1 जनवरी से प्रारम्भ करना, फरवरी को चौथे वर्ष 29 दिन का मानना जैसे कई संशोधन करने के बाद भी इस काल गणना में आज भी त्रुटियां हैं। अब भी पृथ्वी के परिभ्रमण समय तथा ग्रेगेरी वर्ष में अन्तर आता रहता है, इसलिए घडिय़ों को कुछ सेकण्ड आगे या पीछे करना पडता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/76.jpg" alt="76"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;">जबकि भारतीय कालगणना में सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर अब तक सेकण्ड के सौवें भाग का भी अन्तर नहीं आया है। भारत में प्राचीन काल से मुख्य रूप से सौर तथा चन्द्र कालगणना व्यवहार में लाई जाती है। इसका संबंध सूर्य और चन्द्रमा से है। ज्योतिष के प्राचीन ग्रन्थ सूर्य सिद्धान्त के अनुसार पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाने में 365 दिन 15 घटी, 31 पल, 31 विपल तथा 24 प्रतिविपल (365.258756484 दिन) का समय लेती है। यही वर्ष का कालमान है और भारतीय वैज्ञानिकों ने इसी क्रम में वर्ष, महीने, दिन के साथ समय की अन्य इकाइयों की खोज की। </h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>गणना की वैज्ञानिकता</strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;">महर्षि भाकु के अनुसार 2 परमाणु = 1 अणु, 3 अणु = 1 त्रसरेणु , 3 त्रसरेणु = 1 त्रुटि , 100 त्रुटि  = 1 वेध , 3 वेध = 1 लव, 3 लव = 1 निमेष , 3 निमेष = 1 क्षण, 5 क्षण = 1 काष्ठ , 30 काष्ठ = 1 कला , 15 काष्ठ = 1 लघु , 15 लघु = 1 नाडिका , 2 नाडिका = 1 मुर्हूत , 30 मुर्हूत = एक दिन-रात, 7 दिन-रात = 1 सप्ताह , 2 सप्ताह = 1 पक्ष , 1 पक्ष = 1 मास , 2 मास = 1 ऋतु , 3 ऋतु = 1 अयन , 2 अयन = 1 वर्ष होता है। महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने आज से 1400 वर्ष पूर्व लिखे अपने ग्रंथ में समय की भारतीय इकाइयों का विशद विवेचन किया। ये इकाइयॉ इस प्रकार हैं-</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>225 त्रुटि = 1 प्रतिविपल </strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>60 प्रतिविपल = 1 विपल (0.4 सेकण्ड)</strong><br /><strong>60 विपल = 1 पल (24 सेकण्ड)</strong><br /><strong>60 पल = 1 घटी (24 मिनट)</strong><br /><strong>2.5 घटी = 1 होरा (1 घंटा)</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>5 घटी या 2 होरा = 1 लग्न (2 घंटे)</strong><br /><strong>60 घटी = 24 होरा = 12 लग्न = 1 दिन (24 घंटे)</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">स्पष्ट है कि एक विपल आज के 0.4 सेकण्ड के बराबर है तथा त्रुटि का मान सेकण्ड का 33,750 वां भाग है। इसी तरह लग्न का आधा भाग जो होरा कहलाता है , एक घंटे के बराबर है। इसी होरा से अंग्रेजी में हॉवर बना।<br />इसी तरह एक दिन में 24 होरा हुए। सृष्टि का प्रारम्भ चैत्र शुक्ल 1 रविवार के दिन हुआ। इस दिन से पहले होरा का स्वामी सूर्य था, उसके बाद के दिन के होरा का स्वामी चन्द्रमा था, इसलिए रविवार के बाद सोमवार आया। इसी तरह सातों वारों के नाम सात ग्रहों पर पड़े। पूरी दुनिया में सप्ताह के सात वारों के नाम समान रूप से प्रचलित हैं। हमारे यहाँ समय की सबसे बडी इकाई कल्प को माना गया। एक कल्प में 432 करोड़ वर्ष होते हैं। <br />1 कल्प = 1000 चतुर्युग या 14 मन्वन्तर<br />1 मन्वन्तर = 71 चतुर्युगी<br />1 चतुर्युग = 43,20,000 वर्ष</h5>
<h5 style="text-align:justify;">कलयुग की अवधि 4,32,000 वर्ष , द्वापर युग की अवधि 8,64,000 वर्ष, त्रैतायुग की अवधि 12,96,000 तथा सतयुग की अवधि 17,28,000 वर्ष है। इस समय श्वेत वाराह कल्प चल रहा है , जिसका 7 वां मन्वन्तर वैवस्वत के 71 चतुर्युगी में से 27 बीत चुके हैं तथा 28 वीं चतुर्युगी के भी सतयुग, त्रेता तथा द्वापर बीत कर कलयुग का 5119 वां वर्ष प्रतिपदा को शुरू हो चुकी है अर्थात श्वेतवराह कल्प में 1,97,29,49,118 वर्ष बीत चुके है अर्थात सृष्टि का प्रारंभ हुए लगभग 2 अरब वर्ष हो गए हैं। आज के वैज्ञानिक भी पृथ्वी की आयु 2 अरब वर्ष बताते हैं। दूसरे कुछ विद्वानों की काल गणना के अनुसार सृष्टि के 01 अरब 96 लाख 53 हजार 117 वर्ष बीत चुके और अभी 118 वां वर्ष प्रारम्भ होने जा रहा है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>सूर्य और चन्द्र महत्त्वपूर्ण क्यों?</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">भारतीय कालगणना खगोल सम्मत व वैज्ञानिक है। आकाश में 27 नक्षत्र हैं, इनके 108 पाद होते हैं। विभिन्न अवसरों पर 9-9 पाद मिलकर 12 राशियों की आवृति बनाते हैं। इन राशियों के नाम <strong>मेष , वृष , मिथुन , कर्क , सिह , कन्या , तुला, वृश्चिक , धनु , मकर , कुम्भ और मीन</strong> हैं। सूर्य जिस समय जिस राशि में स्थित होता है, वही कालखंड सौर मास कहलाता है। वर्ष भर में सूर्य प्रत्येक राशि में एक माह तक रहता है, अत: सौर वर्ष के 12 महिनों के नाम उपरोक्त राशियों के अनुसार होते हैं। जिस दिन सूर्य जिस राशि में प्रवेश करता है, वह दिन उस राशि का संक्रान्ति दिन माना जाता है। इसी प्रकार चन्द्रमा पृथ्वी का चक्कर जितने समय में लगा लेता है वह चन्द्र मास कहलाता हैं। चन्द्रमा की गति के अनुसार तय किए गए महीनों की अवधि नक्षत्रों की स्थिति के अनुसार कम या अधिक भी होती है। जिस नक्षत्र में चन्द्रमा बढ़ते-बढ़ते पूर्णता को प्राप्त होता है, उस नक्षत्र के नाम पर चन्द्र वर्ष के महिनों का नाम करण किया गया है। एक वर्ष में चन्द्रमा<strong> चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, आषाढ, श्रवण, भाद्रपदा, आश्विन, कृतिका, मृगशिरा, पुष्य, मघा और फाल्गुनी</strong> नक्षत्रों में पूर्णता को प्राप्त होता है, इसलिए चन्द्र वर्ष के महिनों का नाम <strong>चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन</strong> रखे गए हैं। मास के जिस हिस्से में चन्द्रमा घटता है, उसे कृष्ण पक्ष व बढऩे वाले को शुक्ल पक्ष कहा जाता है। चन्द्रमा के 12 महीनों का वर्ष सौर वर्ष से 11 दिन, 3 घटी व 48 पल छोटा होता है। सामंजस्य बनायें रखने के लिए 32 महिने, 16 दिन, 4 घटी के बाद एक चन्द्र मास की वृद्वि मानी जाती है, यहीं अधिक मास है। तीन साल में एक साल ऐसा अवश्य होता है कि दो अमावस्या के बीच में सूर्य की कोई संक्रान्ति नहीं पड़ती, वही मास बढ़ा हुआ माना जाता है। इसी प्रकार 140 से 190 वर्षों में एक ही चन्द्र मास में 2 संक्रान्ति आती हैं, वह महीना कम हुआ माना जाता है। सौर वर्ष में इस प्रकार सामंजस्य बनता है। जबकि पाश्चात्य कालगणना में इसका अभाव है।</h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>भारतीय त्यौहार परम्परा:</strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;">प्रत्येक भारतीय त्यौहार चन्द्र या सूर्य की गति का अवलोकन व गणना कर के निर्धारित होता है। जैसे राखी और होली पूर्णिमा को आएगी और पूरा चन्द्रमा दिखेगा। कृष्ण जन्म अष्टमी को, तो राम जन्म नवमी को मनेगा और दीपावली अमावस्या को ही होगी। मकर संक्रमण पर अयन का परिवर्तन होता है। किस वर्ष में कुम्भ कहाँ होगा, सूर्य और चन्द्र ग्रहण कब आएंगे, होली-दीपावली का वार किस वर्ष में कौन सा होगा। यह भारतीय कालगणना के आधार पर सहज ही जाना जा सकता है। ऐसे में सचमुच हमारी कालगणना ग्रहों-नक्षत्रों की गति पर आधारित होने से वैज्ञानिक एवं खगोल सम्मत है। जबकि पाश्चात्य कालगणना में इसका पूर्णतया अभाव है। <br />भारतीय विद्वान रचित हिमाद्रि ग्रंथ के अनुसार -</h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">चैत्र मासे जगद ब्रह्य संसर्ज प्रथमेऽह्वि</span></strong><br /><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">शुक्ल पक्षे समग्रन्तु , तदा सूर्योदये सति।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">अर्थात् चैत्र मास शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन सूर्योदय के समय ब्रह्माजी ने जगत् की रचना की। सृष्टि इसी दिन से शुरू हुई। यह सृष्टि के प्रारंभ का दिन है। कलयुग संवत ईसा से 3102 वर्ष पूर्व प्रारंभ हुआ। महान् खगोलविद् आर्यभट्ट ने कहा जब वे 23 वर्ष के थे, तब कलयुग के 3600 वर्ष व्यतीत हो चुके थे। उन्होने शुद्ध कालगणना कर सिद्ध किया कि चैत्र शुक्ला प्रतिपदा को ही सृष्टि व कलयुग का प्रारम्भ हुआ। भास्कराचार्य ने भी अपने ब्रह्मस्फुट सिद्धांत ग्रंथ में सृष्टि प्रारंभ का दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही माना है। अत: वर्ष प्रतिपदा सम्पूर्ण विश्व व मानवीय सृष्टि का संवत्सर है। इसी दिन मर्यादा पुरुषोतम भगवान श्री राम का राज्याभिषेक, वरूण अवतार प्रभु झुलेलाल का जन्म दिन, महाराजा युधिष्ठिर द्वारा प्रारंभ संवत् का प्रथम दिन, वीर विक्रमादित्य की विजय की स्मृति स्वरूप प्रारंभ विक्रम संवत् का प्रथम दिन, पराक्रमी सम्राट शालिवाहन की स्मृति में प्रारंभ शक शालिवाहन संवत् का प्रथम दिन, स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा आर्यसमाज की स्थापना का दिन, विश्व के सबसे बडे स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक परम पूज्य डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार का जन्म दिन है। न्यायशास्त्र के प्रणेता महर्षि गौतम की जयन्ती भी इसी दिन है। आइये समस्त राष्ट्रवासी योगाभ्यास करके नव वर्ष का स्वागत करें।<br />सचमुच भारतीय कालगणना हमारी महान् ऐतिहासिक गौरवशाली विरासत का परिचायक है। हमें वर्ष प्रतिपदा को भव्य रूप में मनाकर भारतीय कालगणना के प्रति अपनी आस्था और श्रद्धा प्रकट करनी चाहिए। भारतीय काल गणना को वैश्विक विरासत का दर्जा दिलाने के लिए सयुक्त राष्ट्रसंघ तथा यूनेस्को जैसे मंचो से आह्वान भी करना चाहिए। जिससे भारत की वैज्ञानिकता वैश्विक बने और भारत देश को विश्वगुरु होने का मार्ग प्रशस्त हो सके। </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>सनातन वैभव</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Apr 2017 21:44:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हार्ट सर्जरी के उपरांत चमत्कारिक सिद्ध हुआ प्राणायाम व पतंजलि आयुर्वेद </title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;">बाबा जी अक्टूबर, 2014 में मुझे हार्ट संबंधी परेशानी हुई थी। छाती के बाईं ओर अचानक तेज दर्द हुआ और मैं पसीने से लतपथ हो गया था। घबराहट व दर्द इतना तेज था कि मुझे लगा कब जान निकल जाये पता नहीं। तुरन्त शौरबीटे्रट टेबलेट (जीभ के नीचे रखने वाली) ली, तो आराम मिल गया। <br />दूसरे दिन अपने डॉक्टर से परामर्श किया, तो उन्होंने एन्जियोग्राफी की सलाह दी एवं मैंने (Angiography) करायी। तीन ब्लॉकेज निकले। पहला ब्लॉकेज ८०त्न, दूसरा 70-80%  एवं तीसरा 50% का था, तदोपरान्त 30 अक्टूबर 2014 को asian heart institute bkc mumbai में मेरी बाई-पास सर्जरी हुई।</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2377/heart-sergory-ke-uprant-chamatkarik-siddh-huwa-pranayam-va-patanjali-ayurved"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/78.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">बाबा जी अक्टूबर, 2014 में मुझे हार्ट संबंधी परेशानी हुई थी। छाती के बाईं ओर अचानक तेज दर्द हुआ और मैं पसीने से लतपथ हो गया था। घबराहट व दर्द इतना तेज था कि मुझे लगा कब जान निकल जाये पता नहीं। तुरन्त शौरबीटे्रट टेबलेट (जीभ के नीचे रखने वाली) ली, तो आराम मिल गया। <br />दूसरे दिन अपने डॉक्टर से परामर्श किया, तो उन्होंने एन्जियोग्राफी की सलाह दी एवं मैंने (Angiography) करायी। तीन ब्लॉकेज निकले। पहला ब्लॉकेज ८०त्न, दूसरा 70-80%  एवं तीसरा 50% का था, तदोपरान्त 30 अक्टूबर 2014 को asian heart institute bkc mumbai में मेरी बाई-पास सर्जरी हुई। सर्जरी के काफी दिनों पहले से ही मैं सुबह उठते ही दो गिलास गुनगुना पानी दो चम्मच शहद के साथ सेवन करता था। बाद में शहद की जगह दो बड़े चम्मच ऑवला रस गरम पानी से लेने लगा, यह नियम आज भी जारी है। <br />सर्जरी के बाद 30-35 मिनट सुबह की सैर, प्राणायाम एवं खानपान को लेकर मैं पहले से ज्यादा अनुशासित हो गया। वैसे भी योग-प्राणायाम से मैं 20-25 वर्षों से जुड़ा हू। सर्जरी के बाद asian heart institute bkc mumbai ने अपने डिस्चार्ज टिकट में लिखा था कि 2 साल में आपको c.t. angiography भी करानी है। अत: 27 नवम्बर 2016 को अपोलो अस्पताल, नवी मुम्बई में c.t. angiography कराई। c.t. angiography से ज्ञात हुआ कि जिस आर्टरीज में सबसे बडा़ ब्लॉकेज था, उस आर्टरीज से अब अच्छी मात्रा में रक्त प्रवाह हो रहा है और जो natural blocked artriz थी उस जगह डाक्टर ने नई आर्टीफिशयल आर्टरीज डाली थी, वह अब सिकुड़ गई, उसमें से रक्त का प्रवाह बन्द हो गया है। अर्थात natural blocked artriz (जो ब्लॉक हो गई थी) अब वह खुल गई है, उसमें रक्त प्रवाह अच्छा हो रहा है, इसलिए आर्टीफिशियल आर्टरीज अपने आप बन्द हो गई है।<br />अपोलो अस्पताल के चिकित्सक इस आश्चर्य जनक परिणाम से अचम्भित व थोड़ा संशय में थे कि ऐसे कैसे हो सकता है? इस चमत्कारिक परिणाम से मैं स्वयं व मेरा परिवार भी आश्चर्यचकित है। अपोलो अस्पताल को शंका थी कि जो रिजल्ट सामने आया है, वह सही है या नहीं। इस शंका को निर्मूल करने हेतु उन्होंने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि यह जो आश्चर्यजनक बदलाव दिख रहे हैं, इसे cath angiography से ही सुनिश्चित किया जा सकता है।<br />अत: जिस एशियन हार्ट अस्पताल, मुम्बई में 30 अक्टूबर 2014 को मेरी प्रथम angiography और फिर बाद में बाई-पास सर्जरी हुई थी, उसी अस्पताल में दिनांक 31-12-2016 को मैंने cath angiography कराई। cath angiography होने के उपरान्त वही आश्चर्यजनक रिजल्ट, वही परिणाम, वही बदलाव निकलकर सामने आये, जो मैं ऊपर लिख चुका हूँ। एशियन हार्ट अस्पताल, मुम्बई के डाक्टर्स की टीम भी मेरी रिपोर्ट देखकर अचम्भित हैं। उनका कहना है कि यह अनोखा, आश्चर्यजनक एवं सुखद केस (रिपोर्ट) है। <br />बाबा जी जो भी परिणाम सामने आये हैं, निश्चित ही इसमें ईश्वर की महान कृपा है, पर साथ-साथ मैं इसका पूरा श्रेय आपको एवं आपके द्वारा बताये एवं सिखाये गये प्राणायाम तथा पतंजलि के आयुर्वेद उत्पाद को देता हूँ। मैं पुन: दोहराता  हूँ कि मेरे heart function में जो भी बदलाव आये हैं, उसका पूरा श्रेय आपके योग, प्राणायाम व आयुर्वेद अभियान का है। इस जीवन दान के बाद अब एक ही इच्छा शेष रह गयी कि  बाबा जी मैं आपके मिशन के कुछ काम आ सकू, यह मेरा सौभाग्य होगा। <br />                             </h5>
<h5 style="text-align:right;">  <strong>आपका शिष्य </strong><br /><strong>खूब चन्द, के.सी. वैश्य, पुराना सुभाष नगर, भोपाल, म.प्र.</strong></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>दिव्य अनुभूति</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Apr 2017 21:43:03 +0530</pubDate>
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