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                <title>जुलाई - योग संदेश</title>
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                            <item>
                <title>शाश्वत प्रज्ञा योग संदेश 2017 मई श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...</title>
                                    <description><![CDATA[<h4 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> की उपयोगिता</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">      योग</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> इस एक शब्द में पिण्ड व ब्रहमाण्ड के सम्पूर्ण सत्यों का समावेश है। बस आवश्यकता है योग के समग्र सत्यक को समझने और उसके अनुसार जीने की। किसी भी सत्य को यदि हम समग्र रूप से नहीं समझते तो हम सत्य से आंशिक या पूर्ण रूप से वंचित रह जाते हैं। योग के वैयक्तिक एवं वैश्विक सत्यों की ओर आज विश्व के प्रामाणिक व जिम्मेदार शिखर पुरुषों को गंभीरता पूर्वक विचार करना ही चाहिए। जब हम योग के वैयक्तिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारिवारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनैतिक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> व आध्यात्मिक लाभों व सत्यों का पूरी ईमानदारी के</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2452/shashwat-pragya-july-2017"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/451.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> की उपयोगिता</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   योग</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> इस एक शब्द में पिण्ड व ब्रहमाण्ड के सम्पूर्ण सत्यों का समावेश है। बस आवश्यकता है योग के समग्र सत्यक को समझने और उसके अनुसार जीने की। किसी भी सत्य को यदि हम समग्र रूप से नहीं समझते तो हम सत्य से आंशिक या पूर्ण रूप से वंचित रह जाते हैं। योग के वैयक्तिक एवं वैश्विक सत्यों की ओर आज विश्व के प्रामाणिक व जिम्मेदार शिखर पुरुषों को गंभीरता पूर्वक विचार करना ही चाहिए। जब हम योग के वैयक्तिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारिवारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनैतिक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> व आध्यात्मिक लाभों व सत्यों का पूरी ईमानदारी के साथ मूल्यांकन करेंगे तो हम स्वयं व समष्टि के योगी होने में गौरव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सौभाग्य</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> व लाभ अनुभव करेंगे। योग मानवीय चेतना का मूल स्वभाव</span> ‘<span lang="hi" xml:lang="hi">स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते</span> 8/3 (<span lang="hi" xml:lang="hi">गीता</span>) <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> अन्तिम लक्ष्य</span>-<span lang="hi" xml:lang="hi">ध्येय</span>-<span lang="hi" xml:lang="hi">गन्तव्य</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> और जीवन की पूर्णता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रकृति या परमेश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना है और मनुष्य के पिण्ड में ब्रहमाण्ड की बीज रूप् में जो सम्पूर्ण ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवदेना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामर्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुख</span>-<span lang="hi" xml:lang="hi">शान्ति</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> व आनन्द सन्निहित है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> पूर्ण प्रकटीकरण व जागरण केवल योग विद्या एवं योगाभ्यास से ही संभव है। आज विश्व समुदाय के सम्मुख सबसे बड़ी चुनौतियां हैं हिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपराध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आतंकवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नशा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रष्ट</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> आचरण व भ्रष्टाचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> धाराओं का चरम संघर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमानवीय</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> असमानता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वार्थपरता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहंकार</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> एवं अकर्मण्यता और इन सबका एक मात्र समाधान है योग विद्या</span>-<span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यात्म</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> विद्या का समग्र बोध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> का नियमित अभ्यास एवं योगमय दिव्य श्रेष्ठ आचरण। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एकत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहअस्तित्व</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> एवं बंन्धुत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्ध</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्ध</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> कर्म एवं शुद्ध उपासना। ज्ञानयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्मयोग</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> एवं भक्तियोग। तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वाध्याय</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> एवं ईश्वर प्रणिधान। व्रत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दीक्षा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> एवं श्रद्धा। प्रार्थना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> एवं परमार्थ ये योग के मूलभूत सिद्धान्त हैं। इसके विपरीत अज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अश्रद्धा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> एवं अकर्मण्यता ये योग के सबसे बड़े बाधक तत्व हैं। यम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> एवं ध्यान का संतुलित व नियमित सही अभ्यास तथा योग विद्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यात्म</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> विद्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तत्व</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपराविद्या</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> व पराविद्या के द्वारा जब हमारा मस्तिष्क ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कला</span>-<span lang="hi" xml:lang="hi">कौशल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ह्दय</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> श्रद्धा</span>-<span lang="hi" xml:lang="hi">भक्ति</span>-<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम</span>-<span lang="hi" xml:lang="hi">करूणा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> व वात्सल्य से तथा पूरा अस्तित्व अखंड़</span>-<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रचंड़</span>-<span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परमार्थ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> साधना सेवा व निष्काम दिव्य कम से प्रकाशित हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> हम सच्चे योगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> निरोगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्मयोगी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> व पूरी मानवता या समष्टि के लिए पूर्ण उपयोगी बन जाते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पूरे</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> जीवन को एक शब्द में कहें या परिभाषित करें तो वह है अभ्यास। जैसे हमारे सोचने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचारने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कमाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बोलने</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> व जीने के अभ्यास होते हैं वैसा ही हमारा जीवन हो जाता है। एक योग के प्रतिदिन के अभ्यास से हमारे जीवन के सभी अभ्यास श्रेष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिष्कृत</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> व दिव्य हो जाते हैं। अतः नियमित योगाभ्यास ही एक स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफल</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> व सुखी आदर्श जीवन का आधार है। जीवन को दो शब्दों में कहें तो</span> - <span lang="hi" xml:lang="hi">दृष्टि</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> व आचरण। योगी की दृष्टि भी बहुत ऊँची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सात्विक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पवित्र</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> व श्रेष्ठ होता है। दृष्टि व आचरण की शुद्धता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रेष्ठता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पवित्रता</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> व दिव्यता ही जीवन का अन्तिम लक्ष्य है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-11/july-2017-1.jpg" alt="july 2017 1"></img></span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-11/july-2017-2.jpg" alt="july 2017 2"></img></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शाश्वत प्रज्ञा</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Jul 2017 21:59:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अन्तर्द्वन्द्व</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">आचार्य  </span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">बालकृष्ण</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2453/antardvand"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/066.jpg" alt=""></a><br /><table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#c2e0f4;border-color:#C2E0F4;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(194,224,244);">
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">    <span style="color:rgb(52,73,94);"> ह</span></span><span style="color:rgb(52,73,94);"><span lang="hi" xml:lang="hi">र समय व्यक्ति के मन में उधेड़बुन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कनफ्युज़न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संशय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उलझन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सन्देह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गफलत या अन्तर्द्वन्द्व चलता रहता है और व्यक्ति विचारों के विकारों की भीड़ के बीहड़ में ऐसा खो जाता है कि कभी-कभी तो स्वयं से भी कहीं बहुत दूर चला जाता है। स्वयं से जब दूर चला जाता है तो फिर स्वकर्त्तव्य से भी दूर हो जाता है। आत्मविस्मृति से आत्मग्लानि व आत्मघात तक का शिकार हो जाता है। इन अन्तर्द्वन्द्वों पर विजय पाना यही तप है। तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वाध्याय एवं ईश्वर प्रणिधान यही क्रिया योग है। जो भी जीवन को सुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफलता व शान्ति पूर्वक जीना चाहते हैं। उनसे निवेदन व आह्वान करते हैं कि वे इन अन्तर्द्वन्द्वों या भ्रान्तियों से स्वयं को बाहर निकालें या उबारें।</span></span></strong></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>01: <span lang="hi" xml:lang="hi">पछतावा</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अधिकांश व्यक्तियों के मन में एक बात बार-बार उठती है कि मैंने अपने जीवन के उस समय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमुक काम-पढ़ाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संघर्ष व साहस आदि में खुद को क्यों नहीं लगाया तथा अमुक समय मैंने ये बुरा काम क्यों कर दिया। निष्कर्ष के रूप में अच्छा न करने तथा बुरे कामों को करने का मलाल सामान्यत: अन्तिम श्वास तक बना रहता है। अत: अच्छे कार्य योगाभ्यास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वाध्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दान व पुण्यादि करने में हम एक बार भी प्रमाद न करें तथा एक बार भी किसी भी प्रकार का अशुभ आचरण न करें।</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>02: <span lang="hi" xml:lang="hi">अपूर्णता</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हम स्वयं से स्वयं का मूल्यांकन नहीं कर पाते और परिणामत: स्वयं में समाहित अनन्त ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामर्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्ति व आनन्द से कहीं वंचित से रहकर अपने भीतर एक अपूर्णता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधूरापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यूनता या अल्पता को अनुभव करते रहते हैं और बाहर के व्यक्तियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तुओं व परिस्थितियों से स्वयं को पूरा करने का भ्रान्त प्रयास करते हुए बाहर के सुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफलता व सम्बन्धादि की अविवेक पूर्ण दौड़ में सम्मिलित होकर कहीं जीवन की सही दिशा से भटक जाते हैं। इसलिए ऋषियों ने बार-बार कहा- </span><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मा वा अरे द्रष्टव्य:  श्रोतेव्य: मन्तव्य:</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओं-पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।</span></strong></span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने भीतर एवं बाहर स्वयं में तथा समष्टि में पूर्णता अनुभव करो। पूर्ण ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण निष्ठा व पूर्ण पुरुषार्थ से समष्टि के प्रति पूर्ण कृतज्ञता का भाव रखते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण सहजता के साथ अपने स्वधर्म का पालन करो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यात्म व जीवन का पूर्ण सत्य है। </span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>03: <span lang="hi" xml:lang="hi">अव्यवस्था</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अधिकतर लोगों के जीवन में बाह्य व आन्तरिक रूप से एक अव्यवस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्त-व्यस्तता उल्टा-पुल्टा काम चलता रहता है। सोने-जागने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगाभ्यास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शौच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्नान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मचिंतन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आहारचर्या एवं दिनचर्या का कोई प्रबन्धन नहीं होता। जीवन प्रबन्धन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय प्रबन्धन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवसाय प्रबन्धन एवं आत्म प्रबन्धन के बिना जीवन में सुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफलता व शान्ति सम्भव ही नहीं है। २४ घंटे का दिन तथा चन्द दिनों का जीवन अनन्त कार्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनन्त ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनन्त असीमित संभावनाएं हमारे सामने होती हैं। हमें अपनी प्राथमिकताएं तय करके अपने उत्तरदायित्व को पूरी गम्भीरता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रामाणिकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहजता व प्रसन्नता के साथ निभाने के लिए एक व्यवस्था या सिस्टम में स्वयं को ढ़ालना ही चाहिए। इसके सिवा सुखी जीवन का कोई दूसरा मार्ग है ही नहीं। आज व्यक्ति के जीवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यापार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र एवं विश्व में जहाँ-जहाँ अव्यवस्था है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं-वहीं अशान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दु:ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दरिद्रता एवं विनाश है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  अत: आइए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मग्लानि के स्थान पर आत्मगौरव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपूर्णता के स्थान पर पूर्णता तथा अव्यवस्था के स्थान पर एक व्यवस्थित सधा हुआ अनुशासित जीवन जीते हुए जीवन को उत्सव बनाइए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Jul 2017 21:57:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पतंजलि योगपीठ एवं गुजरात सरकार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित अहमदाबाद अन्तर्राष्ट्रीय योगदिवस </title>
                                    <description><![CDATA[<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मां गंगा व साबरमती के पावन योगस्थ संगम का किया दुनिया ने दिव्य दर्शन</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तृतीय अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस पर पतंजलि ने फिर रचे योग के 23</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  विश्वरिकार्ड</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">    <span style="color:rgb(35,111,161);">नारी शक्ति द्वारा तीन घंटे के सामूहिक योगाभ्यास व तीन लाख लोगों के सामूहिक योग करने सहित कई</span></span><span style="color:rgb(35,111,161);"> <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वरिकार्डों के नाम रहा पतंजलि का </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi"> जून</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज रचित पुस्तक योगविज्ञानम् के हिन्दी-अंग्रेजी संस्करण का पूज्य योगऋषि व श्री अमितभाई शाह ने किया लोकार्पण</span></span></strong></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">      प</span><span lang="hi" xml:lang="hi">तंजलि योगपीठ स्थापना के वर्षों पूर्व गांव की गलियों से प्रारम्भ हुआ पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज का योग आज विश्व स्तर पर गौरवांवित</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2454/yogrshi-ke-saanidhy-mein-teen-laakh-yogasaadhakon-ne-bataee-yogadhaara"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/352.jpg" alt=""></a><br /><ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मां गंगा व साबरमती के पावन योगस्थ संगम का किया दुनिया ने दिव्य दर्शन</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तृतीय अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस पर पतंजलि ने फिर रचे योग के 23</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> विश्वरिकार्ड</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">  <span style="color:rgb(35,111,161);">नारी शक्ति द्वारा तीन घंटे के सामूहिक योगाभ्यास व तीन लाख लोगों के सामूहिक योग करने सहित कई</span></span><span style="color:rgb(35,111,161);"> <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वरिकार्डों के नाम रहा पतंजलि का </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi"> जून</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज रचित पुस्तक योगविज्ञानम् के हिन्दी-अंग्रेजी संस्करण का पूज्य योगऋषि व श्री अमितभाई शाह ने किया लोकार्पण</span></span></strong></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   प</span><span lang="hi" xml:lang="hi">तंजलि योगपीठ स्थापना के वर्षों पूर्व गांव की गलियों से प्रारम्भ हुआ पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज का योग आज विश्व स्तर पर गौरवांवित हो चुका है। इस वर्ष के अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को जहाँ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लखनऊ में सेलीब्रेट किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज व श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के मार्गदर्शन में गुजरात सरकार एवं पतंजलि योगपीठ के संयुक्त तत्वाधान में विश्वस्तरीय अन्तर्राष्ट्रीय योग समारोह आयोजित कर कई विश्व रिकार्ड बनाये गये। इस योगशिविर में जहां लगभग </span>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> लाख से भी अधिक लोगों द्वारा गुजरात के जीएमडीसी मैदान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहमदाबाद पर एक साथ पूज्यवर के नेतृत्व में योगाभ्यास का विश्व रिकार्ड बनाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं सबसे लम्बे समय तक सामूहिक शीर्षासन का विश्व रिकार्ड भी पतंजलि के कार्यकर्ताओं के नाम गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके अतिरिक्त महिलाओं द्वारा सामूहिक रूप से तीन घंटे तक शीर्षासन का विश्व रिकार्ड भी इसी शिविर में बना। इसके अतिरिक्त सूर्य नमस्कार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुश-अप तथा 32 घंटे तक लगातार योग करने का विश्व रिकार्ड भी महिलाओं द्वारा बनाया गया। इस प्रकार दुनियां ने भारत की सर्वसमृद्ध विरासत योग की सामर्थ्य का अनुभव किया। इस अवसर पर श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने कहा योग के क्षेत्र में पतंजलि ने अनेक  विश्वरिकार्ड बनाये हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये रिकार्ड भी आगे श्रद्धेय स्वामी जी के नेतृत्व में पतंजलि ही तोड़ेगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अहमदाबाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुजरात, </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi"> जून। 18 से 21 जून तक चलने वाले इस आयोजन का शुभारम्भ प्रथम दिन ब्रह्म मुहूर्त में पूज्य स्वामी जी महाराज के योगाभ्यास शंखनाद से हुआ। इस अवसर पर स्वामी जी ने कहा कि आज 200 देशों में योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यात्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय संस्कृति को गौरवान्वित करने वाले उद्धारक योद्धा बन गये हैं मोदी जी। योग को जन-जन तक पहुँचाने के लिए प्रारम्भ हुए कार्यक्रम के प्रथम से लेकर अंतिम </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi"> जून तक जीएमडीसी ग्राउण्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहमदाबाद प्रात: 5 बजे से ही भर उठता रहा। </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi"> जून को अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस को सेलीब्रेट करने के लिए लगभग तीन लाख से अधिक लोग आयोजन स्थल पहुंचे थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनके लिए शहर के ही पांच अतिरिक्त ग्राउंडों में व्यवस्था की गयी थी। </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi"> जून को भारी संख्या में सम्मिलित लोगों तक प्रसारित संदेश समुचित रूप से पहुंचे इस निमित्त </span>100<span lang="hi" xml:lang="hi"> से अधिक एलईडी स्क्रीन लगी थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा </span>100<span lang="hi" xml:lang="hi"> से अधिक प्रवेश द्वार तैयार किये गये थे। योगाभ्यास को समुचित ढंग से करने के लिए पतंजलि के </span>10,000<span lang="hi" xml:lang="hi"> कार्यकर्ता तैनात थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो साधकों को निकट जाकर निर्देशित कर रहे थे। खास बात कि योगमहोत्सव में सम्मिलित होने वाले लोगों की संख्या गणना के लिए प्रत्येक गेट पर इलेक्ट्रानिक बारकोडिंग की व्यवस्था अपने में अनूठे प्रबंधन का संकेत कर रही थी। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्तर्राष्ट्रीय योगमहोत्सव में नित्य भारी संख्या में सरकार के मंत्रीगण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विधायक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशासनिक अधिकारियों ने पहुंचकर सहभागिता की। जिसमें भूपेन्द्र सिंह चूड़ात्मा (शिक्षा मंत्री</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुजरात)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वल्लभ भाई कापड़िया (ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ निर्मला बासवानी (महिला एवं बालविकास मंत्री)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री राजेन्द्र त्रिवेदी(युवा एवं संस्कृति मंत्री)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गौतम भाई शाह (मेयर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहमदाबाद) सहित गुजरात सरकार के अनेक मंत्रीगण नित्य योगाभ्यास करने में सहिभागी रहे। </span></h5>
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#fbeeb8;border-color:#FBEEB8;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(251,238,184);">
<table style="border-collapse:collapse;width:100.134%;border-width:1px;background-color:#f1c40f;border-color:#F1C40F;" border="1"><colgroup><col style="width:99.866%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(241,196,15);">
<h4 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सहभागिता अतिविशिष्टों की</span></strong></h4>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वसम्मानित श्री अमित भाई शाह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय अध्यक्ष भारतीय जनता पार्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमुख राष्ट्रीय संत श्री रमेश भाई ओझा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजापिता ब्रह्मकुमारी की प्रतिष्ठित संत सुश्री बहिन शिवानी एवं शारदा बहिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संत श्री बालस्वामी जी महाराज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुजरात सरकार के राज्यपाल श्री ओपी कोहली</span>,  <span lang="hi" xml:lang="hi">गुजरात सरकार के मुख्यमंत्री श्री विजय भाई रूपानी</span>,  <span lang="hi" xml:lang="hi">उपमुख्यमंत्री श्री नितिन भाई पटेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गृहमंत्री श्री प्रदीप जडेजा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्व उपमुख्यमंत्री सुश्री आनंदीबेन पटेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुख्यसचिव श्री जयंतसिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छात्र संगठक श्री राहुल पराडे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसरो के वैज्ञानिकगण एवं विविध संगठनों के सदस्य सहभागी रहे।</span></strong></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                            <category>योग दिवस</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2454/yogrshi-ke-saanidhy-mein-teen-laakh-yogasaadhakon-ne-bataee-yogadhaara</link>
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                <pubDate>Sat, 01 Jul 2017 21:56:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पतंजलि योगपीठ एवं गुजरात सरकार के संयुक्ततत्वावधान में आयोजित अहमदाबाद अन्तर्राष्ट्रीय योगदिवस</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;" align="right"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योगऋषि स्वामी रामदेव </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">य</span><span lang="hi" xml:lang="hi">दि कोई भी व्यक्ति सात्विक आहार लेता है और कपालभाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह  सदैव स्वस्थ रहेगा ही। मैं कहता हूं कि जीवन में प्राण की प्रतिष्ठा आवश्यक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो योग से सम्भव है। वास्तव में विद्यार्थियों के लिए प्राण नॉलेज है। प्राण विद्या है। रोगियों के लिए प्राण-औषधि है। योगियों के लिए प्राण ब्रहम है। इस संदर्भ में हमने योग का प्रयोग किया लाखों-करोड़ों लोगों पर और सिद्ध हुआ कि योग वह सब कुछ प्राप्त कराता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो तुम चाहते हो। प्राणायाम से सब रोग मुक्त </span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव मुक्त </span>, </h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2455/rog--vyasan-aur-hinsa-mukti-ka-abhiyaan-hai-yog"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/1121.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;" align="right"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योगऋषि स्वामी रामदेव </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">य</span><span lang="hi" xml:lang="hi">दि कोई भी व्यक्ति सात्विक आहार लेता है और कपालभाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह  सदैव स्वस्थ रहेगा ही। मैं कहता हूं कि जीवन में प्राण की प्रतिष्ठा आवश्यक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो योग से सम्भव है। वास्तव में विद्यार्थियों के लिए प्राण नॉलेज है। प्राण विद्या है। रोगियों के लिए प्राण-औषधि है। योगियों के लिए प्राण ब्रहम है। इस संदर्भ में हमने योग का प्रयोग किया लाखों-करोड़ों लोगों पर और सिद्ध हुआ कि योग वह सब कुछ प्राप्त कराता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो तुम चाहते हो। प्राणायाम से सब रोग मुक्त </span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव मुक्त </span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंसापरक आचरण से मुक्त </span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब प्रकार की बुराईयों से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभाव व अकर्मणता से मुक्त हो जाते हैं। बीमारियों पर संपूर्ण दुनियां में 100 लाख-करोड़ रुपये प्रति वर्ष खर्च हो रहे हैं। इसी प्रकार 100 लाख करोड़ बुराईयों पर खर्च होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात शराब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बीड़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिगरेट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नशा जैसी बुराईयों पर इतना ही धन खर्च होता है। जबकि योग-रोग मुक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यसन मुक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंसा मुक्ति का अभियान है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लोग कहते हैं मोदी जी पूरे देश को अशांति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनार्किकी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपराध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अराजकता मुक्त करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर मैं कहता हूँ शासन किसी का क्यों न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना योगानुशासन के धरती पर वह श्रेष्ठ शासन नहीं ला सकता। हमें देश व विश्व में हर बच्चों के अंदर योग के प्रति उत्साह पैदा करना है। मैं कहता हूं कि हमें मेरी माता ने जिस रूप में पैदा किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगाभ्यास के कारण आज भी वही नूर हमारे चेहरे पर है। मैं योग एवं कर्म योग को अपना धर्म मानकर कार्य करता हूँ। इस योग को आज राजनैतिक दृष्टि से आजादी के 70 वर्ष बाद अन्तर्राष्ट्रीय गौरव मिला। मैं मानता हूँ योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम की आवश्यकता हर किसी को है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर  जीवन में अहिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्तेय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपरिग्रह आदि का जागरण भी योग ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमें राष्ट्रहित व जीवनहित की इस धारा से योग को जोड़ना व  अपनाना है। </span></h5>
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#f1c40f;border-color:#F1C40F;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(241,196,15);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">देश में योग को प्रामाणिकता से स्थापित करने के लिए प्रधानमंत्री को बधाई</span></strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;" align="right"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">मैं अनुभव करता हूँ जब प्रारम्भ के दिनों में गंगोत्री में हम श्रद्धेय स्वामी जी के साथ चिंतन करते थे कि भारतीय ऋषियों की विरासत को दुनियां में कैसे पहुँचा सकते हैं। इन्हीं दिनों उस गंगोत्री में हम दोनों के सानिध्य में लोग आते थे और साधना के लिए योग करते थे। देखते ही देखते वे स्वस्थ होने लगे और योग की वह यात्रा आज संपूर्ण विश्व में प्रवाहित हो उठी। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पूरी दुनियां के सामने योग एक उदाहरण है कि कोई भी विधा राजाश्रय पाकर कैसे विस्तार पा सकती है। पहले भी अधिकारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनेता हमारे यहां योग करने आते थे। पर योग शिविर में योग करने पर वे सोचते थे कि कब नोटिस आ जाय कि तुम योग क्यों करते हो। क्योंकि इसे सम्प्रदाय के दायरे में जो देखा जाता था। स्वामी जी कहते थे कि देश में धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जाति से लेकर न जाने कितनी दीवारे पैदा थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर इन दीवारों को यदि किसी ने तोड़ा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह है योग। यही नहीं एक तरफ करोड़ों-करोड़ों की दवाईयों को दिखाकर हमें स्वास्थ्य के नाम पर भयभीत किया जाता था। शरीर को हमें मेडिकल स्टोर बनाने हेतु विवश किया जाता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर योग ने इस भय से भी हमें मुक्त किया है। अब हम योग से ही स्वस्थ हो जाते हैं। योग किसी सीमा का विषय नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह दुनियां के सौभाग्य का मार्ग है। हम कहते </span><span lang="hi" xml:lang="hi">है| </span>यदि कोई ईसाई होगा तो योग उसे सच्चा ईसाई बना देगा<span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">मुस्लिम को यह सच्चा मुसलमान बना रहा है। वास्तव में योग ऋषियों की विरासत है</span><span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">सबकी भलाई का आधार है। योग करने वाला व्यक्ति शारीरिक</span><span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">मानसिक प्रदूषण से मुक्त रहता ही है</span><span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">वह दूसरों को भी इससे मुक्त करता है। इस महान परम्परा को संवारने</span><span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">जन-जन तक </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">पहुँचाने</span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi"> का प्रचण्ड प्रयास जो स्वामी जी कर रहे हैं</span><span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">उससे आप भी जुड़ें तथा इसे जन-जन तक पहुँचाने का पुण्य प्राप्त करें। हम इसे देश में प्रामाणिकता के साथ स्थापित करने के लिए माननीय प्रधानमंत्री जी को बधाई देते हैं। योग से हम रोग मुक्त ही नहीं होते</span><span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">अपितु यह संपूर्ण समस्याओं का अंत भी है। मैं देखता हूँ बीमार व्यक्ति योग से ही ठीक हो जाते हैं</span><span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">पर जो बीमार नहीं हैं</span><span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">उनमें भी तरह-तरह का भय व्याप्त रहता है</span><span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">पर यह योग लोगों को भय व घबराहट से मुक्ति भी दिला सकता है। जो स्वस्थ हैं उन्हेें स्वस्थ रखने के लिए योग महत्वपूर्ण  है। स्वस्थ रहने के लिए अपनी दिनचर्या और आहारचर्या को सुधारिये</span><span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">योग की शरण में रहिये। इस प्रकार तन और मन से जब हम ठीक होंगे तो सुंदर देश व विश्व का निर्माण भी कर सकते हैं। इस तृतीय अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस पर अहमदाबाद के इस आयोजन से दुनियां योग को याद ही नहीं करेगी</span><span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">अपितु दुनियां योग का अभ्यास करने के लिए भी प्रेरित होगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                            <category>योग दिवस</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Jul 2017 21:54:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दिव्य अभिव्यक्तियां</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">      जि</span><span lang="hi" xml:lang="hi">नके मार्ग दर्शन में यहां विश्व रिकॉर्ड बने ऐसे पूज्यनीय बाबा रामदेव जी के साथ लाखों की संख्या में योग करने पधारें लाखों भाई बहनों को हमारा नमन है। 2011 में बैंगलूर में विश्व भर के योगाचार्य इकट्ठा हुए और उन्होंने संकल्प व्यक्त किया कि योग जैसी प्राचीन भारतीय धरोहर से बिना औषधि रोग मुक्त हुआ जा सकता है। अत: विश्व को रोगमुक्त करना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हमे विश्व योग दिवस बनाना होगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">2014 में नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने और उन्होंने यूएनओ में विश्व योग दिवस का प्रस्ताव रखा और आज विश्व यह योग दिवस मना रहा है। २१</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2456/divya-abhivyakti"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/slide12.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   जि</span><span lang="hi" xml:lang="hi">नके मार्ग दर्शन में यहां विश्व रिकॉर्ड बने ऐसे पूज्यनीय बाबा रामदेव जी के साथ लाखों की संख्या में योग करने पधारें लाखों भाई बहनों को हमारा नमन है। 2011 में बैंगलूर में विश्व भर के योगाचार्य इकट्ठा हुए और उन्होंने संकल्प व्यक्त किया कि योग जैसी प्राचीन भारतीय धरोहर से बिना औषधि रोग मुक्त हुआ जा सकता है। अत: विश्व को रोगमुक्त करना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हमे विश्व योग दिवस बनाना होगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">2014 में नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने और उन्होंने यूएनओ में विश्व योग दिवस का प्रस्ताव रखा और आज विश्व यह योग दिवस मना रहा है। २१ जून सबसे लम्बा दिन होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग के लिए इस दिन को चुनकर मनुष्य के लिए स्वास्थ प्रद एवं लम्बी आयु का रास्ता और भारत के लिए इसे सशक्त करने का मार्ग प्रशस्त हुआ है। आज विश्वभर में योग के रास्ते पर चलने वालों की संख्या बढ़ रही है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बाबा रामदेव जी को जबसे हमने देखा योग की ही महिमा गाते दिखे। स्वामी जी ने अनेक कार्यो को अपने हाथ में लिये हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो काफी कठिन हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह चाहे योग का प्रचार हो। स्वदेशी आंदोलन हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग शिक्षा हो या देश को संस्कृति निष्ठ करने के लिए हमारी सभ्यता के अनुरूप शिक्षा में सुधार हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब में  बाबा ने अपना प्राण लगाया है। आज योग दिवस के अवसर पर ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि जो योग दिवस मनाने का निर्णय विश्व ने लिया है वह कल्याण मय हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संपूर्ण विश्व निरोग हो और सात्विक जीवन की ओर बढ़े यही प्रार्थना है। </span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्री अमित भाई शाह </span></strong></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय अध्यक्ष</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय जनता पार्टी</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">रत वर्ष के साथ समग्र विश्व योग दिवस मनाता है। यह भारत के लिए गौरव का विषय है। योग भारत का विश्व को अनूठा वरदान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व में भाई-चारा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुख-शांति बनाने का उत्तम मार्ग योग ही है। हम इस पर चलकर 100 वर्षों तक निरोगी जीवन जी सकते हैं। प्राचीन काल से हमारे ऋषि-मुनियों ने योग की एक अनूठी भेंट दी हैं। यह मन व शरीर दोनों को साधने की क्रिया है। यह शरीर को मन से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन को आत्मा से जोड़ने की  प्रक्रिया है। यह कर्म में कौशल लाता है। यह मानसिक चेतना का जागरण भी करता है। योग का एक आयाम इसमें निहित चिकित्सा क्षमता भी है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक जीवन शैली तनाव को जन्म देती है। योग मनुष्य को उस तनाव से निजात दिलाता है। विश्व योग दिवस पर स्वामी रामदेव की उपस्थिति में लाखों लोगों ने एक साथ योग करके प्रांत को गौरवांवित किया है। स्वामी जी के इस प्रयास से देश के युवा विशेष प्रेरित हो रहे हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"> <strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्री ओ पी कोहली </span></strong></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">राज्यपाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुजरात सरकार</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वि</span><span lang="hi" xml:lang="hi">श्व योग दिवस पर लाखों लोगों द्वारा योग करने के विश्व रिकॉर्ड सहित अनेक रिकॉर्डो से गुजरात गौरवांवित हो गया। स्वामी रामदेव ने योग द्वारा गुजरात को तीर्थ बना दिया। स्वस्थ व संस्कृति निष्ठ गुजरात का यह महत्वपूर्ण पुरुषार्थ है। स्वामी जी को ही इसका श्रेय जाता है। इस आयोजन को विश्व रिकार्ड रूप में दर्ज कराने हेतु स्वामी जी के साथ गुजरात सरकार एवं गुजरात के नागरिक प्रयासरत हैं। वास्तव में हिमालय की गंगा व साबरमती का पावन मिलन है यह गुजरात योग महोत्सव। </span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्री विजय रूपानी </span></strong></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मुख्यमंत्री</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुजरात सरकार</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गु</span><span lang="hi" xml:lang="hi">जरात राज्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संपूर्ण विश्व व भारत में अपनी हजारों वर्षों की ऋषियों की योग पद्धति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी प्राचीन सांस्कृतिक पद्धति को संपूर्ण विश्व में गौरवान्वित करने वाले पूज्य स्वामी रामदेव जी को अभिनंदन। पूज्यवर ने गुजरात की पावन धरती पर इस अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस को सफल बनाने हेतु विराट तप अनुष्ठान किया है। यह तप संपूर्ण गुजरात को स्वस्थ-सशक्त बनाने के लिए है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भाई नरेन्द्र मोदी एवं स्वामी रामदेव जी ने अपने अथक प्रयास से तो विश्व में योग प्रतिष्ठित कराया। गुजरात सरकार की ओर से मुख्यमंत्री महोदय ने भी स्वामी रामदेव जी महाराज से विनती की कि संपूर्ण गुजरात की करोड़ों जनता के हित में इस विश्व योग दिवस पर शिविर आयोजित करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह स्वामी जी का महान आर्शीवाद है कि उन्होंने गुजरात के नागरिकों की प्रेरणा हेतु यह आयोजन रखा। आज गुजरात के नागरिकों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार एवं पूज्यवर के प्रयत्न से हमारी युवा पीढ़ी इस योग का लाभ पा रही है। </span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्री नितिन भाई पटेल</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उपमुख्यमंत्री</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुजरात सरकार</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यो</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ग के माध्यम से संपूर्ण धरा बड़ी विजय करने जा रही है। परम पूज्य स्वामी जी के आर्शीवाद से गुजरात पहले से योग में अग्रगण्य रहा है। योगऋषि के प्रयास से २१ जून विश्व योग दिवस हम सबको गौरवांवित कर रहा है। आदरणीय मोदी जी ने योग को लेकर बहुत ईमानदारी से विश्व को सम्मत किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी के परिणाम स्वरूप यह विश्व स्तरीय उपक्रम आज गुजरात में चल रहा है। मुझे खुशी है बाबा रामदेव ने यहां से योग की विश्व रिकॉर्ड श्रृंखला शुरू की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो प्रान्त को गौरवांवित करने वाला है। आज गुजरात की धरती लाखों लोगों के योग करने व स्वामी जी के पधारने से धन्य हो गयी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तृतीय अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस पर यह जन आंदोलन बन गया है। स्वामी जी के प्रयास से आज योग धर्म से बाहर निकल  चुका है। मैं देखता हूँ कि रोजा के दिनों में छोटे-छोटे मुस्लिम बच्चों के साथ सभी समाज के लोग इसे आज अपना रहे हैं।  </span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्री राजेन्द्र त्रिवेदी</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">युवा एवं सांस्कृतिक मंत्री</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गुजरात सरकार</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ब पूरा विश्व योगमय हो रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">२१ जून के ऐतिहासिक दिन को योगमय बनाने का संकल्प जिस महामानव ने लिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यूएनओ में जिसने विश्व योग दिवस का प्रस्ताव रखा और संपूर्ण विश्व आज जिसके कारण योग कर रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस महान राष्ट्रयोगी हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बहुत-बहुत अभिनंदन। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग दिवस पर लाखों लोग अहमदाबाद के पांच ग्राउण्डों पर जिस पूर्ण अनुशासन से योगाभ्यास किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह भी एक कीर्तिमान है। मोदी जी ने आज तक जो भी संकल्प लिये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे अहमदाबाद के अधिकारियों ने जमीन पर उतारकर उदाहरण बनाया। योग दिवस पर लाखों लोगों का मूमेन्ट इस योग के इवेन्ट के लिए हुआ और गुजरात पूरे देश के लिए गवर्नेन्स का उदाहरण बन गया। गुजरात सरकार एवं उनके अधिकारीगण योग के विराट अभियान को सफल बनाने हेतु अभिनंदन के पात्र हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योगऋषि स्वामी</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रामदेव जी महाराज</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">परमाध्यक्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वि</span><span lang="hi" xml:lang="hi">श्व योग दिवस पर स्वामी रामदेव ने योग की विश्व हुंकार स्थापित की। स्वास्थ्य को निरोग रखने की प्रमुख विद्या योग है। योग में कोई साम्प्रदायिकता नहीं है। इस योग विद्या के मार्गदर्शक स्वामी जी के मार्ग दर्शन में हम सभी अहमदाबाद में एकत्र हुए हैं। भगवद गीता कहती है योग दुख का हरण करने वाला होता है। युक्ताहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युक्तविहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युक्त व्यवहार से योग सिद्ध होता है। ब्रहम बेला में जितनी सक्रियता से अहमदाबाद के लोग योग के लिए जगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह अपने में एक विश्व रिकार्ड जैसा रहा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर परमात्मा का यंत्र है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: हमारा शरीर के प्रति धर्म होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे बाबा जी कहते हैं कि करो योग रहो निरोग। मैं भी प्राणायाम  नित्य करता हूँ। मेरे प्रवचनों में स्वामी जी आते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उनके द्वारा सिखायें योग से मैं भी सीख लेता हू। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे राष्ट्र के बहुत ही प्राणावान ऊर्जावान लोकप्रिय प्रधानमंत्री एवं बाबा जी की प्रेरणा से संपूर्ण विश्व योग दिवस मना रहा है। प्रधानमंत्री जी ने अभी एक दिन का भी अवकाश नहीं लिया है। उसका श्रेय इस योग को जाता है। योग सतत ऊर्जा प्रदान करता है। योग महोत्सव में बैठे संतगण एवं विशाल जनसभा हम सबको ऊर्जावान कर रही थी। परम्परा से प्राप्त योग को हमने समय के साथ विस्मृत कर दिया गया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे इस विशेष स्तर पर जन-जन तक पहुँचाने एवं इस प्राचीन विद्या को स्मृति में लाने का श्रेय स्वामी रामदेव जी महाराज को जाता है। विश्व मानवता सदा योग को जन-जन तक पहुँचाने के लिए स्वामी जी का ऋणी रहेगी। जैसे कान को पकड़कर गलती के लिए क्षमा मांगते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे ही नाक पकड़कर स्वास्थ्य के प्रति समर्पित रहें। यह नाक सदैव पकड़े रहें जिससे नाक बची रहे। भारत के सभी जन योग को समर्पित रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक स्वस्थ भारत की पहचान बने ऐसी शुभकामना है। </span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धेय श्री रमेश ओझा</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रसंत एवं कथावाचक</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">य</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ह महत्वपूर्ण समय है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुत से लोग इस दिव्य बेला में सो रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर कुछ लोग जागते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी  जी देश के करोड़ो लोगों के शरीर को योगाभ्यास के माध्यम से स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मा को शक्तिशाली तथा जीवन को प्रकृति से सहचर्य स्थापित करा करके सतयुग लाने का पुरुषार्थ कर रहे हैं। अन्तर्राष्ट्रीय योगदिवस का अहमदाबाद आयोजन अपने में देश व विश्व मानवता को गौरवांवित करने वाला रहा। </span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बहिन सुश्री शिवानी जी</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिष्ठित संत, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजापिता ब्रह्मकुमारी</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">भी 20-25 वर्ष पहले तक योग बुढ़ापे में करने का विषय माना जाता था। पर यह कहते हुए हमें गौरव हो रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कि संपूर्ण विश्व में सबसे बड़ा कांस्टीट्यूसन स्वामी जी के माध्यम से योग के रूप में प्राप्त हुआ है। युवा भी इसमें अभिरुचि ले रहे हैं। मैं समझता हूँ कि नेताओं को देखकर समाज बनता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नेता समयबद्ध होंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो समाज की दिशा बदल जायेगी। मोदी जी योग करके वह प्रेरणा दे रहे है। भारत संतों की भूमि है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं स्वामी जी को नमन करता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि १२० करोड़ की आबादी वाले संपूर्ण देश व विश्व में स्वामी जी को लोग योगऋषि के रूप में लोग जानते हैं।  </span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्री राहुल पराडे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छात्र संसद</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ज पूज्य रामदेव जी महाराज एवं आचार्य श्री के प्रयास से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्व  से पश्चिम तक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर से दक्षिण तक पूरे विश्व में योगाभ्यास की गूंज उठ रही है। आज भारतीय संस्कृति का गौरव योग से बढ़ रहा है। पूज्यवर हमारी संस्था में आये थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो छोटे-छोटे बच्चों में भी योग के प्रति ललक जगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो शुभ संदेश है। </span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><strong><span style="color:rgb(0,0,0);"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्री बालस्वामी जी महाराज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिष्ठित संत</span></span></strong></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                            <category>योग दिवस</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2456/divya-abhivyakti</link>
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                <pubDate>Sat, 01 Jul 2017 21:52:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अंतर्राष्ट्रीय योगदिवस पर योगऋषि पूज्य स्वामी जी महाराज के दिव्य मार्गदर्शन में बने 23 विश्वरिकार्ड</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;">सूर्य नमस्कार महिला वर्ग इसमें 17 वर्ष से अधिक आयु  वर्ग के तहत पतंजलि  की ब्रहम चारिणी सुश्री ओमिका ने 3131 बार सूर्य नमस्कार का कीर्तिमान बनाया। पतंजलि की ही ब्रह्म चारिणी  सुश्री विद्यारानी ने 17 से कम आयु वर्ग में 2121 सूर्य नमस्कार का कीर्तिमान बनाया। <br />इसके अतिरिक्त एक घंटे के तहत 17 आयु वर्ग में सुश्री जागृति जी ने 493 बार सूर्यनमस्कार का रिकार्ड बनाया। सुश्री  विद्यारानी जी ने एक घण्टे में ही 17 आयु से अधिक वर्ग में  481 सूर्य नमस्कार एवं सुश्री रिचा ने 421 बार सूर्य नमस्कार कर वल्र्ड रिकार्ड में नाम दर्ज कराया।<br />सूर्य</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2457/yogadivas-par-yogrshi-poojy-svaamee-jee-mahaaraaj-ke-antarraashtreey-divy-darshan-mein-bane-23-vishvarikaard"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/02.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">सूर्य नमस्कार महिला वर्ग इसमें 17 वर्ष से अधिक आयु  वर्ग के तहत पतंजलि  की ब्रहम चारिणी सुश्री ओमिका ने 3131 बार सूर्य नमस्कार का कीर्तिमान बनाया। पतंजलि की ही ब्रह्म चारिणी  सुश्री विद्यारानी ने 17 से कम आयु वर्ग में 2121 सूर्य नमस्कार का कीर्तिमान बनाया। <br />इसके अतिरिक्त एक घंटे के तहत 17 आयु वर्ग में सुश्री जागृति जी ने 493 बार सूर्यनमस्कार का रिकार्ड बनाया। सुश्री  विद्यारानी जी ने एक घण्टे में ही 17 आयु से अधिक वर्ग में  481 सूर्य नमस्कार एवं सुश्री रिचा ने 421 बार सूर्य नमस्कार कर वल्र्ड रिकार्ड में नाम दर्ज कराया।<br />सूर्य नमस्कार पुरुष वर्ग स्न पुरुषों मेंं 17 वर्ष से कम आयु वर्ग के तहत पतंजलि के ब्रह्मचारी श्री चन्द्र मोहन ने 4500 बार सूर्य नमस्कार करके कीर्तिमान दर्ज कराया। जबकि श्री देवेन्द्र ने 18 वर्ष से अधिक आयु वर्ग में 4050 बार सूर्य नमस्कार करके योग की गरिमा को बढ़ाया। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/02.jpg" alt="02"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;">शीर्षासन स्न श्री जयपाल जी, श्री मोहन शंकर रावत जी एवं श्री गोपाल डांगी जी ने संयुक्तरूप से मिलकर 3 घंटे 33 मिनट 33 सेकेण्ड में विश्व रिकार्ड बनाया। इसके साथ शीर्षासन में पद्मासन लगाकर श्री रवि शंकर व्योम जी ने 40 मिनट का कीर्तिमान बनाया।<br />महिला वर्ग में सबसे लम्बा शीर्षासन स्न पतंजलि विश्वविद्यालय की सुश्री गायत्री ने 18 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के अंतर्गत 1 घंटे 4 मिनट का सबसे लम्बे शीर्षासन का रिकार्ड बनाया एवं सुश्री मनीषा कुमावत ने 17 वर्ष से कम आयु वर्ग में 52 मिनट के शीर्षासन का कीर्तिमान बनाया।</h5>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/03.jpg" alt="03"></img></p>
<h5 style="text-align:justify;">पुरुष वर्ग में पुश-अप का कीर्तिमान स्न पुरुष वर्ग में पुश-अप में पतंजलि के ब्रह्मचारी श्री कुलदीप जी ने 6 घंटे 30 मिनट में 10,900 बार पुश-अप का  विश्वरिकार्ड बनाया, वहीं 01 घंटे में 3150 बार पुश-अप का विश्व रिकार्ड भी इन्हीं के हाथ लगा। जबकि श्री हर्षराम जी ने 1 मिनट में 15 किलोग्राम वजन के साथ 70 बार एवं श्री आदित्य सिंह जी ने 1 मिनट में 157 बार पुश-अप करने का कीर्तिमान बनाया। <br />अन्य कीर्तिमान इसके अतिरिक्त पतंजलि कार्यकत्र्ता श्री फूल चंद्र  जी ने गोमुख आसन में 09 घंटे 30 मिनट का रिकार्ड दर्ज कराया, श्री मदन मोहन ने वृक्षासन में इस प्रकार दिनेश कुमार, पंकज सोनेकर, चंद्र मोहन नेगी, श्री पंन्तलाल जी ने भी विश्व रिकॉर्ड बनाये। इस अवसर पर पूज्यवर को सोशल मीडिया में सर्वाधिक लाइक किये जाने वाले आध्यात्मिक व्यक्तित्व रूप मेें फेसबुक इंडिय़ा प्रमुख श्री सौरभ जी व कीर्ति सिंह जी ने पूज्यवर का अभिनंदन किया। </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                            <category>योग दिवस</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Jul 2017 21:50:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वनौषधियों में स्वास्थ्य</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">आचार्य  बालकृष्ण</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2458/vishishth-ayurvedic-swasthya-vardhak-ghatak-giloya"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/443.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">   अमृता, अमृतवल्ली अर्थात कभी न सूखने वाली गिलोय के पत्ते कोमल पान के आकार के तथा फल मटर के दाने जैसे होते हैं। यह जिस वृक्ष पर चढ़ती है उस वृक्ष के कुछ गुण भी अपने अन्दर समाहित कर लेती है, इसीलिए नीम वृक्ष पर चढ़ी गिलोय श्रेष्ठ मानी जाती है। चरक के बय: स्थापन, दाहप्रशमन, तृष्णा निग्रहण, स्तन्यशोधन आदि गणों में तथा सुश्रुत के गुडूच्यादि, बल्लीपंचमूल आदि गणों में इसकी गणना की गई है।</h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>आयुर्वेदीय गुण-कर्म एवं प्रभाव</strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;">खांसी, दौर्बल्य, प्रमेह, मधुमेह, त्वचा संबंधित रोगों में तथा कई प्रकार के ज्वर में गिलोय उत्तम कार्य करती है। आधुनिक चिकित्साशास्त्रियों के विचार से गिलोय सूक्ष्मतम विषाणु समूह से लेकर स्थूल कृमियों पर अपना प्रभाव दर्शाती है। क्षय रोग उत्पन्न करने वाले माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस जीवाणु की वृद्धि को यह सफलता पूर्वक रोकती है। शरीर के जिस भाग में भी ये जीवाणु शान्त अवस्था में पड़े हों, गिलोय वहीं पर पहूँचकर उनका नाश करती है। ई- कोलाई नामक रोगाणु को जो आंत और मूत्रवहसंस्थान के साथ-साथ पूरे शरीर को प्रभावित करता है, उसको गिलोय जड़ से उखाड़ती है। इसके जल निष्कर्ष में फंगोसिटिक इंडेक्स’ काफी अधिक मात्रा में पाये जाते हैं अर्थात रक्त  के जीवाणु भक्षी कोषों की तरह इसके सूक्ष्म घटक भी आयोनिक गति से रोगाणुओं पर आक्रमण कर उन्हें मार डालने की क्षमता रखते हैं। इसी प्रकार गिलोय का ग्लूकोज टालरेंस तथा एड्रीनेलिन जन्य हाइपर ग्लाइसीमिया में लाभकारी एवं त्वरित परिणामशील होता है। यह शरीर में इंसुलिन की उत्पत्ति व रक्त  में उसकी घुलनशीलता को बढ़ाती है। इससे रक्त शर्करा घटती है। गुडूची को घृत के साथ सेवन करने से यह वातशामक; गुड़ के साथ सेवन करने से-मलबद्धता नाशक; खाँड के साथ सेवन करने से-पित्तशामक; मधु के साथ सेवन करने से-कफशामक; सोंठ के साथ सेवन करने से-आमवातशामक; तथा एरण्ड तैल के साथ सेवन करने से वातशामक होती है। गुडूची का पत्र शाक कषाय, कटु, तिक्त, मधुर, उष्णवीर्य; लघु, त्रिदोषशामक, रसायन, अग्निदीपक, बलकारक, मलरोधक, चक्षुष्य तथा पथ्य होता है। यह वातरक्त, तृष्णा, दाह, प्रमेह, कुष्ठ, कामला तथा पाण्डुरोग में लाभप्रद होता है। गुडूची सत् मधुर, लघु, त्रिदोषशामक, पथ्य, दीपन, चक्षुष्य, धातुवर्धक, मेध्य व वय:स्थापक होता है। गिलोय का प्रयोग वातरक्त, पाण्डु, ज्वर, छर्दि, जीर्णज्वर, कामला, प्रमेह, अरुचि, श्वास, कास, हिक्का, अर्श, क्षय, दाह, मूत्रकृच्छ्र, प्रदर तथा सोमरोग की चिकित्सा में किया जाता है।<br />इस पौधे के सत्त में विषमज्वररोधी क्रिया पाई गई है एवं इनमें इन्सुलिन की भांति क्रिया भी होती है। काण्ड स्वरस तथा काण्ड चूर्ण शोथरोधी तथा मस्तिष्क उद्दीपनरोधी क्रियाओं को प्रदर्शित करता है। गिलोय व्याधिक्षमत्ववर्धक क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है। गिलोय का काण्डसार ज्वरघ्न क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है। गिलोय के काण्ड का जलीय सार प्रत्यूर्जता क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है। गिलोय के काण्ड का जलीय सार एल्बीनों चूहों में शोथहर तथा वेदनाशामक क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है। गिलोय के पमचाङ्ग का एल्कोहॉलिक-सार अस्थिमज्जा कोशिकाओं के प्रफलन को बढ़ाता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>औषधीय प्रयोग मात्रा एवं विधि</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>नेत्र रोग:</strong></span><br />•    10 मिली गिलोय के स्वरस में शहद व सेंधानमक 1-1 ग्राम मिलाकर खूब अच्छी प्रकार से खरल करके नेत्रंजन करने से तिमिर, पिल्ल, अर्श, काच, कंडू, लिंगनाश एवं शुक्ल तथा कृष्ण पटल गत नेत्र रोग नष्ट होते हैं।<br />•    गिलोय रस में त्रिफला मिलाकर क्वाथ बना लें, इसमें पितपली चूर्ण व शहद मिलाकर प्रात:-सायं सेवन करते रहने से नेत्रों की ज्योति बढ़ जाती है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>राजयक्ष्मा (टी.बी.) </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">•    असगन्धा, गिलोय, शतावर, दशमूल, बलामूल, अडूसा, पोहकरमूल तथा अतीस को  समभाग लेकर क्वाथ बनाएं, 20-30 मिली क्वाथ को सुबह-शाम सेवन करने से राजयक्ष्मा नष्ट होता है। इसमें पथ्य के रूप में केवल दूध को सेवन करें।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>वमन</strong></span><br />•    धूप में घूमने-फि रने से या पित्तप्रकोप से वमन हो तो गिलोय स्वरस (10-15 मिली) में 4-6 ग्राम तक मिश्री मिलाकर प्रात: सायं पीने से वमन शांत हो जाता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>संग्रहणी </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">•    सोंठ, मोथा, अतीस तथा गिलोय को समभाग लेकर जल में क्वाथ करें। इस क्वाथ को 20-30 मिली की मात्रा में सुबह-शाम पीने से मन्दाग्नि, आमदोष एवं साम ग्रहणी रोग ठीक होता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>कामला</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">•    20-30 मिली अमृता क्वाथ  में 2 चम्मच मधु मिलाकर दिन में तीन-चार बार पिलाने से पीलिया रोग में लाभ होता है।<br />•    गिलोय के 10-20 पत्तों को पीसकर एक गिलास छाछ में मिलाकर तथा छानकर प्रात: काल पीने से कामला में लाभ होता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>पांडुरोग: </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">•    पुनर्नवा, नीम की छाल, पटोलपत्र, सोंठ, कटुकी, गिलोय, दारुहल्दी, हरड़, प्रत्येक को 20 ग्राम लेकर 320 मिली पानी में पकाकर चतुर्थांश शेष क्वाथ बना लें, इस क्वाथ को 20 मिली सुबह-शाम पीने से सर्वांग शोथ, पेट के रोग, पार्श्वशूल, श्वास तथा खून की कमी में लाभ होता है।<br />•    खून की कमी व पीलिया में गिलोय रस एक ली, कांड कल्क 250 ग्राम, दूध 4 लीटर और घी एक किलो लेकर, मन्द अग्नि पर पकाकर घी मात्र शेष रहने पर छानकर रख लें। 10 ग्राम घी को चौगुने गाय के दूध में मिलाकर प्रात-सायं पीयें।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>यकृत् विकार व मंदाग्नि </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">•    यकृत् विकार व मंदाग्नि में-18 ग्राम ताजी गिलोय, 2 ग्राम अजमोद, 2 नग छोटी पीपल एवं 2 नग नीम की सीकें, इन सबको कुचलकर रात्रि को 250 मिली जल के साथ मिट्टी के बर्तन में रख दें। प्रात: पीसकर, छानकर पिला दें। 15 से 30 दिन तक सेवन करने से पेट के सब रोग दूर होते हैं।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>मूत्रकृच्छ्र </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">•    गुडूची के 10-20 मिली स्वरस में पाषाण भेद का 2 ग्राम चूर्ण और 1 चम्मच मधु मिलाकर दिन में तीन-चार बार सेवन करने से मूत्रकृच्छ्र में लाभ होता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>गठिया</strong></span><br />•    2-5 ग्राम गिलोय चूर्ण को दूध के साथ दिन में दो-तीन बार देने से गठिया और मूत्रम्लता मिटती है।<br />•    गिलोय के 20-30 मिली क्वाथ को सुबह-शाम पीने से गठिया में लाभ होता है।<br />•    गिलोय के 5-10 मिली रस अथवा 3-6 ग्राम चूर्ण या 10-20 ग्राम कल्क अथवा 20-30 मिली क्वाथ को प्रतिदिन निरंतर कुछ समय तक सेवन करने से वातरक्त में अत्यन्त लाभ होता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>कुष्ठ (कोढ़)</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">•    10-20 मिली गिलोय स्वरस को दिन में दो-तीन बार कुछ महीनों तक नियमित पिलाने से कुष्ठ में लाभ होता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>ज्वर रोगों में</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">•    जीर्ण ज्वर (पुराना बुखार): जीर्ण ज्वर या छ: दिन से भी अधिक समय से चले आ रहे, न छूटने वाले ज्वरों में 40 ग्राम गिलोय को अच्छी तरह कुचलकर, मिट्टी के बर्तन में 250 मिली पानी मिलाकर रात भर ढक कर रखते हैं और प्रात: मसल-छानकर प्रयोग करते हैं। 20 मिली की मात्र दिन में तीन बार पीने से ज्वर का शमन हो जाता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;">•    20 मिली गिलोय स्वरस में 1 ग्राम पिपली तथा 1 चम्मच मधु का प्रक्षेप देकर प्रात:-सायं सेवन करने से जीर्णज्वर, कफ, प्लीहारोग, खांसी, अरुचि आदि रोग नष्ट होते हैं।</h5>
<h5 style="text-align:justify;">•    20 मिली गिलोय स्वरस में 1 ग्राम पिपली तथा 1 चम्मच मधु का प्रक्षेप देकर प्रात:-सायं सेवन करने से जीर्णज्वर, कफ, प्लीहारोग, खांसी, अरुचि आदि रोग नष्ट होते हैं।</h5>
<h5 style="text-align:justify;">•   <strong> वातज्वर:</strong> बिल्व, अरणी, गम्भारी, मिलाकर सेवन करने से पैत्तिक शूलजन्य छर्दि, बुखार, जलन तथा अत्यधिक पिपासा का शमन होता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;">•    <strong>वातज्वर:</strong> श्योनाक (सोनापाठा) तथा पाढ़ल की मूल छाल तथा गिलोय, आँवला, धनिया ये सब बराबर-बराबर लेकर इनका क्वाथ बनाएं, 20-30 मिली क्वाथ को दिन में दो बार वातज्वर में सेवन करना चाहिए। </h5>
<h5 style="text-align:justify;">•    20-30 मिली गुडूची क्वाथ में पिपली चूर्ण मिलाकर या फिर छोटी कटेरी, सोंठ तथा गुडूची के क्वाथ (20-30 मिली) में पिपली चूर्ण मिलाकर पीने से वात कफज ज्वर, श्वास, खांसी तथा दर्द का निर्हरण होता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;">•    समभाग गुडूची, नीम तथा आँवला के 25-50 मिली क्वाथ में मधु मिलाकर पीने से विषम ज्वर का शमन होता है।</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पोषक उत्पाद</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Jul 2017 21:49:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>उत्तर प्रदेश राजभवन ने भारत की प्राचीन विधा योग का प्रशिक्षण कर रचा इतिहास-मुख्यमंत्री</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;">      उत्तर प्रदेश राजभवन के लिए 07 जून की प्रात: वेला अपने में ऐतिहासिकता लेकर आयी जब एक साथ राजयोगी व अध्यात्म योगी का दिव्य मिलन भारत की ऋषिप्रणीत प्राचीन विधा योग के प्रशिक्षण को लेकर हुआ। पतंजलि योगपीठ के परमाध्यक्ष स्वामी  रामदेव जी महाराज के मार्गदर्शन में अन्तर्राष्ट्रीय योगदिवस प्रोटोकाल योगाभ्यास प्रशिक्षण के इस अवसर पर उत्तरप्रदेश के राज्यपाल महामहिम श्री रामनाइक जी, मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी, उपमुख्यमंत्री श्री केशव प्रसाद मौर्या एवं श्री दिनेश शर्मा जी तथा प्रदेश के अनेक शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों के साथ सैकड़ो भाई-बहिनों ने योगाभ्यास किया। </h5>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/042.jpg" alt="04" /></p>
<h5 style="text-align:justify;">योग प्रशिक्षण अवसर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2459/uttar-pradesh-raajabhavan-ne-bhaarat-kee-praacheen-vidha-yog-ka"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/042.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">   उत्तर प्रदेश राजभवन के लिए 07 जून की प्रात: वेला अपने में ऐतिहासिकता लेकर आयी जब एक साथ राजयोगी व अध्यात्म योगी का दिव्य मिलन भारत की ऋषिप्रणीत प्राचीन विधा योग के प्रशिक्षण को लेकर हुआ। पतंजलि योगपीठ के परमाध्यक्ष स्वामी  रामदेव जी महाराज के मार्गदर्शन में अन्तर्राष्ट्रीय योगदिवस प्रोटोकाल योगाभ्यास प्रशिक्षण के इस अवसर पर उत्तरप्रदेश के राज्यपाल महामहिम श्री रामनाइक जी, मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी, उपमुख्यमंत्री श्री केशव प्रसाद मौर्या एवं श्री दिनेश शर्मा जी तथा प्रदेश के अनेक शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों के साथ सैकड़ो भाई-बहिनों ने योगाभ्यास किया। </h5>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/042.jpg" alt="04"></img></p>
<h5 style="text-align:justify;">योग प्रशिक्षण अवसर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने पूज्यवर सहित वहां उपस्थित अनेक योग संस्था प्रमुखों को धन्यवाद देते हुए कहा कि अपनी परम्परा एवं अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का सर्वाधिक महत्वपूर्ण माध्यम है योग। इस राजभवन परिसर में हो रहा यह अभ्यास निश्चित ही इस प्रदेश एवं देश के विकास के लिए महत्वपूर्ण मोड़ लेकर आयेगा। मुख्यमंत्री महोदय ने कहा कि हम सभी स्वस्थ शरीर एवं स्वस्थ मस्तिष्क का निर्माण कर सकें तथा स्वस्थ शरीर एवं स्वस्थ मस्तिष्क के साथ हम सब अपने को समाज के सामने प्रस्तुत कर सकें इस निमित्त यह योग अपने में महत्वपूर्ण है। इस अवसर पर उत्तरप्रदेश के आयुष मंत्री श्री धर्मसिंह सैनी जी एवं योगगुरु श्री भारतभूषण जी भी उपस्थित थे। </h5>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/452.jpg" alt="45"></img></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                            <category>योग दिवस</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2459/uttar-pradesh-raajabhavan-ne-bhaarat-kee-praacheen-vidha-yog-ka</link>
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                <pubDate>Sat, 01 Jul 2017 21:47:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ऋषियों की आध्यात्मिक योजना सोलह संस्कार</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">डॉ. साध्वी देवप्रिया</span>, </strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्षा-दर्शन विभाग </span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">पतंजलि विश्वविद्यालय</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">हरिद्वार</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2460/rishion-ki-adhyatmik-yojana-solah-sanskar"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/1051.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">निर्माणों के पावन युग में हम चरित्र निर्माण न भूलें</span>,</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वार्थ साधना की आँधी में वसुधा का कल्याण न भूलें।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span style="color:rgb(230,126,35);"><span lang="hi" xml:lang="hi">हम संसार में देखते हैं कि जो देश उन्नतिशील व प्रगतिशील होते हैं वे योजनाओं का एक तांता सा बाँध देते हैं। वार्षिक योजनाए पंचवर्षीय योजनाएँ दस वर्षीय योजना इत्यादि अनेक प्रकार की योजनाएँ बनाते हैं। उदाहरणार्थ कितने स्कूल कॉलेज विश्वविद्यालय बनाने है। कितने उद्योग लगाने हैं। कितनी नई रेलवे लाइनें बिछानी हैं। फसलों की सब्जियों की फलों की पशुओं की नस्लें कितनी हाईब्रिड करनी हैं इत्यादि। ये सब होना भी चाहिये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जिस मानव की खुशियों के लिए यह सब किया जा रहा है। आखिर उसके निर्माण की भी तो कोई योजना बननी चाहियें। क्योंकि उपरोक्तये सभी उन्नतियाँ अच्छी तो हैं मगर केवल भौतिकता तक सीमित हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इनसे आध्यात्मिक उत्थान की आशा नहीं की जा सकती एक तरफ उत्थान कदापि पूर्ण नहीं हो सकता और पूर्णता के बिना कभी शाश्वत सुख नहीं मिल सकता। हमारे ऋषियों ने इस मर्म को जाना था इसलिए उन्होंने कहा </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">यताअभ्युदय नि:श्रेयस: सिद्धि: स धर्म:</span>’’<span lang="hi" xml:lang="hi">। उसके लिए उन्होंने </span>16<span lang="hi" xml:lang="hi"> संस्कारों की एक आध्यात्मिक योजना बनाई थी। संस्कार किसे कहते हैं। उसका स्वरूप क्या है। चरक ऋषि कहते हैं- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">गुणान्तराधनम् हि संस्कारो उच्चते</span>’’ <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् किसी वस्तु या व्यक्ति के गुणों को परिवर्तित कर देना ही संस्कार है। </span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">म</span><span lang="hi" xml:lang="hi">हर्षि मनु कहते हैं-<strong> </strong></span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>''<span lang="hi" xml:lang="hi">जन्मना जायते शूद्र: संस्काराद् द्विजोच्यते</span>’’</strong></span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् जन्म से तो प्रत्येक मनुष्य शूद्र ही होता है। संस्कार के माध्यम से दूसरा आध्यात्मिक जन्म लेकर ही द्विज बनता है। मानव निर्माण की इस सर्वोच्च योजना की शुरुआत बालक के गर्भ में आने से पूर्व ही प्रारम्भ हो जाती है। माता-पिता अपने ज्ञान के अनुसार प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में जैसी आत्मा का आह्वान करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसी ही आत्मा माँ के गर्भ में आती है। यह ऐसा ही है जैसा कि अपना मकान बनाने से पूर्व जैसा नक्शा हम बनाते हैं। वैसा ही मकान बनकर तैयार हो जाता है। अत: बालक के गर्भावस्था से बाहर आने पर वह दो प्रकार के संस्कार लेकर पैदा होता है। एक अपने पिछले जन्मों के और दूसरे अपनी माता के या गुरु के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि भारतीय वैदिक परम्परा में माँ की भाँति गुरु भी अपने शिष्य को गर्भ में धरण करता है.</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्त:।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">तं रात्रिस्तिस्र उदरे बिभर्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तं जातं द्रष्टुंमभिसंयन्ति देवा:।। अथर्ववेद.</span>11/5/3)</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अपने आश्रम में आये ब्रह्मचारी को आचार्य तीन रात्रि अपने गर्भ में धारण करता है। इस प्रसंग से मुझे स्मरण आया इस सदी के एक बहुत ऊँचे सन्त श्रद्धेय स्वामी सोमानन्द जी महाराज कहा करते थे कि मैं तो अगले जन्म में माँ बनना चाहता हूँ। जिस प्रकार अपने गर्भ में रखकर माँ अपनी सन्तति का निर्माण करती है। राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृष्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गौतम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभिमन्यु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सीता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सावित्री व अनसूया जैसी सन्तानें उनकी माताओं ने ही तो तैयार की थी। माता जीजाबाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माता गुजरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मदालसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंजना आदि ने अपने जीवन से यह सिद्ध कर दिया कि माँ जैसा चाहे वैसा निर्माण कर सकती है। उसी प्रकार बल्कि उससे भी अधिक जीवन का निर्माण गुरु करता है। गुरु एक प्रकार से दिव्य माँ की भूमिका निभाता है क्योंकि वह बड़े मनुष्य को अपने गर्भ में धरण करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसीलिए तो शिष्य को अन्तेवासी कहा जाता है। और उस गुरु का भी गुरु सबसे बड़ी माँ जिससे गुरु भी ऊर्जा व प्रेरणा लेता है वह परमात्मा ईश्वर पूरे विश्व की जगदम्बा है उसके गर्भ में तो यह पूरा विश्व समाया है। </span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">ओऽम् हिरण्यगर्भ: समवर्त्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसीत।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">स दाधार त् पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वेद में ही अन्यत्रा कहा- </span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>''<span lang="hi" xml:lang="hi">त्वं हि न: पिता वसो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्वं माता शतक्रतो बभूविथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधाते सुम्नमीमहे।।</span>‘’</strong></span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋग्वेद</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज हम देखते हैं एक सांसारिक माँ तो अपनी दो-चार सन्तानों का निर्माण करती हैं लेकिन हमारे पूज्य गुरुदेव ने तो आज करोड़ों-करोंड़ों अपने जैसे अपने प्रतिरूप मानस पुत्रों व मानस पुत्रियों को जन्म दिया है। इसलिए माँ कोई शरीर नहीं बल्कि हमारी आत्मा काए आध्यात्मिकता का उत्कर्ष करने वाली एक महान् शक्ति है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब प्रश्न उठता है कि क्या अनन्त जन्मों के संस्कारों को इस जन्म के </span>16<span lang="hi" xml:lang="hi"> संस्कारों से मिटाया जा सकता है अथवा गर्भस्थ शिशु जो पैदा होने वाले हैं या हो चुके उनकों तो माँ संस्कारों से बदल देंगी किन्तु जो बड़े हो चुके उनका रुपान्तरण कैस हो </span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि वे अपने गुरु के गर्भ की शरण में आयें क्योंकि यदि शास्त्रोक्त वचन सम्भव नहीं होते तो शास्त्रों की रचना ही निरर्थक हो जाती। जिस प्रकार हजारों वर्षों से बन्द कमरे के अन्धकार को मिटाने के लिए एक दिया सलाई या मोमबत्ती जलाकर क्षण भर में प्रकाशित करना सम्भव है वैसे ही संस्कारों का या स्वभाव का परिवर्तन भी सम्भव है। यदि संकल्प ऊँचा हो और उसके प्रति समर्पण और अपेक्षित अखण्ड प्रचण्ड पुरुषार्थ हो तो दुनियाँ में कुछ भी असम्भव नहीं है। जब बालक अपनी माँ या गुरु के गर्भ से बाहर आता है तब उसके अपने पिछले जन्मों के संस्कार कमजोर व धुंधले व अनभिव्यक्त होते हैं और माँ से या गुरु से मिले संस्कार ज्यादा प्रबल व अभिव्यक्त होते हैं। इन्हीं संस्कारों को वंशानुगत या जैनिटिक संस्कार कहा जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके बाद दूसरे संस्कार अपने आस-पास के पर्यावरण से निर्मित होते हैं। गर्भ से मिलने वाले संस्कारों की प्रबलता के उदाहरण  माता मदालसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुभद्रा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंजना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कौसल्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीजाबाई और नेपोलियन की जननी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रहलाद भक्त की माता कयादु तथा ध्रव भक्त की माता सुनीति इत्यादि हैं। उसी प्रकार गुरु के गर्भ के संस्कारों की प्रबलता के उदाहरण योगेश्वर भगवान् कृष्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी विरजानन्द जी महाराज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समर्थ गुरु रामदास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री रामकृष्ण परम हंस और आधुनिक युग में योगऋषि स्वामी जी महाराज एवं श्रेद्धय आचार्य जी हैं। आज देश भर में लाखों नहीं करोड़ों भाई-बहन स्वामी महाराज के प्रतिरूप बनते हुए स्वयं को योग सेवा में समर्पित कर चुके हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये पूज्य गुरुदेव के विचारों व संस्कारों की महिमा नहीं तो और क्या है</span>?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिस प्रकार गर्भाधन संस्कार में माता-पिता जैसी आत्मा का आह्वान करते हैं वैसी ही आत्मा गर्भ में आ जाती है उसी प्रकार पतंजलि योगपीठ में छोटे बच्चे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रौढ़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहनें-भाई जैसी भी आत्माओं का श्रद्धेय स्वामी जी महाराज आह्वान करते हैं वैसी ही आत्माएँ यहाँ आ जाती हैं और उन्हें जैसा बनाना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसी ही वो बन जाती हैं। कोई पढ़ने में लगा है तो कोई पढ़ाने में कोई मार्केटिंग टीम में लगा है तो कोई रिसर्च में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई शल्य चिकित्सा में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राकृतिक चिकित्सा में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेदिक चिकित्सा में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गौशाला में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृषि में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बागवानी में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफाई में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षा में न जाने कितने प्रकार का निर्माण कार्य एक समर्थ गुरुसत्ता के माध्यम से यहाँ सम्पन्न हो रहे हैं। यह सब संस्कारों की ही महिमा है। ये संस्कार केवल एक बार करके निश्चिन्त हो जायें ऐसा नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु जीवन में </span>16<span lang="hi" xml:lang="hi"> बार विशेष निर्माण की ओर ध्यान आकर्षित करने की योजना हमारे ऋषियों ने बनायी थी और वह योजना आध्यात्मिक होने के साथ-साथ वैज्ञानिक भी है। अत: प्रारम्भ में गर्भाधन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुंसवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सीमन्तोनयन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जातकर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नामकरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्क्रमण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्नप्राशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चूड़ाकर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्णवेध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपनयन और वेदारम्भ पर्यन्त संस्कार लगभग एक दशक तक सम्पन्न करके जीवन निर्माण की एक सशक्तआधारशिला तैयार कर दी जाती है और इसी समय बालक को द्विज कहा जाता है जब गुरु उसे सावित्री या गायत्राी माँ की गोद में प्रतिष्ठापित कर देता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लगभग प्रत्येक दो दशक के बाद युग परिवर्तन की सम्भावना बनती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चूँकि इस वर्ष जो लाखों बच्चे पैदा हुए वही तो अगले बीस-पच्चीस वर्ष में युवा या गृहस्थी होंगे। और इस वर्ष जो लाखों गृहस्थी बनें वही तो अगले </span>40-50 <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्ष की उम्र में वानप्रस्थी बनेंगे और जो लाखों-लाखों वानप्रस्थी इस वर्ष वानप्रस्थ में दीक्षित हुए वही तो अगले </span>20-25 <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्ष बाद संन्यासी बनेंगे। अत: संस्कारों व वर्णाश्रमों की पावनी परम्परा जितनी अधिक सशक्तऔर पवित्र बनेगी उतना ही उत्कृष्ट मानव का जीवन व राष्ट्र होगा हम समाज में देखते हैं माता-पिता शिकायत करते हैं कि बच्चे सस्कारित बन जाएं अध्यापक चाहते हैं कि उनके विद्यार्थी बदल जायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथाकथित गुरु चाहते हैं कि उनके शिष्य दिव्य बनें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बॉस चाहते हैं कि उनके अधीनस्थ लोगों की कार्य प्रणाली सर्वश्रेष्ठ हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सफलता सबसे कोशो दूर है क्योंकि परिवर्तन की धरा उल्टी तरफ  से चलती है। बालक के जन्म से पहले माता-पिता संस्कारी योगी बनें तो बच्चे योगी पैदा हो। अध्यापक गुरु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बोस पहले स्वयं को परिवर्तित करें तो उनके अनुयायी सुसंस्कृत हो सकें अत: संस्कारों की जिम्मेदारी बड़ों पर ज्यादा होती है और यही कारण है कि जैसे सूर्य आकाश में पृथ्वी से कोशों दूर होते हुए भी पृथ्वी उससे प्रकाश ताप व जीवन धारण कर रही है उसी प्रकार हमारे गुरुदेव परम पूज्य स्वामी जी महाराज व श्रद्धेय आचार्य जी से हमारे करोड़ों-करोंड़ों कार्यकर्त्ता अपने-अपने घरों में भौतिक रूप कोसों दूर रहते हुए भी उनके जीवन से दिव्य प्रेरणा पाकर योगपथ परए आध्यात्म के पथ पर चलते हुए योग सेवा के माध्यम से अपने जीवन को धन्य बना रहे हैं। इसका कारण यह है कि जो सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्याग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र भक्ति सदा प्रसन्नता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहजता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सकारात्मकता पर दु:ख कातरता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम वात्सल्य व परमार्थ के संस्कार वे उनको देना चाहते हैं। उन सब संस्कारों से वे स्वयं सर्वथा व सर्वदा विभूषित व अलंकृत रहते हैं। संस्कारों से किस प्रकार जीवन में परिवर्तन आता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका सजीव उदाहरण इससे बड़ा कोई हो ही नहीं सकता। संस्कारों से युग परिवर्तन की योजना लेकर यदि हमारा प्रत्येक योग शिक्षक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग प्रचारक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तहसील</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिला व राज्य प्रभारी योगमय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वथ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वच्छ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्ध व संस्कारवान भारत का नक्शा तथा दृढ़ संकल्प व उस संकल्प के प्रतिपूर्ण समर्पण व पुरुषार्थ के साथ यदि हम आगे बढ़ें तो हमारा समाज राष्ट्र व युग वैसा ही होगा जैसा हम चाहेंगे। आमूल-चूल दिव्य परिवर्तन सर्वदा सम्भव है। यही हमारे महान् मनीषी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युगद्रष्टा ऋषियों की दिव्य मानव जीवन निर्माण की </span>16 <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कारों से युक्त पावनी परम्परा व आध्यात्मिक योजना रही है।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2460/rishion-ki-adhyatmik-yojana-solah-sanskar</link>
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                <pubDate>Sat, 01 Jul 2017 21:45:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>'21वीं सदी, योग की सदी’ का उद्घोष करती पतंजलि की तीन दशकीय योगयात्रा</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यात्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति एवं <span lang="hi" xml:lang="hi">सभ्यता</span></span><span lang="hi" xml:lang="hi">  का मूल तत्व है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व योगी होना हमारे पूर्वजों ने जीवन की सबसे बड़ी <span lang="hi" xml:lang="hi">उपलब्धि</span></span><span lang="hi" xml:lang="hi">  माना है। योग विद्या ही अध्यात्म विद्या अथवा परा</span> - <span lang="hi" xml:lang="hi">अपरा विद्याओं का मूल स्रोत ह</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ै। योग को केन्द्र में रखकर योगी संसार में वेदानुकूल कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचरण व व्यवहार करता हुआ जब निष्काम भाव से निष्कलंक जीवन जीता है तो समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र व विश्व के लिए वह सर्वश्रेष्ठ आदर्श हो जाता है। ऐसे में किसी कारणवश यदि हमें शास्त्रों</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> को पढ़ने का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समझने का सौभाग्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2461/21-vin-sadi-yog-ki-sadi-ka-udghosh-karti-patanjali-ki-teen-dashkiya-yogyatara"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/162.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यात्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति एवं <span lang="hi" xml:lang="hi">सभ्यता</span></span><span lang="hi" xml:lang="hi"> का मूल तत्व है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व योगी होना हमारे पूर्वजों ने जीवन की सबसे बड़ी <span lang="hi" xml:lang="hi">उपलब्धि</span></span><span lang="hi" xml:lang="hi"> माना है। योग विद्या ही अध्यात्म विद्या अथवा परा</span> - <span lang="hi" xml:lang="hi">अपरा विद्याओं का मूल स्रोत ह</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ै। योग को केन्द्र में रखकर योगी संसार में वेदानुकूल कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचरण व व्यवहार करता हुआ जब निष्काम भाव से निष्कलंक जीवन जीता है तो समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र व विश्व के लिए वह सर्वश्रेष्ठ आदर्श हो जाता है। ऐसे में किसी कारणवश यदि हमें शास्त्रों</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> को पढ़ने का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समझने का सौभाग्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय ना मिले तो हमारे हित में पुरुषार्थरत यही दिव्यकर्म योगी ही हमारे पथ प्रदर्शक या आदर्श होते हैं। तैत्तिरीयोपनिषद</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> में आचार्य अपने शिष्य से कहते हैं कि </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि संसार में तुझे कर्म या आचरण के विषय में कोई सन्देह उपस्थित हो जायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वहाँ जो विचारशील</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्काम कर्म में नियुक्त सरलमति एवं कल्याणभिलाषी महापुरुष हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे जैसा व्यवहार करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसा ही तू </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> करना। कल्याणाभिलाषी पुरुष का आशय ऐसे पुरुषार्थी से है जिनका प्रतिपल लोक के लिए समर्पित हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र-विश्व उत्थान में अपना सर्वस्व तिल-तिल कर होम कर रहा हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके योगनिष्ठ संकल्पों से विराटता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ में दिव्य सात्विकता व जीवन संबंधों में सरलता हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान-पुरुषार्थ से जन-जन को जोड़ने में संलग्र हो।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">व</span><span lang="hi" xml:lang="hi">र्तमान में योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज का जीवन इस दृष्टि से एक आदर्श जीवन कह सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनसे देश-विदेश के करोड़ों व्यक्ति निरन्तर एक उच्च चेतना युक्त दिव्य जीवन जीने की प्रेरणा पाते है, और उनके संकल्प से देशभर में संचालित हो रही नित्य एक लाख से अधिक योग कक्षायें जन-जन को आरोग्य दे रही हैं। वहीं उनका भारतीय ऋषि प्रेरित स्वदेशी संस्कृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी संकल्प की दिशा में प्रेरित पुरुषार्थ राष्ट्र निर्माण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। जिस तरह से पतंजलि योगपीठ ने योग आंदोलन को सफल बनाने के लिए अपने हजारों योगाचार्यों को जिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तहसील व गांव-गांव स्थापित किया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस दृष्टि से इन योगजन्य पुरुषार्थों का आंकलन करें तो संपूर्ण इक्कीसवीं सदी योग की सदी बनकर उभर रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी धमक अगले अनेक शदियों तक देखने को मिले तो आश्चर्य नहीं। भिन्न</span>-<span lang="hi" xml:lang="hi">भिन्न पहलुओं से यदि श्रद्धेय स्वामी जी महाराज के मार्</span><span lang="hi" xml:lang="hi">गदर्शन में संचालित पतंजलि की की सेवाओं का जिक्र  करें तो योग को केन्द्र में रखते हुए जो विराट निर्माण कार्य उन्होंने कर दिखाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह अपने आप में अभूतपूर्व एवं अद्वितीय है। पूज्य स्वामीजी महाराज की राष्ट्र को अर्पित सेवाओं से जहां देश में आरोग्य शक्ति का जागरण हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं योग-आयुर्वेद के माध्यम से राष्ट्र की बुनियाद मजबूत हो रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं विश्व निर्माण में भारत की भूमिका भी स्पष्ट होती चल रही है। जो राष्ट्र के लिए गौरव से कम नहीं है। यहां के गांव-गांव से अब योगनिष्ठ व्यक्तित्व निकल कर वैश्विक जगत को झकझोर रहे हैं।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/372.jpg" alt="37"></img></span></p>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग व योगकक्षाएं</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य योगऋषि कहते है कि योगाभ्यास हर अभ्यासी का करता है चरित्र निर्माण और चरित्र निर्माण से होता है राष्ट्र निर्माण। जिस प्रकार अन्न-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">जलादि से हमारा यह छोटा सा अस्तित्व कब बड़ा हो गया पता ही नहीं चलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे ही योग कक्षाओं के माध्यम से योग करते</span>-<span lang="hi" xml:lang="hi">करते करोड़ों स</span><span lang="hi" xml:lang="hi">फल होते व्यक्ति कब अज्ञान-अविद्या से मुक्त व उच्च चेतना से युक्त होकर सात्विक व्यक्तित्व वाले योगी बनते जा रहे हैं पता भी न चला। इससे राष्ट्र की चेतना </span><span lang="hi" xml:lang="hi">को </span>शक्ति मिलती रहीं है। योगाभ्यास से जुड़कर लाखों लोगों ने मांसाहार को छोड़कर शाकाहार अपनाया<span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">लाखों लोग नशामुक्त हुए</span><span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">असंख्यों को स्वस्थ परिवार निरोग जीवन का मार्ग प्रशस्त हुए। यही नियमितता बनी रही तो शीघ्र ही इस योग को केन्द्र में रखकर हम सब परा-</span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">अपरा विद्याओं का ज्ञान भी आत्मसात कर सकेंगे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सन् </span>1995<span lang="hi" xml:lang="hi"> से अब तक पतंजलि के योग आंदोलन के माध्यम से  देश में वर्गगत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जातिगत व धर्मगत दीवारें ढही हैं। क्षेत्रवाद पददलित हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही करोड़ों व्यक्ति रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नशा व व्यसन मुक्त होकर मांसाहारी से शाकाहारी होकर आज समाज निर्माण में लगे हैं। लाखों लोगों के लिए शक्ति केन्द्र बनी ये योग कक्षाएं। समाज व राष्ट्रनिर्माण हेतु यदि हम विचार करें तो एक-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">एक गांव में चलने वाली ये हमारी योग कक्षाएं ही वो निर्माण की आधारभूत नींव साबित होंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन पर खड़े होने वाले भवन में सर्वप्रथम व्यक्ति का निर्माण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति निर्माण से ग्राम निर्माण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्राम निर्माण से समाज निर्माण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज निर्माण से राष्ट्र निर्माण और राष्ट्र निर्माण से विश्वनिर्माण व युग निर्माण का वह विराट् एवं दुरूह कार्य संपन्न</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> हो पायेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो युग के लिए आवश्यक है। इस भागवत् यज्ञ को पूर्णाहुति तक पहुँचाने के लिए हर गांव में विचारशील</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्काम कर्मयोगी कार्यकर्ताओं की टीम अनवरत लगी है। मानव निर्माण के इस पुण्य अभियान में पूज्य स्वामी जी महाराज व श्रद्धेय आचार्यश्री महाराज इस धरती पर भगवान का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य का व दिव्यता का साम्राज्य स्थापित करने प्रतिबद्ध हैं। करोड़ों</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ों शाश्वत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृतनिष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चरित्रनिष्ठ योगी प्रतिनिधियों का निर्माण करना पतंजलि का लक्ष्य है। विश्लेषक जानते हैं कि किसी भी परिवर्तन के लिए मात्र राजनैतिक व्यवस्था बदलना पर्याप्त नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवर्तन के लिए आवश्यक है व्यक्ति के अंत:करण में बदलाव। व्यक्ति जैसेजैसे श्रेष्ठता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पवित्रता से जुड़ता जायेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज-राष्ट्र व विश्व के स्थाई निर्माण की स्पष्टता बढ़ती जायेगी। सन 1995 में दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट की स्थापना से लेकर अब तक विराट विस्तार में योग कक्षायें ही मूल धुरी रही हैं। जैसे गांधी जी ने चरखा को केन्द्र बनाकर देश में स्वतंत्रता आंदोलन की हूक पैदा की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ठीक वैसे ही पतंजलि का योगाभ्यास अभियान काम कर रहा है। इसी केन्द्र में गुथते जा रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी  चिकित्सा व स्वास्थ्य से लेकर राष्ट्रीय समृद्धि के ऋषि प्रणीत सूत्र। </span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अहमदाबाद में राष्ट्र को समर्पित हुए तीन लाख राष्ट्रयोगी</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत गांवों का देश है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गांव भारत की रीढ़ हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: गांव-गांव योगाभ्यास चलेगा तो देश की रीढ़ मजबूत व स्वस्थ होगी। तृतीय अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर पतंजलि की ओर से विश्व को यह बड़ा उपहार अहमदाबाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुजरात के योगमहोत्सव के माध्यम से तीन लाख भाई-बहिनों द्वारा एक साथ योगाभ्यास कर विश्वरिकार्ड बनाने के रूप में मिला। इसके लिए सम्पूर्ण देशभर में पतंजलि की ओर से महीनों से तैयारियां चलीं। एक गांव में 100 जवान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">100 किसान व 100 महिलाएं संगठित होकर योग करने व अन्य द्वारा उन्हें देखकर वैसा ही आचरण करने का महीनों से संकल्प कराया गया। व्यापकता के साथ योग दिवस पर वही संकल्प अभियान बनकर अहमदाबाद में दिखा।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/381.jpg" alt="38"></img></span></p>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भावी सम्भावनायें</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तृतीय अन्तर्राष्ट्रीय योगदिवस के अभियान के साथ ही आशा है कि देश के प्रत्येक गांव में एक-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">दो वर्ष के बाद एक भी व्यक्ति न रोगी होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न नशा करेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा अभियान चलाया जा रहा है। इस संदर्भ में सोच है कि यदि एक जिले में 500 योगाभ्यासी गांव हैं तो डेढ़ लाख और यदि 1000 गांव हैं तो 3 लाख योगी लोगों का संगठन खड़ा हो सकता है और यदि उनके साथ 5-10</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> व्यक्ति भी उनके मित्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रिश्तेदार आदि जुड़े तो यह </span><span lang="hi" xml:lang="hi">संख्या</span><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्येक जिले में 10</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">15 लाख से लेकर 20-30 लाख तक पहुंच सकती है। इसी संकल्पना से पतंजलि पुरुषर्</span><span lang="hi" xml:lang="hi">थरत है।  इससे भी बढ़कर पतंजलि के इस आंदोलन के माध्यम से राष्ट्र को भारी संख्या में नि:शुल्क समर्पित सेवाभावी व्यक्तित्व मिल रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो 2 घण्टे नित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सप्ताह में 2 दिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्ष में 2 माह व जीवन में 2 वर्ष अथवा पूरा जीवन तक झोंकने हेतु संकल्पित हो रहे हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तृतीय योगदिवस पर पतंजलि की ओर से हर व्यक्ति  को ऋषियों का यह संदेश है कि क्रियाशील बनो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग महिमा का प्रचार करो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐश्वर्य को बढ़ाओ विश्व को श्रेष्ठ बनाओ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ-निरोग जीवन जीयो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र व विश्व को समृद्ध बनाओ। </span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुर: कृण्वन्तो</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वमार्यम्। अपघ्नन्तो अराव्ण:।। ऋग् ९/६ २/५</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् देश पर राष्ट्रभक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सदाचारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजाहितैषी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यायप्रिय लोगों का शासन हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब तरफ रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नशा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञान व व्यसन मुक्त</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च चेतना युक्तराष्ट्र हितैषी नागरिकों का निर्माण हो। ऐसा पूज्य योगऋषि स्वामी जी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज का संकल्प है व इसी को पूरा करने के लिए अपना सुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आराम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसिद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मान</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय व शक्ति सब कुछ दांव पर लगाकर संघर्ष कर रहे हैं। नित्य योगाभ्यास से आप भी अपने सपनों का भारत अपने ही हाथों से बनाने का सौभाग्य पा सकते हैं। इस निर्माण में स्वयं लगें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि इसका निर्माण भी हमसे अतिरिक्त और कौन करेगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">हम योगनिष्ठ बन इस दिशा में बढ़ेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी साकार होगा विश्व निर्माण का स्वप्र और इक्कीसवीं सदी बनेगी योग सदी।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/392.jpg" alt="39"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व रिकार्ड के नाम रहे सभी अंतर्राष्ट्रीय योगदिवस भिलाई योगशिविर के नौ विश्व रिकार्ड :</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के मार्गदर्शन एवं सानिध्य में छत्तीसगढ़ प्रांत के भिलाई नगर में पतंजलि योग विज्ञान शिविर आयोजित हुआ। इसमें लगभग एक लाख लोगों ने एक साथ सामूहिक रूप से एक स्थान पर योग व प्राणायाम से संबधित 9 विश्व रिकार्ड बनाये थे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<ul style="list-style-type:square;">
<li>
<h5 style="text-align:justify;">शिविर में 1 लाख से अधिक लोगों ने एक साथ 1 मिनट में 10 पुशअप लगाकर सामूहिक 10 लाख पुशअप का अनूठा पांचवा विश्व रिकार्ड बनाया ।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>इसी क्रम में पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज के शिष्य (सीकर, राजस्थान) के भाई जयपाल ने 141 मिनट तक शीर्षासन कर नया विश्व कीर्तिमान बनाया था। क्योंकि पूर्व में पतंजलि विश्वविद्यालय के विद्यार्थी श्री व्योम झा द्वारा 90 मिनट तक शीर्षासन का रिकार्ड तोड़ा जा चुका था। </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5> पूज्य स्वामी जी के ही एक अन्य शिष्य भाई रोहतास ने फास्टेस्ट (सबसे तेज) पुशअप का सातवां विश्व रिकार्ड बनाया। उन्होंने 1000 पुशअप मात्र 19 मिनट 20 सेकेण्ड में लगाकर कनाडा के विलियम का 27 मिनट 40 सेकेण्ड में 1000 पुशअप का रिकार्ड तोड़ दिया था।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>इस शिविर में आठवां व नवां विश्व रिकार्ड 50,000 से अधिक लोगों द्वारा सर्वांगासन एवं हलासन का एक साथ सामूहिक अभ्यास कर स्थापित किया गया।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>योगशिविर में ही दिव्यांग गौकरण (जो हाथों से अपंग होने के साथ-साथ मूक एवं बधिर है) ने पैरों से अनुलोम-विलोम किया और फाईन आर्टिस्ट की प्रतिभा का परिचय देकर पैरों से स्वामी जी की पेटिंग बनाकर लोकार्पित की।</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>पतंजलि के गोल्डेन बुक आफ वल्र्ड रिकार्ड</strong></span></h5>
<ul style="list-style-type:square;text-align:justify;">
<li>
<h5>पतंजलि विश्वविद्यालय के रवि व्योम शंकर झा द्वारा 89.08 मिनट तक शीर्षासन का विश्व रिकार्ड बनाया।</h5>
</li>
<li>
<h5>7 घंटे में लगातार 3100 बार सूर्य नमस्कार करके सर्वाधिक संख्या में लगातार सूर्य नमस्कार करने का वल्र्ड रिकार्ड पतंजलि योग समिति के ब्रह्मचारी गोविन्द जी द्वारा बना।</h5>
</li>
<li>
<h5>47 किग्रा. के साथ एक मिनट में 41 बार पुशअप लगाकर नया गोल्डन बुक आफ वल्र्ड रिकॉर्ड स्थापित किया जाना।</h5>
</li>
<li>
<h5>प्रथम बार 25 किग्रा. वजन के साथ एक दिन में 5125 पुशअप का नया विश्व रिकार्ड, पतंजलि के रोहताश चौधरी द्वारा बनाया गया।</h5>
</li>
<li>
<h5>सर्वाधिक लोगों द्वारा एक साथ योग का विश्व रिकार्ड, लगभग 1,00,000 (1 लाख) लोगों द्वारा एक साथ योगाभ्यास।</h5>
</li>
<li>
<h5>लगातार सामूहिक रूप से 1250 लोगों द्वारा शीर्षासन करने का गोल्डन बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड।</h5>
</li>
</ul>
<h5> </h5>
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>पतंजलि के गिनीज बुक आफ वल्र्ड रिकार्ड</strong></span></h5>
<ul>
<li>
<h5 style="text-align:justify;">408 लोगों ने पूज्य स्वामी रामदेव जी के साथ मिलकर एक साथ एक स्थान पर शीर्षासन किया तथा विश्व कीर्तिमान स्थापित किया, जो गिनिज वल्र्ड रिकार्ड बना।</h5>
</li>
<li>
<h5 style="text-align:justify;">रोहताश चौधरी के द्वारा एक मिनट में 36.60 किग्रा. वजन के साथ 51 पुशअप का गिनिज वल्र्ड रिकार्ड स्थापित किया गया।</h5>
</li>
</ul>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्था समाचार</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Jul 2017 21:44:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>योगाभ्यास से लायें, जीवन के प्रारब्ध व पुरुषार्थ में संतुलन</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2462/yogabhays-se-laye--jivan-ke-prarabdh-va-purusharth-me-santulan"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/1621.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   अक्सर विचार आता है कि जीवन के निर्माण में प्रारब्ध व पुरुषार्थ का कितना योगदान है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इन दोनों के योगदान को समानरूप से स्वीकार करना है या किसी एक पर केन्द्रित होकर दूसरे की उपेक्षा की जा सकती है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">बलाबल की दृष्टि से देखें तो इन दोनों में से अधिक बलवान् कौन है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रारब्ध व पुरुषार्थ का वास्तविक तात्पर्य क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी का प्रारब्ध हीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशुभ व अवर कोटि का है तो क्या उसे बदला भी जा सकता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा लगता है इन प्रश्नों की मीमांसा में जीवन की मूलभूत आवश्यकता व गहनतम समस्या का समाधान छिपा हुआ है। वस्तुत: प्रारब्ध व पुरुषार्थ का यह प्रश्न मनुष्य जीवन के कर्म के साथ जुड़ा हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे योगाभ्यास द्वारा योगी संतुलित करने का प्रयास करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श</span><span lang="hi" xml:lang="hi">रीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रियों व मन के द्वारा जो कुछ किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनमें जो परिणाम घटित होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">है। प्राणियों के द्वारा की जाने वाली कुछ क्रियाएँ स्वरसवाही अविदित भाव से होती हैं तथा कुछ इच्छा-अधीन बाह्य-कारणों से दबकर या बाह्य-कारणों के प्रभाववस भी होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे हम कर भी सकते हैं और नहीं भी कर सकते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह पुरुषकार पुरुषार्थ है और जो चेष्टा स्वरसवाही है या जो करनी ही पड़ेगी उसका नाम है आरब्ध कर्म या संस्कारजन्य कर्म। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार मनुष्यों की अनेक मानसिक चेष्टाएँ पुरुषकार रूप हैं एवं पशुओं की अनेक चेष्टाएँ आरब्ध कर्म या भोगरूप हैं। मनुष्य संस्कारजन्य प्रवृत्ति का अतिक्रमण करके जो चेष्टा करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही पुरुषकार है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इच्छा ही प्रधान कर्म है। इच्छा होने के लिए इच्छा के विषय रूप एक ज्ञेय भाव का ज्ञान चाहिए। वह इच्छा पूर्व संस्कार विशेष से जब (या जितनी) हम लोगों के अधीन होकर कार्य करती रहती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब वह अदृष्ट या भोगभूत कर्म कहलाता है और वह इच्छा जब (या जितनी) हम लोगों के अधीन होकर अर्थात् पूर्ववत कर्म संस्कार का अतिक्रम करके कार्य करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब वह पुरुषार्थ रूप कर्म के रूप में जानी जाती है। फलत: इच्छा ही कर्म का उपादान या कर्म का मूलस्वरूप है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार कर्म दो प्रकार के होते हैं- संस्कारजन्य कर्म और पुरुषार्थ रूप कर्म। अभ्यासवश अचेतन होकर पुराने कर्मों को ही किये चले जाते रहने का नाम है संस्कारजन्य कर्म। तथा सचेतन होकर किये जाने वाले कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे वे पुराने कर्म हैं अथवा नवीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनको पुरुषार्थ रूप कर्म कहते हैं। इस प्रकार चाहे संस्कारजन्य कर्म हों या पुरुषार्थ रूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों से ही आगे अच्छा-बुरा कर्माशय बनता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे जाति-आयु-भोगरूप फल होते हैं। स्वप्नावस्था केकर्म भी संस्कारजन्य कर्म की श्रेणी में आते हैं। वह संस्कारजन्य कर्म और जो किया जाता है वह पुरुषार्थ। बाह्य संसार में एक-एक उद्देश्य को सामने रखकर व्यक्ति कर्म करता है। जैसे- इस कर्म से मेरी आजीविका चलती रहेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं अपने से सम्बन्धित पारिवारिक जनों की भौतिक आवश्यकताओं को पूर्ण कर पाउँगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस अमुककर्म से समाज में मैं अपना स्थान बना पाऊँगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरी पहचान बनेगी। मैं संसार में एक विशेष आदर्श स्थापित करना चाहता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं लोगों की सेवा करना चाहता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे पास कोई वस्तु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग्यता या सामर्थ्य है और दूसरों को उसकी आवश्यकता है तो मैं उन्हें देना चाहता </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इत्यादि। कर्म के द्वारा जहाँ बाहरी दुनियां में कुछ परिवर्तन घटित होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ साथ-साथ कर्म कर्त्ता के मन व इन्द्रियों में भी एक विशेष प्रकार का परिवर्तन चल रहा होता है। जिस भाव विशेष के साथ कर्म किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म के द्वारा वह भाव विशेष भी मनुष्य के अन्दर ही अन्दर निर्मित होता रहता है। उदारता या लोभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परमार्थ या स्वार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम या घृणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्यम या अकर्मण्यता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्ति या संघर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दया या क्रूरता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरों का सम्मान या तिरस्कार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय की विशालता या संकोच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये सब भाव कर्म के द्वारा ही मनुष्य के स्वभाव का अङ्ग बनते हैं। इसमें मैत्री</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुदिता के साथ किये गये कर्म मनुष्य के अन्तस् में निर्मलता लाते रहते हैं तो स्वार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईर्ष्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पर्द्धा व अहंकार पूर्ण कर्मों से चित्त अशुद्ध होता जाता है। इस प्रकार कर्म से ही व्यक्ति के स्वभाव विशेष का गठन होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी भी व्यक्ति के स्वभाव के अंग बने हुए कर्मों का नाम ही संस्कारजन्य कर्म है। जिन कर्मों ने भोग देना आरम्भ कर दिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कर्म सहज हो गये हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना प्रयास के होते रहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन कर्मों को व्यक्ति लाभ-हानि का बहुत विचार किये बिना ही करता रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका नाम है संस्कारजन्य कर्म।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लोक में यह कथन अक्सर सुनने में आता है- कि इसकी तो किस्मत ही माड़ी (कमजोर) है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका तो भाग्य ही खराब है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह चीज इसके भाग्य में थी ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका भाग्य बहुत अच्छा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसकी किस्मत बहुत अच्छी है इत्यादि। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वास्तव में जहाँ शुद्ध कर्मों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुभ कर्मों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म युक्त कर्मों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञानयुक्त कर्मों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्र व आचार्योपदेश केअनकूल कर्मों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सह-अस्तित्व या समष्टि के हित के भाव के साथ किये गये कर्मों से उत्तम प्रारब्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान युक्त प्रारब्ध का निर्माण होता है। वहीं अशुद्ध कर्मों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशुभ कर्मों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधर्म युक्त कर्मों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञान युक्त कर्मों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेहोशी में किये गये कर्मों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्र व आचार्यों केद्वारा असमर्थित कर्मों अर्थात् स्वेच्छा चारिता पूर्ण कर्मों से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोभ-मोह-अहंकार-ईर्ष्याद्वेष तथा दूसरों को नीचा और अपने को विशेष सिद्ध करने के भाव के साथ आचरित कर्मों से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पर्द्धा के भाव के साथ किये गये कर्मों से अज्ञान युक्त प्रारब्ध का निर्माण होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार प्रारब्ध का पर्याय </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भाग्य</span>’ '<span lang="hi" xml:lang="hi">भज सेवायाम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">धातु से निष्पन्न </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भाग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द का अर्थ है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका सेवन किया जाए। कर्मों का भी व्यक्ति एक अर्थ में सेवन ही तो करता है। भाग से सम्बद्ध ही भाग्य है। यह शब्द भी अन्तत: व्यक्ति के पूर्वकृत कर्मों की तरफ ही संकेत कर रहा है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस आधार पर एक व्यक्ति को जन्म के साथ जो प्राप्त होता है- उत्तम-मध्यम-सामान्य बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रंग-रूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कण्ठ का स्वर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाक्शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशिष्ट अभिरुचियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर-सौष्ठव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भौतिक ऐश्वर्य- यह सब उसका प्रारब्ध कहा जाता है। पूर्वजन्मों में उसने जो </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ</span><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi"> </span>किया- उस समय वह उसका पुरुषार्थ था। कल का पुरुषार्थ आज का प्रारब्ध है<span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">किन्तु आने वाले कल के लिए आज जो कुछ किया जा रहा है वह सचेतनता केअनुपात में उत्तम-मध्यम-निम्न कोटि केपुरुषार्थ का रूप धारण कर लेता है। प्रत्युत प्रारब्ध के साथ ही पुरुषार्थ आगे बढ़ता है। जो कुछ किया जा रहा है वह सचेतनता केअनुपात में उत्तम-मध्यम-निम्न कोटि केपुरुषार्थ का रूप धारण कर लेता है। अर्थात प्रारब्ध की दिशा में ही जब पुरुषार्थ किया जाता है तो प्रारब्ध से सर्वथा अलग हटकर पुरुषार्थ नहीं होता। प्रत्युत प्रारब्ध के साथ ही पुरुषार्थ आगे बढ़ता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रश्न यह उठता है यदि किसी को यह समझ आ जाये कितेरा प्रारब्ध अर्थात् कर्माशय अच्छा नहीं है तो क्या वह अपने प्रारब्ध को बदल सकता है या उसी दिशा में बढ़ता रहेगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यद्यपि पुरुषार्थ (</span>Free-Will<span lang="hi" xml:lang="hi">) का महान् सम्बल सदा व्यक्ति के साथ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु फिर भी वह एकाएक (सहसा) कार्य नहीं करता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शनै:-शनै उसका वेग बढ़ता है।  हाँ! यदि व्यक्ति के द्वारा अपने प्रारब्ध को बदलने के लिए कोई प्रयास ही नहीं किया जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रारब्ध पर बाह्यशक्ति (</span>External-Force<span lang="hi" xml:lang="hi">) का कुछ भी प्रयोग नहीं हो रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तो प्रारब्ध का जो भी रूप उपलब्ध है अच्छा या बुरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही आगे-आगे बढ़ता रहेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्धान्तत: प्रारब्ध का परिवर्तन असम्भव कार्य नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह अवश्य ही बदल सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु गुरूपदेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगाभ्यास शास्त्र श्रवण या अपनी ही विचार शक्ति के प्रयोग से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने जीवन की ठोकरों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्खलन-पतन इत्यादि के द्वारा पहले यह तो समझ में आये किमेरा प्रारब्ध मेरे लिए भी और दूसरों के लिए भी लाभकारी या सुखकारी नहीं है। यह तथ्य सुस्पष्ट होने पर तो मानवीय स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि शीघ्र या देर से परिवर्तित होकर ही रहेगा। चूँकि पुरुषार्थ से अर्थात् कर्म से प्रारब्ध बना है सो उसका परिवर्तन भी पुरुषार्थ से ही होगा। व्यक्ति जिसका परिवर्तन चाहता है उस पर विपरीत क्रिया करनी ही होती है। जैसे लोभ के प्रारब्ध को बदलने के लिए निर्लोभता की प्रचण्ड क्रिया चाहिए। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार प्रारब्ध और पुरुषार्थ में कौन अधिक बलवान् है- इस प्रश्न के उत्तर में तो यही कहा जा सकता है स्वरूपत: न प्रारब्ध अधिक बलवान् है न पुरुषार्थ। जिस समय जिसकी शक्ति (क्रियाशीलता) अधिक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस समय वही अधिक बलवान् है। कभी-कभी शास्त्रकार प्रारब्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाग्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिष्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दैव की महिमा गाते सुनाई पड़ते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यथा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">न दिष्टमभ्यतिव्रछान्तुं शक्यं भूतेन केनचित्। <strong>दिष्टमेव ध्रुवं मन्ये पौरछषं तुनिरर्थकम्ज्।</strong></span><strong>‘ (<span lang="hi" xml:lang="hi">विदु</span>0<span lang="hi" xml:lang="hi"> नी</span>0 8/32)</strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् भाग्य को बदलने में कोई प्राणी समर्थ नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं भाग्य को ही बलवान् समझता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ तो निरर्थक है। ऐसे वचनों का यह अभिप्राय लिया जा सकता है कि निर्बल चित्त</span>,</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मूढ़ात्मा लोगों की ऐसी ही मन:स्थिति होती है। जबकि आत्मज्ञानी बलवान् पुरुष तो इसके विपरीत ही भाषा बोलते हैं जैसी श्रीराम ने रावण विजय के पश्चात् सीता से बोली थी कि </span><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">दैवेन तु यत् सम्प्राप्तं पौरुषेण त्वपाकृतम्।'</span></strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् हे सीते! दैव भाग्य दोष से मैंने जो कष्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अनर्थ प्राप्त किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे मैंने पुरुषार्थ से दूर कर दिया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विशेष तथ्य यह कि जो विशेष व्यक्ति हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनकी सम्पत्ति और विपत्ति में एकरूपता रहती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी बुद्धि में दैव के अनुसार सुख एवं दु:ख के अनुभव के अनुरूप परिवर्तन नहीं होता। ऐसे विरले महापुरुष द्वन्द्वातीत होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे धीर पुरुष अपने पुरुषार्थ (पौरुष) से अपने अन्दर सचेतन होकर किये गये नवीन कर्म से दैव (पुरातन कर्म) को पराजित करने में समर्थ होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वास्तव में भगवान् ने बिना किसी भेदभाव या पक्षपात के हर एक व्यक्ति में अपरिमित ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति व सामर्थ्य की संभावना देकर धरती पर जन्म दिया है। हर मानव में महामानव होने का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देवत्व व ऋषित्व को उपलब्ध होने का सामर्थ्य दिया है। यदि हम दोष पूर्ण आलम्बन एवं दोषपूर्ण अभ्यासों से निरन्तर बचते रहें और दृढ़ संकल्प पूर्वक घनघोर पुरुषार्थ करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हर किसी क्षेत्र में विशेष उन्नति कर सकते हैं और अपने प्रारब्ध  को भी बदल सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2462/yogabhays-se-laye--jivan-ke-prarabdh-va-purusharth-me-santulan</link>
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                <pubDate>Sat, 01 Jul 2017 21:43:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>योग के मूल सिद्धांत </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">स्वामी रामदेव जी महाराज</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2463/yog-ke-mul-siddhant"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/503.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">जादी के </span>70<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों के बाद भारत को एक ऐसे प्रधानमंत्री मिले हैं जो आध्यात्मिक विकास एवं आर्थिक विकास को एक साथ लेकर देश को परम वैभवशाली वैश्विक महाशक्ति बनाने में लगे हैं। माननीय प्रधानमंत्री श्री मोदी जी में भारत का गौरवशाली अतीत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामर्थ्यमय वर्तमान एवं स्वर्णिम भविष्य का दिव्य दर्शन होता है। प्रधानमंत्री बनने के बाद श्री मोदी जी ने यू.एन. में अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस का प्रस्ताव रखा और </span>177<span lang="hi" xml:lang="hi"> देशों के समर्थन से </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi"> जून अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित हुआ। आज दुनियां के लगभग सभी दो सौ  देश योग कर रहे हैं। पूरे विश्व में योग एवं भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति को गौरव मिल रहा है। पूरे विश्व में सभी आयु एवं सभी वर्गों के लोगों में योग को लेकर काफी उत्सुकता है। अत: योग के विभिन्न पहलुओं के सन्दर्भ में हम संक्षेप में प्रकाश डालने का विनम्र प्रयास कर रहे हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1) <span lang="hi" xml:lang="hi">योग कोई मजहबी परम्परा या अभ्यास नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु योग एक वैज्ञानिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सार्वभौमिक व पंथनिरपेक्ष जीवन पद्धति है। रोगियों के लिए योग एक सम्पूर्ण चिकित्सा (पद्धति) तथा योगियों के लिए एक साधना पद्धति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुक्ति का मार्ग और जीवन में पूर्णता प्राप्त करने का साधन है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">2)  <span lang="hi" xml:lang="hi">योग पर अनुसंधान व अनुभव करके हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि योग से हमें पांच मुख्य लाभ होते हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  क)  एक-एक सेल से लेकर पूरे सिस्टम का संतुलन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर के सभी कैमिकल्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सॉल्ट्स व हार्मोन्स से लेकर सम्पूर्ण शारीरिक संतुलन योग से होता है। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">समत्वं योग उच्यते</span><span lang="hi" xml:lang="hi">।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  ख)   डिजर्नेट हुए सेल्स को हम योग से रिजर्नेट कर लेते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  ग)  मनुष्य में निहित ज्ञान शक्ति एवं सामर्थ्य एक से पांच प्रतिशत ही जागृत अवस्था में होता है। अन्य शक्तियां प्रसुप्त अवस्था में होती हैं। योग से हमारी सुप्त ज्ञान शक्ति एवं अन्य अपरिमित दिव्य शक्तियों का जागरण होता है। योग नर से नारायण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीव से ब्रह्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानव से महामानव बनाने वाली आध्यात्मिक विद्या या आध्यात्मिक विज्ञान है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  घ)  योग से हमारे अज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशुभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अविद्या का धीरे-धीरे क्षय तथा विवेक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुभ व समस्त दिव्यताओं का निरन्तर उदय या विकास होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  ड)  प्रत्येक मनुष्य के शरीर में कोई भी रोग तथा चित्त में कोई विकार पैदा हो सकता है। परन्तु योग से हमारे शरीर व चित्तगत समस्त विकारों के बीज नष्ट हो जाते हैं और योगी निर्बीज हो जाता है। योग से व्याधि की समाप्ति तथा समाधि एवं दिव्य जीवन की प्राप्ति होती है। दिव्यज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वात्सल्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्यशक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामर्थ्य एवं दिव्य विभूतियों से युक्त होता है योगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">3)   <span lang="hi" xml:lang="hi">योगी के जीवन में अर्थात् जो आत्माएँ योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम व ध्यानादि का नियमित श्रद्धा पूर्वक अभ्यास करते हैं तथा योग युक्त दिव्य आचरण करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके जीवन में </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> बड़े सत्यों का समावेश हो जाता है। इन्हें ही योग में यम नियम कहते हैं-अहिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्तेय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मचर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपरिग्रह ये पाँच यम हैं तथा शौच (शुचिता)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सन्तोष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वाध्याय एवं ईश्वर प्रणिधान ये पांच नियम हैं। अत: योगी कभी भी हिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">झूठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेईमानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब्रह्मचर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असंयम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लालच में नहीं पड़ता तथा उसके जीवन में अशुचिता (अपवित्रता)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असंतोष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अकर्मण्यता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मविमुखता व नास्तिकता नहीं होती है। योगी अष्टांग योग का पालन करता है अथवा अष्टांग योग का अपने जीवन में आचरण करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अहिंसासत्यअस्तेयब्रह्मचर्यअपरिग्रहा: यमा:।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">शौचसन्तोषतप:स्वाध्यायईश्वरप्रणिधानानि नियमा:।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="right"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>(<span lang="hi" xml:lang="hi">योग दर्शन)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">4)  <span lang="hi" xml:lang="hi">लगभग </span>700<span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ की विश्व की कुल आबादी में से यदि एक प्रतिशत जनसंख्या भी योगी बन जायेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह दुनियां बहुत सुन्दर समृद्धिमय व शान्तिमय हो जायेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि एक योगी की आत्मा में हजारों लाखों व्यक्तियों से अधिक सामर्थ्य व दिव्यता होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">5)  <span lang="hi" xml:lang="hi">योग न करने वाले या योगी जीवन न जीने वाले लोग सात चीजों के लिए अधिकांशत: संघर्ष करते दिखते हैं- सत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भौतिक इन्द्रिय सुख व भौतिक सम्बन्ध बाह्य समृद्धि एवं सफलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्हीं की प्राप्ति को सामान्य लोग अपने जीवन का अन्तिम लक्ष्य समझ लेते हैं। योगी आत्माओं के जीवन में भी ये सत्य होते हैं। लेकिन इनको योगी ईश्वर का अनुग्रह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माता-पिता व गुरुजनों व समाज के आर्शीवाद से प्राप्त होने वाले कर्त्तव्य के रूप में स्वीकार करता है। ये योगी के जीवन के बाय-प्रोडक्ट बन जाते हैं। योगी के जीवन का मुख्य या अन्तिम ध्येय तो योग-कर्मयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग यज्ञ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधना-सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ-परमार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभ्युदय व नि:श्रेयस ही होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">6)  <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुन्दरता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शाश्वत स्थाई सुख व सफलता-ये सात विश्व के सभी इंसानों की मूलभूत कामनाएं या इच्छाएं हैं। इन सात विवेकपूर्ण कामनाओं की भी प्राप्ति होती है योग से। और योगी अन्तत: अकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्णकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आप्तकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्काम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या ब्रह्मकाम होकर जीवन मुक्त हो कर भगवान का दिव्य यंत्र या दिव्य प्रतिनिधि होकर जीता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">7)  <span lang="hi" xml:lang="hi">योगी उच्च आध्यात्मिक दिव्य जीवन जीता हुआ भी सबसे प्रीतिपूर्वक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्मानुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यथायोग्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विवेकपूर्ण एवं न्यायपूर्ण व्यहार या आचरण करता है। ये योगी के बाह्य आचरण के पांच सत्य हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">8)   <span lang="hi" xml:lang="hi">योग से मनुष्य की उत्पादकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सृजनात्मकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सकारात्मकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एवं सभी प्रकार की दिव्यता बढ़ती है। योग मनुष्य के बाह्य व आन्तरिक विकास का एक सर्वांगीण साधन या माध्यम है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">9)   <span lang="hi" xml:lang="hi">योगी वसुधैव कुटुम्बकम्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सह-अस्तित्व एवं एकत्व के तीन उच्च आध्यात्मिक आदर्शों को अपने जीवन में जीता है। विश्व का सबसे घातक या विध्वंसकारी विचार है कि केवल मैं और मेरा मजहब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्धान्त एवं मान्यताएं ही केवल सत्य हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं और मेरा मजहब ही सर्वश्रेष्ठ है ऐसा योगी नहीं सोचता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु सम्पूर्ण विश्व ही भगवान् की रचना मानता है। सभी सर्वश्रेष्ठ हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभी जीव एक ही ईश्वर की सन्तानें हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: हम सब एक ही हैं। ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कौशल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विभिन्न परम्पराएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पन्नता एवं ताकत के आधार पर परस्पर ऊँच-नीच का भाव योगी नहीं रखता। योगी भगवान को सर्वोच्च शक्ति के रूप में स्वीकार करता तथा अनुभव करता है और वह भगवान के विधान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेदानुकूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मानुकूल या यूनिवर्सल लॉ के अनुरूप आचरण करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">10)   <span lang="hi" xml:lang="hi">योग जीवन प्रबन्धन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव प्रबन्धन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्तित्व विकास एवं आदर्श दिव्य जीवन निर्माण की एक बहुत बड़ी वैज्ञानिक कला है। मनुष्य के भीतर के असीम ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामर्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व दिव्य ऐश्वर्य के जागरण का साधन या माध्यम है योग। योगमात्र एक व्यायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम या ध्यान मात्र ही नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये भी योग की विधाएं हैं। वास्तव में तो एक-एक श्वास एवं पूरा जीवन ही योग है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">11)  <span lang="hi" xml:lang="hi">यौगिक क्रियाओं व आसनों से हमारे शरीर का हार्डवेयर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाधि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वाध्याय व ईश्वर प्राणिधान से हमारा सॉफ्टवेयर अर्थात् आत्मा की सम्पूर्ण दिव्यता की जागृति व अनुभूति होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">12)  <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रेष्ठ प्रारब्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य व श्रेष्ठ वातावरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रेष्ठ प्रशिक्षक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रेष्ठ प्रशिक्षण तथा अखण्ड प्रचंड पुरुषार्थ-ये पाँच साधन हैं जीवन को श्रेष्ठतम व दिव्य बनाने के। इन पांचों में भी पुरुषार्थ तत्त्व सबसे ऊँचा है। योग से मनुष्य का समस्त प्रकार का पुरुषार्थ पूरी तरह से जागृत हो जाता है। पूरा जीवन पुरुषार्थ ही तो है तथा पुरुषार्थ चतुष्ट्य को ही भारतीय संस्कृति में धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काम व मोक्ष नाम से कहा जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">13)  <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीव्र मेधा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य में अखण्ड निष्ठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्साह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पराक्रम व कृतज्ञता-ये सात भगवान् की दिव्य विभूतियां हैं या दैवी सम्पदाएं हैं। योग से इन सातों दैवी सम्पदाओं का विकास होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">14)  <span lang="hi" xml:lang="hi">योग न करने वाले लोग सामान्यत: निम्न चेतना में जीते हैं। योगी सदा उच्च</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य या भागवत चेतना में जीता हुआ देवत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषित्व व भगवत्ता में जीता है। योगी ऋषि सत्ता व भागवत सत्ता का मूर्त्तरूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिरूप या प्रतिनिधि हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">15)   <span lang="hi" xml:lang="hi">योगी भीतर से पूर्ण शान्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहज व बाहर से पूर्ण क्रियाशील</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण पुरुषार्थमय जीवन जीते हुए भगवान् के दिव्य ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य शक्तियों व दिव्य ऐश्वर्य से युक्त होकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् का यंत्र बनकर दिव्य योगमय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण सुखमय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्तिमय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण समृद्धिमय व पूर्ण स्वाधीनता के साथ जीवन को जीता है। योगी के जीवन में न तो बाह्य दरिद्रता होती है न ही आन्तरिक कृपणता व दरिद्रता। योगी का सम्पूर्ण ऐश्वर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामर्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विभूति व समृद्धि समष्टि की सेवा के लिए होती है। योगी न तो साधनहीन दु:खी दरिद्र होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं साधन सम्पन्न दु:खी दरिद्र अपितु योगी साधन सम्पन्न सुखी प्रसन्न रहता है तथा सबको सभी प्रकार की दरिद्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभाव एवं अन्याय से मुक्त देखना चाहता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">16)  <span lang="hi" xml:lang="hi">सुखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दु:खी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुण्यशील व अपुण्यशीलों के प्रति सदा क्रमश: मैत्री</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुदिता व उपेक्षा का भाव रखता हुआ योगी सदा प्रसन्नचित्त व आनन्दित रहता है। वह एक क्षण के लिए भी अशुभ में नहीं जीता। वृत्तिसारूप्य होकर योगी वेगों व विकारों में बहता या बहकता नहीं है। रोंग एक्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रियेक्शन व इन-एक्शन से योगी दूर रहकर डिवाइन एक्शन में रहता है अथवा अपने आत्मस्वरूप में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी पूर्णता में सदातृप्त अपिपास होकर जीवन मुक्त जीवन को जीता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">17)  <span lang="hi" xml:lang="hi">योगी व्यक्ति किसी भी मजहबी व अन्य विकार के भौतिक उन्माद से रहित होकर स्वयं एक पूर्ण आध्यात्मिक जीवन जीता है तथा समष्टि में आध्यात्मिकता की प्रतिष्ठा हेतु पूर्ण पुरुषार्थ करता है। आध्यात्मिक जीवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र व आध्यात्मिक विश्व का निर्माण ही योगी के जीवन का एक मात्र बाह्य ध्येय रहता है। व्यष्टि से समष्टि की मुक्ति अर्थात् अपने व जगत् के समस्त दु:खों को दूरकर वह सदा सर्वत्र सुख व समृद्धि देखना चाहता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">18)  <span lang="hi" xml:lang="hi">योगी सत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम व करुणामय जीवन जीते हुए स्वयं से लेकर समष्टि तक सर्वत्र अज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभाव व अन्याय से मुक्त संसार देखना चाहता है। अहम् से वयम् की यात्रा होती है योगी की। मैं भी सत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परमार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधना सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग व कर्म योग के मार्ग पर चलूँ तथा अपने सम्पूर्ण सामर्थ्य से सबको भी चलाऊं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि यही एक मात्र मानव मात्र के कल्याण का मार्ग है। मैं स्वयं चरित्रवान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्ध बनूँ तथा सबको भी बनाऊँ। योगी </span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम</span>’</strong></span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की ईश्वरीय आज्ञा का पालन करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">19)   <span lang="hi" xml:lang="hi">हठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुराग्रह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वार्थ व अविद्या से रहित होकर संसार की सभी विवेकशील आत्माओं को विश्व की समग्र व स्थाई समृद्धि व विकास तथा विश्व में स्थाई शान्ति के लिए अष्टाङ्गयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हठयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञानयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्मयाग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एवं भक्तियोग आदि योग की वैज्ञानिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सार्वभौमिक व पंथ निरपेक्ष परम्परा को स्वीकार करना चाहिए तथा इसे पूर्ण गौरव दिान करना चाहिए। यही एक मात्र विश्व के कल्याण का मार्ग है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">20)   <span lang="hi" xml:lang="hi">तस्माद् योगी भव अर्जुन (गीता)। योगेश्वर भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हे अर्जुन! संसार में योगी होना सबसे बड़ी सफलता या उपलब्धि है। अत: हम सब वर्ग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समूह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मजहबों एवं अलग-अलग परम्पराओं व राष्ट्र की राजनैतिक सीमाओं में रहते हुए यदि योगी हो जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हमारे जीवन में व इस जगत् में कोई भी दु:ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दरिद्रता व कोई भी समस्या नहीं रहेगी। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">21)  <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग मुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तनावमुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवसन मुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुरे अभ्यासों से मुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्ध व पूर्ण शान्तिमय जीवन जीने का मार्ग है योग। </span>24<span lang="hi" xml:lang="hi"> घंटा में प्रात: या सांयकाल </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> घंटा योग को जो सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं उनके जीवन की सभी प्राथमिकताएं भी स्वत: ही पूरी हो जाती हैं। सभी को एक सुनिश्चित समयावधि का जीवन मिला है। इसमें हमें </span>100<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ष की प्राथमिकताएं तय कर लेनी चाहिए और उन्हें फिर पूरे वेग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्साह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पराक्रम व पुरुषार्थ से पूरा करना चाहिए। प्रात:काल की सर्वोच्च प्राथमिकता योग तथा दिनभर की प्राथमिकताएं अपने दायित्वों के आधार पर तय करनी चाहिए। क्योंकि प्रात: योग करने वाले व्यक्ति को दिनभर समता एवं कुशलता पूर्वक अपने कर्त्तव्य के निर्वहन की पूरी ऊर्जा प्राप्त हो जाती है। इसीलिए कहते हैं:- </span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="right"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">समत्वं योग उच्यते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग: कर्मसु कौशलम।  -(गीता)</span></span></strong></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
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                <pubDate>Sat, 01 Jul 2017 21:42:47 +0530</pubDate>
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