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                <title>अक्टूबर - योग संदेश</title>
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                <description>अक्टूबर RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...</title>
                                    <description><![CDATA[<h4 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मानव</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> जीवन</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ओउम्</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1. <span lang="hi" xml:lang="hi">मानव</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> जीवन भगवान् का सर्वश्रेष्ठ वरदान</span>- <span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> धरती पर भगवान् की सर्वश्रेष्ठ रचना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान्</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> का सबसे बड़ा अनुग्रह है तथा मनुष्य का जीवन पाकर सर्वश्रेष्ठ आचरण करें साथ ही जीवन में श्रेष्ठतम उपलब्धियों को अर्जित करके एक महान एवं पूर्ण सुखी सफल व संतुष्ट जीवन जीएं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">2. <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> का धर्म का मर्म</span>- <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धां</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> भगस्य मूर्ध्नि व च सा वेदयामसि</span>- <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> का जीवन में सर्वोच्च स्थान है। श्रद्धावान लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः</span>.......<span lang="hi" xml:lang="hi">।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> श्रद्धा से ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> से फिर कर्म अर्थात् श्रद्धा एवं ज्ञान युक्त दिव्य कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रेष्ठ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> कर्म या</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2533/shashwat-pragya-oct-2017"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/aaa.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मानव</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> जीवन</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ओउम्</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1. <span lang="hi" xml:lang="hi">मानव</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> जीवन भगवान् का सर्वश्रेष्ठ वरदान</span>- <span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> धरती पर भगवान् की सर्वश्रेष्ठ रचना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान्</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> का सबसे बड़ा अनुग्रह है तथा मनुष्य का जीवन पाकर सर्वश्रेष्ठ आचरण करें साथ ही जीवन में श्रेष्ठतम उपलब्धियों को अर्जित करके एक महान एवं पूर्ण सुखी सफल व संतुष्ट जीवन जीएं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">2. <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> का धर्म का मर्म</span>- <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धां</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> भगस्य मूर्ध्नि व च सा वेदयामसि</span>- <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> का जीवन में सर्वोच्च स्थान है। श्रद्धावान लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः</span>.......<span lang="hi" xml:lang="hi">।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> श्रद्धा से ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> से फिर कर्म अर्थात् श्रद्धा एवं ज्ञान युक्त दिव्य कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रेष्ठ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> कर्म या श्रेष्ठ आचरण ही जीवन का सबसे बड़ा व अन्तिम सत्य है। कर्म व दिव्य कर्म का ही परिणाम सफलता व समाधि या मुक्ति है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">3. <span lang="hi" xml:lang="hi">साधु</span>-<span lang="hi" xml:lang="hi">सन्त या योगी का जीवन</span>- <span lang="hi" xml:lang="hi">सार्वजनिक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> जीवन में वैभव व वैयक्तिक जीवन में तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संयम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सादगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सदाचार</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> एवं अनुकरणीय आचरण यही हमारे महान साधु सन्तों व संन्यासियों की श्रेष्ठ परम्परा रही है। ढ़ोंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आडम्बर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदर्शन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> नहीं हो सकते।</span>  </h5>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-11/oct-2017-1.jpg" alt="oct 2017 1"></img></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-11/oct-2017-2.jpg" alt="oct 2017 2"></img></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शाश्वत प्रज्ञा</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Oct 2017 21:59:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ऋषियों के उत्तराधिकारी स्वामी जी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">आचार्य </span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">बालकृष्ण</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2534/rishion-ke-uttradhikari-swami-ji"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/046.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परम श्रद्धेय श्री स्वामी जी की योजना कोई </span>50<span lang="hi" xml:lang="hi"> या </span>100<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों की योजना नहीं अपितु यह तो हजारों वर्षों की योजना है क्योंकि ये कोई मानवीय कार्य नहीं यह तो ईश्वरीय कार्य है और ईश्वरीय कार्य कभी काल से परिच्छिन्न नहीं होते। ऋषियों की परम्परा के निर्वहन के लिये स्वामी जी एक शृंखला तैयार कर रहे हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">रत अनादिकाल से ही ऋषियों का देश रहा है। अरबों वर्षों पुरानी एकत्व सहअस्तित्व व विश्व बन्धुत्व की वैदिकी परम्परा ही हमारी मूल संस्कृति व पहचान है। इसी वैदिक संस्कृति की पुन: प्रतिष्ठा के लिये समस्त ब्रह्माण्ड की कर्तृ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियन्तृ व संहर्तृ शक्ति ने माँ भारती को एक ऐसा दिव्य पुत्र दिया है जिसमें महर्षि मनु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भृगु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैमिनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गौतम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कण्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाणिनि आदि ऋषियों की छवि साक्षात् दिखाई देती है। परम श्रद्धेय श्री स्वामी जी को देख कर ऐसा लगता है मानों सभी ऋषि-ऋषिकाओं और वीर-वीरांगनाओं का समावेश एक ही शरीर में हो गया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विदेशी आततायियों ने हमारी वैदिक ऋषि संस्कृति को नष्ट करने के पूरे प्रयास किये परन्तु जो सभ्यता अनादि है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका कभी अन्त नहीं हो सकता। अत: आज भी हमारे मूल में हमारे रक्त में वैदिक संस्कृति है और उसी ऋषि परम्परा की पुन: प्रतिष्ठा की जिम्मेदारी ऋषिपुत्र श्रद्धेय श्री स्वामी जी ने ली है। वो निरन्तर अबाध गति से निर्भय परन्तु सजग होकर इस पुनीत कार्य को कर रहे हैं जो कि एक उत्तराधिकारी का कर्तव्य है। जिस प्रकार परम श्रद्धेय श्री स्वामी जी सभी ऋषि-ऋषिकाओं व वीर-वीरांगनाओं की विरासत को रक्षित व संवर्धित करते हुए दिखाई देते हैं उससे यह सिद्ध हो जाता है कि ऋषियों के उत्तराधिकारी परम वन्दनीय मनीषी क्रान्तद्रष्टा युगपुरुष व ऋषियों की संस्कृति के सूर्य संन्यास परम्परा के आदर्श श्रद्धेय श्री स्वामी जी ही हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत वर्ष की भौतिक व आध्यात्मिक उन्नति अर्थात् अभ्युदय व निश्श्रेयस को समानान्तर रूप से आगे बढ़ाने वाले ऋषि पुत्र श्रद्धेय श्री स्वामी जी महाराज सभी के लिये मार्गदर्शक व आदर्श हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>''<span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुर: कृण्वन्तो विश्वमार्यम्। अपघ्नन्तो अराव्ण:।।"</span> </strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi">की वैदिक प्रतिज्ञा को हृदय में लिये हुए शौर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पराक्रम व देवत्व की प्रतिमूर्ति श्रद्धेय श्री स्वामी जी न केवल भारतवर्ष के लिये अपितु समस्त विश्व के लिये प्रेरणा स्रोत हैं। वे स्वयं भी<strong> </strong></span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वसुधैव कुटुम्बकम्</span>’</strong></span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की उदात्त भावना से युक्त आत्म-कल्याण से राष्ट्र-कल्याण और फिर विश्व-कल्याण के लिये अहर्निश प्रयत्नशील रहते हुए हमें भी प्रेरित करते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ ऋषियों की विरासत</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ एक बहुआयामी संस्था है जिसका मूल ध्येय ऋषि संस्कृति की पुन: प्रतिष्ठा है। पतंजलि योगपीठ के प्रत्येक कार्य के पीछे एकत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सह-अस्तित्व व विश्व बन्धुत्व की अनादि वैदिक परम्परा को पुन: प्रतिष्ठित करने की भावना रहती है। भारत को ऋषि-राष्ट्र व जगद्गुरु बनाने के लिये पतंजलि योगपीठ सदैव प्रयत्नशील रहता है। यहाँ जीवन के सर्वांगीण विकास को ध्यान में रखते हुए कई प्रकल्पों के माध्यम से सेवा कार्य संचालित किये जा रहे हैं। योग व आयुर्वेद के माध्यम से स्वस्थ भारत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी के माध्यम से समृद्ध भारत व शिक्षा के माध्यम से संस्कारी भारत का निर्माण पतंजलि योगपीठ के द्वारा किया जा रहा है। अर्थ से परमार्थ व सामर्थ्य से सेवा की भावना से युक्त होकर पतंजलि योगपीठ अनेक लोक-कल्याण के कार्यों को करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे पूर्वज ऋषि-ऋषिकाएँ जिस प्रकार जीवन को समग्रता से जीते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसी ही छवि पतंजलि योगपीठ में देखने को मिलती है। देश को भ्रष्टाचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नशा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदूषण व अकर्मण्यता से मुक्त बनाने के लिये निरन्तर प्रयत्नशील यह संस्था कोई साम्राज्य नहीं अपितु त्याग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तपस्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्यम और ज्ञान कर्म उपासना का एक अद्वितीय संगम </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषियों की विरासत</span>’’ <span lang="hi" xml:lang="hi">है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एक सच्चा संन्यासी</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज देश में ढ़ोंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाखण्डी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत्याचारी बलात्कारी तथाकथित साधुओं की भरमार है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये संन्यासी नहीं अपितु संन्यासी के रूप में राक्षसों से भी गये गुजरे हैं जो कि हमारी पवित्रतम और आदर्श संन्यास परम्परा को कलंकित कर रहें हैं। संन्यासी का उद्देश्य तो लोक कल्याण होता है न कि लोगों को पाखण्ड के जाल में फँसाकर भोग करना।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक सच्चा संन्यासी पुत्रैषणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोकैषणा और वित्तैषणा को त्याग कर समस्त ब्रह्माण्ड को अभयदान देता है। एक सच्चे संन्यासी की प्रार्थना रहती है- </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<strong><span style="color:rgb(186,55,42);">'<span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्र आशाभ्यस्परि सर्वाभ्यो अभयं करत्। जेता शत्रून् विचर्षणि:।।</span>‘’</span></strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">हे इन्द्र! मुझे सर्वथा अभय कर दे ताकि मैं सभी को अभयदान दे सकूँ। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गीता के </span>18<span lang="hi" xml:lang="hi">वें अध्याय </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मोक्षसंन्यास योग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">में कहा है </span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>''<span lang="hi" xml:lang="hi">काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्यासं कवयो विदु:। </span></strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् निष्काम भाव से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोकोपकार व जनकल्याण की भावना से समस्त कर्मों को करना ही संन्यास है और वह व्यक्ति जो इसी प्रकार अपने सभी कर्म ईश्वर आराधना में अर्पित करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही सच्चा संन्यासी है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान युग में जहाँ एक ओर ढोंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाखण्डी और पृथ्वी पर भार बने हुए तथाकथित संन्यासी जो कि हमारी ऋषि संस्कृति और वैदिकी परम्परा की नींव संन्यास परम्परा पर कुठाराघात कर रहें हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे कलंकित कर रहें हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं दूसरी ओर परमपिता परमेश्वर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देवताओं व ऋषियों के आशीर्वाद दिव्य पुरुष युगद्रष्टा योगऋषि श्रद्धेय श्री स्वामी जी ऋषिपुत्र होने का कर्तव्य निभा रहें हैं। श्रद्धेय श्री स्वामी जी समस्त भारत के ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व में एक आदर्श संन्यासी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्याग तथा संयम की प्रतिमूर्ति हैं। स्वामी जी वो दिव्य महापुरुष हैं जिन्होंने </span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा:</span>’</strong></span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के वैदिक उद्घोष को अपने जीवन में चरितार्थ किया हुआ है। आज सर्वसुविधा सम्पन्न होते हुए भी वो झोंपड़ी में रहते हैं जमीन पर सोते हैं एक सामान्य व्यक्ति की भाँति जीवन जीते हुए वो सदा जीवन उच्च विचार का आदर्श प्रस्तुत करते हैं। वे जीवन में नितान्त आवश्यक वस्तुओं का ही प्रयोग करते हैं। विचक्षण जन आज स्वामी जी को एक सच्चे संन्यासी व संन्यास परम्परा के आदर्श के रूप में देखते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आगामी हजारों वर्षों की योजना</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परम श्रद्धेय श्री स्वामी जी की योजना कोई </span>50<span lang="hi" xml:lang="hi"> या </span>100<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों की योजना नहीं अपितु यह तो हजारों वर्षों की योजना है क्योंकि ये कोई मानवीय कार्य नहीं यह तो ईश्वरीय कार्य है और ईश्वरीय कार्य कभी काल से परिच्छिन्न नहीं होते। ऋषियों की परम्परा के निर्वहन के लिये स्वामी जी एक शृंखला तैयार कर रहे हैं। विश्व में सबसे महान् और आवश्यक कार्य है मानव निर्माण का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका आधार सम्यक् शिक्षा व्यवस्था है। यदि हमारी शिक्षा व्यवस्था वैसी ही हो जाये जैसी कि वैदिक काल में थी तो हमारा देश पुन: ऋषियों का देश बन जायेगा। कोई भी व्यक्ति गरीब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लाचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असहाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व अकर्मण्य नहीं रहेगा। हर तरफ खुशहाली होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य का राज्य होगा जिसके लिये श्रद्धेय श्री स्वामी जी निरन्तर कार्यरत हैं। हमारे वेदों में उद्घोष किया है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सा विद्या या विमुक्तये</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् सच्ची विद्या वह है जो हमें हमारी आन्तरिक व बाह्य समस्त पराधीनताओं से मुक्त कराकर परम आनन्द को प्राप्त कराये। परम श्रद्धेय श्री स्वामी जी की योजना से भारत वर्ष शीघ्र ही विश्व में महाशक्ति बनेगा व जगद्गुरु पद को प्राप्त करेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा दायित्व</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी जी एक संकल्पसिद्ध योगी हैं और जब एक संकल्पसिद्ध योगी ने संकल्प ले ही लिया तो उसे पूरा तो होना ही है। ऋषि-ऋषिकाओं की सन्तान होने के नाते हम अपने आपको पहचानें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने सामर्थ्य को पहचानें और तन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धन व आत्मा से इस संकल्प को पूरा करने में अपना सहयोग दें। योग आयुर्वेद व स्वदेशी का व्रत लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोरक्षा करें और राष्ट्रोन्नति के समस्त कार्यों में अपना प्रत्यक्ष या परोक्ष सहयोग अवश्य करें और यदि सहयोग न भी कर पाये तो समर्थन तो अवश्य ही करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि भविष्य में आपको ग्लानि न हो कि मैं भी इस पुनीत कार्य में भागीदार बन सकता था परन्तु ......।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ये भागवत विधान है कि जब-जब पाप अधर्म अन्याय अत्याचार बढ़ता है तब उसे समाप्त करने वाले महापुरुष का भी जन्म होता है। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने भी कहा है- </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">''<span lang="hi" xml:lang="hi">यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।।"</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अत: आप सभी ऋषिपुत्र व पुत्रियों से मेरा आह्वान है कि ऋषियों का भारत बनाने में व ऋषि संस्कृति को पुन: प्रतिष्ठापित करने में सर्वात्मना अपना सहयोग दें व पुण्यभागी बनें।</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">।। ओऽम् ।।</span></strong></span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Oct 2017 21:58:17 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पतंजलि परिसर में 07 से 11 सितम्बर तक आयोजित 'संत सम्मेलन’</title>
                                    <description><![CDATA[<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ों भारतीयों को देश की मौलिकता से जोड़ने में सफल हो रहा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि अभियान- मोहन भागवत</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वेदों के उत्थान हेतु श्री गोविन्द देव गिरि जी महाराज को पतंजलि की ओर से दी गयी एक करोड़ की राशि</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संतों को राष्ट्रनिर्माण-विश्वनिर्माण की प्रत्यक्ष भूमिका में उतरने की जरूरत है- स्वामी रामदेव जी महाराज</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र के निर्माता होते हैं संत-आचार्य बालकृष्ण जी महाराज</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संत समाज की सामयिक पृष्ठभूमि तैयार करेगा पतंजलि का संत सम्मेलन-स्वामी गोविन्ददेव गिरी जी महाराज</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प</span><span lang="hi" xml:lang="hi">तंजलि योगपीठ परिसर में आयोजित पाँच दिवसीय संत सम्मेलन हर्षोल्लसपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ। भारत वर्ष के सभी मत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंथ व सम्प्रदाय</span></strong></span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2535/patanjali-parisar-me-7-se-11-september-tak-ayojit-sant-sammelan"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/082.jpg" alt=""></a><br /><ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ों भारतीयों को देश की मौलिकता से जोड़ने में सफल हो रहा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि अभियान- मोहन भागवत</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वेदों के उत्थान हेतु श्री गोविन्द देव गिरि जी महाराज को पतंजलि की ओर से दी गयी एक करोड़ की राशि</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संतों को राष्ट्रनिर्माण-विश्वनिर्माण की प्रत्यक्ष भूमिका में उतरने की जरूरत है- स्वामी रामदेव जी महाराज</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र के निर्माता होते हैं संत-आचार्य बालकृष्ण जी महाराज</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संत समाज की सामयिक पृष्ठभूमि तैयार करेगा पतंजलि का संत सम्मेलन-स्वामी गोविन्ददेव गिरी जी महाराज</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प</span><span lang="hi" xml:lang="hi">तंजलि योगपीठ परिसर में आयोजित पाँच दिवसीय संत सम्मेलन हर्षोल्लसपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ। भारत वर्ष के सभी मत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंथ व सम्प्रदाय के युवा साधु-महात्माओं का परस्पर परिचय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधु जीवन की गरिमा की स्थापना एवं उनकी समस्याओं का समाधान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मकल्याण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जनकल्याण के लिए साधना एवं धर्म जागरण के माध्यम से सेवा का मार्ग प्रशस्त करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वकल्याण की सम्भावनाओं के संवर्धन हेतु भारतीय संस्कृति की दिव्यताओं पर चिंतन एवं विश्लेषण के लक्ष्य से </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">संत स्वाध्याय संगम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">नाम से इस संत सम्मेलन का आयोजन रखा गया। सम्मेलन में श्री गोविन्द देव गिरि जी महाराज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महामण्डलेश्वर श्री विश्वेश्वरानन्द जी महाराज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महामण्डलेश्वर श्री हरिहरानन्द जी महाराज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महामण्डलेश्वर श्री ज्ञानानन्द जी महाराज सहित देश के अनेक प्रांतों से पधारे लगभग </span>600<span lang="hi" xml:lang="hi"> संतगण सहभागी रहे।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार:- पतंजलि योगपीठ एवं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के आनुसंगिक संगठन धर्मजागरण मंच के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित संत सम्मेलन में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर संघ चालक श्री मोहन भागवत जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ के परमाध्यक्ष पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ के महामंत्री श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज तथा पूज्य गोविन्ददेव गिरी जी महाराज सहित अनेक संतों ने जनजागरण की प्रेरणायें उभारी और भारत के दिव्यता युक्त पुनर्निर्माण का संकल्प लिया।  इस अवसर पर उत्सव पुरुष के रूप में सर संघचालक श्री मोहन भागवत जी ने कहा कि पतंजलि योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय संस्कृति व भारत के ज्ञान-विज्ञान के उत्थान के लिए कार्य करने वाला एक अनोखा आध्यात्मिक संगठन है। उन्होंने कहा कि स्वामी जी व आचार्य श्री ने योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद व भारतीय संस्कृति परक आंदोलन के माध्यम से करोड़ों भारतीयों को देश की मौलिकता से जोड़ा है। संघ का भी यही अभियान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी संस्कृति का काम किसी का विरोध करना नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु लोगों को सुविचार देना है। हम लोगों को सुख की राह पर व विश्व को मानवता की राह पर ला रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत के सभी पूर्वज हिन्दू ही हैं।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/106.jpg" alt="10"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सम्मेलन को संबोधित करते हुए पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज ने कहा संत हमारी संस्कृति के प्राण हैं। सम्पूर्ण मानवता के पथ प्रदर्शक हैं। इनकी जीवन शैली से देश के करोड़ों नागरिक प्रेरणा-प्रकाश पाते हैं। स्वामी जी ने कहा कि संत सम्मेलन में पाँच दिन चला यह मंथन देश की इस महान् परम्परा की रीति-नीति तय करेगा। उन्होंने कहा कि मोहन भागवत जी ने संघ के साथ-साथ संस्कृति की गरिमा को बढ़ाया है। स्वामी जी ने कहा कि हम संतों का जेनेटिक स्ट्रक्चर अलग-अलग हो सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर करेक्टर सबका एक होना चाहिए। संतों को राष्ट्रनिर्माण-विश्वनिर्माण की प्रत्यक्ष भूमिका में उतरने की जरूरत है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ के महामंत्री श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि आज का दिन स्वामी विवेकानन्द जी द्वारा शिकागो में दिये गये भाषण का दिवस है। आचार्य श्री ने कहा कि संघ एक प्रकार से संतों का ही संघ है। राष्ट्रनिर्माण में समर्पित हर साधक की भूमिका संत के समान है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व की समस्याओं को सदियों से समाधान देता रहा है भारत। भारतीय संस्कृति को हमारे ऋषियों ने तप-त्याग के बल पर दुनिया की सबसे जीवंत संस्कृति बनाया है। आज जब सम्पूर्ण विश्व समाधान के लिए भारत की ओर निहार रहा है ऐसी परिस्थिति में साधु-संतों की भूमिका बढ़ जाती है। क्योंकि हमारे साधु-संत हमारे राष्ट्र के आदर्श हैं और इनके व्यक्तित्व से हमारी प्राचीनतम कल्याणकारी धरोहर योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपनिषद्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति एवं ज्ञान-विज्ञान  की परम्परायें अभिव्यक्ति पाती हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सम्मेलन में श्री गोविन्ददेव गिरि जी महाराज ने कहा कि देश जब-जब गुलामियों में जकड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देश की संस्कृति पर जब भी प्रहार हुआ तो देश के संतों ने मोर्चा संभालकर पुन: गरिमा प्रदान की। उन्होंने कहा कि संत समाज की सामयिक पृष्ठभूमि तैयार करेगा पतंजलि का यह संत संमेलन।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/157.jpg" alt="15"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यक्रम के दौरान वेदों के उत्थान में अहर्निश पुरुषार्थरत श्री गोविन्द देव गिरि जी महाराज को पतंजलि की ओर से एक करोड़ रुपये की राशि भेंट की गयी। पतंजलि की ओर से प्रदत्त यह राशि सर संघचालक मोहन भागवत जी ने श्री गोविन्द देव गिरि जी महाराज को सौंपी। मोहन भागवत जी के जन्म दिवस पर पतंजलि की ओर से पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्यश्री एवं प्रद्युम्न जी महाराज ने उन्हें भारतीय संस्कृति की प्रतीक स्वरूप हनुमान गदा भेंट की और पतंजलि संत सम्मेलन में उपस्थित सैकड़ों संतों ने शुभकामनायें दी। सम्मेलन में पधारे संतों ने पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज के मार्गदर्शन में प्रतिदिन योगाभ्यास किया। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्था समाचार</category>
                                            <category>सनातन वैभव</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Oct 2017 21:57:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वनौषधियों में स्वास्थ्य</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> आयुर्वेद में औषधि वह है जो रोगी में आरोग्य का विश्वास पैदा करे और रोग से निजात दिलाये। चूँकि शरीर का सीधा संबंध प्रकृति से है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: रोग भी प्रकृतिगत असंतुलन से ही पैदा होते हैं। ऐसे में औषधि प्रकृतिस्थ तत्वों से युक्त होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त  यदि दवा के नाम पर किन्हीं रासायनिक तत्वों का प्रयोग शरीर पर करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो तत्काल न सही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी न कभी तो वह शरीर के साथ विद्रोही तेवर दिखायेगा ही। अक्षय आरोग्य के लिए आवश्यक है कि शारीरिक व मानसिक रोगों में प्रकृति के बीच से ही औषधि की</span></strong></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2536/mukh-va-tvacha-nivarak-ayurvedic-ghatak-jaitun"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/051.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> आयुर्वेद में औषधि वह है जो रोगी में आरोग्य का विश्वास पैदा करे और रोग से निजात दिलाये। चूँकि शरीर का सीधा संबंध प्रकृति से है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: रोग भी प्रकृतिगत असंतुलन से ही पैदा होते हैं। ऐसे में औषधि प्रकृतिस्थ तत्वों से युक्त होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त  यदि दवा के नाम पर किन्हीं रासायनिक तत्वों का प्रयोग शरीर पर करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो तत्काल न सही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी न कभी तो वह शरीर के साथ विद्रोही तेवर दिखायेगा ही। अक्षय आरोग्य के लिए आवश्यक है कि शारीरिक व मानसिक रोगों में प्रकृति के बीच से ही औषधि की खोज करें। </span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">औषधि के नाम पर परमात्मा के इस शरीर रूपी मंदिर के साथ हो रहे अत्याचार को समाप्त करने के लिए ही वनौषधियों पर पतंजलि आयुर्वेद द्वारा गहन अनुसंधान के पश्चात् रोग की प्रकृति के अनुसार उनके अनुपान का निर्धारण किया गया है। उन्हीं निष्कर्षों के अनुरूप </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वनौषधियों में स्वास्थ्य</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">शृंखला प्रस्तुत है। इन प्रयोगों को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद जड़ी-बूटी रहस्य</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">पुस्तक में विस्तार से पढ़ सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे अपनाकर हर कोई अक्षुण्ण आरोग्य का स्वामी बन सकता है। इस अंक में प्रस्तुत है वनौषधि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">जैतून</span>’...</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जै</span><span lang="hi" xml:lang="hi">तून मूलत: भूमध्य सागरीय क्षेत्रों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एशिया एवं सीरिया के साथ-साथ भारत के उत्तर-पश्चिमी हिमालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जम्मू-कश्मीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आंध्र प्रदेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्नाटक एवं तमिलनाडू में पाया जाने वाला पौधा है। इन वृक्षों के फलों से निकाला जाने वाला तैल उत्तम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वच्छ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुनहरे रंग का तथा हल्की गंध युक्त होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जैतून छोटा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुशाखित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लगभग </span>15<span lang="hi" xml:lang="hi"> मी. ऊँचा सदाहरित वृक्ष होता है। इसकी शाखाएँ तनु तथा छाल धूसर-श्वेत वर्णी व लगभग चिकनी होती हैं। इसके पत्र सरल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विपरीत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमरुद पत्र जैसे</span>, 5-6.3<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी. लम्बे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विभिन्न चौड़ाई के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीक्ष्णाग्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आधार पर क्रमश: संकुचित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों पृष्ठ चिकने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्ध्व पृष्ठ पाण्डुर चमकीले हरित वर्ण के तथा अध:पृष्ठ चमकीले श्वेत वर्ण के होते हैं। इसके पुष्प सुगन्धित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छोटे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरिताभ-श्वेत या पाण्डुर-हरित वर्ण के चिकने होते हैं। जबकि फल अण्डाकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोलाकार</span>, 1.3-2.5<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी. लम्बे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रथमतया हरित वर्ण के एवं पक्वावस्था में बैंगनी-नील कृष्ण वर्ण के होते है। कच्चे फलों का प्रयोग अचार एवं साग बनाने के लिए किया जाता है।  इसका पुष्पकाल एवं फलकाल अक्टूबर से अप्रैल तक होता है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/342.jpg" alt="34"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रासायनिक संघटन</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पत्र</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ओलिएनोलि</span><span lang="hi" xml:lang="hi">क अम्ल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओलियोरोपिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओलियास्टेरॉल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केम्पफेरॉल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्वर्सेटिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐस्कुलेटिन तथा ऐस्कुलिन पाया जाता है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके बीज में अवाष्पशील तैल पाया जाता है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि पुष्प में अरसोलिक अम्ल पाया जाता है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके फल में तैल (जैतुन)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऑलीक अम्ल एवं मैसलिनिक अम्ल मिलता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">औषधीय प्रयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मात्रा एवं विधि शिरो रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सिर की गंज- इसके </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कच्चे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">फलों</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">जलाकर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">राख</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">शहद</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मिलाकर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सिर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">लगाने</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">गंज</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">फुन्सियों</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">लाभ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">होता</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कर्ण रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>1-2<span lang="hi" xml:lang="hi"> बूंद पत्र स्वरस को कान में डालने से कान की वेदना मिटती है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली. जैतून पत्र स्वरस को गुनगुना करके उसमें शहद मिलाकर </span>1-2<span lang="hi" xml:lang="hi"> बूंद कान में डालने से कर्ण रोगों में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मुख रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>दाँतों के रोग-</strong> इसके कच्चे फलों को पानी में पकाकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े से गरारा करने पर दाँतों तथा मसूड़ों के रोग मिटते हैं तथा इससे मुुँह के छाले भी मिटते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>सौंदर्यवर्धनार्थ-</strong> जैतून के तैल को चेहरे पर लगाने से रंग निखरता है तथा सुंदरता बढ़ती है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वक्ष</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>सर्दी/ खाँसी- </strong>जैतून के तैल को छाती पर मलने से सर्दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खाँसी तथा अन्य कफज विकार मिटते हैं।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उदर रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अतिसार- </strong>जैतून के पत्तों को पीसकर इसे जौ के आटे में मिलायें व इसमें कुछ पानी डालकर नाभि पर लेप करने से पुराने अतिसार बंद हो ज</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ाते</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हैं।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वृक्कवस्ति रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जैतून के पत्रों </span><span lang="hi" xml:lang="hi">का</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">क्वाथ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बनाकर</span> 5<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली. मात्रा में पीने से मधुमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूत्र त्याग में कठिनता तथा पथरी में लाभ होता है।  </span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अस्थिसंधि रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>आमवात- </strong>जैतून की मूल को पीसकर लगाने से आमवात में लाभ होता है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जैतून बीज तैल को लगाने से आमवात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वातरक्त तथा जोड़ों के दर्द में अत्यन्त लाभ होता है। </span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचा  रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>व्रण- </strong>जैतून के बीजतैल को घाव पर लगाने से घाव जल्दी भरता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>त्वचा विकार- </strong>जैतून के कच्चे फलों को पीसकर लगाने से चेचक और दूसरे फोड़े-फुन्सियों के निशान मिटते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जैतून के कच्चे फलों को पीसकर घावों पर या पुराने जख्मों पर इसका लेप करने से घाव जल्दी भर जाते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अगर शरीर का कोई भी भाग अग्नि से जल जाये तो कच्चे जैतून के फलों को लगाने से छाला नहीं पड़ता।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>घाव- </strong>जैतून के पत्तों के चूर्ण में शहद मिलाकर घावों पर लगाने से घाव जल्दी भरते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जैतून के पत्तों को पीसकर लेप करने से पित्ती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खुजली और दाद में अत्यन्त लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>दाद- </strong>जैतून के वृक्ष से प्राप्त गोंद को दाद पर लगाने से दाद ठीक होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>व्रण रोपणार्थ- </strong>जैतून के पत्र चूर्ण में शहद मिलाकर लगाने से व्रण का रोपण होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचा विकार-जैतून के पत्तों को पीसकर लगाने से शीतपित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खुजली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दाद आदि त्वचा विकारों में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वशरीरगत</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अत्यधिक पसीना निकलना- </strong>जंगली जैतून के पत्तों को सुखाकर व पीसकर शरीर पर मलने से पसीना कम निकलता है तथा पसीने के कारण होने वाली दुर्गन्ध भी मिटती है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विशेष</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जैतून का सेवन अधिक मात्रा में करने पर सिरदर्द या अनिद्रा रोग हो सकता है। इसका पका हुआ फल आँखों के लिये हानिकारक है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जैतून के फल का मुरब्बा मृदु विरेचक होता है। इसको गर्म पानी के साथ खिलाने से खूब अतिसार रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु इसका अचार विबन्ध कारक होता है।</span></h5>
</li>
</ul>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पोषक उत्पाद</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2536/mukh-va-tvacha-nivarak-ayurvedic-ghatak-jaitun</link>
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                <pubDate>Sun, 01 Oct 2017 21:56:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अच्छाई मनुष्य का शाश्वत स्वभाव है</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">पूज्य गुरुवर आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2537/achchai-manushya-ka-shashwat-swabhav-hai"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/461.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कि</span><span lang="hi" xml:lang="hi">सी विद्यालय का कोई छात्र जब प्रथम स्थान पर आता है तो उस विद्यालय के अधिकारियों के द्वारा उस छात्र का नाम बड़े गौरव के साथ लिया जाता है। उन-उन विशिष्ट छात्रों के नामों से उपलब्धि-पत्र लिखवाये जाते हैं। संस्था के कार्यालय (</span>Reception Room<span lang="hi" xml:lang="hi">) में श्यामपट्ट पर उनके नाम (कभी-कभी चित्र भी) अंकित किये जाते हैं। विद्यालय में अध्ययन की समुचित व्यवस्था तथा अध्यापकों के महान् परिश्रम की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अखबार व टी</span>0<span lang="hi" xml:lang="hi"> वी</span>0<span lang="hi" xml:lang="hi"> विज्ञापन के रूप में भी उन विशिष्ट उपलब्धियों को प्रस्तुत किया जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पर जब कभी परीक्षा-परिणाम प्रतिकूल (</span>Negative<span lang="hi" xml:lang="hi">) होता है और यदि कोई हिम्मत करके प्रधानाचार्य जी से पूछ बैठता है कि क्या कारण है आपने इस वर्ष के परिणाम को प्रदर्शित नहीं किया अथवा आपके विद्यालय का परीक्षा फल बहुत खराब (</span>Weak<span lang="hi" xml:lang="hi">) रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उस समय प्रधानाचार्य जी झट से एक ही उत्तर देते हैं कि क्या करें पिछले स्कूलों का स्तर बहुत ही गिर गया है। नकल आदि के द्वारा छात्रों को आगे धकेल दिया जाता है। पढ़ाई बस नाममात्र की ही रह गयी है। अध्यापकों के समक्ष यह समस्या प्रस्तुत की जाती है तो वे ठीक इसी रूप में निचले स्कूल पर डाल देते हैं। अंत में प्राइमरी विद्यालयों पर अपना बोझ उतार कर हल्के हो जाते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उनके सामने भी यदि कोई इस ज्वलन्त समस्या को पेश करे तो उनका सीधा-सा उत्तर होता है कि क्या करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चों की तरफ  माता-पिता ध्यान नहीं देते। माता-पिता के जागरूक हुए बिना बच्चों को कुछ भी नहीं सिखाया जा सकता। माता-पिता से भी यदि पूछा जाए कि आप तो अपने बच्चों को बहुत प्रेम करते हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर आप लोग उनकी तरफ ध्यान क्यों नहीं दे रहे हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका जबाब होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम क्या करें</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सब तो उस प्रभु की माया है। मायापति की जैसी इच्छा है वैसा हो रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें कौन क्या कर सकता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">महाराज कहते हैं- अमङ्गल को कोई अपने ऊपर लेने को तैयार नहीं है। कैसे-न-कैसे झट अपने ऊपर से टाल दिया जाता है। पर कोई माङ्गलिक अवसर आता है तो व्यक्ति उसका श्रेय लेने के लिए बहुत जल्दी अपना हाथ आगे बढ़ा देता है ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् जब व्यक्ति </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">शुभ</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अपने परिश्रम का फल और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अशुभ</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् की इच्छा मानकर चलने लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बस यहीं से उसका जीवन विसंगतियों से भरने लगता है। बल्कि गहरी आँखों से देखा जाए तो शुभ के रूप में जो कुछ भी जीवन में हो रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह तो भगवान् की इच्छा का फल है और अशुभ नाम से यदि कुछ है तो वह निश्चित ही मनुष्य के अहङ्कार की करतूत है। इसका कारण है कि अच्छाइयाँ व्यक्ति में स्वाभाविक होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि बुराइयाँ पैदा की जाती हैं। अत: व्यक्ति को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने का सम्बन्ध यदि जोड़ना है तो वह बुराइयों के साथ ही जोड़ने योग्य है। अच्छाइयाँ तो सहज स्वाभाविक सृष्टि-नियमों (ऋत-नियमों) का परिणाम मात्र हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महाराज का कहना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिस चीज पर भी व्यक्ति अपने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">पने की मुहर लगा देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह चीज व्यक्ति के पास से चली जाती है। अच्छाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुभ या मङ्गल का कर्त्ता जब व्यक्ति अपने अहम् को बना देता है तो धीरे-धीरे अच्छाई का विलोप होने लगता है। कारण</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">उस अवस्था में व्यक्ति के अन्दर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमाद</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को ठहरने के लिए जगह मिल जाती है। ज्ञानियों ने इसीलिए तो अभिमान को समस्त श्री (शोभा) का नाशक बताया है (अभिमान: श्रियं हन्ति)। इसके विपरीत यदि व्यक्ति बुराइयों को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशुभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमङ्गल व निर्बलता को अपने ऊपर ले लेता है तो वह अपने पूरे वेग से अविलम्ब उस न्यूनता को दूर करना चाहेगा। जैसे कोई व्यक्ति अपने पैर को मल में सना हुआ देखकर तत्काल ही उसे साफ  करना चाहता है। एक क्षण का भी स्थगन पसन्द नहीं करता। उसी प्रकार अपनी कमियों व कमजोरियों को अनुभव करने वाला व्यक्ति भी अपनी सम्पूर्ण सामर्थ्य का प्रयोग कर उन्हें हटाना चाहता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह समस्त संसार ही इस खेल को खेल रहा है। पर दुनिया को दोष दे दिया जाए या भगवान् की इच्छा कहकर अपने ऊपर से बला को टाल दिया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों अवस्थाओं में बात एक ही है कि मैं इस अशुभ के कवच से बाहर हूँ। त्रुटि मुझमें है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा बोलने का साहस कोई नहीं कर पाता।  जिस उत्साह के साथ व्यक्ति अपनी सफलताओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने वैभव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने गौरव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी प्रगति व विकास का वर्णन करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी बोली में यदि अपनी न्यूनताओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी दुर्बलताओं व अपनी भूलों को भी स्वीकार कर ले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो सचमुच मनुष्य का यह दु:खद रूप कदापि देखने को न मिले। उसमें आमूल परिवर्तन हो सकता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार प्रजा नेताओं को दोष देती रहती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नेता प्रजा को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधिकारी अपने मातहतों को निकम्मा बताते रहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मातहत अपने अधिकारियों को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज सुधारक जिन्होंने समाज सुधार का ठेका लिया हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे तो सबसे अधिक दूसरों को कोसते रहते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यापक छात्रों को उच्छंखल बताते हैं तो छात्र अध्यापकों को दोषी ठहरा देते हैं। पति पत्नी पर तो पत्नी पति पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सास बहू पर तो बहू सास पर परस्पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते रहते हैं। परस्पर दोषारोपण का यह सिलसिला इतना व्यापक है कि और तो और</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसार से अपने को विरक्त कहने-समझने वाले साधु-महात्मा भी इससे नहीं बच पाते। जब एक-दूसरे की निन्दा करने का प्रसङ्ग उपस्थित होता है तो ऐसे चटखारे लेकर अपनी बात कहते हैं कि मानो उन्हें स्वर्ग का राज्य ही मिल गया हो। विद्वानों के लिए तो यह समाज में उक्ति ही प्रचलित हो गयी है कि वे आपस में ईर्ष्यालु स्वभाव के होते हैं (बोद्धारो मत्सरग्रस्ता:)। इसी प्रकार महाराज के समक्ष एक पति अपनी देवी की शिकायत करता है कि वह सदा ही मुँह सुजाए रहती है। मैं कहता कुछ हूँ तो करती कुछ है। महाराज समझाते हैं- आप अपने को शासक और देवी को शासित समझना छोड़कर उनका सहयोगी बनकर रहना प्रारम्भ कर दीजिए। उनके काम में प्रसन्नता पूर्वक हाथ बटाना आरम्भ कर दीजिए। झाडू लगाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बर्तन साफ  करना-जैसे छोटे-छोटे कामों को भी हँसते-मुस्कुराते हुए जब आप उनके साथ करने लगेंगे तो आपके प्रश्न का हल आपको स्वत: ही मिल जायेगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वास्तव में व्यक्ति जिन प्रसन्नतादि गुणों को दूसरों में देखना चाहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि पहले उनको अपने पर लागू कर ले तो सचमुच जीवन बहुत ही सरल हो जाता है। अपने को बचाने की प्रवृत्ति व्यक्ति में बहुत गहराई तक बैठी हुई है। इसलिए वह सदा ही किसी भी घटना की ऐसी व्याख्या कर लेता है कि मैं तो बिल्कुल ठीक हूँ। पर इस या उस व्यक्ति के कारण अमुक परेशानी उत्पन्न हो रही है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महाराज कहते हैं कि सरलता के साथ अपनी गलती को स्वीकार करते हुए कह दो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी भी अपने को गलत मान लेने के बाद आगे चर्चा ही नहीं चल सकती है । </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लोक में भी एक कहावत है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">हार मानी और झगड़ा टूटा।</span>‘ <span lang="hi" xml:lang="hi">वैदिक शब्द-कोष निघण्टु में युद्ध के पर्यायवाची शब्दों में एक शब्द यह भी है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मम सत्यम्</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। मेरी बात ठीक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका अर्थ है युद्ध (संघर्ष )। यदि व्यक्ति अपने को झुका लेता है तो संघर्ष वहीं समाप्त हो जाता है। अपने को ठीक सिद्ध करना और दूसरे को गलत बताना एक ही चीज के दो पहलू हैं। सो जो लोग संघर्षमय जीवन के कष्टों से ऊब कर शान्त रहना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मम सत्यम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के इस आग्रहपूर्ण विचार को वापस लेना ही होगा। लेकिन इस अहङ्कार के सामने यही तो एक बड़ी समस्या है कि वह अपने आपको कैसे झुकाए</span>?<span lang="hi" xml:lang="hi">। महाराज कहते हैं- अहङ्कार अन्य सब कुछ कर सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह पर्वतों को चीर सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाँच-पाँच दिन लगातार नृत्य कर सकता है। अपने सिर पर मधुमक्खियों का छत्ता लेकर घूम सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर कभी भी छोटा बनना नहीं चाहता। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाँ! कहीं छोटे बनने के नाम पर इसकी कीर्ति हो रही हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अलग पहचान बन रही हो कि यह व्यक्ति तो बड़ा ही विनम्र है तो उसके लिए भी कोई बड़ा त्याग कर सकता है। अहङ्कार अपने जीते जी कभी भी दूसरे के बड़प्पन को सहन नहीं कर सकता। यही एक ऐसी स्थिति है कि जिसमें अहङ्कार को सबसे अधिक कष्ट में से गुजरना पड़ता है। अहङ्कार के स्वरूप तथा उसकी सम्पूर्ण प्रकृति का अध्ययन करने से पता चलता है कि उसके शहंशाह बनकर रहते हुए यह नहीं हो पाएगा कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">शुभ</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">तो किसी अन्य उच्चतर शक्ति की कृपा का फल है और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अशुभ</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का कर्त्ता मैं हूँ। वह तो इसी बोली में बोलेगा कि मैं ऐसा हू,</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं वैसा हूँ। जितनी भी गड़बड़ है वह या तो </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इसके</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कारण है या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">उसके</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कारण है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी भी भूल-भ्रान्ति के साथ अहम् यदि अपना सम्बन्ध जोड़ने के लिए तैयार हो गया है तो इसका सीधा-सा अर्थ है कि उसने अपने से किसी बड़ी शक्ति को मान लिया है। चाहे उसका नाम भौतिक गुरु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नैतिक मूल्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्तर्यामी पथ प्रदर्शक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम या करुणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कुछ भी रख दिया जाए। अहङ्कार व कोई उच्चतर शक्ति दोनों एक-दूसरे के विरोधी होकर साथ-साथ कदापि नहीं रह सकते। दोनों के साथ रहने का अर्थ है- एक राज्य में समान बलशाली दो राजा। यह सर्वथा अकल्पनीय है। उच्चतर शक्ति का तिरस्कार कर जब वह राजा बनकर रहता है तो उसे जो कष्ट भोगने पड़ते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन अपार कष्टों से तंग आकर जब वह उस शक्ति के सामने आत्म-समर्पण कर देता है तो उच्चतर शक्ति के राज्य में सेवक बनकर आनन्दमय जीवन जीने लगता है। फिर वह अपनी मनमानी करना छोड़कर उस शक्ति से चलाया हुआ चलता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस विशेष अवस्था में यदि त्रुटियाँ भी करता है तो सहर्ष स्वीकार कर लेता है। पहले के समान अकड़कर खड़ा नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यदि कुछ अच्छा होता है तो उसका श्रेय उच्चतर शक्ति को ही देता है। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं ऐसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं वैसा’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार अपनी हेकड़ी दिखाने वाली प्रवृत्ति या सोच को छोड़कर मैं तो उसका यन्त्र हू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस शक्ति का एक सेवक हूँ या उसका एक बालक हूँ- इस बात पर आ जाता है। मैं तो उसके हाथ की एक बाँसुरी हूँ- जो वह बजा रहा है। सचमुच अहम् के द्वारा ऐसा समर्पण कठिन तो है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर शान्ति का और कोई रास्ता भी नहीं है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>सनातन वैभव</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Oct 2017 21:54:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>'वन्दे’ शब्द के संदर्भ में राष्ट्रगीत</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">आचार्य आनन्द प्रकाश</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">तेलंगाना</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2538/vande-shabd-ke-sandarbh-me-rashtriya-geet"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/353.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वन्दे मातरम्’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की समीक्षा</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> में जिस </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वन्दे मातरम्’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन की हुंकार जगाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वन्दे मातरम्’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">गीत के प्रति विरोधाभास करोड़ों देशवासियों के लिए आश्चर्य सा लगता है। फिर भी कुछ समुदाय इसके विरोध में इसलिए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि उनके अनुसार इससे उनकी धार्मिक मान्यताओं पर ठेस पहुँचती है। वे निराकार ईश्वर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खुदा के अतिरिक्त किसी जड़ वस्तु की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूमि की उपासना भक्ति एवं इबादत नहीं करते। कुछ नास्तिक निरीश्वरवादी किसी ईश्वर को नहीं मानते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न भक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपासना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इबादत करते हैं। इसी कारण वर्तमान में विवाद का विषय बने रहे </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वन्दे’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द की इस लेख में भाव शाब्दिक समीक्षा प्रस्तुत है:-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सं</span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्कृत में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वन्दे’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द क्रियापद है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वदि अभिवादनस्तुत्यो:’</span> (<span lang="hi" xml:lang="hi">अभिवादन- प्रणाम करना एवं स्तुति-गुणगान करना) धातु से लट् लकार (वर्तमान काल) में उत्तम पुरुष के एक वचन में बनता है। वन्द्+शप्+लट्-वन्द्+अ+इट्- वन्दे। इस धातुरूप के इसके धात्वर्थ के अनुसार दो अर्थ हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रथम- मैं वन्दना (अभिवादन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रणाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपासना) करता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह अर्थ चेतन माता-पिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु आदि को अभिवादन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नमस्ते करने के लिए एवं परमेश्वर की भक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपासना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इबादत करने के लिए प्रयुक्त होता हैं। जबकि दूसरा मैं स्तुति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुणगान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नामवरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ाई करता हूँ। यह अर्थ चेतन एवं जड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्जीव पदार्थों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तुओं के प्रति होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जड़ वस्तुओं की उपासना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इबादत का तो औचित्य नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु प्रशंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुणगान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नामवरी तो चेतन के साथ-साथ जड़ वस्तुओं की भी हो सकती है। जैसे:- प्रत्येक दुकानदार अपनी बेचने की वस्तुओं की प्रशंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुणगान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ाई करता है। फल विक्रेता कहता है- ये फल ताजे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मीठे हैं आदि। शाक विके्रता कहता है - ये तरकारी ताजी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुत अच्छी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सस्ती है आदि। मूंगफली विक्रेता जोर-जोर से बोलता है- जाड़े का मेवा मूंगफली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करारी-भुनी मूंगफली आदि। टी.वी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रेडियो और अखबारों में दिन-रात लोग व कम्पनियाँ अपने उत्पादों की जोर-शोर से वन्दना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्तुति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुणगान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ाई करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे उनका माल अधिक बिकता है। अर्थात् प्रत्येक माल विक्रेता अपनी वस्तुओं की वन्दना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्तुति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नामवरी करता है। यदि यह वन्दना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुणगान न करें तो उसका माल धरा रह जायेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि कोई विक्रेता कहे कि मैं इन वस्तुओं की स्तुति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुणगान नहीं करूँगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुम्हे वस्तु लेनी है तो लो नहीं तो आगे बढ़ो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दुकान नहीं चल सकती है। मैंने प्रत्येक दुकानदार को अपने माल की वन्दना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्तुति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ाई करते देखा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे वह हिन्दू हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुसलमान हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईसाई हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिख हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नास्तिक हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्त्री हो या पुरुष हो। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृत के भारतीय राष्ट्रगीत में भी मातृभूमि की स्तुति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशंसा ही की गयी है:-</span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वन्दे मातरम्</span>,</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शस्यश्यामलां मातरम्।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">शुभ्रज्योत्स्ना पुलकितयामिनीम्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फुल्लकुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्</span>,</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुखदां वरदां मातरम्। वन्दे मातरम्.....।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् मैं (पृथिवीपुत्र) अपनी मातृभूमि (जन्मभूमि) की वन्दना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुणगान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नामवरी करता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सुन्दर मीठे जल वाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मीठे रसीले फल-फूल वाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ठंडी सुगन्धित वायु वाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरीभरी फसलों से सजी हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चमकीले प्रकाश वाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्तिप्रद रात्रियों वाली व फूलते-फलते वृक्षों से सुशोभित है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ के वासी हँसते-खेलते मधुरभाषी हैं। यह मेरी मातृभूमि सुख देने वाली और वरदान देने वाली (लक्ष्य को पाने की शक्ति देने वाली) है। ऐसी अद्भुत मातृभूमि की मैं वन्दना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुणगान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नामवरी करता हूं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस गीत में गुणगान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशंसा करने वाले ही शब्द हैं। उपासना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इबादत करने को नहीं कहा गया। जिस देश की मिट्टी में हम पले-बढ़े हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी प्रशंसा करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुणगान करना तो हमारा स्वाभाविक धर्म है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्यथा कृतघ्नता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एहसान फरामोशी का पाप लगेगा। वास्तव में मैं यह व्याख्या अपनी मनमानी खींचातानी से नहीं कर रहा हू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु हजारों लाखों वर्षों से उक्त दोनों अर्थों में यह धातु है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वन्दना’</span> (<span lang="hi" xml:lang="hi">अभिवादन-प्रणाम और स्तुति-प्रशंसा) शब्द बनता है। इसका जो अर्थ हजारों वर्ष पूर्व था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही अब है और ये ही दोनों अर्थ वर्षों के बाद भी रहेंगे। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वन्दे मातरम्’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पर आपत्ति का कारण मैं समझता हूँ कि वे </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वन्दे’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द का एकमात्र अर्थ अभिवादन करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रणाम करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इबादत करना ही समझते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कि इस शब्द के प्रति घोर अन्याय है और ५० प्रतिशत झूठ है। इस </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वन्दे’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द का अर्थ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अभिवादन’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अभिवादन’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्तुति करना’</span> (<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशंसा करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुणगान करना) भी है। अत: दूसरा अर्थ ही इस गीत में लेना अभीष्ट है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अत: मेरा मानना है कि सभी लोग अपने देश की प्रशंसा करने वाले गीत को मातृभूमि की स्तुति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुणगान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नामवरी करने वाला मानकर नि:संकोच प्रसन्नता से गा सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्य क्षेत्रिय भाषाओं में तो एक शब्द के अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे-मराठी भाषा में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ताई’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का अर्थ दीदी (बड़ी बहन)। किन्तु हिन्दी भाषा में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ताई’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का अर्थ ताऊ की पत्नी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माँ की जेठानी होता है। अत: यदि आप उत्तर प्रदेश में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">दीदी’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ताई’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहकर बुलाएंगे तो नाराज होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थप्पड़ देगी या गाली देगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु यदि महाराष्ट्र में दीदी को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ताई’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहकर बुलाएंगे तो वह प्रसन्नता से उत्तर देगी। किन्तु संस्कृत भाषा में ऐसी भ्रान्ति नहीं होती। स्थिति के अनुसार उसका अर्थ स्पष्ट हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि आप इस राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकृत </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वन्दे मातरम्’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के पद समूह को देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि इस गीत में भारत का नाम नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: इसे पाकिस्तान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जापान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यूरोप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अफ्रीका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आस्ट्रेलिया आदि के सभी देश गा सकते हैं। अर्थात् यह किसी एक देश (भारत) का ही गीत नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु पृथ्वी-वासी प्रत्येक देश वाले इसको गाने योग्य है। मेरे मान्य प्रधानमंत्री श्री मोदी जी से निवेदन है कि इस </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वन्दे मातरम्’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">गीत को संयुक्तराष्ट्र संघ में विश्व राष्ट्र गीत की मान्यता दिलाने के लिए प्रयत्न करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि हम सब पृथिवी वासीयों का एक कुटुम्ब है (वसुधैव कुटुम्बकम्)। यदि कभी हमें मंगल ग्रह वासियों या बृहस्पति ग्रह वासियों के साथ मिलने का अवसर मिले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हम गर्व से कह सकें कि हम ऐसी पृथिवी (ग्रह) के वासी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसा इस गीत में बताया गया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस गीत के शीर्षक  के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मातरम्’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द पर भी विवाद है कि हम भूमि को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मातरम्’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">क्यों कहें</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">सो इसका अर्थ समझें कि यह शब्द वाचकलुप्तोपमालंकार में है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् माता के समान सुख देने वाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन देने वाली भूमि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मातृभूमि’। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी सादृश्य से बहुत से शब्द बोले जाते हैं जैसे- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">नरशार्दूल:’</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रामसिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रणसिंह</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">धर्मसिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोविन्द सिंह आदि। सिख बन्धुओं के नाम अधिकतर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सिंह’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पर होते हैं। इन सबका अर्थ है- सिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शेर के समान पराक्रमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्साही। न कि बड़े-बड़े दाँतों और पंजों वाला जानवर।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आशा है कि सभी मत के लोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभी देशों के मनुष्य इस </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वन्दे मातरम्’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">गीत को खुशी-खुशी गाकर स्वयं भी प्रफुल्लित होंगे और सुनने वाले भी।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>सनातन वैभव</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2538/vande-shabd-ke-sandarbh-me-rashtriya-geet</link>
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                <pubDate>Sun, 01 Oct 2017 21:53:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>चिकित्सा शास्त्र का उपयोगी घटक 'गुग्गुल’</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">डॉ. डी.एन. तिवारी</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">पूर्व<span>  </span>चिकित्साधिकारी</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">चम्पावत</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2539/chikistakiya-shastra-ka-upyogi-ghatak-guggul"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/guggul.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इं</span><span lang="hi" xml:lang="hi">टरनेट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिंरट मीडिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इलेक्ट्रानिक मीडिया और चिकित्सा वैज्ञानिक समुदाय में आजकल मानव चिकित्सा हेतु गुग्गुल की उपयोगिता बहुत विशेष मानी जा रही है। हजारों वर्षों से भारतीय चिकित्सा पद्धति में मोटापे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गठिया और कई प्रकार की हृदय संबंधी समस्याओं को ठीक करने वाले गुग्गुल की औषधीय क्षमता को अमेरिकी शोघकर्ताओं ने अपनी प्रयोगशालाओं में कठिन परीक्षणों के उपरांत निर्विवाद रूप से अव्वल पाया। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हॉस्टन स्थित </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बेयलर कालेज ऑफ मेडीसन’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के डेविड मूर चिकित्सा वैज्ञानिक के विज्ञान पत्रिका साइंस में प्रकाशित एक लेख में कहा गया कि काँटेदार गुग्गुल भारतीय चिकित्सा पद्धति में ६०० ईसा पूर्व से मोटापे सहित धमनियों की कई बीमारियों के उपचार स्वरूप प्रयोग किया जाता रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने शोध में पाया कि गुग्गुल  अर्क का अत्यन्त सक्रिय तत्व स्टेरॉयड गुग्गुल स्टेरॉन कोशिकाओं के फार्नेस्वॉयड एक्स रिसेप्टर (स्न ङ्ग क्र) की सक्रियता को रोक देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे कॉलेस्ट्रॉल पित्त अम्ल के रूप में परिणत हो जाता है। लेकिन यह प्रक्रिया बहुत तेजी से हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो शरीर को कॉलेस्ट्रॉल से मुक्ति पाने का यथेष्ट अवसर नहीं मिल पाता। परिणामत: शरीर में कॉलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ने से हृदय रोगों के खतरे बढ़ जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि गुग्गुल आमाशय में पैदा होने वाले अम्ल को प्रभावित कर कॉलेस्ट्रॉल नियमित करता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका में किये गये इस शोध से यह साबित हो गया है कि यदि कॉलेस्ट्रॉल का स्तर अधिक हो तो गुग्गुल उसे कम तो करता ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉलेस्ट्रॉल नियंत्रक अन्य दवाओं के साथ बेहतर संयोजन भी कर लेता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेदानुसार गुग्गुल कड़वा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उष्ण वीर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पित्तकारक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मृदु विरेचक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाक में चरपरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हड्डी को जोड़ने वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वीर्यवर्धक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वर को सुधारने वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तम रसायन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पथरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आमवात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बवासीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गण्डमाला और कृमि रोग को नष्ट करने वाला प्रमुख घटक है। यह मधुर रसयुक्त होने से वात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कसैला होने से पित्त और कटु होने से कफ नष्ट करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए गुग्गुल त्रिदोषनाशक भी कहा जाता है। ताजा गुग्गुल वीर्यवर्धक और बलकारक होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि पुराना गुग्गुल शरीर को दुर्बल करने वाला और अनिष्ट कारक माना जाता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मूर एवं उनके शोध दल के साथियों ने गुग्गुल अर्क के कॉलेस्ट्रॉल कम करने के प्रभावों की बेहतर समीक्षा के लिए चूहों को अध्ययन का आधार बनाया। शोध दल ने उन्हें भोज्य पदार्थ खिलाए। तत्पश्चात उनके लिवर में कॉलेस्ट्रॉल का स्तर मापा गया। स्पष्टत: यह स्तर काफी अधिक था। दूसरे समूह के चूहों को उच्च कॉलेस्टॉल वाला भोजन खिलाए जाने के साथ ही गुग्गुल स्टेरॉन दिया गया एवं पाया गया है कि उनके लीवर में कॉलेस्ट्रॉल का स्तर उच्च कॉलेस्ट्रॉल वाला भोजन खिलाएँ जाने से पूर्व जितना ही था।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज अमेरिका के इस शोध परिणाम के प्रचार में आ जाने के बाद जिस गुग्गुल की चर्चा तेज हो गयी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह बाणभट्ट की चिकित्सा शास्त्र में ढ़ाई-तीन हजार वर्ष पूर्व (मेदोरोग) अथवा मोटापे के सफल उपचार का सशक्त माध्यम मानी जाती थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने गुग्गुल को रक्त में अवांछित वसा का स्तर कम करने वाली औषधि माना है। विभिन्न वसा के शरीर में इकट्ठा हो जाने से पैदा होने वाले </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">हाइपरलिपेमिया’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग के ईलाज में इसके व्यापक प्रयोग का वर्णन बाणभट्ट के औषध लेखन में मिलता है। आमवात दोष के कारण होने वाला </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">गठिया (रियूमैटिक)’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के सफल इलाज का वर्णन भी इसमें मिलता हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेदिक ग्रंथों में गुग्गुल की औषधीय महत्ता का बहुत वर्णन मिलता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महर्षि चरक ने इसे मेदोरोग शामक (रक्त में वसा स्तर कम करने वाला)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वात (गठिया की स्थिति) शामक माना। चरक संहितानुसार इसका इस्तेमाल कुष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचा रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगंदर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रलुप्त (गंजापन)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोराइसिस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्श</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वेतप्रदर सहित स्त्री जननांगों के रोग और साइनस की सूजन सहित</span>,  <span lang="hi" xml:lang="hi">यौन-शिथिलता जैसे रोगों के उपचार में किया जाता हैं। शिलाजीत तथा गो दुग्ध के साथ इसके पाक को उपयोग में लाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुश्रुत ने इसे मोटापे के उपचार में अद्वितीय औषधि बताया है। इसके साथ ही उन्होंने गुग्गुल को हृदय रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अरुचि (भूख न लगना)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुल्म (गाँठ)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फोड़ा/घाव आदि रोगों के उपचार में उत्तम माना है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय वैज्ञानिक सत्यवती ने अपने शोध में पाया कि सीरम लिपिड अर्थात् कॉलेस्ट्रॉल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ट्राइग्लिसाइड्स और फॉस्पोलिपिड्स के साथ ही शारीरिक वजन को कम करने में गुग्गुल पूर्ण रूप से सक्षम है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद में गुग्गुल के साथ अन्य औषधीय द्रव्यों को मिलाकर निम्र अनेक दवाईयाँ बनाई जा रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो स्वास्थ्यप्रद साबित हो रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इनमें:-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महायोगराज गुग्गुल</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाण्डुरोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मंदबुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसूती रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नेत्ररोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदर रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नष्टार्तव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्नायुशून्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ तथा इसके अतिरिक्त उदावर्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुल्म आदि रोग इस औषधि के सेवन से दूर होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">कैशोर गुग्गुल</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्रण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुल्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिंडिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदर रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाण्डु रोग आदि रोग इस औषधि के सेवन से दूर होते है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैशोर गुग्गुल उत्तम रसायन भी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके सेवन करने से किशोर अवस्था के समान बल प्राप्त होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">त्रिफला गुग्गुल</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भगन्दर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुल्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूजन और बवासीर आदि रोगों का नाश इस औषधि के सेवन से होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कांचनार गुग्गुल</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस गुग्गुल को उचित अनुपात के साथ देने से गण्डमाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्बुद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गाँठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्रण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगन्दर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुल्म आदि रोग नष्ट होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गोक्षुरादि गुग्गुल</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गोक्षुरादि गुग्गुल उचित अनुपातों के साथ प्रमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूत्र कृच्छ्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूत्राघात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वातरक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वीर्य दोष और पथरी को नष्ट करता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सिंहनाद गुग्गुल</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सिंहनाद गुग्गुल के सेवन से तिल्ली की वृद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदर रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नाभिव्रण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बवासीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ वातरक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाण्डु रोग आदि दूर होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">चन्द्रप्रभा गुग्गुल</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके सेवन से वीर्य और बल बढ़कर वृद्ध मनुष्य भी युवा के समान हो जाते हैं। बवासीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पथरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन्दाग्नि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाण्डु रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वीर्यदोष आदि भी इसके सेवन करने से दूर होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तुत: गुग्गुल के आत्यंतिक गुणों का विस्तार उसके प्रकारों में समाया हुआ है। भाव प्रकाश के मतानुसार गुग्गुल निम्र पाँच प्रकार का बताया गया है:- महिषाक्ष गुग्गुल भौंरे के रंग के समान काले रंग का होता है। महानील गुग्गुल गहरे नीले रंग का होता है। कुमुद गुग्गुल कुमुद के फूल के समान उज्जवल-धवल रंग का होता है। पद्म गुग्गुल माणिक रत्न के समान लाल रंग का होता है। हिरण्याक्ष गुग्गुल सोने के समान पीत वर्ण वाला होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह गुग्गुल सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। मनुष्यों के रोगों के उपचार हेतु आयुर्वेदिक औषधियों के निर्माण में इसका ही प्रयोग किया जाता है। महिषाक्ष और महानील गुग्गुल का प्रयोग हाथियों के रोगों के इलाज हेतु किया जाता है तथा कुमुद एवं पद्म गुग्गुल का प्रयोग घोड़ों के इलाज के लिए अधिकतर किया जाता है अर्थात् इसका प्रयोग पशुओं के इलाज हेतु किया जाता है।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Oct 2017 21:51:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अनुभूति आपकी</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मस्तिष्क विकार (इनकैफ्लोमलेशिया)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> ईस्ता गुप्ता (22 लवकुश नगर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टांक फाटक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जयपुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजस्थान)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उम्र 21 वर्ष। मुझे दो वर्ष की उम्र में ही मैनिनजाइटिस की बीमारी हुई थी। इसकी वजह से मुझे लगातार सिर दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चक्कर आदि आता रहता था तथा दौरे पड़ते रहते थे। 26.07.2012 को एम.आर.आई. में चेकअप कराने पर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इनकैफ्लो मलेसिया से लेफ्ट पेराइटल लोब (मस्तिष्क) में आया। कई स्थानों पर उपचार कराने पर लाभ न मिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो पतंजलि आयुर्वेदिक हॉस्पिटल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार पहुँची। वहाँ डॉ. एस.सी. मिश्रा से मार्गदर्शन लिया। 26.05.2016 से पतंजलि उपचार प्रारम्भ हुआ और 21.02.20.17 तक</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2540/anubhuti-apki"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/069.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मस्तिष्क विकार (इनकैफ्लोमलेशिया)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> ईस्ता गुप्ता (22 लवकुश नगर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टांक फाटक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जयपुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजस्थान)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उम्र 21 वर्ष। मुझे दो वर्ष की उम्र में ही मैनिनजाइटिस की बीमारी हुई थी। इसकी वजह से मुझे लगातार सिर दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चक्कर आदि आता रहता था तथा दौरे पड़ते रहते थे। 26.07.2012 को एम.आर.आई. में चेकअप कराने पर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इनकैफ्लो मलेसिया से लेफ्ट पेराइटल लोब (मस्तिष्क) में आया। कई स्थानों पर उपचार कराने पर लाभ न मिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो पतंजलि आयुर्वेदिक हॉस्पिटल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार पहुँची। वहाँ डॉ. एस.सी. मिश्रा से मार्गदर्शन लिया। 26.05.2016 से पतंजलि उपचार प्रारम्भ हुआ और 21.02.20.17 तक उपचार कराने पर अब 70-80 प्रतिशत स्वास्थ्य लाभ है। अब सिरदर्द व चक्कर में बहुत कमी है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवधि में डॉ. साहब ने मुझे मेधा क्वाथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोती पिष्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रवाल पिष्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमृता-सत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोदंती भस्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रसराज रस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेधा वटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सारस्वतारिष्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बादाम रोगन का चिकित्सकीय अनुशासन के साथ सेवन करने को कहा था। मुझे आभास हुआ कि पतंजलि निर्मित आयुर्वेदिक औषधि व वहां का उपचार देश में सर्वश्रेष्ठ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो रोगियों को आरोग्यता दे रहा है। हम गहरे अंत:करण से श्रद्धेय स्वामी जी व श्रद्धेय आचार्य श्री को नमन करते हैं।  </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मल्टिपल माइलोमा से मुक्ति</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> 7 मार्च 2017 को अपने पिता लालमनी पन्त (मल्टिपल मोइलोमा) के उपचार हेतु पतंजलि आयी। उन्हें मल्टिपल माइलोमा था। इससे पहले मैंने खूब एलोपैथिक इलाज करवाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु उससे कुछ भी सुधार नहीं दिखा। लेकिन पतंजलि की आयुर्वैदिक दवाइयों से तीन महीने में ही स्वास्थ्य में 70 से 80 प्रतिशत सुधार दिखाई दिया।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/471.jpg" alt="47"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैंने पिता जी को प्रथम बार 07-03-2017 को पतंजलि आयुर्वेदिक चिकित्सालय आकर डॉ. एस.सी. मिश्र जी को दिखाया। उन्होंने सर्वकल्प क्वाथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कायाकल्प क्वाथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संजीवनी वटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिला सिन्दूर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताम्र भस्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोयसत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभ्रक भस्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हीरक भस्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वर्ण वसंतमालती रस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुक्ता पिष्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रवाल पिष्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैशोर गुग्गुल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वृद्धिवाधिका वटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आरोग्यवर्धनी वटी निर्धारित क्रम में लेने को कहा। मैंने अपने पिता जी को इसी के साथ चिकित्सक द्वारा बताये अनुसार औषधि के साथ-साथ गेहूं का ज्वारा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोय रस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घृतकुमारी स्वरस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोधन अर्क</span>, 7<span lang="hi" xml:lang="hi"> पत्ता नीम व 21 पत्ते तुलसी रस भी दिया। कुल चार महीने तक इसे लेने पर 80 प्रतिशत लाभ मिला। अत: पूर्व की अपेक्षा ब्लड रिपोर्ट भी नार्मल होती जा रही है। मैं इसके लिए जिन्दगी भर आप सबकी आभारी रहूँगी।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>दिव्य अनुभूति</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Oct 2017 21:50:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ऋषि चेतना</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">डॉ. सुमन</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">मुख्य महिला केन्द्रीय प्रभारी</span>,<span>  </span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">पतंजलि योग समिति</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2541/vani-ek-vardan-bhi-hai-aur-ek-abhishap-bhi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/672.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">माँ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> सरस्वती जो भगवान् की मुख्य चार शक्तियों में से एक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी उपासना करते हुए वाणी का सदुपयोग करते समय वैसे ही सावधान रहना चाहिए जैसे कि अत्यन्त तेजधार वाले चाकू या तलवार का प्रयोग करते समय रहते हैं। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सावधानी हटी और दुर्घटना घटी’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">यह लोकोक्ति स्मरण रखते हुए इस भागवत दिव्य देन का सिर झुकाकर श्रद्धा पूर्वक सम्मान करें।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वै</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>दिक परम्परा में प्रात: सायं सन्ध्या करते समय प्रार्थना की जाती है</strong>- ओऽम् वाक् वाक्।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् मेरी वाणी-वाणी का ही काम करे तलवार या विष का नहीं। जब हमारी वाणी कठोर हो जाती है तब कठोर बोलकर या ऊँचा बोलकर हम सबसे अधिक पीड़ा उन्हीं को देते हैं जो हमारे बहुत नजदीक होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे अपने होते हैं जो हमसे हृदय से प्यार करते हैं। जो कुछ दूर वाले होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे तो यह कहकर हमसे दूर हट जाते हैं इसका स्वभाव अच्छा नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वभाव खराब है और हमारी उपेक्षा करके वे तो अपने ऊपर ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ने देते पर जो हमारे अपने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नजदीकी होते हैं वे तो बेचारे टूट जाते हैं घायल हो जाते हैं। वे ना तो हमें छोड़कर दूर जा सकते हैं और ना ही पास रहकर प्रीति पूर्वक सुख पूर्वक आराम से जी सकते हैं। इसलिए स्वजन हिंसा का अपराध या पाप अनजाने में ही हम एकत्रित करते रहते हैं और जब किसी दिन भगवान् की कृपा से हमें इसका अहसास होता है और हम उस अपराध के इकट्ठे किये पहाड़ को देखते हैं तब हमारा हृदय भी पश्चाताप या ग्लानी से भर जाता है फिर अपने आपको माफ करना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसलिए माँ सरस्वती के चरणों में यह निवेदन है कि वे हमें वाणी के इस दुरुपयोग रूपी विष से या अभिशाप से बचाकर हमें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे वरदान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन-दान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमृत या एक दवा के रूप में प्रयोग करना सिखायें।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/672.jpg" alt="67"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ये वाणी वरदान या जीवन दान का काम कैसे करती है यह मैं एक जीवन्त उदाहरण के माध्यम से आपको बताने का प्रयास करूँगी। मेरे परम-पूज्य गुरुदेव जिन्होंने आज लाखों नहीं करोड़ों लोगों को जीवन की एक सही राह दिखाई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके लिए योग मार्ग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशस्ति का मार्ग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुक्ति का मार्ग प्रस्तुत किया है एक मानव से महामानव-दिव्य मानव बनाने का एक मार्ग यदि बताया है तो उसके पीछे और बहुत से कारण हैं- उनका तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्याग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय की विशालता आदि अनेक दिव्य गुणों के साथ-साथ जो सबसे बड़ा गुण है वह है- वाणी की दिव्यता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माँ सरस्वती के वरदान से अभिषिक्त दिव्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओजस्वी व ममत्वयुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणायुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य अहिंसा से युक्त उनकी अमृत वाणी। क्योंकि कई बार यह भी देखा जाता है कि व्यक्ति का मन तो पवित्र ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संकल्प भी अन्दर शुभ ही होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्लिप्तता व त्यागमय ही होता है मगर वाणी से उसकी अभिव्यक्ति नहीं हो पाती है तो वाणी के सदुपयोग वाला पक्ष अधूरा रहकर अपने सद्गुणों के होते हुए भी वह व्यक्ति दूसरों का या अपना सम्पूर्ण रूप से भला नहीं कर पाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यद्यपि यह भी सत्य है कि यदि उसकी भावना पवित्र है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा की है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्याग की है तो उसका फल भी अवश्यमेव मिलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मगर वाणी वाला पक्ष जो माँ सरस्वती ने वरदान के रूप में दिया था वह अधूरा ही रह जाता है। मैंने देखा लाखों लोग जब प्रत्यक्ष रूप से श्रद्धेय स्वामी जी महाराज से बोझिल हृदय से मिलते हैं और अन्दर जाने पर ना जाने पूज्य गुरुदेव किन शब्दों का प्रयोग करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब वे लोग उनसे मिलकर बाहर निकलते हैं तो बहुत हल्के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्साह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उम्मीद व विश्वास से भरे हुए प्रसन्न मन वाले होते हैं। लाखों लोग जो प्रत्यक्ष रूप से उनसे नहीं मिल पाते वे टी.वी. आदि के माध्यम से उनकी दिव्य ओजस्वी वाणी को सुनकर ही नयी प्रेरणा प्राप्त कर लेते हैं और इतना ही नहीं टैक्नोलॉजी के माध्यम से उस वाणी को रिकॉर्ड करके भी रखा गया है जो आने वाली सदियों तक मानवता के लिए पथ प्रदर्शक का काम करेगी। इसी प्रकार महर्षि दयानन्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी विवेकानन्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री अरविन्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महात्मा बुद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् महावीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुनानकदेव आदि महापुरुषों की वाणी ही तो वरदान रूप में प्रत्यक्ष रूप से उनके जीवनकाल में भी तथा परोक्ष रूप में आज भी कितने लोगों को पीड़ा के भँवर से बाहर निकाल रही है। सारे दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपनिषद्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आरण्यक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्राह्मण ग्रन्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रामायण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गीता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुरान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुराण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाइबिल आदि उन महान्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य आत्माओं की वाणी ही तो है। चारों वेद स्वयं सर्वशक्तिमान ईश्वर की वाणी ही तो है। उपनिषद् में कहा गया है कि यह वाणी आकार में छोटी सी दिखती है मगर इसकी महिमा तीनों लोकों के समान विस्तृत है-</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एषां भूतानां पृथिवी रस: पृथिव्या आपो रसोऽपामोषधयो रस ओषधीनां पुरुषो</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रस: पुरुषस्य वाग्रसो वाच ऋग्रस ऋच: साम रस: साम्न उद्गीथो रस:।।2।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स एष रसानाँ रसतम: परम: परार्ध्योऽष्टमो यदुद्गीथ:।।3।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वागेवकर्् प्राण: सामोमित्येतदक्षरमुद्गीथ:।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तद्वा एतन्मिथुनं यद्वाक् च प्राणश्चर्क् च साम च।।5।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="right"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">(छान्दोग्योपनिषद्-1/१/2,3,5)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तेन तँ ह बृहस्पतिरुद्गीथमुपासांचक्र एतमु एव।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बृहस्पति मन्यन्ते वाग्घि बृहती तस्या एष पति: ।।11।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="right"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">(छान्दोग्योपनिषद्-१/2/11)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पाँचों महाभूतों का रस पृथ्वी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पृथ्वी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> का रस जल है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जलों का रस ओषधियाँ हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">औषधियों का रस पुरुष है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुष का रस वाणी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाणी का रस ऋक्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् भगवान की स्तुति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋक् का रस साम अर्थात् प्रभु के नाम का गायन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साम का उद्गीथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् ओंकार है। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">उत्’</span> - <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् उच्च-स्वर से</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">गीथ’</span>- <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् गान है। ।।2।।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह जो </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">उद्गीथ’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">है- ओंकार का उच्च-ध्वनि से गान है- वह रसों का रस है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परम-रस है सर्वोच्च-स्थायी रस है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रसों की शृंखला में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पृथ्वी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-जल-ओषधि-पुरुष-वाणी-ऋक्-साम-उद्गीथ के रस-क्रम में वह आठवाँ रस है। ।।3।।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वाणी ही ऋक् है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राण साम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओम् जो अक्षर है यही उद्गीथ है। अथवा वाणी और प्राण का एक मिथुन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक जोड़ा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और ऋक् और साम का दूसरा मिथुन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा जोड़ा है। ।।5।।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार मुख-स्थित प्राण को उद्गीथ का प्रतीक मानकर बृहस्पति ने ओंकारोपासना की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे उसका भी कल्याण हो गया। इसलिए प्राण को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बृहस्पति’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">माना जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाणी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बृहती’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महान् है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और प्राण उसका </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पति’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">है। ।।11।।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य अभयदेव जी ने </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">ब्राह्मण की गौ’’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नामक पुस्तक में वाणी की कितनी महिमा का बखान किया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अत: माँ सरस्वती जो भगवान् की मुख्य चार शक्तियों में से एक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी उपासना करते हुए वाणी का सदुपयोग करते समय वैसे ही सावधान रहना चाहिए जैसे कि अत्यन्त तेज धार वाले चाकू या तलवार का प्रयोग करते समय रहते हैं। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सावधानी हटी और दुर्घटना घटी’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">यह लोकोक्ति स्मरण रखते हुए इस भागवत दिव्य देन का सिर झुकाकर श्रद्धा पूर्वक सम्मान करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>सनातन वैभव</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Oct 2017 21:49:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भारत के अभिजन</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">प्रो. रामेश्वर मिश्र </span>'</strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">पंकज’</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2542/bharat-ke-abhijan"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/047.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">      किसी </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भी समाज में संस्कृति और विद्या के क्षेत्र में जो प्रवाह चलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी से समाज पहचाना जाता है और परिभाषित होता है। संस्कृति और विद्या का क्षेत्र एक विशाल क्षेत्र है और इसमें विशिष्ट पुरूषार्थ करना विरले लोगों का ही काम होता है। सारे संसार मे ऐसे लोगों को सम्बन्धित समाज के अभिजन या एलीट कहा जाता है। विद्या के विशाल विस्तार में अग्रिम पंक्ति में रहने वाले लोग अभिजनों के विचार-जगत को रचते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शासन के शिखर पर रहने वाले लोग अभिजनों की राजनैतिक मान्यताओं का सृजन करते हैं और राष्ट्र जीवन या समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में प्रभावशाली हैसियत रखने वाले लोग अभिजनों की नीति सम्बन्धी मान्यताओं का निर्धारण करते हैं।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">न दिनों भारत के सन्दर्भ में यूरोप का उदाहरण लेकर ही शिक्षित लोग सरलता से समझ पाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: वही उदाहरण लेना होगा। यूरोप में शताब्दियों तक ख्रीस्तपंथी पादरी ही वहाँ के अभिजन मान्य रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु विश्रीय क्षेत्र में वास्तविक अभिजन केवल यहूदी लोग ही रहे। इन यहूदियों से यूरोप के आर्थिक क्षेत्र में बढ़त की इच्छा वाले ख्रीस्तपंथी लोग प्राय: ईर्ष्या रखते थे और इनको मारने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जलाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लूट लेने और नष्ट कर देने के लिए वे लोग एक विचित्र-सा तर्क रचते थे कि जीसस को सूली पर चढ़ाने वाला राजा यहूदी था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए ये यहूदी महापापी हैं और हमें इन्हें नष्ट कर डालना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब मुश्किल यह है कि यह नितान्त झूठ है। जीसस को सूली पर चढ़ाया था रोमन राजा ने। परन्तु रोमनों का तो ख्रीस्तपंथी कभी कुछ नहीं बिगाड़ सके। उल्टे रोमनों की यशोगाथा ही यूरोप के लोग आज तक गाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: एक झूठ रचकर अपनी ईर्ष्या को अभिव्यक्ति दी गयी है। कई सौ वर्षों तक यूरोप में यहूदियों का भयंकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बर्बर दमन हुआ और उन्हें तरह-तरह से सताया गया। परन्तु तब भी आर्थिक क्षेत्र के अभिजन आज तक यूरोप में यहूदी लोग ही बने हुए हैं। यही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञान और मानविकी के क्षेत्रों में भी अनेक यहूदी अत्यन्त प्रभावशाली हुए और उन्होंने यूरोप के चित्त को गढ़ा। इनमें आंइस्टाइन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्ल मार्क्स और सिगमण्ड फ्रॉयड उल्लेखनीय हैं। अनेक यहूदियों ने प्राणदण्ड के भय से ख्रीस्तपंथ अपनाकर भी अपना काम जारी रखा औरी प्राचीन यूरोपीय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विषेषत: यवन क्षेत्रीय और रोम क्षेत्रीय चित्रों तथा अन्य कलाकृतियों और कतिपय पुस्तकों को ढूढँकर उन्हें धीरे-धीरे यूरोपीय नवजागरण के आधार के रूप में प्रस्तुत किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे लगभग 200 वर्षों में यूरोप से ख्रीस्तपंथ का वर्चस्व मिट गया। नवजागरण की प्रेरणा से यूरोप के लोग दुनिया भर में निकले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने विश्व की अनेक सभ्यताओं की जानकारी प्राप्त की। उन जानकारियों के आधार पर अपने यहाँ वैज्ञानिक प्रगति की और मध्ययुग की अनेक मान्यताओं को पिछड़ी और बर्बर मानकर त्याग दिया। यही लोग नये यूरोप के अभिजन बने।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में ब्रिटिश प्रभाव के प्रसार के साथ यहाँ भी एक छोटा-सा वर्ग ऐसा पनपा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने ख्रीस्तपंथ के प्रभावों को आत्मसात् कर स्वयं को एक नये अभिजन की तरह प्रस्तुत करने का प्रयास किया। स्पष्ट है कि यह वर्ग न केवल छोटा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु इसे भारत की व्यापक जानकारी भी नहीं थी। परन्तु राजनैतिक छल और कूटनीति में यह निपुण होता गया और इसने भारत के देशभक्त वीरों के दबाव का प्रयोग कर अंग्रेज़ों से गुप्त संधियों के द्वारा सत्ता हस्तान्तरण का पथ अपने लिए प्रशस्त किया। इनमें जवाहरलाल नेहरू तथा उनके अन्य साथी सबसे अग्रणी थे। राजनैतिक दृष्टि से सर्वाधिक चतुर श्री जवाहरलाल नेहरू सिद्ध हुए और उन्होंने ब्रिटिश भारत से अंग्रेजों की विदाई के अवसर का लाभ उठाकर तथा देशभर में फैली प्रचण्ड देशभक्ति की भावना का उपयोग करते हुए उसे अपने पक्ष में मोड़ा और साथ ही अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर नयी उभरी शक्ति-सोवियत संघ तथा कम्युनिस्ट आन्दोलन से साठगाँठ कर बल पूर्वक भारत में एक नया अभिजन रचने की पहल की। इसमें ब्रिटिश भारत के वे लोग जो ब्रिटिश शासन के शीर्ष अधिकारी थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अथवा ऐसे लोग जो ब्रिटिश भारतीय शिक्षा में अग्रणी थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने यूरोपीय ज्ञान के प्रति ही प्रमाण-भावना पालने के कारण इस नये अभिजन वर्ग के उन्मेष में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु इसमें अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो गयी। सम्पूर्ण भारत में फैलाये गये ब्रिटिश भारतीय ढाँचे का लाभ उठाकर यह नया अभिजन वर्ग अत्यन्त शक्तिशाली तो होता गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु इसके सामने पहचान का गम्भीर संकट उत्पन्न हो गया। उसका कारण यूरोप के अभिजन थे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यूरोप के अभिजनों की मुख्य विषेषता यह रही कि उन्होंने सदा अपने ही प्राचीन ज्ञान की निरन्तरता में स्वयं को प्रस्तुत करने का प्रयास किया। इसके लिए उन्हें बहुत-से मिथक रचने पड़े और प्राय: अतिरंजनाओं और असत्यों तक का सहारा लेना पड़ा। उन्होंने अपने इतिहास के सभी अंधकारमय पक्षों को ढँक दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिस दौर को ढँकना असम्भव हो गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सात-आठ सौ वर्षों के उस पूरे दौर को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अंधकार युग’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहकर उससे अपना पल्ला झाड़ लिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु दूसरी ओर उसी अवधि के बारे में काल्पनिक गौरव के भाँति-भाँति के किस्से रचते रहे और अपने ज्ञान की जड़ें उसी अवधि में बताते रहे। उन्होंने भारत और चीन से जो कुछ सीखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस सबको वे स्वयं यूरोप के ही अतीत में विद्यमान बताने की कोशिश करते रहे। इसके लिए उन्होंने अपनी भाषाओं में विशाल साहित्य रचा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें गप्पों और अतिरंजनाओं का भी बहुत बड़ा स्थान था। इसके साथ ही विद्वत्-विमर्ष में उन्होंने ऐसी पदावली अपनायी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो केवल यूरोप को अपना सन्दर्भ बनाती है। यूरोप के सभी विद्वत्-विमर्ष यूरोपीय अतीत और यूरोपीय परम्पराओं को ही अपना मूल सन्दर्भ बनाते हैं और उसकी ही नयी-नयी व्याख्या करते हैं। इस क्रम में उन्होंने विगत डेढ़ सौ-दो सौ वर्षों में रचे गये यूरोपीय साहित्य को विश्व-साहित्य की तरह प्रस्तुत करने का प्रयास किया। यह विश्व में बौद्धिक आधिपत्य स्थापित करने की उनकी सुचिन्तित कोशिश है। इसी अर्थ में वे यूरोपीय समाज के अभिजन हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय अभिजनों के नये वर्ग की मुश्किल यहीं से शुरू होती है। वे यूरोपीय अभिजनों की नकल करते हैं। इसके लिए यूरोप में रचित आधुनिक पुस्तकों को ही पढ़ते और पढ़ाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हीं के आधार पर बहसें और चर्चाएँ करते हैं और उन्हीं को ज्ञान के लिए प्रमाण तथा अधिकारी मानते हैं। परन्तु केवल यूरोपीय सभ्यता पर गर्व करने पर वे किसी भी प्रकार भारतीय अभिजन नहीं रह पायेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह तथ्य जानते हुए वे भारतीय सभ्यता के इतिहास को यूरोप की अनुकृति बताने का प्रयास करते हैं। परन्तु इससे कई मुश्किलें पैदा होती हैं। मुख्य मुश्किल तो विचारों के जगत् में ही आती है। यूरोप का अभिजन अपने ही शास्त्रों और अपने ही विद्वानों को अपना सन्दर्भ बनाता है। यह अभिजनों का विश्व-व्यापी लक्षण है। भारत के नये अभिजन इसकी नकल कैसे करें</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">अगर वे भारतीय शास्त्रों को और भारतीय विद्वानों को मूल सन्दर्भ बनाते हैं तो वे एक क्षण बौद्धिक स्तर पर खड़े नहीं रह सकते। अगर वे यूरोपीय शास्त्रों और भारत में यूरोपीय शास्त्रों के अनुवादकों को अपना सन्दर्भ बनाते हैं तो वे स्वत: तरस के पात्र बन जाते हैं। गहरे में उनके भीतर एक कुण्ठा और हीनता भर जाती है। इसके लिए वे राज्याश्रय का सहारा अवश्य लेते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु विचारों और विद्या की दुनिया में राज्याश्रय की भूमिका बहुत सीमित होती है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी समस्या यह है कि वस्तुत: भारत की अपनी विद्या परम्परा कभी भी बहुत क्षीण नहीं हुई और आज भी विषेशत: मानविकी विद्याओं के क्षेत्र में भारत के शास्त्र सम्पूर्ण यूरोप के शास्त्रों से संख्या में बहुत अधिक हैं और गुणवत्ता में भी कुछ कम नहीं हैं। इस विद्या परम्परा के विशेषज्ञ और अग्रणी लोग भी भारत में बड़ी संख्या में हैं। विशेषत: धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यात्म और संस्कृति के क्षेत्र में भारतीय विद्या परम्परा में दक्ष लोगों की विराट संख्या विद्यमान है। ये ही भारत के वास्तविक अभिजन हैं। इनके सामने भारत के वे नये अभिजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो वस्तुत: आधुनिक यूरोप के नियोग से उपजे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काफी बौने और दयनीय नज़र आते हैं। वे भारतीयता की बात करने को मजबूर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु उनकी सारी बात या तो यूरोपीय लेखकों की लिखी पुस्तकों पर आधारित होती हैं या फिर उन पुस्तकों के अनुवाद के रूप में भारतीय भाषाओं में लिखी पुस्तकों पर आधारित होती हैं। स्पष्ट है कि ऐसी स्थिति में वे द्वितीय श्रेणी के बौद्धिक नज़र आते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक समस्या और भी हैै। आधुनिक भारतीय राजनैतिक दलों के नेता भारतीय समाज से ही आते हैं। और कोई रास्ता भी नहीं है। ऐसी स्थिति में भारतीय समाज की अपने धर्माचार्यों पर और अपनी शास्त्र परम्परा पर जो गहरी श्रद्धा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका उपहास उड़ाने की उनकी हैसियत नहीं बनती। इस प्रकार भारत के हिन्दू धर्माचार्य भारत के वास्तविक अभिजन बने रहते हैं और उनकी चमक ज्यों की त्यों बनी रहती है। इसीलिए हम पाते हैं कि प्रशासनिक सेवाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सैनिक सेवाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुलिस सेवाओं और न्यायिक सेवाओं के उच्चतम पदों से मुक्त हुए भारतीय भी किसी न किसी भारतीय धर्माचार्य के प्रति गहरी श्रद्धा अवश्य रखते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह बात जहाँ उनकी भारतीयता का प्रमाण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं इसी प्रक्रिया में भारत के वास्तविक अभिजनों की महिमा और गौरव बढ़ता ही जाता है। इस स्थिति में कई पेचीदगियाँ पैदा हो रही हैं। कांग्रेस वस्तुत: भारत के राजनीति कर्मियों की एक महासभा थी। यह ठीक है कि उसमें श्री नेहरू ने कम्युनिज़्म और ब्रिटिश भारतीय मान्यताओं की एक अजीब-सी खिचड़ी पकाकर एक नकली अभिजात वर्ग रचने के अद्भुत प्रयास किये। परन्तु राष्ट्रव्यापी दल होने के कारण कांग्रेस में सभी प्रकार के भारतीय बने रहे और वह कभी भी वैचारिक एकपंथवाद का शिकार पूरी तरह नहीं हो पायी। परन्तु नेहरू जी ने जो प्रक्रिया चलायी थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके कारण एक ओर कम्युनिज़्म और दूसरी ओर यूरोपीय किस्म का राष्ट्रवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन दो को केन्द्र बनाकर दो प्रचण्ड एकपंथवादी राजनैतिक शक्तियाँ भारत में उभरीं हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एकपंथवाद इस बात का आग्रह करता है कि वह न केवल शासन में अपितु धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कला और संस्कृति के सभी क्षेत्रों में अपने ही पंथ का प्रचार करेगा। इसके लिए वह अपनी पार्टी के नेताओं को ही विचारक और दार्शनिक की तरह प्रस्तुत करता है और मन्दिर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्याकेन्द्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यात्म केन्द्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कलाकेन्द्र आदि सभी को अपने ही पंथ के अनुशासन में लाने का प्रयास करता है। परन्तु हिन्दू समाज तो सदा से बहुपंथवादी रहा हैं। नेहरूपंथियों ने इसमें यह छल किया कि भारत के बहुपंथवाद को वे </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">हिन्दू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुस्लिम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिक्ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईसाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपस में सब भाई-भाई’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के नारे के नीचे इस तरह प्रस्तुत करते रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानो हिन्दू समाज एक पंथ है और तब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुपंथवाद का अर्थ हिन्दुओं को एक पंथ की तरह मानते हुए अन्य पंथों को भी समान महत्त्व देना प्रचारित किया गया। परन्तु हिन्दू समाज तो स्वयं विविधपंथी है। उसमें सदा से सैकड़ों पंथ हैं। इसलिए यदि कोई राजनैतिक दल एक अलग पंथ बनने का प्रयास करेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह उन सैकड़ों पंथों में से ही एक और पंथ बनकर रह जायेगा और इस प्रकार वह गहरे अर्थों में भारत में प्रजातांत्रिक शासन करने के अयोग्य हो जायेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसे सरल भाषा में कुछ इस तरह स्पष्ट किया जा सकता है कि यदि किसी दल के लोग केवल अपने नेता को शीर्षस्थ विचारक और दार्शनिक की तरह प्रस्तुत करेंगे तो यह भारतीय धर्माचार्यों की विशाल और विराट परम्परा का अनजाने ही अनादर हो जायेगा। जबकि ये धर्माचार्य किसी भी भारतीय राजनेता से बहुत अधिक बुद्धिमान और विद्वान् दोनों हैं। उनको अपने अधीन लाने की किसी पार्टी की कोशिश विफल ही रहने वाली हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार यदि कोई राजनैतिक दल भारत के मन्दिरों और धर्म केन्द्रों को अपने अंकुश में लाने का प्रयास करता है और इसके लिए प्रशासनिक अधिकारियों को मन्दिरों का नियंत्रक बनाता है तो स्पष्ट रूप से यह महापाप है और भारत की जनता ऐसा करने वाले दलों को पापी ही मानती है और मानेगी। एकपंथवादी दलों में यह सामान्य रूझान होता है कि वे मन्दिरों तथा धर्मकेन्द्रों को अपने अंकुश में रखें। बातें तो भ्रष्टाचार पर नियंत्रण की होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु वस्तुत: आध्यात्मिक दृष्टि से यह सबसे बड़ा भ्रष्ट आचरण है कि किसी धर्म-परम्परा में विशेष दक्षता जिन व्यक्तियों को प्राप्त नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे उस धर्म-परम्परा के किसी केन्द्र को संचालित करने का प्रयास करें या उस पर नियंत्रण रखने की कोशिश करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार अपने नेता की किसी मान्यता के आधार पर एक नयी संस्कृति रचने का प्रयास भी भारतीय दृष्टि से सब प्रकार से राष्ट्र-विरोधी होगा और यह नेहरू जी द्वारा 1947 ईस्वी के बाद से इसी दिशा में किये गये कामों की तरह ही निन्दनीय होगा। वस्तुत: राजनैतिक दलों के नेता भारत के एक नया अभिजन वर्ग हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अपने चरित्र और संरचना में वर्णसंकर हैं। क्योंकि भारत में एक भी ऐसा बड़ा नेता 1947 ईस्वी के बाद से आज तक नहीं हुआ है जो वेदों का शीर्ष विद्वान् हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपनिषदों और पुराणों का गम्भीर अध्येता हो और भारतीय ज्ञान परम्परा तथा शास्त्र परम्परा में निष्णात हो। ऐसी स्थिति में उसके द्वारा प्रस्तुत किये गये विचार वस्तुत: भारतीय संस्कारों और यूरोप की कुछ द्वितीय श्रेणी की पुस्तकों के अधकचरे सम्मिश्रण की दयनीय प्रस्तुति मात्र होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्हें संगठन बल से अत्यधिक प्रशंसा और प्रचार के द्वारा गौरव प्रदान किया जाता है। परन्तु तत्त्वत: वे काफी कमजोर विचार होते हैं। न तो वे विश्व की कसौटी पर कहीं ठहर पाते और न ही भारतीय शास्त्रों की कसौटी पर। इस प्रकार एक द्वितीय श्रेणी के अथवा वर्णसंकर प्रकार के अभिजनों को सम्पूर्ण समाज पर आरोपित करने का प्रयास भारतीय मनीषा और परम्परा के नितान्त विपरीत है और भारत के अपने शास्त्रीय अभिजन तथा उनके प्रति श्रद्धावान् समाज उन्हें कभी भी इस रूप में स्वीकार नहीं करेगा। वे अच्छे शासक बनें और समाज की शुभ प्रवृत्तियों का संयोजन करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें ही उन्हें प्रशंसा प्राप्त होगी। कुछ अन्य करने पर वे प्रशंसा के पात्र नहीं बन पायेंगे।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Oct 2017 21:48:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
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                <title>संतों की अनोखी आत्मीयता</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">आचार्य लोकेन्द्र</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">वैदिक गुरुकुलम्</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2543/santon-ki-anokhi-atmiyata"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/405.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">   भारतीय</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> आध्यात्मिक परम्परा में सत्संग को अति महत्वपूर्ण बताया गया है और सत्संग हमें मिलता है हमारे सनातन आर्ष परम्पराओं में दीक्षित साधुओं और संन्यासियों से जो कि अपना सम्पूर्ण जीवन इस जगत् को मथने में लगा देते हैं और उचित-अनुचित में से शुभ को छाँटकर हमें प्रदान करते हैं। कहा है-</span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">संत शरण सुखदायी’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जो समस्त जगत् के सत्य को समझ गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही तो भटके हुए को रास्ता बता सकता है। क्योंकि जो व्यक्ति जगत् के इस मायाजाल में फँसा हुआ है वह भला अपने साथियों की रक्षा कैसे करेगा।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कु</span><span lang="hi" xml:lang="hi">छ दिन पहले जब पूज्य महाराजश्री ने देश के विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिष्ठित संतों के आगमन व पाँच दिवसीय शिविर की चर्चा की तो वैदिक गुरुकुलम्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैदिक कन्या गुरुकुलुम् और पतंजलि विश्वविद्यालय के सभी भाई-बहन उस पल के आगमन की प्रतिक्षा में जुट गए। अब वह समय आ गया। परम पूज्य स्वामी जी के तप: पूर्ण सान्निध्य में हमें सन्तों का एक दिव्य संगम देखने को मिल रहा है। यहाँ हम अनेकानेक तप की विभूतियों को दिव्य संन्यासी वेश में देख रहे हैं। प्रत्येक की ललाट दैदीप्यमान और मुखाकृति कुछ न कुछ सीख दे रही है। जब पूज्य स्वामी जी महाराज ने भोर में योग-सत्र आरम्भ किया तो पूरा हॉल सन्तों के अद्भुत तेज से भर गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पूर्ण परिसर भगवा रंग में रंग गया। जब सूर्य की किरणें उस पर पड़ी तो ऐसा लगा जैसे आज सूर्य का आलोक गगन से नहीं किन्तु पतंजलि योगपीठ से निकल रहा है। पूज्यश्री के इस सफल प्रयास से आत्मज्ञान की भारतीय परम्पराओं का यह प्रकाश सम्पूर्ण भारत को ही नहीं अपितु सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करेगा। हम और हमारी आने वाली हजारों पीढ़ियाँ इस दिव्य स्थिति का दर्शन करेंगी।  पूज्य गुरुवर का यह उच्चासन और वहाँ से निस्सरित भारतीय धर्म संस्कृति के विषयों पर अनमोल सारस्वत संदेश सुनकर सम्पूर्ण परिसर में नई दिव्यता छा गई। पूज्यश्री के इस प्रयास से ऐसा प्रतीत होता है कि अब योग एवं अध्यात्म की तपस्थली पतंजलि योगपीठ आज प्रसन्न हो यूँ कह रही हो कि ये हैं हमारे केन्द्र बिन्दु जिन्हें हमने अपने संकल्पों के केन्द्र में रखा है। यह है मेरा मूल स्वरूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे मुख्य कार्यों में से एक कार्य की झलक। अब यहाँ से पूरे राष्ट्र की आध्यात्मिक सत्ता संचालित और आंदोलित होगी और मेरा देश फिर से ऋषियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महर्षियों व राजर्षियों का देश होगा। प्रत्येक व्यक्ति का अपना गौरव होगा और उसमें अत्यंत गौरवपूर्ण भूमिका निभायेंगे हमारे आर्ष व सनातन परम्परा के साधु संन्यासी जो निष्काम एवं भागवत संकल्प से कार्य करेंगे।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/405.jpg" alt="40"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग सत्र के दौरान जब स्वामी जी महाराज ने संतों के चरित्र की बात की तो लगा भारत की यह उज्ज्वल संत परम्परा अपने शुद्ध व सात्विक स्वरूप की ओर और भी तेजी से अग्रसर हो रही है। इस संगम के केन्द्र में हैं बालवत् सरल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे अत्यन्त प्रिय प्रात:स्मरणीय पूज्य गोविन्ददेव गिरी जी महाराज। वो जब कुछ भी बोलने के लिए उठते हैं तो सभी शिविरार्थियों के हृदय में एक अलग ही भाव उमड़ते हैं। उनकी निश्छल हँसी में महान् भारतीय संत परम्परा का अन्तिम संदेश सभी शिविरार्थी अनायास ही ग्रहण कर लेते हैं। फिर भी वह जो बालते हैं तो वह उनकी महासागर जितनी गंभीर मुस्कुराहट की व्याख्या मात्र होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सत्पुरुषों का संग तो प्रत्येक व्यक्ति को मिलता है। जो सज्जन साधु होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे सभी पर कृपा दृष्टि रखते हैं चाहे वह सुपुरुष हो या अत्यन्त दुष्ट। चन्द्रमा अपनी शीतल चन्द्रिका चाण्डाल को भी उसी प्रकार प्रदान करता है जिस प्रकार किसी सत्पुरुष के यहाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब जल बरसता है तो वह सज्जनों के घर भी आर्द्र करता है तो अन्यत्र उतनी ही शीतलता दुर्जनों को भी प्रदान करता है। संतों का जीवन प्रभु के यन्त्र की तरह हो जाता है अर्थात् जिस प्रकार सृष्टि का चक्र उस परम सत्ता के अधीन चलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें किसी के साथ कोई राग-द्वेष उत्पन्न नहीं होता। बस यही प्रारूप है सन्तों का भी। क्योंकि प्रत्येक देश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काल और परिस्थिति में प्रत्येक के प्रति सम रहना इनका अपना अनूठा स्वभाव होता है। सन्तों की तुलना तो सृष्टि में सबसे बड़े परोपकार के देवता वृक्षों से की है। इस पर भक्त शिरोमणि तुलसीदास जी कहते हैं कि-</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span style="color:rgb(230,126,35);">'<span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी संत सुअम्भ तरु फूलहिं फलहिं विवेक।'</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आप उन्हें कितने ही कष्ट दीजिए किन्तु वे आपको सद्ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वात्सल्य व समरसता से उबारने का प्रयत्न करते ही रहते हैं। अब यदि कोई कहे कि साधु बनना तो सरल कार्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बस एक भगवा वस्त्र पहन लो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक कमण्डलु हाथ ले लो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बस हो गए संन्यासी। नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पहले संतों की अर्हताएँ तो देख लो। जिस प्रकार आप किसी फौज में भर्ती होने के लिए जाते हैं तो वहाँ आपकी उस फौज के अनुरूप योग्यता और सामर्थ्य होना अनिवार्य होता है। जैसे 6 फुट लम्बाई</span>, 85<span lang="hi" xml:lang="hi"> इंच सीना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इतनी लम्बी कूद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इतनी दौड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इतनी अर्हताएँ जब मानव निर्मित एक छोटी व्यवस्था के लिए आवश्यक हैं तो उस परम सत्ता के माॢगयों के लिए कितनी अधिक योग्यता की आवश्यकता होगी।  इस मार्ग के लिए दौड़ की योग्यता पूछें तो वह है समय की गति अर्थात् इसी जीवन में सब कुछ कर देना है। ऊँचाई इतनी हो कि सारी चीजें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उचित-अनुचित साफ-साफ देख सकें। सीना इतना हो कि आत्मखड्ग की आध्यात्मिक धार पर बिना डरे चल दे। हृदय इतना विशाल चाहिए कि सम्पूर्ण जगत् उसमें समा सके। कूद ऐसी होनी चाहिए कि माया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोध आदि को एक छलाँग में पार कर सके। ये है संन्यासी की अर्हताएँ। संन्यासी को एक योगी होना अति आवश्यक है क्योंकि यदि संन्यासी अपनी मानसिक वृत्तियों से परे नहीं जाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छोटी-छोटी अल्पताओं में ही पड़ा रहेगा तो समाज का क्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपना भी भला नहीं कर पायेगा। अब यदि भर्ती होना चाहते हो तो द्वार सभी के लिए हमेशा खुले हैं।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/411.jpg" alt="41"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसीदास जी ने कहा है कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">संत दरश नित पातक हरहिं’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">संतों के दर्शन मात्र से कष्टों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्लेशों व दु:खों का नाश हो जाता है। किन्तु यह योग्यता जो ऊपर कही गई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संन्यासी की है। यह सामर्थ्य तो एक योगी में ही हो सकता है। किन्तु ऐसे संन्यासी के दर्शन मात्र से मन के राग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वेष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईर्ष्या आदि कलुषित वृत्तियाँ गायब हो जाती हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह तो एक संत के दर्शन की बात हुई किन्तु जहाँ संत समागम हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ तो कहना ही क्या। आनन्द ही आनन्द है। चारों ओर शान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्यता और ज्योत्सना छायी हुई है। हमारा सौभाग्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे संगठन में हम हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ परम श्रद्धेय स्वामी जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रात: वन्दनीय श्री गुरु जी महाराज व श्रद्धेय आचार्यश्री की प्रत्यक्ष आत्मीयता हमें समय-समय पर मिलती रहती है। साथ ही देश के ऐसे-ऐसे संत महात्माओं के दर्शन होते रहते हैं।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>सनातन वैभव</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Oct 2017 21:46:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मौन स्फुरण</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">आचार्य शुभम्</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">वैदिक गुरुकुलम्</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2544/maun-sfuran"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/364.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;" align="center"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्येक मनुष्य निर्विवादित रूप से जीवन में सुख चाहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दु:ख की गन्ध मात्र भी नहीं चाहता।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुख व दु:ख एक सिक्के के दो पहलू हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह अमिट सत्य है। व्यक्ति सुख चाहता है तो किसी न किसी रूप में दु:ख भी मिलता ही है और यदि दु:ख से मुक्त होना चाहता है तो उसे सुख की कामना से भी मुक्त होना ही पड़ेगा। उसी दु:ख रूपी अंधकार को समझकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके चक्रव्यूह से मुक्त होने के लिए एक लघु प्रयास-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="right"> </h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अत्यंत विकट है अंधकार का मिट जाना इस भूतल से</span>,</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">घोर तिमिर का द्वन्द्व हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम प्रकाश के प्रतिपल से</span>,</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सूरज को लगता है डर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रजनी की काली बूँदों से</span>,</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बँधा हुआ है महद् दिवाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रातों के बोझिल खूँटों से।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong> </strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मानव मन यह प्रश्न लिए घूमता रहा है सदियों से</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पूछा है अम्बर पर्वत से और कलकल बहती नदियों से</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">क्यूँ हुआ यह द्वन्द्व हमारा अंधकार नामी जन से</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">क्या बैठकर शांत कभी पूछा अपने अन्तर्मन से।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong> </strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सुख का हिस्सा साथ ही दु:ख के बाँटा था भगवान् ने</span>,</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अत्यंत निवृत्ति हो दु:ख की यह माँग लिया इंसान ने</span>,</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दुविधा थी भगवान् की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैसे समझाऊँ नादान को</span>,</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गढ़ दिया फिर रात व दिन को समझाने इंसान को।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong> </strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">विनाश काले विपरीत बुद्धि’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सूक्ति सच कर दिखलाई</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ईश क्रीड़ा को समझने की बारी थी अब आई</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">क्षुब्ध हुआ संतप्त हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर समझ तो कुछ न आता था</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रश्न बनाकर नए-नए खुद से खुद को उलझाता था।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong> </strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">लगता था हर बार उसे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस बार तो गुत्थी सुलझ गई</span></strong>,</span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दिन चार बिताकर पता चला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुगुनी उलझी और उलझ गई</span>,</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्यासा भटका फिर भी अटका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हारा-माँदा थका हुआ</span>,</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पल साथ बिताता अपने दो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर रखा था पका हुआ।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong> </strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वक्त का पहिया साथ-साथ ही ढलता गया लकीरों पर</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मौन व्रत विज्ञान का इस पर रह गई बात फकीरों पर</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा से भरकर ऋषि-मुनि समझाते हैं उस नर को</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">समाधान है ऋजु हमारा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देर न करो अब क्षण भर को।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong> </strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">न सुख में विलय करो खुद को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न दु:ख में विलय करो खुद को</span>,</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हो असंग देखते रहो खड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंतश्चक्षु से सुख-दु:ख को।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तब दु:ख की मार लगेगी न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हाहाकार सुख की मचेगी न</span>,</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अमृत आनन्द को पा लोगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दाल द्वेष की गलेगी न</span>,</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दाल द्वेष की गलेगी न।।</span></strong></span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>कविता</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Oct 2017 21:44:21 +0530</pubDate>
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