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                <title>नवम्बर - योग संदेश</title>
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                <description>नवम्बर RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...</title>
                                    <description><![CDATA[<h4 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सात्विक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> जीवन के सूत्र</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;">1. <span lang="hi" xml:lang="hi">सच्चा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> धन</span>- <span lang="hi" xml:lang="hi">सुस्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सद्ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सद्भाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सद्कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुसंस्कार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सदाचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सात्विक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> समृद्धि एवं योग पूर्वक उद्योग ये आठ हमारी सच्ची दौलत हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">2. <span lang="hi" xml:lang="hi">सात्विकता</span> - <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्त्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रज</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> एवं तम इस त्रिगुणात्मक सृष्टि में हमें आहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यापार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्बन्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुख</span>-<span lang="hi" xml:lang="hi">सुविधा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसाधन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्ता</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> एव सफलता आदि सभी क्षेत्रों में किसी भी कीमत पर सात्विकता का ही चयन करना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजसिकता</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> व तामसिकता का हम चयन या वरण नहीं करें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">3. <span lang="hi" xml:lang="hi">वेदान्त व व्यवहार</span>- <span lang="hi" xml:lang="hi">भाव</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> व</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2561/shashwat-pragya-nov-2017"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/102.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सात्विक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> जीवन के सूत्र</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;">1. <span lang="hi" xml:lang="hi">सच्चा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> धन</span>- <span lang="hi" xml:lang="hi">सुस्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सद्ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सद्भाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सद्कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुसंस्कार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सदाचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सात्विक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> समृद्धि एवं योग पूर्वक उद्योग ये आठ हमारी सच्ची दौलत हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">2. <span lang="hi" xml:lang="hi">सात्विकता</span> - <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्त्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रज</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> एवं तम इस त्रिगुणात्मक सृष्टि में हमें आहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यापार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्बन्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुख</span>-<span lang="hi" xml:lang="hi">सुविधा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसाधन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्ता</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> एव सफलता आदि सभी क्षेत्रों में किसी भी कीमत पर सात्विकता का ही चयन करना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजसिकता</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> व तामसिकता का हम चयन या वरण नहीं करें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">3. <span lang="hi" xml:lang="hi">वेदान्त व व्यवहार</span>- <span lang="hi" xml:lang="hi">भाव</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> व स्वभाव में वेदान्त अर्थात् आध्यात्मिकता तथा व्यवहार सभी जीवों या समष्टि के प्रति प्रीतिपूर्वक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यथा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> योग्य धर्मानुसार व न्यायपूर्ण होना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> ही हमारी भौतिक व आध्यात्मिक बाह्य व आन्तरिक पूर्ण उन्नति होगी। </span></h5>
<h5 style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> रामदेव</span></strong></h5>
<p> </p>
<p><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-11/nov-2017.jpg" alt="nov 2017"></img></span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शाश्वत प्रज्ञा</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>नवम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Nov 2017 21:59:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भारत की वैश्विक भूमिका में हमारा उत्तरदायित्व</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    भा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">रत को परम वैभवशाली बनाने हेतु एक दिव्य एवं भव्य भारत के निर्माण की प्रक्रिया में हम 125 करोड़ भारतीयों को एक बड़ी भूमिका निभानी होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि भारत में यदि चुनौतियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संकट एवं समस्याएं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यहाँ समाधान एवं सम्भावनाएं भी अपरिमित हैं। ईश्वर प्रदत्त नैसर्गिक ऐश्वर्य एवं संसाधनों से लेकर अपरिमित मानव संसाधन भारत के पास हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सृष्टि के आदिकाल से लेकर 18वीं शताब्दी तक जब भारत विश्व की महाशक्ति रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अब भी उसकी पुनरावृत्ति होनी है। बस इस कार्य में हमें अपनी भूमिका प्रामाणिकता के साथ निभानी है। भारत वैश्विक स्तर</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2562/bharat-ki-vashwik-bhumika-me-hamara-uttardayitva"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/223.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  भा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">रत को परम वैभवशाली बनाने हेतु एक दिव्य एवं भव्य भारत के निर्माण की प्रक्रिया में हम 125 करोड़ भारतीयों को एक बड़ी भूमिका निभानी होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि भारत में यदि चुनौतियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संकट एवं समस्याएं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यहाँ समाधान एवं सम्भावनाएं भी अपरिमित हैं। ईश्वर प्रदत्त नैसर्गिक ऐश्वर्य एवं संसाधनों से लेकर अपरिमित मानव संसाधन भारत के पास हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सृष्टि के आदिकाल से लेकर 18वीं शताब्दी तक जब भारत विश्व की महाशक्ति रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अब भी उसकी पुनरावृत्ति होनी है। बस इस कार्य में हमें अपनी भूमिका प्रामाणिकता के साथ निभानी है। भारत वैश्विक स्तर पर सभी क्षेत्रों में नेतृत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्देश एवं एक प्रगतिशील आदर्श राष्ट्र की भूमिका का निर्वहन करे इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं को हम यहाँ संक्षेप में प्रस्तुत कर रहे हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमें पूर्ण विश्वास है कि आप सभी योग संदेश के पाठक इन सत्यों को प्रामाणिकता के साथ राष्ट्र में स्थापित करने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायेंगे-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा उत्तरदायित्व</span></strong></span></h5>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">देश में सफलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्धि एवं विकास का विरोध नहीं होना चाहिए। सक्सेस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिजनेस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रॉस्पेरिटी एवं डवलपमेन्ट को सभी देशवासियों को आदर एवं गौरव देना चाहिए। एंटी सक्सेस थॉट्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आइडियोलॉजी एवं मूवमेन्ट को देश में बन्द करना चाहिए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सुशासन एवं आत्मानुशासन दोनों ही राष्ट्र के लिए जरूरी हैं। लॉ को बे्रक करना तथा यूनिवर्सल लॉ को नहीं मानने से ही राष्ट्र में बहुत प्रकार के दु:ख एवं विसंगतियां जन्म लेती हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सभी क्षेत्रों में एक समग्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यायपूर्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थाई एवं विकेन्द्रित विकास की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जो भी वैज्ञानिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सार्वभौमिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंथ निरपेक्ष एवं सर्वहितकारी सोच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्धान्त एवं कार्य हो उसको अपनाना चाहिए तथा इसके विपरीत अवैज्ञानिक एवं साम्प्रदायिक आदि दोषों से मुक्त रहना चाहिए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सबको एक घंटा योग एवं 8 से 16 घंटा कर्मयोग करने का संकल्प लेकर एक श्रेष्ठ जीवन जीना चाहिए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सद्ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सद्भाव एवं सद्कर्मों से युक्त सभी को दिव्य जीवन जीने के लिए पूर्ण पुरुषार्थ एवं परमार्थ करना चाहिए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयं के प्रति अपने सत्य सिद्धांतों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्यधर्म एवं अपनी सात्विक जीवन पद्धति के प्रति पूर्ण दृढ़ता एवं समष्टि में सब मनुष्यों एवं सम्पूर्ण सृष्टि के प्रति उदारता का भाव रखना चाहिए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">विकल्प रहित संकल्प एवं अखंड प्रचण्ड पुरुषार्थ के साथ अपने सात्विक ध्येय को प्राप्त करना चाहिए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">मजहबी गौरव के स्थान पर स्वयं को भारतीय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वर की सन्तान एवं ऋषि-ऋषिकाओं की सन्तान होने का गौरव एवं तद्नुरूप आचरण करना चाहिए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">हम सभी मनुष्य धरती पर भगवान् की सर्वश्रेष्ठ रचना हैं और हम सबका इस सम्पूर्ण सृष्टि या अस्तित्व के प्रति सबसे अधिक उत्तरदायित्व है। इस भाव संकल्प के साथ हमें एक श्रेष्ठतम व्यवहार स्वयं एवं समष्टि के साथ करना चाहिए।   </span></h5>
</li>
</ul>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>नवम्बर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2562/bharat-ki-vashwik-bhumika-me-hamara-uttardayitva</link>
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                <pubDate>Wed, 01 Nov 2017 21:57:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आर्थिक समीक्षा पतंजलि</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">        योग </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज की पतंजलि आयुर्वेद को विश्व में ऐसी पहली कंपनी होने का गौरव प्राप्त हो गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो केवल स्वदेशी के बल पर इतने ऊँचे स्थान पर पहुँची है। विश्व की प्रसिद्ध पत्रिका हुरून ने तेजी से बढ़ती संस्थाओं में गत वर्ष पतंजलि आयुर्वेद को 25वां स्थान दिया था। अब देश के उद्यमों में पतंजलि आयुर्वेद का स्थान 8वाँ आँका गया है। हाल ही में घोषित टॉप टेन उद्योगपतियों में श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज का नाम आठवें स्थान पर घोषित किया गया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">द्भुत है की भारत के आर्थिक सर्वे में</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2563/arthik-samiksha-patanjali"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/224.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    योग </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज की पतंजलि आयुर्वेद को विश्व में ऐसी पहली कंपनी होने का गौरव प्राप्त हो गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो केवल स्वदेशी के बल पर इतने ऊँचे स्थान पर पहुँची है। विश्व की प्रसिद्ध पत्रिका हुरून ने तेजी से बढ़ती संस्थाओं में गत वर्ष पतंजलि आयुर्वेद को 25वां स्थान दिया था। अब देश के उद्यमों में पतंजलि आयुर्वेद का स्थान 8वाँ आँका गया है। हाल ही में घोषित टॉप टेन उद्योगपतियों में श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज का नाम आठवें स्थान पर घोषित किया गया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">द्भुत है की भारत के आर्थिक सर्वे में चुने गये टॉप टेन उद्योगपतियों में पतंजलि की उपलब्धि गत वर्ष के मुकाबले 173 प्रतिशत अधिक रही है। यहाँ यह बात विशेष उल्लेखनीय है कि जहाँ देश के सबसे बड़े उद्योगपति मुकेश अंबानी की उद्योग प्रगति केवल 58 प्रतिशत रही। वहीं नोटबंदी और जीएसटी के बावजूद पतंजलि द्वारा यह उपलब्धि हासिल करना महत्वपूर्ण है। इस उपलब्धि पर देश-विदेश से स्वामी जी महाराज तथा आचार्यश्री को बधाइयों के तांते लगे हुए हैं। दुनिया के किसी भी मुल्क में किसी भी उद्योग ने इतने कम समय में इतना ऊँचा मुकाम केवल स्वदेशी के दम पर हासिल किया और देश की बेहद पुरानी आयुर्वेदिक इकाइयां पतंजलि से बहुत पीछे रह गई हैं। नॉनलिस्टिंग कम्पनी होते हुए भी पतंजलि की यह ऊँचाई बड़े-बड़े अर्थ विश्लेषकों को आश्चर्यचकित कर रही है। ऊँची उड़ान भरने के बाद पतंजलि का ख्वाब है कि विशुद्ध सेवा प्रकल्पों के दम पर आगे बढ़ते हुए यह संस्था अगले कुछ वर्षों में देश की नम्बर-वन बन जाए। स्वामी रामदेव जी के अनुसार यह मुकाम पाने के लिए और कड़ा श्रम किया जाएगा। स्वदेशी उद्योगों को देशभर में बढ़ावा देने और विदेशी उत्पादनों का देश से समापन करने के लिए काम शुरू भी हो चुका है।  </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><span lang="hi" xml:lang="hi">अद्भुत</span></span><span lang="hi" xml:lang="hi"> है की भारत के आर्थिक सर्वे में चुने गये टॉप टेन उद्योगपतियों में पतंजलि की उपलब्धि गत वर्ष के मुकाबले 173 प्रतिशत अधिक रही है। यहाँ यह बात विशेष उल्लेखनीय है कि जहाँ देश के सबसे बड़े उद्योगपति मुकेश अंबानी की उद्योग प्रगति केवल 58 प्रतिशत रही। वहीं नोटबंदी और जीएसटी के बावजूद पतंजलि द्वारा यह उपलब्धि हासिल करना महत्वपूर्ण है। इस उपलब्धि पर देश-विदेश से स्वामी जी महाराज तथा आचार्यश्री को बधाइयों के तांते लगे हुए हैं। दुनिया के किसी भी मुल्क में किसी भी उद्योग ने इतने कम समय में इतना ऊँचा मुकाम केवल स्वदेशी के दम पर हासिल किया और देश की बेहद पुरानी आयुर्वेदिक इकाइयां पतंजलि से बहुत पीछे रह गई हैं। नॉनलिस्टिंग कम्पनी होते हुए भी पतंजलि की यह ऊँचाई बड़े-बड़े अर्थ विश्लेषकों को आश्चर्यचकित कर रही है। ऊँची उड़ान भरने के बाद पतंजलि का ख्वाब है कि विशुद्ध सेवा प्रकल्पों के दम पर आगे बढ़ते हुए यह संस्था अगले कुछ वर्षों में देश की नम्बर-वन बन जाए। स्वामी रामदेव जी के अनुसार यह मुकाम पाने के लिए और कड़ा श्रम किया जाएगा। स्वदेशी उद्योगों को देशभर में बढ़ावा देने और विदेशी उत्पादनों का देश से समापन करने के लिए काम शुरू भी हो चुका है। </span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में टॉप – 10 ब्रांड्स</span></strong></span></h4>
<p><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/sdd.jpg" alt="sdd"></img></span></strong></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>नवम्बर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2563/arthik-samiksha-patanjali</link>
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                <pubDate>Wed, 01 Nov 2017 21:56:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दिव्य चित्राभिव्यक्ति</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इं</span><span lang="hi" xml:lang="hi">दौर में </span>CII Leadership Conclave <span lang="hi" xml:lang="hi">2017 का आयोजन हुआ। इस अवसर पर पतंजलि योगपीठ के महामंत्री श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश के </span>Commerce, Industry &amp; Employment Minister<span lang="hi" xml:lang="hi"> माननीय श्री राजेन्द्र शुक्ल जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री अंशुल मित्तल जी</span>, Chairman CII MP, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री सुधीर मेहता जी </span>CII Western Region Council, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री मनीष सिंह जी </span>IAS <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री कुमार पुरुषोत्तम जी </span>IAS, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री डी.पी. आहूजा जी </span>IAS <span lang="hi" xml:lang="hi">व भारतवर्ष से आए अनेक प्रबुद्ध जन उपस्थित थे। पतंजलि योगपीठ के महामंत्री श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने अपने उद्बोधन में पतंजलि की वैश्विक लोकप्रियता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2564/indire--madhya-pradesh-me-ayojit-cii-leadership-karyakram-me-acharya-shri-ka-ojpurn-uddodhan"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/472.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इं</span><span lang="hi" xml:lang="hi">दौर में </span>CII Leadership Conclave <span lang="hi" xml:lang="hi">2017 का आयोजन हुआ। इस अवसर पर पतंजलि योगपीठ के महामंत्री श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश के </span>Commerce, Industry &amp; Employment Minister<span lang="hi" xml:lang="hi"> माननीय श्री राजेन्द्र शुक्ल जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री अंशुल मित्तल जी</span>, Chairman CII MP, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री सुधीर मेहता जी </span>CII Western Region Council, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री मनीष सिंह जी </span>IAS <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री कुमार पुरुषोत्तम जी </span>IAS, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री डी.पी. आहूजा जी </span>IAS <span lang="hi" xml:lang="hi">व भारतवर्ष से आए अनेक प्रबुद्ध जन उपस्थित थे। पतंजलि योगपीठ के महामंत्री श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने अपने उद्बोधन में पतंजलि की वैश्विक लोकप्रियता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शब्द से अधिक कर्मों की ध्वनी गहरी होती है। पतंजलि की सफलता भी इसी पर आधारित है क्योंकि हम कथनी से ज्यादा करनी में विश्वास करते हैं। पतंजलि कभी भी नुकसानदायक केमिकल इस्तेमाल नहीं करेगा। आचार्यश्री ने बताया कि आज अमीरों के घर में भी बर्तन पतंजलि के डिश वॉश से धुलते हैं और उनके घर में काम करने वाली बाई भी अपने घर में पतंजलि के ही डिश वॉश से बर्तन धोती है। हमारे सभी उत्पाद ऐसे हैं जो शुद्धता की कसौटी पर खरे उतरे हैं और जिन्हें समाज के हर तबके का व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के इस्तेमाल कर सकता है। पतंजलि ने कुछ नया नहीं किया बल्कि पुराने घिसे-पिटे ढर्रे को सुधारने का प्रयास किया। पतंजलि ने अपनी चीजों को अपनी पहचान के साथ जोड़ा न कि किसी दूसरे की पहचान के साथ। स्वामी जी ने खुद कहा कि ये मेरा उत्पाद है और उसकी जिम्मेदारी मेरी है। लेकिन ऐसा किसी और ने नहीं किया। हमने उत्पाद को बेचने के लिए अपनी संस्कृति को नहीं बेचा। क्योंकि हमारे जीवन का लक्ष्य उत्पाद बेचना नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थ से परमार्थ</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">है व लोगों की समस्याओं को दूर करना है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> <img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/472.jpg" alt="47"></img></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्था समाचार</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>नवम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Nov 2017 21:55:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वनौषधियों में स्वास्थ्य</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">      बा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">कुची के छोटे-छोटे पादप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्षा-ऋतु में समस्त भारतवर्ष में अपने आप उगते हैं तथा जगह-जगह इसकी खेती भी की जाती है। साधारणतया बाकुची के पौधे वर्षायु होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु उचित देखभाल करने से </span>4-5<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ष तक जीवित रह जाते हैं। औषधि कर्म में इसके बीज और बीजों से प्राप्त तैल का व्यवहार किया जाता है। इस पर शीतकाल में पुष्प लगते हैं तथा ग्रीष्म ऋतु में वे फलों में बदल जाते हैं। समस्त भारत में विशेषत: राजस्थान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्नाटक तथा पंजाब में कंकरीली भूमियों में एवं जंगली झाड़ियों में प्राप्त होती है या इसकी खेती की जाती</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2565/tvacha-rog-nivarak-ayurvedic-ghatak-bakuchi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/295.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   बा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">कुची के छोटे-छोटे पादप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्षा-ऋतु में समस्त भारतवर्ष में अपने आप उगते हैं तथा जगह-जगह इसकी खेती भी की जाती है। साधारणतया बाकुची के पौधे वर्षायु होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु उचित देखभाल करने से </span>4-5<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ष तक जीवित रह जाते हैं। औषधि कर्म में इसके बीज और बीजों से प्राप्त तैल का व्यवहार किया जाता है। इस पर शीतकाल में पुष्प लगते हैं तथा ग्रीष्म ऋतु में वे फलों में बदल जाते हैं। समस्त भारत में विशेषत: राजस्थान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्नाटक तथा पंजाब में कंकरीली भूमियों में एवं जंगली झाड़ियों में प्राप्त होती है या इसकी खेती की जाती है। चरक संहिता के तिक्त स्कन्ध एवं अर्शादि अनेक रोगों की चिकित्सा में इसका प्रयोग मिलता है। सुश्रुत संहिता के कटु वर्ग में अवल्गुज नाम से मेधायुष्यकामीय में बाकुची के नाम से इसका उल्लेख प्राप्त होता है। त्वचा सहित शरीर के विविध रोगों के निवारण में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह सीधा</span>, 60-120<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी. ऊँचा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्षायु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शाकीय पौधा अथवा क्षुप होता है। इसकी काण्ड एवं शाखाएँ झुर्रीदार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोणीय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिरायुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पष्ट रक्ताभ ग्रंथियुक्त एवं किंचित् श्वेत रोमश होती हैं। इसके पत्र एकांतर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरल</span>, 2.5-7.5<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी. लम्बे एवं </span>2.5<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी. चौड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोलाकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों पृष्ठ पर श्वेत रोमश तथा अनेक कृष्ण वर्ण के बिन्दुओं से युक्त होते हैं। इसके पुष्प छोटे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीले एवं हल्के बैंगनी वर्ण के</span>, 10-30<span lang="hi" xml:lang="hi"> की संख्या में लगते हैं। इसकी फली </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिमी लम्बी</span>, 3<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिमी. चौड़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छोटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिकनी तथा एकबीजी होती है। कच्ची अवस्था में यह हरे रंग की तथा पकने पर काले रंग की हो जाती है। इसके बीज मसूर के दानों जैसे कड़े किन्तु कुछ बड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काले या गहरे भूरे रंग के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चपटे तथा आगे की तरफ नुकीले होते हैं। बीजों का ऊपरी छिलका मुलायम होता है तथा फलभित्ति से चिपका रहता है। बीज का भीतरी भाग श्वेत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वाद में तिक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चरपरा तथा गंधयुक्त होता है। इसका फलकाल सितम्बर से मार्च तक होता है।</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">औषधीय प्रयोग </span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मात्रा एवं विधि</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचा रोग</span></strong></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ रोग- बाकुची के बीज चार भाग और तबकिया हरताल एक भाग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों को चूर्ण कर गोमूत्र में घोंटकर श्वेत दागों पर लगाने से सफेद दाग दूर हो जाते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची और पवाड़ को समभाग लेकर सिरके में पीसकर सफेद दागों पर लगाने से दाग में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गंधक व गुड्मार को बराबर मात्रा में लेकर तीनों का चूर्ण कर लें तथा </span>12<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम चूर्ण को रात्रि में जल में भिगो दें। प्रात:काल निथरा हुआ जल सेवन कर लें तथा नीचे के तल में जमा पदार्थ श्वेत दागों पर लगाते रहने से श्वेत कुष्ठ नष्ट हो जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची तेल दो भाग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुवरक तेल दो भाग तथा चंदन तेल एक भाग मिलाकर रख लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस तेल को लगाने से सामान्य त्वक् रोग तथा श्वेत कुष्ठ आदि रोग नष्ट होते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>10-20<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम शुद्ध बाकुची चूर्ण में एक ग्राम आँवला मिलाकर खैर की छाल के </span>10-20<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली क्वाथ के साथ सेवन करने से श्वित्र रोग नष्ट हो जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची को तीन दिन तक दही में भिगोकर फिर सुखाकर रख लें। इसका तेल शीशी में निकाल लें। इस तेल में नौसादर मिलाकर श्वेत दागों पर लेप करें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कलौंजी तथा धतूरे के बीजों को समभाग लेकर आक के पत्तों के रस में पीसकर श्वेत दागों पर लगाने से श्वेत कुष्ठ में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इमली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुहागा और अंजीर मूल की छाल को समभाग लेकर जल में पीसकर सफेद दागों पर लेप करने से श्वित्र रोग में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पवाड़ तथा गेरू को समभाग लेकर कूट पीसकर अदरक के रस में खरल कर सफेद दागों पर लगाकर धूप सेंकने से श्वेत कुष्ठ में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गेरू और गन्धक को समभाग लेकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीसकर अदरक के रस में खरल कर </span>10-10<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम की टिकिया बनाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक टिक्की रात्रि को </span>30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिग्रा. जल में डाल दें। प्रात: ऊपर का स्वच्छ जल पी लें तथा नीचे की बची हुई औषधि को श्वेत दागों पर मालिश कर धूप सेंकने से श्वित्र रोग में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अजमोद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पवाड़ तथा कमल गट्टा को समान भाग लेकर कूट पीसकर मधु मिलाकर गोलियां बना लें। एक से दो गोली तक प्रात: सायं अंजीर मूल की छाल के क्वाथ के साथ सेवन करने से श्वेत कुष्ठ में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम शुद्ध बाकुची तथा </span>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम काले तिल के चूर्ण में </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> चम्मच मधु मिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रात: सायं सेवन करने से श्वित्र रोग में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्ध बाकुची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंजीर मूल की छाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीम छाल तथा पत्र को सम भाग लेकर कूट पीसकर खैर छाल के क्वाथ में खरल करके रख लें। दो से पाँच ग्राम तक की मात्रा को जल के साथ सेवन करने से श्वेत कुष्ठ में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची पाँच ग्राम तथा केसर एक भाग लेकर दोनों को कूट पीसकर गोमूत्र में खरल कर गोली बना लें। इस गोली को जल में घिसकर लगाने से श्वित्र रोग में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>100<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम बाकुची</span>, 25<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम गेरू तथा </span>50<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम पवांड़ के बीज लेकर सबको कूट पीसकर वस्त्रपूत कर (कपड़े से छानकर) भांगरे के रस की </span>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> भावनाएं देकर रख लें। प्रात: सायं गोमूत्र में घिसकर लगाने से श्वित्र रोग में लाभ होगा। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची चूर्ण को अदरक के रस में घिस कर लेप करने से श्वित्र रोग में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची दो भाग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीलाथोथा तथा सुहागा एक-एक भाग लेकर कपड़छन चूर्ण कर एक सप्ताह भांगरे के रस में घोंटकर रख लें। इसको नींबू स्वरस में मिलाकर श्वित्र पर लगाने से श्वेत दाग नष्ट होते हैं। यह प्रयोग तीक्ष्ण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: इसके प्रयोग के फल स्वरूप छाले होने पर यह प्रयोग बन्द कर देें।  </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्ध बाकुची चूर्ण की एक ग्राम मात्रा को बहेड़े की छाल तथा जंगली अंजीर मूल की छाल के क्वाथ में मिलाकर निरन्तर सेवन करते रहने से श्वित्र तथा पुंडरीक में लाभ होता है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हल्दी तथा अर्कमूल की छाल को समान भाग लेकर महीन चूर्ण कर कपड़छन कर लें। इस चूर्ण को गोमूत्र या सिरका में पीसकर श्वित्र के दागों पर लगाने से श्वेत दाग नष्ट हो जाते हैं। यदि लेप उतारने पर जलन हो तो तुबरकादि तेल लगायें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> किग्रा. बाकुची को जल में भिगोकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छिलके रहित करके पीसकर </span>8<span lang="hi" xml:lang="hi"> ली. गोदुग्ध तथा </span>16<span lang="hi" xml:lang="hi"> लीटर जल में पाक करें। दुग्ध मात्र शेष रहने पर उसे जमा दें। मक्खन निकालकर उसका घी बना लें। एक चम्मच घी में </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> चम्मच मधु मिलाकर चाटने से श्वेत कुष्ठ में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची तेल की </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> बूंदों को बताशे में डालकर प्रतिदिन कुछ दिनों तक सेवन करने से श्वित्र रोग में लाभ होता है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची को गोमूत्र में भिगोकर रखें तथा तीन-तीन दिन बाद गोमूत्र बदलते रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस तरह कम से कम </span>7<span lang="hi" xml:lang="hi"> बार करने के बाद उसको छाया में सुखाकर पीसकर रखें। उसमें से </span>1-1<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम सुबह-शाम ताजे पानी से खाने से एक घंटा पहले सेवन करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे श्वित्र (सफेद दाग) में निश्चित रूप से लाभ होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह अनुभूत प्रयोग है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम बाकुची और </span>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम काले तिल को मिलाकर एक वर्ष तक दिन में दो बार सेवन करने से कुष्ठ रोग में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कर्ण रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बाधिर्य</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>-</strong> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिदिन</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मूसली</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">औैर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">चूर्ण</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को</span> 1-3<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम की मात्र में सेवन करने से बधिरता में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मुख रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>दंतकृमि- </strong>बाकुची की जड़ को पीसकर उसमें अल्प मात्रा में भुनी हुई फिटकरी मिला लें। सुबह-शाम इससे मंजन करने से दाँत के कीड़े नष्ट हो जायेंगे।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>दन्तरोग- </strong>बिजौरा नीम्बू की जड़ तथा बाकुची की जड़ को पीसकर वर्ति बना कर दाँतों के बीच में दबा कर रखने से कृमिदन्त और दंतवेदना का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दन्तसंक्रमण</span><span lang="hi" xml:lang="hi">- </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मूल</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पीसकर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अल्प</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मात्रा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">शोधित</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">फिटकरी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मिलाकर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्येक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सुबह</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">शाम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मंजन</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रूप</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रयोग</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">करने</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दन्त संक्रमण</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">लाभ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">जाता</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वक्ष रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">आधा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्राम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बीज</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">चूर्ण</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अदरक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रस</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">थ दिन में </span>2-3<span lang="hi" xml:lang="hi"> बार सेवन करने से श्वास-कास में आराम मिलता है। कफ  ढीला होकर निकल जाता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उदर रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अतिसार</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पत्तों</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">साग</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सुबह</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">शाम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नियमित</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रूप</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हफ्ते</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">खिलाते</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रहने</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अतिसार</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुत</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">लाभ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">होता</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गुदा रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्श</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-</span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम हरड़</span>, 2<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम सोंठ और </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम बाकुची के बीज लेकर पीस लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आधी चम्मच की मात्रा में गुड़ के साथ सुबह-शाम सेवन करने से लाभ मिलेगा।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">यकृत्प्लीहा रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पीलिया-</span></strong>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली. पुनर्नवा के रस में आधा ग्राम पीसी हुई बाकुची के बीजों का चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम प्रतिदिन सेवन करने से पीलिया रोग में लाभ होता है (बाकुची का अधिक सेवन वमन पैदा करता है)।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजनन संस्थान रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">मासिक धर्म से शुद्ध होने के पश्चात् बाकुची के बीजों को तैल में पीसकर योनि में रखने से गर्भधारण करने की क्षमता समाप्त हो जाती है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">शाखा रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">शलीपद-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची स्वरस का लेप श्लीपद प्रभावित अंग पर करने से लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची तैल तथा कल्क का लेप करने से श्लीपद में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">साधारण वनौषधि होने के बावजूद आरोग्य में असाधारण भूमिका निभाने वाली बाकुची को हम सब पहचानें और त्वचा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदर सहित शरीर के अनेक रोगों से मुक्ति हेतु लाभ उठायें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रासायनिक </span><span lang="hi" xml:lang="hi">संघटन</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके बीज में वाष्पशील तैल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिर तैल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुचीओल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोरालेन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आईसोरालेन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेरालीडिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आईसोसोरालीडिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉरिलीफोलीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोरालोन</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">आईसोसोगलोन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉरिलीडिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ट्राईएकॉन्टेन</span>, β-<span lang="hi" xml:lang="hi">सिटोस्टीरॉल</span>, β-<span lang="hi" xml:lang="hi">ष्ठ-ग्लुकोसाईड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रेफ्फीनोस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉरीलीफोलीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉरीफोलीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉरीटीफोलीनीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बवाचीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आईसोवाचीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाचीनीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्टीग्मास्टीरॉल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फेनॉल एवं कामेरिन पाया जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके बीज तैल में लीमोनीन</span>, -<span lang="hi" xml:lang="hi">एलीमिन</span>, β-<span lang="hi" xml:lang="hi">केरयोफीलेनोक्साईड</span>, 4-<span lang="hi" xml:lang="hi">टर्पीनीओल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लीनालूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीरेनील एसीटेट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एनजेलीसीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोरालीन एवं बाकुचीओल पाया जाता है। इसके पत्र में रेफिनोस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोरालेन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आइसोसोरालेन एवं एन्जेलीसीन पाया जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके फल में कोरिलिनॉल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोरालिनॉल एवं बावक्रोमानॉल पाया जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसकी मूल में कूमेस्ट्रोल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिटोस्टीरॉल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोरालेन एवं आइसोसोरालेन पाया जाता है।</span></h5>
</li>
</ul>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पोषक उत्पाद</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>नवम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Nov 2017 21:53:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आरोहण के चार सोपान</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">श्रद्धेय गुरुदेव आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2566/arohan-ke-char-sopan"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/188.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   जो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य अपने जीवन को ऊँचाई की तरफ ले जाना चाहता है</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">उसके जीवन में शुद्धि अत्यावश्यक है। शुद्धि अर्थात् स्वच्छता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पवित्रता। यह शुद्धि बाहर की भी होती है और भीतर की भी। व्यक्ति जहाँ रहता है उस परिवेश की शुद्धि जैसे कि आवास स्थान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाकशाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शौचालय आदि और साथ-साथ शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दाँत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदर आदि की भी। अग्रिहोत्र के द्वारा पर्यावरण की शुद्धि का उपक्रम किया गया है। अग्रिहोत्र वृष्टि और वायु को शुद्ध करने का एक सशक्त साधन है। प्रकृति माता वृक्षों के द्वारा सतत इस शुद्धि के कार्य में सहभागी बनी हुई है। प्रकृति माँ ने सूर्य के रूप में शुद्धि का एक महान् स्रोत हमें दिया है। वायुमण्डल में जो धूल-धूएँ और गैसों के रूप में अशुद्धि फैल जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेघ उसे वर्षा के द्वारा धो डालते हैं। शुद्धि की यह सारी व्यवस्था न होती तो यहाँ पृथ्वी पर जीवन ही दूभर हो जाता।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">म</span><span lang="hi" xml:lang="hi">नुस्मृति के पञ्चम अध्याय में शुद्धि करने के लिए वो कौन-कौन से पदार्थ हैं तथा कौन किससे शुद्ध होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे भी गणना करके दर्शाया है। वहाँ कहा है-</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञानं तपोऽग्रिराहारो मृन्मनो वार्युपाञ्जनम्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वायु: कर्मार्र्ककालौ च शुद्धे: कर्तृृणि देहिनाम्।। मनु० ५.१०५।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  अर्थात् </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्रि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिट्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन (विचार)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेप करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वायु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य और काल</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">ये प्राणियों की शुद्धि करने वाले पदार्थ हैं। इनमें से </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन और कर्म</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">ये चार पदार्थ ऐसे हैं जिनसे आन्तरिक शुद्धि होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाकि जो बच गये वे बाह्य शरीरादि की शुद्धि में निमित्त होते हैं। तप और काल को उभय शुद्धि में गिना जा सकता है। भीतर की अशुद्धि राग-द्वेष के कारण होती है। उससे मुक्त होने के लिये व्यक्ति को सबसे पहला काम तो यही करना होता है कि वह अपनी ही ज्ञान की आँखों से अपने को ठीक-ठीक देख पाये कि मुझ में यह अशुद्धि है। यदि इतना काम हो जाता है तो आगे की यात्रा सरल हो जाती है। मनुस्मृति में अर्थशुचिता पर भी विशेष ध्यान दिलाया गया है। कहा गया है-</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">योऽर्थे शुचिर्हि स शुचिर्न मृद्वारिशुचि: शुचि:।। मनु० ५.१०६।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् जो धर्म ही से पदार्थों का संचय करता है वही सब  पवित्रताओं में उत्तम पवित्रता है। जो अन्याय से किसी पदार्थ का ग्रहण नहीं करता वही पवित्र है। जल व मृत्तिका आदि से जो पवित्रता होती है वह धर्म के सदृश उत्तम नहीं हो सकती। आयुर्वेद के आचार्यों ने भी एक निष्कर्ष दिया कि जो </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ऋतभुक्</span>’ (<span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य कमाई का ही भोग करने वाला) होता है वह रोगी नहीं होता।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मनु ने यह भी बताया है कि धर्माचरण से विविध चरित्र दोषों की शुद्धि कैसे होती है-</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">क्षान्त्या शुद्ध्यन्ति विद्वांसो दानेनाकार्यकारिण:।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">प्रच्छन्नपापा जप्येन तपसा वेदवित्तमा:।। मनु० ५.१०७।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विद्वान् लोग क्षमा से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुष्टकर्मकार सत्संग और विद्यादि शुभ गुणों के दान से या जो उनके पास है उसके दान (श्रमदान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धनदान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्रव्यदान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वस्त्रदान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जलदान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूमिदान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहानुभूतिदान इत्यादि) से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुप्त पाप करने वाले विचार से उस पाप का त्याग करके और वेदवित् उत्तम विद्वान् तप से (ब्रह्मचर्य तथा सत्यभाषणादि से) शुद्ध होते हैं। आगे शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मा व बुद्धि की शुद्धि के उपाय बताए हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">अद्भिर्गात्राणि शुद्ध्यन्ति मन: सत्येन शुद्ध्यति।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुद्ध्यति।। मनु० ५.१०९।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जल से स्वेदादि युक्त शरीर के बाहर के अवयव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निषिद्धचिन्तादि से दूषित हुआ संकल्प-विकल्प रूप मन सत्याचरण से अर्थात् सत्य मानने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य बोलने और सत्य करने से शुद्ध हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्या (ब्रह्मविद्या) और पापक्षय के हेतुभूत तप से जीवात्मा शुद्ध होता है अर्थात् शुद्ध परमात्मस्वरूप में अवस्थित रहता है और विपर्ययज्ञान युक्त बुद्धि यथार्थ ज्ञान से शुद्ध होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विद्या और तप के द्वारा जीवात्मा की शुद्धि की बात और ज्ञान के द्वारा बुद्धि शुद्धि की बात कही जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम इसके अभिप्राय को समझते चलें</span>?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सबसे पहले देखें कि बुद्धि की अशुद्धि क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तुत: बुद्धि के दो काम हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने आत्मस्वरूप (</span>Subject<span lang="hi" xml:lang="hi">) का ठीक-ठीक निश्चय करना और वस्तु या किसी भी विषय (</span>Object<span lang="hi" xml:lang="hi">) का ठीक-ठीक निश्चय करना। जो बुद्धि इन दो कामों को ठीक से नहीं कर पा रही है यही बुद्धि की अशुद्धि है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि की यह अशुद्धि ज्ञान (सम्यक् दर्शन) से ही दूर होती है। अयथार्थ देखना (अतस्मिन् स:) बुद्धि की अशुद्धि है और यथार्थ देखना (तस्मिन् स:) बुद्धि की शुद्धि है। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">जो वस्तु जैसी है उसको वैसा ही देखना</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि में यह सामर्थ्य शनै: शनै: कई उपायों से विकसित होता है- शास्त्र के श्रवण-मनन-निदिध्यासन के द्वारा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञानवान् लोगों के साथ चर्चा के द्वारा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयं के विचार-मन्थन या आत्म-मन्थन के द्वारा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य-दृष्टि प्राप्त करने के लिये अपनी आन्तरिक माँग (अभीप्सा) के द्वारा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रार्थना के द्वारा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी या दूसरों की भूलों के द्वारा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन व इन्द्रियों की एकाग्रता (तप) इत्यादि के द्वारा। इन सभी उपायों से जब बुद्धि शुुद्ध हो जाती है और जिस किसी विषय में व्यक्ति को पूर्ण निश्चय हो जाता है कि यह ऐसा ही है तो इस सम्यक् दर्शन को श्लोक में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">विद्या</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द से कहा गया है। जिसका संकेत अन्यत्र </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">विद्ययाऽमृतमश्नुते</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इन शब्दों के द्वारा हुआ है। विद्या और तप के सम्मिलित साधन से जीवात्मा शुद्ध हो जाता है। अर्थापत्ति से यह निकला कि अविद्या (अयथार्थ दर्शन) व अतपस्या से जीवात्मा की अशुद्धि बढ़ती जाती है। अशुद्ध ज्ञान ही जीवात्मा की अशुद्धि का परम हेतु है। अशुद्ध ज्ञान से अशुद्ध इच्छाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशुद्ध कर्म और अशुद्ध संस्कार</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार अशुद्धि का यह अन्तहीन सिलसिला चालू हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">छान्दोग्य उपनिषद् में कहा गया है कि साधक को सर्वप्रथम षडिन्द्रियों (मन व ज्ञानेन्द्रियों) के द्वारा ग्रहण किये जाने वाले आहार को शुद्ध करने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। आहार के शुद्ध होने पर अन्त:करण शुद्ध हो जाता है। अन्त:करण का सत्त्व गुण प्रधान होना ही अन्त:करण की शुद्धि है। अन्त:करण के शुद्ध होने पर साधक की आत्मस्मृति या भूमा रूप की स्मृति निश्चल (ध्रुव) हो जाती है। भूमा रूप की स्मृति या आत्मस्मृति के निश्चल होते ही हृदय की गाँठें (अनन्त जन्मों की विविध वासनाएँ) जिनके कारण व्यक्ति में विविध कामनाओं का जन्म होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे सब छिन्न-भिन्न हो जाती हैं। व्यक्ति समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाता है (आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धि: सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृति:</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्ष:।। छान्दो ७.२६.२) सो अन्त:शुद्धि की इस प्रक्रिया में से इन्द्रियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाव-भावनाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवात्मा इत्यादि सभी को गुजरना पड़ता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्धि के इस प्रथम सोपान पर आरोहण करने पर द्वितीय सोपान आता है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मुक्ति'</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का। जैसा कि ऊपर कहा गया कि ज्ञान के शुद्ध होते ही वह व्यक्ति को समस्त बन्धनों (अहंकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूतकाल की शुभ-अशुभ स्मृतियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान के आवेग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भविष्य की कल्पनाओं) से मुक्त कर देता है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञानान्मुक्ति:</span>’ (<span lang="hi" xml:lang="hi">सांख्य ३.२३)।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तृतीय सोपान है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आनन्द</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। मुक्त व्यक्ति में आनन्द का सहज प्रस्फुटन हो जाता है। अज्ञान के कारण व्यक्ति को अहंकार (अस्मिताक्लेश) घेरे रहता है। अहंकार के साथ ही राग-द्वेष-भय आदि दूसरे क्लेश भी अपने आप चले आते हैं। अहंकार के आते ही स्वत: ही अनेकानेक कामनाएँ पैदा हो जाती हैं। कामनाओं के पूर्ण होने पर लोभ (और-और की माँग) और अपूर्ण होने पर क्रोध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खिन्नता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विषाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरों के साथ स्पर्द्धा व ईर्ष्या आदि सभी का सहज प्रवाह चालू हो जाता है। व्यक्ति को बेबस होकर दु:ख के इस कुचक्र से गुजरना पड़ता है। मुक्त व्यक्ति को इस कुचक्र का कभी भी सामना नहीं करना पड़ता।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">चतुर्थ सोपान है- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्णता</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। पूर्णता को प्राप्त हुआ ज्ञानी व्यक्ति इस सृष्टि में मनुष्य के रूप में साक्षात् भगवान् की तरह पूर्ण होकर जीता है। जीवन की यह चरम उपलब्धि है। अब वह दूसरों की पूर्णता के लिये अपने आपको समर्पित कर देता है। बल्कि यह कहना चाहिए कि दूसरा उसके लिये कोई बचता ही नहीं। उसकी दृष्टि अपरिच्छिन्न हो जाती है वह सर्वभूतात्मभाव के रूप में सब प्राणियों को देखने लगता है। भेददृष्टि का अन्त हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकत्व उसका स्वभाव हो जाता है। यजुर्वेद चालीसवें अध्याय के छठे-सातवें मन्त्र में इसी स्थिति का वर्णन हुआ है।</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार और </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसन्नता की दिव्य शृङ्खला</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञावान् पुरुष कहते हैं कि मनुष्य की पहचान ज्ञान से होती है। ज्ञान को देखकर मनुष्य का पता चल सकता है और ज्ञान की पहचान होती है गुणों से। गुण हैं तो अवश्य ही उनके मूल में ज्ञान होता है। किसी के जीवन में गुणों का प्रवेश या गुणों का प्राकट्य ज्ञान के द्वारा ही होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान के बिना गुण नहीं आ सकते। इस प्रकार गुणों को देखकर ज्ञान का अनुमान हो जाता है। गुणों की पहचान व्यक्ति के आचरण या व्यवहार से होती है। इस प्रकार जीवन में जब गुण धारित हो जाते हैं तो वे व्यक्ति के आचरण या व्यवहार को देखने में परिलक्षित होने लगते हैं। व्यक्ति के अच्छे-बुरे आचरण या व्यवहार को देखकर उसके गुणवान् या गुणहीन होने का अनुमान होता है। पर अन्तिम बात कि व्यक्ति के अच्छे आचरण की पहचान का साधन क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">तो प्रज्ञावान् बताते हैं अच्छे आचरण की पहचान उसकी प्रसन्नता से होती है। निकटवर्ती लोग उससे कितना प्रसन्न रहते हैं। यदि निकटवर्ती प्रसन्न रहते हैं तो निश्चित ही वह व्यक्ति आचरणवान् होता है। ऐसा आचरण ही जीवन के शिखर आरोहण का मार्ग प्रशस्त करता है। आइये हम सभी क्रमश: श्रेष्ठता की धारा से जुड़ें और जीवन को धन्य बनायें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>सनातन वैभव</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>नवम्बर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2566/arohan-ke-char-sopan</link>
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                <pubDate>Wed, 01 Nov 2017 21:51:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अनुभूति आपकी</title>
                                    <description><![CDATA[<h4 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वृक्क निष्क्रियता (ष्टक्रस्न) से मुक्ति मिली</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पास वृक्क निष्क्रियता का रोगी आया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका नाम कालीचरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उम्र ७० वर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निवासी-अलीगढ़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यू.पी. से। रोगी 26/08/2017 को कमजोरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वासकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उल्टी (मिचली) की शिकायत के साथ बहिरंग विभाग (</span>OPD<span lang="hi" xml:lang="hi">) में आया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे अन्तरंग विभाग (</span>IPD<span lang="hi" xml:lang="hi">) में प्रविष्ट किया गया। रोगी ने 10 दिन तक आतुरालय में रहकर आयुर्वेद चिकित्सा कराई। उसका रक्त परीक्षण क्रमश:  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">26/08/2017 </span><span lang="hi" xml:lang="hi">व 05/09/2017 तिथियों को किया गया जो निम्र प्रकार रहा और स्वस्थ होने का संकेत करता है-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>Date                                    <span lang="hi" xml:lang="hi">26/08/2017</span>                              <span lang="hi" xml:lang="hi">05/09/2017</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>Hb%                                   11.7 gm%                11.8</strong></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2567/anubhuti-apki"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/545.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वृक्क निष्क्रियता (ष्टक्रस्न) से मुक्ति मिली</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पास वृक्क निष्क्रियता का रोगी आया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका नाम कालीचरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उम्र ७० वर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निवासी-अलीगढ़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यू.पी. से। रोगी 26/08/2017 को कमजोरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वासकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उल्टी (मिचली) की शिकायत के साथ बहिरंग विभाग (</span>OPD<span lang="hi" xml:lang="hi">) में आया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे अन्तरंग विभाग (</span>IPD<span lang="hi" xml:lang="hi">) में प्रविष्ट किया गया। रोगी ने 10 दिन तक आतुरालय में रहकर आयुर्वेद चिकित्सा कराई। उसका रक्त परीक्षण क्रमश:  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">26/08/2017 </span><span lang="hi" xml:lang="hi">व 05/09/2017 तिथियों को किया गया जो निम्र प्रकार रहा और स्वस्थ होने का संकेत करता है-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>Date                                    <span lang="hi" xml:lang="hi">26/08/2017</span>               <span lang="hi" xml:lang="hi">05/09/2017</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>Hb%                                   11.7 gm%                11.8 gm% </strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>Serum Urea                        131.6 mg%              46.6 mg% </strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>Serum Cretinine                 4.6 mg%                   1.9 mg% </strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>ESR                                     50 mm                      38 mm</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद चिकित्सा</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रोगी को पतंजलि आयुर्वेद संबंधित निम्र औषधियां निश्चित अनुुशासन में दी गयी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो उत्कृष्टता के साथ कारगर रही। वे औषधियां हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">1.         वृक्क दोषहर क्वाथ + तृण पंचमूल क्वाथ (20-20 मिली. दिन में दो बार)</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">2.         गिलोय घन वटी                 2-2 गोली दिन में ३ बार</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>            <span lang="hi" xml:lang="hi">गोक्षुरादि गुग्गुल     </span>            2<span lang="hi" xml:lang="hi">-2 गोली दिन में ३ बार</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>           <span lang="hi" xml:lang="hi">वृक्क दोषहर वटी     </span>          2<span lang="hi" xml:lang="hi">-2 गोली दिन में ३ बार</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">3.         स्व: रक्त चिकित्सा (</span>Auto homeotherapy) <span lang="hi" xml:lang="hi">३ मिली. एक दिन छोड़कर।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उपरोक्त चिकित्सा से आशातीत लाभ हुआ। रोगी ने पतंजलि चिकित्सालय को अपने जीवन के साथ-साथ संपूर्ण धरा के लिए वरदान बताया।  </span></h5>
<h5 style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भवदीय</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. चन्द्र मोहन कंसल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एम.डी. (आयु.)</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"> </h5>
<h4 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">थैलेसिमिया में 95 प्रतिशत लाभ</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">झे थैलेसिमिया की शिकायत है। इसका पता मुझे मेदांता हॉस्पिटल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुड़गाँव से चला। चैकअप कराने के बाद डॉक्टर ने खून चढ़ाने की सलाह दी जिससे मैं सहमत नहीं था।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बाद में मुझे पतंजलि के बारे में पता चला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ डॉ. एस.सी. मिश्रा जी को  दिखाने के बाद मुझे बहुत फायदा हुआ। उपचार के क्रम में मुझे सर्वकल्प क्वाथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुमार कल्याण रस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमृतासत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहरवा पिष्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुक्ता पिष्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रवाल पिष्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आरोग्य वर्द्धिनी वटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैशोर गुग्गुल लेने की सलाह दी गई। इसके साथ प्राकृतिक उपचार के क्रम में गेहूँ ज्वारे का रस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोय रस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घृतकुमारी रस आदि भी शामिल किया गया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मुझे 95 प्रतिशत लाभ मिल चुका है और अभी भी स्वास्थ्य लाभ ले रहा हूँ। पतंजलि से इलाज कराने के बाद मैं संतुष्ट हूँ।  </span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">भवदीय</span>,</h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">अनुपम खट्टर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रामनगर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रुड़की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>दिव्य अनुभूति</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>नवम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Nov 2017 21:50:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>विज्ञान एवं भारतीय दृष्टिकोण</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">आचार्य भरद्वाज</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">वैदिक गुरुकुलम्</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2568/vigyan-evam-bhartiya-drishtikod"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/584.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">     विज्ञान</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् विशेष ज्ञान। ज्ञान विशेष तब होता है जब मनुष्य ज्ञान को आत्मसात् अर्थात् धारण कर उसके अनुकूल कर्म करता है व जीवन जीता है। विज्ञान समुच्चय है ज्ञान कर्म और उपासना का। विज्ञान हमारे जीवन को समग्रता से उन्नत और विशिष्ट बनाता है। विज्ञान सर्वकालिक है अर्थात् विज्ञान के नियम जो भूतकाल में थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे ही वर्तमान में हैं और भविष्य में भी होंगे। विज्ञान के नियम सत्य और ऋत नियमों पर ही आधारित हैं। जिन्हें एकाग्र व विशिष्ट प्रतिभा वाली बुद्धि के द्वारा खोजा तो जा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर नये नियम बनाये नहीं जा सकते क्योंकि नियम अनादि हैं और इनकी नियामक स्वयं सर्वव्यापक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वशक्तिमान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वज्ञ सत्ता है जिसकी उपस्थिति आज के आधुनिक विज्ञान के वैज्ञानिक भी मानते हैं और उसी को भक्तगण प्रभु या ईश्वर नाम देते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ई</span><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वर प्रदत्त ज्ञान को ही वेद कहते हैं। यह ज्ञान अनादि अर्थात् सदा से रहने के कारण अपौरुषेय कहलाता है अर्थात् किसी व्यक्ति के द्वारा निर्मित्त नहीं है। वेद के प्रतिपाद्य विषय ४ माने जाते हैं- ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपासना और इन तीनों का समुच्चय विज्ञान। इन विषयों का प्रतिपादन क्रमश: ऋग्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यजुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामवेद और अथर्ववेद में है। महर्षि दयानन्द जी ने वेद को सभी सत्य विद्याओं की पुस्तक माना है और कहा है कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन सब का आदि मूल परमेश्वर है</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">और यह कथन पूर्णत: सत्य इसलिए है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि इस ब्रह्माण्ड में जितनी भी क्रियाएँ हो रही हैं सभी परमात्मा के ऋत और सत्य नियमानुसार अर्थात् उन नियमों के द्वारा अनुशासित हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो तीनों कालों में वर्तमान हैं और कभी बदलने वाले नहीं हैं।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/733.jpg" alt="73"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस संसार में जितने नियमों सिद्धान्तों की खोजें हुई जैसे गुरुत्वाकर्षण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्प्लवन का सिद्धान्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सापेक्षता का सिद्धान्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बायें हाथ का नियम इत्यादि ये सभी नियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्धान्त शाश्वत हैं  और जितने भी आविष्कार हुए जैसे- वाहन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूरदर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूरवाणी (मोबाईल)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपग्रह आदि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये भी उन्हीं शाश्वत नियम एवं सिद्धान्तों पर कार्य करते हैं जो वैदिक हैं अर्थात् जो वेद विहित ईश्वरीय सत्य ज्ञान हैं। सार्वभौमिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वकालिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंथनिरपेक्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रामाणिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक ज्ञान </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वेद</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के कथन सूत्र रूप में हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्हें जानकर और उस सूत्र रूपी ज्ञान में एकाग्रचित्त निदिध्यासन (ध्यान) कर के मनुष्य उसके विस्तृत उपयोगों की सम्भाव्यता को जानता है। उसका यह जानना भी वैदिक नियमानुसार ही है। अत एव किसी ज्ञान पर या किसी आविष्कार पर अपनी या अपने देश की मुहर लगाना एक बचकानी हरकत और अहंकारिक प्रलाप मात्र हैं। प्रत्येक ज्ञान और आविष्कार सम्पूर्ण मानव जाति के हित के लिए होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञान हमारे जीवन में समग्रता और संतुलन स्थापित करता है। विज्ञान के दो रूप हैं आन्तरिक एवं बाह्य। आन्तरिक विज्ञान से मानव अपने मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि को शान्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विवेकी और प्रतिभावान् बनाता है और बाह्य विज्ञान से अपने जीवन को सुविधा पूर्ण बनाने के लिए सर्वहितकारी अर्थात् प्रकृति एवं जीवों में समरसता रखते हुये वस्तुओं का आविष्कार करता हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैदिक ऋषियों ने विज्ञान के माध्यम से ही आन्तरिक एवं भौतिक सम्पदा को पाया जिन्हें क्रमश: नि:श्रेयस और अभ्युदय कहते हैं। परन्तु उनका ज्ञान कभी भी प्रकृति और जीवों के विरुद्ध नहीं था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सभी की उन्नति के लिए था। ज्यादा नहीं आज से दो सौ साल पूर्व तक को हम आधुनिक विज्ञान के पूर्व का काल कह सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि यूरोपीय सभी आधुनिक आविष्कार दो सौ साल के अन्दर ही हुए हैं। परन्तु दो सौ साल पहले भारत आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनैतिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक और सुरक्षा की दृष्टि से विश्वगुरु था। भारत हर प्रकार के हितकर ज्ञान-विज्ञान और सुविधाओं से उस समय भी परिपूर्ण था जिस समय को यूरोप और अमेरिका में </span>Dark age time of enlightment, renaissance <span lang="hi" xml:lang="hi"> अर्थात् अंधेरे का समय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुनरोत्थान का समय कहते हैं। आज के विज्ञान के विस्तार का बीज और आधार विश्व को भारत से मिला था और वह ज्ञान था ही सब के लिए।  </span>Patent, Copywrite, Pyracy <span lang="hi" xml:lang="hi">आदि के माध्यम से ज्ञान-विज्ञान पर अधिकार करके अपनी प्रभुता दिखलाना आज का चलन है। भारतीय चलन </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वजन हिताय</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">एवं </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वजन सुखाय</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दो सौ साल पहले भी दूरसंचार के माध्यम थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर्यावरण शुद्धि थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवहन प्रणालियाँ थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बड़े-बड़े महल व व्यवस्थित शहर थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनकी जनसंख्या लाखों में थी। राज्य की सुरक्षा हेतु सेना व घातक हथियार थे। भाँति-भाँति के खाद्य पदार्थ थे। धातु विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूगर्भ विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्तरिक्ष विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूगोल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थशास्त्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनीति शास्त्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज शास्त्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रसायन शास्त्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भौतिक विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीव विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाषा विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भवन निर्माण विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्योतिष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गणित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपनिषद्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युद्ध विद्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दण्ड नीति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आन्वीक्षिकी वार्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्रयी आदि विद्याओं के हजारों नहीं लाखों शिक्षा केन्द्र थे जहाँ देश-विदेश से छात्र-छात्राएं विद्यार्जन हेतु आया करते थे। जिसकी चर्चा यूनानी यात्री मेगस्थनीज ने अपनी यात्रा वृतान्त </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इन्डिका</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">में तथा चीनी यात्री ह्यून सांग ने अपने यात्रा वृतान्त में की है और भारत के परम वैभवशाली होने का प्रमाण अमेरिका के वर्तमान के श्रेष्ठतम अर्थशास्त्री एन्गस मेडिसन ने अपनी पुस्तक </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">द वर्ल्ड इकोनामी</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">में विस्तार पूर्वक दिया है। परन्तु तत्कालीन विज्ञान में कभी भी प्रकृति का दोहन करके सुविधा संचय नहीं किया गया। सुविधा का प्रयोजन है कार्य को कम समय में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कम ऊर्जा खर्च करके करना और बचे हुए समय और ऊर्जा को आत्म चिन्तन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवादि कल्याणकारी और उत्पादक कार्यों में लगाना। प्रकृति को वेद और भारतीय दर्शन में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">माँ</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का स्थान दिया है-  </span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">माता भूमि पुत्रोऽहं पृथिव्या:</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञान गलत नहीं होता उसका क्रियान्वयन गलत हो सकता है। उपलब्ध विज्ञान से यूरोप में अनेकानेक खोजें हुई परन्तु उन खोजों का प्रयोग उन्होंने अपनी मान्यताओं के आधार पर किया। जहाँ प्रकृति को माता नहीं दासी माना गया है जो केवल पुरुष के भोग मात्र प्रयोजन के लिए है (</span>Theory of Jenesis<span lang="hi" xml:lang="hi">) और पुर्नजन्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाप-पुण्य और कर्मफल व्यवस्था भी कुछ नहीं है आदि। इन मान्यताओं पर पृथ्वी का दोहन अत्यन्त तीव्र गति से हो रहा है। विज्ञान की खोजें वरदान कम अभिशाप अधिक बनती जा रही हैं। मान्यताओं ने  विज्ञान का प्रभाव उल्टा कर दिया हैं। धरती से खनिजों का ह्रास हो रहा है और मनुष्य में चरित्र का ह्रास हो रहा है। समय और ऊर्जा बचाकर टाईम पास के जरिये उसे व्यर्थ करने अथवा पाप पूर्ण कार्यों में समय व ऊर्जा लगाने के साधन भी सब के हाथ में दे दिये गये हैं। विज्ञान भोगवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाजारवाद को बढ़ाने की कठपुतली बन गया है। असहाय विज्ञान स्वयं की रक्षा में असमर्थ है। षडयंत्रकारियों के द्वारा इसी चलन को आज स्वाभाविक समय की मांग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्धि और उच्च स्तरीय जीवन की संज्ञा दी जाती है जिससे कि उनके बाजार व मुनाफे की रक्षा हो सके। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज जितने सुख सुविधाओं के साधन बढ़ रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उतनी ही बीमारियाँ भी बढ़ रही है। यंत्र जितना समय बचा रहे हैं लोगों के पास उतनी ही समय की कमी है। वो कम से कम अपने और अपने परिवार के लिए भी कुछ पल निकालने में असमर्थ हैं। महंगाई बढ़ रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मशीनें लगाकर भी लागत मूल्य कम नहीं हो रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तुएँ अधिक होने पर भी भोगने की भूख बढ़ रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुख-साधन होने पर भी दु:ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवसाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निराशा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अकेलापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भय आदि समस्याएँ बढ़ रही है। समृद्धि होने पर भी चोरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डकैती बढ़ रही हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्या यह चक्र उल्टा नहीं चल रहा है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदूषण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जनसंख्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्लोबल वार्मिंग आदि समस्याएँ बढ़ रही हैं सो अलग। क्या यह है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञान</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की देन</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं! यह विकृत खोपड़ियों की विकृत मान्यताओं की देन है। इस पर भय करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी को कोसना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लम्बे-लम्बे भाषण आदि का व्यर्थ प्रलाप भी मीडिया आदि संचार साधनों में साथ-साथ चलता रहता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बात पीछे जाने की नहीं  आगे जाने की है। मान्यताओं पर विचार कर उन्हें विवेक पूर्ण बनाने की है। वैदिक ज्ञान-विज्ञान के नियम-सिद्धान्त शाश्वत और अटल हैं। वही समृद्धि समृद्धि है जो सह अस्तित्व अर्थात् प्रकृति और मनुष्य दोनों के उपकार के लिए हो। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वेद</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् विज्ञान भारत का या केवल हिन्दुओं का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु संपूर्ण विश्व और संपूर्ण मानव जाति का हैं। वेदानुसार सहअस्तित्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वबंधुत्व और भाईचारे के साथ उन्नति करना व जीवन जीना और प्रकृति माता की रक्षा करना हमारा परम कर्त्तव्य है। जिससे हमारी भी रक्षा प्रकृति करेगी जैसी करोड़ों साल से करती आ रही है। अन्यथा वर्तमान स्थिति के परिणाम हमारे सामने हैं। धरती 100-200 साल भी बच जाए तो बड़ी बात होगी। कम-से-कम अर्थात् अति आवश्यक वस्तुओं का ही प्रयोग करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विलासिता पूर्ण जीवन त्यागकर स्वस्थ तपस्वी जीवन जीएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरों को भी पे्ररणा दें। अपनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धरती माँ और अगली पीढ़ी के लिए हम सब पूर्ण पुरुषार्थ करें।  </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>सनातन वैभव</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>नवम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Nov 2017 21:48:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जीवन में प्रसन्नता</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="center"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">ब्रह्मचारिणी सुलेखा</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">वैदिक कन्या गुरुकुलम्</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2569/jivan-me-prasannta"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/462.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    प्र</span><span lang="hi" xml:lang="hi">सन्नता के रूप में भगवान् ने दुनियां का सबसे बड़ा उपहार हमारे जन्म से ही दे रखा है। हमारा स्वरूप ही आनन्द है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमें आनन्द के लिए या प्रसन्न रहने के लिए कहीं बाहर नहीं जाना हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने स्वरूप में ही आना हैं। हम सभी का संकल्प यही होना चाहिए कि किसी भी परिस्थिति में हम अपनी प्रसन्नता की चाबी दूसरों के हाथ में न दें अर्थात् दूसरों की किसी भी गतिविधि से हम प्रभावित न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम अपने अन्दर राग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वेष जैसे दु:ख को लाने वाले दोषों को स्थान न दें। अगर हम अपने आप से पूछें कि क्या प्रसन्न रहना असम्भव है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यही उत्तर देंगे कि नहीं हमारे लिए कुछ भी असम्भव नहीं है। ऐसा ही हमारा संकल्प होना चाहिए। हमारे स्वामी जी महाराज हमेशा कहते हैं कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">संकल्प में विकल्प नहीं आना चाहिए</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">संकल्प में विकल्प तब आता है जब हमारी सजगता कम होती है। सभी के मन में एक प्रश्न आया होगा कि सजगता कैसे आएगी</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इसका उत्तर यह है कि जो महापुरुष अपने जीवन में सजग थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे उन महापुरुषों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आदर्श व्यक्तियों का आलम्बन लेने से हमारे जीवन में सजगता अवश्य बनी रहेगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे हम अग्रि का आलम्बन लेते हैं तो हमें उष्णता मिलती है। जल का आलम्बन लेते हैं तो हमें शीतलता मिलती है या फिर किसी कूड़े-कचरे के ढेर के पास से गुजर भी जाते हैं तो हमें दुर्गन्ध सहनी पड़ती है। कहने का तात्पर्य है कि हम जिस किसी का भी जाने-अनजाने में आलम्बन लेंगे वो हमारे अन्दर स्वाभाविक रूप से अवतरित हो जायेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए दिव्य शक्तियों का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य विचारों का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आदर्श महापुरुषों का आलम्बन लें। इसी सन्दर्भ में कहा गया है-</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एतदालम्बन</span>š<span lang="hi" xml:lang="hi">श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते।। (कठोपनिषद्-१.२.१७)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महाजनो येन गत: स पन्था:। (पञ्चतंत्र अपरीक्षित-४०)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् महापुरुष जिस मार्ग से जाते हैं वही सच्चा मार्ग होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अभी हम बातें कर रहे थे आलम्बन की लेकिन इस आलम्बन को अपने जीवन की अवनति नहीं बनने देना।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यथा-एक किसान ने कुछ पौधे लगाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह किसान सभी का बराबर पालन-पोषण करता था। सभी पौधे बराबर बढ़ने लगे और पौधे से पेड़ का रूप लेने लग गये। किसी दिन अचानक तूफान आया और सभी एक दूसरे से टकराने लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हीं में से एक पेड़ टकराने के डर से उन पेड़ों के नीचे छिप गया तो उसे तूफान का झोंका नहीं सहना पड़ा लेकिन वह हमेशा छोटा सा ही पेड़ रह गया। उसमें फल-फूल कभी नहीं आए। इस दृष्टान्त से यह समझना चाहिए कि आलम्बन भी ऊँचे उठने के लिए हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि नीचे गिरने के लिए और जब हम ऊपर उठेंगे तो आप अवश्य ही अपने जीवन में और अन्यों के जीवन में प्रसन्नता व खुशियाँ बिखेर पाएंगे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसन्न व्यक्ति कभी भी बीमार नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पहाड़ जैसे दु:ख आने पर भी वह समुद्र की लहरों जैसा समझकर अपनी नाव को पार निकाल ले जाता है। जिसने हर परिस्थिति में प्रसन्न रहना सीख लिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके अन्दर भय प्रवेश नहीं कर सकता है। निर्भयता में मनुष्य का सहज विकास होने लगता है। इस तरह के सहज प्रसन्न व्यक्ति को देखकर दु:खी व्यक्ति भी प्रसन्नता अनुभव करने लगता है और अनायास ही समाज की सेवा होने लगती है। प्रसन्न मनुष्य उदार हो जाता है उसमें सहज उदारता एवं सहज सरलता आ जाती है। उसमें सभी के प्रति सहज प्रेम उत्पन्न हो जाता है। राग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वेष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईर्ष्या आदि दोष दूर हो जाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगेश्वर भगवान् श्री कृष्ण गीता में कहते है-</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसादे सर्वदु:खानां हानिरस्योपजायते।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धि: पर्यवतिष्ठते।।२.६५।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् प्रसन्नता प्राप्त होने पर व्यक्ति के समस्त दु:खों का नाश हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि प्रसन्नचित्त वाले व्यक्ति अर्थात् स्वस्थ अन्त:करण वाले पुरुष की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से आकाश की भाँति स्थिर हो जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्म रूप से निश्चल हो जाती है। प्रसन्न होने का केवल एक ही मार्ग है- राग-द्वेष से मुक्त होकर अपने इन्द्रियों के द्वारा शास्त्र सम्मत अनिवार्य विषयों का ही सेवन करें।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>नवम्बर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2569/jivan-me-prasannta</link>
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                <pubDate>Wed, 01 Nov 2017 21:47:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सद्गुरु जग्गी वासुदेव जी का पतंजलि प्रवास</title>
                                    <description><![CDATA[<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति का संवाहक </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्यकुलम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थान: जग्गी वासुदेव</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जल प्रबंधन से सुधरेगी नदियों की समस्या : आचार्य बालकृष्ण</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सद्गुरु का नदियों के संरक्षण का प्रयास सराहनीय : स्वामी रामदेव</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार </span>-<span lang="hi" xml:lang="hi"> नदियों के संरक्षण हेतु अपनी राष्ट्रव्यापी यात्रा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">रैली फॉर रीवर्स</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">पर निकले सद्गुरु जग्गी वासुदेव जी महाराज ने पतंजलि योगपीठ का भ्रमण किया। पतंजलि शिक्षण संस्थान </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्यकुलम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की दिव्यता का अवलोकन कर सद्गुरु ने कहा कि पुरातन संस्कृति का संवाहक </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्यकुलम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">निश्चित ही सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थान है जहाँ प्राचीन मान्यताओं व ऋषि परम्परा के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा प्रणाली का भी</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2570/sadguru-jaggi-vashudev-ji-ka-patanjali-pravas"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/255.jpg" alt=""></a><br /><ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति का संवाहक </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्यकुलम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थान: जग्गी वासुदेव</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जल प्रबंधन से सुधरेगी नदियों की समस्या : आचार्य बालकृष्ण</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सद्गुरु का नदियों के संरक्षण का प्रयास सराहनीय : स्वामी रामदेव</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार </span>-<span lang="hi" xml:lang="hi"> नदियों के संरक्षण हेतु अपनी राष्ट्रव्यापी यात्रा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">रैली फॉर रीवर्स</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">पर निकले सद्गुरु जग्गी वासुदेव जी महाराज ने पतंजलि योगपीठ का भ्रमण किया। पतंजलि शिक्षण संस्थान </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्यकुलम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की दिव्यता का अवलोकन कर सद्गुरु ने कहा कि पुरातन संस्कृति का संवाहक </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्यकुलम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">निश्चित ही सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थान है जहाँ प्राचीन मान्यताओं व ऋषि परम्परा के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा प्रणाली का भी समावेश किया गया है। उन्होंने आचार्यकुलम् के छात्र-छात्राओं से विभिन्न विषयों पर चर्चा भी की।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर सद्गुरु जग्गी वासुदेव जी महाराज ने अपने अभियान के संदर्भ में पूज्य स्वामी जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्यश्री एवं पतंजलि कार्यकर्ताओं को अवगत कराते हुए कहा कि पानी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत हमारी नदियाँ आज गम्भीर संकट से गुजर रही हैं। केवल एक ही पीढ़ी में देश की बारहमासी सदाबहार नदियाँ ऋतुओं के अधीन हो गई हैं। कई छोटी नदियाँ तो विलुप्त ही हो गई हैं।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/255.jpg" alt="25"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने पूज्यवर से इसका ठोस समाधान निकालने में मदद मांगते हुए कहा कि समाज और सरकार के सभी वर्गों को इस राष्ट्रीय समस्या के विषय में जागरूकता अभियान चलाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत की जीवनरेखा को बचाने के लिए देश के सभी वर्गों के संगठित प्रयास तथा ठोस कार्रवाई की आवश्यकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यक्रम में श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने देश में नदियों की समस्या की विकटता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जल प्रबंधन के क्षेत्र में कार्य किया जाना चाहिए। देश में प्रतिवर्ष कहीं बाढ़ तो कहीं सूखे की मार झेलनी पड़ती है। जल प्रबंधन में योजनाबद्ध तरीके से कड़े पुरुषार्थ के साथ कार्य किया जाए तो इस समस्या को समूल नष्ट किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि देश की इस गम्भीर समस्या का भार एक संत ने अपने कंधों पर लिया है। निश्चित ही सद्गुरु जग्गी वासुदेव जी महाराज अपने सत्प्रयास में सफल होंगे।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/704.jpg" alt="70"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज ने कहा कि नदियों का इस प्रकार विलुप्त होना तथा ऋतु के अधीन हो जाना एक बड़ी राष्ट्रीय समस्या है। योगऋषि ने सद्गुरु जग्गी वासुदेव जी के नदियों के संरक्षण के प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि सद्गुरु </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">नदियों के लिए रैली</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">जागरूकता अभियान के तहत समाज के सभी वर्गों को सचेत कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि नदियों को शीघ्र ही संरक्षित नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियों का जीवन संघर्ष पूर्ण हो जाएगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर एबीपी न्यूज चैनल के वरिष्ठ पत्रकार एवं न्यूज ऐंकर श्री दिबांग भी उपस्थित रहे।  </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्था समाचार</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>नवम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Nov 2017 21:46:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>एरोमा थैरेपी स्पा विशेषज्ञों के दल का पतंजलि योगपीठ प्रवास</title>
                                    <description><![CDATA[<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एरोमा थेरेपी की प्रभावशीलता भारत सहित दुनियाभर में बढ़ी है : दिआना लिम</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार </span>-<span lang="hi" xml:lang="hi"> एरोमा थैरेपी स्पा विशेषज्ञों का 14 सदस्यीय दल पतंजलि योगपीठ पहुँचा। दल में 10 सदस्य ताइवान तथा 4 सदस्य सिंगापुर से थे। दल के प्रमुख दिआना ओलिविया लिम व दल के अन्य सदस्यों ने पतंजलि आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति विशेषकर पंचकर्म चिकित्सा पद्धति की सराहना की। इस अवसर पर संस्था के महामंत्री श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी के नेतृत्व में आयोजित एक बैठक में इन विशेषज्ञों के साथ एरोमा थैरेपी के विषय में गहन चर्चा हुई। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बैठक में आचार्य श्री ने कहा कि हमारा शरीर प्रकृति की</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2571/aroma-therapy-spa-visheshagyaon-ke-dal-ka-patanjali-yogpeeth-pravas"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/832.jpg" alt=""></a><br /><ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एरोमा थेरेपी की प्रभावशीलता भारत सहित दुनियाभर में बढ़ी है : दिआना लिम</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार </span>-<span lang="hi" xml:lang="hi"> एरोमा थैरेपी स्पा विशेषज्ञों का 14 सदस्यीय दल पतंजलि योगपीठ पहुँचा। दल में 10 सदस्य ताइवान तथा 4 सदस्य सिंगापुर से थे। दल के प्रमुख दिआना ओलिविया लिम व दल के अन्य सदस्यों ने पतंजलि आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति विशेषकर पंचकर्म चिकित्सा पद्धति की सराहना की। इस अवसर पर संस्था के महामंत्री श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी के नेतृत्व में आयोजित एक बैठक में इन विशेषज्ञों के साथ एरोमा थैरेपी के विषय में गहन चर्चा हुई। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बैठक में आचार्य श्री ने कहा कि हमारा शरीर प्रकृति की सबसे अनमोल देन है। आज की भागदौड़ भरी जीवन पद्धति और अनियमित खानपान ने इसका स्वरूप ही बिगाड़ दिया है। बदलती परिस्थितियों में थकान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव व रोगों से बचने के लिए एरोमा थैरेपी कारगर सिद्ध हो सकती है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्यश्री ने बताया कि एरोमा का शाब्दिक अर्थ सुगंध एवं एरोमा थैरेपी का अर्थ सुगंध की सहायता से की जाने वाली चिकित्सा है। उन्होंने बताया कि पौराणिक गाथाओं के अनुसार घरों में सुगंधित फूल चढ़ाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुगंधित लकड़ियां</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">होम-हवन करना विशेषकर उसके सुंगधित धुएं को पूरे घर में फैलाने से नकारात्मक ऊर्जा बाहर जाती है और सकारात्मक ऊर्जा अंदर प्रवेश करती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्यश्री ने बताया कि प्राचीन काल में लोगों का जीवन संयमित व नियमबद्ध था। लोग प्राकृतिक चीजों का उपयोग कर अपने शरीर की सारी व्याधियों का उपचार किया करते थे। कई घरेलू औषधियों का उपयोग कर शरीर का कायाकल्प किया जाता था। आज इन्हीं प्राकृतिक चीजों के उपयोग को एरोमा थैरेपी का नाम दिया गया है। ऐरोमा थैरेपी उपचार की वह पद्धति है जिसमें खुशबू के द्वारा अनेक बीमारियों का निदान होता है। कई प्रकार के पेड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पौधों की जड़ों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेड़ों के तने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फल-फूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब्जियां और कुछ मसालों को मिलाकर डिस्टीलेशन पद्धति के द्वारा इसका अर्क निकाला जाता है जिसके उपयोग से रोग एवं त्वचा संबंधी बीमारी तो दूर होती ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके अलावा इसकी खुशबू से मानसिक तनाव भी अपने आप दूर हो जाता है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/832.jpg" alt="83"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर दल प्रमुख श्री दिआना ओलिविया लिम ने बताया कि एरोमा थैरेपी में ईथर का तेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कई प्रकार के फूलों जैसे गुलाब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चंदन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लैवेंडर और चमेली आदि का सार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कई प्रकार की जड़ी-बूटियों को उबालकर हर्बल अर्क तैयार किया जाता है। जिसकी मालिश करने से शरीर से अवांछित व विषाक्त पदार्थ आसानी से बाहर निकल जाते हैं। इससे शरीर हल्का हो जाता है। उन्होंने बताया कि एरोमा थैरेपी की प्रभावशीलता अब भारत में ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु दुनियाभर में अपनी एक अलग जगह कायम कर रही है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषज्ञों के इस दल में इनालम फ्यू यिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिआना ओलिविया लिम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोह ले जिओक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ली किम कोह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ली ओयू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ली शिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लिन कुई चुन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लिन ली चिऊ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हो चिह चिंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चेन पिन सिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लिन सूचिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वू यू हुवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेंग यिंग लिन आदि सम्मिलित रहे।  </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्था समाचार</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>नवम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Nov 2017 21:44:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पतंजलि योगपीठ में अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन</title>
                                    <description><![CDATA[<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सम्मेलन को राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित अमेरिका की हिन्दी विदुषी प्रो</span>0<span lang="hi" xml:lang="hi"> गैब्रिएला निक इलेवा ने किया सम्बोधित</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार </span>-<span lang="hi" xml:lang="hi"> पतंजलि विश्वविद्यालय में अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में प्रस्ताव पारित कर कुलाधिपति योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज एवं कुलपति आचार्य बालकृष्ण जी के मार्गदर्शन में विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर और शोध कार्य स्तर पर शिक्षा के लिए हिन्दी पाठ्यक्रम प्रारम्भ करने व पतंजलि विश्वविद्यालय में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी केन्द्र</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण जी की अध्यक्षता में स्थापित करने का संकल्प लिया गया। साथ ही इस समारोह के मुख्य अतिथि प्रदेश के काबीना मंत्री मदन कौशिक ने कहा कि आज पूरे विश्व में</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2572/patanjali-yogpeeth-me-antarrashtriya-hindi-sammelan"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/633.jpg" alt=""></a><br /><ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सम्मेलन को राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित अमेरिका की हिन्दी विदुषी प्रो</span>0<span lang="hi" xml:lang="hi"> गैब्रिएला निक इलेवा ने किया सम्बोधित</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार </span>-<span lang="hi" xml:lang="hi"> पतंजलि विश्वविद्यालय में अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में प्रस्ताव पारित कर कुलाधिपति योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज एवं कुलपति आचार्य बालकृष्ण जी के मार्गदर्शन में विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर और शोध कार्य स्तर पर शिक्षा के लिए हिन्दी पाठ्यक्रम प्रारम्भ करने व पतंजलि विश्वविद्यालय में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी केन्द्र</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण जी की अध्यक्षता में स्थापित करने का संकल्प लिया गया। साथ ही इस समारोह के मुख्य अतिथि प्रदेश के काबीना मंत्री मदन कौशिक ने कहा कि आज पूरे विश्व में हिन्दी भाषा का बोलबाला है उन्होंने कहा कि सभी को हिन्दी के प्रति भावना बदलनी होगी तभी हिन्दी का विकास होगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि विश्वविद्यालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार एवं हिन्दी संगम प्रतिष्ठान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत और अमेरिका के संयुक्त तत्त्वावधान में पतंजलि योगपीठ के दिशा ऑडिटोरियम में आयोजित एक दिवसीय इस सम्मेलन में देश-विदेश से अनेक हिन्दी विद्वानों और भाषाविदों के विचार को भरपूर समर्थन मिला। यह भी विचार हुआ कि परिसर में अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी केन्द्र स्थापित किया जाय जिसका उद्देश्य हिन्दी शिक्षण के लिए संसाधनों का विकास और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षण-प्रशिक्षण और शिक्षा विनिमय कार्यक्रमों का समन्वय आदि करना हो। हिन्दी केन्द्र का तकनीकि सहयोग अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी संगम प्रतिष्ठान करेगा। सभी ने सम्मेलन के प्रमुख वक्ता और जार्ज गिर्यसन पुरस्कार से सम्मानित न्यूयार्क विश्वविद्यालय की हिन्दी प्राध्यापिका प्रो. गैब्रिएला निक इलेवा के इस प्रस्ताव का समर्थन किया कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी विस्तार के लिए संरचना और वर्चुअल पाठ्य सामग्री का निर्माण अति आवश्यक है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/654.jpg" alt="65"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. इलेवा ने इस बात पर जोर दिया कि हिन्दी संगम प्रतिष्ठान द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी केन्द्रों की स्थापना के अनेक प्रस्ताव पारित किये जा चुके हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनका सम्मान करते हुए हिन्दी में संसाधन निर्माण के लिए इन केन्द्रों की स्थापना होनी चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति डॉ. वाचस्पति कुलवंत ने भी इस सुझाव का स्वागत किया कि हिन्दी अध्ययन केन्द्र के लिए पतंजलि विश्वविद्यालय परिसर से बढ़कर और कोई स्थान नहीं हो सकता है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/633.jpg" alt="63"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सुरेन्द्र कुमार ने जोरदार शब्दों में प्रस्तावित किया कि विश्वविद्यालयों में स्नातकोत्तर एवं शोध कार्यों के लिए हिन्दी के लिए शोधकार्य तीव्र गति से बढ़ना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके लिए पतंजलि विश्वविद्यालय हिन्दी पाठ्यक्रम के साथ-साथ अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी अध्ययन केन्द्र संचालित करने में पूर्णत: सक्षम है। हिन्दी संगम प्रतिष्ठान के अन्तर्राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अशोक ओझा का सुझाव था कि हिन्दी शिक्षण के संस्थानों का विकास करने के लिए सरकारी नीतियाँ कारगर साबित हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक का प्रयोग करते हुए अर्थपूर्ण शिक्षण सामग्री बनाने का कारगर उपाय तभी सफल हो सकता है जब विभिन्न राज्य सरकारें शिक्षण संस्थानों को आर्थिक सहयोग प्रदान करें।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/663.jpg" alt="66"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने कहा कि प्रतिष्ठान भारत एवं अमेरिका के अनेक विश्वविद्यालयों के साथ हिन्दी शिक्षण-प्रशिक्षण तथा हिन्दी का प्रयोग बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील है। यह आवश्यक है कि एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन इन कार्यों का संयोजन करे और उत्तराखण्ड सरकार उन्हें सफल बनाने में मदद करे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदेश के शहरी विकास मंत्री श्री मदन कौशिक ने अन्तर्राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री ओझा के प्रस्ताव का समर्थन कर वादा किया कि उत्तराखण्ड सरकार प्रतिष्ठान के इस अभियान को आगे बढ़ाने में सहयोग करेगी। सम्मेलन के समन्वयक हिन्दी संगम प्रतिष्ठान के महासचिव यासीन अंसारी ने विश्वविद्यालय व पतंजलि परिवार का सहयोग के लिए आभार जताया।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-10/673.jpg" alt="67"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस सम्मेलन में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. ब्रह्मानन्द जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ. बाबूराम जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ. गिरीश रंजन तिवारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ. दिनेश चमोला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ. नरेन्द्र प्रताप सिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साध्वी राधा माता एवं श्री प्रसाद पंवार जी आदि ने भी इस पर अपने विचार रखे। डॉ. विपिन द्विवेदी जी एवं सुश्री जया मिश्रा जी ने कार्यक्रम का संचालन किया।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्था समाचार</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>नवम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Nov 2017 21:43:57 +0530</pubDate>
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