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                <title>जनवरी - योग संदेश</title>
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                <description>जनवरी RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज के शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...</title>
                                    <description><![CDATA[<h4 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य जीवन</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">म</span><span lang="hi" xml:lang="hi">नुष्यों के तीन प्रकार के जीवन देखने को मिलते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक निम्न कोटि का जीवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा सामान्य श्रेणी का जीवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीसरा उन्नत स्तर का दिव्य जीवन। अशुभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपवित्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशुचिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भय विध विकारों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्लेशों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वासनाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञान व अविद्या से भरा जीवन भगवान के दिए हुए इस जीवन का अनादर है। अत: निम्र स्तर जड़ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पशुता व हैवानियत से बाहर निकलकर सब मनुष्यों को जीवन को निरंतर उन्नत बनाने का पुरुषार्थ व पराक्रम करना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सामान्य कोटि या मध्यम श्रेणी का ही जीवन सामान्यत: समाज में लोगों</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2944/shashwat-pragya-jan-2015"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-05/61.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य जीवन</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">म</span><span lang="hi" xml:lang="hi">नुष्यों के तीन प्रकार के जीवन देखने को मिलते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक निम्न कोटि का जीवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा सामान्य श्रेणी का जीवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीसरा उन्नत स्तर का दिव्य जीवन। अशुभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपवित्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशुचिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भय विध विकारों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्लेशों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वासनाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञान व अविद्या से भरा जीवन भगवान के दिए हुए इस जीवन का अनादर है। अत: निम्र स्तर जड़ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पशुता व हैवानियत से बाहर निकलकर सब मनुष्यों को जीवन को निरंतर उन्नत बनाने का पुरुषार्थ व पराक्रम करना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सामान्य कोटि या मध्यम श्रेणी का ही जीवन सामान्यत: समाज में लोगों का देखने को मिलता है। मध्यम कोटि का व्यक्ति भगवान में विश्वास रखता तथा धर्मयुक्त सकाम करता हुआ अपने साथ-साथ समष्टि के भी हित का सामान्य चिन्तन करता है तथा अशुभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधर्म या पापयुक्त प्रवृत्ति से बचकर अपने जीवन को पुण्यों से प्रकाशित करता हुआ भौतिक सुख भोगना चाहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ में ही भगवान् के प्रति श्रद्धा रखता हुआ सामान्य रूप से योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपासना में भी प्रवृत्त होता रहता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तीसरा उन्नत कोटि का दिव्य जीवन या भागवत जीवन यही हम सबका अन्तिम लक्ष्य होना चाहिए। जहाँ हम सब प्रकार के मिथ्या ज्ञान-अज्ञान या भ्रान्तियों से मुक्त होकर अपने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति व परमात्मा के स्वरूप को यथार्थ में समझ कर अपना अभ्युदय व नि:श्रेयस पूर्ण रूप से सिद्ध करते हैं। निष्काम सेवा व साधना ही इस दिव्य जीव के दो उपाय या साधन हैं। शुद्ध ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्ध कर्म व शुद्ध उपासना अर्थात् ज्ञान कर्म व भक्ति इस दिव्य जीवन की त्रिवेणी है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एकान्त साधना के समय साधक ब्रह्म के एकत्व में भगवान के साथ पूर्ण एकाकार होकर अतीन्द्रिय ज्ञान व अतीन्द्रिय सुख-शान्ति व आनन्द से युक्तहोता है। साधनाकाल में योगी भगवान के साथ एक रूप होकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्ममय होकर भगवान का एक आदर्श प्रतिनिधि या प्रतिरूप हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">साधनाकाल में साधक सविचार समाधि व निर्विचार समाधि का पूर्ण आनन्द अनुभव करता हुआ सदा प्रसन्न व आनन्दित रहता है। साधनाकाल में समाधि तथा व्यवहार काल में दिव्य जीवन की साधना करने वाला साधक निष्काम सेवा करता हुआ भगवान के लिए ही जीता है। निष्काम सेवा का तात्पर्य दिव्य काम अर्थात् आसक्तिपूर्ण मांगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपेक्षाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इच्छाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वासनाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तृष्णाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आशाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्मान व क्षणिक इन्द्रियसुखों से मुक्त होकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रहित होकर भगवान की आज्ञा व ऋषियों की आज्ञा से जीना है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">निष्काम का अर्थ है आप्तकाम या आप्तपुरुष हो जाना। निष्काम सेवा का आधार है-आत्म प्रेरणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेद आज्ञा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्र आज्ञा व गुरु आज्ञा। साधना व निष्काम सेवा से सामान्य मानव भी दिव्य मानव बन सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान हम सबको साधना काल में समाधि लगाने व व्यवहार काल में निष्काम सेवा करने का सामर्थ्य प्रदान करे। हम सत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्मान व भौतिक सुखों के लिए काम नहीं करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु आत्मा में उठने वाली प्रेरणा रूपी परमात्मा की आज्ञा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेद आज्ञा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्र आज्ञा व गुरु आज्ञा में ही रहकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निमित्तमात्र होकर अनासक्त भाव से ब्रह्मभाव में अवस्थित रहकर केवल भगवान के लिए ही कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रवृत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तप या सेवा करें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शाश्वत प्रज्ञा</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 01 Jan 2015 21:59:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दिव्य आत्माओं की खोज</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2945/divya-atmaon-ki-khoj"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-05/shri-arvind-2a.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धेय स्वामीजी ने </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> से 25 वर्ष की आयुवर्ग के एक हजार से अधिक उन बालक-बालिकाओं तथा युवक-यवुतियों की खोज का कार्य प्रारम्भ किया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सात दिव्य गुणों से सम्पन्न हों।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिन बच्चों व युवक-युवतियों में धृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्मृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिभा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरु षार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पराक्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृतज्ञता व सत्याचरण ये सात गुण बचपन से ही होंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे बहुत ही ऊँचे प्रारब्ध वाली आत्मायें होंगी। ऐसी आत्माओं में महामानव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महापुरु ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य पुरु ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि-ऋषिका बनने का आधार होगा। बिना अच्छे बीज के अच्छा फल नहीं हो सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार ऊँचे प्रारब्ध वाली आत्माओं को तैयार करने में यदि पुरुषार्थ किया जायेगा तो उसका सौ प्रतिशत परिणाम आयेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अनादिकाल से चले आ रहे मनुष्य के श्रेष्ठ प्रारब्ध का यदि विवेकपूर्ण व निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हम बचपन से इन सात गुणों को बच्चों के स्वभाव में पायेंगे। हम एक बात महर्षि पतंजलि से लेकर सब महापुरुषों से सुनते आये हैं कि कुछ लोग जन्म से ही महान होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ लोग पूर्ण पुरुषार्थ करके महान बन जाते हैं तथा कुछ लोग कृषि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यात्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनीति व खेल आदि क्षेत्रों में महान लोगों के नाम से थोप दिए जाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिन जीवात्माओं में पूर्वोक्त सात गुण बचपन से स्वभाविक रूप से देखने को मिलें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो समझ लेना कि ये जन्म से महान् आत्माएं हैं। इन आत्माओं को यदि श्रेष्ठतम वातावरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रेष्ठतम प्रशिक्षक व श्रेष्ठतम प्रशिक्षण दिया जाए तथा इन पर पूर्ण पुरुषार्थ किया जाए और इनके इन सात गुणों को और अधिक प्रखर रूप से मुखर या विकसित किया जाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हम ऐसे बच्चों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युवक व युवतियों को मानव से महामानव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महापुरुष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य मानव या ऋषि-ऋषिकाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य व्यक्तित्व व दिव्य नेतृत्व के रूप में तैयार कर सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हम देश भर से अपने संगठन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मीडिया व अन्य माध्यमों से धृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्मृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिभा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पराक्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृतज्ञता व सत्यव्रत इन सात दिव्य गुणों से सम्पन आत्माओं की खोज करें और उनको पतंजलि योगपीठ में ऋषिज्ञान परम्परा में शिक्षा व दीक्षा देकर ऋषि-ऋषिकाओं के रूप में तैयार करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि आपके सम्पर्क में भी इन सात गुणों से सम्पन्न आत्माएं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हमें तुरन्त ०१३३४-२४०००८</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">२४६७३७</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">२४८८८८</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">२४८९९९ या ई-मेल-</span>divyayoga@rediffmail.com <span lang="hi" xml:lang="hi">या पत्र डालकर तत्काल सम्पर्क करके इस सबसे बड़े कार्य में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएं।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2945/divya-atmaon-ki-khoj</link>
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                <pubDate>Thu, 01 Jan 2015 21:57:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वनौषधियों में स्वास्थ्य</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">आचार्य बालकृष्ण</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2946/vanaushadhiyon-me-swasthya"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-05/36.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक नाम :  </span>Saraca asoca (Roxb.) de Willd</strong></h5><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कुलनाम :   </span>Caesalpiniaceae</strong></h5><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अंग्रेजी नाम : </span>Ashoka Tree</strong></h5><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृत : </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हेमपुष्प</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वञ्जुल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताम्रपल्लव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिण्डपुष्प</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गन्धपुष्प</span></strong></h5><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हिन्दी : </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशुगे</span></strong></h5><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गुजराती : </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशोपल्लव</span></strong></h5><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तेलुगु :</span><span lang="hi" xml:lang="hi">असोकामु</span></strong></h5><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बंगाली :</span><span lang="hi" xml:lang="hi">असोक</span></strong></h5><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नेपाली :</span><span lang="hi" xml:lang="hi">अशऊ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक</span></strong></h5><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पंजाबी :</span><span lang="hi" xml:lang="hi">असोक</span></strong></h5><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मराठी :</span><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जसुन्दी</span></strong></h5><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मलयालम :</span><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोकामु</span></strong></h5><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">फारसी :</span><span lang="hi" xml:lang="hi">बर्ग अशोक</span></strong></h5><h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्त विकार व प्रदर में लाभकारी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक</span>’</strong></span></h4><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">शोक भारतीय वनौषधियों में एक दिव्य रत्न है। भारतवर्ष में इसकी कीर्ति का गान बहुत प्राचीनकाल से हो रहा है। प्राचीनकाल में प्रसन्नता एवं शोक को दूर करने के लिए अशोक वाटिकाओं एवं उद्यानों का प्रयोग होता था और इसी आशय से इसके नाम शोकनाश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशोक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपशोक आदि रखे गए। पुष्प धन्वा (कामदेव) के पंचपुष्प बाणों में अशोक पुष्प की भी गणना है। भारत के हिमालयी क्षेत्रों तथा पश्चिमी प्रायद्वीप में </span>750<span lang="hi" xml:lang="hi"> मी की ऊँचाई पर मुख्यत: पूर्वी बंगाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तराखण्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्नाटक एवं महाराष्ट्र की नहरों के किनारे व सदाहरित वनों में यह पाया जाता है। अनेक प्रजातियों वाले अशोक की दो प्रजातियों का ही प्रयोग चिकित्सा के लिए किया जाता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक (</span>Saraca asoca (Roxb.) Willd.<span lang="hi" xml:lang="hi">)- लगभग </span>9<span lang="hi" xml:lang="hi"> मी. ऊँचा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मध्यमाकार का सुंदर सदाहरित वृक्ष है। इस छायादार वृक्ष की काण्ड एवं शाखाएँ फैली हुई होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छाल गहरे भूरे से धूसर वर्ण की होती है। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">औषधि रूप में पेड़ की छाल का ही अधिक प्रयोग किया जाता है। इसके पत्र </span>5-25<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी लम्बे तथा नोंकदार होते हैं। कोमलावस्था में ये श्वेताभ लाल वर्णी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परंतु बाद में गहरे हरे रंग के हो जाते हैं। पत्रकों के किनारे किंचित् लहरदार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुष्प नारंगी अथवा नारंगी-पीत वर्ण के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिन्दूरी वर्ण में परिवर्तित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनेक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत्यधिक सुगन्धित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुच्छों में</span>, 7.5-10<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी व्यास के होते हैं। इसकी फली चपटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृष्ण वर्ण की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चर्मिल</span>, 10-<span lang="hi" xml:lang="hi">२</span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी लम्बी</span>, 3.5-5<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी चौड़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों ओर संकुचित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिरायुक्तहोती है। इसके बीज </span>4-8, 3-8<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी लम्बे</span>, 2.5-3.7<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी व्यास के चपटे होते हैं। पेड़ के काण्डत्वक् से श्वेत रस निकलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो शीघ्र ही वायु में सूखकर लाल हो जाता है। यही अशोक का गोंद कहलाता है। इसका पुष्पकाल मार्च से अप्रैल तथा फलकाल अगस्त से अक्टूबर तक रहता है।</span></h5><p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-05/36.jpg" alt="36"></img></span></p><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रासायनिक संघटन:</span></strong></span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके काण्ड तथा पत्र में एमायरिन</span>, β-<span lang="hi" xml:lang="hi">सिटोस्टेरॉल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्वर्सेटिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कटेचोल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एपीकटेचोल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ल्युकोसाईनिडिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लिनोलीक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लिनोलेनिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिरिस्टिक तथा एराचिडिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पॉमिटिक एवं स्टेएरिक अम्ल पाया जाता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके पुष्प में गैलिक अम्ल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एपिजेनिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्वर्सेटिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केम्फेराल तथा सिटोस्टेराल पाया जाता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके त्वक् में टैनिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केटेचोल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्टेरॉल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्लायकोसाईड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सैपोनिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिमेटोजाईलिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाष्पशील तेल तथा लौह तत्त्व पाया जाता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक के जैसा ही नकली अशोक भी होता है। इसकी पत्तियों में </span>α-<span lang="hi" xml:lang="hi">एमायरिन</span>, β-<span lang="hi" xml:lang="hi">एमायरिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पालीलौंगीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केम्पेस्टेरॉल</span>, β-<span lang="hi" xml:lang="hi">सिटोस्टेरॉल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्टिग्मास्टेरॉल तथा ट्राई ट्राईएकोन्टेन पाया जाता है। इसके काण्डत्वक् में एक नवीन प्रोएन्थोसायनिडिन </span>β-<span lang="hi" xml:lang="hi">सिटोस्टेरॉल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रुटिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्वर्सेटिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लिरिओडेनिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पौलीऐल्यिएलडोइक अम्ल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोलावेनिक अम्ल तथा ल्यूकोसायनिडिन पाया जाता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेदीय गुण-कर्म:</span></strong></span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक लघु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रुक्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कसैला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चरपरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विपाक में कटु और शीतल होता है। यह ग्राही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्त-संग्राहक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेदना-स्थापक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्ण को उज्जवल करने वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हड्डी जोड़ने वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुगन्धित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्रिदोषहर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तृषा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दाह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृमि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शोथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुल्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदर रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आधमान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्श</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्त-विकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गर्भाशय की शिथिलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्व प्रकार के प्रदर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सन्धिवातज पीड़ा और अपच आदि रोगों का नाशक है। इसका प्रयोग कष्टार्तव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तपित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अश्मरी तथा मूत्रकृच्छ्र में भी करते हैं। अशोक की छाल कटु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वर व तृषा नाशक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आंत्रसंकोचक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपच की बीमारी को दूर करने वाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्त-विकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थकावट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्श इत्यादि रोगों में लाभदायक है। इसके अतिरिक्तयह पेट बढ़ने जैसे रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत्यधिक रक्तस्राव तथा गर्भाशयगत रक्तस्राव में उपयोगी होता है। इसकी छाल का स्वरस बहुत संकोचक एवं रक्तप्रदर शामक है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक के बीज मूत्रल होते हैं।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक के पुष्प रक्तज प्रवाहिका नाशक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक की काण्डत्वक् तिक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीक्ष्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शैत्यकारक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्तम्भक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विषघ्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृमिरोधी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशोधक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मृदुकारी</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">अजीर्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तृष्णा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दाह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तविकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काण्ड-भग्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्बुद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदररोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्श</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्रण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रम तथा गर्भाशयगत रक्तस्राव स्तम्भक होती है जबकि-</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नकली अशोक-</span></strong></span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कटु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उष्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लघु तथा रूक्ष होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह दीपन व कृमिघ्न होता है तथा प्रमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वर व कुष्ठ का शमन करता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसका प्रयोग आमदोष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विबन्ध तथा कृमिरोग में अत्यन्त लाभकारी होता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसका एथेनॉल-सार मूषकों एवं चूहों में आमाशयिक व्रण के प्रति आमाशयिक व्रणरोधी क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है। इसके बीज का हेक्सेन सार सूक्ष्मजीवाणुरोधी क्रियाशीलता दर्शाता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">अशोक के प्रमुख औषधीय प्रयोग एवं विधि:</span></strong></h5><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वक्ष रोग:</span></strong></span></h5><h5 style="text-align:justify;">1.  <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास-</span>65<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिग्रा अशोक बीज चूर्ण को पान के बीड़े में रखकर खिलाने से श्वास रोग में लाभ मिलता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उदर रोग:</span></strong></span></h5><h5 style="text-align:justify;">1.  <span lang="hi" xml:lang="hi">वमन-अशोक के फूलों को जल में पीस लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर इसे स्तनों पर लेप करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे दूध पिलाने से स्तनपाई बालक का वमन रुक जाता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;">2. <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तातिसार-अशोक के </span>3-4<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम फूलों को जल में पीसकर पिलाने से रक्तातिसार में लाभ होता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गुदा रोग:</span></strong></span></h5><h5 style="text-align:justify;">1.  <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तार्श-अशोक की छाल का क्वाथ बनाकर </span>15-25<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली मात्रा में पिलाने से रक्तार्शजन्य रक्तस्राव बन्द होता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;">2. <span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक की छाल और इसके फूलों को बराबर मात्रा में लेकर </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम मात्रा को रात्रि में एक गिलास पानी में भिगोकर रख दें।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुबह पानी छानकर पी लें। इसी प्रकार सुबह का भिगोया हुआ तत्व शाम को पी लें। इससे खूनी बवासीर में शीघ्र लाभ मिलता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वृक्क वस्ति रोग:</span></strong></span></h5><h5 style="text-align:justify;">1. <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्नरी (पथरी)-अशोक के </span>1-2<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम बीज को पानी में पीसकर दो चम्मच की मात्र में पीने से अश्मरीजन्य शूल का शमन होता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजननसंस्थान संबंधी रोग:</span></strong></span></h5><h5 style="text-align:justify;">1.  <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदर-अशोक छाल चूर्ण और मिश्री को समभाग खरल कर</span>, 3<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम की मात्रा में गोदुग्ध के साथ प्रात:-सायं सेवन करने से श्वेत-प्रदर में लाभ होता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;">2.   15-25<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली अशोक छाल क्वाथ को दूध में मिलाकर प्रात:-सायं पिलाने से श्वेत-प्रदर और रक्त-प्रदर में लाभ होता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;">3. 3<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम अशोक छाल को चावल के धोवन में पीस-छानकर इसमें </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम रसौत और </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> चम्मच मधु मिलाकर नियमित प्रात:-सायं सेवन से प्रदर में लाभ होता है। इस प्रयोग के साथ ही अशोक छाल के क्वाथ में फिटकरी मिलाकर योनि को भी धोना चाहिए।</span></h5><h5 style="text-align:justify;">4.  <span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक के </span>2-3<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम फूलों को जल में पीसकर पिलाने से रक्त प्रदर में लाभ होता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;">5.  <span lang="hi" xml:lang="hi">मासिकविकार-अशोक छाल का क्वाथ बनाकर </span>20-30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली प्रति खुराक पिलाने से मासिक विकारों का शमन होता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;">6.  <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वप्नदोष-</span>20<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम अशोक की छाल को यवकुट कर </span>250<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली जल में पकाएं</span>, 30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली शेष रहने पर इसमें </span>6<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम शहद मिलाकर सुबह-शाम सेवन करें।</span></h5><h5 style="text-align:justify;">7. <span lang="hi" xml:lang="hi">योनिशैथिल्य-अशोक की छाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बबूल की छाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गूलर की छाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माजूफल और फिटकरी को समान भाग में पीसकर </span>50<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम चूर्ण को </span>400<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली पानी में उबालकर </span>100<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली काढ़ा तैयार कर लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे छान कर योनि को धोने से या पिचु धारण करने से योनिशैथिल्य का शमन होता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;">8.  6-12<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम अशोक घृत को गुनगुने दूध अथवा जल के साथ सेवन करने से सभी प्रकार के प्रदर रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुक्षिशूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कटिशूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योनिशूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मंदाग्नि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अरुचि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाण्डु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कास आदि रोगों का शमन होता है तथा बल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्ण व आयु की वृद्धि होती है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;">9.  20-25<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली अशोकारिष्ट को प्रतिदिन भोजन के बाद सेवन करने से रक्तप्रदर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तपित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तार्श</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मंदाग्नि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अरोचक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शोथ आदि रोगों में विशेष लाभ होता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अस्थिसंधि रोग:</span></strong></span></h5><h5 style="text-align:justify;">1.  <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्थिभंग-</span>6<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम अशोक छाल चूर्ण को दूध के साथ प्रात: सायं सेवन करने तथा इसी का प्रलेप करने से टूटी हुई हड्डी जुड़ जाती है और वेदना का शमन भी होता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;">2.   <span lang="hi" xml:lang="hi">वातव्याधि-वातरोग में स्नेहविरेचनार्थ अशोकघृत का प्रयोग हितकर होता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचा रोग:</span></strong></span></h5><h5 style="text-align:justify;">1.  <span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचाविकार-अशोक छाल स्वरस में सरसों पीसकर छाया में सुखा लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तत्पश्चात् जब भी उबटन लगाना हो तब इस सरसों को अशोक छाल के स्वरस में पीसें और त्वचा पर लगाएं। इससे त्वचा का रंग निखरता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;">2.   <span lang="hi" xml:lang="hi">मुहांसे-अशोक से निर्मित छाल क्वाथ को उबालें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गाढ़ा होने पर इसे ठण्डा करके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें बराबर की मात्रा में सरसों का तेल मिला लें। इसे मुहांसों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फोड़ों तथा फुन्सियों पर लगाएं। नियमित प्रयोग करने से लाभ होगा।</span></h5><h5 style="text-align:justify;">3.   <span lang="hi" xml:lang="hi">व्रण-घृत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रियंगु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक रोहिणी की त्वक्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्रिफला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धातकी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोध्र तथा सर्जरस को समान मात्रा में लेकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूक्ष्म चूर्ण करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे व्रण पर छिड़कने से शीघ्र व्रण का रोपण होता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वशरीर रोग:</span></h5><h5 style="text-align:justify;">1.  <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धिवर्धक-अशोक की छाल तथा ब्राह्मी चूर्ण को बराबर मात्रा में मिलाकर एक-एक चम्मच सुबह-शाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक-कप दूध के साथ नियमित रूप से कुछ माह तक सेवन करने से बुद्धि तीव्र होती है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;">2.  <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वाघौ शूल-अशोक का क्वाथ बनाकर </span>10-20<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली पीने से वेदना का शमन होता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;">  <span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तुत: अशोक ऐसी वनौषधि है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो शारीरिक व मानसिक रोगों का हरण करके चित्त को ऊर्जावान बनाता है। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>वनौषधियों में स्वास्थ्य</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 01 Jan 2015 21:55:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>शरीर को विषाणु मुक्त बनाता है 'जुकाम’</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. नागेन्द्र कुमार नीरज</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2947/makes-the-body-virus-free-from-colds"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-05/31.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  जुकाम</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> ऐसा रोग है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी आज तक दवा तक नहीं खोजी जा सकी। यही नहीं औषधियों के प्रयोग से इस रोग का अधिक जटिल होना अलग रहस्य है। विशेषज्ञों का मानना है कि जुकाम को रोग मानना ही भूल है। यह तो शरीर-सफाई तथा विजातीय टॉक्सिक आर्गेनिज्म के प्रभाव को निष्क्रिय करने की अद्वितीय नैसर्गिक यांत्रिकता है। डॉ. नागेन्द्र नीरज इसी अवधारणा से </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">जुकाम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का विश्लेषण करते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जु</span><span lang="hi" xml:lang="hi">काम के समय छींक की सामान्य गति प्राय: 100 मील प्रति घण्टा होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि नाक में उपस्थित विजातीय विषाणु एवं टॉक्सिक पदार्थ तेजी से निकल कर बाहर जा सकें। कुछ लोगों में यह गति 174 मील प्रति घंटा तक देखी गयी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिस्टर रेगिनाल्ड कॉलमैन की छींक अब तक की सबसे अधिक शक्तिशाली 174 मील प्रति घंटा मापी गयी है। चिकित्सक इन्हें एक खास दुर्लभ एवं दुसाध्य प्रकार के साइनस रोग से ग्रस्त मानते हैं। रेगिनाल्ड कॉलमैन के नाक में कई दिनों तक विजातीय मलवा इकट्ठा रहता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके दबाव एवं उत्तेजना से उन्हें शक्तिशाली छींक आती थी। जब वे छींकते थे तो आसपास के लोगों को महसूस होता था कि कोई अंधड़ तूफान या भूचाल-सा आ गया है। इस रहस्यमय तूफानी छींक की गुत्थी वैज्ञानिक अभी तक नहीं सुलझा सके हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जुकाम यह सूचना देता है कि व्यक्तिकी सुरक्षा-व्यवस्था (इम्यून पॉवर) काफी कमजोर हो गई है और शरीर के अन्दर टॉक्सिक ऑर्गेनिज्म अर्थात् दुश्मन अपना अड्डा जमाने में संलग्र हो गए हैं। आपने देखा होगा कि जब भी आप बीमार होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जिह्वा का स्वाद मारा जाता है और आप उसे उत्तेजित करने के लिए मसालेयुक्तचटपटे आहार शुरू कर देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नमक की मात्रा बढ़ा देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुस्सा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिड़चिड़ापन तथा कामासक्तिबढ़ जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रात्रि का जागरण बढ़ जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्राम नहीं मिल पाता। बेमेल भोजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वातानुकूलित कमरे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यायाम तथा श्रम का अभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदूषित हवा में साँस लेना- यही तो चाहिए दुश्मनों को आक्रमण करने के लिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">62 घंटे का जीवनकाल:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वर्जीनिया विश्वविद्यालय के डॉ. जैक एम. ग्वाल्टनी जूनियर और ओवन हैडली विभिन्न समुदायों पर किए गए अपने शोध कार्यों से इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि जुकाम का वायरस पीड़ित व्यक्तिके हाथ द्वारा संक्रमित होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि चुम्बन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छींक या खाँसी द्वारा। पीड़ित व्यक्तिकहीं हाथ रखे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर उस जगह स्वस्थ व्यक्तिहाथ रखे तो वह जुकाम से पीड़ित हो सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जुकाम के वायरस निर्जीव वस्तु पर भी 60 घंटे तक जीवित रहते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका के एक सर्वेक्षण के अनुसार जुकाम के कारण प्रतिवर्ष पाँच करोड़ श्रम-घण्टे बेकार जाते हैं। इससे मुक्तिके लिए डिस्पोजेबल रुमाल तैयार किया गया है। यह टिशू-रुमाल-क्लिनेंक्श की तरह तीन तह का होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसकी बीच वाली तह में वायरस अवरोधी सिड्रिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेलिक ऐसिड व सोडियम लोरिल सल्फेट नामक तीन रसायन हैं। ये मिनटों में जुकाम के हजारों वायरस को खत्म कर देते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उम्र बढ़ने के साथ-साथ जुकाम होने की दर कम हो जाती है। मिशिगन विश्वविद्यालय के डॉ. आर्नल्ड मोंटो 11 वर्ष तक 1000 लोगों पर शोध कार्य कर इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि 60 वर्ष की उम्र तक जुकाम होने की संभावना मात्र 0.5 प्रतिशत तक ही रहती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि जवान तथा बच्चे जुकाम से बार-बार पीड़ित होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कारण कि बच्चों में रोगों को बाहर करने की तीव्रता ज्यादा है। 20-30 वर्ष के लोग जुकाम-पीड़ित बच्चों के साथ रहने के कारण ज्यादा जुकाम पीड़ित होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो कुछ भी हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जुकाम की स्थिति में दवा लेकर नैसर्गिक विष-निष्कासन की प्रक्रिया में प्रतिरोध डालना मूर्खता के सिवाय कुछ नहीं है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">क्यों न लें औषधियाँ:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">चिकित्सकजीवन-विरोधी (एण्टीबॉयोटिक्स) औषधियाँ देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और ये औषधियाँ दुश्मन-जीवाणुओं के साथ प्रतिरक्षात्मक जीवाणुओं को भी समाप्त करने में लग जाती हैं। शरीर की प्रतिरक्षात्मक व्यवस्था को दवा के पूर्व सिर्फ दुश्मनों से लड़ना पड़ रहा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दवा लेने पर दूसरा दुश्मन औषधि के रूप में पैदा हो जाता है। शरीर में पहले ही जहर भरा हुआ था। अब औषधियों के जहर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुश्मनों एवं मित्र कीटाणुओं के मृतअंश के कारण भयंकर मलबा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कूड़ा-कचरा शरीर में जमा हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर के सारे संस्थान अधिक विषाक्तहो जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर से दुर्गंध आने लगती है। ऐसी स्थिति में यदि रोगी को केवल दवा के सहारे रखा गया और प्राकृतिक चिकित्सा नहीं मिली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह असाध्य दमा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एम्फिजिमा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टी.बी.</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैंसर से ग्रस्त हो सकता है। इसलिए जुकाम रूपी खतरे का सायरन बजते ही सचेत हो जाएँ। पर यह अवश्य ध्यान रखें कि जुकाम के रूप में शरीर-शुद्धि के लिए मेहमान आया है। उसे पूर्ण सहयोग कर अपनी प्रतिरक्षात्मक पंक्तिसबल करने में लगें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">औषधि वैज्ञानियों ने जुकाम से लड़ने  के लिए कितनी ही जीवन-विरोधी औषधियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्जेक्शन तथा टीके आदि ईजाद किए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अभी तक जुकाम पर विजय प्राप्त नहीं हो सकी है। कारण एक को मारने को शस्त्र तैयार होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दुश्मन दूसरी फौज खड़ी कर लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिस पर पहले वाला शस्त्र प्रभावी नहीं हो पाता। बताते हैं वर्तमान में जुकाम पैदा करने वाले पृथक्-पृथक् गुण-धर्म वाले विषाणुओं की फौजों की संख्या 200 तक पहुँच चुकी है। इसमें सबसे सशक्तएवं प्रबल </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">रानो वायरस</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">फौज की टुकड़ी है। इसकी 113 प्रजातियाँ हैं। 60-70 प्रतिशत जुकाम का कारण </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">रानो-वायरस</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">दुश्मन टुकड़ी ही है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उपचार विधि:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उपचार की दृष्टि से जुकाम के लिए कोई भी अंग्रेजी दवा न लें। पूर्ण विश्राम करें। शरीर के साथ पाचन-संस्थान को भी विश्राम दें। इस दृष्टि से 2-3 दिन नींबू-पानी-शहद प्रत्येक ढ़ाई घंटे के अंतराल पर लेते रहें। पानी का खूब प्रयोग करें। पानी का तापमान शरीर के तापमान के बराबर हो। यदि नींबू+पानी+शहद पर रहना मुश्किल हो तो वैसी स्थिति में नीबू के फल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संतरे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मौसम्मी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चकोतरे से फलाहार करें। नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. लाइनसपालिंग ने जुकाम की सर्वोत्तम औषधि विटामिन-सी माना है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फलाहार मात्र से ही जुकाम चला जाता है। इसके अतिरिक्त चोकरदार मोटे आटे की रोटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उबली सब्जी तथा सलाद सुबह के भोजन में तथा सायंकालीन भोजन में सिर्फ फलाहार लें। सूप भी 3-4 बार ले सकते हैं। फलों में सेव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नाशपत्ती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पपीता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खीरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ककड़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तरबूज आदि मौसमानुसार जो भी सब्जी तथा फल मिले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लें। उपचार में पेट की पट्टी आधा घंटा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">20 मिनट गरम-ठण्डा सेक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एनिमा के बाद 20 मिनट गरम पाद स्नान लेने से तीव्र जुकाम में शीघ्र लाभ मिलता है। यह क्रम ५ दिन तक लगातार करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उपवास में शरीर को विश्राम मिलता है तथा पाचन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवशोषण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सात्मीकरण की सारी शक्तिशरीर से जहर निकालने में लग जाती है। फिर 4-5 दिन में ही जुकाम चला जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्य उपाय:</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">15 दिन तक प्रात:काल कुंजर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जलनेति तथा सूत्रनेति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घृतनेति भी करें। रात्रि को सोते समय (50 ग्राम सरसों का तेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">1 ग्राम कपूर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आधा नींबू का रस मिलाकर दोनों नाकों में 10-10 बूँद डालकर तेलनेति करें। रात्रि को सोते समय हथेलियों एवं पादतली पर 15-20 मिनट तक सरसों का तेल मसल कर सोयें।) तेलनेति के पहले व बाद में चेहरे का वाष्प स्नान लें। भगोने में नीम तथा नीलगिरी के पत्ते डालकर उबालें। भगोने को स्टूल पर रखकर ऊपर से कम्बल तथा तौलिए से ढँक कर चेहरे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिर को वाष्प दें। कान में सरसों का तेल डालें तथा नाभि पर भी लगाएँ। तीव्र जुकाम की स्थिति में भी 2-3 बार मुँह में ठण्डा पानी भर कर ठण्डे पानी से 10-15 बार चेहरे पर छींटे मारें। यह उपचार शीघ्र प्रभावी होता है। पतंजलि योगपीठ द्वारा निर्मित औषधियों का प्रयोग शरीर का परिष्करण करके रोग दूर भगाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तीन दिन तक जुकाम नहीं जाए और बुखार भी रहने लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह स्थिति इनफ्लुऐंजा या फ्लू बुखार की हो सकती है। 4-5 दिन तक बुखार न उतरे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या जुकाम या बुखार ठीक हो जाने के बाद फिर हो जाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह स्थिति न्यूमोनिया और सायनस की है। इस स्थिति में भी रोगी को उपर्युक्त उपचार देने के साथ-साथ चिकित्सक से परामर्श करें।। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>रोग विशेष</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 01 Jan 2015 21:53:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जरूरत है शरीर में जठराग्रि, जीवन में प्राणाग्रि की</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उष्मणोऽल्पबलत्वेन धातुमाद्यमपाचितम्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दुष्टमामाशयगतं रसमामं प्रचक्षते।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्ये दोषेभ्य एवातिदुष्टेभ्योऽन्योन्यमूर्च्छनात्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कोद्रवेभ्यो विषस्येव वदन्त्यामस्य सम्भवम्।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आमेन तेन सम्पृक्ता दोषा दूष्याश्च दूषिता:।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सामा इत्युपदिश्यन्ते ये च रोगास्तदुद्भवा:।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्वय-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> उष्मण: अल्पबलत्वेन अपाचितम् आमाशयगतं दुष्टं रसम् आद्यं धातुम् आमम् प्रचक्षते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्ये अतिदुष्टेभय: दोषेभ्य: अन्योन्यमूर्च्छनात् एव आमस्य सम्भवं कोद्रवेभ्य: विषस्य इव वदन्ति। तेन आमेन संपृक्ता: दूषिता: दोषा: दूष्या: एव तदुद्भवा: ये रोगा: </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सामा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इति उपदिश्यन्ते।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शब्दार्थ- उष्मण: = जठराग्रि की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अल्पबलत्वेन = दुर्बलता से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपाचितम् = अपक्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आमाशयगतम् = आमाशय में प्राप्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुष्टम् = (वातादि दोषों में) दूषित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रसम् = रस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आद्यम् = प्रथम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धातुम् = धातु</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2948/there-is-a-need-for-digestive-fire-in-the-body-and-vital-fire-in-life"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-05/13.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उष्मणोऽल्पबलत्वेन धातुमाद्यमपाचितम्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दुष्टमामाशयगतं रसमामं प्रचक्षते।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्ये दोषेभ्य एवातिदुष्टेभ्योऽन्योन्यमूर्च्छनात्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कोद्रवेभ्यो विषस्येव वदन्त्यामस्य सम्भवम्।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आमेन तेन सम्पृक्ता दोषा दूष्याश्च दूषिता:।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सामा इत्युपदिश्यन्ते ये च रोगास्तदुद्भवा:।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्वय-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> उष्मण: अल्पबलत्वेन अपाचितम् आमाशयगतं दुष्टं रसम् आद्यं धातुम् आमम् प्रचक्षते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्ये अतिदुष्टेभय: दोषेभ्य: अन्योन्यमूर्च्छनात् एव आमस्य सम्भवं कोद्रवेभ्य: विषस्य इव वदन्ति। तेन आमेन संपृक्ता: दूषिता: दोषा: दूष्या: एव तदुद्भवा: ये रोगा: </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सामा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इति उपदिश्यन्ते।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शब्दार्थ- उष्मण: = जठराग्रि की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अल्पबलत्वेन = दुर्बलता से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपाचितम् = अपक्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आमाशयगतम् = आमाशय में प्राप्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुष्टम् = (वातादि दोषों में) दूषित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रसम् = रस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आद्यम् = प्रथम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धातुम् = धातु को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आमम् = आम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रचक्षते = कहते हैं। अन्ये = कुछ आचार्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अतिदुष्टेभ्य: दोषेभ्य: = अतिदूषित (वातादि) दोषों से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्योन्यमूर्च्छनात् एव = परस्पर सम्मूर्छित होने के कारण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आमस्य सम्भवम् = आम की उत्पत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोद्रवेभ्य: विषस्य इव = कोदो से विष की उत्पत्ति की भाँति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वदन्ति = कहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेन आमेन संपक्ता: = उस आम से संयुक्तहए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूषिता: = दूषित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोषा: = वातादिदोष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूष्या: च = तथा दूष्य (रसादि)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तदुद्भवा: = उनसे उत्पन्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये रोगा: = जो रोग हैं</span>, (<span lang="hi" xml:lang="hi">वे)</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">सामा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इति उपदिश्यन्ते = </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">साम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इस नाम से कहे जाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भावार्थ- जठराग्रि की दुर्बलता से रस (प्रथम धातु) का ठीक ढंग से पाचन नहीं हो पाता। आमाशय में जाकर वही अपक्व (दूषित) रस धातु </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहलाती है। अन्य आचार्यों के अनुसार जिस प्रकार कोद्रव (कुधान्य) में देश-काल के कारण विष उत्पन्न हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ठीक उसी प्रकार अत्यधिक दूषित वातादि दोषों के परस्पर सम्मूर्च्छित (एक रूप) होने से आम दोष की उत्पत्ति होती है। इस आम से मिले हुए दूष्यों (वातादि दोष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रसादि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धातु एवं पुरीष आदि मल) को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">साम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं तथा इनसे उत्पन्न रोगों को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सामरोग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कुर्यान्न तेषु त्वरया देहाग्रिबलवित् क्रियाम्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">शमयेत्तान् प्रयोगेण सुखं वा कोष्ठमानयेत्।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञात्वा कोष्ठप्रपन्नांश्च यथासन्नं विनिर्हरेत्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्वय- तिर्यग्गता:</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> दोषा: प्राय: आतुरान् चिरं क्लेशयन्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देह-अग्रि-बलवित् तेषु त्वरया क्रियां न कुर्यात्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रयोगेण तान् शमयेत् सुखं वा कोष्ठम् आनयेत्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोष्ठप्रपन्नान् च ज्ञात्वा यथासन्नं विनिर्हरेत्। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शब्दार्थ- तिर्यग्गता:</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> = तिरछे मार्ग में गये हुये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोषा: = दोष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राय: = प्राय:</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आतुरान् = रोगियों को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिरम् = लम्बे समय तक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्लेशयन्ति = पीड़ित करते हैं। देह-अग्रि-बलवित् = देह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्रि तथा बल को जानने वाला (वैद्य)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेषु = उनमें (दोषों के सन्दर्भ में)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्वरया = जल्दबाजी से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रियां न कुर्यात् = चिकित्सा न करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रयोगेण = (वैद्यक शास्त्रोक्त-विधि के) प्रयोग से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तान् = उन दोषों को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शमयेत् = शान्त करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुखं वा = अथवा सुखपूर्वक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोष्ठम् = कोष्ठ में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आनयेत् = ले आयें। कोष्ठप्रपन्नान् च = तथा कोष्ठ में प्राप्त हुये (उन दोषों) को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञात्वा = जान करके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यथासन्नम् = निकटस्थ क्रम से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विनिर्हरेत् = निर्हरण करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भावार्थ- तिर्यग्गत (अर्थात् शोधन मार्ग के बाहर शाखादि में गये) दोष प्राय: रोगी को दीर्घकाल तक पीड़ित करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: देह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्रि एवं बल को जानने वाले वैद्य इनकी शीघ्रतापूर्वक चिकित्सा न करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि शास्त्रानुसार इनका शमन करें अथवा शरीर को बिना पीड़ा पहुँचाए ही दोषों को सुखपूर्वक कोष्ठ में लाकर वमन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विरेचन एवं शिरोविरेचन (विरेचन नस्य) आदि के द्वारा बाहर निकालें।</span></h5>
<h5 style="text-align:right;"><strong>('<span lang="hi" xml:lang="hi">अष्टाङ्ग हृदयम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">से साभार)</span></strong></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 01 Jan 2015 21:51:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>श्रीराम का 'विजय रथ'</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. सुमन : महिला मुख्य केन्द्रीय प्रभारी</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">भारत स्वाभिमान व पतंजलि योगपीठ</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2949/shree-ram-ka-vijay-rath"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-05/ram.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संसार</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> में प्रत्येक प्राणी विजय की कामना करता है। कोई भी पराजित नहीं होना चाहता। शरीर की दृष्टि से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिष्ठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेशभूषा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गाड़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसाधन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक प्रतिष्ठा प्रत्येक दृष्टि से व्यक्तिस्वयं को विजयी देखना चाहता है। सारे विश्व को जीतना चाहता है। लेकिन गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिसने अपने मन को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रियों को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वासनाओं को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कामनाओं को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इच्छाओं को जीत लिया वास्तव में उसी ने जगत को जीता है। इतिहास में वे ही व्यक्तिमहान् कहलाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने आन्तरिक या बाह्य जीवन में कोई बड़ी विजय हासिल की। वेद भी विजय की ही प्रेरणा देता है-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहंमिन्द्रो न पराजिग्ये। </span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अग्निरस्मि जन्मना जातवेदा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घृतं में चक्षुरमृतं म आसन। </span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्कस्त्रिधातू रजसो विमानोऽजस्रो घर्मो हविरस्मि नाम।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहित:। विजय अर्थात् विशेष जय।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विजय प्राप्त करना कोई सरल काम नहीं होता। दीर्घकाल तक सतत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अथक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धापूर्वक किया गया पुरुषार्थ ही इस विजय श्री के दर्शन करा पाता है। किसी कवि ने विजय का वर्णन करते हुए कहा है कि-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विजय और वसुधा ये दोनों बड़े बाप की बेटी हैं।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कापुरुषों की नहीं सदा ये बलवानों की चेटी हैं।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वरण करोगे विजय</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">जगत में बनोगे क्या तुम धरणीधर</span>?</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तो सीखो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैसे देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निज शोणित की अमजलि भर-भर।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस क्रम में रामायण का एक प्रसंग मुझे स्मरण आ रहा है। युद्धकाण्ड के सप्तपंचाशत (</span>57) <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्ग में युद्ध भूमि में जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और रावण आमने-सामने खड़े हैं। रावण के पास अत्यन्त सुन्दर व विशाल स्वर्ण-रथ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धनुष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तलवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कवच आदि-विविध अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित हैं और दूसरी तरफ  श्रीराम वनवासी होने के कारण साधारण से वल्कल वस्त्रों व पैर में खङाऊ धारण किये हुए धरती माता पर बिना रथ व बिना सारथी के खड़े हैं। यह देखकर विभीषण मन में श्रीराम के प्रति अत्यधिक स्नेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भक्तिहोने के कारण भयभीत हृदय होकर कहने लगे- हे नाथ! आपके पास न तो कोई अस्त्र-शस्त्र हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न रथ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुझे डर लग रहा है कि आप इस महाबलि रावण को कैसे पराजित कर पायेंगे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रावण रथी विरथ रघुवीरा</span>, </strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">देख विभीषण भयहु अधीरा</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अधिक प्रीत मन भा सन्देहा</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बन्दी चरण कह सहित सनेहा</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नाथ न रथ नहिं तन पद त्राना।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">केहि बिधि जितब वीर बलवाना।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हे नाथ ! आपके पास न रथ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न शरीर की रक्षा करने वाला कवच है और न जूते ही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर आप उस बलवान् रावण को कैसे जीत सकेंगे</span>?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह सुनकर श्रीराम स्मितवदन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुस्कुराते हुए कहने लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे परम मित्र विभीषण! जिस रथ से विजय प्राप्त होती है वह रथ तो अलग ही प्रकार का होता है। उस विजय रथ की विशेषताएं तुम्हें मैं सुनाता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो वास्तव में परम विजय श्री को प्राप्त कराने वाला है-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सुनहुं सखा कहे कृपानिधाना।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जेहि जय होय सो स्यन्दन नाना।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति धर्म सन्तोष कृपाना।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कवच अभेद विप्र गुरु पूजा। एहि सम विजय उपाय न दूजा।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सखा धर्ममय अस रथ जाके। जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राम ने कहा- शौर्य और धैर्य उस रथ के पहिये हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य और सदाचार उसकी दृढ़ ध्वजा या पताका हैं। बल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विवेक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दम अर्थात् इन्द्रिय निग्रह और परोपकार- ये चार उसके घोड़े हुए हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वर-भजन ही उस रथ का चतुर सारथी है। वैराग्य ढाल है और सन्तोष तलावर है। दान फरसा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि प्रचण्ड शक्तिहै और श्रेष् विज्ञान ही कठिन धनुष है। निर्मल अर्थात् पाप-रहित और अचल व स्थिर मन तरकस के समान हैं। शम अर्थात् मन का वश में होना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहिंसा आदि यम और शौच आदि नियम बहुत सारे बाण हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्राह्मणों और गुरुओं का पूजन ही अभेद्य कवच है। इसके समान विजय का दूसरा उपाय नहीं है। हे सखे! ऐसा धर्ममय रथ जिसके पास हो संसार का कोई शत्रु उसे जीत नहीं सकता।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>सनातन वैभव</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2949/shree-ram-ka-vijay-rath</link>
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                <pubDate>Thu, 01 Jan 2015 21:50:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>हृदय रोग में 'लौकी रस’ रामबाण</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लौ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">की (घीया) का रस दिन में दो बार या एक बार लगातार </span>6<span lang="hi" xml:lang="hi"> माह लेने से हृदय की धमनियों में आये अवरोध (ब्लॉकेज) खुल जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घबराहट दूर होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदयशूल (एनजाइनापेन) से मुक्तिमिलती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोलेस्ट्रोल व ट्रग्लिजराइड्स निंयत्रित होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय की कार्यशीलता (हार्ट वर्किंग) बढ़ती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अम्लपित व आंत्रव्रण (अलसर) भी पूरी तरह ठीक हो जाता हैं। आंत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यकृत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आमाशय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पक्वाशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्लीहा को शक्तिमिलती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हीमोग्लोबिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्ताणुओं की कमी दूर होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अतिमासिक स्त्राव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्श (बवासीर)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन्दाग्नि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गैस व पाचन तन्त्र के</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2950/hridya-ras-me-lauki-ramban"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-05/30.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लौ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">की (घीया) का रस दिन में दो बार या एक बार लगातार </span>6<span lang="hi" xml:lang="hi"> माह लेने से हृदय की धमनियों में आये अवरोध (ब्लॉकेज) खुल जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घबराहट दूर होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदयशूल (एनजाइनापेन) से मुक्तिमिलती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोलेस्ट्रोल व ट्रग्लिजराइड्स निंयत्रित होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय की कार्यशीलता (हार्ट वर्किंग) बढ़ती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अम्लपित व आंत्रव्रण (अलसर) भी पूरी तरह ठीक हो जाता हैं। आंत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यकृत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आमाशय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पक्वाशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्लीहा को शक्तिमिलती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हीमोग्लोबिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्ताणुओं की कमी दूर होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अतिमासिक स्त्राव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्श (बवासीर)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन्दाग्नि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गैस व पाचन तन्त्र के रोग दूर होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लौकी को गरम पानी से अच्छी तरह धोकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना छिलका उतारें कद्दूकश करके सूती कपड़े से छानकर उसका </span>100 <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्राम रस निकाल लें। इस रस में सात पत्ते तुलसी व सात ही पत्ते पुदीना के पीस कर डालें। यह मिश्रण प्रात: खाली पेट व सायं को भोजन से एक या दो घंटे पहले लें। इसका कोई साईड इफैक्ट नहीं है। जिनको लौकी रस पीने पर पतला दस्त हो वे 50 ग्राम मात्रा से प्रारम्भ करें।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पोषक उत्पाद</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 01 Jan 2015 21:49:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संगठन के सशक्ति करण व शुद्धिकरण के लिए निरन्तर दिव्य आरोहण</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">राकेश कुमार : मुख्य केन्द्रीय प्रभारी</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">भारत स्वाभिमान</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2951/organization-for-continuous-empowerment-and-purification"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-05/85.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  किसी भी बड़े परिवर्तन के लिए सबके सामूहिक पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य नेतृत्व एवं विचारधारा का होना आवश्यक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्हीं तीनों के संयोग से संगठन का निर्माण होता है।1947 की आजादी के बाद भारत वर्ष में भी लगातार अंग्रेजों की व्यवस्थाएं चलती रहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो शहीदों ने सपना देखा था वैसा स्वराज्य नहीं आया। भ्रष्ट तंत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रष्ट व्यवस्थाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंग्रेजों के कानून तथा अंग्रेजों की व्यवस्थाओं ने सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों को मानसिक रूप से गुलाम बना कर रखा। चन्द लोगों ने देश का धन लूट-लूट कर विदेशों में जमा करवाकर भारत के 120 करोड़ लोगों के हक को लूट लिया था। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दे</span><span lang="hi" xml:lang="hi">शवासियों ने भी मान लिया था कि भारत की तो अब यही नीयति है कि अब यहाँ कोई आशा की किरण नहीं दिखाई देगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इसी घनघोर अंधकार व निराशा के वातावरण में ईश्वर की प्रेरणा से एक सन्त सिपाही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योद्धा संन्यासी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगी योद्धा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य स्वामी जी महाराज ने संकल्प लिया कि भारत को आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक व राजनैतिक गुलामी से मुक्त करना ही होगा। इसी व्यवस्था परिवर्तन के संकल्प के साथ पूज्य स्वामी जी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्य श्री ने </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> जनवरी </span>2009<span lang="hi" xml:lang="hi"> में भारत स्वाभिमान संगठन की स्थापना की। भारत स्वाभिमान वर्तमान में सबसे कम आयु (मात्र </span>6<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ष) का विश्व का सबसे विशाल संगठन है। जो कार्य संगठन </span>100-100<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों में नहीं कर पाते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवस्था परिवर्तन व सत्ता परिवर्तन का विशाल कार्य भारत स्वाभिमान ने पिछले </span>6<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों में दिव्य नेतृत्व के द्वारा </span>125<span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ लोगों के सहयोग से कर दिखाया। वर्तमान में भारत स्वाभिमान संगठन एवं उसके पाँचों सहयोगी संगठन यथा पतंजलि योग समिति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महिला पतंजलि योग-समिति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युवा भारत व किसान पंचायत आदि मिलकर देश के सम्पूर्ण जिलों व प्रत्येक तहसील में कार्य कर रहे हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत स्वाभिमान संगठन देश के </span>600<span lang="hi" xml:lang="hi"> से अधिक जिलों</span>, 5000<span lang="hi" xml:lang="hi"> से अधिक तहसीलों तथा </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> लाख से अधिक गाँवों में सक्रियता के साथ कार्य कर रहा है। संगठन के माध्यम से राष्ट्रहित के मुद्दों पर जैसे काला धन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रष्टाचार पर जन-जागरण के साथ-साथ नि:शुल्क योग शिविर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नि:शुल्क नियमित योग कक्षायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वृक्षारेापण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर्यावरण संरक्षण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नशामुक्ति अभियान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तदान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वच्छता अभियान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेदिक शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जड़ी-बूटी वितरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपदा राहत सेवा जैसे (बाढ़ राहत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुनामी राहत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केदारनाथ राहत सेवा)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गौसंरक्षण एवं संवर्धन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गरीब कन्याओं का विवाह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नेत्रदान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देहदान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वस्त्र वितरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी का प्रचार-प्रसार आदि असंख्य सेवा के कार्य चल रहे हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य स्वामी जी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्य श्री के नेतृत्व में भारत के इतिहास का सबसे बड़ा सत्याग्रह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जन-जागरण अभियान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रष्ट सत्ता को उखाड़कर एक राष्ट्रवादी सरकार को स्थापित करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सब करोड़ों कार्यकर्ताओं के पूर्ण समर्पण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्ठा व पुरुषार्थ से भारत स्वाभिमान संगठन द्वारा किया गया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विगत </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> दशक पहले पूज्य स्वामी जी ने श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी के साथ योग-आयुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी एवं ऋषि ज्ञान परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए देवभूमि हरिद्वार से यह अनुष्ठान शुरू किया था। परम पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज ने देश व दुनिया के लगभग </span>20<span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ लोगों को प्रत्यक्ष रूप से योग सिखाकर तथा मीडिया के माध्यम से योग को कन्दराओं व महलों से बाहर निकालकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घर-घर तक योग पहुँचाकर वर्तमान युग में योग को पुन: प्रतिष्ठा दिलवाई है। पतंजलि योगपीठ एवं माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी के पुरुषार्थ से आज </span>177<span lang="hi" xml:lang="hi"> देशों के समर्थन के साथ संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi"> जून को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व योग दिवस</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">घोषित करके योग की वैज्ञानिकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सार्वभौमिकता एवं भारतीय ऋषि संस्कृति का लोहा माना है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रसेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानवता सेवा के लिए संगठन के नेतृत्वकर्त्ता पूज्य स्वामी जी महाराज ने भारत की ऋषि परम्परा की तरह योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी व व्यवस्था परिवर्तन की महाक्रान्ति के बाद अब आचार्यकुलम् के माध्यम से शिक्षा के क्षेत्र में महाक्रान्ति अर्थात् ज्ञान-क्रान्ति का लक्ष्य रखा हैं। पूज्य स्वामी जी महाराज कहते है भविष्य में समृद्धि का आधार ज्ञान अर्थात् बौद्धिक सम्पदा के आधार पर तय होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञानवान ही धनवान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान ही धन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके पास बौद्धिक सम्पदा होगी वही विश्व का नेतृत्व करेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे वर्तमान में पतंजलि योगपीठ द्वारा योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद को विश्व पटल पर स्थापित किया गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे ही हमारी प्राचीन वैदिक संस्कृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैदिक ज्ञान विज्ञान को आधुनिक शिक्षा के साथ सम्पूर्ण विश्व पटल पर स्थापित किया जायेगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान क्रान्ति के साथ-साथ संगठन को देश के </span>6<span lang="hi" xml:lang="hi"> लाख </span>36<span lang="hi" xml:lang="hi"> हजार </span>365<span lang="hi" xml:lang="hi"> गाँवों तक विस्तार करना तथा योग के साथ-साथ आयुर्वेद व स्वदेशी के वर्तमान स्थापित तंत्र में कोई न्यूनता या अपूर्णता है उसे पूर्ण करना।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्येक जिले में प्रथम चरण में </span>5-5<span lang="hi" xml:lang="hi"> आदर्श ग्राम स्थापित करना तथा धीरे-धीरे भारत के सभी गाँवों को आदर्श बनाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्येक जिले में आचार्यकुलम् खोलना तथा प्रत्येक ग्राम स्तर तक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देश के अन्तिम व्यक्ति को स्वस्थ बनाने के लिये योग  कक्षा स्थापित करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युवा पीढ़ी को नशे से बचाकर राष्ट्रनिर्माण में उपयोगी बनाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुदरती खेती का अन्तिम किसान तक प्रचार करके रासायनिक खादों के जहर से किसान के खेतों को बचाने तथा  भारतवासियों को बीमारियों से बचाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वच्छ भारत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ भारत भय-भूख-बीमारी मुक्तराष्ट्र का निर्माण करना ये वह विराट लक्ष्य हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो केवल सत्ता या सरकारें नहीं कर सकती है। सरकारें सहयोग कर सकती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवर्तन का वातावरण निर्मित कर सकती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन चरित्र-निर्माण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्तित्व निर्माण का कार्य कोई दिव्यतायुक्त समर्थ योग्यगुरु ही कर सकता है। दिव्य गुरुदेव पूज्य स्वामी जी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्य श्री के मार्गदर्शन में भारत स्वाभिमान संगठन का आगामी लक्ष्य इन बड़े राष्ट्रीय दायित्वों का निर्वहन करना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके लिए निरन्तर हमें संगठन व स्वदेशी के स्थापित तंत्र के सशक्तिकरण एवं शुद्धिकरण की आवश्यकता है। संगठन के शुद्धिकरण व सशक्तिकरण से ही संगठन व राष्ट्र का दिव्य आरोहण होगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संगठन के सशक्तिकरण के लिए </span>100-100<span lang="hi" xml:lang="hi"> जिलों के सभी प्रान्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मण्डल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिला व तहसील स्तरीय दायित्वधारियों की संगठन कार्यशाला नवम्बर व दिसम्बर माह में संगठन मुख्यालय पतंजलि योगपीठ में आयोजित की गई। संगठन कार्यशाला में लक्ष्य रखा गया कि अब संगठन का सशक्तिकरण व शुद्धिकरण करके संगठन व स्वदेशी के तंत्र को विस्तार दिया जायेगा। विगत चार वर्षों तक संगठन लगातार आन्दोलनों में संलग्न रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निरन्तर संघर्ष चलते रहे। एक के बाद एक अभियान चलते रहे। अब संगठन ने परिवर्तन का एक लक्ष्य प्राप्त कर लिया है। अब अनुशासन के साथ शुद्ध ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्ध उपासना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्ध कर्म से अपनी </span>100<span lang="hi" xml:lang="hi">त्न शक्तियों को जाग्रत करके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण योगी बनकर सम्पूर्ण दुनिया का नेतृत्व करना है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संगठन कार्यशाला में उपस्थित कार्यकर्ताओं के लिए पूज्य स्वामी जी महाराज ने सात सर्वोच्च प्राथमिकतायें तय की- (</span>1) <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्तिगत जीवन में निरन्तर साधना व निष्काम सेवा को सर्वोच्च  प्राथमिकता देना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कम से कम </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> घण्टा ध्यान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वाध्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मौन व </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> घंटा योग करना। (</span>2) 10<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रकार के योग शिविरों का आयोजन करना (</span>3) <span lang="hi" xml:lang="hi">योग कक्षाओं का विस्तार करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभी प्रभारियों के लिए योग कक्षा लगाना अनिवार्य है। (</span>4) <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थापित ग्राम समितियों को सक्रिय रखना व पाँचों संगठनों को जिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तहसील</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्राम स्तर तक विस्तार करना। (</span>5) <span lang="hi" xml:lang="hi">संगठन व संस्थान को आदर्श स्थिति में लाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थापित तंत्र की अपूर्णताओं को दूर करके उसका शुद्धिकरण व सशक्तिकरण करना। (</span>6) <span lang="hi" xml:lang="hi">आदर्श जीवन जीना- यथार्थ ज्ञानपूर्वक </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रकार का व्यवहार करना-वाणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभ्यास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रवृत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा। (</span>7) <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्येक जिले में आचार्यकुलम् स्थापित करना। इसके साथ ही पूज्य स्वामी जी ने  साधनाकाल </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वाध्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान</span>’’ <span lang="hi" xml:lang="hi">व व्यवहारकाल के योग </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा</span>’’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का विशेष प्रशिक्षण दिया और कहा कि योग को आधार बनाकर ही हम यहाँ तक पहुँचे हैं तथा योग के साथ ही इस अभियान को हम आगे बढायेंगे। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संगठन कार्यशाला में मुख्य केंद्रीय प्रभारी भाई डॉ- जयदीप आर्य जी द्वारा स्वच्छता अभियान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आदर्श ग्राम निर्माण योजना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहयोग आदि विषयों को प्रस्तुत किया गया। मुख्य केंद्रीय प्रभारी राकेश जी ने ग्राम समितियों का विस्तार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यालय प्रबन्धन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नशामुक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोशल मीडिया तथा बहन आचार्या सुमन जी द्वारा स्वभाव में परिवर्तन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग कक्षाओं व योग शिविरों का आयोजन </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रकार के योग शिविरों के आयोजन से सम्बन्धित प्रशिक्षण दिया गया। संगठन कार्यशाला में संगठन विस्तार के साथ-साथ वैयक्तिक जीवन में अनुशासन के साथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य कर्म करने अर्थात् भागवत कर्म व निष्काम सेवा पर विशेष बल दिया गया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संगठन कार्यशाला में सम्पूर्ण भारत से कार्यकर्ताओं ने उत्साह के साथ भाग लिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जम्मू-कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक तथा राजस्थान से लेकर नोर्थ ईस्ट के प्रत्येक प्रान्त से बड़ी संख्या में भागीदारी रही। अण्डमान निकोबार से </span>10-10<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिन की यात्र करके कार्यकर्ता संगठन कार्यशाला में भाग लेने पहुँचे। केरल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्नाटका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आन्ध्र प्रदेश व मणिपुर के साथ-साथ नागालैण्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्रिपुरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अरुणाचल प्रदेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेघालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिक्किम आदि से भी बड़ी संख्या में भागीदारी रही।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सभी कार्यकर्ताओं ने संकल्प लिया कि अब हम चरैवेति चरैवेति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पापो निषद्वरो जन: इन्द्र इच्चरत: सखा। (एतरेय ब्राह्मण) निरन्तर पूर्ण-पुरुषार्थ से भगवान को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म व न्याय को केन्द्र में रखकर राष्ट्रसेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानवता सेवा जैसे कार्य बिना किसी अहंकार के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्काम सेवा के साथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग को केन्द्र में रखकर इस अभियान को आगे बढ़ायेंगे। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्था समाचार</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 01 Jan 2015 21:47:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>युगीन आंदोलन को समझने के लिए चाहिए दिव्य दृष्टि</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. विजय कुमार मिश्र</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2952/if-not-now-then-when"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-05/39.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   परिवर्तन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> का केन्द्र बिन्दु मनुष्य है। क्रान्ति की सफलता इसी मनुष्य के आन्तरिक परिवर्तन पर अवलम्बित है। प्रसिद्ध विचारक </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">लारेंस हाइड</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का कहना है कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति के पुनर्निर्माण बिना समाज का निर्माण असम्भव है। मानव के भीतर बैठे हुए बन्दर  एवं चीते को मात्र बाह्य दबावों से नियन्त्रित नहीं किया जा सकता। न ही मनुष्य के बीच परस्पर सघन आत्मीयता विकसित किए बिना श्रेष्ठ समाज की स्थापना सम्भव है। हमें स्थायी परिवर्तन के लिए एक ऐसी क्रान्ति का श्रीगणेश करना होगा जो अहिंसात्मक हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैचारिक हो तथा जिसका लक्ष्य सम्पूर्ण विश्व हो न कि सीमित व्यक्तियों अथवा एक समाज विशेष मात्र का हृदय परिवर्तन।</span>‘ <span lang="hi" xml:lang="hi">वह है आध्यात्मिक क्रांति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सदियों में कभी-कभी ही होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज वही सुयोग सामने है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा अवसर फिर कब आये कहना कठिन है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक क्रान्ति की चिंगारी उत्कृष्ट व्यक्तित्वों की आहुति पाकर प्रज्जवलित होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रमश: आध्यात्मिक संगठनात्मक शक्ति में परिवर्तित होती है और समग्र परिवर्तन का मार्ग खुलता है। इसी में सर्वत्र व्याप्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुष्प्रवृत्तियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवाँछनीयताओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुरीतियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूढ़ मान्यताओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्धविश्वासों का कूड़ा-करकट जलता है। अध्यात्म अवलंबित इसी दिव्य अग्नि को प्रज्वलित करने के लिए युगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज स्वयं संकल्प निष्ठ हैं और उन्होंने विश्व के स्वर्णिम भविष्य को हस्तगत आंवले की तरह देखते हुए </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अभी नहीं तो कभी नहीं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का उद्घोष किया है। उनके इस आह्वान का भी एक दिव्य रहस्य है। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तुत: हजारों वर्षों बाद ऐसी घड़ी आई है कि  संपूर्ण मानव जगत का भाग्य नये संकल्प</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नये कलम-स्याही के साथ लिखने हेतु संपूर्ण परमात्म सत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि सत्तायें तत्पर हैं। सूक्ष्म जगत की दिव्य आत्मायें दिव्य विश्व निर्माण के लिए तड़प रही हैं। कुछ दशक पूर्व किसी संत स्तर के व्यक्तित्व ने कहा था कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इस युग आंदोलन के लिए व्यापक स्तर पर दिव्य आत्मायें जन्म लेंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके निमित्त कोख निर्माण का ताना-बाना परमात्म सत्ता बुन रही है। अब तक दुनियां में जितने भी क्रांतिदर्शी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रांतिकारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषिआत्मायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वीरांगनायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महापुरूष आदि धरती पर आये हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन सभी स्तर की श्रेष्ठ आत्मायें इस भावी युग आंदोलन के नेतृत्व के निमित्त जन्म ले भी चुकी हैं और समय आने पर अपना स्वरूप प्रकट करेंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभी बड़ी संख्या में दिव्य आत्मायें कोखों की तलाश में हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">युग नेतृत्व का सुअवसर</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कहना अतिशयोक्ति नहीं कि इन दिनों परमात्म सत्ता की ओर से पतंजलि योगपीठ को उस युगआंदोलन के नेतृत्व का उत्तरदायित्व मिला है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका प्रमाण है पतंजलि योगपीठ का हर स्तर पर शुद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रखर व प्रमाणित होकर खड़ा होना और इसके प्रत्येक मिशन का तीर की तरह सनसनाते लक्ष्य की ओर बढ़ते जाना। अत: पतंजलि योगपीठ के इस दिव्य अभियान के लिए देश ही नहीं विश्व के भावनाशीलों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थियों को इस दिव्य संकल्प पूर्ति हेतु आगे आना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे कि पूज्य स्वामी रामदेव जी एवं श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी अपनी तप: ऊर्जा से संपर्क में आने वाले हर व्यक्तित्व को तपाकर उसे कुन्दन बनाकर परमात्म सत्ता की इस आध्यात्मिक क्रान्ति योजना में हिस्सा बंटाने लायक बना सकें। क्योंकि अब समस्त मानव जाति के उज्जवल भविष्य का सृजन शुरू हो चुका है। इस सद्पुरुषार्थ से सर्वप्रथम नैतिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बौद्धिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्मिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्रों में घुसी हुई भ्रान्तियाँ मिटेंगी। विश्व उद्यान को समुन्नत बनाने का सुयोग मिलेगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(132,63,161);" xml:lang="hi">दिव्य नागरिकों का चलन</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस निमित्त गढ़े जाने वाले दिव्य नागरिकों का जीवन क्रम प्रचलित ढर्रे से बिल्कुल विपरीत होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे औसत नागरिक की तरह पवित्रतम सादगी भरे जीवन निर्वाह में गौरव अनुभव करेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहंकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संकीर्ण स्वार्थपरता से आगे सोचेंगे। संपूर्ण समाज के प्रति संवेदनशील होंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही संपर्क में आने वालों को उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श चरित्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पवित्रता एवं प्रखरता पर आधारित समर्थ व्यक्तित्व निर्माण की दिशा में मोड़ सकेंगे। तब उद्धत आचरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनीति भरे कृत्य का दौर छटेगा। लोगों के मनों में लोकमंगल के उत्तरदायित्व निभाने के लिए उल्लास उठेगा। यही योगयुग व आदर्शवादिता का युग हेागा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ का यह मिशन अब स्वास्थ्य क्रांति से संतुष्ट होने वाला नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य तो उसका केंद्रक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके सहारे बौद्धिक क्षेत्र में व्याप्त अन्धविश्वासों के हजारों घोंसलों को ढहाना है। आहार क्षेत्र में बैठी तले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिर्च-मसाले वाले स्वादिष्ट अभक्ष्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नशे जैसी आदतें भी छुड़ानी हैं। आहार क्षेत्र की इस  क्रान्ति से समाज को दुर्बलता और रुग्णता से छुटकारा मिलेगा ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य गवाने की पीड़ा सहने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिकित्सा के नाम पर अकूत संपत्ति लुटाने और जीवन भर दुर्बल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुपयोगी बने रहकर अकाल मौत के शिकार जैसी समस्याओं से समाज को निजात मिलेगी। यद्यपि यह कार्य योगासन-प्राणायाम से हो भी रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार मनुष्य को सोने-जागने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रम करने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धूप-हवा के सम्पर्क में रहने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मचर्य जैसे प्रकृतिगत निर्देशों से सहमति बैठाने पर भी जोर देना होगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मन-मस्तिष्क भी झकझोरना है</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन दिनों मानव के मन-मस्तिष्क के बीच सतत् चलने वाला निषेधात्मक चिंतन उसे प्रतिक्षण खोखला कर रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो वर्तमान मानसिक विक्षोभों का प्रधान कारण है। जैसे लोगों द्वारा धनी सम्पन्नों से अपनी तुलना करके सदैव दरिद्र एवं कंगाल अनुभव करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो उपलब्ध है उसका निरादर और अति उद्धतता अपनाकर आवारा पशु जैसा मन को भटकाते फिरना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रमशीलता पर गौरवान्वित न होकर मुफ्त की दौलत के लिए ललचाते फिरना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तत्पश्चात आवेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिंता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्दिघ्नता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आशंका से ग्रसित रहना आदि हैं। जरूरत है इस मनोभूमि में दिव्यता का बीजारोपण करने और जनमानस में खिलाड़ी जैसा जीवन जीने का अभ्यास कराने की जिससे वह जीवन के उतार-चढा़वों को संतुलित ढंग से स्वीकार करके हंसती-हंसाती जिन्दगी जी सके।  </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार बनेंगे दिव्य उद्यान</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार एक दिव्य उद्यान है। इस तथ्य पर पुन: विश्वास पैदा करने की जरूरत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि आज के टूटते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिखरते परिवारों ने दिव्य भावीपीढ़ी के निर्माण पर ही प्रश्नचिंह लगा दिये हैं। आवश्यक यह है कि पुरुषों द्वारा अपनी पत्नी को परमात्मा की बेटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मित्र-मानकर व्यवहार करने की आदत से जोड़ने की जो ऋषि परम्परा का तकाजा था। नारी के साथ अतिवादी यौनाचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनावश्यक प्रजनन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लड़की-लड़के में भेदभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सदस्यों के प्रति पक्षपात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसन्नता के लिए अनुचित उपहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तराधिकारियों के स्वावलम्बी होते हुए उन्हें पूर्वजों की सम्पत्ति से लादने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रमहीनता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्वजों का छोड़ा धन सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन में न लगाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आलस्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपव्यय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असहयोग जैसी न जाने कितनी विष बेलें परिवार जैसी दिव्य संस्था को खाये जा रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इनसे यदि उसे मुक्त रखा जा सका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो निश्चित ही परिवार नर-रत्नों का ऋषि उद्यान  बनकर पुन: खड़ा होगा। पतंजलि योगपीठ इस दिशा में भी संलग्र है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थतंत्र  की नीति भी बदलेगी</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज के अर्थ तंत्र में हर कोई एनकेन प्रकारेण धनी बनने के लिए उद्धत है।  हर किसी की आवश्यकतायें बढ़ी-चढ़ी दूसरी ओर अमीरी में जी रहे लोग अपनी सामाजिकता की संपूर्ण जिम्मेदारी ही भूल चुके हैं। संभवत: मनुष्य भूल चुका है कि संचय और अपव्यय जीवन की सबसे बड़ी भूल है। परिणामत: इसके लिए अनीति पूर्वक उपार्जन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपराध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रिश्वत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेईमानी का रास्ता ही तलाशना पड़ता है। अर्थ-संतुलन बिठाने के लिए जरूरत है औसत नागरिक स्तर का निर्वाह</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">सादा जीवन उच्च विचार</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का दृष्टिकोण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिजूलखर्ची और अपव्यय में कटौती जैसे दूरदर्शितापूर्ण सिद्धांत अपनाने की। क्योंकि परिश्रम और ईमानदारी की कमाई ही फलती-फूलती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सामर्थ्य भर कमाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आवश्यकता भर खर्च करने की सुसन्तुलित नीति को  ही आध्यात्मवादी निर्धारण कहते हैं। वास्तव में देखें तो अधिक खर्च होता है अपव्यय में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदर्शन में और व्यसन में। ये तीन कुचक्रों से भी पतंजलि योगपीठ का योग आंदोलन जन-मानस को बाहर निकालने के लिए संकल्पित है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य स्वामी जी का कहना है कि नेक रास्ते से अधिकतम संसाधनों को जुटाना अच्छी बात है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर सब कुछ अपने ऊपर ही खर्च कर डालना कहां का न्याय है। निर्वाह में औचित्य की मर्यादाओं की स्थापना द्वारा बचत तथा उस बचत को सत्प्रवृत्ति संवर्धन में लगाया जा सके तो </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">दरिद्रता का युग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">समाप्त हो सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा-आजीविका का बंधन टूटेगा</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज के युग में शिक्षा और आजीविका का गठजोड़ ऐसा है कि हर कोई श्रम कम से कम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आजीविका अधिक से अधिक की चाहत रखता है। शिक्षा का लक्ष्य मात्र नौकरी रही तो आगे संकट और भी अधिक बढ़ेगा। आवश्यक है कि जीवनोपयोगी प्रारम्भिक शिक्षा के बाद हर अभिभावक अपने बच्चों का आजीविका लक्ष्य निश्चित करे। नई पीढ़ी सहकारी उद्योग के सहारे उत्पादन तन्त्र खड़े करे और उनमें कठोर श्रम करने की बात मस्तिष्क में बिठाये। जिसमें असंतोष उत्पन्न करने वाली इस शिक्षा पद्धति को बदलकर जीवनोपयोगी ज्ञान के अतिरिक्तआजीविका उपार्जन का भी पथ-प्रशस्त हो। आचार्यकुलम योजना इस दिशा में सार्थक कदम कहा जा सकता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक क्षेत्र में वसुधैव कुटुम्बकम्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मवत् सर्वभूतेषु की दृष्टि बैठाई जाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कौटुम्बिकता के शाश्वत सिद्धांतों का समावेश करके जाति-लिंग व अमीरी-गरीबी भरी विषमता से मुक्ति दिलायी जानी जरूरी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब न कोई उद्धत-अहंकारी होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न किसी को पिछड़ेपन की पीड़ा भर्त्सना सहन करनी पड़ेगी। अपनी रोटी मिल-बाँटकर खाने और हिल-मिल कर रहने में ही सबकी सुख-शान्ति संभव है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वायु प्रदूषण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आणविक  विकिरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जल प्रदूषण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा स्रोतों का अत्यधिक दोहन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विलास के साधनों का अमर्यादित उपयोग प्रलयंकर शस्त्रास्त्रों का निर्माण और उनकी अधिसंख्य देशों में बढ़ती प्रतिस्पर्धा जैसे संकट भरे कदम को रोकना और वहां </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">उत्कृष्ट आदर्शवादिता</span>’, '<span lang="hi" xml:lang="hi">आदर्शों के प्रति आस्था</span>’, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदार सहकारिता जैसी सत्प्रवृत्ति जगाना एक बड़ी चुनौती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यद्यपि असली </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिकता</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की परख इसी में होगी। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार विज्ञान पदार्थ जगत से आगे बढे और मानवी चिंतन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चरित्र और लोक परम्पराओं को सृजनात्मक बनायें। धर्मतंत्र में व्याप्त अनावश्यक अन्ध परम्परायें व मूढ़-मान्यतायें बाहर निकाली जायें। मान्यता यह भी बिठानी होगी कि पदार्थ भी चैतन्यता से युक्तहै। विश्व व्यवस्था में एक अदृश्य चेतन शक्तिकाम करती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अनन्त काल पूर्व से संसार में समय-समय पर महापुरुष जन्मते रहे और वे धरती का नये शिरे से सृजन करते आये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईशा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जरथुस्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेजिनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुभाष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महर्षि दयानन्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गाँधी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लिंकन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कन्फ्यूशियस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अरस्तू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विवेकानन्द जैसे महान व्यक्तित्व इसी श्रेणी के हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि इन्हें इतिहास से निकाल दिया जाय तो दुनियां अनाथ-असहाय दिखने लगेगी। आज के समय धारा को मोड़ने में जुटी पतंजलि योगपीठ नवयुग की प्रेरणा स्थली बन भी इसलिए रही है कि उसे श्रेष्ठ महामानव की तप-चेतना के स्रोत का सौभाग्य मिला। जनमानस के जीवन व भाग्य बदलने का यही समय है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसीलिए जुड़ें सौभाग्य सराहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि ऐसा स्वर्णिम अवसर या तो अभी आया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब चूके तो जीवन में दिव्य अवसर कब आए कहा नही जा सकता। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 01 Jan 2015 21:44:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>युगीन आंदोलन को समझने के लिए चाहिए दिव्य दृष्टि</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">        गी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ता परमात्मा की वाणी है। संसार परमात्मा की अनुशासन व्यवस्था। जब तक लोक मानस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र परमात्मा के अनुशासन में जीता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गीता भी प्रवाहित रहती है। अनुशासन टूटते ही प्रवाह अवरुद्ध होता है। तब </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">गीता</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">चीत्कार करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गीता की उस चीत्कार को जो सुन समझ और अनुभव कर लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही युग सृजेता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युग पुरुष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रांति पुरुष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महामानव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगेश्वर आदि के रूप में प्रतिष्ठित होता है। घोर अंधकार के युग में परमात्मा की उस अविरल शाश्वत वाणी को आत्मसात करने में समर्थ भी वही होता है</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2953/divine-vision-is-needed-to-understand-the-yugi-movement"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-05/49.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    गी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ता परमात्मा की वाणी है। संसार परमात्मा की अनुशासन व्यवस्था। जब तक लोक मानस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र परमात्मा के अनुशासन में जीता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गीता भी प्रवाहित रहती है। अनुशासन टूटते ही प्रवाह अवरुद्ध होता है। तब </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">गीता</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">चीत्कार करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गीता की उस चीत्कार को जो सुन समझ और अनुभव कर लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही युग सृजेता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युग पुरुष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रांति पुरुष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महामानव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगेश्वर आदि के रूप में प्रतिष्ठित होता है। घोर अंधकार के युग में परमात्मा की उस अविरल शाश्वत वाणी को आत्मसात करने में समर्थ भी वही होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो परम अनुशासित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियोजन एवं सृजन में जिसकी गति हो। महाभारत काल में योगेश्वर कृष्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्रता आन्दोलन काल में लोकमान्य तिलक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गांधी आदि इसी स्तर के युगदूत थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने गीता की प्रेरणा को युगीन पृष्ठभूमि में आत्मसात किया और नवनिर्माण हुआ। इसीलिए श्रीमद्भगवद्गीता सदा से युग ग्रंथ रहा है। पतंजलि के योगसूत्र की तरह ही चिर शाश्वत </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">युगीन धर्म निर्वाह की प्रेरणा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इसकी प्रतिबद्धता। गीता की उसी आवाज को आज युगऋषि परम पूज्य स्वामी रामदेवजी महाराज आत्मसात करके युगधर्म निर्वाह कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो प्रस्तुत हैं:-              ...सम्पादक</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मदनुग्रहाय परमं गुह्य</span>ï<span lang="hi" xml:lang="hi">मध्यात्मसञ्ज्ञितम्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">यत्त्वयोक्तंवचस्तेन मोहोयं विगतो मम।। १।। </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">त्वत्त: कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्</span>ï<span lang="hi" xml:lang="hi">।। २।। </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महाभारत जैसे युगीन आंदोलन का सहयात्री था अर्जुन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संपूर्ण दारोमदार उसी पर था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन वह भी योगेश्वर के संकल्प मूल्य को नहीं आँक रहा था। इसके लिए स्वयं योगेश्वर को हजारों पहल करनी पड़ीं। तब वह कहने लायक हुआ कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">हे कृष्ण मुझ पर अनुग्रह करने के लिए तुमने अध्यात्मसंज्ञक जो परम गुप्त रहस्यरूप वचन बोलें हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे सुनकर मेरा यह सारा मोह जाता रहा।</span>’</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हे कमलपत्राक्ष (हे कमल के पत्र के समान बड़ी आँखों वाले) मैंने सम्पूर्ण चराचर (भूतों) की उत्पत्ति और उनका अन्त (लय) तथा तुम्हारा अक्षय (कभी नष्ट</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">न होने वाला) माहात्म्य भी विस्तारसहित तुमसे सुन लिया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(224,62,45);" xml:lang="hi">एवमेतद्यथात्थ  त्वमात्मानं  परमेश्वर।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(224,62,45);" xml:lang="hi">द्रष्टुमिच्छामि  ते  रूपमैश्वरं  पुरुषोत्तम।। ३।। </span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(224,62,45);" xml:lang="hi">मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(224,62,45);" xml:lang="hi">योगेश्वर  ततो  मे  त्वं  दर्शयात्मानमव्ययम्।। ४।। </span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब हे परमेश्वर! तुम अपने स्वरूप का जिस विस्तार के साथ जैसा वर्णन कर रहे हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हे पुरुषोत्तम! मैं तुम्हारे उस प्रकार के ईश्वरीय स्वरूप का प्रत्यक्ष दर्शन करना चाहता हूँ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हे प्रभो! यदि तुम समझते हो कि उस प्रकार का रूप मैं देख सकता हूँ अर्थात्</span>ï <span lang="hi" xml:lang="hi">उस स्वरूप को देखने के लिये मैं योग्य हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हे योगेश्वर! तुम अपने अव्यय स्वरूप का दर्शन मुझे कराओ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तब योगेश्वर द्वारा योगबल से अनेक रूपों के ज्ञान का अर्जुन को बोध कराया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्जुन ने उसे अध्यात्म कहा है और वह फिर अव्यक्त से व्यक्तभूतों की उत्पत्ति और विभूति- वर्णन सुनकर उस परमात्म सत्ता का प्रत्यक्ष प्रमाण प्राप्त करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब जाकर योगेश्वर और उसके आंदोलन पर विश्वास बढ़ता है और उस दिशा में कदम बढ़ाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>-<span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीभगवानुवाच-</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(224,62,45);" xml:lang="hi">पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोथ सहस्रश:।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(224,62,45);" xml:lang="hi">नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च।। ५।। </span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(224,62,45);" xml:lang="hi">पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ   मरुतस्तथा।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span style="color:rgb(224,62,45);"><span lang="hi" xml:lang="hi">बहून्यदृष्ट</span>ï<span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्वाणि पश्याश्चर्याणि  भारत।। ६।। </span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्री कृष्ण ने कहा:-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> हे पार्थ! मेरे अनेक प्रकार के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनेक रंगों के और अनेक आकारों के इन सैंकड़ों हजारों दिव्य-स्वरूपों को देखो।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ये देखो बारह आदित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आठ वसु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्यारह रुद्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अश्विनीकुमार (देवों के वैद्य जो युगल भ्राता थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनका नाम था- नासत्य और दस्र) और उनन्चास मरुद्गण। हे भारत! ये अनेक आश्चर्य भी देखो जो कभी पहले न देखे होंगे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्</span>ï<span lang="hi" xml:lang="hi">द्रष्टुमिच्छसि।। ७।। </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्यं ददामि ते चक्षु: पश्य मे योगमैश्वरम्।। ८।। </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हे गुडाकेश! आज एक ही जगह पर सब चराचर जगत् को मेरे इस विश्व रूप में देख लो और भी जो कुछ तुझे देखने की लालसा हो वह भी तू मेरी इस देह में देख ले।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु तू अपने इस मानवीय चक्षु से मेरे इस उपर्युक्त स्वरूप को नहीं देख सकता। अत: मैं तुझे  दिव्य दृष्टि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">देता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे मेरे इस ईश्वरीय योग अर्थात्</span>ï <span lang="hi" xml:lang="hi">योग-सामर्थ्य को देख और इस युग आंदोलन का कर्ता बन।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य स्वामी जी एवं श्रद्धेय आचार्यश्री के संकल्प से उपजे इस आंदोलन का दिव्य दर्शन किये बिना इस आंदोलन से जुड़े असंख्य अर्जुनों को लक्ष्य तो दिखता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे वे भेद भी रहे हैं पर बोध तो तभी होगा जब दिव्य दृष्टि प्राप्त होगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>सनातन वैभव</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 01 Jan 2015 21:42:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ग्राम आदर्श बनेंगे तभी, जब उनकी अस्वस्थता दूर होगी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. महेश कुमार मुछाल</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2954/villages-will-become-ideal-only-when-their-ill-health-goes-away"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-05/vill.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  <strong> प्राचीनकाल</strong></span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> से ही शास्त्रों एवं उपनिषदों में योग प्राणायाम आसन आदि की महत्ता को स्वीकार किया गया है। इनके विश्लेषण के उपरान्त यह विदित होता है कि प्राचीनकाल में चिकित्सा पद्धति का एक मुख्य अवयव योग विद्या थी। योग जीवनशैली का अंग था। आज की अपेक्षा तब रोगियों की प्रतिशत रूप में संख्या नगण्य थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि आज के समान प्रतिरोधक क्षमता वाली एंटीबायोटिक दवाएँ भी विकसित नहीं थीं। अधिकांश लोग स्वस्थ थे। पर स्वस्थ वातावरण के लिए शारीरिक श्रम और पौष्टिक आहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगाभ्यास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम आदि उपलब्ध थे। जबकि आज के समय में न तो शुद्ध वातावरण है और न ही शारीरिक श्रम तथा पौष्टिक आहार। योग के लिए मनोभूमि तो अब बनना प्रारम्भ हुई है। पर योग आदि क्रियायें जिनकी जीवन-शैली का हिस्सा बना हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे इस युग में भी स्वयं को अपेक्षाकृत अधिक स्वस्थ एवं ऊर्जावान महसूस करते हैं।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वि</span><span lang="hi" xml:lang="hi">गत अंक के लेख में हम देख चुके हैं कि भारत की स्वास्थ्य संबंधी स्थिति कितनी भयावह है। विशेष करके ग्रामीण स्वास्थ्य की। हमें अपनी पहचान बनाने के लिए तथा सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय व आध्यात्मिक विकास के लिए आवश्यक है कि हम समय के साथ चलते हुए योग व प्राणायाम को जीवनशैली का एक अभिन्न अंग बना लें। इससे राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन अर्थात् सम्पूर्ण स्वास्थ्य को प्राप्त करने की दिशा हमें सहायता मिल सकेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा पतंजलि योगपीठ सहित अनेक शोध निष्कर्षों से स्पष्ट हुआ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रस्तुत तालिका में विभिन्न बीमारियों से ग्रसित सभी प्रकार के रोगियों को सात दिन तक </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग व प्राणायाम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कराने के पश्चात विभिन्न बीमारियों पर इसका सार्थक प्रभाव पाया गया। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के उन्हीं शोध निष्कर्षों को यहाँ प्रस्तुत किया गया है –</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-05/table1.jpg" alt="table1"></img><span style="font-family:Poppins, sans;font-size:1.25rem;text-align:justify;"> </span></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उपरोक्तसारणी का विश्लेषणात्मक अध्ययन करने पर यह पता चलता है कि जिस आवासीय योग शिविर में टी</span>0<span lang="hi" xml:lang="hi">बी</span>0<span lang="hi" xml:lang="hi"> के </span>230<span lang="hi" xml:lang="hi"> रोगियों को उपचार के रूप में योग-प्राणायाम सात दिनों तक कराया गया। उनका पुन: परीक्षण करने पर </span>65<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत रोगियों में सार्थक एवं प्रत्याशित लाभ पाये गये। अस्थमा के </span>235<span lang="hi" xml:lang="hi"> रोगियों को योग-प्राणायाम कराने पर </span>60.43<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत लाभ स्पष्ट परिलक्षित हुए जो परीक्षण में भी पाये गये। रक्तचाप के </span>338<span lang="hi" xml:lang="hi"> रोगियों को योग-प्राणायाम कराने के उपरान्त </span>82.25<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत लोग लाभान्वित हुए। इसी प्रकार मधुमेह के </span>779<span lang="hi" xml:lang="hi"> रोगियों को योग-प्राणायाम कराया गया और </span>53.79<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत रोगी लाभान्वित हुए। हीमोग्लोबिन की कमी वाले </span>25<span lang="hi" xml:lang="hi"> रोगियों में </span>24<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत रोगियों को लाभ मिला। हिपैटाइटिस (यकृत रोग) से पीड़ित </span>874<span lang="hi" xml:lang="hi"> रोगियों को उक्तउपचार कराया गया और परीक्षण के उपरान्त </span>67.73<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत रोगियों को लाभ मिला। इसी प्रकार अन्य रोगों के परिणाम आये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उपरोक्तसभी योग-प्राणायाम अभ्यास आवासीय योग शिविर में मात्र सात दिनों तक के लिए पतंजलि योग पीठ की ओर से आयोजित किए गए थे। परीक्षणोपरान्त जो परिणाम प्राप्त हुए वे नि:सन्देह समूची मानव जाति के लिए कल्याणकारी सिद्ध हो सकते हैं। यदि रोगोपचार की दृष्टि से उपयोगी प्राणायाम का अभ्यास नियमित जीवनशैली के अंग स्वरूप किया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अधिकांश रोगों में कुछ ही दिनों के अभ्यास से मुक्तिपाई जा सकती है। यदि इनके साथ पूज्य स्वामी जी द्वारा बताये आसनों का भी प्रयोग जारी रखा जाए तो ग्रामीणों के स्वास्थ्य संवर्धन के लिए सोने में सुहागा जैसा होगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम के संदर्भ में यह तथ्य भी उभरकर आये कि इसका हमारे मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव होता है। अधिकांश व्याधियाँ मस्तिष्क के कारण उत्पन्न होती है। प्राणायाम के अभ्यास से तंत्रिका तंत्र पर नियंत्रण सीखकर हम सभी तंत्रों पर अपना नियन्त्रण कर सकते हैं। जिसमें मस्तिष्कीय तरंग तंत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हार्मोन्स स्राव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चयापचय क्रियाएं आदि प्रमुख हैं। यह निष्कर्ष निकाला गया कि इन प्रयोगों से यदि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों को जोड़ा जा सके तो ऐसे स्वस्थ्य व्यक्ति खड़े होने लगेंगे जो आदर्श ग्राम योजना को दिव्य आयाम दे सकते हैं। पतंजलि के पास वह दिव्य अस्त्र अब तैयार है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ग्रामीण जनों के लिए अनुसंधित प्राणायाम:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(226,12,109);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भस्त्रिका प्राणायाम:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि:-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> किसी भी ध्यानात्मक आसन में सुखासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्धासन में सुविधापूर्वक बैठकर दोनों नासिकाओं से श्वास को फेफड़ों में भरना तथा छोड़ना भस्त्रिका प्राणायाम कहलाता है। इस प्राणायाम को मध्यम गति से सामर्थ्यानुसार कर सकते हैं। इस प्राणायाम में श्वास को गहरा भरना एवं छोड़ना होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समय:-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> इस प्राणायाम को </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिनट तक करना चाहिए। दो-ढ़ाई सेकण्ड श्वास लेने में तथा दो-ढ़ाई सेकण्ड श्वास छोड़ने में लगना चाहिए। इस प्रकार करीब एक मिनट में बारह बार हो जाता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सावधानियाँ:-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> श्वास पेट में न भरें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च रक्तचाप तथा हृदय रोगी तीव्र गति से यह प्राणायाम न करें। प्राणायाम के समय आँखें बंद रखें व ओम का मानसिक जाप करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लाभ:-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> इससे फेफड़े सबल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जुकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एलर्जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुराना नजला एवं समस्त कफ रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थायराइड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टान्सिल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तपरिशुद्ध होता है मानसिक तनाव को दूर करने के लिए एवं सक्रियता को बढ़ाने हेतु तथा समस्त विजातीय पदार्थों के निष्कासन में बहुत उपयोगी है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(226,12,109);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कपालभाति प्राणायाम:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि:-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> कपालभाति प्राणायाम की विधि भस्त्रिका से भिन्न है। भस्त्रिका प्राणायाम में पूरक श्वास लेना तथा रेचक श्वास छोड़ने पर बल दिया जाता है जबकि कपालभाति में केवल श्वास छोड़ने पर। पेट अंदर जाना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास लेना नहीं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आवश्यकतानुसार श्वास स्वत: चला जाता है। इस प्राणायाम को भी मध्यम गति से कर सकते हैं। प्राणायाम करते समय मन में विचार करें कि शरीर के समस्त रोग मिट रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास छोड़ने से सारे दोष-विकार नष्ट हो रहे हैं- इस भावना का विचार करें। इस प्राणायाम को </span>15<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिनट तक किया जा सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>सावधानियाँ:- </strong>हृदय व उच्च रक्तचाप के रोगी तीव्र गति से यह क्रिया न करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>लाभ:</strong>- इस प्राणायाम से मुख तेज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आभा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सौन्दर्य बढ़ता है। समस्त कफ रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दमा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एलर्जी मोटापा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गैस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कब्ज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लीवर से सम्बन्धित हिपेटाइटिस-बी एवं पेट के समस्त रोगों का नाश होता है। इस प्राणायाम से </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> माह में </span>4<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>8<span lang="hi" xml:lang="hi"> किलो वजन कम कर सकते हैं एवं इस प्राणायाम का एड्रीनन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थायराइड ग्रन्थि एवं पेन्क्रियाज पर अच्छा प्रभाव होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(226,12,109);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बाह्य प्राणायाम:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि:-</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> इस प्राणायाम के द्वारा मणिपुर व मूलाधार चक्र की शक्तियों का उर्ध्व गमन होता है। श्वास लेकर श्वास को बाहर छोड़ते हुए त्रिबंध लगाए जाते हैं। मूलबंध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उड्डीयान बंध एवं जालंधर बंध इस प्रक्रिया में मूल बंध हेतु नाभि के नीचे वाले भाग को ऊपर खींचते हैं। इस प्राणायाम में त्रिबंध लगते हैं। प्राणायाम की तीन आवृत्ति करते हैं। यह </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> व </span>11<span lang="hi" xml:lang="hi"> बार भी किया जा सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सावधानियाँ:-</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong> </strong>हृदय रेागी एवं हाई ब्लड प्रेशर रोगी इस प्राणायाम को न करें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>लाभ:-</strong> जालंधर बंध से थायराइड रोग से मुक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उड्डीयन बंध से पेट संबंधी रोग एवं हर्निया में आराम तथा मूलबंध से कुंडलिनी जागरण होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(226,12,109);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अनुलोम-विलोम प्राणायाम:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:-</strong> दाहिने हाथ के अंगूठे से दाहिने नासिका छिद्र को बंद कर बायीं नासिका छिद्र से गहरा श्वास लेते हैं। बांये को बंद कर दाहिनी से छोड़ते हैं। दाहिनी नासा छिद्र से ही पुन: श्वास लेते हुए बायें से छोड़ते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुन: लेते हैं। बायें से लेना दायें से छोड़ना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुन: दांये से ही लेना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार इस प्राणायाम को </span>15<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिनट तक किया जा सकता है एवं असाध्य रोगों में </span>30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिनट तक कर सकते हैं। शुरु में कम समय एवं मध्यम गति से अभ्यास करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>सावधानियाँ:-</strong> हृदय एवं उच्च रक्तचाप रोगी तीव्र गति से न करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>लाभ:- </strong>हृदय के अवरोध पूरी तरह खुल जाते हैं। उच्च रक्तचाप में लाभ होता है। रक्त का संपूर्ण शरीर में प्रवाह होता है। लकवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माइग्रेन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिप्रेशन आदि रोग से मुक्ति तथा कुंडलिनी जागरण में भी यह सहायक है। नाड़ी शुद्धीकरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्नायु दुर्बलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्ताल्पता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केंसर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिर्गी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिसेबिलीटी (समस्त कमजोरी)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जोड़ों के दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गठिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नेत्र ज्योति एवं टान्सिल आदि में विशेष लाभ होता है। इससे अंत:स्रावी ग्रंथियों के कारण उत्पन्न हार्मोन्स की अनियमितता भी दूर होती है। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है। साथ ही विचार पवित्र होते हैं। विचारों के साथ-साथ आहार एवं व्यवहार भी पवित्र होता है। मानसिक कारणों से उत्पन्न तनाव को दूर करने में यह प्राणायाम उपयोगी है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(226,12,109);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रामरी प्राणायाम:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:-</strong> तर्जनी अंगुली को आज्ञा चक्र पर लगाते हैं। मध्यमा अंगुली से आंखें बंद एवं अंगूठे से कानों को बंद करके गहरा श्वास लेकर मुंह बंद करके ओम का उच्चारण करते हैं। इससे भ्रमर के समान ध्वनि होती है। इस प्राणायाम की तीन आवृत्ति कर सकते हैं। अधिक से अधिक </span>11<span lang="hi" xml:lang="hi"> एवं </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi"> बार भी कर सकते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>लाभ:-</strong> इस प्राणायाम से तनाव व अनिद्रा में लाभ होता है तथा उच्च रक्तचाप नियन्त्रित होता है। विद्यार्थियों की एकाग्रता शक्ति बढ़ती है एवं इस प्राणायाम से भावनात्मक तनाव दूर होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही विचार भी सकारात्मक हो जाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(226,12,109);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उद्गीथ प्राणायाम:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:- </strong>इस प्राणायाम में आंखें बंद करके गहरा श्वास लेकर ओम का उच्चारण किया जाता है। इसकी कम से कम तीन आवृत्ति करें। यह और अधिक बार भी किया जा सकता है। अंत में दोनों हाथों की हथेलियों को रगड़ते हुए गरम-गरम ऊष्मा का आंखों पर अंजन करते हुए आंखें खोल लेते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>लाभ:-</strong> इस प्राणायाम से मन की वृत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनिद्रा व डिप्रेशन से मुक्ति मिलती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नकारात्मक चिन्तन दूर होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचारों में पवित्रता आती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन की चंचलता दूर होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्न्त के व्यवधान मिटते हैं तथा अर्न्त से ही समाधान होता है। सभी प्राणायाम के बीच में आँखे बंद रख ओम का मानसिक चिंतन करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान करना यह भी प्राणायाम का ही एक प्रकार है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर को स्वस्थ रहने के लिए शरीर के विजातीय पदार्थों का सुचारु रूप से निष्कासन आवश्यक है। निष्कासन हेतु फेफड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आंत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किडनी (वृक्क) एवं त्वचा आदि अंगों का स्वस्थ रहना आवश्यक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो प्राणायाम द्वारा ही सम्भव है। योग व प्राणायाम सहित प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धतियों को विज्ञान की कसौटी पर प्रमाणित कर पतंजलि योग पीठ हरिद्वार द्वारा संचालित पतंजलि योग समिति एवं भारत स्वाभिमान ने केवल ग्रामीण ही नहीं बल्कि शहरी क्षेत्र के रोगियों को भी स्वस्थ कराकर एक विकसित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गौरवशाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्धशाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग मुक्त एवं स्वावलम्बी भारत का निर्माण करने में सफल हो सकेंगे। अत: आदर्श ग्राम निर्माण का शुभारम्भ उनके स्वास्थ्य संवर्धन से ही संभव है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 01 Jan 2015 21:39:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अनुभूति आपकी</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मे</span><span lang="hi" xml:lang="hi">री उम्र 61 वर्ष है। मैं वर्ष 2004 में आपके शिविर के दौरान पतंजलि योगपीठ से जुड़ी और 2009 में आजीवन सदस्य बनी। यहाँ बिलासपुर में मैंने महिला योग समिति के साथ  योग कक्षाएं आरम्भ की। राजकिशोर नगर में मेरी कक्षा वर्ष 2009 से अनवरत चल रही है। मेरी बीमारी के दौरान दूसरी शिक्षिका उसे चला रही हैं। स्वामी जी के भारत स्वाभिमान आन्दोलन के समय रायपुर सभा में मुझे पुरुस्कृत भी किया गया। मुझे सियाटिका था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊपर से मैं </span>tail bone <span lang="hi" xml:lang="hi">पर गिर गई तो उसने अधिक भीषण रूप ले लिया। मैं उठ बैठ भी नहीं पा</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2955/anubhuti-apki"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-05/jtgfyjg1.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मे</span><span lang="hi" xml:lang="hi">री उम्र 61 वर्ष है। मैं वर्ष 2004 में आपके शिविर के दौरान पतंजलि योगपीठ से जुड़ी और 2009 में आजीवन सदस्य बनी। यहाँ बिलासपुर में मैंने महिला योग समिति के साथ  योग कक्षाएं आरम्भ की। राजकिशोर नगर में मेरी कक्षा वर्ष 2009 से अनवरत चल रही है। मेरी बीमारी के दौरान दूसरी शिक्षिका उसे चला रही हैं। स्वामी जी के भारत स्वाभिमान आन्दोलन के समय रायपुर सभा में मुझे पुरुस्कृत भी किया गया। मुझे सियाटिका था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊपर से मैं </span>tail bone <span lang="hi" xml:lang="hi">पर गिर गई तो उसने अधिक भीषण रूप ले लिया। मैं उठ बैठ भी नहीं पा रही थी। बिलासपुर में अस्थि विशेषज्ञ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यूरो सर्जन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पाईन सर्जन को दिखाया। उन्होंने </span>M.R.I. <span lang="hi" xml:lang="hi">करवा कर देखा और तुरन्त ऑप्रेशन बताया। मेरा और मेरे पतिदेव का आप दोनों में और योग में अटूट विश्वास होने के कारण मैंने ऑप्रेशन नहीं कराया। उन्होंने मुझे पतंजलि योगपीठ में वैद्य जी से परामर्श कर आपकी दवाईयां दिलाई। साथ ही मैंने बिस्तर में ही पड़े रहकर प्राणायाम करना प्रारम्भ किया और </span>Acupressure <span lang="hi" xml:lang="hi">भी किया। मैं ६ महीने तक इस प्रयोग के बाद चलने लायक हो गई। तब मुझे बहुत दु:ख होता था कि मैं पतंजलि की सेवा नहीं कर पा रही हूँ।  लेकिन स्वामी जी व आचार्यश्री मैं आपके योग और दवा से जल्दी ही पूर्ण स्वस्थ हो जाऊंगी। आपका आशीर्वाद मेरे साथ है। काफी आराम लग रहा है। ठीक होने के बाद योग कक्षाएं और बढ़ायेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा मन से संकल्प है। आपने योग-प्राणायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद को भारत व विश्वभर में शिखर पर पहुंचाया। मैं भी इस युगीन कार्य की भागीदार बन सकूँ। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी भाव से आपको शत्-शत् प्रणाम।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">भवदीया</span>,</h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">उमा गोयल</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">बी-290</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राज किशोर नगर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिलासपुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छ.ग.</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>दिव्य अनुभूति</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 01 Jan 2015 21:38:14 +0530</pubDate>
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