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                <title>मार्च - योग संदेश</title>
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                <description>मार्च RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...</title>
                                    <description><![CDATA[<h4 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्यात्माओं का आह्वान</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    ह</span><span lang="hi" xml:lang="hi">म सब मूलत: ईश्वर की दिव्य सन्तानें व ऋषि-ऋषिकाओं के वंशज व उन्हीं के बेटे-बेटियाँ हैं। हमारा यह जन्म व जीवन अपने इसी मूल स्वधर्म में जीने के लिए हुआ है। अत: भागवत धर्म व ऋषिधर्म में जीना अर्थात् हमारा ज्ञान व जीवन वाणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रवृत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तप व सेवा ऋषियों व वेद के पूर्णत: अनुकूल ही होना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अपने-अपने कुलवंश की रक्षा के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने-अपने खानदान व माता-पिता की प्रसन्नता व उनको गौरव दिलाने के लिए तो अधिकांश लोग जी ही रहे हैं। आखिर</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2997/shashwat-pragya-mar-2015"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-05/jtgfyjg1.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्यात्माओं का आह्वान</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  ह</span><span lang="hi" xml:lang="hi">म सब मूलत: ईश्वर की दिव्य सन्तानें व ऋषि-ऋषिकाओं के वंशज व उन्हीं के बेटे-बेटियाँ हैं। हमारा यह जन्म व जीवन अपने इसी मूल स्वधर्म में जीने के लिए हुआ है। अत: भागवत धर्म व ऋषिधर्म में जीना अर्थात् हमारा ज्ञान व जीवन वाणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रवृत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तप व सेवा ऋषियों व वेद के पूर्णत: अनुकूल ही होना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अपने-अपने कुलवंश की रक्षा के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने-अपने खानदान व माता-पिता की प्रसन्नता व उनको गौरव दिलाने के लिए तो अधिकांश लोग जी ही रहे हैं। आखिर भगवान् के लिए अपने मूलवंश-ब्रह्मवंश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने मूल माता-पिता परमात्मा व ऋषियों की प्रसन्नता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् व ऋषियों को गौरव दिलाने के लिए उनका प्रतिनिधि कौन बनेगा</span>?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्मान व वैषयिक सुख के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आंग्ल भाषा (अंग्रेजी भाषा) में बोलें तो पॉवर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रोस्परेटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राइज व प्लेजर (</span>Power, Prosperity, Prize and Pleasure<span lang="hi" xml:lang="hi">) के लिए तो करोड़ों लोग जी रहे हैं। क्षणिक सुख के प्रलोभन से ऊपर उठकर ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति व शान्ति के मूल स्रोत जहाँ भूमा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण आनन्द है ऐसे उस भगवान् के लिए जो पूरा जीवन अर्पित करना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनको यह सत्य समझ में आ गया है कि मेरा ये जीवन भगवान् के लिए है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये जीवन ऋषियों के लिए है</span>,</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसी दिव्यात्माओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुण्यात्मा युवक-युवतियों को हम आमन्त्रित करते हैं। वे सब पतंजलि योगपीठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार में आएं और स्वयं को भगवान् व ऋषि-ऋषिकाओं का प्रतिनिधि व प्रतिरूप बनाएं। रामनवमी को हम ऐसे भाई-बहनों की प्राथमिक परीक्षा लेकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी ऋषियों की ज्ञान परम्परा अर्थात् गुरुकुलीय परम्परा में शिक्षा-दीक्षा प्रारम्भ करेंगे। महर्षि गौतम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कणाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैमिनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाणिनि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि की तरह व महर्षि दयानन्द आदि प्राचीन व अर्वाचीन ऋषियों की तरह जो स्वयं को तैयार करना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे लगभग एक हजार भाई-बहनों को हम इस बार और आगामी कुछ वर्षों में लगभग </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> हजार प्रतिभावान् विद्यार्थियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युवक व युवतियों को गुरुकुलीय परम्परा में व्याकरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गीता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपनिषद आदि वेद-वेदाङ्गों की शिक्षा-दीक्षा देकर ऋषि-ऋषिकाओं के रूप में तैयार करेंगे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं दुनियाँ का सबसे बड़ा काम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य-व्यक्तित्व युक्त नेतृत्व तैयार करने को मानता हूँ और एक-एक व्यक्ति जब पूर्ण जागृत व पूर्ण समर्थ बनकर पूर्ण निष्ठा व पूर्ण विवेक के साथ पूर्ण पुरुषार्थ व अखण्ड पुरुषार्थ करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो विश्व रूपान्तरित हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे ही अपने पूर्वजों ने किया है और आज जो भी सात्विक परिवर्तन घटित हो रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके मूल में अलौकिक प्रतिभा युक्त व्यक्ति ही तो हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">छोटे-छोटे उद्देश्यों के लिए जीवन जीना ये जीवन का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् की दी हुई दिव्य-शक्तियों का व ईश्वर प्रदत्त दिव्य ज्ञान व अपरिमित सामर्थ्य का तिरस्कार है। मुझे पूरा विश्वास है कि श्रेष्ठ कुलीन कुलों की श्रेष्ठ दिव्य सन्तानें इस कार्य हेतु हमें अवश्य मिलेंगी और इस पूरे विश्व को हम फिर से ऋषियों व वेद के मार्ग पर चलायेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही है भारत को विश्व का जगद्गुरु या विश्वगुरु बनाने का मार्ग। यही है वेद का सन्देश- </span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रं वर्धन्तोऽप्तुर: कृणवन्तो विश्वमार्यम्। अपघ्नन्तो अराव्ण:।। (ऋग्वेद) </span></strong></span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शाश्वत प्रज्ञा</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>मार्च</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2015 21:59:54 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>महान बनाने वाले 'सात गुण’</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2998/mahan-banane-wale-saat-gun"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/54.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   वै</span><span lang="hi" xml:lang="hi">से तो हर व्यक्ति ग्रेट (महान्) बनना चाहता है। ग्रेट</span>, (<span lang="hi" xml:lang="hi">महान्)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आदर्श</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आइकॉन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोलमाडल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आइडियल या महानायक बनने के लिए यूं तो सभी को सामर्थ्य भी मिली है। क्योंकि ईश्वर या परमात्मा ने बिना किसी भेदभाव के सबको ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति एवं सामर्थ्य समान रूप से प्रदान किया है। हर व्यक्ति में विश्व के किसी भी क्षेत्र का प्रथम व्यक्ति होने की शक्ति निहित है। जब हम ये बातें सुनते हैं तो एक बात सबके मन में आती ही होगी कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">जब सबमें प्रथम होने की शक्ति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो सब प्रथम क्यों नहीं बन पाते</span>?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस सन्दर्भ में पूरे विश्व का खुली आँखों से दर्शन व मूल्यांकन करके हम एक बहुत बड़े निर्विवादित निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ लोग तो जन्म से ही महान् पैदा होते हैं तथा कुछ कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेहनत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ या तप से महान् हो सकते हैं। क्योंकि हमारा यह वर्तमान जीवन प्रथम या अन्तिम नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनादिकाल से जीवन का शाश्वत प्रवाह चलता आ रहा है तथा अनन्त काल तक जीवन का यही प्रवाह चलेगा। यह आत्मा अनादि व अनन्त का नित्य यात्री है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जन्म से महान् होना प्रारब्ध है तथा कर्म से महान् बनना पुरुषार्थ है। इस विषय में एक बात बहुत महत्वपूर्ण है और वह यह कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ऊँचे श्रेष्ठ प्रारब्ध वाली आत्माओं को महान् बनाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनको दिव्यता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देवत्व या ऋषित्व में दीक्षित करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य-व्यक्तित्व युक्त महान् नेतृत्व देने वाले व्यक्तियों के रूप में उन्हें विकसित करना अपेक्षाकृत सरल है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि सामान्य प्रारब्ध वाली आत्माओं को महान् बनाना असंभव तो नहीं लेकिन दुष्कर अवश्य है।</span>‘ <span lang="hi" xml:lang="hi">यह बात भी तथ्य पूर्ण है कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">यदि मुनष्य के रूप में पैदा हुए समस्त जीवों का सामान्य प्रारब्ध नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो मनुष्य का जन्म ही नहीं मिलता। विशेष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रेष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊँचे या दिव्य प्रारब्ध वाली आत्माओं में यूँ तो बहुत से अतिरिक्त गुण होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन निष्कर्ष के रूप में श्रेष्ठ प्रारब्ध वाली आत्माएं जो अनादिकाल से पुण्य कर्म कर रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनमें जन्म से स्वभाव में ही सात विशेष गुण प्रचुर मात्रा में होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शेष आत्माओं में ये गुण सामान्य रूप से होते हैं। जन्म से ही धृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्मृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिभा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पराक्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृतज्ञता व सत्य निष्ठा इन सात गुणों का अत्यधिक मात्रा में होना श्रेष्ठ प्रारब्ध के कारण ही होता है और यही ईश्वर की कर्मफल व्यवस्था का सबसे बड़ा प्रमाण भी है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हम सभी को महान् देखना चाहते हैं और हम कह भी चुके हैं कि पुरुषार्थ करके कोई भी व्यक्ति इन सात गुणों को बढ़ाकर पूर्ण धृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रखर स्मृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य प्रतिभा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण पुरुषार्थ व पूरे पराक्रम द्वारा पूरे अस्तित्व के प्रति पूर्ण कृतज्ञता का भाव रखते हुए तथा पूर्ण सत्यनिष्ठ होकर जीने से महान् ऋषि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुनि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महापुरुष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युग पुरुष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युगपुरोधा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महानायक नहीं भी बन पाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो श्रेष्ठ पुरुष व </span>100' <span lang="hi" xml:lang="hi">एक अच्छा इंसान तो बन ही सकता है। सात गुणों से युक्त जो श्रेष्ठ प्रारब्ध वाली आत्माएं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका पूरा पुरुषार्थ जगाया जाए तो निश्चित रूप से ये महान् ऋषि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महामानव या महानायक बन सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हम इन सात गुणों से सम्पन्न श्रेष्ठ प्रारब्ध वाली आत्माओं का पूरे देश भर से चयन करना चाहते हैं। पाँच वर्ष से लेकर </span>25<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ष तक की आयु वर्ग के बच्चों व युवक-युवतियों को हम पतंजलि योगपीठ हरिद्वार में आमन्त्रित करना चाहते हैं। उन पर विशेष कार्य करना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें ऋषि-ऋषिकाओं के रूप में तैयार करके सर्व प्रथम भारत को ऋषियों का देश बनाना चाहते हैं। यहाँ राम व कृष्ण जैसा सबका चरित्र हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महापुरुषों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महान् आत्माओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि-ऋषिकाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वीर-वीराङ्गनाओं जैसा सबका जीवन हो तथा पूरे विश्व के लोगों का जीवन सुखी व समृद्ध हो। वे भी भीतर व बाहर से पूरी तरह विकसित हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषियों व वेद के मार्ग पर पूरा विश्व चले इसके लिए हम हजारों भाई-बहनों को इस कार्य हेतु तैयार करना चाहते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमें पूरा विश्वास है इन सात गुणों से सम्पन्न श्रेष्ठ आत्माएं हमारे पास अवश्य आयेंगी और पूरे विश्व के मंगल के लिए अपने जीवन की आहुतियाँ अवश्य अर्पित करेंगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन सात गुणों के सन्दर्भ में एक विशेष बात हमें यह कहनी है कि यद्यपि सामान्य रूप से तो सात गुण सभी में होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु ये गुण अत्यधिक मात्रा में स्वभाव में हों अर्थात् किसी भी काल में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धार्मिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक व राजनैतिक परिस्थितियों में धैर्य एक क्षण के लिए भी मन: स्थिति में अधैर्य न आए अपितु अत्यंत धैर्य युक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी सन्दर्भ में कुछ भी तुरन्त याद हो जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर विस्मृत न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक सन्दर्भ में बात कही जाए तो सैंकड़ों तरह से उसका विश्लेषण-मूल्यांकन करके सही निष्कर्ष पर सबसे पहले पहुँच सके और उसको सबसे पहले क्रियान्वित कर दे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी तरह जन्म से पुरुषार्थ करने की आदत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वभाव या अभ्यास हो। किसी की प्रेरणा के बिना ही या सामान्य प्रेरणा से अत्यन्त पुरुषार्थी हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक बार कहने के बाद किसी भी दिशा में पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेहनत या हार्डवर्क करने के लिए जिनको दोबारा या बार-बार न कहना पड़े। जन्म से ही बड़े कार्य करने के लिए रिस्क उठाने के लिए जो तैयार हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि वैयक्तिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारिवारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक या राजनैतिक जीवन में बिना बड़े रिस्क या जोखिम उठाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस असंभावना भरे भविष्य में कुछ भी बड़ा परिणाम घटित नहीं होता है। इस बड़े कार्य को करने के परिणाम की परवाह या चिन्ता किए बिना अपने स्वधर्म के लिए अपना सर्वस्व सदैव दांव पर लगाने में जिनका बचपन या जन्म से स्वभाव या अभ्यास है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही पराक्रम है। बिना किसी की प्रेरणा के स्वभाव से ही जो अत्यन्त निष्ठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भक्ति वाले होते हैं तथा माता-पिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुजनों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वजनों के साथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य व मनुष्येतर समस्त जीव जगत् या सम्पूर्ण अस्तित्व के प्रति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् के सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के प्रति जिनके हृदय में अत्यन्त कृतज्ञता का यह भाव है कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">यह सम्पूर्ण अस्तित्व मेरे लिए कार्य कर रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो मेरा अस्तित्व भी सबके लिए ही है। यह विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संकल्प या भाव जिनमें स्वभाविक रूप से है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह विशेष गुण की श्रेणी में आयेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेरणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपदेश या सत्संग आदि के माध्यम से तो सभी में विद्यमान ये भाव कुछ समय के लिए आ ही जाते हैं। इसी प्रकार जन्म से या बचपन से ही जो बच्चे झूठ नहीं बोलते अर्थात् जैसा देखते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोचते व जानते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसा ही बोलते हैं। भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रलोभन या अहंकार आदि के कारण जो विचलित नहीं होते और सत्य ही बोलते हैं तथा केवल सत्य के ही मार्ग पर चलते हैं। जो लाभ-हानि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मान-अपमान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुख-दु:ख यहाँ तक कि जीवन व मृत्यु का भी विचार किए बिना सत्य को केन्द्र में रखकर जीते हैं। यह गुण जिनमें स्वभाविक रूप से अखण्ड होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे ही ऊँचे प्रारब्ध वाली आत्माएं हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हम इन सात गुणों से सम्पन्न दिव्य आत्माओं का आह्वान करते हैं कि वे तुरन्त पतंजलि योगपीठ में सम्पर्क (फोन-०१३३४-२४०००८</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">२४४१०७</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">२४६७३७)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ई-मेल (</span>divyayoga@rediffmail.com<span lang="hi" xml:lang="hi">) करके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सीधे हरिद्वार आकर वर्तमान शताब्दी के इस सबसे बड़े ईश्वरीय कार्य से अवश्य जुड़ें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>मार्च</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2015 21:58:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बाजीकरण, गर्भनिरोधक तथा रसायन योग से भरपूर  पलाश</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;"><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य </span><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">बालकृष्ण</span></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2999/palash-full-of-vajikaran--contraceptive-and-rasayan-yoga"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/34.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक नाम : </span>Butea monosperma (Lam.) Taub.<span lang="hi" xml:lang="hi">। कुलनाम : </span>Fabaceae <span lang="hi" xml:lang="hi">अंग्रेजी नाम:</span> The Forest Flame<span lang="hi" xml:lang="hi">।  </span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृत :  पलाश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किंशुक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तपुष्पक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षारश्रेष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाततोय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मवृक्ष</span>;  <span lang="hi" xml:lang="hi">।  हिन्दी : ढाक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पलाश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टेसु  । उर्दू :  पलाश पापरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुजराती :  खाखड़ा। तमिल : पलासु  । तेलुगु :  मोडूगा  ।  बंगाली : पलाश गाछ  ।   नेपाली : पलासी  ।  उड़ीया : पोलासो  ।  कन्नड़ : मोदुगु  । मराठी : पलस  ।  मलयालम : किमशुकम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पलासी</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद में औषधि वह जो रोगी में सतत् आरोग्य का विश्वास पैदा कर उसे रोग से निजात दिलाये। चूंकि शरीर का सीधा संबंध प्रकृति से है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: रोग भी प्रकृतिगत असंतुलन से ही पैदा होते हैं। ऐसे में औषधि प्रकृतिस्थ तत्वों से युक्त होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त  यदि दवा के नाम पर किन्हीं रासायनिक तत्वों का प्रयोग शरीर पर करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो तत्काल न सही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी न कभी तो वह शरीर के साथ विद्रोही तेवर दिखायेगा ही। जबकि अक्षय आरोग्य के लिए आवश्यक है कि शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक रोग में प्रकृति के बीच से ही औषधि की खोज करें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वनौषधियों में स्वास्थ्य</span>’</strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">की यह श्रृंखला इसी संकल्प सहित प्रस्तुत है।  परिजन इन प्रयोगों को पंतजलि आयुर्वेद के गहन अनुसंधान के साथ रचित </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद जड़ी-बूटी रहस्य</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">पुस्तक में विस्तार से पढ़ सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे अपनाकर हर कोई अक्षुण्य आरोग्य का स्वामी बन सकता है। आवश्यक यह भी है कि सब मिलकर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी रहस्य</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">पुस्तक घर-घर स्थापना का अभियान चलायें और भारत को पुन: आयुर्वेद का शिरमौर बनायें। इस अंक में प्रस्तुत है वनौषधि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पलाश</span>’...</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बाह्य स्वरूप:</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पलाश टेढ़ा-मेढ़ा</span>, 12-15<span lang="hi" xml:lang="hi"> मी ऊँचा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मध्यम आकार का पर्णपाती वृक्ष होता है। इसके काण्ड धूसर अथवा भूरे वर्ण के मुलायम रोमश होते हैं। काण्डत्वक् खुरदरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीलाभ-धूसर अथवा हल्के भूरे वर्ण की होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नवीन काण्ड-त्वक् रोमश अथवा मृदु रोमश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोंदयुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असामान्य शल्कों में निकलती हुई होती है। इसके पत्र बृहत्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकांतर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्रि-पत्रकयुक्त(बीच का पत्र बड़ा तथा किनारे के दोनों पत्र छोटे होते हैं)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरे रंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खुरदरे तथा स्पष्ट शिरायुक्तहोते हैं। इसके पत्रों का प्रयोग दोना तथा पत्तल बनाने के लिए किया जाता है। पुष्प सुंदर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बृहत्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चमकीले नारंगी-रक्त वर्ण के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कदाचित् पीत वर्ण के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कठोर </span>15<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी. लम्बे असीमाक्ष में पर्णरहित शाखाओं पर लगे होते हैं। इसकी फली बड़ी तथा अग्र की तरफ  एक बीज युक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूरे वर्ण की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चपटी</span>, 12.5-20<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी लम्बी</span>, 2.5-5<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी चौड़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पष्ट वृंतयुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुलायम तथा घनरोमश होती है। प्रत्येक फली में एक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वृक्काकार</span>, 3.3-3.8<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी लम्बा</span>, 2.2-2.5<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी चौड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्ताभ-भूरे वर्ण का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चमकीला व चपटा बीज होता है। ग्रीष्म ऋतु में इसकी त्वचा को क्षत करने पर एक रस निकलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो रक्तवर्णी होता है तथा सूखने पर कृष्णाभ-रक्तवर्ण-युक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भंगुर तथा चमकदार दिखता है। इसका पुष्पकाल फरवरी से मई तक तथा फलकाल मई से जून तक रहता है। यह भारत के मैदानी क्षेत्रों में तथा गुजरात आदि के पर्णपाती वनों में लगभग </span>1200<span lang="hi" xml:lang="hi"> मी तक की ऊँचाई पर पाया जाता है। जबकिउष्णकटिबंधीय हिमालय में </span>800<span lang="hi" xml:lang="hi"> मी. तक की ऊँचाई से पूर्व एवं दक्षिण की ओर श्रीलंका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दक्षिण पूर्वी एशिया एवं मलेशिया में पाया जाता है। वैदिक काल से पलाश का प्रमुख उपयोग यज्ञकर्मार्थ समिधा के लिए भी किया जाता है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/34.jpg" alt="34"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पलाश गुणकारी वनस्पति है। इसको प्राचीन काल से एक दिव्य औषधि की तरह काम में लाया जाता है। कौशिकसूत्र में मेधाजनन कर्मार्थ एवं पलाश कल्क का प्रयोग जलोदर के लिए वर्णित है। बृहत्त्रयी में पलाश का प्रमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्लीहोदर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विदारिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपतानक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्श</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अतिसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तपित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तगुल्म संबंधित प्रयोग मिलता है। चरक के वात-श्लेष्महर-गण के भिन्न-भिन्न रोगों के कतिपय प्रयोगों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा सुश्रुत के रोध्रादि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुष्कादि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अम्बष्ठादि व न्यग्रोधादि गणों में एवं पुष्पवर्ग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेल वर्गादि में भी इसका उल्लेख है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पलाश के पुष्प स्तम्भक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तृष्णाशामक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तस्तम्भक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूत्रल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठघ्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वरघ्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दाहशामक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कफपित्तशामक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भेदन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृमिघ्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तेजक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठघ्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विषघ्न व प्रमेहघ्न हैं। पलाश के फल भी स्तम्भन व प्रमेहघ्न होते हैं। पलाश की गोंद स्तम्भक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अम्लतानाशक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्राही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वृष्य और काफी बलकारक है। यह संग्रहणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुखरोग तथा खाँसी को दूर करता है। पत्र शोथहर तथा वेदना स्थापक भी है। जबकि पञ्चाङ्ग रसायन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दीपन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्राही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यकृत् उत्तेजक तथा कफवातशामक है। पलाश की जड़ का स्वरस नेत्र रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रतौंधी और नेत्र की फूली को नष्ट करता है और नेत्रों की ज्योति बढ़ाता है। पलाश की काण्डत्वक् स्तम्भक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कटु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाजीकर तथा कृमिघ्न होती है व मूल त्वक् वाजीकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेदनाशामक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृमिघ्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्श तथा व्रण शामक होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पलाश के औषधीय प्रयोग विधियां:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नेत्र रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पलाश की ताजी जड़ों का अर्क निकालकर एक-एक बूँद आँखों में डालते रहने से फूली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोतियाबिंद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रतौंधी इत्यादि सब प्रकार के नेत्र रोग नष्ट होते हैं।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नासा रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>नकसीर</strong>-रात्रि भर </span>100<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली शीतल जल में भीगे हुए </span>5-7<span lang="hi" xml:lang="hi"> पलाश पुष्पों को छानकर सुबह थोड़ी मिश्री मिलाकर पीने से नकसीर बंद हो जाती है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कण्ठ रोग:</span></strong></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>गलगंड-</strong>पलाश की जड़ को घिसकर कान के नीचे लेप करने से गलगंड में लाभ मिलता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उदर रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>मंदाग्नि-</strong>पलाश की ताजी मूल का अर्क निकालकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्क की </span>4-5<span lang="hi" xml:lang="hi"> बूँदें पान के पत्ते में रखकर खाने से भूख बढ़ती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अफारा-</strong>पलाश की छाल और शुंठी का काढ़ा बनाकर </span>30-40<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली मात्रा में दिन में दो बार पिलाने से अफारा तथा उदरशूल का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पलाश के पत्तों का क्वाथ बनाकर </span>30-40<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली मात्रा में पिलाने से अफारा और उदरशूल दूर होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>उदरकृमि-</strong>एक चम्मच पलाश बीज चूर्ण को दिन में दो बार खाने से भी पेट के कीड़े मरकर बाहर आ जाते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पलाश के बीज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निसोश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किरमानी अजवायन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कबीला तथा वायविडंग को समभाग मिलाकर </span>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम की मात्रा में गुड़ के साथ देने से सब प्रकार के कृमि नष्ट हो जाते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अतिसार-</span></strong>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम पलाश की गोंद में थोड़ी दाल चीनी और </span>65<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिग्रा अफीम मिलाकर पिलाने से अतिसार तुरंत बंद होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> चम्मच पलाश बीज क्वाथ में </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> चम्मच बकरी का दूध मिलाकर खाना खाने के पश्चात् दिन में तीन बार सेवन करने से अतिसार में लाभ होता है। पथ्य में बकरी का उबला हुआ शीतल दुग्ध और चावल ही लेने चाहिए।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गुदा रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तार्श-</span></strong>1-2<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम पलाश पञ्चाङ्ग की भस्म को गुनगुने घी के साथ पिलाने से खूनी बवासीर में काफी लाभदायक साबित होता है। इसका कुछ दिन लगातार सेवन करने से मस्से सूख जाते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अर्श-</strong>पलाश के पत्रों में घी की छौंक लगाकर उसे दही की मलाई के साथ सेवन करने से बवासीर में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वृक्क वस्ति रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>मूत्रकृच्छ्र-</strong>पलाश के फूलों को उबालकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीसकर सुखोष्ण करके पेड़ू पर बाँधने से मूत्रकृच्छ्र तथा शोथ का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>20<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम पलाश के पुष्पों को रात भर </span>200<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली ठंडे पानी में भिगोकर सुबह थोड़ी मिश्री मिलाकर पिलायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुर्दे की वेदना तथा मूत्र के साथ रक्तका आना बंद होगा।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पलाश की सूखी हुई कोपलें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोंद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छाल और फूलों को मिलाकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में समभाग मिश्री मिलाकर </span>2-4<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम चूर्ण को प्रतिदिन सायंकाल दूध के साथ लेने से मूत्रकृच्छ्र (मूत्र त्याग में कठिनता) में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>प्रमेह-</strong>पलाश की कोंपलों को छाया में सुखाकर कूट-छान लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें गुड़ मिलाकर</span>, 9<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम की मात्रा में प्रात:-काल सेवन करने से प्रमेह में भी लाभ मिलता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पलाश की जड़ों का रस निकालकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस रस में </span>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिन तक गेहँू के दानों को भिगो दें। तत्पश्चात् इन दानों को पीसकर हलवा बनाकर खाने से प्रमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीघ्रपतन और कामशक्तिकी कमजोरी दूर होगी।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पलाश एवं कुसुम्भ के फूल के साथ शैवाल को मिलाकर क्वाथ बना लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीतल होने पर </span>10-20<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली क्वाथ में मिश्री मिलाकर पिलाने से पित्त प्रमेह में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजनन संस्थान रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अंडकोष शोथ-</strong>पलाश के फूलों की पुल्टिस बनाकर नाभि के नीचे बाँधने से मूत्राशय विकार तथा अंडकोष शोथ का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पलाश की छाल को पीसकर </span>4<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम की मात्रा में जल के साथ दिन में दो बार देने से अंडवृद्धि में लाभ मिलता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गर्भनिरोधनार्थ-</span></strong>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम पलाश बीज</span>, 20<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम शहद और </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम घी इन सबको घोटकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें रुई को भिगोकर बत्ती बनाकर स्त्री प्रसंग से तीन घण्टे पहले योनि में रखने से गर्भधारण नहीं होता। अर्थात् यह उत्तम गर्भ निरोधक योग है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अस्थिसंधि रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सन्धिवात-पलाश के बीजों को महीन पीसकर मधु के साथ मिलाकर वेदना स्थान पर लेप करने से संधिवात में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बंदगाँठ-ढाक के पत्तों की पुल्टिस बाँधने से बंदगाँठ ठीक होती है व </span>3-5<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम पलाश मूल छाल चूर्ण को दूध के साथ पीने से भी बंदगाँठ में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पित्तशोथ-पलाश की गोंद को पानी में गलाकर नियमित लेप करने से कष्ट साध्य पित्तशोथ में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कटिशूल-पलाश पुष्प का क्वाथ बनाकर कमर में बफारा देने तथा क्वाथ का परिषेचन करने से कटिशूल का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">शाखा रोग:</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">श्लीपद-</span>100<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली पलाश मूल स्वरस में समभाग सफेद सरसों का तेल मिलाकर दो चम्मच सुबह-शाम पीने से श्लीपद रोग में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचा रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">घाव-घावों पर पलाश के गोंद का चूर्ण बुरकने से घाव रोपण शीघ्र होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ-पलाश बीज तेल को लगाने से व दूध में उबाले हुए पलाश बीज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गंधक तथा चित्रक को शुष्क कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूक्ष्म चूर्ण बनाकर </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> मास तक जल के साथ लेने से मण्डल कुष्ठ में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">दाद-ढाक के बीजों को नींबू के रस के साथ पीसकर लगाने से दाद और खुजली का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">नारू-पलाश के बीज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुचला के बीज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रस कपूर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सादा कपूर और गुग्गुलु इन सब औषधियों को समभाग लेकर बारीक पीसकर पानी के साथ खरल करके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर एक पीपल के पत्ते पर उनका लेप करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस पीपल के पत्ते को नारू के फोले के ऊपर बाँधें। इस पट्टी को तीन दिन तक बाँधने से लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">त्वक रोग-पलाश वृक्ष के मूल से प्राप्त रस (</span>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> लीटर) में तुषोदक तथा </span>12-12<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम मन:शिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुटज त्वक्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कूठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वचा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चक्रमर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करमज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूर्ज ग्रन्थि तथा कनेरमूल की त्वचा मिलाकर पकाकर गाढ़ा करके लेप करने से त्वक् रोगों का शमन होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मानस रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>मिर्गी</strong>-पलाश की जड़ों को पीसकर </span>4-5<span lang="hi" xml:lang="hi"> बूँद नाक में टपकाने से मिर्गी का दौरा रूकता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वशरीर रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>शीत-</strong>ज्वर-ज्वर में यदि ठंडी का आभास हो तो पलाश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्जक तथा सहिजन के पत्रों के कल्क का लेप करना चाहिए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>ज्वरजन्य-</strong>दाह-अम्ल द्रव से पलाश पत्रों को पीस कर लेप करने से दाह तथा ज्वर में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>रक्तपित्त-</strong>चार गुने पलाश स्वरस से पकाए हुए घृत को </span>15-25<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम की मात्रा में मधु के साथ सेवन करने से रक्तपित्त में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पलाश पत्र वृतों के स्वरस एवं कृक से विधिवत् घृतपाक कर मात्रानुसार मधु मिलाकर रक्तपित्त में सेवन करने से लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>200<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम पलाश पुष्प कृक में </span>400<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम मिश्री मिलाकर दूध के साथ पीने से रक्तपित्तजन्य रक्तस्राव आदि रोगों का स्तम्भन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>शोथ</strong>-शीतल जल में पिसे हुए पलाश बीज कल्क का लेप करने से समुद्रफेन घर्षणजन्य शोथ का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पलाश के फूलों की पुल्टिस बनाकर बाँधने से सूजन बिखरती है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रसायन वाजीकरण:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>रसायनार्थ-</strong>छाया शुष्क </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> चम्मच पलाश पञ्चाङ्ग चूर्ण में मधु एवं घृत (मधु एवं घृत विषम मात्रा में ही) मिलाकर प्रात: और सायंकाल सेवन करने से मनुष्य निरोगी और दीर्घायु होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">एक मास तक समभाग पलाश बीज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विडङ्ग बीज तथा आँवला के चूर्ण (</span>2-4<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम) में घी तथा घी से विषम मात्रा में मधु मिलाकर सेवन करने से मनुष्य निरोगी तथा दीर्घायु होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">समभाग घी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आँवला चूर्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शर्करा तथा पलाश बीज चूर्ण (</span>2-4<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम) रात को सोने से पहले खाने से वली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पलित आदि रोगों का शमन होकर बल एवं बुद्धि की वृद्धि होती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वाजीकरण-</span></strong>5-6<span lang="hi" xml:lang="hi"> बूँद पलाश मूल अर्क को दिन में दो बार सेवन करने से अनैच्छिक वीर्यस्राव रुकता है और कामशक्तिप्रबल होती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>2-4<span lang="hi" xml:lang="hi"> बूँद पलाश बीज तेल को कामेन्द्रिय के ऊपर (सीवन सुपारी छोड़कर) मालिश करने से कुछ ही दिनों में सब प्रकार की नपुंसकता दूर होती है और प्रबल कामशक्तिजागृत होती है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विष चिकित्सा:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>वृश्चिकदंश</strong>-पलाशबीज को अर्कदुग्ध के साथ पीसकर वृश्चिक दंशस्थान पर लेप करने से वेदना आदि विष प्रभावों का शमन होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>वनौषधियों में स्वास्थ्य</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>मार्च</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2999/palash-full-of-vajikaran--contraceptive-and-rasayan-yoga</link>
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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2015 21:55:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
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                <title>प्रज्ञापराध</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3000/pragyaparadh"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/53.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   आ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">युर्वेद के एक महान् ग्रन्थ चरक संहिता में हमें शिक्षा के रूप में एक सुन्दर वाक्य सुनने को मिलता है- </span><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञापराधो मूलं सर्वरोगाणाम्</span>’</strong><span lang="hi" xml:lang="hi">। शरीर व मन में विकारों के रूप में पैदा होकर जो कष्ट देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति को तोड़ डालते हैं वे रोग कहलाते हैं (रुजन्ति ते रोगा:)। जैसे शरीर-सम्बन्धी सैकड़ों प्रकार के रोग होते हैं- ज्वर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खाँसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जुकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेट दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कमर दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिर दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वात विकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कफ विकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पित्त विकार इत्यादि। उसी प्रकार काम-क्रोध-लोभ-मोह-मान-मद-ईर्ष्या-असूया इत्यादि अनेकानेक मानस रोग भी होते हैं। आचार्य चरक यह देख रहे हैं- रोग चाहे शारीरिक हों या मानस वे अकारण नहीं आते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका कोई न कोई कारण होता है। यद्यपि कारण दो प्रकार के हो सकते हैं- नित्य या आगन्तु। पर रोगों का कारण नित्य होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो न तो उसे हटाया जा सकता और न ही उससे बचा जा सकता। कारण यदि आगन्तु है तो उसे हटाया भी जा सकता है और सावधानी रखी जाए तो बचा भी। आगन्तु कारण के भी दो रूप हो सकते हैं- सामान्य और विशेष। सामान्य वह होता है जो सब जगह मिले और विशेष वह जो कहीं मिले कहीं न मिले। महामति आचार्य चरक ने सभी शारीरिक व मानस रोगों का एक सामान्य-साझा कारण खोजकर बतलाया। वह है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञापराध</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। आचार्य ने यह बात यथाप्रसंग सम्पूर्ण शास्त्र में बार-बार दोहराई है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञापराध क्या होता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य ने स्वयं ही अपने महान् कण्ठ से यह बतलाने की भी कृपा की है। वे कहते हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">धीघृतिस्मृतिविभ्रष्ट: कर्म यत् कुरुतेऽशुभम्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञापराधं तं विद्यात् सर्वदोषप्रकोपणम्।। (शा. १.१०२)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">धी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धृति और स्मृति से च्युत हुआ व्यक्ति जब कोई अशुभ कर्म करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वात-पित्तादि सभी शारीरिक दोष और रजस्-तमस् आदि मानस दोष प्रकुपित हो जाते हैं यही </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञापराध</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">बुद्ध्या विषमविज्ञानं विषमं च प्रवर्तनम्।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">प्रज्ञापराधं जानीयान्मनसो गोचरं हि तत्।। (शा. १०.१०९)</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि से विषम देखना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो चीज जैसी है उसे वैसा न देखना और फिर गलत समझ के कारण गलत प्रवृत्ति का होना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गलत आचरण करना ही </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञापराध</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">है। यह </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञापराध</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">मन के क्षेत्र में आता है अर्थात् मन के द्वारा ही इसे देखा जा सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">धी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धृति और स्मृति ये तीनों ही प्रज्ञा के भेद हैं। प्रज्ञा की तीनों शक्तियाँ जब ठीक-ठीक काम करती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ही व्यक्ति प्रज्ञावान् कहा जाता है। तीनों में से कोई एक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दो या तीनों ही भ्रष्ट हो जाती हैं तो इसे ही </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञापराध</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं। आचार्य ने इन तीनों का ही पृथक्-पृथक् लक्षण व पृथक्-पृथक् स्वरूप दर्शाया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">धीविभ्रंश क्या है</span>?’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इस बारे में आचार्य कहते हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">विषमाभिनिवेशो यो नित्यानित्ये हिताहिते।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">ज्ञेय: स बुद्धिविभ्रंश: समं बुद्धिर्हि पश्यति।। (शा. १.९९)</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नित्य में अनित्य और अनित्य में नित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हित में अहित और अहित में हित देखना ही विषमाभिनिवेश (अयथाभूतत्वेन निश्चय) है। यदि कोई यह पूछे कि यह बुद्धिविभ्रंश कैसे है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इसके उत्तर में यही कहना होगा कि बुद्धि सर्वदा सम (यथाभूत) ही देखती है। बुद्धि की यह योग्यता है कि जो चीज जैसी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसको वैसा देखे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु बुद्धि यदि अपनी इस योग्यता का निर्वाह ठीक से नहीं कर पा रही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इस असमदर्शन को बुद्धिविभ्रंश कहना उचित ही है। योगशास्त्र ने बुद्धिविभ्रंश को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अविद्या = अविवेक = विपरीत ज्ञान</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इन नामों से स्मरण किया है। न्यायदर्शन में इस स्थिति को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मोह या मिथ्याज्ञान</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहा गया है। अर्थात् </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वह बुद्धि जो अपने हित-अहित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नित्य-अनित्य को ठीक-ठीक नहीं देख पा रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो हितकारक खान-पान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आहार-विहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार आदि को अहितकारक समझ रही है और जो अहितकारक है उसे हितकारक।</span>‘ <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार जो बुद्धि आत्मादि नित्य तत्त्वों को नित्य और शरीरादि अनित्य पदार्थों को अनित्य नहीं समझ पा रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे भी प्रज्ञापराध का एक महत्त्वपूर्ण घटक धीविभंश कहा जायेगा। श्रीमद्भगवद्गीता १८ अध्याय के ३१</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">३२वें श्लोक में राजसी-तामसी बुद्धि के नाम से धीविभ्रंश का वर्णन है-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">अयथावत् प्रजानाति बुद्धि: सा पार्थ राजसी।।३१।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिस बुद्धि से मनुष्य धर्म और अधर्म को तथा कार्य तथा अकार्य को यथार्थ नहीं जानता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हे पार्थ! वह बुद्धि राजसी है। जबकि-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वार्थान् विपरीतांश्च बुद्धि सा पार्थ तामसी।।३२।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् तामसी बुद्धि तमोगुण (अन्धकार) से आवृत्त होने के कारण सब कार्यों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बातों को विपरीत ही मानती है। अधर्म को धर्म और धर्म को अधर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छी वस्तु को बुरी वस्तु और बुरी को अच्छी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परम तत्त्व को तुच्छ और तुच्छ को परम- इस प्रकार सब कुछ विपरीत मानती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञापराध का दूसरा घटक है धृतिभ्रंश। धृतिभ्रंश का वर्णन करते हुए आचार्य कहते हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विषयप्रवणं सत्त्वं धृतिभ्रंशान्न शक्यते।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नियन्तुमहितादर्थाद् धृतिर्हि नियमात्मिका।। (शा. १.१००)</span></strong></span></h5>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि धृतिभ्रंश हो रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो विषयों में डूबे हुए मन को अहित अर्थ से कभी रोका नहीं जा सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि धृति ही तो नियन्त्रण करने वाली शक्ति है। मन व इन्द्रियों का नियंत्रण करने में अशक्त धृति अपने कर्म से भ्रष्ट हुई </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">धृतिभ्रंश</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">नाम से कही जाती है। जब कभी व्यक्ति का मन अशुभ में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधर्म में या अपने संकल्पित पथ से अन्य पथ पर जाने लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रियाँ अपने विषयों में दौड़ने लगती हैं तो धृति उन्हें रोककर रखती है। भाव यह है- मनुष्य के पास यह एक अद्भुत सामर्थ्य वाली शक्ति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके द्वारा वह अपने को अकार्य से रोक कर रखता है। मनु ने भी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं.</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म के दस लक्षण बताते समय धृति को सबसे प्रथम स्थान पर रखा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि उसके बिना धर्ममार्ग में प्रवेश ही नहीं है। संस्कृत में धृ धातु </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पकड़ कर रखना</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इस अर्थ में प्रयुक्त होती है जैसे </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">हस्ते धृत्वा गच्छति</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">हाथ में पकड़ कर जा रहा है।</span></h5>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीमद्भगवद्गीता में धृति के तीन भेद बताए गये हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:left;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">धृत्या यया धारयते मन: प्राणेन्द्रियक्रिया:।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:left;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योगेनाव्यभिचारिण्या धृति: सा पार्थ सात्त्विकी।।३३।।</span></strong></span></h5>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जिस अव्यभिचारिणी धृति के द्वारा मोक्ष के साधनभूत भगवद् उपासना रूप योग से मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राण और इन्द्रियों की सब क्रियाएँ धारण की जाती हैं अर्थात् मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राण और इन्द्रियों की सब चेष्टाएँ जिसके द्वारा शास्त्रविरुद्ध प्रवृत्ति से रोकी जाती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह धृति सात्त्विकी है। सात्त्विकी धृति द्वारा धारण की हुई इन्द्रियाँ ही शास्त्र विरुद्ध विषय में प्रवृत्त नहीं होती।</span></h5>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कहने का तात्पर्य यह है कि अपने को नियन्त्रण में रखने वाला मनुष्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिस अव्यभिचारिणी धृति के द्वारा एकाग्रता रूप योग से मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राण व इन्द्रियों की चेष्टाओं को धारण किया करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोके रहता है। इस प्रकार की धृति सात्त्विकी है।</span></h5>
<h5 style="text-align:left;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:left;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसङ्गेन फलाकाङक्षी धृति: सा पार्थ राजसी।।३४।।</span></strong></span></h5>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">योगेश्वर स्वयं कहते हैं कि हे अर्जुन! फलाकाङ् क्षी पुरुष जिस धृति से अत्यन्त आसक्ति पूर्वक धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काम और अर्थ को धारण करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह धृति राजसी है।</span></h5>
<h5 style="text-align:left;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">यया स्वप्रं भयं शोकं विषादं मदमेव च।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:left;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">न विमुञ्चति दुर्मेधा धृति: सा तामसी मता।।३५।।</span></strong></span></h5>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जिस धृति के द्वारा दुर्बुद्धिग्रस्त मनुष्य स्वप्र (निद्रा)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भय (त्रास)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शोक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विषाद और मद को नहीं छोड़ता। अर्थात् विषय सेवन को ही अपने लिये बहुत बड़ा पुरुषार्थ मानकर उन्मत्त की भाँति मद को मन में सदा कर्तव्य रूप समझता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन सबको नहीं छोड़ता। अर्थात् धारण ही किये रहता है। उसकी धृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तामसी मानी गयी है।</span></h5>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि स्मृतिभ्रंश का निरूपण इस प्रकार है-</span></h5>
<h5 style="text-align:left;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">तत्त्वज्ञाने स्मृतिर्यस्य रजोमोहावृतात्मन:।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:left;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">भ्रश्यते स स्मृतिभ्रंश: स्मर्तव्यं हि स्मृतौ स्थितम्।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:left;" align="right"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">(<span lang="hi" xml:lang="hi">शा. स्थान १.१०१)</span></span></strong></h5>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">रजोगुण-तमोगुण से आवृत आत्मा वाले जिस व्यक्ति की तत्त्व ज्ञान में स्मृति भ्रष्ट हो जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह स्मृतिभ्रंश का लक्षण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि स्मर्तव्य विषय स्मृति में स्थित रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्मृति के अपराध से स्मर्तव्य विषय का विस्मरण हो जाता है। योगशास्त्र में भी स्मृति साधन को ज्ञान प्राप्ति का अन्यतम साधन बताया गया है- अर्थापत्ति से वहाँ यह बात ध्वनित होती है कि स्मृति नहीं तो ज्ञान भी नहीं (श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञा.)। यो.सू. १.२०</span></h5>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">चरक में सूत्रस्थान के उपसंहार के रूप में एक बड़ा ही सारगर्भित र्मार्मक संदेश उपलब्ध है-</span></h5>
<h5 style="text-align:left;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">समग्रं दु:खमायत्तमविज्ञाने द्वयाश्रयम्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:left;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सुखं समग्रं विज्ञाने विमले संप्रतिष्ठितम्।।</span></strong></span></h5>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">श्लोक में पठित </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अविज्ञाने</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द शब्दान्तर से प्रज्ञापराध की ओर ही इङ्गित कर रहा है। भाव यह है- शरीर व मन का समग्र दु:ख अविज्ञान=मिथ्याज्ञान या प्रज्ञापराध पर ही टिका हुआ है। इसी प्रकार शरीर व मन का सम्पूर्ण सुख-शुद्ध ज्ञान में प्रतिष्ठित है। श्रीमद्भगद्गीता में प्रज्ञा (शुद्धबुद्धि/सात्त्विकबुद्धि) की महिमा इस प्रकार वर्णित है कि-</span></h5>
<h5 style="text-align:left;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:left;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धि सा पार्थ सात्त्विकी।।</span></strong></span></h5>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् प्रवृत्ति और निवृत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्य और अकार्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भय और अभय तथा बन्ध और मोक्ष- इन सब को जो बुद्धि ठीक-ठीक जानती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हे पार्थ! वह बुद्धि सात्त्विकी है। जैसा कि पहले ही कहा गया कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">धी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्मृति</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञा की ये तीन अवस्था विशेष हैं। प्रज्ञावान् व्यक्ति इन तीनों को स्वस्थ रखता हुआ पूर्ण सुखमय जीवन व्यतीत करता है। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>मार्च</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2015 21:53:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
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                <title>हारमोंस, ग्रंथियों में छिपे  स्वस्थ-निरोग लम्बी जिंदगी के रहस्य</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. नागेन्द्र कुमार नीरज</span></strong><strong><span>, </span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">निर्देशक-योगग्राम</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3001/secrets-of-a-healthy-and-long-life-hidden-in-hormones-and-glands"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/552.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  अमेरिका</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की इडाहो यूनिवर्सिटी के प्राणिशास्त्री </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्टीव ऑस्टेड</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">ने अनुसंधान कर दावा किया है कि 2000 ई. में जन्मा उनका वारिस २१५० तक यानी १५० वर्ष तक जिन्दा रहेगा। डॉ. आस्टेड का मानना है कि कई प्राणियों की उम्र में तिगुनी वृद्धि हुई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो मनुष्य की औसत उम्र भी उसी रफ्तार से बढ़ेगी। यद्यपि शिकागो यूनिवर्सिटी के सेन्टर ऑफ एजिंग के अनुसंधानकर्ता </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">एस. जय औल्शैस्की</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का मानना है कि मनुष्य की औसत आयु बढ़ रही है तथा बढ़ेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु उतनी नहीं जितना ऑस्टेड दावा करते हैं। कैलिफोर्निया स्थित </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बक इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के वैज्ञानिक साइमन मैलोव ने ऑस्टेड के आशावादितापूर्ण कथन एवं प्रयोग को महत्वपूर्ण करार दिया। उनका मानना है कि भोजन में कैलोरी कम करके तथा दीर्घ जीवन प्रदान करने वाले पोषक तत्वों को बढ़ा कर जीवन डोर लम्बी खींची जा सकती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">सी क्रम में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कनेक्टीकट यूनिवर्सिटी</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के वैज्ञानिकों ने एक </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">फ्रूट फ्लाई</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के जीन में परिवर्तन कर उसका जीवन ३७ दिन से बढ़ाकर ७० से ११० दिन करने में सफलता पाई है। अगर इसी तरह का कोई जीन मानव में परिवर्तित कर दिया जाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ऑस्टेड के कथन को सत्य होने से कोई भी नहीं रोक पायेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यद्यपि किसी भी प्राणी की स्वाभाविक आयु वयस्क होने में लगे कुल समय का छह गुणा मानी जाती है। इस प्रकार व्यक्ति२५ वर्ष में वयस्क होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसकी स्वाभाविक आयु १५० वर्ष होनी ही चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो यौगिक क्रियाओं द्वारा संभव भी है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अंत:श्रावी ग्रंथियों का रहस्य:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस संकल्पना पूर्ति में शरीर की अंत:स्रावी ग्रंथियों का विशेष महत्व है। कभी-कभी ये ग्रंथियाँ अराजक एवं असंतुलित ढंग से कार्य करने लगती हैं। जिसके दुष्परिणामस्वरूप ही बौनापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दैत्याकार शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाल्यावस्था (८-९ वर्ष) में ही गर्भधारण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुढ़ापा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्थि विकृति स्त्रियों को मूँछें आना व पुरुषों में मूँछें नहीं आना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लिंग परिवर्तन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काम-वासना की अत्यधिक उत्तेजना अथवा पूर्ण निष्क्रियता आदि अनेक प्रकार की विचित्रताएँ परिलक्षित होती हैं। जबकि योगाभ्यास से इनमें संतुलित स्राव होने के प्रमाण मिले हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब साधारण से साधारण मानव महामानव बनने में समर्थ होगा। ये रहस्यमयी अंत:स्रावी ग्रंथियाँ निम्र हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पिट्यूटरी ग्रंथि- </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इससे ६ प्रकार के नियंत्रक तथा कुछ अन्य प्रकार के हार्मोन निकलते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो जीवन की समस्त क्रियाओं को प्रभावित करते हैं। इसके द्वारा अन्य ग्रंथियाँ भी नियंत्रित होती हैं। इसलिये इसे रानी ग्रंथि भी कहा जाता है। इसमें कुछ हार्मोन का स्राव कम होने से बौनापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोटापा तथा अधिक स्राव से दैत्याकार शरीर (जिम्नाटिज्म) एवं एक्रोमिगली हो सकती है। निकलने वाले हार्मोन जीव विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शारीरिक जल समतोल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तचाप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेशाब नियंत्रण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गर्भाशय कुंचन को प्रभावित करते हैं। इसकी स्थिति मस्तिष्क में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हाइपोथेलेमस के पास है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पिनियल ग्रंथि-</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> योगियों ने इसे तीसरी आँख (आज्ञाचक्र) कहा है। सन् १९५८ में येल मेडिकल स्कूल के बी. लर्नर ने पिनियल से </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मेलेटोनिन</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">हार्मोन को पृथक् कर इसके महत्व को सार्वभौम बनाया। यह हार्मोन भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोध एवं अन्य भावनात्मक संवेगों को नियंत्रित करता है। युवावस्था के साथ ही यह अपना कार्य पिट्यूटरी ग्लैण्ड को सौंप देता है। मन:चिकित्सक डेनियल ने एक अन्य </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सेरोटेनिन</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">हार्मोन को इससे पृथक् किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी संरचना एल.एस.डी. से मिलती है। यह ग्रंथि भूमध्य में स्थित है। केला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खजूर आदि मीठे फलों को खाने से सेरोटेनिन का स्राव बढ़ जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे तनाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदासी एवं अनिद्रा की शिकायत दूर होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>थायरॉयड ग्रंथि-</strong> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इससे </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">थायरॉक्सिन</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">हार्मोन निकलता है। इसके कम निकलने से बच्चों में जड़ वामनता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रौढ़ों में मिक्सोडमा नामक भयंकर रोग होते हैं। शारीरिक व मानसिक विकास रुक जाता है। चिड़चिड़ापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कब्ज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाल झड़ना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोटापा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेशियों की कमजोरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिरोवेदना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आलस्य आदि लक्षण दिखते हैं। आधारभूत चयापचय (</span>Basal Metabolism<span lang="hi" xml:lang="hi">) कम हो जाता है। ऐसी स्थिति में कृत्रिम थायरॉक्सिन दिया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो हानिकारक साबित होता है। जैसे रक्तमें थायरॉक्सिन बढ़ने से चयापचय की क्रिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊतकों द्वारा दहन क्रिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर का तापक्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पसीना निकालने की क्रिया तीव्र हो जाती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पैराथायरॉयड ग्रंथि-</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> यह थायरॉयड के पीछे चार पिण्डक के रूप में होता है। इससे पैराथायरॉयड हार्मोन निकलता है। इसकी कमी से कैल्शियम तथा फॉस्फोरस चयापचय अव्यवस्थित हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे हड्डियाँ अच्छी तरह विकसित नहीं होतीं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">थायमस ग्रंथि-</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong> </strong>बच्चों में यह वृषण से सम्बन्धित है। वैज्ञानिकों का खोजी दल इस ग्रंथि से निकलने वाले </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">थायमोसिन</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">हार्मोन की चमत्कारी रोग-प्रतिरोधक क्षमता को देखकर आश्चर्यचकित हैं। स्व. अब्राहम व्हाइट तथा डॉ. गोल्डस्टीन ने १९६६ ई. में थायमोसिन की खोज की। इस समय १५० से भी अधिक खोजी दल इस नैसर्गिक औषधि पर कार्यरत हैं। यह शरीर में टी-लिम्फोसाइट्स नामक एक प्रबल कीटाणुनाशक रसायन बनाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो शरीर की प्रतिरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ एवं सशक्तबनाती है। प्रयोगों से देखा गया है कि थायमोसिन की कमी से बच्चों में शारीरिक विकास का धीमा पड़ना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीघ्र ही रोगों के चंगुल में फँसना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैन्सर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नपुंसकत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीघ्र मृत्यु आदि अनेक घातक रोग हो जाते हैं। २५ से ५५ वर्ष की उम्र के बीच थायमोसिन का निकलना कम होने लगता है। यद्यपि इसकी सक्रियता से व्यक्तिसदा युवा बना रह सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">लैंगरहैन्स द्वीप गंथि-</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong> </strong>पैंक्रियास में एक द्वीप आकार की संरचना होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें अल्फा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बीटा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डेल्टा और थीटा कोशिकाएँ होती हैं। इनमें पृथक्-पृथक् हार्मोन निकलते हैं। अल्फा व बीटा कोशिकाओं से एक-दूसरे के भिन्न गुण वाले ग्लुकोन तथा इन्सुलिन हार्मोन निकलते हैं। ये शर्करा की चयापचय क्रिया को प्रभावी बनाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एड्रीनल ग्रंथि-</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong> </strong>यह गुर्दे के ऊपरी सिरे पर स्थित होता है। इसके बाहरी भाग कार्टेक्स से </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कार्टिन</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">या एड्रिनो कार्टिकल हार्मोन निकलता है। काॢटन हार्मोन कोलेस्ट्रॉल से बनता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर हाइड्रो साइक्लोपेन्टाटेनोफेनानथेरिन मूल पदार्थ से एड्रीनल कार्टेक्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्टिसोल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्टिकोस्टेरॉन नामक ग्लूको कोर्टिकॉयड्स हार्मोन पैदा करता है जो कार्बोहाइड्रेट के चयापचय को नियंत्रित एवं नियमित करता है। दूसरा एल्डोस्टेरॉन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिहाइड्रोएपियनड्रोस्टेरॉन नामक मिनरल्स कॉर्टिकोइड्स हार्मोन निकलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सोडियम तथा पोटेशियम के चयापचय को सुधारता है। तीसरे ग्रुप में एड्रोजेन्स (१७ कीटोस्टोरोइड्स)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एस्ट्रोजेन्स (एस्ट्राडिओल) तथा प्रोजेस्टीन्स (प्रोजेस्टेरॉन) हार्मोन पैदा करता है। तीसरे ग्रुप के तीनों हार्मोन प्रजनन प्रक्रिया में भाग लेते हैं। रक्तके लवणों में संतुलन बनाये रखने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शर्करा के चयापचय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गौण लैंगिक लक्षणों का विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषत्व की वृद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रूणावधि के परिवर्द्धन व विकास आदि कार्यों का सम्पादन इन हार्मोनों द्वारा होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">और भी बड़े काम की एड्रीनल ग्रंथि:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी ग्रंथि से स्रावित हारमोंस की कमी से एडीसन व्याधि होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे भयानक पेशीय क्लान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक अवसाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचा का पीलापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाचन-संस्थान की गड़बड़ी तथा निम्र रक्तचाप आदि लक्षण दिखते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एड्रीनल ग्रंथियों के मध्य भाग मेडूला से एड्रीनल (</span>C<span lang="hi" xml:lang="hi">3</span>H<span lang="hi" xml:lang="hi">2</span>O<span lang="hi" xml:lang="hi">3</span>N<span lang="hi" xml:lang="hi">) नारएड्रीनलिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैटेकोलामिन तथा डोपामिन हार्मोन निकलते हैं। एड्रीनल (एपिनेफ्रिन) हार्मोन प्लीहा त्वचा की रक्तवाहिनियों को संकुचित करता है। अस्थि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माँसपेशियों को फैलाता है। दिल की धड़कन को बढ़ाता है। साँस की नलियों को खोलता है। फेफड़ों की माँसपेशियों को शिथिल करता है। यकृत में संचित ग्लाइकोजिन को ग्लूकोज में बदलने के लिये प्रेरित करता है। खून में फैटी एसिड को बढ़ाता है। आमाशय एवं आँत की प्रक्रिया को विक्षुब्ध करता है। नारएड्रीनलिन (नारएपिनेफ्रिन) हार्मोन सूक्ष्म धमनियों एवं शिराओं को संकुचित करता है। रक्तप्रवाह की प्रतिरोध शक्तिकी वृद्धि करता है। रक्तचाप बढ़ाता है। हृदय गति को मंद करता है। डोपामिन धमनियों को फैलाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्डियेक आउटपुट को बढ़ाता है। गुर्दे में रक्तप्रवाह को तेज करता है। कैटे कोलामिन शरीर के अन्य भाग से भी निकलता है। ये आरेखित पेशियों के संकुचन पर नियन्त्रण रखते हैं। इसका स्राव अधिक होने पर (चिन्ता व क्रोध के समय) उच्च रक्तचाप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीव्र हृदय गति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आँसू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पित्त तथा पसीना तीव्र गति से निकलता है। भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तेजना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्महत्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पागलपन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनिद्रा जैसे लक्षण भी दिखते हैं। सिम्पेथैकि संस्थान के स्नायुओं से निकलने वाले हार्मोन </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सिंपेथिन</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा एड्रीनलिन हार्मोन की क्रियाओं में काफी समानता है। इसके प्रभाव से रक्तका थक्का बन जाता है। रक्त-वाहिनियाँ सँकरी हो जाती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे मस्तिष्क एवं हृदय सम्बन्धी अनेक विकृतियाँ दिखती हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गोनड्स ग्रंथि- यह जननांग का आधार है। अण्डाणु एवं शुक्राणु के अतिरिक्तगोनड्स पुरुषों में पुरुष हार्मोन जैसे एण्डरोस्टिरोन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एण्ड्रोजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टेस्टोस्टेरॉन तथा टेस्टोस्टिरोन तथा महिलाओं में इस्ट्रोन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एस्ट्रोजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पोजेस्टिरोन तथा रिलैक्सिन महिला हार्मोन स्रावित करता है। इन हार्मोन्स के आधार पर ही पुरुष-स्त्री गुणों का विभाजन होता है। पुरुष हार्मोन के कारण ही दाढ़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूँछ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारी आवाज तथा शरीर का विशेष आकार-प्रकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्त्रियों के प्रति आकर्षण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युवा उमंग आदि गौण लैंगिक लक्षण पुरुषों में दिखते हैं। स्त्रियों में स्त्री हार्मोन से स्त्रीमद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रजोचक्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्तनों का विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रमणी प्रवृत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नारी सुलभ उमंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कामशक्तिव कमनीयता के गुण दिखते हैं। रिलेक्सिन हार्मोन प्रसव में सहायक होता है। कभी-कभी पुरुषों में स्त्री हार्मोन की अधिकता होने से उनमें स्त्रियोचित गुण तथा महिलाओं में पुरुष हार्मोन की अधिकता से पुरुषोचित गुण दिखते हैं। लिंग परिवर्तन इसी आधार पर होता है। मनोवैज्ञानिक एडलर काम सम्बन्धी शोधों से इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि सुन्दर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आकर्षक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कमनीय व्यक्तित्व होते हुए भी अनेक स्त्रियों में काम व रमणीयता का अभाव होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके चलते उनका दाम्पत्य जीवन दु:खी रहता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आँतों का म्यूकस मेम्ब्रेन भी कोलेसिस्टोकाइनिन तथा सिक्रिटिन नामक हार्मोन पैदा करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो भोजन की पाचन क्रिया को व्यवस्थित करते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योगाभ्यास से ग्रंथियों पर नियंत्रण:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिकों का मत है कि योगाभ्यास के द्वारा इन हार्मोंस ग्रंथियों पर सहज नियंत्रण होता चलता है। अनुसंधानानुसार आसन करते समय प्रत्येक क्रिया के प्रति होश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंतस् में साक्षी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चेहरे पर मुस्कुराहट होनी चाहिए। योगाभ्यासी कर्म + साक्षी भाव + मुस्कुराहट-अहंकार = कर्मयोग के समीकरण को सदैव स्मरण रखें अर्थात् प्रत्येक क्रिया के प्रति होश बनाकर रखना चाहिए। इस प्रकार से प्रत्येक यौगिक क्रिया संगीतपूर्ण होने लगती है। अंतस् में साक्षी भाव जाग्रत होता है और योगस्थ होने में न केवल सहायता मिलती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु जीवन रास्ते पर आने लगता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तुत:</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> योग का अपना विज्ञान है। शरीर के अंगों को यौगिक आसनों से विशेष प्रभावित होते सहज देखा जा सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिस प्रकार मलमूत्र आदि दुर्गन्धित पदार्थ धरती से संयोग कर बीजों के माध्यम से पुष्पों में प्रविष्ट कर सुगन्ध में परिवर्तित हो जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी प्रकार जीवन में प्रकट होने वाली क्रोध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वेष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विक्षिप्तता आदि दुष्प्रवृत्तियाँ योग द्वारा जीवन में क्षमा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकाग्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहकारिता के पुष्पों में रूपान्तरित हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन को सुगन्ध व संगीत से भर देती हैं। योग दुष्प्रवृत्तियों का दमन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रूपान्तरण करता है। यही नहीं योगाभ्यास हारमोंस ग्रंथियों में संतुलन लाकर दीर्घ जीवन का मार्ग खोलता है। यह १५० वर्षीय जीवन का राज भी इसी में है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>स्वास्थ्य समाचार</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>मार्च</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3001/secrets-of-a-healthy-and-long-life-hidden-in-hormones-and-glands</link>
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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2015 21:50:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जीवन की पूर्णता के लिए ढीला करना पड़ता है अपने अहम का खूंट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य प्रद्युम्रजी महाराज</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3002/for-the-completeness-of-life--one-has-to-loosen-the-peg-of-one-s-ego"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/281.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">   जीवन</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का अर्थ है-</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> खाना-पीना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उठना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जागना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृषि- व्यापार आदि करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पढ़ना-लिखना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खेलना-कूदना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बातें करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युद्ध करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संग्रह करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्याग करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोचना-विचारना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपदेशादि करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्रों को समझना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रिय भोगों को भोगना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सन्तान का पालन-पोषण करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घर-परिवार-समाज-राष्ट्र या वैश्व संस्था का संचालन करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दान देना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दान लेना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छा-बुरा अनुभव करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन को शान्त करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधना करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नि:स्वार्थ भाव से सेवा करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लूटना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चोरी करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छल-कपट करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धोखा देना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वासघात करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहयोग लेना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदासीन रहना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक शब्द में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य जो कुछ भी जीवित रहता हुआ कर रहा है- उत्कृष्ट या निकृष्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रवृत्ति या निवृत्ति</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म या अधर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुण्य या पाप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधु या असाधु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भोग या त्याग सभी कुछ जीवन का रूप है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">समें इतना विशेष रूप से समझाना चाहिए कि जीवन के कुछ क्रिया-कलाप ऐसे होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनके द्वारा स्वयं तथा दूसरों को भी सुख मिलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और कुछ के द्वारा केवल दु:ख मिलता है। कुछ मनोभाव ऐसे होते हैं जिनसे व्यक्ति अपने आप को भारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बोझिल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव-युक्त अनुभव करने लगता है और किन्हीं के द्वारा हल्का। इसी प्रकार मन की ऐसी अवस्था भी आती है कि व्यक्ति अपने को अत्यन्त फँसा हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पराधीन व चारों ओर से भय के द्वारा घिरा हुआ पाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दूसरे समय एकदम मुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतन्त्र व अभय की स्थिति का अनुभव करता है। विद्वानों ने इन दोनों स्थितियों को शुभ-अशुभ अथवा सत्य-असत्य के रूप में विभाजन किया है । </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति के मन की चाल या तो बाहर की तरफ  होती है या भीतर की तरफ। व्यक्ति जब बाहर देखता है तो उसके </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का तादात्म्य बाह्य वस्तु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति या विचार के साथ हो जाता है और उसे ही वह अपना स्वरूप समझने लगता है। ऐसे में जो वस्तु-व्यक्ति-विचार सुखदायी प्रतीत होते हैं- उन्हें </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अपना</span>’, '<span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा</span>’, '<span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">नाम दे दिया जाता है तथा जिनसे दु:ख मिलता है या सुख नहीं मिल रहा होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पराया</span>’, '<span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा</span>’, '<span lang="hi" xml:lang="hi">तुम्हारा</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। यह हम सबका ही प्रतिदिन का अनुभव है। व्यक्ति कभी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा मन</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कभी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मन को ही अपना स्वरूप</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">समझता है। कभी हम शरीर को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं तो कभी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा शरीर</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कभी उनके वियोग या विनाश में कहते-सुनते देखा जाता है कि मैं तो मर ही गया और उनकी वृद्धि से अपनी वृद्धि आँकते हैं। कभी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिष्ठा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरी होती है और कभी मैं प्रतिष्ठा रूप होता हूं। अप्रतिष्ठा होने से अपनी मौत और प्रतिष्ठा वृद्धि से अपनी वृद्धि का सिलसिला चालू रहता है। इसी प्रकार किसी विचार को व्यक्ति अपना कह कर पुकारता है और जब उस विचार पर कोई चोट पहुँचाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो विचार के साथ एकीभूत हुआ वह व्यक्ति उस चोट को अपने पर ही पड़ती हुई समझता है। उसकी प्रशंसा या समर्थन से अपने को ही प्रशंसित या समर्थित हुआ मानता है। मेरा सिद्धान्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा घर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा भाई इत्यादि में भी यही होता है। कहीं विदेश में अपने देश का कोई व्यक्ति मिलने पर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे देश का</span>’, '<span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा मित्र</span>’,'<span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा सम्बन्धी</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इत्यादि विविध क्षेत्रों में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द का व्यवहार होता रहता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसा कि देखा गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो मेरा होता है- वह निश्चित रूप से </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का ही एक भाग होता है या दूसरे शब्दों में जिस अवधि तक व्यक्ति का </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">फैल जाता है वहाँ तक </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इसकी सीमा का अवधारण होता है। संक्षेप में मन-बुद्धि-विद्या-बल-प्राण-शरीर-पुस्तक-रुपये-पैसे-भूमिखण्ड-कार-कोठी-बँगला या झोंपड़ी-घर-परिवार-आश्रम-पुत्र-पौत्र-शिष्य-प्रशिष्य-माता-पिता-गुरु-सम्बन्धी-जाति-समाज-प्रान्त-देश-मित्रदेश-विश्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये सब ही विवक्षाभेद से कभी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">होते हैं तो कभी मेरे । इस </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का खेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य ही नहीं बल्कि पशु-पक्षी भी अपने-अपने स्तर पर खेल रहे हैं। इस प्रकार जीवन की यह नौका सदा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के खूँटे से बँधी रहती है। यही बहिर्मुखी जीवन का क्रम है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्तर्मुखी जीवन के लिए सबसे पहले इस </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के खूटे से अपनी जीवन-नौका को खोलना होता है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि बहिर्मुखी जीवन का अर्थ है संसार तथा अन्तर्मुखी जीवन का उद्देश्य है भगवान्। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार देखा गया कि व्यक्ति जिस किसी को अपना आपा (मैं या मेरा) मान लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निकटतम मन-बुद्धि या विद्या-बल-शरीर से लेकर दूरतम देश जाति तक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अपने ज्ञान व समझ के अनुसार उस माने हुए मैं या मेरे की सुख-अभिवृद्धि व उन्नति के लिए भरसक प्रयास करता है। उस अपने अङ्गीकृत </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के विकास में जो वस्तु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति व विचार बाधक प्रतीत होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनको दूर हटाता हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें नष्ट करता हुआ या फिर वे अधिक बलवान् हों तो उनसे बचता हुआ जीवन जीता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि ज्ञान-शक्ति (विवेक) का विकास कम है तो उचित-अनुचित का ध्यान न रखते हुए जिस किसी उपाय से भी (</span>Good or bad means<span lang="hi" xml:lang="hi">) अपने उस स्वीकृत </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को बढ़ाना ही जीवन का प्रमुख उद्देश्य होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर यदि ज्ञान-शक्ति (विशेष समझ) का विकास हो गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्संग के द्वारा या स्वयं के अनुभव से या शास्त्र वचनों से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे जिस उपाय से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अपने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को बढ़ाने के लिए या अपने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सुखी करने के लिए और अपने उस </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के दु:खों को कम करने के लिए दूसरों की बलि नहीं चढ़ाता। उसकी बढ़ी हुई संवेदन-शीलता उसको सोचने के लिए बाध्य कर देती है कि प्रत्येक का ही अपना-अपना </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सो मुझे किसी के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को चोट (</span>Hurt<span lang="hi" xml:lang="hi">) नहीं पहुँचानी चाहिए। ज्ञान-शक्ति के विकास के तारतम्य के अनुसार ही व्यक्ति में इस संवेदन शीलता का विकास होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी राष्ट्रवादी देश भक्त का मुख्य </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">देश-जाति इत्यादि होता है। इसलिए उसके लिए आवश्यकता पड़ने पर अपने प्राण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कि प्राय: सामान्य स्थिति में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के मुख्यतम भाग माने जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें भी भेंट चढ़ाने में अत्यन्त आनन्द का अनुभव होता है। जिस महापुरुष ने सम्पूर्ण समष्टि को ही अपने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के द्वारा घेर लिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवमात्र को जो अपना कहकर पुकारता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इतना ही नहीं बल्कि उन्हें प्रथम स्थान पर देखता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह उनकी सेवा में अपने समझे जाने वाले समय व शक्ति को सहर्ष अर्पित करता रहता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए महाराज कहते हैं कि या तो इस </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को इतना बढ़ाना चाहिए कि सब कुछ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi"> बन जाए। या तो </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को इतना हटाओ कि किसी भी दूसरी संज्ञा का </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के रूप में आभास ही न हो या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को इतना फैलाओ कि सर्वभूत-सृष्टि अपना आप (मैं) ही लगने लगे। दोनों ही अवस्थाओं में जीवन-नौका </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के खूँटे से खुल जाती है। जो अनन्त की उस महायात्रा के लिए प्रस्थान करना चाह रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके मन की उपर्युक्त भाव-दशा होनी चाहिए। जो केवल नैतिक जीवन जीना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनसे केवल इतनी ही माँग की जाती है कि उन्होंने जो भी अपने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का स्वरूप गढ़ा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपना मन-बुद्धि-प्राण-स्त्री-पुत्र-परिवार इत्यादि जो कुछ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे अपने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को सुख देने के चक्कर में दूसरे के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को कष्ट न दें। एक परिवार में भी पति अपने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के लिए पत्नी के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को क्लेश न पहुँचाए। इसी प्रकार पुत्र अपने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के लिए पिता के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को पीड़ा न दे। जितना बन सके अपने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">से दूसरे के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का सहयोग करें। अपने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की प्रसन्नता के लिए दूसरे के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की अपेक्षा रखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपेक्षा न करें । इस प्रकार करते-करते काल-क्रम में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का यह बन्धन ढीला पड़ जायेगा। यदि इस नैतिक दृष्टि का भी आलम्बन नहीं लिया जाता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो व्यक्ति जो भी करेगा</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">अहम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की ग्रन्थि दृढ़ से दृढ़तर होती जायेगी और उसकी जीवन-यात्रा का वही हाल होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे कोई भाँग के नशे में सायंकाल नौका में बैठकर मथुरा से वृन्दावन के लिए प्रस्थान करे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर खूँटे से बँधे हुए नौका के लंगर को खोले ही नहीं। रात-भर चप्पू चलाता रहे। प्रात: काल जब देखते हैं तो नौका वहीं खड़ी है। एक इंच भी यात्रा तय नहीं हुई।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्री महाराज इसे कदम ताल (</span>Standing Running<span lang="hi" xml:lang="hi">) कहा करते हैं कि यों तो व्यक्ति देखने में पसीना-पसीना हो जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर खड़े वहीं के वहीं रहते हैं। यही मनुष्य के जीवन का भी हाल है। अध्यात्म के नाम पर व्यक्ति सत्संग-भजन-कीर्त्तन-रामायण पाठ-यज्ञ-हवन-तीर्थाटन-गुरुधारण</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">मौन-उपवास-दान-दक्षिणा आदि बड़े-बड़े पुरुषार्थ करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर यात्रा एक इंच भी तय नहीं होती। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ कल खड़ा था वहीं आज खड़ा है। कल जितना क्रोध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितना लोभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितना मोह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितना इन्द्रिय असंयम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितना असत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितना मद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितनी ईर्ष्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितना द्वेष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितनी आसक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितना आलस्य-प्रमाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितनी मन की अशुचिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राग-द्वेष थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उतने ही आज भी हैं और आने वाले कल में भी कुछ सुधार की आशा नहीं दिखाई पड़ रही। इस सबका एक ही कारण है- जिस </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के खूटे से अपनी जीवन-नौका को मनुष्य ने बाँधा हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसको खोलने का या कुछ ढीला करने के लिए कुछ भी उपक्रम नहीं किया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्या आपने उन तथाकथित भक्तों को इस भाषा का प्रयोग करते हुए नहीं देखा कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इतनी लम्बी सन्ध्या करता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दैनिक अग्निहोत्र करते हुए मुझे इतने वर्ष हो गये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे गुरु इतने बड़े सिद्ध पुरुष हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैंने इतना सत्संग किया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इतनी बार मैंने पारायण यज्ञ किया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इतनी दान-दक्षिणा दी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इतने-इतने दिन तक मैंने मौन साधना व एकान्तवास किया है इत्यादि। इन स्थूल साधनों के अनुष्ठान से वे अपने आपको दूसरों की तुलना में कितना विशेष अनुभव करने लग जाते हैं। वस्तुत: साधना का लक्ष्य तो यह होना चाहिए कि निर्विशेष पूर्णता उपलब्ध हो जाए। नाम-रूप की उठती हुई लहरों के पीछे </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">समं ब्रह्म</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के दर्शन से चित्त पूर्ण शान्त हो जाए। हीन भाव और अभिमान दोनों से ऊपर उठकर चित्त </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">समता</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">में प्रतिष्ठित हो जाए। कामनायें और तृष्णायें विलय को प्राप्त होकर सहज सन्तोष में स्थिर हो जाएँ। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महाराज ने निरहङ्कार स्थिति का स्वरूप दर्शाते हुए एक बार इंग्लिश कवि वर्ड्सवर्थ की घटना सुनायी। वर्ड्सवर्थ कहता है- पहाड़ की उस सुदूर उपत्यका में पहुँचना। वहाँ तुम्हें बहुत सारे पत्थर पड़े हुए मिलेंगे। उनमें से किसी एक पत्थर को उठाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही बहुतों में कोई एक मेरी मृत्यु के बाद प्रतीक रूप में मेरा स्मारक होगा। अर्थात् ये जो अनन्त आत्मायें हमारे समक्ष हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे सब आत्मायें एक ही हैं- न कोई किसी से हीन है और न कोई विशेष। जो कुछ भेद है वह प्रकृति व उससे बने मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि व शरीर की संरचना में ही है या फिर संस्कारों में कहा जा सकता है। महाराज का कहना है- आज जिसके मन-बुद्धि व संस्कारों की विशेषता दिखाई दे रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह सदा से वैसी नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी वे भी निश्चित रूप से इसी स्थिति में थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसको आज हीन समझा जा रहा है। आज जो कछुए के रूप में है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही किसी समय खरगोश रहा होगा तथा आज का खरगोश परिस्थितिवश कभी कछुए के रूप में बदल सकता है। इन परिवर्तनमान अवस्थाओं का सामने से गुजरता हुआ क्षणिक रूप पकड़कर विशेष या अविशेष कह देना ठीक नहीं है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वास्तव में सतत परिवर्तन ही इस जगत् और जीवन का स्वभाव है। यदि वैसा है तो हम किस रूप को पकड़कर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बुरा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषण दे रहे हैं</span>?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि सबसे प्रथम व आवश्यक काम यही करना है कि जो-जो हमने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के खूँटे गाड़े हुए हैं- मैं विद्वान्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं मूर्ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं अधर्मात्मा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं पापी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं महान्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं क्षुर्द्र उन सब खूँटों से अपनी नौकाओं को खोल देने में ही भलाई है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अपने-अपने द्वारा निर्मित इन खूँटों के खुलते ही जीवन अनन्त से जुड़ जायेगा। ये </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अह्म</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के खूँटे ही मनुष्य को मर्त्य या सीमित या अल्पभाव से युक्त कर देते हैं। अल्प में कभी भी सुख नहीं होता</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">भूमा में ही सुख है। भूमा पूर्ण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्त है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रस स्वरूप है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षोभरहित है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि अल्प में संघर्ष है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षीयमाणता है। इसमें पुन: पुन: वृद्धि के लिए सतत प्रयास करना होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पर्द्धा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भय है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विक्षोभ है। अत: क्यों न हम पूर्णता की ओर बढ़ें।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>मार्च</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2015 21:48:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>व्यक्तित्व विकारग्रस्त होने पर  दिव्य परमात्मा भी भयकारक दिखता है</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">        गी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ता परमात्मा की वाणी है। संसार परमात्मा की अनुशासन व्यवस्था। जब तक लोक मानस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र परमात्मा के अनुशासन में जीता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गीता भी प्रवाहित रहती है। अनुशासन टूटते ही प्रवाह अवरुद्ध होता है। तब </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">गीता</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">चीत्कार करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गीता की उस चीत्कार को जो सुन समझ और अनुभव कर लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही युग सृजेता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युग पुरुष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रांति पुरुष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महामानव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगेश्वर आदि के रूप में प्रतिष्ठित होता है। घोर अंधकार के युग में परमात्मा की उस अविरल शाश्वत वाणी को आत्मसात करने में समर्थ भी वही होता है</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3003/when-the-personality-is-disordered-then-even-the-divine-god-looks-scary"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/321.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    गी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ता परमात्मा की वाणी है। संसार परमात्मा की अनुशासन व्यवस्था। जब तक लोक मानस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र परमात्मा के अनुशासन में जीता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गीता भी प्रवाहित रहती है। अनुशासन टूटते ही प्रवाह अवरुद्ध होता है। तब </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">गीता</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">चीत्कार करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गीता की उस चीत्कार को जो सुन समझ और अनुभव कर लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही युग सृजेता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युग पुरुष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रांति पुरुष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महामानव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगेश्वर आदि के रूप में प्रतिष्ठित होता है। घोर अंधकार के युग में परमात्मा की उस अविरल शाश्वत वाणी को आत्मसात करने में समर्थ भी वही होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो परम अनुशासित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियोजन एवं सृजन में जिसकी गति हो। महाभारत काल में योगेश्वर कृष्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्रता आन्दोलन काल में लोकमान्य तिलक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गांधी आदि इसी स्तर के युगदूत थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने गीता की प्रेरणा को युगीन पृष्ठभूमि में आत्मसात किया और नवनिर्माण हुआ। इसीलिए श्रीमद्भगवद्गीता सदा से युग ग्रंथ रहा है। पतंजलि के योगसूत्र की तरह ही चिर शाश्वत </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">युगीन धर्म निर्वाह की प्रेरणा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इसकी प्रतिबद्धता। गीता की उसी आवाज को आज युगऋषि परम पूज्य स्वामी रामदेवजी महाराज आत्मसात करके युगधर्म निर्वाह कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो प्रस्तुत हैं:-             <strong> ...सम्पादक</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्</span>ï<span lang="hi" xml:lang="hi">। पश्यामि त्वां </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्</span>ï<span lang="hi" xml:lang="hi">।। १९।। </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वा:। दृष्ट्वाद्भुतं </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितम्</span>ï <span lang="hi" xml:lang="hi">महात्मन्</span>ï<span lang="hi" xml:lang="hi">।। २०।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्जुन एक दिव्य योगी के स्वरूप को देखकर अपनी भांति-भांति की प्रतिक्रियायें देता है। वह कहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हे योगेश्वर आपका यह स्वरूप जिसका न आदि है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न मध्य और न अन्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके अनेक बाहु हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य और चन्द्र जिसके नेत्र हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ज्वलित अग्नि जिसका मुख है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे अनन्त शक्तिमान् तुम और अपने तेज से समस्त जगत् को जो तपा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे तुम्हारे रूप को मैं देख रहा हूँ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि आकाश और पृथ्वी के बीच का यह अन्तर और सभी दिशाएं केवल तुम्हीं ने व्याप्त की हुई हैं। हे महात्मन्</span>ï! <span lang="hi" xml:lang="hi">तुम्हारे इस अद्</span>ï<span lang="hi" xml:lang="hi">भुत और विशाल उग्ररूप को देखकर ये तीनों लोक डर से व्यथित हो रहे हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अमी हि त्वां सुरसङ् घा विशन्ति केचिद्भीता: प्राञ्जलयो गृणन्ति। </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ् घा: स्तुवन्ति </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">त्वां स्तुतिभि: पुष्कलाभि:।। २१।। </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च। </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गन्धर्वयक्षासुरसि।।सङ् घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे।। २२।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह देखो! देवसमूह तुम्हारे भीतर प्रवेश कर रहे हैं और कुछ देवता भय से हाथ जोड़े प्रार्थना कर रहे हैं। स्वस्ति-स्वस्ति कहकर महर्षि और सिद्धों का समुदाय अनेक प्रकार के स्तोत्रों से तुम्हारी स्तुति कर रहा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रुद्र और आदित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वसु और सब साध्यगण (मुनिगणों का एक वर्ग)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों अश्विनीकुमार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मरुद्</span>ï<span lang="hi" xml:lang="hi">गण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पितर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गंधर्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यक्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असुर एवं सिद्धों के समूह सब तुम्हारी ओर विस्मित होकर देख रहे हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">(<span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धा से पितरों अर्थात्</span>ï <span lang="hi" xml:lang="hi">वयोवृद्धों को जो अन्न दिया जाता है वह तभी तक उनके लिये स्वास्थ्यप्रद होता है जब तक कि गरमागरम मिले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए पितरों को ऊष्मपा कहते हैं। आदित्य वैदिक देवता हैं)।</span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम्</span>ï<span lang="hi" xml:lang="hi">।</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">बहूदरं बहुदंष्ट</span>ï<span lang="hi" xml:lang="hi">करालं दृष्ट्</span>ï<span lang="hi" xml:lang="hi">वा लोका: प्रव्यथितास्तथाहम्</span>ï<span lang="hi" xml:lang="hi">।। २३।। </span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">नभ:स्पृशं दीप्तमनेकवर्णं  व्यात्ताननं  दीप्तविशालनेत्रम्। </span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">दृष्ट्</span>ï<span lang="hi" xml:lang="hi">वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो।। २४।।</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हे महाबाहो! अनेकों मुखों व आँखों वाले अनेक भुजाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जंघाओं और अनेक पैरों वाले अनेक उदरों वाले और अनेक दाढ़ों के कारण विकराल दिखाई देने वाले तुम्हारे इस महान्</span>ï <span lang="hi" xml:lang="hi">रूप को देखकर सब लोग व्यथित हो गये हैं और मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आकाश को छूने वाले प्रकाशमान्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनेक रंगों से युक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबड़े फैलाये हुए और चमकीले व विशाल नेत्रों वाले तुम्हारे स्वरूप को देखकर हे विष्णो! प्रव्यथित अन्तरात्मा वाला मैं न तो धीरज धारण कर पा रहा हूँ और न शान्ति अर्थात् मैं अपने आपको सहज नहीं रख पा रहा।</span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">दंष्टराकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्</span>ï<span lang="hi" xml:lang="hi">वैव कालानलसन्निभानि। </span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास।। २५।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विशाल दाढ़ों से विकराल और कालाग्नि के समान तुम्हारे इन भयंकर मुखों को देखकर मुझे दिशायें नहीं सूझतीं। चैन नहीं  प्राप्त कर पा रहा हूँ। हे जगन्निवास!  देवताओं के भी देवता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब प्रसन्न हो जाओ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उस दिव्य परमात्मा के दर्शन मात्र से अर्जुन के विकार व्यथित हो भागने लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो विकार ग्रस्त अर्जुन भी भयभीत हो उठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी योगेश्वर ने उसे सम्हाला। इससे जीवन में पवित्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्यता की महत्ता स्वत: सिद्ध होती है। अन्यथा व्यक्तित्व विकार ग्रस्त रहने पर दिव्य परमात्मा भी भयकारक लगता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>मार्च</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3003/when-the-personality-is-disordered-then-even-the-divine-god-looks-scary</link>
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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2015 21:46:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>विद्यार्थियों के परीक्षाकाल में जरूरी है अभिभावकों की सहानुभूति</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. नरेन्द्र कुमार</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3004/parents--sympathy-is-necessary-during-students--examination-period"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/14.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   दु</span><span lang="hi" xml:lang="hi">श्चिंता एक ऐसी मन:स्थिति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो आजकल बच्चों में परीक्षा में बैठते समय या उससे पूर्व आ धमकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके कारण उनमें बेचैनी और मानसिक तनाव की स्थिति पैदा हो जाती है। आत्मविश्वास कमज़ोर पड़ता है तथा हीनता के कारण परिणाम के प्रति आशंका जन्म लेती है और वे परीक्षा में अच्छी प्रकार से कार्य-निष्पादन (</span>performance<span lang="hi" xml:lang="hi">) नहीं कर पाते। दुश्चिन्ता के कारण बालक में निराशा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हतोत्साह (</span>Nervousness<span lang="hi" xml:lang="hi">) की संभावना भी देखने में आती है। छात्रों को चक्कर आने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साँस उखड़ने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नब्ज के तेज होने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तदबाव (</span>Blood Pressure<span lang="hi" xml:lang="hi">) अधिक होने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत्यधिक पसीना आने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूर्छित हो जाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिर में दर्द होने जैसी समस्याओं से जूझना पड़ता है। इससे बचाव के लिए अध्यापक एवं माता-पिता द्वारा जागरूक रहकर पता लगाना आवश्यक है कि कहीं परीक्षा के दिनों में मानसिक तनाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आशंका के कारण उनके बच्चों को परीक्षा देने में बाधा तो नहीं आ रही। परीक्षा में औचित्यपूर्ण सफलता लाने एवं मानसिक तनाव को दूर करने हेतु अभिभावकों को अपने बच्चों के साथ सहानुभूतिपूर्वक निम्रलिखित प्रयास भी अवश्य करना चाहिए-</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">परीक्षा में जाने से पूर्व बच्चों का माँ-बाप के साथ बराबर संवाद बना रहना आवश्यक है और आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करते रहना चाहिए। साथ ही घर में हँसी-खुशी का माहौल रखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चों को अपनी क्षमताओं का अहसास कराते रहें और इस बात की चिन्ता से अपने बच्चों को मुक्त रखें कि उनके मित्र ने कितना अधिक कर लिया है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चे भी परीक्षा के पूर्व तक बातचीत करके यदि कुछ तनाव अनुभव कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे दूर करें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अभिभावकों को यह भी ध्यान रखना है कि परीक्षा के दिनों में छात्रों को पौष्टिक आहार एवं पेय पदार्थ उपलब्ध होता रहे।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इस दौरान बच्चे यदि विधिवत् रूप से (</span>Systematically) <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिदिन समय सारणी बनाकर अपना अध्ययन करें तो वे तनाव से बच सकते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार विद्यालयों में परीक्षा से कुछ दिन पूर्व काउंसिलिंग होनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें तनावभरी स्थिति न बने। छात्रों को अपनी प्राथमिकताएँ (</span>Priorities<span lang="hi" xml:lang="hi">) तय करने की सलाह दी जाय।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">परीक्षाओं के दौरान बैठने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंखे आदि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीने के पानी की ठीक व्यवस्था होनी चाहिए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अभिभावक मिल-बैठकर बनायें दिनचर्या:</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अधिकांश छात्र परीक्षा के दिनों में बहुत कम सोते हैं और परीक्षा के दिन से पूर्व की रात्रि बिना सोए हुए व्यतीत करते हैं। वे नींद न लेना अच्छा समझते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि यह बात ठीक नहीं है। बालक की अध्ययनशीलता की अभिभावकों को प्रशंसा करनी चाहिए और परीक्षा के दौरान उसे रात्रि में अधिक जागने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देर तक सोने के लिए हतोत्साहित करना चाहिए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5> <span lang="hi" xml:lang="hi">नियमित योग के अंतर्गत प्राणायाम और व्यायाम करने से निश्चय ही अवसाद दूर होता है। नियमानुसार विधिवत सर्वांग आसन और अनुलोम-विलोम प्राणायाम का अभ्यास छात्रों के मानसिक तनाव को दूर करने में काफी हद तक सहायक सिद्ध होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अभिभावक शिक्षक एवं छात्र तीनों को अध्ययन-दिनचर्या या समयचक्र बनाने में परस्पर सहायता करनी चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">साधारणतया परीक्षा के दौरान रात्रि में नींद न आने की बालक शिकायत करते हैं। इससे उनमें लगातार थकान एवं एकाग्रता का अभाव देखने में आता है। अत: छात्रों को परामर्श दिया जाना चाहिए कि वे निश्चिन्त होकर अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अनापेक्षित परिणाम का दबाव न दें:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परीक्षाएँ ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि परीक्षा का अनपेक्षित परिणाम भी विद्यार्थियों में मानसिक तनाव उत्पन्न कर देता है। अच्छा परिणाम न पाने के कारण बच्चों को ताने और व्यंग सुनने का डर सताने लगता है। ऐसी स्थिति में अभिभावक यह ध्यान दें कि उनकी भूमिका बच्चे को दिलासा देकर अवसाद (</span>Depression<span lang="hi" xml:lang="hi">) एवं ऐसे डर से बाहर लाने की होनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि अवसाद बढ़ाने की। बच्चे को डाँटने-डपटने और आलोचना करने से उसका मनोबल कमजोर होता है। बच्चे को यह भी एहसास दिलाना चाहिए कि परीक्षा-परिणाम के ठीक न होने के कारण माता-पिता का रवैया नकारात्मक नहीं होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे वह निराशा एवं हीन भावना से ग्रसित न हों।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परीक्षा-परिणाम को लेकर अभिभावक भी बच्चों के सामने तनावग्रस्त न हों। ध्यान रहे ऐसे समय बच्चों को सहानुभूति और दिलासा देने की जरूरत होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विषय चुनाव की स्वतंत्रता:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परीक्षा समुचित परिणाम के साथ संपन्न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके लिए प्रवेश के समय ही बच्चों को अपनी अभिरुचि एवं रुझान के अनुरूप विषय चुनने की स्वतंत्रता देनी चाहिए। जहाँ इससे उसकी एकाग्रता बढ़ेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं वे मानसिक तनाव एवं मनोरोगों से दूर रहेंगे। विषय महत्वपूर्ण नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु उसके प्रति छात्रों का समर्पण माने रखता है। अत: अभिभावकों को चाहिए कि वे अपने बच्चों पर अनावश्यक दबाव न डालें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उन्हें अध्ययन का समुचित वातावरण दें और उनके साथ प्यार से पेश आएँ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी महत्वाकांक्षा बच्चों पर न थोपें:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देखा गया है अभिभावकों की बच्चों से अत्यधिक महत्वाकांक्षा होती है। यदि बच्चा उनकी आकांक्षा के अनुरूप खरा नहीं उतरा तो उसकी आलोचना की जाती है। जो उसे अवसाद (डिप्रेशन) की ओर ले जाती है और वह हताशा से घिरता रहता है। ऐसे में बच्चे पलायनवादी प्रवृत्ति अपना लेते हैं। उच्च रक्तचाप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूख न लगना आदि लक्षण दिखाई पड़ने लगते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अधिक गृहकार्य देने के कारण भी तनाव आता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके कारण बच्चे अनिद्रा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिड़चिड़ेपन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूख न लगने आदि समस्याओं से घिरते जाते हैं। ऐसे अवसाद के शिकार बच्चों को परामर्श (काउंसलिंग) की विशेष आवश्यकता होती है। ऐसे मामलों में परिवार में माता-पिता या भाई-बहन का उनके प्रति मित्रवत व्यवहार ही बच्चे की सहायता कर सकेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चों में योग-प्राणायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परमात्म सत्ता के प्रति यथासंभव आस्था जगाएँ। प्रोत्साहित करें। बच्चे के स्वभाव के अनुरूप किसी विषय में असफल होने पर अन्य संभावनाएँ भी खोजें। केवल एक असफलता के कारण बच्चे को निरुत्साहित न करें। क्योंकि यही उसकी प्रतिभा के मूल्यांकन का अंतिम मापदंड नहीं है। उसे प्रेमपूर्वक असफलता के कारणों को समझाएँ ताकि बच्चा किसी भी असफलता का साहसपूर्वक सामना करना सीख सके और भविष्य में असफल होने पर अवसाद के कारण हार मानकर बैठ न जाए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तुत: माता-पिता एवं शिक्षक का संतुलित एवं मनोवैज्ञानिक सहानुभूतिपरक व्यवहार जहां बच्चे में सुधार ला सकता है वही योग-प्राणायाम उसके विकास में सहायक सिद्ध हो सकता है। तब उत्तम परिणाम के लिए किसी को चिंतित होना नहीं पड़ेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चों की चिड़चिड़ाहट को समझें:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ब</span><span lang="hi" xml:lang="hi">च्चे परीक्षाकाल में मानसिक तनाव की स्थिति में होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उनका मन पढ़ाई से उचट जाता है। कई घण्टों तक सिर में दर्द रहना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छोटी-छोटी बातों पर नाराज होना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत्यधिक पसीना आना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेचैनी अनुभव करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी काम में रुचि न होना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हतोत्साहित या चिड़चिड़ापन और नकारात्मक सोच रखना आदि लक्षण पाए जाने पर उसे मनोचिकित्सक के पास ले जाना चाहिए। यदि उपर्युक्त लक्षणों के पाए जाने पर उचित निदान न किया जाए तो छात्र के गलत रास्ते पर जाने का भय रहता है। छात्रों से जरूरत से ज्यादा आशा करने के कारण भी वे मानसिक तनाव के कारण अवसाद की स्थिति में आ सकते हैं। अत: अभिभावक जब भी बच्चों में लगातार तनाव के कारण चिड़चिड़ापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छोटी-छोटी बातों में बहुत क्रोध करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नींद न आना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूख-प्यास न लगना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खोया-खोया सा रहना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अकेलापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुमसुम बैठे रहना आदि लक्षणों को देखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उन्हें बच्चों की भावनाओं एवं मानसिकता को समझने की कोशिश करनी चाहिए।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>कार्यशाला</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>मार्च</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2015 21:45:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>विश्व को जरूरत है नारी के श्रद्धासिक्त अभिसिंचन की  माता ही यदि हो अज्ञान, बच्चे कैसे बनें महान</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. विजय कुमार मिश्र</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3005/the-world-needs-the-devotional-empowerment-of-women--if-ignorance-is-the-mother--how-can-children-become-great"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/20.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   यहाँ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">माता का आशय राष्ट्र की नारी शक्ति से है और बच्चों का संबंध देश की प्रजा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जनता व जनसंख्या से। भारतीय ऋषियों ने नारी को राष्ट्र लक्ष्मी एवं विश्व की निर्मात्री शक्ति कहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह राष्ट्ररूपी परिवार की रीढ़ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धुरी है। उसकी उत्कृष्टता-विकृष्टता पर राष्ट्र की उत्कृष्टता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्थान एवं पतन निर्भर करता है। समुन्नत नारी ही विश्व को धरती का स्वर्ग बना पाती है। शास्त्रों में उसे ब्रह्मविद्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पवित्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ममता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशिक्षिका की गरिमा से नवाजा गया है। यहां तक कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">संसार में जो कुछ भी सर्वोत्कृष्ट है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें नारीत्व प्रवाहमान बताया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्हीं विभूतियों के समुच्चय के कारण नारी जहां कदम रखती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नव सृजन का प्रवाह फूट पड़ता है। सतत सक्रियता उमड़ पड़ती है। घर देवालय बन जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज नवसृजन से महक उठता है। जनमानस अभाव व दरिद्रता से मुक्त हो उठता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र दृढ़ संकल्पशीलता का पुंज बनकर खड़ा होता है और विश्व से वसुधैव कुटुम्बकम की प्रतिध्वनि गूंज उठती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ना री एक होकर भी अनेक आयामों से कार्य करती है। संबंधों में वह माता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगिनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पत्नी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कन्या सभी दायित्व एक ही साथ पूर्ण करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो सामाजिक क्षेत्र में कर्मठता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्ठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदनशीलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्पक्षता की प्रतिमूर्ति बनकर खड़ी होती है। वहीं राष्ट्रीय व वैश्विक परिपे्रक्ष्य में असीम धैर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नि:श्रेयस के साथ निर्माण व अभ्युदय का दायित्व निभाती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वह अनेक बार नैपथ्य में डाली गयी पर दिव्य सामर्थ्यबोध से पुन:-पुन: विश्वास रूपी नेतृत्व का आधार बनकर खड़ी हुई। वृहत्संहिता में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषाणां सहस्रं च सती नारी समुद्धरेत्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का वर्णन है अर्थात् सती स्त्री अपने पति का ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने उत्कृष्ट आचरण की सामर्थ्य से सहस्रों पुरुषों का कल्याण करती है (यहां सती का आशय नारी की उत्कृष्टता से है। दूसरे शब्दों में कहें तो </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">नारी को स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसन्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समुन्नत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्कृष्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वावलम्बी बनाये रखने का दायित्व समाज का है। उसकी क्षमता को विकसित करने में लगाया धन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनोयोग एवं समय समाज एवं राष्ट्र को असंख्यों गुना होकर लौटता है। नारी जितना समर्थ बनेगी राष्ट्र की संतानें उतना ही सशक्तव समृद्ध होंगी क्योंकि वह निर्मात्री जो है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सीमाओं से परे होती है मां:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हर राष्ट्र के नागरिक नारी शक्तिके रक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रस से निर्मित होते हैं। उनमें विद्यमान चेतना का अभिसिंचन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिपोषण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कारों का विकास मां रूपी नारी द्वारा ही संभव बनता है। ऐसे में यदि नारी का रक्तव रस परिपोषित होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो नारी पोषित होगी। तभी नारी की संतानें स्वस्थ-समुन्नत पैदा होंगी और राष्ट्र व विश्व प्रखर पीढ़ी से भर उठेगा। यदि मां ही दुर्बल होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो विश्व से अनीति-अत्याचार मिटाने वाले सूरमा कहां से आयेंगे। ये सूरमा वैज्ञानिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कलाकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्वान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दार्शनिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज सेवक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशासक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनेता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनीषी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्योगपति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महापुरुष के रूप में हों या देश की सीमा रक्षा करने वाले वीर सिपाही। वे सभी मां की गोद में खेल-खेल कर ही धरती मां को पुष्पित-पल्लवित करते हैं। इसीलिए नारी किसी एक व्यक्तिकी जननी नहीं हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु उसे राष्ट्र मां</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व माता की गरिमा देना भी कम है। वास्तव में एक-एक नारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह किसी भी देश की सीमा में निवास क्यों न करती हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">है वह जगदजननी ही। क्योंकि मातृत्व शक्तिके कारण वह सदा सीमाओं से परे होती है। अत: उसे उचित सम्मान मिलना ही चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वह देवी है:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नारी देवी कही गयी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देवता उसके अनुचर। इसलिए कि वह अल्प में ही संतुष्ट होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि अनुदान-वरदान वृहद स्तर पर लुटाती है। संसार में कबीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समर्थ गुरु रामदास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संत रविदार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वंदा वैरागी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संत तुकाराम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य चाणक्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राम-कृष्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महर्षि रमण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महर्षि अरविंद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरदार भगतसिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असफाक उल्ला खां</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रामप्रसाद बिस्मिल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चंद्रशेखर आज़ाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी विवेकानंद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुभाष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गांधी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पं० श्री राम शर्मा आचार्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">से लेकर वर्तमान राष्ट्रसंत योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषिकल्प श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण महाराज जैसे अनेक युग दृष्टा हैं जिन्होंने देवत्व की दिव्य धाराओं को साधिकार धरा पर उतारने में समर्थ हुए। वह सभी किसी न किसी मां की कोख से ही जन्में। इन दिव्य पुत्रों में देवत्व से परिपूरित संस्कार उनकी माताओं ने ही भरे हैं। इससे स्वत: सिद्ध होता है कि जो जीवन में देवत्व जागृत करे उसे देवी नहीं तो और क्या कहें</span>?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">यही है आत्मबोध का समय:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बड़े दुख का विषय है कि इतनी दिव्यता से ओतप्रोत नारी शक्तिके लिए </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">संयुक्तराष्ट्र संघ</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">एक दिवस</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">घोषित करके उसके उत्थान की सोचना पड़ा। नारी जाति की यह दुर्बलता-दयनीयता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परावलम्बी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पददलित जिंदगी का कारण कहीं अलग नहीं हो सकते। इसी समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी विश्व की उसकी ही संतानों ने उसे उपेक्षा एवं पिछड़ेपन का न केवल शिकार बना दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके अंत: की गहराई तक अबला होने का भाव भरकर नारी वर्ग को हीनता के स्तर तक पहुँचाया। यद्यपि उसकी मौलिकता आज भी दिव्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जरूरत है नारी को आत्मबोध कराने की। उसकी भावना को समुचित सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्नेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रोत्साहन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्कृ ष्ट संकल्पना से भरा जा सका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो नारी के व्यक्तित्व पर जमी राख हटेगी और वह पुन: अभ्युदय प्राप्त करेगी। जैसे अंगारे पर यदि राख की परत अंगारे की ज्वलनशीलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताप की प्रचंडता को प्रकट नहीं होने देती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ठीक  वैसे ही आज की नारी भी कोयले के ढेर में उपेक्षित पड़े हीरे की तरह हो गई है। अब व्यक्तिगत स्तर से संगठनात्मक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवैधानिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरकारी व वैश्विक सहकार भाव से नारी को पुन: उसकी गरिमा दिलाना ही होगा। इसके लिए हर स्तर पर प्रयास जरूरी है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नारी का सम्मान जहां है:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रथम जरूरत है घर-परिवार की चहरदीवारी के बीच ही उसे अपनों के बीच समुचित सम्मान मिले। पर्दा से कसी दासीभाव से हटकर उसे देखा जाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लड़का-लड़की के बीच भेदनीति बदली जाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे भावनात्मक पोषण एवं तर्क-तथ्यों के सहारे मौलिकता से जोड़ें। नारी की भावुक मानसिकता के दोहन एवं शोषण से उसे बचाया जाय। घर में पिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देवर सभी उसे प्रसन्नता प्रदान करें और उसे पारिवारिक दायित्वों के निर्णयों में भागीदार बनायें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार वह अप्रत्यक्ष रूप से लोहे की जंजीरों में जकड़ी दासी मानसिकता से मुक्तहोगी। इसी के साथ उसे सोने के जंजीरों से भी मुक्तकरना पड़ेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रमणी नहीं कर्मणी है:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैदिक युग के अवसान का सबसे बड़ा दंड नारी जाति को मिला। उसकी न केवल प्रतिष्ठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गरिमा खोई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु उसे भोग की वस्तु के रूप में परोसा जाने लगा। राजतंत्र से लेकर समाज तंत्र ने उसका दोहन ही किया। दोहन के पराकाष्ठा की परिणति उसे दास जैसी हीनता भरे जीवन के रूप में चुकाना पड़ा। आज वह परिस्थितियां बदलीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज हरम नहीं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर नारी आज भी छली जा रही है। उसे सोने-चांदी से लादकर रूप-लावण्य की गुड़िया बनाई जा रही है। आश्चर्य कि इसमें वह नारी भी खुश है। यह दूसरे प्रकार का नारी जाति के प्रति धोखा है। जरूरत है नारी को ऐसी विसंगतियों से बचाने की।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नारी शक्ति को बढ़ावा:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यद्यपि आज वह उच्च शिक्षा में भी पारंगत हो रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जरूरत है उसकी गरिमा अनुसार बौद्धिक एवं व्यवहारिक प्रशिक्षण की। कभी वह युद्ध संचालन में कुशल थी। कैकई और दशरथ का उदाहरण सामने है। अत: उसे हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की जरूरत है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नारी में ऐसे कौशल भरे जाएं कि वह अपने जीवन के कुशल संचालन के साथ-साथ आवश्यकतानुसार उपार्जन भी कर सके। तथा यथा अवसर दूसरों को भी आश्रय व सहयोग दे सके। क्योंकि जिस समाज व देश में स्वाभिमानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रमशील</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुसंस्कृत नारी समूह है वह समाज प्रगति करेगा ही।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जरूरी है श्रमशक्ति का निखार:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अनेक देशों में पुरुषों द्वारा भोजन पकाने आदि घरेलू कार्यों में नारी का हाथ बटाने की श्रेष्ठ परम्परा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे उसे घर की सुव्यवस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वच्छता में मदद मिलती ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु स्वयं के सुविकसित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुसंस्कृत एवं सुयोग्य बनने का समय भी मिलता है। पर विश्व की आधी आबादी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज भी अपनी श्रम शक्तिको उपेक्षित रखने के लिए विवश है। आवश्यकता है नारी की श्रम शक्तिको जागृत करके उसे सुनियोजित करने की। तभी विश्व का समुचित निर्माण संभव होगा। युग परिवर्तन के द्वार तभी खुलेंगे जब युग के साथ नारी कदम से कदम मिलाकर बढ़ेगी। मानव में देवत्व एवं धरती पर स्वर्ग लाने के लिए पहले नारी शक्तिको निखारना होगा। पर पहल इसके लिए पुरुष समाज को ही करनी पड़ेगी। स्वस्थ शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुसंस्कारी जीवन शैली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संतुलित मनोबल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुभव और कौशल जागरण से गढ़ी गयी नारी ही राष्ट्रीय-वैश्विक दायित्व निभाने योग्य बन सकती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">परम पूज्य योगऋषि के पावन सान्निध्य में </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नारी जागरण :</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परम पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज के पावन सान्निध्य में पतंजलि योगपीठ नारी जागरण आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। वैसे तो पिछले दो दशकों से श्रद्धेय स्वामी जी महाराज के बहुआयामी विराट् कर्तृत्व में महिलाओं की अहम् भूमिका रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन दिसम्बर </span>2008<span lang="hi" xml:lang="hi"> में विधिवत् महिला पतंजलि योग समिति की स्थापना हुई। आज पूरे राष्ट्रभर में </span>20<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>25<span lang="hi" xml:lang="hi"> लाख महिलाएँ अपने गुरुवर के सपनों का भारत बनाने में पूर्ण ईमानदारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिम्मेदारी व समझदारी से हर क्षेत्र में पूर्ण समर्पण भाव से अपनी सेवाएँ अर्पित कर रही हैं। चाहे योगक्रान्ति रही हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे सत्ता परिवर्तन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद व स्वदेशी की क्रान्ति हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या फिर वर्तमान में चल रही शिक्षा क्रान्ति हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहनों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। आज प्रतिदिन सुबह-सुबह लाखों की संख्या में बहनें नि:शुल्क योग कक्षाएं लगाकर अपने वतन को आरोग्य अर्पित कर रही हैं तथा पूज्य गुरुवर के स्वस्थ भारत के स्वप्न को साकार कर रही है। दिन में आयुर्वेद-स्वदेशी के प्रचार-प्रसार के माध्यम से अपने देश की अर्थव्यवस्था को सशक्तबनाते हुए समृद्ध भारत निर्माण में अपनी आहुति प्रदान कर रही हैं। वैदिक धर्मानुसार बाल संस्कार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वृक्षारोपण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आहारविद्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुटीर उद्योग आदि अनेक प्रयास करते हुए अपने वतन तथा अपने गुरुदेव के अरमानों को पूर्ण करने हेतु इस विराट् यज्ञ में एक आहुति का काम कर रही हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज देश भर में लगभग प्रत्येक जिले व तहसील स्तर पर महिला पतंजलि योग समिति गठित हो चुकी है तथा पतंजलि योगपीठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार में </span>100<span lang="hi" xml:lang="hi"> बहनें आजीवन ब्रह्मचारिणी रहकर राष्ट्रसेवा व भागवत सेवा की दीक्षा लेकर वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शन व व्याकरण आदि का अध्ययन कर रही हैं। अपने माता-पिता के कुल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ-साथ ब्रह्मकुल या भागवत कुल को उत्कृष्टता की ओर ले जा रही है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही विश्वस्तर पर योग-प्राणायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद को आधार बनाकर तप पूर्ण जीवन से जोड़ा जा रहा है। लक्ष्य है दिव्य तपस्विनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रनिष्ठ इन नारियों को वैश्विक नारी जागरण के लिए खड़ा करके विश्व को समुन्नत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सशक्तबनाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व की आधी आबादी के रूप में नारी शक्ति को आगे लाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके हाथ में पारिवारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशासनिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनैतिक एवं आध्यात्मिक आंदोलन का नेतृत्व सौंपना। तभी विश्व निर्माण का मार्ग प्रशस्त होगा। क्योंकि नारी निर्मात्री है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अपनी संतानों का निर्माण कर सकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके लिए विश्व निर्माण कठिन नहीं। वैदिक परम्परा में भी नर-नारी दोनों साथ मिलकर कदम उठाते थे। आज युग पुन: पुकार रहा है कि विश्व की मातायें सृजन में लगें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>मार्च</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2015 21:43:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अनुभूति आपकी</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>Negative Symptoms of Schizophrenia</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हेतु सारस्वतारिष्ट श्रेष्ठ औषधि साबित हुई</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मुझे डिप्रेशन था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं पढ़ नहीं पा रहा था। तब मैंने डॉ. से बोला कि मैं ढंग से पढ़ नहीं पाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुझे डिप्रेशन है। डॉ. जोएल को लगा मुझे </span>''Schizophrenia<span lang="hi" xml:lang="hi">" है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने मुझे </span>Risperidone <span lang="hi" xml:lang="hi">नामक गोली दी जो मेरे लिए अत्यन्त पीड़ादायक साबित हुई।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पुन: </span>Amisulpride <span lang="hi" xml:lang="hi">200</span>mg sustained <span lang="hi" xml:lang="hi">टेबलेट लिया तो उससे भी मुझे अत्यन्त पीड़ा हुई। ऐसा लगा की कोई तेज़ाब मेरे मस्तिष्क में चला गया है एवं मेरी नाड़ियों को दूषित कर रहा है। मुझे लगा कि </span>sucide <span lang="hi" xml:lang="hi">कर लेना चाहिए। एक अन्य</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3006/anubhuti-apki"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/531.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>Negative Symptoms of Schizophrenia</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हेतु सारस्वतारिष्ट श्रेष्ठ औषधि साबित हुई</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मुझे डिप्रेशन था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं पढ़ नहीं पा रहा था। तब मैंने डॉ. से बोला कि मैं ढंग से पढ़ नहीं पाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुझे डिप्रेशन है। डॉ. जोएल को लगा मुझे </span>''Schizophrenia<span lang="hi" xml:lang="hi">" है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने मुझे </span>Risperidone <span lang="hi" xml:lang="hi">नामक गोली दी जो मेरे लिए अत्यन्त पीड़ादायक साबित हुई।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पुन: </span>Amisulpride <span lang="hi" xml:lang="hi">200</span>mg sustained <span lang="hi" xml:lang="hi">टेबलेट लिया तो उससे भी मुझे अत्यन्त पीड़ा हुई। ऐसा लगा की कोई तेज़ाब मेरे मस्तिष्क में चला गया है एवं मेरी नाड़ियों को दूषित कर रहा है। मुझे लगा कि </span>sucide <span lang="hi" xml:lang="hi">कर लेना चाहिए। एक अन्य डॉक्टर ने मुझे कहा था की </span>Amisulpride <span lang="hi" xml:lang="hi">से ही मेरा यह रोग ठीक हुआ था। अत: मैंने बार-बार </span>Amisulpride <span lang="hi" xml:lang="hi">लिया। हर बार मुझे सन्निपातज उन्माद जैसा लगा। </span>Suicidal <span lang="hi" xml:lang="hi">लगा। इस गोली को खाने पर अत्यन्त भयावह दशा हो जाती। अत्यन्त तीक्ष्ण द्वेषपूर्ण मन:स्थिति बनने लगी। तब चिकित्सकों के निर्देश पर इस अत्यन्त पीड़ादायक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सन्निपातज उन्माद जैसी अवस्था को प्राप्त कराने वाली </span>Amisulpride <span lang="hi" xml:lang="hi">को लेने के साथ-साथ हमने पतंजलि की सारस्वतारिष्ट भी लेना प्रारम्भ किया। सारस्वतारिष्ट इतनी अद्भुत औषधि साबित हुई कि </span>Amisulpride <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसी अत्यन्त पीड़ादायक ड्रग के प्रभाव को भी इसने न्यून कर दिया। अर्थात् दोनों - ड्रग और औषधि लेने पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">औषधि अर्थात् सारस्वतारिष्ट का सकारात्मक प्रभाव दिखने लगा। दिव्य पतंजलि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सारस्वतारिष्ट</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">सन्निपातज उन्माद को भी ठीक करने में अत्यन्त लाभदायक औषधि सिद्ध हुई। आज मैं अपने प्रत्यक्ष अनुभव से कहता हूँ कि सारस्वतारिष्ट औषध का सेवन सर्वश्रेष्ठ है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिन केमिकल से कभी परमाणु प्रक्षेपास्त्र बनाए जाते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हीं का उपयोग </span>''Schizophrenia<span lang="hi" xml:lang="hi"> " में होते हैं। जैसे </span>Atom Bomb<span lang="hi" xml:lang="hi"> विध्वंस करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे ही इनके </span>Dopamine Antagonist<span lang="hi" xml:lang="hi"> करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मस्तिष्क में विस्फोट करते हैं। </span>Atom Bomb<span lang="hi" xml:lang="hi"> और </span>Atom Bomb <span lang="hi" xml:lang="hi">और</span> Dopamine Antagonist <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों में केमिकल होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं बार-बार मूल्यांकन के पश्चात कह रहा हूँ कि इसका सेवन करने एवं श्रेष्ठ आचरण से लाभ होता है। मैं आयुर्वेद के महान आचार्य धन्वन्तरि जी महाराज को कोटि-कोटि प्रणाम करता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने अपने पुरुषार्थ से यह अत्यन्त दिव्य एवं अत्यंत अद्भुत औषधि का निर्माण किया। मैं वर्तमान समय अर्थात् विक्रम सम्वत २०७२ के अग्रणी आयुर्वेदाचार्य </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण जी</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">एवं स्वामी रामदेव जी महाराज का कोटि-कोटि धन्यवाद करता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने अपने पुरुषार्थ से इस औषधि का ठीक-ठीक निर्माण कराया और जन-जन तक पहुँचाया। मैं सभी लोगों से इस औषधि का सेवन करने एवं लाभ प्राप्त करने की अभिलाषा भी रखता हूँ।</span></h5>
<h5 style="text-align:right;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी भाव से शत्-शत् प्रणाम।</span></h5>
<h5 style="text-align:right;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भवदीय</span>,</h5>
<h5 style="text-align:right;"><span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ. विवेक आर्य</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"> <span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>आँखों के लिए रामबाण बनी 'दृष्टि'</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं देवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उम्र ६४ वर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रिटायर्ड प्र. अधिकारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस हूँ। मैं इस पत्र के माध्यम से आपको ढेरोंढेर धन्यवाद देना चाहता हूँ। कारण कि लगभग दो महीने पहले अचानक मुझे बांई आंख में अज़ीब तकलीफ हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोचा चश्मा खराब हो गया है। इसलिए पुन: जाँच कराया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नया चश्मा लिया पर तकली</span><span lang="hi" xml:lang="hi">फ बरकरार रही। चूंकि घर का मुखिया हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोचा अगर घर में बात खोली तो आंखों के डॉक्टर के पास जाना पड़ेगा और अड़ोस-पड़ोस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मित्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहयोगी बंधुओं से उनका अनुभव सुन चुका था कि आंखों का डॉक्टर दस-बीस हजार सा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">फ करने में एक दिन भी नहीं लगाता और मेरी इच्छा नहीं थी कि मेडिक्लेम के दस-बीस हज़ार बर्बाद करूं। ख्याल आया आपकी नन्हीं सी शीशी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">दृष्टि</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का और उसे २५ रुपये में ले आया। रोज़ रात को सोते समय एक-एक बूंद आंख में डालने लगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज भी डाल रहा हूँ। आश्चर्य कि मैं अब काफी अच्छा महसूस कर रहा हूँ। मेरे लिए आंख की इससे अधिक रामबाण दवा नहीं दिखी। </span></h5>
<h5 style="text-align:right;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भवदीय</span>,</h5>
<h5 style="text-align:right;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देवन</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>दिव्य अनुभूति</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>मार्च</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2015 21:42:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>योगाभ्यासी भारत ही बनेगा नशा मुक्त भारत</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">रामलखन</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3007/only-india-that-practices-yoga-will-become-a-drug-free-india"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/17.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   दस</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रुपये से दस हजार रुपये तक रोज खर्च करने वाले करीब चालीस करोड़ से भी अधिक भारतीय शराब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिगरेट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बीड़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तम्बाकू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुटखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गाँजा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अफीम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाँग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पान मसाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्राउन शुगर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्मैक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चरस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिरोइन जैसी चीज़ों के आदती हैं। नशे के आदी लोग कम से कम एक दिन में दस रुपया खर्च कर ही देते हैं। इससे ऊपर पचास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सौ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दो-चार-पाँच सौ रुपये खर्च करने वालों की संख्या भी बहुत अधिक है। हजार-दो-चार-पाँच-सात हज़ार नियमित खर्च करने वालों की भी कमी नहीं है। लाखों में कुछ ऐसे हैं जो रोज दस-बीज हज़ार रुपये तक उड़ाने में भी नहीं चूकते। यदि सभी नशेड़ियों का प्रति व्यक्ति औसत खर्च 100 रुपया माना जाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भारत के 40 करोड़ नशेड़ी चालीस अरब रुपये प्रतिदिन नशे की गन्दी नाली में उड़ेल देते हैं। इतने खर्च से ही तो भारत की सम्पूर्ण सुरक्षा व्यवस्था चल रही है। फिर इससे उत्पन्न होने वाली बीमारियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक्सीडेंट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घरेलू कलह-क्लेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अश्लीलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदूषण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गन्दगी आदि को ठीक करने में भी देश का इतना ही धन बह जाता है। नशे के शिकार लोगों की मानसिक एकाग्रता भी डावांडोल होती ही होती है। फलस्वरूप वे दो घण्टे के कार्य को चार घण्टे में भी बहुत अच्छी तरह नहीं कर सकते। इसके साथ ही ऐसे लोग बहानेबाजी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बीमारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कामचोरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काला बाजारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आलस्य आदि में उससे भी ज्यादा देश को नुकसान पहुँचाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नशा पान की मृगमरीचिका:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश का बजट और नशे से जुड़े लोगों की मजबूरी पर ध्यान केन्द्रित कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनको नशे की पराधीनता से मुक्त करने के लिए नई जागृति लाई जाय तो अपना यह भारत विश्व का सिरमौर बन सकता है। स्वतंत्रता संग्राम में भारत के सभी लोगों ने एकजुटता दिखाई थी और उसे जीता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे ही इस मानसिक पराधीनता वाली आदत को युद्ध स्तर पर आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक आधार दे करके आसानी से जीता जा सकता है। अन्यथा नशा जैसी बुरी आदतों के गुलाम देश के लोग दुनिया के दु:खों की गुलामी को कैसे दूर कर सकेंगे</span>?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर साल 30-40 लाख लोग नशीले पदार्थों के सेवन से काल के गाल में समा जाते हैं। परिणामत: लोगों का पारिवारिक जीवन उजड़ जाता है और उनके आश्रित जन मौत से भी बुरी जिन्दगी जीने को विवश होते हैं। नशा की शिकार बहुत-सी गर्भवती महिलाओं के गर्भस्थ शिशुओं का विकास बाधित हो जाता है। बच्चों में विकलांगता-विमंदता का सबसे बड़ा कारण नशा भी है। दुनिया की बहुसंख्यक बीमारियों की जननी मद्यपान को ही माना जाता है। संसार की सम्पूर्ण सेनाओं और हथियारों पर जितनी सम्पदा खर्च होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उससे भी अधिक अनावश्यक खर्च मादक पदार्थों पर चढ़ जाते हैं। इस गोरख धंधे में लगे लोग ही आतंकवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चोरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डकैती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपहरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बलात्कार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चोरबाजारी जैसे कामों को बढ़ावा देने में मुख्य भूमिका निभाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी रोकथाम में देश के अनेकों जवान शहीद होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सभी नशीले पदार्थ सर्वनाश के ही निमित्त बनते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु शराब का स्थान उनमें सर्वोच्च माना जाता है। विकसित देशों में नशीले पदार्थों के ऊपर कठोर प्रतिबन्ध लग जाने के कारण इनकी उत्पादक कम्पनियाँ अपने माल की खपत के लिए अब विकासशील तथा अविकसित देशों को का निशाना बना रही हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मद्यपान ऐसी मृगमरीचिका है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके पीछे भागने वाला व्यक्ति अपनी सम्पत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्बन्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा गंवाने के सिवाय कुछ भी नहीं पाता। यह अतृप्ति का ऐसा दलदल है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें मनुष्य पाता कुछ नहीं परन्तु बहुत कुछ पाने की चाहत में डूबता ही चला जाता है। मादक वासनायें इन्द्रिय लोलुपता की ऐसी प्रतीति हैं कि जिन्हें पाने के बाद इन्द्रियाँ कभी तृप्त नहीं होती। वरन् चाहत विकराल रूप धारण करती ही जाती हैं। किसी देश को नष्ट करने या विनाश के कगार पर खड़ा करने में उसकी युवा पीढ़ी में मादकता के सेवन की आदत है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राकृतिक पोषक पदार्थों को सड़ा-गला कर तैयार की जाने वाली शराब पीने के कुछ ही देर बाद इसका अल्कोहल खून में मिलकर रक्त कोशिकाओं के माध्यम से सारे शरीर में फैल जाता है। इसके विजातीय विष को बाहर निकालने के लिए शरीर के सम्पूर्ण तंत्रिका-तंत्र को बहुत अधिक मेहनत करनी पड़ती है। किडनी पर अतिरिक्त बोझ बढ़ जाता है तथा विष को बाहर निकालने के लिए उसे तीव्र गति से कार्य करते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेशाब के रूप में बाहर निकालना पड़ता है। सर्वाधिक संवेदनशील अंतड़ियों में नशीला पदार्थ पहुँचकर व्यक्ति को पेट का रोगी बना देता है। मस्तिष्क के कोषों को निष्क्रिय कर उन्हें नष्ट करता जाता है। मस्तिष्क के सूक्ष्म कोष एक बार क्षतिग्रस्त हो जाने पर कभी भी सुचारुरीति से काम नहीं कर पाते। स्नायु मण्डल इतने कमज़ोर व शिथिल हो जाते हैं कि उन्हें वासनाओं के सामने घुटने टेकना ही पड़ता है। फिर तो गिरावट का सिलसिला चल पड़ता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शराब से स्फूर्ति और प्रेरणा वाली धारणा एकदम निराधार है। मदिरापान करते ही व्यक्ति मानसिक के साथ शारीरिक गतिविधियों पर संयम रखने में अक्षम होने लगता है। फलस्वरूप वह उन्मत्त व्यवहार करता हुआ आत्म-नियंत्रणहीन हो गिरता जाता है। स्मृति ह्रास होने से उसमें निर्णय शक्ति की कमी हो जाती है। कमज़ोरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिड़चिड़ेपन के कारण वह अपराधिक वृत्तियों की ओर उन्मुख होने लगता है। उसके रक्त संचरण क्रियाओं में अस्त-व्यस्तता आ जाती है। ऐसी क्रियाओं का सीधा असर दिल व दिमाग पर पड़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे रक्त अल्पता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तचाप जैसी बीमारियां घेरने लगती हैं। मद्यपान की निरन्तरता पेट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यकृत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फेफड़े जैसे अति संवेदनशील अंगों को बिगाड़ कर नपुंसकता की ओर ढकेलती है। ऐसे खोखले व्यक्ति गृह-कलह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक तंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बीमारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संतानों में विकलांगता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पागलपन के शिकार होते हैं। जाम के नशे में डूबा व्यक्ति किसी काम का नहीं होता। देखा गया है कि करोड़ों लोग शराब की बोतलों से बह गये हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हम क्या करें</span>?:</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में मादक द्रव्यों के पूर्ण बहिष्कार के लिए देश के युवा जी-जान से जुट जायें। इसके लिए भारत के सभी जिलों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गाँव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कस्बे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शहर के गली-मुहल्लों में जागरूकता लाने में पूर्ण अभियान चलायें। पैदल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साइकिल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टू-व्हीलर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फोर-व्हीलर का उपयोग कर जन-जन तक नशा मुक्ति के संदेश पहुँचाये जाएं। साथ ही उनमें विश्वास पैदा किया जाय कि योग-प्राणायाम युक्त जीवन-शैली से पुराने व्यसनों की लत सहज रीति से छोड़ी जा सकती है। व्यसन मुक्ति से घर-परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज ही नहीं पूरा राष्ट्र नैतिक सम्पन्न राष्ट्र बन जायेगा। व्यसनों की बेड़ियों से मुक्त लोगों की कार्य क्षमता और ओजश्विता बढ़ेगी। तब स्वर्णिम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ भारत का निर्माण किया जा सकेगा। दिव्य भारत का मार्ग प्रशस्त होगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ ही दशक पहले तक अफीमची कहे जाने वाले चीनी लोगों को वहां के कुछ जागरुक लोगों ने पूर्ण मद्यनिषेध के बंधन में बाँध दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अब चीन की गिनती महाशक्तियों में होने लगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नशीले पदार्थों से बचने वालों की मजबूत इच्छा शक्ति पर ही विकसित समाज खड़ा होगा और समुन्नत राष्ट्र का निर्माण होगा। अन्यथा अधिक राजस्व बटोरने की लालच में भारत में उत्तम कार्यों की सफलता असंभव है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यदि स्वस्थ और समुन्नत राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो त्याग-बलिदान के साथ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा भारत – व्यसन मुक्त भारत</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का शंखनाद करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मादक पदार्थों के उत्पादन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विपणन और विज्ञापन में प्रशासन ने ही लाइसेंस देकर बढ़ावा दिया है। हर गाँव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुहल्ले व सड़कों पर इनकी दुकानें धड़ल्ले से बढ़ती जा रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन पर लगाम लगना चाहिए। प्रजातान्त्रिक प्रणाली में सरकारें विकास को बढ़ावा देने के नाम पर चुनी जाती हैं। यदि नागरिकों का उत्थान चाहते हैं तो अब भारतीय परम्परा अनुसार उत्थान का संकल्प लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण इच्छा शक्ति से मादक द्रव्यों पर प्रतिबन्ध लगायें। जो उत्पाद सबके स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्बन्ध और सौन्दर्य को नुकसान पहुँचाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे बन्द करने के लिए मूलभूत अधिकारों की तरह देश में लागू किया जाना चाहिए। तम्बाकू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुटखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अफीम जैसे उत्पादों को सरकारी नियंत्रण की फैक्ट्रीयों में ही प्रोसेसिंग करायी जाय। अन्यथा सर्वनाश की जड़ नशा दिनों दिन और ही दु:खदायी स्वरूप धारण करते हुए माँ भारती को भी अपाहिज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोगालय बना देगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अतिथि देवो भव की संस्कृति वाले भारतवासियों का आहार-विहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार कभी सात्विक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेदिक और विश्व हितकारी वाला था। उसी भारत को सोने की चिड़िया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वगुरु कहा जाता था। जरुरत है सरकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संतगण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संगठन एवं देश के नर-नारी एक साथ नशा मुक्ति का संकल्प लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत को पुन: दिव्य राष्ट्र बनायें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र-चिंतन</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>मार्च</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2015 21:40:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>लम्बी बीमारी से पीड़ित अवसादग्रस्त लोगों में सहायक है 'योग’</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. शरली टेल्लस</span></strong><strong><span>, </span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">निर्देशिका</span></strong><strong><span>, </span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन व ठ्ठ शिवांगी पाठक</span></strong><strong><span>, </span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">रिसर्च फैलो</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3008/-yoga--is-helpful-in-depressed-people-suffering-from-chronic-illness"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/38.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   हर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग जीवन के लिए घातक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर अवसाद की अवस्था खतरनाक मानी जाती है। यह व्यक्ति के जीवन को तोड़कर रख देती है। अवसाद का मूल कारण है लम्बी बीमारी। इस संदर्भ में हम 48 वर्षीय पुरुष एवं 40 व 60 वर्षीय दो महिलाओं की दशा पर दृष्टि डालेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो बाद में लम्बी बीमारियों के कारण अवसाद के शिकार बने।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">48 वर्ष के श्री </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">क</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने कार्य में व्यस्त रहते हैं और अपने दोनों बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलाना चाहते हैं। इसके अलावा वह अपनी पत्नी को सभी आरामदायक सुविधायें उपलब्ध कराना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनकी वे निरन्तर मांग करती रहती हैं। इन कारणों से ही श्री क तनाव ग्रस्त रहते हैं। वे शारीरिक व्यायाम और समय पर भोजन करने के लिए भी मुश्किल से ही समय निकाल पाते हैं। वह </span>Type-II -II diabetes or boarderline hypertension<span lang="hi" xml:lang="hi"> से पीड़ित हो चुके हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे उनका तनाव और भी बढ़ जाता है। वह निरन्तर यह चिन्ता करते रहते हैं कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">यदि वह बीमार हो गये तो उनके परिवार का जीवन यापन व जीवन प्रबंध किस प्रकार से होगा।</span>‘</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीमति </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ख</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">60 वर्षीया हैं। पिछले कई वर्षों से उनका वजन बढ़ रहा है। उन्हें घुटनों में तीव्र दर्द की भी शिकायत रहती है। चिकित्सकीय परीक्षण कराने पर पता चला कि उन्हें </span>Osteo-Arthritis <span lang="hi" xml:lang="hi">नामक बीमारी है। वह अपना वजन कम करने के लिए व्यायाम करना चाहती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु घुटनों में तीव्र दर्द होने के कारण ऐसा नहीं कर पाती। यहाँ तक कि वे अपने पड़ोसी के साथ बाजार भी नहीं जा पातीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें अक्सर आनंदित महसूस करती थी। अब वह मंदिर जाने में भी पीड़ा का अनुभव करती हैं। अब सभी कार्य उनके लिए पीड़ादायक हो गये हैं।  इसी वजह से मिजेस </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ख</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">अवसाद (</span>Depression<span lang="hi" xml:lang="hi">) का अनुभव करने लगी हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कु० </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">चालीस वर्षीय स्वतंत्र महिला हैं। वह अपने कार्यक्षेत्र में बहुत सफल हैं। यद्यपि उन्हें तीव्र अस्थमा है और जब भी मौसम बदलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें छींके सहित बुखार आता है तथा आंख और नाक से निरन्तर पानी बहने लगता है। वह </span>Antihistamine <span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं लेना चाहतीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि इसकी वजह से वह निद्रालु अनुभव करती हैं। ऐसी परिस्थितियों में वह तनाव ग्रस्त महसूस करने लगी हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जीर्ण रोग भी एक कारण:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जीर्ण बीमारी भी लम्बे समय तक चलने वाली स्थिति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे हम नियंत्रित कर सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु पूर्ण रूप से इसका इलाज कठिन है। जीर्ण बीमारी पूरे विश्व में एक बड़ी जनसंख्या को प्रभावित कर रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े के अनुसार जीर्ण बीमारियाँ समय से पूर्व मृत्यु का एक बहुत बड़ा कारण भी बन रही है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय संबंधी बीमारी </span>(Heart Diseases<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैंसर (</span>Cancer<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्ट्रोक (</span>Stroke<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुमेह (</span>Diabetes<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थराइटिस (</span>Arthritis<span lang="hi" xml:lang="hi">) तथा मोटापा जीर्ण बीमारियों की परिणति भी है। जो इन बीमारियों से पीड़ित होते हैं वह अवसाद ग्रस्त भी हो जाते हैं। यहाँ तक कि अवसाद जीर्ण बीमारियों से होने वाली परेशानियों में से एक है। जीर्ण बीमारियों के कारण होने वाला अवसाद </span>Reactive <span lang="hi" xml:lang="hi">अवसाद के नाम से जाना जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अधिकांशत: जीर्ण बीमारियों से ग्रसित होने वाले लोग निराशावादी और दु:खी होते हैं। कुछ परिस्थितियों में तो जीर्ण बीमारियों के कारण शरीर पर होने वाले प्रभाव या जीर्ण बीमारियों के उपचार के लिए प्रयोग किये जाने वाली दवाईयाँ भी अवसाद का कारण बनती हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">अवसाद</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">होने के कई अन्य कारण भी होते हैं जैसे दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गतिशीलता में कमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आय में कमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खर्च में अधिकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेरोजगारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपमान जनक संबंध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लम्बे समय तक कार्यस्थल पर तनाव आदि। यदि आप अवसाद ग्रस्त होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इस प्रकार का अनुभव आपके दैनिक जीवन को प्रभावित करता है और आपके दर्द का कारण भी बनता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अवसाद के अन्य कारण :</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">निराशावादी भावनायें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">लगातार उदास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिंतित या खाली रहने की भावना।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अपराध या लाचारी की भावनायें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">चिड़चिड़ापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेचैनी।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिरदर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐंठन या पाचन संबंधी समस्यायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो इलाज उपचार के बाद भी ठीक नहीं हो पाते।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सरल निर्णय लेने में भी असमर्थता जैसे कि दुकान पर समान लेने जाऊँ या ना जाऊँ वाली मनोदशा।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जो आदतें खुशी महसूस कराती थीं उनमें भी अरुचि आना।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">थकान व ऊर्जा का अभाव।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">एकाग्रता में मुश्किल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विवरणों को याद करने में मुश्किल तथा निर्णय लेने में कठिनाई।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अनिद्रा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुबह जल्दी जगना या अत्यधिक नींद का आना।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">भूख की कमी या भूख का ज्यादा लगना।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">आत्महत्या का विचार तथा प्रयास।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उपर्युक्तलक्षणों के आधार पर अवसाद के दो प्रकार स्पष्ट होते हैं-</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">1.     मानसिक अवसाद (</span>Psychotic Depression<span lang="hi" xml:lang="hi">):</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> इस प्रकार की स्थिति में व्यक्तिविभ्रम का अनुभव करने लगता है तथा वास्तविकता से दूर हो जाता है। साथ ही व्यक्ति इस बात से भी अनभिज्ञ रहता है कि वह किसी समस्या से पीड़ित है। विभ्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रांति व </span>Latatoni <span lang="hi" xml:lang="hi">जीर्ण जैसे विचार संबंधी रोग इसी श्रेणी में आते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">2.     न्यूरोटिक अवसाद (</span>Neurotic Depression<span lang="hi" xml:lang="hi">):</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> अवसाद की इस स्थिति में व्यक्ति चिंता या किसी विशेष स्थिति से भय आदि का अनुभव करता है। इस प्रकार के व्यक्ति को यह ज्ञात रहता है कि वे अमुक समस्या से पीड़ित है। चिंता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदासी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुस्सा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिड़चिड़ापन न्यूरोटिक अवसाद के ही लक्षण हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अवसाद निवारण में योगपरक उपाय:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य संबंधी जीर्ण समस्याओं जैसे चिंता और अवसाद के लिए एक सुरक्षित और असरकारक समाधान है। योगाभ्यास करने से हमारी ग्रंथियों (</span>Glands<span lang="hi" xml:lang="hi">) और शरीर को ऊर्जा प्रदान करने वाले अंगों पर दबाव पड़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो उन्हें सुचारु रूप से चलाने और उनसे स्रावित होने वाले रसायनों को नियंत्रित करने में मदद करता है और हम अच्छा अनुभव करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा शरीर स्वस्थ बनता है। योगाभ्यास हमारे परिसंचरण तंत्र को भी सशक्त करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे हमारे मस्तिष्क और मांसपेशियों में ऑक्सीजन भली प्रकार से पहुँचती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब जीर्ण बीमारी हृदय संबंधी हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब हमें तीव्र यौगिक क्रियाओं से बचना चाहिए या फिर किसी कुशल योग चिकित्सक के परामर्शानुसार ही उपचार करना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ हम कुछ यौगिक क्रियायें प्रस्तुत हैं जोकि न्यूरोटिक अवसाद को नियंत्रित करने के लिए उपयोगी हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आसन:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्द्धकटिचक्रासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाद्हस्तासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्द्धचक्रासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भुजंगासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शलभासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विपरीतकरणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शशांकासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वक्रासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्द्धउष्ट्रासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मत्सस्यासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वासन तथा योग निद्रा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लंबी गहरी श्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कपालभाति (४० राउंड प्रति मिनट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भस्त्रिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रामरी और उद्गीथ)।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगाभ्यास के अन्त में श्वासन में लेटकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगनिद्रा का अभ्यास जरूर करना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे हमारे मन तथा शरीर में आनन्द का अनुभव होता है। योगाभ्यास हमारे शरीर से विषैले तत्वों को भी बाहर निकालता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अवसाद निवारण में घरेलू उपाय:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अवसाद से आराम पाने के लिए हमें पर्याप्त मात्रा में नींद लेना बहुत आवश्यक है। अनिद्रा या नींद की कमी अवसाद का एक मुख्य कारण है। इसके अलावा व्यक्ति को अपने मित्रों के साथ भ्रमण पर जाना चाहिए। बहुत लंबे समय तक अकेले नहीं बैठना चाहिए। व्यक्ति को किसी मनोरंजन में व्यस्त रहना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि वह आनन्दित अनुभव करे। सुबह टहलने से भी मस्तिष्क में ऑक्सीजन प्रचुर मात्रा में पहुँचती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कि अवसाद के लक्षणों को कम करने में सहायता करती है। अवसाद से मुक्ति पाने के लिए स्वस्थ आहार भी बहुत आवश्यक है। कुछ भोज्य पदार्थ जैसे- सोयाबीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रोटीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विटामिन </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सी</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">से युक्त फल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरी पत्तेदार सब्जियाँ अवसाद से लड़ने और उससे छुटकारा दिलाने में प्राकृतिक रूप से सहायक होते हैं। इसके अलावा शराब के सेवन तथा धूम्रपान से भी बचना चाहिए। क्योंकि इसका सेवन मस्तिष्क को अवसाद की स्थिति में ले जाता है। व्यक्ति को पर्याप्त मात्रा में पानी का सेवन करना चाहिए क्योंकि पानी व्यर्थ रासायनिक पदार्थों को शरीर से निकालने में मदद करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अवसाद निवारण के अन्य प्राकृतिक उपाय:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य मेधावटी:</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong> </strong>यह अवसाद के इलाज के लिए सर्वोत्तम प्राकृतिक समाधान है जो मस्तिष्क को शांत रखता है तथा दु:ख और उदासी से छुटकारा पाने में सहायता प्रदान करता है। इसके अलावा यह व्यक्ति को सामान्य मानसिक अवस्था में लाने में भी मदद करता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य मोती पिष्टी:</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> यह दु:ख और उदासी में तुरन्त लाभ पहुँचाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>दिव्य प्रवाल पिष्टी:</strong> यह मस्तिष्क को पौष्टिकता प्रदान करता है तथा मस्तिष्क में रक्त की पूर्ति को बढ़ाता है। क्रोध व अवसाद से मुक्ति दिलाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य गोदन्ती भस्म:</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> यह अवसाद के लक्षणों से मुक्ति दिलाती है तथा एकाग्रता को बढ़ाती है। यह मस्तिष्क के लिए एक टॉनिक का काम करती है तथा मस्तिष्क संबंधी रोगों को जड़ से खत्म करती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य मेधा वटी:</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> यह मस्तिष्क को आवश्यक पोषण उपलब्ध कराने में सहायक है। अवसाद की स्थिति में मस्तिष्क में ऑक्सीजन की पूर्ति को बढ़ाकर तुरन्त लाभ करने में भी सहायता करती है। यह स्मृति और एकाग्रता को बढ़ाने के लिए सर्वोत्तम उपाय है। </span></h5>
</li>
</ul>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पतंजलि रिसर्च</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>मार्च</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3008/-yoga--is-helpful-in-depressed-people-suffering-from-chronic-illness</link>
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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2015 21:38:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>

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