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                <title>फरवरी - योग संदेश</title>
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                <title>श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...</title>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2969/shashwat-pragya-feb-2015"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/63.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मानव जीवन का अन्तिम लक्ष्य</span></strong></span></h4><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सुखी जीवन का मार्ग</span></strong></span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  सभी मनुष्य पूर्ण सुखी जीवन जीना चाहते हैं। पूर्णसुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संतुष्टि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण तृप्ति व शुभ यह सब मानव मात्र की समान आकांक्षा है। इस पूर्ण सुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण शान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संतुष्टि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण तृप्ति व शुभ की प्राप्ति में यूँ तो बहुत सी बाधाएं हैं परन्तु इसमें दो प्रमुख बाधाएं हैं एक अज्ञान व दूसरा अभाव। अज्ञान का क्षेत्र बहुत ही व्यापक है और जिस-जिस क्षेत्र में हमारा अज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिथ्याज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अल्पज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रान्तज्ञान या यथार्थज्ञान नहीं होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस-उस क्षेत्र में हमें पूर्ण सुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संतुष्टि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तृप्ति या शुभ की प्राप्ति हो सकती है। अत: सामान्यत: सभी क्षेत्रों का सामान्य सत्यज्ञान या यथार्थज्ञान सभी मुनष्यों को होना ही चाहिये। पूर्ण ज्ञान-विज्ञान या विशेष ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आनुभूतिक या अनुसंधानात्मक ज्ञान तो व्यक्ति को सीमित क्षेत्रों का ही हो सकता है। दूसरा है अभाव अर्थात् किसी भी तरह की दरिद्रता। नितान्त आवश्यक संसाधनों के बिना जीवन निर्वाह असंभव है तथा सुखी-जीवन के लिए दरिद्रता नहीं वैभव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संपदा या धर्मपूर्वक अर्थ की प्राप्ति अर्थात् अभ्युदय होना ही चाहिए। अभ्युदय व नि:श्रेयस की प्राप्ति यही धर्म है। अभाव से मुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभ्युदय से युक्ततथा अज्ञान से मुक्त व नि:श्रेयस युक्त दिव्य ज्ञान व दिव्य जीवन यही मानव मात्र के जीवन का अन्तिम लक्ष्य है। अज्ञान व अभाव से मुक्त नि:श्रेयस व अभ्युदय से युक्त समाधि व समृद्धि पूर्वक ही सभी जीवन जीना चाहते हैं। नि:श्रेयस से सहज समाधि व अभ्यदुय से सात्विक समृद्धि युक्त जीवन में ही पूर्ण सुख की प्राप्ति या अनुभूति होती है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मकर्म की साधना व निष्काम सेवा </span></strong></span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मभाव की साधना व निष्काम सेवा ब्रह्मकर्म अर्थात विवेक पूर्ण व्यवहार व आचरण ही मानव जीवन का अन्तिम लक्ष्य है। दूसरे शब्दों में दिव्य ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य कर्म व दिव्य भाव अथवा शुद्धज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्धकर्म एवं शुद्ध उपासना ही मानव जीवन का अन्तिम ध्येय है। 24 घंटे की प्रतिदिन की दिनचर्या में हमें कम से कम एक से दो घण्टे एकान्त में बैठकर भगवान् की स्तुति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रार्थना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपासना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आराधना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान या समाधि के रूप में साधना के लिए समय अवश्य देना चाहिए। साधना का व्यावहारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वास्तविक व सत्य मार्ग क्या है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे पूर्वज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगी व ऋषि मुनि कैसे साधना करते थे</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इसको जानने के लिए प्रतिदिन आस्था चैनल पर प्रात: 4 बजे ध्यान का कार्यक्रम अवश्य देखिए और गुरु-शिष्य परम्परा से ध्यान का अभ्यास कीजिए। यदि हम 24 घंटों का विभाजन करें तो 2 घंटे का योगाभ्यास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">6 घंटे की निद्रा तथा 16 घंटे निष्काम कर्म-पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रवृत्ति या निष्काम सेवा करके एक दिव्य आदर्श जीवन जी सकते हैं। साधना के साधन प्रक्रिया या विधियां जानने के लिए मेरे साथ प्रतिदिन प्रात: 4 बजे से 4:40 तक व्यावहारिक रूप से क्रियात्मक योगाभ्यास करने का पूरा प्रयास कीजिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपको जीवन में सत्य की अनुभूति अवश्य होगी। साधना करने से हमारे विकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्लेश या दोष प्रथम तनु और धीरे-धीरे दग्धबीज होंगे और इससे हम हर पल निर्विकार निर्विकल्प</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्वैर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निद्र्वन्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निश्चिन्त अज्ञान व अशुभ से मुक्त</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिपल यथार्थज्ञान व शुभ से युक्त तथा भीतर से पूर्ण शान्त रहेंगे। </span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस साधना का प्रभाव हमारे व्यावहारिक जीवन पर यह पड़ेगा कि हम कृषि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिकित्सा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यावसायिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाजिक व राजनैतिक आदि जीवन के किसी भी क्षेत्र में ब्रह्मभाव में अवस्थित रहकर या योगस्थ रहकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्काम होकर अर्थात् आप्तकाम या दिव्यकाम होकर कर्म करेंगे। निष्काम होने का अर्थ है स्वार्थ पूर्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आसक्तिपूर्ण या अविवेकपूर्ण कामनाओं से मुक्त होकर ईश्वरीय दिव्य कामना या दिव्य प्रेरणा के अनुसार कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रवृत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तप या सेवा करना है। </span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वरीय कामना या भगवदिच्छा को जानने के लिए प्रथम आत्मा में उठ रही परमात्मा की प्रेरणाओं को सुनना तथा उसी के अनुरूप आचरण करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी वेदाज्ञा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीसरी गुरु आज्ञा तथा चौथी शास्त्राज्ञा के अनुरूप ही कर्म करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही निष्काम कर्म या निष्काम सेवा है। फल की इच्छा न करके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् पर सब कुछ छोड़ देना। सत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसाधन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्मान व वैषयिक सुखों की इच्छा से मुक्त होकर भगवान् में रहकर भगवान् के लिए कर्म करना निष्काम सेवा का मतलब है। समष्टि के प्रति पूर्ण कृतज्ञता का भाव रखते हुए कर्तव्य भाव से अनासक्त रह कर तथा संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। सबको साथ लेकर संगठित रूप से कार्य करना। सभी वेदों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्रों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुजनों व अपने अनुभव से हमने जीवन का यह अन्तिम सत्य अनुभव किया है। </span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हम भगवान् के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषियों के सच्चे प्रतिनिधि या प्रतिरूप बनकर इस धरती पर भगवान् का साम्राज्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भागवत सत्ता व भागवत व्यवस्था स्थापित करें तथा ऋषियों की पुण्यधरा इस भारत भूमि को ऋषिभूमि बनाने के लिए संगठित होकर पतंजलि योगपीठ के साथ जुड़ें। </span></h5>]]>
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                                                            <category>शाश्वत प्रज्ञा</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>फरवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Feb 2015 21:59:09 +0530</pubDate>
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                <title>विश्व की ज्वलन्त समस्या</title>
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                        <![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण</span></strong></p>]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2970/world-s-burning-problem"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/70.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">      अ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">पने-अपने कुलवंश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माता-पिता एवं अन्य स्वजनों को सुख पहुँचाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गौरव दिलाने व संभालने के लिए तो करोड़ों लोग अपने जीवन की आहुतियाँ अर्पित कर रहे हैं। अपना सम्पूर्ण ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ व जीवन इसके लिए होम कर दे रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन हम अपने मूलवंश अर्थात् ब्रह्मवंश या मूल कुल अर्थात् ब्रह्मकुल को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूल माता-पिता प्रथम माँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रथम पिता जगतपिता को और भागवत स्वजन सर्वजनों को सुख पहुँचाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सबको गौरव दिलाने के लिए समष्टि को भी संभालने के बारे में तथा पूर्ण मनीषी ऋषियों की विरासत को सम्भालने व उनके वंश को आगे बढ़ाने के बारे में भी सबको जरूर सोचना चाहिये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही सच्चा अध्यात्म है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही सम्पूर्ण आदर्श संन्यास है। यही भगवान् का धर्म अथवा समष्टि के अभ्युदय व नि:श्रेयस की सिद्धि का मार्ग है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   सामान्यत: हमारे जीवन में तीन तरह के कर्म होते हैं- पापकर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुण्य या शुभकर्म तथा तीसरा होता है ब्रह्मकर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्यकर्म या भागवत कर्म। आज हम देश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुनियां व सम्पूर्ण मानवता को यदि पूरी ईमानदारी से बचाना चाहते हैं और पूरी समष्टि को सुख पहुँचाना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हमें अपने पूर्वजों के बताए वेद मार्ग पर ही पुन: आना पड़ेगा। पूरी दुनियाँ आज प्रमुख रूप से तीन उन्मादों के दौर से गुजर रही है प्रथम भोगोन्माद दूसरा मजहबोन्माद तथा तीसरा अज्ञान व अहंकार के कारण अन्तत: युद्धोन्माद। आज के पूरे वैयक्तिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारिवारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यावसायिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनैतिक व वैश्विक ताने-बाने को देखें तो इन तीन उत्मादों के चक्रव्यूह में पूरा संसार फंसा हुआ है। बिना आध्यात्मिकता के भोग हमें उन्माद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पागलपन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शोषण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंसा व अन्तत: विनाश की ओर ही लेकर जाता है। गीता में भगवान् ने कहा है-</span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यायतो विषयान्पुंस: सङ्गस्तेषूपजायते।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सङ्गात्सज्ञायते काम: कामात्क्रोधोऽभिजायते।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोधाद्भवति सम्मोह: सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम:।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से अत्यन्त मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात् ज्ञान शक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वरीय ज्ञान वेद के मार्ग के बिना सब मजहब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंथ की अवैज्ञानिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अव्यवहारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असार्वभौमिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पोंगापंथी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मजहबी सोच से उन्माद ही पैदा होगा क्योंकि<strong> </strong></span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>''<span lang="hi" xml:lang="hi">वेदोऽखिलोधर्ममूलम्</span></strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>।</strong></span> वेदोक्तआध्यात्मिक मार्ग से ही सार्वभौमिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहारिक व पंथनिरपेक्ष (सैक्युलर) सिद्धान्तों पर चलकर ही हम-सबको एक साथ लेकर चल सकते हैं। अज्ञान व अहंकार के कारण ज्ञान विज्ञान अनुसंधान व एकाङ्गी भौतिक पुरुषार्थ से अर्जित मात्र बाह्य समृद्धि व विकास का केन्द्र जब केवल मात्र भौतिक रूप से सत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसाधन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्मान व वैषयिक सुख भोगना ही अन्तिम लक्ष्य बन जाता है। जीवन में आध्यात्मिकता अर्थात् त्याग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मभाव व ब्रह्मकर्म अथवा साधना व निष्कामकर्म की भावना खत्म हो जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अन्तत: यह केवल भौतिक वाद हमें भोगोन्माद से युद्धोन्माद की ओर ही लेकर जायेगा। क्योंकि बिना योग व अध्यात्म के भोग ही अन्तिम लक्ष्य बन जाता है और उसे पाने के लिए व्यक्तियुद्ध व हिंसा पर उतारू हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए हमने निष्कर्ष के रूप में कहा कि भोगोन्माद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मजहबी उन्माद तथा अन्तत: युद्धोन्माद के इस विनाशकारी चक्रव्यूह से हम इस संसार को यदि बचाना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अध्यात्म एवं ऋषियों की विरासत को बचाने के लिए विश्व के श्रेष्ठत्तम बुद्धिमान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञावान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धनवान व महान् लोगों को वेदोक्त योग मार्ग पर आना ही पड़ेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व की श्रेष्ठतम दिव्य आत्माएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महान् आत्माएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण सात्विक आत्माएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊँचे प्रारब्ध वाली पुण्य आत्माएँ जब एक साथ संगठित होकर अपने कुलवंश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने माता-पिता व अपने स्वजनों के मोह पाश से ऊँचे उठकर जब अपने मूलवंश ब्रह्मवंश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने मूल माता-पिता जगज्जननी-जगतपिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रथम माता-प्रथम पिता व भगवान् के स्वजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वजनों के लिए हम जीवन जियेंगे तब हम इस धरती या संसार को भोगोन्माद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मजहबी उन्माद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युद्धोन्माद व हिंसा से बचाकर न्यायपूर्ण अहिंसक समृद्धि व पूर्ण सुख शान्ति के मार्ग पर ला सकेंगे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हम चाहते हैं कि लगभग </span>700<span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ के इस मानवीय संसार में तथा सवा सौ करोड़ के आर्यवर्त ऋषिभूमि भारत वर्ष से हमें ऐसे श्रेष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सात्विक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुण्यात्मा भाई-बहन मिलें जो जीवन व जगत को यथार्थ रूप से समझें और फिर अपने व समष्टि के अभ्युदय व नि:श्रेयस को संगठित रूप से सिद्ध करें और ब्रह्मभाव व ब्रह्मकर्म के द्वारा व्यक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र व विश्व में दिव्यता व भव्यता को स्थापित करें। अन्यथा इस भोगोन्माद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मजहबी उन्माद व युद्धोन्माद हिंसा से संसार को बचाना मुश्किल हो जायेगा। क्योंकि इस सृष्टि में मनुष्यों को छोड़कर शेष पूरा अस्तित्व पूरी सृष्टि या समष्टि स्वयं में संतुलित-मर्यादित व अनुशासित है। मनुष्य को संतुलित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मर्यादित व अनुशासित बनाने का एक मात्र वेदोक्त योगमार्ग या अध्यात्म ही है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज भौतिकवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मजहबी उन्माद व सैन्य शक्ति हथियारों व अन्य विध्वंसक शक्तियों के बल पर आतंक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंसा व युद्ध उन्माद का प्रतिनिधित्व करने वाले लोग लाखों ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ों की संख्या में हैं। आज भारत व एशिया से लेकर फ्रांस व जर्मनी आदि सहित पूरा यूरोप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिडलिस्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अफ्रिकन देश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका सहित पूरे अमेरिकन देश इन उन्मादों से गुजर रहे हैं। इन उन्मादों को पोषित करने के लिए दुनियां के ताकतवर लोग जिनमें इन उन्मादों से प्रभावित ताकतवर तथाकथित धार्मिक लोग व धार्मिक संगठन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकतवर पोल्टिशियन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकतवर बिजनिशमैन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्पोरेट्स व कुछ ताकतवर राष्ट्राध्यक्ष तक इन उन्मादों को पूरी ताकत दे रहे हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे दुनियाँ के कितने ही ताकतवर लोग इस विध्वंसकारी कार्य में सम्मिलित क्यों न हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे कितनी की अकूत धन दौलत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसाधन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्ता व संसाधनों के वे मालिक भी क्यों न हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आखिर जीत तो सत्य की होनी है। </span><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सत्यमेव जयते नानृतम्'</span></strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">यह ऋषियों का अकाट्टय सिद्धान्त है। करोड़ों लोगों की इस मानव सृष्टि में मुझे कुछ हजार दिव्यात्माएं चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अपना पूरा जीवन इस भागवत कार्य के लिए लगाने वाली हों तथा इस ब्रह्मवंश के गौरव को बढ़ाने वाली हों। ऐसी आत्माओं का हम आह्वान करते हैं जिनमें दिव्य प्रतिभा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धैर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पराक्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृतज्ञता व सत्यनिष्ठा है। इन पुण्यात्मा या दिव्यात्माओं को हम भगवान् व ऋषियों के प्रतिनिधि के रूप में तैयार करेंगे। </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ष से लेकर </span>25-30-40<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ष आदि किसी भी आयु वर्ग के भाई या बहन इस ईश्वरीय विरासत या ऋषियों की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए पतंजलि योगपीठ में तुरन्त सम्पर्क करें। इन सैकड़ों व हजारों दिव्य आत्माओं के सात्विक बल या आध्यात्मिक बल पर हम पूरी धरती या दुनियां को मजहबी उन्माद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भोगोन्माद व युद्धोन्माद हिंसा से मुक्त करेंगे और एक दिव्य भागवत व्यवस्था व्यक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र व विश्व में स्थापित करेंगे। श्रद्धेय स्वामी जी महाराज का संकल्प पूर्ति धर्मयुद्ध</span>, 2014<span lang="hi" xml:lang="hi"> इसका एक जीता-जागता उदाहरण हमारे </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समक्ष है।</span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">विजेतव्या दिल्ली छलबल समेताश्च रिपव:।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">विपक्ष: काँग्रेस: रणभुवि सहायाश्च बटव:।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">तथाप्येको राम: सकलमिह जेता रिपुदलम्।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">क्रियासिद्धि: सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महादुर्ग रूप दिल्ली जीतनी थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विपक्षी शत्रु काँग्रेस छल-बल आदि से पूर्ण समवेत अर्थात् युक्त था और सहायक के रूप में सैकड़ों ब्रह्मचारी व करोड़ों कार्यकर्त्ताओं सहित उत्साह शक्ति से अकेले एक संकल्प सिद्ध योगी ने सम्पूर्ण कांग्रेस-सेना को परास्त करके धूल चटा दी। सच है-महापुरुषों की कार्य सिद्धि सत्व अर्थात् सात्विक पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पराक्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भागवत कृपा व उत्साह पर निर्भर होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपकरणों (साधनों) पर नहीं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो भी भाई-बहन इस ईश्वरीय कार्य के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पण करना चाहते हैं और ब्रह्मभाव में रहते हुए ब्रह्म कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य कर्म या भागवत कर्म अर्थात् साधना व निष्काम कर्म या निष्काम सेवा करना चाहते हैं। उन भाई-बहनों के लिए हम वैदिक गुरुकुलम्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैदिक कन्यागुरुकुलम्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवाव्रती प्रकल्प तथा वेद-वेदांग प्रचारक प्रकल्प संचालित कर रहे हैं। इन आध्यात्मिक वैदिक ज्ञान केन्द्रों में आपको अपरा व परा विद्याओं में पारंगत करके भगवान् व ऋषियों का एक दिव्य आदर्श प्रतिनिधि के रूप में तैयार करेंगे और भारत सहित सम्पूर्ण विश्व में एक वैदिक आध्यात्मिक क्रान्ति लायेंगे।</span></h5>]]>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>फरवरी</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2970/world-s-burning-problem</link>
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                <pubDate>Sun, 01 Feb 2015 21:58:55 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[योग संदेश विभाग]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अब शिक्षा का होगा  स्वदेशीकरण व भारतीयकरण</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#e67e23;border-color:#E67E23;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(230,126,35);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(52,73,94);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">"वैदिक शिक्षा व आधुनिक शिक्षा के सार्वभौमिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंथ-निरपेक्ष एवं सर्वहितकारी समन्वय के द्वारा ऐसे नागरिकों का निर्माण करना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो स्वयं में नियन्त्रित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मर्यादित व अनुशासित हों तथा सह-अस्तित्व (समष्टि) के प्रति पूर्ण कृतज्ञता रखते हुए कर्त्तव्यभाव से पूर्ण पुरुषार्थ करके अपना अभ्युदय</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">व नि:श्रेयस सिद्ध कर सकें।</span>’’</strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">      प्रा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">थमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों की शिक्षा के स्तर में गुणात्मक सुधार लाने हेतु आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ भारतीय ऋषि-ज्ञान परम्परा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यात्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शन व विज्ञान संबन्धी मूल्यों एवं सिद्धांतों को शिक्षा में समावेशित करके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक सोच एवं तार्किक प्रवृत्ति को विकसित करके</span></h5>...]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2971/now-education-will-be-indigenized-and-indianized"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/7.jpg" alt=""></a><br /><table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#e67e23;border-color:#E67E23;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(230,126,35);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(52,73,94);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">"वैदिक शिक्षा व आधुनिक शिक्षा के सार्वभौमिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंथ-निरपेक्ष एवं सर्वहितकारी समन्वय के द्वारा ऐसे नागरिकों का निर्माण करना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो स्वयं में नियन्त्रित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मर्यादित व अनुशासित हों तथा सह-अस्तित्व (समष्टि) के प्रति पूर्ण कृतज्ञता रखते हुए कर्त्तव्यभाव से पूर्ण पुरुषार्थ करके अपना अभ्युदय</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">व नि:श्रेयस सिद्ध कर सकें।</span>’’</strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   प्रा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">थमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों की शिक्षा के स्तर में गुणात्मक सुधार लाने हेतु आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ भारतीय ऋषि-ज्ञान परम्परा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यात्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शन व विज्ञान संबन्धी मूल्यों एवं सिद्धांतों को शिक्षा में समावेशित करके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक सोच एवं तार्किक प्रवृत्ति को विकसित करके शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कार व मानवीय-नैतिक मूल्यों के आधार पर मानव को दिव्य मानव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महामानव एवं एक जिम्मेदार विश्व नागरिक बनाना।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हम वैदिक शिक्षा व आधुनिक शिक्षा के सार्वभौमिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंथ-निरपेक्ष एवं सर्वहितकारी समन्वय के द्वारा ऐसे नागरिकों का निर्माण करना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो स्वयं में नियन्त्रित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मर्यादित व अनुशासित हों तथा सह-अस्तित्व (समष्टि) के प्रति पूर्ण कृतज्ञता रखते हुए कर्त्तव्यभाव से पूर्ण पुरुषार्थ करके अपना अभ्युदय व नि:श्रेयस सिद्ध कर सकें। विद्यार्थियों के भीतर बाल्यकाल से ले करके यौवनकाल तक ऐसे विचारों व संस्कारों का समावेश हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे वे कम्प्यूटर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत्याधुनिक तकनीकी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गणित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिजिक्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माइक्रोबायोलॉजी व अन्य आधुनिक विषयों में तो पूर्ण निष्णात हों ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी प्राचीनतम भाषा संस्कृत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रभाषा हिन्दी तथा अन्य प्रान्तीय भारतीय भाषाओं का ठीक-ठीक बोध प्राप्त करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही अंग्रेजी सहित विश्व की अन्य भाषाओं का भी प्रामाणिक ज्ञान रखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके अतिरिक्त उनमें घृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्मृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिभा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पराक्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृतज्ञता व सत्यनिष्ठा- ये दैवीय सम्पदाएं भी विकसित हों और वे समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र व विश्व को दिव्य व्यक्तित्व युक्त नेतृत्व प्रदान कर सकें। इस प्रकार आध्यात्मिक न्यायवाद में निष्ठा रखते हुए मनुष्य व मनुष्येत्तर समग्र जड़-चेतन अस्तित्व के प्रति न्यायपूर्ण दृष्टि रखने वाले आदर्श नागरिक तैयार हों।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हम एक ऐसी शिक्षा-दीक्षा प्रणाली विकसित करना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें साधनहीन-दु:खी-दरिद्र या साधन सम्पन्न दु:खी दरिद्र नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु साधन सम्पन्न सुखी प्रसन्न व्यक्तियों व नागरिकों का निर्माण किया जा सके। इस शिक्षा-दीक्षा पद्धति से न्यायपूर्ण समृद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यायपूर्ण विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यायपूर्ण उपभोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यायपूर्ण भागीदारी व न्यायपूर्ण दोहन की दृष्टि रखने वाले श्रेष्ठ मानव तैयार होंगे। हम शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बौद्धिक व आध्यात्मिक विकास की एक ऐसी शिक्षा-दीक्षा प्रणाली गढ़ना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे व्यक्ति के भीतर सन्निहित अपरिमित ज्ञान व ऊर्जा शक्ति सामर्थ्य को जागृत करके समाप्त प्राय मानवीय सद्गुणों एवं शक्तियों का पुनर्विकास किया जा सके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही अतीन्द्रिय सुख व अतीन्द्रिय ज्ञान अनुभूतियों के क्षेत्र में भी मनुष्य प्रवेश करके अतिमानस चेतना से युक्त हो सके। समस्त मानवीय दुर्बलताओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आसक्तिपूर्ण मांगों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कामनाओं व अहंकार से मुक्त यथार्थ ज्ञान पूर्वक दिव्य जीवन जीने वाले मनुष्यों को तैयार कर सकें। ऐसा होने से अशुभ का अन्त होगा तथा सुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफलता व सब प्रकार की खुशहाली सब ओर होगी। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">विद्यां च अविद्यां च यस्तद्वेदोभय</span>š<span lang="hi" xml:lang="hi">सह। अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते।।</span>‘ -<span style="color:rgb(0,0,0);"><span lang="hi" xml:lang="hi">यजु</span>0 40/14</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुर: कृण्वन्तो विश्वमार्यम्। अपघ्नन्तो अराव्ण:।।</span>‘</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">-<span lang="hi" xml:lang="hi">ऋग</span>0 9/63/5<span lang="hi" xml:lang="hi"> का ऋषियों का विद्या या शिक्षा का उद्देश्य पूर्ण होगा और पूर्ण जागृत व पूर्ण समर्थ नागरिकों का निर्माण होगा।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/7.jpg" alt="7"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक तकनीक को उपयोग में लाने के लिए प्रोत्साहित करने</span><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कौशल को बढ़ाने (</span><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">Skill Development</span><span lang="hi" xml:lang="hi">)</span><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सभी प्रमुख पंथों के मौलिक तत्वों की जानकारी देकर सांप्रदायिक सद्भाव एवं सहिष्णुता की प्रवृत्ति को संवर्धित करने तथा श्रम की महत्ता (</span><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">Dignity of Hard Work</span><span lang="hi" xml:lang="hi">) को छात्रों के मन में प्रतिष्ठापित करने के लिए इस बोर्ड का गठन किया गया है।</span></h5>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इस बोर्ड के पाठ्यक्रम में महर्षि दयानंद की आर्ष शिक्षा प्रणाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महात्मा गांधी की रोजगारोन्मुखी एवं स्वदेशी पर आधारित बुनियादी शिक्षा तथा श्री अरविन्द की दिव्य मानव के निर्माण की शिक्षा एवं स्वामी विवेकानन्द जी की उत्साह पराक्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ व वेदान्त पर आधारित शिक्षाओं तथा आधुनिक शिक्षा का एक समन्वित रूप देखने को मिलेगा।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इस पाठ्यक्रम के माध्यम से छात्रों में क्षेत्रीय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाषायी एवं साम्प्रदायिक संकीर्णताओं से ऊपर उठकर स्वराष्ट्र के प्रति गौरव का भाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभी धर्मों के प्रति आदर व सम्मान की अनुभूति एवं मानवीय मूल्यों के प्रति निष्ठा का भाव जागृत करने का प्रयास किया जाएगा।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय संविधान में वर्णित कर्त्तव्यों व मूल्यों के प्रति छात्रों में विशेष जागरूकता पैदा की जाएगी।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">दि राइट ऑफ चिल्ड्रन टु फ्री एंड कम्पलसरी एजुकेशन एक्ट-</span>2009 (RET<span lang="hi" xml:lang="hi">) में दिये गये शिक्षा संबंधी आवश्यक प्रावधानों को लागू किया जाएगा।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिन्दी एवं अंग्रेजी भाषाओं को समान रूप से प्राथमिकता दी जाएगी।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सीमित चयनित विद्यालय में विश्व की अन्य भाषाओं के भी अध्ययन की व्यवस्था की जायेगी।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">संबंन्धित राज्यों में वहाँ की स्थानीय भाषा का भी पूर्ण गौरव के साथ अध्ययन कराया जायेगा। </span></h5>
</li>
</ul>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>भारतीय शिक्षा </category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>फरवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Feb 2015 21:56:13 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[योग संदेश विभाग]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हरियाणा प्रांत बनेगा  'योग-आयुर्वेद’ का वैश्विक आदर्श मॉडल</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[<ul style="list-style-type:square;">
<li class="MsoListParagraphCxSpFirst" style="text-indent:-0.25in;text-align:justify;">
<h5>          <span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग एवं आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए हरियाणा सरकार ने योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज को बनाया ब्रांड अम्बेसडर</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज एवं आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के मार्गदर्शन में चलेगा सरकार का योग-आयुर्वेद विकास अभियान- अनिल विज</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">        पतंजलि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार के बीसवें स्थापना दिवस पर हरियाणा सरकार के मुख्यमंत्री श्री मनोहर लाल खट्टर ने हरियाणा के हर जिले में आचार्यकुलम् खोलने एवं वहां की खाली पड़ी भूमि पर औषधीय पौध स्थापित करने की घोषणा की थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी श्रृंखला में अगली कड़ी के तहत हरियाणा प्रदेश के स्वास्थ्य एवं खेल मंत्री श्री अनिल विज ने </span>14</h5>...]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2972/haryana-province-will-become-a-global-ideal-model-of--yoga-ayurveda"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/46.jpg" alt=""></a><br /><ul style="list-style-type:square;">
<li class="MsoListParagraphCxSpFirst" style="text-indent:-0.25in;text-align:justify;">
<h5>     <span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग एवं आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए हरियाणा सरकार ने योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज को बनाया ब्रांड अम्बेसडर</span></strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज एवं आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के मार्गदर्शन में चलेगा सरकार का योग-आयुर्वेद विकास अभियान- अनिल विज</span></strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    पतंजलि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार के बीसवें स्थापना दिवस पर हरियाणा सरकार के मुख्यमंत्री श्री मनोहर लाल खट्टर ने हरियाणा के हर जिले में आचार्यकुलम् खोलने एवं वहां की खाली पड़ी भूमि पर औषधीय पौध स्थापित करने की घोषणा की थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी श्रृंखला में अगली कड़ी के तहत हरियाणा प्रदेश के स्वास्थ्य एवं खेल मंत्री श्री अनिल विज ने </span>14<span lang="hi" xml:lang="hi"> जनवरी को पतंजलि योगपीठ पहुंचकर योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के साथ हरियाणा प्रदेश को लेकर सरकार की </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग एवं आयुर्वेद नीति</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">पर गहन मंथन किया। मंथन से तैयार नीतिगत निष्कषों को 15 जनवरी को पतंजलि योगपीठ के दिव्य योग मंदिर में मंत्री महोदय ने संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस के माध्यम से व्यक्त किया। पत्रकारों को बताते हुए हरियाणा के स्वास्थ्य एवं खेलमंत्री श्री अनिल विज ने कहा कि प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी के प्रयास से यू.एन.ओ. द्वारा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित हुआ। अब हरियाणा प्रांत को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद एवं योग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">में भारत का सिरमौर बनाना है। यह महान कार्य पूज्य स्वामी जी एवं श्रद्धेय आचार्यश्री के मार्गदर्शन में ही पूर्ण करना है। उन्होंने कहा- हरियाणा प्रदेश में योग एवं आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए हरियाणा सरकार ने स्वामी रामदेव जी को ब्रांड अम्बेसडर बनाने का आग्रह किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसपर पूज्य स्वामी रामदेव महाराज जी ने अपनी सहमति प्रकट की है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थ्य मंत्री ने कहा कि हरियाणा को योग तथा आयुर्वेद में विश्व का सिरमौर राज्य बनाने के लिए स्वामी रामदेव तथा आचार्य बालकृष्ण जी का मार्गदर्शन लिया जायगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे प्रदेश में भारत की प्राचीन विधाओं को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने कहा कि हरियाणा के सभी लगभग </span>6500<span lang="hi" xml:lang="hi"> गांव व शहरों में व्यायाम व योगशाला बनाई जायेगी। इनमें स्थानीय बच्चों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युवाओं तथा बुजुर्गों को योग सिखाने के लिए प्रशिक्षकों की सेवायें ली जायेंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरियाणा सरकार मानकों के तहत योग शिक्षकों की नियुक्ति करेगी तथा उन्हें पतंजलि योगपीठ में प्रशिक्षित करने  हेतु भेजा जायेगा। इससे गांव स्तर पर योग को एक संपूर्ण क्रांति के रूप में उभारा जा सकेगा। इन योगशालाओं में योग तथा पांच क्षेत्रीय खेलों का भी प्रशिक्षण दिया जायेगा। </span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/46.jpg" alt="46"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्री विज ने कहा योग को घर-घर और हर इंसान तक पहुँचाने के लिए प्राथमिक स्कूलों में भी योग का प्रशिक्षण दिया जायेगा। इसके लिए स्कूलों में कार्यरत पीटीआई अध्यापकों तथा आंगनवाड़ी वर्कर्स को भी पतंजलि योगपीठ हरिद्वार में प्रशिक्षण दिलाने के लिए भेजा जायेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि योग के विषय में बच्चों को प्राथमिक स्तर से ही पूर्ण जानकारी दी जा सके।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदेश में आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति को बढ़ावा देने के लिए कुरुक्षेत्र स्थित </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीकृष्ण राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को विश्व विद्यालय का दर्जा दिया जायेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हरियाणा के आयुष विभाग में कार्यरत </span>550<span lang="hi" xml:lang="hi"> आयुर्वेदिक डाक्टरों को भी पतंजलि योगपीठ में रेफ्रेशन कोर्स करवाया जायेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे वे प्राचीन औषधियों की नवीनतम जानकारी प्राप्त कर मरीजों का उपचार कर सकें।  </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हरियाणा में हजारों एकड़ भूमि पर विश्व का पहला </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वर्ल्ड हर्बल फारेस्ट</span>’ (<span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व की </span>25<span lang="hi" xml:lang="hi"> हजार से अधिक प्रजातियों के औषधीय पौधों का) बनाया जायेगा। दुनियां में बनने वाला यह अपनी तरह का पहला हर्बल फारेस्ट होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जोकि जंगलों में जड़ी-बूटियों के संरक्षण और संवर्धन को बढ़ावा देगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हरियाणा को विश्व में योग व आयुर्वेद की राजधानी के रूप में विकसित किया जायेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके लिए योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा को बढ़ावा देने के लिए पंचकुला में एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा संस्थान</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">बनाया जायगा। इस संस्थान में विश्व स्तर की आधुनिकतम और प्राचीन विधाओं का समायोजन कर मरीजों को उपचार दिया जायेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हरियाणा के सभी अस्पतालों में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आयुष विंग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">खोले जायेंगे जिसमें आयुर्वेद तथा अन्य भारतीय पद्धतियों के अनुसार चिकित्सा की जायेगी। प्रांत के खिलाड़ियों को भी योग से जोड़ा जायेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मंत्री महोदय ने बताया कि इन सभी योजनाओं में योगगुरू स्वामी रामदेव तथा आचार्य बालकृष्ण जी का मार्गर्शन लिया जायेगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग-आयुर्वेद पूर्वजों की देन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सम्मान ऋषियों का सम्मान है- योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगऋषि पूज्य स्वामी जी महाराज ने ब्रांड एम्बेसडर बनाये जाने पर हरियाणा के  स्वास्थ्य मंत्री एवं हरियाणा सरकार का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह एक बड़ा दायित्व है और इससे योग व आयुर्वेद को आगे बढ़ाने का सपना साकार होगा। हमारे अभियान का प्रत्येक प्रयोग ऋषियों के प्रति समॢपत हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग-आयुर्वेद ऋषियों द्वारा ही विकसित है। अत: हरियाणा का यह संकल्प ऋषियों एवं पूर्वजों के प्रति सम्मान है। हरियाणा ने इस दिशा में आदर्श स्थापित किया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आगे यह संपूर्ण देश में फैल जायेगा। स्वामी जी ने कहा कि ऐसे युवा जो नशे व अन्य विकृतियों की ओर उन्मुख हो रहे हैं उनके चरित्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य व संस्कार निर्माण में हरियाणा सरकार की यह पहल अनूठी साबित होगी। मैं उम्मीद करता हूं कि योग को पाठ्यक्रम में शामिल करने वाला हरियाणा देश का पहला राज्य होगा।</span></h5>
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#F1C40F;border-color:#F1C40F;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(241,196,15);">
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>पतंजलि योगपीठ इन्हें करेगा प्रशिक्षित</strong></span></h4>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>हरियाणा के 6500 गावों की योगशाला - व्यायामशाला के नवनियुक्त प्रशिक्षक </strong></span></h5>
</li>
<li>
<h5><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>स्कूलों में सेवारत पी. टी. आई. अध्यापक </strong></span></h5>
</li>
<li>
<h5><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>हरियाणा प्रान्त के आंगनबाड़ी वर्कर्स</strong></span></h5>
</li>
<li>
<h5><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>हरियाणा आयुष विभाग के कार्यकर्ता 550 आयुर्वेदिक डॉक्टर्स का रिफ्रेसर</strong></span></h5>
</li>
</ul>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सत्ता राजसिक भी होती है और सात्विक भी। राजा जब पूर्ण सात्विकता के साथ अपने को परमात्मा का प्रतिनिधि मानकर वेद आज्ञा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्र आज्ञा अनुसार स्वधर्म के निर्वहन के लिए राज्य का संचालन करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह राजसत्ता सात्विक हो जाती है। हरियाणा सरकार व उसके केबिनेट मंत्री श्री अनिल विज जी ऋषि परम्परा के प्रति इसी संकल्प से काम कर रहे हैं। हम इन कार्यों को प्रतिबद्धता के साथ पूर्ण करने में सहयोग करेंगे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इससे प्रदेश के बच्चे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युवा तथा बुजुर्गों में योग के प्रति उत्साह बढ़ेगा- आचार्य बालकृष्ण जी महाराज</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण जी ने कहा कि हम इस पहल के लिए हरियाणा सरकार का आभार व्यक्त करते है तथा इससे प्रदेश के बच्चे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युवा तथा बुजुर्गों में योग के प्रति उत्साह बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि आज देश के लोग पतंजलि योगपीठ एवं उसके योग-आयुर्वेद आंदोलन पर पूरा भरोसा रखते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरियाणा सरकार की यह पहल इसी दिशा में बढ़ा एक कदम है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञातव्य कि मंत्री महोदय ने पतंजलि योगपीठ के विविध संस्थानों </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि हर्बल फूड पार्क</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">आदि का भ्रमण भी किया। योगपीठ पहुँचने पर मंत्री महोदय का यज्ञीय भाव से स्वागत किया गया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्था समाचार</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>फरवरी</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2972/haryana-province-will-become-a-global-ideal-model-of--yoga-ayurveda</link>
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                <pubDate>Sun, 01 Feb 2015 21:55:19 +0530</pubDate>
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                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/46.jpg"                         length="209061"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[योग संदेश विभाग]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मुख, उदर, त्वचा एवं वात आदि रोगों में लाभकारी अखरोट</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण  </span></strong></p>]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2973/walnuts-are-beneficial-in-diseases-like-mouth--stomach--skin-and-arthritis-etc"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/72.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक नाम : </span><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">Juglans regia Linn. </span><span lang="hi" xml:lang="hi">।  कुलनाम : </span><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">Juglandaceae </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अंग्रेजी नाम : </span><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">Walnut </span><span lang="hi" xml:lang="hi">।  संस्कृत :  शैलभव</span><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">गुडाशय</span><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वादुमज्ज</span><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वृक्षफल</span><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पार्वतीय</span><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्नेहफल</span><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अक्षोट</span><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अक्षोटक  ।  हिन्दी : अखरोट</span><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अक्रोट</span><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अखोर  । गुजराती :  अखरोट  ।  तमिल : अकरोटू  । तेलुगु :  अकरोटु   ।  बंगाली : औखरोटु</span><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अखरोट</span><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आक्रोट  ।   नेपाली : ओखरा  ।  पंजाबी : अखरोट</span><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">चारमग्ज़</span><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">खोरका</span><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अखोरि</span><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोट । मराठी : अक्रोड  ।  मलयालम : अकरोटू  ।  अरबी : जोज़</span><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जाजेजुल ए हिन्द  ।  फारसी :  चारमग्ज़</span><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">गिर्दगां ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    भारतीय</span><span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद में औषधि वह जो रोगी में सतत् आरोग्य का विश्वास पैदा कर उसे रोग से निजात दिलाये। चूंकि शरीर का सीधा संबंध प्रकृति से है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: रोग भी प्रकृतिगत असंतुलन से ही पैदा होते हैं। ऐसे में औषधि प्रकृतिस्थ तत्वों से युक्त होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त  यदि दवा के नाम पर किन्हीं रासायनिक तत्वों का प्रयोग शरीर पर करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो तत्काल न सही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी न कभी तो वह शरीर के साथ विद्रोही तेवर दिखायेगा ही। अक्षय आरोग्य के लिए आवश्यक है कि शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक रोग में प्रकृति के बीच से ही औषधि की खोज करें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वनौषधियों में स्वास्थ्य</span>’</strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रृंखला इसी संकल्प सहित प्रस्तुत है। परिजन इन प्रयोगों को पंतजलि आयुर्वेद के गहन अनुसंधान के साथ रचित </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद जड़ी-बूटी रहस्य</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">पुस्तक में विस्तार से पढ़ सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे अपनाकर हर कोई अक्षुण्य आरोग्य का स्वामी बन सकता है। आवश्यक यह भी है कि सब मिलकर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी रहस्य</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">पुस्तक घर-घर स्थापना का अभियान चलायें और भारत को पुन: आयुर्वेद का शिरमौर बनायें। इस अंक में प्रस्तुत है वनौषधि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अखरोट</span>’...</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">खरोट के पर्णपाती बहुत सुन्दर और वृक्ष सुगन्धित होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थानभेद तथा अन्तस्तर (</span>Endocarp<span lang="hi" xml:lang="hi">) के स्वरूप के अनुसार इसकी दो प्रजातियां पाई जाती हैं। </span>1- <span lang="hi" xml:lang="hi">जंगली अखरोट </span>2- <span lang="hi" xml:lang="hi">कागजी (कृषिजन्य) अखरोट।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जंगली अखरोट के फल का छिलका मोटा होता है। ये </span>30-40<span lang="hi" xml:lang="hi"> मी. ऊँचे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने आप उगने वाले होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कृषिजन्य अखरोट </span>15-25<span lang="hi" xml:lang="hi"> मी. तक ऊँचा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके फलों का छिलका पतला होता है। इसे कागजी अखरोट भी कहते हैं। इसकी मींगी श्वेत तथा स्वादिष्ट होती है। इसकी लकड़ी से बन्दूकों के कुन्दे बनाए जाते हैं। यह प्राय: पर्वतीय प्रदेशों में अर्थात् हिमालयी क्षेत्र में कश्मीर से मणिपुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अफगानिस्तान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिब्बत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नेपाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूटान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुर्की तथा उत्तराखण्ड से आसाम तक </span>1000-3000<span lang="hi" xml:lang="hi"> मी. की ऊँचाई तक पाये जाते हैं। अखरोट मूलत: मध्य एशिया में ईरान तथा अफगानिस्तान का निवासी पौधा माना जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">औषधीय प्रयोग एवं विधि:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(224,62,45);" xml:lang="hi">नेत्र रोग:</span></strong></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">नेत्र-ज्योतिवर्धनार्थ: दो अखरोट और तीन हरड़ की गुठली को जलाकर उनकी भस्म के साथ </span>4<span lang="hi" xml:lang="hi"> नग काली मिर्च को पीसकर अंजन करने से नेत्रों की ज्योति बढ़ती है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मुख रोग में अखरोट का प्रयोग:</span></strong></span></h5>
<ol>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>दन्त-विकार:</strong> अखरोट के छिलकों को जलाकर उसकी भस्म में सेंधा नमक मिलाकर मंजन करने से दाँत मजबूत होते हैं। इसके अतिरिक्तअखरोट छाल को मुंह में रखकर चबाने से भी दांत के रोग तथा मुख की बीमारियों में लाभ मिलता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>तालुदाह पर:</strong> पेड़ की छाल का कल्क बनाकर लेप करना चाहिए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>दंतमूल से रक्तस्राव हो रहा हो तो: </strong>अखरोट छाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुम्बरू छाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बकुल छाल तथा लता कस्तूरी के बीज समान मात्रा में लेकर चूर्ण कर लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस चूर्ण को दंतमूल में लेप करें</span>, 10-15<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिनट तक ऐसे ही रहने दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तत्पश्चात गुनगुने जल का कुल्ला करें। इससे दांत से होने वाले रक्तस्राव का स्तम्भन होता है।</span></h5>
</li>
</ol>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कण्ठ रोग:</span></strong></span></h5>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>गण्डमाला:</strong> </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम अखरोट छाल तथा </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम पत्र को </span>200<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली पानी में उबालकर काढ़ा बनाकर</span>, 10-20<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली की मात्रा में सेवन करें तथा उसी क्वाथ से ग्रंथियों का प्रक्षालन करने से गले की गांठों तथा घेंघा का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong> </strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>कण्डप्रदाह:</strong> अखरोट की गिरी (</span>5-10<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम) का सेवन कण्ठ प्रदाह में लाभकारी होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वक्ष रोग:</span></strong></span></h5>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>क्षतक्षीण:</strong> जीवक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काकोली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षीरकाकोली तथा अखरोट आदि द्रव्यों से बनाए अमृतप्राश घृत को </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम मात्रा में अग्निबल का विचार कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रात:-सायं सेवन करने से क्षतक्षीण में लाभ होता है। पर इसे चिकित्सकीय मार्गदर्शन एवं परामर्शानुसार ही सेवन करना उचित हैा। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>कास:</strong> अखरोट गिरी को आग में हल्का भूनकर चबाने से कास में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>500<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिग्रा. की मात्रा में छिलके सहित अखरोट की भस्म बनाकर उसमें थोड़ा सा अकरकरा रस व मधु मिलाकर प्रात:-सायं सेवन करने से कास में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उदर रोगों में लाभकारी अखरोट:</span></strong></span></h5>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अतिसार के रोगी को:</strong> </span>5-10<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम अखरोट पत्र एवं त्वक् को उबालें</span>, 1/4<span lang="hi" xml:lang="hi"> भाग शेष रहने पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छानकर सेवन कराने से अतिसार में लाभ होता है। इसी क्रम में </span>20-40<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली. अखरोट तेल को </span>250<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली. या आवश्यकतानुसार दूध के साथ प्रात: काल पिलाने से कोष्ठ का स्नेहन तथा मल का निर्हरण होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विसूचिका: </strong>अर्थात् हैजा में कँपकपी तथा शरीर में ऐंठन होने पर अखरोट तेल की मालिश करने से लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विबन्ध में:</strong> अखरोट फल के </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>20<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम छिलकों को </span>400<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली. जल में पकाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पिलाने से कब्ज में लाभ मिलता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>प्रवाहिका:</strong> यह  उदरशूल से संबंधित है। इसमें १</span>0-20<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम अखरोट गिरी के सेवन से लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>कृमि के रोगी:</strong> अखरोट तेल की वस्ति देने से उदरकृमियों का नि:सरण होता है अर्थात् कृमि बाहर निकल जाते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>20-40<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली अखरोट त्वक् या पत्र क्वाथ को पीने से भी आंत्रकृमियों का निर्हरण होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गुदा रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अर्श:</strong> अखरोट तेल पिचु को गुदा में धारण करने से बवासीर के कारण उत्पन्न वेदना (दर्द) का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तार्श: </span></strong>2-3<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम अखरोट फल व छाल की भस्म प्रात: मठे के साथ तथा सायं काल जल के साथ सेवन करने से रक्त बहना रुकता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वृक्क वस्ति रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>प्रमेह:</strong> </span>50<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम अखरोट गिरी</span>, 40<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम छुहारा और </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम बिनौले की मींगी को एक साथ कूटकर घी में भूनें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसकी आधी मात्रा मिश्री मिलाकर रख लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें से </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम नित्य प्रात: सेवन करने से प्रमेह में लाभ होता है। इसे चिकित्सकीय परामर्शानुसार ही सेवन करें।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजनन संस्थान रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>स्तन्यजननार्थ:</strong> </span>100<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम गेहूँ की सूजी तथा </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम अखरोट के पत्ते पीसें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों को मिलाकर गाय के घी में पूरी बनाकर सात दिन तक खाने से मां के स्तन्य में स्त्री दुग्ध की वृद्धि होती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>मासिक विकार:</strong> </span>20-30<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम अखरोट फल को त्वक् (छिलका) सहित कूटकर काढ़ा बनाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काढ़े में दो चम्मच शहद मिलाकर </span>3-4<span lang="hi" xml:lang="hi"> बार पिलाने से रुके हुए मासिक धर्म  में लाभ मिलता है। मासिक के समय होने वाले दर्द आदि में भी लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>वीर्य विकार:</strong> इसके फलों के छिलके की भस्म बना लें और इसमें बराबर की मात्रा में खांड मिलाकर </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम तक की मात्रा में जल के साथ </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिन प्रात:-सायं सेवन करने से धातुस्राव या वीर्यस्राव बन्द होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचा रोग में सहायक अखरोट:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>दाद:</strong> प्रात: काल बिना मंजन किए अखरोट की </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम गिरी को मुँह में चबाकर उस रस को दाद पर लगायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ ही दिनों के सेवन से दाद में लाभ होगा।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>व्रण:</strong> अखरोट की छाल के काढ़े से घावों को धोयें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे घाव जल्दी भर जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>नारू रोग:</strong> अखरोट की छाल को जल के साथ महीन पीसकर आग पर गर्म कर लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नहरूवा की सूजन पर इसे लेप करें तथा उस पर पट्टी बांध कर खूब सेकें। </span>10-15<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिन में नारू में लाभ दिखने लगेगा।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>दद्रु:</strong> </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम अखरोट बीज कल्क का लेप करने से दद्रु का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>दुष्टव्रण:</strong> </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम अखरोट बीज के सूक्ष्म कल्क को पिघले मोम या तेल के साथ मिलाकर लेप करने से शीघ्र घाव भरता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>क्षुद्र कुष्ठ:</strong> अखरोट त्वक् एवं पत्र को पीसकर लगाने से घाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विसर्प</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खुजली आदि में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मानस रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>मस्तिष्क दुर्बलता:</strong> अखरोट की गिरी को </span>25<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>50<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम तक की मात्रा में नित्य खाने से दिमाग में सबलता आती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अर्दित:</strong> अखरोट के तेल की मालिश करने व वात हर औषधियों के काढ़े से बफारा (स्वेदन करने) देने से अर्दित में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अपस्मार:</strong> अखरोट गिरी को निर्गुण्डी के रस में पीसकर अंजन करने और इसे </span>4-6<span lang="hi" xml:lang="hi"> बूंद प्रतिदिन प्रात: काल खाली पेट नाक में डालने से मिर्गी रोग शांत होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">  <span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वशरीर रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>वात रोग:</strong> अखरोट की </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>20<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम ताजी गिरी को पीसकर सर्वप्रथम वेदना-स्थान पर लेप करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तत्पश्चात कपड़ा लपेट कर उस स्थान पर सेंक दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे शीघ्र पीड़ा मिट जाती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>शोथ:</strong> </span>250<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली गोमूत्र में </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली अखरोट तेल मिलाकर पिलाने से सर्वांघौशोथ (सारे शरीर पर आने वाली सूजन) में लाभ मिलता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>वातजन्य सूजन:</strong> अखरोट की </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>20<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम गिरी को कांजी में पीसकर लेप करने से वातज शोथ में लाभ मिलता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>बलवर्धनार्थ:</strong> </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम अखरोट गिरी को </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम मुनक्का के साथ नित्य प्रात: खिलाना चाहिए। इससे शारीरिक व मानसिक बल की प्राप्ति होती है तथा पेट भी ठीक रहता है। इसे जितनी पचे उतनी ही मात्रा में लें।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विष चिकित्सा:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अहिफेन विष:</strong> </span>20<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>30<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम तक अखरोट की गिरी खाने से अफीम का विष और भिलावे के उपद्रव शांत होते हैं। </span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>वनौषधियों में स्वास्थ्य</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>फरवरी</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2973/walnuts-are-beneficial-in-diseases-like-mouth--stomach--skin-and-arthritis-etc</link>
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                <pubDate>Sun, 01 Feb 2015 21:54:36 +0530</pubDate>
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                <title>भिन्न-भिन्न सिर दर्द एवं पतंजलि योगग्राम के उपचार</title>
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                        <![CDATA[<p><br /></p>]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2974/different-types-of-headaches-and-treatments-by-patanjali-yogagram"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/87.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    माइग्रेन </span><span lang="hi" xml:lang="hi">रोगी के सामने धीमी चकाचौंध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीले चमकते काले धब्बे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक हाथ में झनझनाहट जो बाद में कन्धा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भुजा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओंठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीभ तथा कभी-कभी पेट व पैरों पर अनुभव होने लगना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आक्रान्त अंगों में कमजोरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बोलना बन्द हो जाना आदि लक्षण माइग्रेन के दौरे के पूर्व रोगी को आभास होने लगता है। तत्पश्चात् १०-१५ मिनट में सिर दर्द प्रारम्भ हो जाता है। आँख हिलाने में दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वमन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेट दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जी मिचलाना आदि पित्तजन्य शिरोवेदना के भी लक्षण प्रकट होते हैं। माइग्रेन का दौरा एक घंटे से लेकर कई घंटे तक भी रहता है। दौरा कम या बन्द होकर पुन: शुरू हो सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे सिर के पीछे के हिस्से में भी दर्द होता है। कभी-कभी कम सुनने तथा देखने के लक्षण भी दिखाई देते हैं। माइग्रेन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माइनर माइग्रेन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्लासिकल ट्राइजेमिनल माइग्रेन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यूरेलार्जिक माइग्रेन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एण्डोजिनल माइग्रेन या क्लासिकल माइग्रेन में तो सिर दर्द होने के २४ घंटे पहले उपर्युक्त रोग लक्षण दिखने लगते हैं। पतंजलि योगपीठ के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग ग्राम’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के निर्देशक डॉ. नागेन्द्र नीरज ने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग ग्राम’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में गहन अध्ययन के साथ सिर दर्द के अनेक प्रकारों एवं उनके यौगिक व प्राकृतिक उपचारों का विश्लेषण किया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  सि</span><span lang="hi" xml:lang="hi">र दर्द या माइग्रेन में दिमाग की रक्तवाहिनियों के अन्दर स्थित पेशियों में सिकुड़न पैदा होती है। रक्तवाहिनियाँ संकरी हो जाती हैं फलत: दर्द की अनुभूति होती है। आँखें भी प्रकाश के प्रति संवेदनशील तथा रेटिना में स्थित रक्तवाहिनियाँ संकरी हो जाती हैं। मस्तिष्क के जिस हिस्से में सिर दर्द होता है उस हिस्से में 20-25 प्रतिशत खून का दौरा कम हो जाता है। प्रयोगों से यह भी देखा गया है कि दिमाग में खून का दौरा सामान्य से अधिक होने से खोपड़ी के ऊतकों में दर्द की अनुभूति होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन माइग्रेन दौरे के पश्चात् दिमाग अपना काम सही ढंग से करने लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मस्तिष्क में स्थायी आघात नहीं होता।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दिमाग में रक्तप्रवाह अस्त-व्यस्त होने से दिमाग को भरपूर पोषण नहीं मिलता। सिर दर्द या माइग्रेन की स्थिति में खून को जमाने वाले घटक प्लेटलेट्स से जु़ड़कर गुच्छा बनते हैं या टूट जाते हैं जिसमें सेरीटोनिन का स्राव बढ़ जाता है। इनके कारण रक्तवाहिनियाँ और तंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संकरी हो जाती हैं। इसके तुरन्त बाद खून में सिरोटोनिन का स्तर अचानक कम हो जाता है जिससे खोपड़ी के ऊतकों तथा दिमाग के चारों तरफ की झिल्लियों में स्थित खून की नलियाँ ढीली तथा चौड़ी हो जाती हैं। रक्तप्रवाह गड़बड़ हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिणाम स्वरूप दर्द के रूप में अनुभूति होती है। पैतृक गुणों के कारण भी कुछ लोगों के रक्त-रसायनों में जन्मजात विकृति के कारण सिर दर्द तथा माइग्रेन होते हैं। विख्यात तंत्रिका विज्ञान की पत्रिका </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">जर्नल ऑफ न्यूरोलॉजी नयूरोसर्जरी एण्ड सीकियाट्री’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में ब्राजील के तंत्रिका विज्ञानी एम.एफ.वी. पेरेस के अनुसार माइग्रेन तथा सिर दर्द का एक बहुत बड़ा कारण दिमाग में न्यूरोकेमिकल हार्मोनों का असंतुलित होना है। इस संदर्भ में अलग-अलग उम्र एवं लिंग के 17 क्रोनिक माइग्रेन के रोगियों का प्रत्येक घंटे के अंतराल पर उनके खून में हार्मोन के स्तर की जाँच की गयी।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक जाँच के बाद इस नतीजे पर पहुँचे कि माइग्रेन को पैदा करने में मेलाटोनिन नामक न्यूरोकेमिकल हार्मोन महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। चिकित्सकों के अनुसार दिमाग तथा खून में मेलाटोनिन का स्तर गिरते ही रोगी माइग्रेन का शिकार होने लगता है। मेलाटोनिन की कमी से रोगी अनिद्रा की चपेट में भी आ जाता है। वैसे मेलाटोनिन अन्य अनेक शारीरिक क्रिया कलापों में भाग लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे दिमाग तथा खून में मेलाटोनिन का लेवल ऊपर-नीचे होने के कारण नींद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जागरण तथा अनिद्रा की स्थितियां पैदा होती हैं। यद्यपि रात्रि के समय मेलाटोनिन का लेवल बढ़ जाता है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि कृत्रिम या स्वाभाविक अल्ट्रावायलेट किरणों एवं प्रकाश में इसका लेवल कम हो जाता है। क्लस्टर हेडॅक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एपिसोडिक माइग्रेन तथा महिलाओं में ऋतुस्राव सम्बन्धित माइग्रेन का सम्बन्ध मेलाटोनिन से ही है। शान्त प्रकाश रहित जगह में रहने या सोने से मेलाटोनिन का लेवल दिमाग तथा खून में बढ़ता है। फलस्वरूप माइग्रेन से मुक्तहोने में सहायता मिलती है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ट्राइजेमिनल माइग्रेन:</span></strong></span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें दर्द आँख के ऊपर भौंहों तथा चेहरे तक सीमित रहता है। खाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चबाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुख धोने या बोलने से दर्द में कोई प्रभाव नहीं होता। सिलियरी माइग्रेन में दर्द आँखों के चारों ओर महसूस होता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">माइग्रेनस न्यूरेल्जिया:</span></strong></span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार का दर्द विशेष ऋतु या मौसम से सम्बन्धित है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">साइनस सिर दर्द:</span></strong></span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नासा गुहा में सूजन या संक्रमण से आँखों के ऊपर तथा दाँत एवं सिर में दर्द की अनुभूति होती है। इसमें आँखों के चारों तरफ के तन्तुओं तथा चेहरे पर सूजन आ जाती है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विषजन्य सिर दर्द:</span></strong></span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कब्ज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टॉयफायड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्फ्लुएंजा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मलेरिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चेचक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खसरा आदि बीमारियों के पैथोजेन्स तथा औषधियों के साइड इफेक्ट से शरीर के रस-रक्त दूषित एवं विषाक्त होकर सिर दर्द पैदा करते हैं।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तहीनता-जन्य सिर दर्द:</span></strong></span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">खून की कमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिर में खून का प्रवाह कम होने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निम्ररक्तचाप व बुढ़ापा तथा अनिद्रा की स्थिति में दिमाग को पर्याप्त मात्रा में खून नहीं पहुँच पाता। ऐसी स्थिति में सिर के पीछे के हिस्से या सिर के तालु के दाएँ तरफ दर्द की अनुभूति होती है। यह रक्तहीनता-जन्य सिर दर्द खड़े होने तथा चलने पर अधिक बढ़ जाता है जबकि लेटकर विश्राम करने से कम होता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अवरोध-जन्य सिर दर्द:</span></strong></span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कभी-कभी सिर में रक्तकी अधिकता या सिर की रक्तनलियों में अवरोध उत्पन्न होने से रक्तप्रवाह व्यवस्थित नहीं होने से रक्ताधिक या अवरोध-जन्य सिर दर्द होने लगता है। शराब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माँस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाँग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गाँजा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तम्बाकू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अफीम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉफी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैफीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोका आदि नशा करने वाले के व उच्च रक्तचाप आदि की स्थिति में सिर तथा गर्दन की नलियाँ दुष्प्रभावित होना इस सिर दर्द के मुख्य कारक हैं। युवतियों में ठण्ड लगने या अन्य किसी कारण से मासिक स्राव कम हो जाता है या रुक जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब भी इस प्रकार कष्टदायक सिर दर्द देखने को मिलता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तनावजन्य सिर दर्द:</span></strong></span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार के सिर दर्द में सिर के एक या दोनों ओर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आँख के ऊपर तथा सिर के पीछे दर्द होता है। दर्द में ऐसा प्रतीत होता है मानो माथे पर पट्टी बाँध दी गयी हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिर को ऊपर से कोई दबा रहा हो या इसे भींच या खींच रहा हो। कभी-कभी सिर के पीछे भी दर्द होता है। वैसे हल्का-हल्का दर्द बराबर बना रहता है। सोने पर दर्द कम हो जाता है। उठने पर दर्द होने लगता है। महिलाओं में मासिक स्राव के पूर्व तथा बंद होने के समय उत्पन्न तनाव के कारण इस प्रकार का दर्द बढ़ जाता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आहारजन्य सिर दर्द:</span></strong></span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">चॉकलेट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पनीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूध से बने आहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माँस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अण्डा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शराब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉफी तथा कुछ खट्टे फल टमाटर आदि में स्थित रसायनों के एलर्जिक प्रभाव से सिर दर्द या माइग्रेन हो सकता है। दूध वाले पदार्थों में टायरोमिन नामक एन्जाइम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शराब का हिस्टामिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खट्टे फलों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टमाटर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ककड़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खजूर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खीरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संतरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टूथपेस्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चूसने वाली गोलियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जेम्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जेली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोका कोला आदि पेय में स्थित सैलीसिलेटस ऑरेने स्कवैश का टारट्राजीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एलर्जेन का काम करते हैं जो सिर की रक्तवाहिनियों को अनेक प्रकार से दुष्प्रभावित कर माइग्रेन या अन्य सिर दर्द पैदा करते हैं।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हार्मोनल अव्यवस्थाजन्य सिर दर्द:</span></strong></span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मस्तिष्क में स्थित पिट्यूटरी ग्लैण्ड से निकलने वाले हार्मोन महिलाओं की ओवरी पर प्रभाव डालते हैं। ओवरी से निकलने वाले हार्मोन एस्ट्रोजन तथा प्रोजेस्टरॉन गर्भाशय के आन्तरिक स्तर की कोशिकाओं पर प्रभाव डालते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें एक विशेष एन्जाइम पैदा करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो एकाइन को प्रभावित करते हैं। इससे सिर की रक्त वाहिनियों की परिधि में परिवर्तन आता है और सिर दर्द पैदा होता है। मासिक धर्म प्रारम्भ होने से पूर्व तथा ४५ वर्ष बाद रजोनिवृत्ति के समय सेक्स हार्मोन एस्ट्रोजन तथा प्रोजेस्टेरॉन में असंतुलन आने से सिर दर्द होता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">पतंजलि योगग्राम की उपचार प्रक्रिया:</span></strong></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कब्ज को दूर करना ही सिर दर्द की प्रधान चिकित्सा है। पित्तजन्य सिर दर्द कुंजर करने से दूर हो जाता है। स्थायी लाभ के लिए सिर को गरम-ठण्डा कम्प्रेस अथवा स्थानीय वाष्प देकर सिर पर ठण्डी पट्टी दें। सिर में खून की अधिकता से उत्पन्न सिर दर्द में सिर पर मिट्टी की पट्टी अथवा ठंडी गीली पट्टी २० मिनट के अन्तर से बदलते रहें। गरम पाद स्नान देने से खून पैरों की तरफ आ जाता है। फलत: सिर के तरफ रक्तपरिभ्रमण कम हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रात्रि को सोते समय पिण्डलियों की लपेट दें।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">खून की कमी से उत्पन्न सिर दर्द में गर्दन के पीछे गरम या गरम-ठण्डा सेंक दें अथवा स्थानीय वाष्प देकर लपेट दें। जबकि निम्र रक्तचाप या रक्तहीनताजन्य सिर दर्द में सुबह-शाम ३०-३० मिनट के लिए स्लेंटिंग चारपाई (पायदान की तरफ एक-एक ईंट लगाकर) पर सोएँ।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रोगी की स्थिति के अनुसार कटि स्नान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रीढ़ स्नान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पंज बाथ तथा मेहन स्नान दिया जाता है। खुले वातावरण में रहना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोना तथा भरपूर नींद लेना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिर दर्द को ठीक करता है।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव मुक्त होकर विश्राम करें। शवासन तथा ओम ध्यान करें। दीर्घ श्वसन प्राणायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिर के साथ सारे शरीर की मालिश भी सिर द र्द के लिए उपयोगी है। जैसे ही सिर दर्द प्रारम्भ हो सिर का गरम-ठण्डा सेक तथा अन्य उपचार प्रारम्भ करें। प्राय: सिर दर्द खोपड़ी के अन्दर की रक्त वाहिनियों के फैलने तथा चौड़ा होने से पैदा होता है। तो ठण्डी मिट्टी की पट्टी देकर चौड़ा होने से रोकें। कुछ दिन फलाहार तथा रसाहार पर ही रहें। पित्ताशय की खराबी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च रक्तचाप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मासिक धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गर्भ निरोधक गोलियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एसीडिटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कब्ज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जुकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वाइकल स्पॉण्डिलाइटिस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधिक झुकना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिर ऊपर करके अधिक गर्मी में काम करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिर झुकाकर बागवानी या अन्य काम करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गलत ढंग से सोना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिगरेट का धुँआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुर्गन्धित वातावरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शराब वाली कोकटेल पार्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चश्में में प्रयुक्त गलत लेन्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर्यटन आदि स्थितियों में माइग्रेन या सिर दर्द और अधिक उग्र हो जाता है। अत: इनसे बचें।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आहार चिकित्सा:</span></strong></span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रारम्भ में रोगी को 5 दिन फलोपवास तथा 15 दिन रसोपवास कराकर धीरे-धीरे सामान्य आहार पर लायें। पित्तजन्य सिर दर्द में नीबू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टमाटर आदि खट्टे फल न दें। फलोपवास या रसोपवास में प्रत्येक 3 घंटे के अन्तराल से एक समय एक प्रकार का फल या एक प्रकार की सब्जी या फल का रस दें। पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को बरसों से माइग्रेन सिर दर्द रहता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका उपचार उन्होंने इक्कीस दिन के उपवास से किया। रोगी को तीन-चार दिन नीबू पानी या नीबू-शहद अथवा संतरे के रस में पानी मिलाकर पिलाएँ। ५ दिन फलाहार पर रखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाद में उबली सब्जी तथा धीरे-धीरे दलिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोटी देते हुए पूर्ण आहार पर लाएँ। अनुभवी चिकित्सक  के मार्गदर्शन में ही उपचार लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तम प्रभाव अनुभव होगा।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग चिकित्सा:</span></strong></span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गर्मी के कारण होने वाले सिर दर्द में जलनेति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पित्तजन्य सिर दर्द में कुंजर तथा शीतली प्राणायाम करें। रक्तकी कमी से उत्पन्न सिर दर्द में सर्वांगासन श्रृंखला तथा योगमुद्रा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पद्मासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शलभासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भुजंगासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नौकासन योग चिकित्सक के निर्देशन में करें।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उपचार नहीं आराम:</span></strong></span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गाय का ताजा घी या सरसों का तेल अथवा पुनर्नवा को पानी में खूब महीन पीसकर कपड़े से निचोड़कर दो-दो बूँद नाक में टपकाएँ। नाक में कफ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खून आने या संक्रमण की स्थिति में घी अथवा सरसों का तेल डालकर गहरा साँस लेकर ऊपर खींचे। रात को पाँच बादाम गिरी भिगोकर प्रात:काल पीसकर घृत में गाय के गर्म दूध में मिलाकर पिएँ। इससे पुराना सिर दर्द ठीक होता है। दालचीनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चंदन या बेल को पीसकर सिर पर लेप करें। सूर्योदय के साथ होने वाले सिर दर्द में 11 ग्राम गुड़ में गाय का घी मिलाकर खाएँ। पतंजलि आयुर्वेद के अनेक उत्पाद हैं जो सिरदर्द नाशक हैं।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दिमाग में ट्यूमर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीर्ण रक्तके थक्के से उत्पन्न सिर दर्द व मस्तिष्क के अन्दर के दबाव से पैदा हुए सिर दर्द को परिवर्तनजन्य सिर दर्द कहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें उल्टी होती है। खाँसने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चलने तथा उल्टी में सिर दर्द बढ़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि लेटने से कम होता है। सिफलिस-जन्य सिर दर्द रात में बढ़ता है। श्वेत रक्त कोशिकाओं में वृद्धि पायी जाती है। गुर्दे की सूजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेशाब कम आना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धमनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीव्र ज्वर जैसे-टायफायड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मलेरिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गठिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिल्म-दूरदर्शन आँखें फाड़कर देखने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्लूकोमा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कनीनिका शोथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आँखों का अति प्रयोग</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">नाक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कान तथा दाँत के रोग</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">टॉन्सिलाइटिस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिम्ब प्रणाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गर्भाशय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय एवं गुर्दे के रोग में तथा तंग टोप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टोपी या पगड़ी पहनने से सिर दर्द होता है। इसमें जिन रोगों के चलते सिर दर्द होता है उनका उपचार होने से सिर दर्द ठीक होता है। अत: आवश्यक है सिर दर्द का कारण समझने का प्रयास करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तत्पश्चात उसी के अनुरूप उपचार करें। </span></h5>]]>
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                                                            <category>रोग विशेष</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>फरवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Feb 2015 21:53:58 +0530</pubDate>
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<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(236,202,250);">
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    <span style="color:rgb(186,55,42);"><strong> प्राणी मात्र </strong></span></span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">को किसी एक की खोज है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक सच्चे प्रेमी की। जो उसे हर पल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर स्थान पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितना वह चाहे उतने समय के साथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नि:श्रेयस प्रेम के साथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशुद्ध सुख व आनन्द के साथ प्राप्त हो। और ऐसा सच्चा प्रेम करने वाला सर्वत्र सुलभ और हमें पूर्ण रूप से समझने वाला ज्ञानी तो परमात्मा ही हो सकता है। उसके यहाँ सब कुछ अनन्त है- प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा सुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आनन्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृपा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहनशक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धैर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समझ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐश्वर्य इत्यादि सब कुछ अनन्त भरा है। हर प्राणी को उसी की खोज है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सच्चे प्रेमी की खोज और कितना आश्चर्य है कि भगवान् को भी उसी व्यक्ति की खोज है जो केवल उसे चाहता है अर्थात् सच्चे प्रेमपात्र की खोज।</span></strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">माँ को बच्चे की खोज है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि अपना अमृत पिलाकर कृतार्थ हो सकें और बच्चे को माँ की खोज है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि अपनी क्षुधा व त्रास मिटा सके। जिस घड़ी दोनों मिल जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही शुभमुहूर्त्त हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भागवत मुहूर्त्त है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुण्य घड़ी है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">यदङ्ग दाशुशे त्वमग्ने भद्रं करिष्यसि। तवेतत् सत्यमङ्गिर:।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक बार तू जिसे अपने गोद में आश्रय दे देता है उसका सदा भद्र=कल्याण ही होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही तेरी सत्य प्रतिज्ञा है। जन्म लेते ही प्राणी उसकी खोज में जुट जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और तब वह भगवान्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माँ के रूप में हमारे सामने प्रकट हो जाता है। जानने वालों ने बताया कि कण-कण में वही बसा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जर्रे-जर्रे में उसी का निवास है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह छिपा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकट ही है। सब रूपों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं तो है। माता-पिता-भाई-बहन-मित्र-पुत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुत्री</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पत्नी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिष्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशंसक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निन्दक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाधक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहायक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेरक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुकूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिकूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धूप-छाँव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गर्मी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वसन्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्षा सबमें वही तो है। सब कुछ तो उसकी कृपा का प्रसाद है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर हम केवल उसके प्रशंसक रूप को तो स्वीकार करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई प्रशंसा करे तो लगता है ये तो साक्षात् भगवान् ही हैं पर जब दोष सुधारने के लिए वह निन्दक का जामा पहन लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वो रूप हमें पसन्द नहीं आता है। माँ दूध-पिलाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लाड लड़ाये अपनी करुणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ममता लुटाये तो लगता है यही साक्षात् भगवान् का रूप है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर साबुन लगाकर मैल हटाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पानी से नहलाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोगी हों तो कड़वी दवा पिलाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गलत काम करे तो पकड़ कर पिटाई कर दें तो लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसी माँ नहीं चाहिये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु ज्ञान सिखाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेरणा दे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय का निश्छल-निर्मल प्रेम देकर अनुग्रह करें तो लगता है इसके अतिरिक्त किसी और भगवान् की आवश्यकता भी नहीं है- पर जब दोष दिखाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कठोर नियमों का पालन कराये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्मोह होकर हमारे दु:खी होने पर भी वज्र जैसी कठोरता दिखायें तो साक्षात् यमराज नजर आता है और लगता है ऐसा गुरु नहीं चाहिये। बस यहीं तो व्यक्ति भगवान् को मिस करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चूक जाता है। समर्पण टूटता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस परीक्षा में फेल होने पर जन्म-जन्मान्तरों तक आत्मा का संसरण होता रहता है। न्यायदर्शन कहता है सब दु:खों का नाश तत्वज्ञान से होता है। जिसे आहार का तत्वज्ञान हो गया वो आहार से उत्पन्न होने वाले दु:खों से बच जाता है। जिसे मौसम का तत्वज्ञान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह मौसम के अनुकूल आचरण करता हुआ </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तत्व</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> दु:खों से बच जाता है। यह तत्व ज्ञान का सूत्र सर्वत्र लागू होता है। तत्व ज्ञान से मिथ्या ज्ञान नष्ट हो जाता है और मिथ्या ज्ञान नष्ट होने से प्रवृत्ति नष्ट हो जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रवृत्ति के नष्ट होने से उसके कारणरूप दोष अर्थात् राग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वेष और मोह नष्ट हो जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोष नष्ट होने से जन्म नहीं होता और जन्म नष्ट होने से समस्त दु:खों का नाश हो जाता है। सब कुछ इतना स्पष्ट और सामने है फिर भी खोज की भागदौड़ जारी है। इसी को तो किसी कवि ने शब्द दिये हैं- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">पानी में मीन प्यासी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोहे सुनि-सुनि आवे हाँसी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">। हे प्रभो मुझे अपनी दिव्य ज्योति का एक ऐसा विराट् कुण्ड बना कि बाहर से आने वाला प्रत्येक विषय मैं उसमें झौंक दूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और वह सब कुछ दिव्य ही बन जाये। तो क्या हमें किसी भी वस्तु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार से द्वेष नहीं करना चाहिये</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या सब कुछ भगवान् का ही प्रसाद समझकर स्वीकार कर लेना चाहिये</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वेद कहता है- </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>''<span lang="hi" xml:lang="hi">योऽस्मान् द्वेष्टि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्म:’’।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">य=जो (एकवचन) अस्मान्=हम सबको (बहुवचन) द्वेष्टि=द्वेष करता है और यं=जिसको (एकवचन) वयं दिष्म:=हम द्वेष करते हैं (बहुवचन) हे काल कराल विराट प्रभो! तं वो जम्भे दध्म: अर्थात् उसे हम आपके दाढ़ में पिसने के लिये रखते हैं। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि कष्ट देने वाला तो एक है और उससे पीड़ित होने वाले हम अनेक हैं जिससे हम सब द्वेष करते हैं वह तो एक है और हम द्वेष करने वाले अनेक हैं। जहाँ ऐसी स्थिति बनें अर्थात् एक से अनेकों को कष्ट मिले तो वह स्वीकार करने योग्य नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह भागवत नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा समझ लेना चाहिये। वह आततायी कोई बाहर का भी हो सकता है और अपने अन्दर का भी हो सकता है। कोई चोर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डकैत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उचक्का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रष्टाचारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत्याचारी आदि बाहर वाला भी हो सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो एक होते हुए भी अनेकों को कष्ट देता है और वह काम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईर्ष्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वेष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभिमान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्रोह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तृष्णा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असूया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचिकित्सा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पृहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मत्सर आदि कोई हमारा आन्तरिक शत्रु भी हो सकता है। इनमें से किसी एक को भी न तो हम पसन्द करते हैं और ना ही दूसरे पसन्द करते हैं। हम स्वयं भी परेशान होते हैं और दूसरों को भी परेशान करते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तो क्या ये मन्त्र पाठ करने से भगवान् इन आन्तरिक और बाह्य शत्रुओं का नाश कर देते हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">हाँ निश्चित रूप से। भगवान् हमारे सभी शुभ संकल्पों को पूर्ण करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसा हम चाहते हैं वैसा ही वो हमारे लिए कर देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर यह सब करते हुए वो माध्यम या अपना यन्त्र हमें ही बनाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि हम बनना स्वीकार करें तो। अर्थात् वो हमारे ही माध्यम से हमारे संकल्प को पूरा करते हैं। इसको वेद के एक अन्य मन्त्र में कहा है-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">यदग्ने स्यामहं त्वं वा घा स्याऽहम्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्युष्टे सत्या इहाशिष:। (ऋग्-8.44.23)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हे सबको आगे ले चलने वाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सबकी उन्नति करने वाले अग्नि रूप मेरे प्रियतम परमेश्वर! मैं तेरी भक्ति में मग्न होकर त्वद्रूप हो जाऊं और तुम मुझ पर कृपालु हुए मुझ में बस जाओ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाहित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिष्ठित हो जाओ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मद्रूप हो जाओ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुम्हारे सब आशीष सत्य हो जाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं सदा तुम्हारे आशीषों से युक्त रहूँ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्री अरविन्द कहा करते थे मानव जीवन का सर्वोत्कृष्ट लक्ष्य है संसार के बीच में भगवान् बनकर जीना। भगवान् उन सबके इस संकल्प को पूर्ण करे जो ऐसा चाहते हैं। उन सबकी खोज को अवसान दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो इसमें लगे हैं। उन सबको अपना प्रेम पात्र बनायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो उन्हीं को सच्चे प्रेमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माता-पिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बन्धु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहायक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्षक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पोषक व प्रेरक के रूप में चाहते हैं। कोई पूर्ण ही तो किसी अपूर्ण को पूर्ण बना सकता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ओ३म् पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वह परमात्मा भी पूर्ण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह संसार भी पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण उत्पन्न हुआ है। उस पूर्ण परमात्मा में से पूर्ण ले लेने पर भी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह पूर्ण ही अवशेष बचता है। ओ३म् शान्ति। </span></h5>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र-चिंतन</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>फरवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Feb 2015 21:51:56 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[योग संदेश विभाग]]>
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                            </item>
            <item>
                <title>योग गुरु है तुम्हें प्रणाम</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">वेद भूषण त्रिपाठी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. रामाश्रय मिश्र</span></strong></p>]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2976/yog-guru-hai-tumhe-pranam"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/36.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग गुरु है तुम्हें प्रणाम</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जन्मे और पले हरिधाम</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सबसे प्रिय है देश महान</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग गुरु है तुम्हें प्रणाम ।।१।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong> </strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हर भाषा का है सम्मान</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बोली हिन्दी लगी ललाम</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय संस्कार महान</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग गुरु है तुम्हें प्रणाम ।।२।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong> </strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ का मान</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व विजित आयूष महान</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन के आदर्श हमारे</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग गुरु है तुम्हें प्रणाम ।।३।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong> </strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">युवा वर्ग में जोश जगाते</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">निर्भयता का पाठ पढ़ाते</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी का करते गुणगान</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग गुरु है तुम्हें प्रणाम।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong> </strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अपनाएगा राष्ट्र महान</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रेष्ठ धर्म मानवीय ज्ञान</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योगी-ज्ञानी अरु विद्वान</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सदा सहज श्रद्धा से लेगा</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत देश तुम्हारा नाम</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग गुरु है तुम्हें प्रणाम ।।५।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong> </strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="right"> </h5>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>कविता</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>फरवरी</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2976/yog-guru-hai-tumhe-pranam</link>
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                <pubDate>Sun, 01 Feb 2015 21:50:38 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[योग संदेश विभाग]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आदर्श ग्राम योजना को सफल बना सकती हैं देश की नारियाँ</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ</span></strong><strong><span style="font-size:10pt;line-height:115%;">0</span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> विजय कुमार मिश्र</span></strong></p>]]>
                    </description>
                
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                        <![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2977/women-of-the-country-can-make-adarsh-%E2%80%8B%E2%80%8Bgram-yojana-successful"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/2.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">      देश</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की सबसे छोटी इकाई गांव है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गांव की सबसे बड़ी पूँजी है वहां के निवासियों की श्रमशक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृषि भूमि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राकृतिक उत्पाद एवं गौवंश सहित घरेलू पशु।  इनका समुचित नियोजन एवं प्रबंधन बड़ी बात है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि इसी पर गांवों की समृद्धि निर्भर करती है। गांवों का संचालन ऋषियों के मार्गदर्शन में होता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब देश की समृद्धि गांवों पर निर्भर थी। ऋषिगण एक प्रकार के कुशल प्रबंधक थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो मानवीय व्यक्तित्व को आदर्श सांचे में गढ़कर उनके माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का नियोजन कराते थे और गांव देश के लिए समग्र विकास के आदर्श मॉडल के रूप में पहचाने जाते थे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">स प्रकार ऋषियों के मार्गदर्शन में तैयार कार्य योजना में गांवों के संसाधनों के सहारे गांवों की समृद्धि का मार्ग प्रशस्त किया जाता था। गांव एक प्रकार के कस्बे जैसे थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गांव में निवास करने वाले व्यक्तियों की बुनियादी जरूरतें जैसे शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिकित्सा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वावलम्बन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कार आदि गांव की व्यवस्था में ही पूरी हो जाती थीं। पर तब गांव की समृद्धि में गांव के पुरुष और वहां की नारियों की समान भागीदारी थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यहां तक कि देश के हर सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनैतिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धार्मिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शैक्षिक आदि कार्यों में नारियों की भूमिका पुरूषों से भी ज्यादा बढ़चढ़ कर रहती थी। शिशु निर्माण के दायित्व से शेष बचे समय व श्रम का उपयोग वे गांव के सामूहिकता एवं भावनात्मक निर्माण में करती थीं। दूसरे शब्दों में कहें तो गांव के उत्थान एवं समृद्धि में दोनों की समान भागीदारी के कारण नारियों को वैदिक काल से ही एक उत्तम सृजेता का महत्व मिला हुआ था।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/2.jpg" alt="2"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अपने सृजन का श्रेय दूसरे को देने की शक्ति:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">-<span lang="hi" xml:lang="hi">यजु. १४।३ के इस मंत्र से भी नारी शक्ति की हर संभव भागीदारी स्पष्ट होती है। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अस्वैर्दक्षेर्दक्षपितेह सीद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देवानाऽसु</span>6<span lang="hi" xml:lang="hi">ने बृहते रणाय</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात हे नारी! तुम अपनी योग्यता से ज्ञान का कोश होकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देवों के कल्याण तथा महान आनन्द के लिए इस घर में रहो। यहां घर का आशय किसी सीमा से कैद होना नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु इसे सृजन परिकर कहा जा सकता है। वैसे भी नारी में दिव्य सृजन की शक्ति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह जिस परिकर में निवास करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे दिव्य आदर्श गुणों से विभूषित कर देती है। वह जहां पहुंचती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं अपनापन बिखेर कर सामूहिता का वातावरण तैयार करती है। नारी में अपने एवं अपने समाज का पिछड़ापन दूर करने की अनुपम शक्ति है। नारी जागरण आंदोलन में जुटे विविध संगठनों पर किसी ने टिप्पणी की थी कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">नारी के लिए पुरुष समाज का यही सबसे बड़ा उपकार है कि वह अपने ढंग से विकसित होती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बढ़ती नारी के मार्ग में अवरोध न खड़ा करे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो नारी अपना विकास स्वयं कर लेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही आस-पास के असंख्य लोगों के भविष्य को उज्ज्वल बनाने में भी सफल हो जायगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बात तथ्य पूर्ण है क्योंकि गर्भ में पल रहे भ्रूण को नारी ही अपने संकल्पबल से मानव से महामानव स्तर तक निर्मित करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें नर कहां साथ होता है। परमात्मा ने इन्हें विद्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भावना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदनशीलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूझबूझ एवं सहनशीलता जैसे विशेष गुण दिये हैं। सबसे बड़ी विभूति अलग से प्रदान की है वह है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अपने सृजन का श्रेय दूसरे को देना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी तो एक कलाकार के रूप में गर्भ में अपनी कृति का निर्माण करती है और उसे नाम पति अर्थात नर का प्रदान करती है।</span>‘ <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी परिधि के प्रति समर्पण</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा किसी भी परिस्थिति में नवरचना की सामर्थ्य।</span>‘ <span lang="hi" xml:lang="hi">आपने देखा होगा कि एक छोटी सी बच्ची जब उसे उसके मां-पिता घर से बाहर निकल कर खेलने से मना कर देतें हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब भी वह अपने उसी दायरे में रहकर निर्धारित समय में ही न केवल अपना मनोरंजन कर लेती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु पूर्ण संतुष्टि एवं संतोष का अनुभव भी करती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नारी की समाधान परक दृष्टि:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज नारी हर दायरे को पार करती दिखती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर अब युग की पुन: आवश्यकता है हर वर्ग की नारी अपनी परिवारिकता अर्थात अपनत्व के दायरे को थोड़ा बढ़ाये और जहां वह निवास करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस सम्पूर्ण गांव-मोहल्ले को अपना एक विराट परिवार वह मान सके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो निश्चित ही संपूर्ण गांव का कायाकल्प हो सकता है। इसी क्रम में गांव भर की नारियां मिलकर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आदर्श ग्राम योजना</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को भी बड़े ही करीने से पूरा कर सकती हैं।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/101.jpg" alt="101"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">चूंकि वह जिस गांव में रचती-बसती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ी ही संजीदगी से उस गांव की आवोहवा को समझती है। यद्यपि गांव को जानने-समझने का प्रयास वहां का पुरुष समाज भी करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर उसका जानना कहीं तक अपनी प्रभुता के साथ संबद्ध रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह गांव की हर जानकारी को अपने अहम से जोड़कर देखता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर नारी किसी भी परिवार से तालुक रखती हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह हर जानकारी के पीछे छिपी समस्या को गहराई से समाधान के दायरे से देखती है और अपने मानस में एक नये ढंग का समाधान परक खाका बनाकर रखती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भले ही उसे अपने मुँह को खोलने का अवसर व अधिकार न मिल रहा हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे मौन ही क्यों न रहना पड़े। पर समाधान को वह अपने अंदर बड़ी संजीदगी के साथ पकाती रहती है। ठीक जैसे वह अपने गर्भ धारण काल में हर उपेक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभाव के बीच भी मौन रहकर उस कृति को परिपक्वरूप देती है। आज नारी के इस तप पूर्ण शैली को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आदर्श ग्राम उत्थान</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की सफल सम्भावित दृष्टि से देखने की जरूरत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। क्योंकि नारी शक्ति की यह विशिष्टता भारत के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आदर्श ग्राम योजना</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">में सहायक साबित हो सकती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि और कृषि भारत की शान:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि एवं कृषि को सामिल किये बिना भारत में आदर्श ग्राम की रूपरेखा अधूरी ही माननी चाहिए। ऋषि वह जिसका चिंतन राष्ट्रीय व वैश्विक होता है तथा जिस स्थान पर वह निवास करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे धरती का स्वर्ग बनाये बिना चैन से नहीं बैठता। ऋषि चेतना के दायरे में आने वाले हर प्राणी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे वह शेर हो अथवा मेमना</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">सभी एक ही घाट पर पानी पीने को विवश होते देखे जाते हैं। महत्वपूर्ण यह कि ऋषि का अपना कोई आसियाना नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह संग्रह से मुक्त</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">समाज द्वारा दिये गये मुट्ठी भर अनाज (मुट्ठी फंड) के सहारे अपना निर्वाह करता ही है अपितु संपूर्ण गांव की प्रगति का दायित्व निर्वहन सहर्ष स्वीकारता है। पतंजलि योगपीठ का प्रयोग आज का जीवंत उदाहरण है। प्राचीन भारत में हर दो किलोमीटर पर किसी न किसी संत की प्रतिष्ठा के पीछे यही दर्शन छिपा है। उसने अपने समय में देश की खुशहाली के लिए गांवों की आदर्शवादी दिव्य रूपरेखा तैयार ही की होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहां के हर नागरिक को देवत्व से भरा-पूरा बना कर रखा होगा। तथ्य बताते हैं कि परम पवित्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभाव मुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य जीवनशैली उसकी चेतना का पर्याय था तथा यही जीवन शैली उसके अपने गांव व संपर्क में आने वाले परिकार को भी आदर्श बनाती रही।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/31.jpg" alt="31"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गांव की पूंजी गांव में:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आदर्शग्राम के लिये सर्वप्रथम जानने की जरूरत है कि उसकी रचना शैली किस प्रकार होगी</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके लिए गांव वासियों का प्रथम संकल्प हो कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">गांव की पूँजी और गांव का पैसा गांव में लगे। बाहर से सिर्फ दो ही तत्व आयात किये जांए एक तो तकनीक व शिक्षा और दूसरा नमक।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका आशय यह नहीं कि गांव की प्रगति के लिए अन्य आवश्यक तत्व जरूरी ही नहीं हैं-जैसे कानून</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय आदि। वस्तुत: ऐसे तत्वों की जरूरत है पर गांव में इतने सौहार्द का वातावरण बना दिया जाय कि कानून की जरूरत मात्र रोजमर्रा के कार्यों में स्वैच्छिक संवैधानिकता बनाये रखने के लिए ही पड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे न कोई द्वेष पनपे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न संकीर्णताओं से भरा लोभ किसी के सिर चढ़कर बोले। इसके लिए गांव वासियों की मानसिकता में यह आवश्यक तथ्य बैठाया जाय कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्वच्छ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुशिक्षित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वावलम्बी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कार युक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यसन-कुरीतिमुक्त</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">सहकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समन्वय से भरापूरा गांव</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ही धरती का स्वर्ग है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सरकारी सहायता कब</span>?</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत के गाँवों में अनेक उदाहरण हैं जिसमें गांवों के स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वावलम्बी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पन्न होने का जिक्र मिलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर तथ्य यह भी हैं कि किसी गांव को आदर्श स्वरूप देने का ताना-बाना वहां के निवासियों ने ही बुना और सबने मिलकर अपने संकल्प बल से उसे पूरा भी किया। वास्तव में सरकारी सहयोग तो तब काम आता है जब गांव वासी इतना स्पष्ट हो लेते हैं कि गांव हित में अमुक कार्य होना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर उन्हें अपने बलबूते पूरा करना असंभव लगता है। तब वे सरकारी भूमिका पर दबाव बनाने में सफल भी हो सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो जब तक अपने गांवों को आदर्श स्वरूप देने के लिए सरकारी भूमिका की बाट जोहते रहेगें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी गांव आदर्श नहीं बन सकते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमें इस तथ्य को भली प्रकार समझना ही होगा। गांव व मोहल्ले को आदर्श बनाने के लिए प्रथम जरूरत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस गांव के हर नागरिक में अपनेपन का भाव जगाकर सम्पूर्ण गांव को एक परिवार मानने की। यह अपनत्व भाव पैदा करने में गांव की नारियों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कार युक्त शिक्षा पर जोर:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कभी देश की नारी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">माता मदालसा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की तरह अपने गांव के सभी शिशुओं को अपनी संतान मानकर उनकी शिक्षा-दीक्षा का प्रबंधन करती थीं। उसका संकल्प बोलता था कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बालक चरित्रवान- संस्कारवान होगा तो गांव संस्कारी व दिव्य बनेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: हर संतान में श्रेष्ठ चिंतन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चरित्र एवं व्यवहार की आदत डालना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें कुटेबों से बचाना नारियों की जिम्मेदारी बनती थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे उसे पूरा भी करती थीं।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आज पुन: उसी सोच की जरुरत है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आदर्श गांव के महत्वपूर्ण सूत्र:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आदर्श गांव के लिए कुछ बुनियादी सूत्र हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्हें हर संकल्पशील को अपने साथ जोड़कर चलना ही पड़ेगा। प्रथम देश के ऋषिमना संत-महापुरुषों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शहीदों  के प्रति विश्वास भरा गौरव जगाना। संत-महापुरुष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुधारक एवं शहीदों के प्रति जिस समाज में सम्मान होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहां की भावी पीढ़ी निडर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पवित्रमना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेजस्वी होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा विशेषज्ञों का मत है। दूसरा धर्म एवं जाति से मुक्त गांव:- गांवों के देवालयों का उपयोग व्यक्तित्व निर्माण के संदर्भ में होना चाहिए। वहां से संस्कार एवं सेवा की योजनाएं संचालित होने में ही इनकी सार्थकता समझी जाय। इससे धार्मिक वर्ग एवं जातिगत समन्वय का मार्ग प्रशस्त होगा। सामूहिक श्रम दान परम्परा के प्रति विश्वास जगाना:- गांव की गलियां</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सडकें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पार्क</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तालाब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विवाह घर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंचायत भवन सहित समस्त सार्वजनिक स्थलों का निर्माण एवं रख-रखाव का दायित्व गांव वासी हिल मिल कर सामूहिक श्रमदान से पूरा करें। गांधी जी ने कहा था कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">यदि गांव में नित्य एक घंटे सामूहिक श्रमदान की परम्परा चल सके तो गांव हित के बड़े से बड़े कार्य पूरे किये जा सकते हैं। आज उसकी जरूरत है।</span>‘ <span lang="hi" xml:lang="hi">सामूहिक अंशदान का प्रचलन:- गांव को कैसे स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वावलम्बी बनायें इसके लिए सभी मिलकर ग्रामोत्थान के लिए मुट्ठी फंड का अभियान चलाये। बूंद-बूंद से घड़ा भरता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार गांव हित में सभी का छोटा अंश भी लग सके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो गांव के हर संसाधनों के प्रति ठीक वैसा ही प्रेम पैदा होगा जैसा अपने निज के साधनों के प्रति। पर्व-त्यौहार बनें सामूहिकता एवं समन्वय के माध्यम:-हर गांव में कोई न कोई पर्व-त्योहार मनाये ही जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इनका उद्देश्य परस्पर सामूहिकता एवं समन्वय भाव पैदा करना होना चाहिए। इसके अतिरिक्त स्वावलम्बी गांव के लिए कुटीर उद्योगों का प्रचलन हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गौ-आधारित जीवन पद्धति का समावेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ गांव के लिए योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम का समावेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों के प्रति विश्वास पैदा किया जाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सद्साहित्य पुस्तकालय केंद्र की स्थापना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ गांव-स्वच्छ गांव का संकल्प जगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बागवानी एवं हरीतिमा संबर्धन का संकल्प जगाया जाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कामकाजी विद्यालय एवं संस्कारशाला का प्रचलन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामूहिक स्वच्छता का वातावरण बने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राकृतिक ऊर्जा पर बल दिया जाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैविक एवं प्राकृतिक कीटनाशक का प्रयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यसन एवं कुरीतियों के विरुद्ध मनोभूमि का निर्माण करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिल बैठकर विवादों का हल निकालने का प्रचलन जैसे अनेक दायित्व हैं जिनमें सदासयता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समायोजन की बड़ी जरूरत पड़ती है और यह दायित्व गांव की संपूर्ण नारियां मिल-जुलकर सहज पूरी कर सकती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि परमात्मा ने इस क्षेत्र में नारियों को अबाध गति दी है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]>
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                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>फरवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Feb 2015 21:49:02 +0530</pubDate>
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                <title>योग एवं आयुर्वेद से जीवन परिवर्तन</title>
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                        <![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">        मैं</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> एक वरिष्ठ नागरिक हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्षा मंत्रालय की आर्डनेन्स फैक्टरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नागपुर से जून-०७ में सेवा निवृत्त हुआ। विद्यालय काल से ही हॉकी एवं फुटबाल का अच्छा खिलाड़ी रहा हूँ। अगस्त-03 में मेरा बाँया फुफ्फुस/ फेफड़ा (</span>Lung<span lang="hi" xml:lang="hi">) जल से भरा पाया गया। जल निकालने की प्रक्रिया (</span>Plural Effusion<span lang="hi" xml:lang="hi">) दो बार पूरी की गयी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रति बार जल की मात्रा 750 (</span>CC<span lang="hi" xml:lang="hi"> रही। यही नहीं अनेक बार मेरे तथा मेरे परिवार की योग-प्राणायाम से रक्षा हुई।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">2007 में सेवानिवृत्त होने तक के काल में मेरी पत्नी को कोई भी स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या नहीं थी। लेकिन</span></h5>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2978/life-transformation-through-yoga-and-ayurveda"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/68.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    मैं</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> एक वरिष्ठ नागरिक हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्षा मंत्रालय की आर्डनेन्स फैक्टरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नागपुर से जून-०७ में सेवा निवृत्त हुआ। विद्यालय काल से ही हॉकी एवं फुटबाल का अच्छा खिलाड़ी रहा हूँ। अगस्त-03 में मेरा बाँया फुफ्फुस/ फेफड़ा (</span>Lung<span lang="hi" xml:lang="hi">) जल से भरा पाया गया। जल निकालने की प्रक्रिया (</span>Plural Effusion<span lang="hi" xml:lang="hi">) दो बार पूरी की गयी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रति बार जल की मात्रा 750 (</span>CC<span lang="hi" xml:lang="hi"> रही। यही नहीं अनेक बार मेरे तथा मेरे परिवार की योग-प्राणायाम से रक्षा हुई।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">2007 में सेवानिवृत्त होने तक के काल में मेरी पत्नी को कोई भी स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या नहीं थी। लेकिन अप्रैल 09 में चिकित्सा हुई। 11 माह में 9 बार अस्पतालों में भर्ती होना पड़ा। अंग्रेजी दवाइयों की भारी मात्रा के दुष्प्रभाव के कारण उनकी कष्टकर स्थिति बनने लगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे में नागपुर मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने बताया कि मुख्य रूप से उन्हें ऑक्सीजन की आवश्यकता है न कि इतनी अधिक दवाइयों की। तब हमारी पुत्री ने अपनी माँ को प्राणायाम करने के लिए प्रेरित किया। योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम व अल्प मात्रा में दवाओं के सेवन से वे जीवन के अंत तक काफी स्वस्थ बनी रही। इसी प्रकार २००८ में मैं सोराइसिस (</span>Psoriasis<span lang="hi" xml:lang="hi">) से ग्रसित हो गया एवं काफी समय तक अंग्रेजी दवाइयों के लेने के उपरान्त भी लाभ नहीं हुआ। फिर मैं पतंजलि आरोग्य चिकित्सा केन्द्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नागपुर के वैद्य के पास गया। तीन महीने में ही आयुर्वेदिक दवाओं के सेवन से रोग मुक्त हो गया। तब से हमने आयुर्वेद ही अपना लिया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">2011 में मेरा पुन: परीक्षण हुआ। मुझे भयंकर हृदय रोग (</span>COPD<span lang="hi" xml:lang="hi">) से ग्रसित बताया गया। विशेषज्ञ चिकित्सक ने बताया मेरे फेफड़ों को कई रोगों ने आ घेरा है। </span>Collapse of Lungs/ Lobes<span lang="hi" xml:lang="hi">। उन्होंने इसके उपचार के लिए (</span>Lobectomy) <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेष शल्य चिकित्सा का सुझाव दिया। फिर हमने दिल्ली के </span>AIIMS<span lang="hi" xml:lang="hi"> और गंगाराम अस्पताल के विशेषज्ञों से सलाह ली। वहाँ के डॉक्टरों ने नई बात बताई। चूंकि मैं लगातार योग-प्राणायाम से जुड़ा था इसलिए उन्होंने कहा कि इसी को नियमित करते रहें। आपको शल्य चिकित्सा की आवश्यकता नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपके फेफड़ों/ फुफ्फुसों को अधिक </span>Oxygen  <span lang="hi" xml:lang="hi">ऑक्सीजन की आवश्यकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम आपके लिए रामबाण है और आप धूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धुएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भीड़ से अपना बचाव करें। चिकित्सकों ने दवाइयों की मात्रा भी कम कर दी और प्राणायाम के साथ ही भाप लेने की सलाह दी। कम दवाओं के सेवन एवं नियमित रूप से प्राणायाम एवं योग से मेरे रोग का उपचार हो गया। 20 वर्ष तक अंग्रेजी दवाओं के सेवन के बाद भी मेरा जो रक्त-दबाव 160/90 रहा करता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह भी आयुर्वेदिक दवाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम एवं </span>Telma-H <span lang="hi" xml:lang="hi">-॥ (40) की कम </span>dose<span lang="hi" xml:lang="hi"> के सेवन से रक्त-दबाव 130/80 ही रहता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ये सब बातें मेरे जीवन में बैठ गईं कि हमारे शरीर को स्वस्थ बनाये रखने के लिए प्राणायाम एक मुख्य स्रोत है। यदि प्राणायाम सही प्रकार से नियमित रूप से किया जाये तो यह हमारे शरीर को निरोगी बनाता है और हम उच्च चेतना के स्तर पर जी सकते हैं। इसी भाव से हम पूज्य स्वामी जी के योग-प्राणायाम का प्रचार-प्रसार करते रहते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ अभियान को सादर प्रणाम एवं हार्दिक शुभकामनाएँ</span>,</h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">भवदीय</span>,</h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">जी.एन. सिंह</span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">वेरावल (गुजरात)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"> </h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ से मिला नया जीवन</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्री बाबा जी मैं चल नहीं पाती थी मेरे पैरों में वात की शिकायत थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जब से मैं आपके द्वारा बताए गए योग एवं एक्सरसाइज कर रही हूँ। मुझे बहुत आराम मिला है। अब मैं चल फिर लेती हूँ। मेरे रीढ़ की हड्डी में दर्द रहता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपके पतंजलि से प्राप्त दवाइयों को खाने से मुझे इसमें भी आराम मिला है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपके द्वारा बताए गए भस्त्रिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कपालभाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुलोम-विलोम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रामरी बहुत ही प्रभाव कारी हैं। जब से मैं आपके द्वारा बताया योगा करने लगी हूँ अपने सभी काम जैसे-कंघी करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कपड़े धोना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नहाना आदि स्वयं करने लगी हूँ। बाबा जी इस प्रकार राह दिखाने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। धन्यवाद किरण सिन्हा जी का भी जिन्होंने हमेशा मुझे योग करने के  लिए प्रेरित किया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">भवदीया</span>,</h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीमती योगश्री चंदेल</span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">अनूपपुर (म.प्र.)</span></h5>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>दिव्य अनुभूति</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>फरवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Feb 2015 21:46:29 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[योग संदेश विभाग]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आयुर्वेद में सलाद प्रकरण</title>
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                        <![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">      भोजन </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के साथ सलाद का महत्वपूर्ण सम्बंध है। सलाद वह पक्ष है जिसके कारण आहार न केवल स्वादिष्ट बनता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु उसकी पौष्टिकता भी बढ़ जाती है। सलाद में सम्मिलित पदार्थों का बिना पका होना इसकी अनिवार्यता है। हरित या ताजे एवं बिना पकाए कच्चे भोज्य पदार्थों का प्रयोग होने के कारण ही संस्कृत में सलाद को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">हरितक’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भोजनकुतुहलम्’</span> (<span lang="hi" xml:lang="hi">आ० बालकृष्ण रचित) पुस्तक के इस अंश </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">हारीत-प्रकरण</span>  <span lang="hi" xml:lang="hi">में सुरुचिपूर्ण व विविध प्रकार के स्वादिष्ट आयुर्वेद सम्मत सलादों का विवेचन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके गुण-धर्म के साथ प्रस्तुत है-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आम का सलाद:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कच्चे आम के फल</span></h5>...]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2979/salad-case-in-ayurveda"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/43.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   भोजन </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के साथ सलाद का महत्वपूर्ण सम्बंध है। सलाद वह पक्ष है जिसके कारण आहार न केवल स्वादिष्ट बनता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु उसकी पौष्टिकता भी बढ़ जाती है। सलाद में सम्मिलित पदार्थों का बिना पका होना इसकी अनिवार्यता है। हरित या ताजे एवं बिना पकाए कच्चे भोज्य पदार्थों का प्रयोग होने के कारण ही संस्कृत में सलाद को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">हरितक’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भोजनकुतुहलम्’</span> (<span lang="hi" xml:lang="hi">आ० बालकृष्ण रचित) पुस्तक के इस अंश </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">हारीत-प्रकरण</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में सुरुचिपूर्ण व विविध प्रकार के स्वादिष्ट आयुर्वेद सम्मत सलादों का विवेचन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके गुण-धर्म के साथ प्रस्तुत है-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आम का सलाद:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कच्चे आम के फल से बना हारीत (सलाद) रुचिकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वातनाशक व गुरु होता है। यह पित्तकफ-वर्धक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जठराग्रि को मन्द करने वाला व विकार-जनक होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रुच्यं चूतफलोद्भूतं हारीतं वातजिद् गुरु।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पित्तश्लेष्मकरं वह्निमान्द्यकारि विकारि च।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बिम्ब (कुन्दरु) का सलाद:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बिम्ब सलाद स्थौल्यकर (मोटापा बढ़ाने वाला) कान्तिवर्धक व वात पित्त हर होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="color:rgb(22,145,121);" xml:lang="hi">स्थौल्यकान्तिकरं बैम्बं हरितं वातपित्तजित्।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मूली का सलाद:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मूली से बना हुआ सलाद लघु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उष्ण व पाक में मधुर होता है। यह गुल्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षयरोग नाशक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेष रूप से त्रिदोषहर होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हरितं मूलकोद्भूतं लघूष्णं स्वादु पाकत:।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गुल्म-शूल-क्षयहरं रुच्यं दोषहरं परम्।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">करेले का सलाद:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">करेले से बना सलाद खाने में रुचिकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जठराग्रि-वर्धक तथा कृमि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कफ व कुष्ठ को नष्ट करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(22,145,121);" xml:lang="hi">रुच्यग्रिकृत् क्रि मिश्लेष्मकुष्ठजित्कारवेल्लकम्।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">केले का सलाद:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">केले के तने के आन्तरिक कोमल भाग से बना हारीत (सलाद) दाह व पित्त रक्त का नाशक एवं कफ प्रद होता है। यह कषाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कटु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उष्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रुक्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु व मन्दाग्रि करने वाला माना जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रम्भाकाण्डकृतं दाहपित्तास्रघ्रं कफप्रदम्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कषायकटुतिक्तोष्णं रूक्षं गुर्वग्रिसादनम्।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कढ़ी पत्ते का सलाद:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कैडर्य (मीठी नीम जिसे कढ़ी पत्ता भी कहते हैं) से बना हारीत रुचिकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुगन्धित व सभी दोषों को दूर करने वाला होता है। राजनिघण्टु (९.१४) में वर्णित हैं- कैडर्य: कटुस्तिक्त: कषाय: शीतलो लघु:। सन्तपशोषकुष्ठास्रकृमिशूलविषापह:।। अर्थात् कैडर्य (कृष्ण निम्ब) कटु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कषाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीतल व लघु होता है। यह सन्ताप (दाह) शोषरोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तपित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृमि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शूल एवं विष का निवारक होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रुच्यं सुगन्धं कैडर्यपत्रजं सर्वदोषनुत्।</span></strong></span></h5>
<p><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/43.jpg" alt="43"></img></span></strong></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गजकर्णी (हथकन) का सलाद:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गजकर्णी के कन्द का हारीत तीक्ष्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उष्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीतिका-निवारक होता है। यह कटु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कफ व वात को नष्ट करने वाला तथा विष व वीसर्प एवं कुष्ठ का निवारक होता है। यह पीलिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृमि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अफारा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्रण व बवासीर आदि में फायदेमंद माना जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ग<span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>जकर्णीकन्दभवं तीक्ष्णोष्णं शीतिकापहम्।</strong></span></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कटुकं कफवातघ्रं विषवीसर्पकुष्ठनुत्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशस्यते पाण्डुशोफक्रि म्यानाहव्रणार्शसाम्।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पेठे का सलाद:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कूष्माण्ड (पेठे) के पतले-पतले खण्ड करके बनाया हारीत (सलाद) वात व पित्त के रोगों को नष्ट करने वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जुकाम दूर करने वाला तथा रुचिप्रद होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कूष्माण्डखण्डसम्भूतं सूक्ष्मं हरितकं जयेत्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वातपित्तामयान् सर्वान् पीनसघ्रं रुचिप्रदम्।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ी सेम का सलाद:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">असिशिम्बी (बड़ी सेम) की कोमल फली को छोटे-छोटे खण्डों में काट कर बना सलाद जठराग्रि को मन्द करने वाला व कुछ वात नाशक भी होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">असिशिम्बेश्च फलकं कोमलं सूक्ष्मखण्डितम्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अग्रिमान्द्यकरं किञ्चिद् वातघ्रं हरितं कृतम्।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">माकन्दिका का सलाद:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">माकन्दिका (माइणी) के छोटे-छोटे अच्छे टुकड़ों से उत्तम मसाले मिलाकर बनाया हारीत (सलाद) कफजन्य रोग व जठनाग्रि की मन्दता को दूर करता है। यह विशेष रूप से वातप्रकोप को भी नष्ट करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जलपीपल का सलाद:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जलपीपल का सलाद नीरस व कटु होता है। यह प्यास व भूख बढ़ाने वाला तथा अतिसार व कफ का नाशक है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तोयमागधिकोद्भूतं हरितं नीरसं कटु।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तृष्णाग्रिजननं सातिसारश्लेष्मविनाशनम्।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कदलीफल का सलाद:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">केले के फल के कटे हुए गोलाकार छल्लों को पुन: सूक्ष्म रूप में काटकर सभी मसालों के साथ बनाया हरितक (सलाद) वातपित्त-नाशक </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कदलीफलसम्भूतच्छल्लिभि: खण्डश: कृतै:।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सूक्ष्मं हरितकं सर्वसम्भारैर्वातपित्तजित्।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सारिवामूल का सलाद:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सारिवा के ताजे मूल के टुकड़ों से बनाया हरितक (सलाद) वात नाशक होता है। यह सभी कफज महारोगों को नष्ट करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पित्त विकार को भी हरता है तथा विशेष रूप से जठराग्रि की वृद्धि करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सारिवा-हरित-मूल-खण्डितैर्निर्मितं हरितकं समीरणम्। हन्ति सर्वकफजान् महागदान् पित्तमत्यनलवृद्धिकारणम्।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">खीरे का सलाद (त्रपुस-हरितक):</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">त्रपुस अर्थात् खीरे से बना सलाद अनेक प्रकार के कफ रोगों को पैदा करता है। पर यह मसाले के साथ सेवन करने पर कृच्छ्रदोष (मूत्रकृच्छ्र) की पीड़ा दूर करने में समर्थ है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">त्रपुसाज्जातहरितं नानाविधकफामयान्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">करोति कृच्छ्रदोषार्तिं सम्भारसहितं जयेत्।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बड़े बेर का सलाद:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बड़े बेर में खटाई मिला कर बनाया हुआ हरितक (सलाद) मन्दाग्रि व वातरोग को नष्ट करता है। यह शिरो रोगों का कारक भी है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महाबदरसम्भूतं साम्लं हरितकं जयेत्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मन्दाग्रिं वातरोगं च शिरोरोगैककारणम्।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तोरी का सलाद:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसका सलाद हृदय के लिए प्रिय व हितकर होता है। तोरी के ऊपरी भाग पर उभरी धारियों (किनारियों) से बना हरीतक सभी व्याधियों व दोषों को दूर करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हरीतकं परं हृद्यं स्वादु कोशातकीभवम्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">फलोर्ध्वदंष्ट्रसम्भूतं नि:शेषव्याधिदोषजित्।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">परवल का सलाद:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्षार अम्ल व लवण से युक्त पटोल (परवल) का हरित पथ्य होता है। यह कफ पित्त नाशक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रुचिकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थोड़ा भारी एवं वात नाशक।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पथ्यं पटोलहरितं क्षाराम्ल-लवणान्वितम्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कफपित्तहरं रुच्यं किञ्चिद् गुरु समीरजित्।।</span></strong></span></h5>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पोषक उत्पाद</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>फरवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Feb 2015 21:44:10 +0530</pubDate>
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                <title>बुढ़ापे की निरोगिता और योग का मनोविज्ञान</title>
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                        <![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. शरली टेल्लस एवं आरती यादव</span></strong></p>]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2980/wellness-of-old-age-and-psychology-of-yoga"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/40.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    जन्म</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के साथ ही हम आयु वृद्धि की ओर बढ़ने लगते हैं। हमारी हर चीज बदलती है इसलिये हम एक सुखद अनुभूति करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर जरावस्था (बुढ़ापा) आते ही हम डर और सिमट से जाते हैं। वास्तव में हमें डरने की नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु जरावस्था के लिये स्वस्थ जीवन शैली अपनाने की जरूरत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससें शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भावनात्मक तथा आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके । इस लेख में कुछ उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट किया गया है कि इस अवस्था में जीवन-शैली परिवर्तन से किस प्रकार लाभ मिलता है और बुजुर्गावस्था हंसते-हंसाते बीतता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">73</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षीय श्रीमती शर्मा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत के एक बड़े शहर में रहने वाली औसत मध्यवर्गीय परिवार की गृहिणी हैं। उन्होंने अपने दोनों बच्चों का पालन-पोषण सुचारु रूप से किया और अब दोनों बच्चे विदेशों में भली प्रकार से रहते हैं। वे आर्थिक रूप से सुदृढ़ हैं। श्रीमान तथा श्रीमती शर्मा दोनों भारत में ही रहते हैं। शर्मा जी व्यस्त रहा करते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु एक वर्ष पूर्व हृदय धमनियों में अवरोध आ जाने से हदय-शल्य चिकित्सा कराई और तब से वे पहले जैसे सक्रिय नहीं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवसाद ग्रस्त भी हो गये हैं। पहले तो दोनों कहीं मिलने जुलने जाया करते थे और प्रसन्न रहते थे। अब तो घर में अकेले ही रहते हैं। जिससे उनके शारीरिक स्वास्थ पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है जैसे वजन में वृद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नींद का ठीक से न आना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शारीरिक अंगों में पीड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भविष्य में किसी बड़ी बीमारी या मृत्यु की चिंता बनी रहना आदि। ऐसे ही अनेक व्यक्ति हैं जो आयु ढ़लने के साथ इस मनोदशा से घिर जाते हैं। इस स्थिति के लोगों के लिए प्रस्तुत हैं कुछ सुझाव-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इन्हें क्या करने की जरूरत है :</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक यौगिक जीवन शैली से स्वस्थ दिनचर्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शारीरिक कार्य क्षमता में वृद्धि होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छा महसूस कराने वाले रसायन एंडोर्फिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेरोटोनिन की वृद्धि होती है। सोच-विचार पर भी योग का प्रभाव पड़ने लगता है। यौगिक जीवन-दर्शन के पालन से ईश्वरीय शक्ति में अटल विश्वास बनने लगता है चाहे किसी भी पंथ-मजहब के हों तथा भविष्य के प्रति चिंताओं का निवारण होने लगता है। अत: हमारा कर्तव्य है कि हम अच्छे से कार्य करें एवं परिणाम के प्रति निश्चिंत रहें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वृद्धावस्था क्या है</span>?</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शैशव अवस्था से बचपन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर किशोर एवं युवा और तब वयस्क व मध्यम आयु तथा अंत में वृद्धावस्था एवं मृत्यु इन जैविक परिवर्तनों के माध्यम से मनुष्य आगे बढ़ता है। वृद्धावस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उम्र बढ़ने की एक प्रक्रिया है। यद्यपि 60 वर्ष की आयु के बाद के लोगों को बुजुर्ग की श्रेणी में रखा जाता है। एक व्यक्ति के सभी अंग एक समान दर से वृद्ध नहीं होते और इस तरह विशिष्ट अंगों की आयु अलग-अलग हो सकती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हेल्थ कनाड (2002) के अनुसार शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक तथा मानसिक स्वास्थ्य</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">सक्षमता</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन गुणवत्ता के संरक्षण व जीवन परिवर्तन में निपुणता के प्रयास करते रहना ही स्वस्थ वृद्धावस्था है। इस परिभाषा में स्वास्थ्य के समग्र विषय शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एवं अध्यात्मिक सभी स्तरों को शामिल किया गया है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/84.jpg" alt="84"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;">WHO, 2005<span lang="hi" xml:lang="hi"> के अनुसार वृद्धावस्था दीर्घकालिक रोगों में परिवर्तित होने वाले खतरों की सूचक हैं। खतरनाक घटकों का प्रभाव प्रारंभिक जीवन में ही शुरू हो जाता है तथा समय के साथ-साथ इसमें वृद्धि होती चली जाती है। यह अनुक्रम केवल जैविक ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक प्रक्रिया भी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योकि जीवन-चक्र की कालावधि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवस्थायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समस्यायें व उनके प्रतिफल प्रत्येक व्यक्ति तथा उनकी पीढ़ी के ऐतिहासिक व सामाजिक परिवेश के अनुसार भिन्न-भिन्न होती है। वृद्धावस्था का सम्बन्ध शारीरिक गति विधियों में क्रमश: क्षय होने से है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो विभिन्न रोगों एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी जटिलताओं को जन्म देती हैं। जैसे-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय रोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">धमनी की स्थूलता तथा कठोरता बढ़ने के साथ-साथ अन्त: स्तर (एण्डोथीलियम) का बेकार होना वैस्कुलेचर के कालिक-क्षय के परिणाम हैं। नैदानिक दृष्टि से ये परिवर्तन प्रकुंचक रक्तदाब (सिस्टोलिक दबाव) में वृद्धि लाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यौगिक जीवन शैली जिसमें आहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शारीरिक गतिविधि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव में कमी लाने एवं अध्यात्म संबंधी गतिविधियाँ शामिल हैं। जो अवरुद्ध धमनियों को ठीक भी कर सकते हैं। यद्यपि हृदय रोग विशेषज्ञ से परामर्श के बाद ही ऐसा करना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक यौगिक जीवन शैली परिधीय संवहनी रोग (पेरिफेरल वस्कुलर डिसीज) के लिए उपयोगी हो सकता है। जो कि कुछ वृद्ध लोगों में मधुमेह की जटिलता में देखा जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च रक्तचाप व मधुमेह:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च रक्तचाप तथा मधुमेह दोनों एक ही प्रमुख लक्ष्य अंगों को प्रभावित करते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यौगिक जीवन शैली का मधुमेह व उच्च रक्तचाप दोनों पर कारगार प्रभाव सिद्ध हो चुका है। ऐसे में एक स्वस्थ आहार योजना एवं हल्की शारीरिक गतिविधि व शिथिलीकरण के संयोजन के साथ विशिष्ट योग तकनीकों की जरूरत होती है। इस कार्यक्रम में विशेष पर्यवेक्षक के मार्गदर्शन में आसन-प्राणयाम व ध्यान को शामिल करना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ऑस्टियो आर्थराइटिस (अस्थि संधि शोथ):</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह जोड़ों की समस्या है जो अक्सर मध्यम आयु के लोगों से लेकर वृद्ध लोगों को प्रभावित करती है। यह आमतौर पर जोड़ों की टूट-फूट घिसाई के रूप में जानी जाती है। लेकिन यह सभी जोड़ों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपस्थि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जोडों के स्तर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्थि-बंधन तथा हड्यिों की बीमारी है। यद्यपि यह वृद्ध लोगों में काफी आम हैं। प्रारंभिक दौर के अस्थि संधि शोध को रोकने में यौगिक जीवन-शैली मददगार हो सकती है। अगर एक व्यक्ति का वजन ज्यादा है तो उसके घुटनों पर पड़ने वाले भार के परिणामस्वरूप जोड़ों की हड्यिाँ ज्यादा घिसती रहती हैं तथा इससे व्यक्ति अस्थि संधि शोध से ग्रसित हो जाता है। इसके लिए भी यौगिक जीवन-शैली काफी लाभप्रद है तथा आहार विनियमन व शारीरिक गतिविधि के द्वारा वे अपना वजन भी कम कर सकते हैं तथा गति एवं संतुलन में भी मदद मिलेगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मोटापा हाइपर कोलेस्टेरोलेमिया:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब शरीर में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा ज्यादा होती है तब हाइपर-कोलेस्टेरोलेमिया होता है। वृद्धावस्था में मोटापा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रुग्णता की वृद्धि जीवन गुणवत्ता स्तर में कमी से संबंधित है। ऐसी स्थिति में एक यौगिक जीवन शैली जिसमें सात्विक आहार (जिसमें रेशे ज्यादा हो तथा संतृप्त वसा कम हो) लाभप्रद होता है। इस जीवन शैली में नियमित योग अभ्यास खासकर वे आसन जो कमर की गति से संबंधित हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जरूर शामिल करना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परम पूज्य स्वामी रामदेव जी द्वारा निर्देशित कपालभाति प्राणायाम का ३०-४० अभ्यास प्रति मिनट की दर से करना विशेष लाभदायक साबित होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अनिद्रा:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वृद्धा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">वस्था के मरीजों में तीव्र अनिद्रा से पीड़ित होने की संभावना ज्यादा रहती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे में प्राणायाम निर्देशित विश्रंति तथा योगनिद्रा के अभ्यास से सम्मिलित एक यौगिक जीवन-शैली इसमें बहुत उपयोगी हैं। शयन के समय से कम-से-कम ४५ मिनट पूर्व चमकीली रोशनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टीवी देखने या अन्य उत्तेजना पैदा करने वाली चीजों से बचें। रात्रि का भोजन सांय ८:०० बजे तक कर लें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मूत्राशय पर नियंत्रण की समस्या:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बुजुर्गावस्था में मूत्राशय तथा आंत नियंत्रण समस्यायें सामान्य बात है। इसमें बिना रिसाव के तात्कालिक बार-बार शौचालय जाने की जरूरत होती है। इन समस्याओं को अक्सर सयंम इन्द्रिय निग्रह की समस्या कहा जाता है। अत: यौगिक जीवन शैली में कुछ विशिष्ट मुद्राओं आसान तथा बन्ध के द्वारा इस आयु से सम्बंधित असंयम की समस्याओं को ठीक किया जा सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अवसाद:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">अवसाद</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">वृद्धावस्था में होने वाली एक सामान्य समस्या है। इसके लिए यौगिक जीवन शैली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियमित दिनचर्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भक्तियोग साधना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक किताबें पढ़ने से अवसाद को कम कर सकते हैं। उन्हें कुछ रूचिकर कार्य करने की सलाह देनी चाहिये। इस उम्र में रिश्तेदारों तथा दोस्तों के साथ एक पर्याप्त नेटवर्क बनाने की आवश्यकता हैं पर जहाँ भी रहें सात्विक व्यक्तियों के साथ रहें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मनोभ्रंश व स्मृति ह्रास:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्मृति ह्रास मनोभ्रंश का पूर्व संकेत है। यह व्यक्ति के उम्र बढ़ने या तनाव होने पर बढ़ जाती है। मानसिक गतिविधियों के लिये यौगिक जीवन शैली को अपनाना आवश्यक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें कर्म योग बहुत महत्वपूर्ण है। इसके अलावा मस्तिष्क के लिये कई तरह का व्यायाम जैसे-पहेली बनाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कविताएं याद करना उपयोगी होती हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रवण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दृष्टि की समस्याएँ:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वृद्धावस्था में दृष्टि की समस्या होने पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब वे खासकर नयी स्थिति का सामना करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उनमें डर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संकोच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उलझन प्रतीत होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी तरह जब वृद्धावस्था में सुनने की क्षमता कम हो जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब किसी से बोलते समय बातचीत की बारीकियों से जुड़ने में उलझन प्रतीत होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे उनमें अनुचित अधीरता हो जाती है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उपयुक्त परिस्थितियों से मुक्त रह कर सुखद-स्वस्थ बुजुर्गावस्था के लिए प्राथमिक आवश्यकता है योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम युक्त जीवन शैली की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि योग द्वारा शारीरिक रूप से सक्रिय रहने से निवारक तथा चिकित्सीय लाभ होता है। योग से शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भावनात्मक तथा आध्यात्मिक लाभ मिलता है। योग वृद्धावस्था में स्वतंत्रता बनाये रखने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बीमारियों से उबारने तथा रोगों के खतरों को कम करने में मदद करता है। लचीलापन एवं जोड़ो की मांसपेशियों की गतिशीलता में सुधार लाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मांसपेशियों को मजबूती प्रदान करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शारीरिक मुद्रा को ठीक करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रीढ़ को मजबूत बनाता है। पीठ दर्द में आराम दिलाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेशी कंकाल की स्थितियों जैसे-घुटनों की खराबी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कंधे व गर्दन तथा स्कोलियोसिस में सुधार लाता है। सहन शक्ति बढ़ाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सतुंलन बनाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अतंस्त्रावी ग्रन्थियों को उत्तेजित करके हर स्थिति में सुधार करता है। श्वसन संबंधी विकारों को ठीक करता है। प्रतिरक्षा तंत्र की प्रतिक्रिया को मजबूत बनाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉलेट्रॉल व शर्करा के स्तर को कम करता है तथा वजन कम करने के लिये प्रोत्साहित करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इससे शरीर के प्रति जागरूकता बढ़ती है। शरीर के दीर्घकालिक तनाव से राहत मिलती है। मन और शरीर को आराम मिलता है। स्फूर्ति को बढा़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भावनात्मक मजबूती दिलाता है। क्रमश: सम्रग आन्तरिक शक्तियों को दिव्य शक्ति की अनुभूति होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हम क्यों न यौगिक जीवनशैली अपनाकर बुजुर्गावस्था की पूर्व तैयारी में आज से ही जुटें। </span></h5>]]>
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                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पतंजलि रिसर्च</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>फरवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Feb 2015 21:42:33 +0530</pubDate>
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