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                <title>अप्रैल - योग संदेश</title>
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                            <item>
                <title>श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण सुखी व सफल जीवन कैसे जिएं</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">      प्र</span><span lang="hi" xml:lang="hi">त्येक मनुष्य जीवन को पूर्ण सुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफलता व समृद्धि के साथ जीना चाहता है। यह सुख की यात्रा शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रियों एवं मन से होती हुई आत्मा तक जाती है। संसार की वस्तुओं व इच्छाओं की पूर्ति में क्षणिक सुख होता है जबकि इच्छा मुक्ति होने पर अकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्काम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आप्तकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मकाम या ब्रह्मकाम होने पर ही पूर्ण सुख की प्राप्ति होती है। संसार में अधिकांश लोग इच्छा पूर्ति को ही उपलब्धि सफलता व सुख मानकर इसी को जीवन का अन्तिम सत्य लक्ष्य या साध्य स्वीकार करके</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3024/shashwat-pragya-april-2015"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-05/jtgfyjg2.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण सुखी व सफल जीवन कैसे जिएं</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   प्र</span><span lang="hi" xml:lang="hi">त्येक मनुष्य जीवन को पूर्ण सुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफलता व समृद्धि के साथ जीना चाहता है। यह सुख की यात्रा शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रियों एवं मन से होती हुई आत्मा तक जाती है। संसार की वस्तुओं व इच्छाओं की पूर्ति में क्षणिक सुख होता है जबकि इच्छा मुक्ति होने पर अकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्काम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आप्तकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मकाम या ब्रह्मकाम होने पर ही पूर्ण सुख की प्राप्ति होती है। संसार में अधिकांश लोग इच्छा पूर्ति को ही उपलब्धि सफलता व सुख मानकर इसी को जीवन का अन्तिम सत्य लक्ष्य या साध्य स्वीकार करके अपना अमूल्य जीवन छोटी-छोटी खुशियों व छोटे-छोटे लक्ष्यों के लिए जीते रहते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी इच्छाओं से मुक्त हो कर भगवान् की इच्छा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवदिच्छा में जीना यही है आत्मकाम या ब्रह्मकाम होना। यही है जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि या सफलता और जीवन का सबसे बड़ा सुख। हम भीतर से आप्तकाम रहें और बाहर से पूर्ण शुद्ध ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्ध भाव व शुद्ध कर्म (सेवा) में प्रतिपल युक्त रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। जो आत्मकाम होता है उसकी स्वयं की कोई कामना नहीं होती अपितु आत्म में परमात्मा का जो आदेश निर्देश या संदेश होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही उसके जीवन का सर्वस्व होता है। इसी आत्म प्रेरणा को सुनने व समझने में कहीं भूल न हो इसके लिए गुरु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्र व वेदाज्ञा सहायक होती है। आत्म प्रेरणा के अनुरूप शुद्ध ज्ञान व शुद्ध भाव से भगवान् का यन्त्र बनकर निष्काम सेवा या पूर्ण पुरुषार्थ करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही जीवन मुक्ति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही दिव्य जीवन की साधना है। मैं स्वयं ऐसे ही जीता हूँ और जो मुझसे अत्यन्त स्नेह करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनसे भी यही अपेक्षा करता हूँ। आवो! हम सब मिलकर ऐसा ही दिव्य पूर्ण सुखी जीवन जीएं। इसी में सभी प्रकार के कर्माशय और उसके फल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयु व भोग की समाप्ति है और जब जन्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयु व भोग ही नहीं होगा तो दु:खों की पूर्ण समाप्ति व मुक्तिया अपवर्ग की प्राप्ति होगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">दु:खजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानाम् उत्तरोत्तराऽपाये तदनन्तरापायादपवर्ग:। न्याय दर्शन १/२।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे पूर्वज ऋषियों ने लाखों-करोड़ों वर्षों तक तप करके जिस पूर्ण सत्य की खोज की और हमारे गुरुदेव ने और स्वयं हमने ३०-४० वर्ष निरन्तर तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ एवं अनुभव करके जिस सत्य की प्राप्ति की उसे हमने अत्यन्त प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वात्सल्य व आत्मीय भाव से एक ही दिन मेें दे दिया है। इसे पूर्ण श्रद्धा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समर्पण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्ठा व पूर्ण कृतज्ञता पूर्वक स्वीकार करके आज व अभी से हमें आत्मवेत्ता व ब्रह्मवेत्ता ऋषियों की तरह ही जीना है। हमारी सबसे बड़ी व मूल पहचान है हम भगवान् की व ऋषियों की ही सन्तानें हैं। हमारे जीवन में भगवत्ता व ऋषित्व होना ही चाहिए। यही हमारा सबसे बड़ा गौरव व सबसे बड़ा कर्त्तव्य है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संसार में जैसे माता-पिता ४०-५० वर्षों में जो कुछ भी अर्जित करते हैं वह सारा एक ही दिन में अपने बच्चों को अर्पित करके जैसे उन्हें अत्यन्त धनवान् बना देते हैं वैसे ही हम आप सब दिव्य आत्मा भाई-बहनों युवक-युवतियों को सभी पुण्यात्मा सात्विक साधकों को एक ही दिन में अपनी जिंदगी भर की कमाई हुई पूरी आध्यात्मिक सम्पत्ति प्रदान करके आपको एक पूर्ण योगी ऋषि-ऋषिका के रूप में देखना चाहते हैं और वह आध्यात्मिक सम्पत्ति है अकाम या आत्म काम होकर आत्मा में परमात्मा का जो शुद्ध ज्ञान उतरता है उसका एक बार भी अनादर नहीं करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु उस शुद्ध ज्ञान व शुद्ध भाव (संवेदना प्रेम पूर्ण हृदय) से प्रतिपल शुद्ध कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्ध आचरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण पुरुषार्थ करना।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब भगवान् पूर्ण शुद्ध हैं तो भगवान् की प्रेरणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाव व शक्ति-सामर्थ्य भी पूर्ण शुद्ध रूप में ही क्रमश: हमारे आत्मा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मस्तिष्क</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय व पूरी अस्तित्व में उतरेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उतरता ही है। यही हमारी तथा सब महापुरुषों व ऋषियों की अनुभूति है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो ऐसा जी रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समझ लेना आपका योग सिद्ध हो गया। आपको भगवान् ने स्वीकार कर लिया और आपके माध्यम से भागवत शक्ति कार्य करने लगेगी। आप भगवान् के दिव्य यंत्र बन जायेंगे। आप अतीन्द्रिय ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अतीन्द्रिय प्रेम व अतीन्द्रिय सामर्थ्य से युक्त होकर ईश्वर के दिव्य कार्यों का निष्पादन करने लगेंगे। आप आत्मकाम होकर पूर्णकाम होंगे। पूर्णता आपके भीतर घटित होगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">ओ३म् पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।। (उपनिषद्)</span></strong></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शाश्वत प्रज्ञा</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Apr 2015 21:59:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>आध्यात्मिक भारत व आध्यात्मिक विश्व के निर्माण हेतु युवाओं का आह्वान</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">ब्रह्मचारी भरद्वाज</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">बी.सी.ए.</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">एम.सी.ए.</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">साफ्टवेयर इंजीनियर</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3025/call-for-youth-to-build-spiritual-india-and-spiritual-world"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/95.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  <strong> इस बार संपादकीय लिखने का अवसर हमने वैदिक गुरुकुलम् के बहुत ही तेजस्वी</strong></span><strong>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञावान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थी व प्रतिभावान् ब्रह्मचारी भरद्वाज को दिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमें पूर्ण विश्वास है कि आपको यह पसंद आयेगा। - सम्पादक</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">म</span><span lang="hi" xml:lang="hi">नुष्य जन्म देवताओं को भी दुर्लभ है</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सत्य हमने प्रवचनों में कई बार सुना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सत्य इसलिए है क्योंकि यह पशुओं की तरह मात्र भोग योनि नहीं अपितु भोग के साथ-साथ कर्म योनि है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम अत्यन्त पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्ध-बुद्धि और धैर्य से दु:खों की अत्यन्त निवृत्ति और पूर्णानन्द की प्राप्ति कर सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसकी सामर्थ्य हममें जन्म से ही है और इसी की प्राप्ति हमारा परम लक्ष्य है। मानव जन्म का इसके अलावा और कोई लक्ष्य हो ही नहीं सकता। छोटे-छोटे लक्ष्यों के लिए जीना इस जीवन का अपमान है। नौकरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐश्वर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छा साथी आदि सभी लौकिक वस्तुएँ हमारी सामायिक माँग हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सब हमारे स्वयं लक्ष्य नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्हें लक्ष्य बनाना जीवन की सबसे बड़ी भूल है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा सारा पुरुषार्थ व्यर्थ चला जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्हीं को पाने के पीछे। स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामर्थ्य और सारा समय नष्ट हो जाता है इन कामनाओं को पूरा करते-करते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु ये कामनाएं पूरा होने का नाम ही नहीं लेतीं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अनन्त जीवन हमने बिता दिए इन्हीं कामनाओं के पीछे भोगों को भोगते-भोगते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु एक भोग भी मुझे संतुष्ट न कर पाया आज तक। मैंने यह सब सोचा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचारा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन्थन किया कि मेरा यह अमूल्य जीवन इन कामनाओं के पीछे नष्ट नहीं हो सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुझे कुछ करना ही होगा अपने जीवन को दिव्य बनाने के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन अनन्त दु:खों से निवृत्त होने के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुख मिले न मिले पर यह दु:ख नहीं मिलना चाहिए। <strong>देश-समाज और अपने व्यक्तिगत दु:खों से निवृत्त होने की मुझमें तीव्र इच्छा थी</strong></span><strong>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परमात्मा की कृपा से उसी समय परम पूज्य स्वामी रामदेव जी ने पूरे देश से युवाओं का आह्वान किया कि जो भी नि:स्वार्थ भाव से आजीवन ब्रह्मचारी रहकर देश की सेवा करना चाहते हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुकुल में पढ़कर अपना जीवन ऋषियों की तरह दिव्य बनाना चाहते हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका स्वागत है। यह सुनकर मुझसे घर में और रुका न गया।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी ने सच ही कहा है कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">यदि तुम दिव्यता की ओर एक कदम बढ़ाओगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान तुम्हारी तरह दस कदम बढ़ा देंगे। देर है तो सिर्फ हमारे कदम बढ़ाने की। मैं अत्यन्त अभाव में भी जीकर दिव्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पवित्र बनना चाहता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु जब पतंजलि योगपीठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार आया तो यहाँ का वातावरण किसी स्वर्ग से कम न था। सारी सुविधाएं उपलब्ध थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी दिन से क्रिया योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रवचनों की बरसात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुओं के सानिध्य से मेरी बुद्धि-मन-शरीर शुद्ध होने लगे। मैं देख सकता हूँ कि एक साल पहले मेरी स्थिति क्या थी और आज क्या है। <strong>दिव्यता की ओर मेरे कदम बढ़ चुके हैं</strong></span><strong>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब मैं भटक नहीं सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन का समाधान होने लगा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दु:ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शंका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संशय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भय आदि विकार दूर होने लगे हैं। ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्धता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पवित्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्यता उद्घाटित हो रही है और अब ये कदम मंजिल को पाकर ही रुकेंगे।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ साधना और देश सेवा दोनों के ही अपार अवसर हैं। देश सेवा कुर्बानी नहीं अपितु सौभाग्य है। एक बुजुर्ग आम का पेड़ लगा रहा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उससे किसी ने पूछा</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">क्या तुम इसके फल खा पाओगे</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्यों लगा रहे हो</span>?’ <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उस बुजुर्ग ने कहा कि</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">यह जितने पेड़ तुम देख रहे हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनके फल हम खा रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनके द्वारा की गई शुद्ध वायु से हमारे प्राण चल रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वो मैंने तो नहीं लगाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे पूर्वजों ने हमारे सुख के लिए लगाए थे।</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">आशय यह है कि चरित्र निर्माण केवल बच्चे के जन्म से ही नहीं शुरू होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु उससे सैकड़ों वर्ष पहले से ही शुरू हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज जो हम समाज की हालत देख रहे हैं उसमें किसी बच्चे का मानसिक-शारीरिक रूप से स्वस्थ रहना तो अपवाद ही लगता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अंग्रेजी लेखिका व चिंतक हेलन केलर से किसी ने पूछा कि न देख सकने से बुरा क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">उसने कहा</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">देख कर के भी न देखना उससे भी बुरा है। आज हम भी यही कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज को देखकर भी अनदेखा कर रहे हैं जिसका परिणाम हमें और हमारी आने वाली पीढ़ी को झेलना होगा। किसी बच्चे को बचपन में ही कैंसर हो जाए तो वो जवानी की सुबह कैसे देखेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अगर समस्याएँ व दु:ख आना शुरू हो गए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ये शुरुवाती दु:ख नहीं दु:खों की शुरुवात है। हमें जागना ही होगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज देश में १/३ लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं (सरकारी आंकड़ा)। ७०</span>% <span lang="hi" xml:lang="hi">देशवासियों के पास मूलभूत सुविधाएँ नहीं हैं। गूगल में सर्च करके अफ्रीका की गरीबी देखें तो रुह काँप उठेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हजारों करोड़ का नकली दवाइयों का कारोबार खुलेआम चल रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन दवाइयों में यह नहीं लिखा होता कि इसे किसी मासूम बच्चे या किसी गर्भवती स्त्री को मत देना। अपराध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रष्टाचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नशा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अश्लीलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महंगाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदूषण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुरीतियों आदि ने समाज की कमर तोड़ रखी है। देश का आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनैतिक और लोगों का चारित्रिक पतन चरम स्थिति तक पहुँच रहा है। यह कोई नकारात्मक सोच नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज की स्थिति आप भी जानते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुझसे अच्छी तरीके से। हमारी संवेदन हीनता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुझदिली देश के पतन का कारण बन रही हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">समाज हमसे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपसे ही बना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमें बदलना होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल आंदोलन करने से उसमें आपके सहयोग देने से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिलकर नारे लगाने से कुछ नहीं होगा। आंदोलन से आंशिक परिवर्तन तो आ सकता है। पूर्ण रूपान्तरण तो चरित्र निर्माण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्म निर्माण से ही घटित होगा। देश तब महान बनता है जब उसके नागरिक महान काम करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महान बनते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देश की पहचान हमसे है। हमें सत्य मार्ग पर चलना ही होगा। जो समाज सिद्धान्तों से ज्यादा सुविधाओं को अहमियत देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वो समाज गिरने लग जाता है।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आज समाज को आपके सहयोग की जरूरत नहीं</span>, </strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>आप की जरूरत है।</strong> अपने को सुधारना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर समाज को सुधारना कोई पार्ट टाईम जॉब नहीं कि दिन में एक-दो घण्टे दे दिये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संडे दे दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस काम में पूरा जीवन लगाना पड़ता है और हमारे पास अवसर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे बड़े सौभाग्य की बात हमारे लिए कुछ और नहीं। स्व-परिवर्तन की इच्छा नहीं इरादा होना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इच्छाओं का तो सौदा हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इच्छाएँ कमज़ोर पड़ने लगती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु इरादा और मजबूत हो जाता है। अगर हम यह सोचें कि मेरे अकेले के बदलने से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करने से क्या होगा। अगर यही बात कहीं पूज्य स्वामी जी व श्रद्धेय आचार्य जी ने भी सोच ली होती तो क्या आज पूरे विश्व में योग-आयुर्वेद का पर्चमम लहरा पाता। देश में वैदिक शिक्षा की क्रान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्ता परिवर्तन आदि सम्भव हो पाता। यदि हमारे क्रान्तिकारियों ने यही सोच लिया होता तो क्या हम आज़ाद हो पाते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे बहुत उदाहरण हैं। सच तो यह है कि हमारे अकेले के ही महामानव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य सामर्थ्यवान बनने से ही देश-समाज में बदलाव आना शुरू हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम अपना बदलाव करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज तो स्वयं बदलने के लिए आतुर है। समाज हमारी ओर ही मुँह बाये खड़ा है और हमसे ही आस लगाए बैठा है कुछ करने की।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भाग्यवादी सोच वाला व्यक्ति भी कुछ नहीं कर पाता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वो कुछ करके नहीं जाते</span>, </strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अपितु कुछ होने के इन्तज़ार में जाते हैं। जिसे करना है वो करके चला जाता है।</strong> अलगाववादी भी कुछ नहीं कर पाते। हम अपने को समाज से अलग कैसे देख सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी व्यक्तिगत और सामाजिक समस्याओं से हम सभी पीड़ित हैं। आज अध्यात्म को अलगाववाद से जोड़ कर देखा जाने लगा है। आध्यात्मिकता दुनियादारी से पल्ला झाड़ने का पर्याय बन गई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु सच तो यह है कि जिसे समाज से कुछ लेना देना नहीं वह आध्यात्मिक नहीं हो सकता। आध्यात्मिक पुरुष पूरा जीवन समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संंसार सेवा में लगा देता है परन्तु हाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके अन्दर संसार नहीं ईश्वर भक्ति होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही सबसे बड़ा देश भक्त है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">युवा देश की ताकत कहा जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु आज तो वह देश की सबसे बड़ी मुसीबत बन रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज युवा नशे की लत में फंस रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपराध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अय्याशी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अश्लीलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेरोजगारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेलेन्टाइन-डे आदि से पीड़ित है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ तक की आत्महत्या जैसा घृणित कर्म करने को भी मजबूर हो रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जो तेज दिमाग के हैं वो </span>IAS/IPS <span lang="hi" xml:lang="hi">आदि नौकरशाही में जीकर नेताओं के आज्ञाकारी बन रहे हैं। कई तो </span>B.P.O., Call Center, MNC<span lang="hi" xml:lang="hi"> और विदेश ही चले जाते हैं। यह सब आज की तथाकथित आधुनिक शिक्षा का ही नतीजा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो मैकॉले द्वारा बनाई ही इसलिए गई थी कि युवा का चारित्रिक पतन हो और वो हमारे मानसिक गुलाम बनें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे नौकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे लिए ही काम करें और उसका विचार सफल भी हुआ है। ज्यादातर अपराध आज पढ़े लिखे ही कर रहे हैं। हम पढ़ लिख तो गए पर चरित्र का निर्माण क्यों न हो पाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय की भावनाएँ क्यों न शुद्ध हो पाईं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माता-पिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति के प्रति आदर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भक्ति क्यों न जागृत हो पाई हममें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह अति गम्भीर विचार का विषय है।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी मूलभूत शिक्षा पद्धति वैदिक शिक्षा पद्धति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो त्याग-तप-शिष्ट आचरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सार्वभौमिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रामाणिक और पंथ निर्पेक्ष रूप से गुरुकुल में पढ़ाई जाती है जो कि ऋषि परम्परा से चलती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज लुप्त प्राय: हो गई हैं। यहाँ ब्रह्मचारी (विद्यार्थी) का सर्वांगीण विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बौद्धिक और मानसिक रूप से किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे जीना सिखाया जाता है सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधना के साथ। गुरुकुल के सभी ब्रह्मचारी निरपवाद रूप से जीना सीख जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य-प्रेम-करुणा-दिव्यता से भर जाते हैं। आज तक प्राय: किसी ने भी गुरुकुल के विद्यार्थी को आत्म हत्या जैसा घृणित कर्म करते न सुना होगा। उसके जीने का स्तर उच्च व दूसरों से भिन्न होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेद-शास्त्र ऋषि ग्रन्थों का ज्ञान प्राप्त कर उसे सही-गलत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म-अधर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्यासत्य का विवेक होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुकुल के ब्रह्मचारी की महिमा वेद ने गाई है। देवता-ऋषियों ने गाई है और जितना कहें उतना कम है। उसके लिए यह कठिन जीवन क्रीड़ावत् हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहज हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह आत्मविश्वास से परिपूर्ण लाखों का आश्रय दाता बन जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सनाथ हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके निर्णय में स्थिरता और परिणाम में संतुष्टि होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह भारी दु:खों में भी प्रसन्न अडिग रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब कुछ उसे प्राप्त होता है और देवता भी उसकी मदद करने को आतुर रहते हैं। सारी दैवीय सत्ता उसके साथ रहती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई भी न्यूनता नहीं रहती। यह मेरी बात नहीं अथर्वर्वेद के ब्रह्मचर्य सूक्त की घोषणा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मचारीष्णंश्चरति रोदसि उभे तस्मिन्देवा: संमनसो भवन्ति।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स दाधार पृथिवीं दिवं च स आचार्यं तपसा पिपर्ति।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दोस्तों अब सोचने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचारने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गणित लगाने का समय गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि आत्म प्रेरणा हो गई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो प्रभु के द्वारा प्रदत्त इस अनुकूल अवसर का लाभ उठाओ। बिना त्याग के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना बड़े निर्णय के जीवन में कुछ भी हासिल नहीं होता। कुछ बड़ा कर जाओगे तो माता-पिता देश और पूरी समष्टि को तुम पर गर्व होगा। अब गम्भीर हो जाओ। आज नहीं तो कल सब को आना तो यहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितना जल्दी आएगें उतना ही अच्छा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितना दूर जाएँगे उतनी अधिक दूरी तय करनी होगी वापस आने में। अब नहीं तो कब</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक पुरुषार्थ से बचेंगे तो सांसारिक वेगों में बहेंगे। यह सामर्थ्यवान संस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैदिक गुरुकुलम् आदि और मैं सब यहीं है परन्तु जब तक आप कदम नहीं बढ़ाओगे काम नहीं चलेगा। समाधान आपको चाहिए तो पुरुषार्थ आपको ही करना पड़ेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ से बचना मृत्यु है। सुविधा-असुविधा को एक तरफ करके नि:स्वार्थ भाव से समर्पित हो कर अनन्त के लिए जीकर तो देखिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या आनन्द है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्रता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वराज है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी परिस्थिति के लिए हम स्वयं जिम्मेदार होंगे। अपने पाँव पर खड़े होने की कीमत चुकानी पड़ती है और अपने घुटनों के बल चलने की कीमत भी चुकानी पड़ती है। आप क्या करेंगे फैसला आपका है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमें जिस बारे में ज्ञान नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम उसमें अपनी बुद्धि से निर्णय नहीं ले सकते। हम यह तो निर्णय ले सकते हैं कि हम क्या पहनेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या खाएँगे आदि।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु साधना पथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुकुल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यात्म के संदर्भ में हमें पर्याप्त ज्ञान नहीं अत एव हम वेद वाणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुवाणी और अन्तर प्रेरणा पर पूर्ण विश्वास रखते हुए निर्णय लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपका निर्णय अवश्य ही आत्मकल्याणकारी व सर्वहितकारी होगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अनन्ययश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।। (गीता ९/२२)  </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Apr 2015 21:57:28 +0530</pubDate>
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                <title>मुख, वक्ष, उदर, वृक्क, प्रमेह, त्वचा रोगों में लाभकारी बिम्बी</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य </span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">बालकृष्ण</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3026/beneficial-in-diseases-of-mouth--chest--abdomen--kidney--gonorrhea-and-skin-diseases"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/141.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक नाम :  </span>Coccinia grandis (Linn.) <span lang="hi" xml:lang="hi">।  </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कुलनाम :   </span>Cucurbitaceae<span lang="hi" xml:lang="hi"> अंग्रेजी नाम : </span>Ivy-gourd<span lang="hi" xml:lang="hi">।  </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृत :  बिम्बी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तफला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुण्डिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुण्डिकेरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओष्ठोपमफला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिम्बिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओष्ठी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्मकारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुण्डिकेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिम्बा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिम्बक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कम्बजा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोह्वी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रुचिफला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छर्दिनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिक्ततुण्डी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिक्ताख्या</span>,</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कटुका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कटुतुण्डिका । हिन्दी : कन्दुरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिम्बी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुनली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुनरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुन्दरू । उड़िया : कुन्द्रु । उर्दू : कुन्दरू । असमिया :  कुन्डुली । कोंकणी :  तेन्दुलेम  ।  कन्नड़ :  कोंडे बल्ली ।  गुजराती : घोलां</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घोली । तमिल : कोवाइ। तेलुगु : बिम्बिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोंडातिगे । बंगाली : बिम्बु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेला कुचा । नेपाली : कुन्दी । पंजाबी : घोल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कन्दूरी।  </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मराठी : तोंडली  । मलयालम : कवेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोवा  ।  अरबी : काबरेहिंदी  ।  </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फारसी :  काबरे हिंदी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुन्द्रुस  ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> आयुर्वेद में औषधि वह जो रोगी में सतत् आरोग्य का विश्वास पैदा कर उसे रोग से निजात दिलाये। चूंकि शरीर का सीधा संबंध प्रकृति से है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: रोग भी प्रकृतिगत असंतुलन से ही पैदा होते हैं। ऐसे में औषधि प्रकृतिस्थ तत्वों से युक्त होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त  यदि दवा के नाम पर किन्हीं रासायनिक तत्वों का प्रयोग शरीर पर करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो तत्काल न सही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी न कभी तो वह शरीर के साथ विद्रोही तेवर दिखायेगा ही। अक्षय आरोग्य के लिए आवश्यक है कि शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक रोग में प्रकृति के बीच से ही औषधि की खोज करें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">वनौषधियों में स्वास्थ्य</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रृंखला इसी संकल्प सहित प्रस्तुत है। परिजन इन प्रयोगों को पंतजलि आयुर्वेद के गहन अनुसंधान के साथ रचित </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद जड़ी-बूटी रहस्य</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">पुस्तक में विस्तार से पढ़ सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे अपनाकर हर कोई अक्षुण्य आरोग्य का स्वामी बन सकता है। आवश्यक यह भी है कि सब मिलकर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी रहस्य</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">पुस्तक घर-घर स्थापना का अभियान चलायें और भारत को पुन: आयुर्वेद का शिरमौर बनायें। इस अंक में प्रस्तुत है वनौषधि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बिम्बी</span>’...</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बाह्य स्वरूप:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह शाखा-प्रशाखााओं से युक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुंदर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विसर्पी अथवा आरोही लता है। इसका काण्ड खात युक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अरोमिल तथा दुर्बल होता है तथा प्रतान पतले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुर्बल तथा रेखित होते हैं। इसका मूल कंदवत्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थूल व पत्र सरल</span>, 5-10<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी लम्बे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्रिकोणाकार अथवा लगभग गोलाकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्ध्व पृष्ठ चमकीले हरित वर्ण के होते हैं। इसके पुष्प एकलिंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वेत वर्णी फल तर्क्वाकार-नुकीले</span>, 2.5-5<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी. लम्बे</span>, 1.3-2.5<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी व्यास के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कच्ची अवस्था में </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> श्वेत वर्ण की धारियों से युक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण पक्वावस्था में चमकीले नारंगी-रक्तवर्ण के तथा चिकने होते हैं। बीज अनेक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चपटे तथा धूसर पीत वर्ण के होते हैं। इसका पुष्पकाल मुख्यत: मार्च से अक्टूबर तथा फलकाल अक्टूबर से दिसम्बर तक रहता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">परिचय:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद के कई निघण्टुओं में बिम्बी का वर्णन है। कैयदेव निघण्टु के अनुसार बिम्बी सद्य: प्रज्ञा का नाश करती है। इसे साधारणत: कुंदरू भी कहते हैं। यह विश्व में उष्णकटिबन्धीय क्षेत्र अफ्रीका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एशिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मलाया एवं ऑस्ट्रेलिया में पायी जाती है। भारत के आसाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उड़ीसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिम बंगाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर प्रदेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तराखण्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महाराष्ट्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आंध्र प्रदेश एवं तमिलनाडु प्रांत में यह मुख्य रुप से पाया जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">औषधीय गुणों के कारण शिर शूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्ण रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वसन प्रदाह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदर रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुजाक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्थिसंधि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचा जन्य रोगों में बिम्बी प्रभावकारी भूमिका निभाती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">औषधीय प्रयोग विधि:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">शिरो रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5> <span lang="hi" xml:lang="hi">शिर:शूल-कुन्दरू अर्थात् बिम्बी मूल को पीसकर मस्तक पर लगाने से शिर:शूल का शमन होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कर्ण रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>कर्णशूल-</strong>बिम्बी पौधे के स्वरस में सरसों का तेल मिलाकर </span>1-2<span lang="hi" xml:lang="hi"> बूंद कान में डालने से कर्णशूल का शमन होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मुख रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>जिह्वा व्रण-</strong>बिम्बी के हरे फलों को चूसने से जिह्वा व्रण का रोपण होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वक्ष रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वासनलिका प्रदाह-बिम्बी पत्र एवं काण्ड का क्वाथ बनाकर सेवन करने से सांस की नली की सूजन एवं अन्य सांस सम्बन्धित बीमारियों का शमन होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उदर रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>कृमिरोग-</strong>बिम्बी कल्क से पकाए हुए घृत को निर्धारित मात्रापूर्वक (</span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम) सेवन करने से आंत्र कृमियों (आंतों के कीड़े) का शमन होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वृक्क वस्ति रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">मधुमेह-</span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली बिम्बी पत्र एवं मूल के स्वरस का सेवन करने से मधुमेह में लाभ मिलता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमेह-</span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली बिम्बी मूल की छाल का स्वरस प्रतिदिन प्रात:काल सेवन करने से प्रमेह में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजननसंस्थान रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सूजाक-</span>5</strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली बिम्बी पत्र के स्वरस को पिलाने से सूजाक में लाभ मिलता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अस्थिसंधि रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">आमवात-बिम्बी मूल को पीसकर लगाने से आमवात के रोग में लाभ मिलता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचा रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>कुष्ठ</strong>-चित्रकमूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ी इलायची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुन्दरू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अडूसा पत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निशोथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मदार पत्र तथा सोंठ इन द्रव्यों को समान मात्रा में पीसकर चूर्ण बना लें। फिर पलाश से निर्मित क्षार को गोमूत्र में घोलकर छान लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तदनन्तर इसे गोमूत्र की भावना देकर लेप बना लें और इसे शरीर पर लगाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धूप में बैठें। इससे कुष्ठ में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अपची (</span>Cervical lymphadenopathy)-<span lang="hi" xml:lang="hi">कैडर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिम्बी तथा कनेर से सिद्ध तेल को </span>1-2<span lang="hi" xml:lang="hi"> बूंद नाक में डालना </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अपची</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">में लाभकारी साबित होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">त्वक्-विकार-बिम्बी पत्र-स्वरस का लेप करने से पामा तथा कण्डु आदि त्वक्-विकारों का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार बिम्बी के पुष्पों को पीसकर लगाने से भी खुजली मिटती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>त्वचा रोग</strong>-बिम्बी के कोमल पत्तों को तेल के साथ पकायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर छानकर त्वचा में लगाने से त्वचा संबंधी विकारों का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>घाव</strong>-बिम्बी के पत्तों को घी के साथ पीसकर घाव पर लगाने से घाव जल्दी भरता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वशरीर रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>ज्वर-</strong>बिम्बी मूल तथा पत्र को पीसकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वरस निकालें तथा इसे समस्त शरीर में लेप करें इससे ज्वर का शमन होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बाल रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">स्कन्दापस्मार-</span>'</strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अनन्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुक्कुरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिम्बी तथा कौंच</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को बांधकर बालक के गले में धारण (</span>Warding of garlands<span lang="hi" xml:lang="hi">) कराने से </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्कन्दापस्मार</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का प्रतिषेध होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>पूतना प्रतिषेधार्थ</strong>-काकतिन्दुक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्रफला (इन्द्रायण)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिम्बी तथा गुमजा को गले में धारण कराने से पूतना प्रतिषेध होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>शीतपूतना प्रतिषेधार्थ-</strong>कपित्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रास्ना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिम्बी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राचीबल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नन्दीवृक्ष तथा भल्लातक का क्वाथ बनाकर बालक का परिषेक (</span>Sprinkling<span lang="hi" xml:lang="hi">) करने से शीतपूतना का निवारण होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विष चिकित्सा:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्पदंश/वृश्चिक दंश-बिम्बी फल को पीसकर दंश स्थान पर लेप करने से सर्प तथा बिच्छू के काटने से होने वाले विषाक्त प्रभावों का शमन होता है। </span></h5>
</li>
</ul>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>वनौषधियों में स्वास्थ्य</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3026/beneficial-in-diseases-of-mouth--chest--abdomen--kidney--gonorrhea-and-skin-diseases</link>
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                <pubDate>Wed, 01 Apr 2015 21:55:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पतंजलि देता है स्वाइन फ्लू से बचने के उपाय</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">        चिकित्सा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> विशेषज्ञों की आधुनिक मान्यता के अनुसार शरीर का तापमान सुबह ९९ डिग्री फॉरेनहाइट और शाम के वक्त ९९.९ डिग्री फॉरेनहाइट से ज्यादा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे बुखार कहा जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि पहले शरीर का नॉर्मल टेम्प्रेचर ९८.४ डिग्री फॉरेनहाइट से अधिक होते ही उसे बुखार की संज्ञा दी जाती थी। आयुर्वेद पसीने में अवरोध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर में संताप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंगों में जकड़न आदि लक्षण एक साथ उत्पन्न होने को बुखार का संकेत मानता है। क्योंकि शरीर में पसीने के अवरुद्ध होने से शरीर के तापमान की वृद्धि होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आमाशय की ग्रंथियों के स्राव अवरुद्ध होने से</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3027/patanjali-gives-solutions-to-prevent-swine-flu"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/135.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    चिकित्सा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> विशेषज्ञों की आधुनिक मान्यता के अनुसार शरीर का तापमान सुबह ९९ डिग्री फॉरेनहाइट और शाम के वक्त ९९.९ डिग्री फॉरेनहाइट से ज्यादा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे बुखार कहा जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि पहले शरीर का नॉर्मल टेम्प्रेचर ९८.४ डिग्री फॉरेनहाइट से अधिक होते ही उसे बुखार की संज्ञा दी जाती थी। आयुर्वेद पसीने में अवरोध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर में संताप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंगों में जकड़न आदि लक्षण एक साथ उत्पन्न होने को बुखार का संकेत मानता है। क्योंकि शरीर में पसीने के अवरुद्ध होने से शरीर के तापमान की वृद्धि होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आमाशय की ग्रंथियों के स्राव अवरुद्ध होने से पाचक अग्रि मंद होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपवृक्क के आंतरिक स्राव (एड्रिनेलिन) बंद होने से हृदय में बेचैनी बढ़ती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो बुखार के लक्षण हैं। इन दिनों देश में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्वाइन फ्लू</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का दौर चल रहा है। हर व्यक्ति भयभीत सा हो रहा है। हल्की छींक आई कि उसे स्वाइन फ्लू का डर सताने लगता है। वस्तुत: इससे डरने की नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके लक्षण को समझने और समुचित उपाय करने की जरूरत है। जहाँ तक बुखार के संदर्भ में नाड़ी गति और शरीर के तापमान की बात है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे भी समझते चलें कि एक स्वस्थ व्यक्ति में नाड़ी की गति प्रति मिनट ७२ बार और श्वास गति १८ बार होती है। एक डिग्री तापमान बढ़ने पर नाड़ी गति लगभग १० बार प्रति मिनट बढ़ जाती है। इस प्रकार बुखार के १०० डिग्री ताप पर ९० तथा १०१ डिग्री होने पर नाड़ी १०० बार प्रति मिनट धड़कने लगती है। रही बात स्वाइन फ्लू की तो </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">नसूनी शीत वायु सांस द्वारा जब फेफड़ों में पहुंचती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो सर्दी-जुकाम होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर यह जो फ्लू-स्वाइन फ्लू बुखार के लक्षण नहीं हैं। हां नाड़ी की गति अनुपात से अधिक चलने पर दिल को अधिक कार्य जरूर करना पड़ता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस साधारण बुखार में रोगी को अलग कमरे में रखें। साफ सफाई का पूरा ध्यान रखें। बुखार के रोगी भोजन हल्का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुपाच्य लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीखे-मसाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तैलीय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिकनाई तथा देरी से पचने वाले खाद्य पदार्थ बिल्कुल न लें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">औषधीय क्रम में पतंजलि आयुर्वेद की ज्वर नाशक वटी व गिलोय घन वटी लेते रहना उपयुक्त होगा। तुलसी के पत्ते व काली मिर्च का काढ़ा बनाकर पीने से भी लाभ मिलता है। इसी क्रम में  स्वाइन फ्लू के लक्षण भी समझते चलें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वाइन फ्लू:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वाइन फ्लू एच-१ एन-१ वायरस से होने वाली बीमारी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो मौसमी फ्लू में सक्रिय होता है। आयुर्वेद में वर्णित फुस्फुस श्वास के सामान्य फ्लू और स्वाइन फ्लू के लक्षण प्राय: एक जैसे ही होते हैं। लेकिन स्वाइन फ्लू जुकाम बहुत तेज होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नाक ज्यादा बहती है। </span>4-6<span lang="hi" xml:lang="hi"> घंटे में ही गंभीर लक्षण दिखने लगते हंै। स्वाइन फ्लू होने पर शीघ्र ही इलाज शुरू होना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">लक्षण:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बुखार लगातार नाक बहना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खांसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छींकें आना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मांसपेशियों में दर्द या अकड़न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिर में भयानक दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ठंड लगना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सांस लेने में कठिनाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थकावट उल्टियां और दस्त</span>,  <span lang="hi" xml:lang="hi">गले में खराश महसूस होना आदि लक्षण स्वाइन फ्लू में पाए जाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेदिक प्राथमिक उपचार:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोय और तुलसी की पत्ती बराबर मात्रा में लेकर जौकुट करें। इसका पाउडर सुबह-शाम एक गिलास पानी में २-२ चम्मच डालकर पानी आधा रहने तक उबालें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तत्पश्चात  कुनकुना ही पी लें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खांसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जुकाम जैसे सामान्य लक्षण दिखने पर महा सुदर्शन काढ़ा और गिलोय सत्व का सेवन दिन में तीन बार करते रहने पर स्वाइन फ्लू का प्रभाव नहीं होता।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">खांसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहती नाक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छींक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुखार जैसे लक्षणों से प्रभावित व्यक्ति से सावधानी रखें ।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5> <span lang="hi" xml:lang="hi">खांसते-छींकते समय मुंह तथा नाक पर रुमाल रखें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">नीम की छाल १०० ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोय १०० ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी ५० ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दालचीनी ५० ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लौंग २५ ग्राम लेकर कूटकर रख लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर ५ ग्राम चूर्ण को ४०</span>0<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली. पानी में पकाकर १०० मिली. बचने पर छानकर पिलायें। दिन में २-३ बार इस प्रयोग को करें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">१-२ ग्राम हल्दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">५-७ लौंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">३-५ काली मिर्च</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">५-७ तुलसी के पत्ते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोय को एक साथ मिलाकर उबालें। इस प्रकार निर्मित क्वाथ का प्रयोग करने से स्वाइन फ्लू में आराम मिलता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सात पत्ते तुलसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाँच लौंग कूटकर एक गिलास पानी में पकायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आधा रहने पर सैंधा नमक डालकर गर्म-गर्म पीलें। इसे प्रतिदिन दो-तीन बार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लगातार दो या तीन दिन तक ले सकते हैं। वैद्यकीय सलाह के लिए निकटतम पतंजलि चिकित्सालय से भी संपर्क कर सकते हैं।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि की विशेष औषधियाँ:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">वैद्य के परामर्शानुसार ज्वर के लिए ज्वरनाशक क्वाथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोय क्वाथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोय घन वटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीम घन वटी आदि का सेवन करें। व</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्दी व जुकाम के लिए लक्ष्मीविलास रस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संजीवनी वटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि बाम व दिव्य धारा का उपयोग करें।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वाइन फ्लू में पतंजलि द्वारा प्रायोगिक औषधियों की विशेष सेवन विधि:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सेवन-१</span></strong></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">भोजन के बाद दोनों समय गिलोय घन वटी</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वर नाशक वटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महासुदर्शन घन वटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संजीवनी वटी की एक-एक गोली लें।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सेवन-२</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">नित्य खाली पेट गिलोय क्वाथ व ज्वरनाशक क्वाथ का काढ़ा बनाकर सेवन करें।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सेवन-३</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार के सभी सदस्य खाली पेट गिलोय घन वटी व ज्वर नाशक वटी की एक-एक गोली का प्रात:-सायं दोनों समय सेवन करें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही छोटी इलाइची एवं कपूर को आपस में पीसकर पोल्टिस बना लें और रोगी को सूंघने को दें। अथवा इन दोनों की सामग्री से घर में हवन भी करते रह सकते हैं। इसके अतिरिक्त आंतरिक प्रतिरक्षा प्रणाली को विकसित करने हेतु सतत कुम्भक प्राणायाम का अभ्यास करें। </span></h5>
</li>
</ul>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>रोग विशेष</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3027/patanjali-gives-solutions-to-prevent-swine-flu</link>
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                <pubDate>Wed, 01 Apr 2015 21:53:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>तनाव के स्तर की समझ और उसका योग द्वारा प्रबंधन</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. शरली टेल्लस एवं राम कुमार गुप्ता</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3028/understanding-stress-levels-and-managing-them-through-yoga"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/16.11.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  पारम्परिक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> जीवन शैली से आधुनिक जीवन शैली की ओर तेजी से उन्मुख होने के कारण आज तनाव प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का हिस्सा बन चुका है। आधुनिक जीवन परेशानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय सीमा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदासी और इच्छाओं से भरा हुआ है। तनाव किसी परिवर्तन के लिए शरीर की प्रतिक्रिया है। शरीर बदलावों के प्रति शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक और भावनात्मक रूप से प्रतिक्रिया करता है। तनाव के प्रकार हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे- तीव्र व दीर्घ अवधि का तनाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भौतिक व मनोवैज्ञानिक तनाव एवं दर्दनाक व दैनिक परेशानी का तनाव। दीर्घ तनाव मस्तिष्क कोशिका विकास में और मस्तिष्क अनुकूलन में विघटन का कारण बन सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो व्यक्ति के शरीर और संज्ञान को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं। पर तनाव शरीर कार्य की पर अनुकूल और प्रतिकूल दोनों रुप से प्रभाव डालते हैं। पर तनाव हर व्यक्ति के लिए एक बिन्दु (सीमा) तक ही खराब होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह दबाव में अच्छा प्रदर्शन करने एवं व्यक्ति को अपने संपूर्ण नियोजन हेतु प्रेरित करने में मदद भी कर सकता है। इसलिए यह कई समायोजन या अनुक्रिया हेतु आवश्यक भी है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वै</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञानिक अध्ययन के अनुसार गलतियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाधाएँ एवं असफलताएँ सीखने एवं भविष्य की नकारात्मक घटनाओं से मुकाबला करने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बड़े संसाधनों के निर्माण को संभावित करने का अवसर प्रदान करती हैं। अत: हम तनाव के लक्षणों को पहचानकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके हानिकारक प्रभावों को कम करके अपनी रक्षा कर सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव के कारण:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">1.     व्यक्तिगत कारण-इसमें व्यक्ति गत समस्यायें आती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे-</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">शारीरिक समस्याएँ: दीर्घ बीमारियाँ जैसे हृदय रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुमेह या संधिवात।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">भावनात्मक समस्याएँ: क्रोध को व्यक्त न कर पाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवसाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दु:ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपराध या आत्म सम्मान का कम होना।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">संबंध संबंधित: अपने संबंधों से जुड़ी समस्याएँ। इसमें मित्रता की कमी का अनुभव करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने जीवन में सहारे की कमी अनुभव करना।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन के बड़े बदलाव: जैसे अचानक पति-पत्नी या अभिभावक की मृत्यु का सामना करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी नौकरी खोना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शादी होना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नये शहर में जाना या नये शिशु का जन्म।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पारिवारिक वातावरण जन्य तनाव: परिवार का कोई सदस्य जो स्वयं तनाव में हो या परिवार का कोई बड़ा सदस्य जो परिवार के सदस्यों को चिंता ग्रस्त किए हो या वह स्वास्थ्य समस्या से ग्रसित हो।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वास और मूल्यों के बीच संघर्षगत तनाव: जैसे कोई पारिवारिक जीवन को मूल्यवान बना सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परंतु अपने परिवार के लिए पर्याप्त समय देने में असमर्थ हो।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">2.     सामाजिक और स्वावलम्बन परक कारण:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">आसपास का वातावरण: जहाँ अत्यधिक भीड़ हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपराध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदूषण या शोर जैसी समस्या में हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे क्षेत्र में रहने से हम तनाव ग्रस्त होते है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक स्थिति: अपने खर्चों को वहन करने हेतु पर्याप्त धन न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अकेलापन अनुभव करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भेदभाव का सामना करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लिंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उम्र या यौन दैशिक (सेक्सुअल ओरिएंटेशन) के प्रति नकारात्मक मनोदशा।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कार्य/नौकरी: अपने कार्यों से प्रसन्न न रहना।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बेरोजगारी: नौकरी खोना या काम पाने की असमर्थता के कारण भी तनाव का स्तर बढ़ता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव के चिन्ह और लक्षण :</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दी गयी सूची में तनाव के सामान्य संकेतक और लक्षण हैं। इसके अंतर्गत जिस व्यक्ति में जितने अधिक तनाव के चिन्ह और लक्षण मिलेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें तनाव का स्तर उतना अत्यधिक माना जाएगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/16.11.jpg" alt="16.11" width="700" height="523"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव स्व-मूल्यांकन स्तर सारणी:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव के स्तर मूल्यांकन हेतु प्रस्तुत सारणी के सहारे हर कोई अपनी स्थिति का आंकलन करके जीवन शैली एवं क्रियाकलाप में परिवर्तन लाकर प्रसन्नता भरी जिन्दगी जी सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/16.12.jpg" alt="16.12" width="901" height="376"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/16.13.jpg" alt="16.13" width="910" height="388"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/16.14.jpg" alt="16.14" width="931" height="365"></img> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव स्तर का जीवन पर प्रभाव:</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/16.15.jpg" alt="16.15" width="939" height="388"></img></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/16.16.jpg" alt="16.16" width="942" height="312"></img></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/16.17.jpg" alt="16.17" width="900" height="453"></img></span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग द्वारा उपयुक्त तनावों से पायें निजात:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग एक शारीरिक-मानसिक अभ्यास है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो खिंचाव के अभ्यास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियंत्रित श्वास-प्रश्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम और विश्राम का समुच्चय है। योग आंतरिक शक्ति की वृद्धि करने में सहायता करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो हमें तीव्र भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हताशा और चुनौतियों से प्रतिदिन निपटने में सहायता करता है। योग का अभ्यास श्वास को नियंत्रित करने में और विश्राम में सहायता करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही बड़े मांसपेशी समूहों और शरीर के सभी भागों से उपजात पदार्थों को निकालते हुए तनाव को आसानी से बाहर निकालता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मस्तिष्क में ताजा रक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आक्सीजन एवं अन्य पोषक तत्व की आपूर्ति होती है। अंतत: अच्छे स्वास्थ्य की अनुभूति बढ़ाता है। योग का अभ्यास श्वास-प्रश्वास को पूरी तरह से धीमा एवं गहरा कर देता है। फलत: हृदय दर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास दर धीमा एवं रक्त दाब कम होने से स्वायत्त तंत्रिका तंत्र का जागरण होता है। हम विश्राम और पचित अवस्था में जाकर पराअनुकंपी तंत्रिका तंत्र के जागृत होने से स्वर्गानुभूति करते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग की शिक्षा हमें नकारात्मक अवस्था से दूर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान में जीने को निर्देशित करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बड़े अर्थ में आत्म नियंत्रण देती है। योग का अभ्यास अच्छे हार्मोन जैसे एण्डार्फिन का स्रावण बढा़कर व्यक्ति को प्रसन्नता का आभास कराती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अत: हम कह सकते हैं कि यौगिक जीवन शैली और यौगिक अभ्यास शरीर की तनाव युक्त प्रतिक्रिया को व्यवस्थित (समंजित) कर सकती हैं और तनाव के साथ प्रभावी रूप से कार्य करके जीवन को तनाव मुक्त करते हुए जागरुकता में वृद्धि करती है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पतंजलि रिसर्च</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3028/understanding-stress-levels-and-managing-them-through-yoga</link>
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                <pubDate>Wed, 01 Apr 2015 21:52:17 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>विश्व स्वास्थ्य दिवस</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ0 विजय कुमार मिश्र</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3029/world-health-day"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/133.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   स्वस्थ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> आहार-स्वस्थ पोषण सूत्र से परिचित ही हैं। 7 अप्रेल विश्व स्वास्थ्य स्थापना दिवस रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष का स्वास्थ्य दिवस अपने में विशेष है। खाद्य सुरक्षा एवं उसकी उभरती चिंताओं पर ध्यान देना इसका लक्ष्य है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसके दायरे में सरकार व सरकारी एजेंसियां</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निजी क्षेत्र व नागरिक समाज सभी को शामिल कर रखा है। लक्ष्य </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">खाद्य जनित जोखिमों से हर नागरिक को बचाना अर्थात् ऐसे आहार जो अपनी विषाक्तता के कारण रोगों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बीमारियों एवं कुपोषण को आमंत्रित करते हैं जैसे अतिसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वायरल रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो व्यक्ति के स्वास्थ्य परक विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी प्रजनन क्षमता में अवरोध पैदा करते हैं तथा व्यक्ति में कैंसर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इबोला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डेंगू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वाइन फ्लू से लेकर न जाने कितने प्रकार के रोगों के कारक बनते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके प्रति सतत् जागरूकता पैदा करना है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(52,73,94);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व स्वास्थ्य संगठन की चिंता:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">खाद्य उत्पादन प्रक्रिया का लगातार परिवर्तित होना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वितरण एवं उपभोग प्रणाली में विसंगतियां</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खाद्य व्यापार के वैश्वीकरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर्यावरण परिवर्तन से लगातार उभरते नये-नये घातक जीवाणु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदूषण का बढ़ता खतरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिलावट जैसे दुष्कृत्यों ने संपूर्ण दुनिया को दहला दिया है। परिणामत: विश्व स्वास्थ्य संगठन ने विश्व की चिंताओं को दृष्टि में रखकर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य दिवस</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">घोषित कर वैश्विक स्तर पर सार्थक कदम उठाने पर बल दिया। संगठन का मानना है कि खाद्य क्षेत्र को अंतर्राष्ट्रीय मानक कोड प्रदान करके एवं स्वास्थ्य संबंधी समुचित दिशा निर्देशों द्वारा दुनिया को इस संकट से उबारा जा सकता है। पर सबसे महत्वपूर्ण है इन मापदंडों के निर्वहन हेतु जन भागीदारी का मार्ग प्रशस्त करना। आखिरकार मुद्दा जब जन साधारण से जुड़ा हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो मात्र कानून बनाकर सफलता पाना असंभव है। अपितु स्वास्थ्य संवर्धन एवं आहारजन्य विषाक्तता से बचाव हेतु आवश्यक है शैक्षिक जागरूकता एवं इस मुद्दे के महत्व को जन-मानस के जीवन में स्थापित करना। साथ ही खुदरा विक्रेताओं को यह सचेत करना आवश्यक है कि वे अपने व्यापारिक हित लाभ के साथ-साथ लोगों के स्वास्थ्य को बनाये रखने वाले दूसरे दायित्व को नजर अंदाज न करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी संदर्भ में सार्वजनिक स्थल पर परोसे जाने वाले भोजन के साथ-साथ उसे परोसने एवं जिस प्लेट व थाली में परोसा जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी स्वच्छता भी माने रखती है। एक रिपोर्ट के अनुसार असुरक्षित भोजन से उत्पन्न होने वाले रोगाणुओं से लगभग २०० से अधिक बीमारियां जन्म लेती हैं और इससे शिशु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छोटे बच्चे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुजुर्ग महिला-पुरुष सभी प्रभावित होते हैं। यही नहीं रासायनिक तत्वों से युक्त आहार घातक बीमारियों को जन्म देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं प्रदूषित आहार लेकर एक बड़ा समाज स्थाई विकलांगता का दंश भोगने के लिए विवश हो रहा है। इतना बड़ा खतरा मनुष्य ने स्वयं अपने द्वारा पैदा किया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व स्वास्थ्य संगठन की ही रिपोर्ट है कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इस ग्लोबलाइजेशन के दौर में यह खतरा अब किसी क्षेत्र व किसी एक देश से जुड़ा नहीं रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु संपूर्ण विश्व इस संकट से ग्रस्त है।</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इसीलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सुरक्षित खाद्य के व्यावहारिक मानक जारी किये हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे खाद्य पदार्थ तैयार करने वालों के साथ-साथ हर नागरिक द्वारा महत्व देने की जरूरत है। वे हैं- १. स्वच्छता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">२. पके एवं कच्चे भोजन का समुचित विभाजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">३. सुरक्षित तापमान पर भोजन को पकाया जाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">४. सुरक्षित जल एवं पौष्टिक खाद्य सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करना आदि।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(52,73,94);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगीपीठ के खाद्य मापदण्ड:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जहां विश्व स्वास्थ्य संगठन ने विश्व के नागरिकों के लिए आहार एवं खाद्य संबंधी मापदण्ड एवं हिदायतें देकर उन्हें </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ्य नागरिक</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की श्रेणी में लाने का अभियान चलाया है और नागरिकों से अपेक्षा की है कि वह अपनी थाली के आहार पर बेबाकी से प्रश्न उठायें। वहींं पतंजलि योगपीठ ने मानवमात्र को आहार की दृष्टि से प्रकृति के निकट ले आने का दिव्य अभियान चला रखा है। पतंजलि जैविक खाद के सहारे विष मुक्त कृषि के माध्यम से उन्नत व पुष्ट अन्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब्जी के उत्पादन पर जागरूक कर रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दूसरी ओर प्रदूषित मल-मूत्र जन्य विषाक्तता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रासायनिक खादों से मुक्त फल-सब्जियों के रखरखाव </span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फल व सब्जियों को संरक्षित करने के उचित मानकों के प्रयोग हेतु पतंजलि हर्बल फूडपार्क जैसे विश्व स्तरीय संस्थान की स्थापना करके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस माध्यम से पूर्ण सौ प्रतिशत शुद्ध व प्रामाणिक विधि से फलों व जड़ी-बूटियों के जूस उपलब्ध करा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु पूर्ण सस्ते मूल्यों के साथ जनता तक पहुचाने हेतु प्रतिबद्ध है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी क्रम में गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य संरक्षण हेतु मां के पोषण को सुनिश्चत  रखने के सामूहिक प्रयास पर बल दे रही है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">       यह तथ्यपूर्ण है कि अंतर्राष्ट्रीय जगत को पूर्ण प्राकृतिक सुरक्षित खाद्य प्रणाली से जोड़ने के लिए अपने अनेक संगठनों के द्वारा प्रत्येक उत्पादक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपभोक्ता एवं सामाजिक ढांचे में सतत जागरूकता से इस दिशा में पहल कर रही हैं। फिर भी पतंजलि योगपीठ का कथन है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने अंत:करण में बिठाना होगा कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आहार के क्षेत्र में एक छोटी सी चूक संपूर्ण मानवता को विकलांग बना सकती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(52,73,94);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक शरीर विज्ञानियों के समान मान्यता:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक मान्यता है कि मनुष्य शरीर के कोशों के सतत टूटने और नये निर्मित होते रहने की प्रक्रिया के बीच मानव जीवन आगे बढ़ता रहता है। यदि यह क्रम प्रकृतिस्थ ढंग से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप से चलता रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोशों में कोई विसंगति पैदा न हो तो हृदय ३०० वर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुर्दे २९० वर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फेफड़े व हड्डियों को क्रमश: १०००</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">१५०० व ४००० वर्षों तक जीवित रखा जा सकता है। यही नहीं इसके बाद इन्हें प्रत्यर्पण द्वारा भी चलाया जा सकता है। इससे सिद्ध होता है कि मनुष्य की ६० वर्ष तक सिमट चुकी आयु को कोशों के इस सृजनात्मक प्रणाली से लम्बी किया जा सकता है। प्राचीन भारतीय ऋषियों ने यह विद्या पहले ही खोज ली थी। ऋषि अश्वनी कुमार द्वारा च्यवन ऋषि व किसी अन्य द्वारा राजा ययाति के पुनर्यौवन की प्राप्ति का विज्ञान आज भी महत्वपूर्ण पहेली बना है। योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज अपने योग-प्राणायाम द्वारा तथा श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज आयुर्वेदिक व</span><span lang="hi" xml:lang="hi">नौषधियों के अनुसंधान द्वारा उसी स्तर पर प्रयोग कर रहे हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह तथ्य पूर्ण है  कि शरीर तो हर पल विकसित होना चाहता है पर हम अपने आहार-विहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृत्य द्वारा इसे अधिक जल्दी मृत्यु तक पहुँचाने में खुद मदद करते हैं। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ. वाल्टर कैनन का कथन है कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य का पर्यावरण से गहरा नाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: मनुष्य को विषाक्त वातावरण से मुक्त रखना महत्वपूर्ण है। इन विषाक्त तत्वों में हैं पर्यावरण प्रदूषण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रेडियोधर्मी तत्वों की सक्रियता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खाद्य पदार्थ जन्य विशाक्तता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्वच्छता युक्त अव्यवस्थित जीवन क्रियायें।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिकन मेडिकल एसोशिएशन तथा जेरियाट्रिक्स सोसाइटी के डॉ. एडवर्ड बोर्ड ने इस विषाक्तता को बढ़ाने में आहार संबंधी मर्यादाओं का उल्लंघन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अतिवादी व अल्पतम श्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अव्यवस्थित दिनचर्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नशाजन्य विकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक अवसाद स्तर का तनाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वच्छता की उपेक्षा एवं काम वासना की अतिवादिता- ये सात कारण गिनाये हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनसे हजार वर्ष तक जीवित रहने वाला मनुष्य शताब्दी की चौखट तक भी नहीं पहुँच पाता। पतंजलि योगपीठ मानव जीवन में व्याप्त इन विकारों को योगाभ्यास द्वारा सृजनात्मक शक्ति के रूप में रूपांतरित करने में प्रयत्नशील है। जिसे विश्व में अनुपम कह सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(52,73,94);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद की मान्यता:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद की मान्यता भी इन तथ्यों के निकट है कि रोग का कारण विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वसन क्रिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भोजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वस्त्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काम वासना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रम जैसी क्रियाओं के असंतुलन का ही परिणाम है। जबकि मानवदेह में निहित इन केन्द्रकों को शरीर के अंदर से ही पोषण मिलता रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह अपनी क्षमतानुसार शरीर में स्वाभाविक रूप से पैदा होने वाले विजातीय द्रव्यों को बाहर फेंकता भी रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर मनुष्य जब इन केंद्रकों में ऊपर से भी कचरा डालने लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो शरीर की निष्कासन शक्ति शिथिल पड़ जाती है और मनुष्य रोग ग्रस्त हो उठता है। इनसे उपजे विषाक्त तत्व शरीर के संपूर्ण सूक्ष्म नर्वस सिस्टम को तोड़-मरोड़ बैठते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जो टॉक्सिन नामक विष वृद्धावस्था के निकट शरीर से उत्पन्न होना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह प्रदूषित आहार-विहार के कारण भरी जवानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ तक कि बाल्यावस्था में ही पैदा होकर शरीर कोशों को क्षति ग्रस्त करने लगता है और जीवन खोखला होकर रोगों का शिकार बनता है। आज बाल्यावस्था में बढ़ता मोटापा जैसे रोग अखाद्य आहार सेवन का प्रमुख उदाहरण है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(52,73,94);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय ऋषियों की आहार दृष्टि:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय मनीषियों ने आहार की तीन कोटियां निर्धारित की हैं। प्रथम सात्विक आहार जो रक्त को शुद्धता देता है। दूसरा राजसिक आहार तथा तीसरा है तामसिक आहार। तामसिक आहार रक्त को तत्क्षण विषाक्त करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्त में कार्बनीकरण की अधिकता से शरीर के कोश भी शिकार होते हैं। यही नहीं इससे मन: स्थिति विक्षोभ ग्रस्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शोक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हताशा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निराशा का कारक बनती है। इस मन:विकृति अवस्था से संपूर्ण स्नायुकोश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नाड़ी तंतु विकृत हो उठते हैं। परिणामत: संपूर्ण शरीर का अणु-अणु विषाक्तता का शिकार होकर दुर्बल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशक्त हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(52,73,94);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम एवं योग-आयुर्वेद से स्वास्थ्य समाधान:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व स्वास्थ्य संगठन की चिंता स्वाभाविक है पर केवल खाद्य पदार्थों के मानक तैयार करने से काम नहीं चलेगा। क्योंकि समस्यायें कानून तक सीमित नहीं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका विस्तार मनुष्य के नियति तक जा पहुँचा है। जब नियति प्रदूषित हो तो खाद्य पदार्थों की विषाक्तता दूर भी कैसे की जा सकती है। राष्ट्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व को ऐसे नागरिक चाहिए जिनमें स्वच्छ चरित्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पवित्र चिंतन व प्रखर पुरुषार्थ की शक्ति निहित हो। मनुष्य का स्तर ऊँचा उठाकर ही यह संभव है। पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्यश्री महाराज द्वारा योग-आयुर्वेद के समुच्चय से विश्व स्तर पर हर नर-नारी को अंदर-बाहर से परिष्कृत करने का चलाया अभियान आज उपलब्धियों के साथ प्रकट हो रहा है। कपालभांति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुलोम-विलोम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विविध योगासनों द्वारा अंत:करण में छाई विषाक्तता दूर हो रही है। उसे प्रकृतिस्थ बना रहा है। इस प्रकार मनुष्य जब अंदर-बाहर से परिष्कृत होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसके अंत: में खाद्य पदार्थों को प्रदूषित रखने का भाव भी पैदा नहीं होगा। तब विश्व-स्वास्थ्य संगठन के मानक स्वत: पूरे होते नजर आयेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि किसी भी परम्परा को बदलने के लिए जीवंत शक्ति चाहिए। जिसका आज अभाव है। यह पूर्ण होगा योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय संस्कारों को वैश्विक प्रतिष्ठा देने से । आज की आवश्यकता है कि हम  सब पतंजलि योगपीठ के साथ जुड़कर इस दिशा में बढें और विश्व स्वास्थ्य स्थापना दिवस को सफल बनायें।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>स्वास्थ्य समाचार</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3029/world-health-day</link>
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                <pubDate>Wed, 01 Apr 2015 21:49:16 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अनुभूति आपकी</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योगग्राम में कैंसर मुक्त हुई</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं जीवन माला (45 वर्ष) 2009 से स्तन कैंसर से पीड़ित थी। मैं फ्लैट-11</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करोल बाग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जालन्धर की रहने वाली हूँ। मुझे प्रारम्भिक स्थिति का कैंसर था तथा एलोपैथिक उपचार पी.जी.आई. चण्डीगढ़ में चल रहा था। जब मैं शारीरिक असामर्थ्य व मानसिक अवसाद से ग्रस्त हुई तो योगग्राम आई। मैं चल-फिर भी नहीं पा रही थी। अपनी बड़ी बहन को कोसती रही कि इतना खर्च करवा दिया यहां भेज कर। कुछ विशेष खाने को भी नहीं देते। खाली नेति आदि करवा कर भीतर से और भी खाली करते रहते हैं। कमज़ोर करके और</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3030/divya-anubhuti"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/137.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योगग्राम में कैंसर मुक्त हुई</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं जीवन माला (45 वर्ष) 2009 से स्तन कैंसर से पीड़ित थी। मैं फ्लैट-11</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करोल बाग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जालन्धर की रहने वाली हूँ। मुझे प्रारम्भिक स्थिति का कैंसर था तथा एलोपैथिक उपचार पी.जी.आई. चण्डीगढ़ में चल रहा था। जब मैं शारीरिक असामर्थ्य व मानसिक अवसाद से ग्रस्त हुई तो योगग्राम आई। मैं चल-फिर भी नहीं पा रही थी। अपनी बड़ी बहन को कोसती रही कि इतना खर्च करवा दिया यहां भेज कर। कुछ विशेष खाने को भी नहीं देते। खाली नेति आदि करवा कर भीतर से और भी खाली करते रहते हैं। कमज़ोर करके और जाने क्या हाल कर देंगे आदि।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तुत: मैं कमजोर अनुभव अवश्य कर रही थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर अंदर से स्वस्थ और मजबूत हो रही थी। यह राज तब खुला जब एक शाम योग करते हुए मुझे मेरे बड़े पुत्र (आयु 8 वर्ष) ने बताया कि उसने योगग्राम की किसी सड़क पर स्वामी जी को देखा है। यह 6 जून 2011 की बात है। विश्वास ही नहीं कर पा रही थी बच्चे की बात पर कि स्वामी जी योगग्राम में हैं। पर उन्हें एक बार देखने की उत्कंट इच्छा से अपने कक्ष से निकल पड़ी। दोनों बेटे मुझे लेकर कभी इस सड़क केछोर तक जाते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो फिर कहते कि वो तो इधर से निकल गए। मैं उन पर झुंझलाती कि स्वामी जी को इतनी दूर से कैसे पहचाना आपने।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">थोड़ा तेजी से दौड़ने पर स्वामी जी दिखाई पड़े। चरण वंदन किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी मैं अपने पर आश्चर्य करने लगी और सोचने लगी कि मैं एलोपैथिक उपचार से अति दुर्बल हो चुकी थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चों का गिरा खिलौना भी उठाकर न दे पाती थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज तीन दिन में ही इतनी रफ्तार से कैसे दौड़ रही हूँ। यह तो चमत्कार हो गया योगग्राम में। योग व प्राकृतिक चिकित्सा के उपचार ने मुझे समर्थ बना दिया। मैंने स्वयं के बाद में दोनों बच्चों का योगग्राम में उपचार करवाया। यहां सेवा भाव से कुछ ही दिनों में मेरे मन व आत्मा के विकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग-दोष धुल गये। मुझे विश्वास हो गया कि अब मैं रोग मुक्त हो जाऊंगी। वही हुआ भी। तभी से मैंने पतंजलि के कार्य में जुड़ने का संकल्प लिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जीवन दान तो यहीं से मिला था। तभी मुझे अपने बच्चे को आचार्यकुलम में भर्ती कराने का भाव अचानक मन में उठने लगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर मुझे यहां कोई जनता नहीं था। एक बार अचानक स्वामी प्रद्युम्र जी से भेंट हो गयी। उन्होंने अचानक कहा कि अपना एक बालक स्वामी जी के मिशन के लिए दोगी माता</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका यह कहना जैसे मुझे मेरा अहोभाग्य ही जान पड़ा। आज २ वर्ष से मेरे दोनों पुत्र आचार्यकुलम में हैं। मैं धन्य हो गई ऐसा गुरुद्वारा पाकर।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वात रोगों से निज़ात मिली</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बाबा जी मैं चल नहीं पाती थी। मेरे पैरों में वात की शिकायत थी। मुझे रीढ़ की हड्डी में दर्द रहता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपके पतंजलि से प्राप्त दवाइयों का सेवन करने से मुझे आराम मिला। आपके द्वारा बताए गए भस्त्रिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कपालभाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुलोम-विलोम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रामरी बहुत ही प्रभावकारी हैं। जब से मैं आपके द्वारा बताया योगाभ्यास प्रारम्भ किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपना रोजमर्रा का काम जैसे कंघी करने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कपड़े धोने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नहाने आदि को खुद करने लगी। बाबा जी स्वस्थ जीवन हेतु योग की राह दिखाने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। धन्यवाद किरण सिन्हा जी का भी जिन्होंने हमेशा मुझे योग करने के लिए प्रेरित किया।</span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">भवदीय</span>,</h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीमती योगश्री चंदेल</span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">जैतहरी रोड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार न्यायालय के सामने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनूपपुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">म.प्र.</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे पति पूर्ण नशामुक्त हुए</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आदरणीय बाबा जी</span>,</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं आपको धन्यवाद करना चाहती हूँ कि मेरे पति नशा करते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर वे अब नशा करने की बुरी आदतों से दूर हो गये हैं। उनकी इस नशे की आदत के कारण घर में सभी परेशान रहते थे। अब आस्था चैनल पर सुबह आपका कार्यक्रम आता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे वो बड़े ध्यान से देखते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही योग संदेश पत्रिका के नियमित पाठक भी हैं। नशा मुक्ति हेतु आपके बताये हुए </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पाँच ढ़क्कन आंवला जूस और उतना ही गर्म पानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही खाली पेट सुबह पांच ढ़क्कन गौधन अर्क  गर्म पानी के साथ मिला कर रात को खाना खाने के बाद लेते थे। इसके अतिरिक्त अश्वगंधा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शतावर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वेत मूसली तीनों को मिलाकर दो ग्राम मात्रा में लेते रहे।</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे शरीर में कमज़ोरी दूर हो गयी। ऐसा करने से कुछ ही दिनों में उनको लगने लगा कि वे कभी व्यसनी थे ही नहीं। ऐसा प्रयोग करते एक साल बीतने जा रहा है। हाँ पर थोड़ा बहुत गैस की समस्या बीच में आयी थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस दौरान शाम को खाने के बाद दिव्य गैसहर चूर्ण भी अपनाया। अब वे पूरी तरह नशा मुक्त हैं। यद्यपि प्रयोग अब भी जारी हैं। आज देश में लाखों परिवार नशा की भेंट चढ़ रहे हैं। मुझे विश्वास है कि वे भी ईमानदारी से इसे अपनाकर लाभ ले सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">भवदीया</span>,</h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीमती लीला</span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">5-81</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नैरोजी नगर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नई दिल्ली-110029</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>दिव्य अनुभूति</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Apr 2015 21:48:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>खान-पान से उत्पन्न अजीर्णता के निवारण में सहायक आहार</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">      मनुष्य</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीव-जंतु भी अजीर्ण के शिकार होते हैं। अजीर्ण ऐसा रोग है जो तात्कालिक आहार से जुड़ा है। जरा सा असंतुलन पैदा हुआ कि अजीर्ण आ धमकता है। हमारे आयुर्वेद में ऋषियों ने इस पर गहन शोध किया और निष्कर्ष रूप में आहार द्वारा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आहार की काट</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">तैयार की। लेख में प्रस्तुत है भिन्न-भिन्न पदार्थ सेवन से उपजे अजीर्ण और उसके निवारण संबंधी उपाय। आम मनुष्य इसका सहज लाभ उठाकर अजीर्ण निवारण के नाम पर चलने वाली महंगी चिकित्सा से बच सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ना</span><span lang="hi" xml:lang="hi">रियल से हुए अजीर्ण में तण्डुल जल (चावल का पानी) व</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3031/diet-helpful-in-preventing-indigestion-caused-by-food-and-drink"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/food.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   मनुष्य</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीव-जंतु भी अजीर्ण के शिकार होते हैं। अजीर्ण ऐसा रोग है जो तात्कालिक आहार से जुड़ा है। जरा सा असंतुलन पैदा हुआ कि अजीर्ण आ धमकता है। हमारे आयुर्वेद में ऋषियों ने इस पर गहन शोध किया और निष्कर्ष रूप में आहार द्वारा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आहार की काट</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">तैयार की। लेख में प्रस्तुत है भिन्न-भिन्न पदार्थ सेवन से उपजे अजीर्ण और उसके निवारण संबंधी उपाय। आम मनुष्य इसका सहज लाभ उठाकर अजीर्ण निवारण के नाम पर चलने वाली महंगी चिकित्सा से बच सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ना</span><span lang="hi" xml:lang="hi">रियल से हुए अजीर्ण में तण्डुल जल (चावल का पानी) व आम्रफल के अजीर्ण में दूध हितकारी होता है। घृत से हुए अजीर्ण में जम्बीर का रस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केले से हुए अजीर्ण में घी उपयोगी साबित होता है। गेंहू के अजीर्ण में ककड़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नारंगी के अजीर्ण में गुड़ भक्षण उचित है। पिण्डालु (अरुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घुइयाँ) के अजीर्ण में कोद्रव (कोदो) का सेवन हितकर माना</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आटे से बने भोज्य पदार्थों के अजीर्ण में जल पीना हितकर होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रियाल फल (चिरौंजी) से हुए अजीर्ण में हरड़ हितकारी होती है। उड़द से हुए अजीर्ण में खाँड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूध से हुए अजीर्ण में तक्र लेना उचित होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोल (बेर) व आम्र फल से हुए अजीर्ण में गर्म पानी पीना चाहिए। अधिक मदिरा पीने पर शहद मिला पानी उसके दोष का शमन करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुष्कर (कमलगट्टे) के अजीर्ण में कड़वा तेल (सरसों का तेल) उपयोगी साबित होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पनस (कटहल) के अजीर्ण में केला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केले के अजीर्ण में घी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घी के अजीर्ण में जम्भरस (जम्बीरी निम्बू का रस) उपयोगी होता है। जम्बीरी के रस से हुए उपद्रव को लवण शान्त कर देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लवण की अधिकता से हुए उपद्रव के शमन में तण्डुल जल (तण्डुलोडक) परम उपयोगी होता है। कुटे हुए चावलों को आठ गुणा पानी में डालकर कुछ समय पश्चात् पानी निकाल लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही तण्डुल जल कहलाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नारियल व तालबीज (तालफल का बीज अर्थात् गिरी) को पचाने के लिए जिन मुनियों ने तण्डुल (चावल) को उपयोगी बताया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे ही बताते हैं कि तण्डुल (चावल) को पचाने के लिए क्षीरवारि (जल मिलाकर उबाला हुआ दूध) पानी उपयोगी होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अनार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आंवला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिन्दुकी (तेन्दु)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बीजपूर (बिजौरा निम्बू) व लवली फल (हरफारवेड़ी) को बकुल (मौलसिरी) का फल पचा देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और बकुल का फल बकुल के ही मूल से पचता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मधूक (महुआ)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मालूर (बिल्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेलफल)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नृपादन (खिरनी)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परूष (फालसा)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खजूर व कपित्थ (कैंथ) को पचाने के लिए नीम के बीज का चूर्ण पानी में मिलाकर पीना चाहिए। बीजपूर (बिजौरा निम्बू) के अजीर्ण को सिद्धार्थक (श्वेत सरसों) का सेवन नष्ट कर देता है। चुटकी भर लवण के साथ पीस कर सरसों का सेवन उक्त अजीर्ण के शमन के लिए किया जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मृणाल (कमल नाल)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खजूर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हारहूरा (मुनक्का)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कसेरु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिंघाड़ा व शक्कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इनको पचाने के लिए भद्रमुस्त (नागरमोथा) उपयोगी होता है तथा लहशुन के अजीर्ण को दूर करने के लिए उबाल कर शीतल किया हुआ दूध उत्तम माना जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आम्रातक (आमड़ा)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदुम्बर (गूलर)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीपल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्लक्ष (पिलखन) व बड़ के फलों का अजीर्ण शीतल पानी पीने से दूर हो जाता है। आम के फल का अजीर्ण सौवर्चल (संचर नमक) से नष्ट होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सौवीर (बेर) फल के अजीर्ण को उष्ण जल दूर कर देता है। प्राचीनामलक (पानी आँवला) के अजीर्ण को अकेली राजिका (राई) दूर करती है। क्षीरी (राजादन/खिरनी) नामक फल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खजूर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फालसा व चिरौंजी को पचा देता है। काली मिर्च ताल फल को पचा देती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बेल (बिल्व फल) व जामुन के फल से हुए अजीर्ण को नागर (सौंठ) दूर करती है। तिन्दुकी (तेन्दु) के फल को शर्करा पचाती है। बाकुल (मौलसिरी के फल से हुए) अजीर्ण को जीरा तथा कपित्थ (कैंथ) फल को मधुरिका (सौंफ) पचा देती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कटहल व आंवले को पचाने के लिए सर्जतरु (शाल वृक्ष) के बीज का उपयोग करना चाहिए। अब तक कहे न कहे सभी फलों को कटु-तिन्दुक (कड़वा तेन्दु/कुचेलक) पचाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कटहल को पचाने के लिए आम की बिना सूखी गुठली उपयोगी होती है। आम के फल को पचाने के लिए घनराव (तण्डुलीय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चौलाई) का मूल उपयोगी होता है। इसी प्रकार अपूप (पूआ) को पचाने के लिए जल में मिलाई अजवाइन कारगर होती है। कुछ विद्वानों ने पृथुक (पोहा) का अजीर्ण दूर करने के लिए भी जल मिश्रित अजवाइन को ही उपयोगी माना है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पालंकिका (पालक)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केमुक/केउँआ/कन्दविशेष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कारवल्ली (करेला)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वार्ताक (बैंगन)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वंशांकुर (बांस के अंकुर)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपोदिका (पोई)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अलाबु (घीया)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पटोल (परवल) व मेघरव (चौलाई)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन सबको सिद्धार्थक (श्वेत सरसों) पचा देती है। श्वेत सरसों को पीसकर थोड़े लवण के साथ सेवन करने से इनका पाचन होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परवल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वंशांकुर (बांस की कोंपल)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कारवल्ली (करेला) व घीया के शाक को अधिक मात्रा में खाकर भी यदि कोई ब्रह्मतरु (पलाश/ढाक वृक्ष) के क्षार से मिश्रित जल को पी लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो पुन: उतना ही खाने की इच्छा हो जाती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बथुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्धार्थक (श्वेत सरसों) व चुंचु (चेवुना) का शाक खदिरसार (कत्था) के क्वाथ से शीघ्र ही पच जाता है। जैसे गुड़ सूरण (जिमिकन्द) व नारङ्ग (नारंगी/सन्तरा) को पचा देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी प्रकार तण्डुल जल (तण्डुलोदक) आलू को पचा देता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुष्प</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूल आदि के जो भी शाक हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनके पाचन के विषय में पहले नहीं कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे सभी तिल क्षार (तिल नाल से बने क्षार) द्वारा पच जाते हैं। आयुर्वेद में यवक्षारादि पाँच क्षारों में तिलनाल से बना क्षार भी गिना जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पिष्टान्न (आटे) से बने भोज्य पदार्थों (रोटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरी आदि) को लवण मिलाकर उबाली हुई कांजी पचा देती है। यवशुक्त (जौ से बनी काञ्जी) घी को पचा देती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शयामाक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अतसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्पाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कंगू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शालि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन सब का मन्थ (जल के साथ मथे दही) से पाचन हो जाता है। कुलत्थ (कुल्थी) व चिंचा (इमली) को पचाने के लिए तिल का तेल पीना चाहिए। मातुलुंगी फल (निम्बू) लवण से तुरन्त पच जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह लवण का विशेष प्रभाव है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कपूर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुपारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काश्मीर (गाम्भीरी फल)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जातीफल (जायफल)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जातीकोश (जावित्री)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कस्तूरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिल्हक (शिलारस/लोबान/एक सुगन्धित द्रव्य) एवं नारिकेल जल (नारियल के पानी) को समुद्र फेन (समुद्र का झाग) पचा देता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">निम्बू व काली मिर्च से घी का पाचन होता है। तक्र (छाछ) पीने से भी घी का अजीर्ण दूर हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">केवल अदरक का रस अथवा पलाश (ढाक) के क्षार से युक्त जल ईख के रस को तुरन्त पचा देता है। यह बात आत्रेय पुनर्वसु के शिष्य अग्रिवेश मुनि की कही हुई है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे सिंधुज (शोधित सुहागा) भैंस के दूध को पचा देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी प्रकार सैंधव (सेंधा नमक) खिचड़ी को पचा देता है। दालों को पचाने के लिए कांजी का शीलन (अभ्यास) करते हैं-अर्थात् दाल खाने पर हुए अजीर्ण में कांजी बहुत उपयोगी होती है। पाचन शक्ति को बढ़ाने के लिए प्राय: काञ्जी का प्रयोग किया जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गर्म माँड पीने से गाय का दूध पच जाता है। व्योष (त्रिकटु) से रसाला (सिखरन) पच जाती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सौंठ-सतीन (मटर) के अजीर्ण को नष्ट कर देती है तथा कोदो नागरंग (नारंगी/सन्तरा) व जम्बीर के अजीर्ण को नष्ट करता है। चन्दन व गैरिक (सोनागेरु) के प्रयोग से इरा (मदिरा) का असर शान्त हो जाता है व उससे होने वाले विकारों का शमन हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उड़द या मूंग आदि के बड़े वेसवार (मसालों) से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फेनी लौंग से व पापड़ शिग्रुबीज से पच जाते हैं। कणामूल (पिप्पलीमूल) से लड्डू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपूप (पुआ) व सट्ट (दही से बने भक्ष्यविशेष) आदि का पाचन हो जाता है तथा इसी से शष्कुली (पूरी) व माण्ड भी पचता है। सट्टक-सट्ट अथवा सट्टक नाम से प्रसिद्ध एक विशेष प्रकार का भोज्य पदार्थ है। यह दही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खाँड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मसाले व अनारदाना आदि से बनाया जाता है। कैयदेवनिघण्टु-कृतान्नवर्ग (१२०-१२४) में चार प्रकार के सट्टकों का वर्णन है। वेसवार- आयुर्वेद में कुछ विशिष्ट मसालों के मिश्रण को वेसवार कहते हैं। इसका स्वरूप निम्र है-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सैन्धव-त्रिकटु-धान्य-जीरकैर्दाडिमीरजनिरामठान्वितै:। (रथोद्धता छन्द)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पाचनोऽथ जठराग्रिदीपनो वेसवार उदितो मनीषिभि:।। (अ.मं.-४९)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सैन्धव (सेंधा लवण)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्रिकटु (सम मात्रा में मिली सौंठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काली मिर्च व पीपल का चूर्ण) धनिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनार दाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हल्दी व हींग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन सबके मिश्रण को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वेसवार</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं। यह पाचन व जठराग्रिदीपन होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वाविद् (सेह)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोधा (गोह)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शल्लकी (सेह जैसा ही गात्रसंकोची प्राणी विशेष)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चीतल तथा कोल (सूअर) व कूर्म (कछुआ) आदि में मांस से हुए अजीर्ण को यवक्षार (जवाखार) नष्ट कर देता है। खीर खाने से हुए अजीर्ण को मूंग का यूष दूर कर देता है एवं कांजी से हुए अजीर्ण को सामुद्र लवण नष्ट कर देता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तीव्र रूप से तपाये हुए सोने या चाँदी को जिस पानी में बार-बार बुझाया गया हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह पानी दीर्घकाल से हुए पानी संबंधी अजीर्ण को शीघ्र ही नष्ट कर देता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पेठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्रपुसीफल (खीरा)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्कारु (छोटा पेठा या कोहड़ा)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चीनातक (चीनारुक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चीनाकर्कटी)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इनसे हुए अजीर्ण को करंजबीज का सेवन शीघ्र ही नष्ट कर देता है। रसाजीर्ण को अरणिमूल (चित्रकमूल) नष्ट करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">असावधानी से स्त्रीकेशमिश्रित जल पीने से हुए विकार को पाणिमर्द (करंज) सहित पीस कर पिया गया प्राचीनामलक (पानी आंवला) दूर करता है। सौंठ व धान्याक (धनिया) का क्वाथ पीने से विविध प्रकार के आमजन्य (आंव से हुए) विकार नष्ट हो जाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">घी आदि स्निग्ध पदार्थ से हुए अजीर्ण को मूंग का (भूना हुआ) चूर्ण दूर कर देता है। इसी प्रकार दस्त वालों को मोथा नष्ट कर देता है तथा माषेण्डरी (उड़द के आटे से बनी बड़ी) के अजीर्ण को निम्बमूल (नीम की जड़ का क्वाथ) दूर करता है। इमली की अम्लता (खटाई) चूर्ण (चूने) के मेल से दूर हो जाती है। भाव यह है कि इमली के साथ चूने का प्रयोग करने से अम्लता जन्य विदग्धाजीर्ण अथवा अन्य अजीर्ण विकार नहीं होते। चूने में कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: यह अम्लता-निवारक होता है। इसीलिए अम्लपित्त आदि में शंख भस्म जैसी कैल्शियम की अधिकता वाली आयुर्वेदीय औषधियाँ प्रयुक्त होती हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पिष्टान्न (आटे से बने भोज्य पदार्थों) से हुए अजीर्ण में कोष्णाम्बु (थोड़ा गर्म जल) पिलाना चाहिए। प्रियाल (चिरौंजी) की मज्जा (गिरी) से हुए अजीर्ण में भी कोष्णाम्बु पीने से लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रियाल तथा मधुजल (शहद के शर्बत) से हुए अजीर्ण को हरड़ शीघ्र ही नष्ट करती है। उड़द से हुए विकारों में खाँड लाभदायक होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमाद वश (अधिक मात्रा में) पान पर लगे चूने से जब मनुष्य का मुख जलने लगे तो शर्करा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिल का तेल व सौवीरक (जौ से बनी कांजी)- इन सबको मिला कर मुख में लेने से जलन दूर हो जाती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पोषक उत्पाद</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Apr 2015 21:46:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
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                <title>गीता सार</title>
                                    <description><![CDATA[<p>  </p>
<table style="border-collapse:collapse;width:100.026%;border-width:1px;background-color:#f8cac6;border-color:#F8CAC6;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8555%;" /></colgroup>
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<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(248,202,198);">
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ता परमात्मा की वाणी है। संसार परमात्मा की अनुशासन व्यवस्था। जब तक लोक मानस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र परमात्मा के अनुशासन में जीता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गीता भी प्रवाहित रहती है। अनुशासन टूटते ही प्रवाह अवरुद्ध होता है। तब </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">गीता</span>  <span lang="hi" xml:lang="hi">चीत्कार करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गीता की उस चीत्कार को जो सुन समझ और अनुभव कर लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही युग सृजेता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युग पुरुष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रांति पुरुष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महामानव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगेश्वर आदि के रूप में प्रतिष्ठित होता है। घोर अंधकार के युग में परमात्मा की उस अविरल शाश्वत वाणी को आत्मसात करने में समर्थ भी वही होता है</span>, </strong></h5></td></tr></tbody></table>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3032/geeta-sar"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/76.jpg" alt=""></a><br /><p> </p>
<table style="border-collapse:collapse;width:100.026%;border-width:1px;background-color:#f8cac6;border-color:#F8CAC6;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8555%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(248,202,198);">
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ता परमात्मा की वाणी है। संसार परमात्मा की अनुशासन व्यवस्था। जब तक लोक मानस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र परमात्मा के अनुशासन में जीता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गीता भी प्रवाहित रहती है। अनुशासन टूटते ही प्रवाह अवरुद्ध होता है। तब </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">गीता</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">चीत्कार करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गीता की उस चीत्कार को जो सुन समझ और अनुभव कर लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही युग सृजेता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युग पुरुष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रांति पुरुष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महामानव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगेश्वर आदि के रूप में प्रतिष्ठित होता है। घोर अंधकार के युग में परमात्मा की उस अविरल शाश्वत वाणी को आत्मसात करने में समर्थ भी वही होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो परम अनुशासित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियोजन एवं सृजन में जिसकी गति हो। महाभारत काल में योगेश्वर कृष्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्रता आन्दोलन काल में लोकमान्य तिलक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गांधी आदि इसी स्तर के युगदूत थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने गीता की प्रेरणा को युगीन पृष्ठभूमि में आत्मसात किया और नवनिर्माण हुआ। इसीलिए श्रीमद्भगवद्गीता सदा से युग ग्रंथ रहा है। पतंजलि के योगसूत्र की तरह ही चिर शाश्वत </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">युगीन धर्म निर्वाह की प्रेरणा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इसकी प्रतिबद्धता। गीता की उसी आवाज को आज युगऋषि परम पूज्य स्वामी रामदेवजी महाराज आत्मसात करके युग धर्म निर्वाह कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो प्रस्तुत हैं:-              ...सम्पादक</span></strong></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जब अर्जुन देखता है योगेश्वर का विराट रूप</span></strong></span></h5>
<h6 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्</span>ï<span lang="hi" xml:lang="hi">। </span></strong></span></h6>
<h6 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्</span>ï<span lang="hi" xml:lang="hi">।। १७।।  </span></strong></span></h6>
<h6 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्</span>ï<span lang="hi" xml:lang="hi">। </span></strong></span></h6>
<h6 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">त्वमव्यय: शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे।। १८।।</span></strong></span></h6>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगेश्वर का विराट रूप देखकर अर्जुन कहता है कि हे कृष्ण- किरीट (मुकुट)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गदा और चक्र धारण करने वाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चारों ओर दीप्तिमान् तेज:पुंज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दमकती हुई अग्नि और सूर्य के समान सब ओर से देदीप्यमान (प्रकाशमान्)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधारण आँखों से दिखाई देने में अशक्य और अपरम्पार (असीम=अप्रमेय) सभी स्थानों पर तुम्हीं मुझे दिखाई पड़ रहे हो (कोई स्थान ऐसा नहीं बचा जहाँ तुम न हो)।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तुम्हीं अन्तिम ज्ञेय अक्षर ब्रह्म</span>ï, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुम्हीं इस विश्व के अन्तिम आधार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुम्हीं अव्यय (विकार रहित) और तुम्हीं शाश्वत धर्म के रक्षक हो। मुझे सनातन पुरुष तुम्हीं जान पड़ते हो।</span></h5>
<h6 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">शशिसूर्यनेत्रम्</span>ï<span lang="hi" xml:lang="hi">। </span></strong></span></h6>
<h6 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्</span>ï<span lang="hi" xml:lang="hi">।। १९।। </span></strong></span></h6>
<h6 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वा:। </span></strong></span></h6>
<h6 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितम्</span>ï <span lang="hi" xml:lang="hi">महात्मन्</span>ï<span lang="hi" xml:lang="hi">।। २०।।</span></strong></span></h6>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका न आदि है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न मध्य और न अन्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके अनेक बाहु हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य और चन्द्र जिसके नेत्र हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ज्वलित अग्नि जिसका मुख है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे अनन्त शक्तिमान् तुम को और अपने तेज से समस्त जगत् को जो तपा रहा है ऐसे तुम्हारे रूप को मैं देख रहा हूँ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि आकाश और पृथ्वी के बीच का यह अन्तर और सभी दिशाएं केवल तुम्हीं ने व्याप्त की हुई हैं। हे महात्मन्</span>ï! <span lang="hi" xml:lang="hi">तुम्हारे इस अद्</span>ï<span lang="hi" xml:lang="hi">भुत और विशाल उग्ररूप को देखकर ये तीनों लोक डर से व्यथित हो रहे हैं।</span></h5>
<h6 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीता: प्राञ्जलयो गृणन्ति। </span></strong></h6>
<h6 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घा: स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभि:  पुष्कलाभि:।। २१।। </span></strong></h6>
<h6 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च। </span></strong></h6>
<h6 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">गन्धर्वयक्षासुरसि।।सङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे।। २२।।</span></strong></h6>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह देखो! देव समूह तुम्हारे भीतर प्रवेश कर रहे हैं और कुछ देवता भय से हाथ जोड़े प्रार्थना कर रहे हैं। स्वस्ति-स्वस्ति कहकर महर्षि और सिद्धों का समुदाय अनेक प्रकार के स्तोत्रों से तुम्हारी स्तुति अर्थात् प्रशंसा कर रहा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रुद्र और आदित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वसु और सब साध्यगण (मुनिगणों का एक वर्ग)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों अश्विनी कुमार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मरुद्</span>ï<span lang="hi" xml:lang="hi">गण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊष्मपा अर्थात् पितर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गंधर्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यक्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असुर एवं सिद्धों के समूह सब तुम्हारी ओर विस्मित होकर देख रहे हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">(<span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धा से पितरों अर्थात्</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">वयोवृद्धों को जो अन्न दिया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह तभी तक उनके लिये स्वास्थ्यप्रद होता है जब तक कि गरमा गरम मिले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए पितरों को ऊष्मपा कहते हैं। आदित्य वैदिक देवता हैं)।</span></h5>
<h6 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम्</span>ï<span lang="hi" xml:lang="hi">।</span></strong></span></h6>
<h6 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> लोका: प्रव्यथितास्तथाहम्</span>ï<span lang="hi" xml:lang="hi">।। २३।।</span></strong></span></h6>
<h6 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नभ:स्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्</span>ï<span lang="hi" xml:lang="hi">। </span></strong></span></h6>
<h6 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दृष्ट्</span>ï<span lang="hi" xml:lang="hi">वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो।। २४।।</span></strong></span></h6>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हे महाबाहो! अनेकों मुखों व आँखों वाले अनेक भुजाओ जंघाओं और अनेक पैरों वाले अनेक उदरों वाले और अनेक दाढ़ों के कारण विकराल दिखाई देने वाले तुम्हारे इस महान्</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रूप को देख कर सब लोग व्यथित हो गये हैं और मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आकाश को छूने वाले प्रकाशमान्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनेक रंगों से युक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबड़े फैलाये हुए और चमकीले व विशाल नेत्रों वाले तुमको देखकर हे विष्णो! प्रव्यथित अन्तरात्मा वाला मैं न तो धीरज धारण कर पा रहा हूँ और न शान्ति। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>सनातन वैभव</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3032/geeta-sar</link>
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                <pubDate>Wed, 01 Apr 2015 21:45:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ब्रह्मांडीय तरंगों की धुन पर नृत्य करता</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong>'</strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">नटराज शिव</span>’</strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3033/dancing-to-the-tune-of-cosmic-waves"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/131.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत के विभिन्न भागों में वैज्ञानिक सिद्धांत पर स्थापित प्राचीन काल से अति महत्वपूर्ण कहा जाने वाला द्वादश ज्यार्तिलिंग का संबन्ध प्रकृति के भीषण तांडव एवं भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों से है। इसके लिए भारत सरकार को एक </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">साइंटिफिक रिलीजियस कमीशन</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">गठित कर हजारों वर्षों से भारतीय परंपरा के पीछे के विज्ञानमय धारा को जन सामान्य के बीच उस ज्ञान के संचार हेतु आगे आना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक मत भी यही है कि प्राचीन काल में स्थापित द्वादश ज्योतिर्लिंग क्षेत्र असामान्य हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका संबंध </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हायर कॉस्मो-फिजिक्स</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञान से जुड़ा है। ये सभी क्षेत्र गुरुत्वीय अधिकता के कारण प्रकाश का पिंड में रूपान्तरण एवं विपरीत काल में अत्यधिक प्रकाश व ऊर्जा नि:सर्जन के भी क्षेत्र हैं। ये ज्योतिर्लिंग क्षेत्र महत्तम गुरुत्वीय खिंचाव के कारण यहां के सूक्ष्म प्रकाश का अत्यधिक धनीभूत होकर पिंडों में रूपांतरण क्षेत्र के रूप में निरूपित हो सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसे विशाल व प्रचंड जलाशय की भांति उच्च व विपुल ऊर्जा का क्षेत्र भी कह सकते हैं। हम शिव को अक्सर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भोला</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कह कर पुकारते हैं एवं सम्पूर्ण भारतवर्ष में जलाभिषेक करते हैं। यह प्रतीकात्मकता बहुत ही रहस्मयी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पवित्र एवं विशेष मान्यता से युक्त है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ विश्व के प्रसिद्ध भूकंप विज्ञानी जो भूकंपीय तीव्रता जानने हेतु </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">रिक्टर स्केल</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">नामक भूकंपीय यंत्र के अविष्कारकर्ता के रूप में जाने जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टैक्नोलॉजी (कालटेक) के प्रोफेसर भी थे। इन्होंने बिहार-नेपाल के क्षेत्र में १९३४ के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मकर संक्रांति</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के दिन भीषण तांडव वाले भूकंप के अध्ययन हेतु भारत की यात्रा की थी। भू-विज्ञान का बाइबिल कही जाने वाली अपने द्वारा रचित पुस्तक </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">एलीमैंन्ट्री सिस्मोलॉजि</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">में उन्होंने लिखा है- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">संयोग से हमारे पास ऐसी घटनाओं के विपुल पर्यवेक्षणीय अनुभव हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन विरोधाभास रूप से दो उच्च तीव्रता से प्रभावित ऐसे क्षेत्र हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो मेरे सर दर्दी का विषय है। जिसमें प्रथम यह कि बिहार के किसी अन्य क्षेत्र की अपेक्षा मुंगेर में अत्यधिक विध्वंस हुआ है। लगभग पूरा मुंगेर शहर मलबे में तब्दील हो गया है। शायद ही कोई मकान या झोंपड़ी विध्वंस या बर्बादी से बची हो। यह विध्वंस इस शहर में आये भयानक कपंन की वजह से हुआ जबकि यहाँ कोई खड्ड नहीं है। सिर्फ उत्तर दिशा में स्थित नदी का किनारा छोड़कर अचानक धंसा हुआ क्षेत्र मैदान है। मरने वाले लोगों की संख्या अन्य किसी भी शहर की अपेक्षा यहाँ ज्यादा है। लगभग बिहार  के मरने वालों में कुल छंटवा हिस्सा। मुंगेर के बाद काठमांडू में ही भीषण तबाही मची है।</span>’</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जानकारी के लिए उन दिनों द्वादश ज्योतिर्लिंगों में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वैधनाथ धाम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">मुंगेर जिले के अंतर्गत ही था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अब देवधर नामक नये जिलों में आ गया है। चार्ल्स रिक्टर के अनुसार भूकंपीय केन्द्र मुंगेर से काफी दूर स्थित था। अब आपको समझने में आसानी होगी कि प्राचीन संहिताओं में बैधनाथ धाम का प्राचीन नाम </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">चिताभूमि</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">क्यों पड़ा था।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन का </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्पेशल थ्योरी ऑफ रिलैटीविटी</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पष्ट करता है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा एवं द्रव्यमान का अंतर रूपान्तरण एक-दूसरे में होता रहता है।</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी संदर्भ में सोमनाथ एवं नागेश्वर की स्थिति के साथ-साथ २६ जनवरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">२००१ में गुजरात में आये भीषण भूकंपीय तांडव पर भी विचार करें तो लगता है कि हम आप सबको अपनी भौगोलिक स्थिति को स्वयं स्पष्ट करते चलना होगा। साथ ही अलबर्ट आइंस्टीन का यह कथन भी कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म के बिना विज्ञान विकलांग है और विज्ञान के बिना धर्म अंधा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसा कि चार्ल्स रिक्टर ने लिखा है कि मुंगेर के बाद भीषण तबाही काठमांडू में हुई। नेपाल की राजधानी काठमांडू में भी अति प्राचीन ज्योतिर्लिंग </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पशुपतिनाथ</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">मौजूद है। यहां नेपाल भारतीय संस्कृति के विज्ञानमय धारा से जुड़ा हिन्दु सभ्यता का अति प्राचीन राष्ट्र है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत के ऋषि-प्रज्ञा ग्रंथों में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">रूद्र</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">एवं </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पशू</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">उच्चतम ऊर्जा के आवेशित </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">विद्युत-चुम्बकीय प्रकाश तरंग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के नाम हैं। इन ऋषि-प्रज्ञा ग्रंथ (ऋग्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैमिनि ब्राह्मण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तांडय ब्राह्मण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बार्हस्पतय संहिता इत्यादि) में महान भारत के विज्ञानमय धारा की महान विरासतें छिपी पड़ी हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत के अति प्राचीन द्वादश ज्योतिर्लिंग में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">केदारनाथ</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तराखण्ड के रूद्रप्रयाग जिला के अंतर्गत है। यह </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ईशान</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात पृथ्वी के उत्तर-पूर्व दिशा के समकोणिय क्षेत्र का कोणीय बिंदु है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ अत्यधिक ऊर्जावान </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">विद्युत-चुम्बकीय प्रकाश तरंग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">रूद्र</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की मौजूदगी के कारण </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">रूद्रप्रयाग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">रूद्र</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">संगम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का क्षेत्र कहते हैं। इस पर विचार करें तो </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पशु</span>’ '<span lang="hi" xml:lang="hi">रूद्र</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">एवं </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मरुत</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मरूद</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">अत्यधिक </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जावान विद्युत-चुम्बकीय प्रकाश तरंग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का पर्यायवाची नाम है। ऐसा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">रूद्रो व अग्रि: पशवोअंशव:।</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">४०/०४</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कपिष्ठल संहिता। व </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आग्रेयश्च मारूतश्च पशु।</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">जैमिनि ब्राह्मण २/२३ में आता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत के प्राचीन संहिता ऋग्वेद इत्यादि के अनुसार ज्योतिर्लिंग शब्द दो शब्दों के संयोग से बना है। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ज्योर्ति</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का शाब्दिक अर्थ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकाश</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">लिंग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का शाब्दिक अर्थ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">चिन्ह</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकाश का चिन्ह</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका के सुप्रसिद्ध थ्योरिटिकल फिजिस्ट वैज्ञानिक जिसे अमेरिका की खुफिया एजेंसी सी.आई.ए. ने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">टेलीपैथी</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">एवं </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">क्वांटम टैलीर्पोटेशन</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">पर अनुसंधान हेतु फंडिंग किया था। जिसकी प्रसिद्ध कृति </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्पेश टाइम एंड वियोंड</span>’, '<span lang="hi" xml:lang="hi">डेस्टनी मैट्रिक्स</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">एवं </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सुपर कास्मोस</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने अमेरिका में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">फिजिक्स एण्ड कंशसनेस रिसर्च ग्रुप</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">बनाकर धूम मचा दिया था। जो वस्तुत: भारत के प्राचीन विज्ञान को स्वीकार रूप में लेकर अनुसंधान है। डॉ. जैक के अनुसार </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पदार्थ वस्तुत: गुरूत्वीय खिचांव द्वारा प्रकाश का पदार्थ रूपान्तरण है। प्राइमोर्डियल अर्थात् मूल या आदिम स्तर पर पदार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकाश एवं विस्तीर्ण आकाश के बीच कोई अंतर नहीं है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी क्रम में महाराष्ट्र का लातूर-उस्मानाबाद दक्कन पठार पर स्थित है जो पहले भूकंपीय दृष्टि से सुरक्षित क्षेत्र के अंतर्गत रख गया था। पर ३० सितंबर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">१९९३ के ब्रह्ममुहूर्त काल ३:५४ मिनट पर आये विनाशकारी भूकंप के बाद भूकंपीय दृष्टि से अत्यधिक खतरनाक </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">जोन-।।।</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के अंतर्गत लाया गया। यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि महाराष्ट्र का लातूर उस्मानाबाद द्वादश ज्योतिर्लिंग </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भीमाशंकर</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">एवं </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">त्रयंबकेश्वर</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के त्रिकोणीय बिन्दु पर स्थित है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह तथ्य भी अतिश्योक्ति पूर्ण नहीं है कि भारत के तमाम द्वादश ज्योतिर्लिंग परिक्षेत्र प्रकाश पिण्ड में रूपान्तरित होकर ठोस पठार या पहाड़ के रूप में परिवर्तित क्षेत्र बन गये हैं। वस्तुत: </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पदार्थ का अत्यधिक घनीभूत अवस्था एवं पृथ्वी और सूर्य के बीच </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अंर्त</span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति,</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अंर्त</span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति या सम्बंधों के बदलाव के कारण महत्त गुरुत्वीय खिंचाव अर्थात् आकर्षण या विकर्षण के कारण पृथ्वी के पिण्डों का पृथ्वी के केन्द्र की ओर खिंचाव या पृथ्वी के केन्द्र से बाह्य दिशा की ओर उन्मुख होना ऊर्जा के अत्यधिक नि:सर्जन का कारण बनता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कभी-कभी भीषण भूकंप का रूप धारण कर लेता है। यही नटराज शिव का तांडव है।</span>’</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसा कि प्राचीन संस्कृत संहिताओं के अनुसार </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पशु</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द अत्यधिक ऊर्जावान </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">विद्युत-चुम्बकीय प्रकाश तरंग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को कहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ से प्रकाश या ऊर्जा का नि:सर्जन होता रहता है। पशुपतिनाथ इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. जैक सारफेटी का कथन इसकी पुष्टि करता है कि</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे विचार से क्वांटम भौतिकी एवं माइंड या चेतना का अंर्तसंबंध है। चेतना ही पदार्थ का सृजन कर्ता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय तत्वदर्शन के अनुसार </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">शिव</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के बीच अन्योनाश्रय संबंध है। ये दोनों एक ही हैं या दोनों एक में समाहित है। जहाँ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">द्वैत</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">एकतत्व</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ शक्ति प्रकाश या ऊर्जा का महासागर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">शिव</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा या प्रकाश को चिन्हित या निरूपित करता है। महत्त गुरुत्वीय प्रभाव के कारण प्रकाश या ऊर्जा का केन्द्रिय द्रव्य या पदार्थ की परिणति ही </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">है जोकि सिर्फ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">डायनामिक कंशसनेस</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् चेतना का घनीभूत या महत्तम चेतना का क्षेत्र है। जो भौतिक विज्ञान के शब्दों में मात्र चेतना का केन्द्र बिन्दु है। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">शिव</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">एकीकृत तत्व हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दो दृष्टव्य रूप से दो महत्त चेतना का स्वरूप हैं। प्रथम </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकाशवान</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">है तो दूसरा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आदिम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सृजन और विनाश के क्रम में अंत: रूपान्तरित होता रहता है। यही ब्रह्मांडीय तरंगों की धुन पर नृत्य करता नटराज शिव भी है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कह सकते हैं कि प्राचीन काल में ज्योतिर्लिंग का निर्धारण पूर्ण वैज्ञानिकता से हुआ है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Apr 2015 21:43:27 +0530</pubDate>
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                <title>माँ की तरह त्यागपथ का अनुगामी होता है सेवक</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य प्रद्युम्रजी महाराज</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3034/like-a-mother--a-servant-follows-the-path-of-sacrifice"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/841.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  त्याग</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> से त्याग बढ़ता है तो भोग से भोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान के द्वारा ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञान से अज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म द्वारा धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधर्म द्वारा अधर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैराग्य के द्वारा वैराग्य तो अवैराग्य द्वारा अवैराग्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्ति द्वारा शान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशान्ति द्वारा अशान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिरता द्वारा स्थिरता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चञ्चलता द्वारा चञ्चलता आदि। इस सूची को कितना भी लम्बा किया जा सकता है। यही सूत्र सेवाधर्म पर भी लागू होता है। इसलिए सेवक के ज्ञान में यह बात एकदम बैठ जानी चाहिए कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं सेव्य के द्वारा धन्य हो रहा हूँ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि सेव्य को धन्य कर रहा हूँ।</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">यद्यपि इस सेवा-चक्र के माध्यम से सेव्य सहज रूप से उपकृत होता ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर यह बात सेवक की ओर से सोचने की नहीं है। कहना अनावश्यक है कि यदि सेवक सेव्य से किसी प्रकार की अपेक्षा रखता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे- आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनैतिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनोवैज्ञानिक-तो निश्चित रूप से यही कहा जाएगा कि उस व्यक्ति ने सेवा के अर्थ या महत्त्व को नहीं समझा और उसे सेवा का अन्यतम फल चित्तशुद्धि कभी भी प्राप्त नहीं हो सकेगा। वह तो सेवा के नाम पर मात्र एक व्यापार कर रहा है अर्थात् व्यापार का अर्थ लेन-देन से है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ज</span><span lang="hi" xml:lang="hi">बकि सेवा कोई व्यापार नहीं है। सेवा का अर्थ है देना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बस देना। बदले में कुछ भी न चाहते हुए अपने आप को बाँट देना। जो लोग ऊपर निर्दिष्ट आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनैतिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय या मनोवैज्ञानिक बिन्दुओं को सामने रखकर सेवा करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें वे-वे अभिलषित चीजें कम या ज्यादा मात्रा में अवश्य मिलेंगी या मिलती ही हैं। पर सेवा का फल नहीं मिलेगा। वस्तुत: सेवा का कोई भौतिक (लौकिक) फल होता ही नहीं है। एक दृष्टि से सेवा की यह व्याख्या संगत ही है कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सब प्रकार के बाह्य फलों से पूर्ण रूपेण उदासीन हो जाना ही सेवा का फल है।</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् अकाम हो जाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्काम हो जाना। अनुमान किया जा सकता है- यह स्थिति कब और कैसे प्राप्त होती है या हो सकती है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति का चित्त जब सब प्रकार की कामनाओं-वासनाओं-इच्छाओं से शून्य हो जाता है। यहाँ तक कि मुक्ति में भी उसे किसी प्रकार का राग नहीं होता। केवल उसी स्थिति में कहा जा सकता है कि अमुक व्यक्ति का चित्त सेवा के बदले कुछ नहीं चाहता। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">चाहना</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">एक ऐसी चीज है जिसका सेवा को कलङ्कित करने वाले तत्त्वों में सर्वप्रथम स्थान है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/126.jpg" alt="126" width="800" height="532"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महाराज एक बात और समझाया करते हैं- सेवा के मार्ग में यह भाव भी बाधक है कि अधिक-से-अधिक लोग मुझसे मेरी सेवाएँ ग्रहण करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि आखिर यह भी तो चाहना का ही एक रूप है। सेवक सदा सर्वदा सेवा के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक मात्र सेवा के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समर्पित तो होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर अपने मन से </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">एक</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अनेक</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को निकाल देता है। वह </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकार</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का उपासक होता है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आकार</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का नहीं। सेवक की शब्दावली में से </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कितनी</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कितना</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द समाप्त हो जाता है। दूसरे शब्दों में वह सेवा का आरम्भ करके पीछे मुड़कर नहीं देखता। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा का आरम्भ तो है पर अन्त नहीं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">महाराज के इन शब्दों का यही गम्भीर आशय है। यह हमारे अन्दर क्रियाशील </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">ही है जो गिनती करना चाहता है और गिनती जब बढ़ती जाती है तो उसका हर्ष भी बढ़ता जाता है। गिनती कम होने लगती है तो मायूस होने लगता है। सेवा तो पूर्ण रूप से </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">निरहम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्त का एक अत्युत्कृष्ट धर्म है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो प्रशान्त सागर की तरह है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कि न कभी बढ़ता है और न घटता है। महाभारत के उज्ज्वल पात्र वार्ष्णेय कृष्ण की तरह विद्वानों के पात्र साफ  करने में भी इसे उतनी ही तृप्ति मिलती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितनी संसार के पूज्यतम व्यक्ति के रूप में अर्घ्य-पूजा ग्रहण करते समय। सेवारत चित्त उपलब्धि-परायण नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि रस व शान्ति परायण होता है। महाराज इस सन्दर्भ में आचार्य शंकर के एक वाक्य को बहुश: उद्धृत किया करते हैं- चित्तस्य शुद्धये कर्म। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">       इसीलिए तो सेवक न थकता है न ऊबता है क्योंकि उसके आधार में सदा रस व शान्ति विराजमान होती है। शान्ति रूपी रंगमंच पर खड़े होकर ही सेवक को अपना सम्पूर्ण अभिनय करना होता है। चूंकि वह बड़ी-से-बड़ी रूमानी उपलब्धि के लिए भी एक क्षण के लिए उत्सुक नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके पीछे भागनेे की तो बात ही क्या</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए सेवक के शान्त-चित्त रूपी राज्य में थकावट या ऊब (</span>Boredom<span lang="hi" xml:lang="hi">) के लिए कोई स्थान ही नहीं बच पाता। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महाराज सेवक की तुलना में सुधारक को बिठाकर बड़ा ही रोचक वर्णन किया करते हैं। उनका कहना है- यों तो सेवक का लक्ष्य सेवा और सुधारक का सुधार है। इस प्रकार ऊपर से देखने में तो इन दोनों में कोई विशेष अन्तर नहीं दिखाई देता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर इनके स्वरूप और क्रिया-कलाप का गम्भीर अध्ययन करने से दोनों की केन्द्रीय श्रद्धा का स्पष्ट रूप से पता चल जाता है। महाराज कहते हैं- वस्तुत: </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सुधारक</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द भी अपने मूल रूप में एक विशेष अर्थ का बोधक है। इसका अर्थ है- जीवन का बांँटना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर आजकल कोई भी वाक्-पटु व्यक्ति इस उपाधि से विभूषित कर दिया जाता है। वह भी अपने को वैसा ही समझने लग जाता है। सेवक के उत्प्रेरक हैं- प्रेम-करुणा-सहानुभूति-सहयोग रूप स्वातीत भाव और सुधारक का उत्प्रेरक मूलत: उसका </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">रूप स्वाग्रही भाव ही होता है। बस इसी आधार पर इन दोनों की दो धाराएँ हो जाती हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुधारक को बना-बनाया अच्छे से अच्छा मंच चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ उसका भाषण सुनने वाले श्रोताओं का जमघट लगा हुआ हो। उसके जयकारे लगाने वाली श्रद्धालुओं की एक टोली सदा उसके साथ हो। उसके द्वारा किये गए सुधार-कार्यों का ब्यौरा सुनाने के लिए सुललित व अतिशयोक्ति-पूर्ण भाषा में स्थान-स्थान पर आयोजित की गई जन सभाओं में अभिनन्दन-पत्र पढ़े जा रहे हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विविध प्रकार के फूलों से बनाई गई मालाओं से उसका स्वागत किया जा रहा हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके कार्य के प्रभाव की सूचना बीच-बीच में पुन:-पुन: उसे दी जा रही हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोगों के मध्य उसके श्रद्धालुओं द्वारा रुपयों से उसे तौला जा रहा हो। सुधारक की ये कुछ ऐसी मूलभूत आवश्यकताएँ हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनके बलबूते पर वह अपने सुधार कार्य को गति देता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ सेवक को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकार</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">से प्रेम होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ सुधारक आकार का (गिनती का) उपासक होता है। जब उसे सुनाया जाता है कि अमुक स्थान पर आपके आन्दोलन का बड़ा व्यापक प्रभाव हो रहा है तो उसका चेहरा खुशियों से भर जाता है। इसके विपरीत सुनने पर मायूस हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और कभी-कभी तो यह मायूसी हताशा व निराशा के चरम बिन्दु तक पहुँच जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके परिणाम स्वरूप जनता को कोसना प्रारम्भ कर देता है कि बड़ा खराब जमाना आ गया है। लोग अपने स्वार्थों में इतने डूब गए हैं कि ये किसी की बात सुनने के लिए तैयार ही नहीं हैं। कई बार तो यहाँ तक कह बैठता है कि मैंने इस दुनिया को देख लिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह भला करने लायक है ही नहीं। देखो! मैंने अपना सारा समय व शक्ति इस संसार की भलाई करने के लिए ही लगाई हुई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी ये लोग कितने मूर्ख हैं कि थोड़ा-सा भी नहीं समझते। इस प्रकार हमारे इस तथाकथित सुधारक का चेहरा ऊब व थकावट से मुर्झाया हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस संसार को क्रूरता से भरा हुआ देखने लगता है और प्रतिक्रिया में शिकायतों का ढेर उगलता रहता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि इस तथ्य को वस्तु परक ढंग से (</span>Objective<span lang="hi" xml:lang="hi">) देखा जाए कि सुधारक की ऐसी निषेधात्मक भावों वाली प्रतिक्रियाएँ क्यों होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि सेवक में ये सब ऊपर वर्णित भाव एक क्षण के लिए भी नहीं आते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो पता चलेगा कि सुधारक स्वकेन्द्रित होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवक वैसा नहीं होता। इसलिए अपने को सुधारक मानने वाला व्यक्ति संसार के लिए अपना सब कुछ लगाकर भी अपने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्व</span>’ (Ego<span lang="hi" xml:lang="hi">) को</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">अहम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को ही बढ़ाता है। इसीलिए अपने कार्य के बदले में जनता से स्वाभिलषित </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्युत्तर</span>’ (Response<span lang="hi" xml:lang="hi">) की अपेक्षा करता है। उसके कारण हताशा-निराशा-थकावट-ऊब का चक्र चालू हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके परिणाम स्वरूप बाहर भी सुधारक के द्वारा इन्हीं चीजों का फैलाव होता रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेशक वह अपने मन में कितना भी खुश होता रहे। सेवक की ऐसी कोई प्रत्याशा न होने से वह सदा तृप्त रहता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सेवक अपने सेव्य को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">नारायण</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का रूप मानता है। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">जनता-जनार्दन</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे शब्द उसके मन में सदा गूँजते रहते हैं। वह सदा अपने को भरा-पूरा समझने के कारण शान्त रहता है। यह </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भरा-पूरा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">उस अभिमानात्मक ढंग का नहीं है जो वस्तुओं की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रुपये-पैसे की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जमीन-जायजाद की या धन-वैभव की अपार वृद्धि से तथा जन समर्थन के द्वारा प्राप्त होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह वह आन्तरिक परिपूर्णता है जो संसार के समस्त शांत रूपों से कुछ भी उपलब्ध करने की चाह के एकदम निवृत्त होने से प्राप्त होती है। इस जगत् के नाम-रूप सब एक समान दिखायी देने लगते हैं। एकमेव देव की लीला के रूप में और उस </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">समदृष्टि</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">से जो सदा शान्त अविचल स्थिति प्राप्त होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बस वही होती है सेवक की आधार भित्ति। उसका एक ही मूल मन्त्र होता है- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कोई प्यासा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे पानी पिलाना</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। वह उन बच्चों की तरह किसी के साथ सेवा के नाम पर जबरदस्ती नहीं करता जो कि उन्होंने अपनी अध्यापिका की प्रेरणा पर एक बुढ़िया के साथ की थी। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कहानी यों है- एक अध्यापिका ने अपनी कक्षा में एक दिन बच्चों को प्रेरणा देते हुए कहा कि हमें प्रतिदिन निष्काम भाव से कोई एक सेवा-कार्य अवश्य करना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे किसी भूखे को भोजन खिलाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी प्यासे को पानी पिलाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी बूढ़े व्यक्ति को सड़क पार कराना इत्यादि। अध्यापिका ने कहा- कल मैं पूछूँगी तुममें से किसने क्या-क्या किया</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">अगले दिन मैम ने पूछना आरम्भ किया- हाँ! राम पहले तुम बताओ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुमने कौन- सा एक सेवा-कार्य किया</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">राम ने कहा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैम! एक बुढ़िया सड़क के इस पार खड़ी थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसको दूसरी पार पहुँचाया।</span>‘ <span lang="hi" xml:lang="hi">मैम ने उसको शाबाशी देते हुए कहा- बहुत अच्छा। अब श्याम की बारी आयी। मैम ने कहा- श्याम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुम बताओ तुमने क्या किया</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">श्याम ने भी कहा-मैम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैंने भी एक बुढ़िया को सड़क पार करायी। मैम ने उसको भी धन्यवाद किया । अब मैम मोहन से पूछने लगी कि मोहन तुम भी बताओ। मोहन ने भी कहा कि मैम ! मैंने भी एक बुढ़िया को सड़क पार करायी। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब मैम भड़क उठीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और कहने लगीं कि तुम सबको इतनी बुढ़ियाँ कहाँ से मिल गयीं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चों ने कहा- मैम। बुढ़िया तो एक ही थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर वह सड़क पार करना ही नहीं चाह रही थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए हम तीनों ने मिलकर प्रयत्न पूर्वक मुश्किल से परले पार पहुँचाया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तुत: सेवक इन बच्चों की तरह सेवा के नाम पर जोर-जबरदस्ती नहीं करता। कारण उसे किसी के समक्ष अपनी सेवा का ब्यौरा सुनाना नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि वह सदा ही अणु में महत् के दर्शन करता हुआ आत्मतृप्त रहता है। अन्दर से सुधारक की तरह खोखला नहीं होता कि उस खालीपन को भरने के लिए दूसरों का मुँह ताकना पड़े और किसी के समक्ष अपने कार्यों का विवरण सुनाना पड़े। एक शिशु के लिए समर्पित माँ को जैसे यह सब किसी को दिखाने की या कहने की एक क्षण के लिए भी आवश्यकता नहीं होती कि देखो! मैं बच्चे के लिए कितना कुछ त्याग कर रही हूँ। सेवक के साथ भी ठीक यही दृष्टान्त प्रयोज्य है। तो आइये हम भी सेवा के मर्म से जुड़ें और जीवन को महान् बनायें। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Apr 2015 21:41:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आचार्यकुलम शिक्षा विस्तार शिविर में देश भर से पधारे 700 संकल्पकर्ता</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">14 फरवरी:</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज एवं ऋषिकल्प श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के आशीर्वाद से अभिसिंचित एवं पोषित आधुनिक एवं वैदिक शिक्षण के समन्वय का अभिनव शिक्षण केंद्र आचार्यकुलम की शिक्षा विस्तार योजना हेतु अपना संसाधन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिभा संकल्पित करने वाले कार्यकर्ताओं के दो दिवसीय प्रशिक्षण शिविर में देशभर से लगभग </span>700<span lang="hi" xml:lang="hi"> संकल्पकर्ताओं ने भाग लिया। </span>14<span lang="hi" xml:lang="hi"> व </span>15<span lang="hi" xml:lang="hi"> फरवरी के इन दो दिनों में कार्यकताओं को आचार्यकुलम शिक्षा विस्तार से संबंधित विशिष्ट रीति-नीति समझाई गई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके आधार पर ये प्रशिक्षित परिजन पतंजलि योगपीठ के मार्गदर्शन में आचार्यकुलम शिक्षा योजना का दायित्व विस्तार करेंगे। </span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3035/700-resolvers-from-all-over-the-country-came-to-acharyakulam-education-extension-camp"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/swami-ji.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">14 फरवरी:</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज एवं ऋषिकल्प श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के आशीर्वाद से अभिसिंचित एवं पोषित आधुनिक एवं वैदिक शिक्षण के समन्वय का अभिनव शिक्षण केंद्र आचार्यकुलम की शिक्षा विस्तार योजना हेतु अपना संसाधन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिभा संकल्पित करने वाले कार्यकर्ताओं के दो दिवसीय प्रशिक्षण शिविर में देशभर से लगभग </span>700<span lang="hi" xml:lang="hi"> संकल्पकर्ताओं ने भाग लिया। </span>14<span lang="hi" xml:lang="hi"> व </span>15<span lang="hi" xml:lang="hi"> फरवरी के इन दो दिनों में कार्यकताओं को आचार्यकुलम शिक्षा विस्तार से संबंधित विशिष्ट रीति-नीति समझाई गई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके आधार पर ये प्रशिक्षित परिजन पतंजलि योगपीठ के मार्गदर्शन में आचार्यकुलम शिक्षा योजना का दायित्व विस्तार करेंगे। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शिविर के क्रम में ही </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय अध्यापक परिषद बंगलौर</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वारा आयोजित </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अखिल भारतीय प्रतिभा खोज परीक्षा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">में चयनित एवं पुरस्कृत आचार्यकुलम के छात्र-छात्राओं को पूज्य स्वामी जी महाराज ने मंच पर बुलाकर आशीर्वाद देकर सम्मानित किया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञातव्य कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अखिल भारतीय प्रतिभा खोज परीक्षा</span>’-2014<span lang="hi" xml:lang="hi"> में आचार्यकुलम के कक्षा-</span>07<span lang="hi" xml:lang="hi"> के विद्यार्थी युवराज आदित्य को अखिल भारतीय स्तर पर प्रथम स्थान प्राप्त करने पर आयोजक बोर्ड की ओर से भी स्वर्ण पदक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक लेप्टाप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ट्राफी के साथ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">गोल्डप टेलेंट अवार्ड</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदान किया गया है। इसके अतिरिक्त अरमान गुप्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्यांशु मोहन व सृजन शाही को क्रमश: कक्षा </span>5- 6, 7<span lang="hi" xml:lang="hi"> के लिए स्वर्ण पदक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि कक्षा </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> के ही एम. ऋषिवरुण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रथमेश भाउसाहब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सौरभ कुमार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सन्नी कुमार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृतम पटेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्कर्ष व कक्षा सात के अंकित कुमार तथा हर्षवर्धन को उत्कृष्टता प्रमाणपत्र से नवाजा गया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य स्वामी जी महाराज: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्यकुलम एक विश्व स्तरीय शिक्षण योजना का उदीयमान संस्थान है तथा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय अध्यापक परिषद बंगलौर</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वारा आयोजित </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अखिल भारतीय प्रतिभा खोज परीक्षा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">में चयनित एवं पुरस्कृत आचार्यकुलम के विद्यार्थी भविष्य के प्रतिदर्श हैं। आने वाले वर्षों में आचार्यकुलम अपने अभिनव शैक्षिक प्रयोग के कारण भारत ही नहीं विश्वस्तरीय शिक्षा योजना देने वाला केंद्र बनकर उभरेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा विश्वास है।</span>‘</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्था समाचार</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Apr 2015 21:39:34 +0530</pubDate>
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