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                <title>मई - योग संदेश</title>
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                <description>मई RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...</title>
                                    <description><![CDATA[<h4 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>साधक का केंद्र व परिधि</strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्र</span><span lang="hi" xml:lang="hi">द्धेय गुरुदेव ने प्रस्तुत पुस्तक साधक-पाथेय में हजारों-हजारों प्रकार के साधकों को उनके अन्तिम गन्तव्य का संकेत किया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेद व अपने अनुभवों से हम बहुत कुछ सीखते हैं। कई बार इन सब के बीच में साधक भ्रमित सा हो जाता है कि मेरे लिए साधना का पूर्ण सत्य पथ क्या है</span>?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस संदर्भ में सभी महापुरुषों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन्मुक्त योगियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैदिक ऋषियों एवं अपने अनुभव से मैं तो इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि प्रत्येक मनुष्य की आत्मा में सत्य-असत्य को जानने का एक सामान्य ज्ञान भागवत् कृपा</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3049/shashwwat-pragya-may-2015"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/132.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>साधक का केंद्र व परिधि</strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्र</span><span lang="hi" xml:lang="hi">द्धेय गुरुदेव ने प्रस्तुत पुस्तक साधक-पाथेय में हजारों-हजारों प्रकार के साधकों को उनके अन्तिम गन्तव्य का संकेत किया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेद व अपने अनुभवों से हम बहुत कुछ सीखते हैं। कई बार इन सब के बीच में साधक भ्रमित सा हो जाता है कि मेरे लिए साधना का पूर्ण सत्य पथ क्या है</span>?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस संदर्भ में सभी महापुरुषों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन्मुक्त योगियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैदिक ऋषियों एवं अपने अनुभव से मैं तो इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि प्रत्येक मनुष्य की आत्मा में सत्य-असत्य को जानने का एक सामान्य ज्ञान भागवत् कृपा से अवश्य होता ही है। इस ज्ञान के आधार पर व्यक्ति यदि यह निर्णय पूर्ण श्रद्धा व अटूट विश्वास के साथ स्वीकार कर ले कि मुझे आत्मा में परमात्मा की जो प्रेरणा-आदेश-निर्देश-संदेश या आवाज-पुकार उठती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका एक बार भी अनादर नहीं करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे अनसुना नहीं करना और वैसे ही मुझे पूर्ण शुद्धता के साथ जीवन को जीना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इसी से उसका निश्चित रूप से पूरा उद्धार हो जायेगा। पूरी अध्यात्म विद्या का निचोड़ दो शब्दों में कहें तो </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आत्म प्रेरणा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आत्म प्रेरणा के अनुरूप पूर्ण शुद्ध आचरण</span><span lang="hi" xml:lang="hi">’</span><span lang="hi" xml:lang="hi">। आत्म प्रेरणा केन्द्र है तथा आत्म प्रेरणा के अनुकूल पूर्ण शुद्ध आचरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म या पुरुषार्थ यह परिधि है। गुरुजी के शब्दों में यही तंत की बात है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शेष तो इसी का विस्तार है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब परमात्मा पूर्ण शुद्ध स्वरूप है तो आत्मा में परमात्मा की प्रेरणा भी शुद्ध ही होगी। मस्तिष्क में भगवान् का ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय में भगवान् का प्रेम तथा हमारे सम्पूर्ण अस्तित्व में कर्म या पुरुषार्थ का सम्पूर्ण सामर्थ्य भी शुद्धतम रूप में ही उतरेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् की शुद्ध प्रेरणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्ध ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्ध प्रेम एवं शुद्ध शक्ति सामर्थ्य से युक्त होकर जब हम जीवन जियेंगे तो हमारा जीवन भागवत जीवन या दिव्य जीवन ही होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं होना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्र एवं वैदिक ऋषि इसी सत्य को विस्तार से हमें बताते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे कि हमें कहीं भी किसी भी प्रकार की भ्रान्ति न रहे।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शाश्वत प्रज्ञा</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>मई</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 May 2015 21:59:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भगवान् का पथ</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3050/path-of-god"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/513.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  श्र</span><span lang="hi" xml:lang="hi">द्धेय गुरुदेव ने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">साधक पाथेय’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में साधक के जीवन में पल-पल व पग-पग में आने वाले उतार-चढ़ाव को अनुभूति के आधार पर शब्दों में अभिव्यक्ति दी है। साधक के जीवन में ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इच्छा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अकाम एवं चिन्मय स्थिति के आरोहण व अवरोहण को साक्षी होकर देखा है और इनके निरन्तर परिष्कार की आनुभूतिक प्रक्रिया बताकर साधकों पर बहुत बड़ा अनुग्रह किया है। हमारे जीवन में ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिथ्याज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अल्पज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रान्तज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्धज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तत्त्वज्ञान एवं शुद्धतम स्थिर ज्ञान की स्थिति में क्या-क्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैसे-कैसे घटित होता है और प्रतिक्षण हमारे आन्तरिक जीवन में चल रहे इस प्रकाश व अन्धकार के संघर्ष में हम शुद्धतम ज्ञान को स्थिर बनाकर अपने भीतर के समस्त अशुभ से मुक्त होकर पूर्ण शुद्ध हृदय व पूर्ण शुद्ध आचरण से अपने जीवन को दिव्य कैसे बनाएं और चिन्मय होकर कैसे जिएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसकी प्रक्रिया को बहुत ही सरल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहज व प्रामाणिक रूप से बताया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक दृष्टि-सम्पन्न साधक को आत्मा-परमात्मा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति-विकृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुभ-अशुभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य-असत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म-अधर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यज्ञ-योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म-कर्मण्यता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कामनापूर्ति-कामनामुक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म के संस्कार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वासनाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्लेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुख-दु:ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुख व दु:ख का हेतु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वथा दु:ख मुक्ति व उसके उपाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यम-नियम और उनके फल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिपक्ष भावना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्याहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैत्री</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुदिता भावनाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रियायोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञानयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भक्तियोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दु:ख-जन्म-प्रवृत्ति-दोष-मिथ्याज्ञान से मुक्त होकर अपवर्ग की प्राप्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सकाम-निष्काम व आप्तकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु शास्त्र व वेद ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्बन्ध व समाधान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधना-साधन-साध्य विवेक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् की विभूति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रियों व अन्त:करण तथा आत्मा की पृथक्-पृथक् मूल माँगें एवं अध्यात्म के मूल तत्त्व शाश्वत प्रेम एवं एकत्व आदि शतश: सहस्रश: सत्त्व कैसे साफ-साफ दिखने लगते हैं और साधक इनके सम्यक् विवेक से कैसे विवेक ख्याति को उपलब्ध होता है और अन्तत: अपने क्लेशों को तनु व दग्ध-बीज करते हुए प्रथम एक सच्चा साधक व अन्त में सिद्ध हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">साधक व सिद्ध की इस साधना की यात्रा की घनघोर जटिलताओं से लेकर अध्यात्मिक जीवन की पूर्ण सहज अवस्था का जीवन वर्णन करके श्रद्धेय गुरुदेव ने हमारे जीवन में सत्य व अनन्त के द्वार खोल दिए हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि गुरुदेव द्वारा अत्यन्त विनम्र भाव से की गई इस आध्यात्मिक सेवा से भगवान् के पथ पर चलने वाले अनन्त के साधकों का निश्चित ही पूरा उपकार होगा। इसी प्रकार सम्बंध केन्द्रित जीवन को आनंदमय बनाने के दिव्य सूत्र भी वे देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो निम्रलिखित हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सम्बन्ध केन्द्रित आनन्दमय जीवन:</span></strong></span></h5>
<ol>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृतज्ञता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्त्तव्य परायणता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वधर्म निष्ठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मर्यादा व विनय शीलता ये गौरवपूर्ण सम्बन्ध व सुख वर्धक जीवन जीने वालों के लिए सात सत्य हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सम्बन्धों में संवाद के दौरान हठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुराग्रह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अति आग्रह एवं अहं को चोट करने वाली बातों या कठोर भाषा इन चार दोषों से बचना चाहिए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सम्बन्ध व सम्पत्ति में सम्बन्धों को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पारिवारिक व आध्यात्मिक सम्बन्धों को दिव्यता के साथ निभाना चाहिए। सम्बन्धों में पलायन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपेक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मौन एवं स्वजनों को उनके प्रारब्ध पर अकेले छोड़ देना इन चार दोषों से बचकर अपने आत्मीय स्वजनों को प्रेम व एकत्व आदि दिव्य भावों के द्वारा अशुभ से बचाकर ऊपर उठाना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें आगे बढ़ाना चाहिए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा पूरा जीवन या भौतिक अस्तित्व सम्बन्धों की परस्परता पर टिका हुआ है। अत: उभय सुख व शान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उभय सहमति व सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उभय समृद्धि व सुरक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उभय सफलता व समादर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उभय एकत्व व कृतज्ञता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उभय कर्त्तव्य व विनय शीलता आदि सिद्धान्तों को आचरण या व्यवहार में लाने पर ही हम सम्बन्ध पूर्वक व सुख पूर्वक जी सकते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे सम्बन्धों की एक अन्तरङ्ग परिधि होती है और एक बाह्य परिधि। बाह्य परिधि में जटिलताएं अधिक कष्टप्रद नहीं होती अपितु वहाँ विकल्प</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिष्करण शुद्धिकरण व सशक्ति करण की अधिक संभावना रहती है। अत: समाधान अपेक्षा कृत सरल व सहज रहता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"> अन्तङ्ग या आन्तरिक सम्बन्धों में बहुत अधिक विवेक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विनय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदन शीलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धैर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षमा एवं अत्यन्त प्रीति पूर्वक व्यवहार या आचरण करते हुए दिव्य सम्बन्ध पूर्वक जीना होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन में हम जो भी निर्णय लेते हैं चाहे किसी भी सन्दर्भ में हों या तो वे ज्ञान प्रधान होते हैं या भाव प्रधान। सम्बन्धों में हमारे अधिकांश निर्णय ज्ञान पूर्वक भाव प्रधान होते हैं अर्थात् ज्ञान पूर्वक भाव प्रधान निर्णयों से ही सम्बन्ध में हम निरन्तर प्रेम व सुख पूर्वक जी सकते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">साधक व सात्त्विक व्यक्ति को अपने व्यावहारिक जीवन में गुरु व भगवान् के सम्बन्ध को सर्वोच्च स्थान पर रखना चाहिए। गुरु-आज्ञा व वेदाज्ञा के अनुरूप आचरण करते हुए उनके प्रियाचरण द्वारा अपने आत्म सम्बन्ध को दृढ़ करना चाहिए। यदि हमारे पारिवारिक सम्बन्ध हमारी आत्मोन्नति या जीवन की पूर्णता की प्राप्ति अर्थात् श्रेयमार्ग में बाधा बन रहे हों तो रक्त सम्बन्ध से हमें आत्म सम्बन्ध को अधिक महत्त्व देना चाहिए और विवेक वैराग्य पूर्वक गुरुसत्ता व भागवत सत्ता के साथ अपना अखण्ड सम्बन्ध जोड़ना चाहिए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">रक्त सम्बन्ध से बड़ा होता है- आत्म सम्बन्ध। रक्त सम्बन्धों में अज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिथ्याज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अविवेकपूर्ण आचरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहंकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिक्रिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोध व प्रतिशोध आदि की सम्भावना बनी रहती है या अधिकांश सम्बन्धों में आंशिक या पूर्ण रूप से सम्बन्धों में टकराव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घरेलू झगड़ा या हिंसा आदि देखने को मिलती हैं।</span></h5>
</li>
</ol>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   आत्मसम्बन्ध ईश्वरीय प्रेरणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्ध ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्ध प्रेम व शुद्ध-आचरण या शुद्ध-पुरुषार्थ पर केन्द्रित होते हैं। अत: आत्म-सम्बन्धों में दिव्यता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत्यन्त प्रेम व दिव्य सुख की अनुभूति होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">11.  हमारा सम्बन्ध मुख्यत: दो तरह का होता है एक व्यष्टिगत एवं दूसरा समष्टिगत। समष्टि माने सह-अस्तित्व। मनुष्य एवं मनुष्येत्तर सम्पूर्ण जड़-चेतन (जलचर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नभचर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थलचर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूक्ष्म व स्थूल चेतन जीव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वृक्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वनस्पतियाँ एवं पृथिवी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्रि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वायु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आकाश आदि) सृष्टि के प्रति विवेक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय व कृतज्ञता पूर्वक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मातृवत्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मवत्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्ववत् व एकत्व का व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचरण या पुरुषार्थ करते हुए दिव्य सम्बन्ध पूर्वक अर्थात् सुख पूर्वक जीना। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>मई</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 May 2015 21:58:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>यकृत, प्लीहा, उदर एवं त्वचा रोगों में लाभकारी 'ज्वार'</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य </span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">बालकृष्ण</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3051/nakuli-is-a-destroyer-of-snake-venom-and-an-excellent-anti-abortion-agent"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/493.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक नाम   :     </span>Aristolochia indica Linn.</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कुलनाम        :     </span>Aristolochiaceae</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अंग्रेजी नाम     :     </span>Indian birthwort</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृत         :     नाकुली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गंधनाकुली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महायोगेश्वरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गरलिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्कमूल</span>;</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हिन्दी          :     ईशरमूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वरमूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसरॉल</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गुजराती        :     निर्वेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सपसन</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कन्नड़         :     सन्नजली</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तेलुग          :     दुआगोवेला</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बंगाली         :     ईशरमूल</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नेपाली         :     ईश्वरमूल</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मराठी          :     सपसण</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मलयालम       :     ईश्वरामूला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करलायाम</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">फारसी         :     जरवन्दे हिन्दी</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय आयुर्वेद में औषधि वह जो रोगी में सतत् आरोग्य का विश्वास पैदा कर उसे रोग से निजात दिलाये। चूंकि शरीर का सीधा संबंध प्रकृति से है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: रोग भी प्रकृतिगत असंतुलन से ही पैदा होते हैं। ऐसे में औषधि प्रकृतिस्थ तत्वों से युक्त होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त यदि दवा के नाम पर किन्हीं रासायनिक तत्वों का प्रयोग शरीर पर करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो तत्काल न सही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी न कभी तो वह शरीर के साथ विद्रोही तेवर दिखायेगा ही। अक्षय आरोग्य के लिए आवश्यक है कि शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक रोग में प्रकृति के बीच से ही औषधि की खोज करें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">औषधि के नाम पर परमात्मा के इस शरीर रूपी मंदिर के साथ हो रहे अत्याचार को समाप्त करने के लिए ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वनौषधियों पर पतंजलि आयुर्वेद द्वारा गहन अनुसंधान के पश्चात् रोग की प्रकृति के अनुसार उनके अनुपान का निर्धारण भी किया गया। उन्हीं निष्कर्षों के अनुरूप </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वनौषधियों में स्वास्थ्य</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रृंखला प्रस्तुत है।  परिजन इन प्रयोगों को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद जड़ी-बूटी रहस्य</span><span lang="hi" xml:lang="hi">’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पुस्तक में विस्तार से पढ़ सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे अपनाकर हर कोई अक्षुण्य आरोग्य का स्वामी बन सकता है। इस अंक में प्रस्तुत है वनौषधि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">नाकुली</span>’...</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बाह्य स्वरूप:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नाकुली अरोमश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुवर्षायु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">झाड़ीनुमा वल्लरी है। इसके काण्ड मोटे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिकने तथा लम्बाई में धारियों से युक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कपूरवत गन्धयुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरिताभ-श्वेत वर्ण के होते हैं। पत्र सरल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकांतर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लघु वृंतयुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विभिन्न आकार के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">10 सेमी लम्बे एवं 1.2-1.8 सेमी चौड़े कदाचित् 10-12.5 सेमी लम्बे एवं 7.5 सेमी चौड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरित वर्णीय अग्र भाग पर नुकीले तथा पांच शिरा युक्त होते हैं। जबकि पुष्प हरिताभ-श्वेत अथवा हल्के बैंगनी वर्ण के होते हैं। फल गोलाकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">षट्कोणीय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">3.8-5 सेमी लम्बे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बीज अनेक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्रिकोणीय अथवा त्रिकोणाकार-अण्डाकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीक्ष्णाग्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चपटे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पक्षवत होते हैं। इसकी मूल गाँठदार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शाखा युक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हल्के बादामी रंग की तथा लम्बी होती है। नाकुली का पुष्पकाल एवं फलकाल जुलाई-अगस्त से अगस्त-फरवरी तक होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नाकुली अरोमश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुवर्षायु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">झाड़ीनुमा वल्लरी अथवा लता है। इसके काण्ड मोटे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिकने तथा लम्बाई में धारियों से युक्त</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">कपूरवत गन्धयुक्त </span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरिताभ-श्वेत वर्ण के होते हैं। इसके पत्र सरल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकांतर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लघु वृंतयुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विभिन्न आकार के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">१० सेमी लम्बे एवं १.२-१.८ सेमी चौड़े कदाचित् १०-१२.५ सेमी लम्बे एवं ७.५ सेमी चौड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरित वर्णीय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्र भाग पर नुकीले तथा पांच शिरा युक्त  होते हैं। इसके पुष्प हरिताभ-श्वेत अथवा हल्के बैंगनी वर्ण के होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ना कुली साधारणतया नेपाल की निचली पहाड़ियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बांग्लादेश एवं श्रीलंका में लगभग 900 मी. की ऊँचाई पर पायी जाती है। जबकि भारत में यह मुख्यत: बंगाल से दक्कन प्रायद्वीप एवं कोंकण से दक्षिण की ओर मिलती है। भारत में कई स्थानों पर इसके पत्र एवं मूलों का प्रयोग विशेष रूप से सर्पदंश की चिकित्सा में किया जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">औषधीय प्रयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मात्रा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विधि:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">1.   अर्धावभेदक-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> सर्पगन्धा तथा नाकुली मूल को समान मात्रा में लेकर चूर्ण कर लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">1-2 ग्राम चूर्ण को दो से तीन सप्ताह तक सेवन करें आधाशीशी सिरदर्द में लाभ मिलेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मुख रोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  <strong>दन्तशूल-</strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong> </strong>नाकुली मूल को चबाने से दंत वेदना का शमन होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कण्ठ रोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> <strong> गण्डमाला- </strong>गण्डमाला की अपक्व ग्रन्थियों पर स्वेदन करके नाकुली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नमक तथा सोंठ को पानी में पीसकर लेप करने से लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उदर रोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">1.   <strong> उदरविकार-</strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong> </strong>3 भाग नाकुली तथा 2 भाग काली मिर्च को पीसकर उदर पर लगाने से पेट के अनेक विकारों में लाभ मिलता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">2.    <strong>विसूचिका-</strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"> नाकुली पत्र स्वरस का पेट पर लेप करने से विसूचिका मिटती है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">3.   <strong>जलोदर-</strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"> इसके रोगी को ५-10 मिली नाकुली पत्र स्वरस पिलाने से जलोदर में लाभ मिलता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अस्थिसंधि रोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   <strong>संधिशोथ-</strong> नाकुली मूल पीसकर लगायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संधिशोथ का शमन होगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचा रोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">1.  श्वेतकुष्ठ-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> 1-2 ग्राम शुष्क मूल चूर्ण में मधु मिलाकर प्रयोग करने से श्वेतकुष्ठ में लाभ मिलता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">2.   स्फोट-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> तीन भाग नाकुली काण्डत्वक् तथा एक भाग हरिद्रा को पीसें और आपस में मिला लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्यूर्जता के कारण उत्पन्न फफोलों पर लेप करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवश्य लाभ मिलेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वशरीर रोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">1.   <strong>एकाघौशोफ-</strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"> लाल पुनर्नवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कनेर पत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पलाश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नाकुली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शालपर्णी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पृश्निपर्णी इन द्रव्यों को पीसकर गुनगुना करके लेप करने से किसी भी प्रकार की सूजन में लाभ होगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">2.   <strong>विषम-ज्वर-</strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"> 1 ग्राम नाकुली मूल चूर्ण को जल के साथ सेवन करने से विषम ज्वर में लाभ होता है।  </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">3.  <strong>रक्तभाराधिक्य-</strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"> 1 से 2 ग्राम नाकुली मूल चूर्ण में मधु मिलाकर दो से तीन सप्ताह तक प्रयोग करने से रक्तभाराधिक्य में लाभ मिलेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विष चिकित्सा:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">1.   <strong>सर्प-विष-</strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong> </strong>सर्पदंश के पश्चात् तत्काल रक्तमोक्षण द्वारा विष-युक्त रक्त निकाल कर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">गुंजा तथा नाकुली</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की जड़ पीस कर उस स्थान पर लेप करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राहत मिलेगी। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">2.   नाकुली मूल तथा 7 काली मिर्च</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> को पीसकर दंश स्थान पर लगाने से भी दंशजन्य विषाक्त प्रभावों का शमन होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">3.   <strong>वृश्चिक (बिच्छू) विष-</strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong> </strong>नाकुली की जड़ को पीसकर दंश स्थान पर लगाने से वेदना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दाह आदि विषाक्त प्रभावों का शमन होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">4.   <strong>सर्पविष-</strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"> 3 नाकुली पत्र और 7 काली मिर्च आपस में पीसकर पिलाने से सर्पदंश जन्य दाह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेदना आदि विषाक्त प्रभावों का शमन होता है। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>वनौषधियों में स्वास्थ्य</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>मई</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3051/nakuli-is-a-destroyer-of-snake-venom-and-an-excellent-anti-abortion-agent</link>
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                <pubDate>Fri, 01 May 2015 21:56:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गुणकारी तरकारी ब्रॉकली</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. नागेन्द्र कु मार नीरज</span></strong><strong><span>, </span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">निर्देशक-योगग्राम</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3052/healthy-vegetable-broccoli"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/19.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> ब्रॉकली क्रुसीफेरी यानि ब्रेसीकेसी परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रेसिका जिन्स (</span>Genus<span lang="hi" xml:lang="hi">) ओलेकेसिया विशिष्ट एपिथेट (</span>Specific Epithet<span lang="hi" xml:lang="hi">) इटालिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बॉट्राइटिस ग्रुप का आरोग्य वर्द्धक क्रान्तिकारी सदस्य है। इसकी कई किस्में हैं जिसमें इटालिकाङ्ग बॉट्राइटिस (</span>Italica X  Botrytis Group<span lang="hi" xml:lang="hi">) का ब्रोकोली रेब रेपिनि (</span>Broccolirabe-Rapini<span lang="hi" xml:lang="hi">) मुख्य सब्जी सदस्य है जिनका उपयोग किसी न किसी जगह किया जाता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रॉकली रोग एवं रोगाणुओं के संहारक क्षमता को देखते हुए विश्व के अनेक प्रयोगशालाओं के वैज्ञानिकों का प्रिय अनुसंधान सब्जी बन गया है। ब्रॉकली के रेशे-रेशे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डण्ठल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके फूलों एवं पत्तियों में रोगाणुओं को मारने वाले सैकड़ों प्रकार के एण्टीबैक्टीरियल कम्पाउण्ड्स पाये जाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   ब्रॉकली में मौजूद </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आर्गेनोसल्फर फाइटो केमिकल</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">में प्रोस्टेट ग्लैंड के कैंसर को दूर करने की अपूर्व क्षमता है। ब्रॉकली के प्लान्ट ऊतकों में मौजूद एमिनो एसिड के जैव संश्लेषण से आर्गेनो सल्फर बनता है जो एण्टी बी.पी.एच. (</span>Benign Prostate Hyperplasia<span lang="hi" xml:lang="hi">) होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    विश्व के समस्त वनस्पतियों में अब तक सौ प्रकार के थायोग्लूकोसाइड्स खोजे गये हैं। इनमें से चार प्रकार के सिर्फ ब्रॉकली में पायेजाते हैं। इन चारों प्रकार के थायोग्लूकोसाइड्स में ओवरी तथा ब्रेस्ट कैन्सर को नष्ट करने की प्रबल क्षमता है। ब्रॉकली में इंडोल्स पाया जाता है। यह परम शक्तिशाली फाइटो केमिकल है जो पुरुषों तथा महिलाओं में टेस्टोस्टेरॉन तथा एस्ट्रोजन हार्मोन को नियंत्रित करता है। टेस्टोस्टेरॉन की कमी से प्रोस्टेट ग्लैंड की वृद्धि होने लगती है। प्रोस्टेट ग्लैंड से होने वाला स्राव भी कम हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   एस्ट्रोजन की अधिकता स्तन कैंसर पैदा कर सकता है। ब्रॉकली में ६ प्रकार के इंडोल्स पाये जाते हैं। इसमें दो प्रकार के इंडोल्स को पहचानने में वैज्ञानिक सफल हुए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो प्रोस्टेट ग्लैंड से निकलने वाले हार्मोन की कमी को दूर करते हैं तथा प्रोस्टेट ग्लैंड की वृद्धि तथा सूजन से बचाते भी हैं। दो अन्य सक्रिय इंडोल्स पी.एस.ए. की वृद्धि को रोकते तथा नियंत्रित करते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    ब्रॉकली सभी प्रकार के मूत्र प्रजनन (</span>Urinogenital<span lang="hi" xml:lang="hi">) सम्बन्धि समस्याओं को दूर करते हैं। मूत्र एवं प्रजनन संस्थान के रक्त संचय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दबाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव तथा अवरोध (</span>Stenosis<span lang="hi" xml:lang="hi">) को दूर करता है। रक्त संचार को बढ़ाता है। प्रोस्टेट ग्लैंड ब्रॉकली के प्रभाव से अपना स्राव नियमित कर देता है। नपुंसकता लैंगिक अशक्तता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीघ्र स्खलन (</span>Sexual and Erectile Dysfunction, Elevation of Ejaculate Volume and Regulation of Libido<span lang="hi" xml:lang="hi">) को नियंत्रित करता है। यह वैज्ञानिक सच्चाई है कि ब्रॉकली का सूप रस तथा सब्जी प्रयोग से ब्लैडर की कार्य क्षमता बढ़ जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्द दूर होता है। यह संक्रमण जन्य रोग लक्षणों को नष्ट करता है। रोग प्रतिरोधक एवं वातावरण अनुकूलन क्षमता में वृद्धि होती है। ब्रॉकली शारीरिक ऊर्जा को बढ़ाने वाले एनर्जी बूस्टर का काम भी करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रो. स्क्वाटर्ग तथा उनके सहयोगियों ने ब्रॉकली में मौजूद शक्तिशाली जैव सक्रिय पौध रसायन ग्लूकोसिनेलेटस (</span>Glucosinolates<span lang="hi" xml:lang="hi">) की खोज की है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो ब्लैडर कैन्सर को खत्म करता है। जो मनुष्य प्रति सप्ताह दो या दो से अधिक बार ब्रॉकली खाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे कैन्सर होने की संभावना ४४ फीसदी कम हो जाती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   जॉन्स हापकिन्स यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन से सम्बन्धित लेविस एण्ड डोरोथी (</span>Lewis and Dorothy Cullman<span lang="hi" xml:lang="hi">) कैन्सर कीमो प्रोटेक्शन सेन्टर के वैज्ञानिकों का एक शोध पत्र कैन्सर रिसर्च जर्नल में प्रकाशित हुआ है। जिसके अनुसार ब्रॉकली समस्त गैस्ट्रिक समस्याओं जैसे स्टमक बग (आमाशयिक रोगाणुओं का समूह) गैस्ट्राइटिस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गैस्ट्रिक अल्सर यहाँ तक कि कैंसर का उपचार एवं बचाव बड़े ही सशक्त तरीके से करता है। प्रतिदिन २.१/२ औंस अर्थात् मात्र ७० ग्राम बेबी ब्रॉकली खाने से उसमें मौजूद सशक्त एवं सक्रिय पौध रसायन सल्फोरा फेन यह कमाल करता है। सल्फोराफेन (</span>Sulforaphane<span lang="hi" xml:lang="hi">) आहार नली में ऐसे एन्जाइम पैदा करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे कैंसर कारी ऑक्सीजन रेडिकल डी.एन.ए. को क्षति ग्रस्त करने वाले तथा सूजन पैदा करने वाले रसायनों के दुष्प्रभाव को खत्म कर देता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   जॉन हापकिन्स स्कूल ऑफ मेडिसिन के वैज्ञानिकों के एक दल ने खोज किया कि ब्रॉकली में मौजूद सल्फोराफेन शरीर में एक खास जीन एनआरएफ२ (</span>Nrf<span lang="hi" xml:lang="hi">2) को सक्रिय करता है जो फेफड़े के टॉक्सिन्स तथा टॉक्सिक पदार्थों से फेफड़े की रक्षा करता है। एनआरएफ२ में हर प्रकार के प्रदूषण तथा टॉक्सिन्स को निकाल बाहर करने की अद्वितीय क्षमता है। सांस की नलियों को क्षति ग्रस्त होने से बचाता है। वास्तव में एलर्जेन एवं एण्टीजेन वायु प्रदूषण फेफड़ों में मौजूद स्नायुओं के सिरे में रहने वाले रिसेप्टर प्रोटीन टीआरपी१ (</span>Lung Nerve Ending Receptor Protein TRPA<span lang="hi" xml:lang="hi">1) को उत्तेजित करके कफ बनने की प्रक्रिया को तेज करता है। सारा कफ फेफड़े में बनता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गले में नहीं। ब्रॉकली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हल्दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अदरक तथा मुलेठी में ऐसे गुण हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो स्नायु के सिरे को उत्तेजित होने से रोकते हैं। जीवन की गुणवत्ता को पुन:स्थापित करते हैं। एनआरएफ२ जीन को सशक्त बनाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  ब्रिटेन के इम्पेरियल कॉलेज लन्दन के वैज्ञानिकों ने एक अद्वितीय खोज की है कि ब्रॉकली में मौजूद सल्फोराफेन शरीर में उस प्रोटीन को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्वीच ऑन</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो धमनियों में कोलेस्ट्रॉल या किसी पदार्थ को जमने नहीं देता। वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि ब्रॉकली नेचुरल डिफेन्स मेकानिज्म को सक्रिय एवं तेज करके धमनियों में थक्का बनने से रोक देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे खून के दौरे का चक्का जाम नहीं होता। दिल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिमाग तथा अन्य अंगों को भरपूर पोषण मिलता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पोषक उत्पाद</category>
                                            <category>2015</category>
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                <pubDate>Fri, 01 May 2015 21:55:12 +0530</pubDate>
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