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                <title>जून - योग संदेश</title>
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                <description>जून RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज के शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...</title>
                                    <description><![CDATA[<h4 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य का मूल स्वभाव</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">1.  मूल प्रकृति- मूल स्वभाव यह शब्द बार-बार सुनते रहते हैं। जैसे अग्नि की मूल प्रकृति दाहकत्व व ऊर्ध्वगमन की है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जल की मूल प्रकृति द्रवत्व अर्थात् बहना व शीतलता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जल के संयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसर्ग या आरोप से अग्नि को शान्त किया जा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उसके मूल स्वभाव को बदला नहीं जा सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी तरह जल के मूल स्वभाव द्रवत्व को फ्रीजर आदि से व इसके शीतलता गुण को अग्नि के संसर्ग से कुछ समय के लिए बाधित किया जा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कालान्तर में वह अपने मूल स्वभाव में लौट</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3053/eternal-truth-emanating-from-the-eternal-wisdom-of-the-revered-yogarishi-his-holiness-swamiji-maharaj"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/96.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य का मूल स्वभाव</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">1.  मूल प्रकृति- मूल स्वभाव यह शब्द बार-बार सुनते रहते हैं। जैसे अग्नि की मूल प्रकृति दाहकत्व व ऊर्ध्वगमन की है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जल की मूल प्रकृति द्रवत्व अर्थात् बहना व शीतलता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जल के संयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसर्ग या आरोप से अग्नि को शान्त किया जा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उसके मूल स्वभाव को बदला नहीं जा सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी तरह जल के मूल स्वभाव द्रवत्व को फ्रीजर आदि से व इसके शीतलता गुण को अग्नि के संसर्ग से कुछ समय के लिए बाधित किया जा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कालान्तर में वह अपने मूल स्वभाव में लौट ही आता है। ऐसे ही मनुष्य की मूल प्रकृति या मूल स्वभाव क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यह बहुत बड़ा प्रश्न सभी मनोवैज्ञानिकों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचारकों व ऋषियों के सामने भी बार-बार आता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">2.   इस प्रश्न का उत्तर वेदों ने भी दिया-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">'<span lang="hi" xml:lang="hi">दृष्ट्वा रूपे व्याकरोत् सत्यानृते प्रजापति:।</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">अश्रद्धामनृतेऽदधाच्छ्रद्धाइ सत्ये प्रजापति:।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">(<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजापति:) सब जगत् का अध्यक्ष जो ईश्वर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सो (सत्यानृते) सत्य अर्थात् धर्म और असत्य अर्थात् अधर्म जिनके प्रकट और गुप्त लक्षण है। (व्याकरोत्) उनको ईश्वर ने अपनी सर्वज्ञ विद्या से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार से देख कर सत्य और झूठ को अलग-अलग किया है। जो इस प्रकार है कि (अश्रद्धाम्) हे मनुष्य लोगों! तुम सब दिन अनृत अर्थात् झूठ अन्याय के करने में श्रद्धा अर्थात् प्रीति कभी मत करो। वैसे ही (श्रद्धां स.) सत्य अर्थात् जो वेद शास्त्रोक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जिसकी प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से परीक्षा की गई हो या की जाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही पक्षपात से अलग न्यायरूप धर्म है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके आचरण में सब दिन प्रीति रखो और जो-जो तुम लोगों के लिये मेरी आज्ञा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस-उस में अपने आत्मा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राण और मन को सब पुरुषार्थ तथा कोमल स्वभाव से युक्त करके सदा सत्य ही में प्रवृत्त करो।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महर्षि दयानन्द सरस्वती भी कहते हैं प्रत्येक मनुष्य की आत्मा सत्य-असत्य को जानने वाली है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उपनिषदों में ऋषियों ने कहा है- तत्त्वमसि श्वेतकेतो।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञानं अयमात्मा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहंब्रह्मस्मि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिवोऽहम् शिवोऽहम्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सब शास्त्रों व ऋषियों की एक जैसी ही मान्यता व सिद्धान्त है कि मनुष्य की मूल प्रकृति या मूल स्वभाव नित्य शुद्ध-बुद्ध आनन्दमय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्तिमय व दिव्य है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">3.   सामान्य रूप से एक साधारण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना पढ़े-लिखे व्यक्ति से लेकर विद्वान् तक सबके अनुभव में एक बात आती है कि प्रत्येक मनुष्य की आत्मा में परमात्मा सदा ही सत्य प्रेरणा या शुभ दिव्य प्रेरणा देता है तथा प्रत्येक व्यक्ति उस प्रेरणा के अनुरूप ही जीना भी चाहता है। यदि अज्ञान या अशुभ के प्रभाव के कारण कोई अपनी अन्तरात्मा की आवाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुकार या प्रेरणा के विपरीत आचरण करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसकी आत्मा उसको धिक्कारती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">   <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: हम सबका मूल स्वभाव या मूल प्रकृति शुभ या दिव्यता ही है। योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यात्मिकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आस्तिकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्यता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सदाचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्मयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृतज्ञता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्यनिष्ठा व सत्याचरण ही हमारा मूल स्वभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहज स्वभाव या मूल प्रकृति है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">  <span lang="hi" xml:lang="hi">बार-बार इस शाश्वत या नित्य सत्य पर हमारा ध्यान जाना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके प्रति पूर्ण सजगता या जागरुकता होनी ही चाहिए। भोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मविमुखता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशुभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अदिव्यता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृतघ्नता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">झूठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनाचार व असत्याचरण ये संसर्ग से बसे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन सबसे भी दु:ख पाकर अन्तत: हमें अपने मूल स्वभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहज सम्पर्क में ही लौटना पड़ेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">    <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् से मानव मात्र के लिए यही प्रार्थना है कि सभी दिव्य आत्माएं अपने दिव्य स्वभाव या सहज स्वभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य मूल प्रकृति को पहचान कर पूर्ण दिव्यता का जीवन जीएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयं पूर्ण सुखी रहें और संसार में सबके सुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्धि व सुरक्षा के लिए पुरुषार्थ करें। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">चारों ओर शुभ व दिव्यता का साम्राज्य हो।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शाश्वत प्रज्ञा</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जून</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 01 Jun 2015 21:59:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नेपाल में महाप्रलय की पहली रात</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3054/first-night-of-disaster-in-nepal"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/122.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">     <strong>नेपाल के भूकम्प की भयानक त्रासदी में जहाँ नेपाल के हजारों लोग असमय में काल कवलित हो गये</strong></span><strong>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं विश्वभर के हजारों लोग जो पर्यटन व तीर्थाटन के लिए नेपाल गये थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे भी सदा-सदा के लिए हमसे बिछुड़ गये। लाखों लोगों ने अपनी आँखों से जो खौफनाक दृश्य देखे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे किसी को देखने को ना मिले। उस भयानक व खौफनाक मंजर को हमें भी अपनी आँखों से देखना पड़ा। दैवयोग ऐसा रहा कि श्रद्धेय स्वामी जी व हम भी बाल-बाल बचे। इस आपदा की घड़ी में हम सबका कर्तव्य बनता है कि राजनैतिक व भौगोलिक सीमाओं से ऊपर उठकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानवीय संवेदनाओं व भावनाओं को अपनाकर हम पीड़ितों की सेवा के लिए आगे आयें।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">स भयानकतम घटना के परिणाम स्वरूप जहाँ हजारों लोग असामयिक ही मृृत्यु को प्राप्त हो चुके थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं हजारों लोग घायल होकर भूख व प्यास से बिलख रहे थे। हजारों परिवार बिखर व टूट चुके थे। कुछ सेकेण्ड की यह त्रासदी इतना बड़ा जख्म दे गयी कि शायद सदियाँ भी इस जख्म को नहीं भर पायेंगी</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु यदि हम सब मिलकर प्रयास करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इस घाव पर मरहम लगाने का कार्य अवश्य हो सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी संवेदना का एक विनम्र प्रयास योगर्षि स्वामी रामदेव जी की प्रेरणा से पतंजलि योगपीठ द्वारा किया जा रहा है|</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/81.jpg" alt="81" width="800" height="534"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिस क्षण भूकम्प आया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उससे क्षणभर पहले तक एक कार्यक्रम चल रहा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें जीवन की गहराइयों तथा साधना व ध्यान की ऊँचाइयों की चर्चा हो रही थी। लगभग चार-पाँच हजार लोग होंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो तन्मयता से सुन रहे थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमने भी कुछ चर्चा की। श्रद्धेय स्वामी जी ने भी सबको योग व अध्यात्म की बातें बताईं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर प्रसिद्ध जैन सन्त महाश्रमण जी भी साधना की चर्चा करते रहे। कार्यक्रम समय से थोड़ा विलम्ब से चल रहा था। कार्यक्रम समाप्त हुआ। मैं तो गाड़ी में आ बैठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी जी को मिलने वाले मिल रहे थे। जैसे ही स्वामी जी पण्डाल से बाहर निकले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधिकांशत: लोग बाहर निकल चुके थे। अचानक जोर-जोर की आवाजें आने लगीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शालिग्राम गाड़ी स्टार्ट कर चुके थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गाड़ी भी हिल रही थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुझे लगा कोई गाड़ी के नीचे न आ गया हो। फिर सामने देखा तो कई माताएँ व पुरुष बेसुध हो अस्त व्यस्त दौड़ रहे थे। मैं भी गाड़ी से उतरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ समझ पाता उससे पहले देखा कि स्वामी जी व कुछ लोग गाड़ी के पास के पेड़ को पकड़े खड़े थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम भी हवा में उड़े से जा रहे थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पैर जमीन पर टिकते ही न थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चारों तरफ  से जोर-जोर की आवाजें आ रही थीं। देखा सामने स्थित बाल मंदिर (जो काठमाण्डू का पुराना प्रसिद्ध भवन था) का आधा हिस्सा टूटकर गिर चुका था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं गाड़ी से बाहर निकल चुका था। पतंजलि के कुछ स्वयं सेवक मुझे भी पकड़ कर सुरक्षित करने का प्रयास कर रहे थे</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धा इतनी गहरी भी होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब अपने प्राण संकट में हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भी अपना प्रिय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपना गुरु पहले दिखाई देता है। यह मुझे तब प्रत्यक्ष अनुभव हुआ (वैसे मैं अपने आपको कोई गुरु या बड़ा संत नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु एक सामान्य व्यक्ति मानता हूँ) उनकी श्रद्धा को जब याद करता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अब भी सहसा मेरी आँखों में हर्षाश्रु निकले बिना नहीं रह पाते हैं।</span>’</h5>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/171.jpg" alt="17" width="800" height="533"></img></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ सेकेण्ड में ही चारों तरफ  का नजारा बड़ा भयावह बन गया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोहे के कॉलम पर खड़ा टीनशेड वाला वाटरप्रूफ  पण्डाल अपने आँखों के सामने झटका सा लेता हुआ धराशायी हो गया। वहीं बराबर की बिल्डिंग का आधा भाग जमीन में मिल चुका था। जो हमारे सामने भवन था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह हिलता हुआ बीच से ही कपड़े फटने की तरह आवाज करता हुआ फट गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी हिलता-हिलता रुक गया। पण्डाल के साइड में बड़े-बड़े पेड़ गिर चुके थे। शुक्र है स्वामी जी ने जो पेड़ पकड़ा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह बच गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामने की बिल्डिंग फट गयी तथा धराशायी होने से पता नहीं क्यों रह गयी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे सामने मृत्यु तीन रूपों में दिख रही थी- टूटता-पण्डाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उखड़ते-पेड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिरती-बिल्डिंग पर पेड़ रक्षक बन गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे पण्डाल कुछ कदम दूरी पर ही गिरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिल्डिंग से हम डरे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर शायद वह हमें डराकर हमसे डर गयी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या उसे लगा पतंजलि का दिया एक साथ न बुझ जाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए अभी इन्हें बक्श दो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमें छोड़ दिया।</span>’</h5>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/122.jpg" alt="12" width="800" height="841"></img></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि उस समय हम पण्डाल के अन्दर होते तो न जाने कितनी जानें जातीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम भी उनमें से ही कोई एक होते और प्रोग्राम यदि दस मिनट पहले भी समाप्त हो गया होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो न जाने भोजनालय में कितने लोग पहुँच गये होते। भोजन के स्थान के पास की बिल्डिंग धराशायी हो गयी थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे कितनों के प्राण जाते। यदि हम सड़क पर होते तो न जाने किस बिल्डिंग के नीचे होते। सब कुछ याद कर अभी भी स्वप्न सा लगता है। ऐसा लगता है कि वह कोई घटना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल स्वप्न था। पर वह स्वप्न इतना भयानक था कि वह कुछ सेकेण्डों में लाखों लोगों के चीत्कारों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुण-क्रन्दनों के साथ क्षणभर में सदियों की पीड़ा दे गया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्षण भर में ही उस स्वप्न से बाहर निकले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर जब वह स्वप्न टूटा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो लोगों के करुण-क्रन्दन पीड़ादायी स्वरूप कभी न भूलने वाला दु:स्वप्न बन चुका था।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/162.jpg" alt="16" width="800" height="1051"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उसके कुछ क्षण बाद वहाँ फिर भूकम्प आया। बड़े पेड़ उखड़ने लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बड़े-बड़े भवन गिरने लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी तरह अपने को सुरक्षित करते हुए अन्यों को भी सुरक्षित करते रहे। स्वयं बाल-बाल बचने पर भी अन्य घायल लोगों का कुशल-क्षेम पूछने व उन्हें भय से मुक्त करने तथा जो दबे हुए थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें सहायता पहुँचाने का प्रयास किया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमने अपनी आँखों से देखा कि किस तरह इस भीषण त्रासदी से जहाँ लाखों जीवन बर्बाद हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं इस त्रासदी ने नेपाल की गौरवशाली सांस्कृतिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारम्परिक व ऐतिहासिक धरोहरों को भी छिन्न-भिन्न कर दिया। सदियों से जो इतिहास परम्परा के धरोहर व चिह्न थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब वे खण्डहर व अतीत बन चुके थे।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/106.jpg" alt="10" width="700" height="1100"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उसके बाद वहाँ से किसी तरह पतंजलि योगपीठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मण्डिखाटार पहुँचकर इस महाप्रकोप से सभी की रक्षा हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभी भय मुक्त हों ऐसी भावना से वैदिक मान्यतानुसार यज्ञ प्रारम्भ कर दिया व भगवान् से प्रार्थना करते रहे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यज्ञ के तत्काल बाद माननीय जैन सन्त महाश्रमण जी व अन्य लोगों का कुशल-क्षेम जानने के लिए उसी मैदान व उसके आस-पास के क्षेत्रों के लोगों की जानकारी लेकर एवं उनसे मिलकर फिर सारे काठमाण्डू में जहाँ-जहाँ जा सकते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभी जगह अत्यन्त चुनौती (रिस्क) होने पर भी क्षति व जानमाल के नुकसान का आकलन करने का प्रयास किया। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ सेकेन्ड का भूकम्प लाखों जीवन का सुख-चैन समाप्त कर चुका था। फोन व अन्य सम्पर्क संवाद के सारे मार्ग अवरुद्ध हो चुके थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चारों ओर हाहाकार व त्राहिमाम्-त्राहिमाम् दिख रहा था। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि परिवार से जुड़े करोड़ों लोगों को भी आपदा की भीषणता व उस समय स्वामी जी व हमारे काठमाण्डू में होने के विषय में पता था। मीडिया में यह सूचना आ चुकी थी कि भूकम्प के बाद आचार्य जी व स्वामी जी का पता नहीं चल रहा है। इस सूचना के बाद देश-दुनिया के लाखों लोग हमारे लिए आकुल-व्याकुल हो क्रन्दन कर रहे थे। हमारे लिए वह क्षण इसलिए भयावह था कि हम उस को अपनी ऑँखों से देख रहे थे व लोगों के क्रन्दन से द्रवित थे। पतंजलि परिवार के लाखों भाई-बहनों के लिए अनहोनी की आशंका से एक-एक क्षण कितना बेचैन करने वाला रहा होगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी कल्पना मात्र से ही हमारा मन उद्वेलित व अशान्त हो रहा था।</span>’</h5>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/792.jpg" alt="79" width="800" height="534"></img></p>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">लगभग सायं के पाँच बजे होंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भयभीत व चोटिल लोग इधर-उधर भाग रहे थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टुँडिखेल मैदान (जो काठमाण्डू का सबसे बड़ा मैदान है) जहाँ पिछले दो दिन से योग-शिविर चल रहा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लगभग पाँच लाख फुट हरा मैट बिछा हुआ था। लोगों ने उसको अपने लिए सुरक्षित मानते हुए उसकी झोपड़ी बनानी शुरू कर दी थी। जब यह बात स्वामी जी को पता चली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उन्होंने सम्पूर्ण पण्डाल व मैट आदि को जनता की सेवा के लिए सहर्ष स्वीकृति प्रदान करते हुए सभी सेवकों को आदेशित कर दिया कि कोई भी किसी को कुछ नहीं कहेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सारा पण्डाल जनता के लिए दे दिया जाये।</span>’</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह सेवा का उत्कृष्ट उदाहरण व पतंजलि की पहली आहुति थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो लगभग चालीस-पचास लाख रुपये का पण्डाल प्राकृतिक आपदा से पहले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो जीवन को स्वस्थ व नीरोग बनाने के लिए बिछाया गया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह अब जीवन-रक्षा के लिए वरदान बन गया। ग्राउण्ड में लाइट व तम्बू की व्यवस्था अपने आप हो गयी थी। इतनी व्यवस्था यदि भूकम्प के तुरन्त बाद भी शुरू करते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कम से कम दो-तीन दिन लग सकते थे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सायंकाल होते-होते हमारे हजारों स्वयं सेवक काठमाण्डू में अनेक स्थानों पर पहुँच कर पीने के पानी की व्यवस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिबड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आलू का झोल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फलों व पतंजलि बिस्कुट का वितरण शुरू कर चुके थे। इस भयानक त्रासदी में भी हजारों लोगों को पहले ही दिन एक आसरा मिल गया था। जहाँ जनरेटर से प्रकाश की व्यवस्था थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं एक बार में सैकड़ों की संख्या में मोबाइल के बैटरी चार्ज किए जा रहे थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेट की आग बुझाने के लिए चिबड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिस्कुट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नमकीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पानी व सेब मिल रहा था। टुँडिखेल मैदान में जहाँ हजारों नेपाल के लोग थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं हजारों की संख्या में भारतीय व अन्य देशों के लोगों का हुजूम (भीड़) लगा हुआ था।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तत्काल सेवा के लिए विचार किया गया कि काठमाण्डू में उपलब्ध खाद्य सामग्री फल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिस्कुट व पानी की बोतलों की तत्काल व्यवस्था की जाये</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु उस भयानक स्थिति में न तो कोई दुकान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न ही कोई दुकानदार था। कुछ परिचित दुकानदार थे भी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वे दुकान नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने प्राणों की रक्षा में ही तत्पर थे। बामुश्किल कुछ लोगों ने बहुत साहस दिखाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब कहीं कुछ सामान की व्यवस्था हो पायी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि आयुर्वेद केन्द्र नेपाल से राजु जी व बाबुकाजी ने लगभग तीन-चार सौ कार्टून बिस्कुट उपलब्ध करा दिया। वहीं लगभग तीन सौ पेटी सेब लेकर अपने सहयोगी उद्धव जी तैयार हो गये। लगभग नौ सौ बोरा चिबड़ा व कई क्विन्टल नमकीन लेकर ओम बंसल जी व विनोद जी सेवा के लिए तैयार थे। सैकड़ों पेटी पानी की बोतल के साथ शालिग्राम जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपेन्द्र जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लबदेव जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहन अर्चना व रीता आदि भी सेवा में जुट गये थे।</span>’</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भूकम्प के बाद बार-बार लगते झटके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपर से गिरता बारिश का पानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काठमाण्डू की ठण्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चारों ओर फैला लोगों का करुण-क्रन्दन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बीच-बीच में कोलाहल के बीच भय से इधर-उधर भागते हुए लोग स्वामी जी की ओजस्वी वाणी के प्रभाव व सेवा के संकल्प से मृत्यु के भय को भुलाकर तत्क्षण अपने सामर्थ्य अनुसार सेवा में जुट गये थे। इन सबके बीच सच कहूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उस समय तत्काल सेवा में जुटे पतंजलि के स्वयं सेवक ही दिख रहे थे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भूकम्प की भयावहता को देश-दुनियाँ के लोग आकलन भी नहीं कर पाये थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं कोई फेसबुक व ट्विटर आदि से सूचना का आदान-प्रदान कर रहे थे। किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि तत्काल क्या किया जाये</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु भूकम्प आने के कुछ घण्टों में पतंजलि तात्कालिक व दीर्घकालिक योजना बनाकर सेवा में जुट चुका था। फोन की सभी लाइनें लगभग ठप हो चुकी थीं। बार-बार फोन लगाने पर घण्टों में कहीं फोन लग पा रहा था। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी जी का आदेश हुआ कि चाहे पतंजलि को किसी अन्य सेवा के कार्य की गति को रोकना भी पड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर इस भूकम्प के राहत कार्यों में कोई कमी नहीं आने दी जायेगी।</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">हम सबने बैठकर तत्काल राहत सामग्री की व्यवस्था स्थानीय स्तर पर करायी</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु बाद के लिए क्या</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">पहले हरिद्वार भरत जी से बात की फिर लखनऊ से सामान शीघ्र पहुँच सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह पता होने पर ओ.पी. श्रीवास्तव जी को व अलख जी को फोन करके तत्काल दो-तीन ट्रक पानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक-एक ट्रक फल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आलू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिरपाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिस्कुट आदि छ:-सात ट्रक सामान की शीघ्र व्यवस्था के लिए बोल दिया गया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि के परिचित डॉक्टरों द्वारा दवाइयों की लिस्ट तैयार कराकर तत्काल जीवन-रक्षा के लिए एक करोड़ के लगभग की जीवन रक्षक दवाइयों को मँगाने का आदेश भी दिया गया</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु पेपरों के अभाव में दूसरे दिन भारत के नेपाल राजदूत के स्वीकृति पेपर तैयार कर एक डॉक्टर के गारन्टी पत्र बनने पर ही भिजवाया जा सका।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तत्काल सभी प्रभावित जिलों में जाने के लिए </span>20-30<span lang="hi" xml:lang="hi"> टीमें बनाकर सुदूर क्षेत्रों में अलग-अलग स्थानों पर कैम्प शिविर बनाकर जब तक यह आपदा या त्रासदी की भयानकता समाप्त नहीं हो जाती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक सेवा कार्य को निर्बाध रूप से चलाने का निर्णय लिया गया। उन्हीं शिविर स्थानों पर भोजन उपलब्ध कराने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयंसेवकों तथा दूर-दराज के लोगों को खाद्य सामग्री</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टैन्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कम्बल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैट आदि उपलब्ध कराने के लिए आदेश दिया गया। (इस कार्य में नेपाल सरकार व पुलिस प्रशासन विशेषकर डी.आई.जी. भण्डारी जी का भी विशेष सहयोग प्राप्त हो रहा था)।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तबाही के इस मंजर में रक्त दान के लिए विचार कर जब रेडक्रास से सम्पर्क करने का प्रयास किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो पता चला कि भूकम्प से पहले उनकी टीम ब्लड डोनेशन करने गयी थी तथा उनका भी भूकम्प के बाद कोई अता-पता नहीं था (किसी तरह अगले दिन ब्लड डोनेशन की व्यवस्था हो पायी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें हमें सन्तोष है कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रथम रक्त दाताओं में स्वामी जी व मुझे आगे रहने का मौका मिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयं रक्त देकर स्वामी जी ने औरों का आह्वान किया।) फिर श्रद्धेय स्वामी जी ने घोषणा की कि आपदा में मृत परिवार के बेघर कम से कम </span>500<span lang="hi" xml:lang="hi"> बच्चों की उचित व उच्च शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आवास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वस्त्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भोजन आदि की सभी व्यवस्था पतंजलि योगपीठ करेगा (तत्काल व्यवस्था के लिए काठमाण्डू के पास धूलिखेल में आयुर्वेद कॉलेज के लिए बनाए हुए भवन को ही इस कार्य के लिए देकर आयुर्वेद कॉलेज के कार्यक्रम को फिलहाल स्थगित करा दिया)। हमने भी स्वयं वहीं रहकर सभी व्यवस्थाओं को सुचारु रूप से चलाने व स्वयं चलकर उस मंजर को देखने व समझने का निर्णय किया। जिससे राहत व पुननिर्माण के कार्यों को सही व प्रभावी ढंग से किया जा सके।</span>’</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सैकड़ों स्वयं सेवक रात्रि के लगभग एक बजे तक सेवा करते रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आधी रात कब गुजर गयी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पता भी नहीं चला। वहीं टुँडिखेल मैदान में एक-एक कम्बल को दो या तीन लोग लपेटकर रातभर बैठे रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि तत्काल उतने ही कम्बलों की व्यवस्था हो पायी थी। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं थोड़ी भी होश हवास की स्थिति नहीं थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चारों ओर हाहाकार व करुण-क्रन्दन ही सुनाई पड़ता था। बहुत सारी बिल्डिंग ध्वस्त हो चुकी थीं। न जाने कितनी जाने जा चुकी थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई अंदाज नहीं लग पा रहा था। बिजली पानी सब गुल हो चुका था। लोगों को सुरक्षा देने वाले भवन अब लोगों को भयावह लग रहे थे। क्योंकि बार-बार भूकम्प के झटके आ रहे थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लगता था यदि अन्दर चले भी गये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसी क्षण भयानक भूकम्प आ जायेगा व भवन धराशायी होकर हमारे प्राण ही ले लेगा। भवन काल्पनिक भूत जैसा लगता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सारा शहर जमीन पर खुले आसमान के नीचे जिसे तिरपाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पन्नी या कोई छत बनाने का जुगाड़ बना तो ठीक अन्यथा भगवान् भरोसे सर्दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब कुछ अत्यन्त दयनीय स्थिति में उसी दयानिधान के सहारे था। सब साधन-विहीन असहाय होकर परमात्मा से सहायता के लिए प्रार्थना कर रहे थे। जो चोटिल व घायल थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें हॉस्पिटल्स में पहुँचाने का कार्य प्रारम्भ हो चुका था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर न जाने कितने चोटिल घायल मलबे के नीचे अन्तिम श्वास गिन रहे थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किस तरह तड़प-तड़प कर हजारों लोगों ने अपने प्राणों को त्यागा होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कल्पना मात्र से ही रौंगटें खड़े हो जाते हैं।</span>’</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हजारों ने किसी के आने की प्रतीक्षा की होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई आयेगा हमें भी बचायेगा। जब काल दैव स्वयं ही क्रूर बन गया हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आशा करते भी तो किससे</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">असीम सामर्थ्यशाली के प्रकोप को सीमित सामर्थ्य वाला मनुष्य कैसे रोक पाता</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य है जब प्रकृति ही प्रतिकूल हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब मानव के पास लाचारी के सिवा रह भी क्या जाता है। फिर भी हमारी जिम्मेदारी है कि जिन्हें बचा पाना सम्भव है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें बचाने की भरपूर कोशिश करें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">शहर के नजदीक व जहाँ-जहाँ सहायता से लोगों के जीवन की रक्षा हो सकती थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ सेवा की जाने लगी</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु जो दूर-दराज के पहाड़ों में बामुश्किल अपना जीवन निर्वहन करते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे शैलपुत्र-पुत्रियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिमालयपुत्र-पुत्रियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने एक-एक तिनका जोड़कर अपना बसेरा बनाया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस बसेरे में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घोसले में दो समय रूखा-सूखा खाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने सुख-दु:ख को अपने आप सहकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने निश्चल उन भोले-भाले बच्चों व परिवार के साथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी को दु:ख दिये बिना जीवन जी रहे थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे नास्तिक नहीं थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी बुद्धि या परम्परा से उस परम शक्ति को खुश रख कर अपने जीवन में सुख की कामना करते थे। राजनैतिक द्वन्द्वों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जटिलताओं कुटिलताओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन में दम्भ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आडम्बरों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृत्रिम जीवन से दूर उन शान्त लोगों को उनका आश्रय आराध्य देव अशान्त क्यों कर गया</span>?’ <span lang="hi" xml:lang="hi">जो दूसरे के आंसुओं को पोंछने के लिए अपने देश के लोगों की सेवा के  लिए ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु अपने से दूर भारत माता को भी अपनी माता समझकर तथा ब्रिटेन तक के लोगों के प्राणों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने में सबसे अग्रणी रहने वाली वीर कौम गोर्खाली आज अपने आँसुओं की धारा बहा रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिलख रहे व तड़प रहे थे। ऐसा मार्मिक क्रन्दन कि पत्थर हृदय भी पिघल उठे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नास्तिक भी उस प्रकृति को कोशता हुआ चीत्कार कर उठे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुन्दर पहाड़ की चोटियाँ हिमाच्छादित पर्वत मालाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें खुशबू बिखेरती प्रकृति व प्राकृतिक जड़ी-बूटियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें मधुरता घोलता पहाड़ी लोक संगीत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वो चहल-पहल सब क्षण भर में मरघट बन चुका था। वे रिश्ते-नाते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मित्र-बंधु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपस के गाँव के परिचित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक दूसरे को आवाज़ देते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुकारते लोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब कुछ निस्तब्ध व शान्त हो गया था। घर परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खेत-खलिहान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घर आँगन में बँधे हुए गाय-भैंस व अन्य पशु कुछ भी न बचा। सब रिश्ते-नाते परम्पराएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्यार सब कुछ क्षण भर में अतीत बन गया। चारों ओर मात्र शून्य ही दिखता था।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं इन पीड़ाओं से गहरे व घनघोर बीहड़ वन में भटकते-भटकते आकुल व व्याकुल था। शरीर एक तम्बू में पड़ा हुआ खुले आसमान को निहारता हुआ रात भर पतंजलि योगपीठ के मैदान में लेटे-लेटे दिन भर का एक-एक पल का स्मरण और उसकी भयावहता व हृदय को छिन्न-भिन्न करने वाले दृृश्यों को सोचते-सोचते न जाने कब सूर्य की लालिमा दिखाई देने लगी। मैदान से उठ कर हिम्मत कर अपने नित्य कर्मों से निवृृत्त हो फिर अपने दिल की पीड़ा को शान्त करने के लिए लोगों की सेवा की योजना बनाने के लिए जुट गये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">हमें इस का संतोष है कि आज भूकम्प के इतने दिन होने को हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ पतंजलि के हजारों कार्यकर्ता रात-दिन एक करके सेवा में जुटे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं आपदा-पीड़ितों के लिए सभी सहयोगियों व पतंजलि द्वारा २ करोड़ की धनराशि से अधिक का सहयोग किया जा चुका है। अभी दीर्घकालिक योजनाएँ जैसे- बच्चों की शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आवास की व्यवस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गाँवों के पुन: निर्माण व अन्य व्यवस्था में हमें बहुत कार्य करना है।</span>’</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बचाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राहत फिर पुननिर्माण व आपदा ग्रस्त लोगों के जीवन को व्यवस्थित करने में महीनों नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्षों लगेंगे। अभी तो ऐसे लोगों की संख्या भी हजारों में है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्हें हेलीकॉप्टरों से चिकित्सा के लिए काठमाण्डू लाया गया</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु अब न उनकी प्रतीक्षा करते पारिवारिक जन व बच्चे तथा न अब उनका कोई घर है। अब वे हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होकर जायें तो जायें कहाँ</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे सभी लोगों के लिए पतंजलि की तरफ से काठमाण्डू व काभ्रे जिला के बनेपा में आवास भोजन की व्यवस्था बनायी जा चुकी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा का कार्य प्रारम्भ हो चुका है। जब वे घर जाने के लिए तैयार होंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब उन्हें तम्बू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आवश्यक सामग्री के साथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ नकद राशि व हिम्मत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साहस देकर घर भेजा जायेगा। ऐसे लोगों की संख्या हजारों में हो सकती है। उन सभी की जिम्मेदारी भी पतंजलि योगपीठ लेगा।</span>’</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हम आप सबसे आह्वान करते हैं कि इस महात्रासदी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दैवीय आपदा में तन-मन-धन से सहयोग हेतु आगे आयें। इस दैवीय आपदा में भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा की गयी तत्काल राहत व बचाव कार्य की प्रशंसा की जानी चाहिए। हमारे एन.डी.आर.एफ. के जवान व चिकित्सक रात दिन एक करके सेवा में लगे हुए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभी बधाई के पात्र हैं। इसके अतिरिक्त दुनियाँ के अनेक देशों की सरकारें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने इस महाआपदा में अपना सहयोग का हाथ बढ़ाया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा जितनी भी दुनियाँ भर की सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक संस्थाएँ जो इस कार्य में नि:स्वार्थ सहयोग व सहायता कर रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें व नेपाल देश के वे लोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो इस विपदा की घड़ी में धैर्य धारण कर एक-दूसरे के सहयोग व सेवा में लगे हुए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस मानवीय संवेदना के लिए उन्हें हम धन्यवाद देते हैं। नेपाल सरकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुलिस प्रशासन का प्रयास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषकर पुलिस के जवानों का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो फील्ड में मलबे के बीच में लोगों को बचाने व मलबे से निकालने के जद्दोजहद में जुटे हुए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम उन सबके पुरुषार्थ के लिए कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। हम आशा करते हैं कि नेपाल में भगवत् कृपा से शीघ्र ही जनजीवन सामान्य होगा और नेपाल के लोग पुन: अपने पुरुषार्थ व पराक्रम से नेपाल में शान्ति व समृद्धि के साथ आगे बढ़ेंगें।</span></h5>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Mon, 01 Jun 2015 21:57:23 +0530</pubDate>
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                <title>विश्व निर्माण को समर्पित हमारे योग आंदोलन के मायने</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">स्वामी रामदेव</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3055/meaning-of-our-yoga-movement-dedicated-to-world-building"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/91.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  प</span><span lang="hi" xml:lang="hi">तंजलि योगपीठ के माध्यम से 2003 से योग की व्यापक जन क्रांति हुई तो इसके प्रयोग व प्रभाव से लाखों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ों लोगों की सब व्याधियों का समाधान हुआ और देश के कोटि-कोटि जनों ने योग को स्वीकार कर लिया और आज राष्ट्र के शून्य से शिखर तक अधिकांश लोग योग को कमोवेश अपनी जीवनशैली में आत्मसात् कर चुके हैं यह एक ऐतिहासिक घटना है। जब देश के गरीब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मध्यम एवं उच्चवर्ग के लोगों ने एक साथ व्यापक रूप में एक संस्कृति को अंगीकार कर लिया हो। यह भी सत्य है कि जब तक योग पर क्लिनिकल कन्ट्रोल ट्रायल का दौर पूरा नहीं हो जाता तब तक कुछ स्वार्थी व दुराग्रही लोग आरोप-प्रत्यारोप की निकृष्टं राजनीति भी जारी रखेंगे। यद्यपि इससे भी योग को और अधिक व्यापक स्वीकृति ही मिलेगी। हमने अभी तक जो प्रयोग किए हैं वे इस बात के प्रमाण हैं कि योग से विश्व की तमाम समस्याओं का समाधान हो सकता है। प्रयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिणाम एवं प्रयास-यह एक क्रम है सत्य तक पहुंचने का। हम योग एवं आयुर्वेद को एक (</span>Evidence based medicine<span lang="hi" xml:lang="hi">) प्रयोग सिद्ध औषध की तरह विश्व पटल पर स्थापित करने के लिए कृत संकल्पित हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    आज आम आदमी से लेकर उच्च पदासीन व्यक्ति तक ने भी योग की शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दीक्षा ली एवं ले रहे हैं। अनेक न्यायाधीशों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सैनिक एवं अर्धसैनिक बलों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुलिस एवं प्रशासन से जुड़े तमाम छोटे बड़े लोगों ने प्राणायाम सहित योग की सहज विधियों को सीखकर उसे व्यवस्था में लागू करने के प्रयास प्रारम्भ कर दिए हैं। प्रिन्ट मीडिया एवं इलैक्ट्रोनिक मीडिया ने योग को राष्ट्रव्यापी विस्तार देने में अहम् भूमिका निभाई है। बच्चे से लेकर बूढ़े तक प्रत्येक आयु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्ग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंथ एवं सम्प्रदायों ने योग को स्वीकार किया है। इसी क्रम में राजसत्ता एवं धर्मसत्ता से जुड़ी देश-विदेश की महान् विभूतियों से सीधा संवाद स्थापित कर विश्व की आध्यात्मिक एवं सात्त्विक शक्तियों को संगठित करने का एक अभूतपूर्व कार्य किया गया। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">     योग को विश्वव्यापी बनाने की दिशा में प्रधानमंत्री आदरणीय मोदी जी के माध्यम से जो प्रखर प्रयास हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी का परिणाम है यू.एन.ओ. द्वारा २१ जून को विश्व में योग दिवस की घोषणा। आगे के लिए एक बड़ी कार्य योजना चल रही है। यू.के.</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आस्ट्रेलिया एवं यू.एस.ए. के बाद अब दुनियां के अधिकांश देशों में पतंजलि योगपीठ के प्रशिक्षित योग शिक्षक नि:स्वार्थ भाव से योग की शिक्षा दे रहे हैं। भारत के लगभग हर जिले में पतंजलि योग प्रशिक्षण समितियां पूर्ण निष्ठा एवं समर्पण से अपना अपना दायित्व निभा रही हैं। हमारा लक्ष्य है कि वर्ष </span>20<span lang="hi" xml:lang="hi">२० तक पूरे भारत सहित सम्पूर्ण विश्व में १</span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> से २</span>0<span lang="hi" xml:lang="hi"> लाख मुख्य एवं सहयोगी प्रशिक्षक तैयार हो जायेगें। आप और हम मिलकर एक स्वस्थ भारत एवं स्वस्थ विश्व के निर्माण के लक्ष्य को शीघ्र ही प्राप्त कर सकेंगें। दैहिक आरोग्य के साथ-साथ योग से स्वस्थ चिन्तन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्यक् एवं पवित्र व्यवहार का कार्य स्वत: प्रतिफलित हो रहा है। हम आश्वस्त हैं कि योग शीघ्र ही वैश्विक संस्कृति का हिस्सा बनेगा और पूरा विश्व भारतीय जीवनदर्शन को वैज्ञानिक मानदण्डों के साथ स्वीकार करेगा। यह हम भारतीयों के लिए गर्व की बात होगी ओर विश्व कृयाण व विश्वशान्ति का मार्ग भी इसी से प्रशस्त हेागा। योग से एक स्वस्थ व संवेदनशील समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र एवं विश्व का निर्माण होगा। शरीर एवं मन से स्वस्थ व संवेदनशील व्यक्ति हिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपराध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जातिवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रान्तवाद एवं मजहबी उन्माद से दूर होगा और संसार में मानवता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सौहार्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सद्भावना व सहिष्णुता का वातावरण तैयार होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धरती पर स्वर्ग का अवतरण होगा। विज्ञान एवं अध्यात्म के एक साथ मिलन से विकास में विनाश का खतरा नहीं होगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">     यह सम्पूर्ण योगान्दोलन जिस सूत्र से संचालित है वह है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वेभवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:-सब सुखी हो सभी निरोग हों। न किसी को भय हो न विपन्नता। इसी के लिए हम सभी आज भी योगशिविरों के रूप में अल सुबह अलख जगाने निकल पड़ते हैं। देश-विदेश में अब तक हजार से अधिक विशाल योगशिविरों का आयोजन किया जा चुका है। इन शिविरों का उद्देश्य समग्र मानवता को स्वस्थ करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बीमारियों के संत्रास से मुक्त कर उन्हें पुष्ट और संतुष्ट जीवन प्रदान करना है। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा यह भी सपना है कि भारत अपनी सनातन गुरु की प्रतिष्ठा को पुन: प्राप्त करे और मानवता को जीवन के परम लक्ष्य का रास्ता दिखा कर उसका जीवन धन्य बनाएं। बाहुबल के जरिए विश्व पर छा जाना मानवीय सिद्धान्त नहीं हो सकता। विश्व गुरु की बात के पीछे चिन्तन यह है कि भारत अध्यात्म के रूप में पहचाने गए अपने वैश्विक मानवीय मूल्यों के प्रसार हेतु कार्य करते हुए विभिन्न प्रकार के दबावों और अभावों की चोट झेल रही मानवता का सम्बल बने एवं उसे नेतृत्व दें।</span>‘</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    स्वस्थ भारत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ विश्व से पवित्र उद्देश्य और क्या हो सकता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने इसी पवित्र उद्देश्य के लिए हम </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को दुनिया के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए प्रयासरत हैं। वैसे अंतिम व्यक्ति तक </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को पहुंचाना आज के परिवेश में कठिन चुनौति है। क्योंकि आज  प्रिंट मीडिया एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कारण जहां एक और पूरे विश्व में ज्ञान विज्ञान का प्रचार व उसकी स्थापना में योगदान मिला है वहीं दूसरी और इसने जाने अजनाने में वासना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंसा आदि जीवन के नकारात्मक पक्षों का भी प्रचुरता से प्रचार व प्रचलन किया है। सुखद यह है कि योग की विरासत को जन-जन तक पहुंचांने में मीडिया का रूख सकारात्मक रहा है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    आज यह मिशन स्वस्थ भारत-स्वस्थ विश्व के सपने के साथ-साथ विश्व निर्माण को साकार करने की ओर बढ़ रहा हैं। योग के साथ जीवन को सर्वांगीण रूप से उन्नत व समृद्ध बनाने के लिए वैदिक सिद्धान्त युक्त आदर्श जीवन की आवश्यक सभी जानकारियां व सम सामयिक विषयों पर उन के दिशाबोधक उद्बोधन निश्चित ही मनुष्य मात्र को अत्यधिक प्रेरित व आन्दोलित करते हैं। दुनिया में जितने तनाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितने संत्रास हैं उनसे दुनिया के अंतिम व्यक्ति तक को मुक्ति दिलाने के लिए योग का जो मार्ग चुना है वह न तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों की तरह मुनाफा कमाने का है और न ही निहित स्वार्थों के लिए छल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छद्म से लोगों को भ्रमित करने का। जहाँ सम्पूर्ण देश के लगभग सभी बड़े शहरों में योग शिविरों का आयोजन किया जा चुका है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं यू.के.</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यू.एस.ए.</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कनाडा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थाईलैण्ड (बैंकाक)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुबई (यु.ए.ई)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इण्डोनेशिया</span>,  <span lang="hi" xml:lang="hi">मारीशस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हालैण्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केन्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युगान्डा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युगोस्लाविया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तंजानिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नेपाल आदि देश में भी व्यापक व वृहत् स्तर पर योग शिविर व अन्य कार्यक्रम आयोजित हो चुके हैं। उसके अतिरिक्त विभिन्न स्कूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉलेज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जेल व अन्य सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक व विविध कार्यक्रमों को सम्बोधित व प्रशिक्षित किया गया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">निराश जीवन में आशा की किरण है </span>‘<span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>’:</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राचीन काल से ही ऋषियों का उद्घोष रहा है कि - </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">शरीरमाद्यं खलुधर्म साधनम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म करने से लेकर जीवन में आनन्द प्राप्त करने तक का एक मात्र साधन स्वस्थ शरीर ही है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में भी रोग  न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसको मुख्य माना गया है। इसके लिए जरूरी है कि हम योग को जीवन में अपनी दिनचर्या का एक अभिन्न अंग बना लें। यह सच है कि रोगी होने पर आपके पास साधन हैं तभी बड़े-बड़े अस्पताल व संसाधनों का लाभ ले सकते हैं जबकि भारत में बसने वाले </span>33<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोगों सहित विश्व में करोड़ों की संख्या में रहने वाले वे लोग जो चिकित्सा की सोच भी नहीं पाते उनके लिए योग-प्राणायाम के रूप में संजीवनी बूटी मिल गयी है। योग उन लोगों के लिए भी वरदान साबित हुआ है जो साधन-सम्पन्न होने पर भी असाध्य रोगों के कारण मृत्यु को सुनिश्चित जान कर जीते जी मर रहे हैं। उनके पास साधन होने पर भी रोगोपचार का कोई मार्ग न था। वास्तव में योग प्राणायाम- ने उन करोड़ों लोगों का रोग रूपी अन्धकुओं में जाने से रोका है। जो हताश निराश थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके जीवन का सहारा बना- </span>‘<span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। जहाँ सारे रास्ते बन्द हो जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ रास्ता दिखाता है </span>‘<span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  भारत की विविधता में एकता को साक्षात् देखना है तो हमारे किसी शिविर में चले आइये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ वस्त्रों में तो भिन्नता हो सकती है पर दिलों में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रूप में भिन्नता हो सकती है पर मनों में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभिरुचियों में भिन्नता हो सकती है पर सृजनात्मकता में नहीं। यहाँ हिन्दू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुस्लिम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईसाईयों सहित कम्युनिस्टों की भागीदारी के रूप में सभी धर्मों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मतों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पन्थों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समुदायों एवं नास्तिकों तथा सभी भाषाओं एवं प्रान्तों सहित विभिन्न देशों का समागम दृष्टिगत होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> जहाँ गरीब से लेकर अमीर तक बालक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वृद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्त्री</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुष सब इस योग से कुछ पाने के लिए एक साथ लाखों की संख्या में बैठते हैं। वास्तव में जहाँ भी योग शिविर होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ रात नहीं होती। वहाँ सवेरा ही होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि रात को जिस समय सोने का समय होता है उस समय लोग योग कक्षा में जाने की तैयारी कर रहे होते हैं। चाहे सर्दी हो या गर्मी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्षा हो या आंधी-तूफान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पांच बजे की जगह- यह क्या</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">लोग सुबह दो तीन बजे ही योग शिविर की ओर दौड़ लगा रहे हैं। ओह!  क्या उमंग है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं दादी का हाथ थामे पोती साथ में है तो कहीं दादा के कन्धे पर बैठ कर योग कक्षा में भाग लेने को जाता हुआ पोता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या सुन्दर मनोहारी दृश्य है। सवेेरे भी सूनी सड़क पर कहीं जाम होता है तो वहाँ निश्चित ही शिविर चल रहा होगा। यदि इंगलैण्ड जैसे देश में जहां कहीं जाम नहीं लगता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां लोग प्रात: जल्दी सोकर उठते भी नहीं हैं वहां भी यदि कभी बिल्कुल सवेरे कहीं मार्ग में हजारों गाड़ियां लाईन में जाम लगाये खड़ी मिलें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और लोग कतारबद्व होकर एक ही ओर चले जा रहे हों तो निश्चय मान लें कि वहां योग शिविर होगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे जीवनोपयोगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज व राष्ट्रोपयोगी योग को विश्व निर्माण की अगली कड़ी से जोड़ने के लिए हम सब एक साथ बढ़ें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन में दिव्यता लायें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जून</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 01 Jun 2015 21:55:30 +0530</pubDate>
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                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/91.jpg"                         length="394817"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अंतर की उत्कट चाह है  तीव्र इच्छा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य प्रद्युम्रजी महाराज</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3056/there-is-a-strong-desire-for-difference"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/67.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> मनुष्य अच्छा-बुरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धार्मिक-अधार्मिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्वान्-मूर्ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्धन-सधन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्बल-सबल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञानी-अज्ञानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आदि इच्छा का ही प्रकट रूप है। मूलत: इच्छा रूपी बीज ही बाह्य परिस्थितियों से विकसित होता हुआ विशाल वृक्ष का रूप धारण कर लेता है। वैज्ञानिक तथ्य है कि बीज में जितनी अधिक शक्ति होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उतना ही वह नीचे गहराई में और ऊपर आकाश में अपनी विशालता को प्रकट करता है। जीवन के सन्दर्भ में भी इस इच्छा रूपी बीज की यही स्थिति है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    मानव जीवन में आने वाली समस्याएँ चाहे किसी भी स्तर की हों- आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनैतिक या मनोवैज्ञानिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकमात्र तीव्र इच्छा (</span>Burning Desire<span lang="hi" xml:lang="hi">) में ही उनका समाधान छिपा हुआ है।  मनुष्य मात्र का यह स्वभाव है कि जब तक किसी काम को न करने से उसका काम चलता रहता है अथवा उसके स्थान पर किसी दूसरे सरल विकल्प (</span>Alternative<span lang="hi" xml:lang="hi">) के द्वारा सन्तोष प्राप्त करने की सम्भावना दिखाई देती रहती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक वह अपनी उस इच्छा का स्थगन किये रहता है। पर जब काम नहीं चलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसके लिए मन में तीव्र इच्छा उपस्थित होती है जो स्वाभाविक  है। उस अवस्था में स्थगन के लिए कोई अवकाश नहीं रहता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न ही उसके स्थान में किसी अन्य विकल्प की ढूँढ-तलाश होती है। कम या ज्यादा रूप में प्रतिदिन ही यह विषय हम सबके अनुभव में आता रहता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    पैर में काँटा लगने पर सब तरफ से अपने मन को हटाकर उसे निकालना ही होता है। जाने या अनजाने में हमारे शरीर का कोई भी अङ्ग मल-मूत्र से छू जाने पर कोई स्थगन की बात नहीं सोचता। आँख में कुछ कष्टदायक चीज धूल या मच्छर आदि गिर जाने पर उसे निकालने पर ही शान्ति आती है। उदर में पीड़ा बढ़ जाने पर चाहे रात्रि के </span>12<span lang="hi" xml:lang="hi"> ही क्यों न बज रहे हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तत्काल किसी भी उपाय से डॉक्टर के पास पहुँच ही जाते हैं। एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिलेगा जो यह सोचकर सन्तुष्ट हो जाए कि प्रात: काल देखेंगे। हाँ! अवश्य ही यह विचार तब आता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब पीड़ा कम हो और उसे प्रात:काल तक सहन किया जा सके । </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">     मान लीजिए कोई व्यक्ति कहीं जा रहा है। अमूल्य आभूषणों से भरा थैला उसके पास है। मार्ग में किसी कुएँ पर उसे प्यास लगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह पानी पीता है। कुछ देर विश्राम करने के बाद प्रमाद वश उस थैले को वहीं छोड़कर पाँच मील दूर निकल जाता है। अकस्मात् उसे ध्यान आता है कि ओहो! थैला तो वहीं कुएँ पर छोड़ आया। कल्पना की जा सकती है- उस व्यक्ति में अपना थैला प्राप्त करने के लिए कितना अधिक उत्कट संवेग पैदा होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसी ही आन्तरिक उत्कट चाह का नाम है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">तीव्र इच्छा</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। इसी का दूसरा नाम है अभीप्सा (</span>Aspiration<span lang="hi" xml:lang="hi">) जैसे कोई व्यक्ति प्यास से मर रहा हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस समय सब ओर से उसका मन हटकर एक मात्र जल पर केन्द्रित हो जाता है अथवा कोई व्यक्ति ओलम्पिक में किसी प्रतियोगिता में भाग ले रहा हो एवं उस समय उसके मन-प्राण-इन्द्रियों की समस्त ऊर्जा एक क्षण के लिए भी अपने लक्ष्य से इधर उधर विचलित नहीं होती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस स्थिति का नाम है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">तीव्र इच्छा</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">घुटन जैसी व्याकुलता चाहिए:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   इस विषय में प्रतिदिन हमारे अनुभव में आने वाला एक मां का उदाहरण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माता कुछ काम कर रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छोटा बच्चा उसके पास है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बार-बार रुदन मचा कर माँ को उसके कार्य में विघ्न पहुँचा रहा है। माँ उसको शान्त करने के लिए उसके हाथ में एक खिलौना दे देती है। बच्चा कुछ देर के लिए चुप हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर कुछ समय बाद फिर पूर्ववत् रोना प्रारम्भ कर देता है। पहले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बालक को आँखों का विषय खिलौना (अक्षिलावण्य) दिया था। अब माँ उसके हाथ में दूसरी इन्द्रिय का विषय झुनझुना दे देती है। इस बार भी कुछ देर शान्त रह कर उसका फिर वही रुदन। माँ तीसरी बार इन्द्रिय का विषय एक पात्र में थोड़ा मधु उसके सामने रख कर चाटने के लिए  प्रेरित करती है। बच्चा कुछ समय के लिए फिर शान्त हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर इन अनित्य साधनों से कहाँ उसकी तृप्ति होने वाली है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">वह तो बार-बार माँ का अमृतरूप स्तन्यपान करने के लिए रुदन मचा पर वह माँ के द्वारा प्रस्तुत किये गए प्रलोभनों के फेर में पड़कर अपनी उस दिव्य इच्छा को भूल जाता था। लेकिन सभी प्रायोगों के बावजूद बच्चे की वह आन्तरिक प्यास अति प्रचण्ड हो उठी और किसी भी उपाय से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी भी साधन से जब वह बूझ न सकी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे उसी क्षण जब बच्चे ने पूर्ण रूप से अस्वीकार कर दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो माँ ने अन्त में उसे गोद में उठा लिया और एक मात्र उसकी अन्तिम इच्छा को पूरा किया। इससे स्पष्ट है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि व्यक्ति अपने लक्ष्य को भूलकर किसी अन्य तरीके से सन्तुष्ट हो जाता  अथवा कुछ समय के लिए स्थगन को स्वीकार कर लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो समझना चाहिए अभी तीव्र इच्छा जागृत नहीं हुई है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   मान लीजिए हमसे कोई शक्तिशाली हमारा पूज्य व्यक्ति हमको किसी जलकुण्ड में दबा लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा श्वास घुटने लगता है। हम बाहर निकलना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर वह हमसे शक्तिशाली है। उस समय हम उस व्यक्ति के साथ पूज्यता की मर्यादाओं को भी तोड़कर किसी भी उपाय से बाहर निकलना चाहते हैं बेशक उसके हाथ को अपने दाँत से काटना पड़े- वह भी कर सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर किसी भी तरह एक क्षण का विलम्ब सहन नहीं करते। यह है तीव्र इच्छा का वास्तविक स्वरूप। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रलोभन से मुक्त तीव्र इच्छा:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्री महाराज हमें समझाते हैं कि जो कुछ भी प्राप्त करना चाहते हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीव्र इच्छा के रूप में उस विषय की आग तुम्हारे अन्दर निरन्तर जलती रहनी चाहिए। वे कहते हैं- यह आग किसी अज्ञात कारण से भी जल सकती है और जलाई भी जा सकती है। उनका कहना है कि जो कुछ तुम चाहोगे उसमें भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाधा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रलोभन तो अवश्य आयेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर यदि तीव्र इच्छा होगी तो अन्त में तुम्हारी विजय होगी। मात्र इसी एक महान् साधन के द्वारा लक्ष्य पर एकाग्रता तथा अन्य सबकी उपेक्षा हो पाएगी। इसलिए इसे जितना बढ़ाया जा सके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उतना ही थोड़ा है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">परमात्मा के लिए तीव्र इच्छा:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्री महाराज एक बार हम लोगों से कहने लगे- अरे! तुम कभी मेरे पास आकर रोये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिलखे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तड़पे</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् केवल कोरी बातें बनाने से या ऊँचे-ऊँचे प्रवचन सुनने मात्र से नहीं मिलेगा। उसके लिए एक सच्ची तड़प चाहिए। ऐसी तड़प जो किसी भी भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाधा या प्रलोभन से न दबाई जा सके। जब तक भगवान् के लिए अपने हृदय में दीपक की अकम्पित लौ जैसी तीव्र इच्छा की आग नहीं जलाओगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक कुछ भी सिद्ध होने वाला नहीं है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महाराज श्रीअरविन्द के द्वारा वैयक्तिक प्रयत्न के रूप में निर्दिष्ट तीव्र इच्छा (अभीप्सा)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्वीकार (त्याग) व समर्पण से युक्त त्रिविध अभ्यास की चर्चा करते हुए कहते हैं कि भगवान् अर्थात् आध्यात्मिक जीवन के लिए तीव्र इच्छा उत्पन्न होने पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति के द्वारा उपस्थित की गई बाधाओं का अस्वीकार सहज ही हो जाता है और जब ये दोनों बातें पूर्ण हो जाती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उस परम सत्ता के प्रति अपने आपको समर्पण करने में कुछ कठिनाई नहीं होती। इस प्रकार साधना के अन्तिम स्तर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">समर्पण</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">तक पहुँचाने वाली तीव्र विद्या इच्छा ही है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समर्पण तक ही साधक के व्यक्तिगत प्रयत्न का उपयोग रहता है। आगे तो भगवान् स्वयं व्यक्ति की आत्मा में उतरकर सब कुछ अपने हाथ में ले लेते हैं। इसलिए कहते हैं- तीव्र इच्छा और कृपा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब ये दो शक्तियाँ मिलती हैं तो वह महान् और दुरूह कार्य भी सिद्ध हो जाता है जो हमारे प्रयास का विषय बना हुआ है। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">तीव्र इच्छा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">व उसके साथ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आसुरी प्रवृत्ति का परिवर्जन</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">व </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण समर्पण</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इस वैयक्तिक प्रयत्न रूप त्रिक के अनुपात में ही कृपा का उत्तर मिलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही जीवन पुरूषार्थ का अंतिम सत्य है। आइये हम अपनी सद्-इच्छाओं को तीव्र करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य अनुदान का हक पायें। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जून</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 01 Jun 2015 21:53:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नेत्र, मूत्रकृच्छ्र तथा त्वचा रोगों में लाभकारी 'ककड़ी’</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य </span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">बालकृष्ण</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3057/-cucumber--beneficial-in-eye--urinary-tract-and-skin-diseases"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/26.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक नाम     :      </span>Cucumis melo var.utilissimus Duthie &amp; Fuller.</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कुलनाम              :      </span>Cucurbitaceae</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अंग्रेजी नाम         :      </span>Snake cucumber</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृत                :      एर्वारु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्कटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुकाण्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बृहत्फल</span>;</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हिन्दी                  :      ककड़ी</span>;</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उर्दू                     :      ककरी</span>;</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गुजराती             :      कांकड़ी</span>;</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कन्नड़                 :      सौते</span>;</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तेलुग                  :      दोसकाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खर्बुजा दोसा</span>;</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तमिल                 :      वेल्लुरिक्कै</span>;</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बंगाली                :      काकुर</span>;</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मराठी                :      ककड़ी</span>;</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मलयालम           :      कक्करीका</span>;</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अरबी                 :      किस्साकदम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कसद</span>;</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">फारसी               :      ख्यार जॉब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ख्यार दराल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खीयाजर्द</span>;</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   भारतीय आयुर्वेद में औषधि वह जो रोगी में सतत् आरोग्य का विश्वास पैदा कर उसे रोग से निजात दिलाये। चूंकि शरीर का सीधा संबंध प्रकृति से है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: रोग भी प्रकृतिगत असंतुलन से ही पैदा होते हैं। ऐसे में औषधि प्रकृतिस्थ तत्वों से युक्त होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त  यदि दवा के नाम पर किन्हीं रासायनिक तत्वों का प्रयोग शरीर पर करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो तत्काल न सही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी न कभी तो वह शरीर के साथ विद्रोही तेवर दिखायेगा ही। अक्षय आरोग्य के लिए आवश्यक है कि शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक रोग में प्रकृति के बीच से ही औषधि की खोज करें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   औषधि के नाम पर परमात्मा के इस शरीर रूपी मंदिर के साथ हो रहे अत्याचार को समाप्त करने के लिए ही वनौषधियों पर पतंजलि आयुर्वेद द्वारा गहन अनुसंधान के पश्चात् रोग की प्रकृति के अनुसार उनके अनुपान का निर्धारण भी किया गया। उन्हीं निष्कर्षों के अनुरूप </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वनौषधियों में स्वास्थ्य</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रृंखला प्रस्तुत है। परिजन इन प्रयोगों को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद जड़ी-बूटी रहस्य</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">पुस्तक में विस्तार से पढ़ सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे अपनाकर हर कोई अक्षुण्य आरोग्य का स्वामी बन सकता है। इस अंक में प्रस्तुत है वनौषधि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ककड़ी</span>’...</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सु</span><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रुत संहिता में मूत्र रोगों के निवारणार्थ ककड़ी का प्रयोग बताया गया है। भारत में मुख्यत: उत्तर प्रदेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तराखण्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिहार तथा पंजाब आदि प्रान्तों में नदियों के किनारे इसकी खेती की जाती है। शीत प्रधान गुण होने से ककड़ी का सेवन अत्यधिक मात्रा में नहीं करना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">औषधीय प्रयोग-विधि:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नेत्र रोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1.   <span lang="hi" xml:lang="hi">नेत्रशूल-ककड़ी के ताजे फलों के टुकड़ों को नेत्र पर रखने से नेत्र शूल का शमन होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>वृक्क वस्ति रोग</strong></span>:</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1.  <strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">मूत्रविकार-</span></strong>2-3<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम ककड़ी के बीजों को पीसकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जल में घोलकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नमक-रहित या हल्का नमक मिलाकर सेवन करने से मूत्रकृच्छ्र (दर्द सहित मूत्र त्याग) में लाभदायक होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">2.   <span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>मूत्रकृच्छ्र-</strong>ककड़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खीरा तथा कुसुम्भ के बीजों को पीसकर </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम चूर्ण में </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम वासा पत्र कल्क तथा </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली द्राक्षा-स्वरस मिलाकर अथवा शीतकषाय (हिम) बनाकर पीने से सभी प्रकार के मूत्रकृच्छ्रों में लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">3.   </span>2-5<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम ककड़ी-बीज चूर्ण में मुलेठी तथा देवदारु का सार भाग मिलाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चावल के धोवन के अनुपान के साथ सेवन करने से पैत्तिक मूत्रकृ च्छ्र में लाभ मिलता हैै।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">4.   <strong>मूत्रदोष-</strong>ककड़ी के </span>5-10<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम कल्क</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वरस (</span>5-10<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली) अथवा बीज चूर्ण (</span>5-10<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम) को प्रात:काल दूध के साथ पीने से मूत्रदोषों में लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">5.   <strong>मूत्रघात- </strong>ककड़ी बीज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुलेठी तथा दारुहल्दी की छाल को पीसकर उसका कल्क बना लें</span>, 5-10<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम कल्क को  चावल के धोवन के साथ पीने से पित्तज मूत्रघात (मूत्र न बनना) में लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">6.   समभाग नरसल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाषाणभेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्भ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खीरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ककड़ी बीज तथा विजयसार के चूर्ण में आठ गुना दूध तथा बत्तीस गुना जल मिलाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूध शेष रहने तक पकायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर दूध में चौथाई भाग घी मिलाकर पीने से मूत्रघात </span>(<span lang="hi" xml:lang="hi">मूत्र न बनना) शीघ्र ठीक होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">7.  <strong>पथरी- </strong>ककड़ी के </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम बीजों को पीसें उसमें </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम मिश्री मिलाकर </span>50<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली जल में घोलकर पिलाने से पथरी में अत्यन्त लाभ मिलता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">8. <strong> मूत्रदाह- </strong>ककड़ी के </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम बीजों को जल के साथ पीसकर उसमें </span>65<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिग्रा यवक्षार मिलाकर पिलाने से मूत्र की जलन मिटती है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">9.   त्रिफला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ककड़ी (खीरा) के बीज तथा सैंधवनमक को समान मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें (</span>1-2<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम चूर्ण को) गर्म जल के साथ पिलाने से मूत्रकृच्छ्र ठीक होता है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/26.jpg" alt="26" width="800" height="600"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजननसंस्थान रोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1.   <strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गर्भिणी शूल- </span></strong>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम कर्कटी मूल को </span>100<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली दुग्ध में पका-छानकर पीने से गर्भिणी स्त्री के शूल का शमन होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचा रोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1.  <span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विपादिका- </strong>पोई-शाक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरसों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्कारु तथा ककड़ी के क्षार जल में तिल के तेल को पका कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें सेंधानमक डालकर मालिश करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पैरों का फटना शीघ्र ठीक हो              जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">2.   <span lang="hi" xml:lang="hi">युवान पिड़िका-ककड़ी फल स्वरस को मुंह पर लगाने से कील</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुहासे आदि दूर होते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">3.   <span lang="hi" xml:lang="hi">ककड़ी को पीस कर चेहरे पर लगाने से चेहरे का रंग निखरता है। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>वनौषधियों में स्वास्थ्य</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जून</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 01 Jun 2015 21:51:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अनुभूति आपकी</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">माइग्रेन से मुक्ति</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> स्वा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">मी जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं 2005 जुलाई में रेलवे से सेवानिवृत्त हुआ। इसके पहले मैं लगभग बीस वर्षों से लगातार माइग्रेन से पीड़ित रहा। कभी 15 दिन या कभी एक महीना अन्तर देकर एक तरफ का सिर दर्द पकड़ लेता था और यह चार-पाँच दिनों तक लगातार बना रहता था। दवा खा-खा कर उसी में मैं अपने ड्यूटी का निर्वहन करता रहा। वर्ष 2004 में जुलाई में मेरे आवास पर एक सरकारी टीवी रख दिया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके माध्यम से आस्था चैनल पर आपका प्रोग्राम देखा करता था। टीवी पर देखकर ही मैंने प्राणायाम करना शुरू किया</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3058/anubhuti-apki"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/661.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">माइग्रेन से मुक्ति</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> स्वा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">मी जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं 2005 जुलाई में रेलवे से सेवानिवृत्त हुआ। इसके पहले मैं लगभग बीस वर्षों से लगातार माइग्रेन से पीड़ित रहा। कभी 15 दिन या कभी एक महीना अन्तर देकर एक तरफ का सिर दर्द पकड़ लेता था और यह चार-पाँच दिनों तक लगातार बना रहता था। दवा खा-खा कर उसी में मैं अपने ड्यूटी का निर्वहन करता रहा। वर्ष 2004 में जुलाई में मेरे आवास पर एक सरकारी टीवी रख दिया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके माध्यम से आस्था चैनल पर आपका प्रोग्राम देखा करता था। टीवी पर देखकर ही मैंने प्राणायाम करना शुरू किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लगभग छ: महीने प्राणायाम करते-करते मुझे माइग्रेन से पूर्णत: मुक्ति मिल गई। उस समय से मैं नियमित रूप से प्राणायाम करता हूँ एवं परिचित लोगों को इसे करने के लिए प्रेरित भी करता रहता हूँ। मेरी उम्र वर्तमान में सत्तर वर्ष है। मैं आपकी कृपा से पूर्णत: स्वस्थ हूँ। अन्त में पुन: कोटिश: नमन। </span></h5>
<h6 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भवदीय</span>,</strong></h6>
<h6 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रमेश प्रसाद सिंह</span></strong></h6>
<h6 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सेवानिवृत्त रेलवे अधिकारी</span>, </strong></h6>
<h6 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मोहल्ला-अतरदह रोड नं-2</span></strong></h6>
<h6 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पोस्ट-रमना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिला-मुजफ्फरपुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिन- 842002</span></strong></h6>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/661.jpg" alt="66" width="800" height="644"></img></span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग-प्राणायाम से मिला नया जीवन</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span lang="hi" xml:lang="hi">प</span><span lang="hi" xml:lang="hi">रम पूज्य बाबा जी को कोटि-कोटि नमस्कार!</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्री बाबा जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं सिर दर्द से लगभग २५ वर्षों से परेशान था। एक दिन टेलिविज़न में आस्था चैनल में आपका योग का कार्यक्रम देखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी दिन से मैं भस्त्रिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कपाभाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुलोम-विलोम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रामरी आरम्भ कर दिया। मुझे पहले ही दिन से सिर दर्द में बहुत आराम मिला। साथ ही पीठ दर्द में भी लाभ शुरू हो गया तो प्राणायाम करने के लिए मैं दृ़ढ़ संकल्पित हो गया। तब से लगातार भस्त्रिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कपालभाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुलोम-विलोम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रामरी आदि प्रारंभ है। मुझे योग-प्राणायाम से नया जीवन मिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं अब आपके दर्शन हेतु हरिद्वार अवश्य आऊँगा। </span></h5>
<h6 style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भवदीय</span>,</strong></h6>
<h6 style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">राम सुख गुप्ता</span></strong></h6>
<h6 style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जैतहरी रोड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वार्ड क्रमांक १०</span></strong></h6>
<h6 style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">शासकीय तुलसी महाविद्यालय अनूपपुर के पास</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">जिला-अनूपपुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश</span></strong></h6>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>दिव्य अनुभूति</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जून</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 01 Jun 2015 21:50:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>स्वप्नदोष किशोर-युवाओं का मानस भ्रम या रोग</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. नागेन्द्र नीरज</span></strong><strong><span>, </span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">निदेशक-योगग्राम</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3059/nocturnal-hallucinations-or-mental-illness-of-teenagers"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/681.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  स्वप्रदोष को लेकर विश्व भर में असंख्य लोग गुमराह हैं। जीवन जीने की ऋषि प्रणीत विरासत से अनजान होने के कारण यह भ्रम अधिक बढ़ा। तथाकथित चिकित्सक इसका लाभ उठाते हैं और तथाकथित रोगी कंगाली-बदहाली के दिन गिनता है। स्वप्रदोष को आयुर्वेद में स्वप्र प्रमेह</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">एलोपैथी में नाइट पॉल्यूसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेट ड्रीम्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नेकटारनल एमिसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नाइट डिस्चार्ज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नाइट फॉल</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">यूनानी में बदख्वाब या एहकलाम कहते हैं। यह इतनी बड़ी बीमारी नहीं है जितना कि इसके सम्बन्ध में बढ़ा-चढ़ा कर कहा जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">धा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">तु-दौर्बल्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीघ्र-स्खलन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुक्र-तारल्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीघ्र-पतन आदि एक-दूसरे से जुड़े हुए मन:स्नायविक दुर्बलता के रोग हैं। आयुर्वेद के अनुसार भोजन पचकर रस प्रदान करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अवचूषित एवं सात्म्यीकृत होकर रक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तसे माँस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माँस से मेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेद से अस्थि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्थि से मज्जा तथा मज्जा से वीर्य का निर्माण होता है। वीर्य या रस ही ओज बन जाता है। मानव में पौरुष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पराक्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्साह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साहस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शूरत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धैर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्य एवं चिन्तन की क्षमता सभी कुछ इसी ओज पर निर्भर है। वीर्य एक महत्वपूर्ण तथा अत्यन्त पराक्रमी धातु है। वीर्य शुक्राणु ही नहीं है। वीर्य जीवन का आधार है। वीर्य धातु का सबल एवं सशक्त होना ही इसकी सुरक्षा है। चटपटे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तेजक आहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माँस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मदिरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विकृत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कामुक विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिन्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव तथा असंयमित जीवन से पाचन संस्थान दूषित होता है। पाचन संस्थान दूषित होने से सप्त धातु विकृत एवं दूषित होते हैं। तब गोनोरिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिफलिस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुजाक आदि रतिज (वी.डी.) रोगों के कारण शुक्र तथा वीर्य में विकृति आ जाती है। वे अधिक तरल हो जाते हैं। परिणामत: उत्तेजना तथा बिना उत्तेजना के ही वीर्य पतला होने से स्खलित होने लगता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजनन विशेषज्ञ डॉ. टी.सी. आनन्द के अनुसार वाहनों से निकलने वाले धुएँ में मौजूद सीसे के जहरीले प्रभाव से भी शुक्राणु संक्रमित एवं प्रदूषित होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जॉन हॉपकिन्स विश्वविद्यालय (अमेरिका) द्वारा कुछ पुरुषों पर किये गये अध्ययन से ज्ञात हुआ कि पुरुष सेक्स हार्मोन टेस्टोस्टेरॉन की सक्रियता एवं स्राव से पुरुषों में गणितज्ञ एवं इंजीनियर बनने की क्षमता बढ़ जाती है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यूनिवर्सिटी ऑफ मेरी लैण्ड मेडिकल सिस्टम के मेडिसिन विभाग के प्रो. डॉ. थॉमस डोन्नर इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि टेस्टोस्टेरॉन पुरुषों में कामेच्छा को तीव्र तो करता ही है साथ ही उनकी माँसपेशियों तथा हड्डियों को सुदृढ़ एवं शक्तिशाली बनाता है। टेस्टोस्टेरॉन बौद्धिक क्रियाशीलता यानि बुद्धि-लब्धांक को भी बढ़ाता है। जबकि इसका अपना विज्ञान है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">युवावस्था में कामेच्छा नैसर्गिक एवं स्वाभाविक है। जरूरत है उचित शिक्षण द्वारा काम ऊर्जा को सृजनात्मक कार्यों- लेखन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्रकला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बागवानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुटीर उद्योग आदि में रूपान्तरित करने की प्रेरणा एवं प्रशिक्षण देने की। फिर भी जब अचेतन में दमित वासनाएँ प्रतिबंधित नहीं होती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन अपनी मनमानी करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही स्वप्रदोष है। स्वप्रदोष प्राय: पुरुषों का रोग है। कभी-कभी युवतियों में भी इसके लक्षण दिखते हैं परन्तु अत्यन्त कम।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिस प्रकार युवावस्था में यौन ग्रंथियों के सक्रिय होने से दाढ़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूँछें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काँख तथा गुप्तांगों में बाल आना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वर में परिवर्तन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वीर्य निर्माण तथा स्वप्रदोष ऐसी ही स्थितियाँ हैं। स्वप्रदोष एक प्राकृतिक प्रक्रिया होने के कारण ही इसका रोग के रूप में आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों में कहीं भी उल्लेख नहीं है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पर </span>'<strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अति सर्वत्र वर्जयेत्</span>’</strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे ध्यान में रखना चाहिए। महीने में स्वप्रदोष अनेक बार होने लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो तुरन्त सावधान हो जाना चाहिए। बार-बार स्वप्रदोष होना मनोदैहिक लैंगिक स्नायविक रोग मानकर इसका शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मिक एवं स्नायविक उपचार करना आवश्यक है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बार-बार स्वप्रदोष का कारण:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कब्ज़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुदाकृमि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मंदाग्रि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपचन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुजाक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुर्दे तथा वृषण में गाँठ तथा अन्य रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पथरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जलोदर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्लीहोदर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपदंश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बवासीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अजीर्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक तनाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विषाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शोक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रात को देर तक जगना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिन में काफी देर तक सोये रहना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रम विहीन बैठे-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">बै</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ठाले जीवन यापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बार-बार मूत्रेन्द्रिय का स्पर्श करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निरन्तर गन्दे एवं कामोत्तेजक चिन्तन में लीन रहना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अश्लील उपन्यास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पत्र-पत्रिकाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कविताएँ एवं साहित्य पढ़ना तथा सुनना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विभिन्न चैनलों पर प्रसारित होने वाले कामोत्तेजक दृश्यों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गीतों तथा संवादों को देखना एवं सुनना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कामुक वस्त्रों एवं अन्य सामग्री का प्रचलन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गर्भ निरोधक साधनों का विज्ञापन आदि कारणों से दिमाग में स्थित सेक्स का केन्द्र निरन्तर उत्तेजित होते रहने से स्वप्रदोष की पुनरावृत्ति बार-बार होती है। चाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉफी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चीनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तले-भुने आहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माँस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मदिरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मछली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैदा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लहसुन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्याज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हलवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मावा तथा गरिष्ठ एवं उत्तेजक आहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अति आहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गर्म-मिर्च</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मसाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पान मसाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुपारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धूम्रपान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नशीली-उत्तेजक मादक औषधियाँ आदि स्नायविक दुर्बलता पैदा करती हैं चूंकि इसका सीधा संबंध मनुष्य की सोच चिंतन से है। यदि विचार साधे न गये तो स्वप्रदोष स्थायी होने लगता है। वीर्य अधिक निर्बल एवं पानी की तरह पतला हो जाता है। आदर्शवादी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सकारात्मक सोच वीर्य जैसी जीवनी शक्ति को पोषित करता है पर जैसे ही अचिन्त्य व अश्लील चिंतन शुरू होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे ही आंतरिक मंथन नकारात्मक दिशा में होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वप्रदोष प्रारम्भ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वप्रदोष काल:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विख्यात यौन विज्ञानी अल्फ्रेड किन्स का मानना है कि प्राय: हर व्यक्ति सेक्स के सपने देखकर स्वप्रदोष का शिकार होता है। जो व्यक्ति जितना शिक्षित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धिवादी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समझदार तथा ऊँची कल्पना शक्ति वाला होता है उसे उतने ही ज्यादा स्वप्रदोष होते हैं। पुरुषों में 20 वर्ष की आयु में तथा स्त्रियों में 35 वर्ष की आयु में सेक्स एवं अश्लीलता से जुड़े ज्यादा सपने आते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राय: 15 से 25 वर्ष की उम्र तक स्वप्रदोष के लक्षण ज्यादा उग्र होते हैं। वैसे बीमारी के रूप में स्वप्रदोष कभी भी हो सकता है। रात्रि के अंतिम पहर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साढ़े तीन से छ: बजे के मध्य जिसे ब्रह्म मुहूर्त कहा गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वप्रदोष की शिकायत ज्यादा होती है। इस काल में सोये रहने से मन का अर्धचेतन एवं अचेतन हिस्सा ज्यादा सक्रिय रहता है। परिणामत: स्वप्रदोष इसी काल में ज्यादा होते हैं। इसीलिए ब्रह्मचर्य पालन तथा स्वप्रदोष से बचने के लिए ब्रह्म मुहूर्त में उठना अनिवार्य है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वायुदोष की वृद्धि होने से वीर्य पतला हो जाता है तथा थोड़ी सी उत्तेजना से ही बार-बार निकल जाता है। कई लोगों में रात्रि को 2-3 बार स्वप्रदोष होने लगता है। जो स्वास्थ्य को नष्ट करने वाला लक्षण है। इसमें शुक्र धारण करने वाले प्रजनन अंग अत्यधिक दुर्बल हो जाते हैं। जिन्हें शक्तिशाली बनाने से ही स्वप्रदोष से मुक्त हुआ जा सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभाव:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बार-बार स्वप्रदोष होने पर शरीर क्षीणकाय तथा पित्त वर्ण दिखने लगता है। आलस्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुस्ती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिर दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाण्डुता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सारे शरीर में दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओज रहित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कान्तिहीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुरझाया चेहरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीव्र हृदय की धड़कन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दृष्टि तथा स्मरण शक्ति का ह्रास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकाग्रता की कमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुंठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदासी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिड़चिड़ापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निराशा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निरुत्साह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असमय एवं अकारण बाल सफेद होना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जनन तंत्र की दुर्बलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधिक ताप की अनुभूति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जननयंत्र संचालक स्नायविक (एरेक्शन तथा एमिसन) केन्द्र में अस्वाभाविक उत्तेजना से स्नायविक दुर्बलता तथा नर्वस ब्रेक डाऊन के लक्षण दिखते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">लिम्बिक सिस्टम भी समझें:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कामेच्छा का मूल केन्द्र दिमाग के बीचों बीच वाले क्षेत्र </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">लिम्बिक सिस्टम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">में होता है। इसे सेक्स आर्गेन ब्रेन भी कहते हैं। लिम्बिक सिस्टम द्वारा ही काम-केलि-क्रीड़ा (स्द्गष्ह्वड्डद्य स्नह्वठ्ठष्ह्लद्बशठ्ठ) नियंत्रित होती है। स्वप्रावस्था में समागम की स्थिति में रीढ़ के माध्यम से उत्तेजनात्मक पैरासिम्पैथेटिक आवेग ज्ञानेन्द्रिय तथा जननेन्द्रिय में उद्दीपन परिवर्तन लाते हैं। परिणामत: गुप्तांग उत्तेजित हो उठते हैं। सेक्स हार्मोन टेस्टोस्टेरॉन आदि का स्राव बढ़ जाता है। काल्पनिक संभोग जैसी स्थिति होने से सिम्पैथेटिक आवेग का तीव्र उद्दीपन तथा सुषुम्ना की रिफ्लेक्स क्रिया के कारण शुक्र-स्खलन प्रारम्भ हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">20 वर्ष की आयु में रूमानी मधुर सपने ज्यादा आते हैं। किन्स ने यह भी पता लगाया कि 83 प्रतिशत किशोर तथा युवा स्वप्रदोष के शिकार होते हैं। इससे अचेतन मन में दफनाए गए दमित सेक्स सम्बन्धी भ्रान्तिपूर्ण विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिन्ता तथा सोचने-समझने से कमजोरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुंठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थकान तथा अन्य लक्षण दिखते हैं। जागने पर चेतन में ग्लानि पैदा होती है कि कुछ गलती हो गयी जिसके कारण मन में गाँठें एवं कुंठा बन जाती है। इस प्रकार की कुंठाएँ शारीरिक एवं मानसिक रोग को जन्म देती हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">माना जाता है कि वीर्य खोने से चेहरे का लावण्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सौन्दर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेजस्विता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कान्ति तथा प्रतिभा कम हो जाती है। शरीर रुग्ण हो जाता है। शक्ति क्षीण हो जाती है। आँखें धंस जाती हैं। उनके नीचे काले धब्बे बन जाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ वीर्य के लक्षण:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ अण्डकोष हमेशा 2 से 3 अरब शुक्राणु उत्पादन के दौर से गुजर रहे होते हैं। 70 से 80 दिनों में वे परिपक्व हो जाते हैं। अण्डकोष में थोड़ी सी भी विकृति या खराबी होने पर अरबों की संख्या में शुक्राणु प्रदूषित हो जाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेदज्ञ सुश्रुत के अनुसार स्वस्थ एवं शुद्ध वीर्य स्फटिक के समान श्वेत वर्ण का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षारीय प्रतिक्रिया वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्रव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्निग्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधु की गन्ध वाला होता है। चरक के अनुसार मात्रा में अधिक शुक्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधिक सघन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गाढ़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेसदार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्निग्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुर्गन्ध रहित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारी तथा श्वेत रंग का वीर्य स्वस्थ वीर्य कहलाता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार शुक्र में ७० से ८० प्रतिशत पानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शेष फॉस्फोरस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रोटीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फॉस्फेट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुक्राणु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुक्र कण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एल्ब्युमिन यानि अण्डे की सफेदी वाला तत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लीकर सेमिनस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ हार्मोन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वर्ण अंश आदि रहते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वप्रदोष के उपाय:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वप्रदोष के रोगियों को प्राय: कब्ज़ की शिकायत रहती है। उपचार में सर्वप्रथम रोगी को आधा घण्टे के लिए पेड़ू तथा सिर पर मिट्टी की पट्टी रखें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब भी नहायें उसके पूर्व नल से या लोटे से पेड़ू तथा रीढ़ के नीचे वाले हिस्से पर 5-10 लोटे ठण्डा पानी डालें। तत्पश्चात् स्नान करें। इससे रीढ़ के स्नायु उद्दीप्त होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिवर्त्त प्रभाव से अण्डकोष की शुक्राणु-उत्पादक कोशिकायें शक्तिशाली होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी कार्य क्षमता बढ़ जाती है और स्वप्रदोष से राहत मिलती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रात्रि को सोने से पूर्व मूत्र-त्याग करें। दोनों पैर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हाथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेट तथा पीठ के पीछे खूब ठण्डे पानी से धो-पोंछकर सोयें। पेट तथा पीठ के बल लेटें। यथासंभव बायीं करवट सोयें। रात्रि को सोने से पूर्व 5-10 मिनट खुले सकारात्मक विचारों के साथ टहलें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तत्पश्चात् मंगल मैत्री भावना करते हुए सो जायें। सोने के पूर्व चिन्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईर्ष्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वेष आदि संवेगों को एक तरफ रखकर सोयें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>यौगिक उपाय</strong></span>:</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वप्रदोष को दूर करने में उड्डियान बन्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूल बन्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अश्विनी मुद्रा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नौलि क्रिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जानुशीर्षासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिमोत्तानासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्धासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वज्रासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्त वज्रासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पद्मासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग मुद्रा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरुदण्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्नायु शक्ति विकासक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विपरीतकरणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वांगासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हलासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मयूरासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीर्षासन तथा शवासन सकारात्मक चमत्कारिक प्रभाव डालते हैं। रीढ़ को सीधा रखते हुए बैठें। साँस निकालते हुए पेट को पीठ से लगाने का प्रयास करें। आन्तरिक बल द्वारा गुदा तथा मूत्रेन्द्रिय को खींचें। यह क्रिया सुबह-शाम ३ से ५ मिनट खाली पेट करें। प्राणायाम तथा ध्यान का अभ्यास किसी योग्य योग चिकित्सक के निर्देशन में करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्ममुहूर्त में जागरण:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इच्छा शक्ति को जाग्रत कर प्रात:काल ५ बजे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्म मुहूर्त में उठकर टहलने से स्वप्रदोष में अद्भुत लाभ मिलता है। मन को उत्तेजित करने वाले अश्लील</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तेजक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिल्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टी.वी. तथा ऐसी चर्चा आदि से बचें। जब भी मन में दुर्विचार उठें उस समय पढ़ने-लिखने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेन्टिंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बागवानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खेल आदि सृजनात्मक कार्यों में लग जायें। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">खाली मन शैतान का घर</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: कुछ-न-कुछ करते रहना ही इसका हल है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बदलें आहार पद्धति:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वप्रदोष के रोगी को गरम तथा उत्तेजक आहार का सेवन पूर्णतया बन्द कर देना चाहिए। इसमें फास्टफूड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चटपटा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तला-भुना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चटोरापन आदि आता है। सुपाच्य एवं प्राकृतिक आहार का प्रयोग करें। स्वप्रदोष काफी विकृति स्थिति में पहुँच गया हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वैसी स्थिति में एक दिन मौसमानुसार फल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फलों का रस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब्जियों का रस तथा जलोपवास पर रखें। पुन: इसी क्रम में आठ दिन पश्चात् सामान्य आहार पर आयें। योगासन या टहलने के 20 मिनट बाद सामान्य आहार में बादाम 7</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंजीर 5</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुनक्का 15 तथा मौसमानुसार फल 300 ग्राम तथा एक गिलास दूध में डेढ़ चम्मच शहद मिलाकर लें। पालक के रस में गूँधे मोटे आटे की रोटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब्जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सलाद तथा दही लें। मध्याह्न काल में मौसमानुसार फल या फलों का रस तथा अपराह्न काल में मौसमानुसार सब्जी का रस या सूप लें। सब्जियों में गाजर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पालक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टमाटर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चुकन्दर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लौकी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुदीना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धनिया (15-15 ग्राम) का रस का सूप लें। सांयकालीन भोजन ६-७ बजे तक कर लें। रोटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब्जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सलाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चटनी आदि लें। खाकर तुरन्त सोने से स्वप्रदोष होने की शिकायत ज्यादा बढ़ जाती है। स्वप्रदोष के रोगी साने के पूर्व दूध नहीं लें। सायंकालीन भोजन हल्का ही लें। पतंजलि निर्मित जौ का दलिया कारगर साबित हुआ है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ आवश्यक खनिज:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक शोधों के अनुसार जस्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वर्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विटामिन-ई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बी तथा ए के अभाव में शुक्राणुओं की संख्या एवं गतिशीलता में कमी आ जाती है। वीर्य पतला हो जाता है तथा स्वप्रदोष की शिकायत होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ. कर्टिश हंट ने अपने प्रयोगों से यह सिद्ध किया है कि जस्ते का सीधा सम्बन्ध वीर्य से है। एक प्रयोग के दौरान देखा गया कि रोज की खुराक में १० मिग्रा. जस्ते को घटाकर एक मिग्रा. करने से शुक्राणुओं की मात्रा एक तिहाई रह गयी क्योंकि वीर्य की मात्रा घटने से फर्टिलिटी कम हो जाती है। डॉक्टर हंट के अनुसार प्रतिदिन १०-१५ मिग्रा. जस्ता वाला आहार अवश्य लें। जस्ते का श्रेष्ठतम स्रोत सूर्यमुखी तथा कद्दू का बीज है। इसके अतिरिक्त सभी प्रकार के अंकुरित अनाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताजे फल एवं ताजी हरी सब्जियों में जस्ता मिलता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विभिन्न शोधों एवं प्रयोगों में पाया गया है कि शुक्राणुओं तथा वीर्य की सुरक्षा के लिए विटामिन-सी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विटामिन-इ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एण्टी ऑक्सीडेज एन्जाइम चमत्कारिक आहार है। तले-भुने फास्ट फूड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माँसाहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंडा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वसा वाले आहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शराब तथा धूम्रपान के ज्यादा प्रयोग से फ्री-रेडिकल्स ज्यादा बनते हैं। फ्री-रेडिकल्स कोशिकाओं में जंग पैदा करते हैं जो फुर्तीले शुक्राणुओं को आपस में चिपका कर नष्ट कर देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुक्राणुओं के डी.एन.ए. को भी परिवर्तित कर देते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तो क्यों न हम ऋषि प्रणीत परम्पराओं एवं आयुर्वेद सम्मत आहार लें और ऐसे रोगों से बचकर जीवन को स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संकल्पशील बनायें। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>रोग विशेष</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जून</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3059/nocturnal-hallucinations-or-mental-illness-of-teenagers</link>
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                <pubDate>Mon, 01 Jun 2015 21:49:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>एक वजीर, एक फकीर की जोड़ी ने योग को किया विश्वपटल पर स्थापित</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. जयदीप आर्य</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3060/the-pair-of-a-minister-and-a-fakir-established-yoga-on-the-world-stage"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/651.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   य</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ह सत्य है कि योग को अन्तरराष्ट्रीय राजनैतिक मंच की </span>69<span lang="hi" xml:lang="hi">वीं यू-एन- जनरल एसेम्बली में भारत के माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी जी ने अपनी शौर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साहस भरी हुई ओजस्वी वाणी में विश्व समुदाय को योग की महत्ता को समझाते हुए उसे अपनाने का प्रस्ताव रखा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   परन्तु यह भी निर्विवादित सत्य है कि विश्व समुदाय द्वारा योग को अपनाये जाने का जो यह वातावरण तैयार हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस वातावरण के निर्माण में किसी व्यक्ति विशेष का यदि सबसे अधिक योगदान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह हिमालय जैसे व्यक्तित्व के धनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय सन्यास परम्परा के गौरव योगऋषि परम श्रद्धेय स्वामी रामदेव जी हैं। यह उनके तप का परिणाम है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   परम श्रद्धेय स्वामी जी ने पिछले </span>20<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों में</span>, 20<span lang="hi" xml:lang="hi"> लाख किलोमीटर की यात्रा करके</span>, 20<span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ लोगों को योग सिखाया एवं योग के प्रति जागरूकता एवं प्रेम पैदा किया। उन्होंने योग को पहाड़ों की गुफाओं से निकाल कर हर घर के ड्राईंग रूम तक पहुँचा दिया। पतंजलि योगपीठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार द्वारा प्रशिक्षित दो लाख योग प्रशिक्षुओं द्वारा लाखों योग शिविरों का आयोजन किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें अभ्यास करने वाले योग साधकों ने अनुभव सांझा किया कि योग से उनके जीवन में सकारात्मक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुणात्मक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रचनात्मक परिवर्तन हुआ है। यही नहीं स्वामी जी महाराज ने जीवन में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र एवं विश्व में योग को लोकतान्त्रिक मूल्यों एवं मर्यादाओं का प्रतिपादक एवं रक्षक तत्व के रूप में स्थापित किया। आज यही योग तनाव ग्रस्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदासीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नशे  एवं विलासिता में डूबे हुए लोगों के जीवन को सही दिशा में लाने का आधार बन गया है। इसका एकमात्र श्रेय पूज्य स्वामीजी महाराज को जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    विश्व की चुनिन्दा नामचीन हस्तियों में शामिल होने के कारण परम पूज्य स्वामी जी महाराज को जून </span>2007<span lang="hi" xml:lang="hi"> में यू.एन. महासचिव ने आमंत्रित करके विश्व को गरीबी मुक्त बनाने का ब्राँड एम्बेसडर नियुक्त किया था और स्वामी जी को न्यूयॉर्क के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्टैण्ड-अप कार्यक्रम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">में सम्मानित किया गया। विनम्र-साधक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परम-तपस्वी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्मयोगी-सन्यासी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्यपाद योगर्षि स्वामी रामदेव जी महाराज विश्व के मंगल अनुष्ठान में अहर्निश संलग्न हैं। उनमें धरती सा धैर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्नि सा तेज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वायु सा वेग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जल जैसी शीतलता व आकाश जैसी विराटता है। श्रद्धेय स्वामी जी महाराज को न्यूजर्सी के सीनेट तथा जनरल असैम्बली द्वारा एवं ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ कॉमन्स में सम्मानित किया गया। इंडिया टुडे पत्रिका द्वारा लगातार दो वर्षों से तथा देश की अन्य शीर्ष पत्रिकाओं द्वारा श्रद्धेय स्वामी जी को देश के सबसे ऊँचे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असरदार शक्तिशाली व प्रतिभाशाली पचास लोगों की सूची में सम्मिलित किया गया। एसोचौम द्वारा स्वामी जी महाराज को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ग्लोबल नॉलेज मिलेनियम ऑनर</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्मान सहित देश विदेशों में सैकड़ों संस्थाओं व सरकारों द्वारा प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया। अभी हरियाणा सरकार द्वारा श्रद्धेय स्वामी जी को हरियाणा प्रान्त का </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग एवं आयुर्वेद का ब्राँड एम्बेसडर</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">बनाया गया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    पतंजलि योगपीठ जो कि एक सामाजिक एवं आध्यात्मिक संस्थान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने विश्व पटल पर योग को जीवनशैली के रूप में पुनर्जीवित किया है। </span>1995<span lang="hi" xml:lang="hi"> से परम श्रद्धेय स्वामी जी महाराज एवं आयुर्वेद शिरोमणि पूज्य आचार्य बालकृष्ण जी महर्षि पतंजलि प्रणीत अष्टांग योग के प्रचार-प्रसार में एवं उसके अनुसन्धान परक शोध कार्य में संलग्न हैं। पतंजलि योगपीठ ने योग को एक चिकित्सा पद्धति के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह संस्था योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैदिक शिक्षा और आदर्श ग्राम निर्माण जैसे प्रकल्पों के माध्यम से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति को स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निरोगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निरामय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विवेकशील एवं आत्मनिर्भर बनाने के प्रति सजगता से कार्य कर रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके विभिन्न प्रकल्पों से प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप में एक लाख लोग रोजगार प्राप्त कर रहे हैं। पतंजलि योगपीठ वह संस्थान है जिसने सर्वप्रथम योग को जीवन प्रबन्धन से जोड़ते हुए उसके भौतिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक एवं वैश्विक प्रभाव का प्रतिपादन एवं प्रतिष्ठापन किया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(0,0,0);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस के सफल आयोजन में अनेक चुनौतियाँ  थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इनमें-</span></strong></span></h5>
<ol>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">योग के विभिन्न प्रशिक्षण प्रक्रियाओं को एक रूपता प्रदान करना </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">एक सरल एवं सरस न्यूनतम समय सीमा का योग पाठयक्रम तैयार करना। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">उस पाठ्यक्रम- स्टेण्डर्ड प्रोटोकोल का प्रशिक्षण करवाना।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशिक्षण करवाने हेतु वोलेन्टियर्स योग शिक्षकों की ट्रेनिंग करवाना।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>21<span lang="hi" xml:lang="hi"> जून-अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस के कार्यक्रम में अधिकतम योग साधकों की जनभागेदारी करवाना। जिन्हें मिल-बैठकर दूर किया गया।</span></h5>
</li>
</ol>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    सम्पूर्ण विश्व में योग दिवस उल्लास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उमंग व उत्साह से मनाया जाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत सरकार सहित विभिन्न योग संस्थान एवं उनके कार्यकर्त्ता ऐसा प्रयास कर रहें हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु सम्पूर्ण विश्व में योग के आसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम का सरल प्रशिक्षण हो एवं उसमें भी अधिक महत्त्वपूर्ण कि </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi"> जून को सब एक जैसी लयबद्ध योग प्रस्तुति कर पायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस दृष्टिकोण से योग के संस्थानों की एक विशेषज्ञ कमेटी का मार्च</span>, 2015<span lang="hi" xml:lang="hi"> में गठन किया गया। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    भारत सरकार द्वारा गठित योग विशेषज्ञ समिति में कई बार चर्चाओं पर गहन मंथन के उपरान्त पतंजलि योगपीठ हरिद्वार एवं अन्य योग संस्थानों द्वारा गम्भीर चिन्तन कर योग दिवस के सफल आयोजन हेतु एक सरल रोचक एवं मात्र </span>35<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिनट के योग प्रोटोकोल का निर्धारण किया गया। यूं तो इस कार्यक्रम के सफल आयोजन एवं उसकी चुनौतियों को स्वीकार करने के लिये माननीय नरेन्द्र भाई मोदी के नेतृत्व में सम्पूर्ण सरकार मनोभाव से कार्य में जुटी हुई है। परन्तु श्रद्धेय स्वामी रामदेव जी महाराज व श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री श्री रविशंकर जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी चिदांनन्द मुनि जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री जग्गी वासुदेव जी के मार्गदर्शन में बहन सुषमा स्वराज जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माननीय विदेश मंत्री एवं श्री श्रीपाद नायक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माननीय आयुष राज्यमंत्री एवं आयुष विभाग के नेतृत्त्व में श्री डॉ. नागेन्द्र जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एस. व्यास विश्वविद्यालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ. ईश्वर बसवरेड्डी जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री ओ.पी. तिवारी जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री सन्याल जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री अनिल गनेरीवाला व श्री श्रीवास्तव जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ. चिन्मय पंडया जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ. जी.डी. शर्मा इत्यादि का विशेष योगदान रहा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    केन्द्र सरकार के पहल पर हृ.ष्ट.ष्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृ.स्.स् के विद्यार्थियों को प्रशिक्षण देने के लिये जब योग प्रशिक्षकों की आवश्यकता थी। विभिन्न राज्य एवं केन्द्रीय संस्थानों ने जब प्रशिक्षण हेतु योग शिक्षकों की मांग की। तब केन्द्र सरकार ने कुछ जगह तो मानदेय पर प्रशिक्षक नियुक्त करने की योजना बनायी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु बड़ी संख्या में आवश्यकता होने पर एवं सीमित बजट होने के कारण सरकारी संस्थानों ने पतंजलि योगपीठ से सहयोग करने को कहा। ऐसे में श्रद्धेय स्वामी जी एवं श्रद्धेय आचार्य जी के निर्देशों पर उत्तराखण्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओडिशा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्नाटक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्वोत्तर भारत में योग शिक्षक तत्काल उपलब्ध कराये गये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु अब बढ़ती मांग को देखते हुए साथ ही अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस के लिये निर्धारित प्रोटोकोल के प्रशिक्षण हेतु अलग से आवश्यक </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> हजार वोलेंटियर की पूर्ति हेतु युवाओं के </span>7-<span lang="hi" xml:lang="hi">७ दिवसीय विशेष योग प्रशिक्षण शिविर प्रारम्भ किये गये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   इसी क्रम में पतंजलि योगपीठ द्वारा प्रशिक्षित </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> लाख योग शिक्षकों को विश्वभर में कार्य करने हेतु निर्देशित कर दिया गया है। साथ ही संस्थान द्वारा प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए लाखों भाई-बहनों को सम्पूर्ण विश्व में योग के इस विराट कार्यक्रम में जनभागेदारी करवाने हेतु भी निर्देशित किया गया है। विदेशों में लगभग ग्यारह हजार तथा देश में एक लाख छोटे-बड़े कार्यक्रमों के माध्यम से २१ जून को यह योग महोत्सव मनाया जायेगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   विदेशों में पतंजलि योग समिति विशेषत: अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर इंग्लैण्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इटली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जर्मनी</span>, ऑस्ट्रिया<span lang="hi" xml:lang="hi"> इत्यादि में माता सुनीता पोद्धार एवं श्री दर्शन सोहल जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका आदि देशों में भाई शेखर अग्रवाल जी</span>,  <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभावी कार्यक्रम की योजना बना रहे हैं। कनाडा में डॉ. गगन भल्ला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उमा भल्ला जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अफ्रीका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आस्ट्रेलिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मॉरिशस आदि क्षेत्रें में भाई ठक्कर जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पटेल जी व अभिषेक यादव जी एवं नेपाल में भाई लवदेव मिश्रा जी कर्मठता से यह सेवा दायित्व सम्भाल रहे हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   भारत में हरियाणा एवं छत्तीसगढ़ की राज्य सरकारों ने पतंजलि योगपीठ के साथ मिलकर इस अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस को दिव्यता एवं भव्यता से मनाने का संकल्प लिया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   राजपथ पर होने जा रहे भारत के मुख्य कार्यक्रम में पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज को विदेश मंत्री बहन सुषमा स्वराज द्वारा आमंत्रित किया गया है। राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पूज्य स्वामी जी ने इस वर्ष </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi"> जून</span>, 2015<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>20<span lang="hi" xml:lang="hi"> जून</span>, 2016<span lang="hi" xml:lang="hi"> तक एक वर्ष के इस काल खण्ड में मोटापा-डायबिटिज आदि रोगों से रोकथाम-निवारण हेतु विशेष अनुसंधान परक योग शिविरों के आयोजनों की घोषणा की गयी है। इन शिविरों के माध्यम से धरती माँ पर से  एक करोड़ किलो ग्राम के लगभग का वजन कम करने का ध्येय निर्धारित किया गया है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    इसी प्रकार जनभागीदारी करने तथा योग के प्रति एक वातावरण निर्माण करने के उद्देश्य से भारत स्वाभिमान के युवाओं को विशेष रूप से योग प्रतियोगिताओं के आयोजन का लक्ष्य प्रदान किया गया है। आइये हम सब इस महा अनुष्ठान में प्राणप्रण से जुड़कर दिव्यता को आत्मसात करें। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग दिवस</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जून</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3060/the-pair-of-a-minister-and-a-fakir-established-yoga-on-the-world-stage</link>
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                <pubDate>Mon, 01 Jun 2015 21:47:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पूर्ण पुरुषार्थ-पूर्ण संतुष्टि</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. साध्वी देवप्रिया</span></strong><strong><span>, </span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्षा-दर्शन विभाग </span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">पतंजलि विश्वविद्यालय</span></strong><strong><span>, </span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">हरिद्वार</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3061/complete-effort-complete-satisfaction"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/1011.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   हमारे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन के दो पहलू हैं। एक बाह्य और दूसरा आन्तरिक। पहला है दृश्य दूसरा है द्रष्टा। इसे ही शास्त्र की भाषा में- प्रेय और श्रेय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भोग-अपवर्ग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभ्युदय-निश्रेयस: कहा गया है। बाह्य व्यक्तित्व के फिर दो भाग हैं- व्यक्तिगत दूसरा सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर। कुछ व्यक्तित्व तो धरती पर सबकी समस्याओं का समाधान बनकर आते हैं। लेकिन हम यदि ऐसा न कर सकें तो कम से कम स्वयं किसी के लिए समस्या न बनें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समस्या-अर्थात् शारीरिक या मानसिक रूप से हमारे व्यक्तिगत अस्तित्व के साथ-साथ पारिवारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक व राष्ट्रीय स्तर का व्यक्तित्व भी हमारे साथ जुड़ा हुआ है। अत: हमें उभयत: निरोग  होने की अवश्यकता है। हम स्वयं भी शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ बनें तथा अपने परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गांव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज व राष्ट्र को भी शारीरिक व मानसिक रूप से निरोग बनायें। क्योंकि ये सब किसी न किसी रूप में हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं। हमें स्वस्थ व उच्चादर्शों से युक्त समाज बनाना चाहिये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवर्तन कोई बलवान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्तिमान अधिकारी ही कर सकता है। अत: हमें योग के अनुष्ठान से पहले स्वयं को शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बौद्धिक व आत्मिक दृष्टि से बलवान व शक्तिमान बनाना होगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    श</span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्ति भी दो प्रकार की होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आन्तरिक और बाह्य। जिस प्रकार बिना नींव का मकान खोखला होता है-उसी प्रकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आन्तरिक उन्नति के बिना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाह्य भौतिक शक्ति ज्यादा प्रभावशाली नहीं होती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और कई बार तो उल्टा विनाश का कारण भी बन जाती है। दोनों ही प्रकार की शक्तियों का आधार है योग।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">      कोई व्यक्ति पूछ सकता कि हम तो योग कर लेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर दूसरों को कैसे सिखायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वो तो सीखने को तैयार ही नहीं। इसका उत्तर यह है कि अपनी बात दूसरे से मनवाने के लिए सर्वप्रथम हमारी वाणी सशक्तव सत्य युक्त होनी चाहिए। हमारी प्रस्तुति का तरीका भी अत्यन्त प्रभावशाली व आकर्षक होना चाहिए। इस विद्या में निपुण व्यक्तिआजकल टी.वी. और अखबार के माध्यम से झूठे विज्ञापन करके भोग को आकर्षक बनाने में लगे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब वे असत्य को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भोग को आकर्षक बना सकते हैं तो हम सत्य को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग को आकर्षक क्यों नहीं बना सकते। आवाज कारतूस चलाने पर भी उतनी ही होती है और गोली चलाने पर भी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर फर्क इतना है कि कारतूस मार नहीं करती और गोली मार करती है। नैतिक आचरण से युक्त वाणी ही दूसरों पर प्रभाव डालती है। सरकारें कभी भी बड़ा परिवर्तन नहीं ला पायेंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ा परिवर्तन तो हमेशा एक जागा हुआ योगी ही कर सकता है। संसार का अन्धकार तो केवल सूर्य ही मिटा सकता है। इसका जीता जागता उदाहरण श्रद्धेय स्वामी जी महाराज हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल निजी व्यक्तित्व को सुधारने मात्र से हमारी सब समस्याओं का समाधान नहीं हो पायेगा। इसीलिए महर्षिगण कहते हैं- </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्रण्वन्तो विश्वमार्यम्- महर्षि दयानन्द</span>,            </strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सेल्फ  रियलाइजेशन से कलक्टिव रियलाइजेशन- श्री अरविन्द</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वच्छ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्ध व संस्कारवान भारत-श्रद्धेय स्वामी रामदेव जी महाराज</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    अत: अभ्युदय: के लिए हमें उपरोक्त परिवर्तन योग के माध्यम से करना ही पड़ेगा और इस सब परिवर्तन का मूल है योग का अनुष्ठान। यह तो हुई बाह्य विकास या परिवर्तन की बात। अब आन्तरिक परिवर्तन व नि:श्रेयस की उपलब्धि कैसे हो</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इस पर विचार करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग दर्शन में लिखा है - भोगापवर्गार्थं दृश्यम्- यह दृश्य भोग और अपवर्ग के लिए है। दृश्य माने शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रिय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समस्त भौतिक जगत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि। इस दृश्य से भोग तो प्राप्त होते हैं यह तो समझ में आ गया अर्थात् जैसे कि हम सबके पास आँख है यह भोग और अपवर्ग दोनों दिलाती है। संसार में जिसके भी पास आँख है वह रूप को देखता ही है। उसमें से सुन्दर रूप को अपने पास सुरक्षित रख लेता है संस्कार के रूप में और असुन्दर को छोड़ देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही भोग है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कान अच्छे शब्दों का अर्थात् मधुर शब्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्मानजनक शब्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशंसा जनक शब्दों को चुनकर उन्हें संस्कार रूप में एकत्रित कर लेता है- बुरे शब्दों को छोड़ना चाहता है पर कभी-कभी द्वेष संस्कार के रूप में उन्हें भी एकत्रित कर लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार आज तक हमने सभी इन्द्रियों के विषयों को प्राप्त किया है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">      यह भोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रिय या संसार से मिलता है यह तो समझ में आ गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर इसी आँख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रियों से अपवर्ग कैसे मिलता है यह समझ में नहीं आता</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यह काम गुरु करता है। श्रद्धेय स्वामी जी महाराज बताते हैं कि जहाँ भी दृष्टि जाये वहीं भगवान् को देखो। प्रत्येक वस्तु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति के साथ ब्रह्मसम्बन्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्येक वस्तु व प्राणि मात्र के प्रति दिव्यदृष्टि अर्थात् ब्रह्मभावपूर्ण दृष्टि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो फूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पशु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पक्षी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर्वत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नदी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्त्री</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुजुर्ग आदि अति सुन्दर दिखें वहाँ तक भगवान् की विशेष कृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेष अनुकम्पा के रूप में उसे देखें। भगवान् का दर्शन करने के बाद भोगने का भाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समर्पण के भाव में बदल जाता है। हम उसकी हिफाजत करना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे सुख व सुरक्षा देना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके प्रति हमारी प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्ठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भक्ति व सेवा की भावना बन जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही आँख के द्वारा अपवर्ग की प्राप्ति है। पर ऐसी पावन दृष्टि बने कैसे</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उत्तर है योग से।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    योग का मतलब है यम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धारणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान और समाधि इन आठ योगाङ्गों का अनुष्ठान। इनमें से भी प्राणायाम का महत्व सर्वाधिक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि यह बाह्य और अन्तरङ्ग योग के बीच सेतु का काम करता है। हमारी सभी इन्द्रियाँ प्राण के माध्यम से ही स्व-स्व विषयों में संचालित होती हैं। इसलिए प्राण ही मूल है। प्राण यदि अशुद्ध होगा तो इन्द्रियाँ भी अशुद्ध हो जायेगी और प्राण यदि शुद्ध हुआ तो सब इन्द्रियों के व्यापार शुद्ध हो जायेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">अशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्याते:</span>’’ <span lang="hi" xml:lang="hi">अशुद्धि का क्षय होने से ज्ञान का प्रकाश होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और यह ज्ञान का प्रकाश तब तक बढ़ता ही रहता है जब तक अविप्लव अर्थात् सुस्थिर विवेक ख्याति प्राप्त न हो जाये। ज्ञानी व्यक्ति विषयों में परवश हुआ-हुआ बह नहीं जायेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि उसका ज्ञान उसके परिणाम को उसके सामने रख देता है। जिस विवेक के प्रकाश से और यहाँ इस प्रसंग में चक्षु इन्द्रिय की शुद्धि से भोग और अपवर्ग दोनों मिलते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी प्रकार समस्त इन्द्रियों के विषय व संसार के विषयों के बारे में समझ लेना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    यहाँ किसी का प्रश्न हो सकता है जिसने ऐसा किया क्या ऐसा कोई व्यक्ति धरती पर देखने को मिल सकता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">और उसकी पहचान कैसे करें</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे व्यक्ति की पहचान यह है कि वह पूर्ण पुरुषार्थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण तृप्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण सन्तुष्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण प्रसन्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आप्तकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्काम और अकाम होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जब हर पल उस सर्वोच्च सत्ता के साथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मसत्ता या भागवत सत्ता के साथ उसके अन्दर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस आनन्द स्वरूप में पूर्ण सजगता व सहजता पूर्वक निवास कर रहा है तब उससे बढ़कर और क्या कामना हो सकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसको पाने के लिए उसमें अतृप्ति दिखे</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् कुछ भी तो नहीं। सामान्य रूप से पहचान करना चाहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ऐसा व्यक्ति जो गम्भीर होते हुए भी हर समय प्रसन्न चित्त रहता है सबको प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खुशी व आनन्द देता है। जिसके पास से उठने को मन नहीं करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बस समझ लेना उसी ने उसको पाया है। जो बात-बात में दूसरों को जलाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनको दोषी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पापी होने का अहसास कराता रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके पास जाने को मन नहीं करता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पास चले भी जायें तो भागने को मन करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समझ लेना वह बेचारा अभी अपवर्ग से दूर है। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र-चिंतन</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जून</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3061/complete-effort-complete-satisfaction</link>
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                <pubDate>Mon, 01 Jun 2015 21:45:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बच्चे मेरे लिए भगवान का रूप हैं</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span><span> </span>-</span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ विजय कुमार मिश्र</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3062/children-are-god-to-me"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/991.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">     पि</span><span lang="hi" xml:lang="hi">छले गर्मी की बात है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाहर से कुछ बच्चे स्वामी जी से मिलने आये थे। स्वामी जी सरलता के साथ बच्चों से मिले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बातचीत की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका हाल-चाल पूछा। पढ़ाई-लिखाई जानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भविष्य के लिए मार्गदर्शन दिया। कुछ ही क्षण में बच्चे स्वामी जी से ऐसे घुल मिल गये कि उन्हें जैसे लगा हम अपने बराबर उम्र के दोस्तों से बात कर रहे हैं। जैसे बच्चों को कोई उन्हीं के उम्र जैसा किन्तु अनुभवी बच्चा मिल गया हो।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    मुलाकात के बाद बच्चों में इच्छा हुई कि वे संत कुटी प्रांगण का भी भ्रमण कर लें। उन्होंने व्यवस्था से अनुमति ली और संत कुटी की एक-एक छटा को गौर से देखने लगे। कुटीर घूमते उन्हें लगभग 1 घंटा से अधिक हो चुका था।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तभी स्वामी जी भी अपने कक्ष से बाहर निकले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी बच्चों पर नज़र पड़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देखा बालक अभी संत कुटी के परिसर में ही घूम रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि धूप तेज है। स्वामी जी उसके बाद कुछ क्षण के लिए अपने कक्ष में चले गये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन कुछ क्षण बाद  ही वे पुन: निकल कर बच्चों को निहारने लगे। यह क्रम बार-बार चलने लगा। स्वामी जी फिर बच्चों को निहारें और कुटिया में चले जायें। स्वयं सेवक व सुरक्षाकर्मी स्वामी जी के इस तरह कुटिया से बार-बार बाहर आने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर अंदर चले जाने को भांप नहीं पा रहे थे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी जी को इस तरह आधा घंटा और बीत गया</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी लोगों ने देखा स्वामी जी दो बोतल पानी लेकर कक्ष से बाहर निकले और संत कुटी में दूसरी छोर पर भ्रमण कर रहे बच्चों की ओर चल दिये। सुरक्षाकर्मी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयंसेवक स्वामी जी के पीछे-पीछे दौड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर स्वामी जी चाह क्या रहे हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">जा कहां रहे हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार स्वामी जी लम्बे कदम से बच्चों के पास पहुँच गये और बोले- बेटे बड़ी धूप है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं देख रहा हूँ तुम बड़ी देर से बिना पानी पिये टहल रहे हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्यास लग गयी होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लो पानी पी लो। वे बच्चे भी आश्चर्यचकित और इस दृश्य को देखने वाले भी। स्वयं सेवक भी सोचने लगे कि यह काम तो हमारा था। बच्चों के प्यासे होने की बात हमें समझ क्यों न आयी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वास्तव में बच्चे पानी के बिना व्याकुल हो रहे थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर संत कुटीर की मनमोहक आध्यात्मिक शांति और वहां के वातावरण की सुरम्यता से मन नहीं हटाना चाहते थे। स्वामी जी की इस सक्रियता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरलता को देख बच्चे भाव-विहवल हो उठे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें स्वामी जी में अपने मां का स्वरूप दिखा। बच्चे भावुक हो बोले स्वामी जी आप!</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तभी स्वामी जी ने उनके भावों को बदला और कहा- बेटे यह हमारी पतंजलि का पानी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैंने सोचा आप जैसे निश्छल बच्चों के साथ बैठ कर इस जल के स्वाद का आनंद लेते हैं। इसीलिए आपके पास चला आया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लो तुम भी पियो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम भी पीते हैं। और फिर पास खड़े स्वयं सेवकों की ओर रुख करते हुए बोले- इन्हें भोजन कराकर भेजना।   </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस घटना ने सभी उपस्थित प्रत्यक्षदर्शियों को भाव विह्वल कर दिया। स्वामी जी ने उपस्थित जनों की भावना को ताड़ते हुए  कहा मेरे भाइयों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी घटना में दिखने वाले दृश्य कोई माने नहीं रखते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महत्वपूर्ण है उसके पीछे छिपे भाव जो कार्य को अंजाम देते हैं। यही भावना अपने साथ-साथ दूसरों के लिए सोचने को मजबूर करती है। श्रेष्ठ भावना से निहित छोटी-छोटी घटना की प्रेरणा भी मनुष्य को आमूलचूल बदल डालती है और जीवन में महामानव बनने के द्वार खुलते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लोगों ने कहा स्वामी जी पानी हमें दे देते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमी बच्चों तक उसे पहुंचा देते। इन छोटे-छोटे बच्चों के लिए आप  यहां तक दैाड़कर आ गये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बड़े-बड़े लोग वहां आपसे मिलने के लिए प्रतीक्षा में हैं। स्वामी जी ने उत्तर में कहा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कोई उम्र व पद से बड़ा नहीं होता बेटे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ी व्यक्ति की पवित्र भावनायें और अंदर की निश्छलता होती है। उन्होंने कहा हमारे लिए ये बच्चे कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर जब पुकार आत्मा की निश्छलता से भरी हो तो प्रतीक्षा कैसे की जा सकती है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">सहायता के लिए कदम उठ ही जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर हमारे लिए ये बालक तो परमात्मा के रूप हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इनकी निश्छलता यदि हमें कमरे से बाहर इनके पास खीच लाई तो इसमें आश्चर्य ही क्या है। मेरे लिये बालक भगवान का रूप हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इनकी सेवा मेरे लिये  परमात्मा  की सेवा से कम नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इनके कष्ट देखकर हमसे रहा ही नहीं जाता </span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आप ही बतायें बच्चे प्यासे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह अनुभव होने के बाद मैं क्या करता।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य ही है कि पूज्यवर का यह स्नेह भरा सानिध्य ही है जो पतंजलि योगपीठ में चल रहे गुरूकुलम विद्यालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्यकुलम विद्यालय में शिक्षण ग्रहण करने वाले छात्र-छात्रायें को शिक्षण पूर्ण करने के बाद भी उन्हें अपने माता-पिता के पास जाने से रोक लेता है। पतंजलि योगपीठ में आने वाले हर वर्ष लाखों व्याक्तियों में अपने युगऋषि से एक बार मिलने के बाद उत्पन्न होने वाले समर्पण भाव के पीछे पूज्यवर का यह दिव्य हृदय ही तो है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जिसका हृदय दिव्य होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके लिए कठिन से कठिन यात्रा क्यों न सुगम हो जायेगी। पतंजलि का कम समय में यह करोड़ों लोगों तक विस्तार यही संदेश चीख-चीख कर कहता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जून</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 01 Jun 2015 21:42:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>किसने क्या कहा</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ईरान के राजदूत गुलाम रजा अंसारी</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कि योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद एवं समाज-लोकहितैषी अन्य नि:स्वार्थ आंदोलनों के कारण स्वामी रामदेव जी एवं आचार्य बालकृष्ण जी तथा यह पतंजलि योगपीठ आज विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित हो गये हैं। इससे दुनियां को जीवन संबंधी नई दृष्टि मिली है। ईरान और भारत दोनों में आध्यात्मिक व सांस्कृतिक समानतायें हैं। हर्बल मेडिसिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर्बल सिस्टम का महत्व भारत से लेकर ईरान तक समान है। पतंजलि योगपीठ इसका सशक्त केन्द्र बनकर उभरा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मुख्यमंत्री हरियाणा मनोहर लाल खट्टर</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नवस्थापित आचार्यकुलम गुरुकुल तक्षशिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नालंदा से बढ़कर हो तथा यहां लाखों की संख्या में विद्यार्थी योग एवं</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3063/who-said-what"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/kisne-kya-kha.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ईरान के राजदूत गुलाम रजा अंसारी</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कि योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद एवं समाज-लोकहितैषी अन्य नि:स्वार्थ आंदोलनों के कारण स्वामी रामदेव जी एवं आचार्य बालकृष्ण जी तथा यह पतंजलि योगपीठ आज विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित हो गये हैं। इससे दुनियां को जीवन संबंधी नई दृष्टि मिली है। ईरान और भारत दोनों में आध्यात्मिक व सांस्कृतिक समानतायें हैं। हर्बल मेडिसिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर्बल सिस्टम का महत्व भारत से लेकर ईरान तक समान है। पतंजलि योगपीठ इसका सशक्त केन्द्र बनकर उभरा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मुख्यमंत्री हरियाणा मनोहर लाल खट्टर</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नवस्थापित आचार्यकुलम गुरुकुल तक्षशिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नालंदा से बढ़कर हो तथा यहां लाखों की संख्या में विद्यार्थी योग एवं आयुर्वेद की शिक्षा ग्रहण करें। मेरी ऐसी संकल्पना है। हम हरियाणा को भारत का प्रतिष्ठित योग-आयुर्वेद केंद्र बनाना चाहते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य स्वामी जी महाराज</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कि भविष्य की अर्थपद्धति सेवा की ओर मुड़ेगी। सबका हित सबका विकास ही भविष्य की अर्थनीति होगी। देश ही नहीं दुनियां में पूंजी की सकारात्मक सक्रियता पद्धति लागू होगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मौलाना कल्वे रिजवी जी </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ दिव्य व्यक्तित्व निर्माण की टकसाल है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी जी में विशिष्ट क्षमताओं का भंडार है। कभी लोग कहते थे कि आसन सिखाने वाला देश की हुकूमत के तरीके क्या सिखायेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर आज दुनियां ने इसे देख लिया है। आज स्वामी रामदेव जी महाराज ने योग के सहारे लोगों को ऐसी ईमानदारी सिखाई कि बेईमानों को बगले झांकने के लिए विवश होना पड़ा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कि देश का युवा जब युग से जुड़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो सकारात्मक दिव्य परिवर्तन सुनिश्चित होते हैं। योग-आयुर्वेद इन युवाओं का आंतरिक कायाकल्प करेगा और पतंजलि योगपीठ का ऋषित्व भरा चिंतन इन्हें सकारात्मक दिशा देगा परिणामत: आदर्शवाद नेक व्यक्ति निर्मित होंगे और यह आंदोलन जनमानस को भारत के नवनिर्माण का मार्ग दिखायेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विक्टोरिया प्रांत के पूर्व मुख्यमंत्री जी</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग भविष्य की पीढ़ी को मजबूत करने की अनोखी पद्धति है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य स्वामी जी महाराज </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं एक संन्यासी हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानवता की सेवा करना ही मेरा ध्येय है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: मंत्री पद की मुझे कोई आवश्यकता नहीं है। इसी में मैं राष्ट्र उत्थान की अनेक संकल्पनाओं को पूरा करने में सक्षम रहूंगा।</span>‘</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अतिविशिष्ट सेवा मेडल प्राप्त लेफ्टीनेन्ट जनरल श्री कमलजीत सिंह</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कि जहां सेना के जवान राष्ट्र की सीमाओं की सुरक्षा करके उसे मजबूत करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं राष्ट्रीय संस्कृति एवं परम्पराओं को जीवंत बनाने का दायित्व देश के अंदर के नागरिक व संस्थायें निभाती हैं। पतंजलि योगपीठ के प्रयोगों द्वारा देश में सशक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चरित्रनिष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रनिष्ठ नागरिकों का निर्माण करके अपने में यह संस्थान अद्वितीय रूप से राष्ट्र उत्थान भूमिका निभा रहा है। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग दिवस</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जून</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3063/who-said-what</link>
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                <pubDate>Mon, 01 Jun 2015 21:40:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आँखों के तनाव को दूर करने में सहायक योगाभ्यास</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. शरली टेल्लस एवं अंकुर कुमार</span></strong><strong><span>, </span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">पतंजलि रिसर्च फाऊंडेशन</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3064/yoga-exercises-helpful-in-relieving-eye-strain"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/o-eyes-facebook.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   गर्मियों की छुट्टियां पड़ने पर हमें लेपटॉप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आईपेड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आईफोन्स और किताबी दुनिया से बाहर निकलकर अपनी आँखों को आराम देना चाहिए। हमारी आँखों की मांसपेशियाँ बहुत मजबूत हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके पश्चात् भी वे बहुत अधिक समय तक कम्प्यूटर या टी.वी. के सामने बैठने पर थक जाती हैं। इस प्रकार की थकान या आँखों का तनाव भी एक प्रकार का नेत्र सम्बंधी समस्या ही है। इसके लक्षण आँखों में जलन या सूखापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आँखे खोलते समय थकान का अनुभव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आँखों में दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धुंधलापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिर दर्द और दोहरी दृष्टि आदि के रूप में प्रकट होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनका उपचार अत्यावश्यक है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">व र्तमान समय में जीवनशैली में आये परिवर्तन की वजह से हमें कम्प्यूटर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ई-बुक्स आदि के सामने बहुत अधिक समय व्यतीत करना पड़ता है। इस प्रकार के कार्य करने की वजह से हमारी आँखें असहज हो जाती हैं और दर्द का अनुभव करती हैं। इस प्रकार के कुछ मामलों में दृष्टिगोचर थकान हमारी उत्पादकता और एकाग्रता को भी कम कर सकती है तथा हमारी देखने की क्षमता पर नकारात्क प्रभाव डाल सकती हैं। इस प्रकार के सिन्ड्रोम को कम्प्यूटर वीज़न सिन्ड्रोम कहते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दृष्टिगोचर थकान के लक्षण:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सूखी और जलन वाली आँखें</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पीड़ादायक और लाल आँखें</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सिर दर्द</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कमर और गर्दन दर्द</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">चक्कर आना</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">हल्कापन</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>·<span lang="hi" xml:lang="hi">कार में चक्कर तथा उल्टी आना</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">उबकाई</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">धुंधली दृष्टि</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">दोहर दृष्टि</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">आँखों में खुजली</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">आँखों में पानी आना</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">आँखों में खुजली</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">आँखों में जलन (बन्द आँखों में भी)</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पलकों में भारीपन/ माथे में भारीपन</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">थकान</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पढ़ने में कठिनाई</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">एकाग्रता की कमी</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि आप इनमें से किसी प्रकार के दृष्टिगोचर थकान से पीड़ित हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो एक नेत्र विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए। वे कुछ नेत्र परीक्षण तथा आपकी जीवन शैली व कार्य करने की आदत के विषय में चर्चा करने के पश्चात् यह बता सकते हैं कि आप दृष्टिगोचर थकान से पीड़ित हैं या नहीं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दृष्टिगोचर थकान के मुख्य कारण:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">टी.वी. देखना</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कम्प्यूटर स्क्रीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आई-पेड्स</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">स्मार्ट फोन्स</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">विडियो गेम्स</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कोई भी वह कार्य जिसमें आँखों पर अत्यधिक ज़ोर या दबाव पड़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे- बहुत अधिक समय तक पढ़ना-लिखना या गाड़ी चलाना।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अधिकांश लोग स्मार्टफोन और डिजिटल डिवाइसेज प्रयोग करते समय उन्हें अपनी आँखों के बहुत करीब रखते हैं। कुछ अध्ययन तो इस बात की पुष्टि करते हैं कि डिजिटल डिवाइस का उपयोग करते समय लोग उन्हें किताबों से भी अधिक समीप ले आते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कि आँखों को सामान्य की तुलना में अधिक तनावग्रस्त करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सामान्य रूप से मनुष्य एक मिनट में 18 बार अपनी आँखें झपकाता है जिससे हमारी आँखें तरोताज़ा अनुभव करती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु अध्ययन बताते हैं कि कम्प्यूटर या अन्य किसी डिजिटल डिवाइस का प्रयोग करते समय मनुष्य केवल इससे आधी बार ही आँखें झपकाता है। परिणाम स्वरूप आँखों में सूखापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थकान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खुजली और जलन इत्यादि की समस्याएं पैदा होती हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उपयोगी यौगिक क्रियाएं:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>पामिंग: </strong>अपने दोनों हाथों की हथेलियों को स्थिरता पूर्वक इस प्रकार रगड़िए कि वे गरम हो जाएं। उसके बाद गरम हथेलियों को कप बनाकर उनसे उन्हें दोनों आँखों के ऊपर इस प्रकार रखिए कि दोनों आँखें ढक जाएं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>संकुचन या शिथिलीकरण:</strong> यदि आपको ग्लूकोमा नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आप यह अभ्यास कर सकते हैं। इसके लिए अपनी आँखों को इतनी दृढतापूर्वक बंद कीजिए जितना आप कर सकते हैं। इस संकुचन को तीन सेकेन्ड तक करें। फिर आँखें तेजी से खोल लें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>आइरोलिंग: </strong>अपनी आँखों को जितना ले जा सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उतना ऊपर तथा नीचे की तरफ ले जाएं। तत्पश्चात आँखों को दायें तथा बायें घूमायें। यह प्रक्रिया चार बार दोहरायें। इसके पश्चात् आँखों की मांसपेशियों को आराम देने के लिए इन्हें तेजी के साथ झपकायें। पूरी प्रक्रिया के दौरान श्वास की गति सामान्य रखें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>योगनिद्रा:</strong> शिथिल होकर शवासन में लेट जायें तथा कुछ गहरी और लम्बी श्वास लें और छोडें। इसके पश्चात अपने ध्यान को दाहिने पैर पर ले जायें तथा इस प्रकार की अनुभूति करें कि आपका पैर शिथिल हो रहा है। इस प्रकार धीरे-धीरे अपने ध्यान को दाहिने घुटने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जाँघ और नितम्बों पर बारी-बारी से लेकर जायें और इन मांसपेशियों में शिथिलीकरण का अनुभव करें। अब अपने दाहिने पैर के विषय में सजकता का अनुभव करें। यह प्रक्रिया बायें पैर के लिए भी दोहराए। इसी प्रकार अपने ध्यान को शरीर के अन्य भागों जैसे- पेट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नाभि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वक्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दाया व बाया कन्धा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दायीं व बायीं भुजा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गला और मस्तिष्क पर लेकर जायें तथा उन्हें शिथिल करें। एक लम्बा व गहरा श्वास लें और शरीर में होने वाली संवेदनाओं का अनुभव करें तथा इसी अवस्था में शरीर को कुछ समय के लिए शिथिलीकृत करें। अब धीरे-धीरे अपने शरीर व उसके आसपास के वातावरण के विषय में सजक होने के पश्चात् दायीं करवट लेट जायें। कुछ मिनट बाद धीरे-धीरे उठकर बैठें और अपनी सुविधा के अनुसार धीरे-धीरे अपने नेत्रों को खोलें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>·</strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>सुलभ दृष्टि: </strong>एक मुस्कान के साथ अपनी आँखों को हल्का करें (अपनी आँखों से मुस्कुराएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि मुख व होठों के द्वारा)। पूरी तरह से आँखों को शिथिल करें</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">आँखें क्या और कैसे देखती हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे प्रभावित करने का प्रयास न करें। जैसे-जैसे आँखें शिथिल होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे ही मन भी शांत होता जाता है। आँखों के द्वारा मुस्कुराइए तथा उस मुस्कान से अपने चेहरे को शिथिल कीजिए तथा महसूस कीजिए कि यह मुस्कान आपके संपूर्ण शरीर में फैल गयी है। कहीं भी ध्यान केन्द्रित न करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आप हर चीज के बारे में जागरूक रहें। इसी क्रम में त्रिविगीय चित्रों पर एकटक देखना एक अच्छा व्यायाम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह दृष्टि को विकेन्द्रित करने तथा आँखों को शिथिल करने में मदद करता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">योगाभ्यास करने के पश्चात् और अपनी जीवनशैली में परिवर्तन लाकर हम नेत्रों की थकान को दूर करके अपने नेत्रों को स्वस्थ बना सकते हैं तथा हर आवश्यक कार्य को सुचारु रूप से करने में सफल हो सकते हैं। </span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पतंजलि रिसर्च</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जून</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 01 Jun 2015 21:38:46 +0530</pubDate>
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