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                <title>जुलाई - योग संदेश</title>
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                <description>जुलाई RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज के  शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...</title>
                                    <description><![CDATA[<h4 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">चक्रव्यूह</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span lang="hi" xml:lang="hi">      मिथ्या आकर्षणों से मुक्त होकर यदि हम सामान्य विवेक से भी काम लें तो जीवन में आहार-व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खान-पान से लेकर जीवन के हर एक सन्दर्भ में हम सही विकल्प का चुनाव करके एक स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्तिमय व आनन्दमय जीवन जी सकते हैं। यदि जीवन में कोई समर्थ गुरू मिल जाए तो ये सब बहुत आसान हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">      जीवन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> में हर एक कदम पर एक गहरा चक्रव्यूह है। शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार व संस्कारों के स्तर पर वैयक्तिक रूप से तथा पारिवारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवसायिक</span>, </h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3079/shashwat-pragya-july-2015"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/1621.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">चक्रव्यूह</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span lang="hi" xml:lang="hi">   मिथ्या आकर्षणों से मुक्त होकर यदि हम सामान्य विवेक से भी काम लें तो जीवन में आहार-व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खान-पान से लेकर जीवन के हर एक सन्दर्भ में हम सही विकल्प का चुनाव करके एक स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्तिमय व आनन्दमय जीवन जी सकते हैं। यदि जीवन में कोई समर्थ गुरू मिल जाए तो ये सब बहुत आसान हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   जीवन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> में हर एक कदम पर एक गहरा चक्रव्यूह है। शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार व संस्कारों के स्तर पर वैयक्तिक रूप से तथा पारिवारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवसायिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनैतिक व वैश्विक स्तर पर भी एक बहुत बड़ा चक्रव्यूह है। यह अच्छा भी और बुरा भी। यदि हम एकाग्रचित्त होकर प्रसन्नता व पवित्रता के साथ चेतना के सभी स्तरों पर पूर्ण पुरुषार्थ करें और सभी सन्दर्भों में विवेकपूर्ण आचरण करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इन समस्त चक्रव्यूहों को हम भेदकर अपने अन्तिम लक्ष्य सभी अज्ञान या अविवेक पूर्ण कामनाओं से मुक्त होकर जीवन में पूर्णता की अनुभूति कर सकते हैं। यदि हम जागरूक ना हों तो पदे-पदे हमें संकटों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संघर्षों व दु:खों का सामना करना पड़ेगा। शरीर में रोग हो जाए तो हर रोग का अलग डॉक्टर अलग-अलग दवा और उनका दुष्प्रभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही रोगों के कारण दूसरे रोगों के चक्रव्यूह में पड़कर बहुत प्रकार से दु:ख पाते हैं। इसी प्रकार इन्द्रियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार व संस्कारों का भी एक बहुत बड़ा चक्रव्यूह है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि हम विवेकशील व जागरूक होकर आगे नहीं बढ़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अवसाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव व अशान्ति का कभी भी न खत्म होने वाला चक्रव्यूह प्रारम्भ हो जाता है। विवेक व वैराग्य पूर्वक जितेन्द्रिय होकर अपने अन्त:करण या चित्त को शुद्ध करके हम इसी जीवन को जीवनमुक्तहोकर जी सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार सम्बन्धों की ठीक-ठीक समझ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसार के नियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कानून व संविधान तथा भगवान् के विधान को यदि ठीक-ठीक समझकर हम प्रतिपल होश में रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो घनघोर संकटों के बीच भी जीवन में संतुलन रखते हुए अपनी मंजिल को हम पा ही लेते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अत: विवेकशील मनुष्य को जागरूक व सहज होकर अपने स्वधर्म का पूरी पवित्रता से आचरण करना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विकल्प:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कोई कहता हैं जीवन एक संग्राम है। कोई कहता है जीवन एक अनसुलझी पहेली है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कोई जीवन को संकल्प व विकल्पों के बीच सत्य की राह पर आत्म प्रेरणा को आधार बना कर बढ़़ता हुआ अपना अभ्युदय व नि:श्रेयस सिद्ध कर लेता है। दुनिया के इस बाजार में अच्छे व बुरे दोनों ही चीख-चीख कर हमें अपनी ओर रिझाते व बुलाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चुनाव हमें करना है। शुभाशुभ या पापपुण्य के बीच हम कई बार इसलिए निर्णय नहीं कर पाते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि बाहर के बाजार के शोर के बीच आत्मा की पुकार मंद पड़ जाती है। खाने-पीने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पढ़ने-लिखने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देखने-सुनने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पहनने न पहनने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उठने-बैठने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोने-जागने से लेकर जीवन के हर पहलु के बारे में अक्सर हम भ्रमित हो जाते हैं। खुशियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफलता व सुख के झूठे सपने दिखाकर लोग हमें बहका देते हैं और जीवन में हम सही विकल्प का चुनाव या निर्णय नहीं पाते और अन्तत: अन्त हीन दु:ख का सफर शुरू हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मिथ्या आकर्षणों से मुक्त होकर यदि हम सामान्य विवेक से भी काम लें तो जीवन में आहार-व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खान-पान से लेकर जीवन के हर एक सन्दर्भ में हम सही विकल्प का चुनाव करके एक स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्तिमय व आनन्दमय जीवन जी सकते हैं। यदि जीवन में कोई समर्थ गुरू मिल जाए तो ये सब बहुत आसान हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन का शाश्वत सत्य:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह सत्य है कि हम शाश्वत के प्रतिनिधि हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम भगवान् की या ऋषि-ऋषिकाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वीर-वीराङ्गनाओं की सन्तानें हैं। हम ऋषियों की दिव्य ज्ञान परम्परा व आध्यात्मिक परम्परा के उत्तराधिकारी या प्रतिनिधि हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु अज्ञान व अहंकार के कारण हम अपने मूल स्वरूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूल प्रकृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या मूल स्वभाव से विमुख होकर बार-बार ठोकर खाते हैं और पछताते हैं। भगवान्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माता-पिता या समर्थ गुरुसत्ता के विशेष अनुग्रह और स्वयं के अत्यन्त पुरुषार्थ से ही हम अन्तर्मुखी स्थितप्रज्ञ होकर परम सत्य या शाश्वत सत्य की ओर आगे बढ़ पाते हैं। भगवान् हम सब जीवों को अपनी दिव्य प्रेरणाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य संवेदनाओं एवं दिव्य सामर्थ्य से सदायुक्त रखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे हम इसी जन्म में जीवन के शाश्वत सत्य को प्राप्त हो सकें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जड़ी बूटी दिवस:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पूर्ण सृष्टि स्वयं में नियन्त्रित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मर्यादित एवं अनुशासित है। सृष्टि के सूक्ष्म-से-सूक्ष्म परमाणु से लेकर बड़े-बड़े घटक या इकाईयाँ ये पूरा ब्रह्माण्ड विधाता के विधान या शाश्वत नियमों में बँधा हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्यता से भरा हुआ है। मुनष्य शरीर की भी एक-एक सूक्ष्म कोशिकाओं से लेकर पूरा शरीर तन्त्र सृष्टि की सबसे अद्भुत रचना है। मनुष्य के पिण्ड में भगवान् ने ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण शक्तियों का समावेश कर दिया और सारी दिव्यता देने के साथ-साथ मनुष्य को भगवान् ने पूर्ण स्वतंत्रता भी दे दी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह स्वतंत्रता मनुष्येतर जीवों व अन्य सृष्टि के घटकों को प्राप्त नहीं है। वे सब भगवान् के विधान में ही बंधे हुए उसकी उपासना करते हुए पूर्ण क्रियाशील हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिस मनुष्य को भगवान् ने अपरिमित ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदना व सामर्थ्य से युक्तकर पूर्ण स्वाधीनता दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह अपने अविवेकपूर्ण आचरण से सृष्टि में विध्वंस करने में लगा है। अपनी अविवेकपूर्ण मांगों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इच्छाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महत्त्वाकांक्षाओं या तृष्णाओं को पूरा करने के लिए सृष्टि में विध्वंस करने लगा और पिछले </span>200<span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ वर्षों में प्रकृति का जो विनाश नहीं हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह मात्र लगभग पिछले </span>200<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों में हो गया। आज जंगल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जड़ी-बूटियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेड़-पौधों का विनाश करने से लेकर मनुष्य ने अपने क्षणिक सुखों के लिए एक लम्बे विनाश को आमन्त्रण दे दिया है। आज पूरी प्रकृति में मनुष्य ने अपनी दुष्कृति से विकृति पैदा कर दी है। हवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिट्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आकाश व अन्नाद्रि जीवन के सारे मूल तत्त्वों को विकृत कर दिया है। यदि अभी हम नहीं संभले तो आने वाली मनुष्य जाति के लिए हम घनघोर संकट के बीज बोकर जायेंगे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आइए प्रकृति माता को बचाइये। यह प्रकृति भगवान् की उत्कृष्ट कृति है। यह भगवान् की रचना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् का ही प्रत्यक्ष रूप यह प्रकृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् का ही मूर्त्त रूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सगुण-साकार रूप है। हम एक-एक पेड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पौधे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वनस्पति व जड़ी-बूटियों की ऐसे देखभाल करें जैसे भगवान् की पूजा करते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति माता के व ऋषियों के हम पर अनन्त उपकार हैं। प्रकृति के उपकारों से उऋण होने के लिए संगठन के पाँचों इकाईयों से जुड़े योग साधक भाई-बहन इसे एक सघन अभियान के रूप में चलायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही प्रकृति के प्रति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् व ऋषियों के प्रति हमारी पूजा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा व आराधना है कि हम अधिक-से-अधिक वृक्षारोपण कर प्रकृति का संरक्षण करें। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शाश्वत प्रज्ञा</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3079/shashwat-pragya-july-2015</link>
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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2015 21:59:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राष्ट्र-निर्णायकों की दृष्टि में पूज्य स्वामी जी महाराज की दिव्य योगयात्रा</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आप कल्पना कर सकते हैं कि एक व्यक्तित्व जो अहर्निश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकनिष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अखंड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अविरल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वन लाइफ वन मिशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चरैवेति-चरैवेति इस देश में लगातार भ्रमण करते रहे। प्रतिदिन डेढ़-डेढ़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ढाई-ढाई लाख लोगों को योग के माध्यम से प्रेरित करते रहे। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैंने बाबा जी से पूछा कि योग से उर्जा प्राप्त होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य प्राप्त होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उमंग रहती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह सब तो है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन चारों तरफ से इतनी यातनायें आती हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसको झेलने की ताकत उनमें कहां से आती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बाबा रामदेव निकले थे नागरिकों के अच्छे</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3080/divine-yoga-yatra-of-pujya-swami-ji-maharaj-in-the-eyes-of-the-nation-s-leaders"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/slide1.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आप कल्पना कर सकते हैं कि एक व्यक्तित्व जो अहर्निश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकनिष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अखंड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अविरल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वन लाइफ वन मिशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चरैवेति-चरैवेति इस देश में लगातार भ्रमण करते रहे। प्रतिदिन डेढ़-डेढ़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ढाई-ढाई लाख लोगों को योग के माध्यम से प्रेरित करते रहे। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैंने बाबा जी से पूछा कि योग से उर्जा प्राप्त होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य प्राप्त होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उमंग रहती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह सब तो है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन चारों तरफ से इतनी यातनायें आती हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसको झेलने की ताकत उनमें कहां से आती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बाबा रामदेव निकले थे नागरिकों के अच्छे स्वास्थ्य के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह निकले थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि योग के माध्यम से गरीब व्यक्ति अपने आपको स्वस्थ रख सके। वह निकले थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जो महंगी दवा गरीब को बचा नहीं सकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे योग</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बचा सकता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अरुण जेटली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूचना एवं प्रसारण मंत्री</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत सरकार</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महात्मागांधी ने संघर्ष कर देश को आजाद कराया और खुद बड़ा त्याग करते हुए सत्ता से दूर रहे। इसी तरह वर्ष </span>1977<span lang="hi" xml:lang="hi"> में जय प्रकाश नारायण ने आंदोलन किया जिसके बाद सत्ता परिवर्तित हुई। जय प्रकाश भी सत्ता से दूर रहे थे। वर्तमान में बाबा रामदेव ने भी व्यवस्था परिवर्तन के लिए संघर्ष किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन खुद राजनीति व सत्ता से दूर रहे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">नितिन गडकरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केन्द्रीय सड़क परिवहन राजमार्ग व जहाजरानी मंत्री</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत सरकार</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में हमेशा ही राजसत्ता का मार्गदर्शन अध्यात्म सत्ता ने किया है। उसी अवधारणा का निर्वाह किया है स्वामी रामदेव जी महाराज ने। उनकी नीतियां वर्तमान भारत की प्रतिष्ठा के लिए महत्वपूर्ण हैं। हम उसी दिशा में कदम बढ़ाएंगे। स्वामी जी ने राष्ट्र के इस ऐतिहासिक चुनाव को लेकर पहले ही पार्टी को विजय आशीर्वाद दे दिया था जो पूर्ण हुआ। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ एच आर नगेन्द्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चांसलर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एस-व्यासा विश्वविद्यालय</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी रामदेव जी के महान कर्म से योग दुनियां के कोने-कोने में प्रसारित हो रहा है। इसी प्रकार योग विश्वकोश भौतिक विश्व के आगे कहां और कैसे जाना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह विश्वकोश उस दिशा के लिए महत्वपूर्ण देन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे निश्चित ही विश्व भर में मान्यता मिलेगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ प्रणव पण्ड्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुलाधिपति देवसंस्कृति विश्वविद्यालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग को जन-जन तक पहुंचाने का श्रेय एक अकेले व्यक्ति स्वामी रामदेव जी को जाता है। आपने उत्तर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दक्षिण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिम को योग के माध्यम से एक कर दिया। स्वस्थ शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वच्छ मन और सभ्य समाज की रचना इसी योग से होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तुत: स्वामी जी युग के पतंजलि हैं। अब भारतीय संस्कृति को कोई हिला नहीं सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण जी के पुरूषार्थ से उपजा यह विश्वकोश निश्चित ही विश्व के विश्वविद्यालयों के अध्ययन का विषय बनेगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ बीरेन्द्र हेगडे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्माधिकारी धर्मस्थला  </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मै टेलीविजन द्वारा स्वामी जी के साथ-साथ योग करता हूं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी जी ने दुनियां के लिए अमरता भरा कार्य करके स्वयं अमर हो चुके हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब स्वामी जी शाश्वत रहेंगे। स्वामी जी के कारण ही यह योग अब केवल अमीरों का नहीं रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु गरीबों के लिए खुल गया है। आचार्य बालकृष्ण जी के कारण आयुर्वेद के प्रति लोगों की दृष्टि बदली है। हमारी चाहत है कि भारत सरकार इस योग को दुनियां भर में निर्यात करे। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रसंत मोरारी बापू </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भागवत कथा को छोटे से कमरे के अंदर से मैदान में उतारने का श्रेय डोगरे जी महाराज को है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी तरह योग को विश्व भर में स्थापित करने का श्रेय स्वमी रामदेव जी को जाता है। वास्तव में विश्वयोग दिवस की स्थापना में इस फकीर का सबसे बड़ा योगदान है। मैं इस बाबा जी का साप्ताहिक चिंतन करके अपना योग पूर्ण करता हॅूँ। यह योग विश्वकोश मात्र एक ग्रंथ नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु यह एक योगी का मस्तक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार और प्रज्ञा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके बोध का मंगलमय स्वरूप है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु शरणानंद जी महाराज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यक्ष मानव सेवा संघ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वृंदावन</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी रामदेव जी और बालकृष्ण दोनों का समुच्चय है पतंजलि योग पीठ का यह योग आंदोलन। जैसे दवायें नास्तिक-आस्तिक सभी के लिए उपयोगी होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे ही योग है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे आधि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्याधि का शमन एवं उपाधि का पाना सम्भव है। विश्व में वैमनस्य जैसे दोष का मूल कारण अज्ञान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग विश्वकोश उसी अज्ञान को दूर करने का शक्ति ग्रंथ है। यह शोध परक ग्रंथ हर योग क्षेत्र के शोधार्थी के लिए उपयोगी होगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी चिदानंद मुनि सरस्वती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यक्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परमार्थ निकेतन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषिकेश</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">साइकिल चलाने वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संत परम्परा की भिक्षा से निर्वाह करने वाला यह ऋषि आज दुनियां को योग दे रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिस देश में ऐसा लाल होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस देश की संस्कृति विश्व भर में प्रतिष्ठित ही होगी। विश्व को अच्छा सोचने व स्वस्थ होने के लिए योग चाहिए ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज भारत करवट बदल रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नया  इतिहास लिख रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग इसमें भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जैन मुनि रूपचंद्र जी महाराज संस्थापक मानव मंदिर गुरुकुल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नई दिल्ली</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग की वर्तमान प्रसिद्धि के पीछे प्रमुख कारण स्वामी रामदेव जी द्वारा योग को स्वास्थ्य से जोड़ना है</span>,</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तुत: विज्ञान हमें शक्ति से जोड़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि योग शिव से। भविष्य में विज्ञान और धर्म के मिलन का पर्याय होगा योग। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जैन मनीषी विवेक जी महाराज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इंटरनेशनल महावीर जैन मिशन </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शांति के लिए आचार्य श्री द्वारा योग विश्वकोश का निर्माण व संग्रह करने का भागीरथ पुरूषार्थ विश्व को योग की ज्ञानगंगा के रूप में प्राप्त हो रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके लिए विश्व उनका ऋणी रहेगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मौलाना कल्वे रिजवी </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो लोगों के पापों को धुलती है वह गंगा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो करोड़ों लोगों के दिलों को जोड़े वह है स्वामी रामदेव। इन्होंने दुनियां के लिए योग के द्वार खोले हैं इससे दुनियां की सेहत ठीक होगी और रोगों में फंसी दुनियां की तरक्की का मार्ग खुलेगा। मक्का की रोटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरसों के साग व पराठे पर किसी हिन्दू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुश्लिम या ईसाई का नहीं केवल भूखे का नाम लिखा होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग ठीक वैसे ही है।  </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मुफ्ती शमून काज़मी </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि में दो संत हैं जिन्हें देखकर हमें ईश्वर याद आते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी जी व आचार्य श्री ये दोनों ने मिलकर योग के माध्यम से विदेशी का बहिष्कार किया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे देश में एकता व नेकता आयेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए जरूरत है हम सब भी योग करें।  जैसे लोग कभी पोलियों ड्राप के प्रति भ्रांति फैला रहे थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे ही योग के प्रति भ्रम फैला रहे हैं। जिससे कि हम बीमारियों में पड़े रहें और हमाारा विकास रुक जाय। वस्तुत: विकास चाहिए तो योग करो। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मुफ्ती शमून काज़मी</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि में दो संत हैं जिन्हें देखकर हमें ईश्वर याद आते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी जी व आचार्य श्री ये दोनों ने मिलकर योग के माध्यम से विदेशी का बहिष्कार किया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे देश में एकता व नेकता आयेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए जरूरत है हम सब भी योग करें।  जैसे लोग कभी पोलियों ड्राप के प्रति भ्रांति फैला रहे थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे ही योग के प्रति भ्रम फैला रहे हैं। जिससे कि हम बीमारियों में पड़े रहें और हमाारा विकास रुक जाय। वस्तुत: विकास चाहिए तो योग करो।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3080/divine-yoga-yatra-of-pujya-swami-ji-maharaj-in-the-eyes-of-the-nation-s-leaders</link>
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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2015 21:58:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>इक्कीसवीं सदी के प्रथम अंतरराष्ट्रीय योगदिवस पर विश्व को पतंजलि की दिव्य सौगात 'योग विश्वकोश’</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3081/patanjali-s-divine-gift--yoga-vishwakosh--to-the-world-on-the-first-international-yoga-day-of-the-twenty-first-century"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/1622.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   भारतवर्ष के लिये बहुत बड़े गौरव की बात है कि भारतवर्षीय ऋषियों की सर्वश्रेष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रामाणिक व सार्वभौमिक खोज </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">आज दुनियाँ के सबसे अधिक प्रयुक्त होने वाले प्रचलित शब्दों में एक है। वर्तमान समय में श्रद्धेय योगर्षि स्वामी रामदेव जी महाराज के पावन तप व अखण्ड पुरुषार्थ से इस दुनियाँ की लगभग पूरी आबादी योग तथा योग से सम्बद्ध आसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुद्रा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाधि आदि शब्दों से परिचित हो रही है। आज योग आम जनमानस से लेकर साधक तथा विश्वविद्यालय स्तर तक के समस्त विचारशील एवं शिक्षित लोगों के लिए लाभप्रद हो रहा है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग एक गूढ़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत्यन्त उपयोगी एवं व्यावहारिक विषय है। यह रूपान्तरण का विज्ञान (</span>Science of Transformation<span lang="hi" xml:lang="hi">) है। योग मात्र ऋषि-मुनियों और विचारशील-विवेकवान् लोगों के लिये ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि प्रत्येक व्यक्ति- किसान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मजदूर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यापारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नौकरीपेशा गृहस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वानप्रस्थ एवं संन्यासी से लेकर विद्यार्थी आदि सभी के लिये ऋषियों की उत्कृष्ट देन है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग के माध्यम से मानव को महामानव बनाने की प्रविधि के विकास से </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक प्रौद्योगिकी</span>’ (<span lang="hi" xml:lang="hi">स्प्रिचुअल टैक्नोलॉजी) का स्वरूप उभरकर सामने आयेगा व ऋषियों के स्वप्न को मूर्त्त रूप देने की दिशा की ओर हम बढ़ सकेंगे। तब योग के द्वारा सच्चे अर्थों में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्विक युग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का निर्माण हो सकेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुनियाँ में पुन: भारत आध्यात्मिक महाशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित होगा। विश्वगुरु के पद पर आसीन होगा और योग-अध्यात्म से ही सच्चे अर्थों में विश्वशान्ति स्थापित होगी तथा विश्व में सात्विक समग्र समृद्धि भी आयेगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">साधारण ग्रामीण से लेकर शिक्षित जनों तक योगविषयक समग्र सोच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्धान्त व साधना पद्धति के द्वारा हमारे ज्ञान में समग्रता व शुद्धता होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे हमारे विचारों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्धान्तों व निर्णयों में भी शुद्धता होगी। जैसे हमारे सिद्धान्त व निर्णय होंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसी ही हमारी भावनाएँ व आचरण होगा। इससे मानव जगत को वैज्ञानिक दृष्टिकोण की प्राप्ति होगी एवं वैश्विक दृष्टि में दिव्य परिवर्तन सम्भव हो सकेगा। पतंजलि योगपीठ इसी अभियान की दिशा में संलग्न है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गुफाओं से गांवों की ओर प्रवाहित होता योग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्विक दृष्टि से देखा जाये तो आज योग बीहड़ जंगलों व गुफा-कन्दराओं से निकल कर गाँव के गलियारों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शहरों के कोलाहल में भी शान्ति की तलाश में भटकते मानवों की जीवन-शैली का हिस्सा बन रहा है। अब लोग यह समझ चुके हैं कि योग मात्र जंगलों में बैठकर या गुफा-कन्दराओं में छिपकर या घर-परिवार व समाज से दूर रहकर केवल साधु-संन्यासियों के द्वारा की जाने वाली कोई रहस्यमयी विद्या ही नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि करोड़ों मानवों के जीवन से जुड़ी हुई पीड़ा का समाधान है। बहुत सारे लोग इस अनादि सत्य को समझ गये हैं कि योग ही दु:खों की आत्यन्तिक निवृत्ति का एकमात्र साधन है। असाध्य माने जाने वाले मधुमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च रक्तचाप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैन्सर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिप्रेशन आदि रोगों की सरल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफल व प्रामाणिक चिकित्सा के रूप में योग पूरे विश्व में फैल चुका है। देर रात तक कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करने वाला व्यक्ति भी निद्रा की गोद में समाहित होने के लिए योग का सहारा ले रहा है। दूसरी तरफ देखा जाये तो योग रोजगार का साधन भी बनकर उभरा है। इसे व्यावसायिक रूप से भी युवा अपना रहे हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज योग लाखों युवाओं के लिए स्वाभिमान के साथ जीने का सहारा भी बना है। घरेलू गृहिणी से लेकर देर रात तक कार्य में व्यस्त लोगों के लिये योग-प्रशिक्षकों की माँग दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। इसके साथ ही देश-विदेश के बहुत सारे विद्यालयों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में भी योग पाठ्यक्रम का हिस्सा बनता जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके कारण समाज में एक ऐसी पीढ़ी का निर्माण हो रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो दिखने में भले ही सामान्य क्यों न हो</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु आन्तरिक रूप से पूरी तरह योग में रंगी हुई है। सम्पूर्ण दुनियाँ जीवन व जगत् से सम्बद्ध सभी क्षेत्रों में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की उपयोगिता को दिन-प्रतिदिन आवश्यक अनुभव करती जा रही है। वस्तुत: लोग योग से जितनी अपेक्षा कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग उन्हें उससे कई गुना अधिक लाभ पहुँचायेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगाभ्यास को तो योग के जिज्ञासु समझते व जानते हैं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु इसमें प्रयुक्त होने वाले शब्दों की समग्र व सूक्ष्म जानकारी योग के जिज्ञासुओं के लिए आज भी सरल नहीं है। शैक्षिक पाठ्यक्रम में योग विषय को शामिल करने के साथ ही इसके समाधान योग से सम्बद्ध एक बृहत् कोश के निर्माण का संकल्प उभरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो योग के जिज्ञासुओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्येताओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधकों के साथ ही योग के क्षेत्र में उच्चस्तरीय शोध व अनुसन्धान करने वाले शोधार्थियों एवं वैज्ञानिकों का मार्गदर्शन कर सके।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">खिलेगा योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी व वैदिक सत्य का संकल्प:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह निर्विवादित सत्य है कि वैश्विक पटल पर योग के समग्र स्वरूप को लेकर काम करने वाली एक मात्र प्रामाणिक संस्था पतंजलि योगपीठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो योग की विविध परम्पराओं का संगम स्थल है। यह योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी व वैदिक सत्य सनातन ऋषि ज्ञान परम्परा का पावन महातीर्थ है। यहाँ पर योग की शाश्वत पद्धति के साथ-साथ प्रत्येक योग-परम्परा की मौलिक खोज को दिव्य मानव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महामानव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अतिमानव को गढ़ने के लिये बिना किसी पूर्वाग्रह के स्वीकार किया जाता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि का अभिमत है कि "योग के त्रिविध ग्रन्थों (आधार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतन्त्र व प्रभावित ग्रन्थों) से योग से सम्बद्ध विशिष्ट पदों का चयन करके प्रत्येक पद के विविध अर्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लक्षण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिभाषा व विधियाँ व उसके लिए प्रयोग में लाए जाने वाले अन्य पद तथा उस पद से जुड़ी हुई जो भी विशिष्ट जानकारियाँ मनुष्य जाति के पास वर्तमान में विद्यमान है वे वेद तथा इस धरती पर उपलब्ध योग के सभी स्वतन्त्र ग्रन्थों और विविध धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभ्यता से सम्बद्ध विपुल प्राचीन एवं अर्वाचीन मूल साहित्य के अन्दर मिलती हैं।" </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा उद्देश्य है कि योग से सम्बद्ध उन शब्दों (जिनसे लोग परिचित हों या अपरिचित) के विषय में यत्र-तत्र बिखरी हुई संपूर्ण जानकारियों को यथासम्भव एकत्र कर उन्हें वैज्ञानिक स्वरूप देकर मनुष्य जाति पुरुषार्थचतुष्टय (धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोक्ष) अथवा अभ्युदय व नि:श्रेयस् की सिद्धि के लिय समग्रता से दर्शाया जाये तथा प्राचीन से लेकर अर्वाचीन योग के स्वरूप को पूरी प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत किया जाये। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही सभी धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति व परम्पराओं में विद्यमान योग के मूलभूत तत्त्वों को शोध व अनुसन्धान के द्वारा ढूँढ़कर मानव समाज के सामने रखा जाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे कि योग के माध्यम से विविध धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्प्रदाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पन्थ व संस्कृति आदि में विभक्त दुनियाँ को हम एकत्व के सूत्र में पिरो सकें। मानव के अन्दर विद्यमान अपरिमित शक्तियों को जगाने हेतु लुप्तप्राय: हो चुकी गूढ़ व रहस्यमयी योग की दुर्लभ विधियों को सम्पूर्ण रूप में प्राप्त कर मानव को महामानव बनाने की दिशा की ओर अग्रसर हो सकें। परिणामत: पुन: भारत आध्यात्मिक महाशक्ति के रूप में इस धरा पर प्रतिष्ठित हो सके।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतजलि योगपीठ का अपने इस आध्यात्मिक दायित्व व कर्त्तव्य की पूर्ति हेतु योग के व्यापक व गूढ़ स्वरूप को शुद्ध रूप में विश्व के सामने लाने का एक प्रयास है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग विश्वकोश</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के रूप में प्रस्तुत हुआ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग-विश्वकोश की विशेष झलक:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परम श्रद्धेय योगर्षि स्वामी रामदेव जी महाराज की दिव्य प्रेरणा एवं कुशल मार्गदर्शन में कई वर्षों के अनवरत घोर तप व पुरुषार्थ के उपरान्त योग के दार्शनिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यावहारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शारीरिक सभी पक्षों का प्रामाणिक रूप से एक साथ संकलन करके तैयार इस योग-विश्वकोश (</span>World Yoga Encyclopedia<span lang="hi" xml:lang="hi">) में योग की विविध परम्पराओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यथा-पातंजलयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हठयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बौद्धयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैनयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्धयोग तथा इनके सिद्धान्त व साधना से जुड़े हुए हजारों शब्दों के विविध अर्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिभाषाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विधियों आदि का ऋषियों के हजारों ग्रन्थों के आधार पर सन्दर्भ पूर्वक पूरी प्रामाणिकता के साथ समावेशित हैं। इस योग से सम्बद्ध 10,000</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> से अधिक शब्दों के बृहत्काय कोश के अन्दर लगभग २५०० आसनों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शताधिक प्राणायामों व शोधन-क्रियाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ढाई सौ से अधिक मुद्राओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यौगिक उपकरणों तथा योगशास्त्रीय द्रव्यों आदि का नाम व विधिपूर्वक सचित्र वर्णन है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मुझे इस बात का उल्लेख करते हुए अपने पूर्वजों के प्रति अत्यन्त गौरव की अनुभूति हो रही है कि सभी मत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पन्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्प्रदाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभ्यता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राचीन परम्पराओं आदि में विद्यमान योग के मूल तत्त्वों को बिना किसी पूर्वाग्रह या दुराग्रह के संकलित करने एवं योग-शास्त्रीय विषयों को एक जगह वैज्ञानिक रूप में सन्दर्भ पूर्वक प्रस्तुत करने का यह ज्ञात इतिहास में सबसे प्रथम व सबसे बड़ा विनम्र प्रयास है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह एक ऐसा कोश है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें योग के सम्पूर्ण स्वरूप को एकीकृत करके समग्र रूप से अभिव्यक्त करने का पुरुषार्थ किया गया है। इसमें योग से सम्बद्ध मात्र आसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुद्रा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बन्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान व समाधि आदि शब्दों की ही चर्चा नहीं की गयी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि योग से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में सम्बन्ध रखने वाले ऐसे हजारों की संख्या में शब्द हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनका आज तक लोगों नेे नाम भी नहीं सुना होगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग-विश्वकोश योग के रहस्यों को धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभ्यता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परम्परा व योग के हजारों ग्रन्थों के मन्थन से निकालकर सहज रूप से मानव जाति के लिये तैयार किया गया अनमोल उपहार है। विश्वकोश से न केवल योग से प्रत्यक्ष सम्बन्ध रखने वाले व्यक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सम्पूर्ण बुद्धिजीवी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे वह वैज्ञानिक हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शोधार्थी हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुसन्धाता हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या सामान्य जन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब थोड़ा कम या अधिक लाभ अवश्य प्राप्त करेंगे। योग-विश्वकोश से यौगिक वैश्विक मंच का निर्माण हो सकेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र व विश्व में शान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकता का संदेशवाहक बनेगा। पूरा विश्व </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वसुधैव कुटुम्बकम्</span>’, '<span lang="hi" xml:lang="hi">सह-अस्तित्व</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">एवं </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">एकत्व</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के सूत्र में संगठित होगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग-विश्वकोश में शब्दों की भूमिका:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग-विश्वकोश में कोई भी ऐसा शब्द नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका अन्य शब्दों के साथ बिल्कुल भी मेल न हो। ध्यान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुद्रा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बन्ध व क्रिया आदि सभी शब्द एक-दूसरे से सम्बन्ध रखते हैं। इन शब्दों का चयन माला के मोतियों की भाँति किया गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें यदि एक भी शब्द की कमी पड़ जाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसकी कमी खलने लगती है। योग-विश्वकोश के अन्तर्गत शब्द एवं शब्दों के युक्ति संगत अर्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामान्य अर्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिभाषाएँ एवं शब्दों से सम्बद्ध विषयों को सम्यक् प्रकार से दर्शाने का हर सम्भव प्रयास किया गया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पातंजलयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हठयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बौद्धयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैनयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नाथयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सन्तयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्धयोग आदि योग की विभिन्न परम्पराओं के ग्रन्थों या साधकों के बीच प्रचलित योग के सिद्धान्त व साधना से सम्बद्ध १०</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">००० से अधिक विशिष्ट पदों (शब्दों) का अर्थ तथा प्रत्येक शब्द से सम्बद्ध अनेकविध जानकारियों तथा रहस्यों का सोद्धरण-ससन्दर्भ विवेचन। चयनित शब्दों के अर्थों व विविध आयामों को स्पष्ट करने हेतु ऋग्वैदिककालीन-साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर वैदिक कालीन-साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूत्र-साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टीका-साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महाकाव्य कालीन-साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्मृति-साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद-साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पौराणिक-साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पातंजलयोग-साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बौद्ध-साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैन-साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नाथ-साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हठयोग-साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तन्त्र-साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्राह्मण-ग्रन्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईसाई-मुस्लिम व सिख आदि धर्मपरक-ग्रन्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कबीर-मीरा-तुलसी व जायसी आदि सन्तों से सम्बद्ध साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्ध-साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूफी-साहित्य आदि से 1,00,000</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> से अधिक सन्दर्भ उद्धृत हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सभी धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति व परम्पराओं के मर्म तत्त्व </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के विराट् स्वरूप का दर्शन। शब्दों के अन्दर जीवन निर्माण व मानव चेतना के उत्थान से सम्बद्ध सम्पूर्ण सूत्रों को एक ग्रन्थ में पिरोने का प्रथम दिव्य प्रयास। चयनित पदों से सम्बद्ध योग के आधार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतन्त्र व प्रभावित साहित्य में विद्यमान जानकारियों को सम्पूर्णतया सोद्धरण-ससन्दर्भ व्यवस्थित रूप में एकत्र करने का अभूतपूर्व प्रयास। एक ही कोश के अन्दर संस्कृत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राकृत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सधुक्कडी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भोजपुरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उड़िया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंजाबी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उर्दू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिन्दी व अंग्रेजी आदि भाषाओं में निबद्ध ग्रन्थों के सन्दर्भोंर् का समावेश।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगशास्त्रों में वर्णित आसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुद्रा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बन्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चक्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोश व विभिन्न प्रकार की विशिष्ट शोधन-क्रियाओं का सचित्र-ससन्दर्भ वर्णन। योग साधना व चिकित्सा हेतु प्रयोग में लाये जाने वाले उपकरणों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यथा-वस्त्रधौति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दण्डधौति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगदण्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूत्रनेति आदि का सचित्र वर्णन। योग के ग्रन्थों में उल्लिखित सम्पूर्ण आयुर्वेदिक द्रव्यों का सचित्र वर्णन। योग के समस्त वाङ्गमय से सिद्धियों के विषय में यत्र-तत्र बिखरी हुई जानकारियों का एकत्रीकरण आदि से युक्त मानव जाति के इतिहास में पहला प्रयास कहेंगे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> तात्त्विक-दार्शनिक चिन्तन के इतिहास को शब्द रूपी सूत्र में पिरोने वाला वैश्विक संस्कृति का स्थापक यह पहला ग्रन्थ विविध धर्मों में विद्यमान योग-तत्त्व के आधार पर सभी धर्मों को जोड़ने की प्रथम ऐतिहासिक पहल कह सकते हैं। बिखरी हुई भारतीय संस्कृति की ऋषि-परम्परा को जोड़ने वाला मानव जाति के लिये पतञ्जलि योगपीठ संस्थान की ओर से यह विश्व के लिए अमूल्य उपहार है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस योग कोश के माध्यम से वैश्विक जगत् में योग के प्रति ऐसा वातावरण तैयार होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे जिज्ञासु पाठक यह समझ सकेगें कि योग मात्र प्रचलित आसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुद्रा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बन्ध तक ही सीमित नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसका स्वरूप विराट् है। परमात्मा की तरह नेति-नेति।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ग्लोबल विलेज की आध्यात्मिक यात्रा:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दुनियाँ ने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सूचना प्रौद्योगिकी</span>’ (<span lang="hi" xml:lang="hi">इन्फार्मेशन टैक्नोलॉजी) का विस्तार और प्रभाव तो देख ही लिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे कि पूरा विश्व </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्विक गाँव</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">में तो परिणत हुआ है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु मौलिक चीजों तथा मानवीय शान्ति के लिये कोई ऐसा कार्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अभी नहीं कर सका। वह है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक प्रौद्योगिकी</span>’ (<span lang="hi" xml:lang="hi">स्प्रिचुअल टैक्नोलॉजी)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके माध्यम से विश्व के प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर संवेदनशीलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सद्भावना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चरित्र निर्माण और दूसरे की पीड़ा को समझने व उसे हल करने की योग्यता का विकास होगा। मानव को महामानव बनाने की प्रविधि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक प्रौद्योगिकी</span>’ (<span lang="hi" xml:lang="hi">स्प्रिचुअल टैक्नोलॉजी) का स्वरूप उभरकर सामने आने से ऋषियों के स्वप्न को मूर्त्त रूप देने की दिशा की ओर हम बढ़ सकेंगे। योग के द्वारा सच्चे अर्थों में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्विक युग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का निर्माण हो सकेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे दुनियाँ में पुन: भारत आध्यात्मिक महाशक्ति  के रूप में प्रतिष्ठित होगा। भारत पुन: विश्वगुरु के पद पर आसीन होगा और सच्चे अर्थों में विश्वशान्ति स्थापित होगी तथा सात्विक समग्र समृद्धि भी आयेगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि हमारे ज्ञान में समग्रता व शुद्धता होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हमारे विचारों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचारधारा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्धान्तों व निर्णयों में भी शुद्धता होगी और जैसे हमारे सिद्धान्त व निर्णय होंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसी ही हमारी भावनाएँ व आचरण होगा। योग के सन्दर्भ में सबका ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भावनाएँ व आचरण शुद्धतम हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी संकल्प के साथ यह योग-विश्वकोश समष्टि की सेवा में समर्पित है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमें विश्वास है कि यह योग-विश्वकोश भारतवर्षीय संस्कृति की ऋषि परम्परा का संदेश वाहक होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विविध धर्मों को एक सूत्र में बाँध सकेगा। इससे वैज्ञानिक दृष्टिकोण की प्राप्ति होगी एवं मानव जाति को एक सूत्र में पिरोने वाले इस ग्रन्थ से वैश्विक दृष्टि में दिव्य परिवर्तन होगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कैसे व्यक्ति जीवन को पूरी दिव्यता व प्रसन्नता से जी सकता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">कैसे सृष्टि के सौन्दर्य का आनन्द पूरी तरह से ले सकता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">कैसे अपरिमित शक्तियों का स्वामी बन सकता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">कैसे उसके जीवन में आदर्श का प्रस्फुटन हो सकता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">आदि विषयों से सम्बद्ध सूत्रों को अध्येता योग-विश्वकोश के अध्ययन से समझ सकेंगे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग-विश्वकोश</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास के विविध कालखण्ड में इस धरा पर अवतरित अनगिनत ऋषि-मनीषियों की दिव्य विरासत और हम सभी के लिए अमूल्य धरोहर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: इसे अतीव उपयोगी बनाने की दिशा में सोचना व प्रयत्न करना हम सभी का पुनीत कर्त्तव्य है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रस्तुत कोश की रचना का श्रेय तो वास्तव में उन ऋषियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्यों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगियों को है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनके वाक्यांश इसमें संगृहीत है। जो परमात्मा की कृपा और श्रद्धेय स्वामी जी के आशीर्वाद से सहज ही नियोजित होता चला गया।  </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्त में कह सकते हैं जब सम्पूर्ण ऋषिसत्ता के प्रति पूर्ण कृतज्ञता के साथ यह ग्रन्थ समष्टि की सेवा में समर्पित होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व के हर साधारण ग्रामीण से लेकर शिक्षित जनों तक योगविषयक समग्र सोच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्धान्त व साधना पद्धति पहुँच सकेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी पतंजलि के विश्व निर्माण आंदोलन का स्वप्र भी साकार होगा। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2015 21:57:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
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                <title>योग की गौरवशाली परम्परा एवं इतिहास</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">      योग</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वचेतना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वशक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वबल अर्थात् आत्मबल इत्यादि को पूर्णत: जाग्रत् करने का विशुद्ध विज्ञान हैै। उसकी प्रसुप्त शक्ति जाग्रत् होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब वह अपरिमित शक्तियों का स्वामी बन जाता है। योग मूलत: पूर्णतया सत्यबोध कराने वाली अध्यात्म-विद्या है। योग विद्या ही अपराविद्या व पराविद्या का मूल है। योग ही हमारे अभ्युदय व नि:श्रेयस् का आधार है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग एक गूढ़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत्यन्त उपयोगी एवं व्यावहारिक विषय है। यह रूपान्तरण का विज्ञान (</span>Science of Transformation<span lang="hi" xml:lang="hi">) है। योग मात्र ऋषि-मुनियों और विचारशील-विवेकवान् लोगों के लिये ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि प्रत्येक व्यक्ति-किसान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मजदूर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यापारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नौकरीपेशा <strong>गृहस्थ</strong></span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3082/glorious-tradition-and-history-of-yoga"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/150.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   योग</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वचेतना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वशक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वबल अर्थात् आत्मबल इत्यादि को पूर्णत: जाग्रत् करने का विशुद्ध विज्ञान हैै। उसकी प्रसुप्त शक्ति जाग्रत् होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब वह अपरिमित शक्तियों का स्वामी बन जाता है। योग मूलत: पूर्णतया सत्यबोध कराने वाली अध्यात्म-विद्या है। योग विद्या ही अपराविद्या व पराविद्या का मूल है। योग ही हमारे अभ्युदय व नि:श्रेयस् का आधार है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग एक गूढ़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत्यन्त उपयोगी एवं व्यावहारिक विषय है। यह रूपान्तरण का विज्ञान (</span>Science of Transformation<span lang="hi" xml:lang="hi">) है। योग मात्र ऋषि-मुनियों और विचारशील-विवेकवान् लोगों के लिये ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि प्रत्येक व्यक्ति-किसान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मजदूर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यापारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नौकरीपेशा <strong>गृहस्थ</strong></span><strong>, </strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>वानप्रस्थ एवं संन्यासी</strong> से लेकर विद्यार्थी आदि सभी के लिये ऋषियों की उत्कृष्ट देन है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महर्षि पतंजलि के अनुसार चित्त अर्थात् अन्त:करण की समस्त वृत्तियों के निरोध से उत्पन्न अवस्था ही योग है। मनुष्य अपने सम्पूर्ण बाह्य व्यवहार की सिद्धि हेतु पंच ज्ञानेन्द्रियों व पंच कर्मेन्द्रियों को बाह्यकरण रूप में उपयोग करता है तथा आन्तरिक व्यवहार व आचरण की सिद्धि के लिए मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि और अहंकार को साधन रूप में ग्रहण करता है। ये साधन अन्त:करण कहलाते हैं। योगदर्शन में चित्त पद के द्वारा चारों करण अर्थात् मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्त और अहंकार एकसाथ गृहीत किये गये हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यथा-चित्तमन्त:करणसामान्यम्।  इस चित्त में विभिन्न प्रकार के चित्र बनते रहते हैं। ये चित्र सांसारिक विषयों से सम्बद्ध होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्हीं को चित्त की वृत्तियाँ कहते हैं। ये वृत्तियाँ जीवात्मा ही अपनी इच्छा से बनाती हैं और स्वयं ही अपनी इच्छा और प्रयत्न से रोक भी लेता है। बाह्य व आन्तरिक करणों के द्वारा जब वह बाह्य तथा आभ्यन्तर दोनों प्रकार के विचारों को रोक देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब जो अवस्था उत्पन्न होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह योग है। योग की अवस्था में आत्मा अपने शुद्धतम ज्ञानमय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आनन्दमय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण सुख व शान्तिमय मूल स्वरूप में रहता है। यही हम सब आत्माओं की मूल प्रकृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूल स्वभाव या मूल स्वरूप है। इसी निज स्वरूप को हमें योगाभ्यास अर्थात् कर्मयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञानयोग व भक्तियोग से प्राप्त करना है। शुद्ध कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्ध ज्ञान व शुद्ध उपासना से हमें योग की सह-स्थिति प्राप्त होगी। इसी के लिए साधना व निष्काम सेवा मुख्य साधन हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार समत्व ही योग है। अशान्त व अनवस्थित मन जब सुव्यवस्थित होकर शान्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकरस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सन्तुलित व समस्थिति को प्राप्त होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे योग कहते हैं। सामान्यत: मन अनुकूल व प्रतिकूल दोनों अवस्थाओं में सन्तुलन को खोकर व्यग्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्त-व्यस्त रहता है। जब मन की अशान्ति के कारण का निवारण हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब उसी प्रतिक्रिया रहित तटस्थावस्था व स्थितप्रज्ञता को गीता योग कहती है। गीता में योग की एक और परिभाषा मिलती है-</span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">तं विद्याद् दु:खसंयोगवियोगं योगसिमज्ञतम्।</span> </strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् दु:ख के संयोग का वियोग होना ही योग है। </span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग: कर्मसु कौशलम्'</span></strong></span> <span lang="hi" xml:lang="hi">विवेक पूर्वक अपने स्वधर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीरधर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवनधर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र व विश्व के प्रति अपने कर्त्तव्य कर्म को अपना धर्म मानकर करना यही स्वधर्म योग है। यही राष्ट्रधर्म व विश्वधर्म रूपी योग मानव मात्र के लिए एकमात्र कल्याण का मार्ग है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मैत्रयण्युपनिषद्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कठोपनिषद्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैवल्योपनिषद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गर्भोपनिषद</span>, </strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>योगशिखोपनिषद्</strong> में अपने और प्राण की एकता करने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वरजरूपी महाशक्ति कुण्डलिनी को स्वरेतरूपी आत्मतत्त्व के साथ संयुक्तकरने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य अर्थात् पिघौला और चन्द्र अर्थात् इड़ा स्वर का संयोग करने तथा परमात्मा में जीवात्मा का मिलन या लय होन की प्रक्रिया को योग से अभिहित किया गया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>बौद्धयोग-</strong></span>साहित्य में योग के स्थान पर ध्यान और समाधि शब्दों के प्रयोग मिलते हैं। बौद्धयोग परम्परा में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान की प्रक्रिया को समाधि कहा जाता है। अत: बौद्धयोग में योग का अर्थ समाधि है। योगसूत्र की व्याख्या या भाष्य में महर्षि व्यास भी योग को समाधि ही कहते हैं-</span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग: समाधि:</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महर्षि चरक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गौतमीय तन्त्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हठप्रदीपिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीगुरुग्रन्थसाहिब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैनाचार्यों से लेकर आधुनिक युग के महान् योगी महर्षि अरविन्द तक में निम्न चेतना से ऊपर उठकर सदा उच्च चेतना अर्थात् भागवत् चेतना या दिव्य चेतना से युक्त होकर दिव्य जीवन जीने के मूल तत्व में योग के संकल्प मिलते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान समय में विश्वविख्यात योगर्षि स्वामी रामदेव योग को समाधि से जोड़ते हैं और योग की पूर्ण व्यावहारिक व्याख्या प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि योग आत्मदर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्म- साक्षात्कार या आत्मबोध की आध्यात्मिक पद्धति है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">योग जीवन-दर्शन है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">योग जीवन-प्रबन्धन है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">योग आत्मानुशासन है। योग मात्र शारीरिक व्यायाम नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु सम्पूर्ण जीवनशैली है। योग चित्त को निर्मल व निर्बीज करने की आध्यात्मिक विधा है। योग एक सम्पूर्ण चिकित्सा-विज्ञान है। योग जीवन का विज्ञान है। योग व्यक्ति समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र व विश्व की सम्पूर्ण समस्याओं का समाधान है। योग एवं कर्मयोग अर्थात् साधना एवं निष्काम सेवा ही योग के मुख्य साधन हैं। प्रतिपल ब्रह्म के एकत्व या ब्रह्मभाव में रहते हुए भगवान् की अन्त:प्रेरणा के अनुसार कर्म करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचरण करना या जीवन जीना ही योगमय जीवन है।</span>‘</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग की प्राचीन परम्परायें:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत्यन्त समृद्ध प्राचीन भारतीय वांगमय के अध्ययन-अनुसन्धान से </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">हिरण्यगर्भ</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">ही योग के आदि प्रवक्ता बताये गये हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्य कोई नहीं। ऋग्वेद ने अद्वितीय हिरण्यगर्भ को सूर्यादि तेजस्वी पदार्थों का गर्भ-उत्पत्तिस्थान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्पादक कहा है। हिरण्यगर्भ को सम्पूर्ण प्राणियों का स्वामी गुरुओं का भी गुरु और पुरातन कहा है। महाभारत में भी योग के आदि प्रवक्ता के रूप में हिरण्यगर्भ को ही स्वीकारा गया है। यह योगिजन का नित्य पूज्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विभु व समष्टि-बुद्धि है। इसी को योगिजन महान् तथा विरिमच और अज (अजन्मा) भी कहते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">अद्भुत रामायण</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">में हिरण्यगर्भ जगत् की अन्तरात्मा व श्रीमद्भागवतपुराण में भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को योगोपदेश देते हुए कहते हैं कि यही योगकौशल का मूल स्रोत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग का प्रारम्भ परमात्मा हिरण्यगर्भ के द्वारा ही हुआ है। अत: योग का आदि व प्रथम गुरु ईश्वर भी वही है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अखिल विश्व के प्राचीनतम साहित्य वेद में योग की अनेक संकल्पनाओं का स्पष्ट उल्लेख विभिन्न स्थानों पर मिलता है। यजुर्वेद में शरीरस्थ पाँच वायुओं की तेज वृद्धि के लिए प्रार्थना की गई है। अनेक वैदिक ऋचाएँ प्रत्यक्षतया अथवा प्रकारान्तर से योग के विभिन्न पक्षों को उद्घाटित करती हैं। यजुर्वेद के ११वें अध्याय के 1 से 5 तक के मन्त्र योग की उत्कृष्टता दर्शाते हैं। अथर्ववेद में कहा गया है कि विवेकशील व्यक्ति शरीर के सभी स्थानों से प्राण एकत्रित करके दिव्य लोक को प्राप्त करते हैं। वेदों में मुक्ति-प्राप्ति  के एकल साधन </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की चर्चा विस्तृत रूप में हुई है। वेदों की उत्पत्ति सृष्टि की उत्पत्ति के साथ-साथ हुई है। वर्तमान सृष्टि की आयु 1 अरब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">17 करोड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">29 लाख</span>, 49<span lang="hi" xml:lang="hi"> हजार 116 वर्ष (विक्रम संवत् 2071 ईस्वी संवत् 2015 में) हो चुकी है। अत: कतिपय विद्वान् योग-उत्पत्ति का काल भी इतना ही मानते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>अहिर्बुध्न्य-</strong></span>संहिता तथा अन्यान्य पुरातन ग्रन्थों से यह सिद्ध हो गया है कि शाश्वत योग की अक्षुण्ण परम्परा की शुरुआत भी हिरण्यगर्भ से ही हुई है। हिरण्यगर्भ से अग्नि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वायु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आदित्य और अंगिरा चार ऋषियों ने समाधि की उच्च-स्तरीय भूमियों में वेदमन्त्रों का साक्षात्कार किया। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग के आधुनिक युग के पुरोधा महर्षि दयानन्द ने स्वीकारा है कि धर्मात्मा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महर्षि लोग जब-जब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिस-जिस के अर्थ को जानने की इच्छा करके ध्यानावस्थित हो परमेश्वर के ध्यान में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके स्वरूप में समाधिस्थ हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब-तब परमात्मा ने अभीष्ट मन्त्रों के अर्थ को अनावृत्त किया और वही लोग उन मन्त्रों के ऋषि कहलाये। इस प्रकार योग की परम्परा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि-परम्परा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">से आगे बढ़ी। इसके अलावा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">शिष्य-परम्परा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से भी भगवान् हिरण्यगर्भ प्रकाशित योग की अक्षुण्ण परम्परा आगे बढ़ती रही।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग की शिष्य-परम्परा:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग की शिष्य-परम्परा का प्रारम्भिक महत्त्वपूर्ण संकेत मुण्डकोपनिषद् में मिलता है। उसमें कहा है कि देवों में मुख्य देव सर्वप्रथम ब्रह्मा हुये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सारे जगत् का कर्त्ता और सब लोकों का रक्षक है। उन्होंने सब विद्याओं में प्रतिष्ठित प्रधान ब्रह्मविद्या अर्थात् योगविद्या अपने ज्येष्ठपुत्र अथर्वन् को कही। अथर्वन् ने अंगिरस् को बताई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंगिरस् ने भारद्वाज सत्यवाह को बताई। भारद्वाज सत्यवाह से यह एक-दूसरे के बाद परम्परा से चली आ रही है।  पवित्रन्त:करण वाले सनक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सनातन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सनन्दन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कपिल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आसुरि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वोढु व पंचशिख आदि विद्वान् सर्वकर्मसंन्यास रूप ब्रह्मयोग अथवा ज्ञानयोग के अनुयायी हुए। यही ब्रह्मयोग कालान्तर में सांख्ययोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञानयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजयोग एवं अध्यात्मयोग आदि नामों से प्रसिद्ध हुआ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग की कर्मयोग परम्परा:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हिरण्यगर्भ प्रवर्तित योग की दूसरी शाखा कर्मयोग की परम्परा में किञ्चित् व्युत्थित चित्त से युक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसार के कार्यों को करते हुए मोक्ष की ओर अग्रसरित होने वाले विवस्वान्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इक्ष्वाकु व अन्य राजर्षि हुए। इस शाखा का मूल तात्पर्य यह है कि जो सर्वकर्मसंन्यासी नहीं बन सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह कर्मों का ईश्वर में अर्पण करते हुए कार्य फलों की आसक्ति से रहित व समाहितचित्त होकर परमात्मा का साक्षात्कार कर सकता है। इस शाखा का उल्लेख छान्दोग्योपनिषद् में मिलता है। इसी शाखा का उल्लेख गीता में भी मिलता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगेश्वरश्रीकृष्ण अर्जुन को कहते हैं-हे अर्जुन! मैंने (आत्मस्वरूप) किसी नई निष्ठा को अपनाने को नहीं कहा है। तुझे अपना विश्वसनीय मित्र समझ यह लुप्तप्राय सनातन-योग का उत्तम रहस्य बताया है। जब बड़े-बड़े विद्वान्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजा-महाराजा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि-महर्षि लोग महाभारत-युद्ध में मारे गये और बहुत से मर गये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब विद्या और वेदोक्त धर्म का प्रचार नष्ट हो चला। दुर्भाग्यवश महाभारत काल के पश्चात् यह सनातन-योग की परम्परा पुन: यथावत् नहीं रह पायी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग में सम्प्रदायवाद व संस्कृति:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वेदोक्तधर्म का प्रचार-प्रसार नष्टप्राय होने से समाज में क्रमश: अलग-अलग मत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पन्थ व सम्प्रदायों की स्थापना होने लगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे लोग </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">समझ बैठे। उसके लिए जीना वे अपना स्वधर्म समझने लगे और अर्थ का अनर्थ करते हुए इस बात को खूब फैलाया कि<strong> </strong></span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह:</span>’</strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>। </strong></span>यही कारण है कि योग की पावनी परम्परा सम्पूर्ण समाज में अच्छी तरह से फैल नहीं पायी। यद्यपि सभी सम्प्रदायों ने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग-संस्कृति</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को सर्वोच्च स्वीकार करके किसी न किसी रूप में इसे आत्मसात् किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथापि साम्प्रदायिक आग्रहों की वजह से तथा वेदोक्तधर्म को भलीभाँति न समझ पाने के कारण वे साम्प्रदायिकता के बन्धन नहीं तोड़ पाये। फिर भी सभी सम्प्रदायों के अन्दर विद्यमान उच्च मूल्य एवं मान्यताएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तन व अन्त:करण को स्वच्छ रखते हुए जन्म-जन्मान्तरों के बन्धन से छूटने की समग्र अवधारणा तथा साधना की वैज्ञानिक पद्धतियाँ और कुछ न होकर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">ही है। बाद में महर्षि पतंजलि ने वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपनिषद्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सांख्य आदि वैदिक ग्रन्थों में यत्र-तत्र बिखरी हुई योगविषयक सामग्रियों में से कुछ शब्दश: तथा कुछ किञ्चित् शाब्दिक परिवर्तनों के साथ एक जगह एकत्रित करते हुए क्रमिक तथा सुव्यवस्थित रूप में ग्रन्थबद्ध करने का महान् कार्य किया। तत्पश्चात् पातंजलयोग की गौरवशाली परम्परा समाज में आगे बढ़ती हुई आज हम तक पहुँची है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विभिन्न सम्प्रदायों में योग परम्परा:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म शाश्वत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म को धारण करने हेतु अपनायी जाने वाली शाश्वत साधना पद्धति योग है। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">योग से स्व (चेतना) का निरन्तर विकास (उत्कर्ष) होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें किसी बाह्य आलम्बन की जरूरत नहीं पड़ती और यदि पड़ती भी है तो उसका किसी अन्य के साथ कोई मतभेद नहीं होता। योग के मूलतत्त्वों में कोई अन्तर नहीं होता। उसकी विविध सम्प्रदाय अपने-अपने तरीके से व्याख्या करते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार विभिन्न सम्प्रदायों ने योग की अपने अनुरूप व्याख्या की है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु मूल स्रोत सभी का एक ही है। योग का लक्ष्य कल्याण है। योग शाश्वत है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सम्प्रदाय में शाब्दिक भिन्नता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सम्प्रदाय में यौगिक सिद्धान्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधना-प्रविधि के साथ-साथ धार्मिक क्रियाकलाप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्रत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपवास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्यौहार व रीति-रिवाज आदि को अपनाया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि योग में सभी सम्प्रदायों के शाश्वत सिद्धान्त व साधनात्मक पक्ष पर ही ध्यान दिया जाता है न कि रीति-रिवाज आदि पर।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग का तात्पर्य है-शाश्वत प्रायोगिक प्रविधियों अर्थात् व्यावहारिक विज्ञान। जो सम्यक् दृष्टि अर्थात् दर्शन पर आधारित है। योग साधन और साध्य दोनों ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें सार्वभौमिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सार्वकालिक एवं सार्वजनीन हित समाहित होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वह प्रक्रिया जिसके अभ्यास से व्यक्ति अपने परम लक्ष्य मोक्ष की दिशा में निरन्तर अग्रसर हो</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके माध्यम से व्यक्ति की चेतना का ऊर्ध्वारोहण व रूपान्तरण होता हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे साधने के लिए किसी बाह्य आलम्बनों की आवश्यकता न पड़ती हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही योग है। उस प्रक्रिया अर्थात् योग को उस मत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पन्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्प्रदायादि के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यथा-जैनयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बौद्धयोग व शैवयोग आदि उसी के स्वरूप हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बौद्ध सम्प्रदाय के अन्दर प्रचलित योग की परम्परा को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बौद्धयोग-परम्परा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा जैन सम्प्रदाय के अन्दर प्रचलित योग की परम्परा को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">जैनयोग-परम्परा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहा जाता है। उपर्युक्त तीनों परम्पराओं की साधना पद्धतियों में शारीरिक क्रियाओं की अपेक्षा मानसिक क्रियाओं को अधिक महत्त्व दिया गया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बाइबल एवं कुरान में योगतत्व:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार बाइबल के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाग </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">शैलोपदेश</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">में कहा गया है कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">धन्य हैं वे जो धर्म के भूखे और प्यासे हैं एवं जिनके हृदय शुद्ध है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि वे तृप्त किए जायेंगे एवं परमेश्वर (गॉड) को देखेंगे।</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे यह सिद्ध होता है कि ईसाई सम्प्रदाय में भी योग के मूलभूत तत्त्व पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस्लाम धर्म की मूलोक्ति है-</span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अल्लाह एक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस एक अल्लाह के अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा मुहम्मद उसी अल्लाह का पैगम्बर (सन्देशवाहक/उपदेशक) है।</span>’ '<span lang="hi" xml:lang="hi">अल्लाह वह जीवन्त नित्य सत्ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो जगत् व्यवस्था को सम्भाले हुए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वास्तव में उसके सिवा कोई अन्य सत्ता नहीं है।</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पष्टत: इस्लाम का अल्लाह और योग का ईश्वर एक ही प्रतीत होता है। मुसलमानों के पवित्र ग्रन्थ कुरान के अनुसार </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अल्लाह ने ईमान वालों पर यह बहुत बड़ा अहसान किया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि उनके बीच उन्हीं में से एक </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">रसूल</span>’ (<span lang="hi" xml:lang="hi">अल्लाह या ईश्वर का सन्देशवाहक) उठाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो उन्हें उसकी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आयते</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सुनाता है। उनकी आत्मा को शुद्ध और विकसित होने का अवसर प्रदान करता है और उन्हें किताब और हिकमत अर्थात् तत्त्वदर्शिता (तत्त्वज्ञान) की शिक्षा देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि इससे पहले वे खुली गुमराही में पड़े हुए थे।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इस्लाम धर्म के इन मूल तत्त्वों की साम्यता योग तत्त्वों से स्पष्ट ही दृष्टिगोचर होती है। क्योंकि ईमान अर्थात् अस्तेय और शुद्धता यानी शौच एवं हिकमत अर्थात् तत्त्वज्ञान तो योग के प्राण तत्त्व है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संतों की अपनी योग परम्परा:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतवर्ष में समय-समय पर ऐसे महान् व्यक्तित्व भी उत्पन्न हुए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने अपने को किसी भी सम्प्रदाय के साथ जोड़े बगैर ही समाज में अपने सार्वभौमिक व वैज्ञानिक सत्य सिद्धान्तों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मान्यताओं व विचारों को फैलाया। वे समाज में सन्त के रूप में प्रसिद्ध हैं। ऐसे सन्त-समुदाय के अन्दर प्रचलित योग की परम्परा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सन्तयोग-परम्परा</span>” <span lang="hi" xml:lang="hi">कहलाती है। इस परम्परा में बहुत सारे सन्त हुए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें से कुछ लोग शारीरिक क्रियाओं को गौण मानते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कुछ लोग इसे दृढ़ता के साथ प्रमुख मानते हैं और कुछ लोग दोनों का समन्वय स्वीकार करते हैं। इनके अलावा शारीरिक क्रियाओं को विशेष महत्ता देकर की जानेवाली योग-साधना की परम्परा भी विकसित हुई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनमें से </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">हठयोग-परम्परा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">नाथयोग-परम्परा</span>’: <span lang="hi" xml:lang="hi">का प्रभाव समाज में अधिक देखने को मिलता है। इन प्रमुख योग-परम्पराओं के अतिरिक्त और भी कई प्रकार की योग-परम्पराएँ विकसित होकर पूरी दुनिया के अन्दर फैल रही हैं। जब इस धराधाम में महर्षि दयानन्द का आविर्भाव होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब उन्होंने उस खण्डित ऋषियों की योग-साधना की परम्परा को पुन: मूलाधार से जोड़ने का युगान्तकारी कार्य किया और योग के आधुनिक युग का सूत्रपात किया। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो आज उसी परम्परा में शिक्षित-दीक्षित योगर्षि स्वामी रामदेव जी महाराज ने अपने कठोर तप व पुरुषार्थ से उस योग की परम पावनी परम्परा को देश व दुनियाँ के करोड़ों पुण्यात्माओं तक पहुँचाने का अभूतपूर्व कार्य ही नहीं किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु वे विश्व के अन्तिम व्यक्ति तक योग को पहुँचाने के लिए प्राणार्पण से कृतसंकल्पित हैं। हमारा अहोभाग्य है कि हमारा जन्म वर्तमान में हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ चहुँ ओर योग की गंगा कलकल ध्वनि के साथ प्रवाहित हो रही है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगमार्ग के सरलीकरण के लिए विभिन्न योगियों ने अपने अनुभव के आधार पर अनेक उपाय सुझाये हैं। उन्होंने पृथक् आचार-मीमांसा की स्थापना की है। सरलीकरण की इसी प्रवृत्ति ने अनेक योग-विधाओं को जन्म दिया। योग-विधाओं के पालन करने और कराने के लिए योगियों ने अपने पृथक्-पृथक् मठ और सम्प्रदाय स्थापित किये हैं। पुरातन शाश्वत योग को अपनाने वाले अनेक सम्प्रदाय आधुनिक समाज में विद्यमान हैं। इनमें से कुछ सम्प्रदाय प्राचीन हैं तथा कुछ मध्यकाल से चले आ रहे हैं। प्राचीन भारत में योग को अपनाने वाले अनेक सम्प्रदायों में से शैव सम्प्रदाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नाथ सम्प्रदाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैष्णव सम्प्रदाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शाक्त सम्प्रदाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संन्यासी सम्प्रदाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कापालिक सम्प्रदाय व अघोर सम्प्रदाय आदि प्रसिद्ध रहे हैं। इन सब में योग की परम्परा अनवरत रूप में चली आ रही है। इसी अक्षुण्ण योग परम्परा के अन्तर्गत विकसित हुई राजयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्मयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भक्तियोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञानयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन्त्रयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लययोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अष्टांगयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हठयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समत्वयोग व ध्यानयोग आदि अनेकानेक योग की पद्धतियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो मोक्ष या कैवल्य प्राप्ति के लिए साधक को अपने-अपने ढंग से सहायता करती हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि-संस्कृति में योग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतवर्षीय ऋषि-संस्कृति में बहुत-सी ऐसी परम्पराएँ सृष्टि के प्रारम्भ से ही विद्यमान रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो मनुष्य की चेतना को उच्चतम बिन्दु की ओर प्रवाहित करते हुए उसे कल्याण के शिखर पर प्रतिष्ठित करती हैं। उन्हीं परम्पराओं में से सर्वोच्च योग-परम्परा का हमेशा से महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> इतना ही नहीं</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">योग-परम्परा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">वैदिक सनातन ऋषि-परम्परा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिन्दू-परम्परा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बौद्ध-परम्परा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैन-परम्परा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्ध-परम्परा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सन्त-परम्परादि समस्त धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभ्यता व संस्कृति आधारित परम्पराओं में प्राण रूप में हमेशा से समाहित रही है। योग-साधना को कमोवेश दुनियाँ की सभी परम्पराओं ने अपनाया है। अत: इसका महत्त्व सार्वकालिक व सार्वभौमिक रहा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राचीन भारतवर्षीय ऋषि-परम्परा में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द में जीवात्मा या परमात्मा का संयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राण और अपान का संयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चन्द्र और सूर्य का मिलन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिव और शक्ति का सामरस्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्तवृत्ति निरोध अथवा अन्य किसी भी प्रकार से उसका लक्षण किया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूल में विशेष भेद नहीं है। इस प्रकार योग का तात्पर्य है-ससीम को असीम के साथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षुद्र को महान् के साथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नर को नारायण के साथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कामना को दिव्य भावना के साथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वार्थ को परमार्थ के साथ जोड़ देना। योगाभ्यास का समूचा पुरुषार्थ साधक को उसी अवस्था के योग्य बनाने के लिए ही निर्मित किया गया है। योग को अपनाकर न जाने कितनों का जीवन धन्य हुआ है एवं वे जीवन के शिखर पर जा पहुँचे हैं। वस्तुत: समस्त धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभ्यता व संस्कृति जिन सूत्रों पर अपनी यात्रा पूरी करते आये हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे सब योग पर ही आश्रित हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पुरातत्वीय अवशेषों में योग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सिन्धुकालीन पुरावशेषों में योग से सम्बद्ध कई साक्ष्य मिले हैं। मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मोहर में सींग युक्त त्रिमुखी पुरुष को एक सिंहासन पर योगमुद्रा (पद्मासन) में बैठे दिखाया गया है। मणिबन्ध से भुजा तक उसके दोनों हाथ कंकणों (चूड़ियों) से अलंकृत हैं। उसके दाहिनी तरफ  एक हाथी एवं एक बाघ और बायीं तरफ  एक गैंडा तथा एक भैंसा खड़े हुए दिखलाये गये हैं। सिंहासन के नीचे दो हिरण खड़े दिखलाये गये हैं।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मार्शल महोदय ने इसे ऐतिहासिक योग के प्रथम ज्ञाता शिव का आदिरूप स्वीकार किया है। उस मूर्ति के ऊपर सात अक्षरों का एक अभिलेख है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। मोहनजोदड़ो से ही प्राप्त मिट्टी की एक अन्य मोहर पर  योगासीन मुद्रा में एक मानवाकृति अंकित है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके अगल-बगल में पुरुष हाथ जोड़े खड़े हैं। इन पुरुषों के पीछे सर्प के फन दिखलाये गये हैं।</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">मोहरों पर यौगिक लक्षणों से युक्त चित्रों के अलावा मोहनजोदड़ों से सिलखड़ी की बनी हुई 15 सेन्टीमीटर लम्बी एक पाषाण प्रतिमा भी प्राप्त हुई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें यौगिक लक्षण दृष्टिगोचर होते हैं। इस मूर्ति में प्रदर्शित पुरुष के नेत्र अर्द्धोन्मिलित हैं। नासाग्र दृष्टि के आधार पर इसे योगी की मूर्ति कहा गया है।</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे प्रतीत होता है कि उस समय एकाग्रता (धारणा) के अभ्यास के लिए नासाग्र दृष्टि (अगोचरीमुद्रा) का अभ्यास किया जाता होगा। प्रसिद्ध पुरातत्त्वविद् </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">जॉन मार्शल</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि मोहनजोदड़ो में जिस नरदेवता की मूर्ति मिली है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह त्रिमुखी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह देवता पीठासन पर योगमुद्रा में बैठा हुआ है। उसके दोनों पैर इस प्रकार मुड़े हुए हैं कि एड़ी से एड़ी मिल रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंगूठे नीचे की ओर मुड़े हुए हैं एवं हाथ घुटने के ऊपर आगे की ओर फैले हुए हैं। इस तथ्य पर विचार करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सिन्धुकालीन सभ्यता में यौगिक विचारधारा का प्रचलन किसी न किसी रूप में अवश्य रहा होगा। इन्हीं बातों के आधार पर कुछ विद्वानों की मान्यता है कि योग सिन्धुकालीन सभ्यता की देन है। उनकी ऐसी मान्यता इसीलिए बनी थी कि वे सिन्धु-सभ्यता को वेद के पूर्व की सभ्यता मानते थे</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन आधुनिक शोध-अनुसन्धानों से यह स्पष्ट हो गया है कि सिन्धु-सभ्यता वैदिक-सभ्यता के पश्चात् विकसित हुई वेदमूलक सभ्यता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सिन्धु-सभ्यता से उपलब्ध पुरातात्त्विक प्रमाणों में योग के क्रियापक्ष का निरूपण मुख्यत: आसन व मुद्राओं के माध्यम से हुआ है। योग-साधना हेतु योगशास्त्रों में वर्णित योगांगों का अभिन्न हिस्सा है-आसन व मुद्रा। साक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि सिन्धु सभ्यता में अष्टांग योग व हठयोग आदि योग की विभिन्न पद्धतियाँ प्रचलन में थी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक भारत में योग काल:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग के इतिहास का आधुनिक काल ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय इतिहास के आधुनिक काल की भी शुरुआत 1857 से ही मानी गयी है। महर्षि दयानन्द सरस्वती के उदय के पश्चात् योग का आधुनिक काल प्रारम्भ हो जाता है। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से यह काल प्रारम्भ होकर वर्तमान में भी चल रहा है। आधुनिक काल के योग के आचार्य के रूप में स्वामी दयानन्द सरस्वती (सन् 1824-1883 ई.) का उल्लेख सर्वप्रथम करना उचित होगा। स्वामी दयानन्द जी ने अपने मुख्य ग्रन्थों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यथा-सत्यार्थ प्रकाश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्याभिविनय व संस्कार-विधि आदि के माध्यम से योग के सिद्धान्त व साधना से सम्बद्ध भ्रान्त-धारणाओं का खण्डन करते हुए योग के वास्तविक पुरातन आर्ष स्वरूप का निदर्शन कराया। उनके शिष्य स्वामी लक्ष्मणानन्द ने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यानयोग-प्रकाश</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">में उनकी शिक्षा को प्रस्तुत किया है। सन् 1875 से महर्षि दयानन्द द्वारा स्थापित आर्य समाज अपनी हजारों संस्थाओं के माध्यम से देश-विदेश में निरन्तर वैदिक ऋषि-परम्परा पर आधारित योग की शिक्षा दे रहा है। महर्षि दयानन्द के सिद्धान्तों से प्रेरित होकर स्वामी श्रद्धानन्द के द्वारा स्थापित गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय सन् 1902 ई. से ही अनवरत समाज में योग-शिक्षा व वैदिक-शिक्षा का व्यापक प्रचार-प्रसार कर रहा है। इसी तरह से देश-विदेश में अनेक गुरुकुलों के द्वारा वैदिक-पद्धति पर योग की शिक्षा-दीक्षा दी जा रही है। इन गुरुकुलों से सैकड़ों योग्य योगाचार्य एवं आचार्य निकल चुके हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो समाज में योग की अलख जगा रहे हैं। वर्तमान में विश्व प्रसिद्ध योगर्षि स्वामी रामदेवजी इसी गुरुकुल-परम्परा से ही प्रशिक्षित हैं। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2015 21:55:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नवजीवन प्रदान करने वाले परम सत्य को चरितार्थ करने में बाधाएं</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. सुमन</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">मुख्य कें द्रीय प्रभारी</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">महिला पतंजलि योग-समिति</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3083/obstacles-in-realizing-the-ultimate-truth-that-gives-new-life"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/1501.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   अपनी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति में परिवर्तन करना कोई आसान कार्य नहीं है। इसके लिए गतिशील संकल्प को दृढ़ बनाना बहुत कठिन है। इस दुरूह कार्य को करने में निम्न प्राण व प्रकृति जो बाधाएँ डालते हैं उनका कुछ दिग्दर्शन करवाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">निम्नतर प्राण की वृत्ति अपने पुराने अभ्यासगत तरीके से चिपके रहना चाहती है:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   वह अभी भी अपने पुराने स्वरूप से गठबन्धन किये हुए और परम प्रकाश के विरूद्ध विद्रोह करती है। निम्न प्राण हर बार जब उसे निरूत्साहित किया जाता है तो वह अपनी स्वतन्त्रता का अधिकार जताता है और अपने ही अनगढ़ और अहंकार पूर्ण विचारो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कामनाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तरंगों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आवेगों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या सुविधाओं का जब चाहे तब समर्थन और अनुसरण करने की स्वतन्त्रता का अधिकार जताता है। वह गुप्त रूप से या शब्दों में अपने मानव असंस्कृत स्वभाव का अनुसरण करने का दावा करता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञान और असंगति से युक्त जो उसका स्वरूप है वही बने रहने का अधिकार घोषित करता है ओर वह इन समस्त अशुद्ध तथा निम्न स्तर पदार्थो को वाणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म आचरण में अभिव्यक्त करने के अधिकार की मांग करता है। कभी-कभी सिद्धान्त रूप में उसकी मांग नहीं करता बल्कि व्यवहार में उसका दावा करता है। अपने बोलने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोचने तथा अनुभव करने के पुराने अभ्यासगत तरीकों को समर्थन करता है तथा चरित्र में जो कुछ विकृत और विरूप हो गया उसे शाश्वत बनाने का प्रयत् न करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मिथ्याभिमान तथा उग्र राजसिक भावना:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मिथ्याभिमान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घमण्ड तथा स्वाग्रही उग्र राजसिक भावना ये अपने-आपको भागवत शक्ति और उसके कार्य के बीच ला खड़ा करते हैं और विरोधी शक्तियों को बुलाते हैं छोटे पैमाने में मिथ्यामिभान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घमण्ड तथा राजसिक उग्रता के दोष प्राय: सभी मानव स्वभाओं में विद्यमान रहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये भिन्न आकार ग्रहण कर लेते हैं ओर सच्चे आध्यात्मिक परिवर्तन के लिए बहुत बड़ी बाधा बन जाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अनाज्ञाकारिता और अनुशासनहीनता यह तपस्या के मार्ग में बहुत बड़ी बाधा है:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">निम्न प्रकृति का एक भाग हमेशा असंयत अनियमित तथा स्वाग्रही होता है और वह अपने आवेग तथा विचार से भिन्न किसी भी तरह के नियम कानून और अनुसशासन के आरोपण को स्वीकार करने में अनिच्छुक होता है इसका परिणाम होता है साधक अपने गुरू का आज्ञाकारी बनने का दावा व प्रतिज्ञा तो सतत करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उसका क्रिया और व्यवहार उसके एकदम विपरित होता है। और जो हमसे पीछे वाले साधक हैं उनके लिए एक बुरा उदाहरण भी हम प्रस्तुत करते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कपटाचार और मिथ्याभाषण:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ये अपनी ही बनायी कीचड़ में साधक को फंसा देते हैं। जो लोग ऋजु और निष्कपट नहीं हैं वे गुरू या भगवान् की सहायता से लाभ नहीं उठा सकते हैं क्योकि वे स्वयं ही उससे मुंह मोड़ लेते हैं। इस मार्ग में वही आगे बढ़ पायेंगे जो ऋजु और सत्यवादी हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">निरन्तर अपने अहं का समर्थन करने की खतरनाक आदत:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मन अपने ही विचार को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पद-प्रतिष्ठा को समर्थन करने के लिए खड़ा रहता है। इसके लिए वह किसी भी प्रकार का तर्क करने के लिए तैयार रहता है। भले इसके लिए उसे किसी छल-छद्म ढ़ोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आडम्बर का सहारा भी क्यों न लेना पड़े। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति की इन कठिनाइयों पर विजय कैसे पायी जाये:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति की चाहे जैसी भी कठिनाइयां क्यों न हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके साथ जूझने की प्रक्रिया चाहे जितनी लंबी और कष्टकर क्यों न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे परम सत्य के विरूद्ध अन्त तक नहीं ठहर सकती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बशर्ते कि सत्ता के इन भागों में सच्चा भाव सच्ची वृत्ति तथा सच्चा प्रयास हो या आ जाये। लेकिन अगर साधक आत्म-अहंकार स्वाग्रह या तामसिक जड़ता के कारण अपनी आँखे बन्द किये रखे या परम प्रकाश के विरूद्ध अपने हदय को कठोर बनाये रखे तो जब तक वह वैसा करता रहेगा कोई भी उसकी मदद नहीं कर सकेगा। दिव्य परिवर्तन के लिये समस्त सत्ता की स्वीकृति आवश्यक है और स्वीकृति की समग्रता तथा संपूर्णता ही सर्वागीण समर्पण को लाती है। लेकिन निम्न प्राण की यह स्वीकृति मात्र एक मानसिक स्वीकरण या कोई गुजरता हुआ भावनात्मक समर्थन नहीं होना चाहिये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे अपने-आपको एक स्थायी मनोभाव तथा सतत और संगत क्रिया में अनूदित करना चाहिये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आवश्यक उद्यम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्विविध जीवन नहीं:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस योग को केवल वे ही अन्त तक कर सकते हैं जो इसके बारे में पूरी तरह सच्चे हैं और अपने-आपको भगवान् में पाने के लिये अपने तुच्छ मानवीय अहंकार तथा उसकी मांगों को समाप्त करने के लिए तैयार हैं। इसे चंचलता या शिथिलता की भावना से नहीं किया जा सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्य बहुत ऊँचा और कठिन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निम्न प्रकृति में विरोधी शक्तियाँ न्यूनतम अनुमति या लघुतम उद्घाटन का लाभ उठाने के लिये एकदम से तत्पर रहती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके लिए बहुत सतत तथा तीव्र अभीप्सा और तपस्या की आवश्यकता होती है। यदि मानव-मन के विचार धृष्टतापूर्वक अपने-आपको प्रस्थापित करें या सत्ता के निम्नतम भाग अपनी मांगों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहजवृत्तियों और दावों की मनमानी तुष्टि करना चाहें-सामान्यत: जिनका समर्थन मानव स्वभाव के नाम से किया जाता है तो यह योग नहीं किया जा सकता। अगर तुम अज्ञान की इन निम्नतम वस्तुओं को भागवत परम सत्य या सत्य पथ पर स्वीकार्य किसी निम्र कोटि के सत्य के साथ तादाम्य करने का हठ करो तो यह योग नहीं किया जा सकता। अगर तुम अपने पुराने रूप या उसकी पुरानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणिक या भौतिक रचनाओं व आदतों से चिपके रहो तो यह योग नहीं किया जा सकता। तुम्हे निरन्त अपने पुराने रूपों को पीछे छोड़ना पड़ता है और हमेशा उच्च से उच्चतर सचेतन स्तर से देखना और जीना होता है। अगर तुम अपने मानव मन या प्राणिक अहंकार की स्वतन्त्रता के लिए आग्रह करो तो यह योग नहीं किया जा सकता। जब तक मनुष्य साधारण जीवन बिताना चाहता है तब तक अगर वह ऐसा करना पसंद करे तो उसकी सत्ता के सभी अंगों को यह अधिकार है कि वे अपने निजी तरीके से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने ही खतरों तथा संकटों का सामना करते हुए स्वयं को अभिव्यक्त और संतुष्ट करें। लेकिन योग पथ पर प्रवेश करने की बात दूसरी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिस पथ का सम्पर्ण उद्देश्य है इन मानवीय वस्तुओं के स्थान पर अधिक महान् सत्य के विधान तथा शक्ति को लाना और जिस की पद्धति का मर्म है-भागवत शक्ति के प्रति आत्म-समर्पण करना और फिर भी इस तथाकथित स्वतंत्रता जो अमुक अज्ञानमय वैश्व शक्तियों की अधीनता से बढ़कर और कुछ नहीं है-की मांग करने का अर्थ है विवेक शून्य विरोध में रस लेना द्विविधि जीवन बिताने के अधिकार की मांग करना।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दो चुनाव:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो इस योग के साधक होने की घोषणा करते हैं आगर वे अपने-आपको हमेशा अज्ञान की उन शक्तियों के केन्द्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यंत्र या प्रवक्ता बनायें रखें जो इसके सिद्धांत तथा उद्देश्य का विरोध करती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्हें अस्वीकार करती है और उनका उपहास करती हैं तो उनके लिये यह योग करने की और भी कम संभावना होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समस्त विरोधों के बावजूद यह अतिमानसिक शक्ति भौतिक चेतना तथा जड़-भौतिक जीवन में अभिव्यक्ति होने के लिए नीचे की ओर दबाव डाल रही है। दूसरी ओर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने समस्त झूठे दम्भ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंधकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन्दता या अक्षम उग्रता के साथ यह निम्नतर प्राणिक प्रकृति जो अपने-आपको बनाये रखने के लिये डटी हुई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवतरण के मार्ग में बाधक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अतिमानसिक या अतिमानवीय चेतना और सृजन की किसी भी सच्ची वास्तविकता या सच्ची संभावना में विश्वास करना अस्वीकार करती है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वह भगवान् की उपस्थिति को अस्वीकार करती है क्योंकि वह जानती है कि उस उपस्थिति के बिना कार्य असंभव है वह जोर-जोर से अपने ही विचारों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्णयों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कामनाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहज वृत्तियों को प्रस्थापित करती है और अगर इनका खण्डन किया जाये तो वह संदेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्वीकृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निन्दात्मक आलोचना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्रोह तथा अस्त-व्यस्तता को फैला कर प्रतिकार करती है। आज हमारे सम्मुख ये दो चीजें हैं जिनमें प्रत्येक मनुष्य को चुनाव करना होगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">चुनाव अनिवार्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य या रसातल:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि यह विरोध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भागवत सत्य के अवतरण के विरूद्ध यह निस्सार बाधा और अवरोध हमेशा के लिये नहीं टिका रहा सकता। प्रत्येक मनुष्य को अंत में इस ओर या उस ओर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परम सत्य के पक्ष में या उसके विपक्ष में आना ही होगा। अतिमानसिक उपलब्धि निम्नतर अज्ञान के दुराग्रह के साथ-साथ नहीं बनी रह सकती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्विविध प्रकृति में प्राप्त सतत संतुष्टि के साथ इसका कोई मेल नहीं बैठता। अत: चुनाव अनिवार्य है- सत्य या रसातल।</span></h5>
<h5 style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">साभार: श्री अरविन्द्र की पुस्तक से</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2015 21:54:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दैनिक जीवन में किये जाने वाले पतंजलि के आठ प्राणायाम</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">    महर्षि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पतञ्जलि प्रणीत अष्टांग-योग का चौथा अंग है-प्राणायाम। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">दो शब्दों से मिलकर बना है-</span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्राण</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आयाम</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। प्राण से तात्पर्य शरीर में समचरित होने वाली वायु (जीवनी शक्ति) से है तथा आयाम का अर्थ नियमन (नियन्त्रण) से है। इस प्रकार प्राणायाम से तात्पर्य हुआ-श्वास-प्रश्वास की क्रिया पर नियन्त्रण करना। इसका अभ्यास करने से सम्पूर्ण शरीर स्वस्थ रहता है।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कभी प्राणायाम करने से पूर्व हजार साहस जुटाना पड़ता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज ने इसे न केवल सर्वसुलभ बना दिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु हर कोई आज इसे अपनी स्वस्थ</span></strong></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3084/patanjali-s-eight-pranayams-to-be-done-in-daily-life"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/971.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">  महर्षि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पतञ्जलि प्रणीत अष्टांग-योग का चौथा अंग है-प्राणायाम। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">दो शब्दों से मिलकर बना है-</span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्राण</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आयाम</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। प्राण से तात्पर्य शरीर में समचरित होने वाली वायु (जीवनी शक्ति) से है तथा आयाम का अर्थ नियमन (नियन्त्रण) से है। इस प्रकार प्राणायाम से तात्पर्य हुआ-श्वास-प्रश्वास की क्रिया पर नियन्त्रण करना। इसका अभ्यास करने से सम्पूर्ण शरीर स्वस्थ रहता है।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कभी प्राणायाम करने से पूर्व हजार साहस जुटाना पड़ता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज ने इसे न केवल सर्वसुलभ बना दिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु हर कोई आज इसे अपनी स्वस्थ जीवन शैली का अभिन्न हिस्सा मानने लगा है। प्रस्तुत हैं दैनिक जीवन में प्रयुक्त होने वाले आठ प्राणायाम एवं उसकी अभ्यास विधि:-</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(226,12,109);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम के सामान्य नियम:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम करने का स्थान स्वच्छ एवं हवादार होना चाहिए। यदि खुले स्थान  में अथवा जल (नदी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तालाब आदि) के समीप बैठकर अभ्यास करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो सबसे उत्तम है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नगरों में जहाँ पर प्रदूषण का प्रभाव अधिक हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ पर प्राणायाम करने से पहले घी का दीपक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अगरबत्ती या धूपबत्ती जलाकर उस स्थान को सुगन्धित करने से बहुत अच्छा रहता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम करते वक्त बैठने के लिए आसन के रूप में कम्बल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चादर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रबरमैट अथवा चटाई का प्रयोग करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम के लिए सिद्धासन/सुखासन या पद्मासन में मेरुदण्ड को सीधा रखकर बैठें। जो लोग जमीन पर नहीं बैठ सकते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे कुर्सी पर बैठकर भी प्राणायाम कर सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम करते समय अपनी गर्दन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रीढ़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छाती एवं कमर को सीधा रखें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास सदा नासिका से ही लेना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे श्वास फिल्टर होकर अन्दर जाता है। मुख से श्वास नहीं लेना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामान्यावस्था में भी नासिका से ही श्वास लें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम करने वाले व्यक्ति को अपने आहार-विहार-आचार-विचार पर विशेष ध्यान रखना चाहिए। सदैव सात्त्विक एवं चिकनाई युक्त आहार ही लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे-फल एवं उनका रस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरी तरकारी-सब्जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घी आदि।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(226,12,109);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">1. भस्त्रिका-प्राणायाम:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि-</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> किसी ध्यानात्मक-आसन में सुविधानुसार कमर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गर्दन सीधी करके बैठकर दोनों नासापुटों से श्वास को पूरा अन्दर डायफ्राम (महाप्राचीरा पेशी) तक भरना तथा धीरे-धीरे सहजता के साथ छोड़ना </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भस्त्रिका प्राणायाम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहलाता है। प्रारम्भ में ढाई सेकेन्ड में श्वास अन्दर लेना एवं उतने ही समय में श्वास को एक लय के साथ बाहर छोड़ना चाहिये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे कि बिना रुके एक मिनट में 12 बार के औसत से पाँच मिनट की एक आवृत्ति में साठ बार (</span>12x5<span lang="hi" xml:lang="hi">=</span>60<span lang="hi" xml:lang="hi">) बार अभ्यास कर सकें।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/1021.jpg" alt="102" width="900" height="600"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कफ  की अधिकता या साइनस आदि रोगों के कारण जिनके दोनों नासाछिद्र ठीक से खुले हुए नहीं होते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन लोगों को पहले दायें नासापुट को बन्द करके बायें से रेचक और पूरक करना चाहिए। फिर बायें को बन्द करके दायें से यथा शक्ति मन्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मध्यम या तीव्र गति से रेचक तथा पूरक करना चाहिए</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर अन्त में दोनों नासापुटों से अर्थात् इड़ा एवं पिंगला से रेचक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरक करते हुए भस्त्रिका प्राणायाम करना चाहिए। इसे डायप्रफैग्मेटिक डीप ब्रीदिंग भी कहते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(226,12,109);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सावधानी:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिनको उच्च रक्तचाप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दमा या हृदयरोग हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें तीव्र गति से भस्त्रिका नहीं करनी चाहिये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्राणायाम को करते समय जब श्वास को अन्दर भरें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब उदर नहीं फुलाना चाहिये। श्वास डायफ्राम तक भरें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे उदर नहीं फूलेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पसलियों तक छाती ही फूलेगी। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इससे शरीर में गर्मी आती है। अत: ग्रीष्म ऋतु में धीमी गति से करना चाहिये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>लाभ: </strong>भस्त्रिका प्राणायाम के अभ्यास से प्रतिक्रिया समय (</span>Reaction Time<span lang="hi" xml:lang="hi">) अथात् किसी भी उद्दीपक के प्रति प्रतिक्रिया में लिया गया समय) में कमी आती है।</span></h5>
<h6 style="text-align:right;"><strong>(<span lang="hi" xml:lang="hi">इंडियन जर्नल ऑफ  फिजीऔल:जी एण्ड फार्मकौलॅ:जी</span>,</strong></h6>
<h6 style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">२००३</span>;<span lang="hi" xml:lang="hi">४७(३) : २९७-३००)</span></strong></h6>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्दी-जुकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एलर्जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वासरोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दमा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुराना नजला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साइनस आदि समस्त कफ रोग नष्ट होते हैं। फेफड़े सबल बनते हैं तथा हृदय एवं मस्तिष्क को शुद्ध प्राणवायु मिलने से उनको आरोग्य-लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रक्त परिशुद्ध होता है। त्रिदोष सम होते हैं। यह प्राणोत्थान और कुण्डलिनी जागरण में बहुत सहायक है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(226,12,109);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">2. कपालभाति-प्राणायाम:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि-</strong> कपालभाति में मात्र रेचक पर ही पूरा ध्यान दिया जाता है। पूरक के लिये प्रयत्न नहीं करते</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु सहज रूप से जितना श्वास अन्दर चला जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जाने देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरी एकाग्रता श्वास को बाहर छोड़ने में ही होती है। ऐसा करते हुए स्वाभाविक रूप से उदर में भी आकुमचन और प्रसारण की क्रिया होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक सेकेन्ड में एक बार श्वास को लय के साथ छोड़ना एवं सहज रूप से धारण करना चाहिये। इस प्रकार बिना रुके एक मिनट में 60 बार तथा पाँच मिनट में 300 बार कपालभाति प्राणायाम होता है। कपालभाति प्राणायाम की एक आवृत्ति 5 मिनट की अवश्य होनी चाहिये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ एवं सामान्य रोगों से ग्रस्त व्यक्ति को कपालभाति 15 मिनट तक करना चाहिये। 15 मिनट में 3 आवृत्तियों में 900 बार यह प्राणायाम हो जाता है। कैंसर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एड्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिप्रेशन आदि असाध्य रोगों में प्रात:-सायं दोनों समय कपालभाति आधा-आधा घण्टा करने से शीघ्र लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(226,12,109);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सावधानी:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पेट की शल्यक्रिया (ऑपरेशन) के लगभग 3 से 6 महीने के बाद ही इस का अभ्यास करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गर्भावस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अल्सर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आन्तरिक रक्तस्राव एवं मासिक धर्म की अवस्था में इस प्राणायाम का अभ्यास न करें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">120 श्वास प्रति मिनट की गति से जब इसका अभ्यास किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब सिम्पथेटिक नर्वस सिस्टम (</span>Sympathetic Nervous System<span lang="hi" xml:lang="hi">) क्रियाशील होने से रक्तचाप (</span>Blood Pressure<span lang="hi" xml:lang="hi">) बढ़ जाता है।</span></h5>
<h6 style="text-align:right;"><strong>(<span lang="hi" xml:lang="hi">होमियोस्टेसिस इन हैल्थ एण्ड डिजीज</span>, </strong></h6>
<h6 style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">१९९१</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">३३(३): १२३-१३४)</span></strong></h6>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>लाभ: </strong>मोटापा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गैस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कब्ज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अम्लपित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुर्दे तथा प्रोस्टेट से सम्बद्ध सभी रोग निश्चित रूप से दूर होते हैं। हृदय की धमनियों में आये हुये अवरोध खुल जाते हैं। डिप्रेशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भावनात्मक असन्तुलन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घबराहट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नकारात्मकता आदि समस्त मनोरोगों से छुटकारा मिलता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्राणायाम के अभ्यास से आमाशय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्न्याशय (पेन्क्रियाज़)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लीवर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्लीहा व आँतों का आरोग्य विशेष रूप से बढ़ता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इलैक्ट्रोएनसैफॅलौग्राफी में यह पाया गया कि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कपालभाति के दौरान बीटा (</span>Beta<span lang="hi" xml:lang="hi">) तथा थीटा (</span>Theta<span lang="hi" xml:lang="hi">) गतिविधि में बढ़ोतरी होती है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु कपालभाति के पश्चात् ऐल्फा (</span>Alpha<span lang="hi" xml:lang="hi">) तथा बीटा (</span>Beta<span lang="hi" xml:lang="hi">) गतिविधि में गिरावट आती है।</span></h5>
<h6 style="text-align:right;"><strong>(<span lang="hi" xml:lang="hi">होमियोस्टेसिस इन हैल्थ एण्ड डिजीज</span>, </strong></h6>
<h6 style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">१९९१</span>;<span lang="hi" xml:lang="hi">३३ (४) : १८२-१८९)</span></strong></h6>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कपालभाति के द्वारा हृदय गति भिन्नता (</span>Heart rate Variability) <span lang="hi" xml:lang="hi">में कोई कमी नहीं आती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसा कि पहले माना जाता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: हृदय स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से यह एक निरापद अभ्यास है।</span></h5>
<h6 style="text-align:right;"><strong>(<span lang="hi" xml:lang="hi">बाइओसाईकौसोशल मेडिसिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">२०११</span>;<span lang="hi" xml:lang="hi">५ : ४-९)</span></strong></h6>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब 60 श्वास प्रतिमिनट की गति से इसका अभ्यास किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब सिम्पथेटिक नर्वस सिस्टम (</span>Sympathetic Nervous System<span lang="hi" xml:lang="hi">) क्रियाशील न होने के कारण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तचाप (</span>Blood Pressure<span lang="hi" xml:lang="hi">) नहीं बढ़ता।</span></h5>
<h6 style="text-align:right;"><strong>(<span lang="hi" xml:lang="hi">बाइओसाईकौसोशल मेडिसिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">२०११</span>;<span lang="hi" xml:lang="hi">५ : ४-९)</span></strong></h6>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कपालभाति के अभ्यास के दौरान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">41.2 प्रतिशत अधिक ऊर्जा की खपत होती है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके अभ्यास के पश्चात् ऊर्जा खपत में कोई परिवर्तन नहीं होता। अधिकतम ऊर्जा हमारे खाये हुए कार्बोहाईड्रेटस (</span>Carbohydrates<span lang="hi" xml:lang="hi">) से खर्च होती है। अत: यदि कपालभाति का विधिवत् अभ्यास किया जाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब यह वजन कम करने में लाभकारी हो सकता है।</span></h5>
<h6 style="text-align:right;"><strong>(<span lang="hi" xml:lang="hi">मेडिकल साईसन्स मोनिटर २०११</span>;<span lang="hi" xml:lang="hi">१७(१) : एलई ७-८)</span></strong></h6>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कपालभाति के अभ्यास के पश्चात् दिमागी रक्त प्रवाह (</span>Brain Blood Flow) <span lang="hi" xml:lang="hi">में कोई वास्तविक परिवर्तन नहीं पाया गया। इसका अर्थ यह हुआ कि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कपालभाति द्वारा दिमाग में रक्त का प्रवाह नहीं बढ़ता। अर्थात्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ व्यक्तियों में इसका अभ्यास करते समय किसी भी प्रकार के दौरे (</span>Stroke<span lang="hi" xml:lang="hi">) की आशंका नहीं है।</span></h5>
<h6 style="text-align:right;"><strong>(<span lang="hi" xml:lang="hi">न्यूरौल:जी इंडिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">१९९९</span>;<span lang="hi" xml:lang="hi">४७ : २४९)</span></strong></h6>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कपालभाति के अभ्यास से एकाग्रता बढ़ सकती है।</span></h5>
<h6 style="text-align:right;"><strong>(<span lang="hi" xml:lang="hi">१. इंडियन जर्नल ऑफ मैडिकल साईअन्सेस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">२००८</span>;<span lang="hi" xml:lang="hi">६२ (१) : २०-२२</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">२. जर्नल ऑफ औल्टरनेटिव एण्ड कौम्प्लिमैंटरी मेडिसिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">२००९</span>;<span lang="hi" xml:lang="hi">१५(३) : २८१-२८५)</span></strong></h6>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मोटे व्यक्तियों में जिन्हें  उच्च रक्तचाप (</span>Hypertension<span lang="hi" xml:lang="hi">) या मधुमेह (</span>Diabetes<span lang="hi" xml:lang="hi">) है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे कपालभाति के अभ्यास से लाभ प्राप्त कर सकते हैं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु उन्हें अपनी रक्त शर्करा मात्रा (</span>Blood Sugar Level<span lang="hi" xml:lang="hi">) तथा रक्तचाप की नियमित जाँच करवानी होगी।</span></h5>
<h6 style="text-align:right;"><strong>(<span lang="hi" xml:lang="hi">मेडिकल साईसन्स मोनिटर २०१०</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">१६(१०) : एलई १५ एण्ड १६(१): सीआर ३५-४०)</span></strong></h6>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कपालभाति छात्रों के लिए (विशेष तौर पर धीमें सीखने वाले) तथा कम से कम 45 मिनट तक एकाग्रता न रख पाने वालों के लिए अति उपयोगी है।</span></h5>
<h6 style="text-align:right;"><strong>(<span lang="hi" xml:lang="hi">१. इंडियन जर्नल ऑफ मैडिकल साईअन्सेस</span>,</strong></h6>
<h6 style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">२००८</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">६२(१) : २०-२२</span>;</strong></h6>
<h6 style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">२. जर्नल ऑफ औल्टरनेटिव एण्ड कौम्प्लिमैंटरी </span></strong></h6>
<h6 style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मेडिसिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">२००९</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">१५(३) : २८१-२८५)</span></strong></h6>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(226,12,109);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">3.  बाह्य-प्राणायाम:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि- सिद्धासन या पद्मासन में विधिपूर्वक बैठकर श्वास को एक ही बार में यथाशक्ति पूरा बाहर निकाल दें। श्वास बाहर निकालकर त्रिबन्ध अर्थात् मूलबन्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उड्डीयान बन्ध एवं जालन्धर बन्ध लगाकर श्वास को यथाशक्ति बाहर ही रोककर रखें। जब श्वास लेने की इच्छा बलवती हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब बन्धों को हटाते हुए धीरे-धीरे श्वास लें। श्वास भीतर लेकर उसे बिना रोके ही पुन: पूर्ववत् श्वसन क्रिया कीजिये।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/1001.jpg" alt="100" width="900" height="600"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">3-5 सेकेन्ड में श्वास को सहजता से पूरा अन्दर भरना एवं 3 से 5 सेकेन्ड में ही सहजता से श्वास को बाहर छोड़कर बाहर ही 10 से 15 सेकेन्ड रोककर रखना तथा पुन: इसी क्रिया को बिना रुके लगातार करना उत्तम है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार 2 मिनट में सामान्यत: 3 से 5 बार बाह्य प्राणायाम आराम से हो जाता है और 5 बार बाह्य प्राणायाम करना सामान्यत: पर्याप्त है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गुदाभ्रंश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योनिभ्रंश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाइल्स (बवासीर)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिस्टुला (भगन्दर)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यौन रोगों आदि से पीड़ित व्यक्ति इसका एक बार में 11 बार तक अभ्यास कर सकते हैं। कुण्डलिनी जागरण के इच्छुक साधक एवं ऊर्ध्वरेता होने की प्रबल इच्छा रखने वाले साधक इस प्राणायाम का एक समय में अधिकतम 21 बार तक अभ्यास कर सकते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समस्त स्त्री-रोगों यथा-बन्ध्यत्व/अप्रजनितृत्व (इन्फर्टिलिटी)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदर (ल्यूकोरिया) आदि तथा गर्भाशयगत दोष में भी यह प्राणायाम बहुत लाभप्रद है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(226,12,109);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सावधानी:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च व निम्न रक्तचाप एवं हृदय रोगों से पीड़ित व्यक्ति को इस प्राणायाम का अभ्यास नहीं करना चाहिये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सिर-दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माइग्रेन से ग्रसित रोगी भी इसका अभ्यास न करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रारम्भ में ही व्यक्ति को इसका अभ्यास न करके अन्य प्राणायामों का अभ्यास करके शरीर व मन को इस अभ्यास के अनुकूल बना लेना चाहिये। यह एक उच्च कोटि का यौगिक अभ्यास है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लाभ: बाह्य प्राणायाम में अम्लजन (</span>Oxygen<span lang="hi" xml:lang="hi">) की अधिक मात्र का व्यवहार होने के कारण ऊर्जा की खपत (</span>Energy Expenditure<span lang="hi" xml:lang="hi">) ज्यादा होती है।</span></h5>
<h6 style="text-align:right;"><strong>(<span lang="hi" xml:lang="hi">इंडियन जर्नल ऑफ  मैडिकल रिसर्च</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">१९९१</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">१४(बी.): ३५७-३६३)</span></strong></h6>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब पूरक अथवा रेचक के समय की तुलना में बाह्य कुम्भक की अवधि अधिक होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब शरीर में अम्लजन (</span>Oxygen<span lang="hi" xml:lang="hi">) की खपत 99 प्रतिशत तक गिर जाती है। अम्लजन का कम खपत होना तनावजन्य उत्तेजनाओं (</span>Stress Related Arousal<span lang="hi" xml:lang="hi">) के कम बनने तथा मनुष्य सहित सभी प्राणियों के दीर्घकाल पर्यन्त जीवित रहने से सम्बद्ध है।</span></h5>
<h6 style="text-align:right;"><strong>(<span lang="hi" xml:lang="hi">इंडियन जर्नल ऑफ  मैडिकल रिसर्च</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">१९९१</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">१४(बी.): ३५७-३६३)</span></strong></h6>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब पूरक अथवा रेचक के समय की तुलना में बाह्य कुम्भक की अवधि कम होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब शरीर में अम्लजन (</span>Oxygen<span lang="hi" xml:lang="hi">) की खपत 52 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। अम्लजन का अधिक खपत होना ऊर्जा के अधिक खर्च होने तथा अधिक उत्तेजित होने का परिचायक है।</span></h5>
<h6 style="text-align:right;"><strong>(<span lang="hi" xml:lang="hi">इंडियन जर्नल ऑफ  मैडिकल रिसर्च</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">१९९१</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">१४(बी.): ३५७-३६३)</span></strong></h6>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पाइल्स (बवासीर)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिस्टुला (भगन्दर)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिशर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुदाभ्रंश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योनिभ्रंश आदि रोगों में लाभप्रद है। वीर्य की ऊर्ध्वगति करके स्वप्नदोष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीघ्रपतन आदि धातु-विकारों की निवृत्ति करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि सूक्ष्म और तीव्र होती है। ब्रह्मचर्य की रक्षा एवं कुण्डलिनी जागरण में अतीव उपयोगी है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(226,12,109);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">4.  उज्जायी-प्राणायाम:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि-</strong> ध्यानोपयोगी आसन में बैठकर दोनों नासापुटों से पूरक करते हुए गले को सिकोड़ते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जब गले को सिकोड़कर श्वास अन्दर भरते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब जैसे खर्राटे लेते समय गले से आवाज होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे ही इसमें पूरक करते हुए कण्ठ से ध्वनि होती है। हवा का घर्षण नाक में नहीं होना चाहिये। इस प्राणायाम में सदैव दायीं नासापुट को बन्द करके बायीं नासापुट से ही रेचक करना चाहिये। </span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/1012.jpg" alt="101" width="900" height="600"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रारम्भ में कुम्भक का प्रयोग न करके केवल पूरक-रेचक का ही अभ्यास करना चाहिये। धीरे-धीरे कुम्भक का समय पूरक जितना तथा कुछ दिनों के अभ्यास के बाद कुम्भक का समय पूरक से दोगुना कर दीजिये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कुम्भक 10 सेकेन्ड से ज्यादा करना हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जालन्धर बन्ध और मूलबन्ध भी लगायें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विशेष:</strong> प्राणायाम से सम्बद्ध सामान्य सावधानियों का अवश्य ध्यान रखें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>लाभ:</strong> थायरॉइड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्नोरिंग (सोते समय खर्राटे की आवाज)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टॉन्सिल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्लीपएप्निया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फुफ्फुस एवं कण्ठविकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अजीर्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आमवात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जलोदर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वर आदि रोगों में बड़ा कारगर है। आवाज को मधुर बनाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: गायकों के लिए विशेष उपयोगी है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इससे बच्चों का हकलाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुतलाना भी ठीक होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(226,12,109);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">5.  अनुलोम-विलोम प्राणायाम:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विशेष</strong>: किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठकर कमर-गर्दन व सिर को सीधा रखते हुए बायें हाथ को ज्ञानमुद्रा में बायें घुटने पर रखकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दाहिने हाथ से प्राणायाम-मुद्रा बनाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंगूठे से दायें नासापुट को बन्द करके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बायें नासापुट से धीरे-धीरे लम्बी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गहरी श्वास भरिए। पूरा श्वास भरने के उपरान्त मध्यमा व अनामिका उंगलियों से वाम नासापुट को बन्द करके अंगूठा हटाकर दायें नासापुट से श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकाल दीजिये</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">तब दायें नासापुट से ही धीरे-धीरे पूरक कीजिये और बायें नासापुट से धीरे-धीरे रेचक कीजिये</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">यह एक आवृत्ति हुई। पुन: इसी प्रकार से बिना रुके निरन्तर आवृत्तियाँ करते रहिये। इडा नाड़ी (वाम स्वर) चूँकि सोम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चन्द्रशक्ति या शान्ति की प्रतीक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिये अनुलोम-विलोम प्राणायाम को बायें नासापुट से प्रारम्भ करते हैं।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/981.jpg" alt="98" width="900" height="600"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बायें नासापुट से लगभग ढाई सेकेन्ड में श्वास लय के साथ भरना एवं बिना रोके दायें नासापुट से लगभग ढाई सेकेन्ड में श्वास को बाहर छोड़ देना तथा दायें से छोड़ने के तुरन्त बाद दायें से ही सहज रूप से ढाई सेकेन्ड में श्वास को लेना एवं बिना श्वास को रोके बायें नासापुट से लगभग ढाई सेकेन्ड में ही श्वास को एक लय के साथ बाहर छोड़ना। यह एक चक्र या आवृत्ति पूरी हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी तरह कम से कम ५ मिनट तक इस प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अनुलोम-विलोम से बार-बार प्राणों को साधना चाहिए। स्वस्थ एवं सामान्य रोगों से ग्रस्त व्यक्ति को अनुलोम-विलोम प्राणायाम का अभ्यास लगातार 15 मिनट तक करना चाहिये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कैंसर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोराइसिस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मस्क्यूलर डिस्ट्रॉफी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माइग्रेन आदि असाध्य रोगों से पीड़ित व्यक्ति को इस प्राणायाम का अभ्यास सुबह-शाम लगातार 30-30 मिनट तक करने से शीघ्र लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>लाभ:</strong> इस प्राणायाम से शरीर में विद्यमान सम्पूर्ण नाड़ियाँ अर्थात् बहत्तर करोड़ बहत्तर लाख दस हजार दो सौ एक (72,72,10,201</span><span lang="hi" xml:lang="hi">) नाड़ियाँ (प्रश्नोपनिषद्-3.6) परिशुद्ध हो जाती हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अनुलोम-विलोम के 20 मिनट अभ्यास से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ व्यक्तियों में हृदय के प्रकुमचन तथा प्रसारण चाप (systolic and diastolic pressure</span><span lang="hi" xml:lang="hi">) में गुरुत्वपूण  गिरावट पायी गई।</span></h5>
<h6 style="text-align:right;"><strong>(<span lang="hi" xml:lang="hi">अप्लाइड साईकौफिजीऔल:जी एण्ड बाइओफीडबेक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">२००८</span>;<span lang="hi" xml:lang="hi">३३ (२) : ६५-७५)</span></strong></h6>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्राणायाम के 10 दिन तक लगातार अभ्यास से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पेशल मैमरी </span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अंक में 86 प्रतिशत तक की गिरावट रिकॉर्ड की गयी</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ स्पेशल मैमरी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से तात्पर्य किसी रास्ते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आकृति इत्यादि की पहचान कर पाने की शक्ति से है।</span></h5>
<h6 style="text-align:right;"><strong>(<span lang="hi" xml:lang="hi">साईकॅलौजिकल रिपोर्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">१९९७</span>;<span lang="hi" xml:lang="hi">८१ (२) : ५५५-५६२)</span></strong></h6>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">20 मिनट तक किये गये अनुलोम-विलोम द्वारा केन्द्रीय (</span>Focused<span lang="hi" xml:lang="hi">) एवं चयनात्मक (</span>Selective<span lang="hi" xml:lang="hi">) एकाग्रता तथा दृष्टि सम्बन्धी अध्ययन (</span>Visual Scanning<span lang="hi" xml:lang="hi">) में बढ़ोत्तरी पाई गई।</span></h5>
<h6 style="text-align:right;"><strong>(<span lang="hi" xml:lang="hi">पर्सैप्टच्युअल एण्ड मोटर स्किल्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">२००७</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">१०४ (३ पी.टी. २) : १२८१-१२९६)</span></strong></h6>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">20 मिनट पर्यन्त किये गये अनुलोम-विलोम के अभ्यास से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्भवत: शर्करा (</span>Glucose<span lang="hi" xml:lang="hi">) के अच्छे ऑक्सीकरण (</span>Oxidation<span lang="hi" xml:lang="hi">) के कारण हाथों की मुठी शक्ति </span>(Hand Grip Strength<span lang="hi" xml:lang="hi">) में वृद्धि पाई गई।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्राणायाम से व्यक्ति किसी भी मनोवैज्ञानिक तनाव से रहित होकर श्वास को रोक पाने में समर्थ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अनुलोम-विलोम प्राणायाम एडीएचडी (</span>ADHD; Attention Deficit Hyperactivity Disorder<span lang="hi" xml:lang="hi">) एकाग्रता के अभाव से उत्पन्न असाधारण/ उत्तेजनात्मक क्रियाशीलता जन्य विकार) का प्रबन्धन कर एकाग्रता तथा स्मृति शक्ति को बढ़ाने में सहायक हो सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संधिवात तथा बार-बार होने वाली तनावजन्य व्याधियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे कि कॉरपल् टनल सिन्ड्रोम (</span>Carpel Tunnel Syndrome<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें अँगुलियों में पीड़ा तथा मुठ्ठी कसने में समस्या होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे रोगों के प्रबन्धन में अनुलोम-विलोम प्राणायाम कारगर हो सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संधिवात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आमवात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गठिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कम्पवात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्नायु-दुर्बलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवसाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओ.सी.डी.</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सीजोफ्रेनिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डाइमेंशिया आदि समस्त वातरोग नष्ट होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कॉलेस्ट्रॉल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ट्राइग्लिसराइड्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धमनियों में आये हुये अवरोध आदि हृदय-सम्बन्धी रोग दूर होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्पेशल मैमरी लॉस (</span>Spatial Memory Loss<span lang="hi" xml:lang="hi">) के प्रबन्धन में लाभकारी हो सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(226,12,109);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">6.  भ्रामरी-प्राणायाम:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि- किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठकर श्वास को पूरा अन्दर भरकर मध्यमा अंगुलियों से नासिका के मूल में आँख के पास से दोनों ओर से थोड़ा दबाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन को आज्ञाचक्र में केन्द्रित रखें। अंगूठों के द्वारा दोनों कानों को पूरा बन्द कर लें। अब भ्रमर की भाँति गुमजन करते हुये नाद रूप में ओऽम् का उच्चारण करते हुए श्वास को बाहर छोड़ दें। पुन: इसी प्रकार आवृत्ति करें।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/971.jpg" alt="97" width="900" height="600"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">3 से 5 सेकेन्ड में श्वास को अन्दर भरना एवं विधि पूर्वक कान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आँख आदि बन्द करके 15-20 सेकेन्ड में नाद रूप में श्वास बाहर छोड़ना। एक बार भ्रामरी पूरा होने पर तुरन्त पुन: इसी प्रकार अभ्यास करना चाहिये। प्रत्येक व्यक्ति को लगातार कम से कम 5 से 7 बार यह प्राणायाम अवश्य करना चाहिये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कैंसर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पार्किन्सन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिप्रेशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माइग्रेन आदि असाध्य रोगों से ग्रस्त रोगी अथवा योग की गहराइयों में उतरने के इच्छुक साधक एक समय में 11 से 21 बार तक भ्रामरी प्राणायाम का निरन्तर अभ्यास कर सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(226,12,109);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सावधानी:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नाद भौंरे की गुमजन की तरह मधुर और सहज रखना चाहिए</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्कश और कठोर गुमजन का प्रयोग कदापि न करें। आँखों के ऊपर अंगुलियों से अत्यधिक दबाव न दें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लाभ: भ्रामरी प्राणायाम के द्वारा नाड़ियों की स्पन्दन गति (</span>Pulse rate<span lang="hi" xml:lang="hi">) में कमी आती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अड्रीनलिन (</span>Adrenalin<span lang="hi" xml:lang="hi">) तथा नोर-अड्रीनलिन (</span>Nor-adrenalin<span lang="hi" xml:lang="hi">) के उपापचयी पदार्थ (</span>Metabolites<span lang="hi" xml:lang="hi">) कम बनते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चर्म प्रतिरोधक क्षमता (</span>Skin Resistance Power<span lang="hi" xml:lang="hi">) में बढ़ोत्तरी होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रामरी प्राणायाम का लाभ (</span>Anxiety Neurosis<span lang="hi" xml:lang="hi">) तथा घबराहट सम्बन्धी विकारों (</span>Panic Disorder<span lang="hi" xml:lang="hi">) के प्रबन्धन में लिया जा सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक रोगों में बेहद लाभप्रद है। माइग्रेन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पार्किन्सन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्माद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक उत्तेजना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन की चमचलता को दूर कर स्वास्थ्य एवं शान्ति प्रदान करता है। ध्यान के लिये अत्यन्त उपयोगी है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(226,12,109);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">7. उद्गीथ-प्राणायाम:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि</strong>- 3 से 5 सेकेन्ड में श्वास को एक लय के साथ अन्दर भरना एवं पवित्र ओऽम् शब्द का विधिवत् उच्चारण करते हुए लगभग 15 से 20 सेकेन्ड में श्वास को बाहर छोड़ना। एक बार उच्चारण पूरा होने पर पुन: इसी प्रकार से अभ्यास करना चाहिये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">3 मिनट की 1 आवृत्ति में लगभग 7 बार प्रत्येक व्यक्ति को इस प्राणायाम का अभ्यास अवश्य करना चाहिये। असाध्य (दु:साध्य) रोगों से ग्रस्त एवं ध्यान की गहराइयों में उतरने के इच्छुक योग-साधक 5 से 10 मिनट या इससे भी अधिक समय तक इस प्राणायाम का अभ्यास कर </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>लाभ: </strong>उद्गीथ प्राणायाम के अभ्यास से नाड़ियों की स्पन्दन गति (</span>Pulse rate<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास-प्रश्वास गति (</span>Breath rate<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अम्लजन की खपत (</span>Oxygen Consumption<span lang="hi" xml:lang="hi">) तथा निरन्तर उत्पन्न हुए पसीने में कमी आती है। अत: यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्गीथ प्राणायाम उत्तेजना का ह्रास करने का एक प्रभावशाली माध्यम है। इसका उपयोग तनाव प्रबन्धन में भी किया जा सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सभी लाभ भ्रामरी प्राणायाम की तरह हैं। समस्त असाध्य रोगों में निरन्तर अभ्यास से लाभ मिलता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव ग्रस्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निराश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हताश व विक्षिप्त व्यक्ति को इसके अभ्यास से सम्बल मिलता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान की गहराइयों में उतरने के इच्छुक साधकों के लिये अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(226,12,109);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">8. प्रणव प्राणायाम या ध्यान योग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि-</strong> पूर्वनिर्दिष्ट सभी प्राणायाम करने के बाद श्वास-प्रश्वास पर अपने मन को टिकाकर प्राण के साथ उद्गीथ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ओ३म्</span><span lang="hi" xml:lang="hi">’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का ध्यान करें। भगवान् ने ध्रुवों की आकृति ओंकारमयी बनाई है। यह पिण्ड (देह) तथा समस्त ब्रह्माण्ड ओंकारमय है। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ओंकार</span><span lang="hi" xml:lang="hi">’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई व्यक्ति या आकृति विशेष नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु एक दिव्य शक्ति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का संचालन कर रही है। द्रष्टा बनकर दीर्घ एवं सूक्ष्म गति से श्वास को लेते एवं छोड़ते समय श्वास की गति इतनी सूक्ष्म होनी चाहिए कि स्वयं को भी श्वास की ध्वनि की अनुभूति न हो तथा यदि नासिका के आगे रूई भी रख दें तो वह हिले नहीं। धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ाकर प्रयास करें कि एक मिनट में एक श्वास तथा एक प्रश्वास चले। इस प्रकार  श्वास को भीतर तक देखने का भी प्रयत्न करें। प्रारम्भ में  श्वास के स्पर्श की अनुभूति मात्र नासिकाग्र पर होगी।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/1022.jpg" alt="102" width="900" height="600"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">धीरे-धीरे श्वास के गहरे स्पर्श को भी अनुभव कर सकेंगे। इस प्रकार कुछ समय तक श्वास के साथ द्रष्टा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् साक्षी भाव पूर्वक ओंकार का जप करने से ध्यान स्वत: होने लगता है। आपका मन अत्यन्त एकाग्र तथा ओंकार में तन्मय और तद्रूप हो जायेगा। प्रणव के साथ-साथ वेदों के महान् मन्त्र गायत्री का भी अर्थपूर्वक जप एवं ध्यान किया जा सकता है। इस प्रकार साधक ध्यान करते-करते सच्चिदानन्द-स्वरूप ब्रह्म के स्वरूप में तद्रूप होता हुआ समाधि के अनुपम दिव्य आनन्द को भी प्राप्त कर सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>लाभ:</strong> सोते समय भी इस प्रकार ध्यान करते हुए सोना चाहिए। ऐसा करने से निद्रा भी योगमयी हो जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दु:स्वप्न से भी छुटकारा मिलेगा तथा निद्रा शीघ्र आयेगी एवं प्रगाढ़ रहेगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3084/patanjali-s-eight-pranayams-to-be-done-in-daily-life</link>
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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2015 21:50:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>योग का स्वरूप</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">परम पूज्य स्वामी स्वामी रामदेव महाराज जी</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3085/form-of-yoga"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/793.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:left;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तदा द्रष्टु: स्वरुपेऽवस्थानम्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समत्वं योग उच्यते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग: कर्मसु कौशलम।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्षि</span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्त मूढ़ एवं विक्षिप्त अवस्था से बाहर निकलकर एकाग्र चित्त व निरुद्ध चित्त होकर अपने मूल स्वरूप में जीना योग है। समत्व में रहते हुए पूर्ण कुशलता के साथ अपने कर्म या कर्त्तव्य का कृतज्ञता पूर्वक निर्वहन करना योग है। ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म एवं उपसना यह योग की त्रिवेणी है। योग के मुख्य रूप से दो पहलू हैं- एक  व्यवहारिक योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा है- आध्यात्मिक योग।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग एक वैज्ञानिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सार्वभौमिक व पंथ-निरपेक्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राकृतिक जीवन पद्धति है। इस सहज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरल जीवन पद्धति को अपना कर हम निरोगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्व्यसनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्ध एवं शान्तिमय जीवन को ही जीते हैं तथा अपने भीतर सुप्त असीम ज्ञान एवं सामर्थ्य को विकसित करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह योग का व्यवहारिक पहलू है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">व्यायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यम-नियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्याहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धारणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान व समाधि रूप अष्टाङ्गयोग के नित्यप्रति अभ्यास से जीवन का पूर्ण विकास करके शील</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाधि एवं प्रज्ञा को प्राप्त करना यह योग का गन्तव्य है। विश्व के किसी भी मजहब में योग का विरोध नहीं है। अपितु एक स्वस्थ व आध्यात्मिक जीवन जीने का ही सभी धर्मों का उपदेश है। वसुधैव कुटुम्बकम्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सह-अस्तित्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समष्टि के साथ एकत्व तथा अस्तित्व के प्रति पूर्ण कृतज्ञता के साथ पूर्ण पुरुषार्थ करते हुए अभ्युदय व नि:श्रेयस को सिद्ध करना या निष्काम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अलोभ व आत्मकाम होकर दिव्य जीवन जीना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही योग है। यह योग का आध्यात्मिक पहलू है। सभी धर्मों व पंथो के मूल आध्यात्मिक तत्त्व तो एक ही हैं। अत: योग भौगोलिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनैतिक व आर्थिक सीमाओं से परे एक शाश्वत सत्य है। सबके सम्पूर्ण स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समग्र समृद्धि एवं विश्व-शान्ति का एकमात्र निर्विवादित मार्ग योग है। योग से ही यह सृष्टि दिव्य व भव्य होगी तथा व्यष्टि व समष्टि में भगवत्ता का अवतरण होगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आइए! इस प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस पर हम सब योगमय जीवन जीने का संकल्प लें और पूरे विश्व को योगमय बनाने की दिशा में आगे बढ़ें। योग को वैश्विक स्तर पर सर्वोच्च गौरव दिलाने हेतु माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को हृदय से धन्यवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरे भारत व विश्व की ओर से उनको अनन्य कृतज्ञता।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">21<span lang="hi" xml:lang="hi">वीं सदी विज्ञान एवं अध्यात्म की सदी होगी। इसमें प्रोस्पेरिटी (</span>Prosperity) <span lang="hi" xml:lang="hi">एवं स्प्रिच्युलिटी (</span>Spirituality) <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ-साथ चलेगी और इस समृद्धि एवं शान्ति का आधारभूत तत्त्व योग होगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2015 21:47:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दैनिक जीवन में किये जाने वाले 12 आसन</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    जिम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा व्यायाम शालाओं में प्रचलित शारीरिक व्यायाम से केवल मांसपेशियाँ  विकसित होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि आसनों के अभ्यास से शरीर के समस्त जोड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मांसपेशियों की क्षमता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति तथा लचीलेपन में वृद्धि होती है। तरीके से श्वास-प्रश्वास को ध्यान में रखते हुए अभ्यास करने से सम्पूर्ण शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता एवं रक्त-संचार में भी वृद्धि होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क</span><span lang="hi" xml:lang="hi">मजोर शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विकलाङ्ग एवं दीर्घ रोगी व्यक्ति भी समुचित मार्गदर्शन में इन आसनों का अभ्यास कर सकते हैं। परम पूज्य योगर्षि स्वामी रामदेव जी महाराज द्वारा वर्षों की तपस्या तथा शोध-अनुसन्धान द्वारा प्रतिपादित अत्यन्त लाभदायी निम्रलिखित 12 आसनों का</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3086/12-asanas-to-be-done-in-daily-life"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/112.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  जिम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा व्यायाम शालाओं में प्रचलित शारीरिक व्यायाम से केवल मांसपेशियाँ  विकसित होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि आसनों के अभ्यास से शरीर के समस्त जोड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मांसपेशियों की क्षमता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति तथा लचीलेपन में वृद्धि होती है। तरीके से श्वास-प्रश्वास को ध्यान में रखते हुए अभ्यास करने से सम्पूर्ण शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता एवं रक्त-संचार में भी वृद्धि होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क</span><span lang="hi" xml:lang="hi">मजोर शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विकलाङ्ग एवं दीर्घ रोगी व्यक्ति भी समुचित मार्गदर्शन में इन आसनों का अभ्यास कर सकते हैं। परम पूज्य योगर्षि स्वामी रामदेव जी महाराज द्वारा वर्षों की तपस्या तथा शोध-अनुसन्धान द्वारा प्रतिपादित अत्यन्त लाभदायी निम्रलिखित 12 आसनों का संपूर्ण पैकेज प्रस्तुत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे हर कोई लाभ उठा सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मुख्य 12 आसन:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बैठकर किये जाने वाले आसन:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मण्डूकासन:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:</strong> वज्रासन में बैठकर दोनों हाथों की मुट्ठी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> बन्द करके (मुट्ठी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> बन्द करते समय अङ्गूठे को अङ्गुलियों से दबायें) दोनों मुठियो को नाभि के दोनों ओर लगाकर श्वास बाहर छोड़ते हुए सामने की ओर झुकते हुए दृष्टि को सामने रखकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थोड़ी देर इसी स्थिति में रहने के बाद वापस वज्रासन में आ जायें</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार तीन से पाँच आवृत्ति करें। यह क्रिया <strong>मण्डूकासन</strong> <strong>(प्रथम)</strong> कहलाती है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/1172.jpg" alt="117" width="900" height="600"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>लाभ:</strong> अग्न्याशय (पैन्क्रियाज) को सक्रिय करके इन्सुलिन की मात्रा को सन्तुलित करते हुए मधुमेह (डायबिटीज) को दूर करने में यह सहायक है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मोटापे एवं उदर से सम्बद्ध रोगों-कब्ज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एसिडिटी (अम्लपित्त) में उपयोगी है। यह हृदय के लिए भी लाभप्रद है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मण्डूकासन-</span>2</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:</strong> वज्रासन में बैठकर नाभि पर बायें हाथ की हथेली पर दायें हाथ की हथेली को रखते हुए पेट को अन्दर दबायें तथा श्वास को बाहर निकालते हुए पूर्व की भाँति <strong>(मण्डूकासन-1)</strong> धीरे-धीरे नीचे झुककर दृष्टि सामने रखना '<strong>मण्डूकासन-2'</strong> कहलाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>लाभ:</strong> पूर्ववत्।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">शशकासन:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि: </strong>वज्रासन में बैठकर दोनों हाथों को श्वास भरते हुए ऊपर उठायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब आगे झुकते हुए श्वास बाहर छोड़ें एवं हाथों को आगे फैला कर हथेलियाँ नीचे की ओर रखते हुए कोहनियों तक हाथों को भूमि पर टिका दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माथा भी भूमि पर टिका हुआ हो। कुछ समय इस स्थिति में रहकर पुन: वज्रासन में आ जायें। इस क्रियाभ्यास को </span><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">शशकासन'</span></strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/1162.jpg" alt="116" width="900" height="600"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विशेष:</strong>नीचे झुकते हुए यह ध्यान दें कि नितम्ब एड़ियों से ही लगे रहें अर्थात् नितम्बों को न उठायें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>लाभ:</strong> शशकासन-आँत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यकृत्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्न्याशय एवं गुर्दों को ऊर्जा प्रदान करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्त्रियों के गर्भाशय को पुष्ट करके उदर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कमर एवं कूल्हों की चर्बी कम करता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक तनाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिड़चिड़ापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुस्सा आदि को दूर करके मानसिक शान्ति प्रदान करता है। दमा व हृदय रोगियों के लिए विशेष लाभप्रद है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वक्रासन:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:</strong> दण्डासन में बैठकर दायाँ और बायाँ पैर मोड़कर बायीं जङ्घा के पास घुटने से सटाकर रखें (अथवा घुटने के ऊपर से दूसरी ओर भी रख सकते हैं)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बायाँ पैर सीधा रहेगा। बायें हाथ को दायें पैर एवं उदर के बीच से लाकर दायें पैर के पमजे के पास टिका दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दायें हाथ को कमर के पीछे भूमि पर सीधा रखकर गर्दन को घुमाकर दायीं ओर कन्धे के ऊपर से मोड़कर पीछे देखें। इसी प्रकार दूसरी ओर से भी अभ्यास करना </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वक्रासन</span><span lang="hi" xml:lang="hi">’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहलाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे 4 से 6 बार कर सकते हैं।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/1151.jpg" alt="115" width="900" height="600"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>लाभ:</strong> कमर व कूल्हों की चर्बी को कम करता है। मधुमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यकृत्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिल्ली के लिए विशेष लाभप्रद है। कमर-दर्द के लिए उपयोगी आसन है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गोमुखासन:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:</strong> दण्डासन में बैठकर बायें पैर को मोड़कर एड़ी को दायें नितम्ब के पास रखें अथवा एड़ी पर बैठ भी सकते हैं। दायें पैर को मोड़कर बायें पैर के ऊपर इस प्रकार रखें कि दोनों घुटने एक दूसरे से स्पर्श करते हुए हों। अब जो पैर ऊपर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी हाथ को ऊपर से एवं नीचे वाले पैर की ओर के हाथ को पीछे कमर की ओर से ले जाकर आपस में अंगुलियाँ फँसाकर खींचें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोहनियाँ एवं गर्दन व सिर सीधे रहेंगे। एक ओर से करने के बाद पुन: दूसरी ओर से भी करें। इस सम्पूर्ण क्रिया को </span><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">गोमुखासन'</span></strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/1141.jpg" alt="114" width="900" height="1350"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/1131.jpg" alt="113" width="900" height="1350"></img></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>लाभ:</strong> हाइड्रोसिल (अण्डकोष वृद्धि) एवं यौन-रोगों में विशेष लाभप्रद है। स्त्री-रोगों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सन्धिवात एवं गठिया में उपयोगी है तथा लीवर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुर्दे एवं छाती को पुष्ट करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उदर के बल लेटकर किए जाने वाले आसन:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मकरासन:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:</strong> उदर के बल लेटकर दोनों हाथों की कोहनियों को मिलाकर स्टैण्ड बनाते हुए हथेलियों को ठोड़ी के नीचे लगाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छाती को ऊपर उठायें। घुटनों से लेकर पंजों तक पैरों को सीधा तानकर रखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब श्वास भरते हुए पैरों को क्रमश: पहले एक-एक तथा बाद में दोनों पैरों को एक साथ मोड़ें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोड़ते समय पैरों की एड़ियाँ नितम्बों का स्पर्श करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास बाहर छोड़ते हुए पैरों को सीधा करना </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मकरासन</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहलाता है। इस प्रकार 10-12 आवृत्ति करें।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/891.jpg" alt="89" width="900" height="374"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>लाभ:</strong> स्लिप डिस्क (रीढ़ की गोटियों का इधर-उधर खिसक जाना)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वाइकल स्पॉण्डिलाइटिस (गर्दन व उसके पीछे वाले हिस्से में दर्द का होना) एवं सियाटिका (कुल्हों का दर्द) के लिए बहुत लाभकारी अभ्यास है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/881.jpg" alt="88" width="900" height="433"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अस्थमा, दमा और फेफड़े-सम्बन्धी किसी भी विकार) तथा घुटनों के दर्द के लिए विशेष कारगर है तथा यह आसन पैरों को सुडौल बनता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भुजङ्गासन-</span>1:</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:</strong> उदर के बल लेटकर हाथों की हथेलियाँ भूमि पर रखते हुए हाथों को छाती के दोनों ओर रखकर कोहनियाँ ऊपर उठी हुई तथा भुजाएँ छाती से सटी हुई होनी चाहिए। पैरों को सीधा रखकर पंजों को एक साथ मिलाकर पीछे की ओर खींचकर रखें। श्वास अन्दर भरकर छाती एवं सिर को धीरे-धीरे ऊपर उठायें। नाभि के नीचे वाला भाग भूमि पर टिका रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिर व गर्दन को अधिकाधिक पीछे की ओर मोड़ें</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">इस स्थिति में लगभग 30 सैकेण्ड तक रुकें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तत्पश्चात् धीरे-धीरे प्रारम्भिक अवस्था में आ जायें। इस पूरी प्रक्रिया को </span><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भुजङ्गासन - 1</span><span lang="hi" xml:lang="hi">’</span></strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं। इस क्रिया को 3 से 5 बार दोहरायें।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/1061.jpg" alt="106" width="900" height="600"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भुजङ्गासन-</span>2:</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:</strong> उदर के बल लेटकर बायें हाथ की हथेली को छाती के नीचे रखकर उसके ऊपर दायें हाथ की हथेली रखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माथा जमीन से लगा रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब श्वास भरते हुए धीरे-धीरे सिर व छाती को ऊपर उठायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीछे से एड़ी-पमजे मिलाकर तानें। कोहनियों को सीधा रखते हुए हाथों को सीधा करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे श्रोणि प्रदेश तक का भाग पृथ्वी से ऊपर उठ जाएगा। कुछ देर इस अवस्था में रुकें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब धीरे-धीरे पूर्व स्थिति में आयें। यह पूरी प्रक्रिया </span><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भुजङ्गासन - 2</span><span lang="hi" xml:lang="hi">’</span></strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहलाती है। इस पूरी क्रिया को 3 से 5 बार दोहरायें।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/1231.jpg" alt="123" width="900" height="600"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>सावधानी:</strong> कमर दर्द से पीड़ित व्यक्ति इस विधि को न करें। प्रारम्भ में प्रथम विधि को ही करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धीरे-धीरे रीढ़ में लचीलापन आने पर दूसरी विधि को भी कर सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>लाभ:</strong> कमर-दर्द व मोटापे से ग्रसित व्यक्तियों के लिए यह रामबाण आसन है। मेरुदण्ड से सम्बद्ध समस्त प्रकार की विकृतियों और रोगों के लिए यह उत्तम आसन है। इससे कलाई व कन्धे सबल बनते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भुजङ्गासन-</span>3:</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:</strong> उदर के बल लेटकर दोनों हाथों को बगल में रखकर (भुजङ्गासन-1 की भाँति)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब आगे से सिर व छाती को ऊपर उठायें। फिर दोनों हाथों को भूमि से ऊपर उठा लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीछे से घुटने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एड़ी व पंजे मिले हुए तथा तने हुए रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी अवस्था में कुछ देर यथा शक्ति रुक कर पुन: वापिस आएं। इस क्रिया को 3-5बार दोहरायें।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/1071.jpg" alt="107" width="900" height="600"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">शलभासन-</span>1:</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:</strong> उदर के बल लेटकर दोनों हाथों को जंघाओं के नीचे रखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ठुड्डी जमीन पर लगी रहेगी। श्वास अन्दर भरकर दायें पैर को बिना घुटना मोड़े ऊपर उठाकर 10 से 30 सैकेण्ड तक इस स्थिति में रहें। सामान्य स्थिति में आकर पुन: बायें पैर से अभ्यास करें। इस प्रकार 5 से 7 आवृत्ति करें। अब दोनों पैरों को एक साथ मिलाकर बिना घुटने मोड़े हथेलियों का रुख अपनी सुविधानुसार ऊपर या नीचे की ओर रखें</span>, (<span lang="hi" xml:lang="hi">सभी अङ्गुलियाँ मिली रहेंगी) अब ऊपर की ओर उठें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें नाभि से नीचे तक का भाग ऊपर उठ जाएगा। यह क्रियाभ्यास </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">शलभासन-1</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहलाती है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/1051.jpg" alt="105" width="900" height="600"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>लाभ</strong>: मेरुदण्ड के नीचे वाले भाग में होने वाले सभी रोगों को दूर करता है। कमर-दर्द एवं सियाटिका दर्द में विशेष लाभप्रद है। फेफड़े मजबूत बनते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कब्ज टूटती है। यह यौन-रोगों में लाभकारी है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">शलभासन-</span>2:</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि: </strong>उदर के बल लेटकर दायें हाथ को कान तथा सिर से स्पर्श करते हुए सीधा रखें तथा बायें हाथ को पीछे कमर के ऊपर रखकर श्वास अन्दर भरते हुए आगे से सिर एवं दायें हाथ को तथा पीछे से बायें पैर को भूमि से ऊपर उठाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थोड़ी देर इस अवस्था में रुककर शनै:-शनै: वापस आयें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार बायीं ओर से इस आसन को करें।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/1042.jpg" alt="104" width="900" height="600"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">शलभासन-</span>3:</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:</strong> उदर के बल लेटकर दोनों हाथों को पीठ के पीछे ले जाकर सीधा रखते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक दूसरे हाथ की कलाइयों को पकड़ें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास भरकर सिर व छाती को अधिकाधिक ऊपर उठायें (पीछे से हाथों को खींचकर रखें)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दृष्टि आकाश की ओर जमी रहेगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/1031.jpg" alt="103" width="900" height="600"></img></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>लाभ</strong>: पूर्ववत्।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पीठ के बल लेटकर किये जाने वाले आसन:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मर्कटासन-</span>1:</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:</strong> सीधे लेटकर दोनों हाथों को कन्धों के समानान्तर फैलायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हथेलियाँ आकाश की ओर खुली रहे</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर दोनों पैरों को घुटनों से मोड़कर नितम्ब के पास लायें। अब घुटनों को दायीं ओर झुकाते हुए दोनों घुटनों और एड़ियों को परस्पर मिलाकर भूमि पर टिकायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गर्दन को बायीं ओर मोड़कर रखें</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी तरह से बायीं ओर से भी इस आसन को करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह </span><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मर्कटासन-1</span><span lang="hi" xml:lang="hi">’</span></strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहलाता है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/1121.jpg" alt="112" width="900" height="600"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मर्कटासन-</span>2:</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि: </strong>पीठ के बल लेटकर दोनों पैरों को घुटनों से मोड़कर नितम्बों के पास रखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पैरों में लगभग डेढ़ फुट का अन्तर रखें (दोनों हाथ कन्धों की सीध में फैले हुए हथेलियाँ ऊपर की ओर हों)। अब दायें घुटने को दायीं ओर झुकाकर भूमि पर टिका दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बायें घुटने को इतना झुकायें कि वह दायें पैर के पंजे से स्पर्श करे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गर्दन को बायीं ओर अर्थात् विपरीत दिशा में मोड़कर रखें। इसी प्रकार से दूसरे पैर से भी करें। इसे </span><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मर्कटासन-2'</span></strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/1111.jpg" alt="111" width="900" height="600"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मर्कटासन-</span>3:</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि</strong>: सीधे लेटकर दोनों हाथों को कन्धों के समानान्तर फैलायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हथेलियाँ आकाश की ओर खुली हों। दायें पैर को 90 डिग्री (900) उठाकर धीरे-धीरे बायें हाथ के पास ले जायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गर्दन को दायीं ओर मोड़कर रखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ समय इसी स्थिति में रहने के बाद पैर को 90 डिग्री (900) पर सीधे उठाकर धीरे-धीरे भूमि पर टिका दें। इसी तरह बायें पैर से इस क्रिया को करें।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/1103.jpg" alt="110" width="900" height="600"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्त में दोनों पैरों को एक साथ 90 डिग्री (900) पर उठाकर बायीं ओर हाथ के पास रखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गर्दन को विपरीत दिशा में मोड़ते हुए दायीं ओर देखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ समय पश्चात् पैरों को यथापूर्व सीधा करें। इसी तरह दोनों पैरों को उठाकर दायीं ओर हाथ के पास रखें। गर्दन को बायीं ओर मोड़ते हुए बायीं ओर देखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह एक आवृत्ति हुई। यह सम्पूर्ण क्रिया </span><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मर्कटासन-3'</span></strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहलाती है। इस प्रकार 3 से 4 आवृत्ति करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>सावधानी</strong>: जिनको कमर में अधिक दर्द हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे दोनों पैरों से एक साथ न करें। उनको एक-एक पैर से ही 2-3 आवृत्ति करनी चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>लाभ: </strong>पेट-दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दस्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कब्ज एवं गैस को दूर करके पेट को हल्का बनाता है। नितम्ब तथा जोड़ों के दर्द में विशेष लाभदायक है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कमर-दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वाइकल स्पॉण्डिलाइटिस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्लिप डिस्क एवं साइटिका में यह विशेष लाभप्रद आसन है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पवनमुक्तासन-</span>1:</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि: </strong>सीधे लेटकर दायें पैर के घुटने को छाती के पास लायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों हाथों की अङ्गुलियाँ आपस में फँसाकर घुटनों पर रखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास बाहर निकालते हुए घुटने को दबाकर छाती से लगायें एवं सिर को उठाते हुए घुटने से नासिका का स्पर्श करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ देर करीब 10-30 सैकेण्ड तक श्वास को स्वाभाविक स्थिति में रखकर अथवा बाहर रोक कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर पैर को सीधा कर दें। इसी प्रकार दूसरे पैर से भी इसी क्रिया को करना</span>, <strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पवनमुक्तासन-1</span>’</strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहलाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/1091.jpg" alt="109" width="900" height="600"></img></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पवनमुक्तासन-</span>2:</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि: </strong>पूर्ववत् विधि को ही आगे बढ़ाते हुए अब द्वितीय स्थिति में दोनों पैरों को एक साथ परस्पर मिलाकर (पंजे तने हुए हों) समकोण अर्थात् 90 डिग्री (900 तक उठायें</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर घुटने मोड़कर घुटनों को छाती के पास रखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब दोनों हाथों से दोनों घुटनों को पकड़कर छाती को दबायें और सिर उठाकर नासिका को घुटनों से लगायें। श्वास को बाहर रोक कर रखें अथवा स्वाभाविक रूप से श्वास लें। यह </span><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पवनमुक्तासन-2</span></strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहलाता है। इस क्रियाविधि को एक बार में 3 से 5 बार कर सकते हैं। </span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/1081.jpg" alt="108" width="900" height="600"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>सावधानी: </strong>यदि कमर में अधिक दर्द हो तो सिर उठाकर घुटने से नासिका न लगायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल पैरों को दबाकर छाती से स्पर्श करें</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा करने से स्लिप डिस्क</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सियाटिका एवं कमर-दर्द में पर्याप्त लाभ मिलता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>लाभ</strong>: यह आसन उदरगत वायुविकार के लिए यह बहुत ही उत्तम है। स्त्री-रोग अल्पार्त्तव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कष्टार्त्तव एवं गर्भाशय-सम्बन्धी रोगों के लिए बहुत लाभप्रद है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अम्लपित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदयरोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गठिया एवं कटिपीड़ा में हितकारी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदर की बढ़ी हुई चर्बी को कम करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्द्धहलासन:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:</strong> पीठ के बल लेटकर हथेलियाँ भूमि की ओर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पैर सीधे एवं पंजे मिले हुए व तने हुए हों। अब श्वास अन्दर भरकर पैरों को 90 डिग्री (समकोण) तक धीरे-धीरे ऊपर उठाकर कुछ समय तक इसी स्थिति में स्थिर रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वापस आते समय धीरे-धीरे पैरों को नीचे भूमि पर टिकायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">झटके के साथ नहीं। कुछ विश्राम कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर यही क्रिया करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे </span><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अर्द्धहलासन</span>’</strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं। इसे 3 से 6 बार करना चाहिए।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/119.jpg" alt="119" width="900" height="600"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>सावधानी:</strong> जिनको कमर में अधिक दर्द रहता हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे एक-एक पैर से क्रमश: इस आसन का अभ्यास करेंऋ दोनों पैरों से एक साथ अभ्यास न करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>लाभ</strong>: यह आसन आँतों को सबल एवं निरोग बनाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा कब्ज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गैस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोटापा आदि को दूर कर जठराग्नि को प्रदीप्त करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नाभि का डिगना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदयरोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेट दर्द एवं श्वासरोग में भी उपयोगी है। एक-एक पैर से क्रमश: रुकने पर कमर दर्द में विशेष लाभप्रद है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पादवृत्तासन-</span>1:</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि</strong>: सीधे लेटकर दायें पैर को उठाकर शून्याकृति बनाते हुए घड़ी की दिशा में 5-10 आवृत्तियाँ करें। एक दिशा में घुमाने के बाद दूसरी दिशा में पैर को घड़ी की विपरीत दिशा (एण्टी क्लॉकवाइज) में वृत्ताकार घुमायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब दूसरे पैर से भी ठीक इसी प्रकार अभ्यास करें। यह पूरी क्रिया </span><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पादवृत्तासन-1</span></strong>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहलाती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पादवृत्तासन-</span>2:</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि</strong>: एक-एक पैर से करने के पश्चात् दोनों पैरों से एक साथ इस अभ्यास को करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पैरों को ऊपर-नीचे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दायें एवं बायें चारों ओर जितना ले जा सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उतना ले जाते हुए घुमायें। दोनों पैरों से दोनों दिशाओं से अर्थात् वामावर्त्त (क्लॉकवाइज) तथा दक्षिणावर्त्त (एण्टी क्लॉकवाइज) घुमाने की क्रिया </span><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पादवृत्तासन-2</span>’</strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहलाती है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>लाभ</strong>: जङ्घा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नितम्ब एवं कमर के बढ़े हुए मेद को निश्चित रूप से दूर करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा उदर को हल्का व सुडौल बनाता है। शरीर के सन्तुलन के लिए यह बहुत उपयोगी है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">द्वि-चक्रिकासन-</span>1:</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि</strong>: पीठ के बल लेटकर हाथों के पंजे नितम्बों के नीचे रख श्वास रोक कर एक पैर को पूरा ऊपर उठाकर घुटने से मोड़कर एड़ी नितम्ब के पास होकर गोलाकार (साइकिल चलाने की तरह) घुमाते रहें। इसी प्रकार दूसरे पैर से इस क्रिया को करें। पैरों को बिना जमीन पर टिकाये घुमाते रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पैरों से वृत्ताकृति बनायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस सम्पूर्ण क्रियाभ्यास को </span><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">द्वि-चक्रिकासन-1</span>’</strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं। 10 से लेकर यथाशक्ति 25-30 बार इसकी आवृत्ति करें। थक जाने पर शवासन में थोड़ी देर विश्राम करके इसी अभ्यास को विपरीत दिशा से दोहरायें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">द्वि-चक्रिकासन-</span>2:</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:</strong> इसी क्रिया के द्वितीय चरण में दोनों पैरों को घुटनों से मोड़ते हुए घुटनों को छाती पर सटा दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब श्वास लेने तथा छोड़ने की क्रिया के साथ दोनों पैरों को (साईकिल के पैडल घुमाने की भाँति) वामावर्त्त घुमाइये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही क्रिया दक्षिणावर्त्त में भी दोहराना <strong>द्वि-चक्रिकासन-2</strong> कहलाता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>सावधानी:</strong> कमरदर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदयरोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च रक्तचाप और हर्निया से ग्रसित व्यक्ति इस तीसरी अवस्था का अभ्यास न करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>लाभ</strong>: मोटापा घटाने के लिए यह सर्वोत्तम आसन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियमित रूप से 5 से 10 मिनट तक इसका अभ्यास करने से निश्चित ही अनावश्यक भार कम हो जाता है। उदर को सुडौल बनाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आँतों को सक्रिय करता है। कब्ज़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन्दाग्नि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अम्लपित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धरन आदि की निवृत्ति करता है। यह सम्पूर्ण शरीर में रक्त-संचारण को तेज करके रक्तशुद्धि करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन निरापद आसनों को अपनी दिनचर्या में स्थान देकर हर कोई सुदृढ़ जीवन का स्वामी बन सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आइये आज से ही इसके लिए संकल्पित हों।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3086/12-asanas-to-be-done-in-daily-life</link>
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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2015 21:45:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दैनिक जीवन में किये जाने वाले सूर्य नमस्कार की 12 स्थितियां</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  <strong>   धरती </strong></span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पर ऊर्जा के स्रोत-हवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य आदि में से सूर्य प्रमुख है। इससे प्राणि जगत् विशेषत: ऊर्जित होता है। यह वैज्ञानिक तथ्य है कि प्रात:काल के उदीयमान सूर्य की किरणों का हमारे शरीर पर विशिष्ट चिकित्सकीय प्रभाव पड़ता है। हमारे पूर्वज मनीषियों ने विशेष शोध व अनुसन्धान के द्वारा पाया कि प्रात:कालीन बेला में इनके अलग-अलग प्रकार के विशेष क्रम का अभ्यास करने से हमें चौबीस घण्टे ऊर्जा का स्तर बनाये रखने में विशेष सहायता मिलती है। मनीषियों ने इन्हीं बारह स्थितियों के समुच्चय को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य-नमस्कार</span>  <span lang="hi" xml:lang="hi">नाम दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अपने आप में एक स्वतन्त्र व</span></strong></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3087/12-situations-of-surya-namaskar-to-be-done-in-daily-life"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/untitled.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> <strong>  धरती </strong></span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पर ऊर्जा के स्रोत-हवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य आदि में से सूर्य प्रमुख है। इससे प्राणि जगत् विशेषत: ऊर्जित होता है। यह वैज्ञानिक तथ्य है कि प्रात:काल के उदीयमान सूर्य की किरणों का हमारे शरीर पर विशिष्ट चिकित्सकीय प्रभाव पड़ता है। हमारे पूर्वज मनीषियों ने विशेष शोध व अनुसन्धान के द्वारा पाया कि प्रात:कालीन बेला में इनके अलग-अलग प्रकार के विशेष क्रम का अभ्यास करने से हमें चौबीस घण्टे ऊर्जा का स्तर बनाये रखने में विशेष सहायता मिलती है। मनीषियों ने इन्हीं बारह स्थितियों के समुच्चय को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य-नमस्कार</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नाम दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अपने आप में एक स्वतन्त्र व पूर्ण व्यायाम है। प्रस्तुत है सूर्य नमस्कार की विधि-</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य-नमस्कार हेतु सामान्य नियम:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य-नमस्कार की 12 स्थितियों को एक बार पूरा करना एक आवृत्ति (चक्र) कहलाती है। इस प्रकार सूर्य-नमस्कार से अधिक से अधिक लाभ प्राप्त करने के लिए प्रत्येक दिन कम से कम १० से 15 आवृत्तियों का अभ्यास करना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषज्ञ मानते हैं कि इन 12 स्थितियों को करते वक्त पूरक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुम्भक व रेचक को ध्यान में रखकर करने से विशेष लाभ मिलता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बीमार अवस्था में सूर्य-नमस्कार नहीं करना चाहिए अथवा योग-शिक्षक से परामर्श लेकर ही इसे धीरे-धीरे करना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्येक स्थिति का अभ्यास मानसिक मन्त्रोच्चारण पूर्वक परमात्मा/ अल्लाह/ गॉड/ वाहे गुरु आदि के प्रति मन ही मन नमस्कार/स्मरण तथा कृतज्ञता/धन्यवाद का भाव जगाते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्दिष्ट शरीरस्थ चक्र में ध्यान केन्द्रित करते हुए करना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य-नमस्कार में किये जाने वाले 12 स्थितियां निम्रलिखित हैं-</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति-1</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति का नाम: प्रणामासन या नमस्कार मुद्रा</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास: सामान्य</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एकाग्रता केन्द्र: अनाहतचक्र</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>मन्त्र: ओ३म् मित्राय नम:</strong></span> अर्थात् हे विश्व के मित्र! आपको नमस्कार है।  </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्योदय के समय सूर्याभिमुख सावधान की स्थिति में खड़े होकर (एड़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंजे तथा घुटने परस्पर मिले हुए हों) नमस्कार की स्थिति में हाथों को छाती के सामने रखें। श्वास की गति सामान्य रहेगी। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार हाथों और पैरों को जोड़ कर खड़े होने से ऊर्जा के परिपथ का निर्माण होता है। परिणाम स्वरूप शरीर शीघ्र ही ऊर्जान्वित हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति-2</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति का नाम: ऊर्ध्वहस्तासन/ हस्तोत्तानासन</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास: श्वास लेते हुए एकाग्रता केन्द्र: विशुद्धिचक्र</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">मन्त्र: ओ३म् रवये नम:</span></strong> अर्थात् हे संसार में चहल-पहल लाने वाले! आपको नमस्कार है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति झुकने के बाद श्वास अन्दर भर कर सामने से हाथों को खोलते हुए बिना कोहनियाँ मोड़े पीछे की ओर ले जायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिर हाथों के बीच में स्थित रहेगा। श्वास रोक कर दृष्टि आकाश की ओर रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कमर को भी यथा शक्ति पीछे की ओर झुकायें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति-3</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति का नाम: पादहस्तासन श्वास: श्वास छोड़ते हुए</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एकाग्रता केन्द्र: स्वाधिष्ठानचक्र</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">मन्त्र: ओ३म् सूर्याय नम:</span> </strong>अर्थात् हे संसार के जीवनदाता! आपको नमस्कार है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति-2 के बाद श्वास बाहर निकालकर हाथों को पीछे से सामने झुकाते हुए पैरों के पास जमीन पर टिका दें। यदि हो सके तो हथेलियों को भी पंजों के दायें-बायें भूमि से स्पर्श करें तथा सिर को घुटनों से लगाने का प्रयास करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान रहे कि किसी भी स्थिति में घुटने न मुड़ें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति-4</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति का नाम: अश्वसंचालनासन</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास: श्वास लेते हुए एकाग्रता केन्द्र: विशुद्धिचक्र</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>मन्त्र: ओ३म् भानवे नम: </strong></span>अर्थात् हे प्रकाश पुंज! आपको नमस्कार है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति-3 के उपरान्त अब नीचे झुकते हुए हथेलियों को छाती के दोनों ओर टिकाकर रखें। बायाँ पैर उठाकर पीछे से पूरा पंजा जमीन पर सटाते हुए तानें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दायाँ पैर दोनों हाथों के बीच में रहेगा (इस पैर को सुविधा की दृष्टि से थोड़ा पीछे भी रख सकते हैं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु एड़ी हर हाल में जमीन को स्पर्श करती हुई हो)। घुटना छाती के सामने रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दृष्टि आकाश की ओर हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास को अन्दर भरकर रखना है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति-5</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति का नाम: पर्वतासन </span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास: श्वास छोड़ते हुए</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एकाग्रता केन्द्र: विशुद्धिचक्र</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>मन्त्र: ओ३म् खगाय नम:</strong> </span>अर्थात् हे आकाश में गतिशील देव! आपको नमस्कार है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास बाहर निकालकर दायें पैर को भी पीछे ले जायें। गर्दन और सिर दोनों हाथों के बीच में रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नितम्ब और कमर ऊपर उठाकर तथा सिर को झुकाकर नाभि को देखने का प्रयास करें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति-6</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति का नाम: अष्टाङ्गनमनासन/ साष्टाङ्गासन/ अधोमुखशवासन</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास:श्वास-प्रश्वास सामान्य</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एकाग्रता केन्द्र: मणिपूरचक्र</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>मन्त्र: ओ३म् पूष्णे नम:</strong> </span>अर्थात् हे संसार के पोषक! आपको नमस्कार है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाथों एवं पैर के पंजों को स्थिर रखते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छाती एवं घुटनों को भूमि पर स्पर्श करें। इस प्रकार दो हाथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दो पैर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दो घुटने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छाती एवं सिर अथवा ठोड़ी</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">इन आठों अङ्गों के भूमि पर टिकने से यह साष्टाङ्गासन बनता है। श्वास-प्रश्वास सामान्य रहेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति-7</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति का नाम: भुजङ्गासन</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास:श्वास लेते हुए</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एकाग्रता केन्द्र: स्वाधिष्ठानचक्र</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">मन्त्र: ओ३म् हिरण्यगर्भाय नम:</span> </strong>अर्थात् हे ज्योतिर्मय! आनन्दमय! आपको नमस्कार है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास अन्दर भरकर (भुजङ्गासन की आकृति) छाती को ऊपर उठाते हुए हाथों को धीरे-धीरे सीधा कर दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीछे से दोनों पैर मिले व तने हुए हों। नाभि तक का भाग भूमि पर टिका हुआ एवं दृष्टि आकाश की ओर हो।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति-8</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति का नाम: पर्वतासन</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास:श्वास छोड़ते हुए</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एकाग्रता केन्द्र: स्वाधिष्ठानचक्र</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>मन्त्र: ओ३म् मरीचये नम: </strong></span>अर्थात् हे संसार के प्रकाशक स्वामी! आपको नमस्कार है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास बाहर निकाल कर कुल्हों को ऊपर उठायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गर्दन और सिर दोनों हाथों के बीच में रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नितम्ब और कमर ऊपर उठाकर तथा सिर को झुका कर नाभि को देखने का प्रयास करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति-9</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति का नाम: अश्वसंचालनासन</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास:श्वास लेते हुए</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एकाग्रता केन्द्र: आज्ञाचक्र</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">मन्त्र: ओ३म् आदित्याय नम:</span> </strong>अर्थात् हे संसार के रक्षक! आपको नमस्कार है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति-8 के उपरान्त अब नीचे झुकते हुए हथेलियों को छाती के दोनों ओर टिका कर रखें। चित्रनुसार दायाँ पैर उठाकर पीछे से पूरा पंजा जमीन पर सटाते हुए तानें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बायाँ पैर दोनों हाथों के बीच में रखें (इस पैर को सुविधा की दृष्टि से थोड़ा पीछे भी रख सकते हैं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु एड़ी हर हाल में जमीन को स्पर्श करती हुई हो)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घुटना छाती के सामने रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दृष्टि आकाश की ओर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास को अन्दर भर कर रखना है (स्थिति-4 की तरह)। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति-10</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति का नाम: पादहस्तासन</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास: श्वास छोड़ते हुए</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एकाग्रता केन्द्र: स्वाधिष्ठानचक्र</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>मन्त्र: ओ३म् सवित्रे नम: </strong></span>अर्थात् हे सृष्टिकर्ता! आपको नमस्कार है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति-9 के बाद श्वास बाहर निकाल कर हाथों को पीछे से सामने झुकाते हुए पैरों के पास जमीन पर टिका दें। यदि हो सके तो हथेलियों को भी पंजों के दायें-बायें भूमि से स्पर्श करके रखें तथा सिर को घुटनों से लगाने का प्रयास करें। ध्यान रहे कि किसी भी स्थिति में घुटने न मुड़ें (स्थिति-2 की तरह)। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति-11</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति का नाम: ऊर्ध्वहस्तासन/हस्तोत्तानासन</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास: श्वास लेते हुए</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एकाग्रता केन्द्र: विशुद्धिचक्र</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>मन्त्र: ओ३म् अर्काय नम:</strong> </span>अर्थात् हे अपवित्रता के शोधक! आपको नमस्कार है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास अन्दर भरकर सामने से हाथों को खोलते हुए बिना कोहनियाँ मोड़े पीछे की ओर ले जायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिर हाथों के बीच में स्थित रहेगा। श्वास रोककर दृष्टि आकाश की ओर रखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कमर को भी यथा शक्ति पीछे की ओर झुकायें (स्थिति-2 की तरह)।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति-12</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति का नाम: प्रणामासन</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास: प्रश्वास सामान्य</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एकाग्रता केन्द्र: अनाहतचक्र</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">मन्त्र: ओ३म् भास्कराय नम:</span> </strong>अर्थात् हे ज्ञान- दाता! आपको </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नमस्कार है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्याभिमुख सावधान की स्थिति में लौटते हुए (एड़ी पंजे मिले हुए हों) नमस्कार की स्थिति में हाथों को छाती के सामने रखें। श्वास की गति सामान्य रखेंगे (स्थिति-1 की तरह)।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य-नमस्कार के लाभ</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य-नमस्कार एक पूर्ण व्यायाम है। इससे शरीर के सभी अङ्ग-प्रत्यङ्ग बलिष्ठ एवं निरोगी हो जाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पेट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आन्त्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आमाशय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्न्याशय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय एवं फेफड़े स्वस्थ रखते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मेरुदण्ड एवं कमर को लचीला बनाकर इनमें आयी हुई विकृतियों को दूर करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह सम्पूर्ण शरीर में रक्त संचरण अच्छी तरह से सम्पन्न करता है। इससे रक्त में आयी हुई अशुद्धियाँ दूर होकर चर्म रोगों का नाश होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पूर्ण शरीर को आरोग्य प्रदान करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: प्रात: शीघ्र उठकर सूर्य-नमस्कार का अभ्यास अवश्य करना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य की किरणें त्वचा पर पड़ने से हमारे शरीर में विटामिन </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">डी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का निर्माण होता है। यह विटामिन कैल्शियम व फॉस्फोरस जैसे अति आवश्यक खनिज लवणों को शरीर के लिए अतीव उपयोगी बनाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके कारण शरीर की हड्डियाँ मजबूत हो जाती हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आमाशय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आन्त्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कलेजा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुर्दा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फेफड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पित्ताशय तथा मेरुदण्ड निरोगी बनते हैं। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह अन्त:स्रावी ग्रन्थियों में धीरे-धीरे अच्छा प्रभाव डालता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रात:कालीन सूर्य की रोशनी का भरपूर उपयोग करने से तनाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थकान व उदासीनता निर्मूल हो जाते हैं। मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मस्तिष्क एवं शरीर तरोताजा </span><span lang="hi" xml:lang="hi">रहते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तुत: सूर्य-नमस्कार की विविध प्रक्रियाओं द्वारा हमारे मनीषियों का हमें प्राकृतिक नियमों के साथ साहचर्य बनाते हुए आरोग्यमय जीवन जीने का अद्भुत सन्देश है। तो क्यों न हम इसे आत्मसात करें और सदा निरोगी रहें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3087/12-situations-of-surya-namaskar-to-be-done-in-daily-life</link>
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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2015 21:43:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दो दशक में 80 करोड़ लोगों तक पहुँची  पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज की योग यात्रा</title>
                                    <description><![CDATA[<p><br /></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3088/yoga-journey-of-revered-yogarishi-swami-ramdev-ji-maharaj-reached-80-crore-people-in-two-decades"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/481.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  यो</span><span lang="hi" xml:lang="hi">गऋषि स्वामी जी महाराज पिछले 20 वर्षों में योग-प्राणायाम को जन-जन की जीवन शैली से जोड़ने की दिशा में</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रयत्नशील हैं। इस निमित्त उन्होंने 20 लाख किलोमीटर की योगयात्रा की और 80 करोड़ से अधिक लोगों को योग समझाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिखाया एवं योग केप्रति जागरूकता पैदा की। उन्होंने योग को साधकों की गुफाओं से निकाल कर हर घर-आंगन तकपहुँचा दिया। पतंजलि योगपीठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार द्वारा प्रशिक्षित दो लाख योग प्रशिक्षुओं द्वारा आज देश भर में नित्य हजारों योग शिविर आयोजन हो रहे हैं। यही नहीं योगाभ्यास द्वारा हर योग साधकजीवन में सकारात्मक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुणात्मक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रचनात्मक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">परिवर्तन अनुभव कर रहा है।</span></h5><p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/1341.jpg" alt="134" width="900" height="643"></img></span></p><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प</span><span lang="hi" xml:lang="hi">रम पूज्य स्वामी जी महाराज के वैश्विक यौगिक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ को देखकर ही जून </span>2007<span lang="hi" xml:lang="hi"> में यू.एन.ओ. महासचिव ने उन्हें आमंत्रित करकेविश्व को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">गरीबी मुक्त</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">बनाने का </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ब्राँड एम्बेसडर</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">नियुक्त किया था और इसी योग परक जन आंदोलन के लिए पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज को न्यूयॉर्क के</span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्टैण्ड-अप कार्यक्रम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">में सम्मानित भी किया गया।</span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ज ईरान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेलारूस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जापान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इंग्लैंड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रूस से लेकर अनेक देश जिसमें इस्लामिक देश भी शामिल हैं पूज्य स्वामी जी के योग-प्राणायाम एवं पतंजलि योगपीठ के आंदोलन से न केवल अपने-अपने देशवासियों को जोड़ना चाह रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु अपने-अपने देश में पतंजलि योगपीठ जैसे योग केंद्र स्थापित करने के प्रति अभिरुचि दिखा रहे हैं।</span></h5><p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/169.jpg" alt="169" width="900" height="675"></img></span></p><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">रत देश के अंदर भी केंद्र सरकार से लेकर विभिन्न राज्य सरकारें व अनेक निजी संस्थान पूज्य स्वामी जी के योग आंदोलन को अपने राज्य व लोक हित मेें नियोजित करने का प्रयास कर रहे हैं। दो वर्षों से इंडिया टुडे पत्रिका से लेकर देश की अन्य शीर्ष पत्रिकाओं द्वारा पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज की योग आंदोलन के कारण बढ़ी लोकप्रियता से देश केसबसे श्रेष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्तिशाली व प्रतिभाशाली पचास लोगों की सूची में सम्मिलित किया जा रहा है। अभी हरियाणा सरकार श्रद्धेय स्वामी जी को हरियाणा प्रान्त का </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग एवं आयुर्वेद</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का ब्राँड एम्बेसडर</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">बनाया। जो उस योगी के योग का ही एक हिस्सा है। वस्तुत: जिस मूल स्रोत से योगऋषि का यह दिव्य आंदोलन प्रस्फुटित हो रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह पतंजलि योगपीठ एक  ऐसा सामाजिक एवं आध्यात्मिक संस्थान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने विश्व पटल पर योग को जीवनशैली के रूप में पुनर्जीवित किया है। यह संस्था योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैदिक शिक्षा और आदर्श ग्राम निर्माण जैसे प्रकल्पों के माध्यम से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्तिको स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निरोगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निरामय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विवेकशील एवं आत्मनिर्भर बनाने के प्रति सजगता से कार्य कर रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके विभिन्न प्रकल्पों से प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप में एक लाख लोग रोजगार प्राप्त कर रहे हैं।</span></h5><p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/158.jpg" alt="158" width="900" height="600"></img></span></p><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">व</span><span lang="hi" xml:lang="hi">र्तमान समय में योग को करोड़ों लोगों तक ले जाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग के भौतिक प्रभावों को वैज्ञानिक ढंग से सारी दुनियाँ के सामने रखने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग की विभिन्न प्रायोगिक क्रियाओं को सरल रूप में लाने वाले योगर्षि स्वामी रामदेव जी महाराज के संकल्प से अब तक पतंजलि अपने पांच शरीर धारण कर चुका है। </span></h5><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वे मुख्यत: पाँच संगठनों के रूप में प्रत्यक्ष है जिनमें दिव्य योग मन्दिर (ट्रस्ट)</span>,  <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ (ट्रस्ट)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत स्वाभिमान (ट्रस्ट)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि रिसर्च फाउण्डेशन (ट्रस्ट) व पतंजलि ग्रामोद्योग (ट्रस्ट)।</span></h5><p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/1411.jpg" alt="141" width="900" height="600"></img></span></p><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इनके आनुषाङ्गिक संगठनों से जुड़े हुए लाखों योग-शिक्षकों व कार्यकर्त्ताओं के माध्यम से भारत के सम्पूर्ण 29 राज्यों</span>, 640<span lang="hi" xml:lang="hi"> जिलों</span>, ५७67<span lang="hi" xml:lang="hi"> तहसीलों</span>, 7933<span lang="hi" xml:lang="hi"> कस्बों व छह लाख से अधिक गाँवों में तथा दुनियां के अनेक छोटे-बड़े देशों में योग की दिव्य ज्योति जागृति हो रही है।</span></h5><p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/641.jpg" alt="64" width="900" height="678"></img></span></p><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">रतवर्ष के इतिहास में एक व्यक्ति के द्वारा इतनी अधिक संख्या में लोगों को योग की महत्ता का दर्शन कराते हुए इस ओर अग्रसरित कराने का श्रेय एकमात्र योगर्षि स्वामी रामदेव जी महाराज को जाता है।</span></h5><p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/632.jpg" alt="63" width="900" height="589"></img></span></p><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन्हीं की संकल्पना एवं भारत के वर्तमान यशस्वी माननीय प्रधानमन्त्री श्रीमान् नरेन्द्र भाई मोदी जी की आध्यात्मिक निष्ठा व वैश्विक नेतृत्व में १७७ देशों के अनुमोदन के साथ पूरा विश्व 21 जून को अन्तर्राष्ट्रीय योग-दिवस मना रहा है। जो सम्पूर्ण भारत ही नहीं विश्व मानवता के लिए सुखद क्षण कहे जायेंगे। इससे योग को नया गौरव मिलेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही योग के इतिहास के क्षेत्र में भी एक नए युग का प्रारम्भ हो जायेगा। पूज्य स्वामी जी महाराज के विश्वनिर्माण स्वप्न का यह प्रारम्भिक चरण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो भविष्य में विराट स्वरूप में साकार होगा।</span></h5><p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/170.jpg" alt="170" width="900" height="775"></img></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3088/yoga-journey-of-revered-yogarishi-swami-ramdev-ji-maharaj-reached-80-crore-people-in-two-decades</link>
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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2015 21:40:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वैश्विक स्तर पर योग आंदोलन को लेकर पतंजलि योगपीठ की 'भावी योजनायें’</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">        पूज्य</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज ने स्वदेश के अन्दर ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु पूरे विश्व में पतंजलि योगपीठ के अन्तर्राष्ट्रिय संगठनों तथा उनसे आबद्ध प्राणवान् योग-शिक्षकों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग-प्रेमियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टी.वी. चैनल्स् व सोशल मीडिया आदि के माध्यम से योग की शाश्वत परम्परा को फैलाया। करोड़ों लोगों को रोग व शोक से मुक्त कर योग से जोड़ा। उन्होंने योग को समग्र चिकित्सा-पद्धति एवं जीवन-पद्धति के रूप में स्थापित करके सर्वप्रथम प्राणायाम का व्यापक तौर पर अभ्यास करवाया और उससे देश व दुनियाँ के करोड़ों लोग सीधे तौर पर लाभान्वित हुए। पूरा विश्व योगमय हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके लिए योगर्षि स्वामी जी</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3089/patanjali-yogpeeth-s--future-plans--regarding-yoga-movement-at-global-level"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/173.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    पूज्य</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज ने स्वदेश के अन्दर ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु पूरे विश्व में पतंजलि योगपीठ के अन्तर्राष्ट्रिय संगठनों तथा उनसे आबद्ध प्राणवान् योग-शिक्षकों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग-प्रेमियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टी.वी. चैनल्स् व सोशल मीडिया आदि के माध्यम से योग की शाश्वत परम्परा को फैलाया। करोड़ों लोगों को रोग व शोक से मुक्त कर योग से जोड़ा। उन्होंने योग को समग्र चिकित्सा-पद्धति एवं जीवन-पद्धति के रूप में स्थापित करके सर्वप्रथम प्राणायाम का व्यापक तौर पर अभ्यास करवाया और उससे देश व दुनियाँ के करोड़ों लोग सीधे तौर पर लाभान्वित हुए। पूरा विश्व योगमय हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके लिए योगर्षि स्वामी जी आज भी अथक अविरल पुरुषार्थरत हैं और योग की समग्र ऋषि-परम्परा से राष्ट्र व विश्व को जोड़ रहे हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   वे</span><span lang="hi" xml:lang="hi">द एवं वैदिक आर्ष-साहित्य पर आधारित ऋषियों की मूल योग की परम्परा का स्वामी जी प्रचार-प्रसार करते हुए जहां स्वयं योगमय जीवन जी रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं करोड़ों लोगों से युक्त विश्व को योगमय बनाने जैसे ईश्वरीय कार्य हेतु अखण्ड पुरुषार्थरत हैं। वेद व योग पर आधारित व्यक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र व विश्व का निर्माण उनका एक बड़ा आध्यात्मिक ध्येय है। योग की व्यक्तिगत ब्रांडिंग से दूर रहकर पूज्य स्वामी रामदेव जी ऋषियों को ही योग का श्रेय देते हैं।  </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    अपनी विलक्षण प्रतिभा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रप्रेम और ऋषि-संस्कृतिनिष्ठ संकल्प के साथ स्वामी जी ने हरिद्वार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तराखण्ड (भारत) में योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यात्म और वैदिक विज्ञान पर आधारित बृहत् अनुसन्धान एवं चिकित्सा संस्थान </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की स्थापना की। इनमें प्रति वर्ष लाखों रोगी आयुर्वेदिक एवं यौगिक चिकित्सा से लाभ उठाते हैं। हजारों व्यक्तियों के एक साथ आवासीय योग प्रशिक्षण की व्यवस्था भी यहाँ पर है। यहाँ योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद सहित प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों पर विश्वस्तरीय शोध-अनुसन्धान का कार्य किया जा रहा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   हिरण्यगर्भ प्रणीत योग ने आज अत्याधुनिक विज्ञान का रूप ले लिया है। चाहे जीवन प्रबन्धन के क्षेत्र हों या औद्योगिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशासनिक या चिकित्सा क्षेत्र सभी में योग को अत्यन्त प्रभावी साधन के रूप में सम्मान स्थान दिया जा रहा है। अपनी-अपनी रुचि एवं आवश्यकता के अनुसार धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काम व मोक्ष की प्राप्ति के लिए लोग योग को व्यापक रूप में अपनाने लगे हैं। इससे योग के इतिहास में नये परिवर्तन की सम्भावनाएँ दृष्टिगोचर हुई।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   पतंजलि योगपीठ द्वारा चलाया योग-आंदोलन अब वैश्विक रूप ले चुका है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उससे समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र्र व विश्व की अपेक्षायें भी बढ़ेंगी ही। वह अब योग को केवल स्वास्थ्य व रोग ठीक करने के यंत्र रूप में ही नहीं देखना चाहता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु उसके माध्यम से वह सब कुछ सम्भव बना लेना चाहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अभी तक उसे असंभव लग रहा था। यथा वह चाहता है कि अब योग उसकी जीवनशैली को तो सुधारे ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन एवं सत्ता-व्यवस्था गत गतिविधियों की पूर्ति में आने वाली खामियों को भी वह दूर करे। वह नौनिहालों एवं युवाओं में आत्मविश्वास जगाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही देश की शिक्षा व्यवस्था को भी चुस्त-दुरुस्त करने में योगदान दे। वह ज्ञानतंत्र की अवधारणा बदले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उस ज्ञान में ऐसे कान्सेप्ट का समावेश करे कि व्यवस्था परिवर्तन का मार्ग स्वत: प्रशस्त हो उठे। अर्थात् देश के लाखों-करोड़ों नर-नारियों की आकांक्षा है कि योग देश के सिस्टम में प्रवेश करके उसका हिस्सा भी बने और उस सिस्टम की खामियों को भी दूर करे। योग समाज में व्याप्त अनेक बुराइयों एवं ओछी दीवारों को मिटाये तथा नेकता एवं एकत्व का मार्ग भी प्रशस्त करे। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ ने उक्त दृष्टि कोण को ध्यान में रखकर योग को लेकर भावी योजनायें तैयार की हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी क्रम में पतंजलि योगपीठ द्वारा प्रथम चरण में प्रशिक्षित </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> लाख योग शिक्षकों को विश्वभर में कार्य करने हेतु निर्देशित कर दिया गया है। साथ ही संस्थान द्वारा प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए लाखों भाई-बहनों को सम्पूर्ण विश्व में योग के इस विराट यौगिक अभियान  में जन भागीदारी करवाने हेतु भी निर्देशित किया गया है। साथ ही पतंजलि योगपीठ ने जनसमाज से अपेक्षा की है कि वह योग को जीवन का अंग बनाकर अपने दायित्व निभाये तथा राष्ट्र व विश्व निमार्ण में भागीदार बनें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी पतंजलि योगपीठ की भावी योजनाओं को समझने के लिए पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज के इस संकल्प वाक्य को आत्मसात करना आवश्यक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे उन्होंने राष्ट्रीय कार्यकारिणी की एक बैठक  में जनमानस को प्ररित करने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग दिवस एवं योग के प्रति महत्ता बताने हेतु शहर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कस्बा से लेकर गांव स्तर तक टोलियां बनाकर अभियान चलाने एवं देश-विदेश में एक लाख 11 हजार योग शिविर एक साथ लगाने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा था कि<strong> </strong></span><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अपना देश भारत विश्व में एक नवीन संकल्प युक्त राष्ट्र के रूप में उदित हो तथा पुन: दुनियां के सामने विश्वगुरू के रूप में प्रतिष्ठित हो यही हमारा स्वप्न है। इसकी पूर्ति हेतु योग दिवस के निमित्त लगने वाली योग की कक्षायें भविष्य के लिए हमारी शक्ति पीठें बनेंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां से विश्वनिर्माण के निमित्त गतिविधियों का संचालन होगा।</span>‘</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यही नहीं लार्ड मैकाले ने देश की 700 से ज्यादा गुरूकुलों की कमर ही तोड़ दी थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमें पुन: उस परम्परा को स्थापित करना है। क्योंकि शिक्षा ही वह आधार है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो भारत को विश्वगुरू बनायेगा। इसलिए योग दिवस की सफलता के साथ ही हमारा अगला कदम देश में शिक्षा क्रान्ति लाना होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही क्रान्ति देश में सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन का आधार बनेगी। इस निमित्त हर जिले में एक आचार्यकुलम स्थापित करने की योजना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस आचार्यकुलम से ही जिले-जिले में योगपीठ का सृजन हो जायेगा। यहीं से देशव्यापी ऋषि प्रणीत संगठन एवं संस्कारों का क्रियान्वयन होगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अभियान के निमित्त कार्ययोजनायें:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अभियान के तहत सोशल मीडिया से लेकर आचार्यकुलम व कन्या गुरूकुलम तक का विस्तार करना प्रमुख है। साथ ही प्रत्येक कार्यकर्ता जीवन में महापुरुषों के आचरणों का आलम्बन लेते हुए कण और क्षण को हर जीवन में स्थापित करने के संकल्प से अपने को जोड़ते हुए पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज के संकल्प से पतंजलि योगपीठ द्वारा संचालित निम्नलिखित भावी योजनाओं के प्रति बढ़ चढ़ कर हिस्सेदार बनाना है। वास्तव में परमात्मा द्वारा संकल्पित इस आंदोलन को पूरा करने का ठीक यही समय है जिसके लिए पतंजलि योगपीठ की ये भावी योजनायें हमारी बाट जोह रही हैं: </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1. <span lang="hi" xml:lang="hi">योग के कार्य को विस्तार देने हेतु सम्पूर्ण भारत एवं विश्व स्तर पर एक लाख से सवा लाख योग कक्षाओं का संचालन करना।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">2. <span lang="hi" xml:lang="hi">हरियाणा के प्रत्येक गांव एवं वार्ड में अर्थात् प्रांत भर में </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>11<span lang="hi" xml:lang="hi"> हजार योग-व्यायाम शालाओं की स्थापना करना।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">3. <span lang="hi" xml:lang="hi">योग को शैक्षिक पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने के लिए मिशन स्तर का अभियान चलाना।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">4.  <span lang="hi" xml:lang="hi">योग को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">5. <span lang="hi" xml:lang="hi">योग को सिस्टम अर्थात समग्र तंत्र के अनुकूलन का हिस्सा बनाना जिसमें स्वास्थ्य तंत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षातंत्र</span>,  <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रबंधन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इंजीनियरिंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनीति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवनकला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यात्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानविकी आदि प्रत्येक क्षेत्र शामिल हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">6. <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा परिवर्तन से व्यवस्था परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करना।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">7.  <span lang="hi" xml:lang="hi">इस वर्ष </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi"> जून</span>, 2015<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>20<span lang="hi" xml:lang="hi"> जून</span>, 2016<span lang="hi" xml:lang="hi"> तक एक वर्ष के इस काल खण्ड में मोटापा-डायबिटिज आदि रोगों के रोकथाम हेतु  विशेष अनुसंधान परक योग शिविरों का आयोजन करना।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">8.   योग द्वारा एकाग्रता एवं एकत्व के साथ सम्पूर्ण कार्य योजना को इस तरह गति देना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे समाज मेें व्याप्त सभी प्रकार की दीवारें टूट सकें एवं समत्व का मार्ग प्रशस्त हो। इन दीवारों में भाषा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्प्रदाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रांत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंधविश्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूढ़ मान्यतायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुप्रथाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नर-नारी में भेद आदि संबंधी कैसी भी क्यों न हों। इनके ढहने से राष्ट्र में समता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन मूल्य परक व्यवस्था का निर्माण होगा। इस प्रकार देश एवं विश्व में स्वस्थ शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वच्छ मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभ्य समाज एवं दिव्य सशक्त राष्ट्र के विकास का आंदोलन शसक्त होगा और तभी विश्वनिर्माण की पृष्ठभूमि भी तैयार होगी। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र-चिंतन</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2015 21:38:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दैनिक जीवन में किये जाने वाले पारम्परिक 12 दंड और 8 बैठक</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">      <strong> भारतवर्ष</strong></span><strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">के मनीषियों द्वारा प्रदत्त </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">दण्ड और बैठक</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर को स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुन्दर व आकर्षक बनाने की सुनियोजित पारम्परिक व्यायाम पद्धति है। दण्ड से सम्पूर्ण शरीर एवं मन प्रभावित होकर पुष्ट और सन्तुलित बनता है एवं बैठकों से व्यक्तित्व में सुदृढ़ता आती है। विशेषकर पैर सम्बन्धी सभी विकार और रोग ठीक होते हैं। इसीलिए रोजमर्रा की दिनचर्या में सम्मिलित ये व्यायाम व्यक्ति को स्फूर्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताजगी और निरोगता प्रदान करने वाले कहे गये हैं। लेख के माध्यम से आइये समझें इनकी क्रियाविधि-</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पारम्परिक 12 दण्डासन:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दण्डासन विधि-1: साधारण दण्ड</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:</strong> पैरों के पंजों और हथेलियों के सहारे नितम्बों</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3090/traditional-12-punishments-and-8-meetings-done-in-daily-life"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/slide1.1.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   <strong> भारतवर्ष</strong></span><strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">के मनीषियों द्वारा प्रदत्त </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">दण्ड और बैठक</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर को स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुन्दर व आकर्षक बनाने की सुनियोजित पारम्परिक व्यायाम पद्धति है। दण्ड से सम्पूर्ण शरीर एवं मन प्रभावित होकर पुष्ट और सन्तुलित बनता है एवं बैठकों से व्यक्तित्व में सुदृढ़ता आती है। विशेषकर पैर सम्बन्धी सभी विकार और रोग ठीक होते हैं। इसीलिए रोजमर्रा की दिनचर्या में सम्मिलित ये व्यायाम व्यक्ति को स्फूर्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताजगी और निरोगता प्रदान करने वाले कहे गये हैं। लेख के माध्यम से आइये समझें इनकी क्रियाविधि-</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पारम्परिक 12 दण्डासन:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दण्डासन विधि-1: साधारण दण्ड</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:</strong> पैरों के पंजों और हथेलियों के सहारे नितम्बों को ऊपर उठाकर दृष्टि सामने रखना दण्ड स्थिति है। फिर कोहनियाँ मोड़कर श्वास लेते हुए हथेलियों व पैर के पंजों पर नीचे दण्ड के समान सीधा हो जाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तत्पश्चात् सर्प की भाँति सिर व छाती को उठायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर श्वास छोड़कर नितम्बों को ऊपर उठाते हुए प्रारम्भिक अवस्था में वापिस आयें। इसे <strong>साधारण दण्ड</strong> भी कहते हैं।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/slide1.1.jpg" alt="Slide1.1" width="1280" height="720"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दण्डासन विधि-2: राममूर्तिदण्ड</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:</strong> दण्डस्थिति (पर्वतासन) से श्वास भरते हुए कोहनियाँ इस प्रकार मोड़ें कि वे पसलियों से लगी रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छाती को धीरे-धीरे नीचे की तरफ  लायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर सर्प की भाँति सिर व छाती को ऊपर उठायें। तत्पश्चात् पंजों और हथेलियों के सहारे श्वास छोड़ते हुए ठीक पूर्व की भाँति ही दण्डस्थिति में वापिस आ जायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह एक आवृत्ति हुई। इसे <strong>राममूर्ति दण्ड</strong> कहते हैं।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/slide2.jpg" alt="Slide2" width="631" height="682"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दण्डासन विधि-3: वक्षविकासकदण्ड</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि</strong>: इसे वक्ष विकास दण्ड भी कहते हैं। दण्डस्थिति में हथेलियों को अन्दर की ओर मोड़कर अर्थात् कन्धों के नीचे अंगुलियाँ एक दूसरे के सामने रखते हुए कमर झुकाकर शरीर को सीधा करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दृष्टि सामने रखकर श्वास छोड़ते हुए कोहनियों को बाहर की ओर मोड़ते हुये नीचे तथा श्वास लेते हुए कोहनियों को सीधा करते हुए ऊपर उठें।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/slide3.jpg" alt="Slide3" width="684" height="686"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दण्डासन विधि-4: हनुमान दण्ड</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:</strong> दण्डस्थिति में श्वास छोड़ते हुए एक पैर के पंजे को उसी हाथ के बगल में बाहर रखकर हथेलियों पर शरीर का भार देते हुए नीचे जायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आगे से अपने सिर व छाती को भुजंगासन की तरह उठायें (नितम्ब अधिक से अधिक नीचे ही रहें</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु जमीन को न छुयें)। फिर पंजे को श्वास लेते हुए प्रारम्भिक दण्डस्थिति में वापिस ले जायें। ठीक यही क्रिया दूसरी तरफ  से करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बारी-बारी से बिना रुके इस क्रिया को वेगात्मक रूप से करते रहें। इसमें <strong>हनुमान दण्ड</strong> की स्थिति बनती है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/slide4.jpg" alt="Slide4" width="707" height="674"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दण्डासन विधि-5: वृश्चिकदण्ड (क)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि</strong>: दण्डस्थिति में आकर श्वास लेते हुए एक पैर को बिना घुटना मोड़े आकाश की ओर उठाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोहनियाँ मोड़कर छाती को नीचे लायें (शरीर का पूरा भार दोनों हथेलियों और दूसरे पैर के पंजे पर स्थिर रहेगा) फिर उठे हुए पैर को वापस जमीन पर लाने के बाद दृष्टि सामने की ओर रखते हुए सिर व छाती को भुजंगासन की तरह उठायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर श्वास छोड़कर नितम्ब ऊपर उठाते हुए प्रारम्भिक दण्डस्थिति में वापिस आयें। दूसरे पैर से भी ठीक इसी प्रकार वेगात्मक रूप से क्रिया दोहरायें।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/slide5.jpg" alt="Slide5" width="1280" height="720"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दण्डासन विधि-6: वृश्चिकदण्ड (ख)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि: </strong>दण्डस्थिति में होकर श्वास भरते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक पैर को बिना घुटना मोड़े आकाश की ओर सीधा करके आगे से कोहनियों को मोड़कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वक्षस्थल को अधिक से अधिक नीचे ले जायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर ऊपर उठे हुये पैर के पंजे को घुटना मोड़ते हुये विपरीत कमर की तरफ  जमीन पर रखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर मुड़े हुए पैर को वापिस ले जाकर हथेलियों पर भुजंगासन लगायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर श्वास छोड़ते हुए प्रारम्भिक दण्डस्थिति की ओर वापस लौटें।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/slide6.jpg" alt="Slide6" width="862" height="697"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दण्डासन विधि-7: पार्श्वदण्ड</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:</strong> दण्डस्थिति में श्वास भरते हुए एक पैर को उदर के नीचे से कलाइयों के पास से विपरीत ओर सीधा करके फैलायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आगे से दोनों कोहनियों को मोड़कर वक्ष को नीचे लायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर इसी स्थिति में हथेलियों पर सिर व छाती को भुजघौासन की तरह ऊपर उठायें। फिर श्वास छोड़कर मुड़े हुए पैर को वापिस लायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रारम्भिक दण्ड स्थिति में आकर पुन: दूसरे पैर से अभ्यास करें।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/slide7.jpg" alt="Slide7" width="1280" height="720"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दण्डासन विधि-8: चक्रदण्ड</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि: </strong>दोनों हथेलियों को जमीन पर रखकर दोनों हाथों के बीच में एक पैर के घुटने को मोड़कर उसके पंजे पर बैठें तथा दूसरे पैर को बराबर में सीधा करके फैलाकर रखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर श्वास लेकर फैले हुए पैर को सामने से लाकर (दोनों हाथों को बारी-बारी से उठाते हुए) चक्र की भाँति घुमाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उछलते हुए दोनों पैरों को पीछे एक साथ रखकर हथेलियों व पंजों पर दण्ड के समान शरीर सीधा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर हथेलियों पर भुजंगासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तत्पश्चात् श्वास छोड़ते</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हुए उछलकर दूसरे पैर पर प्रारम्भिक दण्डस्थिति के समान बैठकर क्रिया दोहरायें।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/slide8.jpg" alt="Slide8" width="1280" height="720"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दण्डासन विधि-9: पलटदण्ड</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:</strong> दण्डासन में स्थित होकर पहले एक बार श्वासों के साथ साधारण दण्ड लगायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर श्वास लेते हुए दोनों पैरों को एक साथ वेगात्मक रूप से उछालकर हाथों के बीच से उठाकर निकालते हुए अधिक से अधिक आगे की ओर लायें</span>, (<span lang="hi" xml:lang="hi">पेट व वक्ष का हिस्सा ऊपर की ओर खिंचा हुआ रहेगा)। तत्पश्चात् श्वास छोड़ते हुए बिना रुके दोनों पैरों को हाथों के मध्य से उठाकर निकालते हुए पूर्व की स्थिति में लाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हथेलियों व पंजों पर दण्ड के समान सीधा होकर सामने से ऊपर उठते हुए भुजंगासन लगायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर वापिस दण्ड स्थिति में आये।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/slide9---copy.jpg" alt="Slide9 - Copy" width="1280" height="720"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दण्डासन विधि-10: शेरदण्ड</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि</strong>: दोनों हथेलियों को जमीन पर रखकर पंजों के बल बैठें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घुटने कोहनियों के बाहर की ओर हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दृष्टि सामने रखकर दोनों पैरों को श्वास भरकर एक साथ उछालते हुए आसमान की ओर ले जाकर सीधा करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों हथेलियों पर पूरे शरीर के भार का सन्तुलन बनाते हुए</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">पुन: धीरे-धीरे कोहनियाँ मोड़ते हुए पैरों को नीचे लाकर हथेलियों पर भुजघौासन बनायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर श्वास छोड़ते हुए दोनों पैर को उछालकर प्रारम्भिक स्थिति में वापिस आये।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/slide10.jpg" alt="Slide10" width="810" height="688"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दण्डासन विधि-11: सर्पदण्ड</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:</strong>दण्ड स्थिति से कोहनियाँ मोड़कर हथेलियों व पंजों पर शरीर को दण्डवत् सीधा करने के पश्चात् सर्प की भाँति तीन बार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास लेते-छोड़ते हुए कोहनियों को इस प्रकार सीधा करें व मोड़ें कि सिर्फ  वक्ष:स्थल ही ऊपर-नीचे हो सके (नितम्ब नीचे रहेंगे) फिर दण्डस्थिति में वापिस आयें।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/slide11.jpg" alt="Slide11" width="1280" height="720"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दण्डासन विधि-12: मिश्रदण्ड</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि</strong>: पंजों व हथेलियों के सहारे बैठकर (ध्यान रहे कोहनियाँ घुटने के अन्दर रहे) फिर श्वास लेते हुए पैरों को उछलकर पीछे ले जाकर गत्यात्मक रूप में कोहनियों के सहारे छाती को नीचे करने के बाद भुजंगासन की भाँति थोड़ा ऊपर लायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तत्पश्चात् श्वास छोड़कर उछलते हुए दोनों पैरों को प्रारम्भिक स्थिति में आगे लाकर बैठें। इसी को बिना रुके वेगात्मक रूप से लगातार करना मिश्रदण्ड है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पारम्परिक 8 बैठक:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बैठक-1: साधारण अर्द्धबैठक</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:</strong> दोनों हथेलियों को कमर पर रखकर पैरों में कन्धों जितना फासला करके खड़े होकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास छोड़ते हुए पैरों को घुटनों से मोड़कर आधी बैठक (जैसे की कुर्सी पर बैठते हैं) लगाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर श्वास लेते हुए वापस आना </span><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">साधारण अर्द्ध बैठक</span></strong>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहलाता है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/442.jpg" alt="44" width="900" height="1350"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बैठक-2: साधारण पूर्ण बैठक</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:</strong> सीधा खड़ा होकर श्वास छोड़ते हुए मुखियाँ कसकर बन्द करके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हाथों को जमीन के समानान्तर करते हुए नीचे बैठना (कमर व गर्दन सीधी रखने का प्रयास करें)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर श्वास छोड़ते हुए हाथों को प्रारम्भिक स्थिति में वापिस लाकर खड़े होना </span><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">साधारण पूर्ण बैठक’</span></strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहलाता है। इस क्रिया को श्वास का क्रम ध्यान में रखते हुए वेगात्मक रूप से करना चाहिए।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/192.jpg" alt="19" width="1000" height="1500"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बैठक-3: राममूर्ति बैठक</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि</strong>: सीधा खड़े होकर श्वास छोड़ते हुए (अंगूठा अन्दर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुठीयाँ बन्द) हाथों को जमीन के समान्तर फैलाना (श्वास रुका हुआ)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धीरे-धीरे पंजों के बल नीचे जाना तत्पश्चात् श्वास भरते हुए धीरे-धीरे हाथों को वापस लाते हुए सीधे खड़े हो जाना </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">राममूर्ति बैठक’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहलाता है। इस क्रिया को भी वेगात्मक रूप से करना चाहिए।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/202.jpg" alt="20" width="900" height="1350"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बैठक-4: पहलवान बैठक (1)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:</strong> सीधे खड़े होकर श्वास छोड़ते हुए सामने की ओर 2-3 फीट दूर तक उछलकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुठीयाँ बन्द हाथों को जमीन के समानान्तर करते हुए बैठना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर श्वास भरते हुए प्रारम्भिक स्थिति में उछलकर वापिस आकर खड़ा होना </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पहलवान बैठक (1)’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहलाता है। इस क्रिया का बारम्बार वेगात्मक रूप से अभ्यास करना चाहिए।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/192.jpg" alt="19" width="1000" height="1500"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बैठक-5: पहलवान बैठक (2)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:</strong> श्वास भरकर हाथों को हिलाते हुए पैरों को घुटनों से मोड़कर पंजों पर एक ही स्थान पर वेगात्मक रूप से तीन बार उछलने का अभ्यास करना चाहिए। फिर श्वास लेते हुए प्रारम्भिक स्थिति में वापिस खड़े हो जाना चाहिए। इस प्रकार की जाने वाली क्रिया </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पहलवान बैठक (2)’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहलाती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बैठक-6: हनुमान् बैठक (1)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:</strong> दोनों पैरों में अधिक से अधिक अन्तर करके खड़े होकर दोनों हाथ सामने जमीन के समानान्तर फैलायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर श्वास छोड़ते हुए एक ओर घुटना मोड़कर उसी पैर के पञ्जे पर कमर सीधी रखते हुए बैठें (नितम्ब एड़ी से लग जायेंगे)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर श्वास लेते हुए मध्य में आयें। दूसरी ओर से भी इस क्रिया को वेगात्मक रूप से करें। इस प्रकार की क्रिया </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">हनुमान् बैठक-(1)’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहलाती है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/432.jpg" alt="43" width="900" height="600"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बैठक-7: हनुमान् बैठक (2)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:</strong> पैरों में अधिक से अधिक फासला रखते हुए दोनों हथेलियों को कमर पर रखकर सीधे खड़े हो जायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तत्पश्चात् एक तरफ के पञ्जे की ओर शरीर को घुमाकर श्वास छोड़ते हुए उस ओर का घुटना मोड़कर पञ्जे पर बैठे (कमर को अधिक से अधिक सीधा रखने का प्रयास करें तथा पीछे वाले पैर का घुटना सीधा व पमजा खड़ा रहेगा)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर श्वास लेते हुए वापिस आयें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार दूसरी तरफ से करें। उपर्युक्त विधि से की जाने वाली क्रिया </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">हनुमान् बैठक (2)</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहलाती है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/403.jpg" alt="40" width="900" height="600"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बैठक-8: हनुमान् बैठक (3)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विधि:</strong> दोनों पैरों में यथासम्भव अधिक से अधिक फासला रखकर खड़े हो जायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर दोनों हाथों के अंगूठे बाहर कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुठीया बन्द करके बगल से हाथों को लाकर अंगूठों को कन्धों पर रखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तत्पश्चात् श्वास छोड़ते हुए एक ओर का घुटना मोड़कर पञ्जे पर कमर को सीधा रखते हुए बैठें (जैसे कि कुल्हें से एड़ी लग जाये)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास भरते हुए मध्य में आयें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस क्रिया को वेगात्मक रूप से बार-बार दोनों तरफ  से करें।</span></h5>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/172.jpg" alt="17" width="1000" height="1500"></img></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उपर्युक्त विधि से की जाने वाली क्रिया </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">हनुमान् बैठक (3)</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहलाती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कभी हर भारतवासी इन दण्ड बैठकों के नित्य अभ्यासी रूप में जाना जाता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर समय के प्रवाह में ये प्रयोग जीवन से दूर होते गये। जरूरत है राष्ट्र को दीनता मुक्त करने के लिए नागरिकों को सुदृढ़ बनाना। अत: दण्ड-बैठकों को नित्य जीवन में स्थान देना ही होगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
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                                            <category>जुलाई</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2015 21:36:59 +0530</pubDate>
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