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                <title>सितम्बर - योग संदेश</title>
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                <description>सितम्बर RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>पतंजलि विश्वविद्यालय में शल्य-तंत्र आधारित तीन दिवसीय ‘सुश्रुतकोन’ सम्मेलन का समापन</title>
                                    <description><![CDATA[<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>हमारा प्रयास ऋषियों की विद्या को जन-जन तक पहुंचाना है: आचार्य बालकृष्ण</strong></h5>
<h5>  </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>पतंजलि अनुसंधान संस्थान ने योग व आयुर्वेद के क्षेत्र में देश का नाम विश्व पटल पर स्थापित किया है : प्रो. मनोरंजन साहू</strong></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>प्राचीन शास्त्र ‘शल्य तंत्र’ एवं आधुनिक शल्य चिकित्सा के समन्वय हेतु वैज्ञानिक अनुसंधान करने की आवश्यकता : प्रो. संजीव शर्मा</strong></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">        पतंजलि विश्वविद्यालय के सभागार में तीन दिवसीय ‘सुश्रुतकोन’ सम्मेलन का समापन पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज, आयुर्वेद शिरोमणि आचार्य बालकृष्ण जी महाराज तथा आयुर्वेद विज्ञान एवं आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के मूर्धन्य विद्वानों की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ। यह सम्मेलन शल्य तंत्र के जनक<br />शल्य</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3604/three-day-sushrutkon-conference-based-on-surgery-concluded-at-patanjali-university"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-03/sushrutkon-conference-at-uo.jpg" alt=""></a><br /><ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>हमारा प्रयास ऋषियों की विद्या को जन-जन तक पहुंचाना है: आचार्य बालकृष्ण</strong></h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>पतंजलि अनुसंधान संस्थान ने योग व आयुर्वेद के क्षेत्र में देश का नाम विश्व पटल पर स्थापित किया है : प्रो. मनोरंजन साहू</strong></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>प्राचीन शास्त्र ‘शल्य तंत्र’ एवं आधुनिक शल्य चिकित्सा के समन्वय हेतु वैज्ञानिक अनुसंधान करने की आवश्यकता : प्रो. संजीव शर्मा</strong></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">    पतंजलि विश्वविद्यालय के सभागार में तीन दिवसीय ‘सुश्रुतकोन’ सम्मेलन का समापन पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज, आयुर्वेद शिरोमणि आचार्य बालकृष्ण जी महाराज तथा आयुर्वेद विज्ञान एवं आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के मूर्धन्य विद्वानों की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ। यह सम्मेलन शल्य तंत्र के जनक महर्षि सुश्रुत की जयंती एवं आचार्य बालकृष्ण जी के जन्मदिवस ‘जड़ी-बूटी दिवस’ के अवसर पर पतंजलि भारतीय आयुर्विज्ञान एवं अनुसंधान संस्थान तथा पतंजलि विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वाधान में पतंजलि रिसर्च फाउण्डेशन, नेशनल सुश्रुत एसोसिएशन, भारत एवं नियोवी लेजर, इजराइल के सहयोग से किया गया। इस अवसर पर पतंजलि विश्वविद्यालय के अध्यक्ष स्वामी रामदेव जी तथा कुलपति आचार्य बालकृष्ण जी ने अतिथि विद्वानों एवं प्रतिभागियों को प्रतीक चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया। सम्मेलन में श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने कहा कि हमारा प्रयास ऋषियों की विद्या को जन-जन तक पहुंचाना है। उन्होंने उपस्थित विद्वानों एवं प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए बताया कि विधा चाहे कोई भी हो, हम सभी का लक्ष्य रोगी को शीघ्रता से स्वास्थ्य लाभ करवाना होना चाहिए। सम्मेलन के मुख्य अतिथि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पद्म भूषण प्रो. मनोरंजन साहू ने आचार्यश्री को जन्मदिवस की शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि पतंजलि अनुसंधान संस्थान ने योग व आयुर्वेद के क्षेत्र में देश का नाम विश्व पटल पर स्थापित किया है। उपस्थित प्रतिभागियों का मार्गदर्शन करते हुए उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में समेकित चिकित्सा पद्धति के विकास के साथ ही शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में गहन अनुसंधान की आवश्यकता है जिसमें पतंजलि का प्रयास निश्चित ही सराहनीय है। डॉ. अनुराग श्रीवास्तव ने शल्य एवं शालाक्य तंत्र की अनुसंधानपरक व्याख्या करते हुए आयुर्वेद की प्राचीन विरासत से सम्मेलन में आए प्रतिभागियों को अवगत कराया। <br />शल्य तंत्र विभाग, पतंजलि आयुर्वेद महाविद्यालय के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष डॉ. सचिन गुप्ता ने सम्मेलन की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए शल्य तंत्र के क्षेत्र में पतंजलि के योगदान की विषद् व्याख्या की। पतंजलि हर्बल रिसर्च डिविजन की प्रमुख- डॉ. वेदप्रिया आर्या ने सम्मेलन में आए विशेषज्ञों का स्वागत करते हुए पतंजलि अनुसंधान संस्थान द्वारा आयुर्वेद के क्षेत्र में किए गए भगीरथ प्रयास पर विस्तार से प्रकाश डाला।<br />इस अवसर पर शल्य चिकित्सा के विद्वान एवं राष्ट्रीय आयुर्वेद मानद विश्वविद्यालय, जयपुर के कुलपति प्रो. संजीव शर्मा ने सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि हम सभी को जनकल्याण के उद्देश्य से प्राचीन शास्त्र ‘शल्य तंत्र’ एवं आधुनिक शल्य चिकित्सा के समन्वय हेतु वैज्ञानिक अनुसंधान करने की आवश्यकता है।<br />पतंजलि विश्वविद्यालय के उप-कुलपति प्रो. महावीर अग्रवाल ने अपने उद्बोधन के क्रम में बताया कि इस सम्मेलन में योग, आयुर्वेद व आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की त्रिवेणी का संगम हो रहा है। पतंजलि आयुर्वेद महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. अनिल कुमार ने अध्यक्षीय उद्बोधन में बोलते हुए कहा कि पूज्य आचार्य जी का सम्पूर्ण जीवन आयुर्वेद द्वारा मानवता के कल्याण हेतु समर्पित है। उपस्थित प्रतिभागियों को उन्होंने पतंजलि आयुर्वेद हॉस्पिटल एवं पतंजलि आयुर्वेद महाविद्यालय की गतिविधियों से भी अवगत कराया। सम्मेलन के तकनीकी सत्र में डॉ. अनुराग श्रीवास्तव ने सामान्य कैंसर की रोकथाम एवं प्रबंधन हेतु आयुर्वेद के सिद्धांतों एवं आधुनिक चिकित्सा के समन्वय विषय पर एवं डॉ. विनोथ फिलिप ने वेरिकोज़ वेन्स के उपचार में लेजर की नवीन तकनीकों पर प्रकाश डाला। सम्मेलन के तीसरे सत्र में डॉ. एम.सी. मिश्रा, डॉ. मनोरंजन साहू, डॉ. शिव जी गुप्ता, डॉ. पी. हेमन्था, डॉ. सचिन गुप्ता, डॉ. संजीव शर्मा, डॉ. अजय गुप्ता द्वारा अपने संबोधन एवं समूह परिचर्चा के माध्यम से उपस्थित प्रतिभागियों का मार्गदर्शन किया गया। सम्मेलन के दूसरे दिन लेजर वैरिकोज वेन, लेप्रोस्कोपिक वैरिकोसेले और प्रोक्टोलॉजी की हाइब्रिड तकनीक विषय पर समानांतर मौखिक पेपर और पोस्टर प्रस्तुति से प्रकाश डाला गया।<br />डॉ. विनोथ फिलिप, डॉ. पी. हेमंथा, डॉ. हेमंत गुप्ता, डॉ. सचिन गुप्ता ने शल्य चिकित्सा का लाईव सत्र प्रस्तुत किया जिसकी अध्यक्षता डॉ. एम.सी. मिश्रा तथा डॉ. मनोरंजन साहू ने की। सर्जिकल प्रक्रियाओं में एकीकृत दृष्टिकोण विषय पर समानांतर मौखिक पेपर और पोस्टर सत्र प्रदर्शित किए गए जिसकी अध्यक्षता डॉ. प्रदीप भारद्वाज तथा डॉ. पी. हेमंथा कुमार ने की। डॉ. एम.सी. मिश्रा ने लैपरो एंडोहर्निया सर्जरी में प्रशिक्षण-एक सतत चुनौती : आगे बढ़ें- देखें, करें, सिखाएं विषय पर प्रकाश डाला। उन्होंने पतंजलि विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों व शोधार्थियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि सर्जरी को एक चुनौति के रूप में लें और सदैव रोगी हित को सर्वोपरि रखें।<br />काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पद्म भूषण डॉ. मनोरंजन साहू ने आयुर्वेद में साक्ष्य आधारित शल्य चिकित्सा प्रक्रिया के विषय में बताते हुए कहा कि आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा प्राचीनकाल से है जिसका जीवंत प्रमाण सुश्रुत संहिता है। महर्षि सुश्रुत को आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा का जनक कहा जाता है। डॉ. मोहित वर्मा ने प्री-ऑपरेटिव कार्डियो-डायबिटिक रिस्क एसेसमेंट विषय से छात्र-छात्राओं को अवगत कराया। उन्होंने बताया कि हृदय रोग में सर्जरी से पहले कई बातों का ध्यान रखना होता है जिसमें मधुमेह मुख्य है।<br />डॉ. शिवजी गुप्ता ने क्षारसूत्र द्वारा गुदा में फिस्टुला के प्रबंधन में क्या करें और क्या न करें विषय पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि फिस्टुला अत्यंत गम्भीर रोग है जिसका प्रामाणिक उपचार आयुर्वेद की शल्य क्रिया ‘क्षारसूत्र’द्वारा सम्भव है। डॉ. अजय गुप्ता ने ‘गुदा फिस्टुला निदान सीमाएँ’ विषय पर विषद् व्याख्या प्रस्तुत की।<br />सम्मेलन के समापन अवसर पर महर्षि सुश्रुत द्वारा प्रणीत ‘शल्य चिकित्सा’ का लाईव सत्र डॉ. पी. हेमंथा एवं डॉ. मोहित वर्मा की अध्यक्षता में डॉ. अजय गुप्ता, डॉ. शिवजी गुप्ता एवं डॉ. सचिन गुप्ता आदि चिकित्सकों द्वारा सम्पन्न हुआ। सभी प्रतिभागियों ने इस सत्र में शल्य चिकित्सा की बारीकियों को विस्तार से सीखा।<br />डॉ. पी. हेमंथा कुमार ने एनोरेक्टल डिसऑर्डर में क्षार कर्म की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि आयुर्वेद की शल्य क्रिया ‘क्षारसूत्र’ एक प्रामाणिक उपचार पद्धति है। वहीं डॉ. अनिल दत्त ने लोकल एनेस्थीसिया की जटिलता विषय पर अपना व्याख्यान दिया। पतंजलि आयुर्वेद महाविद्यालय के प्रोफेसर एवं शल्य चिकित्सा विभाग के अध्यक्ष डॉ. सचिन गुप्ता ने उपरोक्त विषय पर अपनी सारगर्भित प्रस्तुति दी तथा अपना चिकित्सकीय अनुभव उपस्थित प्रतिभागियों से साझा किया। इस सत्र में सर्जिकल प्रक्रिया के समेकित उपागम पर अतिथि चिकित्सकों द्वारा समूह परिचर्चा भी की गई। यथार्थ हॉस्पिटल के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. प्रशान्त शर्मा ने हर्निया सर्जरी विषय पर साक्ष्य आधारित सम्बोधन दिया। उन्होंने सम्मेलन के प्रतिभागियों को बताया कि सदैव रोगी हित को सर्वोपरि रखकर सर्जरी की चुनौती को हमें स्वीकार करना चाहिए।<br />समापन सत्र में पतंजलि विश्वविद्यालय एवं पतंजलि आयुर्वेद महाविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों एवं सम्मेलन के आयोजकों द्वारा अतिथि विद्वानों एवं प्रतिभागियों को प्रतीक चिह्न एवं प्रमाण-पत्र देकर सम्मानित किया गया। इस सम्मेलन में 12 राज्यों के 1100 से अधिक प्रतिभागियों ने ऑनलाईन एवं ऑफलाईन माध्यम से जुडक़र शल्य चिकित्सा की प्रक्रिया एवं जटिलता आदि विषयों पर ज्ञानार्जन किया। अतिथि विद्वानों एवं प्रतिभागियों के सम्मान में सांस्कृतिक संध्या का भी आयोजन किया गया जिसमें पतंजलि विश्वविद्यालय एवं पतंजलि आयुर्वेद महाविद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा भजन, नृत्य, योग आदि की भव्य प्रस्तुति दी गई। <br />कार्यक्रम में प्रति कुलपति डॉ. मयंक अग्रवाल, मुख्य परामर्शदाता प्रो. के.एन.एस. यादव, कुलसचिव डॉ. प्रवीन पूनिया, पतंजलि हर्बल रिसर्च डिविजन की प्रमुख- डॉ. वेदप्रिया आर्या, डॉ. केतन महाजन, डॉ. विक्रम गुप्ता, डॉ. मनोज भाटी सहित समस्त अधिकारीगण, शिक्षकगण, शोधार्थी व छात्र- छात्राएं उपस्थित रहे।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>सितम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Sep 2024 17:46:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>खाद्यान्नों में मिलावट का पता लगाने हेतु पतंजलि का नवीन अनुसंधान विश्व प्रसिद्ध </title>
                                    <description><![CDATA[<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>लोग स्वयं खाद्य की गुणवत्ता का विश्लेषण करने में होंगे सक्षम : आचार्य बालकृष्ण</strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">        हरिद्वार, 02 अगस्त। वर्तमान समय में देश में खाद्यान्न की मिलावट एक भयंकर चुनौती है और आज उसके भयानक परिणाम के रूप में अनेक बीमारियां सबके सामने हैं। देश के खाद्यान्न में कीटनाशकों (Pesticides) और रसायनों (Chemicals) का पता लगाने के लिए पतंजलि ने एक नया अनुसंधान किया है जिसको प्रसिद्ध रिसर्च जर्नल "Microchemical Journal" ने प्रकाशित किया है। <br />इस अवसर पर आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने कहा कि इस अनुसंधान के माध्यम से अब लोग स्वयं खाद्य की गुणवत्ता (Quality) का विश्लेषण कर खाद्य सुरक्षा</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3611/patanjali-s-new-research-to-detect-adulteration-in-food-grains-is-world-famous"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-03/research-paper-(2).jpg" alt=""></a><br /><ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>लोग स्वयं खाद्य की गुणवत्ता का विश्लेषण करने में होंगे सक्षम : आचार्य बालकृष्ण</strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">    हरिद्वार, 02 अगस्त। वर्तमान समय में देश में खाद्यान्न की मिलावट एक भयंकर चुनौती है और आज उसके भयानक परिणाम के रूप में अनेक बीमारियां सबके सामने हैं। देश के खाद्यान्न में कीटनाशकों (Pesticides) और रसायनों (Chemicals) का पता लगाने के लिए पतंजलि ने एक नया अनुसंधान किया है जिसको प्रसिद्ध रिसर्च जर्नल "Microchemical Journal" ने प्रकाशित किया है। <br />इस अवसर पर आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने कहा कि इस अनुसंधान के माध्यम से अब लोग स्वयं खाद्य की गुणवत्ता (Quality) का विश्लेषण कर खाद्य सुरक्षा करने में सक्षम हो सकेंगे। उन्होंने कहा कि छोटे-छोटे आर्थिक लाभ के कारण लोग बिना दुष्परिणाम सोचे खाद्य पदार्थों में मिलावट कर रहे हैं जिस कारण खाद्य पदार्थ दूषित हो गए हैं। दालें, अनाज, दूध, मसाले, घी से लेकर सब्जी व फल तक सभी में मिलावट की जा रही है। शरीर पुष्ट के लिए हम विशेष रूप से खाद्यान्न पर ही निर्भर हैं। शरीर को स्वस्थ रखने हेतु नियमित मात्र में प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन तथा खनिज लवण आदि की आवश्यक होती है जो हम खाद्यान्नों से ही प्राप्त करते हैं। <br />उन्होंने बताया कि खाद्यान्न में मिलावट के खेल को समाप्त करने के लिए पतंजलि ने मिलावट रहित स्वदेशी खाद्य उत्पाद तो तैयार किए ही हैं साथ ही पतंजलि का यह नवीन अनुसंधान मिलावटी खाद्यान्न से मुक्ति दिलाएगा।<br />आचार्य जी ने कहा कि हमें गर्व है अपने वैज्ञानिकों की टीम तथा पतंजलि संस्थान के अनुसंधान पर जिसकी सहायता से लोग खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे और स्थायी (sustainable) वैश्विक विकास में योगदान देंगे।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;">अधिक जानकारी के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएँ-<br /><a href="https://authors.elsevier.com/a/1jVU~,cE91~NW">https://authors.elsevier.com/a/1jVU%7E,cE91%7ENW</a></h5>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/research-paper-(4).jpg" alt="Research Paper (4)" width="1108" height="1440"></img><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/research-paper-(2).jpg" alt="Research Paper (2)" width="1108" height="1440"></img></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/research-paper-(4).jpg" alt="Research Paper (4)" width="1122" height="1440"></img></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/research-paper-(5).jpg" alt="Research Paper (5)" width="1086" height="1440"></img></p>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पतंजलि रिसर्च</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>सितम्बर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3611/patanjali-s-new-research-to-detect-adulteration-in-food-grains-is-world-famous</link>
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                <pubDate>Sun, 01 Sep 2024 17:34:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज के  शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन की पूर्णता व सफलता के सूत्र</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">1. संकल्प में विकल्प नहीं आने देना चाहिए और अपने शुभ संकल्प को पूर्ण करने के लिए पूर्ण पुरुषार्थ करना चाहिए। शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बौद्धिक व आध्यात्मिक पुरुषार्थ में तो हम पूर्ण स्वतंत्र हैं। आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारिवारिक व राजनैतिक दृष्टि से हमारे जीवन में थोड़ी अन्यों पर निर्भरता अवश्य होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु इससे सामान्य बाधा आती है और इसे हम पार कर लेते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थोड़ा कष्ट तो होता ही है। पुरुषार्थ में जीवन की पूर्णता है। बाह्य पुरुषार्थ हमें समृद्धि व आन्तरिक पुरुषार्थ हमें समाधि के शिखर तक</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3124/eternal-truth-emanating-from-the-eternal-wisdom-of-the-revered-yogarishi-his-holiness-swamiji-maharaj"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/1293.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन की पूर्णता व सफलता के सूत्र</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">1. संकल्प में विकल्प नहीं आने देना चाहिए और अपने शुभ संकल्प को पूर्ण करने के लिए पूर्ण पुरुषार्थ करना चाहिए। शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बौद्धिक व आध्यात्मिक पुरुषार्थ में तो हम पूर्ण स्वतंत्र हैं। आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारिवारिक व राजनैतिक दृष्टि से हमारे जीवन में थोड़ी अन्यों पर निर्भरता अवश्य होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु इससे सामान्य बाधा आती है और इसे हम पार कर लेते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थोड़ा कष्ट तो होता ही है। पुरुषार्थ में जीवन की पूर्णता है। बाह्य पुरुषार्थ हमें समृद्धि व आन्तरिक पुरुषार्थ हमें समाधि के शिखर तक ले जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">2. जब हम निष्काम सेवा  व साधना करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भगवान् की तीन सबसे बड़ी विभूतियाँ हमें मिलती हैं। एक श्रेष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्नत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सात्विक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण विवेकशील बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेधा या प्रज्ञा। दूसरी विभूति है श्रेष्ठ बलवान व पूर्ण निरोगी शरीर तथा तीसरी विभूति है श्रेष्ठ माता-पिता व समर्थ श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरुओं का आश्रय। इस जन्म में श्रेष्ठ भोगों को भोगने से सौभाग्य का उदय नहीं होने वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु जितना भी हम भोग भोगते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उतने ही हमारे पुण्यों का क्षय हो जाता है। अत: एक पूर्ण सात्विक व पूर्ण विवेकशील व्यक्ति का यह कर्त्तव्य है कि वह 10%</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से प्रारंभ करके धीरे-धीरे 90 व 100%</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">समष्टि की सेवा के लिए जीवन जीए। समष्टि की सेवा ही निष्काम सेवा है। इसे ही वेदों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शनों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गीता व उपनिषद् में ब्रह्मकर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अचाह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आप्तकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्म काम या दिव्य कर्म आदि नाम दिए जाते हैं। अपने अविवेकपूर्ण इच्छाओं से मुक्त होकर हमें वेदाज्ञा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु आज्ञा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्राज्ञा अथवा आत्माज्ञा के अनुरुप ही जीवन जीना चाहिए। आत्मा में उठने वाली परमात्मा की एक भी आज्ञा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेरणा या निर्देश का हमें एक बार भी अनादर या उल्लंघन नहीं करना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">3. हमें अपने जीवन में कुछ निर्णय पूरी दृढ़ता के साथ करने चाहिए और वैसे ही प्रामाणिक जीवन जीना चाहिए। इसी से जीवन में दिव्यता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महानता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषित्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देवत्व या पूर्णता आती है। जैसे स्थूल दोषों को तो हम जीवन में तुरन्त हटा सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: मांसाहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नशा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशोध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिक्रिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">झूठ अथवा शास्त्रीय शब्दों में कहें तो यम-नियमों के विपरीत आचरण। सूक्ष्म दोषों को पूरी जागरूकता के साथ तनु करते हुए दग्धबीज करने के लिए संकल्पित रहना चाहिए। एक दिन हमें जीवन में सफलता अवश्य मिलेगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारिवारिक व अन्य परस्पर के सम्बन्धों में उदारता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परस्परता या सह-अस्तित्व के सिद्धान्त पर चलना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन ऋषियों के वैदिक सिद्धान्तों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने आचरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु एवं संगठन के प्रति हमें पूर्ण दृढ़ता व कट्टरता रखनी चाहिए। इनमें कोई समझौता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ढुलमुल रवैया नहीं रखना चाहिए। उदारता व दृढ़ता के ये दो सिद्धान्त या आदर्श बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। इन दो सिद्धान्तों को न समझने से ही संसार में दु:ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधर्म व अशान्ति है। मैं स्वयं इस सिद्धान्त को पूरी तरह जीता हूँ तथा मुझसे प्रीति करने वाले सभी पुण्यात्माओं से यह विनम्र आत्मनिवेदन करता हूँ कि सब ऐसे ही जिएं। हमें स्वयं के प्रति पूर्ण दृढ़ता रखनी ही पड़ेगी तथा समष्टि में एक सच्चिदानंद भागवत् तत्व की अनुभूति करते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सबके प्रति उदारता का भाव रखते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सबको पूर्ण दिव्यता के साथ पूर्ण सत्य की ओर बढ़ना होगा।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शाश्वत प्रज्ञा</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>सितम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Sep 2015 21:59:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कपालभाति प्राणायाम</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3125/kapalbhanti-pranayam"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/1022.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    क</span><span lang="hi" xml:lang="hi">पालभाति शब्द को लेकर योग के क्षेत्र में विविध प्रकार का विमर्श हो रहा है। कुछ लोग कहते हैं कि कपालभाति एक क्रिया या कर्म है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह प्राणायाम नहीं है। जबकि पतंजलि योगपीठ के प्रशिक्षण व वहां से प्रकाशित साहित्य में इसे प्राणायाम की श्रेणी में रखा गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे में एक संदेह निर्मित हो रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके विचारणार्थ हम यहाँ कुछ तथ्य प्रस्तुत कर रहे हैं। सबसे पहले तो हमें यह निर्धारित करना होगा कि </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम</span>’’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की परिभाषा क्या है और इसकी परिधि में क्या कपालभाति आता है। जहां तक षट्कर्म में कर्म या क्रिया के अन्तर्गत गणना होने से कपालभाति को प्राणायाम कहने पर आपत्ति नहीं की जा सकती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि प्राणायाम भी तो एक प्रकार का कर्म या क्रिया है। अत: कपालभाति प्राणायाम तो है ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे षट्कर्म में कर्म के श्रेणी में भी रखा है तो यह इसकी विशिष्ट विशेषता या महिमा है कि कपालभाति प्राणायाम भी है और षट्कर्म के अन्तर्गत इसका शोधन क्रियाओं में भी समावेश है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे भी भस्त्रिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्यभेदनम्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उज्जायी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सीत्कारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीतली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुलोम विलोम एवं भ्रामरी आदि सभी प्राणायामों के द्वारा हमारे शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रियों व चित्त के सभी प्रकार के मलों या दोषों की शुद्धि होती ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: सभी प्राणायामों को शोधन क्रियाओं के रुप में भी स्वीकार करें तो कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि क्योंकि हर एक प्राणायाम एक कर्म या प्राणिक क्रिया भी है। हठप्रदीपिका के अनुसार भी कुछ आचार्य तो प्राणायाम के द्वारा ही समस्त दोषों व मलों की शुद्धि होना स्वीकार करते हैं। अत: वे षट्कर्म की क्रियाओं को आवश्यक मानते ही नहीं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायामैरेव सर्वे शुष्यन्ति भला इति।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्याणांतु केषांञ्चिदन्यत् कर्म न संमतम्।। (हठ </span>2/38)</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">केवल प्राणायाम के द्वारा ही सभी प्रकार के मलों की निवृत्ति हो जाती है। अत: कुछ योगी आचार्य अन्य धौति आदि शोधन क्रियाओं को आवश्यक नहीं मानते। जैसे योग दर्शन में तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वाध्याय व ईश्वर प्रणिधान यह क्रियायोग भी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियम भी तथा अष्टाङ्ग योग भी है। सर्वप्रथम हम प्राणायाम शब्द की शास्त्र परम्परा में व्याख्या व मूल प्राणायाम की परम्परा के संदर्भ में प्रकाश डालते हैं। प्राणायाम शब्द का उल्लेख मनुस्मृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपनिषद् गीता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हठयोग के ग्रन्थों एवं पुराणादि में हुआ है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृत भाषा में किसी भी शब्द का अर्थ धातु व प्रत्यय के आधार पर निर्धारित होता है। प्राणायाम एक यौगिक शब्द है। इसमें प्राण एवं आयाम ये दो शब्द हैं (प्राण+आङ् +यम्+घम्) आघ् उपसर्ग पूर्वक यम उपरमेय धातु से भावे (अष्टाध्यायी </span>3/3/18) <span lang="hi" xml:lang="hi">के द्वारा घम् प्रत्यय होकर आयाम शब्द बनता है। आयाम के विस्तार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विधा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियन्त्रण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निषेध व प्रतिबोध आदि अनेक अर्थ हो सकते हैं। प्राणायाम के संदर्भ में प्रयुक्त आयाम शब्द का अर्थ प्राण अर्थात् श्वास-प्रश्वास की सामान्य गति का विच्छेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिषेध अथवा नियन्त्रण है। महर्षि पतंजलि एवं व्यासमुनि ने भी प्राणायाम की यही परिभाषा की है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तस्मिन्सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद: प्राणायाम: (योग दर्शन </span>2/49)</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सत्यासनजये बाह्यस्य वायोराचमनं श्वास:। कोष्ठयस्य वायोर्नि:सारणं प्रश्वास:। </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तयोर्गतिविच्छेद: उभयाभाव: प्राणायाम:। (योग दर्शन- व्यासभाष्य </span>1/49)</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम: त्रिधाप्रोक्त: पूरक कुम्भक रेचकै: (हठ </span>2/71)</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी संदर्भ में योगवासिष्ठ में लिखा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">त्रयाणां पौर्वापर्येण प्रथमभूमिकायां सद्यनुष्ठाननियमादेकत्व व्यवहारोपपत्ते:।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">न तु ताद्रशवाक्येषु मिलितानामेव प्राणयामत्वं विवक्षितम्।। (यो</span>0<span lang="hi" xml:lang="hi"> वा</span>0)</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वक्ष्यमाण चतुर्विध प्राणायामस्यैव सामान्यलक्षणं गतिविच्छेद:।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">शोस्त्रोक्तरीत्या स्वाभाविकगते: प्रतिषेध-इत्यर्थ:।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स च रेचकपूरककुम्भकेष्वनुगत:।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> (यो</span>0<span lang="hi" xml:lang="hi"> वा</span>0<span lang="hi" xml:lang="hi"> पृ. </span>268)</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">निष्कर्ष के रूप में प्राणायाम की स्वाभाविक गति का प्रतिषेध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विच्छेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभाव या नियत्रण ही प्राणायाम है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गीता में भी प्राणायाम के संदर्भ में यही बात कही गई है:</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अपानेजुह्वतिप्राणं प्राणेऽपानं तथाऽपरे।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायाम परायणा:।।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> गीता </span>4/29</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आपनेऽपानवृत्तौ जुह्वति प्रक्षिपन्ति प्राणं प्राणवृत्तिं पूरकाख्यं प्राणायामं कुवन्तीत्यर्थ:। प्राणेऽपानं तथाऽपरे जुह्वति रेचकाख्यं च प्राणायामं कुर्वन्तीत्येतत्।। </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणापानगती मुखनासिकाभ्यां वायोर्निगमनं प्राणस्य गतिस्तदिपर्ययेणाधोगमनमपानस्य ते प्राणापानमती एते रुद्ध्वा निरूध्य प्राणायमपरायणा: प्राणायामतत्परा: कुम्भकाव्यं प्राणायामं कुर्वन्तीव्यर्थ: (शांकरभाष्य)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गीता के इस श्लोक से भी प्राणों की सामान्य गति का प्रतिषेध करके विशेष गति करना ही पूरक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रेचक व कुम्भक प्राणायाम है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब हम कपालभाति पर आते हैं। हमने इसे प्राणायाम की संज्ञा क्यों दी अथवा प्राणायाम की श्रेणी में क्यों रखा और क्या यह शास्त्र सम्मत है। तो सबसे पहले हम महर्षि पतंजलि के योग दर्शन का संदर्भ लेते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य। (योग दर्शन </span>1/34)</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कोष्ठ्यस्य वायोर्नासिकापुटाभ्यां प्रयत्न विशेषाद्वमनं प्रच्छर्दनम्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विधारणं प्राणायाम:। ताभ्यां वा मनस: स्थितिं सम्पादयेत्।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग दर्शन के व्यास भाष्य के अनुसार </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास का दोनों नासिकाओं के द्वारा प्रयत्न पूर्वक बाहर निकालना तथा विधारण करना यह एक प्राणायाम की प्रक्रिया है। योग दर्शन में प्राणायाम की विधि को तो बता दिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु इसकी संज्ञा विशेष नहीं दी। हमें एक अन्वर्थ संज्ञा अर्थात् सार्थक नाम देना था और हमने योग दर्शन के इस प्राणायाम का नाम कपालभाति दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके पीछे कारण यह है कि इसी प्रकार की विधि हठप्रदीपिका में कपालभाति नाम से लिखी हुई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह हमारा शास्त्र सम्मत तर्क है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अथ कपालभाति: </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भस्त्रवल्लोहकारस्य रेचपूरौ ससंभ्रमौ।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कपालभातिर्विख्याता कफदोष विशोषणी।। हठ- </span>3/36</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लुहार की धौंकनी की तरह श्वास को वेग पूर्वक बाहर छोड़ना अर्थात् रेचक करना तथा सहजता के साथ श्वास को लेना धारण करना या पूरक करना यह कपालभाति है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम की श्रेणी में कपालभाति भी इसलिए आ जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जहाँ-जहाँ श्वास प्रश्वास की रेचक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरक एवं कुम्भक क्रियाएं होगी वहाँ-वहाँ प्राणायाम शब्द का व्यवहार होता ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही शास्त्रों व गुरुओं की परम्परा है। कपालभाति शब्द का शब्दिक अर्थ है कपाल अर्थात् माथा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मस्तिष्क तथा भा-दीप्तौ भा धातु से क्तिचक्तौ च संज्ञायाम् (अष्टा. </span>3-3-174) <span lang="hi" xml:lang="hi">पाणिनि अष्टाध्याय के सूत्र द्वारा संज्ञा अर्थ में क्तिच् प्रत्यय करके भाति शब्द बनता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका अर्थ होता है दीप्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकाश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेज व चमक आदि। जिस प्राणायाम के करने से माथे या मस्तिष्क पर ओज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लावण्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्योति व दीप्ति आ जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह कपालभाति प्राणायाम है। हमने हजारों ही नहीं करोड़ों लोगों को यह प्राणायाम करवाकर यह अनुभव किया है। कपालभाति से समस्त रोगों की निवृत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हीमोग्लोबिन से लेकर शरीर के समस्त पोषक तत्वों की पूर्त्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अष्टचक्रों की जागृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यौन रोगों की निवृत्ति व यौन इच्छाओं पर नियंत्रण तथा ब्रह्मवर्चस तेज की प्राप्ति होती है और एक सप्ताह में ही कपालभाति करने वाले के माथे व चेहरे की चमक बढ़ने लगती है तथा लगभग नौ माह तक कपालभाति प्राणायाम करने से व्यक्ति अत्यन्त तेजस्वी हो जाता है। अत: यह संज्ञा अन्वर्थ व सार्थक है।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>सितम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Sep 2015 21:58:16 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अति सुगन्धित, गुणकारी, स्वास्थ्यवर्धक अगुरु (अगर)</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3126/ery-fragrant--beneficial--healthy-aguru"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/203.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक नाम : </span>Aqilaria malaccensis Lam.<span lang="hi" xml:lang="hi">  (ऐक्वीलेरिया मैलाकैन्सिस) </span>Syn-Aquilaria agallocha Roxb. ex DC.; <span lang="hi" xml:lang="hi">कुलनाम : </span>Thymelaeaceae <span lang="hi" xml:lang="hi">(थाइमीलिएसी)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">अंग्रेजी नाम : </span>Eagle wood <span lang="hi" xml:lang="hi">(ईगल वुड)</span>, Agar wood <span lang="hi" xml:lang="hi">(अगर वुड)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृत : अगुरु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृमिजग्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रवर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजार्ह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगराज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वंशिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृमिज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जोङ्गक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनार्यक</span>;  <span lang="hi" xml:lang="hi">हिन्दी : अगर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊद</span>;  <span lang="hi" xml:lang="hi">असमिया : ससि (</span>Sasi<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>;  <span lang="hi" xml:lang="hi">उर्दू : अगर (</span>Agar<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">कन्नड़ : अगरु (</span>Agaru<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">गुजराती : अगर (</span>Agar<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">तमिल : अग्गालीचंदनम (</span>Aggalichandanam<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">तेलुगु : अगरु (</span>Agru<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">बंगाली : अगरु (</span>Agaru<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्गर (</span>Aggar<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उगर (</span>Ugar<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">पंजाबी : पंवार (</span>Panvar<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चकुंदा (</span>Chakunda<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">मराठी : अगर (</span>Agar<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">मलयालम : कायागहरू (</span>Kayagahru<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">अंग्रेज़ी : अगर वुड (</span>Agar Wood<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एलो वुड (</span>Aloe Wood<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मलायन ईगल वुड (</span>Malayan Eagle Wood<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अगल्लोचम (</span>Malayan Eagle Wood<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">अरबी : उद-ए गर्की (</span>Ood-e-Garqi<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अगरे हिन्दी (</span>Agare Hindi<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">फारसी : अगर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद-ए-हिन्दी</span>;</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">औषधि के नाम पर परमात्मा के इस शरीर रूपी मंदिर के साथ हो रहे अत्याचार को वैश्विक स्तर पर समाप्त करने के लिए पतंजलि आयुर्वेद अनुसंधान विभाग द्वारा वनौषधियों पर गहन अनुसंधान हो रहा है।  आयुर्वेद की मान्यता है कि प्रकृतिगत असंतुलन से रोग पैदा होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे में औषधि प्रकृतिस्थ तत्वों से युक्त होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त  यदि दवा के नाम पर किन्हीं रासायनिक तत्वों का प्रयोग शरीर पर करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो तत्काल न सही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी न कभी तो वह शरीर के साथ विद्रोही तेवर दिखायेगी ही। वस्तुत: अक्षय आरोग्य के लिए आवश्यक है कि शारीरिक व मानसिक रोग में प्रकृति के बीच से ही औषधि की खोज करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ द्वारा जड़ी-बूटी पर गहन अनुसंधान करके </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">रोग एवं उसके अनुपान</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">सहित </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वनौषधियों में स्वास्थ्य</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की इस श्रृंखला में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अगर</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का गुण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म एवं प्रयोग विधि प्रस्तुत है। परिजन इन प्रयोगों को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद जड़ी-बूटी रहस्य</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">पुस्तक में भी विस्तार से पढ़ सकते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">परिचय:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अगुरु विशाल तथा सदा हरा भरा रहने वाला वृक्ष है। चरक संहिता में शिरोवेदनाहर एवं शीतहर प्रलेपों तथा शीत ऋतु चर्या में इसके प्रलेप और अनुलेपन का उल्लेख किया गया है। सुश्रुत-संहिता में व्रण धूपन द्रव्यों में अगुरु का वर्णन है। इसकी लकड़ी में राल की तरह कोमल व सुगन्धित पदार्थ निकलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अगरबत्ती बनाने के काम में आता है। कौटिल्य अर्थशास्त्र में इस द्रव्य के व्यापार का बड़ा व्यापक वर्णन प्राप्त होता है। यहूदी धर्म-ग्रन्थों में यह </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अलहोट</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">नाम से प्रसिद्ध है। इसके अतिरिक्त ग्रीक व रोमन में इसे </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अगेलोकन</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा प्राचीन अरब में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अधलूखी एवं ऊद हिन्दी</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">नाम से इनका उल्लेख मिलता है। अगर की अनेक जातियाँ हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्य वैद्यक ग्रन्थों तथा आयुर्वेदीय संहिताओं व निघण्टुओं में इसकी निम्न प्रजातियों का वर्णन है। (</span>1) <span lang="hi" xml:lang="hi">कृष्णागुरु (</span>2) <span lang="hi" xml:lang="hi">काष्ठागुरु (</span>3) <span lang="hi" xml:lang="hi">दाहागुरु (</span>4) <span lang="hi" xml:lang="hi">मंगल्यागुरु। उपर्युक्त समस्त प्रजातियों में कृष्णागुरु सर्वोत्तम व श्रेष्ठ माना जाता है तथा औषधी के रूप में इसका प्रयोग होता है। कृष्णागुरु प्रजाति को पानी में डालने पर लकड़ी भारी होने के कारण डूब जाती है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/203.jpg" alt="20" width="500" height="492"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आसाम प्रदेश प्राचीन काल से ही अगर के लिए प्रसिद्ध है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु विश्व स्तर पर अगुरु का वृक्ष विश्व में भूटान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">म्याँमार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मलाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मलेशिया तथा फिलीपीन्स में प्राप्त होता है। भारत में यह उत्तर पूर्वी हिमालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेघालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मणिपुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नागालैण्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्रिपुरा के पर्वतीय क्षेत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खासिया पहाड़ियों एवं पश्चिमी बंगाल में लगभग </span>500<span lang="hi" xml:lang="hi"> मी की ऊँचाई तक प्राप्त होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रासायनिक संघटन:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कवक संक्रमित काष्ठ में वाष्पशील तैल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक्वीलोचिन (</span>Aquillochin<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लिगनैन</span>, α <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा </span>β-<span lang="hi" xml:lang="hi">एगैरोफ्युरॉन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अगैरो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डाइहाइड्रोएगैरोफ्युरान</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">(</span>Dihydroagarofuron<span lang="hi" xml:lang="hi">) अगैरोस्पाइरॉल (</span>Agarospirol<span lang="hi" xml:lang="hi">) तथा क्षाराभ लिरियोडेनाइन (</span>Liriodenine<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेलिनीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एगारोल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डाइहायड्रोपसेलिनिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेस्क्वीटर्पीन तथा </span>48' <span lang="hi" xml:lang="hi">मद्यघुलनशील पदार्थ पाये जाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेदीय गुण एवं प्रभाव:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अगुरु रस में कटु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कटु विपाक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उष्ण वीर्य</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">लघु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्निग्ध व तीक्ष्ण गुण युक्त होता है। यह कफ वात शामक व पित्त वर्धक होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अगुरु सुगंधित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेप लगाने पर शीतल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृद्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रुचि कारक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वासहर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीत प्रशामक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिरोविरेचक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेदशोषक तथा वर्णप्रसादक होता है।  </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसका प्रयोग कर्ण रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अक्षिरोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिक्का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छर्दि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाण्डु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कण्डू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिडिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोठ तथा विष-विकारों की चिकित्सा में किया जाता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कृष्णागुरु-कटु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिक्त रस युक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उष्ण वीर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किञ्चित् त्रिदोषशामक तथा विशेषकर पित्तशामक होता है तथा इसका लेप अत्यधिक शीतल है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>काष्ठागुरु</strong>-कटु रस</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">उष्ण वीर्य युक्त तथा कफ शामक होता है तथा लेप रूक्ष होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>दाहागुरु</strong>-कटु रस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उष्ण वीर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केश वर्धक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्ण कारक तथा केश विकार शामक होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मं<strong>गल्यागुरु-</strong>शीत वीर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु गुण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगवाहि तथा कुष्ठ निवारण में प्रशस्त है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अगुरु-</strong>सार का स्नेह-कटु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कषाय रस युक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उष्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वात कफ शामक व दुष्ट व्रण शोधक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृमि तथा कुष्ठ नाशक होता है। इसका धूम सुगन्धित एवं वात शामक होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तम अगर  की पहचान:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यह जल में डूबने वाला व कृष्ण वर्ण होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">परखनलीय परीक्षण में यह </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मानव नासा ग्रसनी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्कटार्बुद कोशिकाओं पर कार्य करता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक भैषज विज्ञान के अनुसार इसका ऐथिल एसीटेट सार अनॉक्सीकारक गुण प्रदर्शित करता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसका पत्र-सार जीवाणुरोधी क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">औषधीय प्रयोग मात्रा एवं विधि:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">शिरो रोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1.    <span lang="hi" xml:lang="hi">शिर:शूल-अगुरु की लकड़ी को चन्दन की तरह घिसकर उसमें थोड़ा कपूर मिलाकर मस्तिष्क पर लेप करने से शिर:शूल में लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वक्ष रोग: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1.   <strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कास-</span></strong>1-3<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम अगुरु चूर्ण में थोड़ा सा सोंठ मिलाकर मधु के साथ सेवन करने से कफज कास में लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">2.  <strong> </strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>श्वासनलिका शोथ</strong>-अगुरु चूर्ण तथा कर्पूर को पीसकर वक्ष स्थल पर लेप करने से श्वास नलिका शोथ में लाभ करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">3.  <strong> </strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>श्वास-</strong>ताम्बूल पत्र में </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> बूँद अगुरु तैल को डालकर सेवन करने से श्वास रोग में शीघ्र लाभ मिलता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उदर रोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1.  <span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अर्बुद-</strong>अगर काष्ठ को लगभग </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम लेकर उसका क्वाथ बनाकर </span>20-40<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली मात्रा में नियमित सेवन करने से उदरगत अर्बुद में लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">2. <strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">वमन एवं हृल्लास-</span></strong>1-2<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम अगर  काष्ठचूर्ण का सेवन करने से वमन तथा हृल्लास में लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">3. <strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">मन्दाग्नि- </span></strong>1-3<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम अगर  काष्ठ चूर्ण को शहद के साथ मिलाकर सेवन करने से मन्दाग्नि में लाभ होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गुदा रोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1.   <strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तार्श-</span></strong>1-3<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम अगर  चूर्ण में तीन गुना मिश्री तथा प्रचुर घी मिलाकर पकाने के पश्चात् शीतल करके सेवन करने से रक्तार्श का शीघ्र शमन होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वृक्कवस्ति रोग: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1.   <span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>प्रमेह-</strong>समान मात्र में पाठा पञ्चाङ्ग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अगुरु काष्ठ तथा हल्दी को लेकर क्वाथ बनाकर </span>10-20<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली मात्रा में प्रयोग करने से लवणमेह में लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजननसंस्थान रोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1.  <span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>सूतिका रोग-</strong>प्रसव के पूर्व एवं पश्चात् अगुरु काष्ठ का क्वाथ बनाकर </span>20-30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली की मात्रा में प्रयोग करने से सूतिका रोगों में लाभ होता है। इसमें अजवायन व सोंठ मिलाने से और जल्दी लाभ प्राप्त होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अस्थिसंधि रोग:</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1.<strong> </strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>वात रोग-</strong>अगर  को पीसकर लेप करने से वातरक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आमवात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संधिशोथ तथा अंगघात में लाभ होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचा रोग: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1.   <span lang="hi" xml:lang="hi">अगर  काण्ड को पीसकर या घिसकर लेप करने से त्वक् विकारों में लाभ होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">2.   <span lang="hi" xml:lang="hi">अगर  पत्र को पीसकर लेप करने से कुष्ठ तथा कण्डू में लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वशरीर रोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1.   <span lang="hi" xml:lang="hi">शोथ-चोरक तथा अगुरु को पीसकर लेप करने से कफज शोथ में लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">2.   <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वर-अगर  काष्ठ से भावित जल का सेवन करने से ज्वरजन्य पिपासा (प्यासध् तृष्णा) में लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रसायन वाजीकरण: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1.  <span lang="hi" xml:lang="hi">रसायन- </span>2-5<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम अगर  सार कल्क को एक लोहे के पात्र के भीतर लेप कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रात भर छोड़ दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रात: काल </span>375<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली जल में अगुरु लेप को घोल कर पीना चाहिए। ऐसे ही प्रतिदिन एक वर्ष तक नियमित सेवन करने से वृद्धावस्था जन्य व्याधियों से मुक्ति मिलती है तथा दीर्घायु की प्राप्ति होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">2.  2-5<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम अगर  को दूध के साथ मिलाकर </span>15<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिन से एक वर्ष तक सेवन करने से बल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुष्य आदि रसायन गुणों की प्राप्ति होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">3.  1-2<span lang="hi" xml:lang="hi"> बूँद अगर  तैल का नियमित सेवन करने से बल की वृद्धि होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">4.  <span lang="hi" xml:lang="hi">पान के पत्ते में </span>1-2<span lang="hi" xml:lang="hi"> बूंद पुराने अगुरु तेल को डालकर मुख में धारण करने से कामोत्तेजना तथा वाजीकरण में वृद्धि होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विष चिकित्सा:</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1. <span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>जांगमविष-</strong>अगर काष्ठ को पीसकर लेप करने से सर्प एवं वृश्चिक दंश जन्य वेदना आदि विषाक्त प्रभावों का शमन होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विशेष:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रयोज्याङ्ग: कवक संक्रमित अंत:काष्ठ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मात्रा:</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> तैल </span>1-5<span lang="hi" xml:lang="hi"> बूँद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चूर्ण </span>0-5-3<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सार </span>1-2<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम व क्वाथ </span>10-40<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली चिकित्सक के परामर्शानुसार ही लें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विशेष नोट:</strong> अगर की अन्त:काष्ठ एस्कोमाईसीटस मोल्ड (</span>Ascomycetous mold<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फेओएक्रीमोनीयम पेरासाईटीका (</span>Phaeoacremonium parasitica<span lang="hi" xml:lang="hi">) नामक डीमेशीएशस (गहरे वर्ण के कोशिका युक्त-</span>dark walled<span lang="hi" xml:lang="hi">) कवकों से संक्रमित होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपरोक्त कवकों की वृद्धि से सुरक्षा हेतु वृक्ष से विशेष प्रकार का निर्यास (</span>resin<span lang="hi" xml:lang="hi">) स्रवित होता है।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>वनौषधियों में स्वास्थ्य</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>सितम्बर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3126/ery-fragrant--beneficial--healthy-aguru</link>
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                <pubDate>Tue, 01 Sep 2015 21:57:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जीवन के दिव्य सूत्र</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">स्वामी रामदेव</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3127/divine-formula-of-life"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/992.jpg" alt=""></a><br /><h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">   हम सब मूलत: ईश्वर व ऋषि-ऋषिकाओं की सन्तान हैं। अत: हमारे जीवन में भगवत्ता व ऋषित्व तो होना ही चाहिए यही हमारी मूल पहचान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूल प्रकृति व मूल स्वभाव है।</span></strong></span></h5>
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गतांक से आगे:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">चि</span><span lang="hi" xml:lang="hi">कित्सा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृषि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवसाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संगीत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रबन्धन एवं मीडिया आदि में जो भी हम दोष देख रहे हैं। देश में गरीबी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शोषण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विषमता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंसा झूठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेईमानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कालाधन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रष्टाचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घोटले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुराचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यभिचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनाचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दु:ख अशान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोहत्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूणहत्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दहेज हत्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिलावट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदूषण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अश्लीलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भोगोन्माद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युद्धोन्माद एवं मजहबोन्माद आदि जो भी विद्रूपता दिख रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका कारण है माँ की कोख-गोद से लेकर बााल्यकाल में जैसी सही शिक्षा दीक्षा होनी चाहिए थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसी शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कार व विचार नहीं मिल रहे हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैदिक ज्ञान व आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से दिव्य व्यक्तित्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चरित्र व कर्त्तृत्व युक्त दिव्य श्रेष्ठ नेतृत्व हर क्षेत्र में देश व दुनियाँ को मिलेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा पुरुषार्थ हम अपनी इस शिक्षा के क्षेत्र में विनम्र सेवा के द्वारा कर रहे हैं। हमें पूरा विश्वास है कि हमारे इस पुरुषार्थ से भारत विश्वगुरू-जगतगुरू विश्व की आध्यात्मिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक व राजनैतिक महाशक्ति व परम वैभवशाली राष्ट्र बनेगा और पूरा विश्व सभी प्रकार की आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनैतिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैचारिक व आध्यात्मिक दरिद्रताओं से मुक्त होगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हम सब मूलत: ईश्वर व ऋषि-ऋषिकाओं की सन्तान हैं। अत: हमारे जीवन में भगवत्ता व ऋषित्व तो होना ही चाहिए यही हमारी मूल पहचान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूल प्रकृति व मूल स्वभाव है। हमारे जीन्स में ही सूक्ष्म रूप में ऋषित्व व देवत्व है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे ही हमें पूर्ण रूप से विकसित करना है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमें तीन बातों से बचना है एक धर्म या मर्यादा का अतिक्रमण करने वाले गिरते हुए लोगों को देखकर हमें गिरना या विचलित नहीं होना है। अपितु खुद मर्यादा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म या शुभ में जीते हुए सबको धर्म वेद या योग के सत्य मार्ग पर लाना है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी बात पूर्व जन्म के प्रारब्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस जन्म के गलत अभ्यास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कार या अन्यों के द्वारा गलत प्रेरणा देने या दोषपूर्ण अशुभ बात कहने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुनने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देखने आदि पर भी अपने मन में एक क्षण के लिए भी अशुभ का स्वागत नहीं करना है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् का दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूजा व ध्यान समस्त दृश्य अस्तित्व को भगवान् की रचना के रूप में ईश्वर के ही मूर्त रूप में अनुभव करना यह भगवान् का बाह्यदर्शन है तथा अपनी आत्मा में परमात्मा की प्रेरणाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मस्तिष्क में ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय में संवेदनाओं व पूरे शरीर में सामर्थ्य के मूल स्रोत के रूप में भगवान् को ही स्वीकार करके ईश्वरीय प्रेरणाओं के अनुरूप जीना तथा अपने ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदना एवं सामर्थ्य को पुरुषार्थ करके बढ़ाना यह भगवान् का आन्तरिक दर्शन है। पिण्ड व ब्रहाण्ड को भगवान् के मूर्त दृश्य या प्रत्यक्ष रूप में स्वीकार करके उसके प्रति पूर्ण कृतज्ञता व कर्त्तव्य भाव से यथा योग्य व्यवहार व पुरुषार्थ करना ही भगवान् की पूजा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् को सब सम्बन्धों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पूर्ण ऐश्वर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समस्त सुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्ति के मूल स्त्रोत के रूप में अपने हदय में पूरी एकाग्रता के साथ निरन्तर कुछ समय या लम्बे समय तक अनुभव करना यह भगवान् का ध्यान है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आइये हम सब परमात्मा के इन दिव्य स्वरूपों को हृदयंगम करें और अभ्युदय व नि:श्रेयस के भागीदार बनें।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>सितम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Sep 2015 21:55:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भूतपूर्व राष्ट्रपति महामहिम श्री अब्दुल कलाम जी द्वारा पतंजलि योगपीठ में बिताये मधुर क्षणों के स्मरण सहित भावभरी श्रधांजलि </title>
                                    <description><![CDATA[<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/292.jpg" alt="29" width="900" height="600" /></p>
<h6><strong>पतंजलि योगपीठ में पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज, श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज व महामहिम अब्दुल कलाम के बीच वसुधैव कुटुम्बकम पर चिंतन के विशेष क्षण</strong></h6>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/285.jpg" alt="28" width="900" height="600" /></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/264.jpg" alt="26" width="600" height="387" /></p>
<h6><strong>तात्कालिक महामहिम राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम पतंजलि योगपीठ की विजटिंग बुक में दर्ज करते कुछ अविस्मरणीय एवं एतिहासिक क्षण</strong></h6>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/731.jpg" alt="73" width="900" height="599" /></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/722.jpg" alt="72" width="900" height="887" /></p>
<h6><strong>राष्ट्रपति भवन में पूज्य स्वामी जी महाराज, श्रद्धेय आचार्य श्री द्वारा महामहिम राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रनिर्माण पर विशेष चर्चा के अविस्मरणीय  क्षण</strong></h6>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3128/heartfelt-tribute-by-former-president-his-excellency-shri-abdul-kalam-ji-along-with-remembrance-of-the-sweet-moments-spent-in-patanjali-yogpeeth"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/264.jpg" alt=""></a><br /><p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/292.jpg" alt="29" width="900" height="600"></img></p>
<h6><strong>पतंजलि योगपीठ में पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज, श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज व महामहिम अब्दुल कलाम के बीच वसुधैव कुटुम्बकम पर चिंतन के विशेष क्षण</strong></h6>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/285.jpg" alt="28" width="900" height="600"></img></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/264.jpg" alt="26" width="600" height="387"></img></p>
<h6><strong>तात्कालिक महामहिम राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम पतंजलि योगपीठ की विजटिंग बुक में दर्ज करते कुछ अविस्मरणीय एवं एतिहासिक क्षण</strong></h6>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/731.jpg" alt="73" width="900" height="599"></img></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/722.jpg" alt="72" width="900" height="887"></img></p>
<h6><strong>राष्ट्रपति भवन में पूज्य स्वामी जी महाराज, श्रद्धेय आचार्य श्री द्वारा महामहिम राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रनिर्माण पर विशेष चर्चा के अविस्मरणीय  क्षण</strong></h6>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>सितम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Sep 2015 21:53:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>माँ बहनों को  मिलना पूरा सम्मान चाहिए</title>
                                    <description><![CDATA[<h6 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ. सुमन </span></h6>
<h6 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">मुख्य (महिला)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केन्द्रीय प्रभारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योग समिति</span></h6>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3129/mothers-and-sisters-should-be-given-full-respect"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/233.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">......गतांक से आगे</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">49.    हर विज्ञापन में नारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देख शर्म शरमा रही</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">हेय कुत्सा मानव की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन ही मन सकुचा रही</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">नग्रता इतनी छा रही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे परिधान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">50.    लोलुप विद्या के व्यसनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रस श्रृंगार उपासक</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">लोभी चाण्डालों ने लिख्खा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साहित्य भी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">खुशबू विनाशक</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">जो शील लज्जा को बेचे वो बंद दुकान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">51.    कोई बोला-है पांव की जूति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई कह गया नरक का द्वारा</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">है ताड़न की अधिकारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">है उचित जाए गर मारा</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">जो खड़ा विरुद्ध हो धारा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दयानन्द महान् चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">52.    प्रसन्नता की अनुभूति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नारी को कदाचित होती</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">हमने तो बस देखा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर अवसर पर वो रोती</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">रही नर की खुशियां बोती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब विश्राम चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">53.    लगता है शोषण कर्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर रहा मौज है भारी</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">आंखों के आंसू कहते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शोषित के कष्ट बेशुमारी</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों ही रहे दुखारी-विडम्बना भारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">होना ज्ञान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">54.    कम वजनी काठी हल्की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भी सबकी मनोहारी</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">मस्तक छोटा रक्त भी थोड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धने आंसू बोले प्यारी</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">दिल नाड़ी की धड़कन भारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समर्पणवान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">55.    सृजन की तुझमें समाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति है अनन्त अपारा</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">सुपात्र स्वतन्त्र सुरक्षित कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्माण का सौंपो भारा</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">दे सम्मान जमाना सारा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वो मधुरी तान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">56.    तप उग्र सदा करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपमान भी सहती जाए</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">मन हल्का करने खातिर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छुप-छुपकर नीर बहाए</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">सुन मुंह को कलेजा आये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ना वो दास्तान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">57.    सब बंधन हेतु दु:ख के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर प्रेम का बंधन न्यारा</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">भूखी रह कर हर्षाता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खुद खाकर हो पछतावा</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">वंचित वांछित नारी को प्रेमादान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">58.    जीवित चाहे वो दीखे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर मनोमृत हुई बेचारी</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्तित्व का बोध रहा ना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुझी अस्तित्व की चिंगारी</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">निज भला समझना हो भारी क्या ऐसी शान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">59.    व्यक्ति है व्यक्तित्व चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन को अस्तित्व चाहिए</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">गुण जो पीछे से लाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवृद्धि सुनिश्चित चाहिए</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">बस पीड़ा विगत भुला दे ऐसा एहसान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">60.    चाहे घर में रही या रण में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तूने पहचान बनाई</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">है कौन क्षेत्र अब ऐसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ना तूने धाक जमाई</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने तुझ पर उंगली उठाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वो बंद जुबान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">61.    वेदों की ऋचायें गाती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोपामृदा व अपाला</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">त्रिदेव को शिशु बनाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुसूया मां ने संभाला</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">सावित्री लड़ी थी यम से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वापस पति प्राण चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">62.    विदेह जनक की सभा में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञानी याज्ञवल्क्य आया</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">सुने तर्क गार्गी के तो मस्तक उसका चकराया</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">           <span lang="hi" xml:lang="hi">नर के अहं का कही तो होना अवसान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">63.    अन्याय अधर्म से जूझी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तप देवकी का फल लाया</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">           <span lang="hi" xml:lang="hi">हर बार दी अग्रि परीक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सदा कष्ट ही हिस्से आया</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">           <span lang="hi" xml:lang="hi">मां की पीड़ा पर गुस्सा खाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वो कृष्ण सुजान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">64.    मोरोपन्त दादा की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेटी थी एक छबीली</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">सही शिक्षा समय पे पाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मर्दानी बनी गार्विली</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं मांगे गहने बोली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीर कमान चाहिये। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">65.    चाँद बीबी चेनम्मा ने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कंपाया शत्रु को रण में</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">दुर्गा और अहिल्या ने भी दी छोड़ छाप प्रशासन में</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">अरूणा भीखा जी कामा का ऊंचा नाम चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">66.    मदालसा और मयन्ता ने बनाया बेटा मन चाहा</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">झलकारी और पन्ना ने इतिहास नवेला बनाया</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">खुद को औरों के लिए मिटाया वो दास्तान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">67.    योगिनी है और देवी भी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनगिनत है उन्नत महिमा</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">है उदार मना धरा सी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिदानों की सतत गरिमा</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">शोषण की जगह दोहन का प्रेम विधान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">68.    अधअंग हुआ है अधरंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानव जाति का विचारो</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">चिन्तनीय हुई अवस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ करो स्थिति संभारो</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">महिमा तुम यूं न नकारो उचित पहचान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">69.    नर को श्रम मेरू कहे तो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नारी भावों की सरिता</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">वो भौतिक जग अधिकारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नारी अध्यात्म संचिता</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">बनी रहे इनकी मौलिकता कद्र समान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">70.    अब तक वो पतन देखा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्थान की अब है बारी</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">दिन अब फिरने वाले हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हो गई भागवत् तैयारी</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">यश चाहो तो लक्ष्य पर करना सटिक संधान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">71.    लगातार अंधेरा देखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उजले में आंख चुंधियाई</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्से से रही बदबू में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नई खुशबू नहीं सुहाई</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">अवमूल्यन को अधिमूल्यन से मिलना त्राण चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">72.    गर पात्रता नहीं बनाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्यों प्रतिफल की आश लगाई</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्मान दिया माता को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब जन्में कृष्णा कन्हाई</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">नारी की कोख नर रत्नों की बननी खान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">73.    नहीं योग किया जीवन में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्जित ज्ञान न करके देखा</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">धन जोड़ा हर कीमत पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खा गये भयंकर धोखा</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">अब मिला सुनहरा मौका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देना ध्यान चाहिये। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">74.    दे दो इसे उत्तम शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुंह में जुबान आयेगी</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय में भावना होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बन बुद्धिमति जायेगी</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">खुश हो जगती गायेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा गान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">75.    बड़े-बड़े दायित्व इन्हें दो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ी-बड़ी दो जिम्मेवारी</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर धैर्य भाव से देखो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तोड़ लड़ी पूर्वाग्रहों को सारी</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्ता हो मौन और कृति का बखान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">76.    मत नारी कहीं सताओ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भय बाधा इनकी मिटाओ</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">परिणाम बड़े चाहते हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पात्रता इनकी बढ़ाओ</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि राम-कृष्ण और भरत जैसी सन्तान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">77.    दुलार चाहिए बचपन में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यौवन में चाहिए आदर</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवाश्रम भी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब तन होने लगे जर्जर</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">इस रतन को ठीक तरासे वो मिलनी सान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">78.    न+अरि से बनती नारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर दुश्मन दुनिया सारी</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">जो नर से रह गई बाकी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महिला ने कसर निकारी</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">दु:ख विपदा इसकी भारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई समाधान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">79.    नयन नक्स रूप को लेकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शादी में दहेज कम ला रही</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">बेटा गर ना जन्मा तो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खोटे ताने सास सुना री</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">           <span lang="hi" xml:lang="hi">अरे नारी ने मारी नारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अक्ल भगवान् चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">80.    कहते हैं नारी प्यारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जगदम्बा मां की बेटी</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">न जाने किस कारण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">है वो अब तक रूठी बैठी</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">भुगता है अभिशाप अब तो वरदान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">81.    चुपचाप सही है पीड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सदियों से बेचारी ने</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">बड़े अत्याचार हैं झेले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति सुता नारी ने</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">अब अबला बने प्रबला वो जुबान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">82.    भूखी तन से रह लेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मत रखना प्रेम की भूखी</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">है महानाश का निमन्त्रण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गर घर में नारी है दुखी</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">उपेक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवज्ञा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपमान से मिलना त्राण चाहिए। ...   </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">83.    हेय नहीं श्रेय समझ कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मीयता उदार बनााओ</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">दीखे कहीं कसर गर तो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करो पूरा धर्म निभाओ</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">मत कोसो मत झुंझलाओ नहीं अपमान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">84.    वादे ही वादे करती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बदली सत्ता सरकारें</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">आयोग समिति सभाओं के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खोखले निकले नारे</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">जो नारी का भाग्य संवारे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वो विधान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">85.    होती थी विवेकी विदूषी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विरांगनाएं नारी</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">होती थी सारे जग में तब ऊंची शान हमारी</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">सजनी सखी प्यारी को खुला आसमान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">86.    कुल माता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गृह स्वामिनी थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मातृ शक्ति कहलाती</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">तब विश्वगुरू था भारत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊंची परचम लहराती</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">लक्ष्मी को दासी बनाने का बंद सामान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">87.    लक्ष्मी से बना दी दासी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेविका बना दी स्वामिन</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">मातृ शक्ति का छीना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छल बल से जग ने सिंहासन</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभु न्याय की है उदारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">की जानी जान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">88.    आदि में थी जगदम्बा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बनी मध्यकाल में दासी</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">कुलदेवी को पांव की जूती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बना जग में कराली हांसी</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">अब बन गई गल की फांसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुक्त होनी जान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">89.    चिड़िया भी एकत्र हो जाती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">है देख मौत का साया</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">गायों के झुण्ड को देखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केहरी को मार भगाया</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">तुझको भी मधुमक्खी के होना समान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">90.    खुद उठना होगा तुमको</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब प्रयत्न प्रयास बनेगा</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">सुशिक्षित बन संगठित होकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निकलो स्वाभिमान जगेगा</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर वक्त भाग्य लिखेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विजय का गान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">91.    मत बैठो आस लगा कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई तारण हार आयेगा</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">होगा बड़ा करिश्मा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">म्हारा भाग्य पलट जायेगा</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवर्तन तो आयेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ा बलिदान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">92.    तुम अपनी अहमीयत जानो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिद्वन्द्वी न नर को मानो</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवसायिकता में निजता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मत खोना माता-बहनों</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रम भस्म सभी वार डाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वो ज्ञान-विज्ञान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">93.    तेरा भला न होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामान्य ज्ञान अक्षर से</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">ना कष्ट कटेंगे तेरे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभा समिति संगठन से</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">तू बचकर रह विघटन से यदि उत्थान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">94.    रोजगार तुझे दिलवायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या भूख तेरी है समस्या</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">डिग्री और डिप्लोमा ने पास कराई किसको परीक्षा</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्म जागरण की ले लो दीक्षा जो सुखद परिणाम चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">95.    बिना आत्म जागरण तेरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्थान न होगा नारी</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">नर को भी यही चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दे मिटा भ्रान्त प्रथाएं सारी</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">जो हो रही भागवत तैयारी में समर्पित जान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">96.    आकार से चाहे तनु हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकार में सबसे भारी</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">वरिष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्येष्ठ व श्रेष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जगदम्बे की यह दुलारी</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">सुनना दुनिया सारी को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खोल के कान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">97.    बनी रहनी सदा चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मौलिकता नारी-नर की</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">है पूरक एक दूजे के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपमा है सिर व धड़ की</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्तीत्व की है मजबूरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रहने समान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">98.    देते हैं जगति भर में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब नारी को ही गाली</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">लगती है जाकर नर को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लाती है खून में उबाली</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या अति प्रेम नहीं यह सवाली को व्याख्यान चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">99.    मुश्किल है नामुमकिन भी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उऋण होना तेरे अहसान से</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">एक कोशिश हो सकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने तन-मन और धन से</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">        <span lang="hi" xml:lang="hi">तुझे श्रेय दे कृतज्ञ रहें बस उतना काम चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">100.   स्वीकारिता सहकारिता और स्वभावानुसार कार्य विभाजन</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">          <span lang="hi" xml:lang="hi">परस्पर प्रेमाकर्षण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशुद्ध आत्म जागरण</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">         <span lang="hi" xml:lang="hi">सब होगा उत्तम मंगल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृपा भगवान् चाहिए। ...</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>कविता</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>सितम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Sep 2015 21:52:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अनिद्रा और उसका प्राकृतिक-यौगिक समाधान</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. शरली टेल्लस एवं शिवांगी पाठक</span>, </strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">पतंजलि अनुसंधान विभाग</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">हरिद्वार</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3130/insomnia-and-its-natural-compound-solution"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/sleep.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   हमें</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> जीवन पर्यंत स्वस्थ रहने के लिए नींद अति आवश्यक है। राष्ट्रीय निद्रा संस्थान के अनुसार एक व्यक्ति  के शरीर के विभिन्न कार्यों को सुचारू रूप से चलाने के लिए निद्रा की भूमिका महत्वपूर्ण है।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">निद्रा हमारे हदय को स्वस्थ रखती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव घटाती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर की उत्तेजना को कम करती है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">हमें सक्रिय बनाती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी याद्दाश्त को बढाती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">वजन को नियंत्रित करने में मदद करती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अवसाद के खतरे को कम करती है</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे शरीर को पुन: ऊर्जान्वित करती है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   निद्रा की पांच अवस्थायें हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके दो चरणों में प्रथम चरण को </span>NREM (Non rapid eye movement)<span lang="hi" xml:lang="hi"> कहते हैं तथा द्वितीय को </span>REM (Rapid Eye Movement)<span lang="hi" xml:lang="hi"> कहा जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निद्रा की पांच अवस्थाओं में से चार अवस्थायें </span>NREM<span lang="hi" xml:lang="hi"> के अंतर्गत आती हैं व पॉचवी अवस्था क्रश्वरू के अंतर्गत आती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>क.</strong>  <strong>प्रथम अवस्था</strong>:</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> यह निदा्र की प्रांरभिक अवस्था है। इस अवस्था में अपेक्षाकृत हल्की नींद शामिल है तथा निद्रा की इस अवस्था को जाग्रत अवस्था व निद्रा अवस्था के बीच की स्थिति भी माना जाता है। इस अवस्था का काल 5-10 मिनट तक का होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>ख</strong>. <strong> द्वितीय अवस्था:</strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"> निद्रा की इस अवस्था में शरीर का तापमान घटना शुरू हो जाता है तथा हदय गति कम होनी प्रारम्भ हो जाती है। यह काल लगभग २० मिनट तक का होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>ग</strong>. <strong> तृतीय अवस्था:</strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"> हल्की नींद से गहरी नींद में परिवर्तित होने की अवस्था ही तृतीय अवस्था है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>घ</strong>. <strong>चतुर्थ अवस्था</strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>:</strong> इस काल में व्यक्ति गहरी निद्रा में होता है। यह लगभग ३० मिनट तक की हो सकती है। निद्रा की इस अवस्था में ही सोते समय बिस्तर पर ही पेशाब करना तथा नींद में चलना आदि प्रक्रियायें होती हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ड. </span>REM (Rapid eye movement):</strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">यह निद्रा की पाँचवी अवस्था है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधिकांश स्वप्न इसी अवस्था में दिखाई देते हैं। निद्रा की इस अवस्था में श्वसन दर और मस्तिष्क की क्रियाशीलता बढ़ जाती है तथा मांसपेशियाँ और अधिक शांत </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अनिद्रा की अवस्था में:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बहुत से लोग पर्याप्त नींद न आने की शिकायत करते है। नींद की कमी से आपके दिन भर की कार्यशीलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संतुलन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूख तथा रोग प्रतिरोधक तंत्रो पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है। जो कि कई बीमारियों के होने के खतरे को और भी बढ़ा देता है। अधिक मात्रा में नींद भी हदय संबंधित बीमारीयों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोटापा और स्मृति संबंधित रोगों के होने के खतरे को बढ़ा देती है। इसलिए हमे अपने स्वास्थ्य को बनाये रखने के लिए पर्याप्त नींद की आवश्यकता होती है। उम्र के अनुसार कितनी नींद आवश्यक है इसका विवरण तालिका में दिया गया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आयु और निद्रा का अनुपात:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आयु सीमा                                  नींद की अवधि</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नवजात शिशु से २ महीने तक         12-18 घंटे</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">3 महीने से 9 वर्ष तक                     14-15 घंटे</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">9 वर्ष से 3 वर्ष तक                         12-14 घंटे</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">3 वर्ष से 5 वर्ष तक                         11-13 घंटे</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">5 वर्ष से 12 वर्ष तक                       10-11 घंटे</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">12 वर्ष से 18 वर्ष तक                     8.5-10 घंटे</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वयस्क (18 वर्ष से ज्यादा)               735-9 घंटे</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि हम नियमित रूप से रात्रि में अच्छी व पर्याप्त नींद नहीं ले पाते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उम्र के तेजी से बढ़ने का खतरा पैदा हो जाता है। तथा व्यक्ति इसके साथ-साथ घबराहट व बेचैनी का अनुभव करता है</span>,  <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि नींद के दौरान हमारा शरीर कोशिकाओं की मरम्मत करता है तथा जहरीले पदार्थों को शरीर से बाहर निकालता है। इस प्रकार हमें 6-8 घटे की नींद आवश्यक रूप से लेनी चाहिए।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/sleep2.jpg" alt="sleep2" width="704" height="428"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योगाभ्यास एक समाधान:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">       यदि आप निद्रा संबधी समस्याओं से पीड़ित है जैसे: नींद की कमी (</span>sleepless ness<span lang="hi" xml:lang="hi">) तथा नींद का ना आना आदि (</span>Insomnia<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">तो योगाभ्यास इसके समाधान के लिए एक साधन हो सकता है। योगाभ्यास रक्त परिसंचरण को बढ़ाता है। हमारे तंत्रिका तंत्र को संतुलित करता है तथा शरीर से जहरीले पदार्थों को निकालकर शरीर को ऊर्जान्वित करता है। नियमित योगाभ्यास कई बीमारीयों जैसे नींद का न आना तथा असमय नींद जैसी परेशानियों को ठीक करने में उपयोगी है योग दिन भर के तनाव से मुक्ति दिलाकर रात्रि में अच्छी नींद दिलाने में सहायक है। जो योगासन गहरी शिथिलता तथा जागरूकता के साथ किये जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे मस्तिष्क को शांत करने वाले रसायनों को स्थाापित करने में सहायक होते है। यह अति आवश्यक है कि अपनी क्षमतानुसार किसी भी आसन की पूर्ण स्थिति में पहुंचकर गहरी श्वास-प्रश्वास तथा शिथिलता से आप को उसी अवस्था में बनाये रखना चाहिए । प्राणायाम को अभ्यास भी </span>Insomnia <span lang="hi" xml:lang="hi">के लिए बहुत उपयोगी है। योग का अभ्यास हमेशा अनुभवी शिक्षक के देख-रेख में ही करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संतुलित जीवन शैली  :</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  जीवनशैली तथा निद्रा एक दूसरे पर निर्भर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खराब जीवनशैली आपकी निद्रा की गुणवत्ता को प्रभावित करती है तथा खराब निद्रा आपकी जीवनशैली को प्रभावित करती है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   जीवनशैली में परिवर्तन एक प्रक्रिया है जिसमें समय लगता है। यदि एक बार हम परिवर्तन के लिए तैयार भी हो जाते है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी इसका निरन्तर अनुसरण करना मुश्किल होता है। नीचे  जीवनशैली में कुछ परिवर्तन की सलाह दी गयी है जोकि अच्छी नींद के लिए आवश्यक है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">o   <span lang="hi" xml:lang="hi">सोने का समय सुनिश्चित करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">o   <span lang="hi" xml:lang="hi">सोने के अनुकूल शांतिपूर्ण वातावरण बनायें </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">o   <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सुनिश्चित करें कि बिस्तर आरामदायक हो</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">o   <span lang="hi" xml:lang="hi">नियमित रूप से व्यायाम करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">o   <span lang="hi" xml:lang="hi">सोने के पूर्व कॉफी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाय या ऊर्जा प्रदान करने वाले पेय पदार्थों के सेवन से बचें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">o   <span lang="hi" xml:lang="hi">रात्रि के समय हल्का भोजन लें</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">o   <span lang="hi" xml:lang="hi">धुम्रपान से बचे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">o   <span lang="hi" xml:lang="hi">बिस्तर पर सोने के लिए जाने से पहले अपने शरीर को शिथिल करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">o   <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी चिंताओं से अपने आपको दूर रखें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">o   <span lang="hi" xml:lang="hi">बिस्तर पर चिंताओं से बचें तथा मन व शरीर को शांत रखें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संतुलित आहार जरूरी:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भोजन की भी एक बहुत बड़ी भूमिका है-अच्छी नींद लेने में स्वास्थ्य वर्धक भोजन शरीर की स्वस्थ कोशिका के निर्माण में और उनके कार्यों को सुचारू रूप से करने में मदद करता है। नीचे कुछ आहार दिये गये हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अच्छी नींद के लिए सहायक है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">Complex Carbohydrate: <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण अनाज की रोटियाँ :- अन्न </span>brownraice <span lang="hi" xml:lang="hi">साधारण  </span>carbohydrade<span lang="hi" xml:lang="hi">से बचें जैसे मिष्ठान </span>cake, cookies, pastries<span lang="hi" xml:lang="hi"> तथा अन्य चीनी से बना भोजन यह भोज्य पदार्थ </span>serotorin level<span lang="hi" xml:lang="hi"> को घटाता है तथा निद्रा में बाधक है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">Heart healthy foods: Unsaturated fats <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे अलसी का तेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोयाबीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अखरोट तथा सूर्यमुखी का तेल ना केवल हदय को स्वस्थ बनाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह </span>serotorim level <span lang="hi" xml:lang="hi">के स्तर को भी बढ़ाता है। हमें </span>saturated <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा </span>saturated <span lang="hi" xml:lang="hi">से निर्मित भोज्य पदार्थों को खाने से बचना चाहिए। जैसे </span>French fries potato chips<span lang="hi" xml:lang="hi"> और विभिन्न प्रकार के उच्च वसा से निर्मित </span>Snach foods <span lang="hi" xml:lang="hi">आदि।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">Beverages<span lang="hi" xml:lang="hi">: कुछ पेय पदार्थ निद्रा को बढ़ा भी सकते हैं तथा इसे घटा भी सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोने से पूर्व दूध या हर्बल टी अच्छा पेय हो सकता है।  </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    </span>Fresh herbs<span lang="hi" xml:lang="hi">: स्वस्थ औषधियाँ शरीर को शांत रखने में सहायक होती है। उदाहरण के तौर पर </span>sage<span lang="hi" xml:lang="hi"> एक प्रकार की सुगन्धित वनस्पति है। जबकि हमें काली मिर्च या लाल मिर्च के सेवन से रात्रि में बचना चाहिए क्योंकि ये शरीर को उत्तेजित करते है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छी नींद के अन्य तरीके:</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ अन्य तरीके जो हमें अच्छी नींद लाने मे सहायक हो सकते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">हमें देर शाम के वक्त भस्त्रिका प्राणायाम का अभ्यास नहीं करना चाहिए। इस प्राणायाम के अभ्यास से बहुत अधिक ऊर्जा उत्पन्न होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कि निद्रा के आने में बाधक होती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">हमें रात्रि के समय उत्तेजक व डराने वाले टी.वी कार्यक्रमों को देखने से बचना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि इनका विचार पूरे रात भर दिमाग में घूमता रहता है। इसके स्थान पर हल्का संगीत जैसे मंत्रोच्चारण सुनना या किताब पढ़ना नींद को लाने में सहायक हो सकता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">हमें अपने सोने की एक शैली बनानी चाहिए। दिन में किसी भी समय सोना उपयुक्त नहीं हैं। यह हमारे बायोलॉजिकल क्लॉक को अव्यवस्थित करता है। आदर्श रूप से दोपहर में आधे घंटे सोना और रात्रि में 8 घटे सोना एक अच्छा अभ्यास है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">हमें रात्रि में सोने से पहले अपने दिन भर किये गये कार्यों का आत्मनिरीक्षण करना चाहिए तथा संतुष्टि स्तर तक बिस्तर को साफ कर लेना चाहिए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">हमें 8.30 पर रात्रि का भोजन ग्रहण कर लेना चाहिए तथा रात्रि के भोजन व सोने के बीच में 2 घंटे का अन्तर रखना चाहिए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि आपका अपने परिवार में किसी से भी वाद-विवाद हो गया हो तो सोने के पूर्व इसे सुलझा लेना चाहिए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">हमें रात्रि में उत्तेजक पदार्थों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। विशेषकर तब जब आप नींद न आने जैसी बीमारी से ग्रासित हों।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार हम नियमित योगाभ्यास जीवनशैली व भोजन की आदतों में परिवर्तन लाकर नींद की गुणवत्ता व परिमाण में वृद्धि कर सकते हैं तथा स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शांतिप्रद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रियाशील जीवन के अधिकारी बन सकते है।</span></h5>
</li>
</ul>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पतंजलि रिसर्च</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>सितम्बर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3130/insomnia-and-its-natural-compound-solution</link>
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                <pubDate>Tue, 01 Sep 2015 21:50:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अनुभूति आपकी</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हार्ट एवं भूलने सम्बंधी बीमारी से मुक्ति</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">      यो</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ग साधना करने से ही मुझे नया जीवन मिला है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्यथा सन् 1994 में हुए घातक हृदय रोग से मैं बच नहीं सकता था। हार्ट अटैक के कारण मुझे दिल्ली जाना पड़ा। वहाँ एम्स में कई बार एन्जोग्राफी की गई और मालूम हुआ कि मेरी कई हार्टरीज़ ब्लॉक हो चुकी हैं। लगभग एक वर्ष तक इलाज चला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर मुझे बाईपास सर्जरी की सलाह दी गई। मैंने टी.वी. पर योग क्रिया करते हुए बाबा रामदेव जी को देखा। वे नित्य प्रात: नियमानुसार प्राणायाम साधना एवं योगासन करके दिखाते हैं और उनसे</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3131/your-feeling"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/522.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हार्ट एवं भूलने सम्बंधी बीमारी से मुक्ति</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   यो</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ग साधना करने से ही मुझे नया जीवन मिला है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्यथा सन् 1994 में हुए घातक हृदय रोग से मैं बच नहीं सकता था। हार्ट अटैक के कारण मुझे दिल्ली जाना पड़ा। वहाँ एम्स में कई बार एन्जोग्राफी की गई और मालूम हुआ कि मेरी कई हार्टरीज़ ब्लॉक हो चुकी हैं। लगभग एक वर्ष तक इलाज चला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर मुझे बाईपास सर्जरी की सलाह दी गई। मैंने टी.वी. पर योग क्रिया करते हुए बाबा रामदेव जी को देखा। वे नित्य प्रात: नियमानुसार प्राणायाम साधना एवं योगासन करके दिखाते हैं और उनसे होने वाले लाभ भी बताते हैं। उनका मानना था कि समस्त बीमारियों का निदान एकमात्र योग ही है। मैंने तभी से योग करना शुरू कर दिया और नित्य नियमित रूप से सुबह खाली पेट योग क्रिया करने से मुझे बड़ा लाभ मिला। मुझे अब हार्ट की कोई समस्या नहीं है। एक वर्ष पूर्व मई 2014 में मेरी स्मरण शक्ति भी चली गई थी। मैं अपने बच्चे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पत्नी आदि किसी को नहीं पहचान पाता था। खाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बोलना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चलना-फिरना सब बन्द हो गया। तब मेरे बचने की कोई आशा नहीं थी। मेरे डॉक्टर पुत्र के अथक प्रयास और कई डॉक्टरों की सलाह से जो दवायें निश्चित की गई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें मैं आज भी नियमित रूप से ले रहा हूँ। परन्तु बहुत बड़ा लाभ मेरी योग साधना  से है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे मैं नित्य कर रहा हूँ। रोग से आयी निराशा घट रही है और तनाव से मुक्ति तथा शान्ति अनुभव हो रही है। मैंने लगभग 50-60 अन्य व्यक्तियों को योग से जोड़ना प्रारम्भ किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुझे पूर्ण विश्वास है कि योग साधना से जटिल से जटिल बीमारी दूर हो सकती है। इसलिये हर प्राणी को स्वस्थ एवं प्रसन्नचित रहने के लिये प्रात:काल शुद्ध वायु में नित्य व नियमानुसार घंटे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आधे घंटे कपालभाति और अनुलोम-विलोम अवश्य करना चाहिए। मैं लगभग 89 वर्ष की उम्र में भी नियमित योग क्रिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामर्थ्य के अनुसार करता हूँ। योग साधना से वातावरण बदले या न बदले पर जीवन की घटनाओं के प्रति दृष्टिकोण और वातावरण के अनुभव करने के भाव में परिवर्तन अवश्य आ जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो हमारे तनाव को दूर करने में सबसे बड़ा सहायक होता है। इससे शरीर के समस्त अंगों में स्फूर्ति बनी रहती है। इस समय सारे संसार में योग का प्रचार-प्रसार चल रहा है जिसका बहुत कुछ श्रेय बाबा रामदेव जी और उनके अनुयाइयों को है। मैं इसके लिए उन्हें कोटि-कोटि प्रणाम करता हॅू।</span></h5>
<h6 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भवदीय</span>,</strong></h6>
<h6 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. एल.पी. गुप्त</span>, 79, <span lang="hi" xml:lang="hi">डी.-5</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विभव अपार्टमेण्ट्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यू आगरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आगरा-5</span></strong></h6>
<h5 style="text-align:left;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उदर रोगों में अप्रत्याशित लाभ</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">बा जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं आपके द्वारा बताये योग विद्या से बहुत अधिक लाभान्वित हुआ हूँ। मुझे पेट दर्द तथा उदर रोग की समस्या लम्बे समय से थी। विभिन्न पद्धति के उपचार करने पर भी अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो रहे थे। तब एक दिन पतंजलि योगपीठ की एक योग शिक्षिका का मार्गदर्शन मिला। उन्होंने आपके द्वारा प्रतिपादित योग पद्धति को अपनाने की सलाह दी। मैंने जब से योग करना एवं सुबह-शाम टहलना प्रारम्भ किया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब से पेट के दर्द एवं अन्य बीमारियों से मुक्ति मिल गयी। स्वामी जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग-प्राणायाम जैसे प्रयोगों के विस्तार के लिए मैं आपका आजीवन आभारी हूँ। आपका यश इसी प्रकार देश-विदेश में फैलता रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे समग्र विश्व के रोगियों का कष्ट निवारण हो सके।</span></h5>
<h6 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भवदीय</span>,</strong></h6>
<h6 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रामशिरोमणि मिश्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वार्ड नं० </span>7, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिला-अनूपपुर (मध्य प्रदेश)</span></strong></h6>
<h5 style="text-align:left;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्लड प्रेशर तथा सर दर्द से मिली मुक्ति</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">मी जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं ब्लड प्रेशर तथा तेज सर दर्द से वर्षों से पीड़ित था। पैर में भी अक्सर दर्द रहता था। दर्द से निपटने के लिए पेन-किलर का निरन्तर प्रयोग करता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके दुष्परिणाम भी विभिन्न रोगों के रूप में मुझे मिलते रहे। लगभग एक वर्ष पहले आपके योग प्रशिक्षक से परिचय हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने मुझे योगमय जीवन शैली के लिए प्रेरित किया। उनकी सलाह से निरन्तर योग अभ्यास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूक्ष्म व्यायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुलोम-विलोम प्राणायाम से मेरी बी.पी. तथा दर्द की समस्या समाप्त हो गई। अब मैं पूर्ण स्वस्थ हूँ तथा निरन्तर योग लाभ प्राप्त करने के साथ-साथ अन्य को भी इससे जोड़ रहा हूँ।</span></h5>
<h6 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भवदीय</span>,</strong></h6>
<h6 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उमेश सिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेपर मिल के पास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिला-अनूपपुर (मध्य प्रदेश)</span></strong></h6>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>दिव्य अनुभूति</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>सितम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Sep 2015 21:47:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अद्भुत चमत्कारी सामर्थ्य से भरा हमारा मन</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3132/our-mind-is-full-of-amazing-miraculous-power"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/10-12sep-1.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   म</span><span lang="hi" xml:lang="hi">न को लक्ष्य कर अति उच्च गीत वेद के याजुष मन्त्रों में गाया गया है कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा मेरा मन शिव संकल्प से युक्त हो जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि शिव संकल्पों वाला मन ही शुभ का सम्पादन कर सकता है। यदि ऐसा न होगा तो जैसे अकुशल सारथी स्वामी को लक्ष्य पर पहुँचाने के बजाए या तो कहीं अन्यत्र ही ले जाकर छोड़ देता है या कहीं दुर्घटना करा देता है। वही मन रूपी सारथी भी कर सकता है।</span>’</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मन को शत्रु रूप में देखने वाले साधकों का कहना है- कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">यह मन ही सब अनर्थों की जड़ है। इसी में सब चालाकियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब कुटिलताएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब ढोंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब पाखण्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब मिथ्यात्व व सब की सब धूर्त्तताएँ व भूत काल की सब अशुभ स्मृतियाँ भरी हुई हैं। प्रलोभन अथवा कठिनाई के उपस्थित होने पर यही साधक को सबसे पहले धोखा देता है। यह सर्वथा निर्दय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रूर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कामी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोभी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लालची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वेषी व ईर्ष्यालु है। अहङ्कार से भरा हुआ मन मनुष्य से न जाने क्या-क्या नाच नचवाता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">साधकों को महाविपत्ति में डालकर स्वयं पीछे हट जाता है। यह पाप का जनक है। यही पाप का मित्र भी है। सत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिव या सुन्दर से इसे किञ्चित् मात्र भी लगाव नहीं है। बस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे तो अपनी कामना-पूर्ति तक मतलब है। इससे आगे चाहे कोई कुएँ में पड़े अथवा नरक में जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका कोई सम्बन्ध नहीं।</span>’</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महाराज जी बताते हैं कि साधक को चाहिए कि वह इसे सदा अपना महाशत्रु समझकर इससे अत्यन्त सावधान रहे। यह इतना कुशल ठग है कि चुपके से साधक के समस्त वैभव को लूटकर उसे कंगाल बना देता है। अत: किसी भी परिस्थिति में एक क्षण के लिए भी साधकगण इस पर विश्वास न करें। वाणी इसकी क्रूरता व नृशंसता का वर्णन नहीं कर सकती कि यह कहाँ तक आगे बढ़ सकता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि तिल मात्र भी इस पर भरोसा कर लिया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह ऐसा हित-शत्रु है जो मौका लगते ही अन्दर घुसकर आँतें तक बाहर निकाल कर फेंक देता है। वे साधक बार-बार यही चेतावनी देते हैं कि ऐ प्रिय साधकों! सावधान! तुम्हारे घर में लपलपाती जिह्वा वाला काला नाग बैठा है! यह इतना जहरीला है कि यदि एक बार इसने तुमको डस लिया तो फिर पानी भी नही माँग सकोगे।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/10-12sep-2.jpg" alt="10-12SEP-2" width="900" height="725"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह ऐसी छिपी हुई आग है जो अन्दर-ही-अन्दर सुलगती रहती है और समय पाकर साधक की समस्त सम्पत्ति को जलाकर राख कर देती है। यह वह मगर है जिसको तुमने भ्रान्ति से तख्ता समझ लिया है और इसके सहारे संसार-नदी को पार करना चाह रहे हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर यह तुम्हें सम्पूर्ण को ही निगल जाएगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मन की वृत्तियां:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">काम-संकल्प-विचिकित्सा-श्रद्धा-अश्रद्धा-धृति:-अधृति:-ह्री:-धी:-भी:</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये सब मन के ही विविध रूप हैं। मन के बिना काम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संकल्पादि का मानो कोई अस्तित्व ही नहीं है। प्रगाढ़ निद्रा में या समाधि में मन नहीं होता। इसलिए वहाँ काम (कामना)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संकल्पादि भी नहीं होते। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> मनुष्य में इच्छा का जो भी  रूप उत्पन्न होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह उसके ज्ञान व संस्कार के अनुसार हुआ करता है। संस्कार उत्तम हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान का स्तर ऊँचा है तो मनुष्य की इच्छाएँ भी शुभ गुण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म विषयक होती हैं। अन्यथा अशुभ गुणों व अशुभ कर्मों की इच्छा होने लगती है। ज्ञान व संस्कार का उन्नत या अवनत होना तत्सजातीय ज्ञान व कर्म पर निर्भर करता है। इसी प्रकार आगे-आगे चलती हुई मन के साथ जुड़ी यह एक अन्तहीन शृंङ्खला बन जाती है। शुभ या अशुभ इच्छा के उत्पन्न होने पर व्यक्ति उस इच्छा को पूरा करने के लिए प्रयत्न पूर्वक पुरुषार्थ करने की इच्छा करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">संकल्प</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार किसी विषय में संशय या सन्देह करने का नाम </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">विचिकित्सा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">है। यह संशय जब किसी विषय में निश्चय करने की दृष्टि से किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तो कल्याणकर होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर व्यर्थ कुतर्क के रूप में किया जाए तो महती हानि कर देता है। संशय या विचिकित्सा का जो भी रूप हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माध्यम मन ही है। ईश्वर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने आप में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिफल व पुनर्जन्मादि में अत्यन्त विश्वास का नाम </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">है। अन्याय-पक्षपातादि अशुभ गुणों के प्रति अश्रद्धा होती है तो साधक का महान् कल्याण साधित कर देती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर यदि सत्य-धर्म-ईश्वरादि में अश्रद्धा हो तो महाविनाश का दृश्य उपस्थित हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुख-दु:ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हानि-लाभ चाहे जितना प्राप्त हो तो भी ईश्वर-धर्म-सत्य के प्रति अपने निश्चय को बनाए रखते हुए धीरज को न छोड़ने का नाम </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">धृति</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">है। अधृति के भी अश्रद्धा की तरह दो रूप हो सकते हैं- बुरे कामों में दृढ़ न होना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस रूप में तो अधृति लाभदायक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर सुकर्मों में या अपने संकल्पित जीवन विषय में अधृति हो जाती है तो अनिष्टकर है। मन के संकोच वाली वृत्ति </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ह्री:</span>’ (<span lang="hi" xml:lang="hi">लज्जा) है। यह संकोच भी दो रूपों में उत्पन्न होता है एक तो असत्य आचरण करने में मन लज्जित होता है। दूसरा सच्चे कामों के न कर सकने पर लज्जा महसूस होती है। श्रेष्ठ गुणों को शीघ्र धारण करने वाली वृत्ति को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">धी:</span>’ (<span lang="hi" xml:lang="hi">धारणावती बुद्धि) कहते हैं। यदि यह बुद्धि अश्रेष्ठ गुणों को शीघ्र धारण करने लगे तो महान् अनिष्ट उपस्थित हो जाता है। भय नाम की वृत्ति को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भी:</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi"> व्यक्ति शुभ मार्ग पर चलने में भी भयभीत रहता है। यह किसी भी दृष्टि से अच्छा नहीं है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जब मन बनता है हमारा मित्र: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मन के सम्बन्ध में श्री महाराज सदा मन को मित्र बनाकर रखने की सलाह दिया करते हैं। महाराज का कहना है- जैसे एक सच्चा मित्र कभी भी अपने मित्र का अनिष्ट नहीं करता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार मन यदि हमारा मित्र हो जाता है तो वह भी सदा हमारा कल्याण ही करने में जुट जाता है। मन को मित्र बनाने का उपाय यह है कि उससे निम्न रूप में प्रार्थना की जाए- </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">ओ मेरे प्रिय मन! तू मेरा अति तेजस्वी अदभुत मित्र है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं तेरे नेतृत्व में निर्विघ्न अपनी जीवन-नौका को अनन्त की ओर लेे जा सकने में समर्थ हो पाऊँगा। मुझे तुझ पर पूर्ण विश्वास है- तू मुझे कभी धोखा नहीं देगा। इस लोक की या परलोक की कोई भी बाधा मेरे रास्ते में यदि रुकावट बनती है तो मुझे तेरी अपरिमित शक्ति पर विश्वास है कि तू उसे चूर्ण-विचूर्ण कर देगा। तेरे दुर्धर्ष तेज को सहन करने की भला किसमें सामर्थ्य हो सकती है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">तेरे दुर्दमनीय वेग के समक्ष समस्त रिपुगण वैसे ही विलीन हो जाते हैं जैसे बाज के सामने पक्षिगण। तू कैसे एक सजग प्रहरी की भाँति मेरी रक्षा में सदा प्रवृत्त रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह मैंने अच्छी प्रकार देख लिया है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तू एक ही साथ जहाँ ध्यान मग्न योगी की तरह पूर्ण शान्त है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ वीर योद्धा के समान प्रचण्ड वेग से भी भरा हुआ है। जिस काम को तू करना ठान लेता है- त्रिलोकी में भी उसे रोकने का किसी में सामर्थ्य नहीं है। तू मेरा अक्षयपात्र है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे हृदय का पूज्य देव है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">सच्चा सुहृद् है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">सेनापति इन्द्र है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">महान् कुबेर है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">कठिनाइयाँ व बाधाएँ तेरे गले का हार हैं। हे मेरे मन! तू मेरा सच्चा हितैषी है। तू एक ही साथ माँ के समान प्रेम का अवतार है और गुरु के समान अनन्त धैर्य का सागर है। मैं कहाँ तक तेरा गुणगान करूँ</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">बस! तुझसे मैं एक ही चीज चाहता हूँ कि तू सदा मुझे अपना प्यारा मित्र समझता रहे और मैं भी तेरे प्रति सदा निश्चल प्रेम से भरा रहूँ। जीवन-यात्रा में आगे बढ़ने के लिए मुझे तेरे सहयोग की अत्यन्त आवश्यकता है।</span>’</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मन सीखने को तैयार बैठा है:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मन को विश्वास पूर्वक जो भी सुझाव दिये जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कुछ सिखाया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे वह उसी रूप में तत्काल ग्रहण कर लेता है। इसकी पुष्टि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">नवभारत टाइम्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देहली</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">में छपे समाचार जयपुर की अगस्त १९८९ की इस घटना से भी होती है कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मन के विश्वास और अपनी निराशावादी धारणाएँ बदलकर कोई भी आदमी वह हर काम कर सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो दुनिया की निगाहों में बहुत मुश्किल और असम्भव होता है। यह सिद्ध कर दिखाया है हालैण्ड के एमिल स्टेलबैण्ड ने धधकते हुए अङ्गारों पर चलकर।</span>’</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्री स्टेलबैण्ड ने मस्तिष्क की अपरिमित मनोयोग शक्ति के प्रति लोगों को विश्वास कराते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मौके पर मौजूद करीब </span>104<span lang="hi" xml:lang="hi"> दर्शकों को भी एक-एक करके जलते हुए अङ्गारों पर चलवा दिया। अङ्गारों पर चले इन दर्शकों में इस सफलता से एक आश्चर्य-मिश्रित प्रसन्नता झलक उठी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जयपुर में एस</span>0<span lang="hi" xml:lang="hi">एम</span>0<span lang="hi" xml:lang="hi">एस</span>0<span lang="hi" xml:lang="hi"> मेडिकल कालेज ऑडिटोरियम में अमेरिका के रोविन्स रिसर्च इंस्टीट्यूट के यूरोप क्षेत्र के निदेशक श्री एमिल स्टेलबैण्ड </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मानव मन की असीम क्षमता</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">पर अपना व्याख्यान देने के बाद </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कूल मोसेर्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इट इज कूल मॉस</span>’ (<span lang="hi" xml:lang="hi">ठण्डी घास) कहते हुए अङ्गारों पर चल पड़े। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस रोमांचकारी आलम में एक पाँच वर्षीय बालिका सुरभि ने भी अङ्गारों पर सैर का आनन्द लिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिलकुल निडर होकर। आग पर चलने वाले लोगों में मेडिकल कालेज के छात्र एवं मनोचिकित्सकों के अलावा स्थानीय बिड़ला प्लेनेटोरियम के निदेशक श्री कुलकर्णी भी शामिल थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अपने बच्चों के साथ आग पर चले। अपने व्याख्यान में श्री स्टेलबैण्ड ने मानव मन की असीम क्षमता के दावे पेश करते हुए कहा कि कुछ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वास और संकल्प</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति के विकास के लिए बहुत जरूरी होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए उनकी रक्षा की जानी चाहिए। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस व्यावहारिक उदाहरण से मन की असाधारण सामर्थ्य का पता चलता है। कई बार सोते समय स्वप्नावस्था में भी व्यक्ति को ऐसा लगता है कि कोई तुझे छू रहा है। जागृत अवस्था में जैसे कोई दूसरा व्यक्ति किसी के शरीर को छूता है- उस समय जो अनुभव होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचा इन्द्रिय को ठीक वैसा ही अनुभव स्वप्नावस्था में होता है जबकि वहाँ दूसरा व्यक्ति नहीं होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मन के सहारे यह भी संभव है:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">केवल मन की शक्ति से त्वचा इन्द्रिय में ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सभी ज्ञानेन्द्रियों में ही वह-वह अनुभूति (</span>Sensation<span lang="hi" xml:lang="hi">) उत्पन्न हो जाती है। जैसे कोई गन्ध नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी नासिका उस विशिष्ट गन्ध को ग्रहण करने लगती है। कान शब्द सुनने लगते हैं। आँखें तो रूप देखती ही हैं। रसना बिना किसी पदार्थ के ही विशिष्ट रस को ग्रहण करने में सक्षम हो जाती है। यों तो हम सब को यह एक सामान्य घटना लगती है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु ध्यान दिया जाए तो बड़ा आश्चर्य होता है कि कैसे मन ही उस इन्द्रिय के अन्दर वह संवेदना उत्पन्न कर देता है जो कि जागृत अवस्था में बाह्य विषय के साथ संयोग से ही सम्भव है। यह मन की एकाग्रता की शक्ति के कारण हो पाता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उक्त घटना को यहाँ पर उद्धृत करने का यह भाव किसी अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं बल्कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">यदि हमारा मन किसी विषय में पूर्ण विश्वासी हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उस विशेष अवस्था में वह अपरिमित बल से भरा हुआ होता है। सारा शरीर-तन्त्र मन का आज्ञानुवर्ती हो जाता है। क्या यह छोटी बात है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">सो जो कुछ भी शुभ या अशुभ जैसा भी मन को सिखा दिया या समझा दिया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन की ओर से उसी के अनुसार प्रतिक्रिया होती है। मन को सिखा दिया है कि विषयों में सुख है तो ठीक उसी के अनुसार प्रत्युत्तर (</span>Response<span lang="hi" xml:lang="hi">) मिलता है और विषयों में दु:ख देखना सिखा दिया जाता है तो फिर उसे सदा दु:ख ही दिखायी देता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं शान्त हूँ</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">मन के द्वारा यह सोचते ही सब कुछ शान्त हो जाता है। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं आज बड़ा अशान्त हूं’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अशान्ति की ही शंखला चालू हो जाती है। किसी भी उपाय से हमारे आन्तरिक विश्वास में यह बात अच्छे से बिठा दी जाती है कि मन तो हमारा महाशत्रु है तो वह सदा शत्रु रूप में ही दिखता है। मन को एक घनिष्ठ मित्र के रूप में देखने की दृष्टि विकसित हो जाती है तो फिर वह मित्र ही दिखायी देता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पाठकों के समक्ष दोनों प्रकार के साधकों की अपनी-अपनी दृष्टि उपस्थित कर दी गई है। आगे जिसको जो पसन्द हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयं ही चुनाव करना सबकी जिम्मेदारी है।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>सितम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Sep 2015 21:46:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ओमेगा-3 व स्वर्णरस से भरपूर गाय का दूध</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ डी</span>0 </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">एन</span>0, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">सेवानि</span>0 </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">बरिष्ठ चिकित्साधिकारी</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">चम्पावत</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3133/cow-s-milk-rich-in-omega-3-and-golden-juice"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/642.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  गाय</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> संपूर्ण संसार में सर्वश्रेष्ठ स्थान रखती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु भारतीय समाज में गाय को कामधेनु कहा गया है। हमारे लिए गाय श्रद्धा की प्रतीक भी है। भारतीय जनजीवन के हर क्षेत्र में चाहे वह कृषि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यापार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञान या धर्म हो गाय का विशेष महत्व है। जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कारों में गाय सदा पावन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य एवं पवित्र स्थान रखती है। गाय के शरीर के हर अंग पर देवताओं का वास माना गया है। गाय में चारों वेदों के निवास की मान्यता के पीछे भी विज्ञान है। गाय जब अपने बच्चे को दुलारती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसके मुंह से निकला फेन उस भूमि को पवित्र बनाता है। उसके हर उत्पाद में एक विशिष्ट विज्ञान काम करता है। जरूरत है गाय को धार्मिक मान्यताओं के दायरे से बाहर निकाल कर  वैज्ञानिक अनुसंधान की।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">य प्राकृति की सहचरी है। अत: भूकम्प आदि प्राकृतिक आपदाओं के आगमन से पूर्व गाय के व्यवहार में परिवर्तन होते देखा जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु हम उसे समझ नहीं पाते और उसकी उपेक्षा कर प्राकृतिक आपदा के आगोश में आ जाते हैं। गाय संवेदना शीलता एवं साहित्य की मूल आधार है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसीलिए गाय को बासी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सड़ा एवं अपना जूठा भोजन न देने का विधान है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">21 दिवसीय खीस (</span>Colustrum<span lang="hi" xml:lang="hi">) : </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तुरन्त व्यायी गाय का दूध (21 दिन तक) खीस (</span>Colustrum<span lang="hi" xml:lang="hi">) नाम से जाना जाता है। इसमें अमृत तुल्य दिव्य गुण होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके प्रयोग से शरीर में रोग निरोधक शक्ति बढ़ती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनेक असाध्य रोगों को दूर करने में सक्षम होती है। हमारे प्राचीन चिकित्साशास्त्रियों ने इसको पीयूष (अमृत) कहा है। इस पीयूष (</span>Colustrum<span lang="hi" xml:lang="hi">) से अमेरिकी वैज्ञानिकों द्वारा अनेक वर्षों के अनुसंधान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परीक्षण के आधार पर महत्वपूर्ण औषधियों का निर्माण किया गया है। इससे निर्मित कुछ औषधियों का नाम </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">लैक्टोफेरिन विद कोलोस्ट्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बोवीन कोलोस्ट्रम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">आदि हैं। भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा भी ऐसे अनुसंधान करके गोदुग्ध तथा इसके उत्पाद से प्राप्त अन्य पदार्थों से रोग निवारक औषधियाँ तैयार करने के सफल प्रयास चलने चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ विज्ञान सम्मत तथ्य सामने आये हैं कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">गौ जहां का पानी पीती है वहां दिव्य जल प्रभावित होने लगता है। गौओं का समुदाय जहां बैठकर निर्भयता से सांस लेता है वह स्थान पवित्र हो जाता है।</span>’</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिन क्षेत्रों में अधिक गौ समुदाय होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहां रोग कम पनपते हैं। जिस स्थान पर गौ समुदाय मूत्र का विसर्जन करते हैं उस स्थान पर दीमक नहीं लगती। गाय समुदाय के गोबर की खाद सभी खादों से अधिक उपजाऊ और भूमि के लिये रसवर्धक होती हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गाय का शरीर विज्ञान:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गाय के आमाशय में चार चैम्बर होते हैं -</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रथम चैम्बर रूमेन (</span>Rumen<span lang="hi" xml:lang="hi">) कहलाता है।</span>,  <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वितीय चैम्बर रेटीक्यूलम (</span>Reticulum<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>,       <span lang="hi" xml:lang="hi">तृतीय चैम्बर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ओमेसम (</span>Omasum<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">व चतुर्थ चैम्बर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">एबोमेसम (</span>Abomasum<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहलाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जुगालीकरण (</span>Chewing the cud<span lang="hi" xml:lang="hi">) से गाय के अशुद्ध पदार्थों के सेवन करने पर भी दूध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूत्र व गोबर शुद्ध हो जाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गाय और स्वर्ण तत्व:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गाय की रीढ की हड्डी के अन्दर सूर्य केतु नामक नाड़ी होती है। जब सूर्य की किरणें गाय के शरीर को स्पर्श करती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब यह नाड़ी सूर्य की किरणों से मिलकर शरीर में सोना बनाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी कारण गाय के दूध में पीलापन होता है। दूसरे शब्दों में गौ ही ऐसा दिव्य प्राणी है जिसकी रीढ़ की हड्डी में सूर्य केतु नाड़ी होती है। सूर्य केतु नाड़ी सूर्य किरणों को आकर्षित करती है। ये सूर्य किरणों गौ-रक्त में स्वर्ण तत्व बनाती हैं। यही स्वर्ण गोरस (दूध) में आ जाता है। इसीलिए गाय का दूध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मक्खन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घी आदि पदार्थ स्वर्णिम आभा वाले होते हैं। इस दूध को पीने से शरीर पूर्ण रूप से रोग मुक्त एवं स्वस्थ हो जाता है। गाय के दूध को उबालने पर भी इसके पोषक तत्व नष्ट नहीं होते।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर के विषैले प्रभाव को नष्ट करने में गाय का घी बहुत काम आता है यथा- जहरीले कीड़े के काटने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चोट लगने व शरीर पर होने वाले किसी भी विषैले प्रभाव को गाय का घी नष्ट कर देता है। रूसी वैज्ञानिकों का मत है कि गाय के गोबर से लिपी-पुती भूमि पर परमाणु बम से निकली हुई किरणें कुछ ही सेकण्ड में नष्ट हो जाती हैं। मनुष्य शरीर के लिए सभी आवश्यक पोषक तत्व एवं शक्ति तत्व केवल देशी गाय के शुद्ध दूध में पाये जाते हैं जो बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चेतना एवं जीवनी शक्ति वर्धक होते हैं। इसी प्रकार बायोगैस बनाने के लिए गाय के गोबर का उपयोग कर प्राकृतिक सम्पदा को सुरक्षित रखा जा सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गाय के गोबर से बने उपले जलने पर वातावरण के अनुपयुक्त कीटाणुओं का नाश करते हैं। एटामिक रिएक्टरों में विकिरण से बचाव के लिए आज भी गाय का गोबर ही कारगर है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/642.jpg" alt="64" width="900" height="693"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रमशील प्राणी:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय परम्परा में गाय के दूध को अमृत बताया गया है। आज के समान गाय को खूँटे से बाँधकर रखने की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चारा-दाना खिलाने तथा डेयरी-उद्योग जैसी व्यवस्था नहीं होती थी और न ही रासायनिक उर्वरकों एवं विषैले कीटनाशकों से प्रभावित अस्वच्छ पेयजल और आहार से प्रवाहित वातावरण में गौ पालन होता था। जबकि विश्व में वैज्ञानिक आधार पर यह सिद्ध हो चुका है कि हरे चारे पर गोचरों में स्वपोषित गाय का दूध व गोबर आदि सब रोगों के लिए औषधि का काम करता है। आयुर्वेद में स्वच्छ वातावरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वच्छ पेय जल और स्वच्छ हरे चारे पर गाय के पोषण के बारे में विस्तृत विवरण मिलता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गाय अपने सहज स्वभाव से घुमक्कड़ होती है। इधर-उधर फिर कर जंगल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोचर भूमि आदि से घास व औषधि युक्त हरे पौधों को चरते हुए बड़ी आनन्दित रहती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु डेयरी उद्योग में गायों को बांधकर रखने की व्यवस्था से श्रम विहिन गाय के दूध में वे ही विकार पैदा होते जा रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो श्रम विहीन जीवन शैली में रहने वाले मनुष्यों में आ जाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ओमेगा-3 का स्रोत:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दो हजार के दशक से ओमेगा-३ का प्रभाव मनुष्य के मस्तिष्क की चेतना शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक ता आदि से संबंधित भी समझा जाने लगा है। आज मनुष्य के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए असन्तृप्त वसा का आहार में इतना महत्व माना जा रहा है कि ओमेगा-3 की कैप्सूल को दवा के रूप में सब रोगों के लिए रामबाण बताकर अरबों रुपयों का व्यापार हो रहा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वास्तव में सारा सत्य तो गौ के अमृत तुल्य दूध में छिपा है। आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान के अनुसार जिस ओमेगा-3 को इतना महत्वपूर्ण बताया जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह संसार में केवल हरे चारे पर पोषित गाय के दूध में ही पाया जाता है। खली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिनोला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दाना आदि खिलाने से दूध में संतृप्त वसा तत्व बढ़ता हैै। यह मानव शरीर में उच्च रक्तचाप आदि से हृदय रोग को बढ़ावा देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि भ्रमणशील हरे चारे पर आधारित गौ दूध के वसा में असंतृप्त वसा (</span>EFA- Essential Fatty Acids<span lang="hi" xml:lang="hi">) ओमेगा-३ और ओमेगा-6 में कुल वसा का 25 से 30 प्रतिशत तक ही होते हैं। इनको (</span>EFA<span lang="hi" xml:lang="hi">) आवश्यक वसा कहा जाता है। यही वह वसा तत्व है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो मानव शरीर के लिए अत्यन्त आवश्यक और महत्वपूर्ण है। गाय को जितना हरा चारा मिलेगा उसके दूध में उतनी ही गुणकारी असन्तृप्त वसा की मात्रा अधिक होगी और उसके सेवन से मनुष्य उतना ही स्वस्थ एवं निरोग होगा। आधुनिक विज्ञान यह भी बताता है कि आहार में ओमेगा-३ से </span>DHA (Dehydrogenated Acid<span lang="hi" xml:lang="hi">) तत्व बढ़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी तत्व से मानव मस्तिष्क और नेत्र शक्ति बनते हैं। श्वस्न्र में दो तत्व ओमेगा-३ और ओमेगा-६ बताये जाते हैं। दोनों तत्व जब सन्तुलित अनुपात में प्राप्त होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी मानव मस्तिष्क कुशाग्र और संतुलित होता है। इसलिए गौ दूध को अमृत की संज्ञा दी जाती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>स्वास्थ्य समाचार</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>सितम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Sep 2015 21:44:41 +0530</pubDate>
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