<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/category/6104/october" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>योग संदेश RSS Feed Generator</generator>
                <title>अक्टूबर - योग संदेश</title>
                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/category/6104/rss</link>
                <description>अक्टूबर RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज के  शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य... </title>
                                    <description><![CDATA[<h4 class="MsoNormal" style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">ध्यान</span></strong></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">            प</span><span lang="hi" xml:lang="hi">तंजलि के अष्टाङ्ग योग के अनुसार </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">योगाङ्गों में सातवां अंग है। यम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम और प्रत्याहार ये पाँच योग के बाह्य अंग माने जाते हैं तथा धारणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान समाधि ये तीन अन्तरङ्ग माने जाते हैं। अन्दर के विराट् साम्राज्य में प्रवेश करने हेतु </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">धारणा</span>’, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्तर और बाह्य जगत् के बीच सेतु का काम करता है तो ध्यान उस अन्तर्जगत् में प्रथम प्रवेश द्वार के समान या प्रथम पदार्पण के समान है। संसार के भिन्न-भिन्न मत-सम्प्रदायों में साधना की विधियों में भेद हो सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन ध्यान के</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3152/shashwat-pragya-oct-2015"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/1293.jpg" alt=""></a><br /><h4 class="MsoNormal" style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">ध्यान</span></strong></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">      प</span><span lang="hi" xml:lang="hi">तंजलि के अष्टाङ्ग योग के अनुसार </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">योगाङ्गों में सातवां अंग है। यम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम और प्रत्याहार ये पाँच योग के बाह्य अंग माने जाते हैं तथा धारणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान समाधि ये तीन अन्तरङ्ग माने जाते हैं। अन्दर के विराट् साम्राज्य में प्रवेश करने हेतु </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">धारणा</span>’, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्तर और बाह्य जगत् के बीच सेतु का काम करता है तो ध्यान उस अन्तर्जगत् में प्रथम प्रवेश द्वार के समान या प्रथम पदार्पण के समान है। संसार के भिन्न-भिन्न मत-सम्प्रदायों में साधना की विधियों में भेद हो सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन ध्यान के विषय में मतभेद नहीं हो सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि ध्यान रूपी प्रवेश द्वार के बिना अन्तर्जगत् में प्रवेश हो ही नहीं सकता। अत: साधना की सभी विधियों में ध्यान अत्यावश्यक है। पतंजलि योगानुसार यम-नियम रूपी महाव्रतों का पालन करने के पश्चात् आसनसिद्ध हो जाने पर</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के माध्यम से मन व प्राण के सभी मलों का नाश करके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रियों को अपने-अपने विषयों से समेट कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन को शरीर के किसी स्थान विशेष में समाहित करके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस देश विशेष में ध्यायमान विषय को आलम्बन बनाकर ज्ञान की जो एकतानता है उसे </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं- देश बन्धाश्चित्तस्य धारणा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्</span>’’ (<span lang="hi" xml:lang="hi">योग दर्शन </span>3/1., .2) </strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् तेल की अजस्र गिरती हुई धारा के समान ध्यायमान विषय के ज्ञान का अखण्ड प्रवाह ही ध्यान है। यह ज्ञान किसी दूसरे विषय के ज्ञान से उस समय अर्थात् ध्यानकाल में सर्वथा अमिश्रित रहता है। सांख्यदर्शन में मन के निर्विषय होने को ही ध्यान कहा है </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यानं निर्विषयं मन:</span>’’-(<span lang="hi" xml:lang="hi">सांख्यसूत्र </span>6.25) <span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ निर्विषय का अर्थ है कि उस समय कोई सांसारिक विषय या इन्द्रियों का विषय चित्त में नहीं रहता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु वह बह्म ही इस समय चित्त के आलम्बन का विषय बना हुआ रहता है। साधना की दृष्टि से यह चित्त की सर्वोत्कृष्ट अवस्था है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि चित्त का कार्य है किसी विषय का आलम्बन लेकर उस पर चिन्तन करना। कठोपनिषद् में कहा है-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एतदालम्बनं श्रेष्मेतदालम्बनं परम्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते।।    -(कठोपनिषद्)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् समस्त आलम्बनों में ब्रह्म का आलम्बन ही सर्वश्रेष्ठ व बड़ा आलम्बन है। इस आलम्बन को पा लेने वाला व्यक्ति ब्रह्मलोक में महिमा को प्राप्त हो जाता है- अर्थात् ज्ञानी लोगों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्वानों व योगियों के बीच में वह व्यक्ति विशेष प्रतिष्ठा को प्राप्त होकर ईश्वर की कृपा का पात्र बन जाता है। ध्यान की उत्कृष्ट अवस्था ही योगङ्गों में अन्तिम अङ्ग समाधि में परिवर्तित हो जाती है- चित्त के आलम्बन का विषय जब केवल ज्ञानरूप न रहकर अर्थमात्र के रूप में निर्भासित होने लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान का अपना स्वरूप शून्य जैसे हो जाता है अर्थात् </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">जानामि</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार की भी अनुभूति जब नहीं होती है अर्थात् ध्येयभूत अर्थ पर आत्यन्तिक एकाग्रता होने के कारण केवल उसी अर्थ के रूप में निर्भासित होने लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान की इस अवस्था को ही </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">समाधि</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं। वे ये धारणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान और समाधि तीनों एकत्र अर्थात् एक ही आलम्बनगत हो जाते हैं तब इसे </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">संयम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">त्रयमेकत्र संयम:</span>’’ <span lang="hi" xml:lang="hi">यह संयम शब्द योगदर्शन की अपनी तान्त्रिकी परिभाषा है और उस संयम पर विजय प्राप्त करने से प्रज्ञा का प्रकाश होता है- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">तज्जयात्  प्रज्ञालोक:</span>’’<span lang="hi" xml:lang="hi">। जैसे-जैसे संयम स्थिर होता जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी क्रम में समाधिजन्य प्रज्ञा विशारद अर्थात् निर्मलतर और निर्मलतम होती चली जाती है और उस ध्येयपदार्थ का स्वरूप इस योगी के समक्ष सर्वथा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वभावेन प्रकट हो जाता है। चेतना की इस अवस्था में ही योगी कह उठता है- </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मपश्चाद् दक्षिणतश्चोत्तरेण।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अधश्चोर्ध्वं च पस्रतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम्।।  (मुण्डकोपनिषद् </span>2.2.12)</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह अमृत रूपी ब्रह्म ही मेरे सामने पीछे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दाँयें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दक्षिण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊपर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीचे सर्वत्र प्रस्रत या विराजमान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सम्पूर्ण रूप ब्रह्म में ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्म ही वरिष्ठ अर्थात् सर्वश्रेष्ठ है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>''<span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वं खल्विदं ब्रह्म</span>’’ </strong><span lang="hi" xml:lang="hi">यह सब दृश्यमान् जगत् ब्रह्म का ही मूर्त्तरूप है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रागोपहतिर्ध्यानम्-(सांख्य </span>3.30)</strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">सांख्यदर्शन के तृतीय अध्याय में कहा है कि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राग से उपहत हो जाना अर्थात् रागमुक्त हो जाना ही ध्यान है। सूत्र में राग शब्द पढ़ने से द्वेष का भी ग्रहण हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि राग और द्वेष एक ही सिक्के के दो पहलु हैं। जब व्यक्ति को किसी के प्रति राग होता है तो उस राग में बाधा डालने वाले तत्त्वों से द्वेष भी अवश्य ही होता है। पर जब वैराग्य होने से कोई कामना ही चित्त में शेष नहीं बची तो राग कैसे उत्पन्न होगा क्योंकि जहाँ चाहत है वहाँ राग है और जब राग ही नहीं बचा तो द्वेष किसी से हो ही नहीं सकता। जब चित्त में राग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वेष दोनों ही समाप्त हो गए इसका मतलब है अविद्या समाप्त हो गई और तब तो मात्र ब्रह्म रूपी विषय ही चित्त में रह गया। तब संसार भी विषय बने तो राग-द्वेष से मुक्त अपने यथार्थ रूप में उपस्थित होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी विषय का विशुद्ध ज्ञान का प्रवाह बने यही तो ध्यान है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान के मुख्य रूप से दो चरण हैं एक सम्पूर्ण अस्तित्व को भगवान् के ऐश्वर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महिमा या भगवान् की रचना के रूप में अनुभव करते हुए सबके मूल में ब्रह्म को अनुभव करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब स्वरूपों  में ब्रह्मस्वरूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब सम्बन्धों में ब्रह्मसम्बन्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब सुखों में ब्रह्मसुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब ऐश्वर्यों में ब्रह्म का ही ऐश्वर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब शक्तियों में ब्रह्म की शक्ति अर्थात् समस्त ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐश्वर्य एवं सामर्थ्य के मूल में भगवान् को ही अनुभव करना यह भगवान् का सगुण साकार ध्यान या उपासना है तथा इन सब मूर्त्तरूपों के पीछे अमूर्त्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निराकार आत्मा या परमात्मतत्त्व का साक्षात्कार जो ज्ञानमात्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिन्मात्र व आनन्दमय ब्रह्म है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें समाहित होना यह निर्गुण  निराकार ध्यानोपासना है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब यह चर्चा तो हुई उन लोगों की जो योगीजन हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्म का साक्षात्कार ही जिनका सर्वोपरि लक्ष्य है। पर प्रश्न यह उठता है कि जिनका लक्ष्य संसार है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके लिए भी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का कोई सदुपयोग है या नहीं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर है उनके लिए भी ध्यान बहुत उपयोगी है। हमारे यहाँ तो सामान्य बोल-चाल की भाषा में भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है। यदि कोई खाना खा रहा हो या पढ़ रहा हो या कहीं जा रहा हो तो घर के बड़े बोलते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाई ध्यान से खाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान से पढ़ना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान से जाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका तात्पर्य यह है कि जिस समय जो कार्य कर रहे हो उस समय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी विषय के ज्ञान पर एकाग्र रहेंगे तो उसका प्रतिफल अधिक अच्छा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधिक लाभकारी व अधिक प्रसन्नता प्रदान करने वाला होगा। अत: निष्कर्ष रूप में ध्यान मानव मात्र के लिए शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बौद्धिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाचिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहारिक व आत्मिक हर पहलू की दृष्टि से हमें एक नयी ऊर्जा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सन्तोष व सुख देने की पद्धति है। आजकल यद्यपि ध्यान के नाम पर अशास्त्रीय या अवैदिक पद्धतियाँ भी प्रचलित हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु वास्तव में ध्यान उसी व्यक्ति का घटित होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो योग के पहले </span>6 <span lang="hi" xml:lang="hi">अङ्गों का यथोचित्त पालन कर चुका है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिस प्रकार नींद की विधि तो बतायी जा सकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर अच्छी नींद किसी को दिलायी नहीं जा सकती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह तो परिणाम है जो व्यक्ति अपने कर्त्तव्य कर्मों का यथोचित्त पालन करता है उसे अच्छी नींद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके परिणाम स्वरूप मिलती है। उसी प्रकार ध्यान की विधि तो हमारे ऋषियों ने बता दी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उस की स्थिति में कोई बिना योगाङ्गों के अनुष्ठान के पहुंचा नहीं सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह तो परिणाम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अष्टाङ्ग योग के </span>6 <span lang="hi" xml:lang="hi">अङ्गों का यथोचित्त पालन करने वाले व्यक्ति के जीवन में ही ध्यान घटित होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर वह चाहे कोई संसारी हो या ब्रह्मचारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगी संन्यासी हो। ध्यान तो सभी के लिए अनिवार्य है।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शाश्वत प्रज्ञा</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3152/shashwat-pragya-oct-2015</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3152/shashwat-pragya-oct-2015</guid>
                <pubDate>Thu, 01 Oct 2015 21:59:08 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/1293.jpg"                         length="119807"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सिबकथोर्न एक दुर्लभ औषधीय पादप </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3153/sibbuckthorn-a-rare-medicinal-plant"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/sea-buckthorn.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   सिबकथोर्न (साइबेरियन पाइन एप्पल) को लेह में लेहबेरी कहते हैं। इसे ब्रह्मफल भी कहा जाता है। हार्टिकल्चर के क्षेत्र में यह पौध स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोजगार के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। लेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लद्दाख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कश्मीर के ठंडे रेगिस्तानी क्षेत्र में उभरता हुआ यह पौधा भारत में 1992 से महत्व में आया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परंपरागत चाइनीज दवाओं में इसका ८वीं सदी से औषधीय प्रयोग होता आया है। स्वास्थ्य संवर्धनात्मक पेय के लिए पहचाने जाने वाले इस पौध को चीनी औषधि निर्माता रक्त संचरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाचन तंत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचा संबंधी विकारों में प्रयोग करते थे। चाइनीज ओलम्पिक खिलाड़ियों को भी इस पेय को दिया जाता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे उनकी शारीरिक क्षमता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्य संपादन शक्ति व सहनशीलता में वृद्धि हो सके। मंगोलिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिब्बत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रूस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अफगानिस्तान की लोक कथाओं में इसका विशिष्ट वर्णन सिद्ध करता है कि सिबकथोर्न अर्थात् ब्रह्मफल प्राचीनकाल से ही जन-जन के लिए महत्वपूर्ण था। १२वीं सदी में ग्रीक देश में घोड़ों को मजबूत व ऊर्जावान बनाने के प्रयोग में यह फल लाया जाता था। इसीलिए इसे </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">हिप्पोफै</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहा गया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">चंगेजखान द्वारा संगठित आर्मी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कठोर अनुशासन व लेहबेरी इन तीन आधारों पर अपने साम्राज्य का चीन से योरोप तक विस्तार किया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस विस्तार में लेहबेरी का प्रमुख स्थान था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे उनके सैनिक मजबूत बने रहते थे। सोवियत अंतरिक्ष यात्री व खगोलशास्त्री सिबकथोर्न (ब्रह्मफल) अर्थात् लेहबेरी को विटामिन का विशेष स्रोत मानते थे तथा विकिरण के दुष्प्रभाव से बचने की बड़ी चिकित्सकीय औषधीय पदार्थ रूप में इसका प्रयोग करते थे। अंतरिक्ष उड़ानों में ऑक्सीजन की पूर्ति में भी वे इसे प्रयुक्त करते थे अर्थात् यह उनका पूर्ण आहार था।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद के समान तिब्बत की </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आम्ची सिस्टम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">एक चिकित्सा प्रणाली है। उसमें यह पौधा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अमल वेद</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">नाम से जाना जाता है। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सिरमान</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका स्थानीय नाम है। यद्यपि भारत में यह १९९२ में प्रयोग में आया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर अब भारत में इसके व्यापक प्रयोग पर विचार चल रहा है। इसके गूदे व बीज के तेल पर वैज्ञानिक रिसर्चें हो चुकी हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि सैनिकों को मजबूत बनाने तथा लेहवासियों के पोषण में इसकी बड़ी भूमिका हो सकती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सिबकथोर्न की यह झाड़ी हिमालय की ठंडी मरुभूमि पर आदिकाल से ही उपलब्ध थी। लेह-लद्दाख में 11500 हेक्टेयर में यह पौध फैला मिलता है। २४००० फीट पर तैनात हमारे आर्मी सैनिकों का 6 से 9 माह तक के लिए सामान्य जनता से संपर्क कट जाता है। इस दौरान इस पौध का उपयोग उनके लिए बेहतर पौष्टिक आहार तैयार करने में किया जा सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">डी.आर.डी.ओ.</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत का रक्षा अनुसंधान संगठन जो ठंडे रेगिस्तान की ऊँचाईयों पर अनुसंधान कार्य करता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाद में फील्ड रिसर्च </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">डिफेन्स इंस्टीट्यूट ऑफ हाई एल्टीट्यूट रिसर्च (</span>DIHAR<span lang="hi" xml:lang="hi">) रूप में इसे कार्य करने की मान्यता मिली। यहीं अपने पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के मार्गदर्शन में स्थानीय कृषि को विकसित करने की प्रौद्योगिकी का विकास हुआ। साथ ही स्थानीय किसानों के बेहतर उत्पाद एवं पोषण की दिशा में इस संगठन ने अनेक प्रोद्योगिकियों का प्रयोग किया। हिमालयी झाड़ियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके कांटों एवं फलों आदि के परिष्करण की दिशा में प्रयोग करके उन किसानों में जागरूकता पैदा की। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सिबकथार्न</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की विशिष्टता भी उन्हीं प्रयोगों के दौरान सामने आई। आज सिद्ध हो चुका है कि लेह-लद्दाख की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहां के लोगों को भारी मात्रा में रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में इस अनुवांशिक संसाधन सिबकथार्न की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके पत्तियों की संरचना भी महत्वपूर्ण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें अनेक पौष्टिक तत्व पाये जाते हैं। एफ.आर.एल. (डी.आर.डी.ओ.)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दा सिबकथोर्न 2006 शोध के अनुसार इसमें </span>Moisture<span lang="hi" xml:lang="hi"> (नमी) 52 - 69</span>, Total Ash<span lang="hi" xml:lang="hi"> (टोटल एश) 1.76</span>, Crude Protein<span lang="hi" xml:lang="hi"> (क्रूड प्रोटीन) 2.2 - 2.4</span>, Crude Fibre <span lang="hi" xml:lang="hi">(क्रूड फाइबर) 4.6 - 4.85</span>, Ether Extract<span lang="hi" xml:lang="hi"> (इथर एक्सट्रैक्ट) 6.6-6.94</span>, Total Carbohydrate <span lang="hi" xml:lang="hi">(टोटल कार्बोहाइड्रेट) 32-37</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एवं </span>Calcuium <span lang="hi" xml:lang="hi">(कैल्शियम) 69 </span>mg<span lang="hi" xml:lang="hi">/ 100 </span>gm<span lang="hi" xml:lang="hi"> मात्रा में पाया जाता है</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी क्रम में फलों को लेकर एफ.आर.एल. (डी.आर.डी.ओ.)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दा सिबकथोर्न 2006 की रिसर्च से प्राप्त तथ्यों के अनुसार स्वास्थ्य संतुलन संबंधी उपयोगिता के तहत इसमें </span>Total soluble solids (oB) <span lang="hi" xml:lang="hi">14.3</span>, Acidity % (as Malic acid) <span lang="hi" xml:lang="hi">2.54</span>, pH of Juice <span lang="hi" xml:lang="hi">2.15</span>, Total Sugar % <span lang="hi" xml:lang="hi">1.03</span>, Reducing Sugar % <span lang="hi" xml:lang="hi">0.96</span>, Non Reducing Sugar % <span lang="hi" xml:lang="hi">0.07</span>, Moisture % <span lang="hi" xml:lang="hi">74.58</span>, Ash % <span lang="hi" xml:lang="hi">1.8</span>,  Crude Protein % <span lang="hi" xml:lang="hi">2.64</span>, Crude Fiber % <span lang="hi" xml:lang="hi">3.54</span>, Total Carbohydrates % <span lang="hi" xml:lang="hi">20.56</span>, β-Caro<span lang="hi" xml:lang="hi"> पाये जाते हैं। जो स्वास्थ्य के लिए भरपूर आहार है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्य उपयोगी संसाधन:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह पौध पहाड़ी बंजर भूमि के वनीकरण के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है। इसकी लकड़ी वाणिज्य के लिए अति उपयोगी मानी गयी है। अब इसकी गुणवत्ता बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक संरचनात्मक संयंत्र की दिशा में कदम बढ़ेंगे। यद्यपि पौध लगने के 8 साल बाद सिबकथार्न से वाणिज्यिक उत्पादन शुरू हो जाता है। इसकी उपज प्रति हेक्टेयर 10-15 टन है। जबकि 8 साल बाद इससे प्रतिवर्ष 200-300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पत्ते प्राप्त किये जा सकते हैं। इसके बीज ब्राउन कलर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कठोर कवक से युक्त 4.5 द्वद्व के होते हैं। जबकि फल ओरेंज एलोकलर का होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें बीज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गूदा व कवर होता है। जबकि फल में विटामिन सी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फैटी एसिड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओमेगा-3</span>, 5, 6, 7, <span lang="hi" xml:lang="hi">एवं ओमेगा-9 पाये जाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्यवर्धक प्रयोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह एंटी कैंसर (एक्टी कारसियोजनिक) है। एमिनो माडोलेटा है। एंटी एन्फ्लामेशन है। रेडियोडर्मीटाइटिस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नान रेडियोडर्मिटाइटिस एवं शारीरिक अल्सर (गैस्टिक व ड्यूडेनल अल्सर)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अम्ल-पित्त आदि रोगों में यह काम करता है। यह बुढ़ापा (</span>Anti Ageing<span lang="hi" xml:lang="hi">) कम करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि यह बुढ़ापा लाने वाले तत्व फ्री रेडिकल निर्माण को कम करता है। इसके अन्य प्रभाव भी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रक्त परिसंचरण तंत्र पर प्रभाव:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कार्नरी हर्ट डिजीज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय क्षमता को बढ़ाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्लड के फैट लेवल को कम करने के साथ ब्लड वैशल (नलिकाओं) को पोषण प्रदान करने में सहायक है। इसमें असंतृप्त फैटी एसिड पाया जाता है जो कालेस्ट्रॉल को कम करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्लड प्रेशर को नियमित करता है तथा अरिद्मीय (</span>ARRYTHEMIA<span lang="hi" xml:lang="hi">) को रोकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कैंसर कारक तत्व का प्रतिरोधक:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कैंसररोध में प्रभावी स्रोत सिद्ध होता है। यह कैंसर सेल्स को रोकता है एवं कैंसर कारक तत्व का प्रतिरोधक है। शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। एण्टीबॉडी को बढ़ाकर शरीर के कैंसर प्रतिरोधी क्षमता में वृद्धि करता है। साथ में ऑपरेशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कीमो थैरेपी एवं रेडियेशन के प्रभावों को कम कर जीवन स्तर में वृद्धि करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह एंटी एजिंग है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुढ़ापा को रोकने में सहायक है। आयुवृद्धि संबंधी कोशिकाओं को नियंत्रित करता है जिससे व्यक्ति में बीमारियों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है। यह लीवर सिरोसिस प्रतिरोधी है अर्थात् यह शरीर एन्जाइम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पित्त अम्ल को सामान्य करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अंतत: कह सकते हैं कि लेह-लद्दाख के लिए ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु संपूर्ण मानव एवं प्राणिजगत के लिए यह पौध </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सिबकथार्न</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मफल अर्थात् लेह बेरी ऐसी संजीवनी बनकर उभर रही है जो स्वास्थ्य संवर्धक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपचारात्मक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोकथाम (डिजिज प्रिवेंशन)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दीर्घायुष्य (एंटी एजिंग) में काम करता ही है। देश के युवा वर्ग के लिए रोजगार कारक भी है। पतंजलि आयुर्वेद एवं डीआरडीओ के बीच इसकी हस्तांतरित टेक्रोलॉजी से न केवल सैन्य शक्ति को मजबूती मिलेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही देश का  आर्थिक तंत्र भी मजबूत होगा। लेहवासियों के आर्थिक निर्माण एवं समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होगा।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3153/sibbuckthorn-a-rare-medicinal-plant</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3153/sibbuckthorn-a-rare-medicinal-plant</guid>
                <pubDate>Thu, 01 Oct 2015 21:58:29 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/sea-buckthorn.jpg"                         length="74261"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पोषक, स्वास्थ्यवर्धक पुनर्नवा</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3154/nutritious--healthy-punarnarva"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/213.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">     वैज्ञानिक नाम : </span>Boerhavia diffusa Linn.<span lang="hi" xml:lang="hi"> (बोरहविया डिफ्यूजा) </span>Syn-Boerhavia repens var-diffusa (L.) Hook.f; Boerhavia adscendens Willd. <span lang="hi" xml:lang="hi">कुलनाम : </span>Boerhavia diffusa Linn.<span lang="hi" xml:lang="hi"> (निक्टैजिनेसी)</span>;  <span lang="hi" xml:lang="hi">अंग्रेजी नाम : </span>Hogweed <span lang="hi" xml:lang="hi">(हौगवीड)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृत : पुनर्नवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शोथघ्री</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशाख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वेतमूला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दीर्घपत्रिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कठिल्लक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शशिवाटिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षुद्रवर्षाभू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दीर्घपत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिराटिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्षाङ्गी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्षाही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धनपत्र</span>;  <span lang="hi" xml:lang="hi">हिन्दी : लाल पुनर्नवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सांठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गदहपुर्ना</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">उर्दू : बाषखीरा</span>, (Bashkhira<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">कन्नड़ : सनाडिका (</span>Sanadika<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">गुजराती : राती साटोडी (</span>Rati satodi<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वसेडो (</span>Vasedo<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">तमिल : मुकत्तै (</span>Mukurattei<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुकरातै (</span>Mukaratte<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">तेलुगु : अतिकामामिदि (</span>Atikamamidi<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">बंगाली : पुनर्नबा (</span>Svera punarnaba<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">नेपाली : औंले साग (</span>Onle sag<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">पंजाबी : खट्टन (</span>Khattan<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">मराठी : पुनर्नवा (</span>Punarnava<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">मलयालम : थाजूथमा (</span>Thazuthama<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">ताविलमा (</span>Tavilama<span lang="hi" xml:lang="hi">) अंग्रेज़ी : इरेक्ट बोएर्हविया (</span>Erect boerhavia<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पाइडरलिंग (</span>Spiderling<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्प्रैडिंग हौग वीड (</span>Spreading hog weed<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हॉर्स पर्सलिन (</span>Horse purslane<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिगवीड (</span>Pigweed<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">अरबी : हांडा कुकी (</span>Handakuki<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सबाका (</span>Sabaka<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">फारसी : देवासापत (</span>Devasapat<span lang="hi" xml:lang="hi">). </span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बाह्यस्वरूप:</span></strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"> </span>यह विसरित शाखित मृदुरोमश अथवा चिकना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शाकीय पौधा है। इसके काण्ड लगभग १.२ मी. लम्बे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुधा बैंगनी वर्ण के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर्व पर स्थूल होते हैं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">शाखाएँ पतली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थूल पर्वों से युक्त  तथा जमीन पर फैली हुई होती है। इसके पत्र सरल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विपरीत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लट्वाकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिकने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मांसल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">2.5-5 सेमी लम्बे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्ध्व पृष्ठ पर हरित वर्ण के एवं अरोमश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध:पृष्ठ पर साधरणतया श्वेत सूक्ष्म शल्कीय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्येक पर्व पर दो पत्र होते हैं जिनमें एक पत्ती छोटी तथा एक बड़ी होती है। इसके पुष्प रक्त गुलाबी अथवा श्वेत वर्ण के अत्यधिक छोटे होते हैं। इसके फल 1.3 सेमी लम्बे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">5 शिरा युक्त तथा कृ ष्णाभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिपचिपे एक बीज युक्त  होते हैं। इसकी मूल श्वेत मूल पुनर्नवा की अपेक्षा कम मोटी किन्तु लम्बाई में अधिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बीच से टूट जाने वाली ऊपर की ओर मोटी तथा नीचे की ओर पतली व अनेक उपमूलों से युक्त  होती है। मूल को तोड़ने से दूध जैसा गाढ़ा रस निकलता है। मूल स्वाद में कड़वी उग्रगन्धी होती है। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल अगस्त से जनवरी तक होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रासायनिक संघटन:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पूर्ण पौधे में क्षाराभ पुनर्नवीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ट्राईएकॉनटेनॉल</span>, β-<span lang="hi" xml:lang="hi">सिटोस्टेरॉल</span>, 5-7<span lang="hi" xml:lang="hi"> डाईहाइड्रोक्सी </span>3-4<span lang="hi" xml:lang="hi"> डाईमीथॉक्सी</span>, 6-8<span lang="hi" xml:lang="hi"> डाईमिथाईल फ्लेवोन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिरीसील</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिरिस्टिक अम्ल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऑक्सेलिक अम्ल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पोटैशियम नाईट्रेट एवं अन्य पोटैशियम लवण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्लाईको प्रोटीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हेन्ट्राईएकोन्टेन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्सोलिक अम्ल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्लूकोस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जायलोस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्लूक्यूरोनिक अम्ल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गेलेक्टोस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रु-्र-अराविनोस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रु-रेहेम्नोस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ट्राईएकोन्टेनोल पुनरनवोसाईड </span>β-<span lang="hi" xml:lang="hi">एकडीसॉन तथा बोराविनोन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्च एवं ष्ट पाया जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेदीय गुण-कर्म एवं प्रभाव:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पुनर्नवा शोथहर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीतल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदयोत्तेजक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शूलहर तथा मूत्रल है। इसका प्रयोग शोथ रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जलोदर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पांडु और मूत्राकृच्छ्र तथा वृक्क विकारों में किया जाता है।  इसका विशिष्ट प्रभाव गुर्दों और मूत्रवह संस्थान पर पड़ता है। इसलिए यह मूत्रल और शोथहर है। यह रक्तवह संस्थान और हृदय पर भी अच्छा असर डालती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह मूत्रल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शोथघ्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विषघ्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृद्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रसायन दीपन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्रणरोपक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्रणशोथपाचन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वृष्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्त भारवर्धक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुलोमन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रेचन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कासघ्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वेदजनन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठघ्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वरघ्न तथा मेदोहर है। पोटैशियम नाइट्रेट की उपस्थिति के कारण यह हृदय की मांसपेशियों की संकुचन क्षमता को बढ़ाता है। दूसरी मूत्रल औषधियाँ जहां शरीर में पोटैशियम नाइट्रेट की मात्रा का ह्रास करती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं पुनर्नवा मूत्रल होने के साथ-साथ पोटैशियम प्रदायक है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रक्त पुनर्नवा तिक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कटु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रूक्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लघु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कफपित्तशामक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वातकारक</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">रुचिकारक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्निदीपन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्राही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शोथघ्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रसायन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तस्तंभक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्रणरोपण तथा मलसंग्राही होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह शोफ </span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाण्डु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृद्रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तप्रदर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कण्डू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तपित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अतिसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तविकार तथा उदररोग नाशक होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वेत पुनर्नवा-कटु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कषाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उष्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रूक्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कफवातशामक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रुचिकारक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्निदीपन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वेदोपग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुवासनोपग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कासहर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वय:स्थापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृद्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर तथा क्षारीय होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह शोथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्श</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्रण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाण्डु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदररोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उर:क्षत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तविकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नेत्ररोग तथा हृदयरोग नाशक होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके पत्रों का जलीय सार मधुमेहनाशक क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/1213.jpg" alt="12" width="800" height="816"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">औषधीय प्रयोग एवं विधि:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>शिरोरोग-</strong>प्रात:काल पुनर्नवा मूल त्वक् चूर्ण का नस्य लेने तथा हलवे का भोजन करने से शिरोवेदना का शमन होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नेत्र रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>नेत्रशुक्र</strong>-समभाग श्वेत अपराजिता मूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वेत पुनर्नवा मूल तथा जौ के कल्क से नेत्रों में अंजन करने से नेत्रशुक्र रोग में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पुनर्नवा मूल को नारी दुग्ध में घिसकर नेत्रों में लगाने से नेत्रशूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नेत्रकण्डू आदि रोगों में लाभ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पुनर्नवा मूल को मधु में घिस कर लगाने से नेत्रस्राव का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पुनर्नवा मूल को घृत में घिसकर लगाने से नेत्रपुष्प रोग में लाभ होता है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पुनर्नवा मूल को तैल में घिसकर लगाने से मोतियाबिंद में लाभ होता है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पुनर्नवा मूल को कांजी में घिसकर लगाने से निशान्धता (रात्रि अंधता) रोग में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वेत पुनर्नवा मूल को घृत में पीसकर अंजन करने से नेत्र रोगों का शमन होता है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पुनर्नवा मूल में मधु मिलाकर पीसकर अंजन करने से रक्तस्राव का शमन होता है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पुनर्नवा मूल स्वरस में भाङ्गरा स्वरस मिलाकर लगाने से नेत्रकण्डु में लाभ होता है तथा गोमय स्वरस में श्वेत पुनर्नवा मूल तथा पिप्पली मिलाकर अंजन करने से नक्तांध्य (रात्रि अंधता) में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पुनर्नवा की जडों को पीसकर घी में मिलाकर अंजन करने से आंख की फूली कट जाती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पुनर्नवा की जड़ों को पीसकर शहद में मिलाकर अंजन करने से आंख की लालिमा दूर होती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पुनर्नवा की जडों को भांगरे के रस के साथ घिसकर आंखों में लगाने से नेत्रकण्डु का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पुनर्नवा की जडों को केवल जल के साथ घिसकर आंखों में लगाने से मोतियाबिंद में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मुख रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>मुखपाक-</strong>पुनर्नवा की जडों़ को दूध् में घिसकर छालों पर लेप करने से मुखपाक में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वक्ष रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कास-</span></strong>1-2<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम पुनर्नवा मूल चूर्ण में समभाग शक्कर मिलाकर दिन में दो बार खाने से शुष्क कास का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>दमा-</strong>पुनर्नवा मूल के तीन ग्राम चूर्ण में </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम हल्दी मिलाकर प्रात: सायं खिलाने से दमे में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>उर</strong>: क्षत-यदि उर: क्षत के रोगी के थूक में बार-बार रक्त आ रहा हो तो </span>5-10<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम पुनर्नवा मूल तथा शाठी चावलों के चूर्ण को मुनक्का के रस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूध और घी में पकाकर पीने के लिए रोगी को देें।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय रोग: </span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय रोगों में पुनर्नवा के पत्तों का शाक अत्यन्त लाभकारी है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यह हृदय रोगजन्य अस्थमा में अत्यन्त लाभकारी है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उदर रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>क्षुधवर्धनार्थ-</strong>पुनर्नवा मूल के </span>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम चूर्ण को पीसकर शहद के साथ खाने से भूख बढ़ती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विरेचनार्थ</strong>-पुनर्नवा मूल चूर्ण को दिन में दो बार चाय के चम्मच जितनी मात्रा में लेने से मृदु विरेचक का काम करता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>उदर रोग</strong>-पुनर्नवा मूल को गोमूत्र के साथ देने से सब प्रकार के शोथ तथा उदर रोगों का शमन हो </span>   <span lang="hi" xml:lang="hi">जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>जलोदर-</strong>पुनर्नवा के </span>40-60<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिलीफाण्ट में </span>1-2<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम शोरा डालकर पिलाने से जलोदर में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>उदररोग</strong>-हरीतकी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोंठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुडूची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुनर्नवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देवदारु या दारुहरिद्रा से निर्मित क्वाथ में गुग्गुलु तथा गोमूत्र मिला कर पीने से उदररोग तथा तज्जन्य शोथ का निवारण होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>गुल्म-</strong>पुनर्नवामूल तथा कालशाक में सैन्ध्व मिलाकर सेवन करने से गुल्म तथा तोद (सुई चुभाने जैसी पीड़ा) में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पुनर्नवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काली मिर्च</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरपुंखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोंठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्रक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरीतकी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करंज तथा बेल मज्जा इन औषधियों से निर्मित </span>20-30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली क्वाथ का सेवन करने से बवासीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुल्म तथा ग्रहणी में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">यकृत्प्लीहा रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>पांडु-</strong>पुनर्नवा पीलिया रोग की बहुत गुणकारी औषधि है। </span>10-20<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली पुनर्नवा पंचाङ्ग रस में हरड़ का </span>2-4<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम चूर्ण मिलाकर पीने से पीलिया में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>प्लीहावृद्धि-</strong>श्वेत पुनर्नवा की </span>10-20<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम मूल को तंडुलोदक के साथ पीसकर देने से प्लीहावृद्धि में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>पाण्डु रोग-</strong>पुनर्नवादि मण्डूर को तक्र के साथ सेवन करने से खून की कमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिल्ली बढ़ना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बवासीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विषम ज्वर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शोथ ग्रहणी तथा उदरकृमियों का शमन होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वृक्कवस्ति रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>मूत्रकृच्छ्र</strong>-पुनर्नवा के </span>5-7<span lang="hi" xml:lang="hi"> पत्तों को </span>2-3<span lang="hi" xml:lang="hi"> नग काली मिर्च के साथ घोंट छानकर पिलाने से मूत्र त्याग में कठिनता जैसे रोग में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>5-10<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली पुनर्नवा के पत्र रस को दूध में मिलाकर पिलाने से मूत्र मूत्रकृच्छ्र में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम पुनर्नवा मूल चूर्ण को शहद या गुनगुने जल के साथ सेवन करने से शोथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूत्रकृ च्छ्र तथा मूत्रदाह का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">वृक्क विकार-</span>10-20<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली पुनर्नवा पंचाङ्ग क्वाथ को पिलाने से गुर्दे के विकारों को भी दूर करता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमेह-</span>1</strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम पुनर्नवा पुष्प चूर्ण में </span>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम मिश्री मिलाकर दुग्ध् के साथ सेवन करने से प्रमेह में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजनन संस्थान रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदर रोग- </span></strong>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम पुर्ननवा मूल चूर्ण को जलभांगरे के रस के साथ सेवन करने से प्रदर में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>योनिशूल-</strong> पुनर्नवा स्वरस को योनि में लेप करने से योनि शूल का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>सुखप्रसव</strong>- पुनर्नवा मूल को तेल में स्निग्ध करके योनि में धारण करने से प्रसव शीघ्र हो जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">गर्भाशय विकार जन्य अनार्तव में पुनर्नवा की जड़ और कपास की जड़ का फाण्ट पिलाने से लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सोंठ तथा पुनर्नवामूल को बकरी के दूध में पीसकर योनि में लेप करने से योनिशोथ का शमन होता है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पुनर्नवा के पत्तों को घोंटकर गोली बनाकर योनि में रखने से प्रसव पीड़ा से होने वाले योनि:शूल का शमन होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अस्थिसंधि रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>वातकंटक</strong>- श्वेत पुनर्नवा मूल को तेल में पकाकर पैरों में मालिश करने से वातकंटक रोग दूर हो जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>आमवात- </strong>पुनर्नवा के क्वाथ के साथ कपूर तथा सोंठ के </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम चूर्ण को सात दिन तक सेवन करने से आम का पाचन होकर आमवात में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचा रोग:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>कुष्ठ- </strong>इसको सुपारी के साथ खाने से कुष्ठ में लाभ होता है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विद्रधि- </strong>श्वेत पुनर्नवा की </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम जड़ को </span>500<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली पानी में पकाकर चतुर्थांश शेष क्वाथ बनाकर </span>20-30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली मात्रा में सुबह-शाम पीने से अपक्व विद्रधि नष्ट होती है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन में सतत नवीनता लाने वाले सर्व हितकारी पुनर्नवा को जीवनचर्या में स्थान दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य लाभ पायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे भारतीय वनौषधि विज्ञान का पोषण होगा और सबमें आरोग्यता आयेगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>वनौषधियों में स्वास्थ्य</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3154/nutritious--healthy-punarnarva</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3154/nutritious--healthy-punarnarva</guid>
                <pubDate>Thu, 01 Oct 2015 21:55:43 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/213.jpg"                         length="507369"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>स्वभाव, व्यवहार व आचरण में परिवर्तन से बनेगा सही इंसान</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">स्वामी रामदेव</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3155/change-in-nature--behavior-and-conduct-will-make-you-a-right-person"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/782.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   समाज </span><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व निर्माण की दिशा में गतिशील हर तंत्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती है सही व नेक इंसान का होना। सही व नेक इंसान ही संसाधन व तंत्र का सही हित में संधान कर सकता है। पतंजलि योगपीठ के विश्व निर्माण का केन्द्रक है व्यक्ति। व्यक्ति निर्माण के मार्ग से ही ऋषियों का यह देश भारत पुन: जगतगुरू के पद पर प्रतिष्ठित होने में सक्षम बनेगा। इसी संकल्पना से मनुष्य के व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वभाव व आचरण के परिष्करण के लिए इस लेख में ऋषियों द्वारा अपनाये गये सूत्रों को प्रस्तुत किया जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे हर मनुष्य अपने जीवन की सबसे बड़ी चुनौती या समस्या जटिल स्वभाव में परिवर्तन</span><span lang="hi" xml:lang="hi">’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कर सके और जीवन की सबसे बड़ी सफलता या उपलब्धि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छा स्वभाव</span><span lang="hi" xml:lang="hi">’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छा व्यक्तित्व</span><span lang="hi" xml:lang="hi">’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राप्त कर सके।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वात्सल्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निराभिमानिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पवित्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सात्विकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मचर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चोरी न करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संतोष रखना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुस्सा न करना इत्यादि हमारे मूल स्वभाव के लक्षण हैं। एक वाक्य में कहें तो जिस स्थिति में हम चौबीस घण्टे सहज भाव से रह सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही हमारा स्वभाव है और जिससे कुछ ही समय के बाद हम विचलित होकर उससे निकलना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छूटना चाहते हैं- वह स्वभाव आरोपित किया स्वभाव है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा मूल स्वभाव नहीं है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">घर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संगठन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र और पूरे विश्व में जो भी दु:ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कष्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्लेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संघर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टकराव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनमुटाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">झगड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परेशानी व पीड़ायें हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन सबका एक ही कारण है बुरा स्वभाव। अक्सर हम लोगों को यह कहते हुए सुनते हैं कि यह तो स्वभाव से ही लाचार है अथवा मैं अपना स्वभाव नहीं बदल सकता। मैं तो ऐसा ही हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या करूं इत्यादि।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं व्यक्ति माता-पिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घर-परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐश्वर्य सबकुछ छोड़ सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु बुरे स्वभाव को छोड़ना महाकठिन है। देश के प्रधानमंत्री</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रपति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्योगपति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धनवान या विद्वान् बन जाना हमारे लिए जरूर कठिन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर स्वभाव को बदलना संसार में सबसे कठिन है। खास बात यह कि-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृतिरेषा भूतानां</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निवृत्तिस्तु महाफला।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रह किं करिष्यति।।</strong></span> (गीता.)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् व्यक्ति जीवन भर शास्त्रों</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संतों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुजनों से अच्छी-अच्छी बातें जानता व सुनता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन बावजूद अपना स्वभाव उसे वहीं लाकर खड़ा कर देता है। सुनना और जानना निरर्थक हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बुरी आदतें मुख्य रूप से दो स्तर पर होती हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>वैयक्तिक दोष-</strong> जो हमें ज्यादा दु:ख देते हैं तथा दूसरों को थोड़ा कम दु:ख देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे देर से उठना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आहार की अनियमितता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असंतोष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशुचिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नास्तिकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अकर्मणयता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यायाम आदि न करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरों से सेवा लेना इत्यादि व्यक्तिगत दोष हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>सामाजिक दोष-</strong> वाणी और व्यवहार से हिंसा करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चोरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">झूठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब्रह्मचर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कदाचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुराचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कठोर बोलना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चुगली करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तोड़फोड़ करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुटबाजी करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरों की खिल्ली उड़ाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">झगड़े करना या करवाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरों पर शक करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईर्ष्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वेष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घृणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नफरत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज या संगठन में फूट डालना आदि ये ऐसे दोष हैं जिनका हमें ज्ञान नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर ये अपने साथ-साथ परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र और विश्व को भी कष्ट देने वाले होते हैं। इस प्रकार ये सामाजिक दोष हुए जिनसे मुक्त होना जरूरी है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक प्रश्न और है कि हमारी मूल प्रकृति के शुद्ध होते हुए भी हमारे स्वभाव में दोष क्यों आ जाता है</span>?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसका सीधा सा कारण है हमारे अंदर इन्द्रिय दोष या संस्कार दोष का होना। स्वभाव तो एक परिणाम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक कार्य है। इसके कारण दो प्रकार के हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञात  अथवा  दृश्य कारण- ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्ठा और कर्म का परिणाम </span><span lang="hi" xml:lang="hi">होता है स्वभाव अर्थात् जैसा ज्ञान-वैसी निष्ठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसी निष्ठा-वैसी प्रवृत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसी प्रवृत्ति-वैसा संस्कार और जैसे संस्कार-वैसा स्वभाव। ज्ञान जितना परिष्कृत होगा उतना ही स्वभाव बदलता जायेगा। अल्पज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिथ्याज्ञान के कारण ही हमारी निष्ठायें डगमगाती हैं और बार-बार भूल करने से हमारे वैसे ही संस्कार और स्वभाव बन जाते हैं। इसलिए ज्ञान का अतिरेक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्ठा की पराकाष्ठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म अर्थात अत्यन्त पुरुषार्थ हमें बुरे स्वभाव से बचा सकते हैं। जैसे किसी शुभ कर्म में हम इतने तल्लीन हो जायें कि गलत सोचनेे के लिए समय ही न मिले। इसी प्रकार हमारा स्वभाव हमारे संकल्पों का ही परिणाम है। दृढ़ संकल्प से हम बुरे से बुरे स्वभाव को भी बदल सकते हैं। पर जब तक हम कारण को नहीं समझेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक निवारण नहीं होगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>दूसरा अज्ञात अथवा अदृश्य कारण </strong>अनादिकाल से चले आ रहे जीवन प्रवाह की अनेक योनियों में से होकर हम मनुष्य योनि में आये हैं। उन सब योनियों के संस्कार भी सूक्ष्म रूप से हमारे चित्त में समाहित रहते हैं। बुरे स्वभाव को बदलने से पहले प्रश्न यह उठता है कि मैं अपने स्वभाव को क्यों बदलना चाहता हूँ। इसके अनेक उत्तर हो सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे गुरु ने कहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्रों</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> में लिखा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरे लोग कहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज ऐसा मानता है इसलिए अथवा मैं खुद ही अपने बुरे स्वभाव से परेशान हूँ या हानि देख रहा हूँ इसलिए। इनमें से दूसरा कारण स्वभाव परिवर्तन के लिए अधिक कारगर है। यह अवस्था आते ही स्वभाव में बदलाव सुनिश्चित हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वभाव व संस्कारों को ऐसे बदलें:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मन:स्थिति तथा परिस्थिति के अनुसार स्वभाव परिवर्तन के कुछ तात्कालिक प्रचलित उपाय हैं और कुछ अंतिम या दीर्घकालिक उपाय हैं। तात्कालिक में जैसे गुस्सा आ रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ठण्डा पानी पी लें। किसी को देखकर ईर्ष्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वेष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घृणा उत्पन्न होती है तो ईश्वर का स्मरण कर लें इत्यादि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सदा-सदा के लिए स्वभाव परिवर्तित करने हेतु कुछ उपाय इस प्रकार हैं-</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने अनुभव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति व अन्त:करण की प्रेरणा से प्राप्त ज्ञान का आदर करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् इन सभी स्रोतों से प्राप्त ज्ञान के अनुसार ही जब हम जीवन जीयेंगे तो हमारे स्वभाव में दोष पैदा ही नहीं होगें। हम अपनी मूल प्रकृति से जुड़े रहेंगे। हम खुद भी शान्त रहेंगे और दूसरों को भी अशान्त नहीं करेंगे। गुरु के प्रति अखण्ड निष्ठा होने पर उनके द्वारा प्रदत्त मार्गदर्शन से अत्यंत दोषपूर्ण स्वभाव भी बदल जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यह तथ्यपूर्ण है कि जब हम अपने दोष को हृदय से स्वीकार कर लेते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसका निवारण भी कर लेते हैं। महापुरुष एक बार दु:ख का दर्शन करके सदा-सदा के लिए उससे मुक्त हो जाते हैं जैसे महर्षि दयानन्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महर्षि रमण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महात्मा बुद्ध इत्यादि। अपने दोषों की स्वीकारोक्ति के साथ कुछ क्रियायें भी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे-</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान व प्रार्थना करें-</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong> </strong>नियमित ध्यानयोग व प्रभात संकल्प का अभ्यास करें। ध्यान व प्रार्थना यदि प्रामाणिकता के साथ सच्चे हृदय से निकलती हैं तो उसका उत्तर हमें अवश्य मिलेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सत्संग के द्वारा-</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> ऐसे तेजस्वी महापुरुष जिनका प्रभाव हमारे हृदय पर पड़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके संग से भी स्वभाव परिवर्तित हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण पुरुषार्थ-</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong> </strong>कर्माशय सूक्ष्म होने से कर्माशय को तो हम नहीं बदल सकते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु पूर्ण पुरुषार्थ से अपने प्रारब्ध को बदल सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे समझें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वाध्याय-</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong> </strong>जो आप्तपुरुष आज हमारे बीच में सशरीर नहीं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके वचनों को बार-बार पढ़कर वैसा ही आचरण करने से भी स्वभाव परिवर्तित हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रायश्चित द्वारा:</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> प्राय: निश्चय से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्त-तप करना अर्थात् निश्चय के साथ जो तप किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह प्रायश्चित है अर्थात् बिना किसी और को बताये उपवास आदि के द्वारा अपने आपको स्वयं दण्डित करने से भी मनुष्य भविष्य में वैसी भूल करने से बच जाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि सामान्य भाषा में हम कहें तो व्यक्ति का स्वभाव ही है कि जिसमें वह सुख देखता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस कार्य में प्रवृत्त होता है और जहाँ हानि देखता है उससे बचना चाहता है। पर हो सकता है जिसमें वह सुख देख रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें सुख न हो जैसे- बीड़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिगरेट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शराब आदि पीने वाला उसमें सुख देखता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसीलिए उसमें प्रवृत्त होता है लेकिन वास्तव में उसमें सुख नहीं है किन्तु जैसा भी अल्प ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिथ्या ज्ञान उसके पास है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके अनुसार वह अपने लाभ वाला कार्य मानकर ही करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हम सचमुच अपने बुरे स्वभाव को बदल सकते हैं:</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अपने स्वभाव में आज तक कुछ न कुछ परिवर्तन न किया हो संसार में ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं है। जब हम एक दोष को छोड़ सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दूसरे दोषों को भी छोड़ सकते हैं। शान्तचित्त होकर ध्यानावस्था में अच्छे संस्कारों को उभारकर बुरे संस्कारों को क्षीण करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही स्वभाव परिवर्तन का अंतिम व सशक्त उपाय है। तो इसके लिए हम क्यों न अभी से तत्पर हो लें।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3155/change-in-nature--behavior-and-conduct-will-make-you-a-right-person</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3155/change-in-nature--behavior-and-conduct-will-make-you-a-right-person</guid>
                <pubDate>Thu, 01 Oct 2015 21:53:19 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/782.jpg"                         length="49301"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>यदि साधी न गयी अपनी उम्र</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. नागेन्द्र कुमार नीरज</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">योगग्राम</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">हरिद्वार</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3156/if-sadhi-does-not-live-her-life"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/871.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    बुढापा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> अभिशाप नहीं है। उम्र बढ़ने के साथ शरीर में अनेक परिवर्तन होने लगते हैं। शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने से अनेक बीमारियाँ घर करने लग जाती हैं। कमजोरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहनशीलता की कमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिड़चिड़ापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदनशीलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चलते-चलते गिर जाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चलने में कठिनाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जोड़ों तथा हड्डियों में दर्द आदि अनेक रोग लक्षणों से अक्सर वरिष्ठ नागरिक जूझते रहते हैं। इस आयु के लोगों में सुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसन्नता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सक्रियता एवं उत्साह भी कम होने लगता है। यह स्थिति तब आती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि मनुष्य अपनी प्रत्येक आयु के विज्ञान को नजरंदाज करता है और समुचित पोषण से वंचित रहता है। विशेषज्ञों ने आयु के सात प्रकार बताये हैं- 1. वास्तविक उम्र</span>, 2<span lang="hi" xml:lang="hi">. जैविक उम्र</span>, 3<span lang="hi" xml:lang="hi">. मानसिक उम्र</span>, 4<span lang="hi" xml:lang="hi">. नैतिक उम्र</span>, 5<span lang="hi" xml:lang="hi">. आध्यात्मिक उम्र</span>, 6<span lang="hi" xml:lang="hi">. भावनात्मक उम्र</span>, 7<span lang="hi" xml:lang="hi">. सामाजिक उम्र। प्रस्तुत लेख इसके प्रयोग व विश्लेषण पर आधारित है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जैविक उम्र (</span>Biological Age<span lang="hi" xml:lang="hi">) शरीर के अंग प्रत्यंग दिल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिमाग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फेफड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हडिड्यों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खून रक्त वाहिनियाँ स्नायु तथा पाचन संस्थान की कार्य क्षमता पर निर्भर करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह शरीर की सक्रियता एवं देह की भाषा परिभाषा से झलकती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">साइकोलॉजिकल अर्थात् मानसिक उम्र दिमाग तथा मन के विकास पर निर्भर करती है। बहुत से ऐसे लोग जिनकी उम्र अधिक होती है किन्तु व्यवहार बच्चों की तरह होता है। उनमें धैर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धिमता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निपुणता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साहस एवं पराक्रम का अभाव होता है। निर्णय लेने की क्षमता नहीं होती है। ऐसे लोगों की साइकोलॉजिकल उम्र कम होती है। जबकि जिनकी साइकोलॉजिकल उम्र ज्यादा होती है वे ऊर्जा से लबालब होते हैं। पराक्रमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साहसी एवं बुद्धिमान होते हैं। निर्णय लेने की क्षमता गजब की होती हैं। ऐसे लोग ही असंभव को संभव बनाने की क्षमता रखतेे हैं। साइकोलॉजिकल एज हमारे कार्य करने की शैली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बातचीत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचार-विचार एवं सोच के माध्यम से झलकती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भावनात्मक उम्र (</span>Emotional Age<span lang="hi" xml:lang="hi">):</span></strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong> </strong></span>भावनाओं को हम कितनी जल्दी नियंत्रित कर पाते हैं। अनियंत्रित भावनाएं तथा शीघ्रता से भावनाओं के वशीभूत हो जाने से वास्तविक तथा जैविक उम्र भी प्रभावित होती है। हमारा जीवन नैतिक मूल्य प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करूणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्याग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समन्वय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षमता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शील</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सौजन्यता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहृदयता आदि के प्रति जिस अवस्था में समर्पित होता है। उन्हीं स्तर के दिव्य नैतिक गुणों से हमारा जीवन समृद्ध होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही नैतिक उम्र कहलाती है। 25 साल का नवयुवक भी नैतिक उम्र में समृद्ध हो सकता है। जबकि 75 साल का व्यक्ति भी नैतिक उम्र की दृष्टि से दीन-हीन हो सकता है। आध्यात्मिक उम्र (</span>Spritual Age<span lang="hi" xml:lang="hi">) भी शरीर के उम्र का मोहताज नहीं होती है। स्वामी रामतीर्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विवेकानन्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महर्षि अरविन्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शंकराचार्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्ध आदि कम उम्र में ही आध्यात्म के क्षितिज पर पहुँचे हुए लोग थे। वास्तविक उम्र इन सम्बद्ध पुरुषों की बहुत ही कम थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु आध्यात्मिक दृष्टि से इन्होंने खूब जिया। इसी प्रकार सामाजिक उम्र होती है। सामाजिक एवं पर्यावरणीय परिवेश के साथ आप किस प्रकार सामंजस्य किस उम्र में बैठा पाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी पर सामाजिक उम्र निर्भर करती है। बहुत से ऐसे लोग हुए है जो बहुत ही कम उम्र में समाज के साथ समरसता पैदा कर उसका नेतृत्व किया है। नई दिशा प्रदान की है। वीर भगत सिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुभाष चन्द्र बोस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केनेडी आदि इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्लेषक मानते हैं कि दो व्यक्तियों की क्रोनोलॉजिकल (वास्तविक) उम्र एक समान हो सकती है किन्तु बायोलॉजिकल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इमोशनल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्प्रिचुअल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एथिकल तथा सोशल उम्र एक समान नहीं होती। क्रोनोलॉजिकल को छोड़कर अन्य उम्र निर्भर करती है आपके आहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर्यावरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिन्तन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पालन-पोषण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा ध्यान पर। जबकि सभी प्रकार की उम्र का सारा दारोमदार दिमाग की सक्रियता पर निर्भर करता है। दिमाग से हम जितना काम लेेंगे वह उतना ही सक्रिय रहेगा और हम हर प्रकार की उम्र की दृष्टि से दीर्घायु होंगे। 75 साल के बूढ़े 25 साल के जवान की तरह जोश व जवानी से भरपूर काम करने के जनून तथा मंजिल को प्राप्त करने के जज्बे से भरे हो सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं 25 साल के नवजवान की बायोलॉजिकल उम्र 75 साल के बूढ़े की तरह हताश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निराश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनेक काल्पनिक रोगों से ग्रस्त एवं संत्रस्त हो सकती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य की आयु जीवन शैली पर निर्भर करती है। खान-पान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रहन-सहन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिन्तन-मनन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आहार-विहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार एवं व्यवहार एवं बीमारी की स्थितियों पर क्रोनोलॉजिकल एवं बायोलॉजिकल आयु निर्भर करती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन दिनों विकसित देशों के औसत उम्र में 5 से 16 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है तथा 2025 तक 25 प्रतिशत तक होने की सम्भावना है। भविष्य में किशोरों की अपेक्षा बूढ़ों की संख्या ज्यादा होगी। विकसित देशों में पुरुषों की औसत उम्र 80 साल तथा औरतों की औसत उम्र 86 है। 75 से 80 साल अधिक औसत आयु क्रमश: हांगकांग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऑस्ट्रेलिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कनाड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इंग्लैण्ड तथा सर्वाधिक जापान की है। बांग्लादेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नाइजेरिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इजिप्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इण्डिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लंका एवं चीन के लोगों की भी औसत आयु बढ़ी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु विकसित देशों से काफी कम है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जब उम्र बढ़ने लगे:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे विरले एवं भाग्यशाली ही होते है जिनका बुढ़ापा बिना बीमारी के आनन्द एवं आरोग्यप्रद होता है। उम्र बढ़ने के साथ शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक एवं भावनात्मक परिवर्तन प्रारम्भ हो जाता है। जिसके चलते बुजुर्ग लोग अपने आपको असमर्थ एवं असहाय समझने लगते हैं। उम्र बढ़ने के साथ शरीर क्रिया विज्ञान की दृष्टि से अनेक फिजियोलॉजिकल परिवर्तन होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मस्तिष्क एवं स्नायु सम्बन्धी परिवर्तन:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">45 साल के बाद प्रतिदिन एक हजार स्नायु कोशिकाएं निष्क्रिय होकर नष्ट होने लगती हैं। कई क्रेनियल नर्व्स डिजेनरेट होने लगते हैं। न्यूरोलन लॉस के कारण आर्गेनिक कन्फ्यूजन बढ़ जाता है। ज्ञानेन्द्रिय सम्बन्धी संवेदनाओं में कमी आने (</span>Degenration of Cranial Nerves<span lang="hi" xml:lang="hi">) से देखने सुनने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वाद सुगन्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पर्श सम्बन्धी संवेदनाओं में कमी आने लगती है। जैसे कॉकलियर डिजनरेशन से प्रेसबायोक्युसिस (बुढ़ापे का हाइटोन बहरापन) होता है। आँखों की लेन्स में लचीलापन कम हो जाता है। वे कठोर हो जाती है। फलत: बुढ़ापे के  समीप दृष्टि दोष (</span>Presbyopia<span lang="hi" xml:lang="hi">) लेन्स का ओपेसीफिकेशन होने से मोतियाबिन्द हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रीढ़ की ग्रेमैटर से निर्मित हार्नसेल्स (</span>Dorsal Ventral Anterior Horn Cell<span lang="hi" xml:lang="hi">) नष्ट होने लगते हैं मांसपेशियां कमजोर होने लगती है। उन पर नियंत्रण नहीं रहता। मांसपेशियों का हास एवं क्षय प्रारम्भ हो जाता है। डार्सल कॉलम के नष्ट होने से शरीर का अंगविन्यास एवं अवस्था (पोस्चर एवं पोजिशन) लड़खड़ाने लगती है। अनुकम्पी संवेदना कम होने लगती है। शरीर पर नियंत्रण खत्म होने लगता है। चलने-फिरने से गिरने की संभावना बढ़ जाती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उम्र बढ़ने के साथ दिमाग में खून की आपूर्ति कम होने लगती है। रक्त वाहिनियों के एन्डोथेलियल फंक्शन तथा रक्त रसायनों में परिवर्तन होने से दिमागी रक्त अस्त-व्यस्त हो जाता है। तब ब्रेनहेमरेज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थ्राम्बोसिस तथा स्ट्रोक होने की संभावना बढ़ जाती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सामान्य व्यक्ति के दिमाग में खास प्रकार के पांच लाख रंगीन नाइग्रा कोशिकाएं होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो डोपामिन का स्राव करती हैं। उम्र बढ़ने के साथ कुछ खास लोगों या कोल गैस पॉदजनिंग के कारण ये कोशिकाएं तेजी से नष्ट होती हैं। जिससे पार्किन्सन रोग होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ लोगों के दिमाग में एमीलॉइड बीटा एमीलॉइड पॉलीपेप्टाइड के चकत्ते ज्यादा बनने से एलजीमर्स तथा डिमेन्शिया (बुढ़ापे का पागलपन) रोग पनपने लगता है। बुढ़ापे में वंशानुगत दिमागी बीमारी हनटिंग्टन्स कोरिया भी जोड़ पकड़ता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बुढ़ापे में उच्च रक्तचाप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुमेह तथा मोटापा इत्यादि अनेक बीमारियाँ मुसीबतों के जन्मदाता बन जाते हैं। बौद्धिक प्रदर्शन लड़खड़ाने लगता है। उठने बैठने तथा चलने की क्षमता एवं सक्रियता कम होने लगती है। शरीर का अंग विन्यास तथा गाईट बेढंगा होने लगता है। अचानक ब्लैक आउट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुस्ती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर में गर्मी की कमी हाइपोथर्मिया आदि के लक्षण दिखते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बुढ़ापे में रोगों का आक्रमण तो होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु उसे संयमित दिनचर्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आहारचर्या तथा योग-प्राणायाम व आयुर्वेदिक अनुपान के द्वारा रोका भी जा सकता है। तो क्यों न हम ऋषि प्रणीत प्रयोग करें और सदैव निरोग बने रहें।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>स्वास्थ्य समाचार</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3156/if-sadhi-does-not-live-her-life</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3156/if-sadhi-does-not-live-her-life</guid>
                <pubDate>Thu, 01 Oct 2015 21:51:44 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/871.jpg"                         length="167144"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मेरे लिए दृष्टि आई ड्रॉप एक चमत्कारी औषधि बनी</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं रक्षा मंत्रालय ऑर्डनेन्स फैक्ट्री अम्बाझारी नागपुर का आई.ओ.एस.एस. एण्ड सं. महा प्रबंधक सेवानिवृत अधिकारी हूँ। मैं 50 वर्ष की उम्र से पढ़ने का चश्मा प्रयोग करता आ रहा हूँ किन्तु कोई आँखों की बीमारी नहीं थी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं अपनी आँखों के रूटीन चेकअप के लिए नागपुर के प्रमुख आँख अस्पताल </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">माहात्मे आई बैंक एण्ड आई हॉस्पिटल</span>  <span lang="hi" xml:lang="hi">नागपुर में 28 मई 2011 (रजिस्ट्रेशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">303519) को दिखाया। पूरी तरह चेक करने के बाद डॉक्टर ने बताया कि आपके आँख में कैट्रेक्ट/ मोतियाबिंद शुरू हुआ है। अत: 5-6 माह के अन्दर आप को मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराना पड़ेगा। उन्होंने मुझे पुराने</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3157/drishti-eye-drops-became-a-miracle-medicine-for-me"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/435.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं रक्षा मंत्रालय ऑर्डनेन्स फैक्ट्री अम्बाझारी नागपुर का आई.ओ.एस.एस. एण्ड सं. महा प्रबंधक सेवानिवृत अधिकारी हूँ। मैं 50 वर्ष की उम्र से पढ़ने का चश्मा प्रयोग करता आ रहा हूँ किन्तु कोई आँखों की बीमारी नहीं थी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं अपनी आँखों के रूटीन चेकअप के लिए नागपुर के प्रमुख आँख अस्पताल </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">माहात्मे आई बैंक एण्ड आई हॉस्पिटल</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नागपुर में 28 मई 2011 (रजिस्ट्रेशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">303519) को दिखाया। पूरी तरह चेक करने के बाद डॉक्टर ने बताया कि आपके आँख में कैट्रेक्ट/ मोतियाबिंद शुरू हुआ है। अत: 5-6 माह के अन्दर आप को मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराना पड़ेगा। उन्होंने मुझे पुराने चश्मा पहनने की सलाह दी तथा कई प्रकार की दवाईयाँ-आई ड्रॉप लिखे और बाद में पुन: दिखाने को कहा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैंने इन अंग्रेजी/ एलोपैथी दवाओं का प्रयोग न कर पतंजलि का </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">दृष्टि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आई ड्रॉप डालना शुरू किया। चार महीने तक पतंजलि की </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">दृष्टि</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">दवा डालने के बाद पुन: उसी आई हॉस्पिटल में 26 सितम्बर 2011 को दिखाया। डॉक्टर ने फिर से पूरी तरह देखा पर उन्हें मोतियाबिंद नहीं मिला। उन्होंने 2-3 बार चेक करने के बाद बताया कि अब आपको मोतिया नहीं है। मैंने उन्हें दृष्टि आई ड्रॉप के विषय में बताया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा पुराना चश्मा फरवरी 2015 में मेरे गांव मीरगंज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोपालगंज बिहार में भूल से छूट गया। मैंने 23 फरवरी 2015</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> को पटना में आई.जो.जी.आई.एम.एस. हॉस्पिटल में अपनी आँख चेक कराया। चेकअप के बाद डॉक्टर ने बताया कि आपकी आँख में मोतिया शुरू हुआ है। उन्होंने चश्मा का नम्बर देकर मुझे सस्ता चश्मा बनवाने की राय दी और कहा कि ६ माह के अन्दर आपको मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराना पड़ेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैंने फिर से पटना के पतंजलि चिकित्सालय से </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">दृष्टि</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">ड्रॉप खरीद कर डालना शुरू किया। बिहार से भेरावल गुजरात मार्च में आने पर यहाँ के पतंजलि चिकित्सालय के वैद्य ने दृष्टि डालने के साथ-साथ महात्रिफलादि घृत लेने का सुझाव भी दिया तथा मैंने २ अप्रैल 2015 से इसको लेना भी शुरू कर दिया। मुझे उम्मीद है कि मुझे पुन: ऑपरेशन की जरूरत नहीं पड़ेगी। मेंरी दृष्टि में पतंजलि की </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">दृष्टि</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">आई ड्रॉप आंखों के लिए पूर्ण प्रमाणिक औषधि बनकर उभर रही है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">भवदीय</span>,</h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">जी.एन. सिंह</span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">आई.ओ.एफ.एस. (भू.पू.)</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>दिव्य अनुभूति</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3157/drishti-eye-drops-became-a-miracle-medicine-for-me</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3157/drishti-eye-drops-became-a-miracle-medicine-for-me</guid>
                <pubDate>Thu, 01 Oct 2015 21:50:03 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/435.jpg"                         length="110790"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पतंजलि योगपीठ एवं मार्केट रिसर्च डिफेंस बॉडी (डीआरडीओ)  के बीच टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर विशेष एग्रीमेंट</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    ले</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ह के योग शिविर में सेना के जवानों व लेहवासियों के राष्ट्र उत्थान के संकल्प को मजबूत करते हुए पूज्य स्वामीजी महाराज ने योगाभ्यास कराया। इसी कड़ी में लेह के सेन्ट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ स्टडी में राष्ट्रनायक स्वामी रामदेव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्षामंत्री श्री मनोहर पारिकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेनाप्रमुख दलबीर सिंह सोहाग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डी.आर.डी.ओ. प्रमुख एस क्रिस्टोफर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धेय स्वामी चिदानंद मुनि जी एवं अन्य विशिष्टों की उपस्थिति में डी.आर.डी.ओ. (रक्षा अनुसंधान व विकास संगठन) व पतंजलि योगपीठ के बीच कुछ खास प्रकार के स्थानीय पदार्थों व हर्बल उत्पाद बनाने पर अनुबंध हुए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अनुबंध के तहत लेह</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3158/special-agreement-on-technology-transfer-between-patanjali-yogpeeth-and-market-research-defense-body--drdo"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/715.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  ले</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ह के योग शिविर में सेना के जवानों व लेहवासियों के राष्ट्र उत्थान के संकल्प को मजबूत करते हुए पूज्य स्वामीजी महाराज ने योगाभ्यास कराया। इसी कड़ी में लेह के सेन्ट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ स्टडी में राष्ट्रनायक स्वामी रामदेव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्षामंत्री श्री मनोहर पारिकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेनाप्रमुख दलबीर सिंह सोहाग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डी.आर.डी.ओ. प्रमुख एस क्रिस्टोफर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धेय स्वामी चिदानंद मुनि जी एवं अन्य विशिष्टों की उपस्थिति में डी.आर.डी.ओ. (रक्षा अनुसंधान व विकास संगठन) व पतंजलि योगपीठ के बीच कुछ खास प्रकार के स्थानीय पदार्थों व हर्बल उत्पाद बनाने पर अनुबंध हुए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अनुबंध के तहत लेह में किये गये डी.आर.डी.ओ. द्वारा शोधकार्य की उपलब्धियों का लाभ संपूर्ण देशवासियों तक पहुँचाने के लिए डी.आर.डी.ओ. व पतंजलि योगपीठ के बीच उस रिसर्च कार्य की तकनीक साझा करने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस तकनीक से तैयार होने वाले उत्पादन व बिक्री के लिए विशेष अनुबंध किया गया। इस ट्रांसफर ऑफ टेक्रोलॉजी (</span>TOT<span lang="hi" xml:lang="hi">) संबंधी डील में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड फार मैन्यू फै क्चरिंग एण्ड मार्केटिंग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">एवं </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">द प्रीमियर डिफेन्स रिसर्च इंस्टीट्यूट</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के बीच हस्ताक्षर हुए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अनुबंध में सीबकथार्न (स्थानीय फल) सप्लीमेंट व आड़ू के जूस सहित लेह स्ट्राबेरी जूस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर्बल-टी</span>, Seabuckthorn <span lang="hi" xml:lang="hi">जूस एण्ड </span>Seabuckthorn <span lang="hi" xml:lang="hi">इन पांच उत्पादों के लिए तकनीक साझा की गयी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश के रक्षामंत्री श्री मनोहर पारिकर ने कहा पतंजलि योगपीठ के साथ डीआरडीओ की तकनीक ट्रांसफर होने से लेह के लोगों को 50-60 करोड़ का रेवेन्यू प्रतिवर्ष प्राप्त होगा। पारिकर ने कहा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">लेह के लोग इसमें अप्रत्यक्ष रूप से एक पार्टनर के रूप में अपने को अनुभव करेंगे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगपीठ की योजना अनुसार पांचवर्षीय यह </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">लेह बेरी वेस्ड मैन्यूफैक्चरिंग प्रोग्राम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">होगा। जिससे 50-60 करोड़ वार्षिक का लाभांश प्राप्त होगा। इसकी मार्केटिंग प्रणाली में लोकल जनता आधारित बिजनेश होगा। बेरी जूस से लोगों को ओमेगा-9</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओमेगा-7 पोषण मिलेगा। इसके वार्षिक टर्न ओवर 2000 करोड़ रुपया रहने की सम्भावना है।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>कार्यशाला</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3158/special-agreement-on-technology-transfer-between-patanjali-yogpeeth-and-market-research-defense-body--drdo</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3158/special-agreement-on-technology-transfer-between-patanjali-yogpeeth-and-market-research-defense-body--drdo</guid>
                <pubDate>Thu, 01 Oct 2015 21:48:10 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/715.jpg"                         length="229582"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>क्या आप कब्ज़ के शिकार हैं?</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">      गेंहू</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> का पानी पीने से गैस व कब्ज की समस्या दूर होती है। सौंफ को आधा घण्टा भिगो दीजिए और उसमें मिश्री डालकर शर्बत बनाकर सेवन करने से भी गैस व पेट की अन्य समस्याएं खत्म होती हैं। इसके  लिए रात में सौंफ को पानी में उबालकर भी पी सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रात्रि को त्रिफला का सेवन भी कराया जा सकता है। कब्ज अधिक है तो हरड़ का सेवन कर सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन हरड़ का लगातार लम्बे समय तक सेवन करना स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयोगी नहीं है। इसी क्रम में कब्ज दूर करने के पतंजलि आयुर्वेद द्वारा निर्धारित</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3159/are-you-a-victim-of-constipation"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/861.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   गेंहू</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> का पानी पीने से गैस व कब्ज की समस्या दूर होती है। सौंफ को आधा घण्टा भिगो दीजिए और उसमें मिश्री डालकर शर्बत बनाकर सेवन करने से भी गैस व पेट की अन्य समस्याएं खत्म होती हैं। इसके  लिए रात में सौंफ को पानी में उबालकर भी पी सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रात्रि को त्रिफला का सेवन भी कराया जा सकता है। कब्ज अधिक है तो हरड़ का सेवन कर सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन हरड़ का लगातार लम्बे समय तक सेवन करना स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयोगी नहीं है। इसी क्रम में कब्ज दूर करने के पतंजलि आयुर्वेद द्वारा निर्धारित अन्य उपाय भी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्हें हम पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आंवला-एलोवेरा मिक्स:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शाम को खाना खाने के 1 घण्टे बाद 4 चम्मच आंवला का रस व 4 चम्मच एलोवेरा के जूस के सेवन से पेट साफ रहता है। ज्यादा कब्ज़</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> हो तो 1 गिलास गर्म पानी में 4 चम्मच आंवला और 4 चम्मच एलोवेरा मिलाकर सेवन करें। अम्लपित्त हो तो आंवले की मात्रा कम करें। गेंहू के </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वारे का रस लेेने से भी पेट साफ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नाशपाती का रस:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कब्ज का नाश करने के लिए नाशपाती के रस का सेवन करें। इससे पूरे पेट की ऐसी धुलाई होगी जैसे ऐनिमा से होती है। यह हृदय के लिए भी बहुत अच्छा है। मधुमेह के रोगी इसका सेवन करना चाहते हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसमें बिना मीठा वाली चीजें डालें जैसे ककड़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खीरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टमाटर अदि। साथ ही चावल के साथ खूब सारी सब्जियां डालकर खायें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मिक्स आटा:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">केवल गेंहू की आटे की रोटी का सेवन कब्ज को बढ़ा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: गेंहू के साथ चना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जौ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाजरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुलथी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मटर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोयाबीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मसूर आदि अनाजों से मिश्रित आटे से बनी हुई रोटी का सेवन करें। साथ ही प्रतिदिन 5-6 किमी पैदल चलें और कपालभाति व मण्डूक आसन करें। जो भी खाना हो उसे चबा-चबा कर खायें। दांतों का काम आंतों से न लें। चबा-चबाकर खाने से जो लार निकलती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह पाचक रस बनकर भोजन को पचाती है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार गेंहू की रोटी चोकर सहित खा सकते हैं। मौसमी फलों का प्रयोग करें। अमरूद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पपीता आदि। सेब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमरूद व पपीता ये तीनों पेट साफ करते हैं। जितनी भी हरी सब्जियां हैं भिण्डी को छोड़कर सभी पेट के लिए लाभकारी हैं। करेले का रस पीने से भी पेट साफ होता है। कुछ दिनों तक इन चीजों का प्रयोग करने से कब्ज़</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> तो समाप्त होगा ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आंतें भी ताकतवर हो जायेंगी। आंतें जितनी कमजोर होंगी कब्ज उतनी अधिक होगी। बथुआ और हरी चौलाई भी कब्ज में बहुत कारगर है। अंजीर व मुनक्का भी कब्ज में लाभकारी है। आप मुनक्का और अंजीर का सेवन करने से 1-2 घण्टे पहले भिगों लें। काली द्रास भी पेट के लिए लाभकारी है। इसमें आयरन होता है और हीमोग्लोबीन भी बढ़ता है। गैस में अंकुरित मेथी एवं छाछ का प्रयोग लाभकारी है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ उपाय ऐसे भी:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गर्म ठंडा सेंक पेट पर देना गैस में लाभदायक है। पवनमुक्तासन और मण्डूक आसन भी करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही कटि स्नान भी लाभकारी है। टब में गर्म पानी डालकर धीरे-धीरे पेट पर गीला तौलियां फेरें। इससे आंतों की ताकत बढ़ेगी और गैस बनने की प्रक्रिया भी कम होगी। खाने में दालों का प्रयोग कम करें और छिलके वाली दाल का ही सेवन करें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषज्ञ मानते हैं कि 40 से 50 वर्ष की आयु वर्ग के लोगों को अपने आहार में टमाटर अनिवार्य रूप से शामिल करने चाहिए। महिलाओं को 40 साल के बाद सोयाबीन की छाछ और दही लेना ही चाहिए। 50 साल के बाद </span>Hormone Imbalance <span lang="hi" xml:lang="hi">के बाद होने वाली विकृतियां जैसे प्रोस्टेट </span>Gland Enlargement] PAC<span lang="hi" xml:lang="hi"> का Level बढ़ने और कैंसर आदि से बचने का सबसे सरल तरीका है टमाटर। टमाटर में उपस्थित </span>Lycopene Pigment<span lang="hi" xml:lang="hi"> कैंसर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रोस्टेट </span>Gland <span lang="hi" xml:lang="hi">की हर प्रकार की विकृतियों को दूर करता है। प्रतिदिन 4 से 5 टमाटर को उबालकर खाना बेहद लाभकारी होता है। टमाटर को उबालने से </span>Lycopene <span lang="hi" xml:lang="hi">का </span>fibre<span lang="hi" xml:lang="hi"> जो </span>strong bond<span lang="hi" xml:lang="hi"> होते हैं वह ढीले पड़ जाते हैं। उबालने से शरीर इसे जल्दी </span>Assimilate <span lang="hi" xml:lang="hi">कर लेता है। टमाटर का सूप भी बहुत सारी बीमारियों से रक्षा करता है। परंतु टमाटर का अत्यधिक सेवन एसिडटी बढ़ाता है। प्रतिदिन 150-200 ग्राम से ज्यादा टमाटर ना लें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसे भी आजमायें:</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">कब्ज़, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थराइटिस आदि के लिए रामबाण औषधि घर पर भी तैयार कर सकते हैं। इसमें ५० ग्राम आंवला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">50 से 100 ग्राम चुकंदर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">250-300 ग्राम गाजर और 10 ग्राम कच्ची हल्दी इन सबका जूस मिलाकर प्रयोग करें। जौ के ज्वारे का प्रयोग कर सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह शरीर के हर रोगों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जुकाम से लेकर कैंसर तक को ठीक कर सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पालक व टमाटर का भ्रम क्यों</span>?:</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ लोगों में टमाटर सेवन को लेकर पथरी का भ्रम बना रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तुत: ऐसा है नहीं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी आंतों में बहुत सारे लाभदायक </span>Bacteria <span lang="hi" xml:lang="hi">होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें से एक है </span>Oxalobacter Formigenes<span lang="hi" xml:lang="hi"> इसके आंतों में कम होने या न होने से पथरी होने की संभावना बढ़ जाती है। यह बैक्टीरिया हमारे शरीर में जो </span>Calcium Oxalate<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिलकर के कैल्शियम बनाते हैं उन्हें खा जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके कारण भी पथरी ज्यादा बनती है। मात्र 5 प्रतिशत लोग जो पालक और टमाटर का सेवन करते हैं उन्हें पथरी की शिकायत होती है। शेष 95 प्रतिशत लोगों को पालक और टमाटर न खाने से भी पथरी हो सकती है।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>रोग विशेष</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3159/are-you-a-victim-of-constipation</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3159/are-you-a-victim-of-constipation</guid>
                <pubDate>Thu, 01 Oct 2015 21:46:33 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/861.jpg"                         length="125282"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वैश्विक अहिंसा की दिशा में बढ़ता पतंजलि योगपीठ का आंदोलन</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. विजय कुमार मिश्र</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3160/patanjali-yogpeeth-s-movement-moving-towards-global-non-violence"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/406.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> <strong>  अहिंसात्मक व्यक्ति अर्थात् पूर्ण पवित्र पुरुषार्थी देवत्व से ओतप्रोत मनुष्य जिसमें राष्ट्रवाद व वैश्विक उत्थान दोनों साथ-साथ प्रवाहित होते हैं। अहिंसा चेतनात्मक शक्ति है</strong></span><strong>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो जनमानस के अंत:करण में प्रवाहित होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें युगबोध के परमाणु सतत नव ऊर्जा निर्मित करते रहते हैं। यही जब अवरुद्ध हो जाती है तो जन-जन के मनों में जड़ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अकर्मण्यता जन्म लेती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिणामत: लोकमानस आत्महीनता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किंकर्तव्यविमूढ़ता का शिकार होता है जो एक प्रकार की हिंसा ही है। ऐसा समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र व ऐसा वैश्विक जगत प्रगतिशीलता से वंचित होने लगता है। मनुष्य-मनुष्य के बीच दूरी बढ़ती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानव मन में स्वबोध के तत्व निष्क्रिय हो उठते हैं। अहमजन्य टकराव बढ़ते हैं और समाज संचालन के हर तंत्र दिग्भ्रमित हो लड़खड़ा उठते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंतत: प्रत्यक्ष हिंसा पनपती है।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">Non-Violence, Non Resistance <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् अहिंसा एवं अप्रतिकार का भारतीय जीवनशैली में वैदिक काल से ही महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इस राष्ट्र का हर नागरिक अहिंसक होने के कारण ही भारत विश्व स्तर पर सिरमौर था। पर अहिंसा का आशय कायरता नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु भारतीय वैदिक कालीन सभ्यता की दृष्टि से अहिंसा मनुष्य की वीरता एवं भद्रता का समन्वय है। औचित्य के लिए जीवन को बलिदान करने का भाव है। अहिंसा के अनंत आयामी ज्ञान को प्राप्त करने के लिए सुदूर देशों से व्यक्ति यहां आते रहे। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन काल में इस शब्द को गांधी जी ने युगीन गरिमा देकर राष्ट्र को युगीन चेतना से जोड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देश स्वतंत्र हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकि न बाद के कर्णधारों ने अहिंसा शब्द की सीधे उपेक्षा तो नहीं की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु अपने चिंतन-चरित्र एवं व्यवहार के माध्यम से जैसे इसे रौंद सा डाला। अहिंसा के तथाकथित नुमाइंदे भी इस शब्द को युगीन भारत के परिपे्रक्ष्य में सही ढंग से न रख पायें। परिणामत: देश की नई पीढ़ी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहिंसा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसी शक्तिधारा से लाभान्वित होना दूर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिचित भी न हो पायी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु उसे इस शब्द से ही चिढ़ होने लगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यद्यपि संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2 अक्टूबर को विश्व अहिंसा दिवस से नवाज कर इसे जीवित बनाये रखने का प्रयास किया। पर विडम्बना ही है कि एक तरफ वैश्विक जगत में दशकों से विश्व अहिंसा दिवस मनाया जाता रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं दूसरी ओर विश्व के कई सारे देश पीड़ा से सराबोर होते रहे। इसके पीछे कारण किसी बड़े दबंग देश द्वारा न्याय के नाम पर वैश्विक जगत पर अपनी दादागिरी कायम करना रहा हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अथवा अपनी उद्धत महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति हेतु खड़े हुए कई हिंसक संगठनों द्वारा अपनी राष्ट्रीय सीमा व सीमा के परे अपनी आततायी गतिविधियों का संचालन हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंसा का एक व्यापक तांडव विश्वभर में इन दिनों देखने को मिल रहा है। वर्तमान में कई देशों में हिंसा की धारा में नहाते अपनों द्वारा अपने ही देश की नर-नारियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युवाओं को मौत के घाट उतारते आतंकवादी हरकतों से अहिंसा की आवश्यकता अधिक प्रबल हो उठी है और विश्व का आम मानस चीख-चीखकर कहने लगा है कि अब हिंसा के इस प्रत्यक्ष रूप का प्रतिकार होना ही चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अहिंसा की नयी समझ जरूरी:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पर इसके लिए हमें और गहरे उतरने की आवश्यकता है और भारतीय ऋषियों ने जिस अहिंसा के सहारे विश्व में जगतगुरू की धाक अर्जित की थी उसे समझना होगा और विश्व धरा पर उसे बोना होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तुत: भारतीय चेतना में अहिंसा का आशय केवल शरीर व मन से दूसरे को आघात न पहुँचाने तक ही सीमित नहीं था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु अहिंसा हमारी जीवनशैली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन की रीति-नीति एवं दिशाधारा थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह भी इतनी सशक्त कि औचित्यपूर्ण राष्ट्रहित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानवहित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय व लोकहित में अपनी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">हड्डियां</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्पित करने को भी जीवन का सौभाग्य और श्रेष्ठतम अहिंसा माना गया। शिवि और दधीचि सहित अनेक ऋषि इसके उदाहरण हैं। अर्थात् </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">लोक उत्थान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोकहित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र निर्माण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वहित के प्रत्येक पहलू को युगोन्मुख बनाने के लिए अपने को तिल-तिल गला देने में अहिंसा की साधना निहित है।</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">महावीर स्वामी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गौतम बुद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृष्ण सहित अनेक संत-महर्षि के माध्यम से वह परम्परा चली आ रही है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गांधी जी के अनुसार अहिंसा और सत्य का मार्ग तलवार की धार के समान तीक्ष्ण है। इसका हमारे दैनिक भोजन से भी अधिक महत्व है। सही ढंग से लिया जाए तो भोजन देह की रक्षा करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी प्रकार सही ढंग से अमल में लाई जाए तो अहिंसा आत्मा की रक्षा करती है। अहिंसा के मार्ग का पहला कदम यह है कि हम अपने दैनिक जीवन में परस्पर सच्चाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विनम्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहिष्णुता और प्रेममय दयालुता व साहस का व्यवहार करें। उन्होंने कहा अहिंसा का अनुगमन उस समय करना आवश्यक है जब तुम्हारे चारों ओर हिंसा का नंगा नाच हो रहा हो। अहिंसक व्यक्ति के साथ अहिंसा का व्यवहार करना कोई बड़ी बात नहीं है। वस्तुत: यह कहना कठिन है कि इस व्यवहार को अहिंसा कहा भी जा सकता है या नहीं। लेकिन अहिंसा जब हिंसा के मुकाबले खड़ी होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब दोनों का फर्क पता चलता है। विशेषज्ञों ने इसे अंदर बैठे ईश्वरत्व की शक्ति कहा है। सत्य की स्थापना के लिए अहिंसा एक कारगर अस्त्र है। आज राष्ट्र व विश्व के हर मानव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर तंत्र को नये सिरे से सत्यानुसंधान की आवश्यकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अङ्क्षहसा द्वारा ही संभव है। साथ ही </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहिंसा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के भी नवीन अनुसंधान की जरूरत है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पतजंलि योगपीठ के प्रयोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ का आंदोलन इसी परिप्रेक्ष्य में वैश्विक सत्यानुसंधान की दिशा में प्रयत्नशील है। दूसरे शब्दों में एक दृष्टि से </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहिंसा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की विश्वव्यापी प्रतिष्ठा की दिशा में ही इसके कदम बढ़ रहे हैं। योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद के सहारे विश्व स्तर पर संपूर्ण मानव के अंत:करण में सुसुप्त देवत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वरत्व को जगाकर अहिंसा का ही बीजारोपण हो रहा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी समाज विश्लेषक ने कहा है- समय के साथ समाज की चैतन्यता परिवर्तित हो जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिणाम स्वरूप उसकी आवश्यकतायें बदलती हैं। ऐसे में उसकी उस परिवर्तनकारी  बुनियाद को सही आयाम देने के लिए </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मौलिक परिभाषाओं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को युगीन सूत्रों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युगीन भाषाओं के सहारे परिवर्तित करनी पड़ती हैं। पतंजलि योगपीठ द्वारा इस संदर्भ में प्रयुक्त ऋषि अनुसंधित </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे सर्वव्यापी एवं मानव हितकारी अस्त्र हैं जिसके सहारे पूर्ण अहिंसा के साधकों का उदय होगा और वे एक से एक जुड़कर पूर्ण अहिंसक विश्व का निर्माण करेंगे। दूसरे शब्दों में इसे मानव में देवत्व का उदय एवं धरती पर स्वर्ग के अवतरण की दिशा में क्रांतिकारी पुरुषार्थ कह सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे मानव का उदय होगा जो अभ्युदय व नि:श्रेयस से युक्त हो। योगाभ्यास के सहारे उसका नि:श्रेयस इतना व्यापक हो चुका होगा कि उसे हर मनुष्य में अपनी ही आत्मा विकास करते दिखेगी</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरे का धन मिट्टी के समान लगेगा तथा दूसरे की स्त्री में माता समान अनुभूति होगी। भारतीय वाङ्गमय में इसे महानतम अहिंसात्मक अवधारणा मानी गई है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आशय यह कि इन तीनों स्थितियों के विपरीत आचरण करना हिंसा है। किसी ने कहा है अहिंसा जब जीवन में स्थान पाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो परोपकारिता स्वत: अंत: में जन्म लेती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे नीचे सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परोपकार व्यर्थ के शब्द ही साबित होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगाभ्यास से जब व्यक्ति का अंतकरण व्यापक होगा एवं आयुर्वेद से वह प्रकृतिस्थ बनेगा तो ये सूत्रोन्मुख सद्वृत्तियां गहराई में स्थित होंगी। तब व्यक्तिगत जीवन से लेकर सामाजिक व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय वृत्तियों के संदर्भ में एवं वैश्विक चेतना के स्तर पर अपनाई जाने वाली छोटी-छोटी अनौचित्यपूर्ण प्रक्रियाओं में उसे हिंसा के तत्व स्पष्ट होने लगते हैं और वह उसे दूर करने की दिशा में उठ खड़ा होता है। ऐसा व्यक्ति सामाजिक जीवन में भी त्याग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बलिदान प्रस्तुत करने का प्रयास करेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>संग्रहवृत्ति भी एक प्रकार की हिंसा</strong></span>:</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी संग्रह वृत्ति से दूसरे के हक का अधिग्रहण होता है। परिणामत: समाज में अभाव जन्म लेता है। कहावत भी है एक जगह का टीला संकेत करता है कि कहीं इतना ही गहरा गड्ढा भी है। वस्तुत: मानव की जरूरतें सीमित हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेट भरने के लिए कुछ मुट्ठी अनाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तन ढकने के लिए कुछ मीटर कपड़ा व एक छोटी सी छत बस इतने से ही हर मनुष्य का गुजारा चल जाता है। दूसरी ओर परमात्मा द्वारा प्रदत्त संसाधन इतने पर्याप्त हैं कि विश्व के हर व्यक्ति का कार्य सहूलियत से चल सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन कौन जानता था कि मनुष्य प्रकृतिगत संसाधनों का अंधाधुंध संग्रह मात्र अपने स्वार्थ पूत व विलास वैभव के लिए इस कदर करने लगेगा कि अपने दूसरे भाईयों के लिए कहीं जगह नहीं छूटेगी। अन्य लोग तनाव ग्रस्त और दुखी होते रहेंगे। आज इस नई प्रकार की हिंसा से हर मानव को निकालना होगा और हर मन में मिल-बांटकर खाने का दर्शन स्थापित करना होगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(35,111,161);" xml:lang="hi">अर्थोन्मादी दृष्टि भी हिंसा:</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सभ्यता के विकास के साथ-साथ मानव मन में अर्थोन्मादी दृष्टि घर करती जा रही है। हर कोई अर्जित बौद्धिक शक्ति के सहारे इसी दिशा में भाग रहा है और गर्वीले स्वर में अपने अर्जित संसाधनों पर अधिकार जताता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वास्तव में परम्परागत प्रचलन की दृष्टि से यह न्याय संगत व तार्किक भी है। सरकार एवं संविधान भी उसे तवज्जो देते हैं। शिक्षा-प्रतिभा के सहारे हमने बौद्धिक कुशलता अर्जित की और अब यदि उसी के सहारे सही रास्ते से लाखों रुपये एकत्र कर रहा हूँ तो गलत भी नहीं है। बौद्धिक कुशलता के सहारे कुछ भी अर्जित किया भी जा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन न्याय की दृष्टि से वह वैसे ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मान लिजिए सात रोटियां सात लोगों के लिए पर्याप्त है। इस प्रकार एक रोटी एक व्यक्ति के बांट में आई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर किसी ने बौद्धिक कुशलता के बल पर तिकड़मी नीति बनाकर सात में से चार रोटियां अपने पक्ष में कर लीं। इस प्रकार एक व्यक्ति के हक में चार रोटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्य छ: के बीच तीन। ऐसे में अन्य तीन व्यक्ति तो बिना रोटी के ही रहेंगे। इस दृष्टि से किसी के हक को मारना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे अभाव ग्रस्त छोड़ देना भी तो एक प्रकार की हिंसा ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो आज पूर्ण प्रचलन में है। भविष्य में यह नीति चलेगी ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहा नहीं जा सकता। पतंजलि योगपीठ का योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद व स्वदेशी अभियान में सर्वहित का सूत्र विद्यमान है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नारी जाति पर कुदृष्टि भी हिंसा:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नारी एक चैतन्य शक्ति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्मात्री है। उसकी अपनी चैतन्यतात्मक गरिमा है। वह गरिमा तभी अक्षुण्य है जब उसे समुचित सम्मान मिले। चूंकि वह निर्मात्री है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: उससे कोई नया सृजन तभी संभव बन सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब उसे उसकी गरिमानुसार स्वतंत्रता मिले। निर्णय में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संकल्प साधने में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ की धारा तय करने में आदि। यह तभी संभव हो सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब मानव मात्र नारी के प्रति कुचेष्ठाओं से मुक्त हो तथा नारी स्वयं भी अपनी नारीत्व के सम्मान को गरिमामय दिशा में नियोजित करने हेतु सचेत हो।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भविष्य को न्याय के शासन की जरूरत:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज संपूर्ण विश्व में कानून का शासन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोग उस पर भरोसा करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन फिर भी सारा विश्व भेदभाव से भरा है। यह भी एक प्रकार की जघन्य हिंसा है। वास्तव में पूर्ण अङ्क्षहसा की स्थापना के लिए हमें न्याय के शासन की जरूरत है। इस संदर्भ में परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज का कथन सर्वोत्कृष्ट है कि कानून का शासन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु न्यायपूर्ण शासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यायकारी राज्य की आवश्यकता है। जो कानून भेदभाव से भरे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें बदला जाना चाहिए और अन्यायकारी कानून समाप्त किये जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही वक्त की मांग है। क्योंकि आज न्यायालय फै सला सुनाते हैं न कि न्याय करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसीलिए फैसले से समाज निर्माण नहीं होता। समाज का मूल तत्व न्याय में छिपा है। ऋषियों-महापुरुषों ने इसीलिए सदैव न्यायकारी व्यवस्था पर जोर दिया है। इस संदर्भ में श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज कहते हैं कि न्याय दृष्टि एक प्रकार की श्रेष्ठतम अहिंसा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके बल पर वर्तमान का उत्थान एवं भविष्य का निर्माण संभव बनता है। इसी क्रम में स्वास्थ्य के प्रति न्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने स्वाद के प्रति न्याय का शासन तो स्वयं अपने हाथ है। स्वस्थ शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वच्छ मन एवं सभ्य समाज का मार्ग भी तभी प्रशस्त होगा। तब लड़का-लड़की में समानता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुरीतियों से मुक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन व भावनाओं का समुचित उपयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञानार्जन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शोषण विहीन समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आतताई आतंकवाद से मुक्ति की दिशा में व्यक्ति साहस के साथ जुटेगा और भारत का उत्थान होगा ही। वास्तव में तभी विश्व निर्माण का मार्ग तैयार होगा और तभी अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस की सार्थकता सिद्ध होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ उसी अभियान में अपने लाखों कार्यकर्ताओं सहित संलग्र है। आइये मिलकर हाथ बंटायें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3160/patanjali-yogpeeth-s-movement-moving-towards-global-non-violence</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3160/patanjali-yogpeeth-s-movement-moving-towards-global-non-violence</guid>
                <pubDate>Thu, 01 Oct 2015 21:44:20 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/406.jpg"                         length="139551"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भारत में स्वदेशी गाय से फूटेगा स्वास्थ्यवर्धक दूध का स्रोत</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. डी.एन. तिवारी</span></strong><strong><span>, </span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">सेवानिवृत्त वरिष्ठ चिकित्साधिकारी</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3161/source-of-healthy-milk-will-emerge-from-indigenous-cow-in-india"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/642.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  देशी गाय और दूध का विज्ञान: इस आश्चर्यजनक तथ्य पर ध्यान देने की जरूरत है कि </span>B.CM-<span lang="hi" xml:lang="hi">7 </span>Opioid (narcotic)<span lang="hi" xml:lang="hi"> अफीम परिवार का एक मादक पदार्थ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो बहुत शक्तिशाली (</span>oxident<span lang="hi" xml:lang="hi">) आक्सीकरण एजेण्ट के रूप में मानव स्वास्थ्य पर दूरगामी दुष्प्रभाव छोड़ता है। जिस दूध में यह तत्व होता है उस दूध को वैज्ञानिकों ने </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-1 दूध नाम दिया है। यह दूध उन विदेशी गायों में पाया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनके में ६७वें स्थान पर प्रोलीन न होकर हिस्टीडीन होता है। प्रारम्भ में जब विशेषज्ञों द्वारा </span>BCM-<span lang="hi" xml:lang="hi">7</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के कारण दूध को बड़े स्तर पर जानलेवा रोगों का कारण पाया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब न्यूजीलैण्ड के सारे डेयरी उद्योग के दूध का परीक्षण आरम्भ हुआ। डेयरी दूध पर किए जाने वाले प्रथम अनुसंधान में दूध </span>BCM-<span lang="hi" xml:lang="hi">7 से दूषित पाया गया। इस प्रकार यह सारा दूध </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-1 कहलाया। तदुपरान्त ऐसे दूध की खोज आरम्भ हुई जिसमें </span>BCM-<span lang="hi" xml:lang="hi">7</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">न हो और उस </span>BCM-<span lang="hi" xml:lang="hi">7</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से रहित दूध को </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-२ कहा गया। भारतीय देशी गायों के दूध में यह स्वास्थ्यनाशक मादक विष तत्व </span>BCM-<span lang="hi" xml:lang="hi">7</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बिल्कुल नहीं होता।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">धुनिक अमेरिकी वैज्ञानिक अनुसंधान से अमेरिका में भी यह पाया गया।कि देशी भारतीय गाय के दूध और दूध से बने पदार्थ मानव शरीर में रोग उत्पन्न नहीं होने देते। आज यदि भारतवर्ष का डेयरी उद्योग हमारी देशी गाय की उत्पादकता का महत्व समझ ले तो भारत सारे विश्व में डेयरी-दूध व्यापार में सबसे बड़ा निर्यातक देश बन सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रोगों का कारक </span>BCM-<span lang="hi" xml:lang="hi">7</span> :</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आजकल भारत में ही नहीं अपितु सारे विश्व में जन्मोपरान्त से ही बच्चों में बोध अक्षमता (</span>Autism<span lang="hi" xml:lang="hi">) और मधुमेह (</span>Diabetes<span lang="hi" xml:lang="hi">) जैसे रोग बढ रहे हैं उनका स्पष्ट कारण </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-1 दूध अर्थात् दूध में </span>BCM-<span lang="hi" xml:lang="hi">7 पाया जाना है। शरीर से स्वजन्य रोग जैसे- उच्च रक्तचाप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय रोग तथा मधुमेह का भी प्रत्यक्ष सम्बन्ध </span>BCM-<span lang="hi" xml:lang="hi">7</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">वाले दूध से स्थापित हो चुका है। यही नहीं बुढापे के मानसिक रोग भी बचपन में </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-1 दूध के सेवन संबंधी दुष्प्रभाव के रूप में देखे जा रहे हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मुख्य रूप से यह हानिकारक </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-1 दूध होलीस्टन फ्रीजियन </span>(Holstein Friesian<span lang="hi" xml:lang="hi">) प्रजाति की गाय में ही मिलता है। जो भैंस जैसी दिखने वाली अधिक दूध देने के कारण सारे डेयरी उद्योग की पसन्दीदा गाय है। होलिस्टन फ्रीजियन दूध के ही कारण लगभग सारे विश्व में डेयरी का दूध </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-1 टाइप का होता जा रहा है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और रोगों के अनुसन्धान के आंकड़ों के आधार पर यह सिद्ध हुआ है कि </span>BCM-<span lang="hi" xml:lang="hi">7</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">युक्त </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-1 दूध मानव समाज हेतु विषतुल्य है। जर्सी प्रजाति की गाय के दूध में वे पोषक तत्व नहीं पाये जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो देशी गाय के दूध में पाये जाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-1 एवं </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-2 दूध तथा विषाक्ततत्व </span>BCM-<span lang="hi" xml:lang="hi">7: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">1993 में न्यूजीलैंड के वैज्ञानिकों ने टाइप-1 डायबिटीज (इन्सुलिन डिपेन्डेंट)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आटोइम्यून डिजीज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोरोनरी आर्टरी रोग जैसी कई बीमारियों की जड़ यूरोपियन गायों के दूध में </span>BCM-<span lang="hi" xml:lang="hi">7</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">तत्व को (</span>Hypothesis<span lang="hi" xml:lang="hi">) माना गया। इसी दूध को </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-1 नाम दिया गया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यूरोपियन गोवंश में से होलस्टीन फ्रिजियन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जर्सी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्विसब्राउन आदि के दूध में </span>BCM-<span lang="hi" xml:lang="hi">7</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">विषाक्ततत्व होने का मुद्दा उठाने के बाद उन्होंने ऐसी गायों की पहचान के लिए पशु के बालों की जाँच करने की प्रणाली विकसित की और उसे पेटेन्ट भी करा लिया। </span>BCM-<span lang="hi" xml:lang="hi">7</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">तत्व पैदा करने वाले दूध के अंश को </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-१ बीटा केसीन कहते हैं और उसके पाचन से जो खतरनाक रस निर्माण होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे </span>BCM-<span lang="hi" xml:lang="hi">7</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं। </span>BCM-<span lang="hi" xml:lang="hi">7</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का पूर्ण रूप बीटा-केझो-मारफीन ७ (</span>beta caseo morphine-<span lang="hi" xml:lang="hi">7) है। इसमें अफीम का मारफीन तत्व होने के कारण अत्यन्त नशीला होता है जो धीरे-धीरे दूध सेवन करने वाले के शरीर को विषाक्त कर देता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">समझें विदेशों के शोध अंश:</span>           </strong></span>   </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">न्यूजीलैंड के वैज्ञानिकों ने जब भारतीय गोवंश की जाँच की तब सभी भारतीय गोवंश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें पर्वतीय बद्री गाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गीर गाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साहीवाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरियाणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कांकरेज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देवणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थारपारकर आदि। सभी का दूध </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-1 मुक्त अर्थात् सुरक्षित एवं स्वास्थ्यवर्धक पाया गया। इन वैज्ञानिकों के अध्ययन से प्रभावित होकर कुछ अमीर व्यक्तियों ने न्यूजीलैंड के नागरिकों के स्वास्थ्य रक्षा हेतु </span>BCM-<span lang="hi" xml:lang="hi">7 मुक्त दूध का उत्पादन और वितरण करने के लिए सन् 2000 ई. में एक निजीकम्पनी स्थापित की। उस कम्पनी का नाम </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-2 कार्पोरेशन रखा गया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रूस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जापान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पोलेंड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जर्मनी आदि ने </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-1 दूध के दुष्परिणामों का अध्ययन किया। उनका कहना है कि क्चष्टरू-7 एक चालाक शैतान तत्व है। वह जब तक रक्तमें नहीं पहुंचता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उससे कोई खतरा नहीं रहता। न्यूजीलैंड के वैज्ञानिकों को रक्त में क्चष्टरू-७ पहचानने की जाँच विकसित करने में सफलता नहीं मिली थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन रूस के वैज्ञानिकों ने गाय के रक्त में </span>BCM-<span lang="hi" xml:lang="hi">7</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ढूंढने का तरीका विकसित किया और उसका पेटेन्ट भी करा लिया। रूस के चार अनुसंधान संस्थानों के 12 वैज्ञानिकों ने अपने अनुसंधान के परिणामों से स्पष्ट किया कि जो शिशु (१ वर्ष से कम आयु वाले) </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-1 दूध पीते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके रक्त में </span>BCM-<span lang="hi" xml:lang="hi">7</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">तत्व आ जाता है। १२५ करोड़ आबादी वाले भारतीयों के स्वास्थ्य का करीबी संबंध इस विषय से है। ये सब इस संकट से अनजान हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि भारत की स्थिति:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में विगत 60-90 के दशक में चलाए गए नस्ल सुधार अभियान ने यूरोपियन गोवंश के वीर्य क्षेत्र में पशुपालन विभाग ने करोड़ों </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-2 (अच्छी) गायों को </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-1 (विषैला) बना दिया है। हम जब बाजार में थैली में दूध लेते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह कई </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-1 गायों के दूध का मिश्रण होता है। वही पीकर हम और हमारे बच्चे बड़े हो रहे हैं। अब बार-बार यह कहा जा रहा है कि भारत में टाईप-1 डायबिटीज दिल की बीमारियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऑटोइम्यून आदि रोग बढ़ रहे हैं। भारत इन बीमारियों की वैश्विक राजधानी हो गया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज भारत में </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-1 दूध (स्वास्थ्यवर्धक) </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-1 (विषैले) दूध के साथ मिलाकर बेचा जा रहा है। यदि हम </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-2 दूध स्वतंत्र रूप से बेचें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपलब्ध कराये तो भारत की आने वाली पीढ़ियाँ जहरीले दूध </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-2 से बच सकती हैं। इसके लिए </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-2 दूध के लिए एक कार्पोरेशन की स्थापना की जानी चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके विपरीत जब न्यूजीलैंड के नागरिकों को </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-2 दूध की आवश्यकता महसूस हुई तो उन्हें इस दूध को पाने के लिए 10 वर्ष तक इंतजार करना पड़ा। उन्हें भारत से </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-2 गोवंश का वीर्य या </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-2 सांड मंगवाने पड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर उनसे भारतीय नस्ल की गायें बनीं और </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-2 दूध देने लगीं। हमारे देश के सभी राज्यों में अभी सैकड़ों गोपालक हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो शुद्ध </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-2 भारतीय गायों को सैकड़ों की संख्या में पाले हुए हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत सरकार के करनाल स्थित राष्ट्रीय पशु जेनेटिक अनुसंधान संस्थान ने 2009 ई. में भारतीय गो एवं भैंस वंश की जेनेटिक जाँच की थी। दोनों में </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-2 जींस पाया गया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हम </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-2 दूध का निर्यात कर अरबों रुपये कमा सकते हैं। इसके लिए हमें कुछ नीतियाँ बनानी पड़ेंगी। जैसे-</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय गोवंश के सांड और उनके वीर्य को देश के बाहर ले जाने पर प्रतिबंध लगाया जाए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय गोवंश के दूध की </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-1 तथा </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-2 स्थिति परीक्षण के लिए राज्य सरकारें जिला स्तर पर जेनेटिक जाँच प्रयोगशालाएं स्थापित करें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-2 दूध बेचकर आने वाली राशि से </span>A<span lang="hi" xml:lang="hi">-2 दूध के मानवीय स्वास्थ्य पर होने वाले स्वास्थ्यवर्धक परिणामों के अनुसंधान हेतु चिकित्सा महाविद्यालयों एवं डेयरी दुग्ध अनुसंधान संस्थानों को प्रेरित किया जाना चाहिए।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन प्रयोगों से ही देशी गाय सुरक्षित होगी और देश में पुन: स्वास्थ्यवर्धक दूध का स्रोत फूटेगा।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पोषक उत्पाद</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3161/source-of-healthy-milk-will-emerge-from-indigenous-cow-in-india</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3161/source-of-healthy-milk-will-emerge-from-indigenous-cow-in-india</guid>
                <pubDate>Thu, 01 Oct 2015 21:42:05 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/642.jpg"                         length="119971"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>धीर की वाणी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3162/voice-of-patience"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/1511.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  प्र</span><span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्ध गायत्री मन्त्र जिसे गुरु मन्त्र होने का गौरव प्राप्त है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें प्रार्थना की गई है कि मेरी वाणी शुभ से युक्त रहे। महाराज इस विषय को एक अन्य रूपक के द्वारा भी समझाते हैं। वे कहते हैं- यह वाणी देवलोक की कन्या है। इसे नग्न मत करो। वाणी रूपी कन्या के साथ की गई खिलवाड़ तुम्हें समूल नष्ट कर देगी। कन्याएँ अनग्ना ही सुशोभित होती हैं। नग्नता ही तो अश्लीलता (अश्रीलता=शोभा रहितता) है। कन्याओं को सभी के द्वारा रक्षणीया व परम पवित्र रखने का पूर्ण प्रयास किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी प्रकार इस वाणी के साथ व्यवहार करो! रक्षित व पवित्रता का मूर्त्त रूप ये कन्याएँ जैसे सबकी रक्षा करती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे ही रक्षित वाणी के द्वारा तुम्हारी रक्षा होगी। लोक में भी कहावत है- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर से नंगा सन्त</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वाणी का नंगा बदमाश।’’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस विषय में एक है कि रक्षित वाणी कैसे रक्षा करती है। दृष्टान्त का भाव इस प्रकार है- एक युवती का विवाह हुआ। सास बड़ी क्रोधी थी और मुख की भी बड़ी कड़वी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु पुत्रवधू बड़ी समझदार और शान्त स्वभाव की थी। सास प्रात: से सायं काल तक खूब ताने देती थी। एक दिन सास ने बहू से कहा- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">न जाने तू किस मिट्टी की बनी हुई जड़ मूर्ति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो तुझ पर तनिक भी प्रभाव नहीं होता। मैं इतनी देर से चिल्ला रही हूँ और तू सुनकर भी चुप है।’’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु बहू फिर भी शान्त रही। प्रतिदिन ऐसा होता और अड़ोस-पड़ोस के लोगों को भी तमाशा देखने को मिलता। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सास एक दिन फिर ऐसे ही बरस पड़ी। धरती पर लात मार कर बोली</span>, ''<span lang="hi" xml:lang="hi">इतना चिल्ला रही हूँ। तू मिट्टी से भी गई गुजरी है।’’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">एक पड़ोसन से रहा न गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बोली- बुढ़िया ! गाय के पीछे क्यों पड़ी हुई है! तुझे अपनी जिह्वा का चसका लेना है तो फिर थोड़ा गली से बाहर आ जा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेरे अरमान पूरे कर देते हैं। उस देवी रूप बहू ने यह बात सुनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुरन्त शान्त और मधुर वाणी से कहने लगी- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">इन्हें कुछ मत कहिए। ये मेरी माँ हैं। माँ ही अपनी बेटी को नहीं समझाएगी तो फिर कौन समझाएगा </span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">बहू की मधुर वाणी ने सास के सारे क्रोध पर पानी डाल दिया। सास को फिर कभी अपनी देवी को कुछ भी सुनाते नहीं देखा गया। यह है रक्षित वाणी की शक्ति।’’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कल्पना की जा सकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहू के विरोध में खड़े होकर सास जिस प्रकार वाणी की नग्नता पर उतर रही थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी प्रकार वह देवी भी उसी के स्वर में अपना स्वर मिलाने लगती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो क्या कभी उन दोनों के क्रोध का अन्त होता</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोध सबसे पहले मन में पैदा होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर मुख से गुजरता हुआ वाणी में आ जाता है और वहाँ से भी सरक कर हाथों या पैरों में आ पहुँचता है। मनुष्य प्राय: क्रोधाभिभूत होकर वाणी को नग्न कर देता है और उसके महादु:ख रूप परिणाम को भोगता रहता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महाराज से जब पूछा जाता है कि ऐसे प्रसङ्गों में क्या करें</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वे एक ही बात कहते हैं- तितिक्षा=सहिष्णुता रूपी दृढ़ कवच को धारण करो। ऐसे मौकों के लिए ही तो यह कवच बना है। सब कुछ हमारी इच्छा के अनुसार ही ठीक-ठीक होता चला जाए तो फिर सहिष्णुता की क्या आवश्यकता ! इस बात पर जिज्ञासुओं के द्वारा एक प्रश्न और उठाया जाता है कि जी! कितना सहन करें। कोई सीमा भी है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">महाराज इस प्रश्न का बहुत ही अद्भुत उत्तर देते हैं कि भाई! सहन करो। सहन करने में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कितना’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं होता। सहन के साथ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कितना</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द जोड़ दिया जाए तो सहन करने का कुछ अर्थ ही नहीं रह जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस विषय में महाभारत (आदि पर्व) के ययाति उपाख्यान के उत्तर भाग में ययाति और इन्द्र का संवाद मिलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अतीव महत्वपूर्ण है। उस प्रसङ्ग को यहाँ उद्धृत किया जा रहा है जिसे महाराज सुनाया करते हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्राह्मणों के साथ वन में निवास करते हुए अनेक प्रकार का तप करके ययाति स्वर्ग में गये। वहाँ देवताओं ने उनका स्वागत-पूजन किया। एक बार इन्द्र ने ययाति से पूछा</span>, ''<span lang="hi" xml:lang="hi">हे राजन्! जब पुरु ने अपना रूप देकर आपसे जरा प्राप्ति की और आपने कालान्तर में उसे राज्य सौंपा तब सत्य कहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपने उसे क्या कहा</span>?<span lang="hi" xml:lang="hi">’’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ययाति ने उत्तर दिया</span>, ''<span lang="hi" xml:lang="hi">मैंने अपने प्रिय पुत्र पुरु से कहा</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">जो क्रोध नहीं करता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह क्रोध करने वाले से श्रेष्ठ है। जो सहनशील है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह उससे बढ़कर है जो सहन नहीं कर सकता। जो मानवेतर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन सबकी तुलना में मनुष्य प्रधान है। जो विद्वान् है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह न जानने वालों में प्रधान होता है। यदि कोई अपने से जली-कटी बातें कहे तो स्वयं वैसा नहीं करना चाहिए। जो उन बातों को सहन कर लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह उसके सब पुण्यों को हर लेता है। मनुष्य को चाहिए किसी का मर्म न दु:खाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी से कठोर बात न कहे। जो क्षुद्र है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उससे किसी वस्तु को ग्रहण न करे। जो वचन दूसरे को उद्वेग पहुँचाने वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय छीलने वाला है और नारकी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे कभी न कहे। जिसकी वाणी रूखी और मर्मान्तक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके शब्द शूल की तरह दूसरों को चुभते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे मनुष्य के मुख में साक्षात् नाश की देवी निऋर्ति रहती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे पुरुष को नितान्त श्रीविहीन समझना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य को चाहिए कि सदा अपना आचार आर्यों के जैसा रखे और सज्जनों का आचार ग्रहण करे। उसके सम्मुख सज्जन ही पूजा के लिए हों और पृष्ठ (पीठ) पर भी सज्जन ही रक्षा करने वाले हों। इस प्रकार सज्जनों से नाता जोड़ने वाला वह असज्जनों के तीखे वचनों को भी सहन करे। वचन रूपी बाण असज्जन के मुख से छूटते रहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनसे मारा हुआ दूसरा व्यक्ति रात-दिन छटपटाता है। जो बाण दूसरे के मर्म को छेद देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन वचन रूपी बाणों को बुद्धिमान् व्यक्ति दूसरों पर कभी न चलावे। तीनों लोकों में इस प्रकार का कोई वशीकरण मन्त्र नहीं है जिस प्रकार मीठी बोली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दान और प्राणियों के साथ मैत्रीभाव है। इसलिए सदा तुम दूसरों को मीठी बात कहो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी कड़वी नहीं। जो पूजा के योग्य हैं उन्हें सम्मान दो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सदा दूसरों को दान दो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयं कभी याचक न बनो। यही वह आर्यवृत्त है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका मैंने राज्य देते समय पुरु को उपदेश दिया।’’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य मानवेतर प्राणियों से श्रेष्ठ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गन्धर्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्नर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्ध आदि सब मानव से घटकर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि मनुष्य के पास कर्म-शक्ति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके पास दैव के दिये हुए दस अंगुलियों वाले दो हाथ हैं।‘</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इतना सुनकर इन्द्र ने ययाति को छेड़ते हुए पुन: प्रश्न किया</span>, ''<span lang="hi" xml:lang="hi">हे राजन्! सब कर्मों से छुट्टी पाकर और घर त्याग कर जब तुम वन में गये तब की बात तुमसे पूछता हँू। तुम्हारा तप किसके बराबर था</span>?<span lang="hi" xml:lang="hi">’’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">यह प्रश्न सुनकर ययाति के मन में अहङ्कार की एक रेखा दौड़ गई। उसने कहा</span>,''<span lang="hi" xml:lang="hi">देवताओं में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गन्धर्वों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्यों में और महर्षियों में मैं किसी को ऐसा नहीं देखता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका तप मेरे जैसा हो।’’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्र ने चट उनकी बात पकड़ ली और कहा- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">तुमने जो अपने सदृश हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अपने से श्रेष्ठ हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जो अपने से घटकर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन सबके प्रभाव को जाने बिना कैसे सबका तिरस्कार कर डाला </span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए तुम्हारा पुण्य सीमित हो गया। औरों को सीमित समझने से तुम भी सीमित हो गए। तुम्हारा पुण्योपार्जित लोक भी अन्त वाला हो गया। अब तुम क्षीण होकर नीचे गिरोगे।’’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इस पर ययाति ने इन्द्र के समक्ष एक बहुत ही सुन्दर माँग रखी- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">हे इन्द्र! यदि देवर्षियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गन्धर्वों और मनुष्यों का अपमान करने से मैंने अपना पुण्यलोक खो दिया है और मुझे सुरलोक से विहीन होना ही है तो हे देवराज! मैं चाहता हूँ कि मैं सज्जनों के बीच जाकर गिरूँ।’’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्र ने उनकी यह बात स्वीकार की और ययाति स्वर्ग से गिरकर सद्धर्म का जो विधान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी रक्षा करने वाले अष्टक राजर्षि के पास उपस्थित हुए। अष्टक ने उनसे पूछा- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्र के समान रूपवान् हे युवक! तुम कौन हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अग्नि की तरह स्वतेज से दीप्त हो</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">तुम्हें सूर्यपथ से नीचे आते हुए देखकर हम सब भ्रम में पड़ गए हैं कि अग्नि और सूर्य जैसे अमित प्रकाश वाला यह कौन आ रहा है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">हम सब तुम्हारे पतन का कारण जानने के इच्छुक हैं। तुम कौन हो और क्यों आये हो </span>?<span lang="hi" xml:lang="hi">’’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ययाति ने उत्तर दिया- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं नहुष का पुत्र और पुरु का पिता ययाति हूँ। सब भूतों का अपमान करने के कारण अल्प-पुण्य बनकर देवताओं और सिद्धर्षियों के लोक से च्युत हो गया हूँ। मैं आयु में तुम सबसे बड़ा हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए मैंने तुम्हें अभिवादन नहीं किया। जो विद्या में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तप में और आयु में वृद्ध होता है वही द्विजों में पूज्य समझा जाता है।’’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अष्टक ने कहा- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">क्या तुम यह कहते हो कि जो आयु में बड़ा है वह वृद्ध है </span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं इसे नहीं मानता। मेरी दृष्टि में जो आयु में वृद्ध होते हुए विद्वान् भी हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही पूज्य है।’’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रसङ्ग में ययाति और अष्टक की प्रश्नोत्तरी के रूप में महाभारतकार ने नीति-प्रधान जीवन और प्रज्ञावान् पुरुष के आचार की सुन्दर व्याख्या दी है। ययाति ने अपने जीवन में अनेक प्रकार के अनुभव किये थे। उनका कुछ निचोड़ इस वार्त्तालाप में पाया जाता है। ययाति ने अपने दृष्टिकोण की व्याख्या करते हुए कहा- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">कर्मों का प्रतिकूल आचरण ही पाप कहा गया है। जो कर्म जिस प्रकार से करना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे उसके उचित ढंग से न करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही बुराई का कारण है। जो व्यक्ति कर्म में श्रद्धा नहीं रखता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका वह कर्म भी पाप-युक्त हो जाता है। जो सज्जन हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे कभी असज्जनों का अनुसरण नहीं करते। उनकी आत्मा उन्हें अनुकूल मार्ग पर ले चलती है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन में अनेक प्रकार के भाव आते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे दैव के अधीन हैं। ऊँच-नीच-सुख-दु:ख इत्यादि सम-विषम परिस्थितियों में मनुष्य की निजी चेष्टा कुछ काम नहीं देती। मन में समझ लेना चाहिए कि विधाता वाम (विपरीत) है। ऐसा सोचकर धीर व्यक्ति अपने आपको खिन्न नहीं होने देता। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणी दैवाधीन होकर सुख या दु:ख पाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने मन से नहीं। अतएव नियति को बलवान् समझकर न दु:ख से सन्तप्त हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न सुख से हर्षित हो। धीर पुरुष सदा अपने आपको सम अवस्था में रखे। हे अष्टक! भय से कभी मुझे मोह नहीं होता। मेरे मन में किसी प्रकार का सन्ताप नहीं होता। विधाता लोक में मुझे जिस तरह चलाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे ही मैं ध्रुव भवितव्यता मानता हूँ। सुख और दु:ख दोनों अनिवार्य हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर मुझे किस बात का सन्ताप हो</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं जानता हूँ कि मुझे क्या करना चाहिए और किस प्रकार के कर्म करने से मेरे मन को पछतावा न होगा। मैं इस बात से अपने आपको सावधान रखता हूँ कि </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परिणाम में सन्ताप देने वाले काम से बचूँ। चाहे वह काम वाणी का है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर का या मन का। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अष्टक ने प्रश्नों का क्रम जारी रखते हुए कहा- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">हे ययाति! तुम्हारे कहने का ढंग ऐसा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे कोई क्षेत्रज्ञ धर्म की व्याख्या कर रहा हो। बताओ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुमने किन-किन लोकों का कैसे-कैसे उपयोग किया</span>?<span lang="hi" xml:lang="hi">’’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ययाति ने उत्तर दिया- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं इस पृथिवी पर सार्वभौम राजा था। मैंने अनेक लोकों को जीता और दीर्घ काल तक यहाँ निवास करके फिर मैं परलोक पहुँचा। वहाँ मैं इन्द्र की सहस्र द्वारों वाली और शत योजन लम्बी-चौड़ी अमरावती में दीर्घकाल तक रहा। उसके बाद प्रजापति के दिव्य अमरलोक में मैंने निवास किया। तब देवों का एक विकराल दूत मेरे पास आया और डपट कर बोला-</span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">हट! हट! हट!’’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके ऐसा कहते ही मैं क्षीण पुण्य होकर नन्दन वन से नीचे लुढ़क गया और मैंने अन्तरिक्ष से गिरते हुए अपने पीछे देवताओं की यह वाणी सुनी- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">अहो! कैसे कष्ट की बात है कि पुण्यकर्मा ययाति भी पुण्य के चूक जाने से गिर रहा है।’’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मैंने उनसे कहा- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे साथ इतनी ही भलाई करो कि मैं गिर कर भी सज्जनों के बीच में पहुँच जाऊँ’’। हे अष्टक! इस पर उन्होंने आपकी यज्ञ-भूमि की ओर संकेत किया और मैं इस हविर्गन्ध देश में आ गया ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अष्टक ने पूछा- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">नन्दनवन में इच्छानुसार सैकड़ों-हजारों संवत्सर निवास करके तुम्हें पृथिवी की ओर फिर क्यों आना पड़ा</span>?<span lang="hi" xml:lang="hi">’’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ययाति ने उत्तर दिया- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">यह तो सीधा नियम है। जिस प्रकार मनुष्य का धन क्षीण हो जाने पर उसके सम्बन्धी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मित्र और स्वजन उसे छोड़ देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे ही मनुष्य का पुण्य समाप्त हो जाने पर सब देव-संघ और उनके अधिपति झट उसे छोड़ देते हैं। ये सब लोक अन्तवान् हैं और मनुष्य के पुण्य भी समाप्त होने वाले हैं। जब पुण्य चुक जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लपलपाती हुई लालसा लिये हुए मनुष्य को पुन: इसी भूमि पर आना पड़ता है। यद्यपि वह अन्य प्रकार से क्षीण होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथापि भोगों के प्रति उसकी तृष्णा बढ़ जाती है। अतएव बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिए कि इस लोक में दुष्ट और निन्दित कर्म का परित्याग कर दे।’’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">चार कर्म यदि ठीक प्रकार से किये जाएँ तो उनसे मनुष्य को अभय की प्राप्ति होती हैं। वे कर्म ये हैं- अग्निहोत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मौनभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्ययन और सेवा। किन्तु इनको भी यदि ऐंठ से भरकर बेढंगेपन से किया जाए तो ये ही मनुष्य के लिए भयंकर हो जाते हैं। सम्मान से प्रसन्न न होना चाहिए। इस संसार में भले आदमी भलों का सम्मान करते हैं। दुष्टों में साधु बुद्धि होती ही नहीं। दान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यज्ञ और अध्ययन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये मेरे व्रत के अन्तर्गत हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्हें मैं अभय का मार्ग समझता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु यदि वे ही मान की इच्छा से किये जाएँ तो त्याज्य हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अष्टक के इस प्रश्न के उत्तर में कि आचार्य की शुश्रुषा करने वाला ब्रह्मचारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गृहस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वानप्रस्थ और भिक्षु ये सत्पथ पर चलकर किस प्रकार देव-तुल्य बन जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ययाति ने संक्षेप में उत्तर दिया-</span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु का कर्म करने के लिए जिसे प्रेरणा की आवश्यकता न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु से पहले उठने वाला और बाद में सोने वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब वह कहे तभी अध्ययन करने वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मृदु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दान्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिर चित्त वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अप्रमादी और स्वाध्यायशील ब्रह्मचारी सिद्धि का अधिकारी है।’’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गृहस्थों की पुरातनी उपनिषद् विद्या यह है कि धर्मानुसार प्राप्त धन से यज्ञ करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सदा दान दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अतिथियों को भोजन कराएँ और दूसरों के द्वारा अदत्त धन का ही ग्रहण करें।अपने परिश्रम से जीविका करने वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाप से निवृत्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आहार और कर्म में संयमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरे को दान देने वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी को न सताने वाला मुनि अरण्य में रहता हुआ सिद्धि प्राप्त करता है।जो किसी शिल्प के सहारे जीविका नहीं चलाता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो घर नहीं बनाता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो जितेन्द्रिय है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो गृहस्थी नहीं बटोरता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो थोड़ा-थोड़ा विचरते हुए देशाटन करता है और अकेला रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही सच्चा भिक्षु है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वानप्रस्थ मुनियों और उनके मौन धर्म की व्याख्या करते हुए उसने कहा- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">जंगल में रहते हुए जो गाँव को पीछे छोड़ देता है अथवा गाँव में रहते हुए जो जंगल को पीछे छोड़ देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही मुनि है।’’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार की स्थिति कैसे सम्भव है </span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके उत्तर में ययाति ने कहा</span>, ''<span lang="hi" xml:lang="hi">जो जंगल में रहने वाला मुनि है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह किसी भी ग्राम्य आचार में नहीं पड़ता । यों वह जंगल में बसकर गाँव को पीछे छोड़ देता है। और यदि वह गाँव में बसते हुए केवल उतना ही भोजन करे जिससे प्राण यात्रा हो और केवल उतना ही चीवर ग्रहण करे जितना शरीर ढकने के लिए आवश्यक हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्निहोत्र और गृहवास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इनका मोह न करे तो गाँव में बसते हुए भी वह जंगल को पीछे छोड़ देता है।’’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके बाद स्वर्ग से भ्रष्ट हुए ययाति को अष्टक एवम् अन्य लोग अपने-अपने पुण्यों से उपार्जित लोक अर्पित करते हैं किन्तु ययाति ने यह कहकर सबको अस्वीकार कर दिया कि जिसके लिए मैंने स्वयं पहले कर्म नहीं किया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं उससे चिपटने की कभी इच्छा नहीं करता।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3162/voice-of-patience</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3162/voice-of-patience</guid>
                <pubDate>Thu, 01 Oct 2015 21:40:50 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/1511.jpg"                         length="368210"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आवश्यकता है देश में सघन स्वच्छता अभियान की</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">कुमार प्रखर निर्माणी</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3163/there-is-a-need-for-intensive-cleanliness-campaign-in-the-country"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/801.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  लगता है हमने गंदगी को अपने जीवन का अंग बनाकर उसे आत्मसात कर रखा है। यही प्रकृति हमारी अनेक समस्याओं का कारण है। अस्वच्छता हमें बद्सूरत बनाती ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु अनेक प्रकार की शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक व भावनात्मक रुग्णावस्था की कारक भी बनती है। गंदगी भरे वातावरण में निवास का दुष्प्रभाव हमारे सोच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संकल्प</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवनशैली पर पड़ता है। अंतत: हम आत्मविश्वास को खोकर आत्महीनता तक के शिकार बन जाते हैं। विशेषज्ञों की मान्यता है कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्वच्छ होने का आशय स्वयं अपने कपड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने घर-परिवार व अपनी वस्तुओं को साफ रख लेना ही नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु अपने साथ-साथ दूसरों को भी इस धारा से जोड़ते चलना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे अपने आस-पास के वातावरण से लेकर इस राष्ट्र एवं विश्व में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्वच्छता</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का प्रकाश फैल सके। पतंजलि योगपीठ से जुड़े प्रत्येक कार्यकर्ता के संकल्प में स्वच्छता एक आंदोलनात्मक धारा के रूप में प्रकट होनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अपने से ही प्रारम्भ होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हम अपने घर तक क्यों सिमटें</span>?</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">पना घर झाड़कर कूड़ा किसी दूसरे के दरवाजे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नाली व सड़क पर डालना आम प्रचलन में है। इससे अपना घर तो साफ हो गया पर नाली रूके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सड़न पैदा हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कीटाणु बढ़ें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सड़क पर चलते यात्री फिसलकर गिरें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें क्या! अक्सर देखने में आता है कि कुछ लोग रेल-बस में सफर कर रहे होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूँगफली खाई और छिलका वहीं फैला दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पान खाया तो पीक वहीं थूक दी। संतरे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केले खाए और छिलका बिखेर दिया। इस प्रकार हर जगह गंदगी व अस्वच्छता फैलाना अपना अधिकार समझते हैं। अनेक लोग तो चाट-पकौड़ी खाते और जूठा पत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कागज आदि वहीं डाल देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह हवा में उड़कर राहगीरों के ऊपर पड़ता है। सड़क गंदी हुई सो अलग। इसी प्रकार मोटर साइकिल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार या स्कूटर खराब हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रास्ते में ही मरम्मत की और मोबिल व कालिख वहीं छोड़कर शान से गाड़ी पर चलते बने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीछे किसी यात्री का पैर फिसले व किसी के कपड़े नष्ट हों तो उन्हें क्या</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">लघु शंका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दीर्घ शंका लगी तो उसके लिए सुलभ शौचालय व उपयोगिता कक्ष तक न जाकर सड़क के आस-पास ही निबट लिया। यह सब विचारने पर लगता है कि आज हम अपने घर तक सिमट गये हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निहायत स्वार्थी से बन गये हैं। चौखट के बाहर चाहे कितनी भी गंदगी हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई फर्क नहीं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गाँवों में लोग अशिक्षा के कारण स्वच्छता की ओर विशेष ध्यान नहीं देते। परंतु शहरों में अस्वच्छता का कारण नागरिकों की लापरवाही और अपने नागरिक कर्त्तव्यों के प्रति उदासीनता की भावना ही है। शहरों में सफाई विभाग होते हुए भी गंदगी फैली दिखना यही लगता है कि शहरवासी गंदगी से घृणा तो कर सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परंतु उसे दूर रखने में अपना हाथ नहीं बटाना चाहते। एक दृष्टि से इसे सामूहिकता का अभाव ही कह सकते हैं।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/822.jpg" alt="82" width="900" height="600"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक तथ्य है कि स्वच्छता के अभाव में हमारा शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वातावरण दूषित हो जाता है। गंदी आदतों के कारण अपने शरीर में दाद-खाज एवं अन्य बीमारी हो जाना साधारण बात हैं। शरीर रुग्ण हो तो उसका प्रभाव मन पर भी पड़ता है। वातावरण अस्वच्छ हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो रोगाणु के फैलते देर नहीं लगती। परोक्ष हानियाँ तो प्रत्यक्ष हानियों से भी बढ़कर हैं। भारत की प्राचीन मान्यता और संस्कृति से आकर्षित होकर विदेशी लोग भारत आते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परंतु यहाँ उन्हें अपनी अपेक्षा के अनुरूप स्वच्छता न मिलने से एक दूषित भावना लेकर स्वदेश लौटकर इसकी चर्चा करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे अन्य को निराशा होती है और देश को विदेशी मुद्रा की एक बड़ी रकम से वंचित रहना पड़ता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अस्वच्छ वातावरण में रहने से हमारी भी भावनाएँ अस्वच्छ होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धीरे-धीरे हम गंदगी के अभ्यस्त होते जाते हैं। यही कारण से भारत के गांवों व शहरों में व्याप्त अस्वच्छता हमारी आँखों को बिल्कुल नहीं खटकती। अस्वच्छता का निवारण कर स्वच्छता का वातावरण बनाने के लिए देश की सरकारें तरह-तरह के प्रयोग कर रही हैं। जरूरत है देश के नागरिक भी सफाई को भगवान की पूजा का अंग बनायें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वच्छ भारत के लिए हम क्या करें:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लोगों के मन में अस्वच्छता के प्रति अरुचि जगायें तथा स्वयं  स्वच्छता का शुभारम्भ करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक संगठित क्रम से स्वच्छता अभियान भी चलाया जा सकता है। इसके लिए गाँव व मोहल्ले के कुछ सेवा भावना वाले युवकों की टोली बना लें तथा एक-एक दिन अलग-अलग मोहल्लों में जाकर सार्वजनिक स्थानों की सफाई करें। इससे वहाँ के भावनाशील लोगों में भी जागृति आएगी। इसी प्रकार गांव के कुछ अनुभवी बुजुर्ग लोगों के स्वयं सेवक दल बनें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो गांव की आवश्यकता पर विचार करें। धीरे-धीरे अन्य लोगों में भी स्वच्छता की आदत बन जाएगी और वे स्वयं स्वच्छता के लिए अभ्यस्त हो सकेंगे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चों में:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चों में स्वच्छता की आदत शाला के प्राथमिक स्तर से ही डाली जा सकती है। उन्हें अपने शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाठशाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बगीचा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घर आदि की स्वच्छता का अभ्यस्त बनाना चाहिए। इसी प्रकार शाला की बच्चों को कुछ टोलियाँ बनाकर स्वच्छता की स्वस्थ स्पर्धा कायम की जा सकती है। स्वच्छता के लिए कुछ अंक निर्धारित कर देने से भी वे अधिक आकर्षित हो सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अस्वच्छता की विज्ञान विधि:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अस्वच्छता को स्वच्छता में बदलने की वैज्ञानिक पद्धति भी विकसित कर सकें तो सफाई तो होगी ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही कूड़े का सदुपयोग भी होता रहेगा। इसके लिए गाँव-मोहल्ले में इधर-उधर पड़े कूड़े को एकत्र कर सड़ाया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अच्छी खाद बन सकती है। इस खाद के प्रयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ेगी। कई देशों में ऐसे कारखाने हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ प्रतिदिन शहर का टनों कूड़ा आता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खाद के रूप में परिणत कर दिया जाता है। परिणामत: इस तैयार खाद के प्रयोग से खेतों की पैदावार में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सब रोग मुक्त होंगे:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संक्रामक रोगों में चेचक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मलेरिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यक्ष्मा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डेगू जैसे रोग भी कितने ही ऐसे हैं जिनके मूल में अस्वच्छता या गंदगी रहती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वर्ष 1675 में अंतरराष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन अभियान के अंतर्गत अपने देश से भी मलेरिया खत्म कर दिया गया था। चेचक को लेकर कई अभियान चले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डेगू से लेकर चिकलगुनिया तक के मूल कारण गंदगी-जहाँ उसे फैलाने वाले मच्छर पैदा होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर इस देश में गंदगी जहाँ की तहाँ ही रही।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">डेगू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फाईलेरिया से लेकर अनेक रोग विशिष्ट जलवायु के गंदे स्थानों में रहने वाले मच्छरों के कारण होती है। आमतौर पर इन रोगों के कीटाणु गंदे और बंद तालाबों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सड़े कुओं और इकट्ठे हुए पानी के डबरों में पैदा होते हैं और संक्रमण पद्धति से जल्दी ही रोग फैला देते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गीली या गंदी जगह पर रहने तथा दूषित वायु के सेवन से होने वाले तपेदिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्थमा जैसे रोग की माँ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अस्वच्छता’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कही जा सकती है। सर्वेक्षण के अनुसार भारत में करोड़ों व्यक्ति आज भी ऐसे रोग के शिकार पाए जाते हैं। सबसे बड़ा कारण है गंदगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ पैदा हुए रोगाणु श्वाँस के साथ शरीर में पहुँचते और फेफड़ों में इकट्ठे होते रहते हैं। ये रोगाणु फेफड़ों को धीरे-धीरे चाटते हैं और तपेदिक का रोगी कमजोर होता जाता है। इस देश में व्यक्तिगत या पारिवारिक जीवन में भी स्वच्छता से परहेज करने वाला वर्ग बहुत बड़ा है। नित्य प्रति मलमूत्र के विसर्जन में असावधानी और लापरवाही बरत कर हम न केवल रोगों को फैलाने में सहायक बनते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वरन् अपने राष्ट्र की बहुमूल्य संपदा को भी क्षति पहुँचाते हैं।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/801.jpg" alt="80" width="800" height="533"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नित्य 15 मिनट का प्रयोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश के हर व्यक्ति मात्र 15 मिनट नित्य स्वच्छता के लिए देने का संकल्प करें तो बड़ा परिवर्तन आ सकता है। फिर भी पतंजलि योगपीठ के करोड़ों कार्यकर्ता स्वच्छ भारत-स्वस्थ भारत की दिशा में 15 मिनट के नित्य स्वच्छता अभियान में जुट चुके हैं। अन्य संगठन भी यह प्रयोग अपना सकें तो देश से अस्वच्छता गायब हो जायेगी। इस 15 मिनट के लिए हर किसी को अपना पद-प्रतिष्ठा भूलना पड़ेगा इस राष्ट्रीय अभियान के लिए। गाँवों में पाखाने की गंदगी न फैले इसका उपाय देश की सरकार घर-घर शौचालय योजना के तहत कर रही है पर एक आसान उपाय और भी है जिसे गांधी जी ने चेताया था  कि शौच को जाते समय पानी के लोटे के साथ-साथ एक खुरपी भी ले जाई जाए। शौच के लिए जहाँ बैठा जाए पहले उस स्थान पर खुरपी से एक छोटा गड्ढा बना लिया जाए तथा उसमें शौच किया जाए। शौच के बाद खुरपी से मिट्टी डालकर वह गड्ढा बंद कर दिया जाए। बड़ा गड्ढा खोदकर भी इसे तैयार किया जा सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी तरह घर से निकलने वाले नित्य के कूड़े को इकट्ठा करने के लिए दो प्रकार के पात्र रखें एक में सड़ने-गलने वाले कूड़े को डालें तथा दूसरे में ऐसा कूड़ा जो गल नहींं सकता जैसे कांच के टुकड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्लास्टिक के टुकड़े आदि डालें। बाद में एक से खाद बना लें तथा दूसरे को यथा स्थान डालें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अपने घर के गंदे पानी में साबुन आदि का प्रयोग कम करें तथा उस पानी का उपयोग अपनी घरेलू वागवानी के लिए करके स्वयं का स्वास्थ्य सुधार ही सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वातावरण को गंदा होने से भी बचा सकते है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी के साथ जहां-तहां थूकने और गंदगी फैलाने की प्रवृत्ति पर भी प्रतिबंध लगाना चाहिए। साथ ही सार्वजनिक स्थानों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घर से बाहर सड़कों पर घर का कूड़ा-करकट फेंकने की आदत दंडनीय अपराध बनाया जाय। यदि इस प्रकार के कुछ प्रयोग भी हम अपने रोजमर्रा के जीवन से जोड़ सके तो हमारा स्वास्थ्य सुधरेगा और हमारे घर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आस-पड़ोस एवं समाज के बीच से अस्वच्छता दूर होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत स्वच्छ</span>,  <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ एवं समुन्नत बनेगा।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>कार्यशाला</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3163/there-is-a-need-for-intensive-cleanliness-campaign-in-the-country</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3163/there-is-a-need-for-intensive-cleanliness-campaign-in-the-country</guid>
                <pubDate>Thu, 01 Oct 2015 21:39:56 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/801.jpg"                         length="249079"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        