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                <title>नवम्बर - योग संदेश</title>
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                            <item>
                <title>श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज के शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य... कर्म ही आनन्द</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">      आनन्द प्राप्ति की इच्छा प्रत्येक प्राणी के अन्तस् में विद्यमान होती हुई उनके कर्म का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सतत पुरुषार्थ की प्रेरणा का असज्र उत्स है। किन्तु आश्चर्य! सब कुछ करते हुए भी आनन्द को खोजता ही रह जाता है मानव।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ह</span><span lang="hi" xml:lang="hi">र एक कर्म जिसे उसके उत्साह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आनन्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गौरव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शौर्य का प्रतीक बनना (होना) चाहिए था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छोड़ जाता है उसे और भी अधिक श्रान्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्लान्त और आकुल। आखिर कारण क्या है इसका</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">निवारण क्या है इसका</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">मानव चेतना की इस व्यापक समस्या को बहुत पहले ही जान कर भगवान् श्री कृष्ण हमारे प्रश्नों का</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3181/shashwat-pragya-nov-2015"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/1622.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   आनन्द प्राप्ति की इच्छा प्रत्येक प्राणी के अन्तस् में विद्यमान होती हुई उनके कर्म का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सतत पुरुषार्थ की प्रेरणा का असज्र उत्स है। किन्तु आश्चर्य! सब कुछ करते हुए भी आनन्द को खोजता ही रह जाता है मानव।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ह</span><span lang="hi" xml:lang="hi">र एक कर्म जिसे उसके उत्साह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आनन्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गौरव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शौर्य का प्रतीक बनना (होना) चाहिए था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छोड़ जाता है उसे और भी अधिक श्रान्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्लान्त और आकुल। आखिर कारण क्या है इसका</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">निवारण क्या है इसका</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">मानव चेतना की इस व्यापक समस्या को बहुत पहले ही जान कर भगवान् श्री कृष्ण हमारे प्रश्नों का समाधान अपने ज्ञानमय व्याख्यान ग्रन्थ गीता में प्रस्तुत करते हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यायतो विषयान् पुंसस्सङ्गस्तेषुपजायते। सङ्गात् सञ्जायते कामस्ततो क्रोधोऽभिजायते।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोधात् भवति सम्मोह: सम्मोहात् स्मृतिविभ्रम:। स्मृतिभ्रंशाद बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योगस्थ कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्धयसिद्धयो समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म जो कि वस्तुत: आनन्द का अद्भुत स्रोत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे विषाक्त कर देने वाली व्यक्ति मात्र की एक ही वस्तु है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और वह है सङ्ग (आसक्ति)। सङ्गदोष से दूषित चित्त वाला व्यक्ति कामनाओं का शिकार होकर क्रोधित होता है। तदुपरान्त सम्मोहित होता है और अपने लक्ष्य को विस्मृत कर अन्तत: विनाश को प्राप्त हो जाता है। यह सरणी है उसके निम्र गमन की।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके विपरीत यदि कर्म को सचेतन सङ्गल्प के साथ पूर्ण किया जाए तो हमारे छोटे से छोटे कर्म भी हमारे लक्ष्य में समर्पित होते हुए हमारे अन्दर आनन्द के एक-एक पुष्प को खिलाते जाते हैं और ऐसे दिव्यकर्मी योगी का जीवन भर जाता है। पुण्य कर्मों की पावन मधुर सुगन्ध जो उसके अन्तर्तम को उसके आस-पास के परिवेश को सदा ही सुवासित रखती है। कर्म के इस आनन्द को पाने के लि उस दिव्यकर्मी योगी को अन्य किसी परिणाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फल विशेष की चाह नहीं अपितु उसके लिए कर्म ही पर्याप्त है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म ही आनन्द है। अतएव प्रभु श्रीकृष्ण ऐसे दिव्यकर्मी योगी को सर्वोच्च स्थान प्रदान करते हुए मानव मात्र का आह्वान कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही हो जाने के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वदा आनन्दित रहने के लिए-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तपस्विभ्योऽधिको योगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिक:।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद् योगी भवार्जुन।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सहजता मर्म</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हर श्वास कर्म</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अस्तित्व दिव्य हो गया।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शाश्वत प्रज्ञा</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>नवम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Nov 2015 21:59:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>स्वर्णिम भविष्य की ओर भारत</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3182/towards-golden-future-india"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/354.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   पतंजलि विश्वविद्यालय के दीक्षारम्भ समारोह में उत्तराखण्ड के महामहिम माननीय राज्यपाल</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री कृष्णकान्त पॉल का भव्य आगमन हुआ। मुझे विश्वास है कि इस प्रकार के उच्च पदों पर आसीन उच्च पदाधिकारी वैदिक संस्कृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी एवं राष्ट्र के स्वाभिमान से अनुप्राणित होंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो निश्चित रूप से भारत अतीत के गौरव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान की सामर्थ्य व पुरुषार्थ के साथ स्वर्णिम भविष्य की ओर अग्रसारित होगा। आज महामहिम माननीय राज्यपाल महोदय ने जो सारगर्भित उद्बोधन पतंजलि विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं को दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं समझता हूँ राष्ट्र के प्रत्येक युवा के लिए व प्रत्येक नागरिक के लिए श्रवण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनन व चिन्तन करने योग्य है। इसी अभिलाषा से उनके उद्बोधन को अक्षरश: यहाँ उल्लेखित किया जा रहा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प</span><span lang="hi" xml:lang="hi">तंजलि विश्वविद्यालय के वर्तमान सत्र के दीक्षारम्भ संस्कार कार्यक्रम (</span>Deeksha Aarambh<span lang="hi" xml:lang="hi">) में आज शामिल होकर मुझे हार्दिक प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है। वर्तमान में पतंजलि विश्वविद्यालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग एवं आयुर्वेद के क्षेत्र में सबसे बड़ा नाम है। स्वामी रामदेव जी और आचार्य बालकृष्ण जी ने जिस प्रकार योग एवं आयुर्वेद के माध्यम से देश-विदेश में भारतीय संस्कृति को एक नई पहचान दी है उसके लिए वे बधाई के पात्र हैं। कहते हैं सच्चा ज्ञान एक स्थिर तालाब की भांति नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ समस्त ज्ञान भण्डार एक ही जगह रुक जाए संचित (</span>store<span lang="hi" xml:lang="hi">) कर लिया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वरन सच्चा ज्ञान एक निर्मल बहती नदी की भांति होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका जल सभी के लिए होता है। स्वामी रामदेव जी पतंजलि योगपीठ और पतंजलि विश्वविद्यालय की स्थापना करके इसी महान उद्देश्य की पूर्ति कर रहे हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दीक्षारम्भ समारोह किसी भी विद्यार्थी के जीवन के सबसे महत्वपूर्ण अवसरों/मौकों में से एक होता है। इसका अर्थ बहुत सीधा सा है परन्तु इसका उद्देश्य अत्यंत गंभीर और उतना ही बड़ा है। दीक्षारम्भ का अर्थ है विद्या की साधना के प्रारम्भ में संकल्प लेना कि आप अपने गुरूजनों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिजनों एवं समाज की अपेक्षाओं के अनुरूप काम करते हुए समाज के हित में विद्या प्राप्त करेंगे। महर्षि दयानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कार विधि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में 16 संस्कारों का वर्णन किया है। संस्कार विधि में इन संस्कारों के किये जाने का समय तथा इनके महत्व का भी वर्णन है। दीक्षारम्भ संस्कार भी उन 16 संस्कारों में से एक महत्वपूर्ण संस्कार है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राचीन भारत में विद्यार्थियों का उपनयन संस्कार तथा उसके बाद दीक्षारम्भ संस्कार किया जाता था। जिनमें विद्यार्थी कुछ प्रण लेते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे-मैं गुरू की आज्ञा का पालन करूंगा। मैं अपनी शिक्षा पर पूर्ण ध्यान केन्द्रित करूंगा। मैं गुरूकुल के नियमों को पालन करूंगा। मैं धरती पर शयन करूंगा आदि। यह सभी प्रतिज्ञायें विद्यार्थियों के दिल में अपने गुरू और गुरूकुल के लिए एक उच्च स्थान देकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मान सम्मान और आदर भाव पैदा करती हैं। गुरू और बड़ों का आदर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संयम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धैर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारिवारिक सम्बंध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब धर्मों के लोगों का इकट्ठे त्यौहार मनाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय सभ्यता के अभिन्न अंग हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत वर्ष दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है। समय के साथ सभी सभ्यताएं लुप्त होती चली गईं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन भारतीय सभ्यता-संस्कृति पिछले पाँच हजार सालों से अपनी पहचान बनाये हुए है।</span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">यूनान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिश्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोमा सब मिट गये जहाँ से</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अब तक मगर है बाकि नामों निशां हमारा</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">                                                                       -इकबाल</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा संभव इसलिए हो पाया है क्योंकि हमारे जीवन मूल्य (</span>Values<span lang="hi" xml:lang="hi">) और संस्कृति और </span>Culture <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुत मजबूत थे। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वसुधैव कुटुम्बकम</span>’ (Vasudhaiv Kutumbkum<span lang="hi" xml:lang="hi">) और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वे भवन्तु सुखिन:</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की विचार धारा ने देश में प्यार और भाई-चारा हमेशा कायम रखा है। हमें अहिंसा (</span>Non Violence<span lang="hi" xml:lang="hi">) और धैर्य (</span>Non Violence<span lang="hi" xml:lang="hi">) जैसी </span>Human Qualities<span lang="hi" xml:lang="hi"> भी मिली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी संस्कृति की वजह से अलग-अलग धर्मों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंथों को मानने वाले लोग एक होकर सच्चे भारतीय के रूप में सैकड़ों सालों से साथ रह रहे हैं। हमें अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करना चाहिए। यही एक कारण था कि भारत में शांति का प्रसार हुआ और देश में यदि शांति हो तो समृद्धि भी आती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लगभग 1000 वर्ष पहले तक भारत दुनिया का सिरमौर था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व गुरु कहा जाता था। आज यह सोचकर अचरज होता है कि केवल 300 साल पहले तक पूरी दुनिया के त्रष्ठक्क (सकल घरेलू उत्पादन) का 25 प्रतिशत हिस्सा भारत का होता था।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा के क्षेत्र में भी भारत वर्ष का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है। तक्षशिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नालंदा और विक्रमशिला जैसे महान् विश्वविद्यालय की धरती है यह देश। ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कला हर क्षेत्र में भारत का कोई जवाब नहीं था। जैसे अब हमारे युवा बाहर जाकर पढ़ते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी प्रकार पहले विदेशों से युवा और विद्वान यहाँ भारत वर्ष आकर पढ़ते थे और शोध करते थे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा में मूल्यों का होना बेहद जरूरी है। भारत सैकड़ों सालों से ही ज्ञान-विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संगीत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कला व संस्कृति के क्षेत्रों में अग्रणी रहा है। विश्व के सभी देश भारत को अपने आध्यात्मिक गुरु व मार्गदर्शक के रूप में स्वीकार करते थे। विज्ञान और कला के क्षेत्र में भी हम बहुत आगे थे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दिल्ली में कुतुब के निकट चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय का लौह स्तम्भ आज भी वैज्ञानिकों के लिए एक चुनौती है। लगभग 1600 साल पहले बनाई गई यह लौह लाट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो लगभग 24 फुट ऊंची तथा 06 टन वजन की है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें जंग का नामो-निशान तक नहीं है। एक आज के लोहे हैं जो आठ-दस सालों में जंग से खराब होना शुरू हो जाता है और एक यह लाट प्राचीन विज्ञान का प्रतीक बन कर खड़ी हुई है। इसी तरह से भारत की स्थापत्य और वास्तु कला के प्रमाण के रूप में प्राचीन समय के किले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भवन सालों से मजबूती से खड़े हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और एक आज की इमारतें हैं जिनमें चार-पाँच सालों के बाद ही मरम्मत का काम शुरू हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अजंता एलोरा की गुफाएं आप में से कईयों ने देखी होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सैकड़ों साल पूर्व की गई चित्रकारी के रंग आज भी वैसे ही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देखकर लोगों को आश्चर्य होता है। यदि भारत के गौरवशाली अतीत और विरासत की बात शुरू की जाये तो आज का पूरा दिन कम पड़ जायेगा। खगोल विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एस्ट्रॉनॉमी इतना उन्नत था कि पृथ्वी और सूर्य के मध्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पृथ्वी और अन्य तारों के मध्य दूरी की गणना बिलकुल सटीक की जाती थी। आज भी हमारे पंचांग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चंद्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण की सटीक भविष्यवाणी करते हैं। भारत के वैदिक गणित को आज अन्य देश भी अपना रहे हैं। आर्य भट्ट और वाराहमिहीर जैसे गणितज्ञों ने जो सिद्धांत सैकड़ों वर्ष पूर्व सिद्ध कर दिये थे उनका लोहा संसार आज भी मानता है। चरक और सुश्रुत जैसे महान् चिकित्सक हमारे ही देश में हुए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक अन्य महत्वपूर्ण बात/ जो आज इस मंच से मैं साझा करना चाहता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत वर्ष का प्राचीन ज्ञान- विज्ञान मुख्यत: संस्कृत भाषा में लिखा और रखा गया है। समय के साथ जब बाहरी शासकों ने भारत पर शासन किया संस्कृत का प्रसार आम लोगों से दूर हो गया और इसी कारण यह महत्वपूर्ण ज्ञान भी भारत के लोगों से दूर हो गया। हमारी संस्कृति के मूल्य और सिद्धांत हमसे दूर हो गये। इन सिद्धांतों को एक बार फिर से लोगों तक पहुँचाने की आवश्यकता है। हमारी इस प्राचीन विरासत को संस्कृत के अलावा अन्य भाषाओं में भी लोगों तक पहुँचाया जाये यह जरूरी है। आज जैसे युवा स्नातकों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रिसर्च स्कॉलर्स और पतंजलि विश्वविद्यालय जैसे </span>Institutes <span lang="hi" xml:lang="hi">की भूमिका इसीलिए बढ़ जाती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे युवा मित्रों! विद्या अर्जन से दो लाभ होते हैं। एक अस्थायी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तात्कालिक लाभ जिसे हम भौतिक या </span>Materialistic<span lang="hi" xml:lang="hi">लाभ कह सकते हैं। दूसरा चेतना अथवा आत्मा का विकास जिसे हम आध्यात्मिक अथवा </span>Spiritual Growth <span lang="hi" xml:lang="hi">भी कहते हैं। जहाँ विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिकित्सा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कला आदि आपको सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सांस्कृतिक रूप से प्रबल बनाते हैं वहीं दूसरी ओर विवेक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सद्भाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा जैसे आत्मिक गुण आपको मानव मात्र के रूप में मजबूत करते हैं। यदि हम केवल भौतिक विकास की ओर भागेंगे तो हमारा आध्यात्मिक विकास पीछे रह जायेगा और चरित्र के गठन की नींव भी शायद कमज़ोर पड़ जायेगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ईशा उपनिषद् कहता है- विद्या चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह अविद्या मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते अर्थात् विद्या यानि कि आध्यात्मिक ज्ञान (</span>Spiritual<span lang="hi" xml:lang="hi">) और अविद्या यानि कि भौतिक (</span>Materialistic<span lang="hi" xml:lang="hi">) ज्ञान दोनों को एक साथ समझो-अपनाओ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज भारत वर्ष के सामने बहुत सी चुनौतियां हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो बहुत से सकारात्मक पक्ष भी हैं। हमारा सबसे मजबूत पहलू है हमारा </span>Demographic Divident<span lang="hi" xml:lang="hi">/ (जनतान्त्रिकीय विकास)। आने वाले समय में भारत विश्व का सबसे अधिक युवा देश होगा जिसकी जनसंख्या में युवाओं की संख्या सबसे अधिक होगी। इस युवा शक्ति को सही दिशा में ले जाने की जरूरत है। यदि हमारा युवा वर्ग मजबूत है तो देश भी किसी से पीछे नहीं रहेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे युवा दोस्तों! शिक्षा किसी भी राष्ट्र की प्रगति के लिए महत्वपूर्ण उपकरण (</span>Tool<span lang="hi" xml:lang="hi">) है। मानव विकास तथा सकारात्मक सामाजिक परिवर्तनों (</span>Positive Social Change<span lang="hi" xml:lang="hi">) के लिए शिक्षा से बेहतर कोई माध्यम नहीं है। ज्ञान वह शक्तिशाली हथियार है जिसके माध्यम से आप पूरी दुनिया बदल सकते हैं। आपके जीवन का यह पड़ाव शिक्षा ग्रहण करने का और चरित्र गठन करने का है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके साथ-साथ जैसे हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने कहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमें </span>Skill Development <span lang="hi" xml:lang="hi">की आवश्यकता है ताकि विद्या के बाद काम मिल सके।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सच्ची शिक्षा के दो लक्ष्य होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक बुद्धिमत्ता और दूसरा चरित्र। </span>Swami Vivekanand <span lang="hi" xml:lang="hi">ने कहा है कि सिद्धांतों के बिना शिक्षा एक मनुष्य को चालाक दैत्य सा बना देती है और शिक्षा का असली अभिप्राय व्यक्ति को चरित्रवान बनाना और उसे हर प्रकार से सक्षम बनाना है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसिद्ध मार्टीन लूथर किंग जूनियर ने एक बार कहा था वह कथन आज के इस कार्यक्रम में उपस्थित आप सब छात्रों के लिये भी उपयुक्त है कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आप जो ज्ञान लेंगे उससे समाज का भला कैसे होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह आपको हमेशा सोचते रहना है।’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं इस बात को भली भाँति समझता हूँ कि आज के संदर्भ में प्राचीन गुरुकुलों की बात पूरी तरह से व्यवहारिक (</span>Practical<span lang="hi" xml:lang="hi">) नहीं है। जब गुरु की सेवा करते विद्यार्थी ब्रह्मचर्य का पालन करते विद्या के साथ ही नैतिक मूल्यों की शिक्षा भी ग्रहण करते थे। आज एक भौतिकवादी युग में आपकी सफलता के मापदंड बदल चुके हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आप तर्क कर सकते हैं कि नौकरी पाने के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोजगार चलाने के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छा होने से अधिक जरूरी है </span>Skilful<span lang="hi" xml:lang="hi"> यानि प्रशिक्षित होना। यह सत्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु एक समाज एवं राष्ट्र के रूप में हमारा अस्तित्व कहीं मूल्यविहीन न हो जाये इसलिए इसमें हमें एक संतुलन (</span>Skilful<span lang="hi" xml:lang="hi">) रखना है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फेसबुक और ट्विटर के जमाने में हम सैकड़ों अजनबियों के दोस्त तो हो गये हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु अपने घर वालों की पहुँच के बाहर हो गये हैं। मंगल और चांद तक जाने वाले रॉकेट यान तो बना लिये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु अपने पड़ोस में रहने वाले गरीब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वंचित व्यक्ति को नहीं पहचानते।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक तकनीकि युग में मानव की क्षमताएं ईश्वर के बराबर कही जाने लगी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु मानवता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाईचारा और सेवाभाव का मूल मंत्र हम भूलते जा रहे हैं। इसी प्रकार से हमारा ध्यान आस-पास फैले हुए कूड़ा-करकट और गंदगी की ओर भी जाये। स्वच्छ वातावरण ही प्रगतिशील होने का सच्चा प्रतीक है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा मानना है कि किसी भी विद्यालय अथवा शिक्षण संस्थान में जीवन मूल्यों की शिक्षा अवश्य दी जानी चाहिए। यह शिक्षा वास्तव में परिवार से प्रारम्भ होती है। इसका विस्तार सर्वप्रथम प्राथमिक शिक्षा प्रदान करने वाले स्कूलों और फिर हाईस्कूल और इण्टर कॉलेजों में भी अनिवार्य रूप से होना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी भी लगातार बढ़ी है। निजी क्षेत्र को इस बात का ख्याल रहना चाहिए कि उच्च शिक्षा लाभ कमाने का क्षेत्र नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सेवा का क्षेत्र है। इसके जरिये हम समाज के कमज़ोर तबके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खासतौर से आरक्षित वर्गों और अल्पसंख्यकों की व्यापक मदद कर सकते हैं। लड़कियों की उच्च शिक्षा के लिए भी निजी क्षेत्र को अत्यधिक प्रयास करने की जरूरत है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जैसा कि एक कहावत है एक शिक्षक दरवाजा खोल सकता है लेकिन उस दरवाजे के अन्दर प्रवेश आपको खुद ही करना है। आपके गुरूजन आपको शिक्षा का मार्ग दिखाएंगे लेकिन उस पर चलना आपको है। पतंजलि विश्वविद्यालय के छात्र के रूप में आपको योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद एवं अन्य आधुनिक ज्ञान प्राप्त करने का अच्छा अवसर मिला है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु इस कार्य के लिए आपको अपनी समस्त शिक्षा व्यवस्था में वैज्ञानिकता तर्क और प्रमाणों को बिना किसी संदेह के शामिल करना होगा। भावनाओं एवं परम्पराओं को आमजन की नज़र में स्थापित करने के लिए वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना होगा। इसमें कोई संदेह नहीं है कि योग एवं आयुर्वेद की परम्पराएं पूर्ण रूप से वैज्ञानिक हैं तथा इनको विज्ञान की कसौटी पर खरा उतारा जा सकता है लेकिन इसी तथ्य को एक आम आदमी के मानस पटल पर भी अंकित करना होगा।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/hhuh.jpg" alt="hhuh" width="1050" height="552"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग और आयुर्वेद के सिद्धांतों का सबसे बड़ा पक्ष इनकी प्रतिरोधक क्षमता (</span>Preventive Capacity<span lang="hi" xml:lang="hi">) है। कहते हैं </span>vention is better than cure <span lang="hi" xml:lang="hi">यह बात हमारे ऋषि मुनि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञानी वर्षों से ही जानते थे। ऐसी कितनी ही जड़ी-बूटियाँ और वनस्पतियाँ हैं जिनके नियमित सेवन से आप बड़ी से बड़ी बीमारियों को रोक सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तराखण्ड के संदर्भ (</span>Context<span lang="hi" xml:lang="hi">) में योग और प्रीवेन्टिव के रूप में आयुर्वेद का बड़ा महत्व है। यहाँ की पावन भूमि इन सब जड़ी-बूटियों के लिए बहुत ही उपयुक्त है। यह हिमालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गंगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यमुना की भूमि है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे देवभूमि कहा जाता है। यहाँ पर स्थित पतंजलि जैसे संस्थानों की भविष्य के लिए बड़ी भूमिका है और मुझे विश्वास है कि आपका उसमें महत्वपूर्ण योगदान होगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद हमारी सस्ती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शाश्वत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्दोष व सम्पूर्ण चिकित्सा विधाएं हैं। योग व आयुर्वेद को देश की प्रमुख चिकित्सा पद्धति के रूप में स्थापित करना होगा। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आने वाले समय में पतंजलि योगपीठ एवं पतंजलि विश्वविद्यालय की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होने वाली है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मुझे हर्ष है कि आज बड़ी संख्या में युवा वर्ग योग आयुर्वेद एवं आधुनिक प्रौद्योगिकी (</span>Technology<span lang="hi" xml:lang="hi">) के लिए आकर्षित हो रहा है। मुझे विश्वास है कि आप सभी इस संस्थान में शिक्षा प्राप्त कर अपने जीवन लक्ष्यों को प्राप्त करने में सफल होंगे। जैसा कि भारतीय संस्कृति एवं परम्परा में किसी भी मांगलिक शुभकार्य के प्रारम्भ में प्रतिभागियों को शुभकामना देते हुए कहा जाता है कि-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तदेव लग्रम सुदिनम तदेव</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तारा बदम चन्द्र बलम तदेव</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विद्या बलं दैव बलं तदेव</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">लक्ष्मी पते तेन्द्रि युगम स्मरामि।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">Tadev Laganam Sudinam Tadev</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">Tara Balam Chandra Balam Tadev</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">Vidya Balam Daiv Balam Tadev</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">Lakshmi Pate Tenghri Yugam Smarami</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>नवम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Nov 2015 21:57:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>विशिष्ट आयुर्वेदिक स्वास्थ्यवर्धक घटक गिलोय</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3183/special-ayurvedic-health-enhancing-ingredient-giloy"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/983.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक नाम : </span>Tinospora cordifolia (Willd.) <span lang="hi" xml:lang="hi">  (टिनोस्पोरा कॉर्डिफोलिया) </span>Syn-Menispermum cordifolium Willd.; <span lang="hi" xml:lang="hi">कुलनाम : </span>Menispermaceae <span lang="hi" xml:lang="hi">(मैनिस्पर्मेसी)</span>;  <span lang="hi" xml:lang="hi">अंग्रेजी नाम : </span>Tinospora <span lang="hi" xml:lang="hi">(टिनोस्पोरा)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृत : वत्सादनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छिन्नरुहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुडूची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तन्त्रिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमृता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुपर्णी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमृतलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छिन्ना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमृतवल्ली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भिषक्प्रिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चक्रलक्षणिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चक्रांगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चंद्रप्राश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छिन्नोद्भवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नागकुमारिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्जरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोमवल्ली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरकृता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वातरक्तारि</span>;  <span lang="hi" xml:lang="hi">हिन्दी : गिलोय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुडुच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुडूर्ची</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">उड़ीया : गुलंचा (</span>Gulancha<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">गुलोची (</span>Gulochi<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">कन्नड़ : अमृथावल्ली (</span>Amrutavalli<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमृतवल्ली (</span>Amritvalli<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युगानीवल्ली (</span>Yuganivalli<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुपर्णी (</span>Madhuparni<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">गुजराती : गुलवेल (</span>Gulvel<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गालो (</span>Galo<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>;  <span lang="hi" xml:lang="hi">गोआ : अमृतबेल (</span>Amrytbel<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">तमिल : अमृदवल्ली (</span>Amridavalli<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिन्दिलकोडि (</span>Shindilkodi<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">तेलुगु : तिप्पतीगे (</span>Tippatige<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमृता (</span>Amrita<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुडूची (</span>Guduchi<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">बंगाली : गुलंचा (</span>Gulancha<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पालो गदंचा (</span>Palo gandcha<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोय (</span>Giloe<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">नेपाली : गुर्जो (</span>Gurjo<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">पंजाबी : गिलोगुलरिच (</span>Gilogularich<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गरहम (</span>Garham<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पालो (</span>Palo<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">मराठी : गुलवेल (</span>Gulavel<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अम्बरवेल (</span>Ambarvel<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">मलयालम : अमृतु (</span>Amritu<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेयामृतम (</span>Peyamrytam<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्तामृतु (</span>Chittamritu<span lang="hi" xml:lang="hi">)। अंग्रेजी : इण्डियन टिनोस्पोरा (</span>Indian tinospora<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हार्ट लीव्ड टिनोस्पोरा </span>Heart leaved tinospora<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मून सीड (</span>Moon seed<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुलांचा टिनोस्पोरा (</span>Gulancha tinospora<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">अरबी : गिलो (</span>Gilo<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">फारसी : गुलबेल (</span>Gulbel<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोय (</span>Giloe<span lang="hi" xml:lang="hi">)।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">परिचय:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अमृता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमृतवल्ली अर्थात कभी न सूखने वाली गिलोय के पत्ते कोमल पान के आकार के तथा फल मटर के दाने जैसे होते हैं। यह जिस वृक्ष पर चढ़ती है उसी वृक्ष के कुछ गुण भी अपने अन्दर समाहित कर लेती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीम वृक्ष पर चढ़ी गिलोय श्रेष्ठ मानी जाती है। चरक के बय: स्थापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दाहप्रशमन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तृष्णा निग्रहण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्तन्यशोधन आदि गणों में तथा सुश्रुत के गुडूच्यादि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्लीपंचमूल आदि गणों में इसकी गणना की गई है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रासायनिक संघटन:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोय के कांड में लगभग </span>1.2<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत स्टार्च के अतिरिक्त अनेक कड़वे जैव सक्रिय संघटक पाए जाते हैं। गिलोय में </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोइन</span>’’ <span lang="hi" xml:lang="hi">नामक एक कड़ुआ ग्लूकोसाइड तथा टीनोस्पोरिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पामेरिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टीनोस्पोरिक अम्ल होते हैं। इनमें एक प्रमुख क्षाराभ बर्बेरीन है। इसके अतिरिक्त तिक्त ग्लूकोसाइड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोइमिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्डिओल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्डिओसाइड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टीनोस्पोरिडीन नामक जैव सक्रिय पदार्थ पाए जाते हैं। इसमें एक वाष्पशील तैल होता है एवं वसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एल्कोहल तथा कई प्रकार के वसा अम्ल होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेदीय गुण-कर्म एवं प्रभाव:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह त्रिदोषशामक है। स्निग्ध होने से वात</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">तिक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कषाय होने से कफ  और पित्त का शमन करती है। गुडूची कुष्ठघ्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेदनास्थापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तृष्णानिग्रहण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छर्दिनिग्रहण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दीपन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाचन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पित्तसारक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुलोमन और कृमिघ्न है। इससे आमाशयगत अम्लता कम होती है। यह हृदय को बल देने वाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्त विकार तथा पांडु रोग में गुणकारी है। खांसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दौर्बल्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुमेह में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचा के रोगों में तथा कई प्रकार के ज्वर में उत्तम कार्य करती है। आधुनिक चिकित्सा शास्त्रियों के विचार से गिलोय सूक्ष्मतम विषाणु समूह से लेकर स्थूल कृमियों पर अपना प्रभाव दर्शाती है। क्षय रोग उत्पन्न करने वाले माइको बैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस जीवाणु की वृद्धि को यह सफलता पूर्वक रोकती है। शरीर के जिस भाग में भी ये जीवाणु शान्त अवस्था में पड़े हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोय वहीं पर पहँचकर उनका नाश करती है। ई- कोलाई नामक रोगाणु को जो आंत और मूत्रवह संस्थान के साथ-साथ पूरे शरीर को प्रभावित करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसको जड़ से उखाड़ती है। इसके जल निष्कर्ष में फंगोसिटिक इंडेक्स</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">काफी अधिक मात्रा में पाया जाता है अर्थात रक्त के जीवाणु भक्षी कोषों की तरह इसके सूक्ष्म घटक भी आयोनिक गति से रोगाणुओं पर आक्रमण कर उन्हें मार डालने की क्षमता रखते हैं। गिलोय का ग्लूकोज टालरेंस तथा एड्रीनेलिन जन्य हाइपर ग्लाइसीमिया में लाभकारी एवं त्वरित परिणामशील होता है। यह शरीर में इंसुलिन की उत्पत्ति व रक्त में उसकी घुलनशीलता को बढ़ाती है। इससे रक्त शर्करा घटती है। गुडूची को घृत के साथ सेवन करने से यह वातशामक</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">गुड़ के साथ सेवन करने से-मलबद्धता नाशक</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">खाँड के साथ सेवन करने से-पित्तशामक</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">मधु के साथ सेवन करने से-कफशामक</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">सोंठ के साथ सेवन करने से-आमवातशामक</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा एरण्ड तैल के साथ सेवन करने से वातशामक होती है। गुडूची का पत्र शाक कषाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कटु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उष्णवीर्य</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">लघु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्रिदोषशामक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रसायन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्निदीपक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बलकारक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मलरोधक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चक्षुष्य तथा पथ्य होता है। यह वातरक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तृष्णा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दाह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कामला तथा पाण्डुरोग में लाभप्रद होता है। गुडूची सत् मधुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लघु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्रिदोषशामक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पथ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दीपन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चक्षुष्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धातुवर्धक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेध्य व वय:स्थापक होता है। गिलोय का प्रयोग वातरक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाण्डु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छर्दि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीर्णज्वर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कामला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अरुचि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिक्का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्श</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दाह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूत्रकृच्छ्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदर तथा सोमरोग की चिकित्सा में किया जाता है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/994.jpg" alt="99" width="800" height="600"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पौधे के सत्त में विषमज्वररोधी क्रिया पाई गई है एवं इनमें इन्सुलिन की भांति क्रिया भी होती है। काण्ड स्वरस तथा काण्ड चूर्ण शोथरोधी तथा मस्तिष्क उद्दीपनरोधी क्रियाओं को प्रदर्शित करता है। गिलोय व्याधि क्षमत्व वर्धक क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है। गिलोय का काण्डसार ज्वरघ्न क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है। गिलोय के काण्ड का जलीय सार प्रत्यूर्जता क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है। गिलोय के काण्ड का जलीय सार एल्बीनों चूहों में शोथहर तथा वेदनाशामक क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है। गिलोय के पमचाङ्ग का एल्कोहॉलिक-सार अस्थिमज्जा कोशिकाओं के प्रफलन को बढ़ाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">औषधीय प्रयोग मात्रा एवं विधि:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>नेत्र विकार</strong>-</span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली गिलोय के स्वरस में शहद व सेंधानमक </span>1-1<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम मिलाकर खूब अच्छी प्रकार से खरल करके नेत्रंजन करने से तिमिर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिल्ल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्श</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कंडू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लिंगनाश एवं शुक्ल तथा कृष्ण पटल गत नेत्र रोग नष्ट होते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोय रस में त्रिफला मिलाकर क्वाथ बना लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें पिप्पली चूर्ण व शहद मिलाकर प्रात: सायं सेवन करते रहने से नेत्रों की ज्योति बढ़ जाती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>राजयक्ष्मा (टी.बी.)-</strong> असगन्धा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शतावर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दशमूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बलामूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अडूसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पोहकरमूल तथा अतीस को समभाग लेकर क्वाथ बनाएं</span>, 20-30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली क्वाथ को सुबह-शाम सेवन करने से राजयक्ष्मा नष्ट होता है। पथ्य के रूप में केवल दूध को सेवन करें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>वमन-</strong>धूप में घूमने-फिरने से या पित्तप्रकोप से वमन हो तो गिलोय स्वरस (</span>10-15<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली) में </span>4-6<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम तक मिश्री मिलाकर प्रात: सायं पीने से वमन शांत हो जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>संग्रहणी-</strong>सोंठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोथा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अतीस तथा गिलोय को समभाग लेकर जल में क्वाथ करें। इस क्वाथ को </span>20-30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली की मात्र में सुबह-शाम पीने से मन्दाग्नि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आमदोष एवं साम ग्रहणी रोग ठीक होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कामला-</span></strong>20-30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली अमृता क्वाथ में </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> चम्मच मधु मिलाकर दिन में तीन-चार बार पिलाने से पीलिया रोग में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोय के </span>10-20<span lang="hi" xml:lang="hi"> पत्तों को पीसकर एक गिलास छाछ में मिलाकर तथा छानकर प्रात: काल पीने से कामला में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>पांडुरोग</strong>-पुनर्नवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीम की छाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पटोलपत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोंठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कटुकी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दारुहल्दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्येक को </span>20<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम लेकर </span>320<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली पानी में पकाकर चतुर्थांश शेष क्वाथ बना लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस क्वाथ को </span>20<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली सुबह-शाम पीने से सर्वांग शोथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेट के रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पार्श्वशूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास तथा खून की कमी में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">खून की कमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीलिया एवं हलीमक में गिलोय रस एक ली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कांड कल्क </span>250<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूध </span>4<span lang="hi" xml:lang="hi"> ली और घी एक किलो लेकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन्द अग्नि पर पकाकर घी मात्र शेष रहने पर छानकर रख लें। </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम घी को चौगुने गाय के दूध में मिलाकर प्रात: सायं पीयें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यकृत् विकार व मंदाग्नि-</span>18<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम ताजी गिलोय</span>, 2<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम अजमोद</span>, 2<span lang="hi" xml:lang="hi"> नग छोटी पीपल एवं </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> नग नीम की सीकें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन सबको कुचलकर रात्रि को </span>250<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली जल के साथ मिट्टी के बरतन में रख दें। प्रात: पीसकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छानकर पिला दें। </span>15<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>30<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिन तक सेवन करने से पेट के सब रोग दूर होते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>प्रमेह</strong>-गिलोय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पठानी लोध्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लाल चन्दन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नागरमोथा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आवँला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परवल की पत्ती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीम की छाल तथा पप्रकाष्ठ इन सभी द्रव्यों को समभाग लेकर कूट-पीसकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छानकर रख लें। इनके सम्मिलित चूर्ण को </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम की मात्र में लेकर मधु के साथ मिलाकर दिन में तीन बार देने से पित्तज प्रमेह में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>मूत्रकृच्छ्र</strong>-गुडूची के </span>10-20<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली स्वरस में पाषाण भेद का </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम चूर्ण और </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> चम्मच मधु मिलाकर दिन में तीन-चार बार सेवन करने से मूत्रकृच्छ्र में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गठिया-</span></strong>2-5<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम गिलोय चूर्ण को दूध के साथ दिन में दो-तीन बार देने से गठिया और मूत्रम्लता मिटती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोय के </span>20-30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली क्वाथ को सुबह-शाम पीने से गठिया में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोय के </span>5-10<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली रस अथवा </span>3-6<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम चूर्ण या </span>10-20<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम कल्क अथवा </span>20-30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली क्वाथ को प्रतिदिन निरंतर कुछ समय तक सेवन करने से वातरक्त में अत्यन्त लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ (कोढ़)-</span></strong>10-20<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली गिलोय स्वरस को दिन में दो-तीन बार कुछ महीनों तक नियमित पिलाने से कुष्ठ में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वर रोगों में:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>जीर्ण ज्वर (पुराना बुखार)-</strong> जीर्ण ज्वर या छ: दिन से भी अधिक समय से चले आ रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न छूटने वाले ज्वरों में </span>40<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम गिलोय को अच्छी तरह कुचलकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिट्टी के बरतन में रखकर </span>250<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली पानी मिलाकर रात भर ढककर रखते हैं और प्रात: मसल-छानकर प्रयोग करते हैं। </span>20<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली की मात्र दिन में तीन बार पीने से ज्वर का शमन हो जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>20<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली गिलोय स्वरस में </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम पिप्पली तथा </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> चम्मच मधु का प्रक्षेप देकर प्रात: सायं सेवन करने से जीर्णज्वर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कफ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्लीहारोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खांसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अरुचि आदि रोग नष्ट होते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>वातज्वर-</strong>बिल्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अरणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गम्भारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्योनाक (सोनापाठा) तथा पाढ़ल की मूल छाल तथा गिलोय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आँवला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धनिया ये सब बराबर-बराबर लेकर इनका क्वाथ बनाएं</span>, 20-30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली क्वाथ को दिन में दो बार वातज्वर में सेवन करना चाहिए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">वातज-ज्वर के शमन के लिए गुडूची स्वरस भी श्रेष्ठ है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>20-30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली गुडूची क्वाथ में पिप्पली चूर्ण मिलाकर या फिर छोटी कटेरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोंठ तथा गुडूची के क्वाथ (</span>20-30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली) में पिप्पली चूर्ण मिलाकर पीने से वातकफज ज्वर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खांसी तथा दर्द का निर्हरण होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">समभाग गुडूची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीम तथा आँवला के </span>25-50<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली क्वाथ में मधु मिलाकर पीने से विषम ज्वर का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">मलेरिया में गुडूची स्वरस का प्रयोग अत्यन्त लाभदायक है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वर में कफ  का अनुबन्ध हो तो गुडूची का क्वाथ (</span>20-30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली) पीना चाहिए तथा पित्त का अनुबन्ध होने पर गुडूची शीतकषाय (</span>20-40<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली) का सेवन हितकर होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">समभाग गुडूची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यवासा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोंठ तथा नागरमोथा क्वाथ को  </span>25-50<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली की मात्रा में प्रतिदिन सेवन करने से वातज्वर में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">गुडूची क्वाथ में पिप्पली चूर्ण मिलाकर सेवन करने से जीर्ण ज्वर में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">गुडूची का क्वाथ (</span>20-30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली) शीतल करके मधु मिलाकर पीने से ज्वरजन्य छर्दि (उल्टी) में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वर के रोगी को पथ्य के रूप में गुडूची के पत्तों का शाक बनाकर खाना चाहिए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">गुडूची के पत्तों को अंगारों पर तपाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वरस निकालकर</span>, 25<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली स्वरस में </span>25<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली एरण्ड तैल तथा </span>125<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिग्रा सज्जी-क्षार मिलाकर कोष्ण सेवन करने से ज्वर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदररोग एवं कफज विकारों में अत्यधिक लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">गुडूची सत्त का प्रयोग करने से आंत्रिक-ज्वर तथा ज्वरजन्य दाह का शमन होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रक्त कैंसर: </span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">परमपूज्य स्वामी रामदेव जी का स्वानुभूत प्रयोग उन्हीं के शब्दों में कि </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">हमने अनेक रक्त कैंसर के रोगियों पर गेहूँ के ज्वारे के साथ गिलोय स्वरस मिलाकर दिया तो देखा कि रक्त कैंसर के रोगियों में अत्यन्त लाभ हुआ। हम आज भी इसका प्रयोग कर रहे हैं।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लगभग </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> फुट लम्बी तथा एक अगुंली जितनी मोटी गिलोय</span>, 10<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम गेहूं की हरी पत्तियां लेकर थोड़ा-सा पानी मिलाकर पीस लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कपड़े से निचोड़ कर </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> कप की मात्रा में खाली पेट प्रयोग करें। चिकित्सक द्वारा निर्देशित औषधियों के साथ उक्त रस का सेवन कैंसर जैसे भयानक रोगों से शीघ्र मुक्ति प्रदान करने में सहयोग करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विविध रोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोय के </span>10-20<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली रस के साथ गुड़ का सेवन करने से कब्ज में लाभ होता है। मिश्री के साथ सेवन करने से पित्त के उपद्रव मिटते हैं। मधु के साथ सेवन करने से कफ मिटता है। सोंठ के साथ सेवन करने से आमवात मिटता है। काली मिर्च और सुखोष्ण जल के साथ सेवन करने से हृदय शूल मिटता है। इसका प्रयोग व्याधि के अनुसार अनुपान के साथ सात दिनों तक नियमित रुप से करना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोय शरीर एवं जीवन के लिए बहुउपयोगी होने के कारण अमृत रसायन में शामिल है। हम सब अपने घर-आंगन में इसे लगाकर लाभ उठा सकते हैं।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>वनौषधियों में स्वास्थ्य</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>नवम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Nov 2015 21:56:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>काम-क्रोधादि  हमारी मिथ्या धारणा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज</span></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3184/our-misconception-of-lust-and-anger"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/872.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">   <strong>  (</strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>कामात्क्रोधोऽभिजायते)</strong> काम पूरा हो जाए तो लोभ में परिवर्तित हो जाता है</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">और-और</span>Ó <span lang="hi" xml:lang="hi">की टेक लगाना शुरु कर देता है और यदि पूरा न हो तो क्रोध का रूप धारण कर लेता है। काम के ये दो ही परिणाम हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्हें सत्य दृष्टि प्राप्त नहीं है वे काम से उत्पन्न लोभ के सागर में डूब जाते हैं या फिर उनके मार्ग में कोई आन्तरिक या बाह्य बाधा उपस्थित हो जाए तो क्रोध की पराकाष्ठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्महत्या जैसा क्रूर-निर्दय-निर्मम-मूर्खतापूर्ण कृत्य करने पर उतारू हो जाते हैं। इस विशाल विश्व में प्रतिदिन हजारों की संख्या में ये घटनायें घट रही हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महाभारत में कहा है-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">न तपस्तप इत्याहुर्ब्रह्मचर्यं तपोत्तमम्। </span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्ध्वरेता भवेद् यस्तु स देवो न तु मानुष:।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">तप</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नाम से अभिप्रेत वस्तु ब्रह्मचर्य ही है। इसके अतिरिक्त तप का और क्या रूप हो सकता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्ध्वरेता कोई मनुष्य नहीं बल्कि साक्षात् देवता ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लाखों में मुश्किल से कोई एक आदमी ऐसा होगा जो अपनी प्रेम-पात्र स्त्री को पाने के लिए अपने सब आदर्शों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी उच्चतम दृष्टि और उस प्रत्येक वस्तु को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो उसके लिए परमात्मा का प्रतिनिधित्व करती है त्याग न दे|</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इंजील में कहा गया है- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">यदि व्यक्ति संसार पर विजय पाना चाहता है तो स्वैच्छिक मितव्ययी व्रत को धारण करे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर पर विजय के लिए ब्रह्मचर्य तथा शैतान को जीतने के लिए आज्ञापालन को स्वीकार करे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">काम के इस भयावह रूप को बल्कि काम ही नहीं उसके सभी साथी गण क्रोध-लोभ-मोह-अहङ्कार-ईर्ष्या- द्वेषादि सब के सब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस समस्त त्रिलोकी को हिला देने वाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कँपा देने वाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">झकझोर देेने वाले रूप को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी को भी न बख्शने वाले प्रचण्ड रूप को हमने निकट से देखने-समझने का प्रयास किया। पर पाठकों को महान् आश्चर्य होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री महाराज का इस विषय में अलग ही दृष्टिकोण है। होना भी यही चाहिए। घटना एक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर देखने वाले अपनी-अपनी दृष्टि से उसे देख रहे हैं। अनन्त की ओर आरोहण करते हुए प्रत्येक यात्री के देश और काल का बिन्दु पृथक् होने से घटना का पृथक् दिखाई देना स्वाभाविक ही है। कोई एक व्यक्ति घटना से हजारों मील दूर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई अत्यन्त पास खड़ा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई उसे पार कर इतना आगे निकल गया है कि पीछे छूटी हुई घटना सर्वथा अदृश्य हो गयी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई उससे इतनी दूर खड़ा है कि अभी उसका धुँधला चित्र भी नहीं बन पा रहा। सो इस प्रकार सब द्रष्टाओं के दर्शन पृथक् ही होते हैं। जो शिखर पर पहुँच गया है उसका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जो अभी पर्वत की उपत्यका के भी समीप नहीं पहुँच पाया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन दोनों का एक ही दर्शन कैसे हो सकता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">स्त्री रूपी घटना एक ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके पति को वह सुखकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाँ को दु:खकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीसरे उस व्यक्ति को जो उसे नहीं प्राप्त कर सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके लिए मोहकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि तत्त्व ज्ञानी को न सुखकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न दु:खकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न मोहकर ही प्रतीत होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तत्त्वज्ञानियों में भी एक उसको माता के रूप में देखता है जैसे कि हमारे श्री महाराज प्रकृति माँ के ही प्रतीक रूप में देखते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कि मनुष्य रूप में गुह्य ब्रह्म को जन्म देने वाली जगज्जननी है। दूसरे को केवल हाड़-मांस का एक विशिष्ट ढाँचा मात्र परमाणुओं का पुंज दिखाई देता है। सो काम-क्रोधादि के विषय में महाराज की दृष्टि यह नहीं है कि ये प्रचण्ड वेगवती शक्तियाँ हमारे विरोध में खड़ी होकर हमारे रास्ते को रोक रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उनका कहना है कि उन शक्तियों का कोई अस्तित्व ही नहीं है। शक्ति की कल्पना तो तभी होगी जब पहले </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">है</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहकर स्वीकृति दी जाए। महाराज के दर्शन के अनुसार जिन चीजों का निराकरण हो जाए उनका स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। समस्त निषेध वर्ग का यही स्वरूप है। जैसे अन्धकार कहने के लिए है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर वस्तुत: वह है ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि प्रकाश के द्वारा वह निराकृत हो जाता है। दूसरी ओर प्रकाश का कभी निराकरण नहीं किया जा सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल किसी चीज के बीच में आने से </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्धकार प्रतीत होने लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर प्रकाश तो उस अवस्था में भी बना रहता है। जबकि सब गन्दगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कूड़ा-करकट भी अन्तत: हटा दिया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार स्वच्छता स्वत: सिद्ध है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल गन्दगी से ढक मात्र जाती है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि कोई व्यक्ति निम्न प्रकृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञान की स्थिति में खड़ा हो तो उसे शनै:-शनै: निम्न प्रकृति से उच्च प्रकृति में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भोग से अपवर्ग में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञान से ज्ञान में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असत्य से सत्य में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मृत्यु से अमृत में आरोहण करने के लिए कृत संकल्प होना होगा। सचेतन रूप से अपने अन्दर यह इच्छा जागृत करनी होगी कि अब तुझे यह खण्डित-खण्डित होकर प्राप्त होने वाला विषय-रस नहीं चाहिए जो परिणाम में सदा विषाद को ले आता है। यह इच्छा जितनी बलवती होगी उतना ही अज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असत्य या भोगमय जीवन (जिसके कि काम-क्रोधादि विविध रूप हैं) को अस्वीकार करने में सरलता व सहजता होती जाएगी। जैसे अन्धकार को हटाने के लिए प्रकाश अविनाभावी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी प्रकार काम-क्रोधादि रूप अज्ञानमय जीवन को त्यागने के लिए ज्ञान रूप साधना की अत्यन्त आवश्यकता है। उसके बिना और कोई उपाय नहीं है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पर केवल ब्रह्मचर्य की प्रशंसा सुनने मात्र से ब्रह्मचर्य में स्थिति कभी नहीं हो सकती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब तक अब्रह्मचर्य के दु:खों व कष्टों को व्यक्ति स्वयं अनुभव न कर ले। प्राचीन शब्दावली में इसको अभ्यास व वैराग्य का नाम दिया गया है। विषयों को महादु:खदायी समझकर उधर से सदा के लिए मुख मोड़ लेने का नाम वैराग्य है। पर दु:ख दर्शन से ही वैराग्य का जन्म होता है। जैसे व्यक्ति को जब पता चल जाता है कि यह काला सर्प है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वहाँ से सहज ही तत्क्षण हट जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी प्रकार विषयों का यथार्थ स्वरूप जब व्यक्ति के मन में स्पष्ट हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उससे हटने के लिए संघर्ष नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सजगता काम देती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महाराज का कहना है कि ब्रह्मचर्य-सिद्धि के लिए इस बेहोशी को हटाने की आवश्यकता है। किसी उपाय से बेहोशी टूटे और जब वह टूट जाए तो अब आगे के लिए व्यक्ति पूर्ण सजग हो जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुन: उसी स्वप्न लोक में या बेहोशी या प्रमाद की अवस्था में न जाए तो स्पष्ट है कि फिर इस विकार रूपी मगर से व्यक्ति का बचाव हो सकता है। प्रारम्भिक अवस्था में संघर्ष से यत् किञ्चित् थोड़ा-बहुत सहयोग मिलने की सम्भावना तो है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर वह केवल मूर्छा के टूटने पर ही सम्भव है। जो विषयों के प्रहार से मूर्छित होकर पड़ा हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस अवस्था में तो संघर्ष की कल्पना ही नहीं की जा सकती। अपनी दृढ़ इच्छा-शक्ति का प्रयोग करना ही तो संघर्ष का रूप है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर जब तक व्यक्ति को विषयों में रस दिखाई दे रहा है तो उसके विरोध में इच्छा-शक्ति कहाँ से जुटायी जाए</span>?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि इस दयनीय व पराधीन अवस्था को प्राप्त व्यक्ति अपने समस्त उत्साह को खो बैठता है। इच्छा-शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्साह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन की मूल्यता इन सबका एक-दूसरे के साथ आश्रय-आश्रयि भाव सम्बन्ध होता है। अन्त में मूल बात यहीं आकर टिकती है कि उपाय चाहे जो अपनाया जाए-किसी महापुरुष की वाणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई शास्त्र वचन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विषयों के सम्बन्ध में अपने ही अनुभव से प्राप्त यथार्थ दृष्टि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दु:ख-दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्मल ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशुद्ध भक्ति जैसे भागवत तत्त्वों को प्राप्त करने की अभङ्ग अभीप्सा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर किसी भी उपाय से मन की मूर्छा या बेहोशी को तोड़ा जाए। शनै:-शनै: व्यक्ति को ज्ञान की वह दृढ़ आधार-भित्ति प्राप्त होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके लिए महाराज कहते हैं कि काम-क्रोधादि हैं ही नहीं। हमारी मिथ्या मान्यता का ही ये लाभ उठा रहे हैं। बस उसे ही हटा लेना है। व्यक्ति के द्वारा इस समस्त निषेधवर्ग के प्रति उदासीनता धारण करते ही ये काम-क्रोधादि उसी प्रकार से अव्यक्त में चले जायेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे सूर्योदय होने पर अन्धकार।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तो क्यों न हम योग-प्राणायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद अपनायें व इन मिथ्या धारणाओं से मुक्ति का अभ्यास करें।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>नवम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Nov 2015 21:54:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पतंजलि आयुर्वेद एवं  पतंजलि चिकित्सालय  की सफलता भरी कहानियां</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    जहां 2003 से पूज्य स्वामी जी महाराज के पतजंलि योग शिविरों ने दुनिया में धूम मचाई। लाखों-करोड़ों लोगों को ऋषि प्रणीत योग-आयुर्वेद का ज्ञान कराया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं पतंजलि आयुर्वेद चिकित्सालय के माध्यम से असंख्य असाध्य रोगियों को मौत के मुंह से वापस लाने में सफल हुए। पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण ने मिलकर योग-आयुर्वेद को पुस्तकों के पन्नों से उठाकर जनमानस के जीवन में स्थापित किया है। उसी का प्रत्यक्ष प्रभाव है कि नित्य प्रति देश-विदेश से सैकड़ों लोग योगपीठ पधार कर पतंजलि योगपीठ परिसर में सैकड़ों आयुर्वेद विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा नि:शुल्क परीक्षण एवं मार्गदर्शन ले</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3185/success-stories-of-patanjali-ayurveda-and-patanjali-hospital"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/1016.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  जहां 2003 से पूज्य स्वामी जी महाराज के पतजंलि योग शिविरों ने दुनिया में धूम मचाई। लाखों-करोड़ों लोगों को ऋषि प्रणीत योग-आयुर्वेद का ज्ञान कराया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं पतंजलि आयुर्वेद चिकित्सालय के माध्यम से असंख्य असाध्य रोगियों को मौत के मुंह से वापस लाने में सफल हुए। पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण ने मिलकर योग-आयुर्वेद को पुस्तकों के पन्नों से उठाकर जनमानस के जीवन में स्थापित किया है। उसी का प्रत्यक्ष प्रभाव है कि नित्य प्रति देश-विदेश से सैकड़ों लोग योगपीठ पधार कर पतंजलि योगपीठ परिसर में सैकड़ों आयुर्वेद विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा नि:शुल्क परीक्षण एवं मार्गदर्शन ले रहे हैं। इसी के साथ देशभर में फैले पतंजलि योगपीठ के लगभग चार हजार से अधिक क्षेत्रीय आरोग्य केन्द्र एवं चिकित्सालयों के चिकित्सकों द्वारा भी रोगियों के उपचार व प्रबंधन का कीर्तिमान स्थापित हो रहा है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/922.jpg" alt="92" width="800" height="533"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क हते हैं जो पतंजलि योगपीठ आता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खाली हाथ नहीं जाता। यदि आने वाले थोड़ी सी भी जागरूकता बरतें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह अक्षुण्य स्वास्थ्य के ऐसे सूत्र लेकर जाता है कि स्वयं तो आजीवन स्वस्थ रहता ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संपूर्ण परिवार स्वस्थ निरोग हो उठता है। प्रतिमाह स्वास्थ्य के नाम पर उसके बरबाद होने वाले सैकड़ों से हजारों रुपयों की बचत होती है। वही धन उसके बच्चों के पोषण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षण एवं आवश्यक घरेलू संसाधनों की उपलब्धि में नियोजित होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे परिवार के बीच प्रसन्नता आती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रुकी हुई प्रगति के द्वार खुलते हैं। यही कारण है कि देशभर के रिक्शा चलाने वाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रेहड़ी वाले व चाय बेचने वाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मजदूरी करने  से लेकर अमीर से अमीर व्यक्ति तक पतंजलि योगपीठ पधारने का अवसर ढूंढ़ता रहता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यद्यपि स्वदेशी औषधियाँ एवं परमात्मा द्वारा प्रदत्त प्राकृतिक जड़ी-बूटियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वनौषधियों पर आधारित आयुर्वेद द्वारा आरोग्य देने की भारत देश में लम्बी परम्परा सुषुप्त हो रही थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ ने उसे पुनर्जागृत किया। विगत दो दशक से अधिक समय से आयुर्वेदिक विधि से पतंजलि योगपीठ के चिकित्सकों ने हजारों-लाखों रोगियों को जीवनदान दिया है। इन्हीं प्रयोगों के अनुरूप यहां पाठकों के समक्ष कुछ ऐसे रोगियों का विश्लेषण प्रस्तुत है जो मृत्यु के मुँह में पहुँच गये थे पर उपचार द्वारा आज जीवित हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और पूज्यवर के मार्गदर्शन में पतंजलि योगपीठ आंदोलन में सक्रिय हैं।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/235.jpg" alt="23" width="900" height="600"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="background-color:rgb(255,255,255);color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हार्ट की तीनों नसें ब्लॉक थीं:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">22 फरवरी को शिवाजी पार्क से मतलू महतो नाम के एक ऐसे रोगी ने पतंजलि ओपीडी में पधारकर उपचार कराया जिसके हार्ट की तीन नसें ब्लॉक थीं। डॉक्टरों ने उसकी ऑपरेशन या सर्जरी अनिवार्य बताया था। स्वयं रोगी के बेटे श्री शंभु कुमार के शब्दों में-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं शंभु कुमार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्राम+पोस्ट+थाना- मेहँरन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिला- शेखपुरा का रहने वाला हूँ। मैंने पिता जी को बड़े-बड़े हॉस्पिटल जैसे- पटना जीवक हार्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिल्ली में मैट्रो हार्ट हॉस्पिटल पर दिखाया पर सुधार नहीं हुआ। मैट्रो में एन्जोग्राफी कराने पर पता लगा कि उनके हार्ट में तीन नसें ब्लॉक हैं। मैं घबरा गया और काफी परेशान भी हुआ। डॉक्टर बोले आपके पिता जी को ऑपरेशन या स्टैंड सर्जरी करानी होगी। मैं ESI approval के लिए गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि वहीं से ईलाज हो रहा था। ESI के मेडिकल सुपरिटेन्डेंट बोले कि अपने पिता जी का ऑपरेशन कराओ। मैं दिल्ली पतं हार्ट हॉस्पिटल डॉ. जमालुद्दीन जी को सी.डी.और रिपोर्ट दिखाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उन्होंने बताया कि आपके पिता जी को चार स्टैंड का खर्च लगभग 5 से 6 लाख प्राईवेट में और मेरे पास 2.5 से 3 लाख रुपये आयेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैंने ESI सुपरिटेन्डेंट को सारी बातें बतायी। मैं अपने पिता जी को देखकर बहुत परेशान था। वह सर्जरी के लिए तैयार नहीं थे। एक दिन मैंने नेट पर सर्च कर पतंजलि का नम्बर लिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहां के डॉ. साहब ने पिता जी को सभी रिपोर्ट के साथ लाकर दिखलाने के लिए कहा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि पहुँचकर मैंने डॉक्टर एस.सी. मिश्रा को दिखाया। पिता जी और उनकी सभी रिपोर्ट देखने के बाद उन्होंने कहा कि अभी कुछ मत कराओ। मैं दो महीने की दवा दे रहा हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पहले इसे खिलाओ। उन्होंने अंग्रेजी तथा आयुर्वेदिक दोनों दवा चलाने की सलाह दी और कहा यदि सुधार हुआ तो धीरे-धीरे अंग्रेजी दवा बंद कर सकते हैं। मैंने वैसा ही किया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैंने देखा मेरे पिता जी को धीरे-धीरे सुधार हो रहा है। लगभग 20 दिन दवाईयां देने के बाद अंग्रेजी दवाईयां बंद कर दी। पहले ये 40 से 45 कदम चलते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इनके सीने में दर्द और जलन होती थी। 2 माह बीतने पर भी कोई दिक्कत नहीं दिखी। 1 किमी. तक चलने लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई परेशानी नहीं। दर्द और जलन भी नहीं। जब मेरे पिता जी की ई.सी.जी.</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्लड प्रेशर की रिपोर्ट नॉर्मल आयी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो मुझे बड़ी खुशी हुई। इसके लिए मैं पूज्य स्वामी जी व श्रद्धेय आचार्य श्री को धन्यवाद देता हूँ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उपचार:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रोगी को सर्वप्रथम रिपोर्ट के आधार पर दो माह की दवा दी गयी तथा कुछ परहेज बताया गया। उचित अनुपान से लेने की सलाह दी गयी जिसमें- अर्जुन क्वाथ का काढ़ा सुबह शाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोती पिष्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संगेयासव पिष्टी 10 ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अकीक पिष्टी 5 ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमृता सत् 5 ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगेन्द्र रस 1 ग्राम को मिलाकर सुबह-शाम नाश्ते व खाने से पहले जल के साथ लेने का निर्देश हुआ तथा मधुनाशिनी वटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदयामृत वटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुक्तावटी एवं दिव्य चूर्ण लेने की सलाह भी मिली। इतनी सी औषधि ने कमाल कर दिया। आज रोगी पूर्ण स्वस्थ है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/482.jpg" alt="48" width="800" height="531"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">घुटने में दर्द से मिला आराम:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरे रोगी 72 वर्षीय सत्य प्रसाद भट्ट जिनके घुटने की समस्या थी। वे पतंजलि योगपीठ ओपीडी हेतु सर्वप्रथम 30 अप्रेल 2013 को आये। परीक्षण के बाद उन्हें रोग की प्रकृति अनुसार दो माह की दवा दी गयी। इसमें पीड़ांतक क्वाथ का काढ़ा सुबह-शाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वर्ण माक्षिक भस्म 5 ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महावात विधवंसन रस 10 ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रवाल पिष्टी 5 ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वृहतवात चिंतामणि रस 2 ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोदन्ती भस्म 5 ग्राम को मिलाकर सुबह-शाम खाली पेट ताजे जल से लेने का मार्गदर्शन दिया गया। तथा योगराज गुग्गल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चन्द्रप्रभा वटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुनर्नवादि मण्डूर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिलाजीत सत् लेने की सलाह भी रोगी को दी। दर्द के स्थान तथा जोड़ों पर पीड़ांतक तेल की मालिश कराई गयी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही रोगी को परहेज के क्रम में चावल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजमा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तले-भुने पदार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैदे से बने पदार्थ तथा अधिक प्रोटीनयुक्त पदार्थ न खाने व पथ्य में हरी पत्तेदार सब्जियां तथा सादा सुपाच्य भोजन लेने को कहा गया। प्राकृतिक उपाय के रूप में सेन्धा नमक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धतूरे के पत्ते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मदार के पत्ते व एरण्ड के पत्ते से सिकाई करने के लिए कहा गया। इन उपचारों को एक माह तक करने के बाद वे पुन: चिकित्सक से मिले। रिपोर्ट नार्मल आई</span>, 90<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत आराम भी था। स्वयं रोगी के शब्दों में-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे घुटनों में काफी दर्द था। मैंने दिल्ली में एलोपैथी इलाज करवाया लेकिन लाभ नहीं हुआ। मैं 30 अप्रेल 2013 को पतंजलि आयुर्वेदिक हॉस्पिटल की ओपीडी में आया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां डॉक्टर साहब ने मुझे एक माह की दवा दी। दवा के सेवन से मुझे 90 प्रतिशत आराम हुआ। मैं डॉक्टर साहब के दिशानिर्देशन में चिकित्सा आज भी ले रहा हूँ। योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज व आयुर्वेद शिरोमणि आचार्य बालकृष्ण जी महाराज जैसे महापुरुष भारत माँ को स्वस्थ व भ्रष्टाचार मुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोगभमुक्त करने के प्रति वचनबद्ध हैं। इस स्वास्थ्य लाभ के बाद मैं भारत स्वाभिमान संगठन के लिये की सेवा के लिए तत्पर हूँ। पूरी तरह स्वस्थ हूँ।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/922.jpg" alt="92" width="800" height="533"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कैंसर रोगी शीला देवी:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कैंसर की मरीज श्रीमती शीला देवी की उम्र 66 वर्ष है जो अब स्वस्थ निरोगी जीवन की अधिकारी हैं। वे दिनांक १९ जनवरी 2016 को उपचार हेतु पतंजलि ओपीडी सेक्शन पहुँची। चिकित्सकों ने उनकी पूर्व की रिपोर्ट देखी और उपचार प्रारम्भ किया। उपचार के क्रम में उन्हें सर्वकल्प क्वाथ तथा कायाकल्प क्वाथ का काढ़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संजीवनी वटी 10 ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिला सिन्दूर 3 ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताम्र भस्म 1 ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमृता सत् 10 ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभ्रक भस्म 5 ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हीरक भस्म 300 मि.ग्रा.</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वर्ण वसन्त मालती 4 ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुक्ता पिष्टी 4 ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रवाल पंचामृत 5 ग्राम को मिलाकर खाली पेट सुबह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोपहर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शाम शहद के साथ लेने का परामर्श दिया गया। इसके साथ दो-दो गोली कांचनार गुग्गुल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वृद्धिवाधिका वटी भोजन के पश्चात् ताजे जल से लेने की सलाह दी गई। यही दवा और परहेज क्रमश: दो-दो माह के लिए और बढ़ाया गया। प्राकृतिक उपचार के क्रम में गेहूं का ज्वारा 30 मिली.</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोय रस 25 मिली.</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घृतकुमारी रस 25 मिली.</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोमूत्र 25 मिली.</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी के पत्तों का रस (20 पत्तों का)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीम के पत्तों का रस (7 पत्ते) सुबह-शाम पीने का परामर्श दिया गया। कपालभाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भस्त्रिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुलोम-विलोम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रामरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्गीथ व उज्जायी प्राणायाम करने की सलाह दी गयी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस उपचार प्रक्रिया का प्रभाव ही है कि अब वे पूरी तरह स्वस्थ हैं। सामान्य जीवन जी रही हैं। एक वर्ष के उपचार में ही उन्हें फायदा हो गया। उनके पुत्र श्री श्याम सुंदर शर्मा लिखते हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं श्याम सुंदर शर्मा निवासी बुलंदशहर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उ.प्र. अपनी माता जी श्रीमति शीला देवी जो कैन्सर जैसे गम्भीर रोग से पीड़ित थीं। दिनांक 18.1.13 को हम इन्हें पतंजलि योगपीठ में लाये जिनका इलाज पतंजलि आयुर्वेदिक हॉस्पिटल के चिकित्सा व्यवस्था के माध्यम से प्रारम्भ हुआ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उनके इलाज को अभी 1 माह ही पूरा हुआ कि उन्हें लगभग 60 प्रतिशत फायदा मिला। मैं इनके इलाज से सन्तुष्ट और आशा भरा था।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जोड़ों के दर्द से मुक्ति:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक अन्य जोड़ों के दर्द का रोगी अमृत लाल सिदार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिलासपुर निवासी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिनांक 20</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> फरवरी 2013 को पतंजलि योगपीठ में उपचार के लिए आये। इनका उपचार पतंजलि योगपीठ की प्रारम्भ किया। उनकी उम्र 41 वर्ष थी। इन्हें संपूर्ण प्राणायाम के साथ निम्र औषधियों के सेवन की सलाह दी गयी-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पीड़ांतक क्वाथ का काढ़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वर्णमाक्षिक भस्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महावात विधवंसन रस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रवाल पिष्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोदन्ती भस्म को मिलाकर सुबह-शाम शहद के साथ सेवन कराया गया तथा एक-एक गोली योगराज गुग्गुल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चन्द्रप्रभा वटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुनर्नवादि मण्डूर लेने का परामर्श दिया गया। सुबह-शाम 4</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम वातारी चूर्ण गर्म जल से तथा दो-दो गोली कुटजघन वटी तथा चित्रकादि वटी लेने की सलाह भी दी गई। बादाम तेल से जोड़ों पर मालिश का परामर्श दिया गया। स्वयं रोगी के अनुसार-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं अमृतलाल सिदार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्राम व पोस्ट मस्तूकी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिला-बिलासपुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छ.ग. का निवासी हूँ। मैं दिनांक 03 मार्च 20</span><span lang="hi" xml:lang="hi">13 को पतंजलि योगपीठ आया। मैंने यहां ओ.पी.डी. नम्बर 12</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> में दिखाया। मुझे गंभीर रूप से जोड़ों में दर्द व पेट की बीमारी थी। सबसे ज्यादा समस्या प्लेटलेट्स की थी जो पहले 30 था। उपचार के एक महीने बाद मुझे ५०त्न फायदा हुआ। इसके लिये मैं आचार्य श्री एवं स्वामी जी का आभार व्यक्त करता हूँ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आहार नली में कैंसर:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आहार नली में कैंसर के एक रोगी जिसका उपचार बॉम्बे के कोकिलाबेन हॉस्पिटल में चल रहा था। कोई संतोषजनक स्थिति न देखकर उनके भांजे श्री प्रेमनारायण सोनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नौगांव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छतरपुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">म.प्र. उन्हें पतंजलि योगपीठ लाये। परीक्षण के बाद 28 जून 2014 को उन्हें बताये अनुपान के साथ ये औषधियां दी गई जिसके सेवन का क्रम इस प्रकार था।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वकल्प क्वाथ व कायाकल्प क्वाथ का काढ़ा सुबह-शाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खाली पेट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संजीवनी वटी 20 ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिला सिन्दूर 3 ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताम्र भस्म 1 ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमृता सत् 20 ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभ्रक भस्म 3 ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हीरक भस्म 300 मि.ग्रा.</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वर्ण वसन्तमालती 4 ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रवाल पंचामृत 3 ग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोती पिष्टी 4 ग्राम एक साथ मिलाकर सुबह-दोपहर-शाम शहद के साथ सेवन करने का परामर्श दिया गया। साथ में दो-दो गोली कैशोर गुग्गुल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वृद्धिवाधिका वटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कांचनार गुग्गुल तथा आरोग्यवर्धनी वटी सुबह-शाम लेने की सलाह दी गई। प्राकृतिक उपचार के क्रम में गेहूं का ज्वारा 30 मिली.</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिलोय रस 25 मिली.</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घृतकुमारी रस 25 मिली.</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोमूत्र 25 मिली.</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी के 21 पत्तों का रस तथा नीम के 7 पत्तों का रस सुबह शाम पीने का परामर्श दिया गया। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रथम प्रयास में ही रोगी को 50% आराम मिला। इस प्रकार इन औषधियों के सेवन को सितम्बर 2014 तक बढ़ा दी गई। इसी के साथ रोगी को 8 प्राणायाम तथा योगाभ्यास करने का निर्देश दिया गया। साथ ही सामान्य आहार के साथ उन्हें सहिजन की सब्जी खाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंकुरित अनाज (चना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मसूर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेथी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूंगफली) चबाकर खाने का परामर्श भी दिया गया। रोगी ने समुचित ढंग से उपचार कराया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज उसे ५०त्न आराम है। रोगी के भांजे का पत्र स्वयं इसका गवाह है। वे लिखते हैं कि 29.03.214 को मेरे मामा जी का ईलाज बॉम्बे का कोकिलाबेन हॉस्पिटल में चल रहा था। लेकिन वहाँ कोई संतोष नहीं मिला। फिर वे हरिद्वार आ गये और पतंजलि आयुर्वेदिक हॉस्पिटल से दवा ली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस दवा से उन्हें 50% आराम मिला। मेरे  मामा स्वस्थ जीवन जीने में सफल हो रहे हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विशेष तथ्य यह है कि रोगी ने पतंजलि योगपीठ के द्वारा निर्देशित औषधियाँ प्रयुक्त की जो पूर्ण शुद्धता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुशल चिकित्सकों द्वारा प्रामाणिकता से तैयार होती हैं। भारत के चिकित्सा विशेषज्ञों का भी मत है कि आयुर्वेद आज भी स्थाई ढंग से कारगर उपचार प्रणाली है बशर्ते चिकित्सक योग्य एवं सेवाभावी हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तैयार औषधियां पूर्ण शुद्धता एवं पूर्ण प्रमाणिक हों तथा रोगी पूरी ईमानदारी से निर्देशित पथ्य-अपथ्य अपनाकर उपचार कराये। पतंजलि योगपीठ का चिकित्सा तंत्र इन तीनों में पूर्णत: खरा है।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>नवम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Nov 2015 21:52:47 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>श्रद्धेय स्वामी जी महाराज व पूज्य आचार्य श्री के प्रवचनों से चुने हुए कुछ वाक्य पुष्प</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. सुमन</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">मुख्य महिला केन्द्रीय प्रभारी </span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">पतंजलि योग समिति</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3186/some-sentences-selected-from-the-discourses-of-revered-swami-ji-maharaj-and-pujya-acharya-shri-pushp"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/863.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पंचव्रत:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1.   <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं व्रत लेता हूँ कि अपने संकल्प में विकल्प नहीं आने दूंगा। तथा अपने पुरुषार्थ में लेशमात्र भी न्यूनता नहीं आने दूंगा। योग आयुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी एवं वैदिक संस्कृति के प्रति पूर्ण समर्पित रहूँगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">2. <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं भागवत सत्ता व गुरुसत्ता का प्रतिनिधि/ प्रतिरूप/ मूर्त्तरूप होकर दिव्य जीवन जीऊँगी/ जीऊँगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">3.  <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं वेदाज्ञा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्रज्ञा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरवाज्ञा व आत्माज्ञा का एक बार भी अनादर नहीं करुँगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य सनातन आर्य वैदिक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हिन्दू संस्कृति के प्रति पूर्णदृढ़ता निष्ठा/ कट्टरता रखूंगा तथा सबके प्रति उदारता रखूंगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">4.  <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु के व संगठन के साथ कभी भी विश्वासघात नहीं करुंगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">5.  <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं स्वयं योगव्रती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशीव्रती बनकर एवं औरों को बनाकर अपने जीवन को दिव्य जीवन बनाऊँगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभात संकल्प:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1.  <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं गुरु सत्ता व भागवत सत्ता एवं ईश्वरीय न्याय में अपनी निष्ठा अखण्ड रखूंगा। मैं गुरु सत्ता व शाश्वत के एक आदर्श प्रतिनिधि के अनुरूप ही अपना सम्पूर्ण व्यवहार व आचरण करूँगा। मैं </span>24<span lang="hi" xml:lang="hi"> घंटा ब्रह्मभाव में रहूँगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं सब सम्बन्धों में ब्रह्म सम्बन्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब रूपों में ब्रह्मरूप तथा सब सुखों में ब्रह्मसुख का अनुभव करूँगा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ईशावास्यमिदं सर्वम्</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">वासुदेव: सर्वम्</span>’ '<span lang="hi" xml:lang="hi">सियाराम मय सब जग जानी</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">2.   <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं अपने जीवन व मन में एक क्षण के लिए भी अज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपवित्रता आलस्य व अविश्वास (निराशा) को स्थान नहीं दूँगा। क्योंकि जीवन में दु:ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दरिद्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशान्ति व दुर्गति के ये ही कारण हैं। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">परोऽपेहि मनस्पाप किमशस्तानि शंससि</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहमिन्द्रो न पराजिग्ये</span>’, '<span lang="hi" xml:lang="hi">कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो में सव्य आहित:</span> ’<span lang="hi" xml:lang="hi">। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">3. <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं व्यक्ति व समष्टि में अर्थात व्यक्ति व व्यवस्था में भगवत्ता अर्थात् भगवान् का साम्राज्य व ईश्वरीय न्याय व्यवस्था को प्रतिष्ठापित करने हेतु संकल्पित रहँगा। सैल्फ रियलाइजेशन एवं कलैक्टिव रियलाइजेशन की साधना के सिद्धान्त में पूर्ण आस्था रखूँगा। इन्द्रं वर्धनोऽप्तुर: कृण्वन्तो विश्वमार्यम्। अपघ्नतो</span>6<span lang="hi" xml:lang="hi">राव्ण:। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">4. <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने पूर्वज ऋषि-ऋषिकाओं एवं वीर वीराङ्गनाओं को आदर्श मानते हुए मेरा यह दृढ़ विश्वास हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कि जीवन पर पहला अधिकार भगवान् का है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा मातृभूमि का तथा तीसरा माता-पिता व गुरु का तथा अन्त में मेरा स्वयं का हैं। अत: हर पल आत्मा में परमात्मा की जो प्रेरणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुकार आदेश उठता है उसी के अनुरूप मैं आचरण करूँगा। अपने पूर्वजों की तरह जीवन जीऊँगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">5.  <span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा व संस्कारों के द्वारा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्काम सेवा से मैं अपने जीवन व जगत् को पुण्यों से प्रकाशित करुँगा। प्रभात संकल्प के बाद प्राणों के साथ प्रणव का ध्यान करते हुए ध्यान योग से मैं दिव्य जीवन की साधना करुँगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">प्रार्थना:</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">6.  <span lang="hi" xml:lang="hi">हे प्रभो! तेरे अनुग्रह से मेरा शरीर स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन संयमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि विवेकवती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय प्रेम से भरा हुआ तथा अहं अभिमान शून्य हो। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">7. <span lang="hi" xml:lang="hi">हे सर्वव्यापक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वरक्षक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सच्चिदानंदस्वरूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आनन्दमय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्योर्तिमय भगवान्! आप अन्तर्यामी को हम हर पल अपने हृदय में अनुभव करें। शुद्धज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्धकर्म एवं शुद्ध उपासना के द्वारा सदा आपकी शरणागति में रहें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">8.  <span lang="hi" xml:lang="hi">हे करूणामय पिता! हमको पूर्ण विश्वास है कि हमें निमित्त बनाकर तुम ही सर्वत्र प्रकट हो रहे हो। सभी शक्तियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पूर्ण ऐश्वर्य सभी स्वरूपों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभी सम्बन्धों तथा सभी सुखों के मूल में हे प्रभो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेरी ही अनन्त महिमा को अनुभव करें। हे दयालु पिता! हम तेरी संतानें तेरे अनुग्रह से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेरे प्रसाद से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेरे प्रभाव से व तेरे प्रकाश से सदा प्रकाशित होकर तेेरे महत् तेज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म व भक्ति से युक्त रहें। हे प्रभो! हमारी समस्त अपूर्णताओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षुद्रताओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुर्बलताओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्लेशों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वासनाओं एवं अज्ञान का विनाशकर सदा अपनी शरणागति में हमें रखना।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">9.  <span lang="hi" xml:lang="hi">हे जगज्जननि जगदम्बे! हम तेरी संताने इस भारत माता व धरती माता पर फैले समस्त दु:खों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्याय व अधर्म का विनाश कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वत्र तेरा वैभव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय व धर्म की प्रतिष्ठा करके अन्त में सदा-सदा के लिए तेरे अखण्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नित्य व शाश्वत आनन्द को प्राप्त करें। हे मात: इस बार का ये जन्म व जीवन अभ्युदय व नि:श्रेयस को पूर्ण रूप से सिद्ध करने वाला हो जिससे बार-बार होने वाले जन्म-मरण के प्रवाह से मुक्त होकर सदा तुझसे युक्त हो जाएं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">10.  <span lang="hi" xml:lang="hi">हे प्राणेश्वर! प्राणों के साथ तुझ प्रणव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओंकार की उपासना करते हुए योगबल से हम तेरे दिव्य ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य दृष्टि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य भाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धा भक्ति व दिव्य कर्म की शक्ति से युक्त होकर दिव्य जीवन जीएं। तरे यन्त्र बनकर तेरा ही काम करके जीवन व जगत् में तेरा ही सत्य साम्राज्य स्थापित करके समस्त अज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्याय व अभाव को दूर करके  सर्वत्र भगवत्ता को प्रतिष्ठित करके अन्त में तेरे आनन्दधाम में पहुंचे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">  <span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार प्रभात संकल्प व ध्यान योग से पूर्ण जागृत आत्माएँ तैयार होंगी और उनके माध्यम से धरती पर स्वयं ईश्वरीय शक्ति काम करेंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य अपनी सभी अपूर्णताओं से मुक्त होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वत्र भगवत्ता प्रतिष्ठापित होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसार स्वर्ग बनेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब अज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दु:ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दरिद्रता व अधर्म से मुक्त जीवन जीएंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही हमारे जीवन का योग व लक्ष्य है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">11.   <span lang="hi" xml:lang="hi">योग क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">एकाग्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसन्नता व पवित्रता पूर्वक पूर्ण पुरुषार्थ के साथ अभ्युदय व नि:श्रेयस को सिद्ध करके अकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्काम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आप्तकाम या अकाम होकर दिव्य जीवन जीना ही योग है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">12.  <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरे शब्दों में योग का अर्थ चित्त की दग्धबीज या निर्बीज अवस्था को प्राप्त करना। अन्य शब्दों में योग का अर्थ- हम भागवत के या शाश्वत के प्रतिनिधि बन जाते हैं अथवा हमारे माध्यम से भगवान् काम करने लग जायें और हम उनके यन्त्र बन जायें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">13.  <span lang="hi" xml:lang="hi">योग के आध्यात्मिक लाभ- दिव्य जीवन की प्राप्ति। दिव्य जीवन क्या है</span>?</h5>
<h5 style="text-align:justify;">                (<span lang="hi" xml:lang="hi">क) आत्मा में परमात्मा की दिव्य प्रेरणा</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">                (<span lang="hi" xml:lang="hi">ख) मस्तिष्क में परमात्मा का दिव्य ज्ञान</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">                (<span lang="hi" xml:lang="hi">ग) हृदय में परमात्मा की दिव्य संवेदनाएं</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">                (<span lang="hi" xml:lang="hi">घ) सम्पूर्ण शरीर में परमात्मा की दिव्य सामर्थ्य</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">                (<span lang="hi" xml:lang="hi">घ) जीवन में भगवान् का दिव्य ऐश्वर्य</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">                (<span lang="hi" xml:lang="hi">च) जीवन में भगवान् का दिव्य सुख</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">                (<span lang="hi" xml:lang="hi">छ) जीवन में भगवान् की दिव्य शान्ति। योग के आध्यात्मिक लाभ हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>14.   <span lang="hi" xml:lang="hi">योग के शारीरिक या भौतिक लाभ-</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>क.  सर्व संतुलन- </strong>सभी प्रकार के कैमिकल्स का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोषों का (वात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पित्त व कफ)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आहार का (सात्विक आहार)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचारों का (दिव्य उच्च विचार) व हरमोन्स का सन्तुलन एक-एक शैल्स से लेकर पूरे सिस्टम का संतुलन योग से होता है। यह योग का भौतिक लाभ है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ख.  सुप्तज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति या सामर्थ्य का जागरण तथा डिजनरेट हुए शैल्स रिजनरेट होते हैं यह भी योग का भौतिक लाभ है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ग. भौतिक स्थूल शरीर के एक-एक शैल में एक दिव्य आभा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चे जैसा लावण्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पराक्रम में वृद्धि होना भी योग का भौतिक लाभ है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">15.  <span lang="hi" xml:lang="hi">योग के साथ सत्संग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी का अभ्यास भी हमें करना है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">16.  <span lang="hi" xml:lang="hi">समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमें जो करना है उसे अविलम्ब कर लेना चाहिये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज का दिन हमारे जीवन का सर्वोत्तम समय है अर्थात् वर्तमान का पूर्ण सदुपयोग हमें करना है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">17.  <span lang="hi" xml:lang="hi">पेड़ के पत्ते और फूल दिखते है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके नीचे जो जड़े छिपी हैं जिनके आधार पर वह पेड़ टिका है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे यदि मजबूत हैं तो बिना दिखे भी वे पेड़ के माध्यम से प्रतिबिम्बित (रिफलक्ट) होती ही हैं। हमारा तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ दिखे या न दिखे हमारे जीवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार के माध्यम से प्रतिबिम्बित होता ही है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">18.  <span lang="hi" xml:lang="hi">साधनों की अधिकता से नहीं अपितु साधना की अधिकता से सुख मिलता है। योग मार्ग के पथिक के लिए साधना ही सम्पत्ति है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">19.  <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति को लगता है कि अब सुख या शान्ति मिलने ही वाली है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर फिर भी कुछ-न-कुछ तो फासला (डिस्टैन्स) बना ही रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए सुख यदि चाहिये तो इसी क्षण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान क्षण में आनन्द उठा लीजिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे वह कैसी भी परिस्थति क्यों न हो। कितनी भी विषमताएं क्यों न हों। जो योगी प्रतिकूलताओं में भी प्रसन्न रह सकता है वही अन्तिम आनन्द को भी प्राप्त कर पाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और अभी नहीं तो कभी नहीं। इस क्षण के अतिरिक्त तो सुख की आशा लगाये बैठा रहना मन का एक भ्रम या छलावा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">20.  <span lang="hi" xml:lang="hi">हम सत्वगुण में रहते हैं तो खुद भी सुखी रहेंगे और दूसरों को भी सुख देगें। रजोगुण में रहेंगे तो खुद भी सुख-दु:ख से मिश्रित होगें और दूसरों को भी दोनों दे सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु तमोगुण से युक्त हमारा व्यवहार निश्चित रूप से हमें भी कष्ट देगा और दूसरे को भी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">21.  <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरों से आगे निकलना है तो सावधानी पूर्वक अत्यन्त पुरुषार्थ करके तेज दौड़ना पड़ेगा। हमें अपना तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ अत्यन्त बढ़ाना होगा। यदि तेज दौड़ने में सावधानी नहीं रही तो गिर कर चोट भी खा सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">22.   <span lang="hi" xml:lang="hi">अत्यन्त पुरुषार्थ व अथक प्रयास करने वाले लोगों की गौरव गाथा से ग्रन्थ के ग्रन्थ भरे पड़े है पर उन महापुरुषों या ऋषियों के प्रतिनिधि या उत्तराधिकारी कहलाने का हक हम तभी पा सकते हैं जब हम उतना तप और पुरुषार्थ करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">23. <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ विशेष पाने के लिए तुम्हें याचना नहीं पात्रता प्राप्त करनी होगी। तुम्हें आध्यात्मिक खजाने का वारिश होना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसके पात्र बनों। स्वयं माता-पिता भी अपनी सम्पत्ति का वारिश अपात्र सन्तान को नहीं बनाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">24.  <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन मूल्यों और आदर्शों की आप बात करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पहले सच्चाई से उन्हें अपने अन्दर उतार लेना फिर लोग तो खुद ही समझ जायेंगे। सूरज के उगने मात्र से अन्धकार तो स्वयं ही भाग जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">25.  <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयं के सुख के लिए जीने वाला व्यक्ति कभी दूसरों को सुख दे नहीं सकता और जो दूसरों के सुख के लिए जीयेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके सुखों की व्यवस्था भगवान् स्वयं करते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">26.  <span lang="hi" xml:lang="hi">हमें अच्छे दिखने का प्रयास कम और अच्छा बनने का प्रयास अधिक करना चाहिये क्योंकि कागज के फूल सुगन्ध रहित होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">27.  <span lang="hi" xml:lang="hi">जब तुम्हारा अपना जीवन दिव्य व योगमय बनेगा तो उसकी गूँज बहुत दूर तक तुरन्त सुनाई देती हैं</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">28.  <span lang="hi" xml:lang="hi">लाखों शब्दों की ध्वनि से कर्म की ध्वनि अधिक महान् होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">29.  <span lang="hi" xml:lang="hi">योग करने का संकल्प लेकर जब योगिनी माँ इस धरती पर दिव्य सन्तानों को जन्म देगी तो अपंग बच्चे पैदा नहीं होंगे। </span>7<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>8<span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ बच्चे आज शारीरिक या मानसिक रूप से विकलांग हैं। इससे उनके माता-पिता व सम्बन्धी अत्यन्त परेशान होते हैं। अत: मनुष्य के दिव्य जीवन का प्रारम्भ योगिनी माँ के गर्म में आने से होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">30.  <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन बच्चों को गर्भ में ही योग के संस्कार मिल गए वो बच्चे जन्म से ही योग करने वाले व्रजांगी हनुमान जी जैसे बलवान बनेंगे। जो आज योगी शिशु है- वही कल योगी किशोर होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही अच्छा युवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छा ग्रहस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छा वानप्रस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छा संन्यासी और दिव्य राष्ट्रवादी नागरिक बनेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">31.  <span lang="hi" xml:lang="hi">आप कितनों को योगी बना पायेंगे यह सेकण्ड्री हैं आप ज्यादा को योग ना भी सिखा पाये तो कोई बात नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आप स्वयं पूर्ण योगी बन गए तो आप अकेले ही श्रद्धेय स्वामी जी व पूज्य आचार्य श्री की भांति सैकड़ों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हजारों व लाखों लोगों जितना कार्य कर पायेंगे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">32. <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि मैने अपनी शक्ति और समय को छोटे-छोटे संघर्षों में खर्च कर दिया तो मेरा योगमार्ग में आगे बढ़ना अवरुद्ध हो जायेगा। असतो मा सद् गमय।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">33.  <span lang="hi" xml:lang="hi">जब दूसरे लोग आप पर मिथ्यारोप लगा रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपमान कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सता रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निन्दा करने में अपनी शक्ति लगा रहे हैं तब तुम उनका प्रत्युत्तर देने में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने आपको सही साबित करने के संघर्ष में अपनी ऊर्जा नष्ट न करके धीरे से अपने अन्दर खिसक जाओ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग में आगे बढ़कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कछुए की तरह अपने अंगों को बाहर से समेटकर योग का कवच पहनकर अपने अन्दर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने ही आनन्द में उतर जाइये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं पर माँ भगवती सदियों से तुम्हारा इन्तजार कर रही हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">34. <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा सामर्थ्यानुसार ही होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सामर्थ्य को बढ़ाया भी जा सकता है। सेवा और साधना से ही सामर्थ्य बढ़ती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">35.  <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रियासिद्धि सत्वे भवति महतां नोपकरणे। अर्थात् महापुरुषों की कार्यसिद्धि सत्व (सात्विक पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पराक्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भागवत कृपा व उत्साह) पर निर्भर होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपकरणों (साधनों) पर नहीं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">36.  <span lang="hi" xml:lang="hi">पंचभूत आहार विचार व व्यवहार शुद्ध हो तो हमारा यह शरीर </span>400<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ष तक काम कर सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">37.  <span lang="hi" xml:lang="hi">परा-अपरा विद्या- हमारा सभी प्रकार बौद्धिक शुद्ध ज्ञान अपरा विद्या है तथा शुद्ध ज्ञान के स्तर पर वैसा जीवन जीना प्रारम्भ कर दें और अशुद्ध ज्ञान से सर्वथा मुक्त हो जायें यह परा विद्या है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">38.  <span lang="hi" xml:lang="hi">जिस प्रकार इन्द्रियों को सात्विक पाँच प्रकार के विषयों से (रूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गन्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पर्श</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द) मन को सात्विक विचारों से सुख मिलता है उसी प्रकार हमारे हृदय और हृदयस्थ आत्मा को परमात्मा की भक्ति और सान्निध्य से सुख विशेष मिलता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">39.  <span lang="hi" xml:lang="hi">सोने वाला कलियुग का रूप है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उठने के लिए अंगड़ाई लेने वाला द्वापर का रूप है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उठने वाला त्रेता का रूप और चलने वाला पुरुषार्थी तो साक्षात् सतयुग रूप होता है। सत युग के समान पुरुषार्थी में ही धर्म व पुण्यफल प्रतिष्ठित होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">40.   <span lang="hi" xml:lang="hi">हे प्रभु! गलती होने पर डाँटने और दण्ड देने वाला भी तेरा ही रूप है और वह भी उतना ही करुणालु है जितना प्रेम करने वाला है। हे मेरे जीवन के आधार! सदा तेरी ही इच्छा।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>नवम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Nov 2015 21:51:59 +0530</pubDate>
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