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                <title>दिसम्बर - योग संदेश</title>
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                            <item>
                <title>श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज के शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">देश में फैल रही असहिष्णुता या वैचारिक संघर्ष की जड़ें</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसा विचार हम करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं हमारे संस्कार और व्यवहार का मूल आधार बनता जाता है। बाह्य संसार के दबावों-प्रभावों से हम प्रभावित भी होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और तदनुसार अपने व्यवहार में आवश्यक समायोजन भी करते चलते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु मूल दिशा सदा अपने विचार से ही निर्धारित होती रहती है। क्योंकि ज्ञान ही समस्त व्यवहार का आधार एवं प्रेरक है। ज्ञान-विचार-संवेदना एवं व्यवहार यह क्रम हेाता है विचार के आगे-पीछे का। ज्ञान के आधार पर हमारा विचार बनता है तथा वही विचार जब पूर्णत: परिपक्व एवं सामंजस्यूपर्ण हो</span></strong></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3187/eternal-truth-emanating-from-the-eternal-wisdom-of-the-revered-yogarishi--the-most-revered-swamiji-maharaj"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/613.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">देश में फैल रही असहिष्णुता या वैचारिक संघर्ष की जड़ें</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसा विचार हम करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं हमारे संस्कार और व्यवहार का मूल आधार बनता जाता है। बाह्य संसार के दबावों-प्रभावों से हम प्रभावित भी होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और तदनुसार अपने व्यवहार में आवश्यक समायोजन भी करते चलते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु मूल दिशा सदा अपने विचार से ही निर्धारित होती रहती है। क्योंकि ज्ञान ही समस्त व्यवहार का आधार एवं प्रेरक है। ज्ञान-विचार-संवेदना एवं व्यवहार यह क्रम हेाता है विचार के आगे-पीछे का। ज्ञान के आधार पर हमारा विचार बनता है तथा वही विचार जब पूर्णत: परिपक्व एवं सामंजस्यूपर्ण हो जाता है तो वही हमारी मार्गदर्शक  विचारधारा बन जाती है। इसी को वैचारिक अधिष्ठान या विचारधारा नाम दिया जाता है। जैसी विचारधारा होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर वैसे ही हम सिद्धान्त निर्धारित कर लेते हैं जिन्हें अंग्रेजी में प्रिंसिपल्स कहते हैं। फिर वैसे ही या उसी के अनुरूप ही पारिवारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनैतिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में  मॉडल बने यह प्रयास होता हैै</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्धि एवं शान्ति के लिए। यह परिकल्पित आदर्श स्थिति है।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">व</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>स्तुत:</strong> ऐसे सांगोपांग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परस्पर सामञ्जस्यपूर्ण माडॅल्स आधुनिक युग में कहीं बने नहीं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु आदर्श यही है। सत्य यह है कि आधुनिक संसार में इस विषय में घनघोर अराजकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यात्म के क्षेत्र में प्रशान्त विवेक के शीर्ष साधकों या सिद्धों को  आदर्श मानने वाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी समय राजनीति के क्षेत्र में परम उद्वेग-वर्धक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षोभ-वर्धक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्माद-वर्धक व्यक्तियों  को मॉडल्स मानते हैं और परिवार में परस्पर प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संतुलन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सबका ध्यान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सबके विकास की चिंता करने वाले को तथा आदर्श मानने वाले बाजार में होड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकाधिपत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सबको पछाड़ देने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अकेले शीर्ष पर पहुॅचने वाले को रोल-मॉडल मानते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी के साथ अनेक समानान्तर प्रयास बाजार-क्षेत्र में देखे जाते हैं। व्यापारिक प्रयोजनों से विभिन्न संस्थानों द्वारा अपने अनुकूल व्यक्तियों को खेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिनेमा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साहित्य आदि क्षेत्रों के आइकॉन या रोल-मॉडल की तरह प्रस्तुत यानी प्रोजेक्ट किया जाता है। इसमें भारी होड़ चलती है और कभी कोई आइकॉन चमकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी कोई अन्य । इसके पीछे बाजार की विभिन्न शक्तियों अर्थात् व्यापार के अनेक संस्थानों के बहुस्तरीय कारनामे होते हैं।  </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विविध प्रक्रियाओं के आधार पर हमारे रोल मॉडल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आइकोन्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विजिनरी या आदर्श बन जाते हैं। विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचारधारा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्धान्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मॉडल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोल मॉडल्स या आदर्श आदि का सम्मिलित प्रभाव हम व्यक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र व विश्व में देखते हैं। धर्म की शाश्वत प्रज्ञा का ध्यान इस प्रक्रिया में प्राय: नहीं रहता। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी तरह से इसे हम देखते हैं तो जैसा हमें ज्ञान दिया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्कूल व समाज में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे ही हमारे विचार व संस्कार बन जाते हैं। विचार ही परिपक्व होकर संस्कार या स्वभाव के रूप में हमारे साथ जुड़ जाते हैं। सबसे पहला प्रभाव प्रारम्भ होता है माता-पिता से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्कूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज इसमें बड़ी भूमिका निभाते हंै। इस सम्पूर्ण सृष्टि के मूल में यदि कोई वस्तु है तो वह विचार या संकल्प और पुरुषार्थ है और उसी का विस्तार एवं परिणाम है यह सारा संसार।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् के विचार या संकल्प से सृष्टि की उत्पत्ति होती है और इंसान का भी सारा अभ्युदय व नि:श्रेयस इसी विचार-जन्य पुरुषार्थ का विस्तार है। यह विषय अत्यंत गंभीर है और इसके हजारों पहलू हैं। संक्षेप में इसे कहें तो जैसा हमारा ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जानकारी या समझ विकसित होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे संसार के हर क्षेत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर पहलू के बारे में हमारे विचार हो जाते हैं और हम हर आदमी के मुंह से हर विषय में एक ही बात सुनते हैं इस विषय में मेरे तो ऐसे विचार हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसा हमें ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशिक्षण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जानकारी मिलती है वैसी ही हमारी समझ विकसित हो जाती है फिर वैसे ही हमारे विचार हो जाते हैं। इसके भी जैसे योग में अष्टचक्र हैं वैसे ही आठ चक्र हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचारधारा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्धान्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मॉडल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोल मॉडल एवं संस्कृति। दो शब्द सबके मुख से बार-बार सुनते हैं- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे या हमारे तो ऐसे विचार </span><span lang="hi" xml:lang="hi">है</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं</span><span lang="hi" xml:lang="hi">’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">‘</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा शब्द है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">यह हमारी संस्कृति है</span><span lang="hi" xml:lang="hi">’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अथवा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">यह हमारी संस्कृति नहीं है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस समय देश में उठ रहे सबसे बड़े विवाद कि देश का माहौल खराब हो रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके मूल में हमें जाना होगा। माहौल आज-कल खराब हो रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यानि पहले अच्छा था। वह अच्छा कब था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके लक्षण क्या थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यह चर्चा नहीं होती। बस एक लहर जैसे फैल रही है या फैलाई जा रही है कि आजकल भारत का माहौल खराब हो रहा है। कम से कम बौद्धिक क्षेत्र में बात बयानबाजी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। खराब माहौल या असहिष्णुता का मूल स्वरूप क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">और जब अच्छा माहौल था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहिष्णुता थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब विभिन्न समाजों के बीच सम्बन्धों का स्वरूप क्या था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये बातें सार्वंजनिक चर्चा में उभर कर आनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी किसी बयान का अर्थ है। अन्यथा यह केवल राजनैतिक प्रतिस्पर्धा एवं विद्वेष से प्रेरित कथन दिखने लगता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मुख्य बात यह है कि माहौल खराब होने की चिंता से व्यावहारिक परिणाम निकलें। हम अपने नागरिकों में कौन से विचार प्रतिष्ठित कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस पर गहराई से ध्यान दें। इसका स्वाभाविक अगला चरण होगा कि हम भावी नागरिकों को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने बच्चों को किस रूप में तैयार कर रहें हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ढाल रहें है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें कौन से संस्कार एवं विचार दे रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसकी चिन्ता की जाएं। क्योंकि देश के माहौल की चिंता तो वर्षों के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि दशकों और शताब्दियों के लिए की जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">की जानी चाहिए। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्पष्ट है कि इस खराब माहौल के लिए हम एक व्यक्ति या एक पार्टी या किसी एक संस्था अथवा किसी संगठन विशेष को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। वस्तुत: कतिपय सार्वभौमिक कसौटियों के आधार पर ही दायित्व का निर्धारण उचित है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्वेष के आधार पर नहीं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सभी राष्ट्रवासियों को पूरी ईमानदारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गंभीरता व प्रामाणिकता के साथ इस पर गंभीर चिन्तन व मंथन करके एक सही निष्कर्ष पर पहुंचना होगा और इस समस्या की जड़ में जाना होगा और तब एक ही निर्विवादित समाधान निकलेगा कि सार्वभौम कसौटियों के आधार पर खराब माहौल की जिम्मेदारी निश्चित की जा सकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोषारोपण के आधार पर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी के साथ  स्वस्थ ज्ञान परम्परा की नींव हमें बचपन से बच्चों में डालनी पड़ेगी। एक ऐसी ज्ञान परम्परा जिसमें सार्वभौमिकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण वैज्ञानिकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंथ निरपेक्षता तथा साथ ही भौतिकता व आध्यात्मिकता का पूर्ण समावेश हो। यही भारत की मूलभूत सत्य सनातन वैदिक ऋषि ज्ञान परम्परा या आर्ष परम्परा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">सा प्रथमा संस्कृति: विश्ववारा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पर हमें लौटना ही पड़ेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी वैदिक परम्परा एवं आधुनिक ज्ञान विज्ञान की परम्परा को लेकर हम शिक्षा एवं संस्कारों को लेकर आचार्यकुलम् की शिक्षा क्रान्ति के एक बहुत बड़े आंदोलन को लेकर आए हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमें बचपन में बच्चों की नींव या फाउंडेशन को ठीक करना पड़ेगा। यदि बचपन की नींव मजबूत होगी तो फिर व्यक्ति का जीवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संगठन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र व विश्व अपने आप सही दिशा में बढ़ेगा। यही एक पूर्ण समाधान है। अब थोड़ी बहुत मलहम पट्टी करने से बात नहीं बनेगी। अब तो सम्पूर्ण शिक्षा में हमें एक बड़ा आंदोलनकारी परिवर्तन लाना होगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की मूल ज्ञान परम्परा यही है। इसे ही हमारे पूर्वज अपरा व परा विद्या का नाम देते थे। देश के आधुनिक बुद्धिजीवी भी बिना किसी आग्रह के इस संदर्भ में विचार करें तो वे भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचेंगे। सत्य सनातन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शाश्वत है और उसकी ही विजय होती है। वही उपास्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही कल्याण का पथ है। वैचारिक संघर्षो के नाम पर अपनी-अपनी संकीर्ण अर्हता या पांथिक एकांगिता पर आत्यांतिक आग्रह रखते हुए भिन्न विचार वालों को दोष देते रहना तो असहिष्णुता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और इसमें असहिष्णुता ही बढ़ेगी। परस्पर सहजीवन के सर्वमान्य आधार जो हमारे संविधान की भी मूल प्रेरणा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनको राष्ट्रीय परिवेश में सुदृढ़ता से प्रतिष्ठित करना होगा। अन्यथा अविचारित आरोप और राजनैतिक विद्वेष सदा असहिष्णुता बढ़ाएगें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घटा नहीं सकते। अन्य को असहिष्णुता कहते समय तत्वनिष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तुनिष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्म-परीक्षण करना कर्तव्य है।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शाश्वत प्रज्ञा</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>दिसम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Dec 2015 21:59:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अगली आँधी जड़ी-बूटियों की</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण</span></h5>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3188/next-storm-of-herbs"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/756.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">   समस्त संसार में आदिकाल से ही बीमारियों का ईलाज जड़ी-बूटियों से पीढ़ी दर पीढ़ी चलता आ रहा है। अमेरीका व एशिया सहित विश्व भर में आज भी लगभग 80 फीसदी लोग परंपरागत चिकित्सा पद्धति पर ही निर्भर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज परंम्परागत चिकित्सा के तेजी से प्रचलित होने का कारण मँहगी आधुनिक चिकित्सा एवं उसके बढ़ते दुष्प्रभाव हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट के अनुसार विश्व की लगभग 80 फीसदी जनसंख्या विभिन्न प्रकार की परंपरागत पद्धतियों जैसे योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यूनानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्धा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयरम्पा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चायनीज़ होम्योपैथी तथा एक्युपंचर इत्यादि का प्रयोग कर रही है। एक सर्वे के मुताबिक 74 फीसदी आधुनिक चिकित्सक यह मानते हैं कि आधुनिक चिकित्सा तभी अधिक प्रभावी होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब यह परम्परागत चिकित्सा पद्धति के साथ जुड़ेगी क्योंकि आयुर्वेद की परम्ंपरा को सर्वप्राचीन व शाश्वत माना गया है। हमारे पूर्वज ऋषि-मुनियों महर्षि चरक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुश्रुत व धन्वन्तरी आदि ने जड़ी-बूटियों पर हजारों वर्षों तक अनुसंधान करके उत्तम स्वास्थ्य एवं दीर्घायु जीवन के लिए आयुर्वेद रूपी धरोहर प्रदान की है। चरक ऋषि का यह कथन </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सोऽयमायुर्वेद: शाश्वतो निर्दिश्ते अनादित्वात्</span>’ '<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति का साथ ही सरल व अनादि है</span>’, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी का ही प्रभाव है कि आज भी आयुर्वेदिक पद्धति किसी न किसी रूप में हमारे दिलों में बसी हुई है। हम अपने रोजमर्रा के जीवन में देखते सुनते हैं कि पेट दर्द होने पर या गैस होने पर अजवायन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हींग आदि लेने को कहा जाता है। सर्दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जुकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खाँसी व गला खराब होने पर कहा जाता है कि ठण्डा पानी न पिओ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अदरक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काली मिर्च की चाय ले लो या अदरक का रस व शहद ले लो आदि। दर्द होने व चोट लगने पर हल्दी दूध का सेवन करो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये सब बुजुर्गों द्वारा निर्देशित परम्परा आयुर्वेद के ही अंग हैं।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वि</span><span lang="hi" xml:lang="hi">श्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के संदर्भ में आधुनिक परिभाषा के अनुसार मात्र बीमारियों की अनुपस्थिति ही स्वस्थ होना नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु वह अवस्था जिसमें पूर्ण शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक व समाजिक समरसता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संतुष्टि तथा खुशहाली हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">है। ऐलोपैथी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">होम्योपैथी आदि चिकित्साओं से भिन्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद केवल एक चिकित्सा पद्धति न होकर एक पूर्ण जीवन विज्ञान है- आयुर्वेद (अर्थात् आयुर् = आयु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और वेद = ज्ञान) के अनुसार शरीर तीन मुख्य स्तम्भों पर टिका हुआ है। आचार-विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आहार और निद्रा- शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मा एवं इन्द्रियों का सामंजस्य ही स्वास्थ्य का मूल है- आयुर्वेद के अनुसार दोष एवं धातुओं का शरीर में असंतुलित होना </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">व्याधि</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा इन्हीं दोष व धातुओं का संतुलित अवस्था में होना </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहा गया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक विशेषज्ञ भी ये मानते हैं कि आज के दौर में अधिकतम रोग जीवनशैली के बिगड़ने से उत्पन्न होते हैं। आयुर्वेद विज्ञान नियमित जीवनशैली पर आधारित है। आयुर्वेद जहाँ समग्रता में स्वास्थ्य संबंधी सभी समस्याओं का निराकरण करता है वहीं आधुनिक चिकित्सा विज्ञान मात्र भौतिक बीमारी का त्वरित निराकरण संबंधी कार्य तक ही सीमित है। जड़ी-बूटियों के प्रचलन का एक प्रमुख कारण उनकी सुगम उपलब्धता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे कि हमारी रसोई में मसालों के रूप में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किचन गार्डन में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फल एवं सब्जियों के रूप में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाग बगीचों में। इसी कारण जड़ी-बूटियाँ हमारे दैनिक जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुकी हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज का यह संकल्प है कि स्वदेशी चिकित्सा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। क्योंकि इसी चिकित्सा पद्धति पर अधिसंख्य</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> जनसंख्या आश्रित है। परन्तु दुर्भाग्य से हमारे खेत-खलिहान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जंगल व रसोई से जुड़ी हुई एवं हानि रहित पद्धति होने पर भी सरकार की आयुर्वेद के प्रति उदासीनता हृदय को बहुत पीड़ा देती है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ आज दिन-प्रतिदिन छोटी-छोटी बीमारियों में भी एलोपैथी का प्रभाव बढ़ रहा है। ऐसी परिस्थिति में परंम्परागत व नैसर्गिक चिकित्सा विधा की आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के सम्मुख जनसामान्य में व्यापकता के साथ स्वीकार्यता बढ़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह एक कठिन एवं चुनौती-पूर्ण कार्य है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक तथ्य के अनुसार आधुनिक चिकित्सा प्रणाली में कई सारी बीमारियों का ईलाज आज भी नहीं है और इनके ईलाज के लिए संबंधित दवा को बनाने के लिए कई वर्षों का लम्बा समय व अत्यधिक धन की आवश्यकता होती है। साथ ही बहुत सारी जीवनोपयोगी दवाईयों (लाईफ सेविंग ड्रग्स) का गलत तरीके से उपभोग या उनका उपयोगहीन रह जाना आदि कारणों ने ही फार्मा कम्पनी तथा वैज्ञानिकों को आधुनिक चिकित्सा पद्धति से भिन्न परम्परागत जड़ी-बूटियों आदि के प्रयोग के लिए कालान्तर में प्रेरित किया है। जैसे कि आर्टिमैसिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्टिमिसिया ऐनुआ या चाईनीज स्वीट वार्मवुड से बनती है और सम्पूर्ण संसार में मलेरिया की बहुत ही कारगर दवा है। ऐसी ही अनेक दवायें आधुनिक चिकित्सा पद्धति में जड़ी-बूटियों के मूल आधार को मानकर व आधुनिक रासायन विज्ञान के उपयोग से संशलेषण कर उपयोग में लाई जा रही हैं। इस प्रकार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से परम्परागत चिकित्सा पद्धति का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आखिर वह समय अब लौट रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब देश के हुक्मरान ही नहीं अपितु पूरे विश्व के लोग आयुर्वेदिक औषधि की महत्ता व प्रामाणिकता को स्वीकार ही नहीं करेंगेअपितु इसको अपनाएंगे भी। कुछ वर्ष पहले तक कौन सोच सकता था कि 5 स्टार होटल की संस्कृति पर अनुराग रखने वाले लोग भी लौकी की सब्जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जूस या आंवले के स्वरस के लिए लालायित होंगे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्विक स्तर के मापदंडों के अनुसार जड़ी-बूटी चिकित्सा को विश्व भर में पहुँचाने के लिए निम्नलिखित विषयों पर संज्ञान की आवश्यकता है- </span></h5>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जड़ी बूटियों की सही पहचान।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">औषधीय पौधों का वैज्ञानिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक व गुणवत्ता की दृष्टि से आधुनिक दवाओं के समकक्ष प्रसंस्करण।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">मुख्य घटक का विलगन एवं उसके रासायनिक संघटन का ज्ञान।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">औषधि की सुरक्षा एवं कार्मुक्ता के मानकों के अनुसार उनकी फॉर्माक्लोजिकल (</span>Pharmacological<span lang="hi" xml:lang="hi">) एवं क्लीनिकल स्टडीज (</span>Clinical Studies<span lang="hi" xml:lang="hi">)।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि का उचित मानकीकरण एवं गुणवत्ता नियंत्रण।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">रिसर्च का प्रभावी प्रलेखन।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ प्रभावी ढंग से उपरोक्त सभी तथ्यों पर कार्य कर रहा है। जिससे औषधीय पौधों तथा उनके घटकों की पूर्णरूप से पहचान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी गुणवत्ता नियंत्रण इत्यादि कार्य करके उन्हें वैश्विक स्तर पर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के समकक्ष स्थापित किया जा सके।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">1997-2012 के डेढ़ दशक में आयुर्वेद के क्षेत्र में विकास की धारा प्रगतिशील रही है। आयुर्वेद अस्पतालों की संख्या में बढ़ोत्तरी के साथ उनमें उपलब्ध बिस्तरों की संख्या में उल्लेखनीय 3 फीसदी वार्षिक वृद्धि हुई है। वर्तमान में भारत में लगभग 300 आयुर्वेदिक महाविद्यालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">2,500 के लगभग आयुर्वेदिक अस्पताल तथा 16,000 औषद्यालय हैं। इसके अतिरिक्त विश्व में पंतजलि के लगभग 5,000 चिकित्सालय तथा आरोग्य केन्द्र हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परमात्मा की कृपा व स्वामी रामदेव जी के अथक पुरुषार्थ से इस कार्य को करने के लिए हम निमित्त बने हैं। हमारे अभियान से पहले जहां हीन भावना से ग्रसित वैद्य अपने को वैद्य कहने में संकोच महसूस करते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं अब आयुर्वेेद के वैद्यों की प्रतिष्ठा बढ़ी है। प्रान्तीय एवं राष्ट्रीय स्तरों पर भी वैद्यों के नये पदों का सृजन हुआ है। व्यावसायिक लोग व औद्योगिक घराने भी आयुर्वेद की ओर अग्रसर हुए हैं। यह हमारी प्राचीन ऋषि परम्परा की जीत है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे उत्पादों की गुणवत्ता तुलनात्मक दृष्टि से श्रेष्ठ इसलिए है कि हम इन उत्पादों का विक्रय व्यापार के लिए नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु स्वदेशी के प्रेरक महापुरुषों के सपनों को साकार करने के लिए गाँव-गाँव तक स्वदेशी उत्पादों की उपलब्धता करवाना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि प्रत्येक व्यक्तिको गुणवत्ता युक्त उत्पाद उचित मूल्य पर सुगमता से उपलब्ध हो सकें। हम उच्च गुणवत्ता युक्त उत्पाद कम कीमत पर इसलिए उपलब्ध करा पाते हैं क्योंकि हमारी मैनेजमेंट कोस्ट मात्र २ से 2.5 प्रतिशत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि अन्य कम्पनियों की यह कोस्ट लगभग 8 से 10 प्रतिशत है। हम अपने उत्पादों के विज्ञापन के लिए मॉडल (</span>Model<span lang="hi" xml:lang="hi">) या ब्राँड (</span>Brand<span lang="hi" xml:lang="hi">) पर भारी खर्च नहीं करते। हम अपने उत्पाद सीधे उपभोक्ताओं तक पहुँचाते हैं जिससे कमीशनखोरी व रिश्वतखोरी का खर्च लागत मूल्य में नहीं जुड़ता तथा संस्थान के जो शीर्षस्थ मेनेजमेंट (</span>Top Management<span lang="hi" xml:lang="hi">) है वह सेवा भाव से अवैतनिक सेवा प्रदान करते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> हमारी गुणवत्ता का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि हमारे उत्पाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे-च्यवनप्राश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वर्ण भस्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोती पिष्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मसाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शहद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केशर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेल आदि का सरकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विदेशी कंम्पनियां तथा अन्य षड्यन्त्रकारी एजेन्सियां हजारों बार प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से जाँच करवा चुकी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु एक बार भी गुणवत्ता के मापदण्डों पर हमारे उत्पाद फेल नहीं हुए हैं। वास्तविकता को जानने वाली जनता और अधिक उत्साह व श्रद्धा से इन उत्पादों को अपना रही है। हम पूरी प्रामाणिकता के साथ खड़े हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही हमारी असली ताकत का प्रमाण है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब आधुनिक भारत का इतिहास लिखा जायेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें आयुर्वेद के उत्थान के लिए पतंजलि योगपीठ व आयुर्वेदिक औषध-निर्माण के लिए दिव्य फार्मेसी व पतंजलि आयुर्वेद लि. का नाम अवश्य ही स्वर्णाक्षरों में अंकित होगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा स्वप्न जहां देशवासियों के सहयोग से साकार रूप ले रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं हमारे सामने जिम्मेदारी व चुनौतियाँ भी हैं कि  हम लोगों के विश्वास को पूर्ण करें। न्यूनतम मूल्य पर उच्च गुणवत्ता युक्त औषधियों का निर्माण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जड़ी-बूटी व हानि रहित पदार्थों के सम्मिश्रण से सौन्दर्य प्रसाधन व दैनिक प्रयोग की वस्तुओं का निमार्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च गुणवत्ता युक्त खाद्य सामग्री का निर्माण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस चुनौती को स्वीकार करते हुए हमारे द्वारा विश्व की अत्याधुनिक मशीनों व तकनीकी एवं मापदण्डों पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परम्ंपरागत मूल्यों तथा आदर्शों के निर्वहन के साथ विशाल व व्यापक स्तर पर एक तरह से हम कह सकते हैं </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कॉर्पोरेट कल्चर विद स्प्रिच्युअल करेक्टर</span>’ (Corporate Culture with Spiritual Character<span lang="hi" xml:lang="hi">) आधार को अपनाते हुए औषध से लेकर सभी तरह के उत्पादों के निर्माण का कार्य किया जा रहा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमें विश्वास है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कि देशवासियों के सहयोग से प्रारंम्भ किया हुआ राष्ट्र उत्थान का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषियों की विद्या के संरक्षण का यह अभियान अपने लक्ष्य को अवश्य प्राप्त करेगा। हमारा यह अभियान व्यावसायिक न होकर जनहित में है। इस कार्य के सम्पादन में जहाँ बड़े-बड़े प्रोफेसनल्स (</span>Professional<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">(व्यवसायिक दक्ष लोग) डॉक्टर (</span>Doctor<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साइंटिस्ट (</span>Scientist<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रिसर्चर्स (</span>Researchers<span lang="hi" xml:lang="hi">) व अपने-अपने क्षेत्र के योग्य लोग सेवाएँ दे रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं सैकड़ों-सेवाभावी स्वयंसेवक नि:शुल्क सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। पतंजलि आयुर्वेद का लक्ष्य है वर्ल्ड क्लास क्वालिटी (</span>World Class Quality<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लो प्राइस (</span>Low Price<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चैरिटी एण्ड ट्रस्टीशिप (</span>Charity &amp; Trusteeship<span lang="hi" xml:lang="hi">)। इसी भावना से हम अपने संस्थान को आगे बढ़ा रहे हैं। आयुर्वेदिक औषधियों व अन्य उत्पादों द्वारा प्राप्त साधन को संस्थागत संचालित सांस्कृतिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक व राष्ट्र उत्थान व जन सेवा के विभिन्न कार्यों शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य एवं अनुसंधान आदि में व्यय किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका लाभ करोड़ों देशवासियों को प्राप्त होता है। जड़ी-बूटि व कृषि आधारित कार्य ही ऐसे कार्य हैं जहाँ एक उद्योग स्थापित होता है तो हजारों लोग जो खेत-खलिहान से जुड़े किसान से लेकर मजदूर तक को रोजगार प्राप्त होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमें पूर्ण विश्वास है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे इस संकल्प व प्रयत्न से किसान को अपनी उपज का उचित मूल्य प्राप्त होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं देशवासियों को हानि रहित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्यवर्धक उत्पादों का लाभ मिलेगा। देश स्वस्थ होगा व किसानों की समृद्धि बढ़ेगी। इस संकल्प से प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त के आधार पर लोगों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गांव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देश व देश की समृद्धि का दर्शन बताना</span>, (<span lang="hi" xml:lang="hi">युनिवर्सल लॉ एण्ड जस्टिस) (</span>Universal Law and Justice<span lang="hi" xml:lang="hi">) प्राकृतिक न्यास एवं नैसर्गिक विधान आधार पर कार्य करना। जिन पदार्थों के उपयोग से मानव को हानि हो सकती है उसका उत्पाद करना तो दूर उसके लिए न समर्थन करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न किसी से समर्थन लेना। जो अपने लिए उत्तम वस्तुओं की चाहना करते हैं उन वस्तुओं को सबके लिए उपलब्ध कराने की भावना से कार्य करते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मवत् सर्व भूतेषु य पश्यति स पण्डित:।। दूसरों को सुख देने से ही तुम्हें सुख प्राप्त हो सकता है। आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।। जो तुम्हें अच्छा नहीं लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा व्यवहार तुम दूसरों से भी मत करो। हमारे ध्येय वाक्य हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए हम अपने उत्पादों को लोगों तक पहुँचाने के लिए कृत्रिम भूख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सपने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिथ्या काल्पनिक आकर्षण एवं भावनात्मक छल नहीं करते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके लिए झूठ व मॉडलों का सहारा नहीं लेते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु आम जनता के लिए आवश्यक वस्तुओं का निर्माण उच्च गुणवत्ता के साथ करके कम मूल्य पर उपलब्ध कराते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा दृढ विश्वास है कि इन्हीं भावनाओं से ही व्यक्ति अपने उद्योग व्यापार को हिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रूरता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनीति के आश्रय के बिना भी सात्विक पुरुषार्थ से आगे बढ़ा सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फिर हमारी समृद्धि सिर्फ हमारी नहीं होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वसुधैव कुटुम्बकम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की सच्ची भावना जागृत होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज हम </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ग्लोबलाइजेशन</span>’ (Globalisation<span lang="hi" xml:lang="hi">) की बात करते हैं पर क्या हम सिर्फ दुनियाँ को अपने लिए ही चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या दुनियाँ के लिए अपनी शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामर्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग्यता को देना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह एक बहुत बड़ा विचारणीय प्रश्न है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आइये हम सब मिलकर अपनी समृद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने-अपने संस्थानों की वृद्धि के साथ अपनी परम्परा मूल्यों को जो हम अपने व्यक्तिगत जीवन के लिए चाहते हैं वही व्यवसायिक जीवन में भी अपना लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे न केवल हमारे परिवार की रक्षा होगी अपितु समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देश व विश्व की रक्षा समृद्धि की वृद्धि होगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी ऋषि परम्पराओं की रक्षा होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जड़ी बूटियों के प्रयोगों व आर्गेनिक व सात्विक आहार के प्रयोग से ही यह धरती माँ रासायनिक खाद व पेस्टीसाइड (</span>Pesticide<span lang="hi" xml:lang="hi">) से जहरीली होने से बचेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देश की यदि सभी व्यवसायिक औद्योगिक संस्थाएं व उससे जुड़े हुए सभी व्यक्ति अपना उद्योग नैसर्गिक कृषि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जड़ी-बूटि व प्राकृतिक आहारों को उपलब्ध कराने के लिए संकल्पित हो तो देश ही नहीं सम्पूर्ण विश्व की जनता को एक दिन में ही अनहैल्दी फूड (</span>Unhealthy Food<span lang="hi" xml:lang="hi">) से मुक्त कराया जा सकता है। फिर देश व दुनियाँ की जनता को आहार के रूप में जहर नहीं लेना पड़ेगा। किसी का पेट व घर जहरीली दवाइयों का भण्डार नहीं बनेगा। छोटे-छोटे बच्चे कैंसर व किडनी जैसी भयानक बीमारियों से पीड़ित होकर अपने माँ बाप के सामने बिलख-बिलख कर प्राण त्यागने को विवश नहीं होंगे। आइये हम सब मिलकर समृद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खुशहाल भारत व विश्व का निर्माण करने में सहयोग करें। यह अभियान अध्यात्म-ज्योति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय कुंडलिनी-शक्तिका जागरण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रभक्ति के महाभाव का उदय है। इस महाभाव के उदय से आत्मबल-सम्पन्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रभक्ति-सम्पन्न बने करोड़ों भारतीयों व विश्व के लोगों के हृदय की कृतज्ञता का भाव हमारी सबसे बड़ी ताकत है।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>दिसम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Dec 2015 21:57:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नेत्र, मुख,त्वचा एवं वक्ष रोगों में कारगर बादाम</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3189/almonds-are-effective-in-eye--mouth--skin-and-chest-diseases"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/425.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक नाम : </span>Prunus amygdalus Batsch <span lang="hi" xml:lang="hi">(प्रूनस एमिग्डेलस) </span>Syn-Prunus dulcis (Mill.) D.A. Webb Amygdalus communis Linn.; <span lang="hi" xml:lang="hi">कुलनाम : </span>Rosaceae <span lang="hi" xml:lang="hi">(रोसेसी)</span>;  <span lang="hi" xml:lang="hi">अंग्रेजी नाम : </span>Almond <span lang="hi" xml:lang="hi">(एलमॉन्ड)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृत : वाताद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाताम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वातवैरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुफला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नेत्रोपमफल</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">हिन्दी : बादाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बदाम</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">उड़िया : बादामो (</span>Badamo<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्दू : बादाम शिरिन (</span>Badam Shirin<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">कोंकणी : अमेन्ड (</span>Amendi<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">गुजराती : बादाम (</span>Badam<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तमिल : वडुम (</span>Badumai<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वादाम-कोट्टाइ (</span>Vadam kottai<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">तेलुगु : बादाममू (</span>Vadam kottai<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बादामू (</span>Badamu<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">बंगाली : बिलायती बादाम (</span>Bilati Badam<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बादाम (</span>Badam<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">पंजाबी : बादाम (</span>Badam<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">नेपाली : कागजी बादाम (</span>Kagzi Badam<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">मराठी : बादाम (</span>Badam<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">मलयालम : बादामकोट्टा (</span>Badamkotta<span lang="hi" xml:lang="hi">)। अंग्रेजी : आल्मण्ड ट्री (</span>Almond Tree<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">अरबी : लौज़ (</span>Lowz), <span lang="hi" xml:lang="hi">लूजालहुलु (</span>Lujaalhulu<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">फारसी : बादाम (</span>Badam<span lang="hi" xml:lang="hi">।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">दाम मूलत: एशिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सीरीया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुर्की एवं ईरान के साथ-साथ विश्व में बलूचिस्तान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अफगानिस्तान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यूरोप एवं भूमध्यसागरीय भागों में कृषित किया जाता है। भारत में कश्मीर के शीतल स्थानों एवं पंजाब में ७००-२४०० मी की ऊँचाई पर इसकी कृषि की जाती है। बादाम की गिरी अत्यन्त पौष्टिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बलवर्धक तथा रुचिकर होती है। इसका प्रयोग मेवे के रूप में किया जाता है। चरक-संहिता एवं सुश्रुत-संहिता में अखरोट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिश्ता आदि अन्य मेवों के साथ इसका उल्लेख मिलता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बाह्य स्वरुप:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बादाम लगभग 8 मी ऊँचा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मध्यमाकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर्णपाती वृक्ष होता है। इसकी काण्डत्वक् पाण्डुर बैंगनी भूरे वर्णी तथा झुर्रीदार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पत्र सरल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकांतर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लम्बे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भालाकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वृंतयुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य भाग में मोटे तथा दोनों ओर पतले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोमल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पत्तों का रंग हरा तथा पुराने पत्रों का रंग स्वेताभ धूसर वर्ण का होता है। इसके पुष्प श्वेत वर्णी या हल्के रक्त वर्ण के लगभग वृंतहीन होते हैं। फल की प्रारम्भिक या अपक्व अवस्था के ऊपर का आवरण मखमली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोमश एवं कोमल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ पकाने पर ऊपर का आवरण कठोर हो जाता है। परिपक्व अवस्था में यह आवरण फीके पीले रंग का कठोर तथा मोटा हो जाता है। फलों के अन्दर की गुठली झुर्रीदार एवं सूक्ष्म छिद्रों से युक्त तथा कठोर होती है। इसकी गिरी खुरदरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चपटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्रभाग पर नुकीली तथा भूरे वर्ण के आवरण से आच्छादित होती है। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल जनवरी से अक्टूबर तक होता है। यद्यपि बादाम का औषधीय प्रयोग चिकित्सक के परामर्श अनुसार करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी इसकी गिरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फल त्वक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूल व तेल प्रयोज्यांग होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रासायनिक संघटन:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके बीज तैल में मिरिस्टिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पॉमिटिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्टिएरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओलिक एवं लिनोलीक अम्ल पाया जाता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तिक्त बादाम में अवाष्पशील तेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रोटीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हाईड्रोसाएनिक अम्ल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एमीगडेलीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रुनेसिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉकोस्टरिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिटोस्टीरॉल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हाईड्रोसाएनिक ग्लूकोसाईड एवं साएनोजेनेटिक ग्लाईकासाईड पाया जाता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मधुर बादाम में वाष्पशील तेल ग्लोबुलीन एवं एमेन्डीन नाम प्रोटीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शर्करा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विटामिन ्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्च</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जलीय तत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खनिज (कैल्शियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फॉस्फोरस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लौह)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉकोस्टरिन एवं सिटोस्टीरॉल पाया जाता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके बीज कवच में कौमेरिक अम्ल</span>, n<span lang="hi" xml:lang="hi">- ओक्टाकोसेनॉल</span>, n<span lang="hi" xml:lang="hi">- ट्राईएकॉन्टेन</span>, β- <span lang="hi" xml:lang="hi">सिटोस्टीरॉल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैटेचिन एवं एपीकैटेचिन पाया जाता है|</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/802.jpg" alt="80" width="800" height="600"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">औषधीय प्रयोग विधि:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(22,145,121);" xml:lang="hi">शिरो रोग:</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>शिरोरोग</strong> -</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> बादाम आदि द्रव्यों से निर्मित महामयूर घृत (५ ग्राम) का प्रयोग करने से सिर से संबंधित बीमारियों में लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>स्नायुविकार </strong>-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> बादाम को सिरके के साथ पीसकर लगाने से स्नायु-विकारों का शमन होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कड़वे बादाम को पीसकर सिर पर लेप करने से सिर के जुंये (लीखें) मर जाती हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नेत्र रोग: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>नेत्राभिष्यंद </strong>-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> 7 बादाम की गिरी को महीन पीसकर उसमें घृत तथा मिश्री 5-5 ग्राम मिलाकर प्रात: सायं सेवन करने से नेत्राभिष्यंद में लाभ होता  है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मुख रोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दंतरोग -</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> बादाम के छिलकों को जलाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भस्म बनाकर दांतों पर रगड़ने से दंत विकारों का शमन होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वक्ष रोग: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>क्षतक्षीण </strong>-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> बादाम आदि द्रव्यों से निर्मित अमृतप्राशघृत (५ ग्राम) का सेवन करने से क्षतक्षीण में लाभ होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>कास</strong> -</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> बादाम तेल का प्रयोग खांसी की चिकित्सा में विशेष रूप से किया जाता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उदर रोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अरोचक -</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> बादाम को आधा दिन (१२ घण्टे) तक पानी में फुलाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व पानी में ही उबाल कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊपर का छिलका उतारें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तत्पश्चात चासनी में मिलाकर मुरब्बा बनाकर सेवन करने से अरुचि का शमन होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आंत्रशूल -</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> बादाम को अंजीर के साथ पीसकर खिलाने से हल्का विरेचन होता है तथा आंतों की पीड़ा मिटती है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजनन संबंधी रोग: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>वीर्यविकार </strong>-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> बादाम की गिरी को सेवन करने से वीर्य विकारों का शमन होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मासिक विकार -</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> बादाम को पीसकर उसकी वर्ती बनाकर योनि में रखने से मासिक-धर्म के समय होने वाली पीड़ा का शमन होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वप्नदोष -</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong> </strong>भिगोकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छिलका निकाली हुई 1 बादाम गिरी को 3 ग्राम मिश्री के साथ पीस लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें 1 ग्राम गिलोय सत्</span>, 3<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम घृत तथा 2 ग्राम शहद मिलाकर प्रात:-सायं सेवन करने से स्वप्नदोष दूर हो जाता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">3 से 5 ग्राम बादाम चूर्ण को दूध में मिलाकर प्रात:-सायं सेवन करने से स्तन्य की वृद्धि होती है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पूयमेह -</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> छिलका रहित 7 बादाम की गिरी लेकर उसमें 1 ग्राम श्वेत चन्दन चूर्ण तथा समभाग मिश्री मिलायें और पीसकर दिन में तीन बार जल के साथ पीने से पूयमेह में लाभ होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अस्थिसंधि रोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>वातरक्त </strong>- बादाम आदि द्रव्यों से निर्मित जीवनीय घृत का सेवन करने से वातरक्त(गठिया) में लाभ होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचा रोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>झांई रोग</strong> - समभा ग सरसों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बादाम वचा तथा सेंधानमक को पीसकर चेहरे पर लेप करने से झाईयां मिटती हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>क्षत एवं त्वक् विस्फोट </strong>-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> बादाम के बीजों को पीसकर लेप करने से घाव तथा फोड़ों में लाभ होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>चर्मरोग </strong>-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> बादाम को पीसकर लगाने से चर्मरोगों में लाभ होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>खुजली</strong> -</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> कड़वे बादाम को पीसकर लगाने से खुजली मिटती है</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मानस रोग: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>हिस्टीरिया </strong>-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> बादाम के बीजों का नियमित सेवन करने से योषापस्मार (हिस्टीरिया रोग) में लाभ मिलता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दौर्बल्य -</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> सामान्य दौर्बल्य तथा शल्य कर्माेपरान्त होने वाले दौर्बल्य में 7 ग्राम भिगोए हुए बादाम</span>, 7<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम अश्वगंधा</span>, 1/2<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम पिप्पली  तथा 1/2 ग्राम काली मिर्च को अच्छी तरह मिलाकर पीसकर उसमें दूध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घृत तथा शर्करा मिलाकर दिन में दो बार भोजन से पूर्व सेवन करने से लाभ होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बादाम की गिरी (5-10 ग्राम) में मिश्री मिलाकर सेवन करने तथा बाद में दूध पीने से दौर्बल्य का शमन होता है तथा शरीर पुष्ट होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रसायन वाजीकरण:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वाजीकरणार्थ -</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> 5-10 बादाम की गिरी में 1 ग्राम सोंठ</span>, 20<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम भुने चने</span>, 1<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम काली मिर्च तथा 20 ग्राम मिश्री मिलाकर 5 से 10 ग्राम की मात्रा में प्रात:-सायं दूध के साथ सेवन करने से वाजीकरण संबंधी गुणों की वृद्धि होती है। वस्तुत: बादाम वह बनौषधि है जो आहार में स्वादवर्धक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पोषण में स्वास्थ्य वर्धक एवं शारीरिक व मानसिक शक्ति प्रदान करने वाला है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका हम सब सेवन करें और जीवन को विकार रहित बनायें।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>वनौषधियों में स्वास्थ्य</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>दिसम्बर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3189/almonds-are-effective-in-eye--mouth--skin-and-chest-diseases</link>
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                <pubDate>Tue, 01 Dec 2015 21:55:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पतंजलि योगपीठ चिकित्सालय की उपलब्धियां</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:left;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">डाइवर्टिक कोलाइटिस में 90-95% लाभ</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं अमर सिंह शोरान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिरसा (हरियाणा) निवासी हूँ। मैं 24.06.2015 को पतंजलि चिकित्सालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार अपनी बीमारी डाईवरटी कुलाईटिस के उपचार के लिए आया था। लगभग 7 माह इलाज कराने के उपरांत  अब 90-95% </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ठीक हूँ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतजंलि आयुर्वेदिक हॉस्पिटल में चिकित्सक के परामर्शानुसार मैंने सर्वकल्प क्वाथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोती पिष्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शंख भस्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कपर्दक भस्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुक्ता शुक्ति पिष्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदरामृत वटी तथा बिल्वादि चूर्ण आदि आयुर्वेदिक औषधियों का बताये अनुपात के साथ सेवन प्रारम्भ कर दिया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इससे पहले मैंने कई वर्षों तक अंग्रेजी दवाई से इलाज करवाया। जिसमें सिरसा के स्थानीय डॉक्टर से</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3190/achievements-of-patanjali-yogpeeth-hospital"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/177.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:left;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">डाइवर्टिक कोलाइटिस में 90-95% लाभ</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं अमर सिंह शोरान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिरसा (हरियाणा) निवासी हूँ। मैं 24.06.2015 को पतंजलि चिकित्सालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार अपनी बीमारी डाईवरटी कुलाईटिस के उपचार के लिए आया था। लगभग 7 माह इलाज कराने के उपरांत  अब 90-95% </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ठीक हूँ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतजंलि आयुर्वेदिक हॉस्पिटल में चिकित्सक के परामर्शानुसार मैंने सर्वकल्प क्वाथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोती पिष्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शंख भस्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कपर्दक भस्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुक्ता शुक्ति पिष्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदरामृत वटी तथा बिल्वादि चूर्ण आदि आयुर्वेदिक औषधियों का बताये अनुपात के साथ सेवन प्रारम्भ कर दिया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इससे पहले मैंने कई वर्षों तक अंग्रेजी दवाई से इलाज करवाया। जिसमें सिरसा के स्थानीय डॉक्टर से लेकर जयपुर के दुर्लभ जी हॉस्पीटल तक  सामिल हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन मुझे कोई फायदा नहीं हो रहा था। अब पूज्य स्वामी जी व श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी की कृपा से मैं बिल्कुल ठीक हो रहा हूँ।</span></h5>
<h6 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भवदीय</span>,</strong></h6>
<h6 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अमर सिंह शोरान</span></strong></h6>
<h6 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मकान नम्बर 455</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेक्टर-20</span></strong></h6>
<h6 style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सिरसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरियाणा</span></strong></h6>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पेट में गांठ से जब मेरा पेट दाहिनी ओर मुड़ गया</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बृजमोहन सिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निवासी ग्राम-रिछा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पो.-चुता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिला-बरेली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यू.पी. निवासी हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुझे सन् 2009 में पेट में गाँठ बनी थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका ऑपरेशन सन् 2010 में बरेली के भोजीपुरा अस्पताल में करवाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके बाद पुन: उसी जगह पर गाँठ बन गई और दर्द होने लगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर से उसी अस्पताल में जून 2013 को ऑपरेशन करवाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इस बार गाँठ को चीरा गया पर डॉक्टरों ने गाँठ नहीं निकाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पट्टी होती रही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई फायदा नहीं हुआ। अंत में अस्पताल के डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिये और कहा इसका इलाज हमारे यहाँ नहीं है। एक माह अस्पताल में रहने के बाद छुट्टी कर दी गई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जख्म से लगातार खून निकलता रहता था। फिर हम अपोलो अस्पताल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिल्ली गये जहाँ ऑपरेशन के बाद जख्म को ठीक कर दिया और गाँठ भी निकाल दी गयी। लेकिन मेरा पेट दाहिनी तरफ को मुड़ कर एक तरफ को बड़ा हो गया। क्योंकि मेरी एक तरफ की पूरी पसली को निकाल दिया गया था। दिल्ली में सितम्बर 2014 में मेरा यह ऑपरेशन हुआ था। पर मेरी समस्या फिर ज्यों कि त्यों रही। गाँठ पुन: आधे पेट पर बड़ी होकर बढ़ने लगी। फिर मैंने पतंजलि हॉस्पिटल में चिकित्सक डॉ. एस.सी. मिश्रा से परामर्श लिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने 2 महीने के लिए दवा दी। 02..6.2014 से मैंने इसे लेना प्रारम्भ किया। उपचार हेतु मुझे शिला सिन्दुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रवाल पिष्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमृता सत्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुक्ताशुक्ति भस्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताम्र भस्म सुबह-शाम शहद के साथ तथा वृद्धिवाधिका वटी व कांचनार गुग्गल दो-दो गोली निश्चित अनुपात के साथ सुबह-शाम लेने की सलाह दी गयी। उपचार के बाद अब मुझे 40% आराम है। अभी उपचार चल रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आशा है जल्द ही मैं पूर्ण स्वस्थ हो जाऊंगा।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>दिव्य अनुभूति</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>दिसम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Dec 2015 21:54:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आचार्यकुलम के वार्षिकोत्सव में मुख्य अतिथि के रूप में पधारे</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="center"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">इण्डिया टी.वी. के सी.एम.डी. श्री रजत शर्मा का विशेष उद्बोधन</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3191/attended-the-annual-function-of-acharyakulam-as-the-chief-guest"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/910.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  आज यदि आचार्यकुलम के कार्यक्रम में न आता तो योग क्या होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे इतनी अच्छी तरह से जानने का अवसर न मिलता। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आपकी अदालत</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वारा व अपने पत्रकारिता के कर्तव्य की वजह से ऐसे लोगों से मिला जो समाज के ताकतवर लोग हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज के स्तम्भ हैं। हमें देश व समाज के अनेक स्तर के व्यक्तियों से मिलने का अवसर मिलता है। समाज के प्रतिष्ठित से प्रतिष्ठित व्यक्ति व साधारण से साधारण व्यक्ति से। इस दौरान हमें ज्यादातर लोग वह मिले जो अपनी चिंता करते हैं। अपने नाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैभव व अपने परिवार की चिंता करते हैं। पर जब मैं स्वामी रामदेव जी से मिला तो पाया कि यह ऐसा इंसान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो केवल समाज व राष्ट्र की ही चिंता करता है। हम जानते हैं योग के प्रचार-प्रसार को बढ़ाने के लिए आपने क्या किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन आचार्यकुलम के छात्रों को देखकर मुझे लगता है कि स्वामी रामदेव ने अब शिक्षा के क्षेत्र में भी क्रांति लाने का फैसला किया है। वास्तव में व्यक्ति के निकट आने पर ही उसकी कमियां देखने को मिलती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर स्वामी जी के हम जितना निकट आये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी उज्जवलता कहीं अधिक स्पष्ट होती गयी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य कुलम के बच्चों ने जिस अंदाज व मनमोहक तरीके से समाज की बुराईयों को सामने रखा और ये बताया कि कैसे योग के माध्यम से इन बुराईयों को दूर किया जा सकता है। यह वही बात है जिसे स्वामी रामदेव जी महाराज काफी दिनों से देश-विदेश में कहते रहें है। इनकी बात का कितना प्रभाव पडा़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें लोगों ने कितना आत्मसात किया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह इन आचार्यकुलम के बच्चों ने आज पेश किया। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी रामदेव जी महाराज ने एक सपना देखा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस देश को निरोगी बनाने का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सशक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ बनाने का। इस देश को दुनियां की बड़ी ताकत बनाने का और उसका रास्ता भी बताया कि योग के प्रचार-प्रसार से यह हो सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और करके भी दिखाया। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हम लोगों को भी बड़े-बड़े सपने देखने चाहिए। एक स्वप्न वह है जो हम रात में सोते हुए देखते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक वह है जो दिन में देखते हैं लेकिन उन्हें पूरा करने के लिए हमें रात में नींद नहीं आती।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमने स्वामी रामदेव जी महाराज को अपने श्रेष्ठ स्वप्र के निमित्त टे्रवल करते देखा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपना सुख-चैन छोड़कर सिर्फ योग के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज को जगाने के लिए संघर्ष करते देखा है। मुझे प्रसन्नता है कि उन्होंने हमें भी इस महायज्ञ में सम्मिलित होने का अवसर दिया। हम इसके लिए उनके बहुत आभारी हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चों से कुछ बातें मैं दिल से कहना चाहता हूँ कि सबसे बड़ी चुनौती जीवन में तब आती है जब लगता है हम बहुत संघर्ष कर रहें है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभाव है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गरीबी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तकलीफ है। स्वामी जी भी इन सबका जिक्र किया करते थे। वह सब मैंने बचपन में देखा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बचपन में मेरे पास 10*10 का कमरा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सात भाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक बहिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माँ और मेरे पिता जी उसमें रहते थे। घर में पानी नहीं था। नल नहीं था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो पड़ोस के नल में नहाने जाते थे। वहीं से माँ-बहिन के लिए दो बाल्टी पानी लाते थे। पढ़ने के लिए पास के रेलवे स्टेशन पर जाते थे। घर में बिजली नहीं थी। कभी खाने के लिए मिलता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी नहीं मिलता था। गरीबी योजना के तहत गरीबों के लिए पाउडर का दूध अमेरिका भेजता था। मैं भी लाइन में लगकर दूध ले आता था। उसी से कई-कई दिन तक काम चलता था। हम साधारण स्कूल में पढ़ते थे। कभी टीचर होते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं होते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्लेक बोर्ड होता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी नहीं होता था।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/910.jpg" alt="9" width="800" height="531"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं तब पिता जी से कहता कि बड़ा संघर्ष है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कठिनाई है। तब पिता जी एक बात कहते थे कि दु:ख में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभाव में सभी दु:खी रहते हैं। यदि तुम्हारे पास अच्छा घर होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छे कपड़े होते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो तुम खुश रह सकते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन चुनौती है जब तुम इन सबके बीच भी खुश रहकर दिखाओ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मित्रों उस जमाने में सोचा नहीं था कि हम कभी टी.वी. पर आयेंगे। उस समय रेडियो नहीं था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टी.वी. तो दूर है। उस जमाने में आधी फिल्म शनिवार को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आधी रविवार को दिखाई जाती थी। हम पड़ोसी के यहाँ टी.वी. देखने जाते थे। एक बार सण्डे का दिन था</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">शहीद भगत सिंह</span>Ó <span lang="hi" xml:lang="hi">फिल्म थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देखने गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो पड़ोसी ने अंदर से किवाड़े बंद कर लिए। मैं रोता हुआ घर आया तो पिता जी ने कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आप किसी दूसरे के घर में किसी तीसरे को देखने जाते हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दम तो तब है जब तुम स्वयं टी.वी. में आने लगो और लोग तुम्हें देखें। शायद यही बात कहीं मेरे मन में बैठ गई। संघर्ष किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घबराये नहीं और सफल हुए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एक दिन पिता जी ने कहा-</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन जीना आसान नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संघर्ष बिना कोई महान नहीं होता।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जब तक न पड़े हथौड़े की चोट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पत्थर भी कभी भगवान नहीं होता।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">और ये पंक्तियां हर रोज़ मुझे याद रहती थीं। बाद में बेहतर स्कूल में एडमिशन मिला। थोड़ा दूर था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पैसे नहीं थे तो तीन साल तक पैदल चलकर जाना पड़ता। बाद में अच्छे स्कूल में पढ़ने का अवसर मिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मीडिया में आये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपकी अदालत शुरू हुआ और जीवन बदल गया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बार-बार सफलता मिली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नाम मिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यश मिला। तब बाबू जी थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने मुझे अगला सूत्र दिया और कहा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">विद्या ददाति विनयमं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् चाहे जितने बड़े बन जायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर मन में कभी अहंकार न आने देना। विनय हमारे मन में रहना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर रोज़ भगवान से यह प्रार्थना करना। विनय से ही सुख मिलेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चों एक बात और कहना चाहता हूँ। आप सौभाग्यशाली हैं कि आचार्यकुलम में पढ़ने का सौभाग्य मिला। आचार्यकुलम की कैसी शिक्षा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका नज़ारा भी हमने देखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग से आप अपने जीवन को सफल बनायेंगे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मुझे अब यह चिंता नहीं है कि स्वामी जी योग के क्षेत्र में अकेले हैं। वस्तुत: अब उनके साथ-साथ इस योग का प्रचार-प्रसार ये आचार्यकुलम के बच्चे करेंगे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब आप बड़े बन जायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैभव हासिल करें तो आपमें हर विद्यार्थी एक ऐसे बच्चे को जो गरीब है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके पास मेरी तरह साधन नहीं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे कोई रास्ता दिखाने वाला नहीं है। आप उसके पढ़ाने का खर्चा उठाने का काम करें तो मुझे लगेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा यहाँ आना सार्थक हो गया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दिये से जिस तरह रोशनी होती है। एक-दूसरे को सहारा दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर आगे बढ़ें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह समाज वैभवशाली बने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज सशक्त बने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम इस देश को दुनियां का सर्वशक्तिमान देश बनायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन यह काम अकेले देश का प्रधानमंत्री नहीं कर सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी रामदेव जी अकेले नहीं कर सकते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम सबको उसमें थोड़ा-थोड़ा परसेप्शन करना होगा। मुझे लगता है आज से ही हम इसकी शुरूवात करें। निश्चित ही परिवर्तन होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह देश विश्व में सिरमौर बनेगा।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>कार्यशाला</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>दिसम्बर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3191/attended-the-annual-function-of-acharyakulam-as-the-chief-guest</link>
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                <pubDate>Tue, 01 Dec 2015 21:52:17 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भारतीय उपमहाद्वीप में नये सामाजिकसमीकरणों की संभावनाए</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3192/possibilities-of-new-social-equations-in-the-indian-subcontinent"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/765.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   हिन्दू</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> विरोध की चपेट में बुखार की सीमा तक तापग्रस्त लोगों को परिवर्तनशील विश्व के विषय में कोई भी जानकारी नहीं है। क्योंकि वे पुराने सोवियत चिंतन के खेमे में कैद हैं। वे दुनिया को उन्हीं श्रेणियों में देखते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें देखना भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों ने उन्हें सिखाया है। परन्तु तथ्य यह है कि स्वयं भारत की कम्युनिस्ट पार्टियाँ धीरे-धीरे बौद्धिक रूप से कमज़ोर और कल्पना के स्तर पर प्रबल लोगों के हाथों में चली गईं हैं। उनके लिए हिन्दुत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साम्प्रदायिकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस्लाम की क्रांतिकारी भूमिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईसाइयत का प्रगतिशील चरित्र आदि तोता रटन्त मुहावरे हैं। उनसे बाहर देखने में उन्हें बौद्धिक आलस्य रहता है। इसके लिए क्रांतिकारी लफ्फाजी एक शरणस्थल का काम करती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तथ्य यह है कि दुनिया बदल रही है। क्योंकि यह दुनिया भारतीय शब्दावली में जगत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसार है और भवसागर है। जगत का अर्थ ही है जो निरन्तर गतिशील हो। संसार का अर्थ है जो लगातार संसरण कर रहा है। भवसागर का अर्थ है निरन्तर नित नूतन अस्तित्व रूप ग्रहण करने वाला समुद्र जैसा विशाल क्रियाप्रवाह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओशिएन ऑव बीईंग एण्ड बिकमिंग। भारतीय ज्ञान परम्परा इस संसार को भूत-सागर नहीं कहती अर्थात्- एक बार रचे जाकर यथावत रहने वाला समुद्र यह जगत नहीं है। यह तो भव अर्थात् निरन्तर हो रहा सागर है। इसलिए </span>19<span lang="hi" xml:lang="hi">वीं शताब्दी ईस्वी में यूरोप में उभरे कतिपय महत्वपूर्ण विचार-प्रपंचों में मुग्ध और विमूढ़ लोग अपने समय के संसार को देख नहीं पाते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह स्वाभाविक है। क्योंकि वे केवल बीते हुए को अर्थात केवल भूत को देखते रहते हैं। विचारों का भूत उन्हें जड़ बनाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्तब्ध रखता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गतिहीन रखता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तथ्य यह है कि यूरोप में जो विचारशील समूह हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनमें से आधुनिक वैज्ञानिक चेतना सम्पन्न प्रबुद्ध समूहों के सिवाय कुछ अन्य महत्वपूर्ण समूह भी सक्रिय हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें कैथोलिक ईसाई समूह और कम्युनिस्ट समूह मुख्य हैं। यूरोप के कैथोलिक ईसाई मध्ययुगीन ईसाइयत को एक सीमा तक त्याग चुके हैं। उन्होंने उसका निर्यात एशिया और अफ्रीका को कर रखा है। परन्तु वे स्वयं गतिशील हैं। नई परिस्थितियों से समायोजन करते हुए अपना अनुकू</span><span lang="hi" xml:lang="hi">लन करते रहना उनका स्वभाव है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कैथोलिक समूह विश्व राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनकी बाइबिल में प्रतिपादित भविष्य-कथन में अडिग आस्था है। इस आस्था का स्रोत बाइबिल के </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इलहाम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">खण्ड का अध्याय </span>17<span lang="hi" xml:lang="hi"> एवं </span>18<span lang="hi" xml:lang="hi"> है। तदनुसार कैथोलिकों की आस्था है कि वे जीसस-पिता के पक्ष में संसार की आत्माओं की फसल काटेंगे और गॉड से शैतान के निरन्तर चल रहे युद्ध में शैतान को जीतने नहीं देंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका अर्थ है कि किसी भी गैर-कैथोलिक और गैर-ईसाई समूह को राजनैतिक रूप से शक्तिशाली नहीं होने देंगे। इस आस्था के कारण पिछले </span>70<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों में विश्व में विभिन्न स्थानों पर उन्होंने विभिन्न रणनीतियाँ अपनाईं हैं और बड़े लचीलेपन के साथ कार्य किया है। दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य सम्पूर्ण ईसाइयत के इतिहास में यह है कि चर्च सदा विजेता के साथ रहता है और इस प्रकार निरन्तर पाला बदलते हुए अपना विस्तार करता है। अगर वह किसी गलत पाले में हो तो भी इतनी गुंजाइश सदा छोड़ता है कि मौका पड़ने पर पाला बदला जा सके। मैक्सिको और लैटिन अमेरिकी देशों में कैथोलिक चर्च ने गॉस्पेल का अर्थात न्यूटेस्टामेंट का एक मार्क्सवादी संस्करण प्रस्तुत और प्रचारित किया है। स्वयं संयुक्त राज्य अमेरिका में कैथोलिक जनसंख्या को बढ़ाने के लिए वह मैक्सिको तथा लैटिन अमेरिका में मार्क्सवादी क्रांतिकारी शब्दावली और रणनीति में दीक्षित कैथोलिक योद्धा तैयार कर उन्हें संयुक्त राज्य भेजता रहता है। इसके कारण अमेरिका के प्रोटेस्टेंटों में जबर्दस्त उथल-पुथल है क्योंकि वे इसमें अमेरिकी संस्कृति को खतरा देखते हैं। प्रोटेस्टेंटों की ओर से आह्वान किया जा रहा है कि कैथोलिकों को असाम्प्रदायिक बनाया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात उन्हें सुधारवादी प्रोटेस्टेंट बनाया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि वे क्राइस्ट के सच्चे अनुयायी बन सकें। इसे अंग्रेजी में कहते हैं- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">विनिंग दि कैथोलिक्स टू क्राइस्ट</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वेटिकन का दावा है कि वह इस विश्व में सत्य का एकमात्र प्रतिनिधि और संरक्षक है। उसे सम्पूर्ण विश्व में उस विशिष्ट सत्य को फैलाना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका एकमात्र प्रतिनिधि वह उसी प्रकार है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">गॉड</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का आजतक एकमात्र पुत्र पैदा हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह है जीसस क्राइस्ट या जोशुआ मसीह। अत: इस सत्य को फैलाने के लिए भाँति-भाँति की रणनीति अपनानी है और विजेताओं तथा प्रबल हो रही शक्तियों के साथ लचीलेपन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोस्ती और युक्ति से काम लेना है। जब तक भारत में सोनिया गांधी और राहुल गांधी का नेतृत्व था और उनके नेतृत्व में कांग्रेस अल्पसंख्यकों के फेडरेशन को अपनी राजनीति की धुरी बनाकर देश में काम कर रही थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक वेटिकन ने भी हिन्दुत्व विरोध की रणनीति पर काम किया। परन्तु अब भारत में राजनैतिक शक्ति हिन्दुत्व की समर्थक या पोषक शक्तियों के हाथ में है। ऐसे में अपनी परम्परा के अनुसार वेटिकन इस शक्ति के साथ काम करेगा। परन्तु अपने मुख्य लक्ष्य को कभी भूलेगा नहीं। वह है- दुनिया के एक महत्वपूर्ण भू-भाग के रूप में भारत उपमहाद्वीप में कैथोलिकों का फैलाव और उनकी शक्ति में वृद्धि। इसके लिए सदा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सॉफ्ट टारगेट</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">चुने जाते हैं। इस समय ऐसा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सॉफ्ट टारगेट</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तानी क्षेत्र और बांग्लादेश हैं। नेपाल को भी वह ऐसा ही </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सॉफ्ट टारगेट</span>’  <span lang="hi" xml:lang="hi">मानता है। परन्तु वहाँ मोदी के आने के बाद क्रमश: समीकरण बदल सकते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तान सामाजिक दृष्टि से भीतर से खण्ड-खण्ड विभक्त और जर्जर हो चला समाज बन चुका है। शियाओं और सुन्नियों के झगड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहमदियों और अन्य मुसलमानों के झगड़़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहाबियों के दूसरों से झगड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बलूचियों से पंजाबियों के झगड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पखतूनों और मुख्य पाकिस्तान के झगड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिंधियों और पंजाबियों के झगड़े तथा विभिन्न मुस्लिम संगठनों के परस्पर प्राणघाती संघर्ष उसे एक हस्तक्षेप योग्य क्षेत्र बना चुके हैं। ऊपर से कट्टरपंथियों और फौज के दबाव से पाकिस्तान में ईसाइयों के साथ जबर्दस्त भेदभाव और अत्याचार किया जा रहा है। जबकि पाकिस्तान के मुसलमानों का उल्लेखनीय हिस्सा ईसाइयत को अपनाने के प्रति अनुकूल है। सजा-ए-मौत के डर से ही वह खुलकर ईसाई नहीं बन रहा है। क्योंकि मुसलमानों द्वारा मजहब छोड़ने पर प्राणदण्ड की ही व्यवस्था इस्लाम में जायज है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु आधुनिक विश्व में अंतरराष्ट्रीय कानून और लोकतन्त्र के दबावों के कारण कुछ ही समय के भीतर इस्लाम त्यागने पर सजा-ए-मौत देना संभव नहीं रह जाएगा। ऐसी स्थिति में पाकिस्तान के मुसलमानों की उल्लेखनीय संख्या सुख और शांति के लिए तथा संरक्षण के लिए ईसाई बनने की ओर अग्रसर हो सकती है। यही वेटिकन के लिए </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सॉफ्ट टारगेट</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">है। इधर विश्व हिन्दू परिषद और मोदी सरकार भारत के भीतर अगले कुछ समय तक यह रणनीति बना सकती है कि  वनवासियों और कतिपय अत्यंत पिछड़े समूहों के ईसाई बन चुके कुछेक हिस्सों को अभी कुछ वर्षों तक वह न छेड़े। इसका मुख्य कारण यह है कि परम्परागत हिन्दुओं के विषय में एक यह धारणा व्यापक है कि वे ईसाई मिशनरियों से धन और अन्य सहायताएँ लेकर तथा उनके द्वारा संचालित स्कूलों में शिक्षा प्राप्त कर और काम चलाऊ तौर पर बपतिस्मा लेकर या दिखाऊ ईसाई बनकर भी हिन्दुत्व की आस्थाओं और मान्यताओं से  तब तक गहरे में बंधे रहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब तक वे आधुनिक वामपंथी किस्म की शिक्षा नहीं ग्रहण करते। पूर्वी उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के कुछेक प्रमुख ब्राह्मण नेताओं के पुत्र या संबंधी ईसाई कन्याओं से विवाह कर रहे हैं और कुछ लोग तो छिपे तौर पर ईसाई भी बन रहे हैं अथवा ईसाइयत और ईसाई मिशनरी के प्रति जबर्दस्त उदारता दिखा रहे हैं और उन्हें मानवीय करुणा के आराधक बता रहे हैं। इससे भी वेटिकन को संतोष मिला है। उड़ीसा में भी कई जगह विश्व हिन्दू परिषद और ईसाई मिशनरियों ने परस्पर सहमति से अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र अघोषित रूप से बाँट लिए हैं और अस्थाई शांति बनाकर रह रहे हैं। नेपाल में तो यह स्थिति बहुत व्यापक है। नेपाल से अनेक ऐसे उच्च जाति के ईसाई बने लोगों को प्रशिक्षित एवं दीक्षित कर भारत में विशेषत: हिन्दी प्रदेशों में भी अच्छी संख्या में भेजा जा रहा है। इस प्रकार कैथोलिकों और हिन्दुओं के बीच एक अस्थाई तालमेल बना दिख रहा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इससे उत्साहित कैथोलिक समूह पाकिस्तान में और बांग्लादेश में वहाँ के दुखी और असंतुष्ट मुस्लिम समूहों के ईसाईकरण को अपनी योजना का पहला चरण मानकर चल रहे हैं। पाकिस्तान और बांग्लादेश के विशाल क्षेत्र में इस प्रकार ईसाइयों की अच्छी संख्या हो जाने पर दोनों ही जगह लोकतन्त्र के पक्ष में आवाज तेज होती जाएगी और इसका लाभ परोक्ष रूप से इन दोनों देशों में बच रहे हिन्दुओं को भी मिलेगा। ऐसी एक जटिल रणनीति के अन्तर्गत हिन्दुओं और ईसाइयों के बीच एक तालमेल बन रहा है। क्योंकि दोनों ही समाज धैर्य पूर्वक लम्बे समय तक काम करने की संस्कृति में दीक्षित हैं। दूसरी ओर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस्लाम एक आवेग सिखलाता है और गैर-मुसलमानों के प्रति प्रचण्ड तात्कालिक प्रतिक्रिया पर वहाँ बड़ा गर्व किया जाता है। जिसके कारण सुलझे हुए और शांत तथा गंभीर मुस्लिम नेता और सम्पन्न लोग भी मिल्लत के आवेग के समय चुप रहने को विवश होते हैं। वे शांति के पक्ष में कोई हस्तक्षेप करने का साहस नहीं जुटा पाते। क्योंकि उसमें सफलता की आशा उन्हें नहीं दिखती।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस परिपेक्ष्य में भारतीय उपमहाद्वीप में अगले कुछ समय तक बिल्कुल नये सामाजिक समीकरण उभरते दिखेंगे। नवाज शरीफ सहित पाकिस्तानी मुसलमानों का एक विशेष अंश हिन्दुत्वनिष्ठ भारत के साथ तालमेल बनाता नज़र आ सकता है। इसमें वस्तुत: कोई भीतरी अवरोध इसलिए नहीं है कि भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों का </span>95 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत हिस्सा हिन्दू पूर्वजों की ही संतति है। </span>1000 <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्षों से अधिक समय से उसे परस्पर घुल-मिलकर रहने और कभी-कभी प्रचण्ड टकराव में आ जाने का अभ्यास हो चुका है। दोनों के बीच बहुत-सी चीजे साझा हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें भाषा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मान्यताएँ और सभ्यता के अनेक रिवाज भी शामिल हैं। अत: दोनों ओर से पहल होने पर हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच कुछ वैसा ही दौर आ सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसा पहले कई बार शांति के काल में आता रहा है। वेटिकन को भी इससे सुविधा होगी। अभी वेटिकन ने  कम्युनिस्टों के अनेक समूहों को हिन्दुत्व के विरुद्ध तैयार किया है। परन्तु रणनीति बदलने पर उन्हें भी भिन्न रणनीति का संकेत किया जा सकता है। वैसे भी राष्ट्रीय पूँजीवाद को ऐतिहासिक मोड़ में एक बार बढ़ावा देना और फिर उसके अन्तर्विरोध उभारते हुए कम्युनिस्ट क्रांति का प्रयास करना कम्युनिस्ट रणनीति का लिखित फार्मूला है। राष्ट्रीय पूँजीवाद की सशक्त प्रतिनिधि उनकी दृष्टि में भाजपा ही है। इसलिए वे उससे कभी भी तालमेल विकसित कर सकते हैं। संघ से जुड़े अनेक लोगों के संपर्क विविध कम्युनिस्ट समूहों से वी.पी. सिंह के समय से ही हैं। ऐसी स्थिति में अगले कुछ वर्षों तक मोदी सरकार की पाकिस्तान और बांग्लादेश के अनेक नेताओं से अच्छी पट सकती है और  इस अवधि में वेटिकन की रणनीति उन दोनों देशों में दुखी और त्रस्त मुसलमानों को ईसाई बनाने की ओर मुख्य ध्यान देने की हो सकती है। यही इस क्षेत्र के भविष्य के संभावित समीकरण हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>दिसम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Dec 2015 21:50:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>तीन समिधाएँ तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. सुमन</span></strong><strong><span>, </span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">मुख्य महिला केन्द्रीय प्रभारी</span></strong><strong><span>, </span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">पतंजलि योग समिति</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3193/three-samidhas--tapasya--brahmacharya-and-shraddha"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/683.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   मु</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ण्डकोपनिषद् में एक प्रसंग आता है कि उस कृत से कृत को</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पाया जा सकता है अर्थात् जिसकी उत्पत्ति और विनाश होता है उसे कृत कहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस अकृत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अविनाशी को नहीं पाया जा सकता और उसको पाये बिना जीवन का अन्तिम समाधान नहीं मिलता। यदि वह अकृत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अक्षर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अविनाशी पाया जाना सम्भव है- तो कोई न कोई तो उसको पाने का उपाय भी अवश्य ही होगा। हमारे परम कृपालु ऋषिगण जिन्होंने अपने अथक प्रयास व पुरुषार्थ से उसको पाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसको पाने का उपाय भी हमें मुफ्त में ही बता दिया और वह उपाय है- </span><strong>''<span lang="hi" xml:lang="hi">तमक्रतु: पश्यति</span>’’</strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">जो व्यक्ति अक्रतु=अकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्काम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आप्तकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मकाम व दिव्यकाम हो गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह महामानव उसे सर्वत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वदा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वकाल में देखता है व अनुभव करता रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आनन्दित रहता है। अर्थात् जो निष्काम कर्म करता हुआ दिव्य कर्म करता हुआ उस शाश्वत का प्रतिनिधि व प्रतिरूप बनकर सदा दिव्यानन्द में स्थित रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरु की शरण में समित्पाणि होकर जायें।</span></h5>
<h5 style="text-align:left;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>''<span lang="hi" xml:lang="hi">तद् विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्समित्पाणि: श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्</span>’’<span lang="hi" xml:lang="hi">।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:left;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">(मुण्डकोपनिषद् -1/2/12)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब प्रश्न उपस्थित होता है कि यह समित्पाणि क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">और समित्पाणि होकर ही क्यों जायें</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">समित्पाणि का अर्थ है- हाथ में तीन समिधाएं लेकर गुरु के समक्ष उपस्थित हों। ये तीन समिधाएं शिष्य के व्यक्तित्व व समर्पण का प्रतीक हैं- 1. समिधाएँ सूखी होनी चाहिये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">2. कीड़े आदि लगी नहीं अपितु पवित्र होनी चाहिये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">3- समिधाएं सीधी होनी चाहिये (1) सूखी से अभिप्राय है- जो जलने के लिए बिल्कुल तैयार हैं अर्थात् जो तपस्वी हो जिज्ञासु हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु रूपी अग्नि में जलने के लिए तैयार हो और पात्र भी हो। (2) घुण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कीट आदि से दूषित न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका अभिप्राय है शिष्य ब्रह्मचारी हो। विषयों व दोषों से दूर हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब ऐसी समिधा जलकर शीघ्र ही अग्निस्वरूप अर्थात् शिष्य अपने गुरु के स्वरूप वाला ही हो जाता है। (3) सीधी से अभिप्राय है- श्रद्धावान हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें अहंकार आदि का टेड़ापन न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका चित्त सीधा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरल हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुटिलता से युक्त न हो।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तप:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगदर्शन के अनुसार तप का अर्थ है- द्वन्द्वों को सहन करना। जो व्यक्ति जीवन में आने वाले द्वन्द्वों को सहन नहीं कर पाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टूट जाता है उसे रिजैक्ट करके साइड में डाल दिया जाता है। ठीक वैसे जिस प्रकार एक शिल्पी सुन्दर भगवान् की मूर्ति गढ़ते समय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी छीणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हथौड़ी की चोट से जो पत्थर टूट जाता है- वह उसे साइड में फेंक देता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही कष्ट सहन करने वाला ही अपनी मंजिल तक पहुँच पाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपनिषदों में उग्र क्रिया को तप कहा गया है अर्थात् पहले-पहल जो क्रिया (</span>Activity<span lang="hi" xml:lang="hi">) शुरु होती है और यह क्रिया जब अपने उग्र रूप (</span>Activity<span lang="hi" xml:lang="hi">) पर आ जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रिया की इस अवस्था का नाम ही तप है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी कोई नया सृजन हो पाता है। यहाँ तक कि स्वयं ब्रह्म ने भी जब इस सृष्टि की रचना की तब उसे भी तप करना पड़ा- </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">''<span lang="hi" xml:lang="hi">स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा स मिथुनमुत्पादयते। रायिं च प्राणं चेत्येतौ मे बहुधा प्रजा: करिष्येत इति</span>’’ <span lang="hi" xml:lang="hi">(प्रश्नोपनिषद् -1/4)</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">उपलब्धि चाहे लौकिक हो या अलौकिक बिना तप के प्राप्त नहीं की जा सकती। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">नातपस्विनो योग सिध्यति</span>’  </span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मचर्य:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी समिधा है ब्रह्मचर्य। शरीर की साधना का नाम तप है और मन की साधना का नाम ब्रह्मचर्य। ब्रह्मचर्य का मतलब है उपस्थेन्द्रिय के साथ-साथ समस्त इन्द्रियों का संयम। योगदर्शन में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मचर्य</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">नामक यम का पालन करने से जो सिद्धि प्राप्त होती है वह है- वीर्य लाभ। </span><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>''<span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायां वीर्यलाभ:</span>’’</strong></span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मचर्य में प्रतिष्ठित होने पर वीर्य लाभ होता है। वीर्य का अर्थ है- सात्विक पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पराक्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भागवत कृपा व उत्साह। अर्थात् यदि शिष्य या साधक में पराक्रम व उत्साह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवनी शक्ति नहीं होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि वह ढ़ीला-ढ़ाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जल्दी थकने वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निरुत्साह व अपराक्रमी होगा तो वह कोई बड़ा कार्य नहीं कर पायेगा। श्री अरविन्द ने भी सिद्धि प्राप्ति के लिए काल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु व उत्साह इन चार तत्वों को साधन बताया है। ब्रह्मचर्य शब्द का शाब्दिक अर्थ भी यही है कि जो ब्रह्म में विचरण करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विषयों में विचरण नहीं करता वह ब्रह्मचारी है। इस सृष्टि में ब्रह्म को सबसे प्रिय लगने वाली कोई वस्तु यदि है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह है- ब्रह्मचारी। ब्रह्मचर्य की शक्ति का दिग्दर्शन हमें अथर्ववेद के ब्रह्मचर्य सूक्त में होता है। वहाँ ब्रह्मचारी- उद्घोषणा करता है कि बताइये इस पृथ्वी को उठाकर मैं इधर रखूं या उधर। अर्थात् केवल स्थूल शरीर से ही नहीं अपितु मन और प्राण के स्तर पर भी जो सदा ब्रह्म में विचरण करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्साह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पराक्रम व सात्विक पुरुषार्थ से युक्त रहता है वह ब्रह्मचारी है और इसके सजीव उदाहरण हैं- <strong>श्रद्धेय स्वामी जी महाराज।</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धा:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तीसरी समिधा है श्रद्धा- हमारा मन या तो संकल्प-विकल्प में उलझा रहता है या फिर इससे निकलकर किसी सत्य निर्णय पर पहुँच जाता है। अर्थात् संकल्प विकल्प में से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तर्क की उलझन में से निकलकर सत्य की खोज के लिए डट जाने का नाम ही श्रद्धा है। प्रश्नोपनिषद् में पिप्लाद ऋषि ने ब्रह्मज्ञान के लिए तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मचर्य और श्रद्धा को आवश्यक बताया है क्योंकि श्रद्धा की परिणति निष्काम कर्म में होती है। ऋग्वेद के दशम मण्डल में श्रद्धा सूक्त तथा उपनिषदों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शनों में सर्वत्र श्रद्धा के महिमा की महति चर्चा है। मुण्डकोपनिषद् में कहा कि जो शान्तचित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्वान् तथा जंगल में भिक्षावृत्ति से जीवन निर्वाह करते हुए तप और श्रद्धापूर्वक रहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे सब मलों से शुद्ध होकर सूर्य द्वार से वहाँ पहुँचते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ अमृत अव्ययात्मा पुरुष है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>तप:श्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वान्सो सो भैक्षचर्यां चरन्त सूर्य द्वारेण ते विरजा: प्रयान्ति यत्रमृत: स पुरुषो ह्यव्यात्मा।</strong></span> अन्यत्र कहा </span><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धावान लभते ज्ञानम्</span>’</strong></span> <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धावान व्यक्ति ही सच्चे ज्ञान को प्राप्त कर पाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् ।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्त:शरीरे ज्योतिर्यो हि शुभ्रो यं पश्यन्ति यतय: क्षीणदोषा:। </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">(मुण्डकोपनिषद् -3/1/5)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् वह आत्मा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">तप</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">सम्यक्-ज्ञान</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">से और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मचर्य</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">से पाया जा सकता है। शरीर के भीतर ही वह शुभ्र ज्योतिर्मय रूप में विद्यमान है। यति लोग राग-द्वेष आदि दोषों का क्षय करके उसे देख पाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उपरोक्त तीन समीधाओं से युक्त साधक ही उस ब्रह्मज्ञान को प्राप्त कर पाता है और तब वह कह उठता है- </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशया:।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् जब मनुष्य उस पर और अवर ब्रह्म को जान लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब हृदय की सब गाँठे टूट जाती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे व्याकुल कर देने वाले कर्म भी छूट जाते हैं। तब तो उसे सर्वत्र उस परब्रह्म की ही अनुभूति होने लगती है-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद् ब्रह्म पश्चाद् ब्रह्म दक्षिणतश्चोतरेण। अधश्चोर्ध्व च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">(मुण्डकोपनिषद् -2/11)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् अमृत स्वरूप ब्रह्म ही मेरे सामने है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्म ही पीछे है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्म ही दक्षिण में है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्म ही उत्तर में है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीचे ब्रह्म है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊपर ब्रह्म है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सम्पण विश्व तथा संसार में जो कुछ भी विशिष्ट है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह सब ब्रह्म ही ब्रह्म का विस्तार है। वासुदेव: सर्वम्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सियाराममय सब जग जानि।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उस सर्वत्र व्यापक ब्रह्म को पाकर साधक अपना अलग अस्तित्व इसी प्रकार खो देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार से ब्रह्मरूप ही हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ अपना पृथक् नाम और रूप छोड़कर समुद्र में अस्त हो जाती हैं और समुद्र रूप ही बन जाती हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">यथा नद्य: स्पन्दमाना: समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">तथा विद्वान्नामरूपाद्विनमुक्त: परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">(मुण्डकोपनिषद् -3/2/8)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यही तो हमारे जीवन का अन्तिम गन्तव्य है कि हम प्रतिपल-पूर्ण जागरूक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्णप्रसन्न व एकाग्रता पूर्वक पवित्र जीवन जीते हुए अभ्युदय व नि:श्रेयस को सिद्ध करके आप्तकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्काम व दिव्य काम योग बनकर आनन्द पूर्वक जीवन का यापन करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>दिसम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Dec 2015 21:48:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>चिकित्सा विज्ञान की अनोखी विधा, जिस पर चल रहे हैं प्रयोग</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  योग से जन्मता है जीवन में आस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वास एवं प्रेम। इन तीनों का संयुक्त प्रयोग ही प्रार्थना है जो जीवन को स्वस्थ्य-निरोग रखने में मदद करती  है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन का कायाकल्प करती है। प्रार्थना शब्द आध्यात्मिक है पर उसके प्रभाव आरोग्यता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफलता आदि रूपों में दिखते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क</span><span lang="hi" xml:lang="hi">भी-कभी देखने में आता है कि जीवन में सभी ओर से निराश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हताश एवं असाध्य रोगग्रस्त लोग जब हर तरफ से उपचार करा करके थक जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लाभ नहीं दिखता तभी न जाने उनके अंदर के छोटे से कोने संवेदनशील होकर किसी अज्ञात से आरोग्यता की पुकार कर</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3194/unique-genre-of-medical-science-on-which-experiments-are-going-on"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/178.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> योग से जन्मता है जीवन में आस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वास एवं प्रेम। इन तीनों का संयुक्त प्रयोग ही प्रार्थना है जो जीवन को स्वस्थ्य-निरोग रखने में मदद करती  है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन का कायाकल्प करती है। प्रार्थना शब्द आध्यात्मिक है पर उसके प्रभाव आरोग्यता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफलता आदि रूपों में दिखते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क</span><span lang="hi" xml:lang="hi">भी-कभी देखने में आता है कि जीवन में सभी ओर से निराश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हताश एवं असाध्य रोगग्रस्त लोग जब हर तरफ से उपचार करा करके थक जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लाभ नहीं दिखता तभी न जाने उनके अंदर के छोटे से कोने संवेदनशील होकर किसी अज्ञात से आरोग्यता की पुकार कर उठते हैं और उसका प्रवाह होता भी चमत्कार जैसा है। व्यक्ति स्वस्थ-निरोग होकर खड़ा हो जाता है। वस्तुत: यह अध्यात्म का मनोवैज्ञानिक प्रयोग है जिसे प्रार्थना कहा जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">डयूक विश्वविद्यालय के डॉ. हेराल्ड डी काइंग ने ९७ महिला-पुरुष रोगियों पर अध्ययन के दौरान पाया कि जो लोग प्रार्थना करते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धार्मिक भावना एवं आस्थावान थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने अनास्था वाले लोगों की अपेक्षा ७० प्रतिशत शीघ्रता से स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया। एक अन्य शोध प्रोजेक्ट में १७०० लोगों पर अध्ययन में पाया गया कि प्रार्थना करने वाले लोगों का इम्यून सिस्टम तथा डिफेन्स मेकानिज्म ज्यादा शक्तिशाली एवं सक्रिय होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे ऐसे परिणाम आते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">चिकित्सा विज्ञानी डॉ</span>0<span lang="hi" xml:lang="hi"> लेस्ली वेदरहेड ने अपनी पुस्तक </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">साइकोलॉजी रिलीजन एण्ड हीलिंग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">पुस्तक में असाध्य गुर्दे के रोग ग्रस्त चार वर्षीय बालक का जिक्र है। डॉक्टरों ने उसके न बचने की घोषणा कर दी थी। बालक की माँ ने अपने पड़ोसियों को इकट्ठा कर सामूहिक प्रार्थना प्रारम्भ की। नियत समय पर निश्चित अवधि के लिये लगातार प्रार्थना चलती रही। कुछ दिनों के बाद डॉक्टरों को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि बालक के दोनों गुर्दो ने पुन: कार्य करना प्रारम्भ कर दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चा शीघ्रता से स्वस्थ होने लगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ड्यूक यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ  मेडिसिन के कार्डियोलॉजिस्ट डॉ० मिशेल क्रूकाफ  का मानना है कि प्रार्थना से दूरस्थ रोगियों के इलाज करने की इस पद्धति को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इन्टरसेंसरी प्रेयर</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उनका मानना है कि प्रार्थना  के साथ अन्य उपचार एवं निदान का भी सहयोग लेना चाहिये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तुत: प्रार्थना का अर्थ किसी भी मंत्र या शब्द को बार-बार दोहराना मात्र नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि  प्रार्थना का सीधा सम्बन्ध दिल एवं भावनाओं से जुड़ता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इम्यूनोलॉजिकल प्रोसेस स्ट्रांग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ग्रीन्सबोरो की </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">यूनिवर्सिटी ऑफ नार्थ कैरोलिना</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के शोध विज्ञानिकों ने 112 महिलाओं पर शोध कर पाया कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वर में आस्था तथा सतत् विश्वास रखने वाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रार्थना करने वाले लोगों का स्वभाव तथा दिमाग तो शांत होता ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय की लय-ताल भी सुनियोजित होती है। उनकी नाड़ी की गति एवं रक्तचाप सामान्य तथा सामान्य से कम रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो श्रेष्ठ स्वास्थ्य का सूचक है। वे भरपूर ऑक्सीजन ग्रहण करते  हैं। उनकी मानसिक तंरगों की गति स्वाभाविक होती है। इसी प्रकार सेन फ्रांसिस्को जनरल अस्पताल के कार्डियक केयर यूनिट द्वारा 613 मरीजों पर सर्वेक्षणात्मक अध्ययन कर निष्कर्ष दिया गया कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">जो लोग प्रतिदिन ईश्वर की प्रार्थना करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें प्रार्थना न करने वालों की अपेक्षा आठ गुणा कम एण्टीबायोटिक औषधियों का सेवन तथा छह गुणा कम कृत्रिम साँस के जरिये उपचार की आवश्यकता हुई। अर्थात् प्रार्थना से शरीर का इम्यूनोलॉजिकल प्रोसेस इतना शक्तिशाली हो जाता है कि वह स्वत: रोगाणुओं से लोहा लेने लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें नष्ट कर देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही फेफड़े तथा दिल की क्षमता इतनी विकसित हो जाती है कि ऑक्सीजन की आपूर्ति एवं खपत स्वत: नियमित एवं नियोजित होने लगती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अनुभव कैंसर विशेषज्ञ का:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ. लैरी डोस्सी टेक्सास अस्पताल के कैन्सर विशेषज्ञ ने टेक्सास अस्पताल के एक ऐसे मरीज का जिक्र किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके दोनों फेफड़े घातक कैन्सर से ग्रस्त होकर नष्ट हो गये थे। डॉ. डोस्सी ने लिखा है कि वार्ड के उस कैन्सर रोगी के बिस्तर के पास से जब भी निकलते तो उस मरीज को उसके नाते-रिश्तेदार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मित्र घेरे रहते। अंतिम विदाई का क्षण जानकर वे प्रार्थना करते रहते। कुछ दिनों बाद वे पुन: उसके फेफड़े की एक्सरे प्लेट देखकर दंग रह गये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि उसके फेफड़े पूर्णतया स्वस्थ थे। कैन्सर का कोई चिन्ह नहीं था। जब उन्हें इस बात की जानकारी हुई कि यह चमत्कार प्रार्थना चिकित्सा से सम्भव हुआ तो इस घटना से प्रेरित होकर उन्होंने अपना सारा ध्यान प्रार्थना चिकित्सा पर लगाया। हृदय रोग से लेकर कैन्सर तक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संक्रमण से लेकर अन्य अनेक रोगियों पर प्रार्थना चिकित्सा पर शोध के आधार पर उन्होंने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">हिलिंग वडर््स : दि पावर ऑफ  प्रेयर एण्ड दी  प्रैक्टिस ऑफ  मेडिसन</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">पुस्तक लिखी। उक्त पुस्तक में डॉ. डोस्सी द्वारा प्रिंसटन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हार्वर्ड</span>, स्टैफर्ड आदि विश्वविद्यालयों सहित विश्वभर में तीन सौ से भी अधिक लोगों पर वैज्ञानिक अध्ययनों की समीक्षा की गयी है। इसमें से आधे से अधिक लोगों  ने स्वीकार किया है कि प्रार्थना स्वास्थ्य लाभ में चमत्कारिक असर डालती है। डोस्सी का मानना है कि प्रार्थना सर्वाधिक लाभ तब करती है<span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">जब रोगी सीधे ही अपनी जीवनशैली को प्रार्थना पूर्ण ढंग से जीने लगता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रार्थना का विज्ञान:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बिना किसी धार्मिक कर्मकाण्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिणाम तथा माँग की प्रार्थना चमत्कारिक ढ़ंग से प्रभाव डालती है। बशर्ते प्रार्थना में शिकायत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रताड़ना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चुनौती आदि हो। प्रार्थना में व्यक्ति का मिथ्या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">मिट व मर जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिरोहित हो जाता है। क्योंकि मैं समय से जुड़ा हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिये  तनाव है। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के मिटते ही कोई जल्दी नहीं रह जाती। यहाँ समय भी मिट जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आदमी कालातीत होकर परमात्मा से जुड़ जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परमात्मा से आरोग्य ऊ र्जा बहने लगती है। इसी प्रकार पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज कहते हैं कि प्रात: उठते ही सुबह-शाम प्रतिपल जब भी स्मरण हो प्रभु तथा जीवन के प्रति अहोभाव एवं आनन्द से भरकर प्रार्थना करें कि एक दिन और जीवन मिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य की रोशनी आपके जीवन में आरोग्य का प्रकाश फै लाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आकाश समग्र विकास के लिए जगह देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जल जीवन को पवित्र बनाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तृप्त करता है। इन सबके लिये आप अहोभाव से भरें। पूज्यवर कहते हैं कि धन्यवाद एवं अहोभाव से परिपूर्ण प्रार्थना से शरीर में ईश्वरीय ऊर्जा प्रवाह पैदा होता है। ऐसी प्रार्थना दवाओं तथा शल्य क्रिया से भी ज्यादा सक्रियता एवं शक्तिशाली ढंग से रोग को ठीक करती हैं। योगऋषि पूज्य स्वामी जी महाराज बताते हैं कि योग-प्राणायाम से प्रार्थना के लिए मनोदशा तैयार होती है। अत: योग युक्त प्रार्थना शुभ परिणाम प्रदान करती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ शोध अनुसंधान:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रसिद्ध चिकित्सा विज्ञानी डॉ. अलोक्सिस कैरेल का प्रबल विश्वास है कि प्रार्थना सृष्टि की सर्वाधिक शक्तिशाली ऊर्जा एवं शक्ति है जो मानव के मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मस्तिष्क एवं उसके द्वारा संचालित सम्पूर्ण कार्यतन्त्र को इच्छित दिशा में क्रियाशील होने के लिए बाध्य कर देती है और उसी के अनुरूप शरीर के अन्दर प्रतिरक्षा प्रणाली सक्रिय होकर रोग से मुक्ति प्रदान करती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बाल्टीमोर की जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी द्वारा किये गये शोध परीक्षणों से ज्ञात हुआ कि जो लोग सप्ताह में एक बार भी प्रार्थना करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनमें आत्म हत्या की दर पचास प्रतिशत कम होती है। उसी प्रकार लिवर सिरोसिस होने की दर 74 प्रतिशत कम हो जाती है। दिल के रोग तथा एम्फिसिमा (फेफड़े के ऊतकों में असाधारण दर से हवा भर जाने की स्थिति) में भी पचास प्रतिशत तक कमी पायी गयी। वस्तुत: प्रार्थना किसी भी विधि से की जाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें प्रभु के प्रति सम्पूर्ण समर्पण एवं कृतज्ञता का भाव सन्निहित होना चाहिये। प्रार्थना परमात्मा से सीधे संवाद करने का माध्यम है। यह संवाद बातचीत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्दों के द्वारा तथा मौन के द्वारा भी होता है। दोनों में ही भक्त एवं भगवान भावनाओं के माध्यम से एक-दूसरे के नजदीक होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रार्थना की चिकित्सा में महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए प्रार्थना की चिकित्सकीय क्षमता एवं शक्ति का पता लगाने के लिये हो रहे अनुसंधान अध्ययन की संख्या कुछ दशकों में दोगुनी हो गयी। आज प्रार्थना की आरोग्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा एवं चिकित्सकीय महत्व के लिये वित्तीय सहायता देने में भी संस्थायें उत्साहित हो आगे आ रही हैं। योग चिकित्सा ने प्रार्थना के महत्व को और भी बल दिया है। वस्तुत: प्रार्थना किसी भी तौर-तरीके अथवा धर्म-सम्प्रदाय के अनुसार की जाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि ईश्वरीय सत्ता के प्रति पूर्ण आस्था है तो प्रभाव अवश्य होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मस्तिष्कीय अल्फा-बीटा तरंगों पर प्रभाव:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विभिन्न धर्मों के ध्यान एवं प्रार्थना की जैविक सच्चाई जानने के लिये यूनिवर्सिटी  ऑफ  पेंसिल्वेनिया के तंत्रिका विज्ञान के प्रो. एडन्यूबर्ग ने बौद्ध-भिक्षुओं व अन्य को अलग-अलग कमरों में प्रार्थना एवं ध्यान लगाने के लिये कहा। प्रार्थना एवं ध्यान में पूरी तरह तल्लीन साधकों के शरीर में सुई डालकर यह पता लगाने की कोशिश की गयी कि वे जब पूरी तरह साधना में लीन हो जाते है तो दिमाग की क्या गतिविधियाँ चलती है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरी तन्मयता में की गयी प्रार्थना एवं ध्यान से मस्तिष्क में अल्फा तथा बीटा तरंगों की गतिविधियाँ तेज हो जाती हैं। दिमाग के पृष्ठ भाग में एक ऐसा छोटा सा क्षेत्र है जो प्रार्थना के समय अज्ञात कारणों से निष्क्रियता का केन्द्र बन जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु रिसीवर एण्टीना की तरह कार्य करने लगता है। यह केन्द्र व्यक्ति की आकाशोन्मुखता को मापता है। यह केन्द्र ईश्वरीय ऊर्जा एवं सत्ता से सम्पर्क   साधने का माध्यम बन जाता है। वास्तव में आस्था हमारे अन्दर आनुवांशिक रूप में होती है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हारवर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ. हर्बर्ट बेन्सन बौद्ध ध्यान पर विगत 30 वर्षों से शोध अध्ययन कर रहे हैं। उनके शोध का केन्द्र बिन्दु है</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान एवं प्रार्थना का दिमाग पर क्या प्रभाव होता है।</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ. बेन्सन के अनुसार सभी प्रकार के ध्यान एवं प्रार्थनाओं से दिमाग का वह भाग  जो अनुभव से सम्बन्ध रखता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो उसके </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">और जगत के मध्य विभेद पैदा करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे पैराटाइल जोन कहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत्यधिक सक्रिय हो जाता है। प्रार्थना एवं ध्यान की गहराई में सारा दिमाग एक विशाल शांति एवं आनन्द के घेरे में आ जाता है। इस अवस्था को बेन्सन ने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">क्वायट्यूड</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">नाम दिया हैं। ध्यान एवं प्रार्थना की गहराई में मन की जो अवस्था होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे अल्फास्टेट ऑफ माइण्ड कहते हैं। इस अवस्था में तन तथा मन के सारे तनाव तिरोहित हो जाते हैं तथा समस्याओं का समाधान हो जाता है। प्रार्थना के क्षणों में शरीर के अन्दर अनन्त आरोग्य ऊर्जा का प्रवाह प्रारम्भ हो जाता है और सारा शरीर आरोग्य एवं अनन्त ऊर्जा का वर्तुल बन जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब इस दिशा में अनेक प्रयोग हो रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिणाम भी सकारात्मक मिल रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: जरूरत है हम भी इसे आजमायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ का </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">भी इस दिशा में कारगर प्रयोग हो सकता है।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पतंजलि रिसर्च</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>दिसम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Dec 2015 21:45:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>विलासिता से हटकर आध्यात्मिकता अपनाएं</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">कुमार सौरभ</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3195/move-away-from-luxury-and-embrace-spirituality"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/225.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   <strong>ब्रह्मचर्य युक्त जीवन शैली आयुर्वेद की धुरी है</strong></span><strong>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह हमारे शरीर में ऐसा स्वचालित शोधन उपक्रम तैयार करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे हम घास-पात भी खाते हैं तो वह पोषक बन जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही शरीर में पहुँचने वाला विशाक्त से विशाक्त पदार्थ भी ब्रह्मचर्य से उत्पन्न शोधन अग्रि द्वारा जीवनी शक्ति बनकर प्रकट होता है। भारतीय ऋषियों द्वारा अनुसंधित चिकित्सा प्रणाली योग-आयुर्वेद इसी के सहारे शरीर को दिव्यता प्रदान करता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्तिवान बनाता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन को शसक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मा को बलशाली बनाकर स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुदीर्घजीवी जीवन का मार्ग दिखाता था। अंग्रेजों से लेकर हर विदेशी आतताई ने देश की इसी ब्रह्मचर्य शक्ति को सदैव ढहाने का प्रयास किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज हमारे पतन की ओर बढ़ने के पीछे कारण है ब्रह्मचर्य के प्रति अश्लीलता का कुठाराघात। अंग्रेज देश में जब तक रहे देश को जी भर कर लूटा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी लूट के बल पर उनके यहां औद्योगिक क्रांति की शुरुवात हुई। यही नहीं चारित्रिक और नैतिक रूप से गिराने के लिए उन्होंने बहुत सारे प्रयास किये और जाते-जाते दो ऐसे काम कर गये जो आज भी हमारे लिए नासूर जैसे रिस रहे हैं। इसमें प्रथम भारतीय पीढ़ी को गुलामी भरी शिक्षा दी और दूसरी दी अश्लीलता व विलासिता। ये दोनों आज भी हमारे देश की विरासत के प्रति युवा वर्ग में उपेक्षा भाव पैदा करने में भूमिका अदा कर रहे हैं। अश्लीलता ने ऐसा नंगा नाच किया कि साहित्य से लेकर विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभिनय क्षेत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञापन प्रणाली तक इससे भर उठे।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अं</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ग्रेजों ने ऋषियों मनीषियों के इस देश में अश्लीलता को हर क्षेत्र में बढ़ावा दिया। मां</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेटियों के शरीर को विद्रूप तरीके से प्रदर्शित करके इस देश में एक ऐसी परम्परा डाल दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो हमारे गले की फाँस बन गयी। विश्लेषक मानते हैं कि इस अश्लीलता को फैलाने में अंग्रेजों का स्वार्थ था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अँगरेज़ चाहते थे कि भारत के लोगों का नैतिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक व चारित्रिक रूप से पतन हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी भारतवासी अनंतकाल तक उनके गुलाम बने रह पायेंगे। अश्लीलता उन्हें इस निमित्त ब्रह्मास्त्र लगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि ब्रह्मचर्य इस देश की ताकत थी। देशवासियों के लिए हजारों वर्षों की गुलामी में भी यह दृढ़ता की शक्ति थी। अत: उन्होंने इसी शक्ति को ढहाकर अपने कुटिल तरीके से अश्लीलता को बढ़ावा देना शुरू किया। उनके प्रयास से यह बड़े पैमाने पर फैली। आजादी के सालों बाद भी यह तेजी से फैलता ही जा रहा है। हमारी सरकारों ने इसे मानवीय स्वभाव मानकर नजरंदाज किया। बाद में हमने इसे बढ़ाया साहित्य के जरिये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभिनय के जरिये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्रकारी के जरिये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज विविध उत्पादों के विज्ञापन तो इससे भरे पड़े हैं। जबकि भारतीय परम्परा में ऋषि मर्यादा पालन का विधान है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आजादी के बाद देश में ऐसी फिल्में बनी जिससे अश्लीलता सिर चढ़कर बोलने लगी। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अभी दो दशक पूर्व </span>1990<span lang="hi" xml:lang="hi"> के आसपास सरकार की एक नीति बनी। ग्लोबलाइज़ेशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लिबरलायिज़ेशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राइवेटाइजेशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदारीकरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्विकरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूमंडलीकरण संबंधी इस नीति में ब्रह्मचर्य की परिभाषायें बदलीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अश्लीलता परोसने के सारे दरवाज़े खोले गए। विदेशी फिल्में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विदेशी पत्रिकाएं और विदेशी अखबार आने शुरू हुए और उन्होंने इस देश में कलुसित अश्लील सोच की एक बाढ़ सी ला दी। बड़ी-बड़ी विदेशी कम्पनियों ने औषधियों से लेकर स्वच्छता एवं सौन्दर्य प्रसाधनों में मनगढंत प्रयोग कर उत्पाद तैयार किये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर उन्हें खपाने के लिए भारतीय उपभोक्ताओं में अश्लीलता के सहारे भूख जगाई और अंग्रेजों द्वारा बोई फसल लहलहा उठी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन्टरनेट दुनिया के लिए बड़ी उपलब्धि थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर इस पर सबसे ज्यादा कुप्रभाव अश्लीलता का है। हमारे देश के 12-15 साल के बच्चों से लेकर बड़े-बुजुर्गों तक इसमें लिप्त हो उठे। कंप्यूटर के माउस क्लिक करते ही स्क्रीन पर सैकड़ों अश्लील वेबसाइट खुलने लगीं और उसमें हमारे छोटे-छोटे बच्चे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नौजवान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरी तरह से डूबते रहे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे देश के नौजवान अपना स्कूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉलेज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी कक्षाएं छोड़कर इसमें व्यस्त हो रहे हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की जनसंख्या का लगभग </span>60<span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ हमारे नौजवान हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन नौजवानों को अगर अश्लीलता की खाई में धकेल देंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब हिंदुस्तान का भविष्य पूरी तरह से चौपट होगा ही। ऐसे में देश का युवा उम्र से पहले बुजुर्ग होगा। इसलिए इस अश्लीलता के खिलाफ बड़ा अभियान चलाने की सोच रहे हैं योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">टी.वी. जिनमें इस तरह के दृश्य दिखाए जा रहे हैं। उनका भी पूरी ता</span>$<span lang="hi" xml:lang="hi">कत से बहिष्कार करना होगा। टेलीविज़न का रिमोट कंट्रोल यदि हमारे हाथ में है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे सही खोज के लिए दबाने की ता</span>$<span lang="hi" xml:lang="hi">कत हमें ही पैदा करनी होगी। इसके लिए अंदर से पवित्र संकल्प की ताकत को जगाने की जरूरत है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">चैनल चलते हैं विज्ञापनों से और विज्ञापन मिलते हैं टी.आर.पी. से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टी.आर.पी. तब ज्यादा आती है जब ज्यादा से ज्यादा लोग उस चैनल को देखते हैं। टी.आर.पी. बढ़ने से चैनल को विज्ञापन अच्छे मिलने शुरू हो जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञापनों की संख्या बढ़ने से उस चैनल का पुन: दुरुपयोग करते हुए हर तरह की अश्लीलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभद्रता पर वे उतर आते हैं। इससे निपटने का सबसे आसान तरीका है बहिष्कार। अपने घर के बेटे-बेटियों को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके चरित्र संकल्प</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी नैतिकता की ऊंचाई को बढ़ाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज का एक अच्छा व्यक्ति बनाकर समाज के प्रति समर्पण की प्रवृत्ति जगाने की जरुरत है। इस प्रकार अपने घर के इस छोटे प्रयास से देश में श्रेष्ठता का वातावरण बनेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा नहीं है कि टी.वी. चैनलों पर इसके सिवा कुछ नहीं है। आस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कार से लेकर न जाने कितने चैनल हैं जो श्रेष्ठता दिखाते हैं। आज पूज्य स्वामी रामदेव जी के योग से पूरी दुनिया की आशायें जगी हैं। देश में पतंजलि योगपीठ जैसी संस्थाओं के प्रयोगों से जाने-अनजाने ही सही ब्रह्मचर्य के प्रति संकल्प जगा है। आज देश के विशाल जन मानस का मानसिक टेस्ट बदला है। वे योग-आयुर्वेद की दिशा में प्रेरित हुए हैं। इसी तरह लोगों में श्रेष्ठ संकल्प मजबूत होगा तो राष्ट्र का दिव्य मार्ग खुलेगा। जब सोच स्वदेशी होगी तो स्वदेश के प्रति स्वाभिमान बढ़ेगा। ब्रह्मचर्य अपनाने के प्रति दृष्टि पैदा होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी अश्लीलता मुक्त भारत का निर्माण होगा और भारत पुन: विश्व नेतृत्व के योग्य बनकर खड़ा होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब चिंतन-चरित्र का मूल योग-आयुर्वेद जागृत हो उठेगा।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>दिसम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Dec 2015 21:43:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>यौगिक जीवन शैली अपनायें, मोटापा फोबिया से बचें</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. अरुण कुमार पाण्डेय</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">चिकित्सा अधीक्षक</span>, </strong></p>
<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ चिकित्सालय</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3196/adopt-yogic-lifestyle--avoid-obesity-phobia"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/183.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  समुचित</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> आहार हमारे स्वास्थ्य का आधार है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्नम् वै प्राण: अर्थात् अन्न में प्राण का निवास माना गया है। इसलिए अन्न हमारे स्वास्थ्य एवं पोषण के लिए आवश्यक है। जिसका मेटाबोलिज्म सिस्टम दुरुस्त है उसके लिए समुचित खानपान मोटापे का कारण बन ही नहीं सकता। पर जिसका यह सिस्टम कमज़ोर है अर्थात् पचाना भी उसके लिए कठिन होगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वि</span><span lang="hi" xml:lang="hi">श्लेषकों के अनुसार बड़ी संख्या में लड़के-लड़कियां मोटापा फोबिया के शिकार होकर खाने-पीने से ही परहेज़ करते देखे जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो गलत है। ऐसा नहीं है कि उन्हें भूख नहीं लगती। उन्हें भूख तो लगती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर इस डर से कि खाना खाने से मोटे हो जायेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए वे खाना नहीं खाते।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लड़कियों पर इसका सीधा प्रभाव चेहरे की बनावट तक पर पड़ता है। इसी तरह की मानसिकता जानकर ही आज अनेक बहुराष्ट्रीय कम्पनियां संबंधित उत्पादों के द्वारा मनमाफिक ऐसे खाद्य पदार्थ बाजार में उतार रहे हैं जिसका न कोई पोषकीय मानक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न स्वास्थ्य परक गारंटी है। यह सही है कि वजन की अधिकता अनेक बीमारियों को न्यौता दे डालती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर किसी योगाचार्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉक्टर व वैद्य की सलाह के बिना दुबले-पतले होने की चाहत मन में पाल लेने से रोगी बनने में जरा सी भी देर नहीं लगती।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/194.jpg" alt="19" width="800" height="416"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि ऐसा करना बहुत ही गलत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि ऐसा करने से लाभ की जगह हानि ही होती है। वस्तुत: पतले-दुबले होने के लिए संतुलित व पोषणीय आहार एवं यौगिक जीवन शैली अपनानी पड़ती है। पतंजलि योगपीठ में पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी के मार्गदर्शन में विगत दिनों सम्पन्न मोटापा निवारण शिविर में आहार के साथ योगादि पर विशेष ध्यान दिया गया था और उसके सकारात्मक परिणाम भी आये। श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण महाराज स्वयं बताते हैं कि शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन एवं भावनाओं का स्वस्थ समुच्चय ही ऋषि प्रणीत स्वास्थ्य की परिभाषा है। जो लोग सोलह साल की आयु तक फॉस्ट फूड खा-खाकर अपने वजन में मनचाही बढ़ोतरी कर चुके होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे ही इस अवस्था में छुटकारा पाने के बारे में सोचते हैं। इस उम्र तक आते-आते फिल्मों और टेलीविजन एवं विदेशी साहित्य के द्वारा वे इस बात को जान चुके होते हैं कि स्लिम रहना अच्छे स्वास्थ्य और सफलता की निशानी है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि विदेशी आबोहवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन शैली पर सौन्दर्य की किताबों में लिखे टिप्स पर आंख मूंद कर अमल करना ठीक नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही डायटिंग के द्वारा पतले होना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके लिए प्लास्टिक सर्जरी का रास्ता अपनाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बॉटोक्स की शरण में जाना कहां की नीति है। इस फोबिया से ग्रसित व्यक्ति कभी-कभी अति कठिन आदतों से ग्रस्त जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषकर लड़कियाँँ। पर यौगिक जीवनशैली जीते हुए किसी विशेषज्ञ योगाचार्य की सलाह से यदि कोई आहार को न्यूनतम पर ले जाता है तो उस पर कोई नकारात्मक असर नहीं होता। वे चिड़चिड़ी सी हो जाया करती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और हर वक्त बस यही सोचती रहती हैं कि कहीं उनके भार में वृद्धि न हो जाये।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/206.jpg" alt="20" width="800" height="332"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">चिकित्सकीय मत :</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वजन कम करने की चाह में अनुचित तरीके से वजन कम करने की कोशिश कतई न करें। क्योंकि ऐसा करने से भी इन सबका उनके भावी स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है। ऐसे में यदि किसी को वजन कम करना है तो वह योग चिकित्सक के मार्गदर्शन में लौकी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एलोवेरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आंवला आदि के जूस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फ्रूट जूस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि आयुर्वेद के ऐसे ही अनेक उत्पादों का सहारा लेकर प्रयास करना चाहिए। पतंजलि दलिया व नमकीन दलिया का संतुलित प्रयोग भी सकारात्मक परिणाम लाने में कारगर हुआ है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छी तरह जान लेना चाहिए कि उचित भोजन करने से ही शरीर सही प्रकार से काम कर सकता है। हमें खाने से ही प्रोटीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विटामिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खनिज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैलोरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैल्शियम की प्राप्ति होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी क्रम में योग-व्यायाम व कुछ प्राणायाम भी हैं जो समुचित पोषणीय क्षमता बनाये रखने में मदद करते हैं। पतंजलि योगपीठ का </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भारत मोटापा मुक्त</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">अभियान इस दिशा में कुछ विशेष प्रयोग करने जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका लाभ ले सकते हैं। सबसे पहले अपनी मन: स्थिति को समान्य करें और मोटापा की चिंता छोड़कर नित्य सामान्य तौर पर सूक्ष्म व्यायाम व कपालभाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुलोम-विलोम प्राणायाम औसत स्तर पर करें। भरपूर आहार लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे मन में प्रसंनता पैदा होगी। इसके अतिरिक्त निम्रलिखित तरह से भी अपना वजन कम कर सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वजन कम करने के लिए उचित मात्रा में जूस और पानी पीना चाहिए। आलस्य का परित्याग करके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति के ज्यादा नजदीक रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नैसर्गिक फूड लेकर भी अपने वजन में कमी ला सकते हैं। ताजी हवा व संतुलित आहार का सेवन अवश्य करना चाहिए। फाइबर युक्त खाद्य पदार्थ जैसे- चावल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चपाती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परांठे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आलू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मीठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तले-भूने खाद्य पदार्थों व फास्ट फूड का परित्याग करें। डाक्टर की सलाह के बिना कभी भी वजन कम करने की औषधि का सेवन न करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अंतत: मनोवैज्ञानिक तरीकों से काम लेते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चों को उसका मनपसंद खाना खाने के लिए प्रेरित करें। जब वह परिजनों की सलाह मानकर खाना खाने लगे तो धीरे-धीरे उसके खाने में वृद्धि करते चलें। दिमाग में यह बात बिठानी चाहिए कि सुंदर दिखने की चाह योगाभ्यास व आयुर्वेद सम्मत आहार द्वारा भी किया जा सकता है। इस प्रकार भरपूर आहार के सेवन से चेहरे की चमक में तो वृद्धि होगी ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ योगाभ्यास अपनाने से स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुंदर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसन्नता से भरी छरहरी काया भी बनी रह सकती है और हम मोटापा फोबिया से भी निजात पायेंगे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ चिकित्सालय के प्रयोग:</span></strong></span></h5>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5>2-2<span lang="hi" xml:lang="hi"> गोली मेदोहर वटी सुबह शाम गरम जल से लें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">2-2 गोली त्रिफला गु. तथा आरोग्यवर्धनी वटी भोजन के बाद गरम जल से सेवन करें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">10 मिली. गोधन अर्क तथा 20 मिली. घृतकुमारी रस सुबह-शाम खाली पेट सेवन करें।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रात के समय 1 चम्मच त्रिफला चूर्ण 1 गिलास पानी में भिगो दें। सुबह पकायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब आधा गिलास शेष रह जाये तब छानकर उसमें एक नींबू निचोड़ लें एवं २ चम्मच शहद मिलाकर सुबह शाम खाली पेट सेवन करने से मोटापा में विशेष लाभ मिलता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मोटापा हेतु प्रमुख आसन:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">  <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पूर्ण भारत को मोटापा मुक्त करने हेतु विगत दिनों पतंजलि योगपीठ मोटापा मुक्ति पर चले अनुसंधानात्मक शिविर मे निम्रलिखित आसनों द्वारा विशिष्ट उपलब्धियां प्राप्त हुईं जो निम्नलिखित हैं-</span></h5>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">खड़े होकर करने वाले आसनों में द्रोणासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोणासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्रिकोणासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चलित पादहस्तासन तथा पी.टी. शामिल हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बैठकर करने वाले आसनों में चक्की चलाना तथा कोणासन प्रमुख हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">लेटकर करने वाले आसनों में:-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> एक-पाद उत्तानासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्धहलासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पादवृत्तासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्विचक्रिकासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शलभासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मर्कटासन तथा भुजंगासन आदि शामिल हैं।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>दिसम्बर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3196/adopt-yogic-lifestyle--avoid-obesity-phobia</link>
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                <pubDate>Tue, 01 Dec 2015 21:41:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पतंजलि योगपीठ के श्रम, समय और संस्कृति प्रबंधन का विज्ञान</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. विजय कुमार मिश्र</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3197/science-of-labor--time-and-culture-management-of-patanjali-yogpeeth"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/366.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   समय</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय नहीं मिलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय निकालना बड़ा कठिन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा कहते लगभग अधिकांश व्यक्तियों को सुना होगा पर इस दुनिया में रहने वाले असंख्य लोग हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने इसी समयाभाव के बीच बड़ी उपलब्धियाँ हासिल की। विश्लेषकों की मान्यता है कि समय की मूल इकाई क्षण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षण और श्रम के मनोयोग पूर्वक समन्वय से पूर्ण पुरुषार्थ प्रकट होता है और जीवन में समृद्धि जन्म लेती है। इसमें दुनिया में बिखरे पड़े संसाधनों के आकर्षण की शक्ति है। लोगों के पास धन-वैभव के भरे भंडारों के पीछे यही शक्ति कार्य करती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वि</span><span lang="hi" xml:lang="hi">द्यार्थी इस के सहारे ज्ञानार्जन करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक  नए अविष्कार करता है। व्यापारी व्यापार प्रणाली का विस्तार कर पाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो शिक्षक योग्य विद्यार्थी का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक संत देश में चरित्र निष्ठ नागरिक का निर्माण करने में सफल होता हैं। इसी प्रकार राजनेता श्रम एवं समय का सुनियोजिन कर कुशल एवं युगानुरुप राजनीतिक प्रणाली का विकास करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके सहारे उस देश के करोड़ों नागरिकों के भाग्य का निर्माण होता है। कुशल समय प्रबंधक माइकल अल्थुसर समय में उड़ान की शक्ति देखते हैं और कहते हैं कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">समय उड़ रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पायलट बनकर उसका समुचित संधान करना चाहिए।</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">देश-विदेश में महानतम उपलब्धियां हासिल करने वालों ने परमात्मा प्रदत्त इसी समय को अपनी सूझ-बूझ से श्रम के साथ जोड़ा और सफलतायें हासिल की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुनिया ने उनकी श्रेष्ठता का लोहा माना। विश्लेषक मानते हैं कि जीवन के कुछ और पक्षों का विश्लेषण जरूरी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">समय</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के साथ गहरा तालुक है और आम समाज का भविष्य जिस पर टिका हो सकता है अर्थात् समय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्तित्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रम व संस्कृति प्रवाह। समय प्रवाह के साथ संस्कृति का प्रवाह भी परिवर्तित होता चलता है। इसी संस्कृति के बीच से राजनीतिक प्रणाली जन्म लेती है। वह राजतंत्रीय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोकतंत्रीय व अन्य कुछ भी हो सकती है। हर देश की संस्कृति से ही वहां की राजनीतिक प्रणाली का प्राकट्य हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी केन्द्र बनी देश की संसद। यहीं से देश हित में निर्णय होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देश के लोगों के भाग्य का निर्माण होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन रूपी 24 घड़े:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा पहलू है व्यक्तित्व। समय एवं व्यक्तित्व के  बीच गहरा संबंध है। मान लीजिए प्रचलित समय मानक में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">घंटे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे व्यक्तित्व रूपी घड़े हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परमात्मा की ओर से दिन भर के लिए हर व्यक्ति को 24 घंटे मिले हैं। अपने पवित्र श्रम व पुरुषार्थ के सहारे यदि हम प्रतिदिन परमात्मा द्वारा प्रदत्त समय को व्यक्तित्व रूपी घड़ों में भरते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दिन भर में हमारे 24 घंटे भर जाते हैं। इस प्रकार उस दिन का हमारा व्यक्तित्व पूर्ण माना जायेगा। अगले दिन पुन: 24 घंटे मिलेंगे। यदि हम किसी दिन आलस्य-प्रमाद में मात्र आठ घंटे ही भर पाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हमारे 16 घंटे तो बेकार खाली ही रह गये। अब अगले दिन हम उन 16 घंटों की पूर्ति करना चाहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो असंभव है। इस प्रकार हमारा व्यक्तित्व अनंत के लिए 2/3 खाली ही तो रह गया। क्योंकि समय तो परमात्मा द्वारा हर मनुष्य के लिए समान रूप से स्वचालित उपलब्धि है। न किसी के लिए कम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न किसी के लिए ज्यादा। लाख प्रयास के बाद भी उसमें बदलाव असंभव है। उसकी गति में न शिथिलता लाई जा सकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न तीव्रता। यदि ऐसा होता तो हम अपने बचपन के दिनों में पुन: रंग भरने में सफल हो जाते अथवा भविष्य को पहले ही ज्ञात में बदल लेते। धन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिभा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुटिलता आदि किसी ढंग से ऐसा संभव नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न ही समयरूपी बहुमूल्य संसाधन को संसार की किसी भी दुकान से खरीदा जा सकता है। समय को अगले दिन के लिए बचाया भी नहीं जा सकता। वस्तुत: जरूरत है प्राप्त समय के समुचित प्रबंधन की। पूज्य योगार्षि स्वामी रामदेव जी महाराज </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">समय</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को पुरुषार्थ रूपी हथौड़े से कूट-कूट कर बढ़ाने की बात कहते हैं। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वे कहते है कि जिसने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">क्षण</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को गवां दिया उसने जीवन गवां दिया। क्योंकि परमात्मा द्वारा उपलब्ध कराये गये हर क्षण के बीच से हमारा जीवन झाँकता हैं।</span>’</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हम क्या करें:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अभी वर्षों पड़े हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय को लेकर हमारा यह दृष्टिकोण गलत है। यह हमें अलक्षित कर देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन में आलस्य एवं जड़ता पैदा करने का कारक बनता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि हमें अपने समय का लघुतम इकाईयों में विखंड़न करके उसके साथ अपने लक्ष्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दायित्व एवं श्रम शक्ति का गंभीरता से नियोजन करना चाहिए। इस संदर्भ में पतंजलि योग पीठ का समय प्रबंधन दुनिया में इन दिनों प्रथम श्रेणी का हैं। वह २४ घंटे को सेकेण्ड में विखण्डन कर अपनी कार्य योजना तैयार करता है और उस पर मनोयोग पूर्वक श्रमशक्ति का नियोजन करता है। पतंजलि योगपीठ की दिव्यता एवं शीघ्रतम विस्तार के पीछे उसका समय प्रबंधन ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे सम्पूर्ण विश्व आश्चर्य चकित हो रहा है। श्रद्धेय आचार्य श्री कहते हैं कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">दुनिया अपने श्रम का आंकलन कार्यदिवस में करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि हमारे लिए एक-एक मिनट महत्वपूर्ण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रम की इस पद्धति से नियोजन द्वारा ही भारत विश्व में शीर्षस्थ स्थान पा सकेगा।</span>’</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">समय के साथ संस्कृति:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रगति के हर सोपान के बाद अगली कड़ी आ धमकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस सीढ़ी को हम अंतिम समझकर पैर रखते हैं कि प्रगति का नव आयाम झांक उठता है। इस प्रकार दुनिया भले अंतिम दिन पर पहुँच जाय पर सभ्यता एवं संस्कृति के आंदोलन का पहिया कभी रुकने वाला नहीं। जब से दुनिया का जन्म हुआ अनेक आंदोलन आये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनेक संस्कृतियों एवं सभ्यताओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज करायी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर स्थिर कोई न रह पाई। क्योंकि  संस्कृति का भी एक प्रवाह है जो समयबद्ध चेतनात्मक जड़ता को तोड़कर बाहर आता है। चूंकि संस्कृति के बीच से ही किसी देश में राजनीति का विकास होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिस पर देश की बाह्य व्यवस्थाओं का संचालन निर्भर है। आज लोकतंत्र का युग है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी राजतंत्र का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूँ</span>जी<span lang="hi" xml:lang="hi">वाद का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकाधिकार वादी सत्ताओं का भी युग देखने में आया। सदी पूर्व तक राज्य के निर्णयों के सहारे लोग अन्य नर-नारियों का जड़वस्तु की तरह मोल-भाव करते देखे जाते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तद्नुरूप उसका शोषण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोहन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस पर अत्याचार सब कुछ करना उनके एकाधिकार में था। मजाल था कि कोई उस पर प्रश्न खड़ा कर दे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर अब वह कहाँ रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आतंक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत्याचार व शोषण की वे अट्टालिकायें  म्यूजियम व अजायबघर में परिवर्तित हो गयीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्हें देखकर आज लोग मनोरंजन करते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कयास इतिहास के अवसान का:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार प्रथम व द्वितीय विश्व युद्व के दौरान कौन जानता था कि इतिहास का अब अवसान नहीं हो जायेगा। इसी के बाद हेंगल जैसे विचारकों ने तो सतर्क घोषणा कर दी थी कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मानव सभ्यता जब आधुनिकता व उन्नत समाज के मुकाम पर पहुँच जायेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह इतिहास का अंतिम क्षण होगा।</span>’</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कालमार्क्स द्वारा पूँजीवाद के विरोध में प्रस्तुत साम्यवाद को देखकर लगभग आधी दुनिया कयास लगा रही थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कि अब इससे श्रेष्ठ राजनैतिक व्यवस्था हो ही नहीं सकती। समय के साथ साम्यवाद की विफलता ने दुनिया को उदार लोकतंत्र की ओर प्रेरित किया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तब विश्लेषकों ने इसे अमेरिकी </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पूँ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवादी लोकतंत्र के सफल महोत्सव के रूप में प्रतिपादित किया। मान्यता दी कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अब इस काल से श्रेष्ठ कुछ हो नहीं सकता। पश्चिमी विचारक इस लोकतंत्र को इतिहास का स्वर्णिम युग बताने लगे।</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सत्य है कि लोकतंत्रीय शासन व्यवस्था को अप्रत्यक्ष रूप से आम जनता की संकल्पना एवं विचारों से पोषित व्यवस्था मानी गयी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर पूर्ण यह भी नहीं है। मानवीयता का हित तो इसमें भी कुंठित हो ही जाता है। हाँ आधुनिक विकास की दौड़ में आगे रहने के कारण इस लोकतांत्रिक युग से जुड़े जीवन के हर क्षेत्र में पश्चिम का वर्चस्व रहा। अत: वे  शेष  विश्व को इसी एकांगी एवं संकीर्ण दायरे में आज भी देखते हैं और अपने एक पक्षीय दृष्टिकोण को संपूर्ण विश्व पर थोपने का प्रयास भी करते हैं। आधुनिक दौर में प्रचलित उदार लोकतंत्र की परिकल्पना इसी विचार एवं मत का परिणाम व इतिहास के विशाल और विविध आयामों का एक पक्ष मात्र है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे पूर्णत: सार्वभौम एवं सर्वहितकर नहीं माना जा सकता। क्योंकि विश्व के सभी देश </span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्ग एवं समूची मानवता के प्रति सर्वांग कल्याण की भावना इसमें निहित हो आवश्यक नहीं। हाँ अपेक्षाकृत उत्तम अवश्य है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">लोकतंत्र-पूंजीवाद का अंतर्विरोध:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान में लोकतंत्र और पूंजीवाद के बीच गहराता अंतर्विरोध एक भयानकता का संकेत दे रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मत है कि प्रोद्योगिकी  क्रांति के सहारे प्रौद्योगिकीय पूँजीवाद का प्रादुर्भाव हो रहा है। इस पूँजीवाद को आर्थिक एकाधिकारवाद भी कह सकते हैं। जो छल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कौशल यहाँ तक कि शोषण के बलबूते अधिकतम संपत्ति के स्वामी बनने की प्रक्रिया से जुड़ा है। जहाँ प्राचीन समय का साम्राज्यवाद सैनिक आक्रमण के साथ बढ़ता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं आज अपने व्यापार को दूसरे देशों की तुलना में सुरक्षित रखने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिछड़े देशों के कच्चे माल पर एकाधिकार रखने के लिए साम्राज्यवादी देशों में परस्पर एकाधिकारवादी प्रतिद्वंद्विता हो रही है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सैमुअल हटिंगटन जैसे अनेक विचारकों का तर्क है कि पश्चिम के लोकतांत्रिक मूल्य विशुद्ध रूप से यूरोपीय ईसाई संस्कृति के सह उत्पाद हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनकी पश्चिमी संस्कृति के बाहर कहीं भी जड़े नहीं है। इनका मानना है कि राजनीति को सांस्कृतिक संदर्भों से अलग कर कभी नहीं समझा जा सकता। अत: पश्चिमी मूल्यों को कभी पूर्वी देशों में व्यवहृत् एवं क्रियान्वित भी नहीं किया जा सकता।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जरूरत संवेदनशीलता की:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लोकतंत्र के इस दौर में आधुनिक विश्व-व्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि आज कहीं न कहीं लाभ-हानि के गणित में तमाम शक्ति संपन्न राष्ट्र उलझे हुए हैं। यही नहीं </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी हानि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हानि है और दूसरों के नुकसान से अपना वास्ता नहीं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इस मानसिकता का विकास भी इसी वर्तमान राजनीतिक प्रणाली से हुआ। इसी मानसिकता के परिमाण स्वरूप आंतकवाद जैसे  घिनौने कृत्य  को भी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छे और बुरे</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">में आंका जाने लगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसी कुटिल मानसिकता से न तो एक विश्व व्यवस्था की परिकल्पना की जा सकती है और न वैश्विक स्तर के खतरों को संपूर्ण रूप से समाप्त किया जा सकता  है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तुत: वैश्विक समस्या के समाधान के लिए राजतंत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोक व्यवस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशासन तंत्र में आध्यात्मिक संवेदन शीलता चाहिए। इसके लिए मानवीय व्यक्तित्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रमनीति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय प्रबंधन प्रणाली एवं संस्कृति जन्य प्रवाह में संवेदनशीलता पैदा करनी होगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">आंदोलन के माध्यम से उक्त तंत्रों में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदनशीलता</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रवाहित करने हेतु प्रयत्नशील हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास भी आज करवटें बदल रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक नई विश्व-व्यवस्था के रूप में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका मूल आध्यात्मिक संवेदना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समता एवं एकता में सन्निहित है। भविष्य मानवीय संवेदना के विकास की कहानी में आवृत है। अत: हमें इंसानियत के लिए सहज-संवेदनशील होना चाहिए। यही ऐतिहासिक सच है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ के प्रयोग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्नत समाज व्यवस्था का मूल </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य और उसका व्यक्तित्व</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">है। दुनिया के कार्पोरेट जगत पर नज़र डालें तो वहाँ कार्य करने वाले मानव समूह और पतंजलि से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से जुड़कर कार्य करने वाले लोगों के व्यक्तित्व में जमीन-आसमान जैसा अंतर है। वहाँ कर्मी के प्रोफेशनल लाइफ को महत्व दिया जाता है। पर्सनल लाइफ कैसी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे प्रबंधन को अंश मात्र भी लेना देना नहीं। इसी को कहते हैं संवेदनशीलता का अभाव। जबकि पतंजलि योगपीठ के हर कर्मी की पर्सनल एवं प्रोफेशनल लाइफ में एकरूपता है। यहाँ का प्रबंधन कर्मी के कार्यप्रणाली पर दृष्टि रखने के साथ उसके पर्सनल लाइफ के प्रति भी दृष्टि रखता है। अर्थात् कर्मी के व्यक्तिगत सुख-दुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभाव के साथ सीधा जुड़ाव रखना। यही नहीं इसी संवेदनशीलता के सहारे पतंजलि अपने कॢमयों के श्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय एवं व्यक्तित्व का नियोजन भी करता है। इस प्रकार जहां संवेदनशीलता होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहां उदार-समर्पित एवं पूर्ण पुरुषार्थी समूह संस्कृति का निर्माण होगा। ऐसी संस्कृति में जीवन जीने वाले व्यक्ति का प्रथम लक्ष्य लोकहित ही होगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवधारणा की पोषक पतंजलि योगपीठ की कार्पोेरेट प्रणाली लाभ के लिए अभियान कैसे चला सकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह तो अपने संपूर्ण लाभांश को चेरिटी के लिए समर्पित करती है। जिससे विश्वभर में कोई अभाव में न जिये। सबका नियोजन हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य राष्ट्रीय अभियान में सबका सहयोग समर्पण बन पड़े और विश्व निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>दिसम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Dec 2015 21:40:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>यौगिक प्रणाली से करें चिंता प्रबंधन</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. शरली टेल्लस एवं राम कुमार गुप्ता</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">पतंजलि अनुसंधान संस्थान</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">हरिद्वार</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3198/manage-anxiety-with-yogic-system"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/706.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   चिं</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ता एक ऐसी अवस्था है जिसे हम सभी अपने जीवन में कभी ना कभी महसूस करते है। </span>Board Exam.<span lang="hi" xml:lang="hi"> के परिणाम एवं साक्षात्कार से पहले की अवस्था चिंता का ही उदाहरण हैं। सामान्यत: चिंता का अर्थ भय या किसी आशंका के दुख-भाव से होता है। यद्यपि भय एक सामान्य स्तर तक ठीक रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु यदि भय अनावश्यक रूप से बढ़ जाये तो हमारी दिनचर्चा को प्रभावित कर सकता है। इसी अवस्था को चिंता विकृति कहा जाता है। सतत् चिंता के कारण शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक स्तर पर नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे किसी भी कार्य के प्रदर्शन में कमी आने लगती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अथवा कार्य उस रूप में पूर्ण नहीं हो पाता जैसा कि उसे वास्तव में होना चाहिये था। शायद इसलिए ही चिंता को चिता के समान माना गया है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">चिंता के कुछ लक्षण:</span></strong></span></h5>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सतत् घबराना एवं भय महसूस करना। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बैचेनी महसूस करना। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अभिघातक (</span>Tramatic<span lang="hi" xml:lang="hi">) अनुभवों के बारे में अनियंत्रित रूप से लगातार सोचते रहना । </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी दुस्वप्न के कारण अचानक नींद खुल जाना। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अनिद्रा।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">हाथ एवं पैरों में अनावश्यक पसीना आना। </span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">चिंता के मुख्य कारण:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आत्म विश्वास एवं कुशलता में कमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भय का अधिक आकलन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी क्षमताओं का कमतर आंकना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आनुवांशिक कारण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वायत्त अस्थिरता आदि चिंता के कारणों में आते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रबंधन एवं चिकित्सा:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">चिंता में औषधीय चिकित्सा एवं मनोचिकित्सा दोनों ही लाभदायक हैं। औषधि में मरीज को मनोचिकित्सक द्वारा </span>Anti Anxiety <span lang="hi" xml:lang="hi">दवाईयाँ दी जाती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका </span>Side Effect <span lang="hi" xml:lang="hi">भी शरीर पर पड़ता हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके अलावा मनोविश्लेषण पद्धति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार पद्धति</span>, Modelling <span lang="hi" xml:lang="hi">इत्यादि विधियों द्वारा भी चिंता का प्रबंधन किया जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">चिंता एक ऐसा विकार है जिससे शारीरिक एवं मानसिक दोनों ही स्तर प्रभावित होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनो-शारीरिक चिकित्सा के रूप में योग एक बहुत ही प्रभावी पद्धति के रूप में माना जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि योग उपचार मात्र एक पद्धति न होकर एक जीवन शैली है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें सम्पूर्ण मानव जीवन का उपचार किया जा सकता है। नियमित योग अभ्यास हमें शान्त एवं स्थिर बनाने के लिए दैनिक जीवन की कठिनाईयों से बिना विचलित हुए सामना करने की शक्ति प्रदान करता हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग प्रक्रियाएं/ आसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम श्वास को नियन्त्रित करती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर व मन को तनाव से मुक्त कर शिथिल एवं स्थिर करती हैं। जिसके फलस्वरुप चिंता विकार से मुक्त हो व्यक्ति जीवन में स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आनन्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सकारात्मकता एवं शक्ति प्राप्त करता है। वैज्ञानिक शोधों के अनुसार सतत योग करने वाले व्यक्तियों में </span>GABA, Serotomin, Doparmine <span lang="hi" xml:lang="hi">एवं </span>Endorphin<span lang="hi" xml:lang="hi"> नामक मस्तिष्क रसायनों (</span>Neurotransmittcod<span lang="hi" xml:lang="hi">) की मात्रा में वृद्धि पाई गई जो मस्तिष्क के सही कार्य करने एवं आन्तरिक शरीर की शान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसन्नता एवं आनन्द के लिए उत्तरदायी होते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संभावित योग प्रक्रिया: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आसन :-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> धनुरासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मत्स्यासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेतुबन्ध आसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मार्जरी आसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिमोत्तानासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हस्तपादासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शवासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कपालभाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुलोम-विलोम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रामरी प्राणायाम चिंताग्रस्त मनुष्य के लिए वरदान है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी जीवन में जो भी चुनौतियां आती रहती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका सकारात्मक रूप से सामना करना चाहिए। साथ ही हमें अपने कार्य असफलता के भय के साथ प्रारम्भ ना करके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु अपने पूरे मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षमता एवं सकारात्मकता के साथ करना चाहिये। यदि हम ऐसा करने में समर्थ हुए तो परिस्थिति एवं मन: स्थिति बदलने में देर नहीं लगेगी। जो हमारे चिंता निवारण का प्रत्यक्ष प्रमाण सिद्ध होगी।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>दिसम्बर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3198/manage-anxiety-with-yogic-system</link>
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                <pubDate>Tue, 01 Dec 2015 21:38:56 +0530</pubDate>
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