<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/category/6655/august" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>योग संदेश RSS Feed Generator</generator>
                <title>अगस्त - योग संदेश</title>
                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/category/6655/rss</link>
                <description>अगस्त RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>शाश्वत प्रज्ञा</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य अज्ञान</strong></span><br />1.   मुझे संसार की बड़ी-बड़ी रचनाएं, घटनाएं व वंडर्सादि आश्चर्यचकित नहीं करते लेकिन जब मैं देखता हूँ कि 99% विश्व के मानव जीवन के सन्दर्भ में अपने ज्ञान, संवेदना, सामर्थ्य के बारे में बेखबर होकर अज्ञान या अविद्या जनित वृत्तियों व प्रवृत्तियों में जी रहे हैं। जीवन जो अनादिकाल से चला आ रहा व अनन्त काल तक चलने वाला शाश्वत प्रवाह है तथा जीवन के प्रयोजन, उपयोगिता, उपलब्धि व अन्तिम गन्तव्य या ध्येय के सन्दर्भ में अतिशय भ्रान्ति है। अज्ञान, प्रमाद व क्षणिक सुख व तुच्छ आकर्षणों में फंसकर प्रकृति व परमेश्वर प्रदत्त अनन्त</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3572/shashwat-pragya"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-03/amt_0119.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य अज्ञान</strong></span><br />1.   मुझे संसार की बड़ी-बड़ी रचनाएं, घटनाएं व वंडर्सादि आश्चर्यचकित नहीं करते लेकिन जब मैं देखता हूँ कि 99% विश्व के मानव जीवन के सन्दर्भ में अपने ज्ञान, संवेदना, सामर्थ्य के बारे में बेखबर होकर अज्ञान या अविद्या जनित वृत्तियों व प्रवृत्तियों में जी रहे हैं। जीवन जो अनादिकाल से चला आ रहा व अनन्त काल तक चलने वाला शाश्वत प्रवाह है तथा जीवन के प्रयोजन, उपयोगिता, उपलब्धि व अन्तिम गन्तव्य या ध्येय के सन्दर्भ में अतिशय भ्रान्ति है। अज्ञान, प्रमाद व क्षणिक सुख व तुच्छ आकर्षणों में फंसकर प्रकृति व परमेश्वर प्रदत्त अनन्त शक्ति सम्पन्न जीवन को क्षुद्र उद्देश्यों के लिए ही अधिकांश लोग बर्बाद कर देते हैं। शरीर, इन्द्रियों, मन, बुद्धि सहित अनन्त शक्ति सम्पन्न आत्मा क्या है, क्यों है, जन्म और जीवन हमें क्यों मिला है, ये सब किसका परिणाम है और अन्ततः जीवरन का परिणाम परिणति व नीयति क्या है? इन सब अत्यन्त गंभीर सन्दर्भों के सन्दर्भ में हम अनजान रहकर जीवन के अमूल्य एक-एक क्षण में व्यर्थ गंवा देते है। जब किसी गंभीर संकट, रोग-दुःख, दरिद्रता, अन्याय, शोषण, चुनौति, संघर्ष या समस्या से घिर जाते हैं तो सोचते है कि कोई दैवी शक्ति, शक्तिशाली व्यक्ति शासक राजा, फकीर-वजीर या अमीर व्यक्ति आयेगा और हमें बचायेंगा जबकि यथार्थ यह है कि हम अपनी समस्त समस्याओं या 99% दुःख का स्वयं ही प्रत्यक्ष या परोक्ष कारण हैं। अमीर अपनी अमीरी बढ़ाना चाहते हैं, शासक अपनी सत्ता बचाना चाहते हैं आपके वोट से कंपनियां आपको अपना ग्राहक बनाकर अपना साम्राज्य बढ़ाना चाहते है। धर्मसत्ता आपको अपनी भीड़ का हिस्सा बनाकर अपना साम्राज्य या दंभ दिखाना चाहते हैं भगवान् ने जीवन के रूप में सब कुछ दे दिया, इसके बाद तो प्रभु कर्म फल व न्याय व्यवस्था के अनुरूप न्याय करते हैं निष्कर्ष यह है कि आपको स्वयं को जानना, जगाना होगा तथा अपने सामर्थ्य को सही दिशा में लगाना होगा तब आप स्वयं-स्वयं पूर्ण सुखी हो सकेंगे और करोड़ों लोगों को भी स्वास्थ्य सुख, समृद्धि, शान्ति देकर सबकी सेवा कर सकेंगे। जीवन अनन्त हैं जीवन में ज्ञान, शक्ति सामर्थ्य भी अनन्त है। जीवन का ध्येय भी अनन्त है। संसार में जिन आत्माओं को जवीन का सम्यक् यथादि बोध हो चुका है जो जीवन को अनन्तता को जी रहे हैं उनका धर्म, कर्त्तव्य या उत्तरदायित्व है कि वे संसार को समस्त आत्माओं को भी सही मार्गदर्शन दें। <br />2.  जीवन भी अनन्त है जगत भी अनन्त है जगदीश्वर भी अनन्त है। अतः हम सब मनुष्यों का भी यह परम धर्म है कि हम सब अनन्त ज्ञान, अनन्त प्रेम-करुणा, वात्सल्य व अत्यन्त व अनन्त पुरुषार्थ, शौर्य-वीरता व पराक्रम के साथ इस पूरे अस्तित्व को दिव्यता से भर दें। सारे संसार में सब दिशाओं सभी प्रकार की खुशहाली हो तो कितना सुन्दर होगा, ऐसा होता ही है और आप और हम सब मिलकर ऐसा ही करेंगे।<br />3. जब हमारे भीतर कभी-कभी काम, क्रोध, लोभ, मोह या अहंकारादि अनन्त अत्यन्त या तीव्र आवेग होता है तो हम आंशिक रूप से अनन्तता के सिद्धान्त को नकारात्मक रूप से अनुभव करते हैं आइये इसे ज्ञान, भक्ति, सेवा सुमिरन, सुख-शान्ति, प्रसन्नता व आनंद के रूप में अनुभव कीजिए।</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शाश्वत प्रज्ञा</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>अगस्त</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3572/shashwat-pragya</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3572/shashwat-pragya</guid>
                <pubDate>Thu, 01 Aug 2024 17:59:49 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/amt_0119.jpg"                         length="466006"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पतंजलि आयुर्वेद व योग का पर्याय</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">आचार्य बालकृष्ण</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3573/patanjali-synonymous-with-ayurveda-and-yoga"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-03/yoga-aryuveda.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>पतंजलि आयुर्वेद व योग का पर्याय</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">   पतंजलि में दुनिया के लगभग 70 से ज्यादा देशों के लोग उपचार के लिए आ रहे हैं। इनमें लगभग सभी रोगी वे रोगी हैं जिनके पास चिकित्सा कराने के लिए साधन उपलब्ध हैं, यानि वे आर्थिक रूप से विपन्न नहीं हैं, सामथ्र्यशाली हैं। उनके पास आधुनिक चिकित्सा कराने के सभी विकल्प हैं फिर भी वे आयुर्वेद व योग का प्राथमिकता से चयन करते हुए पतंजलि आ रहे हैं, ये बड़ी बात है।<br />पतंजलि पूरे विश्व में आयुर्वेद का सबसे बड़ा संस्थान है, या यह कहें तो अतिश्योक्ति न होगी कि पतंजलि आज आयुर्वेद का पर्याय बन गया है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>योग मत-पंथ-संप्रदाय के बंधनों से मुक्त है, योग को योग ही रहने दें</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">योग करने के लिए बहुत सारे बाह्य उपकरण नहीं चाहिए, साधन नहीं चाहिए, बहुत सारी जगह की आवश्यकता नहीं है, योग एक विज्ञान है, जीवन के लिए आवश्यक विधा है। इसलिए अपनी संकुचित अवधारणा को छोडक़र, मत-पंथ की अवधारणाओं से बाहर निकलकर योग को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएँ। योग ही बने रहने दें। योग को किसी संप्रदाय का चश्मा पहनाने का प्रयास न करें। तब योग का लाभ सबको मिलेगा। योग जहाँ तक पहुँचा है, वहाँ तक लोग योग का पालन करें और जहाँ योग अभी नहीं पहुँचा है, उसका दायित्व भी उनका है जो योग के साधक हैं, जिन्होंने योग से स्वस्थ जीवन पाया है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>योग व आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के साथ-साथ जीवन पद्धति है</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणं, आतुरस्य विकार प्रशमनं</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">जो रोगी नहीं हैं वे रोगी न हों, इसके लिए दुनिया में कोई विधा हो सकती है तो वह योग व आयुर्वेद है। योग, आयुर्वेद न केवल चिकित्सा पद्धति हैं अपितु जीवन पद्धति हैं। आइए! हम सब मिलकर योग और आयुर्वेद को जीवन पद्धति बनाने का संकल्प लें। यह समय स्वदेशी को अपनाकर स्वालम्बी बनने का समय है। हम मानते हैं कि यदि हम अपने जीवन में योग व आयुर्वेद को अपनाते हैं तो हम स्वदेशी को स्वत: ही स्थान देते हैं।<br /><strong><span style="color:rgb(22,145,121);">मन प्रसन्न तो आत्मा प्रसन्न</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>प्रसन्नात्मेन्द्रियमन: स्वस्थइतिअभिधीयते।</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">    आरोग्य का अर्थ है स्वस्थ शरीर, प्रसन्न मन व आत्मा तथा स्वस्थ इंद्रियाँ। जब तक हमारा मन प्रसन्न नहीं है, अन्दर से आत्मा प्रसन्न नहीं है, हमारी इन्द्रियाँ स्वस्थ नहीं हैं, तो ऐसे शरीर का क्या? आरोग्य दुनियां में किसी औषधि से, किसी दवाई से, कहीं भी जायें, किसी पूजा-पाठ पद्धति से नहीं मिल सकता। केवल आंशिक फल ही मिल सकता है। किंतु यज्ञ एक ऐसा कर्म है, जो आपको अन्दर से भी शु़द्ध करता है, अन्तर को निरोग करता है, प्रसन्नता को प्रदान करता है और जीवन में समृद्धि को लाता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>यज्ञ जीवन की पवित्रता व निरोगिता के लिए आवश्यक </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">   यह तो सभी जानते हैं कि योग से बीमारी जड़-मूल से समाप्त होती है। पूज्य स्वामी जी के अथक प्रयास से योग विधा आज पूरे विश्व में स्थापित करने का कार्य किया जा रहा है। योग के साथ-साथ यज्ञ को पतंजलि ने एक अभिन्न अंग बनाया है। क्योंकि ये पूरक है। यज्ञ जीवन की पवित्रता के साथ, जीवन के निरोगता के लिए है। </h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>धर्मार्थ काम मोक्षाणां आरोग्यं मूलमुतमम्। </strong></span><br /><span style="color:rgb(45,194,107);"><strong>चरक संहिता सूत्र १/२४</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> यह तो मूल है, सबको निरोगी काया तो चाहिए ही, तभी तो सारी दुनियां हमको अच्छी लगेगी। संसार के सारे पुरुषार्थ में देह स्वस्थ हो तो दुनियां अच्छी लगती है। लेकिन जब देह ही स्वस्थ नहीं रहेगी, तो सब चीजें अच्छी नहीं लगती। इसलिए नित्य यज्ञ को अपनाना चाहिए।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>ऋषियों के ज्ञान को अक्षुण्ण बनाकर उसकी अभिवृद्धि करना हमारा दायित्व</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">   आयुर्वेद आदि ग्रंथों में चरक-सुश्रुत आदि ऋषियों ने ऐसा वर्णन किया है किउन्होंने कभी नहीं कहा कि जो हमने उपदेश दिया है, वही अंतिम है, वही सम्पूर्ण है। उन्होंनेकहा कि हमने एक विधा को आपको बताया है, एक चिकित्सा के उपायों का हमने वर्णन किया है। काल, समय, ज्ञान और बोध के आधार पर इसकी अभिवृद्धि करना हमारा दायित्व है। हमारे ऋषियों ने हमें इतना दिया है, हम उन ऋषियों के दिए ज्ञान के सतही स्तर (Basic Level) तक भी पहुँच पाएँ तो यह बड़ा कार्य है लेकिन उन ऋषि परम्पराओं को अक्षुण्ण बना कर उसकी अभिवृद्धि कर पाएँ तो यह बहुत बड़ी बात है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>योगमय जीवनशैली</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">   कहा जाता है कि स्वस्थ व्यक्ति को ब्रहम मुहूर्त में यानि सूर्योदय से 2 घंटे पहले, अर्थात् लगभग 6 बजे सूर्य उदय होता है तो 4 बजे तक उठ जाना चाहिए। इस बात को हम बार-बार कहते हैं। वैसे तो एक स्वस्थ व्यक्ति को रात को 10 बजे सोना और सुबह 4 बजे उठ जाना चाहिए, लेकिन जो साधक होते हैं वो सुबह 3 बजे भी उठ जाते हैं। यानि हमारी जो निद्रा 6 घंटे या ज्यादा से ज्यादा 8 घंटे होनी चाहिए, इससे ज्यादा नहीं। कुल मिलाकर लगभग प्रात:काल 5 बजे से पहले हमें उठ ही जाना चाहिए। क्योंकि अष्टांग संग्रह में बहुत ही अच्छे शब्दों में लिखा गया है कि<span style="color:rgb(22,145,121);"><strong> ब्रह्म मुहूर्त उत्तिष्ठेज्जीर्णाजीर्ण निरूपयन</strong></span>। यानि कि यह समय बहुत ही शुभ माना जाता है। सुबह के वातावरण में शान्ति होती है, उस समय व्यक्ति बहुत सात्विक वातावरण में रहता है जिससे मन भी बहुत प्रसन्न रहता है। <br />इसके तदोपरान्त प्रात: उठकर हमें योग करना चाहिए। जिससे हमारा शरीर स्वस्थ रहता है। योग हमको आत्म केन्द्रित होना तो सिखाता ही है साथ ही निरोगी भी बनाता है। योग हमें पवित्र बनाता है। योग वह सागर है जिसमें हमारी छिपी हुई अच्छाईयां बाहर निकलती है। योग करने से व्यक्ति योगी बनता है। जिस दिन आदमी योग करना शुरू कर देता है, वह उसी दिन से योगी बन जाता है क्योंकि जीवन मुक्त होना योगों का लक्ष्य हो सकता है परन्तु जिस दिन आपने योग प्रारम्भ कर दिया, उस दिन आपके जीवन की मुक्ति का रास्ता शुरू हो जाता है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><br /><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>बौद्धिक क्षमता परिष्कृत करने में  संस्कृत व शास्त्र महत्वपूर्ण</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">   पूज्य स्वामी जी महाराज बार-बार यह कहते हैं कि संस्कृत पढऩे से, शास्त्र पढऩे से बुद्धि का विकास होता है या बौद्धिक क्षमता और ज्यादा परिष्कृत हो जाती है। संस्कृत को देव वाणी या देव भाषा कहते हैं, इससे लगता हैइसमें इतनी विविधता और विविधता में भी गहराई, सरलता, सुगमता के साथ सुन्दता का जो समावेश है, वो अपने आप में अद्भुत है। संस्कृत भाषा के विषय में कुछ लोग कहते हैं कि यह बहुत ज्यादा प्राचीन नहीं है। जब इस तरह की परिचर्चाएँ होती हैं तो निश्चित रूप से स्वत: ही इस बात का बोध होता है कि मानव की उत्कृष्ट संरचना तो हम पाणिनीय व्याकरण को कहते हैं परंतु भाषा की यह उत्कृष्टा मानवीय मस्तिष्क की संरचना नहीं है, अपितु परमात्मा द्वारा मानव के लिए प्रदत्त ज्ञान है, विद्या है, उपहार है। इसलिए हम इसे देव वाणी कहते हैं। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>सकारात्मक सोच रखें</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">    मुझसे सुखी कोई नहीं, जिस दिन आपके मन में ये भाव आ गया न, मैं सुखी हूँ इन बातों का भरोसा करना सीखों। हमें जिन्दगी में सुकून से रहने की, मस्ती से रहने की आदत डालनी चाहिए। क्योंकि यदि आप अपनी सोच को सकारात्मक रखेंगे तो आपके आसपास का वातावरण भी धीरे-धीरे सकारात्मक हो जाएगा और यदि आप निगेटिव सोच के साथ जीयेंगे तो कुछ भी अच्छा होने वाला होगा तो वह भी आपसे दूर चला जायेगा। जीवन की जो प्रतिकूलताएं है, वह रोने से या चिल्लाने से दूर नहीं होती है। उसको भोगने से दूर होंगी, क्योंकि कर्म का जो फल है वह तो हमें भोगना होता ही है। जब व्यक्ति के पास सुख आता है तो मैंने मना नहीं किया था लेकिन जब दु:ख आता है वो भी मनुष्य को भोगना होता है। बस सोच सकारात्मक रखने से व्यक्ति उस दु:ख की घड़ी को भी आसानी से पार कर लेता है और सुख पुन: सकारात्मक सोच के साथ आता है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>धर्म धैर्य सिखाता है </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">    धर्म हमको आंतरिक ताकत देता है और जो अन्दर से धार्मिक होता है, सच में जीवन के रहस्यों को वही जान सकता है। ऋषि दयानन्द जी से किसी ने पूछा कि हमको कैसे पता चलेगा कि यह व्यक्ति धार्मिक है या नहीं। उस पर उत्तर देते हुए दयानन्द जी बोले कि ये पता नहीं है कि वो धार्मिक है या नहीं, लेकिन इसको जानने का एक उपाय है। वह बोले जब जिन्दगी में विपत्ति आती है, कष्ट आता है, परेशानी आती है और व्यक्ति चारों तरफ  से परेशानियों से घिर जाता है, तड़पता है, उस समय भी धार्मिक व्यक्ति शान्त रहेगा। ये धर्म का लक्षण है। धैर्य धर्म का पहला लक्षण है। हम यदि धार्मिक हैं तो भगवान की शक्ति हमारे पास है। अगर कोई आपके दु:ख के क्षण में आपके पास है, तो वह है भगवान की ताकत जो आपको शक्ति प्रदान करती है। इसके पश्चात आप स्वस्थ्य रहने के लिए पूरे आनन्द के साथ योग करें। आप पाएँगे कि सु:ख आपके अन्दर ही है।<br />   भगवान से ये ही प्रार्थना करना कि हे प्रभु कितनी भी प्रतिकूलताएं दे, कोई बात नहीं, पर हमें इतनी शक्ति देना कि जिस मिशन और अभियान को हमने अपने हाथ में लिया है, जिस संकल्प के साथ हम आगे बढ़े हैं, वो संकल्प कभी कमजोर नहीं होने पाये। जिस अभियान को हमने अपने हाथों में लिया है उस अभियान को जब हम जन-जन तक न पहुँचा दे, तब तक हमको विश्राम नहीं लेना है। इस संकल्प के साथ आपको और हमें आग़े बढऩा है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>प्रात: उठकर करें परमात्मा का स्मरण</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">     सुबह उठकर सर्वप्रथम हमें परमात्मा का स्मरण करना चाहिए। जो भी आपके परमात्मा हैं चाहे उसमें वाहे गुरु है या खुदा है, भगवान है, परमात्मा है, ईश्वर है या आपके ईष्ठ देवता है, जिसको भी आप मानते हैं, जानते हैं। इस प्रकृति ने आपको जो असीम सुख दिया है। इस प्रकृति की जो व्यवस्था है, इस प्रकृति की जो देन है कम से कम उसको तो याद कर सकते हैं। आप चाहे नास्तिक हों या आस्तिक किन्तु कुछ समय उनको तो दे ही सकते हैं जिनको आप पूजते हो, मानते हो या भजते हो। इस प्रकृति ने जो आपके ऊपर जो उपकार किया है, इन शक्तियों को चलाने का जो इस प्रकृति का योगदान है, उसको सुबह उठकर हमको स्मरण करना चाहिए, उनके प्रति मन में कृतज्ञता का भाव होना चाहिए। सुबह उठकर कृतज्ञता करते हुए कहना चाहिए कि हे प्रभु! तुमने मुझे नया जीवन दिया है तो मैं इस जीवन को अच्छे कार्य में लगाऊँ, अपनी दिनचर्या को ठीक करुँ, अपने जीवन को ठीक करुँ। इस तरह प्रात:काल उठकर हमें प्रभु से प्रार्थना करनी चाहिए।  </h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>अगस्त</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3573/patanjali-synonymous-with-ayurveda-and-yoga</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3573/patanjali-synonymous-with-ayurveda-and-yoga</guid>
                <pubDate>Thu, 01 Aug 2024 17:57:49 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/yoga-aryuveda.jpg"                         length="353220"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आस्था व भक्ति के साथ गुरु पूर्णिमा महोत्सव संपन्न</title>
                                    <description><![CDATA[<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>गुरु पूर्णिमा का पर्व सनातन धर्म को युग धर्म के रूप में प्रतिष्ठापित करने का पर्व है : पूज्य स्वामी </strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>जीवन में आदर्श गुरु, महापुरुष का आश्रय व आलम्बन लें : श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज</strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>गुरु पूर्णिमा भारत की गुरु परम्परा, ऋषि परम्परा, वेद परम्परा व सनातन परम्परा का बहुत ही गौरवपूर्ण व </strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>पूर्णता प्रदान करने वाला पर्व है : पूज्य स्वामी जी महाराज</strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>जीवन में आदर्श गुरु, महापुरुष का आश्रय व आलम्बन लें : श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज</strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>अपने पूर्वजों के जीवन के आधार पर जीवन जीने का संकल्प लें : पूज्य आचार्य जी</strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">गुरु शिष्य की</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3574/guru-purnima-festival-concluded-with-faith-and-devotion"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-03/4.jpg" alt=""></a><br /><ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>गुरु पूर्णिमा का पर्व सनातन धर्म को युग धर्म के रूप में प्रतिष्ठापित करने का पर्व है : पूज्य स्वामी </strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>जीवन में आदर्श गुरु, महापुरुष का आश्रय व आलम्बन लें : श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज</strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>गुरु पूर्णिमा भारत की गुरु परम्परा, ऋषि परम्परा, वेद परम्परा व सनातन परम्परा का बहुत ही गौरवपूर्ण व </strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>पूर्णता प्रदान करने वाला पर्व है : पूज्य स्वामी जी महाराज</strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>जीवन में आदर्श गुरु, महापुरुष का आश्रय व आलम्बन लें : श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज</strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>अपने पूर्वजों के जीवन के आधार पर जीवन जीने का संकल्प लें : पूज्य आचार्य जी</strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">गुरु शिष्य की पवित्र परम्परा का प्रतीक ‘गुरु पूर्णिमा’पर्व पतंजलि योगपीठ के संस्थापक अध्यक्ष स्वामी रामदेव जी महाराज व महामंत्री आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के सान्निध्य में पतंजलि वैलनेस, योगपीठ-2 स्थित योगभवन ऑडिटोरियम में मनाया गया। इस अवसर पर स्वामी रामदेव जी महाराज ने कहा कि गुरु पूर्णिमा भारत की गुरु परम्परा, ऋषि परम्परा, वेद परम्परा व सनातन परम्परा का बहुत ही गौरवपूर्ण व पूर्णता प्रदान करने वाला पर्व है। </h5>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/amt_3012.jpg" alt="AMT_3012" width="800" height="534"></img></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(227,26,165);"><strong>पूरे विश्व की दृष्टि भारत की ओर</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि अलग-अलग कारणों से पूरी दुनिया में इस्लाम, इसाईयत, कम्यूनिज्म, कैपिटलिज्म और अलग-अलग प्रकार के वैचारिक उन्माद भौतिकवाद, इंटेलेक्चुअल टैरिरिज्म, रिलिजियस टैरिरिज्म, पॉलिटिकल, इकॉनोमिकल टैरेरिज्म, मेडिकल टैरेरिज्म, एजुकेशनल टैरेरिज्म सब एक्सपोज हो चुके हैं। ऐसे में पूरे विश्व की दृष्टि भारत की ओर है कि भारत से पूरी दुनिया को शिक्षा, चिकित्सा के क्षेत्र में पारिवारिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक जीवन में कोई दिशा मिलेगी। यह दिशा देने का कार्य भारत गुरु देश के रूप में करता रहा है, इसीलिए भारत विश्वगुरु रहा है। भारत अपनी उस भूमिका में पुन: आए, इसके लिए मैं 100 करोड़ से अधिक सनातनधर्मियों से आह्वान करना चाहूँगा कि गुरु पूर्णिमा पर हम अपने गुरुओं के सच्चे प्रतिनिधि बनें। योग तत्व को, वेद तत्व को, सनातन तत्व को अपने जीवन व आचरण में धारण करें। हमारे आचरण से किसी भी प्रकार से हमारी गुरु, ऋषि, वेद व सनातन परम्परा कलंकित नहीं होनी चाहिए। ऐसा श्रेष्ठ आचरण हमें करना चाहिए जिसका अनुसरण करने में देश ही नहीं पूरी दुनिया गौरव अनुभव करे। यह गुरु पूर्णिमा का पर्व सनातन धर्म को युग धर्म के रूप में प्रतिष्ठापित करने का पर्व है। हम सब अपने गुरुओं के प्रति कृतज्ञता का भाव रखते हुए संकल्पित हों, गुरुओं के प्रतिनिधि बनकर मन में भाव रखें कि मैं भगवान व ऋषि-ऋषिकाओं का वंशधर हूँ। यह दिन स्वयं संकल्पित होने का है कि मैं सनातन धर्म का, भगवान राम-कृष्ण का व अपने ऋषि-ऋषिकाओं का साक्षात विग्रहवान रूप होकर जीऊँ।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span style="color:rgb(227,26,165);">जब  स्वामी रामदेव को अपनी पहचान बताने  में कोई दिक्कत नहीं है, तो रहमान को क्यों दिक्कत होनी चाहिए?</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">उत्तर प्रदेश व उत्तराखण्ड सरकार द्वारा कांवड मेले के दौरान अस्थाई दुकानों व ढ़ाबा मालिकों व खाना परोसने वालों के नाम के सत्यापन को लेकर स्वामी जी ने कहा कि जब स्वामी रामदेव को अपनी पहचान बताने में कोई दिक्कत नहीं है, तो रहमान को क्यों दिक्कत होनी चाहिए। अपने नाम पर तो सबको गौरव होता है। नाम छिपाने की कोई जरूरत नहीं है, अपने कार्य में शुद्धता व पवित्रता है तो वह चाहे हिन्दु है, मुसलमान है, किसी भी वर्ग से ताल्लुक रखता है, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, दलित, आदिवासी, वनवासी सब भारतवासी हैं, सबको भारतीय होने पर, हिन्दु, मुसलमान, सिक्ख, जैन, बौद्ध, दलित, ओबीसी होने पर समान रूप से गौरव होना चाहिए, इसमें जो नेरेटिव गढ़े जा रहे हैं वे ठीक नहीं हैं।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/4.jpg" alt="4" width="700" height="1054"></img><br />कांवड़ मेले को लेकर उन्होंने कहा कि कांवड़ के यात्री शिवत्व धारण कर ऐसा आचरण करें कि सबको लगे कि यह कांवडिय़ा नहीं अपितु साक्षात शिव-पार्वती का साक्षात विग्रह जा रहा है। हम शिव-पार्वती, लक्ष्मी-नारायण, सीता-राम, भगवान-भगवती के साक्षात विग्रह रूप हैं, ऐसा हमारा आचरण होना चाहिए। जब ऐसा आचरण करेंगे तो इनसे पूरी दुनिया के लोग प्रेरणा लेंगे।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span style="color:rgb(227,26,165);">ईश्वरीय धाम भगवान के द्वारा बनाए गए हैं, उन्हें कोई इन्सान नहीं बना सकता</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">दिल्ली में केदारनाथ धाम की प्रतिकृति बनाए जाने के संदर्भ में स्वामी जी ने कहा कि जो हमारे देव स्थान या बड़े तीर्थ हैं, उनका कोई विकल्प नहीं हो सकता। बाकी हमारे ग्राम देवता, कुल देवता, क्षेत्र देवता, तीर्थ देवता, इष्ट देवता आदि भिन्न-भिन्न 33 कोटी देवता अर्थात 33 प्रकार के देवता हैं। कोई-कोई इन्हें 33 करोड़ भी मानता है। हमारे इष्ट व देवी-देवता अनेक हैं और परा-परब्रह्म एक है, ईश्वर एक है। यह अनेकता में एकता का सूत्र हमने देखा है। अब यह सत्य है कि अब कोई हरिद्वार धाम को नया बना दे, कहने लगे कि हमने नया हरिद्वार बना दिया है, नई काशी बना दी है, नया मथुरा, वृन्दावन बना दिया है तो यह मिथ्या है। जो भगवान के द्वारा बनाए गए धाम हैं, उन्हें कोई इन्सान नहीं बना सकता। धामी सरकार ने जो चारों धामों को पेटेंट करने का निर्णय लिया है, वह प्रशंसनीय है।</h5>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/amt_1446.jpg" alt="AMT_1446" width="900" height="601"></img></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(227,26,165);"><strong>अपने पूर्वजों के जीवन के आधार पर जीवन जीने का संकल्प लें</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">इस अवसर पर आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने कहा कि गुरु पूर्णिमा का यह पर्व हम सबके जीवन में सात्विकता व पवित्रता लेकर आए। हम अपने पूर्वजों के जीवन के आधार पर जीवन जीने का संकल्प लें। जीवन में हम अच्छे व सच्चे बनना चाहते हैं तो इसके लिए सफल, सक्षम महापुरुष के सान्निध्य की आवश्यकता होती है। सीखाने व ज्ञान देने वाले को ही हमारे शास्त्रें में गुरु कहा गया है। सब गुरुजनों को भी इस दिवस पर प्रणाम। अपने जीवन में किसी ऐसे आदर्श गुरु, महापुरुष का आश्रय व आलम्बन लें जिससे जीवन के अनसुलझे पहलु सुलझ जाएँ।</h5>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/6.jpg" alt="6" width="900" height="601"></img></p>
<h5 style="text-align:justify;">इस अवसर पर पतंजलि योगपीठ से सम्बद्ध सभी इकाईयों के सेवाप्रमुख, संन्यासीगण, इकाई प्रमुख, विभागाध्यक्ष तथा प्रभारीगण एवं छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे।</h5>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
                                            <category>सनातन वैभव</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>अगस्त</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3574/guru-purnima-festival-concluded-with-faith-and-devotion</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3574/guru-purnima-festival-concluded-with-faith-and-devotion</guid>
                <pubDate>Thu, 01 Aug 2024 17:56:49 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/4.jpg"                         length="582775"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>शास्त्र श्रवण प्रतियोगिता के विजेता प्रतिभागियों को किया गया पुरस्कृत</title>
                                    <description><![CDATA[<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(227,26,165);"><strong>हमें अपने सनातन धर्म, वेद धर्म, ऋषि धर्म तथा अपने पूर्वजों में दृढ़ता होनी चाहिए : अध्यक्ष</strong></span></h5>
<h5>  </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>अपने पूर्वज ऋषि-ऋषिकाओं के अनुगामी व प्रतिनिधि बनें : कुलपति</strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">      सम्पूर्ण शास्त्र स्मरण करने वाले 31 प्रतिभागियों का चयन 4 अगस्त को आयोजित राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता हेतु हुआ<br />गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर पतंजलि वैलनेस, पतंजलि योगपीठ-2 स्थित योगभवन सभागार में पतंजलि विश्वविद्यालय के नवप्रवेशित लगभग 272 छात्राओं तथा 150 छात्र सहित कुल 422 विद्यार्थियों का दीक्षारम्भ व उपनयन संस्कार वैदिक रीति से सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के अध्यक्ष पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज व कुलपति पूज्य आचार्य बालकृष्ण</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3575/the-winners-of-the-shastra-shravan-competition-were-awarded"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-03/diksharambh-prog.-uop-(3).jpg" alt=""></a><br /><ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(227,26,165);"><strong>हमें अपने सनातन धर्म, वेद धर्म, ऋषि धर्म तथा अपने पूर्वजों में दृढ़ता होनी चाहिए : अध्यक्ष</strong></span></h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>अपने पूर्वज ऋषि-ऋषिकाओं के अनुगामी व प्रतिनिधि बनें : कुलपति</strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">   सम्पूर्ण शास्त्र स्मरण करने वाले 31 प्रतिभागियों का चयन 4 अगस्त को आयोजित राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता हेतु हुआ<br />गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर पतंजलि वैलनेस, पतंजलि योगपीठ-2 स्थित योगभवन सभागार में पतंजलि विश्वविद्यालय के नवप्रवेशित लगभग 272 छात्राओं तथा 150 छात्र सहित कुल 422 विद्यार्थियों का दीक्षारम्भ व उपनयन संस्कार वैदिक रीति से सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के अध्यक्ष पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज व कुलपति पूज्य आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने विद्यार्थियों को यज्ञोपवित धारण कराकर आशीर्वाद दिया। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/diksharambh-prog.-uop-(7).jpg" alt="Diksharambh-Prog.-UOP-(7)" width="800" height="534"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/diksharambh-prog.-uop-(5).jpg" alt="Diksharambh-Prog.-UOP-(5)" width="800" height="533"></img><br />कार्यक्रम में पूज्य स्वामी जी महाराज ने कहा कि आपका सौभाग्य है कि गुरुपूर्णिमा के पावन पर्व पर आपका उपनयन, यज्ञोपवीत दीक्षा और दीक्षारम्भ समर्थ गुरुसत्ता की पवित्र उपस्थिति में हो रहा है। उन्होंने विद्यार्थियों को संकल्प दिलाया कि जीवन के अंतिम श्वास तक यज्ञोपवित धारण करना है। उन्होंने कहा कि हमें अपने सनातन धर्म, वेद धर्म, ऋषि धर्म तथा अपने पूर्वजों में दृढ़ता होनी चाहिए। अपनी सांस्कृतिक विरासत तथा सनातन मूल्यों के साथ हम भारत ही नहीं पूरे विश्व का नेतृत्व करने में सक्षम हैं। स्वामी जी ने कहा कि व्यक्ति नहीं व्यक्तित्व की पूजा करो, चित्र नहीं चरित्र की पूजा करो। अपना पुरुषार्थ करो और गुरु व भगवत् कृपा से आगे बढ़ते रहो। इस अवसर पर पूज्य आचार्य जी महाराज ने कहा कि यज्ञोपवित मात्र प्रतीक नहीं है, यह हमारे सौभाग्य का पर्व है। जीवन के पूर्वाद्र्ध के बाद आप उत्तराद्र्ध की ओर जाएँगे यानि शिक्षा के उपरान्त सेवा कार्य करेंगे तब आपको यज्ञोपवीत की महत्ता का आभास होगा। उन्होंने आह्वान किया कि आप अपने पूर्वज ऋषि-ऋषिकाओं के अनुगामी बनें, उनके प्रतिनिधि बनें। आचार्य जी ने कहा कि आपको समाज में व्याप्त अज्ञानता व भ्रम को मिटाकर सनातन मूल्यों को प्रचारित-प्रसारित करना है। कार्यक्रम में प्रति-कुलपति डॉ. मयंक अग्रवाल ने कहा कि पूरे विश्व में ऐसा कोई विश्वविद्यालय नहीं है जहाँ शास्त्र स्मरण के लिए इतना प्रोत्साहित किया जाता है। हमारा लक्ष्य विद्यार्थियों को मात्र शिक्षा देना ही नहीं अपितु उनका समग्र व्यक्तित्व विकास कर उनमें नेतृत्व क्षमता विकसित करना है। सायंकालीन सत्र में छात्र-छात्राओं ने पतंजलि विश्वविद्यालय के सभागार में विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति दी। साथ ही हाल ही में आयोजित तीन दिवसीय शास्त्र श्रवण प्रतियोगिता में चरक संहिता, चार वेद, भाष्य (योगदर्शन व न्यायदर्शन), अष्टांगहृदयम्, उपचार पद्धति, एकादशोपनिषद्, महाभाष्य (नवाह्निकम्), धातुवृत्ति, काशिका, षड्दर्शन, पंचदर्शन, अमरकोश, योगविज्ञानम्, प्रथमावृत्ति, श्रीमद्भगवद्गीता, हठप्रदीपिका, घेरण्ड संहिता, चाणाक्य नीति, विदुर नीति तथा अष्टावक्र गीता में विजेता प्रतिभागियों को मेडल, प्रशस्ति पत्र तथा पुरस्कार राशि प्रदान की गई। सम्पूर्ण शास्त्र स्मरण करने वाले 31 प्रतिभागियों का चयन राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता हेतु हुआ है जो 4 अगस्त को आयोजित होगी। कार्यक्रम में पतंजलि विश्वविद्यालय की मानविकी संकायाध्यक्षा साध्वी देवप्रिया, बैंगलोर से प्रो. शिवानी जी, स्वामी परमार्थदेव, कुलानुशासक स्वामी आर्षदेव, प्रति कुलपति डॉ. मयंक अग्रवाल, मुख्य परामर्शदाता प्रो. के.एन.एस. यादव, सहित समस्त संन्यासीगण, अधिकारीगण, शिक्षकगण व छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे।</h5>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/diksharambh-prog.-uop-(9).jpg" alt="Diksharambh-Prog.-UOP-(9)" width="800" height="533"></img></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>अगस्त</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3575/the-winners-of-the-shastra-shravan-competition-were-awarded</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3575/the-winners-of-the-shastra-shravan-competition-were-awarded</guid>
                <pubDate>Thu, 01 Aug 2024 17:55:49 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/diksharambh-prog.-uop-%283%29.jpg"                         length="203228"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पतंजलि योग समितियों द्वारा पुरे देश में मनाया गया</title>
                                    <description><![CDATA[<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/iyd2---copy.jpg" alt="iyd2 - Copy" width="877" height="1093" /></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/iyd3---copy.jpg" alt="iyd3 - Copy" width="874" height="1083" /></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/iyd4---copy.jpg" alt="iyd4 - Copy" width="875" height="1084" /></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/iyd5---copy.jpg" alt="iyd5 - Copy" width="875" height="1075" /></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/iyd5.jpg" alt="iyd5" width="875" height="1075" /></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/iyd6.jpg" alt="iyd6" width="875" height="1086" /></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/iyd7.jpg" alt="iyd7" width="875" height="1075" /></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/iyd8.jpg" alt="iyd8" width="881" height="1076" /></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/iyd9.jpg" alt="iyd9" width="880" height="1086" /></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3576/international-yoga-day-2024"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-03/iyd1---copy.jpg" alt=""></a><br /><p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/iyd2---copy.jpg" alt="iyd2 - Copy" width="877" height="1093"></img></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/iyd3---copy.jpg" alt="iyd3 - Copy" width="874" height="1083"></img></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/iyd4---copy.jpg" alt="iyd4 - Copy" width="875" height="1084"></img></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/iyd5---copy.jpg" alt="iyd5 - Copy" width="875" height="1075"></img></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/iyd5.jpg" alt="iyd5" width="875" height="1075"></img></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/iyd6.jpg" alt="iyd6" width="875" height="1086"></img></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/iyd7.jpg" alt="iyd7" width="875" height="1075"></img></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/iyd8.jpg" alt="iyd8" width="881" height="1076"></img></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/iyd9.jpg" alt="iyd9" width="880" height="1086"></img></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग दिवस</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>अगस्त</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3576/international-yoga-day-2024</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3576/international-yoga-day-2024</guid>
                <pubDate>Thu, 01 Aug 2024 17:54:49 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/iyd1---copy.jpg"                         length="524938"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>“देवभूमि का सांस्कृतिक गौरव”</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">डॉ. महावीर अग्रवाल   प्रति-कुलपति-पतंजलि विश्वविद्यालय<br />पूर्व कुलपति- उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3577/%E2%80%9Ccultural-pride-of-devbhoomi%E2%80%9D"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-03/kedar.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">धन्य है, भारत की यह पुण्य धरा, जिसकी पावन गोद में जन्म लेने वाले श्रीराम, श्रीकृष्ण, गौतम, कणाद, कपिल, पतंजलि, आचार्य शंकर, महर्षि दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द आदि विश्ववन्द्य महापुरुषों ने संपूर्ण विश्व को मानव धर्म और वैदिक संस्कृति का अमर सन्देश प्रदान किया। समग्र विश्व ने भारत को अपना गुरु माना। देवता भी यहाँ जन्म लेने के लिए लालायित रहे। विष्णु पुराण ने उद्घोषणा की-</h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>‘गायन्ति देवा: किल गीत कानि, धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।</strong></span><br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>स्वर्गापवर्गास्पद् हेतुभूते, भवन्ति भूय: पुरुषा: सुरत्वाद्।।</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">भारत पुण्यभूमि है। इसके कण-कण में देवत्व का वास है। ऋषि-मुनियों के तप से शोधित, यज्ञ-धूम से विशोधित, सत्कर्मों से सुशोभित, वीरों के रक्त से अभिसिंचित, कृषकों और श्रमिकों के स्वेद-कणों से सुसिंचित इस पुण्यधरा की माटी की सुगन्ध समस्त मानवता को अपनी ओर आकृष्ट करती रही है।<br />यूं तो इस देश के प्रत्येक क्षेत्र का ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक वैभव अनुपम है, तथापि देवभूमि उत्तराखण्ड का सांस्कृतिक गौरव इतना महान् है कि उसे शब्दों में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता है।<br />भारत के महान् कवि, कविकुलगुरु कालिदास ने अपने अमर महाकाव्य कुमार संभव का शुभारम्भ करते हुए हिमालय की इस तपोभूमि को नमन करते हुए कहा था -</h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>‘अस्त्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराज:।</strong></span><br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>पूर्वापरौ तोयनिधीवगाह्य स्थित: पृथिव्यामिव मानदण्ड:।।</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">नगाधिराज हिमालय की महिमा अपरंपार है। न जाने कितने ऋषियों, योगियों ने इसकी गुफाओं में साधना कर ईश्वर का साक्षात्कार किया। चारों वेदों की मधुर ऋचायें यहीं पर गूंजी थी। महर्षि वेदव्यास ने इसी हिमालय की चोटियों पर बैठकर वेदों और पुराणों को लिपिबद्ध किया था। आयुर्वेद, दर्शन, ज्योतिष आदि के उत्तमोत्तम ग्रन्थों की रचना इसी हिम प्रदेश में हुई थी। भारत के गौरव माने जाने वाले हिमालय की महिमा वेदों में भी इस प्रकार वर्णित है-</h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span style="color:rgb(35,111,161);">‘यस्येमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्रं रसया सहाहु:।</span></strong><br /><strong><span style="color:rgb(35,111,161);">यस्येमे प्रदिशो यस्य बाहु कस्मै देवाय हविषा विधेम।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>ऋग्वेद</strong></span><br />हिमालय के शिखरों पर प्रभात वेला में विद्यमान हिम और उस हिम पर ऋग्वेद पडऩे वाली सूर्य रश्मियाँ, ऐसा प्रतीत होता है मानो हिमालय ने मुक्ता मण्डित मुकुट ही धारण कर रखा हो।<br />इसी प्रकार गोमुख और गंगोत्री से प्रवाहित होने वाली साठ हजार सगर पुत्रों को मोक्ष प्रदायिनी, भारत की जीवन रेखा के रूप में विख्यात, सकलकल्मषहारिणी, पुण्यसलिला भगवती भागीरथी तो मानो भारत माता के कण्ठ में शोभायमान मुक्ताहार ही है। हिमालय और गंगा की महिमा से हमारा समग्र साहित्य भरा पड़ा है। किसी संस्कृत कवि ने ठीक ही कहा है-</h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>त्वत्तीरे वसतां त्वदम्बु पिबतां त्वद्धामसम्पष्यताम्।</strong></span><br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>त्वन्नामामृतसेविनां पदे-पदे यानेन संभ्राजताम्।</strong></span><br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>गंगे! ते विभवं सुराजितमहो भाग्येन दिव्यं महत्।।</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">इसी गंगा के तटों पर स्थित ऋषिकेश, हरिद्वार, देवप्रयाग आदि तीर्थस्थान भवसागर पार करने का मन्त्र बताने वाले पावन धाम है। तीर्थ नगरी हरिद्वार में प्रत्येक बारह वर्षों में पूर्ण कुम्भ तथा छ: वर्षों में अर्धकुम्भ का आयोजन हमारी सांस्कृतिक यात्रा का दिव्य, भव्य अनुष्ठान है, जिसमें कोटि-कोटि श्रद्धालु बिना निमन्त्रण के दौड़े चले आते हैं।</h5>
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#F1C40F;border-color:#F1C40F;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(241,196,15);">
<h5 style="text-align:justify;"><strong>भारत पुण्यभूमि है। इसके कण-कण में देवत्व का वास है। ऋषि-मुनियों के तप से शोधित, यज्ञ-धूम से विशोधित, सत्कर्मों से सुशोभित, वीरों के रक्त से अभिसिंचित, कृषकों और श्रमिकों के स्वेद-कणों से सुसिंचित इस पुण्यधरा की माटी की सुगन्ध समस्त मानवता को अपनी ओर आकृष्ट करती रही है।</strong></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;">    जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य ने देश को एकता के सूत्र में बांधने के लिए जिन चार पीठों की स्थापना की थी उनमें से एक जहाँ समाधिस्थ होकर परब्रह्म का साक्षात्कार किया था वह भगवान् शिव का धाम केदारनाथ हम देशवासियों का परम आस्था केन्द्र है, मंदाकिनी के तटपर समुद्र तल से लगभग 3584 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह मन्दिर ‘‘शिव के धाम’ नाम से विश्वविख्यात है। भगवान् शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक इस महाधाम में गंगोत्री से लाये जल से महादेव का जलाभिषेक किया जाता है। अगस्त्य, वशिष्ठ, कपिल, गौतम, कश्यप, परशुराम, पराशर, व्यास और शुकदेव आदि ऋषियों का हिमालय से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है। वशिष्ठ गुफा, व्यास गुफा, कण्वाश्रम, परशुराम मन्दिर इसके प्रमाण है। यह माना जाता है कि रावण वध के पश्चात् कुछ समय तक अयोध्या में राज्य संचालन कर श्रीराम और लक्ष्मण हिमालय चले गये थे। जनश्रुति है कि ऋषिकेश के जिस पुल से उन्होंने गंगा पार की उसका नाम ‘लक्ष्मण झूला’पड़ गया। अलकनंदा और भागीरथी के संगम ‘देवप्रयाग’में राम की स्मृति में प्रस्थापित प्रतिमा इसका प्रमाण है।<br />इसी देवभूमि के दूसरे परम पवित्र धाम ‘बद्रीनाथ’की महिमा शब्दों में अभिव्यक्त नहीं की जा सकती। अलकनन्दा नदी के दक्षिण तट पर 3133 मीटर की ऊँचाई पर नर और नारायण पर्वतों की गोद में ‘बद्रीवन’में स्थित श्री बद्रीनाथ धाम हिन्दुओं के सबसे पुराने तीर्थ स्थलों में एक है। 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य द्वारा इस मन्दिर की स्थापना की गई थी। प्रत्येक हिन्दू की यह प्रबल इच्छा रहती है कि जीवन में कम-से-कम एक बार तो बद्रीकाश्रम के दर्शन कर अपने जीवन को कृतार्थ करें।<br />इसी प्रकार मानसरोवार, यमुनोत्री, गंगोत्री, हेमकुण्ड साहिब आदि पवित्र तीर्थ स्थान भारतीय आस्था और श्रद्धा के प्रमुख केन्द्र हैं।</h5>
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#236FA1;border-color:#236FA1;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(35,111,161);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(255,255,255);"><strong>इक्कीसवीं सदी में इसी पावन नगरी में योगऋषि परम पूज्य स्वामी रामदेवजी एवं उन्हीं के अनुज परम श्रद्धेय आचार्य बालकृष्णजी ने संपूर्ण देश ही नहीं अपितु विश्व को जगाने, बचाने और कल्याण मार्ग पर अग्रसर होकर मानवजीवन को कृतार्थ करने के लिए हरिद्वारदिल्ली मार्ग पर पतंजलि योगपीठ की स्थापना की।</strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;">यमुनोत्री पवित्र यमुना नदी का उद्गम स्थल है तथा यहाँ पर यमुना देवी का प्रसिद्ध मन्दिर है। यमुना को यमराज की जुड़वां बहन तथा सूर्य की बेटी भी माना गया है। समुद्रतल से इसकी ऊँचाई लगभग 3235 मीटर है।<br />गंगोत्री धाम में माँ गंगा मन्दिर लगभग 3048 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है, जिसका निर्माण 18वीं सदी में हुआ। सफेद रंग के संगमरमर से बने इस मंदिर की ऊँचाई 25 फीट है।<br />पुण्य सलिला भगवती भागीरथी के तट पर स्थित ‘हरि और हर का द्वार’समझा जाने वाला (हरिद्वार या हरद्वार) हिन्दुओं का पावन तीर्थ है। इसके दो पवित्र शिखरों पर मनसा-देवी और चण्डी-देवी के मन्दिर इस नगर की आध्यात्मिक संपदा को प्रकाशित करते हैं। अत्यन्त प्राचीन माया देवी मन्दिर की तरह यहाँ अनेक मन्दिर भारत की सांस्कृतिक गौरव गाथा गाते हैं। राजा भगीरथ द्वारा धरा पर गंगा को लाये जाने पर राजा श्वेत ने यहां तपस्या की थी। ब्रह्मा द्वारा राजा श्वेत को प्रदत्त वरदान के फलस्वरूप ही ‘हर की पैड़ी कुण्ड’का नाम ‘ब्रह्मकुण्ड’पड़ा था। कनखल का दक्षेश्वर महादेव मन्दिर, दक्ष प्रजापति की प्रसिद्ध कथा को स्मरण कराता है।<br />इसी पावन नगरी में 04 मार्च 1902 को गंगा के पावन तट पर अमर हुतात्मा स्वामी श्रद्धानन्द ने गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय की स्थापना की। इस ऐतिहासिक शिक्षा केन्द्र के देशभक्त, विद्वान् स्नातकों ओर आचार्यों ने विश्व में वैदिक संस्कृति का शंखनाद किया और पराधीनता के विषमकाल में स्वतन्त्रता की ज्योति जलाते हुए, प्राचीन ज्ञान परम्परा को सुरक्षित रखा। महामना मदन मोहन मालवीय ने गंगा सभा की स्थापना के साथ ऋषिकुल की भी स्थापना की। माँ गंगा की निर्मलता तथा संस्कृत एवं आयुर्वेद की शिक्षा के उन्नयन के लिए महामना द्वारा किये गये कार्य सदैव स्मरण रहेंगे।<br />इसी हरिद्वार में तपोमूर्ति आचार्य श्रीराम शर्मा द्वारा स्थापित शान्तिकुंज, महात्मा नारायण स्वामी द्वारा स्थापित आर्य विरक्त वानप्रस्थ एवं संन्यासाश्रम, निवृत्त शंकराचार्य महामण्डलेश्वर परम पूज्य स्वामी सत्यमित्रानन्द जी का भारत माता मन्दिर, जूना पीठाधीश्वर परम पूज्य आचार्य स्वामी अवधेशानन्द जी का हरिहर आश्रम, योगऋषि स्वामी रामदेव जी का पतंजलि योगपीठ आदि ऐसे परम पावन केन्द्र हैं, जहाँ आकर अध्यात्म मार्ग के पथिकों को अपार शान्ति एवं प्रेरणा प्राप्त होती है।<br />हरिद्वार ऐसी सौभाग्यशाली तीर्थ नगरी है, जिसका इतिहास अति प्राचीन है। जगद्गुरु शंकराचार्य, जगद्गुरु श्री रामानन्द जी, गुरु नानक, गुरु अमरदास, उदासीनाचार्य श्री श्रीचन्द्र, गुरु रामराय, सर्व धर्म समन्वय के संदेशवाहक स्वामी प्राणनाथ, संत गरीबदास, महर्षि दयानन्द सरस्वती, महात्मा गाँधी, श्री माँ आनन्दमयी, स्वामी रामतीर्थ, पुष्टि मार्ग के अनेक आचार्य, कथावाचक पण्डित श्रद्धाराम फिल्लौरी आदि प्रात: स्मरणीय अनेक महापुरुषों के शुभागमन से यह नगरी धन्य-धन्य होती रही है।<br />इक्कीसवीं सदी में इसी पावन नगरी में योगऋषि परम पूज्य स्वामी रामदेवजी एवं उन्हीं के अनुज परम श्रद्धेय आचार्य बालकृष्णजी ने संपूर्ण देश ही नहीं अपितु विश्व को जगाने, बचाने और कल्याण मार्ग पर अग्रसर होकर मानवजीवन को कृतार्थ करने के लिए हरिद्वार-दिल्ली मार्ग पर पतंजलि योगपीठ की स्थापना की। <br />पतंजलि नाम को सार्थक करते हुए, यह पावन प्रतिष्ठान त्रिविध दु:ख नाश करते हुए प्रयागराज संगम के समान आयुर्वेद योग एवं शिक्षा की त्रिवेणी प्रवाहित कर रहा है। <br />पतंजलि गुरूकुलम्, पतंजलि कन्या गुरूकुलम्, आचार्यकुलम् एवं पतंजलि विश्वविद्यालय में जो श्रेय और प्रेय मार्ग को, अभ्युदय और नि:श्रेयस को सिद्ध करने वाली परा और अपरा विद्याएं दी जा रही हैं, उससे देश के भविष्य का उज्जवल रूप प्रकाशित होता हुआ दृष्टिगोचर हो रहा है। <br />विश्व इस प्रतिष्ठान को समस्त समस्याओं के समाधन के रूप में निहार रहा है। रोग, भोग, भय, अन्याय, अभाव और अज्ञान को दूर करने के लिये परम पूज्य स्वामी जी के प्रेमपूर्ण कुशल मार्गदर्शन में हजारों युवा ब्रह्मचारी, पूज्य साधु, संन्यासी, पूज्या साध्वी बहनें विकल्प रहित संकल्प से प्रचण्ड पुरूषार्थ के साथ निरन्तर आगे बढ़ रहे हैं। आर्थिक दरिद्रता, बौद्धिक विपन्नता को दूर भगाते हुए ईश भक्ति और देश भक्ति के भावों से ओत प्रोत इस शिक्षा मन्दिर में राष्ट्र देवता की आराधना करने वाले युवक, युवतियां, ऋषि, मुनियों और वीर शहीदों के सपनों का भारत बनाने के लिए घोर तप और श्रम कर रह हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे आचार्य चाणक्य के प्रिय शिष्य चन्द्रगुप्त मौर्य ने एक नया इतिहास बनाया था। ऐसे ही जब देश 2047 में स्वतन्त्रता का शताब्दी महोत्सव मना रहा होगा, तब योगऋषि का ही कोई योग्यतम शिष्य देश का प्रधानमन्त्री बनकर, लाल किले पर राष्ट्र ध्वज फहरायेगा और वेद मन्त्रों का उच्चारण करता हुआ किले की प्राचीर से देश के साथ-साथ विश्व को संबोधित करेगा। <br />भारत पुन: विश्वगुरू बनेगा। संपूर्ण विश्व के लोग भारतभूमि को और इस देश की महान् गुरू परम्परा को नमन करेंगे। <br />जयतु भारतम्। जयतु भारतीया संस्कृति:।</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>अगस्त</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3577/%E2%80%9Ccultural-pride-of-devbhoomi%E2%80%9D</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3577/%E2%80%9Ccultural-pride-of-devbhoomi%E2%80%9D</guid>
                <pubDate>Thu, 01 Aug 2024 17:53:49 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/kedar.jpg"                         length="224652"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बवासीर का शत-प्रतिशत समाधान अर्शोग्रिट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">डॉ. अनुराग वार्ष्णेय <br />उपाध्यक्ष- पतंजलि अनुसंधान संस्थान</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3578/arshogrit-is-100--solution-for-piles"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-03/fdg.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">  बवासीर, भगन्दर, पाईल्स, हेमरॉयड एक ऐसी बीमारी है जिसमें रोगी को मल त्याग के समय असहनीय दर्द होता है, और कई बार मल द्वार से खून भी आता है। हेमरॉयड हमारे पाचन तंत्र के सबसे पीछे वाले हिस्से के कुछ ऐसे गद्देदार कुशन हैं, जिनमें खून भरा होता है और वह मल त्याग में मददगार होते हैं। एक मिथक यह भी है कि हेमरॉयड ही एक बीमारी है, परन्तु ऐसा नहीं है। यह हमारे शरीर के वह ऊतक हैं जिनमे सूजन आने पर हेमरॉयडल डिजीज होती है जिसे पाईल्स कहते हैं। इस हेमरॉयडल कोशिकाओं में जब खून आना शुरू हो जाता है तो यह बहुत असहनीय हो जाता है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>रोग के प्रमुख कारण</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">दुनियाभर में इस बीमारी से लगभग 4.5 प्रतिशत लोग प्रभावित हैं जो दिन-रात असहनीय दर्द से गुजरते हैं। इसके प्रमुख कारणों में लम्बे समय तक कब्ज की समस्या बने रहना, मल त्याग के समय ज्यादा दबाव पडऩा, आदि प्रमुख हैं। कुछ अन्य कारणों की वजह से जैसे- भारी सामान उठाना भी अपने आप में इस समस्या को अधिक बढ़ा देता है। इस बीमारी के प्रमुख कारणों में मोटापा, और अधिक वजन उठाना, साथ ही आज-कल के वर्क कल्चर में जहां कर्मचारी बिना ब्रेक के लम्बे समय तक अपने वर्क डेस्क पर बैठे हुए कार्य करते हैं, उन लोगो में भी यह समस्या देखी गई है, वहीं दूसरी ओर सोशल मीडिया के प्रयोग से लम्बे समय तक मल त्याग में समय लगाना भी इस समस्या का कारण हैं। इस रोग में व्यक्ति को मस्से, दर्द, मल त्याग के दौरान असहनीय पीड़ा और खून आना, खुजली जैसी समस्या रहती है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>मॉर्डन चिकित्सा पद्धति में सर्जरी व दर्द निवारक ही उपाय</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">मॉडर्न चिकित्सा पद्धति में इस बीमारी का एक मात्र समाधान सर्जरी है। वहीं दर्द से आराम के लिए गर्म पानी का सेंक और दर्द निवारक ऑइंटमेंट लगाने का परामर्श भी दिया जाता है। खान-पान में बदलाव जैसे अधिक तरल पदार्थों का सेवन, भोजन में डाइटरी फाइबर्स में बढ़ावा, कम तला-भुना सादा भोजन भी इस रोग की पीड़ा को कम करने में सहायक होते हैं।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>चूहों पर अर्शोग्रिट का सफल वैज्ञानिक अनुसंधान</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">पतंजलि द्वारा निर्मित अर्शोग्रिट और पारम्परिक आयुर्वेदिक औषधियों पर उन्नत विश्लेषणात्मक तकनीकों के माध्यम से अध्ययन कर इन औषधियों की प्रभावकारिता ज्ञात करने कि चेष्टा की गई। अर्शोग्रिट और जात्यादि घृत पर किए गए शोध में इन औषधियों में विभिन्न फाइटो कंपाउंड्स के बारे में जानकारी प्राप्त हुई। तत्पश्चात इन-विट्रो तकनीक के माध्यम से इन औषधियों के बारे अन्य आंकलन किए गए। इसके लिए, इस अध्ययन में विस्टर चूहों को विभिन्न समूहों में बाँट कर, पहले उनमें यह बीमारी उत्पन्न की गई, जिसके लिए जमालगोटे के बीज का तेल उनके मलद्वार पर लगाया गया।  तत्पश्चात इनमें से कुछ समूहों को अर्शोग्रिट डोज और जात्यादि घृत की विभिन्न मात्रा का लेपन किया गया, वहीं कुछ समूह को अन्य दवाई दी गई। </h5>
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#FBEEB8;border-color:#FBEEB8;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(251,238,184);">
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>अर्शोग्रिट के आयुर्वेदिक घटक</strong></span></h4>
<p><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/makoy-wonderberry-solanum-b.jpg" alt="makoy-wonderberry-solanum-b" width="700" height="591"></img></strong></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"> <strong>  मॉडर्न चिकित्सा पद्धति के इन अल्प-समाधानों और लोगों को इस बीमारी से मुक्ति के लिए पतंजलि ने भारत के प्राचीनतम विज्ञान और सनातन परम्परा के ऋषि-मुनियों के अद्भुत ज्ञान को आधार बना कर अर्शोग्रिट औषधि का निर्माण किया है। यह औषधि मकोय, एलोवेरा, नागदौना, महुआ, गोखरू, निशोध, वायविडंग आदि अति विशिष्ट जड़ी-बूटियों से निर्मित है।</strong></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><br />सर्वप्रथम, इन चूहों का वजन जांचा गया, जिससे पता चला कि आयुर्वेदिक औषधि वाले समूह के वजन में किसी प्रकार की कोई गिरावट नहीं आई थी, जो इस बात की पुष्टि करता है कि यह औषधियां शरीर पर किसी भी प्रकार का नकारात्मक प्रभाव नहीं डालती। तत्पश्चात इन चूहों के समूह के मलद्वार का आंकलन किया गया। इसमें यह बीमारी अर्शोग्रिट की विभिन्न मात्रा के सेवन से ठीक हुई, जिससे पता चला कि यह आयुर्वेदिक औषधियां, अत्यंत प्रयोग में आने वाले स्टेरॉयड प्रेडीनसोलोन से भी अधिक प्रभावकारी हैं। <br />तत्पश्चात इन समूहों में पैथोलॉजिकल एनालिसिस किया गया और एनोरेक्टल कोफिसिएंट को जांचा गया जोकि शरीर में सूजन को जांचने का एक कोफिसिएंट है। इस अध्ययन में भी इन आयुर्वेदिक औषधियों की प्रभावकारिता, समतुल्य स्टेरॉयड से अधिक पाई गई। इसके बाद शरीर में इन्फ्लैमेशन के बायोमार्कर्स, साइटोकाइन्स टीएनएफ-अल्फा और आईएल-1 बीटा की भी जांच की गई और देखा गया कि यह औषधियां अधिक प्रभावकारी सिद्ध हुई। तत्पश्चात इन चूहों के समूहों की हिस्टोपैथोलॉजी यानि ऊतक की भी जांच की गई, परिणामस्वरूप यह सिद्ध हुआ कि यह आयुर्वेदिक औषधियां डीजनरेटिव कोशिकाओं को फिर से रीजनरेट कर पाने में सक्षम है।  <br />साथ ही इन कोशिकाओं में नेक्रोसिस स्कोर, इन्फ्लेमेशन स्कोर, और अन्य पैरामीटर्स को जांचने के बाद यह निष्कर्ष निकला कि इन आयुर्वेदिक औषधियों ने इन जांचो में भी आशातीत प्रदर्शन किया है।<br />इन सभी अध्ययन से यह सिद्ध हुआ किआयुर्वेदिक औषधियां हर प्रकार के साध्य और असाध्य रोगो को ठीक करने में सक्षम हैं, आवश्यकता है उस ज्ञान को विश्व तक पहुंचाने की। यह पतंजलि का ध्येय है कि भारत की यह प्राचीन धरोहर जनकल्याण के काम आए और विश्व में हमारी सनातनी संस्कृति की ध्वज पताका लहराए। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पतंजलि रिसर्च</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>अगस्त</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3578/arshogrit-is-100--solution-for-piles</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3578/arshogrit-is-100--solution-for-piles</guid>
                <pubDate>Thu, 01 Aug 2024 17:51:49 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/fdg.jpg"                         length="103428"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राजधर्म के 3 आधार </title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:right;">प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज</h5>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3579/3-pillars-of-rajdharma"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-03/mantra-power.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">   भारत वर्ष सनातन काल से हिन्दू राष्ट्र है। परंतु कालप्रवाह वश इसका बहुत बड़ा अंश पापपरायण राजाओं और उनके संरक्षण में पापमूलक विचारों और पैशाचिक कर्मों का अड्डा बन गया है। 15 अगस्त 1947 के बाद इसका जो अंश भारत के रूप में है, वह इसका मर्मभाग और सत्व है। इसमें अभी भी सनातन धर्म के संस्कार भरपूर हैं। कमी केवल ऐसे राज्य की है जो सनातन धर्म को उचित संरक्षण दे। क्योंकि इस क्षेत्र में सनातन धर्म को खतरा केवल दस्युदलों से है। ये दस्युदल भिन्न-भिन्न आवरण लेकर कहीं किसी मजहब की आड़ में, कहीं किसी रिलीजन की आड़ में और कहीं किसी ऑइडियालॉजी की आड़ में दुराचरण और लूट-खसोट तथा नृशंसता का अपना धंधा करते हैं। उसे राजदंड के द्वारा ही नियंत्रित किया जा सकता है। <br />भारत में राजनीति का पर्याय है दंडनीति। वस्तुत: विश्व में भी राज्य का मुख्य बल उसका दंडबल ही है। अंतर इतना है कि भारत में दंड को सदा धर्ममय रखने पर बल दिया गया है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>धर्ममय राजदंड का महत्व</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">रामायण, महाभारत, मानव धर्मशास्त्र, कौटिलीय अर्थशास्त्र, शुक्रनीति आदि में राजनीति और दंडनीति का विस्तार से विवेचन है। महाभारत में भीष्म पितामह शांतिपर्व में युधिष्ठिर से कहते हैं कि ‘सभी विद्यायें राजधर्म से ही पोषित होती हैं और समस्त लोक अर्थात दृश्यमान जीवजगत का परिपालन राजधर्म का अंग है।’अत: हिन्दू राष्ट्र की स्थापना धर्ममय राजदंड के द्वारा ही संभव है। <br />सौभाग्यवश संसद के नये भवन में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने धर्ममय राजदंड (सेंगोल) की प्रतिष्ठा विधि विधान से की है। अत: यदि शासन धर्ममय राजदंड का सम्यक प्रयोग करेगा तो हिन्दू राष्ट्र निश्चित ही सशक्त होगा और विश्व के लिये भी कल्याणकारी सिद्ध होगा। क्योंकि भारत में राजधर्म का अर्थ है सनातन धर्म का रक्षण और पोषण। जो कि सार्वभौम मानवीय मूल्यों का ही रक्षण और पोषण है। इसलिये उसमें विश्व का कल्याण समाहित है। <br />राजधर्म की विवेचना हमारे समस्त धर्मशास्त्रों में है। शुक्राचार्य का कहना है कि धर्म और अधर्म का रक्षण और प्रशिक्षण राजधर्म है और इसीलिये राजा ही युग का प्रवर्तक होता है। यदि किसी राष्ट्र में अधर्म है तो उसके लिये न तो प्रजा दोषी है, न ही युग या काल। राजा ही उसके लिये दोषी है। दंडनीति के द्वारा ही धर्म की स्थापना होती है। <br />महाभारत में शांतिपर्व का कथन है कि ‘दंड के द्वारा ही राष्ट्र को सन्मार्ग पर चलाया जाता है, इसीलिये यह विद्या दंडनीति के नाम से विख्यात है। दंडनीति ही संधि, विग्रह, यान आदि छहों राजनैतिक गुणों का सार है। दंड के द्वारा ही धर्म की प्रतिष्ठा राजा करता है।’<br />चक्रवर्ती सम्राट मान्धाता को इंद्र ने स्वयं कहा था कि ‘हे निष्पाप नरेश, किसी राज्य में दंडनीति का विलोप तभी होता है, जब राजा स्वयं दुष्ट हो। ऐसी स्थिति में राजधर्म की उपेक्षा होती है और सभी प्राणी कर्तव्य और अकर्तव्य का विवेक खोकर अपने-अपने मोह के अनुसार बरसने लगते हैं और काम और क्रोध से प्रेरित होकर कुमार्ग पर चलने लगते हैं।’इस प्रकार दंडनीति का अत्यधिक महत्व है। वस्तुत: राज्य की मुख्य शक्ति दंडबल ही है। दंडबल से कंटक शोधन होता है और राष्ट्र के मार्ग के सारे कंटक सम्यक दंडनीति से दूर होंगे।<br />राजधर्म के पालन के लिये शास्त्रों में तीन बलों का महत्व प्रतिपादित है। ये हैं - ज्ञान बल, प्रभु बल एवं विक्रम बल। महाभारत के आश्रमवासिक पर्व के 7वें अध्याय में महाराज धृतराष्ट्र महाराज युधिष्ठिर को राजधर्म का उपदेश देते हुये इन्हें मंत्रशक्ति, प्रभुशक्ति और उत्साहशक्ति का उपदेश देते हैं। इसके साथ ही वे सैन्यबल, धनबल, मित्रबल, भृत्यबल और श्रेणीबल तथा चारबल (दूतों और गुप्तचरों का बल) का भी संग्रह आवश्यक बताते हैं। विशेषकर मित्रबल और धनबल को सर्वाधिक महत्वपूर्ण बताते हैं। <br />कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में छठे अधिकरण में दूसरे अध्याय में कहा है कि ‘शक्ति से ही सिद्धि होती है। बल का नाम ही शक्ति है और उससे जो आनंदप्रद फ़ल प्राप्त होते हैं, उसे ही सिद्धि कहा जाता है। शक्ति तीन प्रकार की है - ज्ञानबल, प्रभुबल और विक्रमबल।’</h5>
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#F8CAC6;border-color:#F8CAC6;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(248,202,198);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(227,26,165);"><strong>"ज्ञानबल"</strong></span><br /><strong>आगे उन्होंने स्पष्ट किया है कि ज्ञानबल का अर्थ है मंत्रशक्ति। प्रभुबल का अर्थ है कोषबल और दंडबल तथा विक्रम बल का अर्थ है उत्साहशक्ति या उत्साहबल। इनमें भी विक्रम बल या उत्साहबल को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। शासक को सदा महोत्साह से सम्पन्न रहना चाहिये। संधि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय एवं द्वैधीभाव - इन छह: प्रकार के गुणों या उपायों का यथोचित निर्धारण करना ही मंत्रबल या मंत्रशक्ति और ज्ञान बल कहा जाता है। </strong></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#C2E0F4;border-color:#C2E0F4;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(194,224,244);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>"प्रभु-बल"</strong></span><br /><strong>शक्तिशाली सेना और भरा पूरा राजकोष - इन दोनों को मिलाकर प्रभुबल होता है। उत्साहशक्ति ही विक्रमबल है। कौटिल्य के अनुसार इनमें से मंत्रशक्ति या ज्ञानबल सर्वोपरि हैं। प्रभुशक्ति अर्थात सेना और कोष उसके बाद आते हैं तथा शासक का उत्साह सबसे अंत में कौटिल्य ने गिनाया है।</strong></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#BFEDD2;border-color:#BFEDD2;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(191,237,210);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>"विक्रमबल"</strong></span><br /><strong>उत्साह की सर्वाधिक प्रशंसा धर्मशास्त्रों में की गई है क्योंकि उत्साहशक्ति के अभाव में प्रभुबल और ज्ञानबल का भी सम्यक उपयोग नहीं होता। इसीलिये उत्साहशक्ति को ही विक्रम बल कहा गया है। शासक का उत्साह ही उनके विक्रमबल का सूचक भी है और आधार भी। इस विषय में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी का विक्रम बल अद्वितीय है क्योंकि वे सदा महोत्साह से भरे रहते हैं और सेना तथा राज्यतंत्र का भी उत्साहवर्धन करते रहते हैं। यह विक्रमबल ही अनेक पुरूषार्थों की सिद्धि का मूल आधार है। हिन्दू राष्ट्र की सिद्धि में विक्रम बल ही निर्णायक होगा और सौभाग्यवश वह प्रधानमंत्री जी में भरपूर है।</strong> </h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>कंटक शोधन</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">कौटिल्य ने अर्थशास्त्र के चौथे और पांचवे अधिकरण में कंटक शोधन के उपाय विस्तार से बताये हैं। इनमें से पंचम अधिकरण का नाम योगवृत्त है। उसके प्रथम अध्याय में राज्य कर्मचारियों के बीच के कंटकों के कंटकशोधन के उपाय बताये गये हैं। उस प्रथम अध्याय का नाम है ‘दाण्डकर्मिकम्’। <br />चौथे अधिकरण का तो नाम ही है कंटकशोधन। यह पूरा अधिकरण तेरह अध्यायों का है और इसमें तेरहों अध्यायों में कंटकशोधान के विषय में विस्तार से निर्देश दिये गये हैं। वर्तमान में जो भारतीय दंडसंहिता लागू है, उसमें भी यही उपाय थोड़े परिवर्तन के साथ निरूपित हैं। अत: कंटकशोधन में वर्तमान भारतीय दंड सहिंता भी सहायक है, बाधक नहीं है। आवश्यकता विक्रम बल या उत्साहशक्ति के उचित प्रयोग की है। <br />शासन पर सदा ही आपराधिक या विद्रोही तत्व आपत्तियाँ लाते रहते हैं। ये आपत्तियाँ अनेक प्रकार की होती हैं। महाभारत में भी आश्रमवासिक पर्व के सातवें अध्याय में धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर को उन आपत्तियों के विविध प्रकार बताये हैं और साथ ही उनसे निपटने के भी उपाय बताये हैं। उसमें भी सब जगह राजा या शासक के अभ्युदयशील और उत्साहपूर्ण होने पर ही सर्वाधिक बल दिया गया है।<br />ऐसा कोई राज्य नहीं है, जिस पर उसके विरोधी या दस्यु लोग भांति-भांति की आपत्तियाँ न लाते हों। इसलिये भारत में इस समय जो-जो आपत्तियाँ दस्यु दलों के द्वारा उपस्थित की जाती हैं, वे अप्रत्याशित नहीं हैं और उनका आवरण लेकर शासन की शिथिलता का स्पष्टीकरण नहीं हो सकता। इन्हीं आपत्तियों के निवारण और कंटकशोधन के लिये ही राज्य है। विक्रमबल और महोत्साह से सम्पन्न राजा सदा सभी आपत्तियों का शमन करने में समर्थ होता है। राजा कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है। उसके पास राज्य का बल होता है। वह बल इसीलिये समाज द्वारा दिया जाता है कि राजा सदा कंटकशोधन करता रहे। अत: महोत्साह के साथ निरंतर कंटकशोधन प्रमुख राजधर्म है। <br />मंत्रशक्ति या ज्ञानबल के लिये वर्तमान में न केवल अपने देश के विषय में ज्ञान रखना आवश्यक है, अपितु अन्तर्राष्ट्रीय शक्तियों और घटनाक्रमों पर भी उतनी ही पैनी दृष्टि आवश्यक है। क्योंकि वर्तमान में विश्व का हर सशक्त राज्य संसार में जहाँ भी संभव है, वहाँ अपना प्रभाव बढ़ाने और अपने पक्ष में हस्तक्षेप करने के लिये सक्रिय है। इसीलिये राजधर्म को कंटकों से भरा हुआ कहा गया है। यह केवल दक्षता और स्फ़ूर्ति के साथ विकास कार्यों को करने की सामथ्र्य नहीं है अपितु सब प्रकार से कंटकों का शोधन करने की सामथ्र्य ही सर्वोपरि है। इस समय समस्त विश्व की प्रमुख शक्तियों का ज्ञान रखना और उनसे समीकरण स्थापित करना तथा राष्ट्रहित के अनुकूल आवश्यक हस्तक्षेप एवं समायोजन करना अत्यधिक महत्वपूर्ण है। सौभाग्यवश वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी और उनकी टीम इस कार्य हेतु सर्वाधिक समर्थ है। <br />इस प्रकार मंत्रशक्ति, प्रभुशक्ति और उत्साहशक्ति के सम्मिलित प्रयोग के द्वारा भारत की शक्ति को पुन: बाधाओं से मुक्त कर ऊर्जावान बनाया जा सकता है और बनाना चाहिये। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी इस दिशा में अनेक निर्णायक कदम उठा चुके हैं और आशा है कि आगे भी उठायेंगे। <br />इस प्रकार राष्ट्र के कंटकों का शोधन होने के बाद हिन्दू राष्ट्र की सिद्धि सहज ही हो जायेगी।</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>अगस्त</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3579/3-pillars-of-rajdharma</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3579/3-pillars-of-rajdharma</guid>
                <pubDate>Thu, 01 Aug 2024 17:49:49 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/mantra-power.jpg"                         length="345153"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>योग एवं आयुर्वेद</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">वंदना बरनवाल<br />राज्य प्रभारी-महिला पतंजलि योग समिति, उ.प्र.(मध्य)</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3580/yog-and-ayurved"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-03/yoga-and-aayurveda.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">   हम सभी के जीवन को बहुत से कारक प्रभावित करते हैं। हम किस संस्कृति में पले-बढ़े हैं, वह हमारे जीवन को प्रभावित करने वाला बहुत महत्वपूर्ण कारक होता है। प्राय: हम सभ्यता और संस्कृति में भ्रमित होते हैं। संस्कृति एक व्यापक क्षेत्र है और सभ्यता तो संस्कृति का ही एक अंग है। अगर हमारी भौतिक प्रगति सभ्यता से होती है तो मानसिक प्रगति संस्कृति में दिखलाई देती है। संस्कृति एक ऐसा व्यापक क्षेत्र है जिसमें हमारा जीवन जीने का तरीका अहम भूमिका निभाता है। इसी क्रम में जब हम भारतीय संस्कृति की बात करते हैं तो इसमें जो तत्व सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटक बनकर उभरता है, वह है सनातन मूल्य। इस सनातन मूल्य में हमारा पहनावा, खान-पान, भाषा, व्यवहार ही नहीं बल्कि जीवन से लेकर मृत्यु तक हमारी पूरी जीवन शैली शामिल है और इसी में शामिल है योग और आयुर्वेद पर आधारित स्वास्थ्य की अनूठी और अद्भुत भारतीय शैली। भारत की इस संस्कृति पर ना जाने कितनी पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं जिसकी बदौलत प्रकृति और मनुष्य की दोस्ती आज भी बनी हुई है। ऐसे में जब इसी संस्कृति के विज्ञान सम्मत ज्ञान को बढ़ावा देने के लिए किसी विज्ञापन को कानून के फ्रेम में फिट किया जाता है तो उसका अर्थ यही निकलता है कि सनातन मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए अभी और भी प्रयास की आवश्यकता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>आयुर्वेद दवाओं का संग्रह मात्र नहीं </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">हम सभी जानते हैं कि आयुर्वेद हजारों वर्षों से प्रचलित एक चिकित्सा विज्ञान है पर इसे केवल दवाओं का संग्रह मान लेना ज्ञान की अशुद्धता और अपूर्णता को प्रदर्शित करता है। क्योंकि आयुर्वेद तो जीवन जीने का एक तरीका है। जीवन के इस तरीके में चिकित्सा के संग अत्यंत प्राकृतिक रूप से सामाजिक और सांस्कृतिक का सम्मिश्रण भी है। आयुर्वेद न सिर्फ भारत के पारंपरिक ज्ञान का एक जीवित भंडार है जो हर भारतीय के जन्म के साथ ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी विकसित, कायम और हस्तांतरित होता चला आ रहा बल्कि यह हमारे देश की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान का अटूट हिस्सा भी है। आयुर्वेद का पारंपरिक ज्ञान वास्तव में वह ज्ञान है जिसकी जड़ें प्राचीन हैं और जो अक्सर अनौपचारिक और मौखिक ही रहा है। एक ऐसा ज्ञान जो भारत में कभी भी पारंपरिक बौद्धिक संपदा संरक्षण प्रणालियों द्वारा संरक्षित नहीं हुआ। बचपन से दादी-नानी के नुस्खे की बदौलत कब हम सब बड़े हो गये, पता ही नहीं चला। ना कोई अंग्रेजी दवा ना कोई चुभती हुई सुई, अनेकों बीमारियों में रसोई में प्रयोग किये जाने वाले हल्दी, काली मिर्च, मेथी, धनिया, जीरा, सौंफ, हींग, दालचीनी, अजवाइन जैसे मसाले और नीम एवं तुलसी की पत्तियां ही कमाल कर देते थे। पर विडंबना देखिये कि उसी हल्दी और नीम को पेटेंट की कैद से छुड़ाने के लिए भारत ने दशक भर से ज्यादा समय तक लड़ाई लड़ी। क्या आप जानते हैं कि एक बारगी अमेरिका ने तो यह मानने से इनकार ही कर दिया था कि हल्दी भारतीय है। वित्तीय वजहों से नहीं बल्कि देश के गौरव के लिए और भारत के पारंपरिक ज्ञान को सहेजने के लिए हल्दी के लिए लड़ाई लडऩी पड़ी।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>स्वास्थ्य का विज्ञान है आयुर्वेद </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">आयुर्वेद दुनिया की सबसे पुरानी चिकित्सा पद्धति में से एक है जिसका अर्थ ही है ‘जीवन का विज्ञान' और ‘जीवन का ज्ञान’। आयुर्वेदिक चिकित्सा का मुख्य लक्ष्य अच्छे स्वास्थ्य को बढ़ावा देना और बीमारी को रोकना है, लडऩा नहीं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि यह रोग प्रबंधन नहीं बल्कि स्वास्थ्य प्रबंधन की पद्धति है और शायद इसीलिए इस चिकित्सा पद्धति को व्यापक विस्तार मिलना अब भी शेष है। दूसरी तरफ आयुर्वेद के करीब दो हजार वर्ष बाद प्रचलन में आई एलोपैथी प्रयोग और अनुसंधान के दम पर काफी आगे निकल गयी। हालाँकि विगत वर्षों में पारंपरिक और असरदार चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद को आधार और विस्तार देने के लिए पतंजलि योगपीठ ने बड़े पैमाने पर पहल की है जिसके परिणाम स्वरूप आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति का प्रसार हर वर्ग में बढऩे लगा है। उस वर्ग में भी जो इसे केवल जड़ी-बूटी भर समझता था। इस बढ़त से नि:संदेह स्वास्थ्य लाभ तो सबका हुआ पर कुछ लोगों को व्यावसायिक नुकसान भी हुआ और शायद यही कारण है कि आयुर्वेद का जितना विरोध है उससे कई गुना इसे समर्थन प्राप्त है।          </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>खामियां नहीं खूबियाँ गिनें </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">एक बार श्रेष्ठता को लेकर आम और नीम में बहस छिड़ गयी कि श्रेष्ठ कौन। दोनों ही हार मानने के लिए तैयार नहीं थे। अपनी खूबियाँ और दूसरे की खामियां गिनाते गिनाते पूरा दिन बीत गया। परिणाम नहीं निकलता देख दोनों ने तय किया कि मामले में किसी और की राय ली जाये। सामने से एक खुशहाल व्यक्ति आता दिखा। आम और नीम ने अपनी समस्या बताई और उसकी खुशी का राज पूछा तो उसने इसका बहुत ही छोटा सा जवाब दिया, किसी की खामियां नहीं खूबियाँ गिनो। आम और नीम दोनों को मर्म समझ में आ गया और अब दोनों ही एक दूसरे की उपयोगिता का गुणगान कर रहे थे। आम नीम के हर हिस्से को अचूक औषधि बताने में लग गया और नीम आम को फलों का राजा कहकर सम्मानित कर रहा था। शुभ कार्य में पत्तों के वन्दनवार, हवन में लकड़ी के महात्म्य से लेकर खूबियों का गुणगान होता रहा। दोनों ही खुश थे। इसलिए आयुर्वेद हो या एलोपैथ, दोनों ही चिकित्सा पद्धतियों को इस कहानी से सीख लेनी होगी। उन्हें एक दूसरे को कमतर आंकने और खुद को श्रेष्ठ बताने की होड़ से बाहर आना होगा। चिकित्सा पद्धति कोई भी हो उद्देश्य तो बीमार को स्वस्थ करते हुए स्वस्थ और समृद्ध भारत के निर्माण का ही होना चाहिए। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>भ्रम से निकलें बाहर</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">सार तो यही निकलता है कि अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था की तरह ही अंग्रेजी चिकित्सा व्यवस्था यानि एलोपैथ का प्रचार प्रसार ज्यादा है। लिखा-पढ़ी में भी अंग्रेजी शिक्षा की तरह ही अंग्रेजी चिकित्सा की मान्यता ज्यादा है जबकि यदि आयुर्वेद या अन्य किसी भी चिकित्सा पद्धति का अवलोकन करें तो उसमें लोगों को भरोसा बहुत है। इन दोनों स्थितियों के कारण बीमारी से घिर जाने पर समाज में चिकित्सा और चिकित्सकों को लेकर एक भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो चुकी है। इस भ्रम को दूर करने के लिए आकस्मिक चिकित्सा के अतिरिक्त मामलों में परम पूज्य स्वामी जी महाराज ने पूरी प्रमाणिकता के साथ स्थायी समाधान सुझाया ही नहीं बल्कि उपलब्ध भी करवाया है। गत तीन दशकों में पतंजलि द्वारा दिए गए समाधान और वो भी बिना किसी दुष्प्रभाव वाले समाधान ने भारत की चिकित्सा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी बदलाव ला दिया है। इस बदलाव ने जहाँ लोगों को यह भरोसा दिलाया है कि उनकी बीमारी जड़ से ठीक हो सकती है तो वहीं इलाज के नाम पर वर्षों से चली आ रही लूट को पीछे भी धकेला है। यही कारण है कि पूज्य स्वामी जी महाराज श्रद्धेय आचार्यश्री बहुतों की आँखों में किरकिरी बन रहे हैं। फिर भी बदलाव तेजी से हो रहा और इसके दूरगामी परिणाम तो अभी आने बाकी हैं क्योंकि आयुर्वेद पर शोध कार्य लगातार चल रहे हैं और परिणाम अत्यंत उत्साहजनक हैं।</h5>
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#FBEEB8;border-color:#FBEEB8;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(251,238,184);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>स्वस्थ भारत से ही होगा समृद्ध भारत</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>क्या आप जानते हैं कि भारत में हर साल अपनी बीमारी के कारण करीब 7 करोड़ लोगों को गरीबी से जूझना पड़ता है। लोग स्वस्थ हों, इसके लिए देश में चिकित्सा सुविधाएं दुरुस्त होनी चाहिए। पर क्या भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश, जिस पर अपनी 140 करोड़ के आबादी के सेहत का ख्याल रखने की बड़ी जिम्मेदारी है, उसकी चिकित्सा व्यवस्था दुरुस्त है। कोई एक ही प्रकार की पैथी इस पूरी आबादी के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी नहीं ले सकती है और ना ही हर पैथी सबके लिए सुलभ हो सकती है। यदि एलोपैथी की बात करें तो आबादी के बाद से इन सात दशकों में इसकी मदद से हमने बहुत से संक्रामक रोगों पर काबू पाया है। आजादी के बाद भारत को कई महामारियों ने भी अपना शिकार बनाया मगर देश ने उनका डटकर सामना किया और जीत भी हासिल की। पर इस जीत में सभी की हिस्सेदारी थी और इसका एक हालिया उदाहरण कोरोना संक्रमण भी है। पर इन्हीं सात दशकों में स्वास्थ्य सेवा का जो निजीकरण हुआ है, उसको कैसे भुलाया जा सकता है। लोग सरकारी स्वास्थ्य देखभाल की तुलना में एक मरीज को मिलने वाली सुविधाएं जैसे बिस्तर, भोजन की गुणवत्ता, उपचार और यहां तक कि डॉक्टर का चयन जैसी बातों को लेकर निजी अस्पतालों को प्राथमिकता देने लगे। जैसे-जैसे लोगों की जीवन शैली बदलने लगी तो बीमारियाँ भी बढऩे लगीं। बीमारियाँ बढ़ीं तो उसी अनुपात में दवाओं की खपत, फार्मा कम्पनियाँ, अस्पताल और चिकित्सक सब बढ़ गए। परिणामस्वरूप चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में समृद्ध अतीत वाले देश के लिए स्वस्थ भारत समृद्ध भारत का नारा स्वयं में एक चुनौती बन गया।</strong></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>सबका सहयोग आवश्यक है </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">बीमारी के खिलाफ और स्वास्थ्य के लिए युद्ध अकेले किसी एक वर्ग या एक पैथी के द्वारा नहीं लड़ी जा सकती है। यह एक जनयुद्ध है जिसमें पूरी आबादी को स्थायी रूप से लामबंद होना होगा। परम पूज्य स्वामी जी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्यश्री ने हमेशा से यही माना है कि महर्षि धनवंतरी, चरक, सुश्रुत, पतंजलि और उनके जैसे अनेक महर्षियों के अथक प्रयासों के चलते उन्हें इस अमूल्य ज्ञान की प्राप्ति सम्भव हो सकी है। इस ज्ञान से भारत ही नहीं बल्कि पूरा विश्व रोगमुक्त रह सके इसके लिए पतंजलि के चिकित्सा वैज्ञानिकों ने इस ज्ञान की गहराइयों में जाकर इसके मानव शरीर पर इसके प्रभावों का गहन अनुसंधान कर रहे हैं। गुणवत्ता के साथ इस ज्ञान और अनुसंधान के परिणामों को जन जन तक पहुँचाने और इसकी उपयोगिता को बढ़ाने के लिए संसाधनों की आवश्यकता होती ही है और वह नि:शुल्क नहीं मिलती। एक तरफ जहाँ फार्मा इंडस्ट्री अपने बजट का 40 प्रतिशत से अधिक सिर्फ अपनी मार्केटिंग पर खर्च करती है और 10 प्रतिशत भी मूल रिसर्च पर नही लगातीं। ऐसे में पतंजलि आयुर्वेद के अनुसंधान के लिए चुनौती और बड़ी हो जाती है। अत: ज्ञान के इस विज्ञान के विज्ञापन को देश के अंतिम व्यक्ति तक दृढ़ता से पहुँचाना ही होगा। इसलिए सोचना हमें है कि हम सभी ऐतिहासिक कार्य में कैसे सहयोग कर सकते हैं। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>आलोचक नहीं शोधार्थी बनें </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">प्राचीन आयुर्वेदिक चिकित्सकों ने हर औषधि के गुणों और उनका शरीर पर पडऩे वाले प्रभाव का गहराई से अध्ययन किया था और आज भी यह विज्ञान आधुनिक शोधकर्ताओं को शोध करने के नए-नए विषय प्रदान कर रहा है। पैथी कोई भी हो, पर लक्ष्य तो सबका एक ही होना चाहिए, सबको अच्छा स्वास्थ्य। पैथी कोई भी हो पर सबकी अपनी विशेषता है। सभी विज्ञान हैं और उनकी अपनी सीमाएं हैं। मधुमेह और रक्तचाप से विश्व का बड़ा भाग पीडि़त है। इन रोगों को समाप्त करने की दवा नहीं है। पारकिंसन (कम्पन रोग), अवसाद आदि बिमारियों की भी दवा नहीं है। इन्हें संयत करने की दवाइयां आजीवन खानी पड़ती है क्योंकि मस्तिष्क की गतिविधि का बड़ा भाग अज्ञेय है। मानव मस्तिष्क जटिल संरचना है। सुख, दुख, ज्ञान व बुद्धि की अनुभूति मस्तिष्क क्षेत्र की गतिविधि से होती है। सुनते हैं कि प्रार्थना का प्रभाव गहन होता है। अवसाद का जन्म और विकास मस्तिष्क में होता है तो विषाद का भी। सोच उल्लास और प्रसन्नता देते हैं तो इसका उल्टा भी होता है। पर पतंजलि के योग सूत्रों में चित्त की पांच प्रवृत्तियों को ही सुख-दुख का कारण बताया गया है। इसलिए आज आवश्यकता है कि हम आलोचक नहीं शोधार्थी बनें। पतंजलि योगपीठ के दवारा निरंतर अनुसंधान से भारत का प्राचीन ज्ञान फिलहाल आधुनिक हो रहा है। आपको इसकी गति धीमी लग सकती है पर विज्ञान की दूसरी धाराओं की तरह भारतीय चिकित्सा की प्राचीन पद्धति में निरंतर शोध जारी है और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों से निबटने के लिए इसमें कई तरह के प्रयोग हो रहे हैं, आवश्यकता है धैर्य और विश्वास को बनाये रखने की।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>एलोपैथी बनाम आयुर्वेद नहीं </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">ज्ञान के विज्ञान का विज्ञापन एलोपैथी बनाम आयुर्वेद करने या किसी को बरगलाने के लिए नहीं है बल्कि यह तो रोगों के विरुद्ध एक संत के संघर्ष की गाथा है। इस संघर्ष का उद्देश ना तो किसी की किसी से तुलना करना है और ना ही श्रेष्ठता और अश्रेष्ठता की लड़ाई लडऩा है। यह किसी के छोटा होने या किसी को छोटा साबित करने का उद्देश्य लिए हुए भी नहीं है। इसका तो बस एक ही उद्देश्य है, सभी स्वस्थ हों और शरीर से बीमारियाँ जड़ से मिट जाएँ। एलोपैथी को मानने वाले लोग भी यह जानते हैं कि इसमें जो दवाएं दी जाती हैं वो बीमारी के स्रोत को ठीक करने के लिए नहीं बल्कि बीमारी को दूर करने के लिए होती हैं। भले ही इसके लिए शरीर में टेबलेट, कैप्सूल और सुइयों के माध्यम से रासायनिक बमबारी और उथल-पुथल क्यों ना मचानी पड़े। जबकि आयुर्वेद में इलाज के नियम पूरी तरह से अलग हैं। इसमें रोग से लडऩे की बजाए उसके विरुद्ध शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने का प्रयास ज्यादा होता है। ताकि रोग के कारण से लडऩे की बजाय शरीर को प्राकृतिक रूप से स्वस्थ रखा जा सके। कोशिश यही होती है कि शरीर स्वयं ही अपनी ऊर्जाओं का प्रयोग कर बीमारी ठीक कर ले। शरीर द्वारा अपनी ही ऊर्जा से स्वस्थ होने की इस तकनीक को आयुर्वेद में ‘स्वभावोपरमवाद' भी कहा जाता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>एक मौका हम सभी के लिए </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">आयुर्वेद ही नहीं बल्कि योग भी ‘स्वभावोपरमवाद’में ही विश्वास करता है और इन दोनों की ही मान्यता है कि प्रकृति ही स्वभाव है विकृति नहीं। अत: मनुष्य स्वभावत: ही विकृति से उबर कर प्रकृति या स्वास्थ्य की ओर अग्रसर होता है। चिकित्सा तो केवल सहायक मात्र है। योग प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा शरीर के सभी अंगों, तंत्रों को अपने तरीकों द्वारा स्वस्थ बना के रखता है। इसीलिए आजकल चिकित्सा के क्षेत्र में यह भी अहम भूमिका निभा रहा है। यहाँ तक कि अब तो एलोपैथी चिकित्सक भी योगाभ्यास करने का परामर्श देते हैं। परम पूज्य गुरुवर ने हम सभी को योग की इस विधा में निपुण बनाकर स्वस्थ भारत के निर्माण के लिए सेवा का एक मौका दिया है, योग सेवा के माध्यम से स्वास्थ्य सेवा। आइये! गुरु द्वारा प्रदत्त स्वास्थ्य के इस ज्ञान, विज्ञान को हम सभी योग शिक्षक, शिक्षिका मिलकर योग और आयुर्वेद के ज्ञान को हर घर-आँगन तक स्वयं लेकर जाएँ। पूज्य स्वामी जी के अथक प्रयासों से जन-जागरण तो वैसे भी हो ही चुका है, लोग स्वास्थ्य का अर्थ समझने लगे हैं और स्वयं ही योग और आयुर्वेद का विज्ञापन भी कर रहे हैं। 21 जून को विश्व योग दिवस के रूप में पूरी दुनिया ने देखा, हमको और आपको तो गुरु की कृपा से बस श्रेय लेना है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>अगस्त</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3580/yog-and-ayurved</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3580/yog-and-ayurved</guid>
                <pubDate>Thu, 01 Aug 2024 17:48:49 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/yoga-and-aayurveda.jpg"                         length="171356"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>महाभारत सर्वगुण सम्पन्न</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">प्रो. कुसुमलता केडिया</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3582/tales-of-the-conquest-of-the-earth-by-great-dynasties"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-03/untitled.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">    जब हम महाभारत पढ़ते हैं, तो प्रथम अध्याय में ही हम भारत के उन महान और सर्वगुण सम्पन्न राजवंशों के विषय में संक्षिप्त जानकारी प्राप्त करते हैं, जिन्होंने अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्रों के द्वारा धर्मयुद्ध से पृथ्वी पर विजय प्राप्त की थी। महाभारत की संपूर्ण कथा अपनी संरचना में ही पूर्ण प्रामाणिक दिखती है और इसलिये कुछ मूर्ख अथवा दुष्ट लोगों द्वारा उसकी प्रामाणिकता को संदिग्ध बताने वाली चर्चा हमारे लिये अप्रासंगिक है। क्योंकि ये लोग मुख्यत: या तो ईसाइयत से प्रेरित लोग होते हैं या इस्लाम के नाम पर कभी भी कुरान और हदीस का पालन नहीं करते हुये स्वयं को मुस्लिम कहने वाले मुनाफिकीन होते हैं या फिर इन दोनों के अनुगत होते हैं। अत: उनके उछाले गये जुमलों पर चर्चा महाभारत के संदर्भ में पूरी तरह विषयान्तर होगी। हमारी दृष्टि में महाभारत एक पूर्णत: प्रामाणिक इतिहास ग्रंथ है। जो कि उसे सदा से कहा जाता रहा है। <br />प्रथम अध्याय में बताया गया है कि युद्ध की समाप्ति के बाद जब केवल कौरव पक्ष के तीन लोग तथा पाण्डव पक्ष के सात लोग ही युद्ध से बचे हैं, तब महाविलाप करते हुये धृतराष्ट्र को सांत्वना देने के लिये सूतपुत्र संजय कहते हैं कि हे राजन, आपने विधिवत् राज्य संबंधी शिक्षा प्राप्त की है तथा देवर्षि नारद और महर्षि वेदव्यास के मुख से भारत के महान उत्साह सम्पन्न, महाबलवान राजाओं का चरित्र सुना है। वे सर्वसदुगुण सम्पन्न महान राजा और सम्राट दिव्य अस्त्र-शस्त्रों के द्वारा धर्मयुद्ध से पृथ्वी पर विजय प्राप्त कर यशस्वी हुये और फिर काल के गाल में समा गये। अत: काल महाबलवान है और उससे कोई नहीं बच पाता। इसके बाद वे 24 ऐसे महान राजाओं का वर्णन करते हैं जो उसके पूर्व भारत में यशस्वी हो चुके थे तथा इसके बाद साठ और ऐसे ही प्रतापी सम्राटों का वर्णन करते हुये तथा अंत में यह स्मरण दिलाते हुये कि ऐसे ही अन्य असंख्य राजा भारत वर्ष में होते रहे हैं जो बड़े बुद्धिमान और शक्तिशाली हुये परंतु वे सब भी विपुल वैभव भोग कर निधन को प्राप्त हुये। यहां दो बातें महत्वपूर्ण हैं। पहली यह कि राजाओं की संख्या गिनाते समय वे उनकी संख्या पद्मों में बताते हैं। दस हजार करोड़ का एक पद्म होता है। इससे ध्यान आता है कि हमारे यहां गणना की लघुतम से लेकर विराटतम इकाइयां तक अतिप्राचीन काल से सामान्य गणित का अंग रही हैं, जबकि यूरोप में मिलियन, बिलियन और ट्रिलियन के आगे गति नहीं रही है। <br />दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रथम 24 महान सम्राटों में महारथी सम्राट शैव्य से लेकर रन्तिदेव, काक्षीवान, बाह्लीक, शर्याति, नल, विश्वामित्र, अम्बरीष, मरूत, मनु, इक्ष्वाकु, गय, चक्रवर्ती सम्राट भरत, श्रीराम, भगीरथ, कृतवीर्य, जनमेजय और ययाति का वर्णन है। जिन्होंने समस्त पृथ्वी को यज्ञ के खंभों से अंकित कर दिया था। इन 24 में इक्ष्वाकु वंश के स्वयं इक्ष्वाकु, भगवान श्रीराम और भगीरथ ही उल्लिखित हैं। इससे पहता चलता है कि रघुवंश के सैकड़ों सम्राटों का यहां तक कि स्वयं रघु का उल्लेख इस सूची में करने योग्य नहीं माना है। इससे स्पष्ट होता है कि यह कितनी विरल सूची है। रघु, ककुत्स्थ, युवनाश्व, सगर आदि का उल्लेख अगली सूची में है जो इन 24 के बाद गिनाई गई है। उसमें सम्राट पुरू, कुरू, वीतिहोत्र, वेन आदि का भी उल्लेख है। सूची से स्पष्ट है कि ये नाम अत्यन्त प्राचीन काल से प्रसिद्ध राजाओं में से ही छाटें गये हैं। यह भी कहा गया है कि अन्य हजारों प्रतापी राजाओं का वर्णन सैकड़ों बार किया गया है। जो यह स्मरण दिलाता है कि भारत में इतिहास ग्रंथों की अत्यन्त प्राचीन परंपरा रही है और यह भी कि यह दुनिया का सबसे बड़ा लिक्खाड़ समाज है। यूरोपीय ईसाइयों ने अपने यहां की ‘ओरल ट्रेडिशन’को यहां भी आरोपित कर दिया और उनसे प्रभावित लोग उसका अनुवाद कर वाचिक परंपरा की बात दोहराने लगे। परंतु सत्य यह है कि प्राचीनतम काल से भारत में सभी अनुशासनों में लेखन की विराट पंरपरा रही है। <br />महाभारत के आदिपर्व को पढ़ते हुये ही एक अन्य महत्वपूर्ण बात सामने आती है कि अपने महान राजाओं और राजपुरूषों तथा वीरों के श्रेष्ठ गुणों और गौरव को भुलाना अनुचित है। यहां इस संदर्भ में हम तीन ऐसी विभूतियों का उल्लेख करेंगे जो प्रथम पर्व में ही उल्लेखित हैं। धृतराष्ट्र, युधिष्ठिर और भीम। <br />सर्वप्रथम तो स्वयं धृतराष्ट्र की बात करते हैं। प्रथम अध्याय में ही सूतपुत्र उग्रश्रवा जी बताते हैं कि गंगापुत्र भीष्म पितामह की आज्ञा से और अपनी माँ सत्यवती की आज्ञा से शक्तिशाली और धर्मात्मा श्री कृष्ण द्वैपायन व्यास जी ने विचीत्रवीर्य की पत्नियों तथा दासी से तीन अग्नियों के समान तेजस्वी तीन कुरूवंशी पुत्र पैदा किये - धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर। महर्षि वेदव्यास का एक भी शब्द निरर्थक या निराधार नहीं है। अत: जब वे स्वयं इन्हें अग्नि के समान तेजस्वी कह रहे हैं तो उस शब्द का महत्व असंदिग्ध है।  <br />महाभारत से स्पष्ट होता है कि धृतराष्ट्र बहुत नीतिमान, बुद्धिमान, राजनीतिशास्त्र के ज्ञाता, अत्यन्त गंभीर और प्रज्ञाचक्षु हैं। उन्हें जिन महत्वपूर्ण घटनाओं के समय ही यह आभास होता रहा था कि पाण्डव पक्ष की जीत सुनिश्चित है और हमारे पुत्रों की हार निश्चित है, उनमें से अनेक का उल्लेख उन्होंने स्वयं किया है। स्पष्ट है कि वे नीतिज्ञ और घटनाओं के आधार पर संभावित परिणामों के आँकलन में समर्थ दूरदर्शी सम्राट हैं, परन्तु पुत्र के प्रति स्वाभाविक मोह से बंधे हैं क्योंकि स्वयं के नेत्रहीन होने के कारण राज्याभिषेक में प्राथमिकता नहीं मिलने का दंश उनके भीतर है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि राजोचित बुद्धिमत्ता, ज्ञान और विवेक की उनमें कोई कमी है। कई बार कालप्रवाहवश बड़े बुद्धिमान भी इस प्रकार मोह में फंस जाते हैं, इतना ही उनकी कथा से पता चलता है। वे कोई पुत्रमोह में अंधे साधारण व्यक्ति नहीं हैं और उन्हेें इस तरह देखना मूढ़ों के द्वारा किये गये प्रचार से प्रभावित होना है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>गुप्तचर सेवाओं का महत्व प्राचीनतम काल से</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">धृतराष्ट्र जिन घटनाओं से आगामी परिणामों का सही अनुमान कर लेते हैं उनमें से कुछ महत्वपूर्ण हैं। यथा, वे कहते हैं कि ‘जब मैंने सुना कि विराट की राजधानी में पांचों पांडव द्रौपदी सहित निवास कर रहे थे और हमारे सारे गुप्तचर उनका कोई पता नहीं लगा पाये थे, तभी मैंने अपनी विजय को असंभव मान लिया था। जब मैंने सुना कि द्रौपदी से कीचक द्वारा किये गये अनुचित व्यवहार का बदला भीमसेन ने कीचक को सौ भाईयों सहित मार कर लिया, तभी मैंने विजय की समस्त आशायें त्याग दीं। गायों के हरण के लिये गये हमारे पक्ष के श्रेष्ठ महारथियों और हमारे पुत्रों को धनंजय ने अकेले ही हरा दिया तभी से मुझे विजय की कोई आशा नहीं रही। <br />इससे पता चलता है कि ‘इंटेलिजेंस’सेवाओं का महत्व उस समय भी कितना अधिक था और ‘इंटेलिजेंस' की विफलता पराजय का कारण बनती है। यदि हम यूरोप के दोनों महायुद्धों का विवरण पढ़ें तो पता चलता है कि सोवियत संघ, अमेरिका, जापान, फ्रांस और इंग्लैंड तथा जर्मनी सभी के ‘इंटेलिजेंस’ सेवाओं की उसमें कितनी बड़ी भूमिका रही है और स्वयं भारत की भी ‘इंटेलिजेंस’सेवाओं ने उन युद्धों में निर्णायक भूमिका निभाई थी। <br />यह अत्यंत दुखद तथ्य है कि कांग्रेस ने योजना पूर्वक ‘इंटेलिजेंस’सेवाओं को कमजोर किया। बाद में इंदिरा गांधी जी ने अपनी आवश्यकता के कारण ‘इंटेलिजेंस’सेवा में कुछ महत्वपूर्ण दक्षता लाने का प्रयास किया परंतु फिर विशेषकर सोनिया गांधी-मनमोहन सिंह के समय भारत के ‘इंटेलिजेंस’ को बुरी तरह तोड़ा गया। जिसका विवरण हमें महत्वपूर्ण गुप्तचर अधिकारी श्री मणि की पुस्तक ‘दि सैफ्रन टेरर' (भगवा आतंक) में पढऩे को मिलता है। <br />यही कारण है कि हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ‘इंटेलिजेंस’सेवाओं को पुन: सुदृढ़ करने की ओर गंभीर हैं। हमारे पास श्री अजीत डोभाल जैसे अनेक श्रेष्ठ गुप्तचर हैं जो राज्य की महत्वपूर्ण सेवा करते हैं। इनकी उपेक्षा राष्ट्र को कमजोर करती है। संतोष की बात है कि मोदी जी और अमित शाह इस पक्ष में पूर्णत: सजग हैं। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>राजा के आत्मसंयम का महत्व</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">इसी प्रकार वे कहते हैं कि ‘जिस दिन मैंने सुना कि मत्स्यराज विराट ने अपनी प्रिय एवं सम्मानित पुत्री उत्तरा को अर्जुन को देना चाहा परंतु उत्तरा को शिक्षा देने वाले अर्जुन ने गुरू शिष्य परंपरा का मान रखते हुए उत्तरा को अपनी पुत्री जैसा मानकर उसे अपने पुत्र अभिमन्यु के लिये स्वीकार किया, तभी ऐसे विवेकवान और संयमी अर्जुन के बारे में जानकर मुझे पाण्डवों की विजय सुनिश्चित लगने लगी। इससे पुन: स्पष्ट होता है कि विवेक और संयम का महत्व तथा परंपरा के सम्मान का अर्थ धृतराष्ट्र अच्छी तरह जानते थे। वस्तुत: क्षुद्रता और चालाकी से छोटे-मोटे ‘बैटिल्स’(लड़ाइयां) भले ही जीत लिये जायें, परन्तु ‘वॉर’(युद्ध) में विजय तो नैतिक बल और चरित्र तथा सदाचरण से प्राप्त बल द्वारा ही संभव है। भारत में आये दिन क्षुद्र चालाकियों और दांवपेचों को कृष्णनीति कहने या बताने वाले क्षुद्र लोग कभी भी बड़े पुरूषार्थ नहीं कर सकते। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>शांतिवार्ता का निरादर राजनैतिक विफलता है</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">इसी प्रकार धृतराष्ट्र गिनाते हैं कि जब स्वयं श्रीकृष्ण लोक कल्याण के लिये शांति की इच्छा से हमारे यहां आये और शांति संधि का प्रयास किया, परंतु असफल रहे और लौट गये, तभी मैंने विजय की आशा छोड़ दी थी। शांति प्रस्तावों का कितना महत्व है और उस समय सही ढंग से वार्ता न कर पाना कितना बड़ी विफलता है, यह धृतराष्ट्र जानते हैं। इससे पुष्ट होता है कि धृतराष्ट्र महाबुद्धिमान, नीतिज्ञ और प्रज्ञाचक्षु हैं। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>काल और बुद्धि में विरोध नहीं</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">इसी प्रकार यूरोपीय कहानियों और फिल्मों के प्रभाव से लोगों में यह छवि फैली है कि दस हजार हाथियों का बल रखने वाले और गदा युद्ध में अद्वितीय कुशल महान योद्धा भीमसेन बलवान तो बहुत हैं परंतु वे उतने बुद्धिमान नहीं हैं। ऐसा इसलिये क्योंकि यूरोप में किसी समय यह मान्यता फैल गई कि जिसमें शरीर बल है, उसमें बुद्धिबल कम होता है और ब्रिटिश काल में कुशिक्षा द्वारा यही बात भारत में भी फैला दी गई। परंतु महाभारत में आदि पर्व के प्रथम अध्याय में 125वे श्लोक में लिखा है कि राष्ट्र की सम्पूर्ण प्रजा भीमसेन की धृति से बहुत प्रसन्न होती थी। पाद टिप्पणी में बताया गया है कि अपनी इच्छा के अनुकूल और प्रतिकूल पदार्थों की प्राप्ति होने पर चित्त में विकार ना होना ही ‘धृति’ है। यह बहुत बड़ा गुण है। वाल्मीकि रामायण में हम भगवान श्रीराम के इस गुण का वर्णन पाते हैं कि वे राज्याभिषेक की सूचना प्राप्त होने पर भी शांत रहे और वनवास जाने का पिता का आदेश पाकर भी शांत ही रहे, उनका चित्त तनिक भी म्लान नहीं हुआ। इससे स्पष्ट है कि ‘धृति’बहुत बड़ा गुण है और आंतरिक बोध तथा संयम से ही संभव है। अत: स्पष्ट है कि भीम जितने बलवान हैं, उतने ही बुद्धिमान हैं और संयमी हैं। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>युधिष्ठिर की बुद्धिमत्ता बेजो</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">इसी प्रकार, धारावाहिकों में तथा फिल्मों में और समकालीन कहानियों आदि में युधिष्ठिर को कुछ मूर्खतापूर्ण सरलता और धर्म का विवेकनिरपेक्ष आग्रह रखने वाला व्यक्ति दिखलाया जाता है। परंतु महाभारत बतलाता है कि राष्ट्र की प्रजा युधिष्ठिर के शौचाचार से सदा प्रसन्न होती थी। साथ ही सब लोग पांडवों के शौर्य गुण से संतोष का अनुभव करते थे। बलवान शत्रु को पराजित कर देने का अध्यवसाय ही ‘शौर्य’है। शौचाचार को हम लोग सामान्यत: आंतरिक और बाहरी स्वच्छता के ही अर्थ में लेते हैं। परंतु महाभारत में प्रथम अध्याय के 125वें श्लोक की टिप्पणी में बताया गया है कि शास्त्रोक्त आचार का परित्याग न करना, सदाचारी सत्पुरूषों का संग करना और सदाचार में दृढ़ता से स्थित रहना - इसको ‘शौच’कहते हैं। <br />युधिष्ठिर की परम बुद्धिमत्ता तथा सदाचार में दृढ़ता से स्थित रहने और शास्त्रोक्त आचार का परित्याग ना करने का एक बहुत बड़ा साक्ष्य हम महाभारत के भीष्म पर्व में 43वें अध्याय में पाते हैं, जब गीता की धर्मविवेचना के उपरांत अर्जुन धनुष बाण धारण कर रथारूढ़ होकर सिंहनाद करते हैं और दोनों ओर से शंख, भेरियां, पेश्य वाद्य, क्रकच और नरसिंघा बज उठते हैं और चारों ओर महान शब्द गूंजने लगता है, उसके बाद महाराज युधिष्ठिर अपने कवच खोलकर और अपने आयुधों को रथ में नीचे डालकर रथ से उतरकर पैदल ही हाथ जोड़े पितामह भीष्म की ओर चल पड़ते हैं। सभी पाण्डव और स्वयं योगेश्वर कृष्ण उनके पीछे-पीछे जाते हैं। भाई लोग प्रश्न करते हैं कि आप इस प्रकार शत्रु सेना की ओर क्यों जा रहे हैं परंतु वे उन्हें उत्तर ना देकर चुपचाप चलते जाते हैं और भगवान कृष्ण हंसते हैं कि वे क्यों जा रहे हैं यह मुझे ज्ञात है, वे पितामह भीष्म और आचार्यों से तथा मामाजी से आज्ञा लेकर शत्रुओं के साथ युद्ध करेंगे क्योंकि यही प्राचीन परंपरा है और ऐसा ना करने वाला माननीय लोगों की दृष्टि में गिर जाता है। जबकि इस विषय में भी शास्त्र की आज्ञा मानने वाले योद्धा की विजय अवश्य होती है। <br />सभी कौरव चकित होकर युधिष्ठिर को ताकते रहते हैं और कई लोग उन्हें कायर मानकर उन्हें कुलकलंक आदि भी कहते हैं, परंतु वे सीधे पितामह भीष्म के सामने जाकर दोनों हाथों से उनके चरण दबाते हैं। फिर हाथ जोडक़र उनसे उनके ही साथ युद्ध की आज्ञा मांगते हैं और विजय का आशीर्वाद मांगते हैं। पितामह भीष्म कहते हैं कि हे पृथ्वीपति, भरतकुलनंदन महाराज, यदि तुम युद्ध के समय इस प्रकार मेरे पास नहीं आते तो मैं तुम्हें पराजित होने का शाप देता, परंतु अब मैं प्रसन्न हूँ, आज्ञा देता हूँ और विजय का आशीर्वाद देता हूँ। युधिष्ठिर हाथ जोडक़र कहते हैं कि हे महाबाहु, आप सदा मेरे हितैषाी रहे हैं और कौरवों के लिये युद्ध करें, मुझे सही सलाह देते रहें। इसके उपरांत वे पितामह द्वारा और आग्रह करने पर सीधे उनकी पराजय का उपाय पूछ लेते हैं। जब पितामह कहते हैं कि मैं अपराजेय हूँ तो वे उनसे शत्रुओं द्वारा मारे जाने का उपाय ही पूछ लेते हैं। जो पितामह उस समय नहीं बताते। बाद में बताने कहते हैं। <br />इसी प्रकार युधिष्ठिर आचार्य द्रोण के पास जाते उन्हें प्रणाम कर उन गुरूदेव की देवता रूप में परिक्रमा करते हैं और तब उनसे अपने हित की बात पूछते हैं। द्रोणाचार्य भी वही कहते हैं कि यदि तुम युद्ध का निश्चय करने के बाद, मेरे पास नहीं आते तो मैं निश्चय ही पराजय का शाप देता। परंतु अब तुमने मेरा आदर किया है, मेरी पूजा की है अत: मैं संतुष्ट हूं और आज्ञा देता हूँ कि तुम लड़ो और विजय प्राप्त करो। युधिष्ठिर उनसे भी अंत में उनके वध का उपाय पूछ लेते हैं और वे बता भी देते हैं। इसी प्रकार वे आचार्य कृप के पास जाते हैं और उनकी भी हाथ जोडक़र परिक्रमा करते हैं तथा युद्ध की अनुमति और विजय का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और आगे कुछ बोल नहीं पाते तो कृपाचार्य स्वयं बताते हैं कि राजन, मैं अवध्य हूँ जाओ, युद्ध करो और विजय प्राप्त करो, मैं शुभकामना करता हूँ। <br />अपने मामा शल्य का भी वे इसी प्रकार सम्मान करते हैं और उनसे भी विजय का आशीर्वाद मांगते हैं। जब वे विजय का आशीर्वाद देकर और अपेक्षित सहयोग के विषय में पूछते हैं तो युधिष्ठिर यह मांगते हैं कि जब कर्ण का अर्जुन से युद्ध हो, उस समय आप कर्ण का उत्साह ना बढ़ायें अपितु उसका तेजोवध करें। मामा यह आशीर्वाद दे देते हैं।<br />इस प्रकार संग्राम के प्रारंभ में ही स्थिर और संतुलित बुद्धि से तथा जाग्रत विवेकपूर्वक वे इतने महत्वपूर्ण कार्य संपादित करते हैं जो और किसी को उस समय सूझता ही नहीं। इस तरह शास्त्र विधि में सदा सजग रहकर संलग्न रहना और तदनुकूल आचरण में दृढ़ रहना ही सदाचार और शौचाचार है। जिसमें युधिष्ठिर सबसे आगे हैं। इस तरह हमें इन दिनों सामान्य अर्थ में प्रचलित महत्वपूर्ण शब्दों के गंभीर अर्थ महाभारत को पढऩे से ज्ञात होते हैं। <br />इसी प्रकार नकुल और सहदेव की गुरूशुश्रुषा, क्षमाशीलता और विनय से प्रजा प्रसन्न रहती है, यह बात आदिपर्व के प्रथम अध्याय में कही गई है। गीताप्रेस गोरखपुर के संस्करण में पादटिप्पणी में बताया गया है कि सद्वृत्त की अनुवृत्ति ही ‘शुश्रुषा’है। किसी के द्वारा अपराध हो जाये तो भी उसके प्रति चित्त में विकार का ना होना अर्थात् चित्त का शांत और स्वस्थ रहना ही क्षमाशीलता है। स्पष्ट है कि किये गये अपराध के लिये वांछित न्यूनतम दंड तो देना ही होगा। क्योंकि न्याय के लिये यह आवश्यक है। परंतु दंड देते समय चित्त का शांत और स्वस्थ रहना ही क्षमाशीलता है। स्पष्ट है कि इन दिनों जो दुर्दान्त अपराधियों और आतंकवादियों को राष्ट्रपति के द्वारा दंडमुक्त कर दिया जाता है, वह हमारे शास्त्रों की दृष्टि में क्षमाशीलता नहीं है। वह तो ईसाई राजनीति का विमूढ़ अनुकरण मात्र है। क्षमाशीलता का शास्त्रीय अर्थ इससे नितान्त भिन्न है और उसी अर्थ में नकुल और सहदेव क्षमाशील हैं। इसी प्रकार जितेन्द्रिय रहना और उद्धत नहीं होना ही विनय है। किसी नरम व्यवहार या नरमी दिखाने वाले बाहरी व्यवहार के दिखावे को शास्त्रों में विनय नहीं कहा गया है। इस अध्याय में इस प्रसंग में अर्जुन के विम से समस्त प्रजा को प्रसन्न होते कहा गया है। विक्रम का अर्थ पादटिप्पणी में बताया गया है कि सबसे बढक़र सामथ्र्य का होना ही विक्रम है। इन सब गुणों का वर्णन करने वाला श्लोक भी वहीं पर उद्धत है। <br />इस प्रकार अपने महान वीरों और महापुरूषों के गुणों का सही-सही स्मरण, चिंतन और मनन ही कर्तव्य है। इन दिनों हमारे महापुरूषों और इतिहास की महान घटनाओं के विषय में जिस प्रकार हल्के भावों के साथ सामान्य विशेषणों का प्रयोग कर दिया जाता है अथवा उनका हल्का चित्रण किया जाता है, वह  सर्वथा दोषपूर्ण है। इस दोष की पराकाष्ठा हमें समकालीन लेखन में धृतराष्ट्र, युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन का चित्रण हल्के ढंग से किये जाने में दिखती है। धृतराष्ट्र को पुत्रमोह में आसक्त कोई सामान्य राजा, युधिष्ठिर को सामान्य धर्मभीरू, भीम को उद्धत पहलवान और अर्जुन को महाभारत युद्ध से डर जाने वाला व्यक्ति बताना भयंकर दोष है। यह प्रज्ञापराध है। इसी प्रज्ञापराध वाली बुद्धि से महाभारत को मात्र दो भाईयों की आपसी लड़ाई की तरह देखा और बताया जाता है और अर्जुन को अपने परिजनों की हत्या होने से डर गया व्यक्ति बताया जाता है। यह इन घटनाओं और इन महापुरूषों की विराटता को ना देख पाने की बौद्धिक दीनता का लक्षण है। जबकि इन्हें सम्यक रूप से देखने पर चित्त की गहराई और विराटता का, उत्साह और सत्यनिष्ठा का तथा बुद्धिमत्ता का उन्मेष होता है।</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>अगस्त</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3582/tales-of-the-conquest-of-the-earth-by-great-dynasties</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3582/tales-of-the-conquest-of-the-earth-by-great-dynasties</guid>
                <pubDate>Thu, 01 Aug 2024 17:47:49 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/untitled.jpg"                         length="162713"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>स्वास्थ्य समाचार</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><strong>मेडिटेरेनियन डाइट में दुग्ध उत्पाद शामिल, अंडा-मीट-प्रोसेस्ड फूड से परहेज...इसके कई लाभ</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>फल-सब्जियां खाने से महिलाओं में मृत्यु का जोखिम कम</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">महिलाओं में मेडिटेरेनियन डाइट मृत्यु का जोखिम कम कर सकती है। एक नवीन चिकित्सा अध्ययन के मुताबिक, स्वास्थ्य के लिए इसे अच्छा माना जाता है। पौधा आधारित इस आहार में फल-सब्जियां ज्यादा खाई जाती हैं और दुग्ध उत्पाद, अंडा-मीट व प्रोसेस्ड फूड से परहेज किया जाता है। इसमें चीनी या नमक का इस्तेमाल भी बहुत कम होता है। लंबे समय तक इसका सेवन कई तरह के स्वास्थ्य जोखिमों को कम करता है। 25 हजार से भी ज्यादा अमेरिकी महिलाओं</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><h5 style="text-align:justify;"><strong>मेडिटेरेनियन डाइट में दुग्ध उत्पाद शामिल, अंडा-मीट-प्रोसेस्ड फूड से परहेज...इसके कई लाभ</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>फल-सब्जियां खाने से महिलाओं में मृत्यु का जोखिम कम</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">महिलाओं में मेडिटेरेनियन डाइट मृत्यु का जोखिम कम कर सकती है। एक नवीन चिकित्सा अध्ययन के मुताबिक, स्वास्थ्य के लिए इसे अच्छा माना जाता है। पौधा आधारित इस आहार में फल-सब्जियां ज्यादा खाई जाती हैं और दुग्ध उत्पाद, अंडा-मीट व प्रोसेस्ड फूड से परहेज किया जाता है। इसमें चीनी या नमक का इस्तेमाल भी बहुत कम होता है। लंबे समय तक इसका सेवन कई तरह के स्वास्थ्य जोखिमों को कम करता है। 25 हजार से भी ज्यादा अमेरिकी महिलाओं पर हुए अध्ययन में पता चला है कि मेडिटेरेनियन डाइट का सेवन करने वाली महिलाओं में समय से पहले मृत्यु के जोखिम में 23 फीसदी तक गिरावट लाई जा सकती है। यह आहार कोलेस्ट्रॉल, मोटापा और इंसुलिन प्रतिरोध के साथ-साथ मधुमेह और हृदय रोग सहित चयापचय संबंधी बीमारियों का जोखिम भी कम करता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>आहार में मेवा साबुत अनाज भी</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">शोधकर्ताओं के मुताबिक, मेडिटेरेनियन डाइट में फल-सब्जियों की भूमिका काफी अहम है। इसमें मेवा, साबुत अनाज और फलियां शामिल हैं। इसके अलावा स्प्राउट्स, पालक, फूलगोभी, गाजर, प्याज, टमाटर, ब्रोकोली, खीरा, नींबू, मशरूम, सरसों के अलावा फलों में अनार, केला, सेब, संतरा, अंजीर, खरबूजा, तरबूज, नाशपाती, बेरीज, स्ट्रॉबेरी, लीची का सेवन किया जा सकता है। साबुत अनाज में मक्का, होल वीट, ब्राउन राइस, राई, ओट्स शामिल हैं।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>हर तरह से स्वास्थ्य के लिए लाभकारी</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">अमेरिकी शोधकर्ता प्रो. शफकत अहमद ने बताया कि इस अध्ययन में 45 वर्ष की महिलाओं से जानकारियां एकत्रित की गईं। उनसे वजन, ऊंचाई और बॉडी मास इंडेक्स के साथ-साथ अपनी जीवनशैली, चिकित्सा और सामाजिक इतिहास के बारे में जानकारी ली गई। इस बीच उनका रक्तचाप भी मापा गया। शोधकर्ताओं ने लिपिड और इंसुलिन प्रतिरोध सहित चयापचय के 30 से अधिक बायोमार्कर का मूल्यांकन किया। इन सभी के विश्लेषण के आधार पर शोधकर्ताओं ने स्वीकार किया कि मेडिटेरेनियन डाइट महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए काफी बेहतर है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>स्तन कैंसर, मधुमेह से बचाने में भी संभव</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">हाल ही में मेडिटेरेनियन डाइट को लेकर एक और अध्ययन सामने आया, जिसमें पता चला है कि इसे लेने स्तन कैंसर, मधुमेह के साथ साथ मेमोरी लॉस जैसी गंभीर स्थितियों से बचा जा सकता है। पिछले कुछ समय से मेडिटेरेनियन डाइट ने दुनियाभर में काफी चर्चाएं बटोरी हैं। इस आहार को डॉक्टरों ने भी मान्यता दी है और अब तक अलग-अलग चिकित्सा अध्ययनों में इसके प्रभावों का वैज्ञानिक तौर पर पहचान भी हुई है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>साभार : अमर उजाला</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">https://www.amarujala.com/india-news/study-eating-fruitsand-<br />vegetables-reduces-the-risk-of-death-in-women-2024-<br />06-04?pageId=3</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>रोजाना एक ग्राम ज्यादा नमक से एक्जिमा का खतरा, दिन में दो ग्राम सोडियम पर्याप्त</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>ज्यादा नमक खाने से कई तरह के स्वास्थ्य जोखिम पैदा हो सकते हैं, जिनमें से एक एक्जिमा भी है।</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">अमेरिका के सान फ्रांसिस्को स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के अध्ययन के अनुसार, हर दिन अनुशंसित मात्रा से एक ग्राम अतिरिक्त सोडियम खाने से एक्जिमा का जोखिम 22 फीसदी तक बढ़ सकता है, जो शुष्क और खुजली वाली त्वचा की सूजन संबंधी स्थिति है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो एक दिन में दो ग्राम से कम सोडियम का सेवन करना चाहिए। वहीं, ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा के अनुसार यह मात्रा अधिकतम 2.3 ग्राम है। भारत की बात करें तो भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद का मानना है कि एक दिन में अधिकतम दो ग्राम तक सोडियम का सेवन करना चाहिए जो लगभग पांच ग्राम नमक से प्राप्त हो सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि त्वचा में मौजूद सोडियम ऑटोइम्यून और क्रोनिक सूजन संबंधी स्थितियों से जुड़ा है, जिसमें एक्जिमा भी शामिल है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>दो लाख से अधिक लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">अध्ययन में शोधकर्ताओं ने यूके बायोबैंक से लिए 2,15,000 से अधिक लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण किया है। इनमें उनके यूरिन सैंपल और मेडिकल रिकॉर्ड शामिल थे। इन सबकी आयु 30 से 70 वर्ष के बीच थी। इनके यूरिन नमूनों से पता चला कि वे कितने नमक का सेवन कर रहे थे।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>फास्ट फूड बच्चों और किशोरों के लिए खतरनाक</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">शोधकर्ताओं के मुताबिक, फास्ट फूड का लगातार सेवन बच्चों और किशोरों में एक्जिमा की आशंका और गंभीरता को बढ़ा सकता है। इनमें बहुत अधिक मात्रा में सोडियम होता है। पिछले कुछ वर्षों से विकसित देशों में एक्जिमा की समस्या बेहद आम होती जा रही है। अमेरिका में तो हर 10वां व्यक्ति इस बीमारी का शिकार है।<br />दुनियाभर में 30 लाख से ज्यादा लोगों को मार रहा ज्यादा सोडियम खाने में अतिरिक्त सोडियम से रक्तचाप और हृदय संबंधी रोगों का खतरा भी बढ़ रहा है। दुनियाभर में गैर-संचारी रोगों के कारण होने वाली करीब 32 फीसदी मौतों के लिए हृदय संबंधी रोग जिम्मेदार हैं। इसके साथ ही जरूरत से ज्यादा मात्रा में सो डियम का सेवन मोटापा, किडनी संबंधी रोगों और गैस्ट्रिक कैंसर से भी जुड़ा है। हर साल जरूरत से ज्यादा सोडियम का सेवन करने से दुनिया में 30 लाख से ज्यादा लोगों की जान जा रही है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>साभार : अमर उजाला</strong></span><br />https://www.amarujala.com/india-news/study-finds-eatingone-<br />gram-more-salt-than-recommended-amount-each-dayincreases-<br />eczema-risk-2024-06-13</h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>एक यूनिट ब्लड तीन लोगों की जान बचा सकता है</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>रक्तदान से हार्ट अटैक का खतरा ८८% तक घटता है, इम्यूनिटी सुधरती है, कैंसर का जोखिम भी कम होता है</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">देश में हर दिन करीब 12 हजार लोगों की मौत समय पर ब्लड न मिल पाने के कारण हो जाती है और ब्लड की यह कमी होती है रक्तदान से जुड़ी जानकारी के अभाव और भ्रमों के कारण रक्तदान न करने से। भारत सरकार के अनुसार हर साल लगभग १५ लाख यूनिट की जरूरत होती है जबकि केवल ११ लाख यूनिट रक्त ही उपलब्ध हो पाता है। यानी लगभग ४ लाख यूनिट रक्त की कमी कर साल होती है। विभिन्न शोध बताते हैं कि रक्तदान करने से न केवल रक्त पाने वाले की जान बचती है बल्कि रक्त देने वाले को भी कई फायदे होते हैं। एक शोध के अनुसार नियमित रक्तदान करने वाले लोगों में हार्ट अटैक का खतरा ८८ प्रतिशत कम हो जाता है। इसके अलावा ऑक्सफोर्ड एकेडमिक के अनुसार नियमित रक्तदान करने से पेट, गले, फेफड़े और आंतों के कैंसर का खतरा भी कम होता है। इससे लिवर सेहतमंद रहता है, जिससे शरीर डिटॉक्स होता है। इससे इम्यूनिटी बढ़ती है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>रक्त का गाढ़ापन कम होता है, इससे दिल को फायदा होता है</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">नियमित रूप से ब्लड डोनेशन का दिल की सेहत पर बेहद अच्छा असर होता है। यह ब्लड प्रेशर कम करता है, जिससे हार्ट अटैक का खतरा घटता है। कोलंबिया यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर के अनुसार यदि आपका हीमोग्लोबिन ज्यादा है तो ब्लड डोनेशन से रक्त का गाढ़ापन कम होता है। रक्त के अधिक गाढ़ा होने से उसका थक्का जमने का खतरा बढ़ता है। इससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ता है।<br />रक्तदान के 24 घंटे बाद शरीर प्लाज्मा की भरपाई कर लेता है<br />रक्त में दो तरह के कंपोनेंट होते हैं। पहला है प्लाज्मा और दूसरा है सेल्युलर कंपोनेंट। सेल्युलर कंपोनेंट में रक्त कणिकाएँ आती हैं। इसमें प्लाज्मा की भरपाई लगभग २४ घंटे में हो जाती है। वहीं सेल्युलर कंपोनेंट जैसे कि लाल रक्त कणिकाएँ, सफेद रक्त कणिकाएँ आदि की पूरी तरह से भरपाई में ४ से ८ सप्ताह का समय लगता है। इसीलिए रक्तदान करने वालों को कम से कम तीन महीने का गैप रखने के लिए कहा जाता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>डायबिटीज और थॉयराइड है तो भी कर सकते हैं रक्तदान</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">कई बार बीमारी से ग्रसित होने पर हम रक्तदान से कतराते हैं, लेकिन सरकारी गाइडलाइन के अनुसार डायबिटीज, थॉयराइड और यूरिक एसिड जैसी लाइफ स्टाइल बीमारी से पीडि़त लोग भी रक्तदान कर सकते हैं बशर्ते डायबिटीज पीडि़त इंसुलिन न ले रहा हो, केवल गोली ले रहा हो। पिछले चार महीने से दवाइयों में बदलाव न किया हो और शुगर नियंत्रित हो। ऐसे ही यदि आप थायराइड पीडि़त हैं, लेकिन यह पूरी तरह नियंत्रित है तो ब्लड डोनेट कर सकते हैं। ऐसे ही यूरिक एसिड की समस्या से पीडि़त भी ब्लड डोनेट कर सकता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><br /><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>ऐसे इस्तेमाल होता है दान किया रक्त</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">4% प्रसव के दौरान उपयोग, १२त्न ऑर्थोपेडिक ट्रामा और अन्य, 13% दिल, किडनी से जुड़ी बीमारियों में, 18% सर्जरी के दौरान खर्च होता है, १९त्न एनीमिया के मरीजों पर तथा 34% कैंसर, ब्लड के मरीजों में।</h5>
<h5 style="text-align:justify;">साभार : दैनिक भास्कर</h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>स्वास्थ्य समाचार</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>अगस्त</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3583/health-news</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3583/health-news</guid>
                <pubDate>Thu, 01 Aug 2024 17:45:49 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>योग एवं आयुर्वेद एक समग्र चिकित्सा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">डॉ. रीना अग्रवाल, (हिंदी वैज्ञानिक-बी)<br />पतंजलि हर्बल अनुसंधान हरिद्वार, उत्तराखंड</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3584/yoga-and-ayurveda-are-a-holistic-medicine"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-03/yoga-and-aayurveda.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">   योग शब्द <strong>‘युजसमाधौ’आत्मनेपदीदिवादिगणीय</strong> धातु में ‘घं’प्रत्यय लगाने से बना है। ‘योग’शब्द का अर्थ समाधि अर्थात चित्त वृत्तियों को वश में करने से है। ‘योग’शब्द संस्कृत मूल ‘युज’से लिया गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘जोडऩा’‘जुडऩा’या ‘एकजुट होना’है। योग शास्त्रों के अनुसार योगाभ्यास व्यक्तिगत चेतना को सार्वभौमिक चेतना से जोड़ता है, जो तन, मन, व्यक्ति और प्रकृति के बीच पूर्ण सामंजस्य स्थापित करता है। योग शारीरिक व्यायाम, शारीरिक मुद्रा (आसन), ध्यान, सांस लेने की प्रविधि एवं व्यायाम को जोड़ता है। इसका अर्थ ‘योग’या भौतिकता का स्वयं से आध्यात्मिक के साथ मिलन है। योग मन के उतार-चढ़ाव (चित्त वृत्ति) का निग्रह (वश में) करता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>योग के ज्ञान का विकास</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">योग की उत्पत्ति हजारों वर्षों पूर्व हमारे देश में ही हुई थी जो आज भी भारतीय संस्कृति से अद्भुत एवं अटूट रूप से जुड़ी है। योग दर्शन के जनक महर्षि पतंजलि ने लगभग 500 ईसा पूर्व योग सूत्र लिखे थे। इन सूत्रों को योग पर आधिकारिक ग्रंथ माना जाता है। इसके आठ अंगों की रूपरेखा इस प्रकार है- यम (सामाजिक नैतिकता),  नियम (व्यक्तिगत नैतिकता), आसन (मुद्राएँ), प्राणायाम (श्वास क्रिया), प्रत्याहार (इंद्रियों को वापस खींचना),  धारणा (एकाग्र ध्यान), ध्यान (ध्यान) और समाधि (स्वयं के साथ विलय)। भारतीय संस्कृति में भगवान शिव को आदि योगी और आदि गुरु के रूप में ध्यान और कलाओं का संरक्षक देवता माना जाता है। सूर्य देवता कौन हैं! सूर्य को बार-बार प्रणाम करते हुए इतना कह सकते हैं कि विश्व की सभी सभ्यताओं में सूर्य का स्थान सदैव ही पूजनीय रहा है। भगवद्गीता ने योग सूत्रों को सरल बनाया, श्रीकृष्ण और अर्जुन ने अपने संवाद के माध्यम से उनका और विस्तार किया। इस आदान-प्रदान से योग के तीन पृथक प्रकारों पर चर्चा की गई- क्रिया योग (कर्म योग), ज्ञान योग (ज्ञान योग)और भक्ति योग (भक्ति योग)।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>आयुर्वेदिक ज्ञान का विकास</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">आयुर्वेद जीवन का विज्ञान है जो लाभ-हानि और सुख-दुख के साथ जीवन के लिए क्या अच्छा और क्या बुरा है इसका माप है। आयुर्वेद के रचयिता महर्षि धन्वंतरि को आयुर्वेद के जनक और देवत्व के रूप में स्थापित किया गया है। 000-700 ईसा पूर्व के मध्य, आयुर्वेद आठ शाखाओं में इस प्रकार विकसित हुआ- आंतरिक चिकित्सा (कायाचिकित्सा), सर्जरी (शल्य तंत्र), नेत्र, कर्ण, नासिका और ग्रीवा के रोग (शालाक्य तंत्र), बाल चिकित्सा (कौमारभृत्य), विष विज्ञान (अगद तंत्र), मनोचिकित्सा (भूत विद्या), कायाकल्प (रसायन) और यौन जीवन शक्ति (वाजीकरण)। इसके अलावाउस समय दो विद्यालय ‘धन्वंतरि स्कूल ऑफ़ सर्जन’और ‘आत्रेय स्कूल ऑफ़ फिज़ि़शियन’भी बनाए गए।<br />आयुर्वेदिक योग चिकित्सा एक मन-शरीर-आत्मा दृष्टिकोण है जो संवेदनाओं-भावनाओं को दबाने के बजाय उनसे जुडऩे में सहायता करता है। आयुर्वेद से मिलता जुलता शब्द आयुर्विज्ञान, विज्ञान की वह शाखा है जिसका संबंध मानव शरीर को निरोगी रखने, रोग से मुक्त करने अथवा शमन करने और आयु बढ़ाने से है। आयुर्वेद, तंदुरुस्ती मन, शरीर, आत्मा और पर्यावरण के मध्य एक नाजुक संतुलन पर निर्भर करती है। आयुर्वेद का लक्ष्य अच्छे स्वास्थ्य में वृद्धि और व्याधियों से लडऩा नहीं बल्कि उन्हें रोकना है। आयुर्वेद का मूल आधार अथर्ववेद है। अथर्ववेद में आयुर्वेद से संबंधित विषयों का वर्णन है जिनमें मुख्य ‘वैद्य के गुण, कर्म या भिषज, भैषज्य, बाजीकरण, दीर्घायुष्य, रोगनाशक विभिन्न मणियाँ, प्राण चिकित्सा, शल्य चिकित्सा, वशीकरण, सूर्य चिकित्सा, जल चिकित्सा तथा विविध औषधियों के नाम आदि उपलब्ध हैं।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>वैदिक चिकित्सा</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">चरक, सुश्रुत और वाग्भट्ट जैसे आयुर्वेदिक ग्रंथों में ‘चिकित्सा या उपचार से संबंधित क्षेत्र’नाम से खंड सम्मिलित हैं। उनके निदान से संबंधित खंड और शरीर स्थान, ‘देहधारी आत्मा से संबंधित खंड’जैसे पूरक क्षेत्र हैं जिनमें भौतिक शरीर की संरचना और शरीर विज्ञान शामिल है। हमारे देहधारी स्वभाव (शरीर, मस्तिष्क और आत्मा) और यह कैसे कार्य करता है, संक्रमण के कारण और बीमारी का उपचार का आयुर्वेदिक दृष्टिकोण स्वास्थ्य और आदर्श कल्याण की एक उत्कृष्ट और अद्भुत प्रणाली में पूर्ण रूप से जुड़ा हुआ है। आयुर्वेद चिकित्सा में आहार एवं जड़ी-बूटियों का प्रयोग करके आयुर्वेदिक दवाएँ, सर्जरी, शरीर क्रिया और पंचकर्म जैसी असाधारण नैदानिक विधियाँ हैं। यह तन और मन दोनों के उपचार के लिए अनुष्ठान, मंत्र और ध्यान प्रदान करता है। इसके अलावा यह स्वास्थ्य, जीवन-काल और बीमारी से बचने के लिए जीवन-शैली के निर्देश, तन और मन के कायाकल्प के लिए असाधारण प्रक्रियाएँ भी प्रदान करता है। यह आसन व प्राणायाम से मंत्र और ध्यान तक योग के कार्यों को अपने स्वास्थ्य लाभ के प्रमुख पहलू के रूप में शामिल करता है। प्राणायाम आयुर्वेद के दोषों या जैविक हास्य (वात, पित्त और कफ) को प्रभावित करता है। प्राणायाम श्वसन संचार और तंत्रिका तंत्र की स्थितियों के उपचार में कारगर है। इनके माध्यम से शारीरिक एवं मानसिक स्थितियों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>आयुर्वेद का अर्थ जीवन का ज्ञान </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">सुखी व स्वस्थ रहने के लिए यह आवश्यक है कि शरीर में कोई व्याधि एवं विकार न हो,यदि कोई व्याधि एवं विकार हो भी जाए तो उसे शीघ्र दूर कर लिया जाए। आयुर्वेद का लक्ष्य उचित पेय, आहार और जीवन-शैली के साथ-साथ हर्बल चिकित्सा के द्वारा तन, मन और चेतना में संतुलन बनाकर व्याधि की रोकथाम व उपचार करना है। आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों के अनुसार ब्रह्मांड पाँच तत्वों यथा; अंतरिक्ष, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी से मिलकर बना है। ये तत्व प्रत्येक वस्तु में हैं जो तीन ऊर्जा बनाते हैं- वात (अंतरिक्ष और वायु), पित्त (अग्नि और जल) और कफ (जल और पृथ्वी। आयुर्वेद में 'तुलसी के पौधे’को अतुलनीय पवित्र जड़ी-बूटी माना गया है। विविध गुणों से भरपूर होने के कारण इसे ‘आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों की रानी’ कहा जाता है। यह एक ऐसा पौधा है जिसके पत्ते, तना, मंजरी एवं जड़ सबका प्रयोग आयुर्वेदिक औषधि के रूप में होता है। अश्वगंधा को ‘आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों का राजा’ माना जाता है। आयुर्वेदाचार्य अश्वगंधा को लगभग 3,000 से अधिक वर्षों से कई तरह के शारीरिक-मानसिक रोगों के उपचार के लिए प्रयोग करते आ रहें हैं। पाचन तंत्र संबंधित रोग इस प्रकार हैं- श्वसन तंत्र, नेत्र रोग, कर्ण रोग, मुख रोग, त्वचा रोग, ज्वर और यौन रोग। विभिन्न रोगों से संबंधित अधिकांश चिकित्सा-उपचार अथर्ववेद में उपलब्ध होते हैं। ‘चरक संहिता’आयुर्वेद की एक प्रसिद्ध पुस्तक है इसके लेखक अग्निवेश हैं। इस प्रकार आयुर्वेद का अर्थ जीवन का ज्ञान है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>योग और आयुर्वेद का प्रारंभिक इतिहास</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">वेद, प्राचीन ग्रंथ संस्कृत में रचित हैं। कहा जाता है कि इन्हें हज़ारों वर्ष पूर्व मान्यता मिली थीं। ये कविताओं एवं भजनों का एक संग्रह हैं जो मूल रूप से मौखिक परंपरा के माध्यम से पारित किए गए थे। अंतत: 1500 ईसा पूर्व-500 ईसवी के आसपास लिखे गए थे। आज चार वैदिक ग्रंथ ज्ञात हैं- ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद। इनमें से प्रत्येक वेद विशिष्ट विषयों या उपवेदों पर केंद्रित है। आयुर्वेद और योग दोनों की उत्पत्ति का पता ऋग्वेद से लगाया जा सकता है। ऋग्वेद चिकित्सा के विषय में बात करता है, अथर्ववेद में आयुर्वेद से संबंधित अधिकांश चिकित्सा शामिल हैं। योग के मुख्यक प्रकार हैं, कर्म योग- जहाँ हम शरीर का उपयोग करते हैं, भक्ति योग- जहाँ हम भावनाओं का उपयोग करते हैं, ज्ञान योग- जहाँ हम मन और बुद्धि का उपयोग करते हैं और क्रिया योग- जहाँ हम ऊर्जा का उपयोग करते हैं।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>योग और आयुर्वेद का प्रसार</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">19वीं सदी में योग को पश्चिम में प्रस्तुत किया गया था। इसका श्रेय स्वामी विवेकानंद को दिया जा सकता है जिन्होंने अमेरिका में योग दर्शन को आगे बढ़ाते हुए व्याख्यान एवं विभिन्न शिक्षण केंद्र स्थापित किए। परमहंस योगानंद (योगी की आत्मकथा के लेखक) ने 1920 के दशक में अपने व्याख्यान, केंद्र और लेखन के माध्यम से पश्चिम में योग के विस्तार में योगदान दिया। भारत में कृष्णमाचार्य ने शारीरिक अभ्यास या आसनों पर ध्यान केंद्रित करते हुए हठ योग को लोकप्रिय बनाया, जिसके परिणामस्वरूप वर्तमान में हम जिस तरह का योगाभ्यास देखते हैं वह आज प्रमुख बन गया है। भारत का इतिहास मुगल आक्रमणों और ब्रिटिश उपनिवेशवाद से भरा पड़ा है। अंग्रेजों ने भारतीय चिकित्सा विज्ञान के आयुर्वेद को दबाकर, 1833 में सभी आयुर्वेदिक कॉलेजों पर प्रतिबंध लगा दिया था। परिणामस्वरूप विभिन्न परंपराएँ, पद्धतियाँ एवं ज्ञान के भंडार नष्ट हो गए। 1947 में औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के बाद आयुर्वेद को भारत सरकार द्वारा पुनर्जीवित और मानकीकृत किया गया।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>आयुर्वेद और योग, समग्र दृष्टिकोण </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">इस क्षेत्र में हुए अध्ययनों से पता चलता है कि आयुर्वेदिक घटक ऑस्टियोअर्थराइटिस से पीडि़तों की कार्यक्षमता में वृद्धि करते हैं। टाइप-2 मधुमेह से पीडि़तों में लक्षणों को प्रबंधित करने में मदद करती हैं। व्यक्ति हॉर्मोन्स के असंतुलन के कारण भी अक्सर बीमार रहता है इसके पीछे अधिक तनाव, थायरॉइड, प्रेग्नेंसी, मोनोपॉज के अलावा अन्य कारण भी हो सकते हैं। अधिक दवाओं के सेवन से हार्मोन असंतुलित हो जाते हैं। फलस्वरूप रात्रि प्रहर में सात से आठ घंटे की आरामदायक निद्रा, तनाव से बचने के उपाय, प्रतिदिन शारीरिक रूप से सक्रियता, सकारात्मक सामाजिक संबंध, प्रकृति के सानिध्य में रहना, माइंडफुलनेस का अभ्यास, तंबाकू-मादक पदार्थों एवं अतिरेत व्यवहार से बचना आदि सम्मिलित है। आज हमारे समक्ष कई बड़ी चुनौतियों में से एक बड़ी चुनौती महंगी चिकित्सा और उनके लिए वहनीय शुल्क की व्यवस्था न हो पाना है। आयुर्वेद और योगाभ्यास सकारात्मक और समग्र दृष्टिकोण से जीवन निर्वाह करने में सहायक है। अत: हम तनाव मुक्त शरीर और मन पा सकते हैं जिससे लंबी आयु सुनिश्चित होती है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>निष्कर्ष</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि भारतीय संस्कृति अनेक विशेषताओं से समृद्ध है जो आज भी संपूर्ण भारतीय समाज को उच्चतम मूल्यों-आदर्शों की चेतना प्रदान करती है। आज योग और आयुर्वेद को पुन: एकीकृत किया जा रहा है ताकि पूर्ण उपचार और आध्यात्मिक दृष्टिकोण प्राप्त किया जा सके। योग और आयुर्वेद दोनों का अंतिम लक्ष्य जीवन को स्वस्थ और संतुलित करना है। हम स्वस्थ तब होते हैं जब हमारा तन, मन और आत्मा एक साथ होते हैं, एकाग्र होते हैं और पर्यावरण में पूर्ण सामंजस्य स्थापित करते हैं।<br />अत: योग और आयुर्वेद का यह पुन: जुड़ाव आधुनिक चिकित्सा के साथ वास्तविक आदान-प्रदान का आधार प्रदान करेगा जो विशिष्ट उपचारों को संबोधित करेगा, बीमारी के वास्तविक कारणों एवं समाज में स्वास्थ्य और समृद्धि को बनाए रखने के तरीकों को भी संबोधित करेगा।</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>अगस्त</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3584/yoga-and-ayurveda-are-a-holistic-medicine</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3584/yoga-and-ayurveda-are-a-holistic-medicine</guid>
                <pubDate>Thu, 01 Aug 2024 17:42:49 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/yoga-and-aayurveda.jpg"                         length="171356"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        