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                <title>सितम्बर - योग संदेश</title>
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                <title>शाश्वत प्रज्ञा</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>जीवन का सत्य</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>1.  पराविद्या-</strong> मनुष्य जब ईश्वरीय सामथ्र्य अर्थात् प्रकृति या परमेश्वर प्रदत्त शक्तियों का पूरा उपयोग कर लेता है तो भगवान् उसे अतीन्द्रिय शक्ति, परविद्या या पारमार्थिक शक्तियों से जिसे शास्त्र में ऋषि सिद्धि कहते हैं इनसे भी युक्त कर देता है। यदि हमने मानवीय सामर्थ्य का ही पूरा उपयोग नहीं किया तो फिर हमें अतीन्द्रिय शक्तियों की आवश्यकता ही नहीं है। जितना व्यवहारिक जगत सत्य है उससे अनंत गुणा पारमार्थिक तत्त्व भी सत्य नहीं परम सत्य है या सनातन शाश्वत सत्य है। इन भौतिक व पारमार्थिक सत्यों में संतुलन या इनकी सम्यक् समझ या बोध या अनुभूति</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3594/eternal-truth"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-03/7.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>जीवन का सत्य</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>1.  पराविद्या-</strong> मनुष्य जब ईश्वरीय सामथ्र्य अर्थात् प्रकृति या परमेश्वर प्रदत्त शक्तियों का पूरा उपयोग कर लेता है तो भगवान् उसे अतीन्द्रिय शक्ति, परविद्या या पारमार्थिक शक्तियों से जिसे शास्त्र में ऋषि सिद्धि कहते हैं इनसे भी युक्त कर देता है। यदि हमने मानवीय सामर्थ्य का ही पूरा उपयोग नहीं किया तो फिर हमें अतीन्द्रिय शक्तियों की आवश्यकता ही नहीं है। जितना व्यवहारिक जगत सत्य है उससे अनंत गुणा पारमार्थिक तत्त्व भी सत्य नहीं परम सत्य है या सनातन शाश्वत सत्य है। इन भौतिक व पारमार्थिक सत्यों में संतुलन या इनकी सम्यक् समझ या बोध या अनुभूति दुर्लभ है। गुरु कृपा या भगवत अनुग्रह से ही ये सब संभव है। निष्कर्ष यही है कि आप अपना 100% पुरुषार्थ कीजिये तो गुरु, भगवान् व प्रकृति के विधान के अनुरूप आपका 100% शुभ या मंगल ही होगा।<br /><strong>2.  पुरुषार्थ चतुष्टय- </strong>धर्म माने धारणीय या कर्तव्य तत्व, अर्थ अर्थात् धर्म से अर्जित सामर्थ्य, काम माने धर्म व अर्थ से अर्जित सामर्थ्य से सत्य या विवेकपूर्ण कामनाओं या संकल्पों की पूर्ति, मोक्ष अर्थात् धर्मार्थ व काम की पूर्णता से पूर्णतृप्ति, पूर्णसंतोष, अशुभ का पूर्ण परित्याग व शुभ में पूर्ण प्रतिष्ठा।<br />    जीवन के चारों सत्यों की प्राप्ति का एक मात्र साधन है पुरुषार्थ की पराकाष्ठा व प्रमाद का पूर्णत्याग। अत: जो भी जीवन में आप भी इन सनातन शाश्वत तत्त्वों या सत्यों का सिद्ध करना चाहते हैं तो आज से पूर्ण पुरुषार्थ करने का व्रत लीजिये।</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शाश्वत प्रज्ञा</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>सितम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Sep 2024 17:59:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>2000  वर्ष के पूर्व के आयुर्वेद और वर्तमान समय के आयुर्वेद की कड़ी को जोडऩे का माध्यम है</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">आचार्य बालकृष्ण</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3595/it-is-a-medium-to-connect-ayurveda-of-2000-years-ago-with-ayurveda-of-present-time"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-03/whatsapp-image-2024-08-15-a.jpg" alt=""></a><br /><table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#C2E0F4;border-color:#C2E0F4;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(194,224,244);">
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>प्राचीन शास्त्रों में दोषों के आधार पर अनेक रोगों का वर्णन है परन्तु वर्तमान समय में उनमें से लगभग 234 रोग ही उपलब्ध हैं </strong></h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>‘सौमित्रेयनिदानम्’ को शरीर संरचना के आधार पर 14 खण्डों में विभाजित करते हुए 6821 श्लोकों में 471 मुख्य व्याधियों सहित लगभग 500 व्याधियों का सचित्र वर्णन किया गया है।</strong></h5>
</li>
</ul>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;">  आयुर्वेद शाश्वत है, अनादि है किंतु लगभग 2000 वर्ष पूर्व आयुर्वेद काल, समय, स्थिति के कारण पिछड़ गया था। पिछले 2000 वर्ष के पूर्व के आयुर्वेद और वर्तमान समय के आयुर्वेद की कड़ी को जोडऩे का कार्य ‘सौमित्रेयनिदानम्’ के माध्यम से किया गया है और हम गौरवशाली हैं कि इस कार्य में हम सहभागी बने हैं। सौमित्रेयनिदानम् शास्त्रीय शैली में लिखा प्रमाणिक ग्रंथ है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>आयुर्वेद सर्वाधिक प्राचीनतम चिकित्सा विधा</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">आयुर्वेद सर्वाधिक प्राचीनतम चिकित्सा विधा है किंतु यह सिद्ध करने के लिए दुनिया की सभी विधाओं पर अनुसंधान करने की आवश्यकता है। आयुर्वेद में हम मुख्य रूप से चरक, सुश्रुत व धनवंतरि आदि महर्षियों को प्रणेता मानते हैं, इसी प्रकार अन्य चिकित्सा पद्धतियों में भी कोई न कोई प्रणेता अवश्य रहा है। उनके समय, काल का अध्ययन कर तथ्य व प्रमाणों के आधार पर वैश्विक इतिहास को एक जगह रखकर हम सिद्ध कर पाएँगे कि वास्तव में आयुर्वेद ही सर्वाधिक प्राचीन, वैज्ञानिक व प्रामाणिक चिकित्सा पद्धति है। कथन से नहीं, शास्त्र से नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व के इतिहास से भी हम प्रामाणिक हैं इसका प्रमाण भी पतंजलि के माध्यम से ही सिद्ध होगा। हमारे पूर्वजों ने आयुर्वेद के रूप में हमें ज्ञान का अनुपम उपहार दिया है जिसमें हमें निरंतर शोध व तकनीक की सहायता से अभिवृद्धि करनी है। उनके ज्ञान-विज्ञान को आधुनिक विज्ञान व शोध के माध्यम से कसौटी पर कसकर संसार में पनप रहे नए रोगों की पहचान कर उनके स्वरूप, लक्षण व निदान सचित्र प्रस्तुत करना एक दुर्गम कार्य था जिसे पतंजलि रिसर्च फाउण्डेशन के वैज्ञानिकों ने कड़ी मेहनत व अथक पुरुषार्थ से सफल बनाया है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span style="color:rgb(35,111,161);">अनुपलब्ध व्याधियों को एक स्थान पर नूतन रूप में स्थापित करने का प्रयास है ‘सौमित्रेयनिदानम्’</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">यद्यपि प्राचीन शास्त्रों में दोषों के आधार पर अनेक रोगों का वर्णन है परन्तु वर्तमान समय में उनमें से लगभग 234 रोग ही उपलब्ध हैं। अर्वाचीन युग में दृश्यमान आयुर्वेद में वर्णित व्याधियों के अतिरिक्त प्राचीन ग्रन्थों में पृथक्-पृथक् रूप से जिनका विशेष वर्णन जो अभी तक अनुपलब्ध था, उन सबको प्रामाणिकता के साथ एक स्थान पर नूतन रूप में स्थापित करने का प्रयास ही ‘सौमित्रेयनिदानम्’ है। ग्रन्थ को शरीर संरचना के आधार पर 14 खण्डों में विभाजित करते हुए 6821 श्लोकों में 471 मुख्य व्याधियों सहित लगभग 500 व्याधियों का सचित्र वर्णन किया गया है। साथ ही ग्रन्थ के माध्यम से आयुर्वेद की परम्परा में प्रथम बार 2500 से भी अधिक चिकित्सकीय अवस्थाओं (Clinical Conditions) का वर्णन किया गया है। सौमित्रेयनिदानम् के अंग्रेजी रूपान्तरण में श्लोक, श्लोकों की फोनेटिक्स और अंग्रेजी में विषय प्रस्तुति की गई है। साथ ही ग्रन्थ का अंग्रेजी भाषा में रूपान्तरण भी कराया गया है। यह ग्रन्थ आयुर्वेद के चिकित्सकों, विद्यार्थियों व शोधार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी ग्रन्थ साबित होगा।<br />अभी तक हमारी ऋषि परम्परा में जितने रोगों के बारे में हमनें समझा है, पैथोलॉजिकल टैस्ट को छोड़ कर यांत्रिक रूप से रोगों के निदान के संबंध में जो नव अनुसंधान हुए हैं, आज तक हमने जितने भी रोगों के नाम, स्वरूप, लक्षण और निदान के संदर्भ में अपने पूर्वजों से बौध प्राप्त किया है, उसके साथ नव बौध का समन्वय करके 234 रोगों और लगभग उतने ही रोगों को और जोड़ करके लगभग 500 रोगों के संदर्भ में यह एक मौलिक कालजयी अप्रतिम रचना तैयार की है। किसी भी संदर्भ में जब हम वार्ता करते है, संवाद करते हैं या विश्व के सामने अपनी बात रखते हैं तो यह बात आती है कि जैसे चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, अष्टांगहृदयम्, माधव निदान आदि जितने भी हमारे आयुर्वेद के ग्रंथ हैं जब इनमें उन बीमारियों का नाम ही नहीं है तो जिस उपचार की बात हम कर सकते हैं, वह बेईमानी प्रतीत होती है। जबकि रोगों का मूल कारण एक ही है। जैसी प्रकृति ने शरीर की रचना की है जब उसमें कोई विकृति आ गयी तो वह रोग कहलाती है। तो देह तो वही है बस इसका जो मूल स्वरूप है, जो त्रिदोष या हमारी जो तीन प्रकार की मूल प्रकृति में जब किसी भी प्रकार की विकृति आती है, तो वह रोग कहलाती है। उनके नाम, स्वरूप, लक्षण आदि भिन्न हो सकते हैं। उसका भी पूरा समावेश इस ग्रन्थ में करके हमने आयुर्वेद को गौरव दिलाने का बहुत ही गौरवपूर्ण कार्य किया है। इसमें गर्व, गौरव और स्वाभिमान है, इसमें पूर्वजों का बोध व ज्ञान भी है और नव अनुसंधान भी है। मानों की हमारी पूरी ऋषि परम्परा का सार रूप इस ग्रन्थ में एक विग्रह रूप मूर्त रूप होकर हमारे सामने उपस्थित है। इस गौरवशाली क्षण में, क्योंकि यह एक मौलिक रचना, कालजयी रचना है, अप्रतिम प्रस्तुति है।<br />हम एक दृष्टि से नहीं, शिक्षा, चिकित्सा, कृषि, अनुसंधान, आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक दृष्टि से सभी दिशाओं से देश को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हों इसलिए विश्वविद्यालय की स्थापना की जाती है। आज पतंजलि का ये प्रागंण और सौमित्रेयनिदानम् का लोकार्पण अपने आप में ऐतिहासिक है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>योग-आयुर्वेद से जुडऩा हमारा गौरव </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">जो संसार में आया है जीवन यापन के लिए वह कुछ तो करता ही है। हमें परमात्मा ने योग-आयुर्वेद से जोडक़र संसार से रोग, शोक मिटाकर मानवता की सेवा में निमित्त बनाया है, ये सब परमात्मा की व्यवस्थाएं हैं। योग आयुर्वेद के विद्यार्थीगण को भगवान ने ऋषि विधा से, ऋषि परम्परा से जुडक़र संसार में कुछ करने के लिए निमित्त बनाया। यह हम सबके लिए प्रसन्नता और गौरव की बात है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>पूज्य स्वामी जी जैसा व्यक्तित्व न इतिहास में और न वर्तमान में</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">परम पूज्य स्वामी जी महाराज उनका तप, अखण्ड-प्रचण्ड पुरुषार्थ, कर्म में संलग्नता, ऐसा पुरुषार्थ एवं तप करने वाला कोई शरीरधाारी व्यक्ति कहीं दूर तक भी नहीं दिखता। न इतिहास में और न वर्तमान में। ऐसे पुरुषार्थ सेवा करने वाले स्वामी जी के सानिध्य में हमें तप करने का, सेवा करने का मौका मिला है।</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>सितम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Sep 2024 17:57:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जड़ी-बूटी दिवस के अवसर पर पतंजलि योगपीठ हरिद्वार में एक लाख पौधों का निशुल्क वितरण एवं वृक्षारोपण</title>
                                    <description><![CDATA[<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>2000+ स्थानों पर देशभर में तहसील स्तर पर वृक्षारोपण व जड़ी-बूटी वितरण</strong></h5>
<h5>  </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>1000+ लोगों ने किया रक्तदान</strong></h5>
<h5>  </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>280 लोगों का नि:शुल्क नेत्र परीक्षण तथा नि:शुल्क चश्मों का वितरण</strong></h5>
<h5>  </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>412 लोगों का नि:शुल्क दंत परीक्षण तथा नि:शुल्क डेंटल किट वितरण</strong></h5>
</li>
</ul>
<ul style="list-style-type:circle;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>आचार्य जी का जीवन कर्ममय, पुरुषार्थमय व परमार्थमय : स्वामी रामदेव </strong></h5>
<h5>  </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>जन्मदिवस तो मात्र बहाना है, निरंतर राष्ट्रसेवा के कार्य करते हुए, पेड़-पौधे लगाना हमारा लक्ष्य : आचार्य बालकृष्ण</strong></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">      पतंजलि योगपीठ के महामंत्री श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज का जन्मदिवस पतंजलि वैलनेस, पतंजलि योगपीठ-2 के योगभवन सभागार में जड़ी-बूटी दिवस के रूप में मनाया गया। इस अवसर पर पूज्य योगऋषि</h5>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/21.jpg" alt="2" width="900" height="601" /></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>वृक्षारोपण</strong></span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3597/jadi-buti-divas"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-03/21.jpg" alt=""></a><br /><ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>2000+ स्थानों पर देशभर में तहसील स्तर पर वृक्षारोपण व जड़ी-बूटी वितरण</strong></h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>1000+ लोगों ने किया रक्तदान</strong></h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>280 लोगों का नि:शुल्क नेत्र परीक्षण तथा नि:शुल्क चश्मों का वितरण</strong></h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>412 लोगों का नि:शुल्क दंत परीक्षण तथा नि:शुल्क डेंटल किट वितरण</strong></h5>
</li>
</ul>
<ul style="list-style-type:circle;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>आचार्य जी का जीवन कर्ममय, पुरुषार्थमय व परमार्थमय : स्वामी रामदेव </strong></h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>जन्मदिवस तो मात्र बहाना है, निरंतर राष्ट्रसेवा के कार्य करते हुए, पेड़-पौधे लगाना हमारा लक्ष्य : आचार्य बालकृष्ण</strong></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">   पतंजलि योगपीठ के महामंत्री श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज का जन्मदिवस पतंजलि वैलनेस, पतंजलि योगपीठ-2 के योगभवन सभागार में जड़ी-बूटी दिवस के रूप में मनाया गया। इस अवसर पर पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी व श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी के साथ-साथ पूरे देश में स्थापित पतंजलि योग समितियों के माध्यम से एक लाख से अधिक औषधीय पौधों यथा- नीम, तुलसी, एलोवेरा, लौंग तुलसी, आंवला आदि का नि:शुल्क वितरण तथा रोपण किया गया। यह आयोजन विशेष पखवाड़े में किया गया जिसमें जन्मदिवस के पूर्व आचार्य जी के नेतृत्व में पतंजलि संन्यासाश्रम के संन्यासियों ने माला गांव में जाकर हजारों पौधों का रोपण किया। साथ ही स्वयं आचार्य जी द्वारा रक्तदान से प्रेरित होकर हरिद्वार में 887 यूनिट तथा पूरे देश में स्थापित पतंजलि योग समितियों के माध्यम से एक हजार से अधिक यूनिट रक्तदान किया गया।</h5>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/21.jpg" alt="2" width="900" height="601"></img></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>वृक्षारोपण का संकल्प</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">जड़ी-बूटी दिवस के अवसर पर स्वामी रामदेव जी व आचार्य बालकृष्ण जी ने उपस्थित जनसमूह को स्वस्थ व्यक्ति, स्वस्थ परिवार, स्वस्थ समाज, स्वस्थ राष्ट्र व स्वस्थ विश्व के लिए वृक्षारोपण हेतु संकल्पित कराया। स्वामी जी व आचार्य जी ने वृक्षारोपण कर जनसामान्य को वृक्षारोपण के लिए प्रेरित किया।<br />आचार्यश्री ने 50 वर्षों से अधिक तप एवं पुरुषार्थ किया : पूज्य स्वामी रामेदव<br />कार्यक्रम में स्वामी रामदेव जी महाराज ने आचार्य जी को जन्मदिवस की शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि आचार्य जी का जीवन कर्ममय, पुरुषार्थमय व परमार्थमय है। पूर्वजों से प्राप्त अपने सनातन, सांस्कृतिक शाश्वत तत्वों को जीवन में आत्मसात कर जगत के कल्याण के लिए पूज्य आचार्यश्री ने 50 वर्षों से अधिक तप एवं पुरुषार्थ किया है जो हम सभी के लिए सदैव प्रेरणा देता रहेगा।</h5>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/41.jpg" alt="4" width="800" height="823"></img></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/5.jpg" alt="5" width="800" height="1199"></img></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>वर्ल्ड हर्बल इंसाइक्लोपीडिया का पोर्टल लाँच</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">इस अवसर पर आचार्य जी ने कहा कि जन्मदिवस तो मात्र बहाना है, निरंतर राष्ट्र सेवा के कार्य करते हुए, पेड़-पौधे लगाना हमारा लक्ष्य है। हमारी दृष्टि में जन्मदिवस हमारे पूरे साल के कार्यों का रिपोर्ट कार्ड पेश करने तथा भविष्य के लिए चिंतन-मनन करने का दिन है।<br />कार्यक्रम में स्वामी जी व आचार्य जी ने वर्ल्ड हर्बल इंसाइक्लोपीडिया का पोर्टल लाँच किया। आचार्य जी ने बताया कि इस पोर्टल में लगभग 7500 पादप वंश, लगभग 50 हजार से अधिक पादप प्रजातियाँ, 2000 से अधिक भाषाओं (संस्कृत भाषा के नामों सहित), 12 लाख स्थानीय नामों संस्कृत भाषा सहित, 2.5 लाख पर्यायवाची, 6.5 लाख यूनिक रेफरेंस कोड को एक साथ सूत्रबद्ध किया गया है। साथ ही पोर्टल में 10 से अधिक वनस्पति विज्ञान आधारित औषधीय प्रणाली, 964 उपचार पद्धति, 2000 से अधिक स्थानीय समुदायों तथा 2.5 लाख फॉल्क फॉर्मेशन की जानकारी को व्यवस्थित रूप से संकलित किया गया है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>शल्य आधारित सम्मेलन ‘सुश्रुतकॉन’ का उद्घाटन </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">आचार्य जी ने बताया कि आज ही पतंजलि विश्वविद्यालय में शल्य तंत्र आधारित तीन दिवसीय सम्मेलन ‘सुश्रुतकॉन’ का उद्घाटन किया जा रहा है। उपस्थित जनसमूह एवं स्वास्थ्य साधकों को सम्बोधित करते हुए उन्होंने बताया कि आयुर्वेद की शल्य परम्परा को पतंजलि के माध्यम से नई ऊँचाइयों पर ले जाने का प्रयास किया जा रहा है जिसके तहत शल्य की पूरी प्रक्रिया को आमजन आधुनिक तकनीक के माध्यम से लाईव देख सकेंगे। इस अवसर पर शल्य तंत्र पर आधारित त्रिदिवसीय सम्मेलन की स्मारिका ‘सुश्रुतकॉन’ का भी विमोचन किया गया।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/61.jpg" alt="6" width="900" height="601"></img><br />कार्यक्रम में हरिद्वार में 887 यूनिट के साथ पूरे देश में स्थापित पतंजलि योग समितियों के माध्यम से हजारों यूनिट रक्तदान किया गया। साथ ही हरिद्वार में 280 लोगों का नि:शुल्क नेत्र परीक्षण व नि:शुल्क चश्मों का वितरण, 412 लोगों की नि:शुल्क दंत चिकित्सा व नि:शुल्क डेंटल किट वितरण, व्यापक स्तर पर औषधीय पौधों का वितरण व वृक्षारोपण का कार्य किया गया। इस अवसर पर लाखों औषधीय पौधों यथा- नीम, तुलसी, एलोवेरा, लौंग तुलसी, आंवला आदि का नि:शुल्क वितरण किया गया।<br />कार्यक्रम में पतंजलि योगपीठ से सम्बद्ध सभी प्रकल्पों तथा शिक्षण संस्थानों के संन्यासी, अधिकारी, कर्मयोगी, शिक्षकगण तथा विद्यार्थी उपस्थित रहे।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>सितम्बर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3597/jadi-buti-divas</link>
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                <pubDate>Sun, 01 Sep 2024 17:56:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>78वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर पतंजलि योगपीठ में ध्वजारोहण</title>
                                    <description><![CDATA[<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>पतंजलि संस्थान शिक्षा, चिकित्सा, आर्थिक, सांस्कृतिक व वैचारिक आजादी के साथ रोग व नशा, वासनाओं से इस देश को आजाद कराने के लिए संकल्पित : स्वामी रामदेव</strong></span></h5>
<h5>  </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>शहीदों के स्वप्नों को पूरा करने में पतंजलि प्रयासरत : आचार्य बालकृष्ण</strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">      देश के 78वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर पतंजलि योगपीठ व पतंजलि विश्वविद्यालय के अध्यक्ष परम पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी तथा पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलपति परम श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी ने ध्वजारोहण कर सभी देशवासियों को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ दी। ध्वजारोहण के पश्चात राष्ट्रगीत वंदे मातरम से सम्पूर्ण वातावरण राष्ट्रप्रेम के रंग में रंगा नजर आया।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>पाँच लाख से</strong></span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3598/flag-hoisting-at-patanjali-yogapeeth-on-the-occasion-of-78th-independence-day"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-03/78th-independance-day-(2).jpg" alt=""></a><br /><ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>पतंजलि संस्थान शिक्षा, चिकित्सा, आर्थिक, सांस्कृतिक व वैचारिक आजादी के साथ रोग व नशा, वासनाओं से इस देश को आजाद कराने के लिए संकल्पित : स्वामी रामदेव</strong></span></h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>शहीदों के स्वप्नों को पूरा करने में पतंजलि प्रयासरत : आचार्य बालकृष्ण</strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">   देश के 78वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर पतंजलि योगपीठ व पतंजलि विश्वविद्यालय के अध्यक्ष परम पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी तथा पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलपति परम श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी ने ध्वजारोहण कर सभी देशवासियों को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ दी। ध्वजारोहण के पश्चात राष्ट्रगीत वंदे मातरम से सम्पूर्ण वातावरण राष्ट्रप्रेम के रंग में रंगा नजर आया।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>पाँच लाख से ज्यादा वीर-वीरांगनाओं व ऋषि-ऋषिकाओं के बलिदान से पाई आजादी</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">कार्यक्रम में पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज ने कहा कि भारत की आजादी के लिए भारत के पाँच लाख से ज्यादा वीर-वीरांगनाओं व ऋषि-ऋषिकाओं के बलिदान से हमने आजादी पाई है। हम उनके प्रति कृतज्ञता का भाव अपने हृदय में रखते हुए उनके सपनों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। हमारी प्रतिबद्धता है कि हम राजनैतिक आजादी के साथ-साथ इस देश में आर्थिक आजादी के लिए एक बड़ी क्रांति कर रहे हैं और करेंगे। पूरी दुनिया की सम्पत्ति, संसाधनों, वैभव, ऐश्वर्य पर एक प्रतिशत से भी कम लोगों अधिकार है। इन साम्राज्यवादी ताकतों ने अपने क्रूर पाशों में पूरी दुनिया की सम्पत्ति को एक तरह से जकड़ रखा है। हमारा उद्देश्य है कि इस देश को आर्थिक आजादी मिले।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>लाखों करोड़ की अर्थव्यवस्था पर मल्टीनेशनल कम्पनियों का आधिपत्य</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">ईस्ट इण्डिया कम्पनी से लेकर ब्रिटिशर्स ने इस देश से 1 हजार लाख करोड़ की लूट की। अभी भी लाखों करोड़ की अर्थव्यवस्था पर, भारत के शेयर मार्केट से लेकर एफएमसीजी सेक्टर, ऑटो मोबाइल, मोबाइल, एग्रीकल्चर, इण्डस्ट्री में मल्टीनेशनल कम्पनियों का आधिपत्य है। यदि किसी स्वाधीन राष्ट्र की अर्थव्यवस्था स्वतंत्र नहीं है तो उस देश के यह शर्मनाक है। जिस देश की अर्थव्यवस्था विदेशी हाथों की गुलाम होती है वह देश कभी भी सम्मान, स्वाभिमान और पूर्ण आजादी के साथ जी नहीं सकता। हमने इस बार के स्वतंत्रता दिवस पर यह संकल्प लिया है कि हम इस देश में आर्थिक आजादी लाएँगे, स्वदेशी के आंदोलन को और मुखर करेंगे।</h5>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/whatsapp-image-2024-08-15-a1.jpg" alt="WhatsApp-Image-2024-08-15-a" width="900" height="601"></img></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>पढ़े-लिखे बेरोजगार लोग भविष्य में बन सकते हैं सामाजिक विद्रोह का कारण</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">मैकाले की शिक्षा पद्धति के कारण पढ़े-लिखे बेरोजगार लोगों की फौज तैयार हो रही है जो भविष्य में सामाजिक विद्रोह का कारण बन सकती है। मैकाले की शिक्षा के स्थान पर पतंजलि गुरुकुलम्, आचार्यकुलम्, पतंजलि विश्वविद्यालय और भारतीय शिक्षा बोर्ड के माध्यम से मैकाले की शिक्षा पद्धति समाप्त कर शिक्षा की आजादी के लिए कार्य करेंगे। शिक्षा संस्कार मूलक हो, रोजगार मूलक हो, उसमें नैतिकता हो, स्वाभिमान हो, सम्मान हो, मानवीयता हो। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिसमें युवा कभी देश के खिलाफ बगावत न कर सकें। जो बगावत हमने बंगलादेश, श्रीलंका, मीडिल ईस्ट, पाकिस्तान अफगानिस्तान आदि में देखी, यह बहुत बड़ा उपद्रव है। हम ऐसी संस्कारमूलक शिक्षा के बीज इस देश में बोएँगे जिससे कि शिक्षा की स्वाधीनता मिलेगी।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>चिकित्सा की स्वाधीनता का सपना बाकी</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">चिकित्सा की स्वाधीनता का तो अभी बहुत बड़ा सपना बाकी है। एलोपैथी की जहरीली दवा खाकर करोड़ों लोगों की मौत हर साल हो रही है। हमने दुनिया का इतिहास पढ़ा है कि ब्रिटिशर्स ने पूरी दुनिया में अपना राजनैतिक साम्राज्य स्थापित करने के लिए 10 करोड़ से ज्यादा लोगों का कत्ल किया। ऐसे ही इस्लाम के नाम पर भी करोड़ों लोगों का कत्ल हुआ। लैनिन, मार्क्स, माओ की क्रांतियों के नाम पर जो कत्ल हुए हैं, विश्व युद्धों तथा अलग-अलग त्रासदियों में करोड़ों लोग मारे गए किन्तु हर साल सिंथेटिक एलोपैथिक दवाएँ खाकर करोड़ों निर्दोष लोग मर रहे हैं। पतंजलि द्वारा पतंजलि वेलनेस, योगग्राम, निरामयम् के माध्यम से चिकित्सा की आजादी का आंदोलन चल रहा है, इसको हम और मुखर करेंगे। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>दुराचार, अनाचार, व्यभिचार, गैंग रेप की घटनाओं का मुय कारण योग से विमुखता</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">पहली राजनैतिक आजादी, दूसरी आर्थिक आजादी, तीसरी शिक्षा, चौथी चिकित्सा की आजादी, पाँचवी सांस्कृतिक व वैचारिक आजादी और रोगों, नशा, वासना से देश को आजादी दिलानी है। सोशल मीडिया के माध्यम से बहुत बड़ा वैचारिक युद्ध चल रहा है। इससे भारत के बच्चे बर्बाद हो रहे हैं। लोगों के दिलों में वासनाओं की आग भडक़ रही है। आए दिन दुराचार, अनाचार, व्यभिचार, गैंग रेप की घटनाएँ बढ़ रही हैं। इसका एक बड़ा कारण है कि हम या तो योग विमुख हो गए या कर दिए गए। पूरे देश का सांस्कृतिक वातावरण दूषित हो रहा है। ऋषियों की भूमि पर गैंग रेप जैसी घटनाओं से हृदय कांप उठता है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>5 प्रकार की आजादी का संकल्प</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">स्वामी जी ने बताया की हमने आजादी के 78वें स्वाधीनता दिवस पर यह संकल्प लिया है कि इस देश में राजनैतिक आजादी के साथ-साथ शिक्षा, चिकित्सा, आर्थिक, सांस्कृतिक व वैचारिक आजादी के साथ रोग व नशा, वासनाओं से इस देश को आजादी दिलाकर 5 प्रकार की आजादी के अभियान को मुखर रूप से देश में बढ़ाएँगे और भारत को स्वस्थ, समृद्ध और संस्कारवान और परम वैभवशाली बनाने के लिए पतंजलि की ओर से एक बड़ी भूमिका निभाएँगे और पिछले 30-35 वर्षों से हम यह भूमिका निभा भी रहे हैं। हम 50 वर्षों से योग व कर्मयोग के पथ पर चल रहे हैं। अखण्ड-प्रचण्ड पुरुषार्थ कर रहे हैं। शून्य से प्रारंभ हुई यह यात्रा आज यहाँ तक पहुँची है। हमने अपने कर्म को अपना धर्म माना है। अपने कर्म को धर्म मानकर राष्ट्रधर्म के रूप में अखण्ड-प्रचण्ड पुरुषार्थ करते हुए भारत को सशक्त बनाने की आवश्यकता है और यह भूमिका पतंजलि निभा रहा है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>हमने आजादी दया व रहमत से नहीं पाई</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">भारत की एकता, अखण्डता, सम्प्रभुता और आजादी की रक्षा के लिए देश ने अपना पुरुषार्थ और पराक्रम किया है, हमने आजादी किसी की दया व रहमत से नहीं पाई, और आजादी की रक्षा करने में भी हम सक्षम हैं।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>बांग्लादेश, श्रीलंका, मीडिल ईस्ट, पाकिस्तान व अफगानिस्तान की में वैश्विक ताकतों का षड्यंत्र</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">जो बांग्लादेश, श्रीलंका, मीडिल ईस्ट में कुछ जगह हुआ, इसमें वैश्विक ताकतें षड्यंत्र करती रही हैं और आगे भी करती रहेंगी। इसका एक ही समाधान है भारत की एकता, अखण्डता और सम्प्रभुता को हम बनाकर रखें, भारत को इतना शक्तिशाली बना दें कि भारत के पड़ोसी देश कोई षड्यंत्र न कर सकें। <br />अल्पसंख्यक हिन्दुओं, उनके व्यवसायिक प्रतिष्ठानों व मंदिरों पर हमले रोके बांग्लादेश सरकार<br />बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिन्दुओं, उनके व्यवसायिक प्रतिष्ठानों तथा मंदिरों पर जो हमले हो रहे हैं, वहाँ की सरकार उन्हें तुरंत रोके अन्यथा भारत राजनैतिक, कूटनीतिक और वैश्विक दृष्टि से इतना सक्षम है कि हमारे निर्दोष हिन्दुओं पर कोई अत्याचार नहीं कर सकता, और यदि यह अत्याचार नहीं रूका तो इसका अंजाम बहुत बुरा होगा। वहाँ कि जमाइते इस्लाम जैसी नफरत फैलाने वाली, मजहबी उन्माद में डूबी ताकतें हैं उन्हें सबक लेना चाहिए, नहीं तो उनका भी समूल नाश होगा।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>देश में मजहबी उन्माद, जातीय उन्माद, भाषावाद, प्रांतवाद और अलग-अलग प्रकार के वैचारिक उन्माद से देश को बचाने का संकल्प</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">सडक़ों से लेकर संसद तक जातीय उन्माद, मजहबी उन्माद देश में पैदा करना, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, आदिवासी, वनवासियों को आपस में लड़ाना, अगड़ों-पिछड़ों का विभाजन और ओ.बी.सी., दलित, मुस्लिम में भेद पैदा कर कुछ लोग सत्ता पाने के सपने देख रहे हैं। हमें देश को जातीयों में बंटने नहीं देना है। किसी भी कीमत पर देश में मजहबी उन्माद, जातीय उन्माद, भाषावाद, प्रांतवाद और अलग-अलग प्रकार के वैचारिक उन्माद से देश को बचाना है। इस स्वतंत्रता दिवस पर यह संकल्प लेना ही होगा।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>एक के बदले दस सिर काटने का भारत का सामर्थ्य  दिखना चाहिए</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">सरहदों की रक्षा के लिए शहादतों का सिलसिला अभी भी चल रहा है जो किसी भी समर्थ व सक्षम देश के लिए शोभनीय नहीं है। हमें ऐसे प्रयत्न करने पड़ेंगे कि शहादत कम से कम हो और यदि कोई शहादत होती भी है तो एक के बदले दस सिर काटने का भारत का सामर्थ्य दिखना चाहिए।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>वीर-शहीदों के सपनों के देश का निर्माण करने में अपनी भूमिका निभाएँ</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">कार्यक्रम में आचार्य बालकृष्ण जी ने स्वतंत्रता के पावन दिवस की सभी देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएँ दी। जिस संकल्प के साथ वीरों, शहीदों ने इस देश को स्वतंत्र कराने के लिए अपनी आहुति देकर हमें इस स्वतंत्र वायुमण्डल में जीने का अधिकार दिया, उनको स्मरण करते हुए, उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम अपने देश के निर्माण के लिए सर्वविद प्रयास करके उन वीर-शहीदों के सपनों के देश का निर्माण करने में अपनी भूमिका निभाएँ। इसी कार्य के लिए पतंजलि योगपीठ अहर्निश संलग्न है। श्रद्धेय स्वामी जी के नेतृत्व में वीर, शहीद, क्रांतिकारियों को न केवल हम स्मरण कर रहे हैं अपितु उन्होंने जो स्वप्न देखा था उसे साकार करने के लिए हम प्रयासरत हैं।</h5>
<h5 style="text-align:justify;">इस अवसर पर संस्थान से सम्बद्ध सभी इकाईयों तथा शैक्षणिक संस्थानों के अधिकारी, कर्मयोगी, छात्र-छात्राएँ तथा पतंजलि संन्यासाश्रम के संन्यासी भाई व साध्वी बहनें उपस्थित रहे।</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>सितम्बर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3598/flag-hoisting-at-patanjali-yogapeeth-on-the-occasion-of-78th-independence-day</link>
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                <pubDate>Sun, 01 Sep 2024 17:55:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>साक्ष्य आधारित लिवोग्रिट एक प्रभावी और सुरक्षित औषधि</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">डॉ. अनुराग वार्ष्णेय <br />उपाध्यक्ष- पतंजलि अनुसंधान संस्थान</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3599/evidence-based-livogrit-is-an-effective-and-safe-medicine"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-03/livogrit-(1).jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">  नई औषधियों की खोज और विकास के दो बड़े आयाम हैं- एक इनकी efficacy यानि दवा का प्रभाव कैसा है? और यह कैसे काम करती है? साथ ही साथ यह बीमारी के किन-किन कारणों पर असर कारक है, तथा दूसरा इनकी safety या जिसे दवाई का टोक्सिकोलॉजिकल अस्सेस्मेंट भी कहते हैं, जिसमें यह पता लगाने का प्रयास किया जाता है कि क्या बनाई गई नई औषधि का कोई दुष्प्रभाव है या नहीं और अगर है तो वह कितनी मात्रा लेने के बाद और कितने समय के पश्चात हो रहा Efficacy और safety दोनों ही औषधियों के विकास और निर्माण के महत्पूर्ण घटक हैं और इसी से यह प्रमाणित होता है कि कोई औषधि कितने लम्बे समय तक कारगर साबित होगी।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>पतंजलि की सभी औषधियाँ साक्ष्य आधारित</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">पतंजलि की सभी औषधियां इस पूरी प्रक्रिया से गुजरने के बाद ही बाजार में रोगियों के लिए उपलब्ध कराई जाती है, इसलिए ही इन्हें साक्ष्य आधारित औषधियों की संज्ञा दी गई है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>लिवर कोशिकाओं पर गहन अनुसंधान</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">इस प्रक्रिया को जानने के लिए लिवर कोशिकाओं के ऊपर एक शोध किया गया। लिवर हमारे शरीर का दूसरा सबसे बड़ा अंग है और यह एक तरह से सबसे मेहनती अंग भी है। इसका एक प्रमुख कार्य ड्रग मेटाबोलिज्म है अर्थात् जो भी औषधियां हम खाते हैं उनको रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा शरीर के लिए आसान बनाना होता है। इन एलोपैथिक और सिंथेटिक दवाइयों के सेवन से यकृत या लिवर में डिली (ड्रग इंडयूस्ड लिवर इंजरी) पैदा हो जाती है जिसका प्रभाव लिवर के साथ-साथ पूरे शरीर पर पड़ता है। इस शोध के माध्यम से यह जानने का प्रयास किया गया कि क्या यकृत पर पडऩे वाले इन दुष्प्रभावों को आयुर्वेदिक औषधियों के माध्यम से ठीक किया जा सकता है। अमेरिका के विभिन्न अस्पतालों में भर्ती हुए लगभग 1321 रोगियों पर हुए एक शोध से एक आश्चर्यजनक डाटा सामने आया जिससे यह पता चला कि एक्यूट लिवर फेलियर की घटनाएं उन रोगियों के साथ ज़्यादा घटित हुई जिन्होंने बुखार में प्रयोग होने वाली दवाई पैरासिटामोल का प्रयोग बहुत लम्बे समय तक और अधिक मात्रा में किया था। गर्भावस्था के दौरान और दिल की बीमारियों में दी जाने वाली दवाइयों से भी यकृत के काम करना बंद करने की घटनाएं अधिक देखी गई।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>आयुर्वेद का सरलीकरण</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">आयुर्वेद में वर्णित विभिन्न औषधियों के सन्दर्भ से बनाए गए सर्वकल्प क्वाथ जो पुनर्नवा, भूमि आंवला, और मकोय जड़ी-बूटियों से निर्मित हैं में निहित विभिन्न फाइटोकेमिकल के एक्सट्रैक्ट और फार्मूलेशन बनाये गए जिससे रोगियों और उनके परिवारजन बीमारी के समय काढ़े को बनाने वाली परेशानी से बच सकें। उसके बाद इन्हीं अर्क से बनाए गए लिवोग्रिट की Efficacy और safety को सिद्ध करने के लिए शोध भी किया गया। इस शोध में यह देखा गया कि क्या सर्वकल्प क्वाथ या लिवोग्रिट के प्रयोग से यकृत की कार्यशीलता में सुधार किया जा सकता है और क्या डिली को भी ठीक किया जा सकता है या नहीं। शोध के लिए सबसे पहले मानव यकृत कोशिकाओं को अनुसंधान प्रयोगशाला में निर्मित कर उन्हें एक रसायन, कार्बन टेट्रा क्लोराइड (CCL4) दिया गया, जोकि एक औद्योगिक रसायन है और डिली की उत्पत्ति का एक प्रमुख कारण भी है। जब यह रसायन इन कोशिकाओं में प्रेरित किया गया तो इन कोशिकाओं का जीवन कम हो गया अर्थात् इनकी मृत्यु होने लगी। तत्पश्चात सर्वकल्प क्वाथ देने पर उन कोशिकाओं की पुन: उत्पत्ति होने लगी। इन कोशिकाओं की मृत्यु के दो प्रमुख कारण थे, पहला इन सेल्स में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस का शुरू होना और दूसरा जो माइटोकॉन्ड्रिया हमारे सेल्स का पावर हाउस है, का मेम्ब्रेन पोटेंशियल कम होना। रिएक्टिव ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और एमएमपी स्तर जो औद्योगिक रसायन की वजह से बढ़ गया था वह भी डोज़ डिपेंडेंट तरीके से कम हुआ और यह दोनों पैरामीटर्स लिवोग्रिट के माध्यम से पुन: सही अवस्था में आ गए।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>लिवोग्रिट का चूहों पर सफल प्रयोग</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">इसके बाद इन-वीवो शोध के लिए विन्स्टर चूहों को चुना गया। 9 हफ्तों तक किए गए इन शोध में विभिन्न पैरामीटर्स को जांचा गया जिसमें सीरम एएलटी और सीरम एएसटी प्रमुख हैं, शोध में पाया गया कि सर्वकल्प क्वाथ या लिवोग्रिट देने पर इन पैरामीटर्स का स्तर डोज़ डिपेंडेंट और टाइम डिपेंडेंट तरीके से कम हुआ। एक अन्य पैरामीटर सीरम बिलीरुबिन जोकि पीलिया के समय भी नापा जाता है वह भी सीसीएल 4 के प्रयोग से बढ़ चुका था वह भी लिवोग्रिट के माध्यम से डोज़ डिपेंडेंट तरीके से कम हुआ। स्ट्रेस की वजह से जानवरों में कोलेस्ट्रॉल और यूरिक एसिड के बढ़े हुए स्तर को भी इन आयुर्वेदिक औषधियों के माध्यम से कम किया। <br />इन्हीं दवाइयों के साथ-साथ ही सिलिमेरिन जोकि एक कारगर ऐलोपैथिक औषधि है पर भी शोध किये गए, तत्पश्चात देखा गया कि यकृत की कोशिकाओं पर दोनों का क्या प्रभाव पड़ता है और पता लगा कि लिवोग्रिट अपने समकक्ष सिलिमेरिन से ज़्यादा प्रभावकारी है।<br />सीसीएल 4 के कारण इन यकृत कोशिकाओं में फाइब्रोसिस, लिम्फोसिस्टिक इंफिल्ट्रेशन, और हेपैटोसेलुलर वैक्यूओलेशन जैसी समस्या पाई गई, जिसका मतलब इन कोशिकाओं के बीच बहुत बड़ी-बड़ी खाली जगह बननी शुरू हो गई, लिवोग्रिट को डोज़ डिपेंडेंट और टाइम डिपेंडेंट तरीके से देने पर इन समस्याओं में भी कमी आई। <br />इन शोधों से यह निष्कर्ष निकला कि सर्वकल्प क्वाथ या लिवोग्रिट एक असरकारक औषधि है। उसके बाद सेफ्टी और टॉक्सिकोलॉजी पर कार्य करने के लिए रेगुलेटरी गॉइडलाइंस और ओसीडी गॉइडलाइन के अनुरूप 28  दिन तक 1000 mg/kg डोज़ दी गई और किसी भी प्रकार का दुष्प्रभाव देखने को नहीं मिला, तत्पश्चात महत्वपूर्ण अंगो की अलग-अलग हिस्टोपैथोलॉजी करने के बाद यह पता लगा कि इन अंगो में आयुर्वेदिक औषधि लिवोग्रिट देने से किसी भी प्रकार का कोई साइड इफ़ेक्ट नहीं है। <br />लाल रक्त कणिकाओं और श्वेत रक्त कणिकाओं, तथा 118 अलग-अलग प्रकार के पैरामीटर्स देखने के बाद यह निष्कर्ष प्राप्त हुआ कि लिवोग्रिट हर प्रकार से एक सुरक्षित और असरदारक औषधि है। </h5>
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#F8CAC6;border-color:#F8CAC6;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(248,202,198);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>आयुर्वेद की पुन: प्रतिष्ठा में पतंजलि की भूमिका</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">भारत के प्राचीन ग्रंथों में विभिन्न प्रकार के औषधीय पेड़-पौधों का वर्णन है, परन्तु अपनी भाषा का ज्ञान न होने के कारण यह विद्या हमारे देश से विलुप्त होती जा रही थी। परन्तु पतंजलि इस अनमोल धरोहर को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लेकर, साक्ष्य आधारित आयुर्वेदिक औषधियों से हर नागरिक को रोग मुक्त कर विश्व को आगे बढऩे के लिए प्रोत्साहित कर रही है।</h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पतंजलि रिसर्च</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>सितम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Sep 2024 17:54:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
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                <title>प्रकृति की प्रयोगशाला में निर्मित कार्बनिक अंकुरित अमृतान्न आयु, आरोग्य जीवन को बनाता है महान</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">डॉ. नागेन्द्र कुमार नीरज<br />निर्देशक एवं मुख्य चिकित्सा प्रभारी, योगग्राम, हरिद्वार</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3600/organic-sprouted-amritan-made-in-nature-s-laboratory-makes-longevity-and-health-of-life-great"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-03/11.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>कार्बनिक आहार क्या है? </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">   कार्बनिक आहार अर्थात् स्वास्थ्य एवं जीवनदायी जैव-आहार (Vitalyzing Food) सभी प्राणियों का वैज्ञानिक आहार है। प्रकृति की उन्मुक्त प्रयोगशाला में बने आहार को बिना तले-भुने एवं उबाले सीधे ही जो आहार उपयोग में लाया जाता है, वह जैव कार्बनिक आहार है। कार्बनिक-जैव आहार कार्बनिक जैव-खाद से ही उगाया जाता है। कार्बनिक आहार को उगाने से लेकर खाने तक किसी प्रकार के संश्लिष्ट रसायन एवं खाद, कीटनाशी दवाओं तथा अग्नि आदि से उसकी भौतिक, रासायनिक एवं भैषजीय संरचना को क्लिष्ट, जटिल एवं विकृत नहीं किया जाता। इसलिए कार्बनिक जैव-आहार को प्रकृति के रसोई घर में बना हुआ तथा बिना अग्नि का बना भोजन कहा जाता है। जैव-कार्बनिक आहार में सभी भौतिक, रासायनिक एवं भैषजीय संरचना, एन्जाइम, कार्बोज, प्रोटीन, वसा, खनिज, विटामिन करिटोनॉथड, फ्लोवोनॉयड तथा अन्य ज्ञात-अज्ञात उपयोगी आवश्यक पोषक खाद्य तत्त्व जैव तथा नैसर्गिक रूप में होते हैं। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>कार्बनिक आहार की खोज</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">हम जो भी आहार लेते हैं वह सभी कार्बनिक रूप में होता है, लेकिन यहाँ पर कार्बनिक आहार का मूल तात्पर्य उपर्युक्त जैव-कार्बनिक आहार से है। हमारा शरीर जैव-कार्बनिक रसायनों का श्रेष्ठ यौगिक है अत: इसके स्वस्थ निर्माण एवं विकास के लिए सजातीय उपर्युक्त जैव-कार्बनिक रसायन ही श्रेष्ठ तथा उपयोगी हैं। कार्बनिक रसायन का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। सन् 1745 ई. में सुप्रसिद्ध रसायनज्ञ लैवोजिएर ने यह सिद्ध किया कि कार्बनिक यौगिकों में प्राय: कार्बन हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन तत्त्व पाए जाते हैं। स्वीडिश वैज्ञानिक डॉ. शीले ने सन् 1769 से 1786 के मध्य नीबू से साइट्रिक अम्ल तथा पेशाब से यूरिक अम्ल बनाया। उस समय सभी प्रकार के कार्बनिक यौगिक जीव-जन्तुओं तथा पौधों से ही प्राप्त होते थे। इसीलिए सन् 1815 ई. में कार्बनिक रसायन के क्षेत्र में स्वीडिस रसायनज्ञ डॉ. जॉन्स जैकब (जे.जे.) बर्जीलियस ने जीवनी-शक्ति सिद्धान्त (Vital Force Theory) का प्रतिपादन किया। इस सिद्धान्त के अनुसार सभी कार्बनिक पदार्थों के निर्माण के लिए एक विशेष प्रकार की अद्भुत दिव्य जीवनी शक्ति की आवश्यकता होती है और यह जैव शक्ति जैव-पदार्थों में ही होती है। इस शक्ति द्वारा ही जीवन के सभी कार्य सम्पादित होते हैं तथा ये विभिन्न जैव रस-रसायनों, हार्मोन, एन्जाइम आदि का निर्माण करते हैं। इस शक्ति द्वारा ही जीवन स्वस्थ एवं नैसर्गिक सौन्दर्ययुक्त होता है। यह शक्ति प्रयोगशाला में किसी भी कीमत पर पैदा नहीं की जा सकती है। जीवनी शक्ति परमात्मा द्वारा सिर्फ जीवित जीवों (Living Organism) को दिव्य वरदान के रूप में मिला है। इसे प्रयोगशाला में नहीं बनाया जा सकता है। कार्बनिक यौगिकों का निर्माण एवं संश्लेषण जीवित कोशिकाओं के द्वारा प्रकृति प्रदत्त जीवनी शक्ति (Vita Force) की सहायता से होता है। 19वीं शताब्दी के 1828 ई. में जर्मन रसायनज्ञ बोलर अमोनिया सायनेट को गर्म करके यूरिया, 1845 ई. में कोल्वे कार्बन तथा हाइड्रोजन से एसिटिक एसिड तथा बर्थेलाट 1856 में मिथेन बना चुके थे। अब तक लाखों की संख्या में कार्बनिक रसायन ज्ञात हो चुके हैं तथा बनाये जा रहे हैं। इस प्रकार रसायनज्ञों की भाषा में जीवनी शक्ति सिद्धान्त खंडित हो चुका है, लेकिन आहार-विशेषज्ञ होने के नाते मैं बल देकर कहना चाहता हूँ कि आहार के क्षेत्र में वर्जिलियस का सिद्धान्त शाश्वत है, क्योंकि प्राणियों के आहार के रूप में जैव-कार्बनिक रसायन जितना उपयोगी एवं सात्मीकृत होता है, उतना प्रयोगशाला में निर्मित औषध या किसी रूप में संश्लेषित कार्बनिक रसायन उपयोगी नहीं होता है। साथ ही ये अपने दुष्प्रभाव से अनेक प्रकार की विकृतियाँ एवं असाध्य रोग पैदा करते हैं। कार्बनिक रसायन का विद्यार्थी होने के नाते मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि विटामिन, औषधियाँ तथा अन्य कथित टॉनिक तथा एण्टीबायोटिक्स में प्रयुक्त संश्लेषित कार्बनिक रसायन जीव को बेमौत मारता है। संश्लेषित कार्बनिक रसायन मृत्य एवं विषाक्त रसायन हैं। ये जीव के लिए कभी उपयोगी नहीं हो सकते हैं। यह एक कटु सत्य है। सभी औषधियाँ जहर सदृश हैं। स्वास्थ्य के लिए मृग मरीचिका हैं। प्रत्येक कसौटी पर कार्बनिक जैविक आहार खरा उतरता है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/035c72b9e706f7805aa817d3fa9.jpg" alt="035c72b9e706f7805aa817d3fa9" width="900" height="904"></img></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>कार्बनिक आहार की विशेषताएं</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">पर्यावरण की दृष्टि से विकास के नाम पर आज विभिन्न प्रकार के कल-कारखाने पर्यावरण प्रदूषण की समस्या खड़ी कर रहे हैं। आहार पकाने के लिए प्रयुक्त विभिन्न प्रकार के ईंधन-गैस, कोयले, लकड़ी इत्यादि के जलने से भी पर्यावरण प्रदूषित होता है। इसके अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के कृत्रिम आहारों, रासायनिक खादों तथा कीटनाशी दवाओं के बेशुमार उत्पादन, प्रयोग तथा खपत के कारण भयंकर रूप से पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है। इनसे कारगर ढंग से निपटने का एक ही रास्ता है- जनसाधारण को जैव-खेती द्वारा अधिक से अधिक उत्पादन बढ़ाने का प्रशिक्षण देना और जैव-खेती में उत्पादित आहारों को जैव-कार्बनिक आहार के रूप में कच्चे ही खाने के लिए प्रोत्साहित करना। इस प्रकार के प्रयोग लेखक सन् 1973 ई. से स्वयं तथा ढ़ाई लाख से भी अधिक इनडोर एवं लाखों आउटडोर रोगियों पर कर चुका हूँ तथा अभी भी प्रयोग चल रहा है। यह प्रयोग काफी उत्साहवर्धक एवं सफल रहा है। जैव-खेती एवं जैव-कार्बनिक आहार में रुचि रखने वाले अनेक लोगों ने इस प्रक्रिया को सहर्ष अपनाया है। आवश्यकता इस बात की है कि जैव-कार्बनिक खेती करने तथा जैव-कार्बनिक आहार का उपयोग करने के लिए एक विशाल जन स्वास्थ्य आन्दोलन पतंजलि योगपीठ संस्थान द्वारा चलाया जा रहा है। इस आन्दोलन आहार के प्रयोग को सार्वभौम एवं सार्वजनीन बनाने से राष्ट्रीय तथा विश्व पर्यावरण की दृष्टि से हम काफी समृद्ध हो सकेंगे।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/pancreas_food_fruit_vegi.jpg" alt="pancreas_food_fruit_vegi" width="800" height="450"></img></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>आयुर्विज्ञान की दृष्टि से</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">विश्व की अनेक विख्यात प्रयोगशालाओं ने अपने विविध प्रयोगों से यह सिद्ध कर दिया है कि कार्बनिक जैव खाद से उत्पादित आहार की रासायनिक संरचना में कोई परिवर्तन नहीं होता है। वे अपने मौलिक रूप में होते हैं। रासायनिक खाद तथा कीटनाशी औषधियों से उगाए गए पौधों की रासायनिक संरचना में विषम परिवर्तन होने से उनके मौलिक गुणों में काफी अन्तर आ जाता है। ऐसे आहारों के प्रयोग से गुर्दे, यकृत, मांसपेशीय सम्बन्धित तथा कैंसर जैसे घातक रोग होने की प्रबल संभावना बढ़ जाती है। इस प्रकार के आहार शरीर के रासायनिक घटकों पर रोगोत्पादक प्रभाव डालते हैं। अत: स्वास्थ्य- संवर्धन रोग-निवारण तथ स्वास्थ्य-संरक्षण की दृष्टि से कार्बनिक जैव-आहार ही हमारे शरीर के रसायनों के अनुकूल श्रेष्ठतम आहार है। आयुर्विज्ञानियों ने जैव अंकुरित अनाजों से एक विशेष प्रकार का आहार तैयार किया है। इस आहार का उपयोग विभिन्न रोगों की चिकित्सा में किया जायेगा। आयुर्विज्ञानी अपने प्रयोगों के दौरान यह देखकर आश्चर्यचकित रह गये कि एक बीज के अंकुरण के समय इन नन्ही सी अद्भुत प्रयोगशाला के किसी खण्ड में एमीनों अम्ल की सक्रियता काफी बढ़ रही है तो कहीं पर विभिन्न प्रकार के विटामिनों, एन्जाइमों, शर्कराओं का निर्माण हो रहा है। कहीं जटिल पोषक तत्त्वों का सरलीकरण हो रहा है अर्थात् विभिन्न खंडों में विभिन्न प्रकार का जैव-रासायनिक संश्लषण व निर्माण कार्य चल रहा है। अंकुरण के दौरान जैव भौतिक रासायनिक क्रियाओं का अद्भुत करिश्मा चलता है। इन अद्वितीय करिश्मों को देखकर दाँतों तले अँगुली दबाने को बाध्य होना पड़ता है। अंकुरण के दौरान प्रोटीनों का श्रेष्ठ प्रोटीनों में रूपान्तरण होता है। अंकुरित अनाज का प्रोटीन माँसाहार से श्रेष्ठ माना जाता है। माँसाहार का प्रोटीन शरीर में किडनी हृदय एवं मस्तिष्क रोग यूरिक अम्ल, क्रिटीनाइन, फ़ास्फेट, यूरिया तथा कोलेस्टेरॉल बढ़ाता है, जबकि अंकुरित अनाज इन्हें कम करते हैं। मिनेसोटा विश्वविद्यालय के डॉ. सी.डब्लू. वैली अपनी शोधों से इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि गेहूँ के प्रारम्भिक अंकुरण काल में विटामिन सी 600 प्रतिशत तथा बहुमूल्य विटामिन-ई प्रचुरता से बढ़ता है। डॉ. बुरखोल्डर्स अपने शोधों से इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि अंकुरित अनाज में नायसिन 500 प्रतिशत, बायोटिन 50 प्रतिशत, पायरिडॉक्सिन 500 प्रतिशत, पेन्टोथेनिक 200 प्रतिशत, फॉलिक अम्ल 600 प्रतिशत, थायमिन 10 प्रतिशत, रिबोफ्लेविन 100 प्रतिशत तथा इनोसिटाल 100 प्रतिशत बढ़ जाता है। डॉ. लेट्राइल केबस के अनुसार अंकुरित अनाजों तथा ताजी हरी सब्जियों में कैंसर-अवरोधी तत्त्व लेट्राइल प्रचुरता से पाया जाता है। हिप्पौक्रेट्स हेल्थ इन्स्टीट्यूट बोस्टन के संस्थापक निदेशक डॉ.एन. विग्मोर तथा पूर्व अनुसंधान निर्देशक डॉ. विक्टोरस पी. कुल्वीन्सकॉस ने अंकुरित अनाजों पर वर्षों प्रयोग कर एक पुस्तक न्यूट्रीशन एवोल्यूएशन ऑफ स्प्राउट एण्ड ग्रासेस लिखी है। इस नवीनतम शोध-पुस्तक के आधार पर अंकुरण के दौरान कुछ प्रमुख जीवनदायक जैव तत्त्वों का संवर्धन किस प्रकार होता है, उन्हें निम्न तालिकाओं द्वारा दर्शाया गया है-<br />एन्जाइम- मूँगफली में अंकुरण के पूर्व तथा पश्चात् एन्जाइम सक्रियता (Enzyme Activity) का संवर्धन यू. मोल्स ग्लाइकोमेट में निम्न प्रकार से होता है-<br /><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/11.jpg" alt="11" width="828" height="471"></img><br />विटामिन-सी 100 ग्राम सोयाबीन में अंकुरण के बाद विटामिन-सी में वृद्धि निम्नानुसार पाई गयी है-</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/22.jpg" alt="22" width="983" height="352"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;">सूखे अनाज में विटामिन-सी तथा एन्जाइम का सर्वथा अभाव होता है, लेकिन भीगने तथा अंकुरण के बाद इनमें तेजी से वृद्धि होती है। <br />आर.एन.ए. तथा डी.एन.ए.- प्रति 100 ग्राम गेहूँ तथा जई के अंकुरण में आर.एन.ए. तथा डी.एन.ए. का सम्वद्र्धन माइक्रोग्राम पायरो फॉस्फेट में-</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><br /><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/33.png" alt="33" width="986" height="579"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;">कैरोटिन प्रति 100 ग्राम विभिन्न प्रकार के अनाज द्विदल बीजों के अंकुरण के बाद कैरोटिन (विटामिन-ए) में वृद्धि-</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><br /><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/44.jpg" alt="44" width="582" height="251"></img><br />विटामिन-बी 100 ग्राम सोयाबीन में अंकुरण के बाद विटामिन-बी में सम्वद्र्धन-<br /><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/55.jpg" alt="55" width="578" height="180"></img><br />प्रति ग्राम गेहूँ, मूँग, मटर के सूखे तथा अंकुरण के 5वें दिन बी-ग्रुप के विभिन्न विटामिनों की स्थिति मा.ग्रा./ग्राम  <img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/66.jpg" alt="66" width="576" height="410"></img><br />माँसाहार समर्थक कुछ आहार-विज्ञानियों का मानना है कि विटामिन बी-12 का एकमात्र स्रोत माँसाहार ही है, परन्तु निम्न शोधपूर्ण तालिका से यह सिद्ध होता है कि अंकुरित अनाज विटामिन बी-12 का श्रेष्ठ स्रोत है। प्रति ग्राम मूँग, मसूर, चना, सूखे हरे मटर के अंकुरण के बाद विटामिन बी-12 में वृद्धि माइक्रोग्राम में-</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><br /><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/77.jpg" alt="77" width="573" height="237"></img><br />प्रति ग्राम विभिन्न प्रकार के बीजों के अंकुरित होने पर विटामिन-ई (टोकोफेरॉल) की वृद्धि माइक्रोग्राम में-<br /><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-03/88.jpg" alt="88" width="575" height="206"></img><br />उपर्युक्त विभिन्न प्रकार के अंकुरित अनाजों, तेल तथा द्विदल बीजों के अंकुरण के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के ताजे फलों, सब्जियों तथा हरी सब्जियों को कच्चे खाने से सभी प्रकार के एन्जाइम तथा विटामिन प्रचुरता से उपलब्ध हो जाते हैं। फल व सब्जियों का वैज्ञानिक विश्लेषण लेखक की अन्य पुस्तक आहार के चमत्कार में देखें। <br />आर्थिक दृष्टि से- अंकुरित अनाज तथा मौसमानुसार मिलने वाले फल एवं सब्जियाँ आदि कार्बनिक जैव आहार काफी सस्ते पड़ते हैं। अंकुरित अनाज विश्व को श्रेष्ठतम आहार है। गरीब से गरीब व्यक्ति भी इस बहुमूल्य आहार का लाभ उठा सकता है। यह आहार विकासशील, अविकसित तथा तीसरी दुनिया के गरीब देशों के लिए प्रकृति का श्रेष्ठतम वरदान है। <br />‘अजस्र अक्षय स्वास्थ्य’ का स्रोत है- अंकुरित अनाज। जिस कौम के बाल, वृद्ध एवं युवा गरीबी के कारण कुपोषण के शिकार हो अकाल काल-कवलित हो जाते हैं, उनके लिए अमृत तुल्य है अंकुरित अन्न। उदाहरण स्वरूप भीषण कमर तोड़ मंहगाई की स्थिति में 100 ग्राम अंकुरित अनाज का अधिकतम मूल्य मात्र 2-4 रुपया ही होगा। इस प्रकार से अंकुरित अनाज सर्वसुलभ तथा सर्वसाध्य है। इसके लिए मंहगे ईंधन, गैस, कैरोसिन तेल, लकड़ी तथा कोयला आदि की आवश्यकता नहीं होती है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;">स्वास्थ्य की दृष्टि से- कार्बनिक जैव आहार में विपुल मात्र में विशिष्ट प्रकार के एन्जाइम, विटामिन तथा अन्य ज्ञात-अज्ञात पोषक तत्त्व पाए जाते हैं जो स्वास्थ्य की सुरक्षा एवं निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। स्वास्थ्य की दृष्टि से कार्बनिक जैव आहार का कोई विकल्प नहीं है। <br />सौन्यदर्य की दृष्टि से- हमारा सौन्दर्य जीवन्त कोशिकाओं तथा चमकते रक्त के हिमोग्लोबिन पर निर्भर करता है। रक्त कोशिकाओं का स्वास्थ्य उच्चतम किस्म के पोषक तत्त्वों से संयुक्त कार्बनिक जैव आहार पर निर्भर करता है। कार्बनिक जैव आहार का प्रयोग करें तो आपका सौन्दर्य पूर्णता में निखरेगा। शृंगार-प्रसाधन तथा ब्यूटी क्लिनिक आपको कभी भी सौन्दर्य नहीं दे सकते। कार्बनिक जैव आहार के प्रयोग से आपके अन्दर से ही फूल की तरह सौन्दर्य प्रस्फुटित एवं सुरभित होगा तथा खिलेगा।<br />मानवीय सौहार्द की दृष्टि से- कार्बनिक जैव आहार के प्रयोग से व्यक्ति के दुर्गुण ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, हिंसा, लोभ, क्रोध, मोह इत्यादि का रूपान्तरण हो जाता है। व्यक्ति के अन्दर दूसरों के तथा अपने प्रति सहानुभूति, उदारता, प्रेम, स्नेह, करुणा, मैत्री, मुदिता, संयम, शांति, शील, समता, सौजन्यता, सहृदयता, सेवा, सहनशीलता, सहकारिता, निर्भयता, प्रसपता, स्वच्छता आदि उदात्त विचारों एवं सद्गुणों का विकास होता है। मानवीय सौहाद्र्र के भाव का संवर्धन होता है। <br />असाध्य रोग-निवारण की दृष्टि से- गलत आहार मेल, मिलावट, कृत्रिम रंग रसायनों से युक्त आहार के कारण आधुनिक सभ्य लोगों में कैंसर, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, गुर्दे तथा यकृत के रोग, मधुमेह, आर्थराइटिस, मोटापा, मानसिक आदि रोग तेजी से बढ़ रहे है। इन असाध्य रोगों से मुक्ति के लिए जैव कार्बनिक आहार का प्रयोग शत-प्रतिशत सफल रहा है। <br />दीर्घ जीवन की दृष्टि से- कार्बनिक जैव आहार का विशेष महत्त्व है। कार्बनिक जैव आहार के प्रयोग से मनुष्य की पूर्ण आयु 150 से 200 वर्ष तक की जा सकती है। यौवनावस्था 25 से बढ़ाकर 75 वर्ष तक की जा सकती है। अंकुरित अमृतान्न जीवन में सत्कर्म करने का जोश, जवानी, जूनून एवं जज्बात के रस से भर देता है।  <br />पाचन की दृष्टि से- कार्बनिक जैव आहार में अनेक प्रकार के पाचक तत्त्व, एन्जाइम, विटामिन तथा अन्य ज्ञात-अज्ञात सुपाच्य तत्त्वों का शीघ्रता से संवर्धन होता है। उदाहरण स्वरूप दाल-बीजों में कार्बोज परिवार के दो तत्त्व स्टेकीओस तथा वरवेसीकोस होता है। रेफिनोज (कार्बोज) परिवार के इन तत्त्वों का पाचन अल्फा ग्लेक्टसाइडेज नामक एन्जाइम करता है। आमाशय के रस में इस एन्जाइम का सर्वथा अभाव होता है फलत: ये पेट में सड़ते हैं। अंकुरित अनाज में किण्व प्रक्रिया द्वारा एमिलाइटिक, प्रोटियोलाइटिक तथा लाइपेज एन्जाइम तथा अन्य पाचक एन्जाइम पैदा होते हैं जिससे रेफिनोज तथा अन्य खाद्य-तत्त्व शीघ्रता से पच जाते हैं।<br />कब्ज निवारण की दृष्टि से- सभी प्रकार के कार्बनिक जैव आहार में रफेज सेलुलोज की पर्याप्त मात्रा होने से कब्ज की स्थिति दूर होती है। <br />औषधीय-गुण की दृष्टि से- सभी प्रकार के कार्बनिक जैव आहार में अनेक प्रकार के हार्मोन, एन्जाइम, विटामिन तथा प्रति जैविकीय (Antibiotics) तत्त्व पैदा होने से इनमें प्रबल औषधीय गुण आ जाते हैं। यही कारण है कि कार्बनिक जैव आहार सभी प्रकार के रोगों से लोहा लेने में सक्षम हैं। </h5>
<h5 style="text-align:justify;">स्वाद-संवेदनशीलता संवर्धन की दृष्टि से- कार्बनिक जैव-आहार जिह्वा की स्वाद संवेदनशीलता को बढ़ाते हैं। बचपन में स्वाद की संवेदनशीलता पूर्ण रहती है। लेकिन आहार में गर्म मिर्च, मसाले तथा तले-भुने आहार के प्रयोग से स्वाद की संवेदनशीलता समाप्त हो जाती है। जिह्वा स्थित स्वाद की कलियाँ मर जाती हैं। मुर्दा जिह्वा पर गर्म मिर्च-मसाले युक्त आहार डालने से वह तडफ़ड़ाती एवं काँपती है तो ऐसा भान होता है कि स्वाद आ रहा है, परन्तु यह स्वाद का एक भ्रम होता है। स्वाद की संवेदनशीलता को लौटाने के लिए कार्बनिक जैव आहार का प्रयोग श्रेष्ठ है। <br />इस प्रकार हम देखते हैं कि कार्बनिक जैव आहार की असंख्य विशेषताएँ हैं। कार्बनिक जैव आहार के प्रयोग से व्यक्ति की पेटूपन की आदत समाप्त हो जाती है। दाँतों की खूब अच्छी कसरत होती है। हमारा शरीर एक जैव रासायनिक कारखाना है अत: इसका ईंधन भी जैव-रासायनिक ही होना चाहिए। यही सत्य तथ्य विज्ञान एवं प्रकृति-सम्मत है। कार्बनिक जैव आहार जीवन्त शरीर का सर्वश्रेष्ठ ईंधन है। अनेक आयुर्विज्ञानियों ने भी अपने विभिन्न प्रयोगों के आधार पर इस तथ्य को स्वीकार किया है। अमृतान्न आप भी अपनाइये तथा 100 साल तक आरोग्य आनन्द उल्लास के रस से भरपूर रहिए, उमंग की तरंग से तरंगामित होते रहिए, इसी आशा एवं विश्वास के साथ।</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
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                <pubDate>Sun, 01 Sep 2024 17:53:05 +0530</pubDate>
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                <title>ज्ञान से रहित भावना को  ‘भक्ति’ नहीं कहते</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3601/feeling-devoid-of-knowledge-is-not-called-%E2%80%98devotion%E2%80%99"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-03/knowadge.jpg" alt=""></a><br /><table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#B96AD9;border-color:#B96AD9;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(185,106,217);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(255,255,255);"><strong>ज्ञान-रहित भावना मन का उल्लास है, मन की तरंग है। वह भावक को सुख और उत्साह से भरती है। परंतु उसे भक्ति नहीं कह सकते। उसके वे परिणाम नहीं प्राप्त होंगे, जो भक्ति के होते हैं। ऐसा कोई ज्ञानी आज तक नहीं हुआ, जो भक्त न हो। ऐसा कोई बड़ा भक्त आज तक नहीं हुआ, जो ज्ञानी न हो।</strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;">  ईश्वर-भक्ति हो या राष्ट्र भक्ति, दोनों के लिए ज्ञान अनिवार्य है। ईश्वर-भक्ति के लिए ईश्वर की महिमा और गुणों का ज्ञान आवश्यक है। राष्ट्र-भक्ति के लिए राष्ट्र की महिमा और उसके गुणों, विशेषताओं, इतिहास, प्रकृति और स्वरूप का ज्ञान आवश्यक है।<br />ज्ञान-रहित भावना मन का उल्लास है, मन की तरंग है। वह भावक को सुख और उत्साह से भरती है। परंतु उसे भक्ति नहीं कह सकते। उसके वे परिणाम नहीं प्राप्त होंगे, जो भक्ति के होते हैं। ऐसा कोई ज्ञानी आज तक नहीं हुआ, जो भक्त न हो। ऐसा कोई बड़ा भक्त आज तक नहीं हुआ, जो ज्ञानी न हो। शंकराचार्य ज्ञानी के रूप में प्रसिद्ध हैं परंतु उनसे बड़ा भक्त भी कौन है। आज भी सनातन धर्म के मंदिरों में उनके भक्ति-भाव भरे श्लोक गाए जाते हैं। भगवान विष्णु, शिव, माता दुर्गा, माता लक्ष्मी, नरसिंह भगवान की स्तुतियाँ तो प्रसिद्ध ही हैं, गंगा मैया की भी सबसे भावमय स्तुति उन्होंने ही की है। उनके अन्नपूर्णा स्त्रोतं का नित्य गायन देश भर में होता है।<br />स्वामी दयानन्द की छवि तो शुष्क ज्ञानी की है। परम तेजस्वी, तर्क-सम्पन्न, प्रज्ञावान। वे भी ईश्वर के बड़े भक्त थे। उनकी भक्ति असंदिग्ध है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong>गोपियाँ ज्ञानी भी थीं</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">ब्रज की गोपियों का प्रेम और भक्ति ही प्रसिद्ध है। उद्धव जब उन्हें ज्ञान देने लगे तो उन्होंने कहा- <span style="color:rgb(132,63,161);"><strong>‘निर्गुण कौन देश को बासी। को है मात, पिता को कहिमत, कौन दास, को दासी।’ </strong></span>उद्धव  थोड़ी देर से समझे कि ये हंसी-हंसी में कितना ज्ञान व्यक्त कर रही हैं। नारद-भक्ति सूत्र में कहा है- ‘भक्ति परम प्रेम रूपा है। यथा ब्रज गोपिकानां’ जैसे ब्रज की गोपिकाएं परम पे्रम करती थीं श्रीकृष्ण से। परन्तु अगला ही सूत्र है- <span style="color:rgb(132,63,161);"><strong>‘न तत्रापि माहात्म्य-ज्ञान-विस्मृति-अपवाद:।’ </strong></span>अर्थात वे भी भगवान के माहात्म्य ज्ञान से सम्पन्न हैं। उन्हें कभी भी भगवान का महात्म्य विस्मृत नहीं होता। वे भी प्रेम और ज्ञान के समन्वय की अपवाद नहीं हैं। नियम ही है। उन्हें श्रीकृष्णा के माहात्म्य का पूरा ज्ञान है। वे किसी सामान्य किशोर पर अनुरक्त नहीं हैं। देह के रूप, गुण पर मुग्ध नहीं हैं। वे उनके भागवत-ऐश्वर्य, परम ज्ञानमय सम्पन्न शक्ति को जानती हैं। उन्हें सर्वज्ञ, सर्वगुणोपेत, सर्वतेजोमय, सर्वव्यापी सत्ता की ही अवतारी अभिव्यक्ति जानकर प्रेम करती हैं। इसी से वे भक्ति का मूर्तिमत स्वरूप हैं। श्रीमद्भागवत पुराण के दशम स्कंद में 31वें अध्याय में वे कहती हैं- हे परम प्रिय कृष्ण, आप केवल यशोदानन्दन और गोपिकानंदन नहीं हैं-</h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong>‘न खलु गोपिकानन्दनो भवान्</strong></span><br /><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong>अखिल देहिनाम् अन्तरात्म-दृक।’</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">‘आप तो समस्त प्राणियों की अन्तरात्मा हैं।’ इससे स्पष्ट है कि ज्ञानपूर्वक ही भक्ति होती है। नारद- भक्तिसूत्र का अगला ही सूत्र है- ‘तद् विहीनं जाराणाम् इव।’ अर्थात भगवान के माहात्म्य ज्ञान से रहित जो उनसे प्रेम है, वह उस प्रकार का है जैसे कोई कुलटा स्त्री पति से प्रेम दिखाते हुए किसी अन्य से भी वैसा ही प्रेम दिखाए, अर्थात वह व्यभिचार है, प्रेम नहीं।<br />इस प्रकार के ज्ञान से रहित भाव मात्र प्रेम नहीं है। वह मात्र मन की तरंग है। सात्विक तरंग है जो चित्त में सात्विक उल्लास देती है। वह भावना उत्कट हो, तीव्र हो, सच्ची हो तो परमगुरु परमेश्वर स्वयं ऐसे भावकों को ज्ञान की दिशा दिखा देंगे। परन्तु वह भाव भक्ति तभी कहलाएगा, जब उसमें भगवान की महिमा का ज्ञान होगा। अन्यथा वह भाव की माया में भटकता रहेगा।<br />नारद जी कहते हैं- ‘क: तरति, क: तरति मायां? य: संगस्त्यजति, महानुभावं सेवते निर्ममो भवति।’ माया से वही तरता है जो मात्र भावुक आसक्ति नहीं रखता अपितु जो ज्ञानियों का सेवन करता है और निर्मम होता है, यानी अन्य विषयों में ममता नहीं रखता।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong>राष्ट्रभक्त वही है, जो राष्ट्र की महानता जानता है</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">जो बातें ईश्वर भक्ति के लिए सत्य हैं, वे ही नियम राष्ट्रभक्ति पर लागू होते हैं। राष्ट्र की महिमा का ज्ञान आवश्यक है। उसका इतिहास, उसके वैभव, उसके बड़प्पन, उसकी विराटता का ज्ञान होने पर ही राष्ट्रभक्ति कही जाएगी। किसी नेता का भाषण सुनकर या चारों ओर राष्ट्र की चर्चा और नारेबाजी सुनकर जो भाव जगता है, वह आरम्भ बिन्दू है, परन्तु फिर भारत की महिमा, भारत का सच्चा इतिहास, उसकी विशेषताएं, उसका वैभव, उसके गुण, उसकी धर्म-साधना का सतत् प्रवाह इन सबका ज्ञान आवश्यक है। तभी राष्ट्रभक्ति होगी, अन्यथा वह एक भावुक मतवाद होगा। उसमें आप राष्ट्र के सनातन आधारों पर आघात करते हुए भी स्वयं को राष्ट्रवादी मानते रहेंगे। यही माया है, भटकन है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong>भटकाव भरे राष्ट्रवाद के दृष्टान्त</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">राहुल सांस्कृत्यायन नाम से एक प्रसिद्ध कम्युनिस्ट लेखक थे। वे स्वयं को भारत राष्ट्र का सेवक कहते थे। १९६२ ई० में उन्होंने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से और माओ जे दुंग से प्रार्थना की कि आप भारत के वर्तमान शासन को उखाड़ फेंको, हम सब जयमाला लेकर आपका स्वागत करेंगे। इसी उत्साह में उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा- ‘आज मैंने बड़ा सुन्दर स्वप्र देखा। मैंने देखा कि चीनी वायुयान दिल्ली के अंतरिक्ष में मंडरा रहे हैं और ध्वनि-प्रसारक यंत्र से उद्घोषणा कर रहे हैं कि भारत के क्रांतिकारी भाई-बहनों, हम आपके मित्र हैं, आपका कल्याण करने आए हैं। नीचे दिल्ली केलाखों लोग फूल-मालाएँ लिए उनके स्वागत को तैयार खड़े हैं।’ यह राष्ट्रवाद वस्तुत: राष्ट्र द्रोह का पर्याय है।<br />इसी प्रकार एक अन्य कम्युनिस्ट हुए डॉ. रामविलास शर्मा। उन्होंने आर्य-आक्रमण की गप्प का बहुत व्यवस्थित खण्डन किया। वे निश्चय ही देश से प्रेम करते थे पर जब सोवियत संघ की सेनाओं ने अफगानिस्तान में हस्तक्षेप किया तो उनका स्वागत करते हुए उन्होंने लिखा कि इसी प्रकार का सैनिक हस्तक्षेप सोवियत सेनाओं को भारत में भी करना चाहिए और यहाँ की कांग्रेस सरकार को सत्ता से बलपूर्वक हटाकर कम्युनिस्ट शासन स्थापित करना चाहिए। यह स्पष्ट राष्ट्रघाती विचार है, पर वे इसे राष्ट्रप्रेम मान रहे थे।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong>भारत को गुलाम बताना अज्ञान है</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">इन दिनों अन्य कई समूह राष्ट्र से इसी प्रकार का प्रेम करते हैं। वे बिना सच्चा इतिहास जाने भारत को १००० वर्षों तक मुस्लिम शासन के अधीन और २०० वर्षों तक ब्रिटिश शासन के अधीन रहा मानकर हिन्दु समाज को नपुंसक, बुराइयों से भरपूर बताकर धिक्कारते रहते हैं, यही उनका राष्ट्रवाद है जो उनके नेता के भाषणों से उपजा है, भारत के ज्ञान से इसका काई भी सम्बंध नहीं है।<br />सत्य यह है कि इस्लाम का शासन भारत के किसी भी हिस्से में एक दिन नहीं रहा। उसका प्रयास अवश्य होता रहा है। मुस्लिम शासन उसे कहते हैं, जिसमें राजा, सेनापति, खजांची सहित सभी महत्वपूर्ण पद मुसलमानों के पास हों। ऐसा भारत में कभी कहीं नहीं था। हर मुस्लिम राजा के सेनापति, खजांची तथा अन्य अधिकारी हिन्दू होते थे। अत: वह हिन्दू-मुस्लिम साझा शासन कहलाएगा, मुस्लिम शासन नहीं। कुछ उग्रवादी गिरोह इस्लाम की आड़ लेकर मंदिर तोड़ देते थे तो हिन्दू लोग पुन: मंदिर बना लेते थे। अकबर के शासन में सैकड़ों छोटे-बड़े मंदिर बने। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong>दिल्ली से आगरा तक ही थी मुगलिया जागीर</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">दूसरी ओर जिसे भारत में मुगल शासन कहते हैं, वह दिल्ली से आगरा-फतेहपुर सीकरी तक फैली जागीर थी। शेष भारत के विशाल हिस्से में हिन्दू राजा थे जो मुगल क्षेत्र से लगभग २५ गुना बड़ा क्षेत्र था। राजा मानसिंह, महाराजा जसवंत सिंह आदि प्रसिद्ध सेनापति अकबर के थे। टोडरमल उनके कोषाध्यक्ष व भूमि प्रबंधन के अधिकारी थे। श्रेष्ठ हिन्दू कलाकार, संगीतज्ञ वहाँ सम्मान पाते थे। प्रख्यात जैन कवियों ने अकबर की कीर्ति में महाकाव्य रचे हैं। जो संगीत और चित्रकला इस्लाम में वर्जित है, उसको भरपूर संरक्षण अकबर ने दिया।<br />अकबर कभी भी हज करने नहीं गया, जो हर सच्चे मुसलमान के लिए अनिवार्य है। यहाँ तक कि औरंगजेब की सेना के भी मुख्य सेनापति जोधपुर नरेश थे और राजा उदय प्रताप ने छत्रपति शिवाजी से औरंगजेब के पक्ष में युद्ध किया था। महाराणा प्रताप से छत्रपति शिवाजी महाराज तक हिन्दू से मुसलमान राजाओं ने जो भी युद्ध किए, उनमें हिन्दू सेनापति, मुस्लिम राजा की ओर से भी थे। अत: इसे हिन्दू-मुस्लिम युद्ध नहीं कहा जा सकता।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong>स्वतंत्र हिन्दू राजाओं को गुलाम बताना अपराध है</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">अकबर की जागीर से बहुत बड़े क्षेत्र में राजपूतों के राज्य थे। जाटों, गूजरों, अहीरों और गोंडों की स्वतंत्र जागीरें थी। बुंदेलों का राज्य था। दक्षिण में बहुत बड़े-बड़े हिन्दू राज्य थे यादवों, पाण्ड्यों, चोलों, आन्ध्रों आदि के। विजयनगर साम्राज्य था। उड़ीसा में खंडाइतों का बड़ा राज्य था। असम में अहोमों का, नगा, मिजो, मैती, खासी, संथाल, भील, खैरवारों के स्वतंत्र राज्य थे। सबको गुलाम बताना अपराध है।<br />जब से औरंगजेब ने शिवाजी के साथ छल और वचन भंग किया, राजपूतों ने उससे दूरी बना ली। तो जाटों ने उस पर आक्रमण तेज कर दिए। जाटों के डर से औरंगजेब भागा-भागा २६ वर्षों तक दक्षिण में भटकता रहा और वहीं मर गया। उसके बाद से भारत में मराठों, राजपूतों, आन्ध्रों, चेरों, यादवों के राज्य रहे। कैसा मुस्लिम राज्य? औरंगजेब भी कभी हज करने नहीं गया। वस्तुत: कोई भी मुस्लिम राजा पक्का मजहबी नहीं था। ये सुविधा अनुसार लूटपाट, नृशंसता और छल के लिए इस्लाम की आड़ ले लेते थे तथा शेष समय हिन्दुओं से घुले-मिले रहते थे। उनके काल को मुस्लिम काल कहकर पहली बार इलियट एवं डाउसन ने 19वीं शती ईस्वी में प्रचारित किया।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong>इंग्लैंड का सच</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">जहाँ तक अंगे्रजों की बात है, पहले इंग्लैंड के सबसे कमजोर लोगों को कम्पनी ने कर्मचारी की आड़ में छिनैती-डकैती करने भेजा। क्लाइव आदि इंग्लैंड के बेरोजगार छोकरे थे। जीने-खाने के लिए कम्पनी की सेवा में आए इन लोगों के मन में लूट, ठगी, हत्या, विश्वासघात, छल करने में कोई झिझक नहीं थी क्योंकि उन दिनों इंग्लैंड का समाज इसी प्रकार का था और ये उसमें निचले तबके के लोग थे।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong>कुल 90 वर्ष रहा ब्रिटिश शासन</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">इन कम्पनी कर्मचारी अंगे्रजों की पत्नियां और बहनें भी भारत में वेश्यावृत्ति करती थीं धन के लिए, यह स्वयं इंग्लैंड में छपी अनेक पुस्तकों में लिखा है। कुछ नवाब तथा धनी इन गोरी वैश्याओं को शौक से पालते थे। इन्हीं से जासूसी कराकर कम्पनी के लोगों ने भारतीय राजाओं को आपस में लड़वाया। जब १८५७ में कम्पनी को मार भगाने को भारतीय राजा-रानी महारानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व में संगठित हुए तो कतिपय अन्य राजाओं ने इंग्लैंड जाकर वहाँ की रानी से संधि कर ली और भारतीय राजाओं को हटाने में रानी की मदद की। यह बात स्वयं रानी विक्टोरिया ने १ नवंबर 1958 की सार्वजनिक घोषणा करते हुए बताई और अपने भतीजे कर्जन को भारत में ब्रिटिश वायसराय नियुक्त किया। स्वयं रानी ने कहा कि आज १ नवंबर 1857 से कम्पनी के प्रमुख क्षेत्र में पहली बार ब्रिटिश राज्य स्थापित हो रहा है और भारत के राजाओं-रानियों से हमारी इस पर संधि है। इस प्रकार स्वयं रानी विक्टोरिया के अनुसार कुल 90 वर्षों तक भारतीयों के सहयोग से आधे भारत में इंग्लैंड का शासन रहा। इसे 200 वर्षों तक सम्पूर्ण भारत में ब्रिटिश शासन बताना असत्य की पराकाष्ठा है। पर राष्ट्रवाद के नाम पर यह झूठ अनेक भारतीय नेता बोलते हैं। ऐसा झूठा कथन राष्ट्रभक्ति का द्योतक नहीं है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong>ज्ञान रहित राष्ट्रवाद के खतरे</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">भारत के इतिहास के विषय में जब झूठ गढ़ा जाएगा तो वर्तमान का विश्लेषण भी झूठा ही होगा। उस झूठ के आधार पर राष्ट्र के लिए बनाई गई नीतियां भी राष्ट्र का अहित करेंगी। इसलिए ज्ञानरहित राष्ट्रवाद, राष्ट्रभक्ति नहीं है। वह मन की तरंग है, उसमें राष्ट्र का अहित है।<br />स्वयं अंग्रेजों ने १९वीं शती ईस्वी के पूर्वार्ध में आधे से अधिक भारत का सर्वेक्षण किया। उनकी रिपोर्टों का सार स्वयं प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी सार्वजनिक रूप में दो वर्ष पूर्व प्रसारित कर चुके हैं। तदानुसार भारत के प्रत्येक गांव में एक पाठशाला थी। कस्बों एवं शहरों में अधिक पाठशालाएँ जनसंख्या के अनुसार होती थी। इनमें हर एक जाति के बच्चे पढ़ते थे और शिक्षक भी सभी जातियों के होते थे। जब यह एक अधिकृत रिपोर्ट है तो कुछ जातियों को शिक्षा से वंचित रखने की बात कितनी अधिक झूठी है। ब्रिटिश शासन के ९० वर्षों में जो गरीबी बढ़ी, विषमता बढ़ी, कंगाली बढ़ी, उसमें सभी जातियों को बहुत कष्ट उठाना पड़ा। अब इस सत्य को छुपाकर राष्ट्रीय नीतियाँ बनाना राजनैतिक मतवाद तो है, किंतु राष्ट्रभक्ति नहीं।<br />इतिहास के अज्ञान से उपजी नीतियाँ सत्य पर आधारित नहीं हैं। कुछ तो ऐसे उत्साही राष्ट्रवादी युवक विगत वर्षों में हुए हैं जो अंग्रेजों का राज सैकड़ों साल का बताते हैं और मुसलमानों का हजारों वर्ष। इन कार्टून लोगों में राष्ट्र के प्रति भावना तीव्र है पर ज्ञान के अभाव में वे राष्ट्रभक्त नहीं हैं। उल्टे, राष्ट्र के लिए उनके झूठे प्रचार घातक हैं।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong>मिथ्या राष्ट्रवाद से क्षति</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">झूठ और प्रचार के आधार पर राष्ट्र को देखना राष्ट्रवाद कहा जाता है परंतु वह राष्ट्रभक्ति  का अभाव है। कुछ लोगों में यह राष्ट्रवादी उत्साह इतना अधिक है कि वे कहते हैं कि भारत अभी भी अंग्रेेजों का गुलाम है। वे इसके लिए ‘इंडिया इंडिपेंडेंस एक्ट 1946-47’ का हवाला देते हैं। सत्य यह है कि कांग्रेस के नेता इस विषय में अधिक बुद्धिमान थे। संविधान लागू होने के साथ ही स्वयं संविधान में यह अंकित है कि आज से ‘इंडिया इंडिपेंडेंस एक्ट 1947’ ‘रिपील’ किया जाता है, जिसका अर्थ है कि ‘कालबाह्य एवं अप्रासंगिक हो जाने से अब वह रद्द किया जाता है।’ इस प्रकार ‘इंडिया इंडिपेंडेंस एक्ट 1947’ अधिकृत रूप से विधिक स्तर पर रद्द किया जा चुका है। इस ज्ञान से शून्य लोग भारत को अभी भी ब्रिटिश गुलाम बताने का प्रज्ञापराध करते रहते हैं।<br />भारत के विषय में तथा हिन्दु समाज के विषय में इसी प्रकार की सैकड़ों अज्ञानमूलक बातें विगत ७७ वर्षों में रची और फैलाई गई हैं। अनेक राष्ट्रवादी इन झूठे प्रोपेगेंडा की चपेट में हैं और उनसे प्रभावित हैं। वे भारत के गौरवशाली इतिहास, अभूतपूर्व न्याय व्यवस्था, अद्वितीय विद्या परम्परा एवं वीरता की भव्य परम्परा से अपरिचित हैं। इसलिए वे राष्ट्र के विषय में नितांत गलत विचार एवं धारणाएं, राष्ट्रवादी उत्साह में व्यक्त करते रहते हैं। यह उत्साह मन की तरंग है। इसे राष्ट्रभक्ति नहीं कहा जा सकता। ज्ञानपूर्वक ही राष्ट्रभक्ति सम्भव है। ज्ञान से रहित भावना भक्ति नहीं होती। वह मन की तरंग होती है।  </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र-चिंतन</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>सितम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Sep 2024 17:52:05 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>स्वास्थ्य समाचार</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><strong>67% मरीज इलाज के लिए निजी अस्पतालों पर निर्भर</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>युवाओं में बढ़ा कैंसर का खतरा, 20 फीसदी मरीजों की आयु 40 से कम</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">देश के युवा कैंसर की गिरफ्त में हैं। यह खुलासा ऑन्कोलॉजिस्ट के एक समूह के शुरू किए एनजीओ कैंसर मुक्त भारत फाउंडेशन की रिपोर्ट में हुआ है। एनजीओ की कैंसर मरीजों के लिए चलाई जाने वाली हेल्पलाइन पर दूसरी राय लेने के लिए फोन करने वालों में 20 फीसदी कैंसर मरीज 40 साल की कम उम्र के है। यह साफ इशारा है कि युवाओं में कैंसर बढ़ रहा है।<br />कैंसर मुक्त भारत फाउंडेशन के मुताबिक, मरीजों के</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3602/health-news"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-03/035c72b9e706f7805aa817d3fa91.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><strong>67% मरीज इलाज के लिए निजी अस्पतालों पर निर्भर</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>युवाओं में बढ़ा कैंसर का खतरा, 20 फीसदी मरीजों की आयु 40 से कम</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">देश के युवा कैंसर की गिरफ्त में हैं। यह खुलासा ऑन्कोलॉजिस्ट के एक समूह के शुरू किए एनजीओ कैंसर मुक्त भारत फाउंडेशन की रिपोर्ट में हुआ है। एनजीओ की कैंसर मरीजों के लिए चलाई जाने वाली हेल्पलाइन पर दूसरी राय लेने के लिए फोन करने वालों में 20 फीसदी कैंसर मरीज 40 साल की कम उम्र के है। यह साफ इशारा है कि युवाओं में कैंसर बढ़ रहा है।<br />कैंसर मुक्त भारत फाउंडेशन के मुताबिक, मरीजों के लिए निशुल्क दूसरी राय लेने के लिए हेल्पलाइन नंबर (93-555- 20202) शुरू किया गया। यह सोमवार से शनिवार तक सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक चालू रहता है। कैंसर मरीज प्रमुख ऑन्कोलॉजिस्ट से सीधे बात करने के लिए इन हेल्पलाइन नंबर पर कॉल कर सकते हैं या कैंसर के इलाज पर चर्चा करने के लिए वीडियो कॉल भी कर सकते हैं। इस हेल्प लाइन पर एक मार्च से 15 मई के बीच 1,368 कैंसर मरीजों की कॉल उन्हें आई थीं। एनजीओ के मुताबिक, सबसे ज्यादा कॉल हैदराबाद से थीं। इसके बाद मेरठ, मुंबई और नई दिल्ली का नंबर था। इनमें 40 साल से कम उम्र के कैंसर मरीजों में 60 फीसदी मरीज पुरुष थे।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>सिर और गर्दन के कैंसर सबसे अधिक</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">अध्ययन में देखा गया कि सबसे अधिक सिर और गर्दन के कैंसर (26 फीसदी) के थे। इसके बाद गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर (16 फीसदी), स्तन कैंसर (15) फीसदी) और फिर रक्त कैंसर (9 फीसदी) थे। अध्ययन में यह भी पाया गया कि भारत में 27 फीसदी मामलों में कैंसर का पता चरण 1 और 2 और 63 फीसदी में चरण 3 या 4 में पहुंचने पर पता चलता है। हेल्पलाइन पर कैंसर रोगियों आम सवाल अपने इलाज के सही, अपडेटेड, नवीनतम होने और दवाई को लेकर थे। वहीं, कई मरीज अपने कैंसर के चरण और रोकथाम के बारे में जानकारी लेते थे।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>उपचार में मिलेगी मदद...</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">कैंसर मुक्त भारत अभियान का नेतृत्व करने वाले मुख्य अन्वेषक और वरिष्ठ ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. आशीष गुप्ता का कहना है कि हेल्पलाइन नंबर के लॉन्च के बाद से यह पूरे भारत में कैंसर मरीजों के लिए मददगार प्रणाली साबित हुई है। इस पर हर दिन लगभग सैकड़ों कॉल आती हैं। यह अध्ययन हमें इलाज के लिए अधिक लक्षित कैंसर दृष्टिकोण अपनाने और भारत को कैंसर मुक्त बनाने में मदद करता है। भारत जैसी बड़ी आबादी वाली देश में सही स्क्रीनिंग को कम अपनाने की वजह से लगभग दो तिहाई मामलों में कैंसर का देर से पता चलता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>कैंसर मरीज निजी अस्पतालों के भरोसे</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">अध्ययन से पता चला कि 67 फीसदी कैंसर रोगी निजी अस्पतालों में तो 33 फीसदी सरकारी अस्पतालों में इलाज करा रहे थे। डॉ. आशीष गुप्ता का कहना है कि हमारे देश में बढ़ता मोटापा, आहार संबंधी बदलाव, खास तौर से अल्ट्रा- प्रोसेस्ड भोजन की खपत में बढ़ोतरी और गतिहीन जीवनशैली भी उच्च कैंसर दर को बढ़ा रही है।</h5>
<h5 style="text-align:left;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>साभार : अमर उजाला</strong></span><br />https://www.amarujala.com/india-news/cancer-mukt-bharatfoundation-<br />report-claims-increased-risk-of-cancer-amongindian-youth-2024-05- </h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>विभिन्न कारणों से दुनिया भर में डिप्रेशन के शिकार लोगों की संख्या बढक़र 28 करोड़ हुई</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>अमेरिका: वर्कप्लेस पर काम के दबाव से 34% डिप्रेशन में, इसके लक्षण बिना रुके काम करना, सहकर्मियों से दूरी और काम में दिलचस्पी का खोना</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">अमेरिका में वर्कप्लेस (कार्यस्थलों) में मेंटल हेल्थ एक गंभीर मुद्दा बनता जा रहा है। द कॉन्फ्रेंस बोर्ड के सर्वे के अनुसार, काम का तरीका और इसके दबाव से अमेरिका में 34% कर्मचारी ​डिप्रेशन के शिकार हैं। हालांकि, यदि आप वर्कप्लेस पर डिप्रेशन से गुजर रहे हैं तो आप अकेले नहीं हैं, दुनिया भर में 28 करोड़ लोग विभिन्न कारणों से इसके शिकार हैं।<br />वर्कप्लेस पर डिप्रेशन के कई लक्षण तो तुरंत समझ में आ जाते हैं लेकिन कई ऐसे होते हैं कि हम उसे सामान्य मान नजरअंदाज कर देते हैं। इसमें काम की आदतें भी शामिल हैं। आइए जानते हैं काम की 4 आदतों के बारे में जो डिप्रेशन के लक्षण हो सकते हैं।<br /><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>1.    बिना रुके काम और घर जाने का मन न करना : </strong></span>यदि आप काम में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि घर जाने का मन नहीं करता? संभव है कि आप काम में खुद को इसलिए डुबो रहे हों ताकि व्यक्तिगत समस्याओं से बच सकें। यह डिप्रेशन का संकेत हो सकता है।<br /><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>2.    सहकर्मियों से दूरी बनाना :</strong></span> यदि आप पहले मिलनसार थे और अब सहकर्मियों से दूर रहने लगे हैं, मीटिंग्स में भाग नहीं ले रहे, तो यह डिप्रेशन के संकेत हो सकते हैं। सहकर्मियों से दूरी कार्यक्षमता को प्रभावित वकरती है व इससे आप अकेलापन महसूस कर सकते हैं।<br /><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>3.    काम में दिलचस्पी का खोना :</strong></span> यदि आप अपने काम में दिलचस्पी खो चुके हैं। क्या आप स्क्रीन पर बस खाली नजरें डालते रहते हैं और महत्वपूर्ण कार्यों को नजरअंदाज करते हैं? तो यह भी डिप्रेशन के लक्षण हो सकते हैं। जब आप अपने काम में दिलचस्पी खो देते हैं, तो आपकी प्रोडक्टिविटी कम हो जाती है और आप अपने कामों को टालते रहते हैं।<br /><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>4.    समय पर काम पूरा न कर पाना :</strong></span> यदि आप समय पर काम पूरा नहीं कर पा रहे हैं, या आप लगातार देर से ऑफिस आ रहे हैं, यह भी डिप्रेशन के लक्षण हो सकते हैं। टाइम मैनेजमेंट में समस्या, फोकस्ड न रह पाना, और काम के प्रति उदासीनता यह सभी इस बात के संकेत हैं कि आपको मेंटल हेल्थ पर ध्यान देने की जरूरत है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>डिप्रेशन के लक्षण खुद पर हावी होने से पहले उन्हें पहचानना जरूरी</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">मनोचिकित्सक गार्सिया ​के अनुसार, वर्कप्लेस पर डिप्रेशन के लक्षण खुद पर हावी होने से पहले उन्हें पहचानना और डाक्टर से प्रामर्श करना जरूरी है। इससे निपटना हमारी व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। कंपनियों को भी इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है। डिप्रेशन की पहचान के लिए स्क्रीनिंग प्रोग्राम और जागरूकता अभियान चलाते रहना चाहिए। ताकि कर्मचारी अपनी मानसिक स्थिति समझ सकें।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>साभार : दैनिक भास्कर</strong></span><br />https://www.bhaskar.com/happylife/news/280-millionpeople-worldwide-suffer-fromdepression-133293541.<br />html#:~:text=अमेरिका%20में%20वर्कप्लेस%20पर%20<br />काम,%E2%80%8Bडिप्रेशन%20के%20शिकार%20</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>इंडियन टेस्ट सेहत को लेकर भारतीय फिक्रमंद</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>73% स्नैक्स लेने से पहले देखते हैं न्यूट्रिशनल वैल्यू</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">हर चार में से तीन यानी 73% भारतीय स्नैक्स खरीदने से पहले उसके लेबल पर इंग्रीडिएंट्स और न्यूट्रिशनल वैल्यू पढ़ते हैं। यह ट्रेंड भारतीयों के बीच बढ़ रही हेल्दी स्नैक्स की चाहत को दर्शाता है। हेल्दी स्नैकिंग रिपोर्ट 2024 के मुताबिक भारत में 10 में से 9 यानी 93% लोग पारंपरिक स्नैक्स को सेहतमंद मानते हैं। 60% नेचुरल, एडिटिव-फ्री प्रोडक्ट चुन रहे हैं, जिनमें नट्स, सीड्स और खड़ा अनाज जैसे पौष्टिक तत्व होते हैं। इसमें देशभर के 6,000 से अधिक लोगों की राय जानी गई।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>नाश्ते में मखाना, नट्स लोगों की पहली पसंद</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">67% भारतीय पोषक तत्वों से भरपूर विकल्प पसंद करते हैं। 23- 38 साल के 59% लोगों ने मखाने, ड्राई फ्रूट्स को भरोसेमंद नाश्ता बताया। 22 साल तक की उम्र के जेन-जी (49%) और 39-54 साल तक के जेन-एक्स (47%) ने इसे अपनी पसंद बताया।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>मीठे में चॉकलेट पहले और आम दूसरे नंबर पर</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">देश में सभी आयु वर्ग के बीच चॉकलेट फेवरेट स्वीट है। 65% जेन-जी, 63% मिलेनियल्स, 46% जेन-एक्स और बूमर्स यानी 55-73 साल तक के 40% लोगों ने इसे पसंदीदा स्वीट बताया। वहीं, 50% मिलेनियल्स, 41% जेन एक्स, 40% जेन-जी और 30% बूमर्स ने चॉकलेट के बाद आम को पसंदीदा स्वीट बताया।</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>स्वास्थ्य समाचार</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>सितम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Sep 2024 17:49:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>मधुमेह लाइलाज नहीं है</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:right;">स्वामी समग्रदेव<br />पतंजलि संन्यासाश्रम, पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार</h5>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3603/diabetes-is-not-incurable"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-03/world-diabetes-day-medical-.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>मधुमेह (डायबिटीज) क्या है?</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">डायबिटीज एक ऐसी बीमारी है जिसकी विशेषता हाई ब्लड शुगर का स्तर है। ब्लड में बहुत अधिक ग्लूकोज होने से स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं और यदि ब्लड ग्लूकोज, जिसे ब्लड शुगर के रूप में भी जाना जाता है, किसी भी व्यक्ति में बहुत अधिक हो सकता है, इसे मधुमेह कहा जाता है। ब्लड शुगर ऊर्जा का प्रमुख स्रोत होता है और उस आहार से आता है जिसका सेवन किया जाता है। शरीर में इंसुलिन नामक एक हार्मोन होता है जो ग्लूकोज को कोशिकाओं में जाने में मदद करता है ताकि ऊर्जा प्रदान की जा सके।<br />टाइप-१, टाइप-२, गर्भावधि और पूर्व-मधुमेह जैसे विभिन्न प्रकार के मधुमेह होते हैं। जब कोई व्यक्ति मधुमेह से पीडि़त होता है तो शरीर इंसुलिन नहीं बनाता है और इस प्रकार ग्लूकोज शरीर की कोशिकाओं में जाने में विफल रहता है और ब्लड में रहता है। यह बढ़ा हुआ ब्लड शुगर का स्तर या ग्लूकोज का स्तर आंखों की क्षति, किडनी की क्षति, हृदय रोग आदि जैसी समस्याएं पैदा कर सकता है, इस प्रकार यदि अनुपचारित छोड़ दिया जाए तो मधुमेह एक गंभीर स्थिति हो सकती है। जबकि मधुमेह का कोई स्थायी इलाज नहीं है, यह किसी व्यक्ति के मधुमेह को संभालने और स्वस्थ और फिट जीवन जीने के लिए कदम उठा सकता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>मधुमेह के विभिन्न प्रकार क्या हैं?</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">मधुमेह उन रोगों का एक समूह है जिसमें शरीर पर्याप्त या किसी भी इंसुलिन का उत्पादन नहीं करता है, जो उत्पादित इंसुलिन का ठीक से उपयोग नहीं करता है, या दोनों के संयोजन का प्रदर्शन करता है। जब इनमें से कोई भी चीज होती है, तो शरीर ब्लड से शुगर को कोशिकाओं में ले जाने में असमर्थ होता है। यह हाई ब्लड शुगर के स्तर की ओर जाता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>मधुमेह के तीन मुख्य प्रकार होते हैं-</strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>टाइप-1 डायबिटीज :</strong> किसी व्यक्ति की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से अग्न्याशय में इंसुलिन बनाने वाली बीटा कोशिकाओं पर अटैक करती है और नष्ट कर देती है। कुछ लोगों में जीन भी इस बीमारी के कारण में एक भूमिका निभाते हैं। इस प्रकार, इंसुलिन का उत्पादन नहीं होता है और इस प्रकार हाई ब्लड शुगर होता है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>टाइप-2 डायबिटीज : </strong>यह इंसुलिन प्रतिरोध के कारण होता है। यह आनुवांशिकी और जीवन शैली कारकों का संयोजन है जैसे अधिक वजन या मोटापे के कारण इस समस्या का खतरा बढ़ जाता है। पेट में भारी वजन के कारण कोशिकाएं ब्लड शुगर पर इंसुलिन के प्रभाव के लिए अधिक प्रतिरोधी हो जाती हैं।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>जेस्टेशनल डायबिटीज (गर्भकालीन मधुमेह) :</strong> इस समस्या का मुख्य कारण गर्भावस्था के दौरान हार्मोनल परिवर्तन है। नाल हार्मोन का उत्पादन करता है और ये हार्मोन कोशिकाओं को इंसुलिन के प्रभाव के प्रति कम संवेदनशील बना सकते हैं। यह गर्भावस्था के दौरान हाई ब्लड शुगर का कारण बन सकता है। उचित आहार के माध्यम से इस बीमारी को रोका जा सकता है।</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>डायबिटीज मेलेटस के  कारण हैं-</strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>मोटापा </h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>उच्च रक्तचाप </h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>तनाव या डिप्रेशन </h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>गर्भावधि मधुमेह </h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>इंसुलिन की कमी</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>परिवार में किसी व्यक्ति को डायबिटीज़ होना</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>हाई कोलेस्ट्रॉल लेवल</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>एक्सरसाइज ना करने की आदत</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>हार्मोन्स का असंतुलन</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>हाई ब्लड प्रेशर</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>खान-पान की ग़लत आदतें</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>बढ़ती उम्र आदि।</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>डायबिटीज के लक्षण (Symptoms of Diabetes)</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">डायबिटीज (मधुमेह) के निम्नलिखित लक्षण होते हैं जैसे-</h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>Excessive Thirst – अत्यधिक प्यास</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>Unexplained Weight Loss – अपरिहार्य वजन कमी</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>Increased Hunger – बढ़ी हुई भूख</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>Fatigue – थकान</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>Slow Healing of Wounds – घावों का धीमा भरना</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>Blurry Vision – धुंधली दृष्टि</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>Numbness or Tingling in E &amp; tremities – हड्डीयों में सुन्न या झिल्ली जैसा आभास</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>Frequent Infections – बार-बार संक्रमण</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>Dry Skin and Itching – शुष्क त्वचा और खुजली</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>Mood Swings – मूड बदलना</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>Recurring Urinary Tract Infections (UTIs) – बार-बार होने वाले मूत्रमार्ग संक्रमण</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>Slow Reflexes – धीमे प्रतिक्रियाएं</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>Erectile Dysfunction – यौन अक्षमता</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>टाइप 1 और टाइप 2 मधुमेह के लिए टेस्ट</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>रैंडम ब्लड शुगर टेस्ट :</strong> एक यादृच्छिक समय पर ब्लड सैंपल लिया जाता है। जब आप आखिरी बार खाते हैं, तो डिकिलिटर (मिलीग्राम/ डीएल)-प्रति लीटर (मिमोल/ एल) - या उच्चतर 200 मिलीग्राम का एक यादृच्छिक हाई शुगर लेवल मधुमेह का सुझाव देता है।<br /><strong>फास्टिंग ब्लड शुगर टेस्ट : </strong>भोजन से पहले और भोजन के बाद रोगी के ग्लूकोज के स्तर का परीक्षण किया जाता है। यदि ग्लूकोज का स्तर सामान्य से 100 मिलीग्राम / डीएल से कम है। बार-बार अलग-अलग परीक्षणों के बाद भी 126 मिलीग्राम / डीएल या अधिक से उपवास ब्लड शुगर का स्तर मधुमेह की पुष्टि करता है।<br /><strong>ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन (A1C) टेस्ट :</strong> यह टेस्ट दिखाता है कि टेस्ट से 2 से 3 महीने पहले व्यक्ति का औसत ब्लड शुगर लेवल क्या था। ब्लड शुगर सैंपल भोजन से पहले या बाद में लिया जा सकता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>डायबिटीज की जटिलताएं (Diabetes Complications)</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">मधुमेह कई लम्बी स्वास्थ्य जटिलताओं को जन्म दे सकता है। यह मुख्य रूप से अत्यधिक या लंबे समय तक हाई ब्लड शुगर लेवल के कारण हो सकता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>हाइपरस्मोलर हाइपरग्लाइसेमिक अवस्था (HHS) :</strong> यह जटिलता मुख्य रूप से टाइप-2 मधुमेह वाले लोगों को प्रभावित करती है। यह तब होता है जब रक्त शर्करा का स्तर बहुत अधिक 600 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर से अधिक होता है। इससे गंभीर डिहाइड्रेशन हो सकती है।<br />कीटोएसिडोसिस (Ketoacidosis): यह जटिलता मुख्य रूप से टाइप 1 मधुमेह वाले लोगों को प्रभावित करती है। यह तब होता है जब शरीर में पर्याप्त इंसुलिन नहीं होता है। यदि शरीर में इंसुलिन नहीं है, तो यह ऊर्जा के लिए ग्लूकोज का उपयोग नहीं कर सकता है। इसलिए यह वसा को तोडऩे लगता है। यह प्रक्रिया कीटोन्स नामक पदार्थ छोड़ती है, जो रक्त को अम्लीय बना देता है। इससे सांस लेने में तकलीफ, उल्टी और अनकॉनशसनेस होती है।<br /><strong>निम्न रक्त शर्करा (Hypo Glycemia) :</strong> जब ब्लड शुगर लेवल सीमा से नीचे चला जाता है, तो हाइपोग्लाइसीमिया हो जाता है। गंभीर हाइपोग्लाइसीमिया बहुत कम रक्त शर्करा है। यह मुख्य रूप से मधुमेह वाले लोगों को प्रभावित करता है, जो इंसुलिन का उपयोग करते हैं। धुंधली दृष्टि या डबल विजन, दौरे पडऩा और अन्य मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम इसके कारण हो सकती हैं।</h5>
<h5 style="text-align:justify;">डायबिटीज परामर्श आहारोपचार </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>औषधीय जल-</strong> सौंफ+मेथी का पानी।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>एंटी डायबिटिक काढ़ा-</strong> गिलोय+कुटकी+चिरायता।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>नाश्ते में-</strong> भीगे हुए बादाम-5, अखरोट-2, उबाले टमाटर-2, लहसुन-2, अंकुरित मेथी, जौ का दलिया, फलों में- नाशपाती, सेव व पपीता।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>दोपहर का भोजन-</strong> खाने से पहले- करेला का जूस, मेथी सरसों का पाउडर, 1-2 एंटी-डायबिटिक रोटी, सूप (लौकी), उबली हुई सब्जी (लौकी, टिंडा, तोरई)</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>दोपहर के भोजन उपरांत-</strong> जूस (करेला+खीरा+सदाबहार के पत्ते+टमाटर+गिलोय), भुना मखाना।<br />रात्रि भोजन- खाने से पहले- करेला का जूस, मेथी सरसों का पाउडर, 1-2 एंटी-डायबिटिक रोटी/जौ का दलिया, सूप  (लौकी), उबली हुई सब्जी (लौकी, टिंडा, तोरई)<br />नोट- अत्यधिक कमजोरी होने पर सोया पनीर/मशरूम टिक्का।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>रात्रि भोजन के उपरांत- </strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1. एंटी डायबिटिक काढ़ा (गिलोय+कुटकी+चिरायता) <br />2. उटनी के दूध</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>उपचार</strong></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>हॉट एंड कोल्ड कॉम्प्रेस (लीवर +पैनक्रियाज)।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>न्यूट्रल हिप बाथ।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>हॉट फूट बाथ।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>काफ मसाज एंड लपेट।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>एनीमा, जलनेति, रबर नेति, कुंजल।</h5>
</li>
</ul>
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>मधुमेह के लिए योग </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>आसन :</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">मंडूकासन, शशकासन, योगमुद्रासन, वक्रासन, गोमुखासन, पवनमुक्तासन, उत्तानपादासन, नौकासन, कन्धरासन, पादांगुष्ठनासास्पर्शासन</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>प्राणायाम :</strong><br />1. भस्त्रिका, 2. कपालभाति, 3. बाह्य प्राणायाम (अग्निसार-सहायक क्रिया), 4. उज्जायी, 5. अनुलोम-विलोम, 6. भ्रामरी, 7. उगिथ, 8. प्रणवध्यान</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>प्राकृतिक चिकित्सा :</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">निम्नलिखित प्राकृतिक चिकित्सा का उपयोग मधुमेह चिकित्सा के रूप में लिया जाता है<br />1.    हॉट कोल्ड कंप्रेस<br />2.    गैस्ट्रो हैपेटिक पैक<br />3.    न्यूट्रल हिप बाथ<br />4.    मसाज<br />5.    ओजोन थेरेपी </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>हवन चिकित्सा : </strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">पतंजलि वैलनेस में मधुमेह के निदान के लिए विशेष हवन चिकित्सा अनेक औषधियों से कराई जाती है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>आयुर्वेद चिकित्सा :</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">निम्नलिखित औषधी का उपयोग कर मधुमेह में विशेष लाभ प्राप्त होता है</h5>
<h5 style="text-align:justify;">1.    चिरायता क्वाथ तथा गिलोय क्वाथ : दोनों औषधीय को मिलाकर दो चम्मच (10-15 gm)  लेकर 400ml  पानी में पकाएं, 100ml शेष रहने पर छान कर प्रात:काल खाली, सायं भोजन से एक घंटा पूर्व लें। </h5>
<h5 style="text-align:justify;">2.    मधुनाशिनी वटी, गिलोय घनवटी <br />    2-2 गोली सुबह शाम भोजन से पहले ले ।</h5>
<h5 style="text-align:justify;">3.    मधुग्रिट वटी<br />    2-2 वटी सुबह शाम भोजन के पश्चात ले।<br />   </h5>
<h5 style="text-align:justify;">निम्न उपचार योग औषधि व नियमित दिनचर्या से मधुमेह में लाभ प्राप्त किया जा सकता है।<br />पतंजलि वैलनेस में आकर तथा पूज्य महाराज श्री को आस्था इंडिया टीवी व अन्य माध्यमों से ऑनलाइन देख कर व सुनकर हजारों रोगियों ने मधुमेह में विशेष लाभ प्राप्त किया है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>अनुभव</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1)    मेरे बच्चे को बुखार हो गया था, उसका वजन भी कम होने लगा, उसके बाद गांव से थोड़ी सी दूर एक डॉक्टर को दिखाया तो उसने बताया कि बच्चों को टाइप-१ डायबिटीज की समस्या है, बच्चे को डॉक्टर ने इन्सुलिन पर रख दिया था पूरे दिन में 60 यूनिट इंसुलिन लेनी पड़ती थी। तत्पश्चात हमें पतंजलि वैलनेस का पता लगा, हम वहां पर आए और बच्चे का इलाज करवाया। आज 6 से 7 महीने हो गए मेरे बच्चे की इंसुलिन पूरी तरह से बंद है, व खाना भी नॉर्मल खाता है ।</h5>
<h5 style="text-align:right;"><strong>रोगी  का नाम : कृष</strong><br /><strong>आयु 11 वर्ष,  गुजरात</strong><br /><br /></h5>
<h5 style="text-align:justify;">2)  अगस्त 2021 में पेट दर्द उल्टी की दवा खाए जिससे टाइप-१ शुगर हो गई। 07 जनवरी 2023 को पतंजलि वैलनेस आए थे, केवल 5 दिन में इंसुलिन 10 यूनिट से घटते-घटते जीरो यूनिट हो गई। इंसुलिन अब पूरी तरह बंद है।</h5>
<h5 style="text-align:right;"><strong>रोगी  का नाम : हार्दिक पटेल</strong><br /><strong>आयु 8 वर्ष,  भोपाल, मध्य प्रदेश</strong><br /><br /></h5>
<h5 style="text-align:justify;">3)    हमारे बच्चे को भूख बहुत कम लग रही थी तो हमने उसको भूख बढ़ाने की दवाई दी, तत्पश्चात उसको प्यास भी ज्यादा लगने लगी और बाथरूम भी ज्यादा आने लगा फिर उसे हम डॉक्टर के पास लेकर गए तो हमें पता लगा कि उसको टाइप वन डायबिटीज की समस्या है डॉक्टर ने बच्चे को प्रतिदिन 40 यूनिट इंसुलिन लेने के लिए कहा, हम बच्चे को दिन में 40 यूनिट इंसुलिन दे रहे थे तत्पश्चात हमें पतंजलि वैलनेस का पता चला और हम वहां पर आए बच्चे का इलाज करवाया ,जब से हम पतंजलि वैलनेस से गए हैं तब से हमारे बच्चे को इंसुलिन लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती और डाइट भी नॉर्मल ले रहा है।</h5>
<h5 style="text-align:right;"><strong>रोगी  का नाम : आदर्श</strong><br /><strong>आयु 12 वर्ष,  कानपुर, उत्तर प्रदेश</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;">4.   मेरी बच्ची को टाइप-१ डायबिटीज की समस्या थी उसके बाद हम पतंजलि वैलनेस आए और अपने बच्चे का इलाज करवाया। जबसे हम पतंजलि वैलनेस से गए हैं तब से मेरे बच्चे का इंसुलिन बिल्कुल बंद है। उसकी डाइट भी नॉर्मल चल रही है तब भी उसकी शुगर नॉर्मल आ रही है।</h5>
<h5 style="text-align:right;"><strong>रोगी  का नाम : खुशी हुड्डा</strong><br /><strong>आयु 11 वर्ष,  राजस्थान</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;">5.    मुझे टाइप वन डायबिटीज की समस्या थी मुझे इंसुलिन लेना पड़ता था। तत्पश्चात में पतंजलि वैलनेस आई। यहां योग, विभिन्न थेरेपियों एवं आहार द्वारा मेरी डायबिटीज कंट्रोल हो गई। आज लगभग 1 साल हो गया, अब मैं डाइट भी नॉर्मल लेती हूँ और मेरी इंसुलिन भी पूरी तरीके से बंद है।</h5>
<h5 style="text-align:right;"><strong>रोगी  का नाम : अदिति</strong><br /><strong>आयु 21 वर्ष,  सोनीपत, हरियाणा</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><br />6. मेरे बच्चे को बुखार हो गया था उसको डॉक्टर के पास लेकर गए तो पता लगा कि उसे टाइप-१ डायबिटीज की समस्या है। डॉक्टर ने एक दिन में 30 यूनिट इंसुलिन देने के लिए कहा था जिस कारण हम बच्चे को प्रतिदिन 30 यूनिट इंसुलिन दे भी रहे थे। उसके बाद हम पतंजलि वैलनेस आए और बच्चे का उपचार कराया। आज लगभग 2 महीने हो गए, हमारे बच्चे को इंसुलिन लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती। डाइट भी नॉर्मल ले रहा है, उसे केवल योग का अभ्यास करवाते हैं।</h5>
<h5 style="text-align:right;"><strong>रोगी  का नाम : दीक्षित</strong><br /><strong>आयु 14 वर्ष,  महाराष्ट्र</strong><br /><br /></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>रोग विशेष</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>सितम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Sep 2024 17:47:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पतंजलि विश्वविद्यालय में शल्य-तंत्र आधारित तीन दिवसीय ‘सुश्रुतकोन’ सम्मेलन का समापन</title>
                                    <description><![CDATA[<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>हमारा प्रयास ऋषियों की विद्या को जन-जन तक पहुंचाना है: आचार्य बालकृष्ण</strong></span></h5>
<h5>  </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>पतंजलि अनुसंधान संस्थान ने योग व आयुर्वेद के क्षेत्र में देश का नाम विश्व पटल पर स्थापित किया है : प्रो. मनोरंजन साहू</strong></span></h5>
<h5>  </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>प्राचीन शास्त्र ‘शल्य तंत्र’ एवं आधुनिक शल्य चिकित्सा के समन्वय हेतु वैज्ञानिक अनुसंधान करने की आवश्यकता : प्रो. संजीव शर्मा</strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">    पतंजलि विश्वविद्यालय के सभागार में तीन दिवसीय ‘सुश्रुतकोन’ सम्मेलन का समापन पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज, आयुर्वेद शिरोमणि आचार्य बालकृष्ण जी महाराज तथा आयुर्वेद विज्ञान एवं आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के मूर्धन्य विद्वानों की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ। यह सम्मेलन शल्य तंत्र के जनक<br />शल्य</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3605/-patanjali-vishvavidyaalay-mein-shaly-tantr-aadhaarit-teen-divaseey-%E2%80%98sushrutakon%E2%80%99-sammelan-ka-samaapan-83---5-000-three-day-sushrutkon-conference-based-on-surgery-concluded-at-patanjali-university"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-03/sushrutkon-conference-at-uo1.jpg" alt=""></a><br /><ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>हमारा प्रयास ऋषियों की विद्या को जन-जन तक पहुंचाना है: आचार्य बालकृष्ण</strong></span></h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>पतंजलि अनुसंधान संस्थान ने योग व आयुर्वेद के क्षेत्र में देश का नाम विश्व पटल पर स्थापित किया है : प्रो. मनोरंजन साहू</strong></span></h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>प्राचीन शास्त्र ‘शल्य तंत्र’ एवं आधुनिक शल्य चिकित्सा के समन्वय हेतु वैज्ञानिक अनुसंधान करने की आवश्यकता : प्रो. संजीव शर्मा</strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">  पतंजलि विश्वविद्यालय के सभागार में तीन दिवसीय ‘सुश्रुतकोन’ सम्मेलन का समापन पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज, आयुर्वेद शिरोमणि आचार्य बालकृष्ण जी महाराज तथा आयुर्वेद विज्ञान एवं आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के मूर्धन्य विद्वानों की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ। यह सम्मेलन शल्य तंत्र के जनक महर्षि सुश्रुत की जयंती एवं आचार्य बालकृष्ण जी के जन्मदिवस ‘जड़ी-बूटी दिवस’ के अवसर पर पतंजलि भारतीय आयुर्विज्ञान एवं अनुसंधान संस्थान तथा पतंजलि विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वाधान में पतंजलि रिसर्च फाउण्डेशन, नेशनल सुश्रुत एसोसिएशन, भारत एवं नियोवी लेजर, इजराइल के सहयोग से किया गया। इस अवसर पर पतंजलि विश्वविद्यालय के अध्यक्ष स्वामी रामदेव जी तथा कुलपति आचार्य बालकृष्ण जी ने अतिथि विद्वानों एवं प्रतिभागियों को प्रतीक चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया। सम्मेलन में श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने कहा कि हमारा प्रयास ऋषियों की विद्या को जन-जन तक पहुंचाना है। उन्होंने उपस्थित विद्वानों एवं प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए बताया कि विधा चाहे कोई भी हो, हम सभी का लक्ष्य रोगी को शीघ्रता से स्वास्थ्य लाभ करवाना होना चाहिए। सम्मेलन के मुख्य अतिथि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पद्म भूषण प्रो. मनोरंजन साहू ने आचार्यश्री को जन्मदिवस की शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि पतंजलि अनुसंधान संस्थान ने योग व आयुर्वेद के क्षेत्र में देश का नाम विश्व पटल पर स्थापित किया है। उपस्थित प्रतिभागियों का मार्गदर्शन करते हुए उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में समेकित चिकित्सा पद्धति के विकास के साथ ही शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में गहन अनुसंधान की आवश्यकता है जिसमें पतंजलि का प्रयास निश्चित ही सराहनीय है। डॉ. अनुराग श्रीवास्तव ने शल्य एवं शालाक्य तंत्र की अनुसंधानपरक व्याख्या करते हुए आयुर्वेद की प्राचीन विरासत से सम्मेलन में आए प्रतिभागियों को अवगत कराया। <br />शल्य तंत्र विभाग, पतंजलि आयुर्वेद महाविद्यालय के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष डॉ. सचिन गुप्ता ने सम्मेलन की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए शल्य तंत्र के क्षेत्र में पतंजलि के योगदान की विषद् व्याख्या की। पतंजलि हर्बल रिसर्च डिविजन की प्रमुख- डॉ. वेदप्रिया आर्या ने सम्मेलन में आए विशेषज्ञों का स्वागत करते हुए पतंजलि अनुसंधान संस्थान द्वारा आयुर्वेद के क्षेत्र में किए गए भगीरथ प्रयास पर विस्तार से प्रकाश डाला।<br />इस अवसर पर शल्य चिकित्सा के विद्वान एवं राष्ट्रीय आयुर्वेद मानद विश्वविद्यालय, जयपुर के कुलपति प्रो. संजीव शर्मा ने सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि हम सभी को जनकल्याण के उद्देश्य से प्राचीन शास्त्र ‘शल्य तंत्र’ एवं आधुनिक शल्य चिकित्सा के समन्वय हेतु वैज्ञानिक अनुसंधान करने की आवश्यकता है।<br />पतंजलि विश्वविद्यालय के उप-कुलपति प्रो. महावीर अग्रवाल ने अपने उद्बोधन के क्रम में बताया कि इस सम्मेलन में योग, आयुर्वेद व आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की त्रिवेणी का संगम हो रहा है। पतंजलि आयुर्वेद महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. अनिल कुमार ने अध्यक्षीय उद्बोधन में बोलते हुए कहा कि पूज्य आचार्य जी का सम्पूर्ण जीवन आयुर्वेद द्वारा मानवता के कल्याण हेतु समर्पित है। उपस्थित प्रतिभागियों को उन्होंने पतंजलि आयुर्वेद हॉस्पिटल एवं पतंजलि आयुर्वेद महाविद्यालय की गतिविधियों से भी अवगत कराया। सम्मेलन के तकनीकी सत्र में डॉ. अनुराग श्रीवास्तव ने सामान्य कैंसर की रोकथाम एवं प्रबंधन हेतु आयुर्वेद के सिद्धांतों एवं आधुनिक चिकित्सा के समन्वय विषय पर एवं डॉ. विनोथ फिलिप ने वेरिकोज़ वेन्स के उपचार में लेजर की नवीन तकनीकों पर प्रकाश डाला। सम्मेलन के तीसरे सत्र में डॉ. एम.सी. मिश्रा, डॉ. मनोरंजन साहू, डॉ. शिव जी गुप्ता, डॉ. पी. हेमन्था, डॉ. सचिन गुप्ता, डॉ. संजीव शर्मा, डॉ. अजय गुप्ता द्वारा अपने संबोधन एवं समूह परिचर्चा के माध्यम से उपस्थित प्रतिभागियों का मार्गदर्शन किया गया। सम्मेलन के दूसरे दिन लेजर वैरिकोज वेन, लेप्रोस्कोपिक वैरिकोसेले और प्रोक्टोलॉजी की हाइब्रिड तकनीक विषय पर समानांतर मौखिक पेपर और पोस्टर प्रस्तुति से प्रकाश डाला गया।<br />डॉ. विनोथ फिलिप, डॉ. पी. हेमंथा, डॉ. हेमंत गुप्ता, डॉ. सचिन गुप्ता ने शल्य चिकित्सा का लाईव सत्र प्रस्तुत किया जिसकी अध्यक्षता डॉ. एम.सी. मिश्रा तथा डॉ. मनोरंजन साहू ने की। सर्जिकल प्रक्रियाओं में एकीकृत दृष्टिकोण विषय पर समानांतर मौखिक पेपर और पोस्टर सत्र प्रदर्शित किए गए जिसकी अध्यक्षता डॉ. प्रदीप भारद्वाज तथा डॉ. पी. हेमंथा कुमार ने की। डॉ. एम.सी. मिश्रा ने लैपरो एंडोहर्निया सर्जरी में प्रशिक्षण-एक सतत चुनौती : आगे बढ़ें- देखें, करें, सिखाएं विषय पर प्रकाश डाला। उन्होंने पतंजलि विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों व शोधार्थियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि सर्जरी को एक चुनौति के रूप में लें और सदैव रोगी हित को सर्वोपरि रखें।<br />काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पद्म भूषण डॉ. मनोरंजन साहू ने आयुर्वेद में साक्ष्य आधारित शल्य चिकित्सा प्रक्रिया के विषय में बताते हुए कहा कि आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा प्राचीनकाल से है जिसका जीवंत प्रमाण सुश्रुत संहिता है। महर्षि सुश्रुत को आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा का जनक कहा जाता है। डॉ. मोहित वर्मा ने प्री-ऑपरेटिव कार्डियो-डायबिटिक रिस्क एसेसमेंट विषय से छात्र-छात्राओं को अवगत कराया। उन्होंने बताया कि हृदय रोग में सर्जरी से पहले कई बातों का ध्यान रखना होता है जिसमें मधुमेह मुख्य है।<br />डॉ. शिवजी गुप्ता ने क्षारसूत्र द्वारा गुदा में फिस्टुला के प्रबंधन में क्या करें और क्या न करें विषय पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि फिस्टुला अत्यंत गम्भीर रोग है जिसका प्रामाणिक उपचार आयुर्वेद की शल्य क्रिया ‘क्षारसूत्र’द्वारा सम्भव है। डॉ. अजय गुप्ता ने ‘गुदा फिस्टुला निदान सीमाएँ’ विषय पर विषद् व्याख्या प्रस्तुत की।<br />सम्मेलन के समापन अवसर पर महर्षि सुश्रुत द्वारा प्रणीत ‘शल्य चिकित्सा’ का लाईव सत्र डॉ. पी. हेमंथा एवं डॉ. मोहित वर्मा की अध्यक्षता में डॉ. अजय गुप्ता, डॉ. शिवजी गुप्ता एवं डॉ. सचिन गुप्ता आदि चिकित्सकों द्वारा सम्पन्न हुआ। सभी प्रतिभागियों ने इस सत्र में शल्य चिकित्सा की बारीकियों को विस्तार से सीखा।<br />डॉ. पी. हेमंथा कुमार ने एनोरेक्टल डिसऑर्डर में क्षार कर्म की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि आयुर्वेद की शल्य क्रिया ‘क्षारसूत्र’ एक प्रामाणिक उपचार पद्धति है। वहीं डॉ. अनिल दत्त ने लोकल एनेस्थीसिया की जटिलता विषय पर अपना व्याख्यान दिया। पतंजलि आयुर्वेद महाविद्यालय के प्रोफेसर एवं शल्य चिकित्सा विभाग के अध्यक्ष डॉ. सचिन गुप्ता ने उपरोक्त विषय पर अपनी सारगर्भित प्रस्तुति दी तथा अपना चिकित्सकीय अनुभव उपस्थित प्रतिभागियों से साझा किया। इस सत्र में सर्जिकल प्रक्रिया के समेकित उपागम पर अतिथि चिकित्सकों द्वारा समूह परिचर्चा भी की गई। यथार्थ हॉस्पिटल के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. प्रशान्त शर्मा ने हर्निया सर्जरी विषय पर साक्ष्य आधारित सम्बोधन दिया। उन्होंने सम्मेलन के प्रतिभागियों को बताया कि सदैव रोगी हित को सर्वोपरि रखकर सर्जरी की चुनौती को हमें स्वीकार करना चाहिए।<br />समापन सत्र में पतंजलि विश्वविद्यालय एवं पतंजलि आयुर्वेद महाविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों एवं सम्मेलन के आयोजकों द्वारा अतिथि विद्वानों एवं प्रतिभागियों को प्रतीक चिह्न एवं प्रमाण-पत्र देकर सम्मानित किया गया। इस सम्मेलन में 12 राज्यों के 1100 से अधिक प्रतिभागियों ने ऑनलाईन एवं ऑफलाईन माध्यम से जुडक़र शल्य चिकित्सा की प्रक्रिया एवं जटिलता आदि विषयों पर ज्ञानार्जन किया। अतिथि विद्वानों एवं प्रतिभागियों के सम्मान में सांस्कृतिक संध्या का भी आयोजन किया गया जिसमें पतंजलि विश्वविद्यालय एवं पतंजलि आयुर्वेद महाविद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा भजन, नृत्य, योग आदि की भव्य प्रस्तुति दी गई। <br />कार्यक्रम में प्रति कुलपति डॉ. मयंक अग्रवाल, मुख्य परामर्शदाता प्रो. के.एन.एस. यादव, कुलसचिव डॉ. प्रवीन पूनिया, पतंजलि हर्बल रिसर्च डिविजन की प्रमुख- डॉ. वेदप्रिया आर्या, डॉ. केतन महाजन, डॉ. विक्रम गुप्ता, डॉ. मनोज भाटी सहित समस्त अधिकारीगण, शिक्षकगण, शोधार्थी व छात्र- छात्राएं उपस्थित रहे।</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>कार्यशाला</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>सितम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Sep 2024 17:43:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पतंजलि आयुर्वेद महाविद्यालय के तत्वावधान में दो दिवसीय समेलन ‘सौमित्रेयनिदानम्’</title>
                                    <description><![CDATA[<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>हमारा प्रयास ऋषियों की विद्या को जन-जन तक पहुंचाना है: आचार्य बालकृष्ण</strong></span></h5>
<h5>  </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>‘सौमित्रेयनिदानम्’ एक मौलिक, कालजयी और अप्रतिम रचना : स्वामी रामदेव</strong></span></h5>
<h5>  </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>अनुपलब्ध व्याधियों को एक स्थान पर नूतन रूप में स्थापित करने का प्रयास है ‘सौमित्रेयनिदानम्’ : आचार्य बालकृष्ण</strong></span></h5>
<h5>  </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>सौमित्रेयनिदानम् शास्त्रीय शैली में लिखा प्रमाणिक ग्रंथ : आचार्य जी</strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">      पतंजलि आयुर्वेद महाविद्यालय के तत्वावधान तथा पतंजलि विश्वविद्यालय के सभागार में दो दिवसीय सम्मेलन ‘सौमित्रेयनिदानम्’ का उद्घाटन स्वामी रामदेव जी महाराज, आचार्य बालकृष्ण जी महाराज, मुख्य अतिथि एवं केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के महानिदेशक प्रो. (डॉ.) रबिन्द्रनारायण आचार्य, केन्द्रीय विश्वविद्यालय नई दिल्ली के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी, भारतीय<br />ग्रन्थ</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3606/two-day-conference-%E2%80%98soumitrayanidanam%E2%80%99-under-the-aegis-of-patanjali-ayurved-college"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-03/saumitranidanam-21.jpg" alt=""></a><br /><ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>हमारा प्रयास ऋषियों की विद्या को जन-जन तक पहुंचाना है: आचार्य बालकृष्ण</strong></span></h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>‘सौमित्रेयनिदानम्’ एक मौलिक, कालजयी और अप्रतिम रचना : स्वामी रामदेव</strong></span></h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>अनुपलब्ध व्याधियों को एक स्थान पर नूतन रूप में स्थापित करने का प्रयास है ‘सौमित्रेयनिदानम्’ : आचार्य बालकृष्ण</strong></span></h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>सौमित्रेयनिदानम् शास्त्रीय शैली में लिखा प्रमाणिक ग्रंथ : आचार्य जी</strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">   पतंजलि आयुर्वेद महाविद्यालय के तत्वावधान तथा पतंजलि विश्वविद्यालय के सभागार में दो दिवसीय सम्मेलन ‘सौमित्रेयनिदानम्’ का उद्घाटन स्वामी रामदेव जी महाराज, आचार्य बालकृष्ण जी महाराज, मुख्य अतिथि एवं केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के महानिदेशक प्रो. (डॉ.) रबिन्द्रनारायण आचार्य, केन्द्रीय विश्वविद्यालय नई दिल्ली के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी, भारतीय चिकित्सा पद्धति के लिए राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष वैद्य जयंत यशवंत देवपुजारी, आयुष मंत्रालय, भारत सरकार के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा एवं आयुर्वेद के मूर्धन्य विद्वानों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन कर किया। इस अवसर पर आचार्य बालकृष्ण जी के नेतृत्व में रचित कालजयी रचना ‘सौमित्रेयनिदानम्’ के साथ-साथ सौमित्रेयनिदानम् रोगावली तथा सम्मेलन की स्मारिका का भी विमोचन किया गया।<br />ग्रन्थ का विमोचन करते हुए स्वामी रामदेव जी ने कहा कि आचार्य बालकृष्ण जी के नेतृत्व में निष्पन्न ‘सौमित्रेयनिदानम्’ एक मौलिक, कालजयी और अप्रतिम रचना है। उन्होंने कहा कि अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का भाव और उनके ज्ञान, प्रज्ञान, विज्ञान के अनुरूप नव अनुसंधानों का नवोन्मेष का समन्वय संश्लेषण करते हुए इस नवयुग में नवायुगाचार के अनुरूप नए रोग, नए विकार, नई व्याधियाँ जो संसार में पनप रही हैं, उनका स्वरूप, लक्षण व निदान सचित्र प्रस्तुत करना एक चूनौतिपूर्ण कार्य था। अभी तक हमारी ऋषि परम्परा में लगभग 234 रोगों का वर्णन प्राप्त था, हमारे ऋषियों के बोध के साथ नवबोध का समन्वय करके लगभग 500 रोगों का सचित्र स्वरूप, लक्षण व निदान अद्वितीय कार्य है। <br />सम्मेलन में श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने कहा कि आयुर्वेद शाश्वत है, अनादि है किंतु लगभग 2000 वर्ष पूर्व आयुर्वेद काल, समय, स्थिति के प्रभाव से लोगों ने आयुर्वेद को भुला दिया था। पिछले 2000 वर्ष के पूर्व के आयुर्वेद और वर्तमान समय के आयुर्वेद की कड़ी को जोडऩे का कार्य ‘सौमित्रेयनिदानम्’ के माध्यम से किया गया है। सौमित्रेयनिदानम् शास्त्रीय शैली में लिखा प्रमाणिक ग्रंथ है।<br />इस अवसर पर प्रो. (डॉ.) रबिन्द्रनारायण ने कहा कि यदि हम आयुर्वेद के इतिहास में जाएं तो देखेंगे कि आयुर्वेद के शास्त्रों पर विशेष चर्चा, उनकी समीक्षा तथा समय-समय पर युग और राष्ट्र की आवश्यकताओं के अनुसार उनका नवीनीकरण नहीं किया जाता। आयुर्वेद विज्ञान को काल व समय के आधार पर प्रगतिशील बनाना होगा। औषधीय पौधों तथा रोगों की संख्या, लक्षण व उनके निदान का वर्णन वेदों, संहिताओं, पुराणों में निघण्टुओं में अब दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। पिछले कुछ दशकों में इस कार्य में आचार्य बालकृष्ण जी की विशेष भूमिका रही है।<br />कार्यक्रम में प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने कहा कि आयुर्वेद केवल चिकित्सा पद्धति नहीं अपितु वेद, उपनिषद्, दर्शन, शास्त्र भी है। संस्कृत भाषा को बल प्रदान करते हुए उन्होंने कहा कि संस्कृत भूमि है, शास्त्र बीज रूप में उसमें उत्पन्न हुआ है। इस कृषि को आचार्य जी ने अपने अनुभव रूपी जल से सिंचित किया है। इससे एक नए निदान शास्त्र का अंकुर उत्पन्न हुआ है, इसको वृक्ष बनाना, फल प्राप्त करना, यह सब हमारा कार्य एवं कर्तव्य है।<br />सम्मेलन के प्रथम दिन प्रथम सत्र में ए.आई.आई.एम.एस. (एम्स), नई दिल्ली के प्रोफेसर तथा रोग निदान विभाग के विभागाध्यक्ष, शैक्षणिक संकायाध्यक्ष, डॉ. आनंद ने ‘हृदय रोग की अवधारणा और समकालीन अवलोकन’ विषय पर प्रकाश डाला। पारूल आयुर्वेद संस्थान, वडोदरा के प्रोफेसर डॉ. सचिन देवा ने ‘सौमित्रेयनिदानम् में शीतपित्त की खोज : व्यापक समीक्षा और विस्तृत जानकारी’ विषय पर विस्तार से चर्चा की। केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जम्मू के सहायक प्रो. डॉ. रविकांत तिवारी ने आयुर्वेद एवं योग के मतानुसार मानसिक रोग के कारण एवं निवारण पर व्याख्यान दिया।<br />पंडित खुशीलाल शर्मा शाशकीय (स्वायत्त) आयुर्वेद संस्थान, भोपाल की रोग निदान विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रीता सिंह ने रुमेटिक गठिया (आमवात), ऑस्टियोआर्थराइटिस (संधिवात) और एंकिलॉजिंग स्पॉन्डिलाइटिस (वंशकशेरु) के लिए नैदानिक ​​दृष्टिकोण पर विषद् चर्चा की। ऑस्ट्रेलियाई पाठ्यक्रम, मूल्यांकन और रिपोर्टिंग प्राधिकरण (ACARA), आयुर्वेद विद्यालय, अमृतपुरी के अनुसंधान निदेशक प्रो. डॉ. राममनोहर पी. ने ‘अनुक्त व्याधियों के मूल्यांकन और नैदानिक रूपरेखा के लिए आयुर्वेदिक नवाचार’ विषय पर व्याख्यान दिया।<br />सम्मेलन के दूसरे सत्र में एस.ए.एम. कॉलेज ऑफ आयुर्वेदिक साइंसेज एंड हॉस्पिटल, भोपाल के प्राचार्य प्रो. डॉ. अखिलेश सिंह ने जोंक चिकित्सा में बायोमार्कर और चिकित्सीय लक्ष्य, रोग निदान एवं विकृति विज्ञान विभाग, ऋषिकुल परिसर, उत्तराखण्ड आयुर्वेद विश्वविद्यालय, हरिद्वार के प्रोफेसर डॉ. संजय कुमार सिंह ने वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आयुर्वेदिक निदान प्रक्रियाओं/तकनीकों की प्रासंगिकता तथा केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, श्री सदाशिव परिसर, पुरी, उड़ीसा के डीन-यौगिक साइंस एण्ड हॉलिस्टिक हैल्थ प्रेक्टिसिस, दिल्ली के निदेशक डॉ. बनमाली बिसवाल ने ‘सौमित्रेयनिदानम् में वर्णित संक्रामक रोग और उनके उपचार’ विषय पर विषद् चर्चा की।<br />सम्मेलन में आई.एम.एस., बी.एच.यू., वाराणसी के आयुर्वेद संकाय में क्रियाशारीर विभाग के सहायक-प्राध्यापक वैद्य सुशील कुमार दूबे ने ‘आयुर्वेदिक नाड़ी परीक्षा और प्रकृति परीक्षा में निदान की भूमिका का उपयोग’ विषय पर व्याख्यान दिया।<br />अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान, नई दिल्ली के सह-प्राध्यापक डॉ. संदीप तिवारी ने ‘रोग निदान और पैथोलॉजी प्रयोगशाला के क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग का लाभ’ विषय पर उद्बोधन दिया। ऋषिकुल परिसर, हरिद्वार, उत्तराखण्ड आयुर्वेद विश्वविद्यालय के रोग निदान एवं विकृति विज्ञान विभाग की विभागाध्यक्षा डॉ. रूबी रानी ने ‘क्रिया-काल की अवधारणा का पुनर्मूल्यांकन’ विषय पर विषद् चर्चा की। <br />आई.एम.एस. बी.एच.यू. वाराणसी के रोग निदान एवं विकृति विज्ञान विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. अनुराग पाण्डेय ने ‘पुरुष बांझपन से संबंधित आयुर्जीनोमिक्स और सटीक चिकित्सा के सिद्धांत डब्ल्यूएसआर से सौमित्रेयनिदानम्’ विषय पर वक्तव्य दिया। आरोग्य लक्ष्मी आयुर्वेद केन्द्र, जयपुर के संस्थापक डॉ. श्रीकृष्ण खण्डेल ने ‘आयुर्वेद में रोगनिदानम्’ विषय पर ज्ञानवर्धन किया। दत्तामेघी आयुर्वेद महाविद्यालय एवं हॉस्पिटल, नागपुर के सहायक प्राध्यापक वैद्य माधव आष्टिकर ने ‘सौमित्रेयनिदानम् इति ग्रन्थस्य तन्त्रगुण-दोष युक्त्यात्मकमध्ययनम्’ विषय पर मार्गदर्शन दिया।<br />पैनल चर्चा में ‘आयुसंस्कृतम् - संस्कृत फॉर आयुर्वेदा’ विषय पर प्रो- (डॉ-) श्रीप्रसाद बावाडेकर, प्रो- विजयपाल शास्त्री, प्रो- एस- वेनूगोपालन, प्रो- महेश व्यास, डॉ- शशीरेखा एस-के-, प्रो- बनमाली बिस्वाल, प्रो- सत्यपाल ने सभी का ज्ञानवर्धन किया। <br />देश भगत विश्वविद्यालय, पंजाब के कुलपति डॉ- अभिजीत एच- जोशी ने ‘आयुर्वेदोक्तव्याधिनिदानमपद्धति’ विषय के द्वारा आयुर्वेद के माध्यम से रोगों की निदान पद्धति पर प्रकाश डाला। ऋषिकुल परिसर, उत्तराखण्ड आयुर्वेद विश्वविद्यालय, हरिद्वार के रोग निदान एवं विकृति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ- संजय कुमार सिंह ने ‘वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आयुर्वेदिक निदान प्रक्रियाओं/तकनीकों की प्रासंगिकता’ विषय पर व्याख्यान दिया। पतंजलि आयुर्वेद कॉलेज की रोग निदान विभाग की विभागाध्यक्षा एवं सह-प्राध्यापिका डॉ. नेहा बरूआ ने ‘आयुर्वेदिक त्वचा विज्ञान में इंद्रलुप्त की अवधारणा : सौमित्रेयनिदानम् से अंतर्दृष्टि’ विषय पर विषद् चर्चा की।<br />कार्यक्रम के अंत में आचार्य बालकृष्ण जी ने कार्यक्रम में पधारे सभी विद्वान अतिथियों को स्मृतिचिन्ह भेंट कर सम्मानित किया। कार्यक्रम का सफल संचालन पतंजलि हर्बल रिसर्च डिविजन की प्रमुख डॉ. वेदप्रिया आर्या ने किया। <br />कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों से पधारे आयुर्वेद के प्रकाण्ड विद्वान, पतंजलि आयुर्वेद कॉलेज व पतंजलि विश्वविद्यालय के शिक्षकगण, विद्यार्थीगण तथा शोधार्थियों ने ज्ञानवर्धन किया।<br />आचार्य जी ने प्रो. सत्यपाल जी तथा पतंजलि विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के प्रो. मनोहर लाल आर्य का विशेष रूप से सौमित्रेयनिदानम् को श्लोकबद्ध करने हेतु धन्यवाद ज्ञापित किया। साथ ही इस कालजयी रचना में किसी न किसी रूप में सहभागी व्यक्तियों का भी आभार व्यक्त किया।  </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
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                <title>राजसूय का आरंभ और जरासंध का वध</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">प्रो. कुसुमलता केडिया</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><h5 style="text-align:justify;">   भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि ‘क्षत्रियों ने पूर्वजों की परंपरा का पालन करते हुए यह नियम बना लिया है कि हममें से जो समस्त क्षत्रियों को जीत लेगा, वही सम्राट होगा। चन्द्रवंशी सम्राट पुरूरवा तथा सूर्यवंशी सम्राट इक्ष्वाकु के वंश के 100 कुल इस समय विद्यमान हैं।<br />देव ऋषि नारद ने महाराज युधिष्ठिर से विदा लेने से पहले कहा कि तुम्हारे पिता पांडु ने तुम्हारे लिये संदेश भेजा है कि ‘तुम सारी पृथ्वी को जीतने में समर्थ हो। अत: राजसूय नामक श्रेष्ठ यज्ञ का अनुष्ठान करो।’ अत: हे पुरूष सिंह पाण्डुनन्दन, तुम अपने पिता के संकल्प को पूरा करो-</h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>विज्ञाय मानुषं लोकमायान्तं मां नराधिप।</strong></span><br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>प्रोवाच प्रणतो भूत्वा वदेथास्त्वं युधिष्ठिरम्।।</strong></span><br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>समर्थोऽसि महीं जेतुं भ्रातरस्ते स्थिता वशे।</strong></span><br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>राजसूयं क्रतुश्रेष्ठमाहरस्वेति भारत।।</strong></span><br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>तस्य त्वं पुरूषव्याघ्र संकल्पं कुरू पाण्डव।</strong></span><br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>गन्तासि त्वं महेन्द्रस्य पूर्वे: सह सलोकताम्।।</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:right;"><span style="color:rgb(0,0,0);"><strong>(महाभारत, सभापर्व, अध्याय 12, श्लोक 24, 25 एवं 28)</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">यहाँ यह स्मरणीय है कि देवर्षि नारद सभी लोकों में जाने में समर्थ महाज्ञानी, अतीत, वर्तमान और भविष्य के दृष्टा, वेदों और उपनिषदों सहित समस्त ज्ञान के ज्ञाता, इतिहास-पुराण के मर्मज्ञ, धर्मतत्व को जानने वाले, न्याय के अधिकारी विद्वान, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरूक्त, छंद और ज्योतिष - इन छहों वेदांगों के ज्ञाता, राजनीति के महापंडित, सांख्य और योग के परम अधिकारी, संगीत और नृत्य सहित समस्त कलाओं से सम्पन्न परम बुद्धिमान थे। (कुछ लोग उन्हें पत्रकार टाइप कोई महापुरूष बताते हैं और ऐसा करते हुए अपनी मूढ़ता का निर्लज्ज प्रदर्शन करते हैं।) इसी कारण उनका अत्यधिक सम्मान महाराज युधिष्ठिर ने किया और सभी लोग करते थे। उन्होंने महाराज पाण्डु का संदेश महाराज युधिष्ठिर को दिया क्योंकि वे विभिन्न लोकों में सहजता से आते-जाते रहते थे। <br />देवर्षि नारद ने महाराज युधिष्ठिर को सावधान भी किया कि राजसूय जैसे महान यज्ञ में बहुत से विघ्नों की संभावना रहती है और यह राजसूय यज्ञ क्षत्रशमन है अर्थात अन्य सब क्षत्रियों का शमन करने वाला है। अत: यदि अन्य क्षत्रिय शांतिपूर्वक सहमत नहीं हुए तो कई बार राजसूय यज्ञ के अनुष्ठान होने पर पृथ्वी पर विनाशकारी युद्ध भी उपस्थित हो सकता है। परंतु चारों वर्णों की रक्षा के लिये अप्रमत्त रहकर राजकाज करना सम्राट का धर्म है। अत: तुम्हें जो उचित हो वह करो, जो अपने लिये कल्याणकारी लगे वह करो। <br />देवर्षि के इन वचनों को सुनकर महाराज युधिष्ठिर गहरे सोच-विचार में पड़ गये और बहुत देर तक चिंतन करते रहे। पूर्वजों के प्रताप का स्मरण कर उन्होंने राजसूय यज्ञ करने का संकल्प किया। क्योंकि उन्हें लगा कि यही हमारा धर्म है और इसी में सबका कल्याण है। इसके बाद श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर ने अपने सभी भाइयों और मंत्रियों से राजसूय यज्ञ के विषय में परामर्श कर उनकी सम्मति चाही। सबका यह सर्वसम्मत कथन था कि आप सम्राट के गुणों को पाने के सर्वथा योग्य हैं। अत: आपको राजसूय यज्ञ अवश्य करना चाहिये। यहाँ स्पष्ट है कि राजसूय यज्ञ सम्पन्न करने वाला ही सम्राट होता है। अन्यथा महाराज होकर अर्थात अनेक राजाओं के द्वारा मान्य सम्प्रभु होकर भी कोई सम्राट नहीं कहा जा सकता। वह केवल महाराज ही कहा जायेगा। <br />महाराज युधिष्ठिर ने स्वयं भगवान वेदव्यास तथा अन्य महर्षियों से भी उनका इस विषय पर मत पूछा। सभी ने राजसूय यज्ञ करने के पक्ष में मत दिया। तब महाराज युधिष्ठिर ने विचार किया कि केवल अपने ही निश्चय से यज्ञ का आरंभ नहीं किया जाता। भगवान श्रीकृष्ण की सम्मति आवश्यक है। ऐसा विचार कर उन्होंने दूत भेजा। भगवान श्रीकृष्ण अपनी बुआ कुन्ती और अपने फफ़़ुेरे भाई महाराज युधिष्ठिर तथा अन्य पाण्डवों से मिलने इन्द्रप्रस्थ पधारे। पाण्डवों ने उनका स्वागत किया और महाराज युधिष्ठिर ने राजसूय के विषय में उनकी सम्मति मांगी। <br />भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि ‘क्षत्रियों ने पूर्वजों की परंपरा का पालन करते हुए यह नियम बना लिया है कि हममें से जो समस्त क्षत्रियों को जीत लेगा, वही सम्राट होगा। चन्द्रवंशी सम्राट पुरूरवा तथा सूर्यवंशी सम्राट इक्ष्वाकु के वंश के 100 कुल इस समय विद्यमान हैं। अत: उन सबका विश्वास और सबकी सम्मति से ही आप सम्राट पद पर अभिषिक्त हो सकेंगे। वर्तमान में जरासंध सम्राट के पद पर अभिषिक्त है। उसने सभी क्षत्रियों को जीत लिया है और महाराज शिशुपाल, करूषराज दन्तवक्र सहित सभी राजा उनके साथ हैं तथा यवनाधिपति राजा भगदत्त भी वाणी और क्रिया के द्वारा उनके साथ ही हैं, यद्यपि मन ही मन वे तुम्हारे प्रति स्नेह रखते हैं। इसी प्रकार कुन्तीभोज कुल के महावीर महाराज पुरूजित भी तुम्हारे प्रति प्रेम और स्नेह रखते हैं परंतु अनेक राजा जरासंध से मिले हुये हैं और यह आवश्यक है कि तुम जरासंध को पराजित करो। तभी तुम सम्राट कहलाने योग्य हो सकोगे। कंस भी जरासंधा का ही साथी था। कंस का भय तो अब जाता रहा परंतु अनेक राजाओं को जरासंध ने बंदी बना रखा है। अत: उसे जीतना आवश्यक है।’ इसी क्रम में भगवान श्रीकृष्ण ने समकालीन सभी राजाओं और महाराजाओं का विस्तार से वर्णन किया जो सभापर्व के 14वें अध्याय में वर्णित है। अंत में उन्होंने बताया कि कैसे वे स्वयं जरासंध से बचने के लिये ही द्वारकापुरी गये हैं और कैसे जरासंध ने भगवान शंकर की कृपा प्राप्त कर अनेक राजाओं को बंदी बना रखा है। अत: उस पर विजय पाना आवश्यक है। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण मनुष्य रूप में भी समकालीन राजनीति और समकालीन भारतीय परिदृश्य के एक बहुत बड़े ज्ञाता और विशेषज्ञ दिखते हैं। <br />इसके बाद जरासंध के विषय में महाराज युधिष्ठिर, भीम तथा भगवान श्रीकृष्ण के मध्य मंत्रणा हुई और आगे की कार्ययोजना बनी। युधिष्ठिर इस विषय में शंकालु हो गये और हिचक से भर गये। तब अर्जुन तथा भगवान श्रीकृष्ण ने कई प्रकार से उन्हें समझाया और अंत में  भगवान श्रीकृष्ण के साथ अर्जुन और भीमसेन जरासंधा के साम्राज्य मगध की ओर चले। तीनों ने तेजस्वी स्नातक ब्राह्मणों का वेश धारण किया। इस यात्रा का वर्णन समस्त भौगोलिक विवरणों के साथ महाभारत में दिया हुआ है जिससे स्पष्ट है कि यह कितनी यथार्थ घटना है। वहाँ वर्णित सभी भौगोलिक स्वरूप आज भी देखे जा सकते हैं। वे तीनों कुरूदेश से चलकर कुरूजांगल के बीच से होते हुये पद्म सरोवर पहुँचे और इसके बाद गण्डकी, महाशोण तथा सदानीरा नदियों सहित अन्य सभी नदियों को पार करते हुये सरयू नदी पार कर पूर्वी कोसल प्रदेश में प्रविष्ट हुये और उसे पार करके गंगाजी को तथा शोणभद्र को पार किया और पूर्व की ओर चलते चले गये तथा गोरथ पर्वत पर पहुँच कर उन्होंने मगध देश की सुन्दर और विशाल राजधानी को देखा। राजधानी धन-धान्य से सम्पन्न थी। जल की भरपूर सुविधा वहाँ उपलब्ध थी और सभी निवासी स्वस्थ सबल थे। अनेक महलों और भवनों तथा उद्यानों और पर्वतों से सुशोभित यह राजधानी सुन्दर और सुगन्धित फ़ूलों से भरी हुई थी। गौतम मुनि द्वारा शूद्र जाति की कन्या से उत्पन्न अनेक पुत्रों के द्वारा राजधानी रक्षित थी। अनेक मुनि और यति वहाँ निवास करते थे। तीनों राजधानी में मुख्य द्वार से न जाकर एक अन्य द्वार से प्रविष्ट हुए और राजधानी गिरिव्रज पहुँचकर जरासंध के सामने उपस्थित हुये। तीन ब्राह्मणों को सामने देखकर सम्राट जरासंध उठकर खड़े हो गये और विधिपूर्वक उनका आतिथ्य सत्कार किया तथा उनसे प्रयोजन पूछा। श्रीकृष्ण ने कहा कि हम आधी रात के बाद ही आपसे बात करेंगे क्योंकि इन दोनों ब्राह्मणों ने यही प्रतिज्ञा कर रखी है कि वे आधी रात से पहले नहीं बोलते। सम्राट जरासंध ब्राह्मणों का बहुत सम्मान करते थे। अत: उनकी बात मान गये। आधी रात के बाद जब सम्राट जरासंध पहुँचे तो तीनों क्षत्रिय के वेश में सामने थे। इस पर जरासंध ने पूछा कि आप लोग कौन हैं तथा इस तरह बार-बार वेश क्यों बदल रहे हैं? तब श्रीकृष्ण ने अपना परिचय दिया और कहा कि हम आपसे मल्लयुद्ध करना चाहते हैं। तीनों महान वीरों को सामने देखकर अपने भविष्य के विषय में पूर्व में की गई भविष्यवाणी का ध्यान रखकर सम्राट जरासंध ने अपने पुत्र सहदेव का राज्याभिषेक सम्पन्न किया और इसके बाद मल्लयुद्ध के लिये तत्पर हुये। <br />भीम और जरासंध का भीषण युद्ध हुआ। उस मल्लयुद्ध का भी विस्तार से वर्णन महाभारत में सभापर्व के 23वें अध्याय में है। पहले दोनों ने हाथ मिलाये। फिऱ एक-दूसरे के चरणों का अभिवन्दन किया और फिऱ ताल ठोककर भिड़ गये। वे एक-दूसरे को बार-बार रगडऩे लगे तथा चित्रहस्त आदि दाँव दिखाते हुए कक्षाबंध का प्रयोग किया। अर्थात कांख या कमर में दोनों हाथ डालकर प्रतिद्वन्द्वी को बांध लेने की चेष्टा की। दोनों एक दूसरे को बांध नहीं पाये और फिऱ कंठ तथा कपोलो पर परस्पर तीव्र आघात करने लगे। फिऱ एक-दूसरे के पैरों पर भीषण प्रहार किया और फिऱ पूर्णकुम्भ नामक दाँव लगाया और फिऱ उरोहस्त का प्रयोग किया अर्थात छाती पर घूसे मारने लगे और एक-दूसरे को दबाने लगे तथा सिंहनाद करने लगे। उस समय वे दो प्रतापी और प्रबल सिंहों की भांति ही गुंथे हुये दिख रहे थे। यहाँ महाभारत में बीसों दाँवपेचों का विस्तार से वर्णन है। मल्लयुद्ध को देखने सभी वर्णों के नर-नारी एकत्र हो गये और मनुष्यों की अपार भीड़ वह युद्ध देखने लगी। जब युद्ध और तीव्र हो गया तो बहुत से दर्शक देखने से भी डरने लगे और भाग खड़े हुये। 14 दिनों तक यह भीषण युद्ध बिना खाये पिये अविराम गति से चलता रहा। इस पर भगवान श्रीकृष्ण ने संकेत किया और भीमसेन ने उनके उकसावे पर सम्पूर्ण बल लगाकर महाबलवान जरासंध को उठाकर आकाश में घुमाना आरम्भ किया। फिऱ भगवान के संकेत के अनुसार 100 बार घुमाकर उसे धारती पर पटक दिया और उसका एक पैर पकडक़र तथा दूसरे पैर पर अपना पैर रखकर दो खण्डों में चीर डाला। परंतु वे दोनों खण्ड बार-बार जुड़ जाते थे। दोनों प्रचंड गर्जना कर रहे थे। जरासंध पीड़ा से चीत्कार करने लगा। अंत में श्रीकृष्ण ने संकेत किया कि दोनों भागों को अलग-अलग दिशाओं में फ़ेंको। भीमसेन ने वही किया और तब जरासंध का वधा सम्पन्न हो गया। <br />तदुपरान्त जरासंध के अभिषिक्त पुत्र को राजधानी में राज्य करने की अनुमति देकर भगवान श्रीकृष्ण और भीमसेन तथा अर्जुन ने उन सब राजाओं को बंधन से मुक्त कराया जिन्हें जरासंध ने एक बहुत बड़ी पहाड़ी खोह में बंदी बनाकर रखा था और वहीं उन्हें भोजन आदि की सुविधायें सुलभ कराता रहता था। मुक्त राजाओं ने पाण्डवों और भगवान श्रीकृष्ण के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। भगवान श्रीकृष्ण ने सभी से आदरपूर्ण व्यवहार किया और ब्राह्मणों का तथा अन्य सभी नागरिकों का सम्मान करते हुये विदा ली। <br />जरासंध के एक विशिष्ट दिव्य रथ पर बैठकर भगवान श्रीकृष्ण भीमसेन और अर्जुन के साथ इन्द्रप्रस्थ की ओर चले और सम्राट जरासंध के पुत्र महामना सहदेव ने आदरपूर्वक उन्हें विदा किया। भगवान श्रीकृष्ण ने सहदेव को तथा मुक्त किये गये सभी राजाओं को राजसूय यज्ञ में सम्मिलित होने का निमंत्रण दिया और वे इन्द्रप्रस्थ पहुँचे। भगवान श्रीकृष्ण ने जरासंध के पुत्र सहदेव को अपना अभिन्न सुहृद् बना लिया। अत: भीमसेन और अर्जुन ने भी उनका बड़ा सत्कार किया। उपहारों के साथ जब भीमसेन और अर्जुन सहित भगवान श्रीकृष्ण महाराज युधिष्ठिर के पास पहुँचे तो वे अत्यन्त प्रसन्न हुये और इसके बाद दिग्विजय के लिये चारों भाई चार अलग दिशाओं में अपनी-अपनी सेनाओं के साथ विजय यात्रा पर चल पड़े।</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>सितम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Sep 2024 17:41:05 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
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