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                <title>अक्टूबर - योग संदेश</title>
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                <description>अक्टूबर RSS Feed</description>
                
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                <title>Two day parent meeting concluded at Patanjali University</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;">Haridwar, September 23, A two-day parent meeting is being organized at Patanjali University in which parents of students from different states have come to share the evaluation of their children and other information related to the university. In the program organized on this occasion, Chancellor Swami Ramdev Ji Maharaj addressed the parents present and said that Patanjali University is playing a big role in making your children the best. Our aim is to make students with good conduct. Swami Ji said that children who grow up in struggles, challenges and deprivations have the highest level of effort. In the world,</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3695/two-day-parent-meeting-concluded-at-patanjali-university"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-05/amt_4304.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">Haridwar, September 23, A two-day parent meeting is being organized at Patanjali University in which parents of students from different states have come to share the evaluation of their children and other information related to the university. In the program organized on this occasion, Chancellor Swami Ramdev Ji Maharaj addressed the parents present and said that Patanjali University is playing a big role in making your children the best. Our aim is to make students with good conduct. Swami Ji said that children who grow up in struggles, challenges and deprivations have the highest level of effort. In the world, man considers materialism to be the best but we believe that character is the best, a person achieves success only with a bright character. <br />On this occasion, Vice Chancellor Prof. Mahavir Agarwal said that the students should progress towards progress with holistic efforts, Divine awaken the divine feeling through worship. In the program, the university Vice-Chancellor Prof. Satyendra Mittal, Chancellor Swami Arshadev, Examination Controller Prof. A.K. Singh, Hostel Superintendent Sadhvi Dev Pratishtha, hostel Superintendent Dr. Lalit Choudhary, Shri Chandramohan and University's all the officers and professors were present. The program the program was conducted by Swami Aarshdev. </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>English</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>October</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Oct 2024 18:21:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>परम पूज्य योग-ऋषि श्रद्धेय स्वामी जी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य ...</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>ओ३म</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>1. सनातन की शक्ति -</strong> वेद धर्म, ऋषिधर्म, योग धर्म या यूं कहें कि सनातन धर्म के शाश्वत, वैज्ञानिक, सार्वभौमिक, व्यवहारिक व पारमार्थिक सत्य अकाट्य हैं। नैतिक व मानवीय मूल्यों के नाम पर लोगों में मतभेद हो सकता है। वैसे तो हर बात पर इतना विभाजन है कि बौद्धिक रूप से समर्थ लोग हर जगह विवाद खड़ा कर लेते हैं। लेकिन जीवन के मूलभूत सत्य जिस समग्रता के साथ वेद, दर्शन, उपनिषद्, गीता, पुराणों, रामायण व महाभारत में हैं वैसे अन्यत्र दृष्टिगोचर नहीं होते। अत: अपने पूर्वजों के ज्ञान व अनुभवों की विरासत पर गौरव अनुभव कीजिये एवं अपने</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3615/shshwat-pragyaa"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-03/yoga-2sa.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>ओ३म</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>1. सनातन की शक्ति -</strong> वेद धर्म, ऋषिधर्म, योग धर्म या यूं कहें कि सनातन धर्म के शाश्वत, वैज्ञानिक, सार्वभौमिक, व्यवहारिक व पारमार्थिक सत्य अकाट्य हैं। नैतिक व मानवीय मूल्यों के नाम पर लोगों में मतभेद हो सकता है। वैसे तो हर बात पर इतना विभाजन है कि बौद्धिक रूप से समर्थ लोग हर जगह विवाद खड़ा कर लेते हैं। लेकिन जीवन के मूलभूत सत्य जिस समग्रता के साथ वेद, दर्शन, उपनिषद्, गीता, पुराणों, रामायण व महाभारत में हैं वैसे अन्यत्र दृष्टिगोचर नहीं होते। अत: अपने पूर्वजों के ज्ञान व अनुभवों की विरासत पर गौरव अनुभव कीजिये एवं अपने महान ऋषि-ऋषिकाओं, वीर-वीराङ्गनाओं व योद्धाओं की तरह जीवन में सदा उच्च आचरण कीजिये। हम मात्र नाम से नहीं अपने काम, चरित्र व महान् योगदान से सच्चे सनातनधर्मी बनें।<br /><strong>2. नया ज्ञान अनुसंधान व योगदान -</strong>पतंजलि योगपीठ की ओर से पतंजलि वैलनेस गुहाटी सेवा का एक बहुत बड़ा कार्य नार्थ ईस्ट के लिए नवरात्र से प्रारंभ हो चुका है। अत: पश्चिम बंगाल, ओडिसा, असम व नार्थ ईस्ट के सातों राज्यों के साथ मां कामाख्या, ब्रह्मपुत्र एवं पूर्वी संस्कृति के दिव्य दर्शन का आनन्द अनुभूति के साथ पूर्ण स्वस्थ जीवन का लाभ पाने हेतु आप सभी सादर आमन्त्रित हैं।<br />लीवर, किडनी, हार्ट, पेन्क्रियाज, ब्रेन एवं कैंसर के रोगों में हर माह कुछ नई खोज करते हैं और आस्था-सोशल मीडिया व योग संदेश के द्वारा आप तक सम्प्रेषित करते हैं। लीवर के रोगों में लिवोग्रिट जूस व वटी के साथ बकरी के दूध का कल्प, किडनी के रोगों में रीनोग्रिट वटी के साथ गोखरू हरा, हरा धनिया, कासनी हरी तथा नीम व पीपल के भी ताजे हरे पत्ते पीने से अप्रतिम लाभ हो रहा है। डायबिटीज में खीरा, करेला, टमाटर के साथ आंवला, एलोवेरा, सदाबहार, चिरायता, कुटकी गुड़मार, विजय सार, मेथी का पानी के साथ हजारों वर्षों से हिमालय क्षेत्र मे प्रयोग होने वाला रतपत्तिया का नया प्रयोग अत्यंत आश्चर्यजनक है। एक से दो सप्ताह नोन-डायबिटीक होना<br />विश्व के लिए बहुत बड़ी घटना है। वात रोगों में एलोवेरा, गिलोय, पारिजात, निर्गुण्डी व सहजना के पत्तों का रस परम औषधि साबित, प्रमाणित हुई है। थायराइड में धनिया के पानी या हरा धनिया के जूस के साथ थायरोग्रिट ने वर्षों पुराने थायरायड को निर्मूल करने का विश्व कीर्तिमान बनाया है। गर्भ में मरणासन्न बच्चों के लिए पुत्रजीवक व शतावर संजीवनी रामबाण औषधि बन चुकी है। वहीं बवासीर के लिए अर्शोग्रिट व कायाकल्प वटी की दो-दो गोली दिन में दो बार खाली पेट खाने से वर्षों पुराने अर्श से लोगों को मुक्ति मिल रही है। नीम जूस, प्लेटोग्रिट जूस, आइग्रिट जूस के परिणामों ने चिकित्सा के क्षेत्र में नए द्वारा खोल दिए हैं ऐसे अनगणित प्रयोग हम पीडि़त मानवता की भलाई हेतु पतंजलि वैलनेस में कर रहे हैं।<br />कैंसर, हृदय रोग व ऑटोइम्यून डिजीज में 8 से 10 घंटों की प्राणायाम साधना के अविश्वसनीय परिणाम सामने आ रहे हैं। मात्र सनातनधर्मी हिंदु भाई-बहन भी पूरी ताकत के साथ पतंजलि के साथ खड़े हो जायें तो हम संसार को एक नई दिशा दे सकते हैं और विश्व की शिक्षा एवं चिकित्सा व्यवस्था में नई क्रांति लाकर एक सात्विक, आध्यात्मिक जीवन पद्धति में पूरे विश्व को मोड़ सकते हैं।</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शाश्वत प्रज्ञा</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Oct 2024 17:59:47 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>अतिथि संपादकीय</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">प्रो. दिनेश चन्द्र शास्त्री,<br />अध्यक्षचर, वेदविभाग, गुरुकुलकांगड़ी (समविश्वविद्यालय)<br />कुलपति-उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><h5 style="text-align:justify;">    आनादिकाल से सतत प्रवहमान ‘आयुर्वेद’ विश्व की प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति है। धर्म, अर्थ आदि पुरुषार्थचतुष्टय की सिद्धि में ‘आरोग्य’ को मूल मानते हुए आरम्भ से ही मानव स्वास्थ्य तथा तदर्थ चिकित्सा का क्रम निरन्तर चला आ रहा है। ‘श्रुतिपरम्परा’ से प्राप्त आयुर्वेद ज्ञान को समय की आवश्यकतानुसार ग्रन्थों में निबद्ध किया गया। इसके परिणामस्वरूप मानवकल्याणार्थ आयुर्वेद का विपुल साहित्य विद्यमान है। नाना प्रकार की चिकित्साविधियों से समन्वित आयुर्वेद को कायचिकित्सा आदि आठ अङ्गों में बाँटा गया है। यह अष्टाङ्ग आयुर्वेद मूलत: त्रिसूत्रत्मक है। आचार्य चरक के अनुसार सर्वप्रथम ब्रह्मा को हेतु, लिङ्ग व औषध रूप त्रिसूत्रात्मक आयुर्वेद का बोध हुआ था- </h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>हेतुलिङ्गौषधज्ञानं स्वस्थातुरायणम्।</strong></span><br /><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>त्रिसूत्रं शाश्वतं पुण्यं बुबुधे यं पितामह:।। (च.सं.सू.1.24)</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">इस प्रकार 1. हेतु (रोग की उत्पत्ति का कारण), 2. लिङ्ग (रोग व आरोग्य का लक्षण), तथा 3. औषध (स्वस्थ व रोगी के लिए हितकारी चिकित्सा प्रक्रिया)-<br />इन तीनों का पल्लवित रूप ही अष्टाङ्ग आयुर्वेद है। आयुर्वेदीय अष्टाङ्ग में भी ‘निदान’ व ‘चिकित्सा’ का विशिष्ट महत्त्व है।<br />रोगविज्ञान की महत्ता को देखते हुए कालान्तर में ‘निदान’ को आधार बनाकर स्वतन्त्र ग्रन्थों का भी प्रणयन किया गया। इस विषय पर सर्वप्रथम माधवकरप्रणीत प्राचीनतम ग्रन्थ ‘माधवनिदानम्’ उपलब्ध होता है। इसके अतिरिक्त हंसराजनिदान, अमजननिदान, सिद्धान्तनिदान आदि निदान पर आधारित उल्लेखनीय ग्रन्थ हैं।<br />इसी क्रम में निदानग्रन्थों की परम्परा को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिये चिरकाल के अनन्तर 21 वीं शताब्दी में आयुर्वेद व वनस्पतिविज्ञान के मर्मज्ञ तथा संस्कृतभाषानुरागी श्रद्धेय आचार्यबालकृष्ण जी के द्वारा सौमित्रेयनिदानम् नामक एक बृहद् ग्रन्थ की रचना की गई है, जिसका लोकार्पण 7 अगस्त, 2024 को केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति श्री श्रीनिवास बरखेड़ी, केन्द्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसन्धान परिषद् के महानिदेशक प्रोफेसर रविनारायण आचार्य, राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा पद्धति आयोग के अध्यक्ष वैद्य श्री जयन्त देवपुजारी और राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा पद्धति आयोग में आचार एवं पंजीकरण बोर्ड के अध्यक्ष प्रोफेसर (वैद्य) राकेश शर्मा सदृश आयुर्वेद एवं संस्कृत के विशेषज्ञों की उपस्थिति में वैदिक संस्कृति के उपायक योगऋषि स्वामी रामदेव जी के द्वारा किया गया।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span style="color:rgb(22,145,121);">सौमित्रेयनिदानम् का वैशिष्ट्य</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">सौमित्रेयनिदानम् व्याधियों से सम्बन्धित शास्त्रीयशैली में विरचित एक श्लोकबद्ध बृहद् आयुर्वेदीय निदानग्रन्थ है। विश्व में मानवमात्र के स्वास्थ्य संरक्षण और विभिन्न व्याधियों से ग्रस्त रोगियों के रोगों के निवारण के संकल्प को लेकर ही ग्रन्थकार के द्वारा इसका प्रणयन किया गया है। अर्वाचीन युग में सभी व्याधियों का आयुर्वेद से उपचार करने के साथ-साथ आयुर्वेद का पठन-पाठन करने वाले पाठकों तक सम्पूर्ण व्याधियों के ज्ञान को पहुंचाना भी ग्रन्थकार को अभीष्ट है। यह ग्रन्थ आयुर्वेद सहित रोगी के स्वास्थ्य से सम्बन्धित सम्पूर्ण पद्धतियों के द्वारा चिकित्सापरायण चिकित्सकों के लिए व जन स्वास्थ्य सम्बन्धी नीति-निर्माताओं के लिए अतीव उपयोगी होगा और सम्पूर्ण स्वास्थ्य के अभिलाषीजनों के लिए रोगमुक्त जीवन की ओर बढऩे में मित्र के समान सहायक सिद्ध होगा। आयुर्वेद के अनेक पूर्ववर्ती ऋषियों द्वारा प्रदत्त<br />निदानविषयक सारसूत्रों से अनुस्यूत यह ग्रन्थ स्वस्थ एवं रोगमुक्त समाज के निर्माण में नींव के पत्थर के समान अतीव उपयोगी सिद्ध होगा।<br />प्राचीन और अर्वाचीन ग्रन्थों का समग्र दृष्टि से अवलोकन करके आयुर्वेद के प्राचीन शास्त्रों में वर्णित व्याधियों के अतिरिक्त पूर्वशास्त्रों में जो अपर्याप्त रूप से वर्णित हैं और विश्व में वर्तमान में प्राप्यमाण नवीन व्याधियां हैं, उन सबको भी इस ग्रन्थ में समाविष्ट किया गया है। ग्रन्थ में 500 व्याधियों को 471 व्याधिशीर्षकों के अन्तर्गत रखा गया है, जिसमें 234 प्राचीन व्याधियां हैं, जबकि 237 वर्तमान व्याधियों को नवीन नामों से अभिहित करके वर्णित किया गया है। ग्रन्थ को शरीर संरचना क्रम से 14 खण्डों में वर्गीकृत किया गया है। सभी खण्डों में व्याधियों को अकारादिक्रम से वर्णित किया गया है। प्रत्येक व्याधि के तीन विभाग हैं-स्वरूपम्, निदानम् और लक्षणम्। ग्रन्थ में अनुष्टुप्, इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उपजाति, वंशस्थ, इन्द्रवंशा, विशिष्ट उपजाति (वंशस्थ, इन्द्रवंशा), द्रुतविलम्बित, भुजङ्गप्रयात, प्रहर्षिणी, वसन्ततिलका, मालिनी, पञ्चचामर, शिखरिणी, पृथ्वी, मन्दाक्रान्ता, शार्दूलविक्रीडित और स्रग्धरा-इन 18 छन्दों का प्रयोग किया गया है। उल्लेखनीय है कि ग्रन्थ-परिचय में भी इन्हीं 18 छन्दों को प्रयुक्त किया गया है।<br />ग्रन्थ के विस्तृत कलेवर और पाठक की सुविधा की दृष्टि से इसे दो भागों में विभाजित किया गया है। इसके प्रथम भाग में प्रथम खण्ड से पञ्चम खण्ड (व्याधिसंख्या 1-260) रोग वर्णित हैं और ग्रन्थ के द्वितीय भाग में छठे खण्ड से चतुर्दश खण्ड (व्याधिसंख्या 261-471) तक व्याधियां हैं। प्रथम भाग के परिशिष्ट भाग में, द्वितीय भाग में वर्णित की जाने वाली व्याधियों की अनुक्रमणिका जोड़ी गई है, जबकि द्वितीय भाग के परिशिष्ट भाग में प्रथम भाग की अनुक्रमणिका को भी रखा गया है। पाठक की सरलता की दृष्टि से ग्रन्थ में प्रयुक्त सभी नवीन शब्दों की संस्कृतनामावली परिशिष्ट भाग में रखी गई है, जिसमें 400 से भी अधिक नवीन शब्द हैं। ग्रन्थ के परिशिष्ट भाग में लगभग 2500 चिकित्सकीय अवस्थाएं उपनिबद्ध भी की गई हैं।<br />यह भी इस ग्रन्थ की विशेषता है कि सभी 500 व्याधियों को खण्डों के अनुसार श्लोकबद्ध किया गया है, जिसके कारण ग्रन्थ की सभी व्याधियों को स्मरण करने में सरलता होगी। व्याधियों के श्लोकों का लयबद्धता से गायन करके QR Code की सहायता से समग्र ग्रन्थ के श्लोकों का श्रव्य रूप भी प्रस्तुत किया गया है। अल्पसंस्कृतज्ञजनों के लिए श्लोक में प्रयुक्त प्रत्येक पद का अर्थ करके काठिन्यनिवारण पहले ही कर दिया गया है। सम्पूर्ण विश्व के लोगों के लिए ग्रन्थ को उपयोगी बनाने के उद्देश्य से असंस्कृतज्ञजनों के ज्ञानार्थ श्लोकों के साथ उनकी<br />फोनेटिक्स और अंग्रेजी में स्वरूप, निदान और लक्षणों को प्रस्तुत करके ग्रन्थ का अंग्रेजी रूपान्तरण भी किया गया है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>सौमित्रेयनिदानम् की प्रमाणिकता व उपादेयता</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">सौमित्रेयनिदानम् ग्रन्थ की शास्त्रीयता, प्रासंगिकता, उपादेयता, शुद्धता और प्रामाणिकता आदि के आयुर्वेद दृष्ट्या अवलोकन तथा विषयगतसमीक्षा के लिए पतञ्जलि विश्वविद्यालय और केन्द्रीय संस्कृत-विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के सौजन्य<br />से 7 अगस्त से 8 अगस्त तक द्विदिवसीय संगोष्ठी का आयोजन करवाया गया, जिसमें संपूर्ण भारतवर्ष से प्रतिष्ठाप्राप्त आयुर्वेद और संस्कृत के लगभग 50 विद्वानों<br />ने अपने विचार व समीक्षात्मक प्रस्तुति दी। सबमें एक बात सामान्य रही कि सौमित्रेयनिदानम् प्रामाणिक और अद्वितीय एक ऐसा ग्रन्थ है, जो चिकित्सा जगत् के लिए अत्यधिक उपयोगी होगा-<br />1.  परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज ने ‘सौमित्रेयनिदानम्’ ग्रन्थ के विषय में कहा कि यह एक मौलिक कालजयी अनुपम रचना है, अप्रितम प्रस्तुति है। यह कार्य बहुत बड़ा था। 18 छन्दों में 6821 श्लोकों में जो रचना हुई है, साथ ही हिंदी सहित इंग्लिश भाषा में इसका रूपान्तरण करना और उसको पूरी ऋषि परम्परा के अनुरूप प्रतिबद्धता के साथ सम्पूर्ण विषय को समेटते हुए अभिव्यक्त करना एक चुनौती पूर्ण कार्य था। श्रद्धेय आचार्यश्री और सम्पूर्ण विद्वन्मण्डली के लिए विशेष अभिनन्दन होना चाहिए। आज यहां ‘सौमित्रेयनिदानम्’ का लोकार्पण अपने आप में ऐतिहासिक कार्य है।<br />2.  केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर श्रीनिवास बरखेड़ी ने कहा कि ‘‘ग्रन्थ के आविर्भाव से आयुर्वेद शास्त्र के इतिहास में एक ऐतिहासिक नूतन युग का आरम्भ हुआ है। आज इस संस्कृत भूमि पर शास्त्रबीज का वपन हुआ है। इस कृषि में आचार्य बालकृष्ण जी ने अपने अनुभवजल से सेचन किया है। उनके द्वारा एक नव निदानशास्त्र का अंकुर उत्पन्न हो गया है। इसको वृक्ष बनाना, इसका फल प्राप्त करना, पुष्प प्राप्त करना- यह हमारा कार्य है। अष्टाङ्गहृदय के समान यह मौलिक ग्रन्थ भी सहस्रों वर्षों तक आयुर्वेद के क्षेत्र में देदीप्यमान रहेगा।’’<br />‘‘यह चर्वितचर्वण नहीं है, अपितु नूतन नवीन है।’’ उनके अनुसार इसमें नूतन शब्दों, धातुओं और नवपरिभाषितों पर शोध के लिये भी पर्याप्त विषयवस्तु देखी गई है।<br />3.  केन्द्रीय आयुर्वैदिक विज्ञान अनुसन्धान परिषद् के महानिदेशक प्रोफेसर रविनारायण आचार्य के अनुसार शास्त्र और विज्ञान की तब वैज्ञानिकता नहीं होती जब तक वह समय के अनुसार उन्नत तथा परिष्कृत न हो। उन्होंने आगे कहा कि सौमित्रेयनिदानम् की यह विशेषता ही उसे सर्वोत्कृष्ट बनाती है कि यह एक मौलिक रचना है और आधुनिक परिप्रेक्ष्य के अनुसार अनुसन्धानपूर्वक प्राय: सभी नए रोगों का भी इसमें समावेश किया गया है।<br />4.  राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा पद्धति आयोग में आचार एवं पंजीकरण बोर्ड के अध्यक्ष प्रोफेसर (वैद्य) राकेश शर्मा के अनुसार यह ग्रन्थ आयुर्वेद के क्षेत्र में मील का पत्थर सिद्ध होगा। यह अपने आप में एक विशेष रचना है और इस बात से भी इसका महत्त्व और बढ़ जाता है कि इसमें प्रत्येक श्लोक के प्रत्येक पद का अर्थ भी साथ में प्रस्तुत करके आयुर्वेद के पाठकों के लिए शब्दकोश तथा अर्थज्ञान की दिशा में उत्कृष्ट कार्य किया गया है। इसे कश्मीर से कन्याकुमारी तक प्रत्येक आयुर्वेद संस्थान के पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया जाना चाहिए, जिससे सभी छात्र इसके वैशिष्ट्य से लाभान्वित हो सकें।<br />5. राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा पद्धति आयोग के अध्यक्ष वैद्य श्री जयन्त देवपुजारी ने कहा कि ‘‘सौमित्रेयनिदानम् ग्रन्थ पर आयुर्वेद के सम्बन्ध में दीर्घकाल तक कार्य होता रहेगा। इससे इस दिशा में एक नई परंपरा का आरंभ हुआ है। अनुक्त को उक्त करने का शुभारम्भ श्रद्धेय आचार्य जी के द्वारा किया जा चुका है। पञ्चनिदान व आयुर्वेद की दृष्टि से यह एक परिपूर्ण ग्रन्थ है। उन्होंने आगे परामर्श देते हुए कहा कि पूज्य आचार्य जी को प्राचीन पुस्तक नाड़ीतत्त्वदर्शन के विकृतिविज्ञान विषय पर भी अनुसंधानात्मक कार्य करना चाहिए।’’<br />6.  दत्ता मेघे आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान महाविद्यालय एवं औषधालय नागपुर (महाराष्ट्र) से उपस्थित प्रोफेसर वैद्य माधव आष्टिकर ने ‘‘ग्रन्थस्य तन्त्रगुणदोष-युक्त्यात्मकम् अध्ययनम् विषय पर प्रस्तुति देते हुए कहा कि यह शास्त्र स्वयं में एक अपूर्व महत्त्वपूर्ण कार्य है। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि सौमित्रेयनिदानम् में वर्णित अपस्मार में वयोऽनुसार प्रेरक आक्षेप, संवेदी आक्षेप आदि भेद बताकर बहुत श्रेष्ठ कार्य किया गया है। आयुर्वेद विज्ञान के सिद्धान्तों का अनुपालन करते हुए अपने विचार व्यक्त करने से यह अनुमत शास्त्र की श्रेणी में आता है। स्वसंज्ञाओं का समायोजन और नवीनपदावली का प्रयोग, अन्वयपूर्वक प्रत्येक पद की अर्थप्रस्तुति आदि से यह एक अद्वितीय ग्रन्थ है, जो आने वाली अनेक पीढिय़ों का पथप्रदर्शन करता रहेगा। उन्होंने व्याधियों के वर्गीकरण सम्बन्धी परामर्श देते हुए हेतु और लक्षण के मध्य सेतुस्वरूप सम्प्राप्ति की संयोजना का भी परामर्श दिया।<br />7.    देशभगत विश्वविद्यालय पंजाब के कुलपति डॉ. अभिजित एच. जोशी ने ग्रन्थ की समीक्षा करते हुए कहा मैं इसे आयुर्वेदीय निदान ग्रन्थ की अपेक्षा अथर्ववेद आधारित व्याधिनिदान मानता हूँ। परामर्श देते हुए उन्होंने कहा कि आयुर्वेद के विषय में अथर्ववेद पर भी अनुसंधानात्मक कार्य करवाया जाना चाहिए।<br />8.    केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय श्री सदाशिव परिसर, पुरी ओडीशा के निदेशक डॉ. बनमाली बिस्वाल ने कहा कि ग्रन्थ की भाषा और उसमें शार्दूलविक्रीडित जैसे विभिन्न छंदों का प्रयोग करके एक श्रेष्ठ कार्य को प्रस्तुत किया गया है। नवीन संस्कृत पदावली का प्रयोग और परिशिष्ट भाग में उसको दर्शाकर शास्त्रगत काठिन्य का स्वयं परिहार प्रस्तुत करके श्रेयस्कर कार्य किया गया है।<br />9.    अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान नई दिल्ली के रोगनिदान विभाग के सह-प्राध्यापक डॉ. सन्दीप सिंह तिवारी ने कहा कि सौमित्रेयनिदानम् को मैंने जितना देखा है, इसमें ग्रन्थ के श्लोकों का गायन करके QR Code के रूप में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का प्रशंसनीय प्रयोग किया गया है, जो आयुर्वेद के क्षेत्र में अपूर्व प्रयास है। आयुर्वेद की साधना में लगे हुए जनों के लिए यह विधा अतीव उपयोगी सिद्ध होगी।<br />इसके अतिरिक्त सम्पूर्ण भारतवर्ष से पतञ्जलि विश्वविद्यालय के सभागार में उपस्थित होकर आयुर्वेद और संस्कृत भाषा के मर्मज्ञ 35 अन्य विद्वानों ने भी सौमित्रेयनिदानम् ग्रन्थ के विषय में अपनी-अपनी समीक्षापरक प्रस्तुति दी, जिसमें एक बात सामान्य रही कि अर्वाचीन में इस बृहद्ग्रन्थ की सर्जना करके आयुर्वेद जगत् के साथ-साथ समग्र विश्व का उपकार किया है। सहस्रों वर्षों तक यह आयुर्वेद के पाठकों और जिज्ञासुओं को अपने प्रकाश से लाभान्वित करता रहेगा। ग्रन्थकार का यह कथन-</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>आयुष्यवेदस्य कृतेश्च तस्या: सद्वर्तमाने च भविष्यकाले। अध्यापनं चाध्ययनं चिकित्साक्रान्तिं प्रकुर्युर्जगतीह नूनम्।। (इन्द्र)</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">‘‘सौमित्रेयनिदानम् आयुर्वेद के क्षेत्र में वर्तमान में तथा आने वाले अनेक वर्षों तक पठन-पाठन तथा इससे चिकित्सा हेतु आयुर्वेद के जगत् में एक नई क्रान्ति को लाने वाला रहेगा।’’<br />वस्तुत: ग्रन्थकार का यह कथन सटीक एवं यथार्थता से परिपूर्ण एवं नितान्त चरितार्थ है। नि:सन्देह यह एक परिपूर्ण और अनुपम आयुर्वेदीय निदान शास्त्र है। ‘वैदिक वाग् ज्योति’ की ओर से आचार्य बालकृष्ण जी को इस महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ की रचना करने पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाऐं। आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि यह कृति लोक हित में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बनायेगी और भारतीय ज्ञान परम्परा को आगे बढ़ाने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देगी।</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
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                <pubDate>Tue, 01 Oct 2024 17:57:47 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
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                <title>डेंगुनिल डेंगू का सफल उपचार</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">डॉ. अनुराग वार्ष्णेय<br />उपाध्यक्ष- पतंजलि अनुसंधान संस्थान</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3617/successful-treatment-of-dengue"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-04/1721637871dengunilvati1.png" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">  डेंगू वायरस के जीन एक्सप्रेशन डीइएनवी-3 को मापा गया तो देखा कि औषधियों के विभिन्न डोज़ेस पर वायरस का लेवल धीरे-धीरे कम हो रहा है। इसके बाद इन मछलियों में लिवर इन्फ्लेमेशन को नापा गया और यह देखा गया कि दवाई की विभिन्न मात्रा से यह इंफ्लेमेटरी मार्कर्स भी कम हो रहे हैं, तत्पश्चात लाल रक्त कोशिकाओं के बढ़े हुए लेवल को भी इस औषधि ने डोज़ डिपेंडेंट तरीके से कम किया।</h5>
<h5 style="text-align:justify;">वर्षा ऋतु के समाप्त होते-होते पूरे भारत वर्ष में डेंगू की एक लहर आ जाती है। यह वायरल बुखार बहुत से लोगों के लिए प्राणघातक साबित होता है क्योंकि कई लोग इसको सामान्य वायरल बुखार जानकर नजरअंदाज करते हैं। हिंदी में इसे डेंगू कहा जाता है, वहीं अंग्रेजी में इसे डेंगी कहते हैं।<br />डेंगू बुखार एक विशेष मच्छर के काटने से होता है जिसका नाम एडीज़ है। इसकी 2 प्रजातियां हैं जिनके काटने से यह होता है। यह वायरस, मच्छर के द्वारा हमारे शरीर में प्रवेश करता है। जब यह मच्छर किसी रोगी को काटता है तो यह उसका होस्ट बन जाता है, तथा जब वही मच्छर जब किसी दूसरे स्वस्थ व्यक्ति को काटता है तो यह वायरस उस व्यक्ति में प्रवेश कर जाता है और वह व्यक्ति भी डेंगू कि चपेट में आ जाता है। यह एक विशेष प्रकार का मच्छर होता है, जिसके शरीर पर सफेद रंग के चक्कते या धब्बे दिखाई देते हैं। डेंगू के मुख्यत: 4 वायरस हैं, जिन्हें क्रमश: 1, 2, 3, 4 की संख्या दी गई है। यह एक ऐसी बीमारी है जिसके बार-बार होने की सम्भावना बनी रहती है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>प्रतिवर्ष करोड़ों लोग होते हैं डेंगू से ग्रसित </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">विश्व में हर वर्ष लगभग 40 करोड़ लोग डेंगू से ग्रसित होते हैं, और पिछले साल की रिपोर्ट के अनुसार 40 हजार लोग इस बीमारी से काल के गाल में समा गए थे। भारत तथा उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में यह एक सामान्य बीमारी है क्योंकि वहां की पस्थितियाँ जैसे तापमान मच्छरों को पनपने के लिए अनुकूल होती हैं। <br />शरीर के अंदर जाते ही यह वायरस तीव्र गति से बढऩा शुरू कर देता है और शरीर के विभिन्न अंगों जैसे लिवर, स्प्लीन, किडनी पर अपना वर्चस्व स्थापित कर देता है, साथ ही रक्त धमनियों पर तेजी से असर करना शुरू कर देता है। यह वायरस एक सुई की नोक पर थोड़ी सी मात्रा में भी शरीर के लिए बहुत नुकसानदायक है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>डेंगू के मुख्य लक्षण</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">इस बीमारी के लक्षणों में आँखों के नीचे दर्द, बुखार आना, मांसपेशियों में दर्द, सिरदर्द, जी-मिचलाना, उल्टी, हड्डियों और जोड़ों में दर्द, और पूरे शरीर में जगह-जगह लाल रंग के चक्कते पड़ जाते हैं। यह चक्कते यह बताते हैं कि हम डेंगू की एडवांस स्टेज पर पहुंच चुके हैं।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>डेंगूनिल पर पतंजलि का अनुसंधान</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">सर्वप्रथम इस औषधि की रासायनिक एनालिसिस करने के बाद ये देखा गया कि इसमें कितने प्रकार के फाइटोकेमिकल्स, कितनी मात्रा में विद्यमान हैं। तत्पश्चात बायोलॉजिकल परीक्षणों के लिए जेबरा फिश को आधार बनाया गया। इस मछली की अंदरूनी बनावट मनुष्य के काफी हद तक समानांतर ही है एवं इस पर शीघ्रता से शोध किये जा सकते हैं, इसलिए इस मॉडल को अपनाया गया।<br />परन्तु एक सवाल यह भी था कि क्या डेंगू वायरस मछलियों को भी संक्रमित करेगा, क्योंकि मछलियां पानी के अंदर रहती हैं और इस प्रकार की बीमारी का अभी तक उन पर अध्ययन नहीं किया गया है। परन्तु जब डेंगू से पीडि़त रोगियों के सीरम लिए गए और उनको इन मछलियों में रोपित किया गया तो इस वायरस ने जेबरा मछली को भी उसी प्रकार संक्रमित किया जिस प्रकार यह मनुष्यों को करता है और उसमें भी अपने आप को गुना किया। इस शोध में पता लगा कि इन मछलियों में भी उसी प्रकार के लक्षण पाए गए जैसे अनीमिया, आलस्य और प्लेटलेट्स का लेवल कम होना।<br />इस शोध के अंतर्गत सबसे पहले इन मछलियों को 2 समूह में रखा गया जिनमें इन्हें 8 दिन और 15 दिन लगातार औषधि का सेवन कराया गया। तत्पश्चात डेंगू वायरस के जीन एक्सप्रेशन डीइएनवी-3 को मापा गया तो देखा कि औषधियों के विभिन्न डोज़ेस पर वायरस का लेवल धीरे-धीरे कम हो रहा है। इसके बाद इन मछलियों में लिवर इन्फ्लेमेशन को नापा गया और यह देखा गया कि दवाई की विभिन्न मात्रा से यह इंफ्लेमेटरी मार्कर्स भी कम हो रहे हैं, तत्पश्चात लाल रक्त कोशिकाओं के बढ़े हुए लेवल को भी इस औषधि ने डोज़ डिपेंडेंट तरीके से कम किया। <br />इसके अलावा इस औषधि के द्वारा सफेद रक्त कोशिकाओं, और प्लेटलेट काउंट की संख्या की भी जांच की गया और पाया कि जो व्हाइट ब्लड सेल्स और प्लेटलेट काउंट डेंगू की वजह से कम हो गए थे, वह भी औषधि की विभिन्न मात्राओं से ठीक हो रहे हैं। <br />अन्य पैरामीटर्स जैसे हिमाटोक्रिट काउंट और आरबीसी काउंट जो दोनों डेंगू में कम हो जाते हैं, वो भी विभिन्न डोज़ेस के साथ-साथ ही ठीक हो रहे हैं, बढ़ रहे हैं। इसके अतिरिक्त एक अन्य बायोमार्कर और पैरामीटर हैमरेज क्लॉट जिसका तात्पर्य शरीर पर लाल चकत्ते होना होता है और जो डेंगू की एक एडवर्स कंडीशन है, मछलियों के फिन्स पर भी देखी गई, परन्तु जैसे-जैसे डेंगुनिल औषधि को इन मछलियों को दिया गया, वैसे-वैसे ही यह चकत्ते भी कम होना शुरू हो गए। साथ ही डेंगुनिल वटी ने प्रमुख जीन एक्सप्रेशन एएनजी-3 और सीसीएल-3 जो की डेंगू में बढ़ जाते हैं को भी डोज़ डिपेंडेंट तरीके से कम किया।<br />तत्पश्चात मानव शरीर पर इसके दुष्प्रभावों को जांचने के लिए मानवीय लिवर कोशिकाओं और त्वचा की कोशिकाओं पर शोध किया गया और पाया कि डेंगुनिल का कोई दुष्प्रभाव नहीं है।<br />आयुर्वेदिक सिद्धांत एवं प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से विभिन्न रोगों का उपचार संभव है और पतंजलि उसी दिशा में कार्य करने के लिए दृढ़-संकल्पित है। </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Oct 2024 17:54:47 +0530</pubDate>
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                <title>अर्धसत्य से अंधकार फ़ैलता है</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3618/half-truths-spread-darkness"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-04/fgnvg.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">   अर्धसत्य सदा आध्यात्मिक अंधकार फ़ैलाता है। मजहबी और बाहरी रेलिजस प्रभावों से सनातन धर्म के कतिपय अनुयायियों में भी अर्धसत्य ही बोलने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। यद्यपि सनातन संस्कारों के गहरे प्रभाव के कारण सभी सनातनधर्मी विद्वान और साधक यह सत्य जानते हैं कि वे जो बोल रहे हैं, वह अर्धसत्य है और प्रसंगवश ही बोला जा रहा है। परंतु बारम्बार सत्य का केवल आधा पक्ष दोहराने से नई पीढ़ी में सत्य का शेष पक्ष विस्मृत या कुंद होता जा रहा है। इसलिये सभी सत्यनिष्ठ लोगों को चाहिये कि वे केवल अर्धसत्य न बोलें, पूर्ण सत्य बोलें। अन्यथा आध्यात्मिक अंधकार  और भ्रांति फ़ैलने की संभावना बढ़ती जायेगी।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong>एक जीवित मनुष्य में केवल आत्मा ही नहीं</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">उदाहरण के लिये, सभी हिन्दू यह सत्य दोहराते रहते हैं कि ‘तुझमें राम, मुझमें राम, सबमें राम समाया’। या यह कि ‘परमात्मा का वास सभी के हृदय में है’। या यह कि ‘तुझमें नारायण, मुझमें नारायण, सबमें नारायण, जहाँ देखो वहाँ नारायण-नारायण’। परंतु मानव जीवन का यह अर्धसत्य है। क्योंकि एक जीवित मनुष्य में केवल आत्मा ही नहीं होती। आत्मा तो होती है परंतु साथ ही देह, मन, ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ, बुद्धि, संस्कार, आकांक्षायें, संकल्प, स्मृति, अभ्यास और पुरूषार्थ की सामथ्र्य भी होती है। सबके भीतर एक ही परमात्मा का वास है, यह सत्य है। परंतु सबके संस्कार, सबके मन की वृत्ति और संरचना, बुद्धि का स्वरूप और स्तर, ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का सामथ्र्य, संकल्प का स्वरूप, आकांक्षाओं और लालसाओं के रूप, स्मृति का स्वरूप और भंडार तथा अभ्यास का स्वरूप और पुरूषार्थ की सामथ्र्य भिन्न-भिन्न होती है। प्राय: भिन्न-भिन्न लालसाओं और आकांक्षाओं के कारण समाजों और व्यक्तियों के मध्य टकराहट और संघर्ष होते रहते हैं। मानव जीवन का यही इतिहास है। सबके भीतर परमात्मा का वास होने के तथ्य से आज तक व्यक्ति और व्यक्ति, व्यक्ति और समाज तथा समाज और समाज यानी एक समाज की दूसरे समाज से टकराहटें टली नहीं हैं। इतना ही नहीं, स्वयं सनातन धर्म के ज्ञान के वाहक भारत में भी व्यक्तियों, कुलों, सम्प्रदायों और भिन्न-भिन्न समूहों की टकराहटें सदा होती रही हैं। साथ ही सनातन धर्म के ज्ञान के कारण उन टकराहटों का न्यायपूर्ण समाधान भी निकाला जाता रहा है। सम्पूर्ण भारतीय इतिहास इसका साक्षी है। इसके साथ ही पुरूषार्थों और संकल्पों के अलग-अलग रूपों से ही विद्या, कला, राज्य तथा शिल्पों के क्षेत्र में ऐश्वर्य की विविधता साकार होती है। इस विराट वैविध्य को देखते हुये भी अनदेखा करना सत्य का अनादर है। केवल सबमें एक परमात्मा का वास होने की रट में सत्य का यही अनादर सन्निहित है। दूसरी बात यह है कि इस अर्धसत्य के रट से कि सबमें एक ही परमात्मा का वास है, सामने दिख रहे संसार की विविधता का स्वरूप और कारण स्पष्ट नहीं होता।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong>सर्वत्र सर्वव्याप्त नारायण केवल वीतराग संन्यासियों की दृष्टि </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">सर्वत्र सर्वव्याप्त नारायण को देखना सिद्ध वीतराग संन्यासियों की दृष्टि है। जिन्हें जगतगति नहीं व्यापती और जिनमें कोई भी लौकिक लालसा तथा भोग के संस्कार शेष नहीं हैं। इस प्रकार वे समाज के बीच रहते हुये एक महान प्रकाशपुंज की तरह है। उनकी उपस्थिति और उनके सामीप्य से सबको आध्यात्मिक लाभ होता है और चैतन्य का जागरण होता है। अत: उनका होना स्वयं में किसी भी समाज का सौभाग्य है परंतु उतने से लोकव्यापार नहीं चलता। लोक में व्यवहार और पुरूषार्थ के अनंत रूप अनादिकाल से प्रवर्तित और प्रवाहित हैं। समस्त धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, व्यापारिक, वाणिज्यिक, शिल्पगत, व्यवहारगत और राजनैतिक पुरूषार्थ विविध प्रकार की आकांक्षाओं और संकल्पों तथा क्रियाओं का परिणाम है। वे केवल वीतराग संन्यासियों के पुरूषार्थ का परिणाम नहीं है। अत: सर्वत्र नारायण के दर्शन से तथा परस्पर की भिन्नता और भेद की विस्मृति से लोकव्यवहार और लोकव्यापार संभव नहीं है। यह सर्वविदित है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong>कथाएँ व गाथाएँ शिक्षा का प्रमुख अंग</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">परम्परा से हमारे यहाँ कथाओं, आख्यानों तथा इतिहास-पुराण की गाथाओं की प्रस्तुति कथावाचकों और उपदेशकों तथा धर्मक्षेत्र की विभूतियों के द्वारा होती रही है। इसलिये विश्व की विविधता की व्याख्या जन-जन में व्याप्त रही है। तात्विक स्तर पर अभेद का ज्ञान और व्यावहारिक स्तर पर भेद का ज्ञान सनातन सत्य है, जिसका ज्ञान इन कथाओं, आख्यानों और इतिहास की गाथाओं से निरंतर समाज में प्रसारित होता रहा है। परंतु 15 अगस्त 1947 के बाद औपचारिक शिक्षा के क्षेत्र से ये कथायें और गाथायें यह कहकर बहिष्कृत कर दी गई हैं कि ये शिक्षा के मुख्य प्रवाह का अंग नहीं हैं। फ़लस्वरूप विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में होने वाली विद्वत-चर्चाओं में ये कथायें और इतिहास के ये तथ्य प्राय: अनुपस्थित रहते हैं। इसलिये नई पीढ़ी के चित्त से यह सत्य बौद्धिक स्तर पर ओझल या अस्पष्ट रहता है। इससे संसार के प्रति तामसिक अभेदवाद पैदा होता है। विशेषकर हिन्दुओं की नई पीढ़ी में यह तामसिक अभेदवाद संभवत: जानबूझकर बढ़ाया गया है। परंतु इससे बहुत अनिष्ट होता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong>नई पीढ़ी की अज्ञानता से बढ़ रहा आध्यात्मिक अंधकार</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">भारत में इन दिनों ऐसे अनेक समूह सक्रिय हैं जो हिन्दू धर्म को पिछड़ा, अज्ञानपूर्ण और नष्ट होने योग्य बताते रहे हैं और इसके स्थान पर अपने पंथ या अपने मत को प्रस्थापित करने का प्रस्ताव करते रहते हैं। एक ओर वे हिन्दू धर्म के प्रति सार्वजनिक रूप से शत्रुता का भाव रखते देखे जाते हैं और दूसरी ओर सभी मजहब एक हैं की रट से हिन्दुओं की नई पीढ़ी को लगता है कि जब सब में एक ही परमात्मा का वास है तो क्या अंतर पड़ता है कि सनातन धर्म रहे या अमुक लोगों का मजहब या रिलीजन रहे। दूसरी ओर हिन्दू धर्म की निंदा कर रहे समूह यह कभी नहीं कहते कि हमारा मजहब रहे या हमारा रिलीजन रहे अथवा सनातन धर्म ही रहे, इससे क्या अंतर पड़ता है। इसके स्थान पर वे सदा ही अपने मजहब या रिलीजन या पंथ अथवा मतवाद को हिन्दू धर्म की जगह प्रतिस्थापित करने को तत्पर रहते हैं। यह बड़ी विषम स्थिति है। अर्धसत्य की चपेट में आये हिन्दुओं की युवा पीढ़ी इस स्थिति को सम्भाल नहीं पाती।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong>राजनैतिक लाभ के लिए हमारे शासकों ने फ़ैलाई अर्धत्य की प्रवृत्ति</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">अर्धसत्यों की यह प्रवृत्ति सबसे पहले 1947 ईस्वी के बाद हमारे शासकों ने फ़ैलाई। उन्होंने विश्व के विषय में देश में अर्धसत्य फ़ैलाया। जिस समय विश्व में आणविक और परमाणु हथियारों की होड़ चल रही थी और प्रत्येक शक्तिशाली राष्ट्र सम्पूर्ण विश्व में केवल अपना प्रभुत्व फ़ैलाने के लिये सब प्रकार के कूटनैतिक प्रयास और प्रपंच कर रहा था, उस समय श्री जवाहरलाल नेहरू और उनके नेतृत्व में शासन से जुड़े सभी प्रमुख बौद्धिक लोग देश को यह बता रहे थे कि हम विश्व में शांति और पंचशील लाने जा रहे हैं और सम्पूर्ण विश्व से हथियारों की होड़ समाप्त करके शांतिपूर्ण सहअस्तित्व संभव बनायेंगे। यह बताते-बताते 70 वर्ष से अधिक हो गये और न तो दुनिया में हथियारों की होड़ थमी और न ही भीषण युद्ध थमें तथा न ही शक्तिशाली देशों द्वारा सम्पूर्ण विश्व में अपना ही एकाधिकार फ़ैलाने और अन्य देशों तथा समाजों को अपने नियंत्रण अथवा अपने प्रभाव में लेने की रणनीतियाँ थमी। अपने देशवासियों से अर्धसत्य बोलकर उन्होंने देश के मानस को विश्व के सत्य से काट दिया। इससे एक राष्ट्रीय बुद्धि मंदता फ़ैली। हिन्दुओं का बहुत बड़ा वर्ग विश्व के विषय में अपने नेताओं की गप्पों के आधार पर राय बनाने लगा और स्वप्नजीवी हो गया। उसने मान लिया कि विश्व में सब लोग भारत के नेतृत्व में शांति और सद्भाव स्थापित करने के लिये ही प्रयासरत हैं। जबकि इस बीच सभी शक्तिशाली राज्य विश्व में केवल युद्ध और अन्यों पर नियंत्रण की ही रणनीति पर काम कर रहे थे। इतना ही नहीं, बौद्धिक स्तर पर भी हिन्दू धर्म को लांछित करने और भारत के गौरवशाली इतिहास को छिपाने या मलिन करने के प्रयास भी चल रहे थे। इस प्रकार नेताओं द्वारा फ़ैलाये गये अर्धसत्य के कारण भारत के हिन्दुओं की बहुत बड़ी जनसंख्या विश्व की वास्तविकताओं से कट गई। हिन्दू धर्म को नष्ट करने वाले सभी समुदायों को वे सद्भाव से प्रेरित और सत्यनिष्ठ समूह मानते रहे। यह आत्मघाती वृत्ति समाज को सब प्रकार से हानि पहुँचाने वाली सिद्ध हुई।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span style="color:rgb(230,126,35);">कुछ कथावाचक व उपदेशकों ने भी फ़ैलाया भ्रम</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">नेताओं के अनुसरण में कुछ कथावाचक, उपदेशक आदि भी सम्पूर्ण विश्व में शांति और सद्भाव फ़ैल रहे होने की बात कहने लगे। आचार्य विनोबा भावे जैसे विद्वान ने यह व्याख्या ही प्रस्तुत कर दी कि सम्पूर्ण विश्व निरंतर अहिंसा की ओर बढ़ रहा है और हम निरंतर आध्यात्मिक दृष्टि से विकसित हो रहे हैं। स्पष्ट है कि यह सर्वथा असत्य और भ्रांत बात थी। विश्व का सत्य तो कुछ और ही है। लगातार नास्तिकता और अविवेकपूर्ण भोगवाद भी फ़ैल रहा है। भारत में भी यही प्रवृत्तियाँ फ़ैलीं। इन प्रवृत्तियों को थामने का काम भी सत्यनिष्ठ और पुरूषार्थी धार्मिकजनों ने ही किया है। न कि नेताओं के अनुसरण में विश्व के विषय में भ्रांति फ़ैलाने वाले लोगों ने।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong>हिन्दुओं में व्याप्त तामसिक अभेदवाद को विश्व के किसी भी मजहब या रिलीजन वालों ने नहीं किया स्वीकार </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">जिन लोगों ने तामसिक अभेदवाद का अनुसरण कर हिन्दू धर्म और एकपंथवादी मतों या मजहबों को एक समान माना, उनके कारण यह स्थिति आ गई कि सनातन धर्म को भारत में ही सब प्रकार से लांछित किया जाने लगा और हिन्दू धर्म का परित्याग या उसकी निंदा को नई चेतना का पर्याय बताया जाने लगा। भारत से बाहर के किसी भी मजहब या रिलीजन ने आज तक तामसिक अभेदभाव के इस स्वरूप को नहीं अपनाया है। किसी ने भी यह नहीं कहा है कि हमारे मजहब या हमारे रिलीजन का आराध्य देव वही हैं, जो हिन्दुओं के परमात्मा हैं या जो श्रीराम, श्रीकृष्ण, भगवान शिव, जगदम्बा दुर्गा, माता सरस्वती और माता लक्ष्मी हैं। यह कभी कोई नहीं कहता। यह केवल कतिपय मूर्ख अथवा दुष्ट हिन्दू नेताओं ने और उनका अनुसरण करने वाले धार्मिक नेताओं ने कहा है कि जो राम हैं, वे ही अल्लाह भी हैं और वे ही यीशु हैं। इसके स्थान पर अल्लाह को मानने वालों ने अन्य सभी आराध्य देवों को असत्य बताया है और यीशु को मानने वालों ने अल्लाह सहित शेष सबको असत्य बताया है। इस प्रकार हिन्दुओं में व्याप्त तामसिक अभेदवाद को विश्व के किसी भी मजहब या रिलीजन वालों ने स्वीकार नहीं किया है। <br />तो क्या उनके भीतर परमात्मा का वास नहीं है? निश्चय ही है। लेकिन अन्यों के आराध्यदेवों अथवा अन्यों की उपासना पद्यति या अन्यों की संस्कृति या धर्म को नष्ट करने का कोई निर्देश सर्वान्तर्यामी परमात्मा ने नहीं दिया है। यह तो संबंधित समूहों द्वारा अन्यों पर आधिपत्य की लालसा से उपजा विचार मात्र है। केवल सर्वव्यापी परमात्मा पर बल देने से विश्व की इन घटनाओं और प्रवृत्तियों का कोई भी स्पष्टीकरण संभव नहीं है। क्योंकि उनके भीतर बैठे परमात्मा ने अन्यों के भीतर बैठे परमात्मा को अस्वीकार करने या नष्ट करने का कोई भी निर्देश नहीं दिया है। ऐसा कोई निर्देश वे दे ही नहीं सकते। क्योंकि ऐसा निर्देश देने वाला परमात्मा हो ही नहीं सकता। यह तो संबंधित समूहों की सत्ता और सम्पत्ति तथा प्रभुत्व और नियंत्रण की लालसायें हैं जो उन्हें अपने आराध्यदेव के अतिरिक्त अन्य सब आराध्यों को असत्य बताकर उन पर अपना प्रभुत्व और अपना नियंत्रण स्थापित करने की प्रेरणा देती हैं और उस प्रकार के विचार फ़ैलाती हैं। अत: सत्य के इस पक्ष का भी न केवल ध्यान रखना आवश्यक है, अपितु सार्वजनिक प्रचार भी आवश्यक है। कम से कम हिन्दू समाज के भीतर यह सम्पूर्ण सत्य फ़ैलना आवश्यक है। क्योंकि तभी हिन्दू समझेंगे कि जिन्हें वे अपने ही जैसा परमात्मा का उपासक मानते हैं, वे अकारण हिन्दू धर्म को नष्ट क्यों करना चाहते हैं? हिन्दू धर्म ने उनको क्या हानि पहुँचाई है या उनसे क्या छीना है? अगर कुछ भी नहीं छीना है तो फिऱ वे लोग अकारण हिन्दुओं के प्रति आक्रामक क्यों हैं? <br />इसीलिये सम्पूर्ण सत्य को जानना और बोलना दोनों आवश्यक हैं। जिस समाज में केवल अर्धसत्य फ़ैलता है, वहाँ आध्यात्मिक अंधकार फ़ैल जाता है। सामने नष्ट करने को उपस्थित आततायी भी ऐसे अंधे लोगों को आत्मीय नजर आते हैं और अंत में उनकी पराजय सुनिश्चित हो जाती है। इसलिये सत्य के दोनों ही पक्षों का प्रचार और कथन कर्तव्य है। केवल सब में परमात्मा का वास बताना अलग-अलग लोगों के भीतर जाग्रत लालसाओं और वासनाओं की आग तथा ईष्र्या और द्वेष की आग एवं प्रभुत्व और विनाश की धधकती ज्वाला को छिपाना है। उससे प्रत्यक्ष सत्य की सम्यक व्याख्या नहीं हो पाती। केवल आध्यात्मिक अंधकार फ़ैलता है। इसीलिये पूर्ण सत्य का बोध जाग्रत रहना आवश्यक है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र-चिंतन</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3618/half-truths-spread-darkness</link>
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                <pubDate>Tue, 01 Oct 2024 17:53:47 +0530</pubDate>
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                <title>आर्थराइटिस</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">डॉ. अरुण पाण्डेय  पतंजलि आयुर्वेद कॉलेज, हरिद्वार</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3619/arthritis"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-04/basaljointarthritis_1280.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">   शरीर के जोड़ों में होने वाले दर्द और सूजन को आर्थराइटिस रोग के नाम से जाना जाता है। ज्वांइटस पेन (जोड़ों का दर्द) एक तरह से आज के युग की एक आम समस्या बनकर रह गयी है। जैसे-जैसे आयु बढ़ती है, वैसे-वैसे हमारे शरीर का कोई न कोई इस रोग की गिरफ्त में आ ही जाता है और तब इस रोग से ग्रसित व्यक्ति का जीवन पीड़ा युक्त होकर रह जाया करता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>आस्टियो आर्थराइटिस</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">आस्टियो आर्थराइटिस रोग की शरीर में उत्पत्ति चयापचय में आयी गड़बड़ी की वजह से होता है। पुरूषों की अपेक्षा महिलाओं को यह रोग ज्यादा सताता है। ज्यादातर यह रोग घुटनों, कमर, नितंबों और अगूठों की हड्डियों में होता हैं वैसे यह रोग शरीर के किसी भी जोड़ में हो सकता है। हड्डियों के जोड़ों के बीच साइनोवियल फ्ल्यूड का तरल पदार्थ होता है। एक तरह से यह तरल पदार्थ लुब्रिकेशन का काम करता है। जब जोड़ों के बीच साइनोवियल फ्ल्यूड की उपस्थिति में कमी आ जाती है, तब आस्टियो आर्थराइटिस (अस्थि संबंधित) रोग होता है। इस रोग के होने पर खून में यूरिक एसिड और यूरेटस की मात्रा में बढ़ोतरी हो जाती है। जिससे यह शरीर के जोड़ो, उपास्थियों, कान व त्वचा के नीचे इकट्ठा होकर तेज दर्द पैदा करता है। रोगी को इस तरह का रोग ज्यादातर सुबह के समय होता है। ज्यादातर दर्द रोगी के दायें पैर के अंगूठे में होता है। इसके अलावा रोगी की एड़ी, घुटना, टखना और कानों में भी दर्द होता है। रोगी को सर्दी लगने के साथ-साथ तेज बुखार चढ़ जाता है। दिन में दर्द में कमी आ जाती है और शाम होते-होते रोगी को तेज दर्द होने लगता है। अगर रोगी को सही वक्त पर उपचार न किया जाए तो गंभीर स्थिति उत्पन्न होने की आशंका बन जाती है और फिर तब रोगी के गुर्दों में पथरी बननी शुरू हो जाती है और रोगी की रक्तवाहनियां व मूत्रशय रोगग्रस्त हो जाते हैं। इस रोग के होने पर शरीर की कार्यप्रणाली पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। सामान्य अवस्था में मानव शरीर की सुरक्षा करने वाले तत्व ही शरीर के जोड़ों के स्वस्थ ऊतकों और झिल्लियों पर ही आक्रमण करना शुरू कर देते हैं, जिससे रोागी को जलन और दर्द का अनुभव होता है और उसके शरीर के रोग ग्रस्त हिस्से में सूजन आ जाया करती है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>लक्षण</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">कई बार पायरिया, टांसिल की सूजन, गनोरिया, टी0बी0, सोरायसिस, सिफलिस और डिसेन्ट्री आदि कीटाणुओं के संक्रमण के कारण भी शरीर में आर्थराइटिस रोग के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। उपरोक्त सभी बीमारियों में रोगी के शरीर से बदबूदार पसीना निकलता है और उसमें प्यास, कब्ज, सिरदर्द, जोड़ों में सूजन, बुखार, जोड़ों में दर्द के लक्षण दिखाई देने लगते हैं।</h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>रोगी की जीभ पर सफेद परत सी जम जाती है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>जब रोगी चलता है तब उसके दर्द में बढ़ोतरी हो जाती है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>रोगी को शाम के समय ज्यादा दर्द का अनुभव होता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>रोगी के घुटने धनुष की तरह बाहर की ओर मुड़ जाते हैं। </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>उंगलियों के जोड़ सूज जाते हैं। </h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>रोगी चिड़चिड़ा सा हो जाया करता है।</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>कारण</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">हमारे शरीर में जब विषाक्त पदार्थों का जमावड़ा आवश्यकता से अधिक हो जाता है, तब हमारे शरीर में वात रोग का प्रकोप पैदा हो जाता है। जब कब्ज रोग पुराना हो जाता है, तब आंतों में जमा मल सडऩ पैदा कर तरह-तरह के रोगाणुओं को पैदा को करता है। ये कीटाणु भोजन से मिले प्राटीन एमिनो एसिड्स पर अपना प्रभाव डालकर एमाइन्स में परिवर्तित कर देते हैं। जो टॉक्सिस खून सोखता है वे खून के द्वारा शरीर के जोड़ों और पेशियों में पहुंचकर उन्हें संक्रमित कर देते हैं, तब शरीर में संधिवात रोग पैदा होता है। बरसात में भोजन से, टॉन्सिल होने से, वायु विकार होने से, गनोरिया रोग होने से, टीबी होने से, सिफलिस रोग होने से भी शरीर में विभिन्न प्रकार के वातज रोग पैदा होने का कारण बन जाया करते हैं।</h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>आस्टियो आर्थराइटिस में पतंजलि की निरापद चिकित्सा </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>पीड़ानिल गोल्ड 2-2 कैप्सूल भोजन से पूर्व</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>आर्थोग्रिट व लाक्षादि गुग्गल 2-2 गोली भोजन के बाद</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>वातारि चूर्ण 1-1 चम्मच दूध  के साथ सुबह-शाम</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>सुबह-शाम पीड़ान्तक तैल से मालिश करें</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>जड़ी-बूटियों द्वारा रोग निवारण </strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>आक की जड़ की छाल, 1 भाग काली मिर्च, कुटकी और काला नमक एक-एक ग्राम। सबको मिलाकर जल के साथ महीन पीसकर चने जैसी गोलियां बना लें। शरीर के किसी भी अंग में वातजन्य पीड़ा हो तो सुबह-शाम 1-1 गोली गर्म पानी के साथ सेवन करें। </h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>वासा के पके हुए पत्तों को गरम करके सिकाई करने  से संन्धिवात रोग में आराम पहुंचता है। </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>धतूरे की जड़ और अगस्त्य की जड़ दोनों को बराबर मात्रा में लेकर पीस लें और पुल्टिस बनाकर  वेदना युक्त भाग पर बांधने से कष्ट दूर होता है और सूजन उतर जाती है। </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>तिल के तेल में आजवायन खुरासानी को सिद्ध कर मालिश करने से संधिवात रोग में लाभ पहुंचता है। </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>अमरबेल का बफारा देने से पीड़ा और सूजन में कमी आती है। </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>अलसी के तेल की पुल्टिस गठिया की सूजन पर लगाने से लाभ होता है। </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>20 ग्राम सूखे आंवले और 20 ग्राम गुड़ को 500 ग्राम पानी में औटाकर 250 ग्राम पानी रहने पर, मल छान कर सुबह-शाम पीने से रोग में फायदा होता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>अमरूद के कोमल पत्तों को पीसकर वेदना युक्त स्थान पर लेप करने से लाभ होता है। </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>सारिवा मूल चूर्ण को तीन ग्राम की मात्रा में शहद के साथ दिन में तीन बार देने से सन्धिवात में लाभ होता है। </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>अंकोल के पत्तों की पुल्टिस रोग ग्रस्त हिस्सों पर बांधने से पीड़ा मिटती है। </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>बकायन के बीजों को सरसों के साथ पीस कर रोग ग्रस्त हिस्से पर लेप करना चाहिए।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>अश्वगंधा के तीन ग्राम चूर्ण को तीन ग्राम घी में मिलाकर, एक ग्राम शक्कर मिलाकर सुबह-शाम खाने से रोग में फायदा होता है। </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>संन्धिवात में तिल तथा सौंठ बराबर लेकर प्रतिदिन 5-5 ग्राम तीन से चार बार सेवन करना चाहिए। </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>श्योनाक की छाल के चूर्ण को 125 मिली ग्राम से 250 मिलीग्राम तक मात्रा में दिन में तीन बार नियमित रूप से सेवन करने से तथा इसके पत्तों को गरम करके जोड़ों पर बांधने से संधिवात में बहुत लाभ होता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>चित्रकमूल, आंवला, हरड़, पीपर, रेबंद, चीनी और सेंधा नमक इन सब चीजों को समान भाग लेकर चूर्ण बनाकर 4 ग्राम से 5 ग्राम तक की मात्रा में प्रतिदिन सोते-सोते समय गरम पानी के साथ लेने से पुराना संधिवात रोग मिटता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>संधिवात में दालचीनी का 10-20 ग्राम चूर्ण 20-30 ग्राम शहद मिलाकर, पेस्ट बनाकर धीरे-धीरे मालिश करने से लाभ होता है। इसके साथ-साथ एक कप गुनगुने जल में 1 चम्मच शहद एवं दालचीनी का 2 ग्राम चूर्ण मिलाकर सुबह, दोपहर, शाम सेवन करना चाहिए।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>6 ग्राम धनिये के चूर्ण में 10 ग्राम शक्कर मिलाकर सुबह-शाम खाने से गर्मी से होने वाला जोड़ों का दर्द मिटता है। </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>जोड़ों के दर्द में ईसबगोल की पुल्टिस बांधने से लाभ होता है। </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>करेले के ऊपरी छिलके को निकालकर शेष भाग को आग पर 10 मिनट रखकर भुर्ता बना लें, फिर उसमें शक्कर मिला रोगी को गर्म-गर्म सुहाता हुआ खिला दें। इस प्रकार सुबह-शाम करीब 125 ग्राम तक यह भुर्ता शक्कर मिलाकर रोगी को गरम-गरम सुहाता हुआ खिला दें। ऐसा करनेे से संधिवात रोग में लाभ होता है। पीड़ा वाले स्थान पर करेले के फूलों के रस का बार-बार प्रलेप करना चाहिए।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>पलाश के बीजों को महीन पीसकर शहद के साथ वेदना वाले स्थान पर लेप करने से संधिवात में लाभ होता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>तगर को यशद भस्म के साथ लेने से संधिवात रोग में फायदा होता है। </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>तेजपात के पत्तों का लेप संधिवात पर करने से लाभ होता है। </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>संधिवात रोग में तुलसी के पंचाग का बफारा देने से लाभ होता है।</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>रयूमेटॉइड आर्थराइटिस</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">रयूमेटॉइड आर्थराइटिस बहुत की कष्टदायक रोग है। इस रोग को आमवात रोग के नाम से भी जाना जाता है। कम उम्र में और वृद्धावस्था में यह रोग ज्यादा होता है। एक साथ परिवार के कई लोगों को भी यह रोग होता देखा गया है। इस प्रकार से यह रोग वंशानुगत भी होता है। इस रोग में हड्डियों के जोड़ों में भयानक दर्द होने के साथ सूजन आ जाया करती है। रोग की अधिकता होने पर रोगी को कष्ट सहना मुश्किल हो जाया करता है। तीव्र र्यूमेटिज्म की अवस्था में स्थिति ज्यादा गंभीर हो जाती है। यह रोग ज्यादातर बच्चों, किशोरों और युवाओं को होता है। गले में स्ट्रप्टोफोकस के संक्रमण से इस रोग की उत्पत्ति होती है। इस अवस्था में रोगी को बुखार चढ़ जाता है। <br />रोगी के एक-एक जोड़ में दर्द और सूजन आ जाती है। रोगी में दर्द, सुर्ख लाल धब्बे विशेष रूप से कोहनी के नीचे दर्द रहित गांठ बन जाया करती है। रोग की अधिकता होने पर रोगी का हार्ट फेल हो जाता है, दिल में मर-मर की आवाज आती है और दिल के वाल्ब में खराबी आ जाती है। महिलाओं को रयूमेटॉइड आर्थराइटिस ज्यादा होता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>लक्षण</strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>रोगी के अनेक जोड़ों में दर्द रहने लगता है। </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>रोगी की हाथों की उंगलियों में दर्द होने लगता है। </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>जब रोगी सुबह उठता है तो उसे जकडऩ का अनुभव होता है। </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>सुबह का वक्त रोगी के लिए ज्यादा कष्टदायक  रहता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>सर्दी और बरसात के मौसम में रोगी की ज्यादा कष्ट  होता है। </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>रोगी की उंगलियों, पंजों और घुटनों में सूजन आ जाती है और रोगी की उंगलियां टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती हैं।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>रोगी के हाथ-पैर, टखना, सिर, घुटना, नितंब, पीठ और जांघों में पीड़ा युक्त सूजन आ जाया करती है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>रोगी को चलने-फिरने में असुविधा होती है और रोग के बढऩे पर रोगी चलने-फिरने में असमर्थ सा होकर रह जाता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>रोगी के शरीर में टूटन सी रहने लगती है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>रोग को आलस्य रहने लगता है। </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>रोगी का खाया-पीया पचता नहीं है। </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>चारपाई पर करवट बदलते वक्त भी रोगी को कष्ट होता है। कंपकपी के साथ रोगी को बुखार चढ़ता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>रोगी को नींद कम आती है, पेशाब ज्यादा आता है। </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>रोगी को दिल की बीमारी और कब्ज की शिकायत भी हो जाती है।</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>कारण </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">तले-भुने व गरिष्ठ खाद्य पदार्थों के सेवन से, ज्यादा चिकनाई युक्त व मीठे पदार्थों के सेवन से, बर्फ, कोल्ड ड्रिक्ंस, आईसक्रीम के सेवन से, फ्रीज का ठंडा पानी पीने से, ज्यादा खट्टे पदार्थ जैसी-खट्टी छाछ, दही, कैथ, कैरी, अमचूर, आदि के सेवन से, बेसन व मैदा के बने खाद्य पदार्थों के सेवन से रयूमेटॉइड आर्थराईटिस रोग की उत्पत्ति होती है। मानसिक बैचेनी भी इस रोग का कारक बनती है। 40 से 60 साल की उम्र की महिलाओं को यह रोग ज्यादा होता है। शरीर की रोगों से लडऩे की ताकत में जब कमी आ जाती है, तब यह रोग हो जाता है। गरीब बस्तियों में नमी व सीलन युक्त वाली बस्तियों में ठंडे प्रदेशों में,  यह रोग ज्यादा पनपता है। कुपोषण भी इस रोग का मुख्य कारण हैं। </h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>रयूमेटॉइड आर्थराइटिस में पतंजलि की निरापद चिकित्सा </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>पीड़ानिल गोल्ड 2-2 कैप्सूल भोजन से पूर्व</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>आमवातारि रस 2-2 वटी भोजन से पूर्व</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>सिंहनाथ गुग्गुल, ऑर्थोग्रिट, पुनर्वादि मण्डूर २-२ गोली भोजन के बाद</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>सुबह-शाम सैंध्वादि तैल से मालिश करें</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>यदि हम पिण्ड स्वेद करें तो अति लाभ होगा।</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>जड़ी-बूटियों से उपचार</strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>आक का फूल, सौंठ, काली मिर्च, हल्दी व नागर मोथा समभाग लें। जल के साथ महीन पीसकर चने जैसी गोलियां बना लें। 2-2 गोली सुबह-शाम जल के साथ सेवन करें।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>आरग्वध के 2-3 पत्तों के सरसों के तेल में भूनकर शाम के भोजन के साथ सेवन करने से र्यूमेटिड आर्थराईटिस रोग में फायदा होता है। </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>एरंड मूल 10 ग्राम और सौंठ का चूर्ण 5 ग्राम लेकर इसका क्वाथ बना लें। इसका सेवन करने से आमवात (रयूमेटॉइड आर्थराईटिस) रोग में फायदा होता है। </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>आमवात रोग में गोखरू के फल एवं समान भाग सौंठ की 10-20 ग्राम मात्रा को 400 मिली लीटर पानी में उबालकर चतुर्थांश बचे क्वाथ को सुबह और रात में सेवन करने से लाभ होता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>गोरखमुण्डी के फल के साथ समभाग सौंठ चूर्ण पीसकर, उष्णोदक से दोनों समय 3 ग्राम सेवन करने से और फलों को महीन पीस कर पीड़ा वाले स्थान पर लगाना चाहिए।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>आमवात में नीबू का रस एक-दो चार-पांच घंटे बाद सेवन करना चाहिए।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>पुनर्नवा के क्वाथ के साथ कपूर तथा सौंठ को 1 ग्राम चूर्ण को सात दिनों तक आमवात में सेवन करने से फायदा होता है। </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>अदरक के 1 किलोग्राम रस में 500 ग्राम तिल तेल डालकर आग पर चढ़ाना चाहिए। जब रस जलकर तेल मात्र रह जाये, तब उतार कर छान लेना चाहिए। इस तेल से मालिश करने पर जोड़ों की पीड़ा</h5>
<h5>मिटती है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>अमजोद, पायविदंग, देवदारू, चित्रक, पिपला मूल, सौंफ, पीपल, काली मिर्च 10-10 ग्राम, हरड़ विधारा 100 ग्राम, शुंठी 100 ग्राम। इन सबका महीन चूर्ण 6 ग्राम की मात्रा में पुराना गुड़ मिश्रित कर गर्म पानी के साथ दिन में तीन बार सेवन करने से आमवात में फायदा होता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>आमवात रोग में अरलू की जड़ व सौंठ का फांट बनाकर दिन में तीन बार 50 मिली की मात्रा में पीने से लाभ होता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>आमवात रोग में मिर्च सिद्ध तेल की मालिश करने से बहुत फायदा होता है।</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>दिव्य पीड़ान्तक रस द्वारा उपचार</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">इसकी 1-1 या दो-दो गोली दो बार दूध या गर्म पानी के साथ भोजनोपरान्त लेने से जोड़ों का दर्द, गठिया, कमर दर्द आदि रोगों में फायदा पहुंचता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>दिव्य पीड़ान्तक क्वाथ द्वारा उपचार</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">5 से 10 ग्राम क्वाथ को लगभग 400 ग्राम पानी में पका कर जब लगभग 100 ग्राम शेष रह जाये तब छानकर सुबह खाली पेट व रात को सोते समय पीयें। ऐसा करने से जोड़ों का दर्द, गठिया रोग में फायदा होता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);">दिव्य पीड़ान्तक तेल द्वारा उपचार</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">पीड़ायुक्त स्थान पर इस तेल की धीरे-धीरे मालिश करनी चाहिए। मालिश हमेशा दिल की ओर उचित बल का उपयोग करते हुए धीरे-धीरे करनी चाहिए। इस क्रिया से जोड़ों का दर्द, कमर दर्द, घुटनों का दर्द मिटता है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>स्वानुभूत उपचार</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">दिव्य स्वर्ण माक्षिक भस्म 5 ग्राम, दिव्य महावातविध्वंस रस 10 ग्राम, दिव्य प्रवाल पिष्टी 5 ग्राम, दिव्य बृहद वातचिन्तामणि रस 1 ग्राम, दिव्य गोदन्ती भस्म 5 ग्राम लेकर सबको मिला लें। इस मिश्रण की 60 पुडिय़ा बना लें। सुबह-शाम शहद या गर्म पानी से खाली पेट इस पुडिय़ा को लें। ऐसा करने से जोड़ों का दर्द, घुटनों का दर्द, कमर दर्द व गठिया रोग में फायदा होता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>घरेलू उपचार</strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>हल्दी 100 ग्राम, मेथी दाना 100 ग्राम, सौंठ 100 ग्राम व अश्वगंधा 50 ग्राम लेकर चूर्ण बना लें। इसे 1-1 चम्मच नाश्ते व शाम के खाने के बाद गुनगुने पानी से लेने पर जोड़ों का दर्द, कमर दर्द व गठिया रोग में फायदा होता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>लहसुन की 1 से 3 कली खाली पेट पानी से लेने पर जोड़ों के दर्द में लाभ होता है। </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>मोथा घास की जड़ जो कि एक गांठ की तरह होती है, उसका पाउडर करके 1 से 2 ग्राम सुबह-शाम पानी या दूध से लेने से जोड़ों का दर्द व गठिया रोग में फायदा होता है। </h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>योग द्वारा उपचार</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">बुखार की अवस्था में भूलकर भी व्यायाम व योगासन न करें। इस अवस्था में बिस्तर पर व्यायाम करते हुए गहरा श्वास-प्रश्वास, प्राणायाम और व्यायाम करें। बुखार के उतरने पर या न होने पर सभी प्रकार के वात रोगों में व्यायाम और प्राणायाम बहुत ज्यादा लाभदायक है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>बचाव</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">अपने भार में ज्यादा बढ़ोतरी न होने दें, क्योंकि ज्यादा शारीरिक भार होने की अवस्था में शरीर के जोड़ों पर अतिरिक्त भार पड़ता है। एक तरह से मोटापा आर्थराइटिस रोगों को न्यौता देता है। <br />एक ही मुद्रा में ज्यादा देर तक कभी नहीं बैठना चाहिए।<br />नाक, कान व गले के संक्रमण से बचें।<br />ठंड से, ठंडी हवा से, ठंडे पानी से नहाने से बचें। हाँ, रोग मुक्त होने पर ठंडे पानी से नहा सकते हैं।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>पथ्य</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">गेंहू की रोटी, घी व शक्कर डालकर बनाया हलवा, किसी  भी प्रकार का अन्त: व बाहृय स्नेहन, पुनर्नवा पत्रों का शाक, अनार, पका मीठा आम, अंगूर, एरण्ड तेल, मूंग की दाल, हींग, अदरक, सौंठ, मेथी, आजवायन, लहसुन, सहिजन के फूल व कच्ची कली की सब्जी, हल्दी, घृतकुमारी का सेवन, उष्ण जल का पान व स्नान, उष्ण वातावरण में निवास सेवनीय होता है। गर्म जल में तेज नमक डालकर पीड़ा व सूजन युक्त स्थान पर सिकाई करने से विशेष लाभ होता है। रोगी को अंकुरित अनाज, उबली सब्जी शुरू करते हुए धीरे-धीरे रोटी, दलिया आदि ठोस खाद्य पदार्थों का सेवन करना चाहिए।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>अपथ्य</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">इस रोग के रोगी को चीनी, चाय, कॉफी, शीतल पेय, कोक आदि का सेवन नहीं करना चाहिए। रोगी को मांस, मदिरा, दाल, अण्डा, तंबाकू, जंक फूड, फास्ट फूड आदि का सेवन नहीं करना चाहिए। रोगी का चना, मटर, सोयाबीन, आलू, उड़द, राजमा, मसूर, कटहल, फूल गोभी, खीरा, टमाटर, अमचूर, नीबू, संतरा, अंगूर, दही,  छाछ आदि खट्टे पदार्थ, भैंस का दूध, पेठा, ठंडा जल, पीना व स्नान, सीलन व ठंडे स्थान पर निवास करना अहितकर  है।<br />रोगी का आईसक्रीम, पिज्जा, बर्गर, पेटीज, इडली, डोसा, गुटखा, पान-मसाला, मैदा से बने ब्रेड आदि, कन्फैक्शनरी व सिन्थेटिक फूड्स आदि का सेवन नहीं करना चाहिए।</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>रोग विशेष</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Oct 2024 17:51:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>इन्द्रलुप्त (ऐलोपेसिया) आयुर्वेदीय उपचार</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong>वैद्य आशीष भारती गोस्वामी </strong>प्राध्यापक, अगद तंत्र विभाग, <br />पतंजलि भारतीय आयुर्विज्ञान एवं अनुसंधान संस्थान, हरिद्वार<br />एवं <strong>वैद्या नेहा बरुआ </strong> सह प्राध्यापिका, रोग निदान विभाग, <br />पतंजलि भारतीय आयुर्विज्ञान एवं अनुसंधान संस्थान, हरिद्वार</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3620/ayurvedic-treatment-for-alopecia"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-05/table-1.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">     क्या आप जानते हैं कि इन्द्रलुप्त (ऐलोपेसिया) एक गंभीर बीमारी हो सकती है? आइये जानते हैं ‘ऐलोपेसिया’ के बारे में! वर्तमान समय में बालों का झडऩा बहुत ही आम बात है। लोगों को ऐसा लगता है, कि ये कोई बीमारी थोड़े ही हो सकती है, खान-पान में समस्या, दैनिक दिनचर्या, मौसम में बदलाव होने से बाल तो झड़ते ही हैं, लेकिन अगर आपके बाल गुच्छों में झडऩे लगें जिससे आपकी हेयर लाइन ऊंची होने लगे, कभी-कभी सिर के साथ-साथ शरीर के अन्य हिस्से के बाल भी गिरने लगें तथा सिर पर पैच (गोल चकत्ते) दिखायी देने लगें तो इस बीमारी को ऐलोपेसिया (गंजापन) कहा जाता है। आधुनिक चिकित्सकों एवं त्वचा रोग विशेषज्ञों के अनुसार यह एक ऑटोइम्यून (Autoimmune) रोग है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-05/alopecia-(1).jpg" alt="Alopecia-(1)" width="900" height="716"></img><br />कई बार महिलाओं में प्रेगनेंसी के समय भी यह दिक्कत  शुरू हो जाती है जो बाद में ठीक हो जाती जाती है। कई बार लंबे समय से तनावग्रस्त होने से भी यह समस्या हो सकती है। दवाइयों के साइड इफेक्ट के कारण भी ऐलोपेसिया हो सकता है। इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं:-</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>ऑटोइम्यून  समस्या</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली बालों के रोम को एक बाहरी तत्व समझकर उन पर हमला करती है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>अनुवांशिक कारण</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">अगर परिवार में किसी को यह समस्या रही है, तो इसकी संभावना बढ़ जाती है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>तनाव या अवसाद</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">शारीरिक या मानसिक तनाव भी एलोपेसिया एरियाटा को ट्रिगर कर सकता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>हॉर्मोनल असंतुलन</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">कुछ मामलों में हॉर्मोनल बदलाव भी इस समस्या को जन्म दे सकते हैं। <br />आयुर्वेद में इस व्याधि को इन्द्रलुप्त कहा जाता है। रोमकूपों में रहने वाला पित्त दोष जब वात दोष के साथ मिलकर विकृत या दूषित होता है तो उस स्थान के केश झड़ जाते हैं। फिर दूषित रक्त मिश्रित कफ दोष उस स्थान के रोमकूपों के मार्ग को अवरुद्ध कर देता है जिस कारण नये केश उत्पन्न नहीं हो पाते हैं।<br />यह बीमारी पुरुषों एवं महिलाओं दोनों में देखी जा सकती है। प्राय: पुरुषों में बाल किनारे एवं सामने की ओर से झडऩा प्रारंभ होते हैं। महिलाओं के बाल, सिर के बीच से झडऩा प्रारंभ होते हैं। इस व्याधि का प्रभाव मन पर भी प्राय: देखा जाता है क्योंकि यह समस्या बाहरी सौंदर्य से भी जुड़ी हुई है। खासकर महिलाओं पर इस बीमारी का गहरा प्रभाव देखने को मिलता है। इसके कारण वे प्राय: चिंता एवं अवसाद से ग्रसित  हो जाती हैं। जिसके कारण दोष और प्रकुपित  होते हैं तथा समस्या और बढ़ जाती है।<br />आधुनिक चिकित्सा पद्धति मे भी ऐलोपेसिया का कोई स्थायी समाधान नहीं है, इसलिये बाल कम गति से झड़े इसी तरह के उपाय वे करते हैं। आयुर्वेदिक चिकित्सा से ऐलोपेसिया को ठीक किया जा सकता है साथ ही नयी केश उत्पत्ति भी देखी जा सकती है। यह आयुर्वेद चिकित्सा के चमत्कार ही हैं, ऐसा ही एक 24 वर्षीय महिला रोगी मेरे समक्ष उपचार हेतु आयी जो ऐलोपेसिया बीमारी से पीडि़त थी। उसके बाल गुच्छे मे झडऩे से सिर में पैच बन गया था। इस बात का उस पर गहरा असर था इसलिये वह अत्यंत तनाव ग्रस्त, अवसाद युक्त एवं चिड़चिड़ी स्वभाव की हो गयी थी। <br />सर्वप्रथम मैंने उसको चिकित्सीय औषधि परामर्श के साथ-साथ मानसिक रूप से भी प्रबल रहने को कहा। प्रकृति परीक्षण पर पाया गया कि वह पित्त कफज प्रकृति की महिला है तथा उसके दिनचर्या में भी बहुत हद तक वात व पित्त प्रकोपक कारक शामिल है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>उपचार</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">रोगी को सर्वप्रथम जो औषधियाँ दी गई वे निम्न हैं:-<br />    <br /><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-05/table-1.jpg" alt="table 1" width="688" height="316"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;">उपरोक्त सभी औषधियों को मिलाकर 60 पुडिय़ा बनाकर 1 पुडिय़ा सुबह शाम खाने के लगभग 20 मिनट पहले जल के साथ लेने का निर्देश दिया गया।</h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>दिव्य फाइटर वटी (पतंजलि) 2-2 वटी  सुबह शाम खाने के बाद </strong></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>न्यूट्रेला नेचुरल बोन हेल्थ (पतंजलि) 1-1    कैप्सूल सुबह शाम खाने के बाद </strong></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong>न्यूट्रेला डेली एक्टिव कैप्सूल (पतंजलि) 1-1    कैप्सूल सुबह शाम खाने के बाद </strong></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>बाह्य औषधियाँ</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>हर्बल हेयर एक्सपर्ट ऑइल (पतंजलि)</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">रोगी को हफ्ते में दो बाररात मे सिर मे लगाकर सुबह धोने का निर्देश दिया गया। उपरोक्त औषधियों के अलावा पित्त दोष के निरहरण के लिए जलौकावचारण चिकित्सा का उपयोग किया गया। चूंकि इस बीमारी में त्रिदोष के साथ-साथ रक्त धातु की विकृति होती है इसलिए पित्त दूषित रक्त को शरीर से बाहर निकालने के लिये जलौकवाचरण चिकित्सा अत्यंत की लाभदायक है इसलिये औषधियों के साथ समय-समय पर जलौकवाचरण करना जरूरी था। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-05/alopecia-(4).jpg" alt="Alopecia-(4)" width="900" height="1025"></img><br />आयुर्वेदिक चिकित्सा पथ्य पालन एवं योगाभ्यास के बिना अधूरी है चूंकि रुग्ण महिला के खानपान में विरुद्ध आहार एवं पित्त प्रकोप आहार ज्यादा शामिल थे, इसलिये सर्वप्रथम उनके आहार में कुछ विशेष बदलाव किये गये। उन्हें जरूरी प्राणायाम जैसे अनुलोम-विलोम भ्रामरी तथा कुछ आसन सर्वांगासन आदि दैनिक रूप से करने की सलाह दी गयी।<br />खान पान में बदलाव एवं व्यायाम करने से तथा नियमित औषधि सेवन से मात्र 1 महीने में फर्क दिखने लगा उनके केश झडऩे कम हो गये थे तथा पैच वाले स्थान केश उत्पत्ति शुरू हो गई, जिससे उन्हें मानसिक बल मिला व उनका आयुर्वेद चिकित्सा के प्रति उत्साह बढ़ गया। प्रकुपित दोषो के शांत होने तथा दूषित रक्त के निरहरण से इस बीमारी मे कुछ ही महीनो में चमत्कारिक लाभ देखने को मिला। आधुनिक शास्त्र में जहां इस बीमारी का कोई स्थायी समाधान नहीं है वहीं आयुर्वेद चिकित्सा, पथ्य पालन एवं योगाभ्यास से इस जटिल बीमारी को ठीक किया जा सकता है। विगत कुछ वर्षों के अनुभव से यह मैं स्पष्ट रूप से कह सकता हूँ कि किसी भी बीमारी की आयुर्वेद चिकित्सा यदि दोष, दूष्य प्रकृति, स्रोतोदुष्टि आदि को ध्यान में रख कर की जाए तो वह चिकित्सा लाभप्रद ही रहती है।</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>रोग विशेष</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3620/ayurvedic-treatment-for-alopecia</link>
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                <pubDate>Tue, 01 Oct 2024 17:50:47 +0530</pubDate>
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                            </item>
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                <title>मोटापा एक विश्वव्यापी समस्या जीवनशैली जनित रोग</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">स्वामी समग्रदेव<br />पतंजलि संन्यासाश्रम, पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3621/obesity-is-a-global-problem-and-a-lifestyle-disease"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-05/23123426-0-a_new_study_from.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>मोटापा</strong></span><br />    आजकल पूरी दुनिया में मोटापा एक बड़ी समस्या बन चुकी है। भारत में भी अनेक लोग मोटापा के शिकार हैं। मोटापा के कारण आमलोगों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। इसके कारण शरीर में कई तरह की बीमारियाँ एक साथ जन्म ले लेती हैं। <br />अनहेल्दी लाइफस्टाइल की वजह से होने वाली बीमारियों में मोटापा सबसे सामान्य है, जिससे आज दुनिया में हर दूसरा व्यक्ति परेशान है। मोटापा सिर्फ शारीरिक रूप से ही नहीं मानसिक रूप से भी नकारात्मक प्रभाव डालता है। मोटापे को 'lifestyle disease' भी कहा जाता है। जिसका अर्थ है कि यह आपकी खराब जीवनशैली यानि खराब लाइफस्टाइल से होता है और इससे छुटकारा दिलाने में भी आपके लाइफस्टाइल की बहुत बड़ी भूमिका होती है।<br />अधिक वजन और मोटापे को असामान्य या अत्यधिक वसा संचय के रूप में परिभाषित किया जाता है जो स्वास्थ्य के लिए खतरा उत्पन्न करता है। 25 से अधिक बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) को अधिक वजन माना जाता है, और 30 से अधिक को मोटापा माना जाता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>मोटापे के प्रमुख् कारण</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">मोटापे के कई कारण हो सकते है। इनमें से प्रमुख हैं-</h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>मोटापा और शरीर का वजन बढऩा, ऊर्जा के सेवन और ऊर्जा के उपयोग के बीच असंतुलन के कारण होता है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>अधिक चर्बी युक्त आहार का सेवन करना भी मोटापे का कारण है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>कम व्यायाम करना और स्थिर जीवन-यापन मोटापे का प्रमुख कारण है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>असंतुलित व्यवहार औऱ मानसिक तनाव की वजह से लोग ज्यादा भोजन करने लगते हैं, जो मोटापे का कारण बनता है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>शारीरिक क्रियाओं के सही ढंग से नहीं होने पर भी शरीर में चर्बी जमा होने लगती है, यह भी मोटापे का एक कारण है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>बाल्यावस्था और युवावस्था के समय का मोटापा व्यस्क होने पर भी रह सकता है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>कई लोगों को दिन मे खाना खाने के बाद सोने की आदत होती है जो मोटापे का कारण बन सकती है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>हाइपोथाइरॉयडिज़्म (अवटु अल्पक्रियता)</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>बहुत ज्यादा मीठे का सेवन करने से भी मोटापे का खतरा रहता है।</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>मोटापे के लक्षण</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">मोटापा शारीरिक और मानसिक स्तर पर जीवन में कई सारे परिवर्तन लाता है। जिनके कारण व्यक्ति में इसके लक्षण परिलक्षित होते हैं। किन्तु कई बार लोग इन्हें महत्त्व नहीं देते और इसके बारे में कोई चिकित्सकीय परामर्श नहीं लेते जो आगे चलकर उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>मोटापे के प्रमुख लक्षण निम्नवत हैं</strong></span><br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>सांस फूलना</strong></span><br />    बार-बार साँस फूलने की समस्या का होना मोटापे का लक्षण है जो कई कारणों से हो सकता है और कई रोगों का कारण बनता है।<br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>पसीना में वृद्धि</strong></span><br />    अचानक से बार-बार पसीना आना और वह भी बहुत, यह दर्शाता है कि व्यक्ति मोटापे से ग्रसित है।<br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>खर्राटे</strong></span><br />    आमतोर पर मोटापे से बेहाल लोगों को नींद में बहुत खर्राटे लेते देखा जा सकता है मोटापा बढऩे के साथ-साथ यह समस्या और भी बढ़ती जाती है।<br />शारीरिक गतिविधि के साथ सामंजस्य करने में अचानक असमर्थता का अनुभव करना<br />    सामान्य रूप से कोई भी शारीरिक गतिविधि करने में असमर्थ होते जाने का संबध भी मोटापे से है और ये मोटापे का सबसे प्रमुख्य लक्षण भी है।<br />बहुत अधिक थकान महसूस करना<br />    आमतौर पर बिना किसी अतिरिक्त कार्यभार के लगातार थकान का अनुभव करना भी मोटापे का ही एक लक्षण है।<br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>पीठ और जोड़ों में दर्द </strong></span><br />    मोटापे की समस्या से ग्रसित लोगों में पीठ और जोड़ों के दर्द सामान्य रूप से देखा जा सकता है।<br />आत्मविश्वास और आत्मसम्मान में कमी का अनुभव<br />    शारीरिक समस्याओं के कारण किसी भी काम को करने की क्षमता में कमी आ जाती है और स्वयं पर विश्वास भी नहीं होता जिसके चलते आत्मसम्मान में भी कमी आ जाती है।<br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>अकेला महसूस करना</strong></span><br />    मोटापे में अकेलापन अनुभव करना एक आम बात है। शारीरिक परिवर्तनों के चलते लोग स्वयं को सबसे अलग और एकाकी महसूस करते हैं।<br />जरूरत से ज्यादा या कम सोना<br />    यदि हम जरुरत से ज्यादा सोते है तो यह भी हमारे मोटापे का बहुत बड़ा लक्षण होता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>मोटापे से जुड़ी समस्याएं</strong></span><br />मोटापे के कारण कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं होती हैं जिनमें टाइप-2 डायबिटीज, हाइपरकोलेस्ट्रोलेमिया (उच्च कोलेस्ट्रॉल, गैस्ट्रोओस्फोजियल रिफ्लक्स डिजिज (जीईआरडी), उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, अवसाद, जोड़ों की ओस्टियोआर्थराइटिस, जोड़ों का दर्द, स्लीप एपनिया और श्वसन सम्बंधी समस्याएं, यूरिनरी स्ट्रेस इंकांटिनेंस, अस्थमा और फेफड़ों की समस्याएं और प्रजनन संबंधी समस्याएं। डायबिटीज वाले मरीज के मोटापा बढऩे से उसकी डायबिटीज की समस्या बढ़ जाती है । सांस फूलना तथा अधिक पसीना आना मोटापे के प्रमुख समस्या है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>उचित वजन</strong></span><br />एक युवा व्यक्ति के शरीर का अपेक्षित वजन उसकी लंबाई के अनुसार होना चाहिए, जिससे कि उसका शारीरिक गठन अनुकूल लगे। शरीर के वजन को मापने के लिए सबसे साधारण उपाय है बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) और यह व्यक्ति के शरीर की लंबाई को दुगुना कर उसमें वजन (किलोग्राम) से भाग देकर निकाला जाता है।<br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>निष्कर्ष</strong></span><br />उपरोक्त दी गयी युक्तियों का पालन करके मोटापे को कम किया जा सकता है। यदि आप इस स्थिति का शिकार हो जाते हैं तो इसे ठीक करने के लिए तत्काल एक चिकित्सक से परामर्श करना ही ठीक रहेगा क्योंकि यह न केवल अपने आप में एक समस्या है बल्कि कई अन्य स्वास्थ्य समस्याओं जैसे हृदय की समस्या, पित्त पथरी, नींद, अश्वसन और बांझपन को भी जन्म देती है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>आहार</strong></span><br />सुबह 5:00 बजे    :    पंचामृत पेय, (सौंफ, धनिया, जीरा, अजवाइन)100 द्वद्य <br />सुबह 7:30 बजे     :    (सर्वकल्प +कायाकल्प) और (एलोवेरा+ वीटग्रास)।<br />नाश्ते में         :    बादाम -5, अखरोट -2, अंजीर -2, किशमिश-7, लहसुन -2, फल -सेब, पपीता,   नाशपाती, + स्प्राउट्स + नारियल का पानी ।<br />12:00 से 1:00    :    सौंफ, उबली हुई सब्जी, सलाद, मल्टीग्रेन रोटी -2, मल्टीग्रेन दलिया, लौकी कल्प।<br />4:00 से 5:00    :    भुने हुए मखाने, भुने हुए चने, नारियल पानी।<br />शाम 7:30 बजे     :    सौंफ, उबली हुई सब्जियां, दलिया / लौकी कल्प।<br />औषधीय पानी     :    मेधोहर पेय ( 1-2 लीटर / डेली )।<br />उपवास    :    नारियल के पानी पर उपवास।<br />            सौंफ मेथी शहर के पानी पर उपवास।<br />            नींबू शहद के पानी पर उपवास।<br />            फल।<br />            स्प्राउट्स।<br />            लौकी कल्प ‘उबली हुई लौकी’।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>उपचार    :    </strong>हॉट एंड कोल्ड कंप्रेस ऑन एब्डोमिनल।<br />नेचुरल इमर्शन बाथ : जकूजी बाथ। <br />काफ मसाज के साथ  लपेट। <br />एनिमा, जलनेति, आई वॉश, कुंजल, रबर नीति। वाइब्रो मसाज। स्टीम बाथ, लोकल स्टीम ( फैटी पार्ट्स )। उद्वर्तन।<br />फुल बॉडी मड बाथ।<br />आयुर्वेदिक चिकित्सा<br />सर्वकल्प क्वाथ <br />कायाकल्प क्वाथ <br />दोनों औषधीय को मिलाकर दो चम्मच (10-15 ml)  लेकर 400 द्वद्य  पानी में पकाएं , 100 ml शेष रहने पर छान कर प्रात: काल  खाली पेट, सायं भोजन से एक घंटा पूर्व लें।<br /><strong>वेट गो वटी</strong><br />2-2 गोली सुबह शाम भोजन से पहले लें। <br /><strong>फाइटर वटी</strong><br />2-2 गोली सुबह शाम भोजन से पहले लें। <br /><strong>लिपिडोम टैबलेट</strong><br />1-1 गोली सुबह दोपहर शाम भोजन के पश्चात लें।<br /><strong>लौकी घनवटी</strong><br />1-1 गोली सुबह दोपहर शाम भोजन के पश्चात लें।<br /><strong>पुनर्नवादी मंडूर </strong><br />1-1 गोली सुबह दोपहर शाम भोजन के पश्चात लें। <br /><strong>गौधनअर्क </strong><br />20 ml सुबह खाली पेट बराबर मात्रा में पानी के साथ लें।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>मोटापा के लिए योग</strong><br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>आसन-</strong></span><br />1.    तिर्यक ताड़ासन, त्रिकोणासन, कोणासन, पादहस्तासन।<br />2. चक्की आसन, स्थितकोणासन, पश्चिमोत्तानासन।<br />3. भुजंगासन, शलभासन।<br />4.    अर्ध हलासन, पादवृत्तासान, द्विचक्रिकासन, मर्कटासन, शवासन।<br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>प्राणायाम-</strong></span><br />1.    भस्त्रिका प्राणायाम <br />2.    कपालभाति प्राणायाम <br />3.    बाह्य प्राणायाम (अग्निसार –साहयकक्रिया) <br />4.    उज्जायी प्राणायाम <br />5.    अनुलोम-विलोम प्राणायाम <br />6.    भ्रामरी प्राणायाम <br />7.    उद्गीत प्राणायाम <br />8.    प्रणवध्यान प्राणायाम</h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>अनुभव</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">मैं राजस्थान का रहने वाला हूँ, मेरी उम्र 27 वर्ष है और मेरा वजन 172 किलो था। पतंजलि वैलनेस में आने के बाद मैंने यहाँ की थेरेपी ली और नियमित रूप से डाइट फॉलो की। अपने घर पर भी यही फॉलो किया और अब मैंने अपना वजन 74 किलो कम किया। वजन 172 से 98 kg मात्र 9 महीनों में किया जो कि फैटी लिवर के कारण बढ़ गया था।   </h5>
<h5 style="text-align:right;">रोगी  का नाम : रोहन गांधी<br />आयु २७ वर्ष, राजस्थान<br /><br /></h5>
<h5 style="text-align:justify;">मैं गुडग़ाँव से हूँ। बाहर का ज्यादा खाने से मेरा वजन बढ़ गया था जो कि बहुत ही खराब दिखता था। पतंजलि वैलनेस में मैंने अपना इलाज कराया और डॉक्टरों के द्वारा दिये गये डाइट को फॉलो किया और बाहर का खाना छोड़ दिया। अब मेरा वजन 20 किग्रा. कम हो गया है।</h5>
<h5 style="text-align:right;">रोगी  का नाम : दिनेश<br />आयु २6 वर्ष, गुडग़ाव<br /><br /></h5>
<h5 style="text-align:justify;">मैं बिहार का रहने वाला हूँ। बाहर का ज्यादा खाने से मेरा वजन बढ़ गया था जो कि बहुत ही खराब दिखता था। पतंजलि वैलनेस मैं मैंने अपना इलाज कराया और डॉक्टरों के द्वारा दिये गये डाइट को फॉलो किया और बाहर का खाना छोड़ दिया। मैंने अपना  वजन 36 किग्रा. कम किया। (116किग्रा. से 80 किग्रा.)। </h5>
<h5 style="text-align:right;">रोगी  का नाम : कृष्णकान्त  <br />आयु २३ वर्ष, बिहार</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><br />       तले बुने खाने की वजह से मेरा वजन 99 किग्रा. हो गया था। पतंजलि वैलनेस में गया और वहाँ विभिन्न प्रकार की थेरेपी ली। साथ ही दिये गये डाइट प्लान का अच्छे से पालन किया और अब वजन को 17 किग्रा. घटकर ८2 किग्रा. हो गया  है।  </h5>
<h5 style="text-align:right;">रोगी  का नाम : दिव्यांश <br />आयु २४ वर्ष, पंजाब<br />  </h5>
<h5 style="text-align:justify;">मेरा वजन 176 था। ज्यादा समय तक बैठकर काम करना और बाहर के कार्य बहुत ही कम करना इसकी मुख्य वजह रही।  पतंजलि वैलनेस में मैंने अपना इलाज करवाया और वहाँ के स्टाफ के द्वारा दिये गये डाइट प्लान को अच्छे से फॉलो किया। साथ-साथ योग भी किया जिससे मुझे काफी आराम मिला और वजन भी 11 किग्रा. कम किया ।</h5>
<h5 style="text-align:right;">रोगी  का नाम : वैभव मित्तल<br />आयु २२ वर्ष, नई दिल्ली<br />सम्पर्क सूत्र : 9625052095</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>रोग विशेष</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3621/obesity-is-a-global-problem-and-a-lifestyle-disease</link>
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                <pubDate>Tue, 01 Oct 2024 17:49:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आयुर्वेदिक औषधि Bronchom है, स्टेरॉयड से अधिक प्रभावशाली, Peer-reviewed अंतरराष्ट्रीय जर्नल Molecular Medicine में शोध प्रकाशित</title>
                                    <description><![CDATA[<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong>पतंजलि का लक्ष्य, रोग-मुक्त विश्व : आचार्य बालकृष्ण</strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">      24 अगस्त। आयुर्वेदिक औषधि ब्रोंकॉम अस्थमा रोग में अत्यंत कारगर औषधि है। यह शोध अमेरिका के विश्व-प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रकाशन Springer Nature के peer-reviewed जर्नल Molecular Medicine में प्रकाशित हुआ है।<br />इस अवसर पर आचार्य बालकृष्ण जी ने कहा कि जब कोई दवाई कार्य नहीं करती है, तब एलोपैथी में रोगियों को दिया जाता है भयानक स्टेरॉयड, जो तत्काल तो कुछ प्रभाव दिखाती  है, परन्तु उसके दुष्प्रभाव से जीवन दुखदाई बन जाता है, उसके बाद भी बीमारी ठीक होने की कोई आशा की किरण नहीं दिखाई देती।<br />उन्होंने बताया कि अब अस्थमा के</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3622/ayurvedic-medicine-bronchom-is-more-effective-than-steroids--research-published-in-peer-reviewed-international-journal-molecular-medicine"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-05/research-paper---bronchom_p.jpg" alt=""></a><br /><ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong>पतंजलि का लक्ष्य, रोग-मुक्त विश्व : आचार्य बालकृष्ण</strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">   24 अगस्त। आयुर्वेदिक औषधि ब्रोंकॉम अस्थमा रोग में अत्यंत कारगर औषधि है। यह शोध अमेरिका के विश्व-प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रकाशन Springer Nature के peer-reviewed जर्नल Molecular Medicine में प्रकाशित हुआ है।<br />इस अवसर पर आचार्य बालकृष्ण जी ने कहा कि जब कोई दवाई कार्य नहीं करती है, तब एलोपैथी में रोगियों को दिया जाता है भयानक स्टेरॉयड, जो तत्काल तो कुछ प्रभाव दिखाती  है, परन्तु उसके दुष्प्रभाव से जीवन दुखदाई बन जाता है, उसके बाद भी बीमारी ठीक होने की कोई आशा की किरण नहीं दिखाई देती।<br />उन्होंने बताया कि अब अस्थमा के रोगियों के लिए आयुर्वेद की प्रमाणित दवा Bronchom नया जीवन ले कर आयी है। जब एलोपैथिक स्टेरॉयड भी काम नहीं करता है तब यह काम करती और इसका कोई दुष्प्रभाव भी नहीं है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-05/tgdfggdf.jpg" alt="tgdfggdf" width="1100" height="747"></img><br />Mixed Granulocytic Asthma  के animal (mouse) modal पर किए गए शोध में Bronchom ने dose-dependent तरीके से hyper responsiveness को कम किया।<br />इसके साथ ही श्वसन तंत्र में ईसिनोफिल्स और न्यूट्रोफिल्स और म्यूकस सीक्रिशन को एलोपैथिक स्टेरॉयड की तुलना में अधिक बेहतर तरीके से ठीक किया। यह प्रमाण है कि Bronchom, स्टेरॉयड से अधिक प्रभावी है।<br />आचार्य जी ने कहा कि आयुर्वेद के विज्ञान को नवीन तकनीकों के माध्यम से वैश्विक मंच पर प्रस्तुत कर, पतंजलि रोग-मुक्त विश्व के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;">यह रिसर्च पेपर इस लिंक पर उपलब्ध है: <br />https://molmed.biomedcentral.com/articles/10.1186/ s10020-024-00888-7</h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पतंजलि रिसर्च</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3622/ayurvedic-medicine-bronchom-is-more-effective-than-steroids--research-published-in-peer-reviewed-international-journal-molecular-medicine</link>
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                <pubDate>Tue, 01 Oct 2024 17:48:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के संबंधों का स्वरूप</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">प्रो कुसुमलता केडिया</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3623/nature-of-relations-between-india-and-the-united-states"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-05/04-10-22_current-affairs-up.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">    भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के वर्तमान और भावी संबंधों को लेकर तरह-तरह के अनुमान लगाये जा रहे हैं। भारत में ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक है जो संयुक्त राज्य अमेरिका को अपना स्वाभाविक मित्र मानते हैं। भारत के अनेक प्रतिभाशाली युवक और युवतियाँ संयुक्त राज्य अमेरिका में उच्च और निर्णायक पदों पर हैं। अत: उनके कारण आत्मीयता का यह भाव और गहरा हो जाता है। दूसरी ओर कम्युनिस्टों और कम्युनिस्ट झुकाव वाले कांग्रेसियों ने भारत में संयुक्त राज्य अमेरिका के विरूद्ध स्थायी जहर फ़ैला रखा है। उनकी हर बात में अमेरिका के प्रति विद्वेष निहित होता है। जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका और पश्चिमी यूरोपीय देशों में ही उनके बच्चे पढ़ते हैं और उन देशों के कम्युनिस्ट नेताओं और बौद्धिकों से ही भारत के कम्युनिस्ट तथा कांग्रेसीजन प्रभावित और संचालित होते हैं। परंतु मीडिया में वे स्वयं को अमेरिका विरोधी ही दिखाते हैं। इस दोहरेपन से वे भारतीय लोकमानस में लगातार भ्रम और भ्रांतियों का प्रसार करते हैं। इसलिये यह आवश्यक है कि भारत और अमेरिका के संबंधों को सत्य के प्रकाश में सम्यक रूप से समझा जाये। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>नई बसाहटें</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">वस्तुत: जिसे आज अमेरिका कहा जाता है उसका पुराना नाम इन दिनों प्रचलन में नहीं है। यह नया नाम कोलंबस के बाद से किया गया और यूरोप से गये लोगों के फ़ैलाव के साथ बलपूर्वक यही नाम प्रचलन में आया। परंतु तथ्य यह है कि यूरोप के भिन्न-भिन्न देशों से गये हुये भिन्न-भिन्न समुदायों के लोगों के द्वारा इस विशाल अमेरिकी क्षेत्र में जो उपनिवेश बनाये गये, आज उनके बारे में ही संसार में अधिक चर्चा है। यूरोप के वे लोग जो अमेरिकी महाद्वीप में गये, वे ऐसे लोग थे जिन्हें यूरोप के उनके अपने लोग आवारा, निठल्ला और बेरोजगार ही मानते तथा कहते थे। मार्कोपोलो जब चीन और भारत की यात्रा करके वापस लौटा, तबसे यूरोप के बाहर विशाल समृद्धि होने की कहानियाँ यूरोप में फ़ैलने लगीं और उससे दुस्साहसी लोग अपने यहाँ के अत्याचारों से बचने के लिये दूर-दूर जाकर धन लूटकर लाने की योजना बनाने लगे। ऐसे ही लोगों की बसाहट संयुक्त राज्य अमेरिका भी है, कनाडा और आस्ट्रेलिया  भी। इन लोगों ने अमेरिका के स्थानीय लोगों को पहले तो इंडियन कहा क्योंकि उन्होंने इंडिया का नाम तो सुन रखा था परंतु वह सचमुच कहाँ है, यह पता नहीं था। 15वीं शताब्दी ईस्वी तक यूरोपीय ईसाइयों को विश्व के भूगोल तथा मानचित्रों का ठीक-ठीक ज्ञान नहीं था। अत: वे जहाँ पहुँचते और समृद्धि देखते, उसे ही इंडी या इंडिया कहने लगते। बाद में जब भारतीय व्यापारियों की सहायता से वास्कोडिगामा भारत पहुँचा, तब उसे असली इंडिया का पता चला और तब अमेरिका के लोगों को रेडइंडियन कहा जाने लगा। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>भूमि और सम्पत्ति का अपहरण</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">यूरोपीय लोगों ने स्थानीय मूलनिवासियों की भूमि और सम्पत्ति छीनने के लिये हत्या, लूट, डकैती, छिनैती आदि काम किये और उसे रेलिजन का आवरण दे दिया। परंतु फिऱ भी प्रारंभ में इन यूरोपियों की बसाहटें बिखरी हुई ही थीं। धीरे-धीरे वे कुछ क्षेत्रों में सघन रूप से बसने में सफ़ल हुये। इनमें से ही एक क्षेत्र वर्तमान संयुक्त राज्य अमेरिका है। <br />वस्तुत: क्रिस्टाफ़ेर कोलंबस एक स्पेनिश था और उसने वर्तमान न्यूमैक्सिको और कैलिफ़ोर्निया नामक क्षेत्रों में मारकाट की और वहाँ स्पेन के कैथोलिक ईसाई लुटेरों और डकैतों को बसाया। इसके बाद मिसीसिपी नदी के तट पर तथा मैक्सिको की खाड़ी से जुड़े क्षेत्र में फ्रेंच ईसाइयों ने मारकाट कर बस्तियाँ बनायी। वर्तमान वर्जीनिया क्षेत्र में तथा प्लाइमाउथ क्षेत्र में ब्रिटिश ईसाइयों ने स्थानीय लोगों को मारकाट कर अपना इलाका बनाया। स्थानीय अमेरिकी लोगों से इनके युद्ध हुये तथा छल प्रपंच और बर्बरता के द्वारा इन्होंने उनको मारा और यूरोप के अपने-अपने इलाकों से ये ईसाई लोग जुड़े रहे। इन लोगों ने अफ्रीकी लोगों को जबरन गुलाम बनाकर बांधकर लाकर पूर्वी समुद्र तट पर बड़ी संख्या में बसाया और उन गुलामों से क्रूरता और बर्बरतापूर्वक काम लेते रहे। जो विश्व मानवता का अत्यंत लज्जापूर्ण इतिहास है। जिन देशी अमेरिकनों ने बलपूर्वक ईसाई बनाने का यूरोपीय ईसाइयों का दबाव स्वीकार कर लिया उन्हें भी उन्होंने बीहड़ और निर्जन इलाकों में घेरा बनाकर एक निर्दिष्ट क्षेत्र में बसने को विवश कर दिया। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>50 वर्षों में ढाई करोड़ यूरोपीय लोग अमेरिका पहुँचे </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1865 से 1917 ईस्वी तक यूरोप से लगभग ढाई करोड़ लोग आकर अमेरिका में बसे। जिनमें पूर्वी तट पर यहूदियों, आयरिश लोगों और इतालवी लोगों ने स्थानीय लोगों को भगाकर अपनी बस्तियाँ बना लीं और मध्य पश्चिमी क्षेत्र में जर्मन तथा अन्य केन्द्रीय यूरोपीय देशों के लोग इसी प्रकार बसे। कनाडा से लगभग 10 लाख फ्रेंच आकर न्यू इंग्लैंड नामक अमेरिकी शहर बनाकर बसे और अफ्रीकी अमेरिकन भी इसी अवधि में दक्षिण से उत्तर की ओर आये। 1867 ईस्वी में अमेरिकी प्रशासकों ने अलास्का क्षेत्र को रूस से खरीदा।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>देशी लोगों का संहार और ब्रिटेन से युद्ध</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">13 ब्रिटिश उपनिवेशों ने मिलकर स्थानीय स्वशासन की घोषणा की और देशी अमेरिकन लोगों का संहार शुरू कर दिया। तब तक ब्रिटेन के शासकों को इन उपनिवेशों के प्रसार की सूचना मिली और वे इन्हें अपने नियंत्रण में रखने को विकल हो गये। जिन दस्युदलों ने ये उपनिवेश बनाये थे, वे मांग करने लगे कि हमें ब्रिटिश प्रशासन में भी सहभागिता मिले तभी हम अपने द्वारा वसूले गये राजस्व और छीने गये धन का एक हिस्सा ब्रिटेन को देंगे। ब्रिटिश शासन इसके लिये तैयार नहीं हुआ और 1765 से 1776 तक इंग्लैंड के शासन से अमेरिकी अंग्रेजों की लड़ाई चली। अंत में अमेरिकी अंग्रेजों ने 4 जुलाई 1776 को इंग्लैंड से नाता तोडक़र एक स्वतंत्र नेशन स्टेट बनाने की घोषणा की। जार्ज वाशिंगटन, बेन्जामिन फ्रेंकलिन, हैमिल्टन, थॉमस जफ़ेर्सन, थॉमस पेन आदि अमेरिकी नेशन स्टेट के निर्माता कहलाये। तब भी अंग्रेजों ने अपने इन पुराने लोगों से युद्ध जारी रखा और 1783 में जाकर ही यूरोपीय लोगों ने संयुक्त राज्य अमेरिका के नेशन स्टेट को मान्यता दी। इस प्रकार यह 250 वर्ष से भी कम पुराना नेशन स्टेट है। जबकि वस्तुत: 1917 ईस्वी तक यह नेशन स्टेट बार-बार पुनर्गठित होता रहा है और इस अर्थ में यह 108 वर्षों से ही एक व्यवस्थित नेशन स्टेट है। जो गृहयुद्ध से पूरी तरह मुक्त है। उसके पहले वहाँ निरंतर गृह युद्ध की दशा रही। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>आर्थिक प्रगति का रहस्य</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">गुलाम बनाये गये लोगों से बलपूर्वक और बहुत ही कम दामों पर मजदूरी कराई गई और उससे ही संयुक्त राज्य अमेरिका की आर्थिक प्रगति हुई। इस प्रक्रिया में कतिपय महत्वपूर्ण औद्योगिक घराने उभरे जिन्होंने व्यापार पर एकाधिकार के लिये अनेक ट्रस्ट बनाये और अपने पक्ष में बहुत से कानून बनाये। परंतु इस प्रक्रिया में मलिन बस्तियाँ और आर्थिक विषमतायें भी तेजी से बढ़ी जिससे कि कम्युनिस्ट प्रभाव वाले बहुत से श्रमिक संघ खड़े हुये। उनके दबाव से अनेक सुधार हुये। इस प्रक्रिया से 1917 के बाद अमेरिका एक आर्थिक शक्ति दिखने लगा। प्रथम महायुद्ध के समय जर्मनी से इंग्लैंड और फ्रांस की पराजय रोकने में भारतीय सैनिकों और अमेरिकी सहयोग, दोनों की भूमिका थी।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>पहली बार स्त्रियों को मताधिकार</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1920 ईस्वी में पहली बार संयुक्त राज्य अमेरिका में स्त्रियों को मताधिकार दिया गया। इसी बीच संचार माध्यमों का भी विकास हुआ। यूरोप में जो प्रथम महायुद्ध के बाद भीषण मंदी आई, उससे अमेरिका को बचाने में राष्ट्रपति फें्रकलिन रूजवेल्ट की निर्णायक भूमिका रही। उन्होंने अनेक आंतरिक सुझाव अपने यहाँ लागू किये। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>नीतिगत किलता</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">द्वितीय महायुद्ध में संयुक्त राज्य अमेरिका तटस्थ ही था। इंग्लैंड और फ्रांस के दबाव से युद्ध सामग्री की पूर्ति अवश्य करता रहा परंतु जापान द्वारा पर्ल हार्बर पर आक्रमण के कारण उसे इस महायुद्ध में सक्रिय होना पड़ा। पहला अणुबम अमेरिका ने बनाया और जापान के हिरोशिमा तथा नागासाकी में उसके द्वारा भयंकर संहार किया। इसके कारण द्वितीय महायुद्ध में मित्र शक्तियों की विजय संभव हुई। <br />द्वितीय महायुद्ध के बाद जिस सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी को इंग्लैंड और अमेरिका ने युद्ध में सहयोग के बदले बहुत बड़े इलाके पर कब्जा करने दिया था, वही सोवियत संघ शीघ्र ही अमेरिका का प्रतिस्पर्धी हो गया। दोनों ही खेमों के मध्य शीतयुद्ध चलता रहा और दोनों विश्व में अपनी-अपनी शक्ति बढ़ाने का प्रयास करते रहे। इसमें अमेरिका सोवियत संघ से आगे निकल गया। परंतु विश्व में अपना प्रभाव बनाये रखने के लिये तथा विश्व के सभी देशों में अपने नियंत्रण वाला शासन स्थापित करने की आकांक्षा में अमेरिका ने अनेक युद्ध किये और इससे उसे भारी क्षति भी उठानी पड़ी। वियतनाम तथा इराक में उसका हस्तक्षेप उसकी अर्थव्यवस्था के लिये भार साबित हुआ। जिन उग्रवादी इस्लामी शक्तियों को उसने सोवियत संघ को घेरने और बांधने के लिये प्रोत्साहित किया था, उनके ही एक अलकायदा नाम के एक गुट ने 2001 ईस्वी के 11 सितंबर को संयुक्त राज्य अमेरिका के ऊपर आतंकवादी आक्रमण कर दिया। जिसका बहुत ही दूरगामी प्रभाव पड़ा। ये अमेरिकी नीति की किलता के उदाहरण हैं।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>भारत से सीखने योग्य मूल्य</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">इस प्रकार हम देखते हैं कि संयुक्त राज्य अमेरिका यूरोप से गये ईसाई लोगों के द्वारा आपसी मारकाट और मूल निवासियों के नृशंस संहार के बाद बहुत ही विषम परिस्थिति में क्रमश: विकसित हुआ एक नेशन स्टेट है। उतने बड़े क्षेत्र में ऐसे भयंकर जनसंहार और सम्पत्ति की लूट तथा भूमि पर बलपूर्ण अधिकार के बाद भी संसाधनों से सम्पन्न यह नया राष्ट्र न तो अपने नागरिकों के बीच सुख, शान्ति और सामंजस्य के सूत्र सुदृढ़ कर पाया है और न ही विश्व में शांति तथा सौमनस्य का प्रसार कर सका है। इसका कारण यह है कि अपनी शक्ति से कई गुना अधिक फ़ैलने और प्रभुत्व पाने की लालसा तथा लोभ की वृत्तियों ने अमरीकी शासकों के चित्त को निरंतर विकल कर रखा है। अत: ऐसे में अमरीकी शासन के प्रबुद्धजन चाहें तो सनातन धर्म के अनुयायी भारत देश से बहुत कुछ सीख सकते हैं। इसमें मुख्य है- आत्ममर्यादा, आत्मसंयम, मैत्रीभाव, सच्ची वीरता और उदात्त भाव। <br />वस्तुत: अमेरिका एक नवविकसित नेशन स्टेट है, इसके उसे कुछ लाभ भी हैं। अपने मूल स्थान यूरोप के प्रति ममता और विद्रोह- दोनों की प्रवृत्तियों का एक गहरा अन्तद्र्वंद्व उसमें है। परन्तु साथ ही नया सीखने की ललक भी है। यही कारण है कि भारत तथा अफ्रीकी देशों से वहाँ के प्रबुद्ध लोगों ने बहुत कुछ सीखा है और सीखने की लालसा रखते हैं। इतना खुलापन उनमें है। परन्तु भारत की दृष्टि से मुख्य समस्या यह है कि पहले तो यहाँ ईसाई इंग्लैण्ड के प्रति भक्तिभाव रखने वाले समूह को ही सत्ता का हस्तांतरण हुआ और उन्होंने भारत की कोई भी विशेषता विश्व में प्रचारित नहीं की। उल्टे, राजनैतिक स्तर पर पूर्ण किल हुये लोगों को ही भारत का प्रतिनिधि बताया। जो लोग ग्रामस्वराज, गौरक्षा, स्वदेशी, स्वभाषा और सनातन धर्म के प्रतिनिधित्व का दावा कर रहे थे और भारत के विभाजन की संभावना को अपने जीते जी असंभव बता रहे थे, उन्हीं लोगों ने सोवियत संघ और इग्ंलैण्ड की नकल वाला एक केन्द्रीयकृत तथा समाज-निरपेक्ष एवं धर्मनिरपेक्ष राज्य की रचना के सामने हार मान ली। अत: राजनैतिक दृष्टि से वे पूर्ण किल सिद्ध हुये। ऐसे लोगों का ही नाम भारतीय मनीषा के एकमात्र प्रतिनिधि की तरह प्रचारित किया गया। इसके साथ ही एकमात्र नाम तथागत बुद्ध का लिया जाता रहा, वह भी उनके शून्यवाद और निर्वाणवाद के साथ। जिनका कोई भी राजनैतिक चिंतन कभी रहा ही नहीं। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>भारत का सत्य विश्व के समक्ष रखना सबके लिये कल्याणकारी </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">इस प्रकार इन लोगों ने भारत की दो विशेषतायें विश्व में प्रचारित कीं - राजनीति के विषय में शून्यता और उदासीनता या अज्ञान तथा राजनैतिक किलता में गौरव की अनुभूति। राजनीतिप्रधान राज्य की रचना के साथ भारत की इन विशेषताओं को विश्व में प्रस्तुत करने पर स्वाभाविक ही विश्व की दृष्टि में भारत नितांत निरीह और अनाकर्षक राज्य हो गया। यह तो सौभाग्य है कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने राजनैतिक दक्षता का एक प्रतिमान उपस्थित कर विश्व में भारत के प्रति आकर्षण जगाया है। परंतु कांग्रेस द्वारा प्रचारित दो नामों को ही उनके द्वारा भी प्रस्तुत किये जाने पर उस भारत का मूल महत्व संयुक्त राज्य अमेरिका सहित विश्व के देशों में, विशेषकर यूरोप के देशों में सामने नहीं आ पाता। मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्रीराम, योगेश्वर श्रीकृष्ण, महावीर अर्जुन, भीम और युधिष्ठिर से लेकर सम्राट विक्रमादित्य, सातवाहन, चोल, चालुक्य और यादवों के यशस्वी नरेशों तथा महाराणा  प्रताप और छत्रपति शिवाजी महाराज तथा बाजीराव पेशवा जैसे अद्वितीय सम्राटों ने किस प्रकार हजारों ही नहीं, लाखों वर्षों से भारत जैसे विराट राष्ट्र और वैविध्य से भरपूर समाज को समरस, एक और अखंड रखा है, यह विश्व को बताने पर समस्त विश्व उनसे प्रेरणा लेगा। भारत का यही योगदान संयुक्त राज्य अमेरिका सहित सम्पूर्ण विश्व को हो सकता है। सभी इकाइयों की विशेषता को सुरक्षित रखते हुये उनके मध्य न्यायपूर्ण संबंधों को गतिशील रखने का भारत का इतिहास सभी के लिये प्रेरक है। अद्भुत वीरता होते हुये भी संयम और मर्यादा का परिचय देना तथा चक्रवर्ती सम्राटों द्वारा समस्त अधीनस्थ राजाओं को सनातन धर्म की मर्यादा में भरपूर स्वायत्ता और स्वतंत्रता देना एक ऐसा अनुकरणीय ‘मॉडल’ है, जो अपनी शक्ति से बहुत अधिक फ़ैलने की एकाधिकारवादी लालसाओं वाले समुदायों के लिये सीखने योग्य है। क्योंकि वही एक टिकाऊ ‘मॉडल’ है। हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री भारत के इस वास्तविक स्वरूप को अमेरिका के सामने रख सकें और योग तथा आयुर्वेद के ज्ञान से भरपूर संयमित, अनुशासित और समृद्ध जीवन के सूत्र प्रस्तुत कर सकें तो इससे भारत-अमेरिकी मैत्री चिरकाल के लिये सुदृढ़ और टिकाऊ होगी तथा विश्व के लिये भी वह किसी भय का कारण नहीं बनेगी। भय तो केवल दुष्टों, राक्षसों और आतताइयों को ही होना चाहिये। शेष सभी समाज और राज्य अपनी स्वायत्ता के साथ एक शन्तिपूर्ण और सामंजस्य से भरपूर विश्व में अपनी-अपनी मर्यादा में सुखपूर्वक रहने के सूत्र पा सकेंगे।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र-चिंतन</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Oct 2024 17:47:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अमेरिका के रिसर्च जर्नल Scientific Reports के अनुसार आयुर्वेदिक औषधि रीनोग्रिट है किडनी रोगो के लिए है प्रभावशाली उपचार</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><strong>आयुर्वेद सत्य है, यह एक तथ्य है, क्योंकि अनुसन्धान का प्रमाण है : आचार्य बालकृष्ण</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">हरिद्वार, 22 अगस्त।  देश में बिना तथ्य के षड्यंत्रपूर्वक एक अफवाह फैलाने का प्रयास किया गया कि आयुर्वेदिक दवाइयों से किडनी खराब होती है। परन्तु, आयुर्वेदिक औषधि रीनोग्रिट ने न केवल कैंसर की एलोपैथिक दवा Cisplatin से खराब हुए किडनी को ठीक किया अपितु किडनी सेल्स पर पडऩे वाली ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को भी ठीक किया।<br />ये हम नहीं कह रहे, अमेरिका का प्रसिद्ध रिसर्च जर्नल Nature प्रकाशन का Scientific Reports कह रहा है।<br />इस रिसर्च पेपर को आप विस्तार से देख सकते हैं-<br />https://www.nature.com/articles/s41598- 024-69797-3</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3625/according-to-the-american-research-journal-scientific-reports--the-ayurvedic-medicine-renogrit-is-an-effective-treatment-for-kidney-diseases"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-05/kii1.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><strong>आयुर्वेद सत्य है, यह एक तथ्य है, क्योंकि अनुसन्धान का प्रमाण है : आचार्य बालकृष्ण</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">हरिद्वार, 22 अगस्त।  देश में बिना तथ्य के षड्यंत्रपूर्वक एक अफवाह फैलाने का प्रयास किया गया कि आयुर्वेदिक दवाइयों से किडनी खराब होती है। परन्तु, आयुर्वेदिक औषधि रीनोग्रिट ने न केवल कैंसर की एलोपैथिक दवा Cisplatin से खराब हुए किडनी को ठीक किया अपितु किडनी सेल्स पर पडऩे वाली ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को भी ठीक किया।<br />ये हम नहीं कह रहे, अमेरिका का प्रसिद्ध रिसर्च जर्नल Nature प्रकाशन का Scientific Reports कह रहा है।<br />इस रिसर्च पेपर को आप विस्तार से देख सकते हैं-<br />https://www.nature.com/articles/s41598- 024-69797-3<br />इस अवसर पर पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने कहा कि आयुर्वेद के विभिन्न ग्रंथों में किडनी रोगों की औषधियों का वर्णन है और पुरातन समय से ही इन रोगों का उपचार प्रभावकारी रूप से किया जा रहा है। उन्होंने आगे कहा कि आयुर्वेद ही सत्य है, यह एक तथ्य है, क्योंकि अनुसन्धान का प्रमाण है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-05/research-paper-(5).jpg" alt="Research-paper-(5)" width="1000" height="1313"></img></h5>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-05/kol.jpg" alt="kol" width="1000" height="1313"></img></p>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-05/kol2.jpg" alt="kol2" width="1000" height="1313"></img></p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पतंजलि रिसर्च</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Oct 2024 17:45:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>स्वास्थ्य समाचार</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><strong>नींद न आए तो : सोने की चिंता नहीं, जागने की कोशिश करें </strong><br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>सुबह के रूटीन से तय होती है नींद</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">अच्छी नींद का सबसे अच्छा नियम है मस्तिष्क को शांत रखना। हालांकि जब नींद न आए तो दिमाग को शांत रखना थोड़ा कठिन हो जाता है। खासकर तब जब यह लगातार हो रहा हो। हालांकि विज्ञान आधारित कुछ ऐसे गैर-पारंपरिक तरीके भी हैं जिन्हें अपनाया जाए तो नींद आसानी से आने लगती है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>ये पांच तरीके नींद की समस्या से राहत दे सकते हैं</strong></span><br /><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">कोशिश कर सोने का प्रयास न करें</span></strong><br />अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी में स्लीप साइकोलॉजिस्ट डायरड्रे</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3627/health-news"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-05/dental.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><strong>नींद न आए तो : सोने की चिंता नहीं, जागने की कोशिश करें </strong><br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>सुबह के रूटीन से तय होती है नींद</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">अच्छी नींद का सबसे अच्छा नियम है मस्तिष्क को शांत रखना। हालांकि जब नींद न आए तो दिमाग को शांत रखना थोड़ा कठिन हो जाता है। खासकर तब जब यह लगातार हो रहा हो। हालांकि विज्ञान आधारित कुछ ऐसे गैर-पारंपरिक तरीके भी हैं जिन्हें अपनाया जाए तो नींद आसानी से आने लगती है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>ये पांच तरीके नींद की समस्या से राहत दे सकते हैं</strong></span><br /><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">कोशिश कर सोने का प्रयास न करें</span></strong><br />अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी में स्लीप साइकोलॉजिस्ट डायरड्रे कॉनरॉय के अनुसार नींद को लेकर की जाने वाली चिंता और एंग्जाइटी की वजह से व्यक्ति को और नींद नहीं आती। इसके उलट बिस्तर पर लेटे हुए व्यक्ति अगर पूरी रात जागने की कोशिश करें तो एक समय अचानक से नींद आएगी और आप सो जाएंगे।<br /><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>थोड़ी चिंता भी जरूरी</strong></span><br />अच्छी नींद के प्रयास में चिंताओं से बचने की कोशिश करेंगे तो ये और परेशान करेंगी। ऐसे में सोने के कुछ घंटे पहले समस्याओं पर विचार कर लें तो यह फायदेमंद होगा। 15 मिनट का समय निकाल कर दिन भर की चिंताओं को एक कागज पर लिख लें।<br /><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>सुबह को बेहतर बनाएं</strong></span><br />नींद पर सुबह की दिनचर्या सबसे ज्यादा असर डालती है। सुबह निश्चित समय पर उठें और सबसे पहले सूरज की रोशनी में जाएं। यह जैविक घड़ी को सेट करेगा। रात के सोने का समय भी इससे तय होगा।<br /><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>प्रकृति के बारे में सोचें</strong></span><br />प्राकृतिक ध्वनि और अंधेरा नींद के लिए जरूरी दो महत्वपूर्ण तत्व हैं। यूएस ओलिम्पिक वेट लिफ्टिंग टीम के स्लीप मेडिसिन फिजिशियन जेफरी डर्मर के अनुसार तनाव, बीपी, हार्ट रेट और मसल्स टेंशन को प्रकृति कम करती है। तारों को आपने कब गौर से देखा था उसके बारे में विचार करें। टूटता हुआ तारा कब देखा था इसके बारे में सोचें।<br /><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>फोकस के लिए 4-7-8 नियम</strong></span><br />सांसों पर फोकस करने से यह चिंताओं से दूर कर आपको वर्तमान क्षण में ले आता है। मस्तिष्क शांत होता है। इसके लिए 4-7-8 नियम अपनाएं। यानी 4 सेकंड तक सांस लें, फिर 7 सेकंड तक रोकें और फिर 8 सेकंड तक उसे बाहर छोड़ें।</h5>
<h5 style="text-align:right;">साभार : दैनिक भास्कर</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>हर छह लोगों में से एक को है रक्तचाप</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span style="color:rgb(35,111,161);">नियमित बीपी की जांच करा कर बच सकते हैं बीमारी से</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">हायपरटेंशन का मरीज बना रही है। इस बीमारी से पीडि़त लोगों में शहर के लोग ज्यादा है जो आधुनिकीकरण की दौड़ में इस बीमारी को मोल लिए बैठे हैं। शहर में कुल आबादी का करीब 17 प्रतिशत व गांवों में 10 प्रतिशत भारतीयों को ये बीमारी है। इस बीमारी से सावधानी रखकर ही इससे बचा जा सकता है।<br />हायपरटेंशन या हाई बीपी दुनिया भर में समय से पहले मुत्यु होने का सबसे बड़ा कारण है, लेकिन इनमे से 80 प्रतिशत लोगों को इस बीमारी के बारे में पता ही नही होता है। इसके कारण हर साल 9.4 मिलियन लोग अपनी जान से हाथ धो बैठते है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी 2011 की रिपोर्ट के मुताबित भारत में 25 साल से अधिक उम्र का हर तीसरा व्यक्ति इस बीमारी से पीडि़त है।<br />भारत में इस बीमारी की स्थिती इसलिए भी बदतर है क्योकि केवल एक तिहाई को ही बीमारी के बारे में पता होता है। ब्लड प्रेशर सामान्यत दो संख्याओं के अनुपात के रुप में दर्शाई जाती है। ऊपरी संख्या को सिस्टोलिक बीपी और कम संख्या का डायलोस्टिक बीपी कहते हैं। सिस्टोलिक बीपी की सामान्य सीमा 110 से 139 तथा डायलोसिटक बीपी की समान्य सीमा 70 से 89 के बीच होती है। कम समय में ज्यादा से ज्यादा कमाने की मानसिकता से हायपरटेंशन के रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। खासकर युवा वर्ग इससे खासा प्रभावित है। ये स्ट्रोक या पैरेलिसिस का सबसे बड़ा कारण है। 40 साल से कम के युवाओं में स्ट्रोक का बड़ा कारण यही बीमारी है। इस बीमारी से सावधानी रखकर ही इससे बचा जा सकता है।<br /><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>हायपरटेंशन के मुख्य कारण</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">हायपरटेंशन होने के प्रमुख कारणों में शराब का अत्यधिक सेवन, नियमित रूप से व्यायाम न करने, भोजन में नमक का अधिक सेवन करने, धुम्रपान करने और हमेशा तनावग्रस्त होने से इस तरह की बीमारी होती है। अत्यधिक मोटापा, परिवार में किसी को हायपरटेंशन होने और शुगर के कारण भी ये बीमारी होती है। उच्च या अनियंत्रित ब्लड प्रेशर के कारण हार्ट अटैक, स्ट्रोक, गुर्दों की विफलता, नेत्रों की क्षति होती है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>हेल्दी लाइफ स्टाइल से किया जा सकता है बचाव</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">हायपरटेंशन के कारण समय से पहले मुत्यु या अपंगता हो सकती है। इस बीमारी से बचने के लिए हेल्दी लाइफ स्टाइल को अपनाना होगा। समय पर उठना, रोज व्यायाम करना और संतुलित भोजन की आदत डालना होगी। इससे बचने के लिए समय-समय पर अपना बीपी चैक करना चाहिए। इससे उच्च रक्तचाप का पता चलने पर समय रहते उस पर काबू पाया जा सकता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>रात में ब्रश और समय-समय पर दांतों की सफाई है जरूरी</strong><br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>झोलाछाप से न कराएं इलाज</strong></span><br />चमकते दंत किसे पंसद नहीं होते, लेकिन कई बार हम दांतों की सेहत पर ध्यान नहीं देते। इसका नतीजा यह होता है कि दांतों में बैक्टीरिया पननने से कई तरह की - बीमारियां घेर लेती हैं। इसके लिए दो बार ब्रश करें। समय-समय पर दांतों की सफाई करवाएं।<br />यदि फिर भी कभी दर्द हो या घाब बन जाए तो डेंटिस्ट से समय रहते उपचार करा लें। झोलाछाप से दांतों का इलाज न करवाएं। ऐसा करना कई बार खतरनाक हो सकता है। <br />दातों की ऊपरी लेयर हार्ड तरीके से ब्रश करने पर घिस जाती है। यही कारण है ठंडा-गर्म लगता है। इससे बचने को हमेशा साफ्ट ब्रश का ही इस्तेमाल करें। इसे केवल दो से तीन मिनट ही करें। ज्यादा परेशानी होने पर डेंटिस्ट से संपर्क करें।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-05/dental.jpg" alt="dental" width="900" height="600"></img><br />सामान्य बोलचाल में दांतों में कीड़ा लगना कहते हैं, जबकि यह बैक्टीरिया है।<br />इससे कैविटी होती है और खाना फंसने लगता है। फिर दर्द होने लगता है। कई बार सूजन भी आने लगती है। ऐसी स्थिति में रूट कैनाल किया जाता है।<br />दांतों की सफाई से दांत घिसने की बात मिथ्या है, सफाई करने से दांत नहीं घिसते। दातों की लीयर में बैक्टीरिया जमा होता है। यह वैक्टीरिया धीरे-धीरे दांतों को नुकसान पहुंचाता है। क्लीनिंग के समय दांतों की अच्छी परत नहीं घिसी जाती है। इसलिए छह महीने से एक साल में दांतों की सफाई करानी चाहिए।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>इन बातों का रखें ध्यान-</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">दो बार ब्रश करें<br />सॉफ्ट ब्रश का ही प्रयोग करें<br />कैल्शियम युक्त भोजन लें<br />प्रोटीन का ध्यान रखें<br />साभार : दैनिक जागरण</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>स्वास्थ्य समाचार</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Oct 2024 17:44:40 +0530</pubDate>
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