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                <title>दिसम्बर - योग संदेश</title>
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                <title>शाश्वत प्रज्ञा</title>
                                    <description><![CDATA[<h4 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>योग प्रज्ञा</strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>योग -</strong> योग जीवन का प्रयोजन, उपयोगिता, उपलब्धि, साधन-साधना-साध्य, सिद्धान्त, कत्र्तव्य, मंतव्य, गंतव्य, लक्ष्य, संकल्प, सिद्धि, कर्म धर्म, मर्म, ज्ञान, ध्यान, भक्ति, शक्ति, सम्पत्ति, धन, यौवन, गीता, दर्शनोपनिषद् एवं वेदों, पुराणों का सार व विस्तार है। योग में सब ऋद्धि-सिद्धि, अष्टसिद्धि नवनिधि दशमविद्या, अभ्युदय नि:श्रेयस, निवृत्ति मूलक प्रवृति, विनय, वीरता, संस्कृति-समृद्धि-विरासत विकास, शान्ति-क्रान्ति, प्रार्थना-पुरुषार्थ, पुरुषार्थ-परमार्थ, जीवन का निर्माण व निर्वाण, आत्ममंगल, लोकमंगल, आत्महित, सर्वहित, भौतिक व पारमार्थिक सब सत्य योग में ही सन्निधि हैं। योग केन्द्र में है, परिधि में ब्रह्मांड, योग मूल प्रकृति संस्कृति है। योग सनातन धर्म, मूल्य आदर्शों का आत्म तत्त्व है तथा कर्मयोग शरीर</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3723/shashwat-pragya"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-08/with-rambhadracharya-(2).jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>योग प्रज्ञा</strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>योग -</strong> योग जीवन का प्रयोजन, उपयोगिता, उपलब्धि, साधन-साधना-साध्य, सिद्धान्त, कत्र्तव्य, मंतव्य, गंतव्य, लक्ष्य, संकल्प, सिद्धि, कर्म धर्म, मर्म, ज्ञान, ध्यान, भक्ति, शक्ति, सम्पत्ति, धन, यौवन, गीता, दर्शनोपनिषद् एवं वेदों, पुराणों का सार व विस्तार है। योग में सब ऋद्धि-सिद्धि, अष्टसिद्धि नवनिधि दशमविद्या, अभ्युदय नि:श्रेयस, निवृत्ति मूलक प्रवृति, विनय, वीरता, संस्कृति-समृद्धि-विरासत विकास, शान्ति-क्रान्ति, प्रार्थना-पुरुषार्थ, पुरुषार्थ-परमार्थ, जीवन का निर्माण व निर्वाण, आत्ममंगल, लोकमंगल, आत्महित, सर्वहित, भौतिक व पारमार्थिक सब सत्य योग में ही सन्निधि हैं। योग केन्द्र में है, परिधि में ब्रह्मांड, योग मूल प्रकृति संस्कृति है। योग सनातन धर्म, मूल्य आदर्शों का आत्म तत्त्व है तथा कर्मयोग शरीर योग, मूलधर्म मुख्य धर्म तथा संसार के समस्त व्यवहार गौणधर्म हैं। योग शाश्वत, सनातन सत्य है तथा योग मूलक आहार, विचार, वाणी, व्यवहार व आचरण से क्षणिक किन्तु अपरिहार्य सत्य हैं। योग परम सत्य है- संसार व्यवहारिक सत्य है।<br />योगधर्म में वेदधर्म सनातनधर्म एवं सेवाधर्म, मानवधर्म, राष्ट्रधर्म तथा युगधर्म सम्मिलित है। योग को करना भी है, जीना भी है। योग जीवन का अनादि, अनन्त देवी सम्पदा है। अतीत, वर्तमान एवं भविष्य का आधार एवं नींव है। योग अपरा व परा विद्या का मूल है।<br />योग तत्त्व को जीने वाला रामत्व, कृष्णत्व, शिवत्व एवं हनुमत् तत्त्व को आचरण में जीता है। योग में सीता, लक्ष्मी, दुर्गा, भवानी, भगवती की दिव्य शक्ति है। योग में ऋषि-ऋषिकाओं का ऋषित्व, समस्त देवताओं का देवत्व है। वीर-वीरांगनाओं का वीरत्व, शौर्य है। योग में भगवान् बुद्ध की करुणा, बुद्धत्व, भगवान् महावीर का तप, त्याग, अहिंसा, गुरुनानक देव जी की समता, सेवा, सुमरिन व गुरु गोविन्द सिंह जी की वीरता, शौर्य, पराक्रम व स्वाभिमान युक्त आत्मानुशासन है।<br />योग मूलक शिक्षा, चिकित्सा, विद्यायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, मीडिया, व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र एवं वैश्विक व्यवस्था संसार की समस्त समस्याओं का समाधान है। योग मूलक जीवन पद्धति का अनुसरण जब सारा संसार करेगा तो कहीं भी अनीति, अनाचार, पाप, अधर्म, अशुभ का लेश मात्र भी शेष नहीं रहेगा। योगी प्रमाही व दरिद्र हो ही नहीं सकता। उसके जीवन में भौतिक व पारमार्थिक समृद्धि सम्पन्नता व प्रसन्नता दोनों ही होंगी। योगी व्यक्ति किसी के साथ अन्याय कर ही नहीं सकता। योगी व्यवहारिक प्राकृतिक न्याय व पारमार्थिक न्याय, भगवान की न्याय व्यवस्था व कर्म फल व्यवस्था में विश्वास करता है इसलिए वह किसी का भी, किसी भी प्रकार का अहित व बुरा कर ही नहीं सकता। योगमूलक शासन, योगमूलक अर्थ व्यवस्था से ही संसार का सर्वागीय विकास संभव है। योग से विश्व में पूर्ण शान्ति व समृद्धि आयेगी।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शाश्वत प्रज्ञा</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>दिसम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Dec 2024 18:59:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>एजुकेशन फॉर लीडरशिप का शंखनाद</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">आचार्य बालकृष्ण</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3724/edication-for-leadership-shankhnaad"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-08/dji_0131new.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">  पतंजलि विश्वविद्यालय के विश्वस्तरीय वृहद सभागार में आयोजित पतंजलि गुरुकुलम् तथा पतंजलि विश्वविद्यालय के वार्षिकोत्सव कार्यक्रमों में आधुनिकता के साथ-साथ प्राचीन भारतीय संस्कृति, संस्कार व परम्पराओं की झलक देखने को मिली। साथ ही पतंजलि की भावी योजनाओं में स्वदेशी शिक्षा के आंदोलन की रूपरेखा भी दिखाई दी।<br />शिक्षा क्रांति को लेकर पतंजलि की भावी योजनाओं में जल्द ही हरियाणा में पतंजलि ग्लोबल गुरुकुलम् तथा पतंजलि ग्लोबल विश्वविद्यालय स्थापित करना मुख्य है। स्वदेशी चिकित्सा व स्वास्थ्य को लेकर भी पतंजलि की व्यापक योजनाएँ हैं जिनमें हरियाणा में ही प्रस्तावित विश्वस्तरीय ग्लोबल वेलनेस सेंटर मील का पत्थर साबित होगा। इस सेंटर पर पतंजलि द्वारा प्रतिपादित एकीकृत चिकित्सा का लाभ जनमानस को सुलभ होगा।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>एजुकेशन फॉर लीडरशिप का शंखनाद</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">हमारा लक्ष्य विद्यार्थियों में शिक्षा के साथ-साथ भारतीय संस्कार, मूल्यों व आदर्शों की प्रतिष्ठा कराना है जिससे वे विश्व नेतृत्व के लिए तैयार हो सकें। इसके लिए पतंजलि ने ‘एजुकेशन फॉर लीडरशिप’ का शंखनाद किया है।<br />प्राचीन भारतीय संस्कृति शाश्वत, सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों का प्रतीक है। इसलिए भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा को फिर से स्थापित करने और भारत को फिर से विश्वगुरु बनाने के उद्देश्य से हमें स्वस्थ, सक्षम और चरित्रवान नागरिक गढऩा है, और पतंजलि के सभी शिक्षण संस्थान इस कार्य को गति प्रदान कर रहे हैं।<br />हमारा उद्देश्य युवाओं में वह सामथ्र्य गढऩा है जिससे वे प्राचीन वैदिक ज्ञान और नए वैज्ञानिक अनुसंधान को विश्व बंधुत्व की भावना के साथ जोडक़र वैश्विक चुनौतियों का समाधान ढूंढ सकें।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>पतंजलि गुरुकुलम</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">श्रद्धेय स्वामी रामदेवजी महाराज के मार्गदर्शन में संचालित पतंजलि गुरुकुलम् की स्थापना जून, 2017 में की गई थी। हमारा उद्देश्य पूर्ण रूप से जागृत एवं पूर्ण रूप से सक्षम आत्माओं को तैयार करना है जो एक जागृत, प्रबुद्ध, शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं वैज्ञानिक रूप से विकसित परिवार, समाज, राष्ट्र एवं समग्र रूप से विश्व का निर्माण करेंगे।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>पतंजलि गुरुकुलम के उद्देश्य</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>वैदिक विद्वान निर्माण योजना :</strong> व्याकरण, दर्शन, वेद, उपनिषद, भारतीय प्रामाणिक इतिहास और राजधर्म आदि विभिन्न विषयों के संदर्भ में सत्यनिष्ठ विद्वान तैयार हों तथा सामाजिक, आध्यात्मिक, आर्थिक, वैज्ञानिक और राजनैतिक दृष्टि से एक आदर्श नेतृत्व प्रदान करने की क्षमता वाले स्नातक विद्यार्थी तैयार हों।<br />आधुनिक भारत की राष्ट्रीय नेतृत्व निर्माण योजना : ऐसे बुद्धिजीवियों और राष्ट्रीय व्यक्तित्वों को तैयार करना जो विभिन्न क्षेत्रों जैसे- प्रौद्योगिकी, प्रबंधन, रक्षा, प्रशासनिक सेवा, पुलिस सेवा, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, खेल और क्रीड़ा, ललित कला, संगीत, नाटक, कृषि, उद्योग, अनुसंधान आदि में नए मील के पत्थर स्थापित कर सकें।<br />बालपन कच्ची मिट्टी के समान होता है, इसे जैसा चाहें वैसा ढाल सकते हैं। पतंजलि गुरुकुलम् के माध्यम से हम युवा मन में उपयोगिता और आकर्षण दोनों का संचार कर रहे हैं। बाद में ये विद्यार्थी अपने कर्म, संस्कार और स्वभाव के अनुसार अपना रास्ता स्वयं चुनने में सक्षम रहते हैं। श्रद्धेय स्वामीजी का मानना ​​है कि एक बच्चे में सुधार की संभावना हर गुजरते साल के साथ एक प्रतिशत कम होती जाती है और आम तौर पर हर पहलू से एक बच्चा हर साल एक प्रतिशत प्रबुद्ध होता है। लेकिन बौद्धिक प्रयासों की मदद से हम इस प्रबुद्धता को शारीरिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से एक से दस प्रतिशत तक विकसित कर सकते हैं।<br />पतंजलि गुरुकुल में हमारा दृष्टिकोण शिक्षा में उत्कृष्टता का एक वैश्विक केंद्र बनाना है जो पारंपरिक मूल्यों और आधुनिक ज्ञान को सहजता से एकीकृत करता है। हमारा लक्ष्य एक परिवर्तनकारी शिक्षण पारिस्थितिकी तंत्र बनाना है जहाँ छात्र दोनों की श्रेष्ठता को आत्मसात कर सकें - वैदिक ज्ञान की गहराई और विस्तृत समकालीन शिक्षा। हम अपने स्नातकों को प्राचीन ज्ञान के पथप्रदर्शक और आधुनिक प्रगति के अग्रदूत के रूप में देखते हैं, जो एक गतिशील दुनिया की चुनौतियों का समाधान करने के लिए कौशल, मूल्यों और दृष्टिकोण से लैस हैं। समग्र विकास के लिए एक अटूट प्रतिबद्धता और मानव विरासत के प्रति गहरी श्रद्धा के साथ, हम ऐसे नेतृत्व विकसित करने की आकांक्षा रखते हैं जो मानवता के लिए एक सामंजस्यपूर्ण, समृद्ध और समावेशी भविष्य को आकार देते हैं।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>विद्यार्थियों को प्रोत्साहन एवं छात्रवृत्ति</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">पतंजलि गुरुकुलम् में विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से छात्रों की योग्यतानुसार आकर्षक छात्रवृत्ति योजना है जिसमें शुल्क में २५ से ७० प्रतिशत की छूट का प्रावधान है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>समग्र शैक्षणिक वातावरण </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">पतंजलि गुरुकुलम् तथा पतंजलि विश्वविद्यालय परिसर प्राचीन संस्कृति, संस्कार, परंपराओं व नवाचार का सामंजस्यपूर्ण संगम है। ये अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त शिक्षण संस्थान हैं जहाँ छात्र-छात्राओं के समग्र विकास के लिए एक उपर्युक्त वातावरण है। हम एक समग्र शैक्षणिक वातावरण बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं जो योग, जीवन प्रबंधन कौशल और वैदिक परंपरा को पाठ्यक्रम में एकीकृत करता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>पतंजलि में योग-आयुर्वेद पर अनुसंधान के लिए </strong><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">उ</span>पलब्ध सुविधाएँ</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">योग-आयुर्वेद पर अनुसंधान के लिए पतंजलि में सभी पैरामीटर्स पर अत्याधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं। पतंजलि रिसर्च फाउण्डेशन के तत्वाधान में योग-आयुर्वेद पर अनेकों विश्वविख्यात रिसर्च जर्नल्स में पतंजलि के शोध निरंतर प्रकाशित हो रहे हैं। श्रद्धेय स्वामी जी के सान्निध्य में आयोजित योग शिविरों में लाखों-करोड़ों लोगों पर योग के व्यापक प्रभाव को आधुनिक विज्ञान की कसौैटी पर परखा गया है। साथ ही आयुर्वेद पर शोध करने के लिए उन्नत तकनीक और सुविधाएँ जिनमें हृ्रक्चरु, ष्ठस्ढ्ढक्र, ष्ठक्चञ्ज मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाएँ शामिल हैं, जिनमें ष्टष्टस्श्व्र द्वारा अनुमोदित पशु गृह और साथ ही अच्छी तरह से परिभाषित <span style="color:rgb(35,111,161);">ढ्ढ्रश्वष्ट,</span> ढ्ढक्चस्ष्ट और ढ्ढश्वष्ट संरचनाएँ हैं।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>विश्वविद्यालय में उपलब्ध पाठ्यक्रम</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span style="color:rgb(35,111,161);">1.    डी.लिट/ डी.एस.सी.</span></strong><br />संस्कृत <br />दर्शन शास्त्र<br />योग विज्ञान<br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>2. पी-एच.डी. पाठ्यक्रम</strong></span><br />योगविज्ञान<br />संस्कृत<br />मनोविज्ञान<br />दर्शन शास्त्र<br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>3. स्नात्कोत्तर पाठ्यक्रम</strong></span><br />एम.ए. योग<br />एम.एस-सी. योग विज्ञान <br />एम.ए. संस्कृतम् (साहित्य)<br />एम.ए. संस्कृतव्याकरणम्<br />एम.ए. मनोविज्ञान<br />एम.ए. दर्शन <br />एम.ए. योग एवं सांस्कृतिक पर्यटन<br />मास्टर ऑफ  स्पोर्टस साईस<br />एम.एस-सी. बायोकेमिस्ट्री<br />एम.ए. इतिहास<br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>4.    स्नातकोत्तर डिप्लोमा</strong></span><br />योगविज्ञान<br />स्नातकोत्तर डिप्लोमा योग, स्वास्थ्य एवं सांस्कृतिक पर्यटन<br />स्नातकोत्तर डिप्लोमा वैदिक दर्शन योग के साथ<br />योग एवं आयुर्वेद में स्नातकोत्तर डिप्लोमा<br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>5.    स्नातक पाठ्यक्रम</strong></span><br />बी.ए. योग के साथ<br />बी.एस-सी. योग विज्ञान<br />बी.एस-सी. ऑनर्स (जैविक विज्ञान)<br />बी.ए. ऑनर्स-संस्कृतव्याकरणम्<br />बी.ए. दर्शन के साथ योग<br />बी.पी.ई.एस. (शारीरिक शिक्षा एवं खेल)<br />बी.एस-सी माइक्रोबायलाजी<br />बी.एन.वाई.एस. (प्राकृतिक एवं योग चिकित्सा)<br />बी.पी.ए. (भरतनाट्यम नृत्य)<br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>6.    डिप्लोमा पाठ्यक्रम</strong></span><br />डिप्लोमा हिन्दुस्तानी (भारतीय) संगीत<br />डी.एन.वाई.टी. (प्राकृतिक एवं योग चिकित्सा)<br />शास्त्रीय नृत्य ’ (भरतनाट्यम)<br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>7.    सहायक पाठ्यक्रम</strong></span><br />संस्कृत इन्टरमीडिएट<br />स्नातक पाठ्यक्रम<br />बी.ए. (योग विज्ञान के साथ) का पाठ्यक्रम<br /><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>विवरण:</strong></span><br />1. योग विज्ञान (अनिवार्य)<br />2. संस्कृत<br />3. मनोविज्ञान<br />4. पर्यटन<br />5. इतिहास<br />(इन विषयों में से किन्हीं एक विषय, का चयन अभ्यर्थी द्वारा किया जायेगा)</h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>दिसम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Dec 2024 18:57:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सुबह की चाय का आयुर्वेदिक, स्वास्थ्यवर्धक विकल्प  दिव्य हर्बल पेय</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;">  भागदौड भरी आधुनिक जीवनशैली में सुबह की शुरुआत अक्सर चाय या कॉफी के बिना अधूरी सी लगती है। ये पेय हमारे दिन की शुरुआत का अभिन्न हिस्सा बन गए हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि सुबह-सुबह खाली पेट चाय या कॉफी का सेवन आपके स्वास्थ्य पर क्या असर डालता है?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>चाय-कॉफी से होने वाले रोग</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">विशेषज्ञों की मानें तो सुबह खाली पेट चाय या कॉफी पीने से न केवल पेट की समस्याएं बढ़ती हैं, बल्कि इससे नींद की गुणवत्ता, पाचन तंत्र और यहां तक कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।<br />चाय और कॉफी में कैफीन</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3725/subah-ki-chaya-ka-ayurvedic--swasthyavardhak-vikalp-diva-harbal-pay"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-08/herbal-tea.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"> भागदौड भरी आधुनिक जीवनशैली में सुबह की शुरुआत अक्सर चाय या कॉफी के बिना अधूरी सी लगती है। ये पेय हमारे दिन की शुरुआत का अभिन्न हिस्सा बन गए हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि सुबह-सुबह खाली पेट चाय या कॉफी का सेवन आपके स्वास्थ्य पर क्या असर डालता है?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>चाय-कॉफी से होने वाले रोग</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">विशेषज्ञों की मानें तो सुबह खाली पेट चाय या कॉफी पीने से न केवल पेट की समस्याएं बढ़ती हैं, बल्कि इससे नींद की गुणवत्ता, पाचन तंत्र और यहां तक कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।<br />चाय और कॉफी में कैफीन की मात्रा अधिक होती है, जो शरीर के प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित करती है। इसका अत्यधिक सेवन शरीर को ऊर्जा की झूठी अनुभूति तो देता है, लेकिन दीर्घकालिक रूप से थकावट, चिंता और अनिद्रा की समस्या उत्पन्न कर सकता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>पाचन तंत्र खराब करता है कैफीन : WHO</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, यदि एक दिन में 400 मिलीग्राम से अधिक कैफीन का सेवन किया जाए, तो यह पाचन संबंधी समस्याओं को जन्म दे सकता है। इसके दुष्प्रभावों में पेट की गैस, नींद में कमी, हृदय गति का बढऩा और मस्तिष्क का अत्यधिक सक्रिय हो जाना शामिल हैं। ये सभी हमारी जीवनशैली और मानसिक शांति पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>आयुर्वेद रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में कारगर</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">आयुर्वेद हजारों वर्षों पुरानी चिकित्सा प्रणाली है, जिसमें ऐसे अनेक जड़ी-बूटियों का वर्णन मिलता है। ये हमारे स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में सहायक हैं। ये जड़ी-बूटियां न केवल ऊर्जा प्रदान करती हैं बल्कि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी मजबूत करती हैं।<br />पतंजलि ने आयुर्वेद के इसी ज्ञान का अनुसरण करते हुए दिव्य हर्बल पेय का निर्माण किया है। यह हर्बल पेय 28 विशेष जड़ी-बूटियों का मिश्रण है, जिनमें छोटी इलायची, बड़ी इलायची, दालचीनी, जावित्री, काली मिर्च, सौंठ, लाल चंदन, मुलेठी, तुलसी, अर्जुन, गुलाब, और छोटी पिप्पली शामिल हैं।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>दिव्य हर्बल पेय पर पतंजलि का अनुंसधान</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">दिव्य हर्बल पेय के लाभों की पुष्टि के लिए गहन वैज्ञानिक अध्ययन किए गए हैं। सबसे पहले इसका रासायनिक विश्लेषण किया गया, जिसमें इसके सक्रिय घटकों की मात्रा और सूजन रोधक यौगिकों की पहचान की गई। इसके बाद, इसे ज़ेब्रा फिश मॉडल पर जांचा गया, जो जैव चिकित्सा अनुसंधान में एक मान्य मॉडल है।<br />तत्पश्चात किये गए अध्ययन में ज़ेब्रा फिश में बैक्टीरियल लिपोपॉलिसैकेराइड (LPS) को प्रेरित किया गया, जिससे उनके शरीर में सूजन और बुखार जैसे लक्षण उत्पन्न हुए। यह बिलकुल ऐसा ही है जैसे हमारे शरीर में कहीं किसी प्रकार का आतंरिक संक्रमण होने पर खांसी, जुकाम, बुखार होना जिसका तात्पर्य यह होता है कि हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता उस बैक्टीरिया के विरूद्ध लड़ रही है। इन मछलियों में भी एलपीएस इंड्यूस्ड करने के उपरांत इनके शारीरिक तापमान में वृद्धि हुई। इसके बाद, इन मछलियों को दिव्य हर्बल पेय की विभिन्न मात्राओं में डोज़ दी गई, जिस कारण इन मछलियों में सूजन के लक्षण कम हो गए और शारीरिक तापमान में सुधार देखा गया।<br />यह इस बात की पुष्टि करता है कि दिव्य हर्बल पेय के प्रयोग के द्वारा सूजन और अन्य लक्षणों के मूल कारण को नियंत्रित किया जा सकता है। <br />इसके साथ ही विभिन्न समूह को 7 दिन, 10 दिन और 15 दिन तक हर्बल पेय के सेवन से इन मछलियों की रोग प्रतिरक्षा प्रणाली में भी सुधार देखा गया।<br />साथ ही साथ एलपीएस के कारण ज़्वर आने की वजह से इन मछलियों के फिन्स में आई विकृति को भी हर्बल पेय ने डोज़ डिपेंडेंट तरीके से कम किया। <br />विभिन्न जीन मार्कर पर किये गए शोध में यह ज्ञात हुआ कि हर्बल पेय ने उन साइटोकाइन्स को भी नियंत्रित किया, जो सूजन और ज्वर का कारण बनते हैं। साथ ही, इसने सूजन के कारण बढ़े हुए hs-CRP (सी-रिएक्टिव प्रोटीन) के स्तर को भी कम किया।  <br />इन सभी शोध के द्वारा यह फलित हुआ कि दिव्य हर्बल पेय में प्राकृतिक सूजनरोधी गुण मौजूद हैं जो शरीर में सूजन और बुखार के कारणों को नियंत्रित करते हैं। इसके अतिरिक्त हर्बल पेय का लम्बे समय तक प्रयोग रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। यह पेय कैफीन के विपरीत तनाव और मस्तिष्क की सक्रियता को संतुलित कर उसको शांत और स्थिर रखता है, पाचन तंत्र को मजबूत करता है और पेट से जुड़ी समस्याओं को भी दूर करने में सहायक है। प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से निर्मित होने के कारण यह शरीर को स्वस्थ रखता है और ऊर्जा प्रदान करता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>चाय-कॉफी बनाम हर्बल पेय</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">जहां चाय और कॉफी शरीर को अस्थायी ऊर्जा और कैफीन का असर प्रदान करते हैं, वहीं हर्बल पेय दीर्घकालिक स्वास्थ्य लाभ देता है। इसके नियमित सेवन से न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक स्वास्थ्य भी बेहतर होता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>स्वस्थ जीवन के लिए सही विकल्प चुनें</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में, जहां हर कोई तेजी से आगे बढऩे की कोशिश कर रहा है, यह जरूरी है कि हम अपने स्वास्थ्य के लिए सही विकल्प चुनें। चाय और कॉफी जैसे अस्वास्थ्यकर पेय को छोडक़र आयुर्वेद के ज्ञान से प्रेरित हर्बल पेय को अपनाना एक बेहतर और स्वस्थ निर्णय हो सकता है।<br />दिव्य हर्बल पेय न केवल शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है, बल्कि यह एक संतुलित और स्वस्थ जीवनशैली की ओर भी प्रेरित करता है। स्वस्थ जीवन के लिए, हर्बल पेय को अपनी दिनचर्या में शामिल करें और एक नए, स्वस्थ जीवन की शुरुआत करें।  </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>अनुसंधान</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, यदि एक दिन में 400 मिलीग्राम से अधिक कैफीन का सेवन किया जाए, तो यह पाचन संबंधी समस्याओं को जन्म दे सकता है। इसके दुष्प्रभावों में पेट की गैस, नींद में कमी, हृदय गति का बढऩा और मस्तिष्क का अत्यधिक सक्रिय हो जाना शामिल हैं। ये सभी हमारी जीवनशैली और मानसिक शांति पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पतंजलि रिसर्च</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>दिसम्बर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3725/subah-ki-chaya-ka-ayurvedic--swasthyavardhak-vikalp-diva-harbal-pay</link>
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                <pubDate>Sun, 01 Dec 2024 18:56:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>गीतानुशासन</title>
                                    <description><![CDATA[<p>प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3726/geetanushasan"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-05/20240905_161425.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">  भारतीय परंपरा में किसी भी विमर्श के संदर्भ में यह नियम है कि जो विमर्श प्रारंभ करें उसके विषय में सबसे पहले चार बातों का विचार आवश्यक है। इसे अनुबंध चतुष्टय कहते हैं। विषय क्या है, प्रयोजन क्या है, इसके अधिकारी कौन हैं और जो प्रतिपादन किया जा रहा है या जो कृति प्रस्तुत की जा रही है या जो शास्त्र अथवा व्याख्यान प्रस्तुत किया जा रहा है, उसका विषय से, अधिकारी से और प्रयोजन से संबंध क्या है। यह चार बातें पहले बहुत स्पष्ट हो जानी चाहिए। <br />इस विमर्श का विषय है- ‘अथ गीतानुशासनं’। गीता का एक शासन है जिसे योगेश्वर श्री कृष्ण ने, स्वयं परम सत्ता ने सनातन काल से इस सृष्टि को संचालित रखने के लिए रच रखा है। जो उस शासन को मानते हैं और जो नहीं मानते, सभी उसी शासन से संचालित हैं। यह संपूर्ण सृष्टि उसी शासन से चल रही है जिसका प्रतिपादन श्रीमद्भगवद्गीता में है। जब हम उस पर चर्चा करते हैं तो उस शासन का अनुस्मरण करते हैं। उसे गुरु के मार्गदर्शन में हृदयंगम करने की कोशिश करते हैं। ताकि हम एक तो उस ज्ञान को जान सकें जो गीता में दिया है। वह बल प्राप्त कर सकें जो गीता के ज्ञान से प्राप्त होता है। उस बल के अनुरूप और उस ज्ञान के अनुरूप स्वधर्म का निर्धारण कर सकें और स्वधर्म निर्धारण का बल प्राप्त करके हम स्वधर्म पालन कर सकें। क्यों? क्योंकि गीता में अध्याय 18, श्लोक 46 में कहा है -</h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong>यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। </strong></span><br /><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong>स्वकर्मणा तमभ्यच्र्य सिद्धिं विन्दति मानव:।।</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">(स्वकर्म द्वारा ही परमेश्वर की अर्चना होती है। उस अर्चना द्वारा ही मनुष्य सिद्धि प्राप्त करते हैं।) उससे पूर्व श्लोक 45 में भगवान ने कहा है -</h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span style="color:rgb(230,126,35);">स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर:।</span></strong><br /><strong><span style="color:rgb(230,126,35);">स्वकर्मनिरत: सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">(अर्थात अपने-अपने लिये नियत या निर्धारित कर्म (स्वधर्म) का पालन करते हुये मनुष्य सिद्धि प्राप्त करता है। यह सिद्धि किस प्रक्रिया से प्राप्त होती है, वह मैं तुम्हें बताता हूँ, सुनो।)<br />यह जो सृष्टि चक्र प्रवर्तित है इसमें अपने स्वधर्म का बोध करके जब हम कर्म करते हैं, तो प्राणियों की प्रवृत्ति जिस कारण से हुई है, भगवान ने इस सृष्टि को जैसे प्रवर्तित कर रखा है और उसमें प्रत्येक जीवात्मा जिन कारणों से प्रवर्तित है, उन कारणों के अनुशासन में उस जीवात्मा की सार्थकता है, उसके जीवन की सार्थकता इसी में है कि वह स्वधर्म का पालन करे। तो अपने कर्म से, अपने कर्तव्य से, स्वधर्म पालन से, वह जो परम सत्ता है, जो संचालन कर रही है इस संसार का, उसकी अर्चना करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त होता है। ऐसा भगवान ने कहा है। तो इसलिए स्वधर्म पालन के लिए आवश्यक ज्ञान को जानना। गीता के शासन को जानना। यही गीता का अनुशासन है। यह इसका विषय है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong>त्रिविध ज्ञान</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">गीता में तीन प्रकार के ज्ञान प्रतिपादित हैं। एक तो जगत संबंधी ज्ञान। जगत का स्वरूप क्या है? जगत का मूल क्या है? जगत चलता कैसे है? इसके विषय में जो आधारभूत ज्ञान है, वह गीता में दिया हुआ है। <br />इसके अतिरिक्त जीव के रूप में जो आत्म सत्ता है, जो इस जगत में वर्तती है, व्यवहार करती है, कोई काम करती है और साथ ही स्वधर्म का पालन करते हुए सिद्धियां और पुरुषार्थ प्राप्त करती है, सिद्धियां प्राप्त करती है, उस आत्म सत्ता का स्वरूप क्या है? यानी विश्व का ज्ञान और आत्म ज्ञान और उसके अतिरिक्त जो इस संपूर्ण विश्व को संचालित करने वाली परम सत्ता है, जिसे ब्रह्म कहा है उस ब्रह्म का ज्ञान।<br />तो गीता तीन प्रकार के ज्ञान देती है: एक जगत ज्ञान या विश्व ज्ञान। यानी विश्व के सार का ज्ञान। विस्तार का नहीं। उसके मूल तत्वों का ज्ञान। दूसरा आत्मा के स्वरूप का ज्ञान और तीसरा ब्रह्म सत्ता के स्वरूप का ज्ञान। तो जगत ज्ञान या विश्व ज्ञान, आत्म ज्ञान और ब्रह्म ज्ञान, इन तीनों ही प्रकार के ज्ञान के लिए गीता का अध्ययन और मनन नितांत आवश्यक है। यह है गीता का महात्म्य और यह हमारा विषय है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong>प्रयोजन</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">प्रयोजन क्या है? प्रयोजन यही है कि इसके द्वारा जो जिज्ञासु हैं, वे विश्व ज्ञान प्राप्त करें, आत्म ज्ञान प्राप्त करें और ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करें। प्रारंभ में उसके विषय में सूत्र ज्ञात करें। फिर इसके बाद गुरु के मार्गदर्शन में साधना के द्वारा जब पुरुषार्थ करेंगे तो उनके जीवन की धन्यता या सार्थकता सिद्ध होगी। केवल सुनने से कुछ नहीं हो जाता।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong>शास्त्र-श्रवण से संस्कार बनते हैं </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">सनातन धर्म में यह नहीं कहा है कि आपने कोई शास्त्र सुन लिया तो इससे आप उस शास्त्र के ज्ञाता हो गए या उस धर्म के अनुष्ठाता हो गए। कई ऐसे पंथ हैं दुनिया में जैसे ईसाइयत है, इस्लाम है, इसमें माना जाता है कि किसी परम सत्ता का जो मैसेज आया है या कोई भी सत्ता जो उनके यहाँ वर्णित है, उसका मैसेज आपने ईमान के साथ सुन लिया, इतना पर्याप्त है। सनातन धर्म में यह नहीं है। शास्त्र श्रवण बहुत पुण्य कर्म है लेकिन श्रवण से आपके भीतर एक तरह का संस्कार बनता है। यही बस। इतना ही पुण्य इससे है। मनन से संस्कार दृढ़ होते हैं।<br />इसके बाद शेष काम यानी उसका मनन करना, उसको चित्त में अच्छी तरह अवधारण करना, उसको चित्त में बैठाना, उसका गुरु से, मार्गदर्शक से, शास्त्रों से विविध प्रकार से बारंबार अवगाहन करना, उसे दृढ़ करना। फिर तद्नुरूप स्वधर्म का निर्धारण करके स्वधर्म का पालन करना। जीवन में तरह तरह की सिद्धियां प्राप्त करना, पुरुषार्थ प्राप्त करना, ऐश्वर्य प्राप्त करना और उसके द्वारा जीवन को सार्थक बनाना। तब माना जाता है कि आपने धर्माचरण किया है, आप धर्मनिष्ठ हैं। <br />शास्त्र कंठस्थ होना धर्मनिष्ठ होने का प्रमाण नहीं, उसकी सम्भावना मात्र है आपने किसी शास्त्र को पढ़ लिया है इससे ये नहीं पता चलता कि आप धर्मनिष्ठ है। आपको कोई शास्त्र कंठस्थ है तो भी यह नहीं पता चलता कि आप धर्मनिष्ठ हैं। हमारे यहां ऐसा कुछ नहीं कहा है। क्योंकि पाठ से, पढऩे से, सुनने से आपमें एक संस्कार आ गए लेकिन साथ ही अन्य संस्कार भी बने रह सकते हैं। इसी के लिए पुराणों में बड़े विस्तार से बताया है कि बड़े-बड़े ऋषि हैं, तपस्वी योगी हैं, उनमें ज्ञान भी है, तप का ऐश्वर्य भी है, प्रकाश है, सब प्रकार से और फिर भी कोई पुरानी पिछले जन्मों की या इसी जन्म की वासना अचानक तीव्र होती है और क्या होता है? वह उस वासना के वश में थोड़ी देर आ जाते हैं। जिसे कहते हैं स्खलित हो जाना। तो केवल ‘मैसेज’ को सुनना पर्याप्त नहीं है। <br />सच यह है कि उसका बारंबार आपने ठीक से पारायण भी कर लिया, कुछ साधना भी कर ली, कुछ सिद्धि भी प्राप्त कर ली तो भी यह आशंका बनी रहती है कि कोई अन्य वासना आपके भीतर जो पिछले जन्मों के कारण या वर्तमान जन्म के कारण रह गई है, वह अचानक जागृत होकर आपको स्खलित कर सकती हैं, धर्मभ्रष्ट कर सकती हैं, धर्मच्युत कर सकती हैं। तो अपने यहां धर्मपालन इतना सरल नहीं कहा है। इसीलिए बारम्बार कहा है - ‘क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया, दुर्गम पथस्तत कवयो वदन्ति’। तलवार की धार पर चलने जैसा कठिन है धर्ममय जीवन। यह दुर्गम पथ है। इसे गुरू अपने मार्गदर्शन में सुगम बनाने का प्रयास करते हैं। किसी सत्ता का संदेश, किसी महापुरुष का संदेश या कोई परम दिव्य सत्ता, रहस्यमय सत्ता का संदेश, कोई इलहाम जो प्राप्त हुआ हो किसी को, वह सुन लेने से, किसी ‘द बुक’ को, किसी किताब को, किसी आसमानी किताब को सुन लेने से या उसमें ‘फेथ’, ईमान जता देने से आप धर्मनिष्ठ नहीं हो जाते। <br />उसको विवेक पूर्वक सनातन धर्म के अनुशासन में जांचना होता है कि आपने जो सुना है, क्या वह सनातन धर्म के अनुरूप है? इसलिए हमारे यहां नए को, जैसा नया आजकल फैशन चला है कि यह नया है, हम नया करेंगे इस अर्थ में, सर्वथा अपूर्व के अर्थ में, नए को कोई अच्छा नहीं मानते। वस्तुत: नया कुछ होता भी नहीं है। सृष्टि चक्र है। सभी प्रकार के लोग, सभी प्रकार की वृतियाँ, सभी प्रकार के उद्योग, सभी प्रकार के पुरुषार्थ अनेक बार हो चुके हैं, अनेक बार भविष्य में होंगे। सभी प्रकार के जीव अच्छे और बुरे, दुष्ट और सज्जन सब प्रकार के लोग। वीर और कायर, धर्मात्मा और धर्म विरोधी, पुण्यात्मा और पापी, सब प्रकार के लोग सदा से होते रहे हैं। सब प्रकार के कर्म होते रहे हैं। तो उस अर्थ में पूर्णत: नया कुछ होता नहीं है। सत्य यही है। लेकिन उससे भी महत्त्वपूर्ण यह है कि नया संदिग्ध है, नया सही नहीं है जब तक वह सनातन के अनुशासन में ना हो। यही कहा गया है। क्योंकि नए के अच्छे होने का प्रमाण क्या है? जब तक वह शास्त्र वचन से, आप्त पुरुषों के कथन से प्रमाणित नहीं हो। शाश्वत जो नियम हैं, इस सृष्टि के संचालन के, उनके अनुरूप नहीं हो। उनसे सुसंगत नहीं हो। उनके विरोध में पड़ता हो, तब तक नया तो अनर्थकारी भी हो सकता है अथवा यूं ही मनमानी भी हो सकता है। इसलिए किसी चीज का नया होना कि मुझे तो बड़ी नई जानकारी मिली है, नई जानकारी मिली है तो वो किसी काम की हो भी सकती है और नहीं भी हो सकती। नया होना स्वयं में कोई गुणवाचक नहीं है। वह एक स्थिति वाचक है कि यह नया है। वह गुण भी हो सकता है, दोष भी हो सकता है। अच्छा भी हो सकता है, बुरा भी हो सकता है। आपको नया ज्ञान मिला है इससे नहीं पता चलता कि वो कोई अच्छा, सम्यक, सत्य ज्ञान है। उसको जांचना पड़ता है। शास्त्रों से। सार्वभौम नियमों से। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong>सनातन धर्म का ज्ञानार्जन ही गीता का प्रयोजन है</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">तो प्रयोजन क्या है? सनातन धर्म के अनुरूप ज्ञान का अर्जन। उसमें गीता में जो प्रतिपादित है विश्व का ज्ञान, आत्मसत्ता का ज्ञान और ब्रह्म ज्ञान। उसको जानना ताकि स्वधर्माचरण में हमको उससे सहायता मिले। हमारे भीतर वह अनुशासन आए जिसके द्वारा हम ऐसे पुरुषार्थ कर सकें कि हम भविष्य में धर्मनिष्ठ ही रहें, स्खलित नहीं हों। स्खलित हों तो उसके अनुसार प्रायश्चित को जानें। यह भी नहीं कहा है कि यदि कभी कोई स्खलित हुए, एक बार हुए तो सदा के लिए नरक में चले जाओगे। नहीं। मनुष्य में स्खलन होता ही रहता है। तो उसके लिए आवश्यक प्रायश्चित की व्यवस्था है। शास्त्र के अनुरूप प्रायश्चित कीजिए। पुन: सन्मार्ग पर प्रवृत होइए। आगे बढि़ए। निरंतर गतिशील रहिए। निरंतर आगे बढ़ते रहिए यही कहा है। तो यह है प्रयोजन कि यह जानना कि हमें क्या करना है, हमारे भगवद्गीता में सृष्टि के विषय में, आत्म सत्ता के विषय में और ब्रह्म के विषय में क्या कहा गया है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong>गीता ज्ञान का अधिकारी कौन </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">तो इसका अधिकारी कौन है? अनुबंध चतुष्टय में चार चीज जाननी चाहिए।  विषय क्या है, प्रयोजन क्या है। प्रयोजन क्या है ज्ञान प्राप्त करना ताकि पुरुषार्थ संपादन में स्वधर्म पालन हेतु बल प्राप्त हो, सहयोग प्राप्त हो। और अधिकारी कौन है इसका? इसका अधिकारी वह है, जिसे सनातन धर्म में श्रद्धा हो। गीता में श्रद्धा हो। जो मानता हो कि गीता में ऐसा ज्ञान है कि जिसके द्वारा हमारा जीवन संपन्न हो सकता है, भरपूर हो सकता है, श्रेष्ठ हो सकता है, समृद्ध हो सकता है। हम में धर्म ज्ञान आएगा, हमारे भीतर आत्म ज्ञान आएगा, हमारे भीतर ब्रह्म ज्ञान आएगा, अगर हम गीता के ज्ञान को जान लेंगे और आवश्यक साधना करेंगे।<br />तो जो सनातन धर्म के प्रति जिज्ञासु और श्रद्धालु हैं, वही इसके अधिकारी हैं। 18 वें अध्याय में ही स्पष्ट कहा है ‘इदं ते नातपस्काय’। जो किसी तरह का तप करने, ज्ञान साधना के लिये किसी तरह का कष्ट सहने के लिए नहीं तैयार है, उसके लिये यह नहीं है। बस, जो कुछ सुन रखा है जो कुछ मान रखा है, जो कहता है, जी हम तो यह मानते हैं, हम तो मानते हैं कि भगवान नहीं है, हम तो मानते हैं कि हिंदू धर्म में दोष ही दोष है, हम तो मानते हैं कि यह देश तो दुनिया में सबसे गया गुजरा है, जो भी तरह तरह के लोग मिलते हैं एक से एक नमूने, कार्टून तो जो वह सब मानते हैं, वह इसके अधिकारी नहीं हैं।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
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                <pubDate>Sun, 01 Dec 2024 18:55:48 +0530</pubDate>
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                <title>नेत्र रोग</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">डॉ. अरुण पाण्डेय<br />पतंजलि आयुर्वेद कॉलेज, हरिद्वार</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3727/netra-rog"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-08/southwood-eyecare-hp2021-su.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">  आँखें सजीवों को भगवान द्वारा प्रदान किया गया एक अनुपम व अमूल्य उपहार है। यह एक जटिल संवेदी अंग है। हमारी ज्ञानेन्द्रियों में आँखें सबसे महत्वपूर्ण हैं। आँखों से हम अपने आस-पास के वातावरण को देख और अनुभव कर सकते हैं। यह अंग जितना महत्वपूर्ण है उतना ही संवेदनशील भी है। आँखों की देखरेख बहुत ध्यान से करनी चाहिए अन्यथा नेत्र विकार बड़ी असुविधाएँ पैदा कर सकता है। नेत्र रोग कई प्रकार के हो सकते हैं। सामान्यत: काला या सफेद मोतिया सबसे ज्यादा पाया जाता है। आंखों की स्थिति के शुरुआती निदान के लिए नियमित आंखों की जांच महत्वपूर्ण है। आँखों का सही प्रकार ध्यान न रखने की स्थिति में नेत्र सम्बंधी बड़ी विकृति या अंधापन भी हो सकता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(227,26,165);"><strong>नेत्र रोग का कारण</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">नेत्र रोग के अनेकों कारण हैं जिनमें धुएं या धूलयुक्त स्थान में रहना, बार-बार आंखों को रगडऩा, असमय नींद टूट जाना, आंख में चोट लग जाना, आंखों में गर्मी या आग की लपट पहुंचना, ऋतु-विपर्यय होना, अधिक रोना, गर्म प्रकृति के व्यक्ति का ठण्डे पानी से नहाना, गर्मी से एकदम ठंडे स्थान में पहुंचना आदि कारण प्रमुख समझे जाते हैं। इनके अतिरिक्त माता के आहार-विहार की गड़बड़ी से उसका दूध दूषित हो जाये अथवा माता के नेत्रों में कोई रोग उत्पन्न हो जाये तो दूध पीते बच्चों को भी नेत्र रोग हो सकता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(227,26,165);"><strong>नेत्र रोग के प्रकार</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">आंख दुखने को आयुर्वेद की भाषा में अभिष्यन्द कहते हैं। यह चार प्रकार का होता है- (1) रक्तज,  (2) वातज,  (3) पित्तज और (4) कफज। रक्तज में ललोई युक्त पानी आंखों से निकलता है तथा आंखें और पलक भी लाल हो जाती हैं। पित्तज अभिष्यन्द में भी प्राय: यही लक्षण होते हैं। नेत्रों में दाह, पाक, धुंआ सा निकलना, ठण्डे पानी के लगने से चैन मालूम पडऩा तथा नेत्रों का पीले हो जाना आदि पित्तज अभिष्यन्द के लक्षण हैं।<br />वाताभिष्यन्द में सुई चुभने जैसी पीड़ा होती है। नेत्रों में भारीपन और रोमहर्ष, कंकड़ जैसे चुभने का अनुभव (खडक़), रूखापन, शिर-दर्द, नेत्रों में ठण्डे आंसू गिरना आदि लक्षण होते हैं।<br />कफाभिष्यन्द में नेत्रों में भारीपन, शोध, खुजली, छटपटाहट आदि रहना तथा गर्म पानी या गर्म वस्तु लगने से आनन्द प्रतीत होना, चिकना पानी बहना आदि लक्षण होते हैं।<br />कुछ व्यक्तियों में एक प्रकार का अभिष्यन्द रोग और होता है जिसमें नीचे की पलक की कला पर आलपिन के सिरे के समान आकार के कूपक उत्पन्न हो जाते हैं जो कि थोड़े दिनों के बाद मिट जाते हैं। किन्तु अभिष्यन्द रोग फिर भी बना रहता है।<br />नेत्र के पलकों में गुसेरी (पोथकी) होने की भी व्याधि मिलती है। इनमें बड़ा दर्द होता है तथा स्त्राव, खुजली आदि उपसर्ग भी हो जाते हैं। पलकों पर भारीपन तथा गुहेरी का दाना लाल सरसों के समान होता है और वही पक जाने पर पीवयुक्त भी हो जाता है।<br />माता का दूषित दूध पीने के कारण बच्चों को कुकूणक रोग हो जाता है। इससे आंखों में खुजली चलती और कीचड़ बहती है। इसमें बच्चे अपने माथे, आंख और नाक को रगड़ते रहते हैं। इस स्थिति में बच्चे सूर्य या धूप की ओर नहीं देख सकते और न ही पलकों को ही खोल सकते हैं। इसे कुकूणक रोग कहते हैं।<br />पित्त के प्रकोप से पक्ष्मपात नामक एक रोग होता है। उसमें पलकों के बाल गिरते हैं तथा खुजली व जलन होती है।<br />आंखों में रोहे पड़ जाते हैं। यह रोग भी बच्चों और वयस्कों सभी को होता है। इनके अतिरिक्त और भी अनेक उपसर्ग उत्पन्न हो जाते हैं, जिनकी लक्षणानुसार चिकित्सा करनी चाहिए।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(227,26,165);"><strong>नेत्र रोगों की सूची और वे आपकी दृष्टि को कैसे प्रभावित कर सकते हैं</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>ग्लूकोमा ( Glaucoma)</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">ग्लूकोमा ( Glaucoma)आंखों में बने दबाव से होने वाला एक नेत्र विकार है, जो मस्तिष्क को संकेत भेजने के लिए जिम्मेदार ऑप्टिक तंत्रिकाओं को क्षति पहुंचाता है। यदि शुरूआत में ग्लूकोमा का पता नहीं चलता है, तो यह कुछ वर्षों में स्थायी नेत्र रोग का कारण बन सकता है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;">ग्लूकोमा के लक्षणों का पता लगाना थोड़ा कठिन है। यदि आपको निम्नलिखित में से कोई भी समस्या हो, तो तुरंत नेत्र रोग विशेषज्ञ से परामर्श करना चाहिए-</h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>सिर दर्द</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>आंखों का लाल होना</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>संकीर्ण दृष्टिकोण</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>आँख में दर्द</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>उल्टी या जी मिचलाना</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>धुंधली आँखें</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(227,26,165);"><strong>नेत्र विकार</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>मोतियाबिंद</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">मोतियाबिंद में पुतली और परितारिका के पीछे स्थित आंख का लेंस धुंधला हो जाता है। 40 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में इस नेत्र विकार के होने की सम्भावना रहती है। मोतियाबिंद विश्व में अंधेपन का प्रमुख कारण है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>मधुमेह संबंधी रेटिनोपैथी</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">मधुमेह के रोगियों में रक्त शर्करा का ऊंचा स्तर रक्त वाहिकाओं के रिसाव या सूजन का कारण बन जाता है, जिससे रक्त का प्रवाह ठीक से नहीं हो पाता है। इससे दृष्टि हानि हो सकती है। मधुमेह संबंधी रेटिनोपैथी के लक्षण निम्रवत हैं-</h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>धुंधली दृष्टि</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>खराब नाइट विजन</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>धुले हुए रंग</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>दृष्टि के क्षेत्र में अंधेरे क्षेत्रों की दृश्यता</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>दृष्टिवैषय</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">इसमें आंखों की वक्रता में अपूर्णता हो जाती है। यह स्थिति एक निश्चित सीमा तक होती है। यह आंखों की दृष्टि में हस्तक्षेप नहीं करता है लेकिन कभी-कभी आंखों पर पडऩे वाली रोशनी ठीक से मुड़ती नहीं है, जिससे धुंधली या धुंधली दृष्टि होती है। हालांकि, इसे आंखों की सर्जरी या कॉन्टैक्ट लेंस या चश्मे से आसानी से ठीक किया जा सकता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(227,26,165);"><strong>मंददृष्टि</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">यह बच्चों में दृष्टि दोष का एक बहुत ही सामान्य प्रकार है। इस स्थिति में, एक आंख की दृष्टि कम हो जाती है क्योंकि मस्तिष्क को आंखों से उचित दृश्य उत्तेजना प्राप्त नहीं होती है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(227,26,165);"><strong>कॉर्निया का घर्षण</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">यह आमतौर पर तब होता है जब आंख में कोई बाहरी वस्तु गिर जाती है। और जब आप अपनी आंखों को रगड़ते हैं, तो धूल आपकी आंखों पर खरोंच का कारण बन सकती है। इसलिए, यह सुझाव दिया जाता है कि आप अपनी आँखों को बहुत अधिक न रगड़ें, उन्हें अपने नाखूनों से न पोछें, या गंदे कॉन्टैक्ट लेंस न पहनें।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(227,26,165);"><strong>सूखी आंखें (Dry Eye)</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">यह बहुत ही सामान्य नेत्र रोग है। यह तब होता है जब आपके आंसू आपकी आंखों को ठीक से लुब्रिकेट नहीं कर पाते हैं। आंसुओं के कम होने के लिए कई कारण हो सकते हैं। यह स्थिति बहुत ही असहज हो सकती है और जलन या चुभन पैदा कर सकती है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(227,26,165);"><strong>रेटिना डिटैचमेंट (रेटिना का अलग होना)</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">रेटिनल डिटैचमेंट एक गंभीर नेत्र विकार है। इसमें आंखों के पीछे का रेटिना आसपास के ऊतकों से अलग हो जाता है। रेटिना प्रकाश को संसाधित करता है, इसलिए रेटिना का क्षतिग्रस्त होना आँखों की रोशनी को स्थायी रूप से नुकसान पहुँचा सकता है। इस नेत्र विकार का सामान्यत: कोई लक्षण नहीं होता, लेकिन नेत्र सम्बंधी कुछ परिवर्तन हैं जो इसके कारण हो सकते हैं-</h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>प्रकाश की चमक</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>बहुत सारे फ्लोटर्स की दृश्यता</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(227,26,165);"><strong>एक खराब पक्ष या परिधीय दृष्टि</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>आयु से संबंधित धब्बेदार अध:पतन (एएमडी)</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">यह आंखों के बिगडऩे के कारण होता है। सूर्य का कलंक, रेटिना का मध्य क्षेत्र जो दृश्य तीक्ष्णता को नियंत्रित करता है। इस आंख की स्थिति के कुछ लक्षण इस प्रकार हैं-</h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>कम कंट्रास्ट संवेदनशीलता</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>कम दृश्य तीक्ष्णता</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>केंद्र में विकृत छवियों की दृश्यता</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>यूवाइटिस</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">अवधि यूवेइटिस कई नेत्र स्थितियों में हो सकता है जो मुख्य रूप से यूवीए को प्रभावित करते हैं। इससे आंख में सूजन हो सकती है और यह ऊतकों को नष्ट कर सकता है। इससे दृष्टि खराब हो सकती है या अंधापन भी हो सकता है। यूवाइटिस के कई प्रकार हैं-<br /><strong>पूर्वकाल यूवाइटिस-</strong> आंख के सामने के हिस्से को प्रभावित करता है।<br /><strong>इंटरमीडिएट यूवाइटिस-</strong> सिलीरी बॉडी को प्रभावित करता है।<br /><strong>पोस्टीरियर यूवाइटिस-</strong> आंख के पिछले हिस्से को प्रभावित करता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>हाइपहेमा</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">यह ऐसी स्थिति है जिसमें आंखों में रक्त जमा हो जाता है। यह ज्यादातर परितारिका और कॉर्निया के बीच एकत्र होता है। हाइपहेमा तब होता है जब चोट लगने से रक्त वाहिकाएं फट जाती हैं। ऐसी स्थिति में नेत्र रोग विशेषज्ञ से तुरंत परामर्श किया जाना चाहिए।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(227,26,165);"><strong>नेत्र रोगों में आयुर्वेदिक उपचार</strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>दारुहल्दी, नागरमोथा और गेरु समान भाग लेकर बकरी के दूध के साथ पीसें और आंखों के बाहर लेप करें तो बालकों के सभी नेत्र रोगों में लाभ होता है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>सोंठ, भांगरा, हल्दी और सेंधा नमक का कल्क करें और पुटपाक विधि से पकाकर रस निचोड़ लें। इसे रोगी की आंखों में टपकाने से कुकूणक एवं अन्य नेत्र रोग दूर होते हैं।</h5>
<h5>छोटी हरड़ को पानी के साथ घिसकर लगाने से शीघ्र लाभ होता है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>दारुहल्दी के रस से निर्मित रसौत को माता के दूध में मिला कर अक्षिपूरण करने से आंखों में दाह, दर्द तथा अश्रु स्राव आदि में लाभ होता है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>काली हरड़ को पीसकर घी में मिलावें और आंखों पर लेप करें तो सब प्रकार अभिष्यन्द ठीक होते हैं।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>नीम के पत्तों में कल्क में लोध को पीसकर रखें और आग पर स्वेदन कर माता का दूध मिलावें तथा छानकर नेत्रों में टपकावें। इससे पित्तजन्य अभिष्यन्द में लाभ होता है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>वृहत्पंचमूल का क्वाथ छानकर आंखों में गुनगुना डालना चाहिए। इससे वातज अभिष्यन्द में लाभ होता है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>सुगन्धबाला, देवदारु, कूट और सोंठ को पानी के साथ पीसकर लेप करने से कफज अभिष्यन्द में लाभ होता है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>तुलसी के रस को गुनगुना करके आंखों में टपकावें इससे भी कफजन्य अभिष्यन्द ठीक होता है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>एरण्ड की छाल, पत्ते और जड़ का कल्क करके उसके साथ बकरी का दूध सिद्ध करके छान लें और आंखों में गुनगुना ही डालें तो वातज अभिष्यन्द ठीक हो जाता है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>आंखों में केवल गुलाब जल डालें तो उससे पित्तज अभिष्यन्द में लाभ होता है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>त्रिफला, लोध, मुलहठी, शर्करा और नागरमोथा को पीसकर ठण्डे पानी में मिलाकर आंखों पर सेक करें तो रक्तज अभिष्यन्द ठीक होता है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>सफेद लोध को चूर्ण घृत के साथ भूनकर कपड़छन करें और गर्म पानी मिलाकर आंखों पर सेक करें अथवा इसकी पोटली बनाकर सेकें तो आंखों का दर्द दूर होता है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>त्रिफला को रात्रि के समय पानी में भिगो दें और प्रात:काल छानकर आंखों में टपकावें तो सब प्रकार के अभिष्यन्द में लाभ होता है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>नींबू के रस को लौह पात्र में डालकर लोहे की ही मूसली से घोटें और जब कुछ गाढ़ापन आ जाये, तब उसे आंखों के बाहर लेप करें। इससे सब प्रकार की नेत्र पीड़ा नष्ट हो जाती है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>आंवले के बीज का 1 भाग, बहेड़े की मिंगी 2 भाग और हरड़ की मिंगी 3 भाग, पानी के साथ पीसकर बत्ती बना लें तथा पानी के साथ घिसकर आंखों में आंजें। इससे आंखों से पानी का बहना और वात-रक्तज पीड़ा में शीघ्र लाभ होता है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>बबूल के पत्तों का क्वाथ बनाकर छानें और पुन: आग पर चढ़ाकर लेही के समान गाढ़ा कर लें तथा उतारकर ठण्डा होने पर उसमें शहद मिलावें और आंखों में अंजन करें, इससे नेत्र स्राव (आंखों में पानी बहने) में लाभ होता है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>समुद्रफल को पानी के साथ घिसकर नित्य प्रति आंखों में आंजने से नेत्रस्राव नष्ट होता है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>आंखों में दर्द, लाली, स्राव आदि की स्थिति हो तो गर्म पानी सेंक करना हितकर है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>कफजन्य नेत्र-विकारों में श्वेत फिटकरी को फुलाकर गुलाबजल के साथ मिलावें और आंखों में टपकावें तो शीघ्र ही लाभ सम्भव है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>सेंधा नमक और शहद 1-1 ग्राम तथा गिलोय का स्वरस 12 ग्राम एकत्र घोंटकर आंजने से पिप्लार्म, तिमिर, काज, खाज तथा श्वेत और काले भाग के रोग दूर हो जाते हैं।</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(227,26,165);"><strong>पतंजलि में उपचार</strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>आइग्रिट गोल्ड, इम्यूनोग्रिट, गिलोय घनवटी, महात्रिफलादि घृत, आइग्रिट आई-ड्राप आदि अत्यंत गुणकारी, शोधपरक व प्रामाणिक औषधियाँ हैं।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>रोगानुसार तर्पण, पुट पक्का, अंजन, सेक, अस्च्योतन, पिंडी विडालक आदि चिकित्सा विधियाँ हैं।</h5>
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>नोट : </strong></span>उपचार से पहले चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।</h5>
</li>
</ul>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>रोग विशेष</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>दिसम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Dec 2024 18:54:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पारंपरिक विज्ञान संस्कृति पर आधारित हैं</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;">    51वें अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलन में पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज को ‘योगीन्द्र सम्राट’, पूज्य आचार्य बालकृष्ण जी महाराज को ‘आयुर्वेद विद्या विभूति’ तथा पूज्या डॉ. साध्वी देवप्रिया जी को भारतीय ‘विद्या विशारदा’ उपाधि से सम्मानित किया गया।</h5>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-08/udupi--(10).jpg" alt="Udupi--(10)" width="900" height="600" /></p>
<h5 style="text-align:justify;">उडुपी (कर्नाटक)। श्री कृष्णमठ में आयोजित 51वें अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में प.पू.स्वामी रामदेव जी महाराज एवं प.पू. आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने कहा, ‘पारंपरिक विज्ञान संस्कृत पर आधारित हैं, जो सभी भाषाओं की मूल भाषा है।’ <br />यह सम्मेलन भारतीय विद्वत परिषद् बैंगलोर, पर्याय पुट्टीगे मठ और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय नई दिल्ली के सहयोग से आयोजित किया गया था।</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3728/paramparik-vigyan-sanskrit-par-adharit-hai-param-pujya-swami-ramdev-ji-maharaj"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-08/uduai--(2).jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">  51वें अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलन में पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज को ‘योगीन्द्र सम्राट’, पूज्य आचार्य बालकृष्ण जी महाराज को ‘आयुर्वेद विद्या विभूति’ तथा पूज्या डॉ. साध्वी देवप्रिया जी को भारतीय ‘विद्या विशारदा’ उपाधि से सम्मानित किया गया।</h5>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-08/udupi--(10).jpg" alt="Udupi--(10)" width="900" height="600"></img></p>
<h5 style="text-align:justify;">उडुपी (कर्नाटक)। श्री कृष्णमठ में आयोजित 51वें अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में प.पू.स्वामी रामदेव जी महाराज एवं प.पू. आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने कहा, ‘पारंपरिक विज्ञान संस्कृत पर आधारित हैं, जो सभी भाषाओं की मूल भाषा है।’ <br />यह सम्मेलन भारतीय विद्वत परिषद् बैंगलोर, पर्याय पुट्टीगे मठ और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय नई दिल्ली के सहयोग से आयोजित किया गया था। कार्यक्रम कृष्ण मठ के राजाङ्गण में हुआ। सम्मेलन का उद्घाटन पारंपरिक रूप से दीप प्रज्वलित करके और तुलसी के पौधे को पानी देकर किया गया। अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन कर्नाटक सम्मेलन के दौरान, परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज को श्री सुगुनेंद्र तीर्थ स्वामीजी द्वारा ‘योगीन्द्र सम्राट’ की उपाधि एवं पूज्य आचार्य बालकृष्ण जी महाराज को ‘आयुर्वेद विद्या विभूति’ से सम्मानित किया गया। पूज्या डॉ. साध्वी देवप्रिया जी (विभागाध्यक्षा दर्शन विभाग एवं संकायाध्यक्षा मानविकी एवं प्राच्य विद्या संकाय) को भारतीय ‘विद्या विशारदा’ उपाधि से सम्मानित किया गया।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-08/uduai--(2).jpg" alt="Uduai--(2)" width="900" height="489"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-08/udupai--(1).jpg" alt="Udupai--(1)" width="900" height="464"></img><br />सम्मेलन में पतंजलि योगपीठ हरिद्वार के संस्थापक अध्यक्ष योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज ने प्राचीन ज्ञान के संरक्षण में संस्कृत की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि गुरुकुलों में वेद और संस्कृत सीखने वालों को दुनिया भर में प्रसिद्ध होना चाहिए। उनमें विभिन्न क्षेत्रों में इतिहास रचने की इच्छा है और पतंजलि संगठन इस दिशा में काम कर रहा है। भारतीयों को ऋषियों की महान वंशावली के उत्तराधिकारी होने पर गर्व और सम्मान होना चाहिए। माधवाचार्य ने महान दार्शनिक और व्यावहारिक विचार प्रस्तुत किया कि मनुष्य ईश्वर की संतान हैं। इसलिए उडुपी काशी, मथुरा और वृंदावन के समान सम्मान का हकदार है।’</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-08/udupi--(9).jpg" alt="Udupi--(9)" width="680" height="510"></img><br />संस्कृत के छात्रों को छात्रवृत्ति के बारे में बताते हुए प.पूज्य स्वामी जी महाराज ने कहा, पतंजलि गुरुकुल में बच्चों को भगवद् गीता और उपनिषद् याद करना सिखाया जाता है। मैं उडुपी के छात्रों को हमारे संस्थान में आने के लिए आमंत्रित करता हूँ। इसका खर्च हमारा संगठन उठाएगा, इसके अलावा, प्रत्येक छात्र को 25,000 रुपये की छात्रवृत्ति मिलेगी। संस्कृत में पारंगत लोग प्रोफेसर बनने से कहीं अधिक कर सकते हैं, वे इससे भी बड़ी उपलब्धियाँ हासिल कर सकते हैं। 21वीं सदी भारत की है और संस्कृत के जानकारों को विशेष मान्यता दी जाएगी। उन्होंने कहा, पारंपरिक विज्ञान पर अगला अखिल भारतीय सम्मेलन हरिद्वार में पतंजलि संस्थान में आयोजित किया जाएगा। इस वैश्विक सम्मेलन में भाग लेने के लिए दुनिया भर के गणमान्य व्यक्तियों को आमंत्रित किया जाएगा। उडुपी के आठ मठों के प्रमुखों और विद्वानों को इस कार्यक्रम में शामिल होना चाहिए।</h5>
<h5 style="text-align:justify;">कार्यक्रम में पर्याय श्री पुट्टीगे मठ के पूज्य श्री सुगुनेंद्र तीर्थ स्वामीजी ने कहा, ‘उडुपी आध्यात्मिकता की राजधानी है। भगवान और भक्तों के संगम के कारण भारत अद्वितीय है। ज्ञान की प्राचीन प्रणाली समय के साथ परिपक्व हुई है, और इसका संरक्षण आवश्यक है। ऐसे युग में जहां सनातन धर्म को नुकसान पहुंचाने वाले शब्द सुने जाते हैं, सभी को धर्म और संस्कृति की रक्षा करने का संकल्प लेना चाहिए। सनातन धर्म ही एकमात्र ऐसा धर्म है जो बौद्धिक स्वतंत्रता देता है, यही कारण है कि इसके भीतर कई संप्रदाय पनपे हैं। अन्य धर्मों में, संस्थापक के शब्दों को अंतिम माना जाता है और दूसरों को भी उसका पालन करना चाहिए।’ स्वामीजी ने संस्कृत की चिरस्थायी प्रकृति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा की तुलना में कुछ भी नहीं है। अंग्रेजी शिक्षा का प्रभाव व्यापक है, लेकिन पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करना एक कर्तव्य है, क्योंकि इसका इतिहास 10,000 साल पुराना है। यह स्वतंत्र है और किसी भी बाहरी ताकतों से प्रभावित नहीं हुआ है। अन्य भाषाओं ने अपने मूल रूप में परिवर्तन किया है, जबकि संस्कृत ने सभी समय में एक ही रूप बनाए रखा है। यदि अन्य भाषाएं अस्पष्ट हैं, तो संस्कृत एक सटीक भाषा है। अंग्रेजी में, लिखने और पढऩे में अंतर है, लेकिन संस्कृत में, जो लिखा जाता है उसे उसी तरह पढ़ा जाता है। संस्कृत को संरक्षित करने से प्राचीन ज्ञान का संरक्षण सुनिश्चित होता है।’<br />कार्यक्रम में परम श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि हमारी संस्कृति संस्कृत भाषा से जुड़ी हुई है, इसलिए हमें अपनी संस्कृति को बचाने के लिए संस्कृत भाषा को बचाना होगा। भारत के अलावा दुनिया में कोई भी संस्कृति ऐसी नहीं है, जहां लोग ‘सर्वे भवन्ति सुखिन:’ कहते हों। लोग सिर्फ अपने विकास के बारे में सोचते हैं। संस्कृत ही संस्कृति को बचा सकती है। लेकिन इस परंपरा को खत्म करने की साजिश हो रही है। आर्य-द्रविड़ अवधारणा का प्रचार लोगों में फूट डालने के लिए किया जा रहा है। सिल्क रूट का निर्माण भारतीयों ने किया था, लेकिन अंग्रेजों ने इतिहास को बदलकर यह साबित कर दिया कि यह रूट विदेशियों के भारत में प्रवेश के लिए बनाया गया था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पास 6,000 ऐतिहासिक स्थलों का रिकॉर्ड है, जबकि पतंजलि संस्था ने 10,000 ऐतिहासिक स्थलों का डेटा इकट्ठा किया है।<br />इस अवसर पर अखिल भारतीय प्राच्य सम्मेलन (AIOC) पर एक पुस्तक और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय नई दिल्ली के कुलपति श्रीनिवास वरखेड़ी द्वारा लिखित ‘शास्त्र बद्धताही’ का विमोचन भी किया गया। एसएमएसपीटी द्वारा यक्षगान के माध्यम से आरंभिक प्रार्थना प्रस्तुत की गई। आचार्य वीरनारायण पांडुरंगी, अध्यक्ष बीवीपी ने उपस्थित लोगों का स्वागत किया। श्रीनिवास वरखेड़ी ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। कनिष्ठ मठाधीश श्री सुसरेंद्र तीर्थ स्वामीजी, पेजावर मठ के श्री विश्वप्रसन्न तीर्थ स्वामीजी, श्री भंडारकेरी मठ के विध्येश तीर्थ, सांसद कोटा श्रीनिवास पुजारी, कौप विधायक गुरमे सुरेश शेट्टी, स्थानीय सचिव प्रोफेसर शिवानी वी, महासचिव प्रो.कविता होली, संस्कृत पुणे के सेवानिवृत्त प्रोफेसर विश्वविद्यालय की प्रो.सरोजा भाटे और अन्य उपस्थित थे।</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>दिसम्बर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3728/paramparik-vigyan-sanskrit-par-adharit-hai-param-pujya-swami-ramdev-ji-maharaj</link>
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                <pubDate>Sun, 01 Dec 2024 18:53:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नेत्र विकार EYE DISORDER</title>
                                    <description><![CDATA[<p>स्वामी समग्रदेव<br />पतंजलि संन्यासाश्रम, पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3729/netra-vikar-eye-disorder"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-08/dfgd.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"> आँखें हमारे जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वे न केवल हमें दुनिया को देखने और समझने में मदद करती हैं, बल्कि हमारे दैनिक जीवन और गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी हैं। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>जीवन में आँखों का महत्व</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>1.    दृष्टि : </strong>आँखें हमें देखने की क्षमता देती हैं, जिससे हम अपने चारों ओर की दुनिया का अनुभव कर सकते हैं।<br /><strong>2.    संचार :</strong> आँखों के माध्यम से हम अपनी भावनाओं और विचारों को व्यक्त कर सकते हैं। आँखों का संपर्क और हावभाव संचार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।<br /><strong>3.    सुरक्षा :</strong> आँखें हमें खतरों को पहचानने और उनसे बचने में मदद करती हैं।<br /><strong>4.    कला और सृजन :</strong> दृष्टि के बिना, हम कला, प्रकृति और सृजन का आनंद नहीं ले सकते।<br /><strong>5.    स्मरण :</strong> दृष्टि हमें विभिन्न स्थानों, चेहरों और घटनाओं को याद रखने में मदद करती है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>आखों से संबंधित तथ्य और अन्धत्व से  जुड़ी जानकारी</strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>वर्तमान में 3.7 करोड़ लोग दृष्टिहीन हैं एवं 12.4 करोड़ लोग गंभीर रूप से दृष्टि-विकार से पीडि़त हैं।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>दृष्टिहीनता उत्पन्न करने वाली स्थितियों के बचाव या त्वरित उपचार से 80 प्रतिशत मामलों में अन्धवत्व‍ से बचा जा सकता है। विश्व के ९० प्रतिशत दृष्टिहीन लोग विकासशील देशों में रहते हैं। </h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>विश्वभर के दृष्टिहीनों में दो-तिहाई से अधिक महिलाएं हैं।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>विश्व के एक-चौथाई दृष्टिहीन लोग भारत में रहते हैं।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>लगभग 70 प्रतिशत दृष्टिहीन लोग भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं जहां आँखों की अच्छी देखभाल उपलब्ध नहीं है।</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) ने दृष्टि की विभिन्‍न दर्जे की कई श्रेणियाँ निर्दिष्ट की हैं जिसका दृश्य तीक्ष्णता मापक के माध्यम से आँकलन किया जाता है।<br />दृश्य तीक्ष्णता आंख द्वारा विस्तार से देखने की क्षमता को मापती है। सामान्‍यत: दृश्य तीक्ष्णता, एक चार्ट का 3 मीटर, 6 मीटर या 40 सेमी दूरी पर उपयोग कर मापी जाती है। चार्ट में विभिन्‍न आकारों के अक्षर, अंक या विभिन्‍न आकार हो सकते हैं।<br />स्‍नेलन चार्ट का उपयोग कर तथा नीचे दी गई सारणी को देखकर, दृश्य तीक्ष्णता को विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है, ज्ञात कर सकते हैं। सारणी में डब्ल्यू.एच.ओ और भारतीय दोनों परिभाषाएँ हैं-<br /><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-08/dfgd.jpg" alt="dfgd" width="1091" height="757"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;">आँखों के विकार विभिन्न प्रकार के हो सकते हैं और ये हमारी दृष्टि और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>नेत्र विकारों के विषय में कुछ मुख्य जानकारी निम्नवत हैं -</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>1.    मायोपिया (निकट दृष्टिदोष)</strong><br /><strong>विवरण :</strong> इस स्थिति में व्यक्ति दूर की वस्तुओं को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाता है।<br /><strong>लक्षण :</strong> दूर की वस्तुएं धुंधली दिखना, सिरदर्द।<br /><strong>कारण : </strong>आंख की लंबाई बढ़ जाती है या कॉर्निया की वक्रता अधिक होती है।<br /><strong>2.     हायपरोपिया (दूर दृष्टिदोष)</strong><br /><strong>विवरण :</strong> इस स्थिति में व्यक्ति नज़दीक की वस्तुओं को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाता है।<br /><strong>लक्षण :</strong> पढऩे में कठिनाई, आंखों में खिंचाव।<br /><strong>कारण :</strong> आंख की लंबाई कम होती है या कॉर्निया की वक्रता कम होती है।<br /><strong>3.     ग्लूकोमा (Glaucoma)</strong><br /><strong>विवरण :</strong> यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें आंखों के अंदर का दबाव बढ़ जाता है, जिससे ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुंचता है।<br /><strong>लक्षण :</strong> दृष्टि का धीरे-धीरे कम होना, आंखों में दर्द।<br /><strong>कारण :</strong> आंखों के अंदर का दबाव बढऩा।<br /><strong>4.     कैटरेक्ट (Cataract)</strong><br /><strong>विवरण :</strong> यह स्थिति तब होती है जब आंखों के लेंस में धुंधलापन आ जाता है।<br /><strong>लक्षण : </strong>धुंधली दृष्टि, रात में देखने में कठिनाई।<br /><strong>कारण :</strong> उम्र बढऩे, चोट, आनुवंशिक कारक।<br /><strong>उपचार :</strong> सर्जरी, जिसमें धुंधले लेंस को हटा कर कृत्रिम लेंस लगाया जाता है।<br /><strong>5.     रेटीना डिटेचमेंट (Retina Detachment</strong>)<br /><strong>विवरण :</strong> यह स्थिति तब होती है जब रेटिना की परतें एक-दूसरे से अलग हो जाती हैं।<br /><strong>लक्षण : </strong>अचानक दृष्टि में धुंधलापन, आँखों के सामने फ्लोटर्स।<br /><strong>कारण :</strong> चोट, आंख की बीमारियाँ, उच्च मायोपिया।<br /><strong>उपचार :</strong> सर्जरी।<br /><strong>6.     रक्तस्राव (Hemorrhage)</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>विवरण :</strong> आंख के अंदर रक्तस्राव होने की स्थिति।<br /><strong>लक्षण :</strong> अचानक दृष्टि का कम होना, दर्द।<br /><strong>कारण :</strong> उच्च रक्तचाप, मधुमेह, चोट।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>7.     सूखी आँखें (Dry Eyes)</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>विवरण :</strong> यह स्थिति तब होती है जब आँखें पर्याप्त आँसू नहीं बना पातीं या आँसू जल्दी वाष्पित हो जाते हैं।<br /><strong>लक्षण :</strong> जलन, आंखों में किरकिरापन, लालिमा।<br /><strong>कारण :</strong> वातावरणीय कारक, उम्र बढऩा, कुछ दवाएं।<br /><strong>8.     कलर ब्लाइंडनेस (Color Blindness)</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>विवरण :</strong> यह स्थिति तब होती है जब व्यक्ति रंगों को सही तरीके से पहचान नहीं पाता है।<br /><strong>लक्षण : </strong>कुछ रंगों को ठीक से पहचानने में कठिनाई।<br /><strong>कारण :</strong> आनुवंशिकता व अन्य।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span style="color:rgb(35,111,161);">पतंजलि वेलनेस में आखों की चिकित्सा</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">पतंजलि वेलनेस में समग्र चिकित्सा के द्वारा आखों की समस्या का निदान किया जाता है-</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>आहार चिकित्सा</strong></span> </h5>
<h5 style="text-align:justify;">प्रात: कालीन औषधि जल    -    त्रिफला का पानी<br />नाश्ता    -    गाजर, चुकंदर, एलोवेरा, आँवला, गिलोय, व्हीट ग्रास जूस; भीगे हुए<br />5-बादाम, 5-अखरोट <br />फल    -    पपाया, एप्पल, अवाकार्डो<br />दोपहर का भोजन        -    मल्टीग्रेन, रागी, बाजरा की रोटी;<br />                    उबली हुई शकरकंद, खीरा, गाजर चुकंदर, टमाटर का सलाद<br />दोपहर भोजन उपरांत        -    खीरा, गाजर, चुकंदर,  टमाटर का जूस<br />रात्रि भोजन    -    मल्टीग्रेन, रागी, बाजरा, रोटी, मूगदाल खिचड़ी, उबली सब्जी, सूप, उबली हुई शकरकंद।<br />रात्रि भोजन के उपरांत        -    महात्रिफलादी घृत + देसी गाय का दूध</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>आयुर्वेद में औषधी</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">पतंजलि महात्रिफलादी घृत, पतंजलि आइ ग्रिट</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>आयुर्वेद की चिकित्सा</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">त्रिफला का पानी : आईवाश के लिए, अक्षितर्पण</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>प्राकृतिक चिकित्सा</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">मडपैक, हेडनैक मालिश, accupunture/ acupressure</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>योग चिकित्सा</strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>षट्कर्म</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>जलनेति</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>रबरनेति</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>आसन</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>आँखो के लिए अभ्यास</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>आँखों के सूक्ष्म अभ्यास </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>शीर्षासन, 2. सर्वांगासन, 3. हलासन, 4. चक्रासन 5. पश्चिमोत्तानासन</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>प्राणायाम</strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>अनुलोम-विलोम प्राणायाम </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>त्राटक क्रिया के अभ्यास से आखों में विशेष लाभ होता है।</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>साथ ही सुबह उठकर मुँह में पानी भरकर आँखों में छिपके मारना।</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>रोग विशेष</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>दिसम्बर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3729/netra-vikar-eye-disorder</link>
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                <pubDate>Sun, 01 Dec 2024 18:52:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>यूरोप की राजनैतिक दशायें तथा नेशन स्टेट का उदय</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">प्रो. कुसुमलता केडिया   </p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3730/europe-ki-rajnaitik-dashayen-tatha-nation-state-ka-uday"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-08/71pmadzcznl._sl1360_.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">    भारत के लोगों को यूरोप के इतिहास के विषय में प्रामाणिक जानकारी बहुत कम है। चकाचौंध भरा प्रोपेगंडा ही उनको विदित है। इसलिये तथ्य जानने आवश्यक हैं। 19वीं शताब्दी ईस्वी में यूरोप में अत्यन्त महत्वपूर्ण राजनैतिक परिवर्तन हुये। अनेक नये-नये राज्य बने और पुराने बिगड़े। विश्व के अनेक देशों से यूरोपीय क्षेत्र के अनेक राज्यों ने सोना-चाँदी जवाहरात और धन तो लूटा ही, वहाँ के लोगों को गुलाम बनाकर भी बड़ी संख्या में लाये। गुलामों का पूरा व्यापार ही चलता रहा। सम्पूर्ण 19वीं शताब्दी ईस्वी में यूरोप के प्रत्येक राज्य ने गुलामों का व्यापार किया और उससे बड़ी कमाई की। गुलामों के साथ अवर्णनीय क्रूरता और पैशाचिकता की जाती थी। केवल किसी समाज को युद्ध में पराजित करके ही उन्हें गुलाम बनाते हों, ऐसा नहीं था। अपितु जहाँ भी कोई समाज या समुदाय किसी यूरोपीय समुदाय द्वारा अचानक अत्याचार किये जाने पर उनके प्रतिरोध के लिये सक्षम नहीं था, वहाँ सब जगह वे लोगों को जबरदस्ती पकडक़र बांधकर ले जाते और दूर देश में ले जाकर बेच देते। इसके पक्ष में तरह-तरह के तर्क बाद में गढ़े गये। परंतु वे तर्क सब बाद के थे, पहले तो क्रूरता, नृशंसता और पैशाचिकता का यह कर्म कर लिया जाता था। बाद में पूछे जाने पर उसके पक्ष में तर्क दिये जाते थे। <br />उदाहरण के लिये पहले तो यह तर्क दिया गया कि हम श्रेष्ठ हैं और गैर यूरोपीय गैर ईसाई लोग निकृष्ट हैं। इसलिये हमें उन्हें गुलाम बनाने का अधिकार है। अफ्रीका और अमेरिका के मूल निवासी लोगों के लिये तो यह कह दिया गया कि वे मनुष्य ही नहीं हैं, ओरांगउटांग नामक एक प्रजाति विशेष हैं और इसलिये उन्हें गुलाम बनाने तथा कुपित होने पर उनकी हत्या कर देने का भी पूरा अधिकार गॉड ने यूरोपीय ईसाइयों को दे रखा है। इस प्रकार गुलामी का व्यापार भारी मुनाफे का धंधा बन गया। क्योंकि इसमें पूँजी केवल उनको बंदी बनाने और मारपीट कर ढोकर ले जाने में आने वाले खर्च के रूप में ही लगाई जाती थी। बदले में भारी मुनाफा उनकी बिक्री से मिलता था। बाद में यूरोपीय ईसाइयों ने इसका एक और आसान रास्ता भी निकाला। मारपीट कर बंदी बनाने की जगह वे अफ्रीकी मुसलमानों से गुलामों को बेहद सस्ते दामों में खरीदने लगे और फिर केवल ढुलाई का खर्च लगता था तथा उन्हें ले जाकर भारी दामों में बेच दिया जाता था।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>लोगों को गुलाम बनाने के लिए झूठे और गंदे कुतर्क गढ़े गए</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">गुलाम प्रथा के विस्तार को समझने के लिये 19वीं शताब्दी ईस्वी में यूरोप की राजनैतिक दशा को समझना आवश्यक है। हाब्सबर्ग, आस्ट्रिया, प्रशा, जर्मनी, फ्रांस, रूस, इंग्लैंड, आयरलैंड, स्काटलैंड, नार्वे, स्वीडन, स्विटजरलैंड, पुर्तगाल, स्पेन, हालैंड आदि इसके प्रमुख राज्य थे। मुसलमानों से ईसाइयों ने स्पेन को छीना और फिर वहाँ अपना राज्य स्थापित किया। 18वीं शताब्दी के अंत तथा 19वीं शताब्दी के आरंभ में स्पेन, पुर्तगाल और इंग्लैंड की सेनाओं ने फ्रांस से युद्ध शुरू कर दिया। फ्रांस की ओर से इस युद्ध का नेतृत्व नेपोलियन बोनापार्ट ने किया। उसके पहले आस्ट्रिया ने इटली को गुलाम बना लिया था। फ्रांस ने आस्ट्रिया को पराजित कर इटली को स्वतंत्र करने की घोषणा की। आस्ट्रिया और फ्रांस में तीन युद्ध हुये। युद्ध के बाद की संधियों में बार-बार भौगोलिक क्षेत्रों के आदान-प्रदान हुये। नेपोलियन ने युद्ध के नेतृत्व में अद्भुत वीरता दिखाई और अंत में आस्ट्रिया को संधि करनी पड़ी। इस बीच यूरोप के विविध समुदाय भारत आकर यहाँ विद्यमान बड़े-बड़े राज्यों को देख चुके थे। अत: पहली बार यूरोप में भी बड़े-बड़े राज्य स्थापित करने की लालसा जगी। नेपोलियन के पक्ष और विपक्ष में फ्रांस के अलग-अलग समुदाय एकत्रित हो गये। अंत में आपस के गृहयुद्ध से निपटने में नेपोलियन सफल रहा और वह फ्रांस का सम्राट बन गया। फिर उसने इंग्लैंड पर आक्रमण की योजना बनाई। तब इंग्लैंड ने आस्ट्रिया और रूस से संधि कर नेपोलियन का मुकाबला किया। <br />नेपोलियन के समय यूरोप में कोई नेशन स्टेट नहीं था।<br />इस प्रकार स्पष्ट है कि नेपोलियन के समय तक यूरोप में कोई भी नेशन स्टेट नहीं था। अलग-अलग जागीरें थीं और राजघरानों का राज्य था जो बनता बिगड़ता रहता था। 19वीं शताब्दी ईस्वी के आरंभ में ही नेपोलियन ने सम्पूर्ण यूरोपीय क्षेत्र पर एकाधिकार के लिये युद्ध छेड़ दिया। फ्रांस और इंग्लैंड क्षेत्रों के कुछ राजा उसके पहले भी बहुत समय से लगातार लड़ रहे थे। यद्यपि तब तक फ्रांस और इंग्लैंड नेशन स्टेट नहीं बने थे। उनके तत्कालीन राजाओं को बाद में बने नेशन स्टेट के प्रतिनिधि के रूप में लिखने का चलन है, जबकि वे वस्तुत: केवल अपने छोटे से इलाके के राजा होते थे। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>संधियां करना और तोडऩा: पूर्ण अनैतिकता</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">19वीं शताब्दी ईस्वी आरंभ होने के एक दशक पहले से ही यूरोपीय क्षेत्र के ये सभी राजा और जागीरदार नित्य नये गठबंधन बनाते थे और नये-नये मोर्चे खोलते और बंद करते थे, संधियाँ करते और तोड़ देते थे और लगातार युद्ध पर युद्ध लड़े जा रहे थे। <br />फ्रांस के संवैधानिक राजा के विरूद्ध इंग्लैंड सहित यूरोप के अनेक जागीरदारों ने मोर्चा बनाया और फ्रांस को हराने में जुट गये। इसमें फ्रांस के अनेक क्रांतिकारियों ने इन आक्रामक राजाओं से संधियाँ की थीं। फिर राजाओं ने उस पर अमल नहीं किया तो 20 अप्रैल 1792 ईस्वी को क्रांतिकारियों के बहुमत वाली फ्रेंच विधानसभा ने ऑस्ट्रिया के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। तब ऑस्ट्रिया के साथ संधि में बंधे प्रशा के राजा ने फ्रांस पर जून 1992 में आक्रमण कर दिया। ऑस्ट्रिया और प्रशा के जागीरदारों की सेना ने फ्रांस पर आक्रमण कर वर्दन नामक शहर पर कब्जा कर लिया और पेरिस में हजारों लोगों की हत्या कर दी। तब फ्रांस की सैन्य टुकडिय़ों ने अपने शहर वाल्मी पर आक्रमण कर ऑस्ट्रिया की सेना को भगा दिया और इसकी जीत का खूब शोर किया। परन्तु फ्रांस के शेष हिस्से में ऑस्ट्रिया का कब्जा तब भी बरकरार था।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>फ्रेंच क्रांति की असलियत</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">फ्रांस की तत्कालीन सरकार भंग करके युद्ध की तैयारी के साथ फें्रच गणराज्य घोषित कर दिया गया। परन्तु राइन नदी की ओर से नीदरलैंड होकर ऑस्ट्रिया की सेनाओं ने आक्रमण जारी रखा और उधर अंग्रेजों ने अपनी कूटनीति चलते हुये फे्रंच क्रांतिकारियों को राष्ट्रद्रोह के लिए उकसाया और ट्यूटन पर कब्जा कर लिया। फ्रांस में हडक़ंप मच गया और आदेश जारी हुआ कि 18 वर्ष और उससे ऊपर के सभी फे्रंच किशोरों को सेना में भर्ती होना अनिवार्य है। तब फ्रांस की बड़ी सेना बन गई और उन्होंने आक्रमणकारियों को मार भगाया। अन्य राज्यों में इसका भय बैठ गया।<br />नीदरलैंड का एक हिस्सा ऑस्ट्रिया ने फ्रांस को समर्पित किया और इटली की अनेक जागीरें भी फ्रांस को सौंप दी गईं। स्पेन ने भी घबराकर फ्रांस से संधि की। परन्तु फ्रेंच क्रांतिकारियों ने फ्रेंच नरेश लुई सोलहवें को फांसी दे दी। जिससे स्पेन, नीदरलैंड और नेपल्स के राजा नाराज हो गये तथा क्रांतिकारियों को उखाड़ फेंकने के लिये सक्रिय हो गये। इस सारी गहमागहमी में वह फे्रंच क्रांति विफल हो गई जिसका गुणगान मूर्खों के झुंड भारत में आजतक करते हैं। वह क्रांति कुचल दी गई। फ्रांस में पुन: राजशाही आ गई। <br />तब भी प्रशा की सेना ने फ्रांस पर आक्रमण किया। परन्तु फ्रांस की प्रशिक्षित सेना से उसे मुँह की खानी पड़ी। फ्रांस लगातार अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाता रहा और सभी युवकों को सेना में भर्ती कर प्रशिक्षण देता रहा। सेना में भर्ती होने से मना करने वाले युवक को राजद्रोही घोषित कर दिया जाता और मृत्युदंड दिया जाता था। इससे फ्रांस की सेनाओं में नया जोश आया और उन्होंने ब्रिटेन और ऑस्ट्रिया दोनों को हरा दिया। <br />फ्रांस के राजा ने बटाविया क्षेत्र में अपनी एक कठपुतली को राजा बना दिया। उसने फ्रांस से बेसिल की संधि की। डच के राजा ने भी फ्रांस से संधि कर उसे अपने राज्य का एक हिस्सा सौंप दिया। फ्रांस और स्पेन में संधि हुई और फ्रांस सुरक्षित लगने लगा। परन्तु ब्रिटेन ने फ्रेंच लोगों में फूट जारी रखी और बार-बार विद्रोह को भडक़ाया। जिसे नेपोलियन बोनापार्ट ने विफल कर दिया। इसके साथ ही ब्रिटेन को कमजोर करने के लिये नेपोलियन ने जार्डन, इजिप्त मिश्र तथा इटली पर एक साथ आक्रमण की योजना बनाई। नेपोलियन बोनापार्ट इटली को पराजित करने में सफल हुआ। साथ ही भीतर के फ्रेंच विद्रोहियों को कुचल दिया गया। इसके बाद ब्रिटेन और फ्रांस की सेनाओं में युद्ध छिड़ गया। <br />नेपोलियन बोनापार्ट के नेतृत्व में फ्रेंच सेनाओं ने इटली, स्विटजरलैंड, दक्षिणी जर्मनी और भूमध्यरेखिक क्षेत्र में एकसाथ कई मोर्चों पर युद्ध छेड़ दिया और विजयी रहे। लून विले की संधि और एमियन्स की संधियाँ हुईं तथा फ्रांस के कब्जे में अनेक क्षेत्र आ गये। ब्रिटेन ने बड़ी चतुराई से तुर्क राजाओं से दोस्ती कर ली और उनको फ्रांस के विरूद्ध अपने साथ कर लिया। इन युद्धों में फ्रांस के 75,000 सैनिक मारे गये और इंग्लैंड, स्विटजरलैंड, इटली तथा दक्षिणी जर्मनी एवं मुस्लिम सेनाओं को मिलाकर कुल 2 लाख सैनिक मारे गये। दोनों ओर से लगभग डेढ़-डेढ़ लाख सैनिक बंदी बनाये गये।  फिर 1 अप्रैल 1805 से 18 जुलाई 1806 ईस्वी तक पुन: दोनों पक्षों में भीषण युद्ध हुआ। इंग्लैंड, ईसाई बना हुआ रोमन साम्राज्य (जिसे वे होली एम्पायर कहते थे), रूस, नेपल्स, सिसली और स्वीडन एक तरफ थे और फ्रांस तथा उनके मित्र इटली, स्पेन, बावरिया आदि दूसरी ओर। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>कुटिल भेद-नीति में कुशल अंग्रेज</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">ब्रिटेन ने फ्रांस के बोरबोन राजपरिवार के एक सदस्य लुई एनटाइने हेनरी, जो एजियेन नामक जागीर के ड्यूक थे, को भेदपूर्वक अपने पक्ष में कर लिया जिससे कि नेपोलियन बोनापार्ट ने उसे फांसी दे दी। इस पर यूरोप के सभी राजघराने भडक़ उठे और रूस के जार अलेक्जेंडर प्रथम ने नेपोलियन को सबक सिखाने का निर्णय लिया। स्वयं टाल्सटॉय ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘वॉर एंड पीस’ में एजियेन के जागीरदार को फांसी देने का उल्लेख किया है। जिसमें बताया है कि तत्कालीन अतिप्रसिद्ध फ्रेंच अभिनेत्री के घर लुई एनटाइने और नेपोलियन बोनापार्ट दोनों एक पार्टी में थे। बोनापार्ट को मिर्गी का दौरा आ गया और वह गश खाकर गिर पड़ा। तब लुई एनटाइने ने उसे संभाला। परन्तु बोनापार्ट ने बाद में लुई एनटाइने को मृत्युदंड देकर चुकाया, जो टाल्सटॉय के अनुसार कृतघ्नता का एक उदाहरण है। जबकि बोनापार्ट का तर्क था कि फ्रांस से गद्दारी करने के कारण अब लुई एनटाइने का रक्त अशुद्ध हो गया है। उसकी रक्त की शुद्धता का दावा नहीं किया जा सकता। अत: उसे मृत्युदंड देना उचित है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>राजघरानों की एकता</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">राजा लुई एनटाइने की हत्या से यूरोप के विभिन्न राजघराने कुपित होकर नेपोलियन के विरूद्ध हो गये। पहले की संधियाँ तोड़ दी गईं। ब्रिटेन ने 18 मई 1803 ईस्वी को फ्रांस के विरूद्ध पुन: युद्ध की घोषणा कर दी। दिसंबर 1804 में ब्रिटेन के पक्ष में स्वीडन आ गया और 11 अप्रैल 1805 ईस्वी को रूस भी इसी खेमे में आ गया। ऑस्ट्रिया, नेपल्स तथा सिसली ने भी मोर्चे में साझेदारी स्वीकार की और युद्ध तीव्रतर होता गया। परंतु  इस युद्ध में अंत में नेपोलियन की ही विजय हुई। नेपोलियन का डंका पूरे यूरोपीय क्षेत्र में बज गया  लेकिन बाद में इंग्लैंड ने उसे विष देकर मरवा डाला। इसके बाद भी यूरोपीय क्षेत्र में निरंतर आपसी संघर्ष होते गये। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>बीसवीं शताब्दी से 30 वर्ष पहले बना जर्मन राष्ट्र</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1870 ईस्वी में बिस्मार्क ने पहली बार जर्मन राष्ट्र के एकीकृत स्वरूप की बात की। उसके पहले तक सम्पूर्ण जर्मन क्षेत्र 300 से अधिक अलग-अलग राजनैतिक इकाइयों में बंटा था। वस्तुत: जर्मन शब्द स्वयं हूण का तद्भव रूप है। यह बात जर्मन भी जानते हैं और सम्पूर्ण यूरोप भली-भांति जानता है। तो बिस्मार्क ने दावा किया कि जहाँ-जहाँ हूणों का कब्जा रहा है, वह सम्पूर्ण क्षेत्र जर्मन राष्ट्र है। अब यह बात अलग है कि हूण वस्तुत: भरतवंशी क्षत्रिय हैं और वाल्मीकीय रामायण तथा महाभारत में उन्हें भारतीय क्षत्रिय ही कहा गया है और सम्पूर्ण पुराणों में तथा टॉड के द्वारा संकलित क्षत्रियों की वंशावली में भी हूणों को भारतीय क्षत्रिय ही कहा गया है। परंतु ईसाई पादरियों ने और ईस्ट इंडिया कंपनी के बाबू तथा सैनिक एवं अन्य निचली श्रेणी के कर्मचारियों ने अपने राजनैतिक और आर्थिक लक्ष्यों के लिये मनमाने झूठ रचे और उसे ही यूरोप में प्रचारित किया। इसलिये बिस्मार्क को हूणों के भरतवंशी क्षत्रिय होने वाला तथ्य स्मरण नहीं था। यद्यपि जर्मन लोग हूणों को यानी स्वयं को 20वीं शताब्दी ईस्वी में आर्य तो कहने ही लगे थे। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>लडख़ड़ाया सत्ता संतुलन</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">जर्मन राष्ट्र के 1870 ईस्वी में इस उभार के साथ ही यूरोप में सत्ता संतुलन लडख़ड़ा गया। क्योंकि यह नवोदित जर्मन राष्ट्र इंग्लैंड और फ्रांस से बहुत बड़ा था तथा बहुत शक्तिशाली था। इंग्लैंड के पास तब तक कोई संगठित सेना नहीं थी। इसीलिये बिस्मार्क ने कहा था कि इंग्लैंड के सैनिकों को तो हमारी जर्मन पुलिस ही गिरफ्तार करके ले आयेगी। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>तुर्कों से छलपूर्ण दोस्ती की ईसाइयों ने</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">इंग्लैंड और फ्रांस कांप गये और उन्होंने रूस से संधि की तथा वहाँ अपने अनुकूल राजनैतिक परिवर्तन घटित होने में विशेष रूचि ली। साथ ही उन्होंने तुर्की से भी संधि का प्रयास किया। तब तक तुर्की एक शक्तिशाली राज्य था और इसीलिये उसने इंग्लैंड और फ्रांस की चालों को भांप लिया तथा कूटनैतिक वार्ता करता रहा और जर्मनी से भी मैत्री रखे रहा। युद्ध में मुख्यत: भारतीय सैनिकों की सहायता से धुरी राष्ट्रों के विरूद्ध कथित मित्र राष्ट्रों को सफलता मिली और उन्होंने तुर्की को अनेक छोटे-छोटे नेशन स्टेट में बांट दिया तथा जर्मनी को भी खंडित करने का प्रयास करने लगे। अंतत: द्वितीय महायुद्ध में पुन: जीतकर वे जर्मनी को बांटने में सफल ही हो गये। स्पष्ट रूप से यह अपने सभी संभावित प्रतिस्पर्धियों को खंडित और कमजोर करने की इंग्लैंड, फ्रांस और संयुक्त राज्य अमेरिका के शासकों की रणनीति थी। यद्यपि इन तीनों ही नेशन-स्टेट में शासकों के प्रतिस्पर्धी और विरोधी शक्तिशाली समूह सक्रिय थे। परंतु युद्ध के परिवेश में उन सबको दबाना और अपनी-अपनी राष्ट्रीयता की बात करते हुये ऐसा करना सुगम हो गया। ईसाई शासक आपस में भीषण युद्ध और छल कपट करते रहे।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>रूसी कम्युनिस्टों को इंग्लैंड फ्रांस ने सत्ता में बिठाया</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">कथित मित्रराष्ट्रों के गुट ने स्वयं यूरोप में अनेक नेशन स्टेट खड़े किये। 2 करोड़ 20 लाख सैनिकों की इन दोनों युद्धों में मृत्यु हुई और नवोदित नेशन स्टेट जर्मनी, पुराने आस्ट्रिया-हंगरी राज्य और तुर्की का राज्य (जिसका नाम बिगाडक़र कथित मित्रराष्ट्र उस राज्य के शासक उस्मान-वंश को अपने यहाँ के एक शासक ऑटो से सादृश्य दिखाने के लिये ऑटोमन राज्य कहने लगे। नाम बिगाडऩा भी इनकी सुपरिचित रणनीति रही है।) अनेक नेशन स्टेट्स में बांट दिया। साथ ही स्वयं रूस में गृहयुद्ध भडक़ाकर वहाँ ईसाई शासक जार को उखाड़ फेंकने में लेनिन और स्तालिन की सहायता की गई और विश्व का पहला कम्युनिस्ट राज्य इंग्लैंड, फ्रांस और संयुक्त राज्य अमेरिका के सहयोग से खड़ा हुआ। संयुक्त राज्य अमेरिका ने संपूर्ण विश्व में अमेरिकीकरण की नीति अपनाई और लेनिन तथा स्तालिन ने सम्पूर्ण विश्व में सोवियत प्रभाव फैलाने तथा लेनिनीकरण और स्तालिनीकरण की नीति अपनाई। इस प्रकार इनकी मैत्री प्रतिस्पर्धा में बदल गई। पूंजीवादी साम्राज्यवाद के समानान्तर लेनिन और स्तालिन ने कम्युनिस्ट साम्राज्यवाद को बढ़ाया। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>मुहम्मद साहब के वंश का अरब में प्रभुत्व समाप्त कर दिया</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">तुर्की के पराभव और विखंडन के लिये यूगोस्लाविया, अल्बानिया, बोस्निया, बल्गारिया, मकदूनिया, यवन राज्य (ग्रीस), सर्बिया, रोमानिया, इटली, स्लोवेनिया तथा क्रोशिया राज्यों को बाल्कन राज्य कहकर तुर्की के विरूद्ध खड़ा किया गया और अनेक नये राष्ट्र राज्य इनके खंडन-विखंडन से खड़े किये गये। <br />दूसरी ओर स्वयं तुर्की को विखंडित कर एक छोटे से वहाबी जागीरदार को सऊदी अरब नामक एक नये नेशन स्टेट का स्वामी बना दिया गया और कुरैश अरबों का अरब से स्वामित्व समाप्त कर दिया गया। इस प्रकार इस्लाम के प्रवर्तक पैगंबर मुहम्मद साहब के वंश का प्रभुत्व ही अरब क्षेत्र में समाप्त कर दिया। जिन तुर्कों से पहले दोस्ती की थी, उनको ही समूल नष्ट करने की चालें इंग्लैंड और फ्रांस ने चलीं। कुवैत, बहरीन, कतर, संयुक्त अरब अमीरात, यमन, ओमान, सीरिया, लेबनान आदि अनेक नये नेशन स्टेट बना दिये गये। पोलैंड, चेकोस्लाविया, यूगोस्लाविया, लिथुवानिया, लाटबिया, हंगरी, आर्मिनिया, यूक्रेन आदि अनेक नये नेशन स्टेट्स का पूर्वी यूरोप में गठन किया गया। इसी क्रम में भारत राष्ट्र के वीर सैनिकों की शक्ति दोनों महायुद्धों में अपने पक्ष में काम में लाने के बाद भविष्य में उसकी शक्ति से आशंकित होकर भारत राष्ट्र का भी विखंडन सुनिश्चित किया गया। </h5>
<h5 style="text-align:justify;">भारत राष्ट्र के उत्तरी हिस्से के पांच राज्य तुर्कमेनिस्तान, कजाकिस्तान, ताजकिस्तान, अजरबेजान, किर्गिजिस्तान को 20वीं शताब्दी ईस्वी के पूर्वाद्र्ध में ही अपने लिये अगम्य पाकर इंग्लैंड ने लेनिन और स्तालिन के हवाले कर दिया था। शेष बचे भारत में से अफगानिस्तान को भी 1922 ईस्वी में ही एक अलग रियासत बना दिया। बाकी हिस्से को और विखंडित करने के लिये योजना बनाई गई तथा पूर्व और पश्चिम दोनों हिस्सों के खाद्यान्न, मेवे तथा खनिज आदि बहुमूल्य सम्पदाओं वाले हिस्सों को अलग करने की रणनीति बनी और इसके लिये योजना पूर्वक हिन्दू-मुस्लिम टकराहटों को पराकाष्ठा तक ले जाया गया और पूर्वी तथा पश्चिमी पाकिस्तान बना दिये गये। यह मूल रूप से इंग्लैंड, फ्रांस और संयुक्त राज्य अमेरिका की योजना के अनुसार हुआ और गांधी जी, नेहरूजी तथा जिन्ना का चतुराई भरा उपयोग किया गया। योजना के मूल स्वरूप को ढँकने के लिये इसे मुस्लिम अलगाववाद के रूप में प्रस्तुत किया गया। जबकि वास्तविक मुस्लिम बहुलता वाले इलाके - उत्तर प्रदेश तथा अन्य हिस्सों को यथावत रहने दिया गया। पूर्व तथा पश्चिम में जिन इलाकों को मजहबी राज्य बनाया गया, वहाँ 15 अगस्त 1947 ईस्वी तक बहुत बड़ी संख्या में मंदिर, तीर्थस्थल संस्कृत और हिन्दू धर्म के बड़े केन्द्र तथा हिन्दू जनसंख्या विद्यमान थी। जिससे स्पष्ट है कि मुस्लिम मजहबी उन्माद का केवल आवरण था और मूल रणनीति कथित मित्र राष्ट्रों की थी। इस प्रकार ये नेशन स्टेट बने हैं।  </h5>]]></content:encoded>
                
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                                            <category>राष्ट्र-चिंतन</category>
                                            <category>2024</category>
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                <pubDate>Sun, 01 Dec 2024 18:51:48 +0530</pubDate>
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                <title>'पतंजलि व्हे परफॉर्मेंस' Patanjali Whey Performance  माँसपेशियों के लिए संपूर्ण आहार</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">डॉ. रश्मि अतुल जोशी<br />साइंटिस्ट-सी, पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन, हरिद्वार</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3731/patanjali-whey-performance"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-09/gfhfg.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">    आज की व्यस्त जीवन शैली, खान-पान की खराब आदतें एवं चारों ओर उपस्थित दूषित पर्यावरण, मनुष्यों को कई प्रकार से शारीरिक एवं मानसिक रूप से कमजोर कर रहा है। चाहे ग्रामीण परिवेश हो या शहरी, बच्चे, युवा, वृद्ध, हर मनुष्य अपनी नियमित दिनचर्या एवं संतुलित आहार को कहीं पीछे छोड़ता जा रहा है। संतुलित आहार ही स्वस्थ शरीर एवं मन का मूल आधार है। असंतुलित आहार को पूर्ण रूप से संतुलित करने हेतु मनुष्य अपने नियमित भोजन के अलावा विभिन्न प्रकार के पदार्थ, जैसे कुछ जड़ी-बूटीयाँ, जैव किण्वित विटामिन, विभिन्न अमिनो ऐसिड (amino acid) इत्यादि के सेवन को अपनी दिनचर्या में भोजन के साथ अथवा किसी अन्य सुविधाजनक समय में ग्रहण करता है। हर उम्र का मनुष्य इन प्राकृतिक पदार्थों से अपने स्वास्थ्य लाभ की ओर अग्रसर होता है। ‘सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे संतु निरामया’ इस मूल मंत्र को पतंजलि की ‘न्यूट्रिला स्पोर्टस’ यर्थाथ रूप से व्यक्त करती है। मनुष्य के पूर्ण संतुलित भोजन में प्रोटीन (protein) जिसे हम body building food के नाम से भी जानते हैं का प्रमुख योगदान है क्योंकि इसके द्वारा शरीर को सही शक्ति एवं विकास मिलता है। इसकी मात्रा (Recommended Dietary Allowance RDA) विभिन्न आयुवर्ग, कार्यक्षमता, पुरुष व स्त्रियों में तय मानकों से निर्धारित की गई है, पर प्रमुखत: 0.8 ग्राम/किलोग्राम साधारण रूप से तय किया गया है। शरीर में प्रोटीन के द्वारा विभिन्न कार्य जैसे शारीरिक संरचना का गठन, विभिन्न हार्मोन को बनाना, शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना, विभिन्न जैव रसायनिक प्रक्रियाओं को पूर्ण करना इत्यादि होता है। एक ग्राम प्रोटीन लगभग 4 कैलोरी उर्जा प्रदान करता है। यह प्रोटीन विभिन्न दाल (उड़द, मूँग, राजमा, सोयाबीन इत्यादि), पनीर, दूध, बादाम, अखरोट, अलसी, ब्रोकली, पालक, मूँगफली, सूरजमुखी के बीज, चिया सीड, फ्लेक्स सीड में बहुतायत से पाया जाता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong>पतंजलि व्हे परफॉर्मेंस </strong></span><br /><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong>(Patanjali Whey Performance)</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">‘व्हे प्रोटीन’ (Whey protein) क्या है? ‘व्हे प्रोटीन’ मूल रूप से प्राकृतिक दूध एवं दुग्ध उत्पादों में पाया जाता है एवं प्रमुखत: पनीर बनाते समय दूध से अलग हो जाता है। इसमें मुख्य रूप से beta-lactoglobulin, alpha-lactalbumin, bovine serum albumin एवं immunoglobulins का मिश्रण होता है। इसे प्राय: सम्पूर्ण प्रोटीन माना जाता है क्योंकि इसमें सभी essential amino acids (जो शरीर में नहीं बनते पर शरीर के लिए जरूरी होते हैं) पाए जाते हैं। leucine (branched amino acid भी पाया जाता है जो माँसपेशियों के बनने (muscle synthesis) के लिए अति आवश्यक माना जाता है। इसमें उपलब्ध अन्य branched chain amino acids मानव शरीर में glutathione का स्तर बढ़ाने में सहायक होते हैं जो कि ऊतक निर्माण और मरम्मत, शरीर में आवश्यक रसायन और प्रोटीन बनाने और प्रतिरक्षा प्रणाली के कार्य में शामिल हैं। इसके द्वारा शारीरिक विकास पूर्ण रूप से हो पाता है क्योंकि इसका सीधा असर माँसपेशियों पर पड़ता है। इसमें lactose की मात्रा कम होती है। विभिन्न शोधकर्ताओं ने व्हे प्रोटीन को कोलेस्ट्रॉल कम करने वाला, वजन घटाने वाला, प्रतिरोधक क्षमता में सुधार करने में उपयुक्त, उच्च रक्ताचाप एवं हृदय रोगों को क्षीण करने हेतु अत्यंत उपयोगी बताया गया है। नवीन शोधों में इसकी कैंसर प्रतिरोधक क्षमता का भी विवरण प्राप्त होता है इसके अलावा ये HIV से लडऩे, कॉटीसोल (cortisol) को कम करने, दिमाग में serotonin (सिरोटॉनिन) के स्तर को बढ़ाने में सहायक है। सेरोटोनिन मनुष्य  की नींद, पाचन, मतली, घाव भरने, हड्डियों के स्वास्थ्य, रक्त के थक्के जमने जैसे शारीरिक कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।<br />संतुलित प्राकृतिक एवं स्वस्थ पोषण हेतु पतंजलि के द्वारा निर्मित ‘न्यूट्रेला न्यूट्रस्युटिकल’ की श्रेणी में ‘पतंजलि व्हे परफॉर्मेंस’ एक उच्चतर श्रेणी dietary/nutrition supplement है। यह आवश्यक पोषक तत्वों से बना वैज्ञानिक रूप से, आयुर्वेदिक सिद्धातों के परिपेक्ष में प्राकृतिक शाकाहारी न्यूट्रस्युटिकल’ है। स्वाद बढ़ाने हेतु पतंजलि ‘व्हे परफॉर्मेंस’ फे्रंच वनिला, मलाई कुल्फी एवं चाकलेट के स्वाद (flavour) में उपलब्ध किया गया है जो कि ‘सेहत के साथ स्वाद’ को यर्थाथ रूप से दर्शाता है, क्योंकि स्वाद के साथ सेहत बहुत ही कम पदार्थ में प्राप्त होती है। ‘पतंजलि व्हे परफॉर्मेंस’ में व्हे प्रोटीन कॉस्ट्रेट (Whey protein concentrate) एवं व्हे प्रोटीन आइसोलेट (Whey protein isolate) का प्रयोग किया गया है जिसमें कम वसा एवं कम शर्करा (carbohydrate) होते हैं एवं प्रोटीन की मात्रा 90% तक होती है। इसमें अप्राकृतिक रूप से किसी भी शर्करा का उपयोग नहीं किया गया है। यह gluten व Zero trans fat रहित भी है। Gluten न होने के कारण यह celiac बीमारी से ग्रसित व्यक्तियों के लिए भी पूर्ण पोषण प्रदान करता है। इसके 30 ग्राम में लगभग 24 ग्राम प्रोटीन जिसमें 5.5 g branched chain amino acids एवं 4.2g  ग्लूटामाइन (glutamine) के साथ 12 आवश्यक अमीनो एसिड,साथ 11 जैव किण्वित विटामिन, 17 प्राकृतिक जड़ी-बूटीयाँ, जैसे- सोया (Glycine max (L.) Merr), जिंको (Ginko biloba), अश्वगंधा (Withania somnifera (L.) Dunal) मूसली (Chlorophytum borivilianum Santapaux R. R. Fern.), हडजोड (Cissus quadrangularis L.), रोज हिप (Rosa canina L.), पालक ((Spinacia oleracea L.) इत्यादि, का समावेश है। इसके प्रोटीन पाउडर की लगभग 100 ग्राम मात्रा लगभग 392 kcal उर्जा प्राप्त होती है।<br /><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong>Nutritional information</strong></span><br /><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-09/gfhfg.jpg" alt="gfhfg" width="566" height="432"></img></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong>उत्पाद के लाभ</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">मनुष्य के शरीर में जब पाचन प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है तब आवश्यक एमिनो एसिड्स शरीर की कोशिकाओं (Cell) में अवशोषित हो जाते है, जिसके फलस्वरूप वो इन कोशिकाओं में प्रोटीन संश्लेषण (protein synthesis ) को बढ़ावा देते हैं और उनके विकास में मदद करते हैं, इस प्रकार से यह ‘व्हे प्रोटीन’ सबके लिए एक आवश्यक पूरक बनाता है। यह केवल एक प्रोटीन सप्लीमेंट नहीं है अपितु यह स्वास्थ्य लाभ करने हेतु पूर्ण रूप से आधुनिक पोषण विज्ञान एवं आयुर्वेदिक सिद्धातों का समावेश किया हुआ एक प्रभावशाली पदार्थ है। इसमें उपलब्ध जैविक एन्जाइम पाचन क्रिया के बाद पोषक तत्वों को जल्दी अवशोषित करने में सहायक होते है। इस पतंजलि ‘व्हेपरफॉर्मेंस’ के प्रयोग से माँसपेशियों का पूर्ण विकास, प्रतिरोधक क्षमता में सुधार, माँसपेशियों में अत्याधिक थकान या दर्द, वजन कम करना इत्यादि का पूर्ण लाभ मिलता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong>प्रस्तावित दैनिक खुराक/मात्रा</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">प्रत्येक आयुवर्ग का व्यक्ति इस न्यूट्रास्युटिकल (health supplement) से लाभ प्राप्त कर सकता है। इस प्राकृतिक पोषक फार्मूलेशन को समय की माँग अनुसार विभिन्न स्वाद में रखा गया है। इसको उपयोग करने हेतु सर्वप्रथम आधा चम्मच (15 ग्राम) को 100 मि.ली. ठण्डे पानी में घोलकर पहले पाँच दिन पीना चाहिये। उसके बाद नियमित रूप से एक चम्मच (30 ग्राम) 200 मि.ली. पानी में घोलकर लेना चाहिये। आप चाहे तो इस प्रोटीन को अपने स्वादनुसार स्मूदी, ओट्स इत्यादि में भी मिलाकर ले सकते हैं। जिस प्रकार हर सिक्के के दो पहलू होते हैं उसी प्रकार अत्यंत लाभ के साथ, इसकी अधिक मात्रा को ग्रहण करना थोड़ा हानिकारक भी हो सकता है जैसे कि जिन मनुष्यों को दूध से एलर्जी है, वे इसका प्रयोग न करें। गर्भवती महिलाओं एवं स्तनपान कराने वाली माताओं को भी कम मात्रा में इसका सेवन करना चाहिये। आवश्यकतानुसार, उचित मात्रा में इस ‘पतंजलि व्हे परफॉर्मेंस’ के सेवन से आप पूर्ण रूप से शाकाहारी, आयुर्वेदिक सिद्धांतो के अनुसार तैयार किए गए एक प्रभावी न्यूट्रास्युटिकल के द्वारा अपने शारीरिक व मानसिक विकास को बल देने में सक्षम हो पाते हैं।</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पतंजलि रिसर्च</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>दिसम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Dec 2024 18:49:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>‘‘भारतीय शिक्षा बोर्ड’’</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;">वंदना बरनवाल  राज्य प्रभारी<br />महिला पतंजलि योग समिति - उ.प्र. (मध्य)</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3732/bhartiya-shiksha-board"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-09/1718979289110.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">    भौतिक विकास की आवश्यकताओं ने विश्व भर में समय के साथ-साथ शिक्षा के उद्देश्यों और उसके पाठ्यक्रम में भी बदलाव किया है। इस बदलाव से भारत भी अछूता नहीं है। पर इन बदलावों के बीच हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत में वैदिक काल से ही शिक्षा का उद्देश्य केवल भौतिक या बाहरी विकास ही नहीं बल्कि चारित्रिक और आतंरिक विकास भी रहा है। ब्रिटिश शासनकाल में भारतीय शिक्षा में मैकाले की सोच ने जो जहर घोला उसने भारतीय शिक्षा के दोनों ही उद्देश्यों को गहरा आघात पहुँचाया और स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद एक बहुत बड़ा भ्रम हम सभी के मन में डाला गया कि अंग्रेज नहीं आते तो इस देश में सबको शिक्षा नहीं मिलती। अंग्रेजों के आने से पहले भारत में लगभग सौ प्रतिशत साक्षरता थी पर जानबूझकर नैरेटिव गढ़ा गया कि देश एक ऐसी वर्ण व्यवस्था में विभाजित था कि कुछ लोगों के हाथ में पूरी की पूरी विद्या और शिक्षा थी और बाकी के लोगों को पढऩे नहीं दिया जाता था। यह नैरेटिव स्वतंत्रता के सतहत्तर वर्षों बाद आज भी विद्यमान है क्योंकि राजनीति के लिए यह कारगर टूल है। जबकि सत्य तो यह है कि लगभग 100 प्रतिशत की साक्षरता वाले भारत के लोगों को अंग्रेजों ने निरक्षर कर दिया और 1947 में जब देश स्वतंत्र हुआ तो उस समय इस देश की साक्षरता मात्र 18 प्रतिशत रह गयी। यानि 82 प्रतिशत भारतीयों को निरक्षर करने का काम जिन अंग्रेजों ने किया उनको कुछ लोग धन्यवाद देते नहीं थकते कि अगर अंग्रेज भारत नहीं आते तो भारतीय अनपढ़ रह जाते।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>उत्कृष्टता की ऊँची विरासत </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">जब जब भारतीय शिक्षा और संस्कृति की बात आती है तो हम सभी नालंदा और तक्षशिला जैसी संस्थाओं के अतीत का जिक्र करना नहीं भूलते। इन शिक्षण संस्थाओं का जिक्र करते हुए हमें वैदिक काल से चली आ रही अपनी शैक्षणिक उत्कृष्टता की ऊंची विरासत पर गर्व महसूस होता है। यह गर्व हो भी क्यों ना, भारत में तो हर युग में शिक्षा और शिक्षा की व्यवस्था अत्यंत उच्च कोटि की रही है। गुरुकुल शिक्षा प्रणाली एवं गुरु-शिष्य परम्परा का गौरवशाली इतिहास तो युगों-युगों से चला आ रहा है। अगर त्रेतायुग में स्वयं भगवान राम ने अपने भाइयों के साथ ऋषि वशिष्ठ जी के गुरुकुल में रहकर शिक्षा प्राप्त की थी तो द्वापर में श्रीकृष्ण, बलराम व सुदामा संग महर्षि संदीपनि के गुरुकुल से शिक्षा प्राप्त करने गए। गुरु के सानिध्य में शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थी गुरु के कुल के हो जाते थे और शिक्षा का वह स्थान गुरुकुल कहलाता था। इसीलिए गुरुकुल को गुरु का परिवार और गुरु के वंश की तरह देखते थे। धौम्य ऋषि, च्यवन ऋषि, गुरु द्रोणाचार्य, संदीपनि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, बाल्मीकि, गौतम, भारद्वाज आदि अनेकों ऋषियों के आश्रम अपनी अपनी विशेषताओं के कारण प्रसिद्ध रहे। बौद्धकाल में भी बुद्ध, महावीर और शंकराचार्य की परंपरा से जुड़े गुरुकुल प्रसिद्ध हुए जहाँ विश्व भर से मुमुक्षु ज्ञान अर्जित करने आया करते थे। इन सभी गुरुकुलों में गणित, ज्योतिष, खगोल विज्ञान, भौतिक विज्ञान समेत अनेकों विषयों की शिक्षा प्रदान की जाती थी। प्रत्येक गुरुकुल अपनी विशेषता के लिए प्रसिद्ध थे, कोई धनुर्विद्या, अस्त्र शस्त्र सिखाने में कुशल था तो कोई वैदिक ज्ञान, ज्योतिष और खगोल विज्ञान में दक्ष था। इन गुरुकुलों की विशेषता वैसी ही थी जैसे कि आजकल उच्च शिक्षा के लिए इंजीनियरिंग, कॉमर्स, आर्ट्स, मेडिकल, प्रबंधन आदि कॉलेज होते हैं। यह शिक्षा महिला पुरुष सभी के लिए सामान रूप से थी। शास्त्रार्थ में निपुण महान विदुषी गार्गी, मैत्रेयी, विद्योत्मा और आदि गुरु शंकराचार्य जिन्होंने 42 दिनों तक चले शास्त्रार्थ में मंडल मिश्र को भी निरुत्तर कर दिया, उनकी पत्नी उदय भारती देवी आदि सर्व भारतीय शिक्षा के चंद उदाहरण हैं।   </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>जीवन मूल्यों में संवेदनहीनता </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">अपनी विशिष्टताओं से पूरे विश्व को आकर्षित करने वाली हमारी अद्भुत शिक्षा व्यवस्था को लम्बी गुलामी के दौर ने निगल लिया और रही सही कसर स्वतंत्रता पश्चात की अनदेखी ने पूरी कर दी। शिक्षा में सुधार और आधुनिकीकरण की कोशिशें तो हुईं परन्तु हमारी विशिष्टता हमसे छीन गयी और शिक्षा में अंग्रेजियत की मिलावट ने भारतीय मूल्यों को निगल लिया। परिणामत: आज हम सभी पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय मूल्यों में गिरावट की चुनौतियों से जूझ रहे हैं। ऐसे में यदि हमें इन चुनौतियों से पार पाना है तो हमें वर्तमान शिक्षा व्यवस्था के सामानान्तर में वैदिक युग की शिक्षा विशिष्टताओं को फिर से अपनाना होगा। आज हर माता-पिता अपने बच्चे को आईएएस, डॉक्टर, इंजिनियर, उद्योगपति आदि बनाने के स्वप्न देख रहे हैं। ऐसी ही आकांक्षाओं के साथ हर वर्ष वे बच्चों के साथ स्वयं भी किसी ना किसी प्रतियोगी परीक्षा का सामना करते ही रहते हैं। कुछ बच्चे और उनके माता-पिता इन परीक्षाओं को भले ही उत्तीर्ण कर पा रहे हों पर जीवन के अनेकों क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें एक परिवार और समाज के तौर पर ज्यादातर लोग अनुत्तीर्ण हो रहे हैं। आज बच्चे पढ़ लिखकर नौकरी व्यवसाय एवं विवाह के लक्ष्य को हासिल कर अपने परिवार में व्यस्त हो जाने को ही सफलता मान चुके हैं। ऐसे में माता-पिता का ख्याल भी उन्हें नहीं रहता नतीजतन वृद्ध आश्रमों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। ऐसे भी कई घटनाएं पढऩे में आती हैं कि नौकरी की तलाश में विदेश गए बच्चे अपने माता-पिता के अंतिम संस्कार में भी नहीं आना चाहते। आखिर जीवन मूल्यों में इतनी संवेदनहीनता कहाँ से आ रही और यह हमें कहाँ ले जाएगी। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>मूल्य शिक्षा के प्रति संकोच भाव क्यों</strong></span> </h5>
<h5 style="text-align:justify;">इस बात को तो सभी स्वीकारते हैं कि वर्तमान समय में शिक्षा में मानवीय मूल्यों की निरंतर कमी होती जा रही है। आज के बच्चों पर ही कल परिवार, समाज और देश का उत्तरदायित्व आना है। यदि उनमें ही मूल्यों का अभाव रहेगा तो उनसे यह कैसे आशा की जा सकेगी कि वे अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान बनें। संवेदन शून्य व्यक्ति से कर्तव्य बोध की आशा तो नहीं की जा सकती है। वर्तमान पीढ़ी का भारतीय मूल्यों से विमुख होने से सरकार, शिक्षाविद और अभिभावक सभी चिंतित तो दिखलाई पड़ते हैं परन्तु मूल्य शिक्षा लागू करने के प्रति कितने लोगों में जिम्मेदारी का भाव है। पढऩे पढ़ाने के लिए पाठ्यक्रम कैसा भी हो, शिक्षा के नाम पर स्कूल में बस उतना ही बताया जा रहा जितने से परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों का उत्तर लिखा जा सके और शिक्षित होने का प्रमाण पत्र हासिल हो जाये। इसका असर प्राथमिक कक्षा में पढ़ रहे बच्चे से लेकर पीएचडी कर रहे लोगों तक पर देखा जा सकता है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने, धरती माँ को प्रणाम करने, माता पिता का चरण स्पर्श करने, सूर्य को अर्ग देने, जमीन पर बैठ कर भोजन करने आदि मूलभूत क्रियाओं और उनके पीछे के सनातन विज्ञान से बच्चों को कितने कान्वेंट स्कूल परिचित करवाते हैं। एक समय था जब संयुक्त परिवारों में ऐसी शिक्षाएं स्वत: ही मिल जाती थीं, पर अब संयुक्त परिवार टूटकर एकाकी परिवार बल्कि उससे भी आगे नैनो परिवार का स्वरूप ले चुके हैं। परिवारों में बड़े-बुजुर्गों का स्थान मजबूरी का होता जा रहा है जबकि पहले यही बड़े बुजुर्ग बच्चों को किस्सों और कहानियों और अपनी दिनचर्या से नैतिक व आध्यात्मिक शिक्षा भी देते थे। आज दादी, नानी की कहानियों का स्थान टीवी, मोबाइल, सोशल मीडिया, इन्टरनेट और ओटीटी प्लेटफार्म ने छीन लिया है। इन प्लेटफॉर्म से नैतिक और धार्मिक मूल्यों की बात करना या मानवीय मूल्यों की शिक्षा की अपेक्षा रखना बेमानी है। यह स्थिति बेहद खराब और समाज में बिखराव की स्थिति पैदा करने वाली है क्योंकि संवाद के इन डिजिटल प्लेटफार्म पर मिलने वाली सामग्री की गुणवत्ता हर दिन गिरती ही जा रही है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-09/dji_0131new.jpg" alt="DJI_0131new" width="900" height="600"></img></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>डिग्री और प्रमाणपत्रों में सिमटी हुई व्यवस्था</strong></span>   </h5>
<h5 style="text-align:justify;">हमें ऐसा लगता है कि आजादी के 77 सालों में भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में काफी तरक्की की है। उच्च शिक्षा की बात करें तो आज देश के कई शहरों में आईआईटी, आईआईएम जैसी जानी मानी संस्थाओं समेत अनेकों इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों की भरमार है। इन संस्थाओं में बच्चे के प्रवेश मात्र से अभिभावक को भी गर्व की अनुभूति होती है। प्राथमिक शिक्षा की सुविधाएँ भी बहुत पीछे नहीं हैं बस आपकी जेब में पैसे होने चाहिए। जैसा पैसा वैसा ही स्कूल, उसका भवन और उसके शिक्षक-शिक्षिकाएं। दिखने में धर्मशाला और लॉज से लेकर फाइव स्टार होटल को मात कर देने वाले स्कूल भी उपलब्ध हैं। हर माता-पिता की बस एक चाहत, कैसे भी करके बोर्डिंग वाले स्कूल में ना सही पर अंग्रेजी माध्यम के किसी अच्छे वाले स्कूल में उनके बच्चे का नाम प्रवेश सूची में आ जाये। सुबह-सुबह उनका बच्चा भी सुन्दर सी टाई लगाकर गुड मॉर्निंग बोले और भारी-भरकम स्कूल बैग पीठ पर लादकर टाटा मम्मा बाय-बाय डैडी करे। कहने को आज भारत पंद्रह लाख स्कूलों, चालीस हजार से ज्यादा कॉलेजों और एक हजार से ज्यादा विश्वविद्यालयों वाला शिक्षा तंत्र बन चुका है जो करीब तीस करोड़ छात्रों की जरूरतें पूरी करता है। पर अफसोस कि स्वतंत्रता के 77 सालों बाद भी भारत की शिक्षा व्यवस्था अभी भी डिग्री के मोहपाश में जकड़़ी हुई है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>उम्मीदों को पंख </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">यदि सत्ताएं चाहतीं तो आजादी के बाद उचित फैसले लेकर मैकाले के जिस जहर की हम सभी बात करते हैं उसके दुष्प्रभाव को कम तो किया ही जा सकता था। परन्तु राजनीतिक सत्ता और शिक्षा में वामपंथ की विचारधारा के प्रभाव ने ऐसा होने नहीं दिया। हालात ऐसे पैदा किये गए कि हर माता पिता को इसी शिक्षा व्यवस्था में अपने बच्चे का भविष्य दिखलाई देने लगा। कान्वेंट स्कूल में प्रवेश और अंग्रेजी भाषा में पढ़ाई का ऐसा महिमामंडन किया गया कि आसान सी मातृभाषा और अपनी संस्कृति को छोडक़र लोगों में अंग्रेजियत अपनाने की होड़ लग गई। शिक्षा संस्कार से अलग होकर डिग्री से जुड़ गयी और डिग्री रोजगार से। एक तरफ संस्कार विहीन शिक्षा ने परिवार, समाज और राष्ट्र भावना को आघात पहुंचाया तो दूसरी तरफ डिग्री वाली शिक्षा ने विरासत में मिलने वाले हुनर को छीन लिया। लम्बी गुलामी में क्षीण हो चुके लोगों के हुनर के रक्षण पर विचार करने के स्थान पर समाज को आरक्षण में उलझा दिया गया। परिणाम सबके समक्ष है। परिवार और समाज तो बिखराव का सामना कर ही रहे हैं भारत तेरे टुकड़े होंगे और सनातन को बीमारी बताने वाले लोग भी पैदा हो रहे हैं। शिक्षा में आये ऐसे दोषों को दूर करने की आवश्यकता थी और इसकी उम्मीद जगी वर्ष 2020 में जब नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनी। बदलाव की उम्मीद को और पंख लगे वर्ष 2022 जब भारतीय शिक्षा बोर्ड का भी गठन पूर्ण हुआ।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>शिक्षा के मूल्यों के पुनस्र्थापना का बोर्ड</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">भारतीय शिक्षा बोर्ड के बारे में अनेकों बार हम सभी पूज्य गुरुवर, श्रद्धेय आचार्यश्री और आदरणीय नागेंद्र प्रसाद सिंह जी से सुन चुके हैं और बहुत हद तक इससे परिचित भी हो चुके हैं। भले ही इस बोर्ड को अगस्त, 2022 में सरकारी मान्यता मिली हो परन्तु इसके विचारों की नींव तो पूज्य स्वामी जी ने वर्षों पहले पतंजलि योगपीठ की स्थापना और भारत स्वाभिमान आन्दोलन के समय ही रख दी थी जब उन्होंने पांच राष्ट्रीय भ्रम, पांच राष्ट्रीय सामाजिक आंदोलन और अपनी पांच प्रतिज्ञाओं को दुनिया के समक्ष बार-बार दोहराया था। योग और आयुर्वेद के माध्यम से स्वास्थ्य की क्रांति लाने वाले पूज्य स्वामी जी इस सत्य से परिचित थे कि जब तक राजनितिक सत्ता में परिवर्तन नहीं होता तब तक शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन संभव नहीं। वर्ष 2014 में राजनीतिक सत्ता के परिवर्तन में ऋषि परम्पराओं के अनुरूप अग्रणी भूमिका निभाने के पश्चात वर्ष 2015 उन्होंने सरकार के समक्ष नए शिक्षा बोर्ड के गठन का प्रस्ताव रख दिया जो कि कुछ आपत्तियों के कारण स्वीकार नहीं हुई और 2016 में खारिज कर दी गयी। पूज्य स्वामी जी ने अपने भागीरथ प्रयासों से वर्ष 2022 में भारतीय शिक्षा बोर्ड को सरकारी मान्यता दिला ही दी। इस प्रकार वर्ष 2022 और पूज्य स्वामी जी के प्रयास, भारतीय शिक्षा के मूल्यों की पुनस्र्थापना के लिए सदियों तक याद रखे जायेंगे। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>अतुलनीय भारत से साक्षात्कार </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">परम पूज्य गुरुवर के अथक प्रयासों से भारतीय शिक्षा बोर्ड का गठन तो हो चुका है और अब अगली चुनौती विभिन्न स्कूलों को इससे जोडऩे से लेकर, योग्य शिक्षकों की तलाश एवं संसाधनों का एकत्रीकरण है। पर इससे भी बड़ी चुनौती समाज के बुद्धिजीवी और सक्षम वर्ग के साथ साथ बच्चों के माता-पिता तक इस संदेश को पहुँचाना है कि वे सभी स्वयं आगे आयें जिससे इस बोर्ड के प्रति सकारात्मक माहौल बन सके। हो सकता है नयी संस्कृति एवं नयी शिक्षा व्यवस्था से पढक़र निकले एवं पढ़े-लिखे होने का बोध रखने वाले कुछ शिक्षितों को भारतीय शिक्षा बोर्ड का भविष्य अभी उज्जवल ना दिखे, पर उन्हें यह विश्वास दिलाना होगा कि आने वाला कल इसी का है। भारतीय शिक्षा बोर्ड समय की पुकार है और परिवार एवं वर्तमान समाज की सर्व समस्याओं का समाधान भी है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;">अत: आइये हम सभी यह संकल्प लें कि हम पूरी उर्जा और सकारात्मक भाव से इस अभियान से स्वयं भी जुड़ेंगे और शिक्षण संस्थानों और अभिभावकों तक इसकी महत्ता पहुंचाएंगे। जिससे भारत के 140 करोड़ लोग भारत की विरासत पर गर्व कर इस अनुष्ठान में अपना हर संभव योगदान दे सकें। पूज्य गुरुवर के सानिध्य में हमने योग, आयुर्वेद और स्वदेशी को जिस प्रकार जन आन्दोलन बनाया, यदि हमने यह प्रण ले लिया तो जब स्वाधीनता की सौवीं वर्षगांठ के समय ही हम विश्वगुरु के यशस्वी भाव को पुन: प्राप्त कर विश्व को नेतृत्व देने की स्थिति में आ जायेंगे। फि़लहाल तो यह बोर्ड अति शैशवावस्था में है पर इतना तो तय है कि आने वाले कल में यही भारतीय शिक्षा बोर्ड पूरे विश्व को अतुलनीय भारत से साक्षात्कार करवाएगा।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>थोडा आत्ममंथन सभी करें</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">आईआईटी, ट्रिपल आईआईटी, एनआईटी जैसे संस्थान तकनीक के क्षेत्र में इस देश के रत्न के समान हैं जिनमें प्रवेश पाना आसान नहीं होता। लाखों लोग हर वर्ष प्रवेश के लिए प्रयत्न करते हैं। पर यह आश्चर्य किन्तु सत्य है कि चंद्रयान और मंगल मिशन जिसकी सफलता में इसरो के 3600 वैज्ञानिक सीधे और 5 से 6 हजार लोग अप्रत्यक्ष रूप से लगे थे उनमें से कोई भी इन जाने-माने तकनीकी संस्थान से नहीं था। बड़े गर्व से हम कहते फिरते हैं कि अंतरिक्ष में शोध करने वाली विश्व में आज जो दो सबसे बड़ी संस्थाएं हैं उनमें अमेरिका की संस्था नासा और भारत की संस्था इसरो है। हमें इसका भी गर्व होता है कि अमेरिकी संस्थान नासा में 36 प्रतिशत भारतीय मूल के वैज्ञानिक हैं पर इसरो में एक भी अमेरिकी नहीं काम करता, हम इस पर मंथन नहीं करते। यही नहीं वर्तमान में अमेरिका में 38 प्रतिशत डॉक्टर और तमाम दिग्गज कंपनियों के सीईओ भी ऐसे भारतीय हैं जिनकी शिक्षा भारत में हुई है। अनेकों दिग्गज विदेशी कंपनियों के बड़े हिस्से को आज भारतीय मेधा संभाल रही है। ऐसे में हमें इस पर भी आत्ममंथन करना होगा कि आखिर हमारी शिक्षा और उससे जुड़ी अन्य व्यवस्था में वह कौन सी खामी रह गई है कि देश की श्रेष्ठ मेधा शिक्षा ग्रहण कर अपने देश की बजाय दूसरे देश की सेवा कर रहे हैं।</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>भारतीय शिक्षा </category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>दिसम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Dec 2024 18:47:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>स्वास्थ्य समाचार</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><strong>भास्कर खास चेतना का उच्चतम स्तर: एमआरआई से अध्ययन में मस्तिष्क पर प्रभाव की पुष्टि</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong>आईआईटी-एम्स ने माना... योग निद्रा से नींद नियंत्रित होती है, मन का भटकाव रुकता है; अभ्यास से इसका असर बढ़ा</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">कई  बड़े योगाचार्य ज्यादा चिंता करने वालों को ध्यान से जुड़े ‘योग निद्रा’ आसन का अभ्यास करने को कहते हैं। सोने व जागने के बीच की इस अवस्था को ‘आध्यात्मिक नींद’ भी कहा जाता है। कई शोध में मानसिक सेहत के लिए इसके खास फायदों को लेकर जानकारी पहले भी आती रही है। हालांकि, अब आईआईटी दिल्ली और दिल्ली एम्स के शोध में भी इसके</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><h5 style="text-align:justify;"><strong>भास्कर खास चेतना का उच्चतम स्तर: एमआरआई से अध्ययन में मस्तिष्क पर प्रभाव की पुष्टि</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);"><strong>आईआईटी-एम्स ने माना... योग निद्रा से नींद नियंत्रित होती है, मन का भटकाव रुकता है; अभ्यास से इसका असर बढ़ा</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">कई  बड़े योगाचार्य ज्यादा चिंता करने वालों को ध्यान से जुड़े ‘योग निद्रा’ आसन का अभ्यास करने को कहते हैं। सोने व जागने के बीच की इस अवस्था को ‘आध्यात्मिक नींद’ भी कहा जाता है। कई शोध में मानसिक सेहत के लिए इसके खास फायदों को लेकर जानकारी पहले भी आती रही है। हालांकि, अब आईआईटी दिल्ली और दिल्ली एम्स के शोध में भी इसके मस्तिष्क पर पडऩे वाले प्रभावों की पुष्टि हुई है।<br />आईआईटी, एम्स और महाजन इमेजिंग के एमआरआई के जरिए हुए इस अध्ययन में यह पुष्टि हुई है कि ‘योग निद्रा’ आराम के गहरे अहसास (गहन विश्राम) और चेतना के उच्चतम स्तर पर ले जाती है। इसके अभ्यास से मन के भटकने और नींद नियंत्रित करने की क्षमता बढ़ी। इतना ही नहीं, जिन प्रतिभागियों ने ज्यादा वक्त तक ध्यान व योगाभ्यास किया था, योग निद्रा के दौरान उनके मस्तिष्क की गतिविधियों में अधिक परिवर्तन दिखे। यानी वे मन का भटकाव कम करने में ज्यादा सफल रहे। अध्ययन से जुड़े आईआईटी दिल्ली के प्रो. राहुल गर्ग कहते हैं कि योग निद्रा गहरे अवचेतन मन में दबे संस्कारों को सतह पर लाने और अंतत: उन्हें मुक्त करने में मदद करती है। इससे सेहत सुधरती है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>मस्तिष्क व विश्राम की मुद्रा में है खास संबंध</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">अध्ययन के लिए दो समूह बनाए गए थे। एक में 30 ऐसे लोग थे जिनके पास कम से कम 3 हजार घंटों के योग का अनुभव था। दूसरे समूह में 31 नए लोग थे। अध्ययन के दौरान मस्तिष्क संचार पैटर्न के अंतर से यह समझने में मदद मिली कि योग निद्रा हमारे मस्तिष्क को कैसे नियंत्रित करती है। टीम से जुड़े डॉ. वैभव त्रिपाठी कहते हैं कि यह अध्ययन ध्यान करने की क्षमता को मापने और अपने ध्यान अभ्यास की गहराई को ट्रैक करने में मदद कर सकता है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>योग निद्रा का अभ्यास... धीरे-धीरे समय बढ़ाएं</strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>शवासन में लेट जाएं।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>आंखें बंद करें और अपनी श्वास को स्वाभाविक रहने दें।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>अपने दिमाग को अपने शरीर के अंगों पर घुमाएं। </h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>सिर के ऊपर, माथा, भौंहें, आंखें, कान, गाल, नथुने, होंठ, ठुड्डी, गर्दन, छाती, और पेट पर 3-3 सेकंड ध्यान केंद्रित करें। </h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>पीछे की ओर दाहिनी पीठ, बाई पीठ, रोड़, कंधे, गर्दन, और सिर पर भी इसी तरह ध्यान केंद्रित करें। </h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>गहरी सांस लें। शरीर में आती स्वस्थ तरंगों को महसूस करें। </h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>धीरे-धीरे बाहरी वातावरण की ओर ध्यान को ले जाएं। </h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>थोड़ी देर बाद दाहिने करवट लेटते हुए, बाई ओर नाक से सांस छोड़ें। इससे शरीर का तापमान सामान्य अवस्था में आ जाएगा। कुछ देर बाद धीरे-धीरे उठकर बैठ जाएं और आंखों को खोलें।</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">साभार : दैनिक भास्कर</h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>हार्ट अटैक से मौत की एक और चौंकाने वाली घटना आयी सामने, फॉर्मासिस्ट की जान गयी</strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(132,63,161);">हार्ट अटैक: अब डरा रहे केस</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">अटैक साइलेंट किलर बनता जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग के फार्मासिस्ट की मौत हार्ट अटैक से हो गई। यह कार खुद ड्राइव करते हुए ड्यूटी पर जा रहे थे। रास्ते में सीने में तेज दर्द उठा, इससे उन्हें कार को साइड में लगाने का मौका मिल गया लेकिन जान बचाने का कोई इंतजाम नहीं कर पाये, कार की सीट पर ही उन्होंने दम तोड़ दिया। प्रयागराज में इस तरह का यह पहला केस नहीं है। अचानक हार्ट अटैक से होने वाली मौतों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। इन घटनाओं से तमाम सवाल खड़े हो रहे हैं लेकिन फिलहाल जवाब पर कोई बात नहीं हो रही है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>कार ड्राइव करते समय फॉर्मासिस्ट को पड़ा दिल का दौरा, ऑन द स्पॉट हुई मौत, संभलने का भी नहीं मिला मौका</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">झुंसी के बदरा सोनौटी गांव के सामने बुधवार की सुबह यह घटना घटी। हंडिया के उपरदहा सीएचसी में तैनात फॉर्मासिस्ट प्रमोद कुमार रोजाना की तरह कार चलाकर ड्यूटी पर जा रहे थे। बदरा सौनोटी के सामने उनके सीने में तेज दर्द होने लगा। उन्होंने कार सडक़ किनारे लगा दी और थोड़ी देर में उनकी जान चली गई। सूचना पर पहुंचे झुंसी एसओ ने बॉडी को कब्जे में लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के अधीक्षक डॉ. सुरेश चंद्र यादव को इसकी सूचना दी। केंद्र अधीक्षक ने बताया कि संत कबीर दास नगर के प्रमोद कुमार (45) रोज अपनी कार ड्राइव करके ड्यूटी पर आते थे। उन्होंने पहले इस तरह की कोई शिकायत भी नहीं बतायी थी।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>हार्ट अटैक से डराने वाली घटनाएं</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>खेलते समय गिरे और जान गई</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">केपी कॉलेज ग्राउंड पर मेजर रंजीत सिंह स्टेडियम 01 में 25 अप्रैल 2024 की मार्निंग बैडमिंटन खेलने पहुंचे खिलाड़ी देव गुलानी की हार्ट अटैक से मौत हो गई थी। वह कीडगंज के रहने वाले थे। कोर्ट पर पहुंचने से पहले उन्होंने रोज की तय एक्सरसाइज भी की थी उनके साथ खिलाड़ी भी कोर्ट पर मौजूद थे। शाट मारते समय वह अचानक कोर्ट पर गिर गये जब तक खिलाड़ी कुछ सोच पाते और उन्हें अस्पताल लेकर पहुंचते वह दम तोड़ चुके थे।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>सोकर उठे और सीने में उठा दर्द</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">बसपा के पूर्व विधायक मुराया सि‌द्दीकी के बड़े बेटे अब्दुल्ला के साथ भी कुछ ऐसी ही घटना हुई। यह महज 36 साल के थे। मार्निंग में सोकर उठे तो एकदम दुरुस्त थे कुछ देर बाद उन्हें सीने में दर्द की शिकायत हुई परिवार के लोग जब तक उन्हें लेकर डॉक्टर के पास पहुंचते यह दम तोड़ चुके थे।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>वकील को मौका ही नहीं मिला</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">ऐसा ही एक चौंकाने वाला मामला हाई कोर्ट में सामने आया अधिवक्ता को यहां बैठे-बैठे अटैक आया, उस समय वहां तमाम लोग मौजूद थे लेकिन जब तक वह कुछ समझ पाते उनके प्राण पखेरू हो चुके थे।<br /><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>बैट्री में पानी डालते समय आया</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">21 नवंबर 2023 की कर्नलगंज में एक बिजली मिस्त्री की बैट्री में पानी डालते समय हार्ट अटैक से मौत हो गई थी। सुनील भारतीय नाम के इस शख्म की लाश नौकरानी ने देखी तो लोगों को सूचित किया।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>दरोगा भी नहीं बच पाये</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">16 जून 2023 को सिविल लाइंस थाने में तैनात दरोगा राजेश पाठक की हार्ट अटैक से मौत हो गई थी। वह सुबह सोकर उठने के बाद स्नान कर रहे थे तभी सीने में तेज दर्द होने से उसकी मौत हो गई।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>डांस करते वक्त चली गई जान</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">एक ऐसी घटना हुई थी जो रातों रात सोशल मीडिया पर वायरल हो गई थी। इस घटना में अपनी साली की शादी की सालगिरह में नाच रहे युवक अमरदीप वर्मा की अचानक मौत हो गई थी। इस घटना का वीडियो काफी वायरल हुआ था। मृतक एक दवा कारोबारी था।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>बचाव के तरीके</strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>समय समय पर हार्ट का चेकअप कराते रहें</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>तले भुने और मसालेदार चीजों से दूरी बनाएं</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>शराब और सिगरेट की लत से छुटकारा पाने की कोशिश करें</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>सुबह टहलें और ओवर एक्सरसाइज से बचें</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>परिवार में अगर हार्ट अटैक की हिस्ट्री है तो डॉक्टर से सलाह लें</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>ब्लड में क्लाटिंग होने की आशंका पर जांच कराएं</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>तेजी से बढ़े मामले</strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>एसआरएन की कार्डियोलाजी विभाग की ओपीडी में दो साल में हार्ट अटैक के मामलों में 30 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>इस दौरान हार्ट अटैक से होने वाली मौतों की संख्या में 25 फीसदी की बढ़त हुई है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>कार की सीट पर ही हो गयी फॉर्मासिस्ट की मौत।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>डॉक्टर्स का कहना है कि मरीजों की उम्र का रेशियो भी कम हुआ है।</h5>
<h5> </h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>30 से 40 साल के युवाओं में भी हार्ट अटैक के मामले आ रहे हैं।</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">एसआरएन अस्पताल प्रयागराज के कार्डियोलाजिस्ट डॉ. मो. शाहिद के अनुसार लाइफ स्टाइल काफी रफ होती जा रही है। मार्निंग वॉक नहीं करना और निमित एक्सरसाइज से दूरी हार्ट अटैक का कारण बन रही है। बाजार में फास्ट फूड का अधिक इस्तेमाल हो रखा है। लोग परंपरागत भोजन से दूरी बना रहे हैं। लक्षणों को लेकर भी लोगों को होशियारी बरतनी चाहिए।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>साभार : अमर उजाला</strong></span><br /> https://www.inextlive.com/uttar-pradesh/allahabad/heart-attack</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>स्वास्थ्य समाचार</category>
                                            <category>2024</category>
                                            <category>दिसम्बर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3733/swasthya-samachar</link>
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                <pubDate>Sun, 01 Dec 2024 18:43:48 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन  ‘आयुर्धन 2024’ का समापन</title>
                                    <description><![CDATA[<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>आयुर्वेद में अस्थमा, गठिया, मधुमेह, कैंसर जैसी कई पुरानी असाध्य बीमारियों का उपचार करने की अद्भुत क्षमता: स्वामी रामदेव</strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>भारत उत्सव, पर्वों का देश है : आचार्य बालकृष्ण</strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">  हरिद्वार, 29 अक्टूबर। पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन और पतंजलि विश्वविद्यालय के सहयोग तथा भारत सरकार के आयुष मंत्रालय द्वारा आयुर्स्वास्थ्य योजना के अंतर्गत ‘आयुर्धन 2024-स्वस्थ भविष्य के लिए आयुर्वेद, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार के सामंजस्य पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन’ विषय पर आयोजित तीन दिवसीय सम्मेलन का समापन पतंजलि विश्वविद्यालय के सभागार में  हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं धन्वंतरि वंदना से किया गया। सम्मेलन में पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी ने कहा कि</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-09/conference-(1).jpg" alt="Conference-(1)" width="800" height="1200" /><br />कार्यक्रम</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3734/three-day-international-conference-%E2%80%98ayurdhan-2024%E2%80%99-concludes"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2025-09/conference-(1).jpg" alt=""></a><br /><ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>आयुर्वेद में अस्थमा, गठिया, मधुमेह, कैंसर जैसी कई पुरानी असाध्य बीमारियों का उपचार करने की अद्भुत क्षमता: स्वामी रामदेव</strong></span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>भारत उत्सव, पर्वों का देश है : आचार्य बालकृष्ण</strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"> हरिद्वार, 29 अक्टूबर। पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन और पतंजलि विश्वविद्यालय के सहयोग तथा भारत सरकार के आयुष मंत्रालय द्वारा आयुर्स्वास्थ्य योजना के अंतर्गत ‘आयुर्धन 2024-स्वस्थ भविष्य के लिए आयुर्वेद, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार के सामंजस्य पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन’ विषय पर आयोजित तीन दिवसीय सम्मेलन का समापन पतंजलि विश्वविद्यालय के सभागार में  हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं धन्वंतरि वंदना से किया गया। सम्मेलन में पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी ने कहा कि आयुर्वेद में अस्थमा, गठिया, मधुमेह, कैंसर जैसी कई पुरानी असाध्य बीमारियों का उपचार करने की अद्भुत क्षमता है जिनका आधुनिक चिकित्सा प्रणाली में उपचार संभव नहीं है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-09/conference-(1).jpg" alt="Conference-(1)" width="800" height="1209"></img><br />कार्यक्रम में आचार्य बालकृष्ण जी ने कहा कि हमारे ऋषियों ने हमें विभिन्न पर्वों का संयोजन प्रदान करके स्वस्थ भविष्य के लिए आयुर्वेद प्रौद्योगिकी के प्रति अग्रसर किया है। भारतीय चिकित्सा ग्रंथों में भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का देवता माना गया है। आचार्य जी ने आयुर्वेद के विस्तार एवं उन्नति की संभावनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि चिकित्सा के क्षेत्र में लूट के षडयंत्र का समाधान आयुर्वेद के रूप में पतंजलि ने खोजा है।<br />सम्मेलन में मुख्य अतिथि उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय, देहरादून के कुलपति प्रो. (डॉ.) अरुण ने आयुर्वेद में गुणवत्तापूर्ण शोध एवं विशिष्ट कार्यों के उन्नयन में आधुनिक तकनीकी एवं अनुभवी शोधकर्ताओं को आवश्यकता पर बल देते हुए नवाचार के निर्माण की बात कही। अथ आयुर्वेद, गुरुग्राम के वरिष्ठ सलाहकार, डॉ. परमेश्वर अरोड़ा ने मधुमेह नियंत्रण एवं मुक्ति संबंधित आयुर्वेदिक विवेचना की व्याख्या प्रस्तुत करते हुए कहा कि प्राचीन ज्ञान को आधुनिक ज्ञान से जोडक़र ही सम्पूर्ण कल्याण संभव है। </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-09/conference-(2).jpg" alt="Conference-(2)" width="900" height="646"></img><br />आयुष मंत्रालय, उड़ीसा सरकार में अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) गोपाल सी. नंदा ने ‘वैश्विक स्वास्थ्य प्रणाली में आयुर्वेद का योगदान एवं सतत विकास के लक्ष्य’ विषय का उल्लेख करते हुए कहा कि हमें अभी आयुर्वेद, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध तथा होम्योपैथी के अंतर्राष्ट्रीय विकास के लिए अवसर तलाशने हैं। टीडीयू बेंगलुरु के कुलपति पद्मश्री प्रो. (डॉ.) दर्शन शंकर ने ऑनलाइन प्रस्तुति के माध्यम से भारत के नोबल पुरस्कार पाने की दिशा में आयुर्वेद एवं आधुनिक चिकित्सा की अंतर्दृष्टि और एकीकृत शोध-समाधान पर महत्त्वपूर्ण वक्तव्य प्रस्तुत किया।<br />अंतर्राष्ट्रीय यूरोपियन संगठन के डिजास्टर मेडिसिन ग्रुप के अध्यक्ष प्रो. रॉबर्टो मुगावेरो, (डॉ.) गोपाल सी. नंदा, प्रो. सत्येन्द्र राजपूत, प्रो. पार्थ रॉय और नेपाल से आये विशिष्ट अतिथि बाबू काजी ने जीवन में आयुर्वेद के विविध पहलुओं को साझा किया। पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन, हरिद्वार के उपाध्यक्ष डॉ. अनुराग वाष्र्णेय ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आयुर्वेद के विस्तार एवं विकास के महत्त्वपूर्ण विषय पर विचार प्रस्तुत किया।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2025-09/conference-(3).jpg" alt="Conference-(3)" width="900" height="600"></img><br />साउथ टेक्सास सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन कैंसर रिसर्च के संस्थापक निदेशक प्रो. सुभाष सी. चौहान, एस. व्यास सम विश्वविद्यालय, बेंगलुरु के डिप्टी रजिस्ट्रार डॉ. वासुदेव वैद्य, शूलिनी विश्वविद्यालय, सोलन, हिमाचल प्रदेश की प्रो. पूनम नेगी, केंद्रीय विश्वविद्यालय एचएनबी गढ़वाल से औषधि विज्ञान के प्रो. अजय नामदेव आदि ने आयुर्वेद से नवीन नवाचारों की यात्रा में अपार सम्भावनाएँ, प्राचीन एवं आधुनिक चिकित्सा में संयोजन और चिकित्सीय लाभों पर प्रकाश डाला। <br />भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली के डॉ. भूपेंद्र सिंह, ट्रांस डिसिप्लिनरी स्वास्थ्य विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, बेंगलुरु की अनुशासनिक प्रो. (डॉ.) अश्विनी गोडबोले, अमेटी इंस्टीट्यूट ऑफ नैनोटेक्नोलॉजी, हरियाणा गुडग़ाँव के प्रो. अतुल ठाकुर, डोईवाला, देहरादून स्पर्श हिमालय विश्वविद्यालय के प्रो. (डॉ.) प्रदीप कुमार भारद्वाज, ऋषिकुल परिसर, हरिद्वार की प्रो. रूबी रानी अग्रवाल, पतंजलि रिसर्च अनुसंधान के वैज्ञानिक डॉ. अनुपम श्रीवास्तव आदि ने आयुर्वेद के विविध पहलुओं पर ज्ञान साझा किया। राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न शोधार्थियों, विद्वानों ने शोध पत्र प्रस्तुत किए।<br />आगन्तुक अतिथियों का आभार ज्ञापित करते हुए पतंजलि हर्बल रिसर्च डिविजन की विभागाध्यक्ष डॉ. वेदप्रिया आर्या ने आयुर्वेद की वैश्विक मान्यता एवं स्वीकृति के लिए साक्ष्य आधारित शोध पर बल दिया।<br />आयुर्वेद कॉलेज, हरिद्वार के प्राचार्य डॉ. अनिल कुमार ने कहा कि ऐसी संगोष्ठियाँ नवीन दृष्टिकोण प्रदान करती हैं। उन्होंने देश-विदेश से पधारे समस्त विद्वानों, वैद्यों, वैज्ञानिकों, चिकित्सकों एवं आयुर्वेद के सुधीजनों का धन्यवाद ज्ञापित किया।</h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Sun, 01 Dec 2024 18:41:48 +0530</pubDate>
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