<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/tag/3145/%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%AE%E0%A4%99%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A4%B2-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%86%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%AE%E0%A4%99%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A4%B2" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>योग संदेश RSS Feed Generator</generator>
                <title>लोकमङ्गल से आत्ममङ्गल - योग संदेश</title>
                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/tag/3145/rss</link>
                <description>लोकमङ्गल से आत्ममङ्गल RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>लोकमङ्गल से आत्ममङ्गल</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">श्रद्धेय गुरुदेव आचार्य प्रद्यु</span><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi"></span><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">न जी महाराज<span>  </span></span></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1548/lokmangal-se-atammangal"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/216.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्त्र में अविनाशी परमात्मतत्त्व के स्वरूप को दर्शाने के लिए निषेधवाचक शब्दों का प्रयोग ही प्राय: मिलता है। उसका कारण यही है कि व्यक्ति की इस अज्ञान अवस्था में उस अक्षर अविनाशी तत्त्व का समस्त दृश्य के साथ तादात्म्य हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस तादात्म्य को हटाने या तोडऩे के लिए यह एक युक्ति या मार्ग निकाला गया। इस प्रक्रिया से साधक अपने उस केवल निज स्वरूप में पहुँच जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ दूसरा विषय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पदार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नाम तथा रूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ भी नहीं रहता।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रश्नोपनिषद् में भी उसके षोडश (सोलह) कला वाले स्वरूप का वर्णन करके उसके निष्कल (कलाओं से रहित) शुद्ध स्वरूप का दर्शन कराया गया है। प्राण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंचभूत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रिय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वीर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मंत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोक और नाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन कलाओं ने ब्रह्म के पारमार्थिक स्वरूप को ढक रखा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए इन्हें कला कहते हैं (कं ब्रह्म लीयते आच्छाद्यते यया सा कला) व्यक्ति का आत्ममङ्गल तो उस शुद्ध स्वरूप की उपलब्धि में ही निहित है। लोकमङ्गल से जीवन का आधा लक्ष्य ही पूरा होता है। अर्थात् लोकमङ्गल अपने से बाहर कुछ करने से सम्बद्ध है और आत्ममङ्गल अपने भीतर जानने से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह दोनों की स्थिति है। आत्ममङ्गल का कोई और भी उपाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मार्ग या साधन है अथवा केवल एक ही रास्ता है कि व्यक्ति किसी से कुछ न चाहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ न देखे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ न सुने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ न बोले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समस्त मन व इन्द्रियों के व्यापार से उपरत हो जाए और इस प्रकार बाहर से सर्वथा विमुख होकर आत्म-केन्द्रित हो जाए। हाँ! और भी है। जीव जब मनुष्य शरीर में इस संसार में आता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ऐसी असहाय अवस्था में होता है कि एक-एक क्षण उसकी देखभाल की आवश्यकता होती है। आरम्भ में तो माता-पिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुटुम्ब सब मिलकर मनुष्य को अपने प्रेम व साधनों से बढ़ाते हैं। धीरे-धीरे गुरुजन या समाज जैसे भी उसे मिलते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनसे कुछ शुभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ अशुभ सीखता हुआ कुछ करने लायक हो जाता है। यदि उसमें अज्ञान अधिक होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसके अनुपात में भोग-इच्छाएँ ही बलवती होती हैं। भोग रुचि के प्रबल होने पर व्यक्ति अधर्मपूर्वक भी अपनी उस भोग-रुचि को पूरा करने में लगा रहता है और इस प्रकार न चाहते हुए भी पाप संचय करता हुआ अपना अमङ्गल करता रहता है। यह एक सर्वमान्य सिद्धान्त है कि भोग की रुचि को लेकर अशुभ और पुण्य की रुचि को लेकर शुभ कार्य होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु यदि उसे सौभाग्यवश उत्तम कोटि के माता-पिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मित्रगण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज या गुरुजन मिल जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसकी बुद्धि धर्म की ओर अधिक अभिमुख रहती है और वह धर्मपूर्वक ही अपनी भोग-इच्छाओं को पूरा करना चाहता है। इस प्रक्रिया से पुण्य का संचय बढ़ते-बढ़ते आत्ममङ्गल की ओर अग्रसर होता रहता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पूर्ण रूप से आत्ममङ्गल तो तभी होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब व्यक्ति को कोई ज्ञानी पथ प्रदर्शक गुरु मिल जाए। वह गुरु किसी को माँ के रूप में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी को पिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मित्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साक्षात् गुरु या किसी भी रूप में मिल सकता है। वह गुरु अपने शिष्य का शास्त्र से भी परिचय करा देता है। इस प्रकार शास्त्र और गुरु दोनों मिलकर शिष्य की बुद्धि में ज्ञान का बीज बोते हैं। आगे चलकर यही बीज विकसित होता हुआ शिष्य की सत्ता के ऊपर छा जाता है। उसके हृदय में शुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पवित्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमरत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परम शान्ति की प्यास दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती है। बढ़ती हुई यह प्यास स्वयं मार्ग खोजती हुई साधक की उस माँग को पूरा कर देती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो वह व्यग्र होकर परम उत्कण्ठा के साथ खोज रहा होता है या चाह रहा होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्र व गुरुजन साधक का मार्गदर्शन करते हैं कि तुम्हारे पास विधान के अनुसार जो कुछ भी संचित हो गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके बदले में कुछ भी न चाहते हुए इच्छुक लोगों में उदारतापूर्वक बाँटते रहो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें तुम्हारे विवेक व सामथ्र्य का कुछ विरोध भी न हो। ऐसा करने से तुम्हारे चित्त की वह भूमि तैयार हो जाएगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें भागवत ज्ञान-ज्योति-प्रकाश-आनन्द-परमरस-परमतृप्ति अवतरित होगी। इस प्रकार निष्काम कर्म (सेवा) भी चित्तशुद्धि परम्परा से तुम्हारे आत्ममङ्गल के साधन बन जाएँगे। इस तरह निरन्तर चलते-चलते एक दिन तुम्हारा परम कल्याण हो जाएगा। साधक भी संचित पुण्यों के कारण प्राप्त उत्तम बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञा या मेधा के द्वारा शास्त्र या गुरुवाणी में पूर्ण विश्वास करता हुआ निर्दिष्ट पथ पर धैर्य से चलता रहता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भक्ति के माध्यम से भी आत्ममङ्गल घटित हो सकता है। तदर्थ दो शक्तियों का संयोग या मिलन आवश्यक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधक की अभीप्सा और भागवत कृपा। बाह्य गुरु व शास्त्र दोनों के सहयोग से साधक की प्यास सतेज होती जाती है। यह प्यास तत्त्व और भी अधिक तीव्र व बलवती हो जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब साधक अपनी प्राप्त विवेकबुद्धि के द्वारा इस संसार की अनित्यता या असारता का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षणिक सुखों से मिलने वाली अतृप्ति का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहं की पूर्ति करने में झेले गए अनन्त दु:खों का विचार करने में सक्षम होता है। इन सब के सहयोग से भगवत् प्राप्ति के लिए साधक में अनन्य प्रेम जाग्रत हो जाता है। यह प्रेम साधक की सभी अन्य इच्छाओं को खा जाता है। विषयों से भरा हुआ यह समग्र संसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कभी पहले उसे रस से परिपूर्ण दिखाई देता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब वह उसके लिए एकदम उल्टा हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब कुछ नीरसता में बदल जाता है। भगवान् के सिवाय उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता। न किसी से बात करना चाहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कोई खाने-पीने में रुचि है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कहीं घूमने की इच्छा होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न किसी सम्मान की ही चाह है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह इस तरह का दीवाना जैसा हो जाता है। बस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस व्याकुलतापूर्ण स्थिति या अवस्था की उत्तर अवस्था ही भगवत्प्राप्ति है। भगवत्प्राप्ति होने पर व्यक्ति शान्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समता में स्थित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समबुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वात्मभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरल (अहंमुक्त) हो जाता है। ऐसे व्यक्ति को शास्त्रकारों ने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कुशल’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">या ब्रह्म को जानने वाला </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ब्राह्मण’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सार्थक नाम दिया है। बृहदारण्यक श्रुति में याज्ञवल्क्य गार्गी को समझाते हुए कहते हैं कि जो इस अक्षर अविनाशी तत्त्व को बिना जाने इस संसार से प्रयाण करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह कृपण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेचारा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुत ही दीन है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्त में साररूप में संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि यदि उचित दृष्टि मिल जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो लोकमङ्गल व आत्ममङ्गल न तो एक-दूसरे के विरोधी हैं और न असहयोगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। साधक को यह दृष्टि मिल जाती है कि यह सृष्टि उस सृष्टिकर्ता का निवास स्थान है और सृष्टिकर्ता ही उसका प्रभु है। समस्त जीवगण अपने प्रभु के सेवक हैं या उसकी सन्तानें हैं। उन सबमें मनुष्य की स्थिति यह है कि वह अपने प्रभु का या अपने पिता का ही प्रतिरूप है। मनुष्य का यही सर्वोत्तम कत्र्तव्य है कि उसका यह शरीर विश्ववाटिका की खाद बन जाए और हृदय अपने प्रभु के लिए प्रेम से भर जाए और अहं अभिमान शून्य हो जाए अर्थात् अपने लिए किसी से कुछ न चाहे। इस समझ के साथ यदि कोई अपने जीवन को चलाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो स्वत: ही उभयविध मङ्गल साधित हो जाता है। इस दृष्टि में कर्मयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञानयोग व भक्तियोग तीनों ही इक्कठे हो जाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर से (स्थूल व सूक्ष्म शरीर दोनों से ही) कर्मयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि से ज्ञानयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन व अपने से भक्तियोग सम्पन्न होता है। ये तीनों योग भी सर्वथा एक-दूसरे से पृथक् नहीं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। केवल इतनी सी बात है कि एक की प्रमुखता रहती है और दूसरे दो सहयोगी। मनुष्यों का प्रारब्ध (कर्मप्रवाह) पृथक्-पृथक् होने से किसी में क्रिया के वेग की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी में विचार की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो किसी में भाव की प्रमुखता होती है। कर्मयोगी का साधन उदारता और कत्र्तव्यपरायणता है। वह प्राप्त सामथ्र्य को या तो भगवान् की समझता है या जगत् की। यदि वह इसे भगवान् की समझता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भगवान् के नाते और जगत् की समझता है तो जगत् के नाते अपनी सम्पूर्ण सामथ्र्य को सेवा में अर्पित कर देता है। साथ में अपने लिए किसी से कुछ चाहता नहीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जिस स्वाधीनता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वराज्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमरत्व की उसे माँग है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह किसी वस्तु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति या परिस्थिति के अधीन होकर नहीं मिल सकती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे तो पहले ही अपने में मौजूद हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: अपनी माँग को अपने में ही पाकर सन्तुष्ट हो जाता है। इसी का नाम है- ज्ञानयोग। सुने हुए प्रभु को अपना मानकर उसे अपने हृदय का प्यार अर्पित करने का नाम है भक्तियोग। अर्थात् प्रभु को अपना प्रेमास्पद स्वीकार करके अपने हृदय में उसकी अखण्ड स्मृति जगाकर नित्य प्रेम का दान करना ही भक्तियोग है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संक्षेप में मेरे पास जो कुछ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह जगत् का है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस बुद्धि से जगत् की सेवा का नाम कर्मयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु जगत् पति का समझकर जगत् की सेवा का नाम भक्तियोग और किसी का भी न समझकर अपने में अचाह हो जाने का नाम है ज्ञानयोग। ज्ञानयोगी भी कर्म करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">गुण ही गुणों में वर्त रहे हैं और मैं गुणों से असङ्ग हूँ’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इस भाव के साथ करता है। मनुष्य को जगत् के लिए भी उपयोगी होना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने लिए भी और प्रभु के लिए भी। वस्तुत: जिसका आत्ममङ्गल हो गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही सच्चे अर्थ में लोकमङ्गल कर सकता है। साक्षात् सच्चिदानन्द बनकर जीना ही आत्ममङ्गल का स्वरूप है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसी स्थिति में जीवन का निर्दोष हो जाना स्वाभाविक है। निर्दोष जीवन में लोकमङ्गल निहित ही है।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category> फरवरी</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1548/lokmangal-se-atammangal</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1548/lokmangal-se-atammangal</guid>
                <pubDate>Fri, 01 Feb 2019 21:41:46 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/216.jpg"                         length="277728"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>लोकमङ्गल से आत्ममङ्गल</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">श्रद्धेय गुरुदेव आचार्य प्रद्युम</span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">न जी महाराज<span>  </span></span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1481/lokmangal-se-atmmangal"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/394.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पि</span><span lang="hi" xml:lang="hi">छले अंक में हमने लोकमङ्गल पर विस्तारपूर्वक चर्चा की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब हम आते हैं- आत्ममङ्गल पर। <strong><span style="color:rgb(186,55,42);">आत्ममङ्गल का अर्थ है- परमशान्ति</span></strong></span><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">, <span lang="hi" xml:lang="hi">दु:खमुक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अगाधप्रियता की प्राप्ति।</span></span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"> </span></strong>जहाँ लोकमङ्गल सामथ्र्य के द्वारा घटित होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस सामथ्र्य के सैकड़ों प्रकार हो सकते हैं- लेखक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वक्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैद्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृषक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यापक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्योगपति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुकानदार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुलिसकर्मी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लिपिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सैनिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनेता इत्यादि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ आत्ममङ्गल होता है- सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्याग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान (बोध) व प्रेम के द्वारा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ यह स्पष्ट तौर पर समझ लेना चाहिये कि सामथ्र्य और ज्ञान दोनों अलग-अलग हैं। सामथ्र्य एक शक्ति है और ज्ञान प्रकाश का एक रूप है। यह सदा ध्यातव्य है कि <span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>ज्ञान वह नहीं है जो जाना जाता है</strong></span></span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि वह है</span>, </strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>जिसके द्वारा जाना जाता है।</strong></span> हो सकता है कि किसी के पास शास्त्र का सामथ्र्य हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर ज्ञान न हो। इससे विपरीत भी हो सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान तो हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर शास्त्रीय सामथ्र्य न हो। कुछ ऐसे भी होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनके पास दोनों ही होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हीं को </span><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">'<span lang="hi" xml:lang="hi">श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ</span>’</span></strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे आचार्य शङ्कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी दयानन्द। महर्षि रमण ज्ञानी तो हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु उनके पास शास्त्र की पङिक्तश: व्याख्या करने का सामथ्र्य नहीं है। बहुत सारे विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर्स होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनके पास सामथ्र्य तो है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर वे स्वयं कहते हैं कि हम ज्ञानी नहीं हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान हमारे समक्ष हमारी भूल दिखाकर उसे मिटा देता है। हमारी भूल यह हो रही है कि हमें किसी से भी जो कुछ मिला है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसको हमने अपना समझ लिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने लिये समझ लिया और इससे भी आगे बढ़कर उसे अपना स्वरूप ही समझने लगे। ज्ञान हमें यह दिखाता है कि जिसका वियोग हो सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह हमारा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा वही है जो हमसे कभी वियुक्त न हो। ज्ञान हमें यह भी दिखाता है कि जिसको हम </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">यह</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं हो सकता।  अर्थात् ज्ञान देवता की कृपा से अपने से भिन्न वस्तु या व्यक्ति में ममकृति (मैं का भाव) चली जाती है और वही ज्ञान स्वयं के शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग्यता आदि में अहंकृति का नाश कर देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् ज्ञान हमारे शरीर के साथ हमारे तादात्म्य को तोड़ डालता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान ने हमारी भूल को मिटाया और हमें यह दिखाया कि अपना तो अपने में ही है और इस प्रकार वस्तु-व्यक्ति-पदार्थ-परिस्थिति से हटाकर हमें अकेला खड़ा कर दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् ज्ञान ने हमको इस समस्त संसार से बिना चाह के व अकिंचन बनाकर बिना साथी और बगैर सामान के बना दिया। हम सर्वथा निष्काम व अहंकार रहित हो गए। इस ज्ञान देवता की कृपा से हम केवल या अकेले (</span>Alone)<span lang="hi" xml:lang="hi"> हो गए। हमारी ऐसी स्थिति हो गई कि खोने के लिए कुछ बचा ही नहीं। जब खोने के लिए कुछ बचा ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भय भी जाता रहा। जब अपना करके कुछ शेष ही नहीं रहा अर्थात् कहीं ममता ही नहीं रही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो काम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोध और लोभ भी चला गया। इस प्रकार ज्ञान ने हमको निर्विकार बना दिया। अब हमें केवल इतना करना है कि ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो हमारा पथ प्रदर्शन कर रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका अनादर नहीं करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसको ठीक वैसे ही स्वीकार करना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसा वह है। ज्ञान का अनादर करते ही व्यक्ति के हाथ से आत्ममङ्गल छिन जाता है और आदर करते ही व्यक्ति तत्काल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि भविष्य में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभी वस्तुओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्तियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिस्थितियों से असङ्ग हो जाता है। असङ्ग होते ही स्वाधीन हो जाता है। जो हमारा निजस्वरूप है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह बच जाता है और जो आरोपित है या अध्यस्त है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह हट जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आत्ममङ्गल के लिये एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वह ज्ञान हमारे अनुभव में आ जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके प्रकाश में सब कुछ जाना जा रहा है। जो भी स्वीकृतियाँ हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनको वह ज्ञान हटा देता है। जो जानने में आ रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह स्वीकृति रूप होता है। श्रुति में कहा गया है- <strong><span style="color:rgb(186,55,42);">तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते</span></strong>। तदेव-शब्द से उस तत्व की ओर सङ्केत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो केवल प्रकाशक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकाश्य अर्थ तो यहाँ हो ही नहीं सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि उसका सङ्केत </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इदम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द से किया जा रहा है। प्रकाश्य से सम्पृक्त प्रकाशक भी नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: तदेव शब्द का अर्थ हुआ- शुद्ध प्रकाशके समस्त स्वीकृतियाँ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इदम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के ही अन्तर्गत आती हैं। यद्यपि स्वीकृतियों के दो रूप हैं- एक साधन रूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा असाधन रूप। जैसे- मैं कितना सुन्दर हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धनी हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेखक हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दानी हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भोगी हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसार का रक्षक (</span>Saviour)<span lang="hi" xml:lang="hi"> हूँ या इनके विपरीत कुरूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्धन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञानी या मूर्ख हूँ इत्यादि सब असाधन रूप स्वीकृतियाँ हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु कोई कहे कि मैं ब्रह्मचारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संन्यासी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तापस हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये सब साधन रूप स्वीकृतियाँ हैं। प्रारम्भ में साधन रूप स्वीकृतियों के द्वारा असाधन रूप स्वीकृतियों को हटाया जाता है और फिर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहं ब्रह्मास्मि</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">रूप अन्तिम वृत्त्यात्मक ज्ञान से उन साधन रूप स्वीकृतियों को भी हटा दिया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि वे भी तो आरोपित ही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा निज स्वरूप नहीं हैं। पुन: जैसे अग्नि लकड़ी को भस्म करके फिर स्वयं भी शान्त हो जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे ही वह ब्रह्म का<strong> </strong></span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहं ब्रह्मास्मि</span>’ </strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi">रूप वृत्त्यात्मक ज्ञान भी सभी स्वीकृतियों को मिटाकर स्वयं भी शान्त हो जाता है और मात्र शुद्ध प्रकाशक ज्ञान शेष रह जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहं ब्रह्मास्मि</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इस वृत्तिज्ञान को भी प्रकाशित किया था।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पूर्ण औपनिषद दर्शन इसी एक बात को समझाने के लिए प्रवृत्त है। जैसे-बृहदा. श्रुति (</span>3.8.11) <span lang="hi" xml:lang="hi">में याज्ञवल्क्य ने गार्गी के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा </span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">तद्वा एतदक्षरं गाग्र्यदृष्टं द्रष्ट्रश्रुतं श्रोत्रमतं मन्त्रविज्ञातं विज्ञातृ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्ति मन्तृ नान्यदतोऽस्ति विज्ञात्रेतस्मिन्नु खल्वक्षरे गाग्र्याकाश ओतश्च प्रोतश्चेति।</span></strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong> </strong></span>अर्थात् हे गार्गी! वह अक्षर तत्त्व अदृष्ट है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दृष्टि का विषय न होने के कारण वह किसी के द्वारा देखा नहीं गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु स्वयं दृष्टि स्वरूप होने के कारण द्रष्टा है। इसी प्रकार यह श्रोत्र (श्रवण इन्द्रिय) का अविषय होने के कारण सुना नहीं गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु स्वयं श्रुतिस्वरूप होने से श्रोता है। मन का अविषय होने के कारण यह अक्षर मनन का विषय नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु स्वयं मतिस्वरूप होने से मन्ता है। इसी तरह बुद्धि का अविषय होने के कारण विज्ञात नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु स्वयं विज्ञानस्वरूप होने के कारण विज्ञाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस अक्षर से भिन्न कोई द्रष्टा दर्शन क्रिया का कत्र्ता भी नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह अक्षर ही सर्वत्र दर्शन क्रिया का कत्र्ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार इससे भिन्न कोई श्रोता भी नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह अक्षर ही सर्वत्र श्रोता है। इससे भिन्न कोई मन्ता भी नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पूर्ण मनों के द्वारा सर्वत्र वह अक्षर ही मनन करने वाला है और इससे भिन्न कोई विज्ञाता (विज्ञान क्रिया का कत्र्ता) नहीं है। समस्त बुद्धियों के द्वारा वह अक्षर ही विज्ञान क्रिया का कत्र्ता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हे गार्गी! निश्चय ही इस अक्षर में ही आकाश ओत-प्रोत है। जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो क्षुधादि संसार धर्मों से अतीत सर्वान्तर आत्मा है और जिसमें आकाश ओत-प्रोत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह अक्षर ही पराकाष्ठा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह परागति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह परब्रह्म है और यही पृथिवी से लेकर आकाश तक समस्त सत्य का सत्य है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">केनोपनिषत् श्रुति में भी यही समझाया कि वह सदा ही विज्ञाता बना रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी भी मन-बुद्धि व इन्द्रियों का विषय न होने से विज्ञेय कोटि में नहीं आता। मन-बुद्धि-इन्द्रियों के द्वारा सूक्ष्म-स्थूल पदार्थ जाने जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर वह इनका विषय नहीं बन सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: उसको जानने का एक ही उपाय है कि इन्हें शान्त कर दिया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बस फिर वही शेष रह जाता है- <strong><span style="color:rgb(186,55,42);">अन्यदेव तद् विदितादथो अविदितादधि।</span></strong> (</span>1.3) <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् इस विशाल संसार में विदित-अविदित (स्थूल-सूक्ष्म) के रूप में जो पदार्थ हमारे ज्ञान के विषय बनते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह अक्षर तत्त्व उन सबसे भिन्न ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सदा विषयी ही बना रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी भी विषय नहीं बनता।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">छान्दोग्योपनिषत् श्रुति में भूमा की व्याख्या करते हुए इसी सत्य की तरफ  संकेत किया है- </span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाऽथ</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मत्र्यम्। (</span>7.24.1)</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् जैसे लोकव्यवहार में दृश्य से भिन्न अन्य एक देखने वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुनने वाला या जानने वाला होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब वह अन्य किसी एक-एक इन्द्रिय के द्वारा किसी अन्य द्रष्टव्य श्रोतव्य या ज्ञातव्य विषय को देखता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुनता या जानता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसा भूमातत्त्व में देखने-सुनने या जानने वाला नहीं होता है। वहाँ तो केवल बस वही होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके सिवा और कोई कुछ नहीं होता। अधिक से अधिक हम इतना ही कह सकते हैं- <span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>शिवं शान्तम् अद्वैतं प्रपञ्चोपशमम् (माण्डूक्य- </strong></span></span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>8) </strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वप्रपंच के निवृत्त होने पर शान्ति मात्र शेष रह जाती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>सनातन वैभव</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1481/lokmangal-se-atmmangal</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1481/lokmangal-se-atmmangal</guid>
                <pubDate>Tue, 01 Jan 2019 21:51:55 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/394.jpg"                         length="227822"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>लोकमङ्गल से आत्ममङ्गल</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">श्रद्धेय गुरुदेव आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2266/lokmangal-se-atmmangal"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/543.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   आ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ज हम एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विषय पर विचार करना चाहते हैं कि कैसे हमारे द्वारा लोकमङ्गल घटित हो और कैसे आत्ममङ्गल</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">लोकमङ्गल में ही हमारा आत्ममङ्गल भी समाहित हो जाता है अथवा आत्ममङ्गल के लिए कुछ अलग से भी करना पड़ता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इस चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले लोकमङ्गल से क्या तात्पर्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे हम समझ लेते हैं। यह जो कुछ भी हमारे चारों तरफ  फैला हुआ जगत् है- पृथिवी-अप्-तेज-वायु-आकाश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भौतिक पर्यावरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य-चन्द्रमा-नक्षत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नदी-वन-उपवन-पर्वतमालाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्षा-समुद्र-हिमपात इत्यादि तथा इस धरती पर जितने भी मनुष्यादि जीव-जन्तु हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जरायुज-अण्डज-स्वेदज-उद्भिज्ज प्राणी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन सबके सम्मिलित रूप को कहते हैं </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">लोक’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">और इन सबके मङ्गल या कल्याण का नाम है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">लोकमङ्गल’</span><span lang="hi" xml:lang="hi">।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लोक के इन सब घटकों में सबसे महत्त्वपूर्ण इकाई है मनुष्य। ऊपर लोक के जो ये विभिन्न घटक गिनाए गए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी अपनी-अपनी पृथक्-पृथक् आवश्यकताएँ हैं। जैसे पर्यावरण भी स्वस्थ और सबल रहना चाहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर हमें खोजना पड़ेगा कि वह किन उपायों से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या कुछ करने से स्वस्थ या सबल रह सकता है। इसी प्रकार समुद्र में जलचर प्राणियों की रक्षा व नभचर पक्षियों का संरक्षण कैसे किया जाए</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">निरपराध थलचर प्राणियों व वनों की रक्षा के क्या उपाय अपनाए जाएँ</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">धरती अधिक से अधिक हरियाली से परिपूर्ण रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस विषय में भी सोचा जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे पतंजलि योगपीठ में श्री स्वामी रामदेव जी महाराज के अनन्य सहयोगी अपने ढंग के अद्भुत व्यक्तित्व श्री आचार्य बालकृष्ण जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने आयुर्वेद व जड़ी-बूटियों के लिए अपने जीवन को समर्पित किया हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस दिशा में धरती माता के लिए अपना अप्रतिम सहयोग दे रहे हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समुद्र में ऐसी जहरीली चीजें न पहुँचें या मनुष्य सावधान रहे कि समुद्रीय जीव-जन्तुओं की रक्षा हो सके। मनुष्य अपने तुच्छ स्वार्थ या सुखों की प्राप्ति के लिए वन्य प्राणियों का वध न करे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने बच्चों के लालन-पालन की तरह ही वृक्ष-सम्पदा के संवर्धन में अपना मन लगाए। इस सम्पूर्ण लोक विस्तार में ध्यान देने योग्य बात यह है कि मनुष्य के ऊपर ही सम्पूर्ण लोकों के रक्षण की जिम्मेदारी है। मनुष्य के अज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहङ्कार व स्वार्थ के कारण समस्त लोक नष्ट-भ्रष्ट हो जाते हैं या हो सकते हैं और यदि वही मनुष्य ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम व त्याग से सम्पन्न हो जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो सम्पूर्ण अस्तित्व की रक्षा हो सकती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस पूरे प्रपञ्च में से यदि मनुष्य बाहर हो जाए तो सब कुछ इतना अच्छा चलेगा कि जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। मनुष्य की भी जो उसकी अपनी समस्याएँ हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे भी उसके साथी भाइयों के कारण अधिक हैं। प्रकृति में कभी-कभी जो असन्तुलन दिखाई देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह भी मनुष्य की गलतियों या उसके स्वार्थ अथवा अज्ञान के कारण ही होता है। लगभग 50 वर्ष पहले भारत में एक अत्यन्त उपयोगी प्राणी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">गिद्ध’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">जो मरे हुए पशुओं का माँस खाकर वातावरण को स्वच्छ कर देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी संख्या लाखों में थी और अब बहुत बड़े सरकारी संरक्षण के बाद भी वह संख्या अब कुछ सौ में सिमट कर रह गई। पशुओं में ऐसे साल्ट वाली दवाओं का प्रयोग किया जाता है कि उन मृत पशुओं का माँस खाने वाले ये गिद्ध भी मर जाते हैं। यह तो एक उदाहरण मात्र है। नदियों का जल दूषित हो गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही जल समुद्र में पहुँचकर समुद्र को भी धीरे-धीरे दूषित कर रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे जलीय जीव-जन्तुओं तथा समुद्र में होने वाली वनस्पतियों पर उसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। वर्तमान जीवन शैली के कारण सर्वत्र पर्यावरण में जहर घुल गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे कौन नहीं जानता।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पर्यावरण रक्षा के लिए पहले बड़े-बड़े यज्ञ होते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब वे नाम मात्र के होते हैं। वन बहुत अधिक मात्रा में होते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे सब समाप्त होते जा रहे हैं। यह सब गाथा सुनाने के पीछे मेरा भाव यह है कि लोक के जितने भी घटक हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी रक्षा करने से वे रक्षित होते हैं और ध्यान न देने से नष्ट हो जाते हैं। जैसे कृषि-गौ इत्यादि पर ध्यान न देने से मनचाहा लाभ नहीं मिलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चों पर ध्यान न देने से अर्थात् उन्हें उचित शिक्षा न मिलने से बच्चे बिगड़ जाते हैं। जो भी मानव के द्वारा उपेक्षित हो जाता है या मानव की इच्छापूर्ति का शिकार हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही विनाश की राह पर चल पड़ता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी पृष्ठभूमि में हम यह खोजना चाहते हैं कि लोकमङ्गल कैसे हो</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसा हमने देखा- समस्याओं का मुख्य जन्मदाता मनुष्य है। मनुष्य की अपनी बहुत सारी समस्याएँ हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञान की समस्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भौतिक संसाधनों के अभाव की या उनके दुरुपयोग की समस्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारस्परिक सद्भाव के अभाव की समस्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्वच्छता की समस्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन सम्बन्धी सही शिक्षा के अभाव की समस्या इत्यादि। लोक में उपकार-प्रत्युपकार के बिना किसी के साथ किसी का सम्बन्ध होना सम्भव नहीं है। संसार में कोई एक व्यक्ति ऐसा नहीं हो सकता जो कि सभी मनुष्यों की किसी एक आवश्यकता को भी पूरा कर दे और हो भी जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उस व्यक्ति के जीवनकाल के बाद फिर वही स्थिति आ जाएगी। अत: परस्परता में ही जीवन चलता है। लोकमङ्गल के लिए प्रवृत्त हुए व्यक्ति को देखना चाहिए कि मैं इस यज्ञ में अपनी क्या आहुति लगा सकता हूँ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मुझे ऐसा लगता है कि लोकमङ्गल हेतु सबसे महत्त्वपूर्ण और सबसे प्रथम आहुति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो किसी के लिए भी असम्भव नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समान रूप से सभी मनुष्य सबल-निर्बल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सधन-निर्धन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्वान् या अविद्वान्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधिक योग्यता व कम योग्यता वाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बूढ़े और जवान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्त्री-पुरुष मनुष्यमात्र जिसके अधिकारी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">लोकमङ्गल का सद्भाव’</span><span lang="hi" xml:lang="hi">। मैं कुछ भी ऐसा नहीं करूँगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे लोक के किसी घटक को हानि पहुँचे। यदि यह चेतना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह जागरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह जागरूकता </span>(Awareness)<span lang="hi" xml:lang="hi"> आ जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह एक बहुत बड़ी आहुति होगी। आगे तो फिर अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार कोई अध्यापक बनकर लोकमङ्गल में शरीक होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई कृषक बनकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई कवि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्रकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेखक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विदूषक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुकानदार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डाक्टर-वैद्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुलिसकर्मी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ड्राइवर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बैंक में कर्मचारी इत्यादि हजारों छोटे-छोटे विभाग हैं। अर्थात् इस वैश्व यज्ञ को सम्पन्न करने के लिए किसी के पास विशेष मस्तिष्क है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी के पास लेखनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी के पास हाथ या सम्पूर्ण शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी के पास वाणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी के पास कोई कला विशेष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी के पास जैसा कि हमने ऊपर कहा केवल स्वच्छ मन या पवित्र हृदय और उसके सद्भाव।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी शृङ्खला में कोई विरक्त हो जाता है। ऐसा नहीं है कि वह लोक से अलग हो गया है। वह भी लोक की एक महत्त्वपूर्ण सेवा कर रहा है। यदि कोई यह सोचने लगे कि भौतिक रूप में जो निर्माण करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे ही लोक के लिए कुछ कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह बात लोक के जितने ही घटक हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनको अलग कर देगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि वे भी लोक के लिए अपनी आवश्यक भूमिका अदा कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे अध्यापक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉक्टर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुकानदार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यालयरत सभी मनुष्य। अत: मानना पड़ेगा कि लोकमङ्गल के इस महायज्ञ में वह विरक्त भी सम्मिलित है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस संसार में पदार्थ के द्वारा जो सेवा कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे जगत् के भौतिक अस्तित्व को बनाए रखने के लिए उपयोगी हैं। यदि कृषक अन्न पैदा न करे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्योगपति आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन न करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो मानव जीवन संकट में पड़ जाए। दूसरा सेवा का रूप है व्यवस्था बनाए रखने के लिए राजा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुलिस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिलिट्री इत्यादि। वे न हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भी सब जगह आपा-धापी मच जाए। अत: वह भी आवश्यक है। अलग-अलग स्थानों पर काम करने वाले श्रमिकों की भी आवश्यकता होती है। यदि ये श्रमिकजन न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हों तो न कोई मकान बन सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कोई फैक्ट्री और न उनको आगे चलाया जा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सारी धरती हरियाली से विहीन हो जाएगी। कल्पना के द्वारा देखा जा सकता है कि उन श्रमिकों की लोकमङ्गल में कितनी बड़ी भूमिका है। चौथे वे लोग हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो मस्तिष्क से काम करते हैं- चित्रकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेखक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कवि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहानीकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यापक-प्रोफेसर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कथावाचक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य-उपदेशक इत्यादि। इन लोगों की भी लोकमङ्गल में एक आवश्यक भूमिका स्पष्ट दिखाई देती है। जो वैज्ञानिक-दार्शनिक हैं जो रात-दिन अपने कक्ष में बैठे हुए खोज कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आइंस्टीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्टीफन हॉकिन्स की तरह जो लोग परमाणु-विज्ञान या खगोल-विज्ञान आदि का अध्ययन कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्तत: उनकी खोज भी लोकमङ्गल में ही पर्यवसित (परिणामित) होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु प्रश्न उठता है कि ये विरक्त साधु केवल ध्यान-भजन या केवल अपना स्वाध्याय करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोक से अलग हटकर एक कोने में बैठे हुए चुप होकर अपना काम कर रहे होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इनकी लोकमङ्गल में क्या भूमिका है</span>?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देखिए! हम जिस किसी भी रूप में क्रोधी-अक्रोधी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्त-अशान्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सविकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्विकार होकर जो भी जीवन जीते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस समय वैसी ही हमारी सूक्ष्म तरङ्गें वातावरण में फैल जाती हैं। उन तरङ्गों का अपना एक-एक शुभ-अशुभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुकूल-प्रतिकूल प्रभाव भी होता है। विरक्त पुरुष तो जो एक अर्थ में जीवन के पथ-प्रदर्शक गुरु का ही अभिनय कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे तो एक दिव्य ज्योति-स्वरूप होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके प्रभाव की कल्पना सहज ही की जा सकती है। इस विषय में महापुरुष हमें समझाते हैं कि गुरु शिष्य के ऊपर तीन प्रकार से कार्य करता है अथवा यह कहें कि गुरु तीन तरीकों से शिष्य तक अपनी बात पहुँचाता है- शिक्षण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दृष्टान्त व प्रभाव। एक तो साक्षात् शब्दों के द्वारा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">यह करो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह मत करो</span>Ó <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसी शिक्षा देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा शिष्य के समक्ष अपना स्वयं का दृष्टान्त रखता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे विषम-प्रसङ्गों में कैसे अपने भीतर शान्ति बनाकर रखनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह बात बोलकर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अपना उदाहरण देकर शिष्य के समक्ष रखता है। तीसरा अपने प्रभाव के द्वारा शिष्य का रूपान्तरण साधित करता है। शिष्य जिस अनुपात में गुरु की ओर उद्घाटित होता है या ग्रहणशील होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी अनुपात में शिष्य में परिवर्तन शुरू हो जाता है। अनुभवी लोगों ने यह भी बताया है कि शिक्षण से दृष्टान्त अधिक शक्तिशाली होता है और दृष्टान्त से प्रभाव। तो यहाँ ऐसा समझना चाहिए कि वे गुरु या विरक्त महात्मा अपने भीतर अधिकाधिक आध्यात्मिक चेतना शक्ति को धारण करते हैं और दूसरी ओर वे संस्कारी आत्माएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो ऐसे विरक्त योगी की ओर उद्घाटित होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगी के उस प्रभाव से उन जिज्ञासु आत्माओं का शीघ्र ही उद्धार हो जाता है। बिना ग्रहणशीलता के तो यह स्थिति ऐसी बन जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे आकाश में सूर्य तो चमक रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु किसी व्यक्ति ने अपने घर की खिड़की को बन्द कर लिया हो।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभाव के विषय में श्री अरविन्द लिखते हैं- प्रभाव दृष्टान्त की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। प्रभाव का अर्थ गुरु का अपने शिष्य पर बाह्य शासन एवं अधिकार नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसके संस्पर्श एवं उसकी उपस्थिति की शक्ति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी आत्मा की दूसरे की आत्मा के साथ समीपता की शक्ति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो दूसरे की आत्मा के अन्दर चाहे मौन रूप में ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु के अस्तित्व और गुरु को अन्त:सञ्चारित कर देती है। यह है गुरु का सर्वोत्कृष्ट लक्षण। वास्तव में परमोच्च कोटि का गुरु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षक बहुत कम होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह तो एक उपस्थिति होता है जो अपने आसपास के सभी ग्रहणशील लोगों में दिव्य चेतना और उसकी सारभूत ज्योति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पवित्रता और आनन्द उड़ेलता रहता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार लोकमङ्गल के लिए इन विरक्त महात्माओं की भूमिका का अवमूल्यन  </span>(devaluation) <span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं किया जा सकता। आप यह कह सकते हैं कि इस कोटि का अभीप्सु शिष्य तो कोई विरला ही होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: लोकमङ्गल के इस काम में इन विरक्तों की भूमिका तो बहुत ही सिमट गई। इस बिन्दु पर इस रूप में विचार किया जा सकता है कि यह संसार तो एक विशाल बाजार की तरह है। यहाँ किसी एक सामान्य किराने की दुकान पर बहुत भीड़ दिखाई देती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दूसरी हीरे-मोती वाली दुकान पर कोई दिन भर में इक्का-दुक्का ही पहुँचता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो क्या ग्राहक कम हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस हेतु से सामान्य किराने की दुकान की तुलना में हीरे-मोती वाली दुकान की कम उपयोगिता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिल्कुल नहीं। प्रसिद्ध नाच-तमाशा देखने के लिए हजारों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी-कभी लाखों लोगों की भीड़ उपस्थित हो जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु किसी सिद्धपुरुष से शिक्षा लेने के लिए कोई एक-दो ही पहुँचते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो क्या उस भीड़ के आधार पर सिद्धपुरुष की तुलना में नाच-तमाशा दिखाने वालों का अधिक महत्त्व हो जाएगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">कदापि नहीं। आज के युग में वेदार्थ जानने वालों की संख्या बहुत ही अल्प मिलेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि किसी प्रसिद्ध उपन्यास के पाठक लाखों मिल जाएँगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो क्या वेदार्थ-ज्ञाता उपन्यास-पाठकों से छोटे हो जाएँगे</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी नहीं। तात्पर्य यही निकला कि किसी एक व्यक्ति से अपने सम्पूर्ण जीवन काल में यदि एक व्यक्ति भी उपकृत हो गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस विरक्त पुरुष के सहयोग से किसी एक व्यक्ति ने भी जीवन का अन्तिम पुरुषार्थ सिद्ध कर लिया तो लोकमङ्गल का उद्देश्य तो पूरा हो गया है। शृङ्खला टूटेगी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह फिर औरों को तैयार करेगा और ऐसा हो नहीं सकता कि एक व्यक्ति भी उसे न मिले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि कोई किसी विषय में प्रामाणिक बन जाता है तो ऐसे मूल्यवान् व्यक्तित्व को इच्छुक लोग खोज ही लेते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि लोकमङ्गल के साधन एक तो स्थूल पदार्थ हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा स्थूल शब्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीसरा चिन्तन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चौथा अचिन्तन। आचार्य विनोबा जी ने किसी प्रसङ्ग में बहुत ही सुन्दर कहा है- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">लोग अक्सर कर्म को ही अधिक महत्त्व देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु मुझे स्पष्ट अनुभव मिल रहा है कि कर्म से अधिक शक्तिशाली है- शब्द। शब्द से ज्यादा ताकतवर है- चिन्तन और चिन्तन से भी अधिक- अचिन्तन।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">निषेध की तरफ  से भी इसे हम समझ सकते हैं। शारीरिक हिंसा से ज्यादा विनाशक होते हैं क्रूर शब्द। इसीलिए कहते हैं कि शस्त्र का घाव तो भर जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु शब्द का घाव कभी नहीं भरता। इसी प्रकार क्रूर शब्दों से भी अधिक विनाशकारी है क्रूर चिन्तन। कोई व्यक्ति किसी के बारे में बुरा सोचता है तो निश्चित ही यह उन क्रूर शब्दों से भी अधिक घातक हो जाता है। सकारात्मक दृष्टि से भी इसे समझ सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई व्यक्ति सारी समष्टि के लिए शुभ चिन्तन करता है तो वह उसका चिन्तन स्थूल शुभ कर्मों से या बोले गए सुन्दर शब्दों से भी अधिक प्रभावी होगा। इस प्रक्रिया में चिन्तन करने वाले का भी उद्धार हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि अशुभ चिन्तन से चिन्तन करने वाले का विनाश सुनिश्चित है। इस विवेचन में उस बात का भी अनुमोदन हो रहा है कि विरक्त लोगों की भी इस लोकमङ्गल रूपी महायज्ञ में बहुत बड़ी भूमिका है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि वे सदा सुचिन्तन (शिवसङ्कल्प) या अचिन्तन (नि:सङ्कल्प) अवस्था में रहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी भी कुचिन्तन (अशिवसङ्कल्प) में नहीं रहते।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह भी एक बात ध्यान देने योग्य है कि जो क्रूर कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रूर शब्द व क्रूर चिन्तन में रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह कभी भी अचिन्तनरूप उस सर्वोत्कृष्ट अवस्था को नहीं प्राप्त हो सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि सुचिन्तन का ही परिणाम अचिन्तन होता है। वेदों में मन को सुन्दर बनाने के लिए कितनी तेजस्वी प्रार्थनाएँ मिलती हैं- तन्मे मन: शिवसङ्कल्पमस्तु (यजु0- 34.1)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनस: काममाकूतिं वाच: सत्यमशीय</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> (यजु0- 39.4) मैं मन के शिव-संकल्प को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन के उत्साह को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाणी के सत्य को प्राप्त करूँ। कोई व्यक्ति अहर्निश इस शुभचिन्तन को ही यदि अपनी साधना बना ले तो लोकमङ्गल व आत्ममङ्गल दोनों ही एक साथ घटित हो सकते हैं। सुचिन्तन का जो प्रथम चरण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह यह है कि मैं निर्दोष हो जाऊँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं शत्रु का भी बुरा न चाहूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सबका भला हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब सुखी रहें। एक सन्त ने तो यह प्रार्थना भी की है कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं किसी को बुरा न समझूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे कहते थे कि होगा कोई बुरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु किसी को बुरा समझने का हमारा अधिकार नहीं।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2018</category>
                                            <category>दिसम्बर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2266/lokmangal-se-atmmangal</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2266/lokmangal-se-atmmangal</guid>
                <pubDate>Sat, 01 Dec 2018 21:50:48 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/543.jpg"                         length="306699"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        