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                <title>सफलता को पचाने का अभ्यास - योग संदेश</title>
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                <description>सफलता को पचाने का अभ्यास RSS Feed</description>
                
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                <title>आंतरिक शक्तियों को कैसे प्रकट करें</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">साध्वी आचार्या देवप्रिया</span></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1549/antarik-shaktiyon-ko-kaise-prakat-kare"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/443.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हम कहते हैं कि ईश्वर हम सबमें निहित है। वो हमारे अन्दर भी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाहर भी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब जगह विद्यमान है। किन्तु वह अभिव्यक्त क्यों नहीं हो रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिखाई क्यों नहीं दे रहा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">वाद्य यंत्रों में सभी स्वर मौजूद हैं किन्तु उन्हें वही बजा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने उनका अ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"></span><span lang="hi" xml:lang="hi">यास किया हो। अ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"></span><span lang="hi" xml:lang="hi">यास के अभाव में वाद्य यंत्रों से बेसुरा स्वर ही निकलेगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ई</span><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वर हमारे भीतर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं पूर्ण हूँ किन्तु यह अभिव्यक्त नहीं हो रहा। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सहोऽसि सहो मयि धेहि’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरी सहनशक्ति कम क्यों है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि ईश्वर तो महान् सहनशील</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षमाशील</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यायकारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परमपुरुषार्थी है। विष्णो: कर्माणि पश्यत। यह सारा कर्म ईश्वर का ही तो है। क्योंकि हमने भागवत शक्तियों को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वरीय शक्तियों को अभिव्यक्त करने का अभ्यास ही नहीं किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए ईश्वर हमारे अंदर होते हुए भी हम उसे अभिव्यक्त नहीं कर पाये। ये अभिव्यक्त होते हैं महर्षि दयानन्द के व्यक्तित्व से। क्योंकि महर्षि दयानन्द ने उन गुणों को अभिव्यक्त करने का घण्टों-घण्टों नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिपल अभ्यास किया है। वे अपने सभी व्या</span><span lang="hi" xml:lang="hi"></span><span lang="hi" xml:lang="hi">यानों में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यद भद्रं तन्न आसुव’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इस वेदवाक्य का उद्धरण देते थे। वे कहते थे कि इस दुनिया में जो भी अच्छा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह हमें ग्रहण करने का अ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"></span><span lang="hi" xml:lang="hi">यास करना चाहिए। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हम कहीं जाते हैं तो वहाँ कमियाँ ढूँढऩे लगते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे उदाहरण के तौर पर यदि हम न्यू-मुल्तान नगर आर्य समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिल्ली गये तो वहीं कमियाँ ढूँढऩे लगते हैं। कहते हैं कि वहाँ सब कुछ तो ठीक था किन्तु पानी के गिलास सभी जगह बिखरे पड़े थे। पतंजलि योगपीठ गये थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ सब कुछ तो ठीक था किन्तु जो पंखे लगे थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे विदेशी कम्पनियों के थे। अरे भाई! वो पंखे यदि २० वर्ष पूर्व किसी दानदाता ने दान दिये थे तो अब क्या उन्हें फेंक दें। किसी के घर जाते हैं तो कहते हैं कि उन सास-बहू की आपस में बनती नहीं है। वैसे तो दोनों मुस्कुरा रहे थे किन्तु वह सब बनावटीपन था। ये जो व्यक्ति बयान कर रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये आर्य समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ या उस अमुक व्यक्ति के घर की स्थिति को बयान नहीं कर रहा अपितु अपनी दृष्टि को बयाँ कर रहा है कि इस संसार को देखने की उसकी दृष्टि कैसी है। संसार को देखने का उसका अभ्यास कैसा है। जिसका देखने का अभ्यास सुन्दर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे कीचड़ में भी कमल दिखाई देता है। उसे कीचड़ दिखाई देता ही नहीं है। और जिसका देखने का अभ्यास सुन्दर नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे चन्द्रमा में भी दाग दिखाई देता है। ये सब हमारे अभ्यास का ही परिणाम है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सफलता को पचाने का अभ्यास</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अभ्यासों की इस कड़ी में हमें सफलता पाने पर न इतराने का अभ्यास और प्रतिकूलता आने पर न घबराने का अभ्यास करना है। व्यक्ति को जब थोड़ी सी सफलता प्राप्त होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थोड़ी अनुकूलता आती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यश मिलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुकीर्ति मिल जाती है तो वह भूल जाता है कि मैं कहाँ से चला था। वह भूल जाता है कि जो मुझे मिला है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह कहाँ से मिला है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैसे मिला है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और अभी भी मुझे जो मिल रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके पीछे कितने लोगों का आशीर्वाद है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">वह अपनी सफलता की कहानी भूल जाता है। वह एरोगेन्ट हो जाता है और थोड़े दिन में लोग उसे अपने जीवन से बाहर कर देते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अत: व्यक्ति को सफलता पचाने का अभ्यास भी होना चाहिए। अनुकूलताओं में भी अपने आप को स्थिर रखने का अभ्यास होना चाहिए। क्योंकि पौधे के ऊपर जो पुष्प खिला है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह तभी खिला जब तक जड़ से जुड़ा है। यदि वह जड़ की परवाह न करे और सोच ले कि जड़ का क्या अस्तित्व है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह तो मिट्टी में दबी पड़ी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोग तो मेरी वाह-वाह करते हैं। और जिस दिन वह अपनी जड़ों से कट जायेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी दिन सूख जायेगा। उस पुष्प की सुन्दरता और वाह-वाही के पीछे मिट्टी में दबी वो जड़ें हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कभी दिखती नहीं हैं। यही है अनुकूलताओं में अपने को स्थिर रखने का अभ्यास।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अनुकूलताओं के साथ-साथ जीवन में प्रतिकूलताएँ भी आती हैं। प्रतिकूलताओं में न घबराने का अभ्यास भी हमें होना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं तो व्यक्ति अवसाद में चला जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टूट जाता है। यह हम सबकी समस्या है। हम सब अच्छी-अच्छी बातें जानते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बोलते हैं किन्तु जब हमारे जीवन में प्रतिकूलताएँ आती हैं तो रोने लगते हैं। यदि थोड़े समझदार हैं तो दूसरों के सामने मुस्कुराते हैं और अन्दर एकांत में जाकर रो लेते हैं। किन्तु सहनशक्ति तो नहीं है ना। अन्दर रोयें या बाहर रोयें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये हमारी कमजोरी का प्रतीक तो है ही। शक्ति वही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्दर भी ईश्वर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाहर भी ईश्वर है किन्तु सत्संग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपासना उस अन्दर वाले अव्यक्त को सक्रिय कर देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभिव्यक्त कर देते हैं। अत: सत्संग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपासना का भी अभ्यास हमें होना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अपना अभिनय सही प्रकार से करने का अभ्यास</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हम सभी जीवन में अभिनय कर रहे हैं। एक उदाहरण के तौर पर एक प्रसंग प्रस्तुत है- एक व्यक्ति मंच पर अभिनय कर रहा था। उस अभिनय में उसका किरदार था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कि उसका जहाज पानी में डूब गया। उसके बीवी-बच्चे मर गये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका व्यापार नष्ट हो गया। इन सब घटनाओं से उसे हृदयाघात (हार्ट-अटैक) होता है और वह मर जाता है। वह व्यक्ति उस अभिनय को पूरी तन्मयता के साथ निभाता है। अब वह मंच पर मरणासन अवस्था में पड़ा है। उसके सगे संबंधी उसे चारों ओर से घेरे हुए हैं तथा रो रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिलख रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस व्यक्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कुछ लोग उसे उठाकर ले जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब भी वह उसी अवस्था में रहता है। किन्तु नाटक समाप्ति के थोड़ी देर बाद देखा तो वह मंच के नीचे खड़ा चाय पी रहा है। एक व्यक्ति ने बड़े अचरज से पूछा कि अभी कुछ देर पहले तो आप मर गये थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और अभी हँस रहे हैं। अभिनेता ने उस व्यक्ति को समझाया कि मैं तो मंच पर अभिनय कर रहा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह कहानी मेरी नहीं थी। फिर वह उस व्यक्ति को अपना परिचय देते हुए कहता है कि मैं तो अमुक स्थान पर रहता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा पूरा परिवार है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बीवी-बच्चे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनके भरण-पोषण के लिए मैं यह सब कर रहा हूँ। मेरी कहानी तो दूसरी है। किन्तु यदि महर्षि दयानन्द की दृष्टि से देखें तो पता चलेगा कि वह कहानी भी उसकी नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ भी वह किरदार ही निभा रहा है। कहीं पति का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं बेटे का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं भाई का तो कहीं बिजनेसमैन का। असली कहानी तो यह है कि मैं एक विशुद्ध आत्मा हूँ। इसमें न तो कुछ जोड़ा जा सकता है और न ही घटाया जा सकता है। आज से ५०-१०० साल पहले कोई और अभिनय करके चले गये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई और प्रधान थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज आप प्रधान हैं। आज से १०० साल पहले बोलने वाले कोई और थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज बोलने वाले कोई और हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कल कोई और होंगे। सब अभिनय कर रहे हैं। मंच पर ३ घंटे की कहानी वाला अभिनय तो बहुत अच्छा कर लेते हैं और अभिनय करने वाले को भी संतुष्टि मिलती है कि मैंने बहुत अच्छा अभिनय किया। दूसरे भी सराहना करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन यह सारा जीवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह संसार भी तो उस ईश्वर का ही रंगमंच है। हम इस मंच पर अभिनय कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये हम भूल जाते हैं। तब हमें लगता है कि मेरा सदा से यही अस्तित्व है। आप सोचें की बचपन से अभी तक हमने कितने अभिनय किए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी छोटे बच्चे का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी युवा का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी विद्यार्थी का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी वक्ता का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी पति का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी पत्नी का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कितने दोस्त हमें छोड़कर चले गए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कितने नए दोस्त हमारे साथ आए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये सब चलता रहता है। ये सब अभ्यास हमें करने हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छी सास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छी बहू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छा पति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छी पत्नी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छा पुत्र बनने का अभिनय करने का अभ्यास हमें करना है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category> फरवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 Feb 2019 21:40:45 +0530</pubDate>
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