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                <title>चरित्र - योग संदेश</title>
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                <description>चरित्र RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>अपनी प्राथमिकताओं को पहचानें</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">स्वामी अथर्वदेव<span>  </span></span></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1551/apni-prathmiktaon-ko-pahachane"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/253.jpg" alt=""></a><br /><table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#BA372A;border-color:#BA372A;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(186,55,42);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(236,240,241);"><strong>प्रभु-अनुग्रह से यह मानव-जीवन सबसे श्रेष्ठ है और इसकी श्रेष्ठता का भान जिस समय व्यक्ति को होता है, उसी समय से जीवन अप्रतिरोध के साथ निरन्तर उन्नति करता है। ईश्वर की अनुकपा से मानव को अप्रतिम कुशलता व क्षमता का अमूल्य भंडार मिला है, लेकिन इस भंडार को पाने के लिए मनुष्य को क्या करना चाहिए, जिससे वह जीवन में कुशल बन सके, स्वयं के साथ-साथ संपूर्ण समाज व राष्ट्र की उन्नति कर सके।</strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ह</span><span lang="hi" xml:lang="hi">मारे ऋषियों ने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे शुभचिन्तक महापुरुषों ने जीवन की उलझी गुत्थियों को सुलझाकर हमें निरन्तर प्रगति की राह दिखाई। उन्होंने अनेक मार्ग बतलाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन कुछ मार्ग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ दिशाएँ सभी ने समान रूप से दिखलाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनमें से कुछ दिशाएँ तो विश्व के प्रत्येक मनुष्य के लिए अत्यन्त आवश्यक हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि वह भौतिक या आध्यात्मिक जीवन में उन्नति करना चाहता है। </span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी प्राथमिकताओं को पहचानें </span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ प्राथमिकताएँ ऐसी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सभी मनुष्यों के लिए आवश्यक हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे- </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">चरित्र </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मानव जीवन को श्रेष्ठ बनाने में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वहित समर्पित बनाने में सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">चरित्र’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का होता है। कोई भी मनुष्य चाहे किसी भी जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्प्रदाय से संबंध रखता हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका चरित्र निष्कलंक व निष्कपट होना चाहिए। अपनी शालीनता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विनम्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भद्रता को कभी भी न्यून नहीं होने देना चाहिए। इस तरह चरित्र हमारी सबसे पहली प्राथमिकता है। श्रद्धेय स्वामी जी महाराज एक बात को बार-बार कहते हैं कि विद्वान् हर कोई नहीं बन सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु धर्मात्मा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चरित्रवान् तो सभी बन सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि किसी भी संत को उसका चरित्र ही संत बनाता है। हमें चरित्र विकास में स्वयं का अधिकांश समय लगाना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि चरित्र बहुत व्यापक शब्द है। इसमें हमारी समस्त चेष्टाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे समस्त कर्तव्य समाहित हो जाते हैं। हमारा संपूर्ण व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे वह वाणी से हो या शरीर से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी बौद्धिक गतिविधि हो या शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन समस्त चेष्टाओं का परिणाम हमारा चरित्र होता है। इसलिए शुद्ध चरित्र निर्माण को अपनी प्राथमिकता बनाकर उसे अपने अतीत से बेहतर बनाना चाहिए। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अभ्यास</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अभ्यास भी चरित्र की तरह बहुत व्यापक शब्द है। हमारी सारी चेष्टाएँ हमारे पुराने अभ्यासों का ही परिणाम हैं। यहाँ तक कि हमारे विचार भी हमारे अभ्यासों का ही नतीजा हैं। सभी महापुरुषों या श्रेष्ठ व्यक्तियों के जीवन को यदि आप देखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आप पाएँगे कि सभी के अभ्यास कितने कुशल हैं। उनके एक-एक अभ्यास में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण प्रामाणिकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण निष्ठा व पूर्ण कत्र्तव्य परायणता दृष्टिगोचर होती है।</span></h5>
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#BA372A;border-color:#BA372A;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(186,55,42);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(236,240,241);"><strong>हमारा संपूर्ण व्यवहार, चाहे वह वाणी से हो या शरीर से, हमारी बौद्धिक गतिविधि हो या शारीरिक, इन समस्त चेष्टाओं का परिणाम हमारा चरित्र होता है। इसलिए शुद्ध चरित्र निर्माण को अपनी प्राथमिकता बनाकर उसे अपने अतीत से बेहतर बनाना चाहिए।</strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्येक मनुष्य की प्रकृति पृथक् होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि सभी के अभ्यास व पुरुषार्थ पृथक् होते हैं। यदि कोई भी एक बुरा अभ्यास या गलत जगह किया हुआ पुरुषार्थ दृढ़ हो जाता है अर्थात् वह हमारे स्वभाव में आ जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जीवन अवनति की राह पर आरूढ़ हो जाता है। फिर उस गलत अभ्यास के हम इतने आदी हो जाते हैं कि वह सामान्य जागरुकता से खत्म नहीं होता। इसके लिए हमें परम पुरुषार्थ व परम जागरुकता रखनी पड़ती है। प्रत्येक मनुष्य की हर समय कुछ प्राथमिकताएँ होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे प्राथमिकताएँ हर एक  व्यक्ति की अलग-अलग होती हैं। वेे बहुत ही श्रेष्ठ या अनुकरणीय भी हो सकती हैं या फिर हीन व अशोभनीय भी हो सकती हैं। अत: मनसा-वाचा-कर्मणा हमारे अभ्यास अत्यंत पवित्र हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आसुरी सम्पदा से मुक्त हों। आसुरी सम्पदा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कि गीता (१६/४) में वर्णित है- </span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span style="color:rgb(224,62,45);"><span lang="hi" xml:lang="hi">द</span><span lang="hi" xml:lang="hi"></span><span lang="hi" xml:lang="hi">भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोध: पारुष्यमेव च।</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span style="color:rgb(224,62,45);"><span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ स</span><span lang="hi" xml:lang="hi"></span><span lang="hi" xml:lang="hi">पदमासुरीम्।।</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन आसुरी सम्पदाओं से पूर्णतया मुक्त होकर जीने के अभ्यास को हमें प्राथमिकता देनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि ये मानव जीवन को जड़ बना देती हैं। उसके जीवन का सारा चैतन्य छीन लेती हैं तथा व्यक्ति एक यंत्र की भाँति कार्य करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कि पूर्ण रूप से पराधीन होता है। इसलिए अभ्यास को पूर्ण रूप से शुद्ध व कुशल बनाना हमारी प्राथमिकता है। वह अभ्यास चाहे ब्रह्म मुहूर्त में उठने का हो या वरिष्ठों केअभिवादन का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा छोटे से छोटा अभ्यास भी संपूर्णतया परिमार्जित व संस्कारित होना चाहिए। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">समय प्रबंधन व सदुपयोग </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी भी क्षेत्र (Field) का व्यक्ति हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे वह आध्यात्मिक पथ का पथिक हो या वह भौतिकता के मार्ग का चयनकर्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि उसे उस क्षेत्र के श्रेष्ठ शिखर पर आरोहण कर उसे पाना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो चरित्र व अभ्यासों के साथ उसे समय प्रबंधन व उसका सदुपयोग भी करना होगा। यह भी एक अभ्यास ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर प्रधानता के कारण पृथक् रूप से इसका वर्णन आवश्यक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि बिना समय प्रबंधन के व्यक्ति का निर्माण कदापि नहीं हो सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही प्रत्येक कुशलता को पाने के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पूर्णता को पाने के लिए एक निश्चित समय में निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कि बिना समय प्रबंधन के नहीं हो सकता है। अब इसमें एक समस्या यह </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भी आती है कि समय का प्रबंधन तो कर लिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर सदुपयोग नहीं हो पाता। उसके लिए हमें ही जागरूक होना पड़ेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि शिखर भी तो हमें ही चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान को उपजाऊ बनाओ</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि हम ईमानदारी से स्वयं का अवलोकन करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हम पाएँगे कि हमारा अधिकांश समय या तो अतीत की चिन्ताओं में बीतता है या भविष्य की कल्पनाओं में। हमने वर्तमान को नहीं संभाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे उपजाऊ नहीं बनाया। यही हमारे सारे दु:खों का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी आत्मग्लानि का मुख्य कारण है और आत्मग्लानि को शास्त्रों में मृत्यु कहा गया है। जो हम सोचते हैं और कर नहीं पाते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो तत्क्षण हमारे अंदर मृत्यु घटित होती है। हमारे संकल्पों की मृत्यु ही हमारी मृत्यु है। इसलिए यदि इस मृत्यु से पार जाना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वर्तमान को बाँझ होने से बचाना होगा। वर्तमान को हमें सींचना होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब जाकर हमारे संकल्पों की चेतना जीवित रह सकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्यथा मृत्यु़ सदैव प्रतीक्षारत है। अत: वर्तमान की जागरुकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सजगता हमारी प्राथमिकता है। इसे जीवन में धारण कर हम आत्मोन्नति का सफल मार्ग चयन कर सकते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार हमें जीवन में इसी तरह की प्राथमिकताएँ तय करनी पड़ेंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सार्वभौमिक व सार्वकालिक हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जीवन इतना विराट है कि यदि मनुष्य केवल चिंतन करे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उम्र भर का समय जीवन के क्षेत्रों के चिंतन मात्र में निकल सकता है। अत: चाणक्य नीति के श्लोक में जिस तरह सारभूत अमृत की उपासना की बात कही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी तरह हम अपनी प्राथमिकताओं की भी उपासना करें अर्थात् उनका वरण करें। </span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span style="color:rgb(224,62,45);"><span lang="hi" xml:lang="hi">अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्या</span>,</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(224,62,45);" xml:lang="hi">अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(224,62,45);" xml:lang="hi">यत्सारभूतं तदुपासनीयं</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span style="color:rgb(224,62,45);"><span lang="hi" xml:lang="hi">हंसो यथा क्षीरमिवा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"></span><span lang="hi" xml:lang="hi">बुमध्यात्।।</span></span></strong></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category> फरवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 Feb 2019 21:36:45 +0530</pubDate>
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