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                <title>शिक्षा के क्षेत्र में पतंजलि का योगदान - योग संदेश</title>
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                <description>शिक्षा के क्षेत्र में पतंजलि का योगदान RSS Feed</description>
                
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                <title>शिक्षा के क्षेत्र में पतंजलि का योगदान</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">साध्वी देवश्रुति</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1664/shiksha-ke-kshetra-me-patanjali-ka-yogdan"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/156.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<table style="border-collapse:collapse;width:100.026%;border-width:1px;background-color:#D8C139;border-color:#D8C139;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8555%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(216,193,57);">
<h5 style="text-align:justify;"><strong>‘एतद्देश प्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन:। स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवा:।।’ इस वैदिक उद्घोष को चरितार्थ करना पतंजलि योगपीठ के शिक्षा प्रकल्पों का ध्येय है। जो अग्रिम 15-20 वर्षों में समस्त जगत् में निश्चित रूप से पूर्ण होकर भारतवर्ष को पुन: परम वैभवशाली शक्तिसंपन्न व विश्वगुरु पद पर प्रतिष्ठित राष्ट्र के रूप में पहचान दिलाएगा।</strong></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शि</span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्षा शब्द शिक्ष-विद्योपादाने धातु से बना है जिसका अर्थ है विद्या को ग्रहण करना अर्थात् ज्ञान को आचरण में लाना वास्तविक रूप में शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कारों का वह परिणाम है जो पाशविक चेतना का आरोहण अतिमानस चेतना में करके मानव को महामानव बना देता है। वर्तमान समय में शिक्षा का अभिप्राय कुछ बाह्य सूचनाओं के एकत्रीकरण मात्र में संकुचित हो गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि वैदिक दृष्टिकोण के आधार पर शिक्षा उन सिद्धान्तों का समूह है जिनके माध्यम से एक दिव्य व्यक्तित्व का निर्माण किया जाता है। वैदिक परम्परा में शिक्षा शब्द का प्रयोग अत्यन्त व्यापक रूप में किया जाता रहा है और इसके अनेकों प्रमाण प्रचीन वैदिक वाङ्मय में बहुधा देखने को मिलते हैं। वैदिक दृष्टिकोण के आधार पर शिक्षा वह तत्त्व है जिसके बिना मनुष्य मनुष्य नहीं होता अपितु पशु के समान होता है। शिशु के व्यक्तित्व का निर्माण उसको मिल रहे संस्कारों से होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कारों को दो भागों में बाँटा जा सकता है- १. प्रसव से पूर्व के संस्कार और २. प्रसवोत्तर संस्कार।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन दोनों ही प्रकार के संस्कारों को नियन्त्रित करने के लिए वैदिक विचारधारा में विशेष व्यवस्था की गई है। इसी व्यवस्था को मूल में रखते हुए पतंजलि योगपीठ के विभिन्न प्रकल्पों के माध्यम से ऋषियुग को पुन: प्रतिष्ठापित करने के लिये अहर्निश निष्काम भाव से परमार्थ के कार्य किये जा रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें से शिक्षा के क्षेत्र में अभिनव क्रान्ति दिव्य मानव निर्माण व ऋषि युग की पुन: प्रतिष्ठापना के लिये आधार-भूत है। परम पूज्य प्रात:स्मरणीय हम सभी के प्रेरणास्रोत योगर्षि श्रद्धेय स्वामी जी व सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समर्पण जैसे दिव्य भावों की प्रतिमूर्ति आयुर्वेद शिरोमणि श्रद्धेय आचार्य जी स्वयं ही शिक्षाओं के अजस्र स्रोत हैं। जिनका जीवन मानव मात्र के लिए पथप्रदर्शक व ऋषि संस्कृति की जीवन्तता का प्रतिरूप है। वे वर्षों पुरानी परम्परा को पुन: प्रतिष्ठापित करने के अपने क्रान्तिकारी व परम पुनीत उद्देश्य को मूल में रखते हुए विगत कई वर्षों से अहर्निश सेवारत हैं। जिसके फलस्वरूप पतंजलि योगपीठ में शिक्षा के कई प्रकल्प अत्यन्त प्रामाणिकता के साथ चल रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में और अधिक प्रामाणिकता लाने के लिए कुछ प्रकल्पों जैसे- प्रसव से पूर्व संस्कारों के लिए नव दम्पत्ति प्रशिक्षण शिविर व </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि बाल गुरुकुलम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे नूतन प्रकल्पों का प्रारम्भ इसी वर्ष किया जा रहा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि गुरुकुलम्</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे भारतवर्ष का शैशव व बाल्यकाल आन्तरिक व बाह्य दोनों दृष्टियों से परिपूर्ण हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विवेकशील व जागृत हो आगे चलकर वह समस्त समाज व राष्ट्र का नेतृत्व कर सके व ऋषि संस्कृति का सच्चा उत्तराधिकारी बन सके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए परमपूज्य श्री स्वामी जी एवं आचार्य जी ने पतंजलि गुरुकुलम् प्रकल्प प्रारम्भ किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ </span>9-11<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ष के बालक व बालिकाओं का प्रवेश कक्षा </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> में होता है। किसी भी बालक या बालिका के व्यक्तित्व को पूर्ण विकसित करने के लिये </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> तत्वों का होना अत्यन्त आवश्यक है- १. प्रारब्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">२. पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">३. श्रेष्ठ प्रशिक्षक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">४. श्रेष्ठ प्रशिक्षण व ५. श्रेष्ठ वातावरण।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य स्वामी जी एवं श्रद्धेय आचार्य जी के माध्यम से व्यक्तित्व के सर्वाङ्गीण विकास के लिए उपर्युक्त पाँचों तत्वों का समावेश पतंजलि गुरुकुलम् में मूर्तरूप ले रहा है। श्री स्वामी जी महाराज का मानना है कि जैसे-जैसे आयु बढ़ती है वैसे-वैसे संस्कारों में सुधार की संभावना का प्रतिशत कम होता जाता है। संस्कार ही आगे चलकर स्वभाव के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। संसार में सबसे महान् और दुरूह कार्य है स्वभाव परिवर्तन। अत: बालक-बालिकाओं में बाल्यकाल से ही श्रेष्ठ संस्कार पड़ें व उनके मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर व आत्मा ये सब स्वस्थ व सबल होवें इसके लिए ये प्रकल्प अहर्निश सेवारत रहता है। पतंजलि गुरुकुलम् के विद्यार्थी प्राचीन ऋषि-मुनियों की श्रेष्ठ परम्परा के जीवन्त संवाहक हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे समझ पाएँ कि ऋषियों ने वैदिक संस्कृति का जो अमूल्य उपहार हमारे लिए दिया गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह जीवन की पूर्णता के लिए अत्यंत आवश्यक है। पतंजलि गुरुकुलम् के विद्यार्थियों को बाल्यकाल से ही त्याग तपस्या संयम सदाचार का जीवन्त पाठ पढ़ाया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे कि वे जीवन के किसी भी मोड़ पर स्वयं को असहाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लाचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पराधीन या शक्तिहीन न समझें अपितु आत्मोन्नति के द्वारा राष्ट्रोन्नति का मार्ग प्रशस्त करें। पतंजलि गुरुकुलम् के विद्यार्थियों का मस्तिष्क पूर्ण प्रज्ञावान् हृदय दिव्य संवेदनाओं से भरा हुआ व शरीर स्वस्थ व बलवान् हो उनकी बुद्धि विवेकवती हो इसके लिए गुरुकुलम् के छात्रों को एक विशिष्ट दिनचर्या का अनुष्ठान कराया जाता है। पतंजलि गुरुकुलम् की संकल्पना का आधार ऋषि युग की पुन: प्रतिष्ठा का संकल्प है। यह प्रकल्प अब और वृहद् रूप ले रहा है जिसके अन्तर्गत पतंजलि बाल गुरुकुलम् का प्रकल्प इसी वर्ष प्रारम्भ किया जा रहा है जिसमें </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>7<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ष के बालक व बालिकाओं को प्रवेश दिया गया। उन्हें विभिन्न माध्यमों से प्रशिक्षित किया जाएगा। </span>3-5<span lang="hi" xml:lang="hi"> भाषाओं के ज्ञान के साथ-साथ उन्हें आध्यात्मिक रूप से सशक्त व पूर्ण जीवन जीने के लिए संस्कारित किया जाएगा। यही नहीं नव दम्पत्तियों को एक दिव्य मानव निर्माण योजना के अन्तर्गत प्रशिक्षित किया जाएगा कि किस प्रकार जीवनचर्या रहन सहन आचार-विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आहार व व्यवहार से वे दिव्य आत्माओं को अवतरित कर सकते हैं। पतंजलि द्वारा किए जा रहे ये सेवाकार्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य मानव निर्माण योजना व शिक्षा के सभी प्रकल्पों का एकमात्र ध्येय है कि इस समस्त भूमण्डल पर पुन: रामराज्य स्थापित हो सके। हमारे ऊपर अत्याचारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रष्ट व चोर शासन न करें अपितु ऋषि-ऋषिकाओं की संस्कृति के माध्यम से अभ्युदय और नि:श्रेयस की सिद्धि होवे व धर्म की विजय हो।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्यकुलम्</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतवर्ष के श्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों में से एक है आचार्यकुलम्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी प्रतिष्ठापना का उद्देश्य ऐसी दिव्य प्रतिभायुक्त ईमानदार सजग शिक्षक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिकित्सक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इंजीनियर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यापारी व अधिकारी आदि तैयार करना है जो समस्त राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को न सिर्फ  समझें अपितु उनका निर्वहन भी कर सकें व देश को भौतिक दृष्टि से समृद्धिशाली बनाने में अपना अतुलनीय योगदान दे सकें। आचार्यकुलम् में सी.बी.एस.ई. पैटर्न के साथ-साथ वैदिक शिक्षा का भी अनिवार्य रूप से समावेश है। जिससे की बालक-बालिकाओं में अपने देश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म व संस्कृति के प्रति स्वाभिमान रहे। विगत लगभग </span>7<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों में आचार्यकुलम् ने अपनी सेवाओं का परिचय अनेकानेक प्रतियोगिताओं व परीक्षाओं में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करके दिया है। आचार्यकुलम् की मूल शाखा पतंजलि योगपीठ हरिद्वार में स्थित है व भावी योजनाओं के तहत और कई आचार्यकुलम् देश के विभिन्न स्थानों पर प्रारम्भ हो रहे हैं जिनमें से एक आचार्यकुलम् राँची में प्रारम्भ हो चुका है। आचार्यकुलम् में योग्य व प्रशिक्षित शिक्षकों के माध्यम से बालकों के सर्वाङ्गीण विकास पर अत्यधिक बल दिया जाता है। विगत </span>7<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों के अत्यल्पकाल में ही साहित्य-संगीत कला आदि के क्षेत्रों में उत्कृष्ट स्थान प्राप्त करने के साथ-साथ राष्ट्रपति सम्मान से भी आचार्यकुलम् के विद्यार्थियों ने ख्याति प्राप्त की है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वैदिक गुरुकुलम् व वैदिक कन्या गुरुकुलम्</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैदिक गुरुकुलम् व वैदिक कन्या गुरुकुलम् पतंजलि योगपीठ के वे अद्वितीय प्रकल्प हैं जहाँ पावन प्रारब्ध व पुनीत संकल्प वाले उन युवक-युवतियों को भारतीय आर्ष ज्ञान परम्परा में शिक्षित-दीक्षित करके ऋषियों का सच्चा उत्तराधिकारी बनाने का महान् यज्ञ अहर्निश निर्बाध रूप से चल रहा है। जिन्होंने अपना सर्वस्व राष्ट्रहित व ऋषि युग की पुन: प्रतिष्ठा के लिये न्यौछावर कर दिया है व अपना एक-एक पल इस परम पावनी वैदिक ज्ञान परम्परा के उत्थान के लिये समर्पित कर रहे हैं। वे युवक-युवतियाँ जिनके जीवन का एक मात्र ध्येय अपनी प्राचीन संस्कृति का पुन: प्रतिष्ठित करके रामराज्य के सपने को साकार करना है। जिन्होंने वसुधैव कुटुम्बकम् के दिव्य भाव को आत्मसात् कर लिया है उनकी सम्पूर्ण शिक्षा-दीक्षा वैदिक गुरुकुलम् व वैदिक कन्या गुरुकुलम् के माध्यम से होती रही हैं। क्रान्तद्रष्टा युगपुरुष वैदिक युग की पुन: प्रतिष्ठापना के लिए कृतसंकल्प वर्तमान युग में आर्ष संस्कृति के संवाहक परम पूज्य योगर्षि व श्रद्धेय आचार्य जी के इस महान् यज्ञीय संकल्प के साथ संकल्पित युवक-युवतियाँ इस गुरुकुल में रहकर सम्पूर्ण वैदिक वाङ्मय अर्थात् वेद वेदाङ्ग दर्शन शास्त्र उपनिषद् ब्राह्मण आरण्यक एवं सम्पूर्ण व्याकरण का अध्ययन व अध्यापन करके दिव्य व्यक्तित्व युक्त नेतृत्व को व नाना तरह के कौशलों को विकसित करके भावी स्वर्णिम भारत के स्वप्न को साकार करने में निष्काम भाव से अहर्निश समर्पित रहते हैं। ये सर्वात्मना समर्पित युवा ब्रह्मचर्य से संन्यास का मार्ग अपना कर अपनी समस्त शक्तियों का उपयोग राष्ट्रहित व ऋषि संस्कृति की पुन: प्रतिष्ठापना के लिए करते हैं।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/218.jpg" alt="21"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि वेदवाक्यों व महापुरुषों के कथनानुसार जितना उपकार संसार का एक ब्रह्मचारी संन्यासी कर सकता है उतना अन्य नहीं अर्थात् यह मार्ग पूर्णतया परमार्थ का मार्ग है। वैदिक गुरुकुलम् एवं वैदिक कन्या गुरुकुलम् परम श्रद्धेय श्री स्वामी जी महाराज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य श्री एवं गुरु जी व अनेक विद्वान् आचार्यों व कई विदुषी आचार्याओं के निर्देशन में निरन्तर प्रगतिशील है। शताब्दियों से चली आ रही स्वर्णिम एवं वैभवशाली परम्परा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सांस्कृतिक विचारधारा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यात्मिक ज्ञान विज्ञान व सामाजिक भावनाओं के पुनरुत्थान का प्रकल्प है। वैदिक गुरुकुलम् एवं वैदिक कन्या गुरुकुलम् के स्नातक चरित्रवान्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्वान्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बलवान्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्मात्मा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देशभक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दृढ़व्रती व गुरुनिष्ठ होकर देश-विदेश में भारतीय ऋषि ज्ञानपरम्परा के संवाहक बनें यही परमपूज्य गुरुजनों का स्वप्न है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">त्याग तपस्या संयम व पुरुषार्थमय दिव्य वातावरण जहाँ श्रेयपथ के राही श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरुओं के प्रेमपूर्ण सानिध्य में निरन्तर गतिमान है वह एकमात्र वैदिक गुरुकुलम् व वैदिक कन्या गुरुकुलम् है। इस प्रकल्प में </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi">वीं</span>, 12<span lang="hi" xml:lang="hi">वीं या स्नातक परास्नातक आदि उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुके मात्र उन युवक-युवतियों का प्रवेश प्रतिवर्ष रामनवमी व गुरुपूर्णिमा के पावन अवसर पर होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनके जीवन का एक मात्र ध्येय परमार्थ है जो स्वयं प्रकाशित होकर समस्त विश्व को प्रकाशित करना चाहते हैं। वैदिक गुरुकुलम् व वैदिक कन्या गुरुकुलम् का प्रत्येक अन्तेवासी अपना निर्माण एक व्यक्ति नहीं अपितु ऋषि वंश परम्परा व शाश्वत संस्कृति के संवाहक के रूप में कर रहे हैं। अहंशून्य होकर निरन्तर अहर्निश सेवा व साधना से ऋषिवंश्य भावी भविष्य के निर्माण में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि विश्वविद्यालय</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ के माध्यम से सर्वप्रथम सन </span>2006<span lang="hi" xml:lang="hi"> में ऋषि पतंजलि के नाम पर पतंजलि विश्वविद्यालय की स्थापना की गई। पतंजलि विश्वविद्यालय के माध्यम से योग ऋषि स्वामी रामदेव जी एवं आयुर्वेद शिरोमणि आचार्य बालकृष्ण जी ने उच्च गुणवत्ता युक्त मूल्य आधारित शिक्षा को आधार बनाकर योग व यज्ञ की परम पावनी परम्परा को पुन: प्रतिष्ठापित करके युवाओं के दिव्य व्यक्तित्व निर्माण में कुशल मार्गदर्शन किया व अहर्निश कर रहे हैं। योगऋषि श्रद्धेय स्वामी जी एवं आयुर्वेद शिरोमणि श्रद्धेय आचार्य जी ने पतंजलि विश्वविद्यालय के माध्यम से योग एवं आयुर्वेद पर आधारित जीवनशैली के द्वारा स्वास्थ्य एवं खुशहाली का मार्ग प्रशस्त किया व प्रकृति की ओर लौटने का सिंहनाद किया। आज पतंजलि विश्वविद्यालय अबाध गति से एक वृहद् रूप लेता जा रहा है जहाँ योग के साथ-साथ संस्कार जैसे कई विषयों का अध्यापन किया जा रहा है और आने वाले </span>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों में यह एक विशाल आकार लेकर ऋषि युग को पुन: प्रतिष्ठापित करने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इस विश्वविद्यालय के माध्यम से अनेकों युवक-युवतियों को न केवल आजीविका के साधन मिले हैं अपितु जीवन जीने के कौशल का विकास हुआ है। हमारा भौतिक विकास अर्थात् अभ्युदय यदि नि:श्रेयस पर आधारित न हुआ तो उसके परिणाम विनाशकारी होते हैं। अत: पतंजलि विश्वविद्यालय की संकल्पना का आधार संस्कार आधारित शिक्षा है। यहाँ प्रत्येक विद्यार्थी की सुबह योग से होती है और दिन भर कर्मयोगमय जीवन जीकर वे अपना विकास करते हैं पतंजलि विश्वविद्यालय का उद्देश्य विद्यार्थी को मात्र व्यवसाय के योग्य बनाना नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु उनके व्यक्तित्व का सर्वाङ्गीण विकास करके सामाजिक सौहार्द को जागृत करना है जिससे कि एक प्राचीन नींव पर नये युग का भवन खड़ा किया जा सके। अध्यात्मवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य-रक्षण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अखण्ड भारतीय शिक्षा एवं उद्यमिता शिक्षा के इन चार स्तम्भों पर पतंजलि विश्वविद्यालय विशेष रूप से प्राथमिकता देता है। इस प्रकार स्वदेशी शिक्षा पद्धति से युवाओं में दिव्य संस्कारों का बीजारोपण करके उनमें अन्तर्निहित उच्च संभावनाओं का जागरण व दिव्य गुणों का विकास होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे कि विद्यार्थी एक सफल आदर्श प्रेरक व्यक्तित्व व स्वावलम्बी बनते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि आयुर्वेद महाविद्यालय</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार आयुर्वेद महाविद्यालय में अपनी प्राचीन भारतीय चिकित्सा प्रणाली आयुर्वेद का (पठन-पाठन) अध्यापन उच्च गुणवत्तायुक्त वातावरण में कराया जाता है। विद्यार्थियों के विकास के लिये वह सब कुछ किया जाता है जिससे कि वे योग्य बनकर स्वदेशी उद्यमिता व रोजगार के साधनों को बढ़ावा देकर वर्तमान समय की नास्तिकतावदी त्रासदी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य समस्याओं से व बेरोजगारी से निपट सकें। वे परिवर्तनकारी भूमिका निभाकर योग व आयुर्वेद की परम पावनी प्राचीन परम्परा को पुन: प्रतिष्ठापित करके भारतवर्ष को सम्पूर्ण विश्व में एक शक्तिशाली राष्ट्र व जगद्गुरु के पद पर प्रतिष्ठित कर सकें। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">एतद्देश प्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन:। स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवा:।।</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इस वैदिक उद्घोष को चरितार्थ करना पतंजलि योगपीठ के शिक्षा प्रकल्पों का ध्येय है। जो अग्रिम </span>15-20<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों में समस्त जगत् में निश्चित रूप से पूर्ण होकर भारतवर्ष को पुन: परम वैभवशाली शक्तिसम्पन्न व विश्वगुरु पद पर प्रतिष्ठित राष्ट्र के रूप में पहचान दिलाएगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ के माध्यम से संचालित इन सभी प्रकल्पों के संक्षिप्त परिचयोपरान्त मैं यह कहना चाहूँगी कि परमपूज्य स्वामी जी व परम श्रद्धेय आचार्य जी द्वारा संचालित शिक्षा के इन प्रकल्पों का ध्येय व्यापार नहीं अपितु सम्पूर्ण समाज व देश में एक परिवार की भावना का विकास करना है। जो हमारी वैदिक संस्कृति की आधारशिला है। वसुधैव कुटुम्बकम् की वह भावना जिसके आते ही समस्त दुव्र्यसन दुर्गुण अत्याचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रष्टाचार जैसे घृणित कृत्य स्वत: समाप्त हो जाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी भी राष्ट्र का निर्माण किन्हीं जड़ वस्तुओं से नहीं अपितु वहाँ के व्यक्तियों से होता है और व्यक्तियों का विकास तथाकथित स्कूल या कॉलेज में नहीं अपितु गुरुकुल जैसी परमपावनी भूमि पर होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ स्वार्थ का लेश मात्र भी अंश नहीं होता अपितु बालक व बालिकाओं के कोमल हृदय व निश्छल मानस पटल पर सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया: तथा मा गृध: कस्यस्विद्धनम्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इदं विश्वं इदं वरिष्ठम्</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> जैसे श्रेष्ठ भावों को अंकित किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे कि वे एक श्रेष्ठ विश्व नागरिक बनकर समस्त विश्व में ऋषि संस्कृति की प्रतिष्ठा करके पुन: ऋषि युग का संकल्प पूरा करते हैं। अन्त मे हम आह्वान करते हैं उन माता-पिताओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युवक-युवतियों व श्रेष्ठ प्रतिभाओं का जो पूज्य स्वामी जी व श्रद्धेय आचार्य जी के इस महान् यज्ञ में एक-संकल्प होकर अपना योगदान देना चाहते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">ऋषि संस्कृति पुन: प्रतिष्ठित हो हम ये अभिलाषा लाए हैं</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">हम पतंजलि अन्तेवासी ऋषियों के वंशज आए हैं</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">मर्यादा पुरुषोत्तम के हैं हम पुत्र-पुत्रियाँ अनुयायी</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">योगेश्वर जैसे दूर करें बाधा जो पथ में है आयी</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">अपना स्वर्णिम इतिहास आज हम सब दोहराने आये हैं</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">हैं नाना कौशल से विकसित विज्ञान ज्ञान से पूर्ण धरा</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">बनकर आदर्श प्रतिष्ठित हो ये योग यज्ञ की परम्परा</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">अज्ञान दूर कर ज्योतिर्मय जग का सन्देशा लाए हैं</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">है एक ध्येय बस हम सबका ऋषि युग को फिर से लाना है</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">वसुधा कुटुम्ब है बतलाकर एकत्व का पाठ पढ़ाना है</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">गौतम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कणाद और पतंजलि हर दिल में जगाने आये हैं।</span></span></strong></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>भारतीय शिक्षा </category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category>अप्रैल-मई</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 01 Apr 2019 21:37:18 +0530</pubDate>
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