<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/tag/3653/%E0%A4%89%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%80-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AE" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>योग संदेश RSS Feed Generator</generator>
                <title>उज्जायी-प्राणायाम - योग संदेश</title>
                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/tag/3653/rss</link>
                <description>उज्जायी-प्राणायाम RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>दैनिक योगाभ्यास के लिए सर्वश्रेष्ठ आठ प्राणायाम</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[<table style="border-collapse:collapse;width:100.026%;border-width:1px;background-color:#fbeeb8;border-color:#FBEEB8;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8555%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(251,238,184);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(0,0,0);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">म</span><span lang="hi" xml:lang="hi">हर्षि पतञ्जलि प्रणीत अष्टांग-योग का चौथा अंग है-प्राणायाम। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">दो शब्दों से मिलकर बना है-</span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्राण</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आयाम</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। प्राण से तात्पर्य शरीर में संचरित होने वाली वायु (जीवनी शक्ति) से है तथा आयाम का अर्थ नियमन (नियन्त्रण) से है। इस प्रकार प्राणायाम से तात्पर्य हुआ-श्वास-प्रश्वास की क्रिया पर नियन्त्रण करना। इसका अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> करने से सम्पूर्ण</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  शरीर स्वस्थ रहता है।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(0,0,0);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कभी प्राणायाम करने से पूर्व हजार साहस जुटाना पड़ता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज ने इसे न केवल सर्वसुलभ बना दिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु हर कोई आज इसे अपनी</span></strong></span></h5></td></tr></tbody></table>...]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1761/dainik-yogabhyas-ke-liye-sarvshresth-aath-pranayam"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-06/98.jpg" alt=""></a><br /><table style="border-collapse:collapse;width:100.026%;border-width:1px;background-color:#fbeeb8;border-color:#FBEEB8;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8555%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(251,238,184);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(0,0,0);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">म</span><span lang="hi" xml:lang="hi">हर्षि पतञ्जलि प्रणीत अष्टांग-योग का चौथा अंग है-प्राणायाम। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">दो शब्दों से मिलकर बना है-</span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्राण</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आयाम</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। प्राण से तात्पर्य शरीर में संचरित होने वाली वायु (जीवनी शक्ति) से है तथा आयाम का अर्थ नियमन (नियन्त्रण) से है। इस प्रकार प्राणायाम से तात्पर्य हुआ-श्वास-प्रश्वास की क्रिया पर नियन्त्रण करना। इसका अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> करने से सम्पूर्ण</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> शरीर स्वस्थ रहता है।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(0,0,0);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कभी प्राणायाम करने से पूर्व हजार साहस जुटाना पड़ता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज ने इसे न केवल सर्वसुलभ बना दिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु हर कोई आज इसे अपनी स्वस्थ जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा मानने लगा है। प्रस्तुत हैं दैनिक जीवन में प्रयुक्त होने वाले आठ प्राणायाम एवं उनकी अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> विधि:-</span></strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम के सामान्य नियम:</span></strong></span></h5>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम करने का स्थान स्वच्छ एवं हवादार होना चाहिए। यदि खुले स्थान  में अथवा जल (नदी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तालाब आदि) के समीप बैठकर अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो सबसे उत्तम है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">नगरों में जहाँ पर प्रदूषण का प्रभाव अधिक हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ पर प्राणायाम करने से पहले घी का दीपक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अगरबत्ती या धूपबत्ती जलाकर उस स्थान को सुगन्धित करने से बहुत अच्छा रहता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम करते वक्त बैठने के लिए आसन के रूप में कम्बल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चादर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रबरमैट अथवा चटाई का प्रयोग करें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम के लिए सिद्धासन/सुखासन या पद्मासन में मेरुदण्ड को सीधा रखकर बैठें। जो लोग जमीन पर नहीं बैठ सकते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे कुर्सी पर बैठकर भी प्राणायाम कर सकते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम करते समय अपनी गर्दन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रीढ़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छाती एवं कमर को सीधा रखें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास सदा नासिका से ही लेना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे श्वास फिल्टर होकर अन्दर जाता है। मुख से श्वास नहीं लेना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामान्यावस्था में भी नासिका से ही श्वास लें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम करने वाले व्यक्ति को अपने आहार-विहार-आचार-विचार पर विशेष ध्यान रखना चाहिए। सदैव सात्त्विक एवं चिकनाई युक्त आहार ही लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे-फल एवं उनका रस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरी तरकारी-सब्जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घी आदि।</span></h5>
</li>
</ul>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भस्त्रिका-प्राणायाम</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि- किसी ध्यानात्मक-आसन में सुविधानुसार कमर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गर्दन सीधी करके बैठकर दोनों नासापुटों से श्वास को पूरा अन्दर डायफ्राम (महाप्राचीरा पेशी) तक भरना तथा धीरे-धीरे सहजता के साथ छोडऩा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भस्त्रिका प्राणायाम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहलाता है। प्रारम्भ में ढाई सेकेन्ड में श्वास अन्दर लेना एवं उतने ही समय में श्वास को एक लय के साथ बाहर छोडऩा चाहिये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे कि बिना रुके एक मिनट में 12 बार के औसत से पाँच मिनट की एक आवृत्ति में साठ बार (12</span>X5<span lang="hi" xml:lang="hi">=60) बार अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> कर सकें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कफ  की अधिकता या साइनस आदि रोगों के कारण जिनके दोनों नासाछिद्र ठीक से खुले हुए नहीं होते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन लोगों को पहले दायें नासापुट को बन्द करके बायें से रेचक और पूरक करना चाहिए। फिर बायें को बन्द करके दायें से यथाशक्ति मन्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मध्यम या तीव्र गति से रेचक तथा पूरक करना चाहिए</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर अन्त में दोनों नासापुटों से अर्थात् इड़ा एवं पिंगला से रेचक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरक करते हुए भस्त्रिका प्राणायाम करना चाहिए। इसे डायफ्रैग्मेटिक डीप ब्रीदिंग भी कहते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सावधानी:</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जिनको उच्च रक्तचाप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दमा या हृदयरोग हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें तीव्र गति से भस्त्रिका नहीं करनी चाहिये।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्राणायाम को करते समय जब श्वास को अन्दर भरें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब उदर नहीं फु लाना चाहिये। श्वास डायफ्राम तक भरें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे उदर नहीं फूलेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पसलियों तक छाती ही फूलेगी।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इससे शरीर में गर्मी आती है। अत: ग्रीष्म ऋतु में धीमी गति से करना चाहिये।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">लाभ: </span></strong></span></h5>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">भस्त्रिका प्राणायाम के अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> से प्रतिक्रिया समय (</span>Reaction Time<span lang="hi" xml:lang="hi"> अर्थात् किसी भी उद्दीपक के प्रति प्रति</span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्रिया में लिया गया समय) में कमी आती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्दी-जुकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एलर्जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वासरोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दमा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुराना नजला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साइनस आदि समस्त कफ रोग नष्ट होते हैं। फेफड़े सबल बनते हैं तथा हृदय एवं मस्तिष्क को शुद्ध प्राणवायु मिलने से उनको आरोग्य-लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">रक्त परिशुद्ध होता है। त्रिदोष सम होते हैं। यह प्राणोत्थान और कुण्डलिनी जागरण में बहुत सहायक है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कपालभाति-प्राणायाम</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि- कपालभाति में मात्र रेचक पर ही पूरा ध्यान दिया जाता है। पूरक के लिये प्रयत्न नहीं करते</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु सहज रूप से जितना श्वास अन्दर चला जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जाने देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरी एकाग्रता श्वास को बाहर छोडऩे में ही होती है। ऐसा करते हुए स्वाभाविक रूप से उदर में भी आकुञ्चन और प्रसारण की क्रिया होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक सेकेन्ड में एक बार श्वास को लय के साथ छोडऩा एवं सहज रूप से धारण करना चाहिये। इस प्रकार बिना रुके एक मिनट में ६० बार तथा पाँच मिनट में ३०० बार कपालभाति प्राणायाम होता है। कपालभाति प्राणायाम की एक आवृत्ति ५ मिनट की अवश्य होनी चाहिये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ एवं सामान्य रोगों से ग्रस्त व्यक्ति को कपालभाति १५ मिनट तक करना चाहिये। १५ मिनट में ३ आवृत्तियों में ९०० बार यह प्राणायाम हो जाता है। कैंसर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एड्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिप्रेशन आदि असाध्य रोगों में प्रात:-सायं दोनों समय कपालभाति आधा-आधा घण्टा करने से शीघ्र लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सावधानी:</span></strong></span></h5>
<ul style="list-style-type:circle;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पेट की शल्यक्रिया (ऑपरेशन) के लगभग ३ से ६ महीने के बाद ही इस का अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> करें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">गर्भावस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अल्सर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आन्तरिक रक्तस्राव एवं मासिक धर्म की अवस्था में इस प्राणायाम का अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> न करें। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">120 श्वास प्रति मिनट की गति से जब इसका अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> क</span><span lang="hi" xml:lang="hi">िया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब सिम्पथेटिक नर्वस सिस्टम (</span>Sympathetic Nervous System)<span lang="hi" xml:lang="hi"> क्रियाशील होने से रक्तचाप (</span>Blood Pressure)<span lang="hi" xml:lang="hi"> बढ़ जाता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">लाभ: </span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">मोटापा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गैस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कब्ज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अम्लपित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुर्दे तथा प्रोस्टेट से सम्बद्ध सभी रोग निश्चित रूप से दूर होते हैं। हृदय की धमनियों में आये हुये अवरोध खुल जाते हैं। डिप्रेशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भावनात्मक असन्तुलन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घबराहट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नकारात्मकता आदि समस्त मनोरोगों से छुटकारा मिलता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्राणायाम के अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> से आमाशय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्न्याशय (पेन्क्रियाज़)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लीवर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्लीहा व आँतों का आरोग्य विशेष रूप से बढ़ता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इलैक्ट्रोएनसैफॅलौग्राफी में यह पाया गया कि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कपालभाति के दौरान बीटा </span>(Beta)<span lang="hi" xml:lang="hi"> तथा थीटा </span>(Theta)<span lang="hi" xml:lang="hi"> गतिविधि में बढ़ोतरी होती है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु कपालभाति के पश्चात् ऐल्फा (</span>Alpha<span lang="hi" xml:lang="hi">) तथा बीटा </span>(Beta)<span lang="hi" xml:lang="hi"> गतिविधि में गिरावट आती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कपालभाति के द्वारा हृदय गति भिन्नता (</span>Heart rate Variability) <span lang="hi" xml:lang="hi">में कोई कमी नहीं आती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसा कि पहले माना जाता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: हृदय स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से यह एक निरापद अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जब 60 श्वास प्रतिमिनट की गति से इसका अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब सिम्पथेटिक नर्वस सिस्टम क्रियाशील न होने के कारण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तचाप नहीं बढ़ता।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कपालभाति के अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> के दौरान</span>, 41.2<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत अधिक ऊर्जा की खपत होती है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> के पश्चात् ऊर्जा खपत में कोई परिवर्तन नहीं होता। अधिकतम</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> ऊर्जा हमारे खाये हुए कार्बोहाईड्रेट्स </span>(Carbohydrates)<span lang="hi" xml:lang="hi"> से खर्च होती है। अत: यदि कपालभाति का विधिवत् अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> किया जाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब यह वजन कम करने में लाभकारी हो सकता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कपालभाति के अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> के पश्चात् दिमागी रक्त प्रवाह (</span>Brain Blood Flow) <span lang="hi" xml:lang="hi">में कोई वास्तविक परिवर्तन नहीं पाया गया। इसका अर्थ यह हुआ कि कपालभाति द्वारा दिमाग में रक्त का प्रवाह नहीं बढ़ता। अर्थात् स्वस्थ व्यक्तियों में इसका अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> करते समय किसी भी प्रकार के दौरे </span>(Stroke)<span lang="hi" xml:lang="hi"> की आशंका नहीं है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कपालभाति के अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> से एकाग्रता बढ़ती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">मोटे व्यक्तियों में जिन्हें उच्च रक्तचाप </span>(Hypertension)<span lang="hi" xml:lang="hi"> या मधुमेह </span>(Diabetes)<span lang="hi" xml:lang="hi"> है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे कपालभाति के अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> से लाभ प्राप्त कर सकते हैं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु उन्हें अपनी रक्त शर्करा मात्रा </span>(Blood Sugar Level)<span lang="hi" xml:lang="hi"> तथा रक्तचाप की नियमित जाँच करवानी होगी।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कपालभाति छात्रों के लिए (विशेष तौर पर धीमें सीखने वाले) तथा कम से कम 45 मिनट तक एकाग्रता न रख पाने वालों के लिए अति उपयोगी है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बाह्य-प्राणायाम</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि- सिद्धासन या पद्मासन में विधिपूर्वक बैठकर श्वास को एक ही बार में यथाशक्ति पूरा बाहर निकाल दें। श्वास बाहर निकालकर त्रिबन्ध अर्थात् मूलबन्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उड्डीयान बन्ध एवं जालन्धर बन्ध लगाकर श्वास को यथाशक्ति बाहर ही रोककर रखें। जब श्वास लेने की इच्छा बलवती हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब बन्धों को हटाते हुए धीरे-धीरे श्वास लें। श्वास भीतर लेकर उसे बिना रोके ही पुन: पूर्ववत् श्वसन क्रिया कीजिये। ३ से ५ सेकेन्ड में श्वास को सहजता से पूरा अन्दर भरना एवं ३ से ५ सेकेन्ड में ही सहजता से श्वास को बाहर छोड़कर बाहर ही १० से १५ सेकेन्ड रोककर रखना तथा पुन: इसी क्रिया को बिना रुके लगातार करना उत्तम है। इस प्रकार २ मिनट में सामान्यत: ३ से ५ बार बाह्य प्राणायाम आराम से हो जाता है और ५ बार बाह्य प्राणायाम करना सामान्यत: पर्याप्त है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/100.jpg" alt="100"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गुदाभ्रंश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योनिभ्रंश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाइल्स (बवासीर)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिस्टुला (भगन्दर)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यौन रोगों आदि से पीडि़त व्यक्ति इसका एक बार में ११ बार तक अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कर सकते हैं। कुण्डलिनी जागरण के इच्छुक साधक एवं ऊध्र्वरेता होने की प्रबल इच्छा रखने वाले साधक इस प्राणायाम का एक समय में अधिकतम २१ बार तक अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> कर सकते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समस्त स्त्री-रोगों यथा-बन्ध्यत्व/अप्रजनितृत्व (इन्फर्टिलिटी)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदर (ल्यूकोरिया) आदि तथा गर्भाशयगत दोष में भी यह प्राणायाम बहुत लाभप्रद है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सावधानी:</span></strong></span></h5>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">व</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">निम्न</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तचाप</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">एवं</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रोगों</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पीडि़त</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इस</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> नहीं करना चाहिये।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सिर-दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माइग्रेन से ग्रसित रोगी भी इसका अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> न करें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रारम्भ में ही व्यक्ति को इसका अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> न करक</span><span lang="hi" xml:lang="hi">े अन्य प्राणायामों काअभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> करके शरीर व मन को इस अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> के अनुकूल बना लेना चाहिये। यह एक उच्च कोटि का यौगिक अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>लाभ</strong></span>: </span></h5>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाह्य प्राणायाम में अम्लजन </span>(Oxygen)<span lang="hi" xml:lang="hi"> की अधिक मात्रा का व्यवहार होने के कारण ऊर्जा की खपत  ज्यादा होती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जब पूरक अथवा रेचक के समय की तुलना में बाह्य कुम्भक की अवधि अधिक होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब शरीर में अम्लजन </span>(Oxygen)<span lang="hi" xml:lang="hi"> की खपत 99 प्रतिशत तक गिर जाती है। अम्लजन का कम खपत होना तनावजन्य उत्तेजनाओं के कम बनने तथा मनुष्य सहित सभी प्राणियों के दीर्घकाल पर्यन्त जीवित रहने से सम्बद्ध है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जब पूरक अथवा रेचक के समय की तुलना में बाह्य कुम्भक की अवधि कम होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब शरीर में अम्लजन </span>(Oxygen)<span lang="hi" xml:lang="hi"> की खपत ५२ प्रतिशत तक बढ़ जाती है। अम्लजन का अधिक खपत होना ऊर्जा के अधिक खर्च होने तथा अधिक उत्तेजित होने का परिचायक है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पाइल्स (बवासीर)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिस्टुला (भगन्दर)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिशर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुदाभ्रंश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योनिभ्रंश आदि रोगों में लाभप्रद है। वीर्य की ऊध्र्वगति करके स्वप्नदोष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीघ्रपतन आदि धातु-विकारों की निवृत्ति करता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि सूक्ष्म और तीव्र होती है। ब्रह्मचर्य की रक्षा एवं कुण्डलिनी जागरण में अतीव उपयोगी है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उज्जायी-प्राणायाम</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि- ध्यानोपयोगी आसन में बैठकर दोनों नासापुटों से पूरक करते हुए गले को सिकोड़ते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जब गले को सिकोड़कर श्वास अन्दर भरते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब जैसे खर्राटे लेते समय गले से आवाज होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे ही इसमें पूरक करते हुए कण्ठ से ध्वनि होती है। हवा का घर्षण नाक में नहीं होना चाहिये। इस प्राणायाम में सदैव दायीं नासापुट को बन्द करके बायीं नासापुट से ही रेचक करना चाहिये। </span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/019.jpg" alt="01"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रारम्भ में कुम्भक का प्रयोग न करके केवल पूरक-रेचक का ही अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> करना चाहिये। धीरे-धीरे कुम्भक का समय पूरक जितना तथा कुछ दिनों के अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> के ब</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ाद कुम्भक का समय पूरक से दोगुना कर दीजिये। कुम्भक 10 सेकेन्ड से ज्यादा करना हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जालन्धर बन्ध और मूलबन्ध भी लगायें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>विशेष:</strong></span> प्राणायाम से सम्बद्ध सामान्य सावधानियों का अवश्य ध्यान रखें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">लाभ: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">थायरॉइड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्नोरिंग (सोते समय खर्राटे की आवाज)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टॉन्सिल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्लीपएप्निया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फुफ्फुस एवं कण्ठविकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अजीर्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आमवात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जलोदर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वर आदि रोगों में बड़ा कारगर है। आवाज को मधुर बनाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: गायकों के लिए विशेष उपयोगी है। इससे बच्चों का हकलाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुतलाना भी ठीक होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अनुलोम-विलोम प्राणायाम</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि: किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठकर कमर-गर्दन व सिर को सीधा रखते हुए बायें हाथ को ज्ञानमुद्रा में बायें घुटने पर रखकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दाहिने हाथ से प्राणायाम-मुद्रा बनाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंगूठे से दायें नासापुट को बन्द करके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बायें नासापुट से धीरे-धीरे लम्बी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गहरी श्वास भरिए। पूरा श्वास भरने के उपरान्त मध्यमा व अनामिका उंगलियों से बाएँ नासापुट को बन्द करके अंगूठा हटाकर दायें नासापुट से श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकाल दीजिये</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">तब दायें नासापुट से ही धीरे-धीरे पूरक कीजिये और बायें नासापुट से धीरे-धीरे रेचक कीजिये</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">यह एक आवृत्ति हुई। पुन: इसी प्रकार से बिना रुके निरन्तर आवृत्तियाँ करते रहिये। इडा नाड़ी (वाम स्वर) चूँकि सोम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चन्द्रशक्ति या शान्ति की प्रतीक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिये अनुलोम-विलोम प्राणायाम को बायें नासापुट से प्रारम्भ करते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/1011.jpg" alt="101"></img></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बायें नासापुट से लगभग ढाई सेकेन्ड में श्वास लय के साथ भरना एवं बिना रोके दायें नासापुट से लगभग ढाई सेकेन्ड में श्वास को बाहर छोड़ देना तथा दायें से छोडऩे के तुरन्त बाद दायें से ही सहज रूप से ढाई सेकेन्ड में श्वास को लेना एवं बिना श्वास को रोके बायें नासापुट से लगभग ढाई सेकेन्ड में ही श्वास को एक लय के साथ बाहर छोडऩा। यह एक चक्र या आवृत्ति पूरी हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी तरह कम से कम 5 मिनट तक इस प्राणायाम का अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> करना चाहिये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अनुलोम-विलोम से बार-बार प्राणों को साधना चाहिए। स्वस्थ एवं सामान्य रोगों से ग्रस्त व्यक्ति को अनुलोम-विलोम प्राणायाम का अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> लगातार 15 मिनट तक करना चाहिये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कैंसर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोराइसिस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मस्क्यूलर डिस्ट्रॉफी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माइग्रेन आदि असाध्य रोगों से पीडि़त व्यक्ति को इस प्राणायाम का अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> सुबह-शाम लगातार 30-30 मिनट तक करने से शीघ्र लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>लाभ</strong></span>: </span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्राणायाम से शरीर में विद्यमान सम्पूर्ण</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> नाडिय़ाँ अर्थात् बहत्तर करोड़ बहत्तर लाख दस हजार दो सौ एक (72</span>,10,201<span lang="hi" xml:lang="hi">) नाडिय़ाँ (प्रश्नोपनिषद्-३.६) परिशुद्ध हो जाती हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अनुलोम-विलोम के २० मिनट अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> से स्वस्थ व्यक्तियों में हृदय के प्रकुंचन तथा प्रसारण चाप (</span>Systolic and Diastolic Pressure)<span lang="hi" xml:lang="hi"> में गुरुत्वपूर्ण गिरावट पायी गई।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">20 मिनट तक किये गये अनुलोम-विलोम द्वारा केन्द्रीय </span>(Focused)<span lang="hi" xml:lang="hi"> एवं चयनात्मक </span>(Selective)<span lang="hi" xml:lang="hi"> एकाग्रता तथा दृष्टि सम्बन्धी अध्ययन </span>(Visual Scanning)<span lang="hi" xml:lang="hi">  में बढ़ोत्तरी पाई गई।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">20 मिनट पर्यन्त किये गये अनुलोम-विलोम के अ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"></span><span lang="hi" xml:lang="hi">यास से सम्भव</span><span lang="hi" xml:lang="hi">त: शर्करा </span>(Glucose)<span lang="hi" xml:lang="hi"> के अच्छे ऑक्सीकरण </span>(Oxidation)<span lang="hi" xml:lang="hi"> के कारण हाथों की मुट्ठी शक्ति </span>(Hand Grip Strength)<span lang="hi" xml:lang="hi"> में वृद्धि पाई गई।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्राणायाम से व्यक्ति किसी भी मनोवैज्ञानिक तनाव से रहित होकर श्वास को रोक पाने में समर्थ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अनुलोम-विलोम प्राणायाम एडीएचडी (</span>ADHD; Attention Deficit Hyperactivity Disorder)<span lang="hi" xml:lang="hi"> एकाग्रता के अभाव से उत्पन्न असाधारण/ उत्तेजनात्मक क्रियाशीलता जन्य विकार) का प्रबन्धन कर एकाग्रता तथा स्मृति शक्ति को बढ़ाने में सहायक हो सकता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">संधिवात तथा बार-बार होने वाली तनावजन्य व्याधियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे कि कॉरपल् टनल सिन्ड्रोम (</span>Carpel Tunnel Syndrome), <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें अँगुलियों में पीड़ा तथा मुठ्ठी कसने में समस्या होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे रोगों के प्रबन्धन में अनुलोम-विलोम प्राणायाम कारगर हो सकता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">संधिवात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आमवात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गठिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कम्पवात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्नायु-दुर्बलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवसाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओ.सी.डी.</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सीजोफ्रेनिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डाइमेंशिया आदि समस्त वातरोग नष्ट होते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कॉलेस्ट्रॉल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ट्राइग्लिसराइड्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धमनियों में आये हुये अवरोध आदि हृदय-सम्बन्धी रोग दूर होते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">स्पेशल मैमरी लॉस (</span>Spatial Memory Loss)<span lang="hi" xml:lang="hi"> के प्रबन्धन में लाभकारी हो सकता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रामरी-प्राणायाम</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि- किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठकर श्वास को पूरा अन्दर भरकर मध्यमा अंगुलियों से नासिका के मूल में आँख के पास से दोनों ओर से थोड़ा दबाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन को आज्ञाचक्र में केन्द्रित रखें। अंगूठों के द्वारा दोनों कानों को पूरा बन्द कर लें। अब भ्रमर की भाँति गुंजन करते हुये नाद रूप में ओ३म् का उच्चारण करते हुए श्वास को बाहर छोड़ दें। पुन: इसी प्रकार आवृत्ति करें।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/1021.jpg" alt="102"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">३ से ५ सेकेन्ड में श्वास को अन्दर भरना एवं विधिपूर्वक कान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आँख आदि बन्द करके १५-२० सेकेन्ड में नाद रूप में श्वास बाहर छोडऩा। एक बार भ्रामरी पूरा होने पर तुरन्त पुन: इसी प्रकार अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> करना चाहिये। प्रत्येक व्यक्ति को लगातार कम से कम ५ से ७ बार यह प्राणायाम अवश्य करना चाहिये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कैंसर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पार्किन्सन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिप्रेशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माइग्रेन आदि असाध्य रोगों से ग्रस्त रोगी अथवा योग की गहराइयों में उतरने के इच्छुक साधक एक समय में ११ से २१ बार तक भ्रामरी प्राणायाम का निरन्तर अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> कर सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सावधानी:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नाद भौंरे की गुंजन की तरह मधुर और सहज रखना चाहिए</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्कश और कठोर गुंजन का प्रयोग कदापि न करें। आँखों के ऊपर अंगुलियों से अत्यधिक दबाव न दें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">लाभ: </span></strong></span></h5>
<ul style="list-style-type:circle;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रामरी प्राणायाम के द्वारा नाडिय़ों की स्पन्दन गति </span>(Pulse rate)<span lang="hi" xml:lang="hi"> में कमी आती है</span>, एड्रेनैलिन<span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>(Adrenalin)<span lang="hi" xml:lang="hi"> तथा नोर-एड्रेनैलिन (Nor-</span>adrenalin)<span lang="hi" xml:lang="hi">) के उपापचयी पदार्थ </span>(Metabolites)<span lang="hi" xml:lang="hi"> कम बनते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चर्म प्रतिरोधक क्षमता </span>(Skin Resistance Power)<span lang="hi" xml:lang="hi"> में बढ़ोत्तरी होती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रामरी प्राणायाम का लाभ </span>Anxiety Neurosis<span lang="hi" xml:lang="hi"> तथा घबराहट सम्बन्धी विकारों </span>(Panic Disorder)<span lang="hi" xml:lang="hi"> के प्रबन्धन में लिया जा सकता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक रोगों में बेहद लाभप्रद है। माइग्रेन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पार्किन्सन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्माद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक उत्तेजना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन की चंचलता को दूर कर स्वास्थ्य एवं शान्ति प्रदान करता है। ध्यान के लिये अत्यन्त उपयोगी है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उद्गीथ-प्राणायाम</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि- 3 से 5 सेकेन्ड में श्वास को एक लय के साथ अन्दर भरना एवं पवित्र ओ३म् शब्द का विधिवत् उच्चारण करते हुए लगभग 15 से 20 सेकेन्ड में श्वास को बाहर छोडऩा। एक बार उच्चारण पूरा होने पर पुन: इसी प्रकार से अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> करना चाहिये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/98.jpg" alt="98"></img></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">3 मिनट की 1 आवृत्ति में लगभग 7 बार प्रत्येक व्यक्ति को इस प्राणायाम का अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> अवश्य करना चाहिये। असाध्य (दु:साध्य) रोगों से</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्रस्त एवं ध्यान की गहराइयों में उतरने के इच्छुक योग-साधक 5 से 10 मिनट या इससे भी अधिक समय तक इस प्राणायाम का अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> कर सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>लाभ</strong></span>: </span></h5>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">उद्गीथ प्राणायाम के अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> से नाडिय़ों की स्पन्दन गति </span>(Pulse rate), <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास-प्रश्वास गति </span>(Breath rate), <span lang="hi" xml:lang="hi">अम्लजन की खपत (</span>Oxygen Consumption)<span lang="hi" xml:lang="hi"> तथा निरन्तर उत्पन्न हुए पसीने में कमी आती है। अत: यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उद्गीथ प्राणायाम उत्तेजना का ह्रास करने का एक प्रभावशाली माध्यम है। इसका उपयोग तनाव प्रबन्धन में भी किया जा सकता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">सभी लाभ भ्रामरी प्राणायाम की तरह हैं। समस्त असाध्य रोगों में निरन्तर अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> से लाभ मिलता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">तनावग्रस्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निराश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हताश व विक्षिप्त व्यक्ति को इसके अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> से सम्बल मिलता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान की गहराइयों में उतरने के इच्छुक साधकों के लिये अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रणव प्राणायाम या ओंकार ध्यान</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> पूर्वनिर्दिष्ट सभी प्राणायाम करने के बाद श्वास-प्रश्वास पर अपने मन को टिकाकर प्राण के साथ उद्गीथ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ओ३म्’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का ध्यान करें। यह पिण्ड (देह) तथा समस्त ब्रह्माण्ड ओंकारमय है। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ओंकार’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई व्यक्ति या आकृति विशेष नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु एक दिव्यशक्ति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो इस सम्पूर्ण</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> बह्माण्ड का संचालन कर रही है। द्रष्टा बनकर दीर्घ एवं सूक्ष्म गति से श्वास को लेते एवं छोड़ते समय श्वास की गति इतनी सूक्ष्म होनी चाहिए कि स्वयं को भी श्वास की ध्वनि की अनुभूति न हो तथा यदि नासिका के</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> आगे रूई भी रख दें तो वह हिले नहीं। धीरे-धीरे अभ्यास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> बढ़ाकर प्रयास करें कि एक मिनट में एक श्वास तथा एक प्रश्वास चले। इस प्रकार श्वास को भीतर तक देखने का भी प्रयत्न करें। प्रारम्भ में श्वास के स्पर्श की अनुभूति मात्र नासिकाग्र पर होगी। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">धीरे-धीरे श्वास के गहरे स्पर्श को भी अनुभव कर सकेंगे। इस प्रकार कुछ समय तक श्वास के साथ द्रष्टा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् साक्षीभावपूर्वक ओंकार का जप करने से ध्यान स्वत: होने लगता है। आपका मन अत्यन्त एकाग्र तथा ओंकार में तन्मय और तद्रूप हो जायेगा। प्रणव के साथ-साथ वेदों के महान् मन्त्र गायत्री का भी अर्थपूर्वक जप एवं ध्यान किया जा सकता है। इस प्रकार साधक ध्यान करते-करते सच्चिदानन्द-स्वरूप ब्रह्म के स्वरूप में तद्रूप होता हुआ समाधि के अनुपम दिव्य आनन्द को भी प्राप्त कर सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लाभ:</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> सोते समय भी इस प्रकार ध्यान करते हुए सोना चाहिए। ऐसा करने से निद्रा भी योगमयी हो जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दु:स्वप्न से भी छुटकारा मिलेगा तथा निद्रा शीघ्र आयेगी एवं प्रगाढ़ रहेगी।  </span></h5>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1761/dainik-yogabhyas-ke-liye-sarvshresth-aath-pranayam</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1761/dainik-yogabhyas-ke-liye-sarvshresth-aath-pranayam</guid>
                <pubDate>Mon, 01 Jul 2019 21:49:46 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-06/98.jpg"                         length="147028"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[योग संदेश विभाग]]>
                    </dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        