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                <title>'रामराज्य’ - योग संदेश</title>
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                <description>'रामराज्य’ RSS Feed</description>
                
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                <title>जीवन के तथ्य एवं सत्य</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण</span></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1880/jivan-ke-tathya-aur-satya"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-07/181.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    जी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">वन में दो बातें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं। एक परिस्थिति एवं दूसरी मन:स्थिति। परिस्थितियाँ जीवन में एक जैसी नहीं हो सकती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि इस संसार में हमारे अलावा बहुत बड़ी रचना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य एवं मनुष्येतर करोड़ों जीव एवं जड़ चेतन जगत् का अस्तित्व है तथा संसार मेें जो कुछ घटित हो रहा है उसके प्रभाव व परिणाम से हम अछूते नहीं रह सकते। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अत: परिस्थितियाँ कभी भी पूर्णरूप से हमारे अनुकूल हो ही नहीं सकती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए विवेकशील मनुष्य को बाहर की परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी मन:स्थिति को सदा ऊँचा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समतापूर्ण एवं दिव्य रखकर सदा कत्र्तव्यनिष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसन्नचित्त व आनन्दित रहना चाहिए। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पराधीनता व स्वाधीनता</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गुलामी तथा आजादी कभी भी पूर्ण रूप से हमारे जीवन में कभी भी नहीं होती है। हम कुछ अर्थों में सदा स्वतंत्र (आजाद) रहते हैं तथा जीवन के कुछ ऐसे पहलु हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ हम पराधीन ही रहते हैं। कभी-कभी पराधीनता में भी हमारे जीवन का निर्माण व विकास होता है और हम पूर्ण रूप से सुखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसन्नचित्त व आनन्दित होते हैं तथा हमारे जीवन का पूर्ण विकास भी होता है। जैसे विवेकी माँ केगर्भ में तथा गुरु कुल में विवेकी गुरु के गर्भ या आश्रय में पूर्ण पराधीन रहकर भी हम पूर्ण स्वाधीन ही होते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मूलत: एक बहुत बड़ा सिद्धान्त है स्वाधीनता या आजादी का कि हमारी किसी भी प्रकार की वैयक्तिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारिवारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवसायिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धार्मिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक या राजनैतिक आजादी से किसी अन्य की आजादी बाधित नहीं होनी चाहिए। यदि हमारे आहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार या अभिव्यक्ति आदि की आजादी किसी भी मनुष्य या मनुष्येत्तर जड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चेतन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीव जगत् की आजादी खतरे में पड़ती है या उसको हानि पहुँचती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह आजादी नहीं अपराध होता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्तद्र्वन्द्व</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे व्यक्तिगत जीवन से लेकर पारिवारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धार्मिक व राजनैतिक जीवन में बहुत बड़े अन्तद्र्वन्द्व हैं। इसी अन्तद्र्वन्द्व से समाज में कलह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लड़ाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">झगड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रूरता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शोषण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युद्ध</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">गृह युद्ध</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">एवं विश्वयुद्ध जैसी परिस्थितियों का भी निर्माण होता है। अत: संसार के सभी जिम्मेदार बड़े लोगों का कत्र्तव्य है कि समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र व विश्व में संघर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैर-विरोध या युद्ध के सूत्र न खोजें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जातियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंथों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देशों एवं दुनिया में अतीत में जो कुछ घटित हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उससे हम अच्छी या बुरी दोनों ही बातों को ले सकते हैं। अत: समझदारी व जिम्मेदारी इसमें है कि हम अतीत की बातों को भुलाकर वर्तमान में एकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समानता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बन्धुत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सद्भावना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामंजस्य व सह-अस्तिव के साथ आगे बढ़ें। समाज की सभी विषमताओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनीति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैर व प्रतिशोध को खत्म करके सभी व्यष्टि व समष्टिगत अन्तर्विरोधों व अवरोधों से बाहर निकलकर एक स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विकासशील व प्रगतिशील भविष्य का निर्माण करें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलना संबंधों में नहीं</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राजनैतिक जीवन में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृषि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवसाय या अन्य व्यवहारिक क्षेत्रों में जहाँ हम विभिन्न पहलुओं की तुलनात्मक समीक्षा करके अपने लिए श्रेष्ठ विकल्प या चयन कर सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करने चाहिए। लेकिन व्यक्तिगत सम्बन्धों एवं पारिवारिक सम्बन्धों यहाँ तक कि महापुरुषों में तुलना करने पर संघर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विवाद एवं कई बार तो युद्ध या गृहयुद्ध जैसी स्थिति बन जाती है। मैं महान् हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुम निकृष्ट या नीच हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माँ अच्छी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिता जी बुरे हैं। पति अच्छे है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पत्नि बुरी है। माँ अच्छी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्त्री बुरी है। ये सोच विचार व व्यवहार ठीक नहीं है। ये महापुरुष अच्छे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महान् हैं। ये महापुरुष उनसे छोटे हैं। महापुरुषों के योगदान में न्यूनाधिकता हो सकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उन सबका जीवन महान् होता है। लेकिन कुछ लोगों को महापुरुषों के नाम पर थोप दिया गया है। लेकिन वे यदि हमारे सभी पूर्वज महापुरुषों का अनादर करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन पर ओछे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घटिया आधार रहित झूठे मनघड़न्त निकृष्ट आरोप लगायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे तो महापुरुष की श्रेणी में ही नहीं आते। भले ही उन्होंने कुछ अच्छे काम भी किये हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन कुछ अच्छे कामों की वजह से हम उन्हें महापुरुष या भारत के महान् आदर्शों की श्रेणी में नहीं रख सकते। निष्कर्ष यह है कि सात्त्विक महापुरुषों या यथार्थ में जिनका जीवन महान् रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन महापुरुषों की भी कभी तुलना या अपमान नहीं करना। संबंधों एवं परस्परता में तुलना न करके एक दूसरे की पूरकता में काम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सद्भाव एवं एकात्मभाव से अत्यन्त प्रीतिपूर्वक सब प्रकार से परस्पर सुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सद्भावना व आत्मीयता को बढ़ाना। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">रामराज्य</span>’</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दीर्घकाल के धैर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संघर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधना एवं सरकार की राजनैतिक इच्छा शक्ति व पराक्रम से राम मंदिर तो अब निश्चित रूप से बनेगा। यह राष्ट्र का परम सौभाग्य होगा। राम को जो महापुरुष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवतारी पुरुष या भगवान् या अपना महान् पूर्वज किसी भी रूप में मानते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभी के लिए परम गौरव का अवसर है। राम मंदिर के साथ-साथ राम एवं सीता जैसा व व्यापक रूप से कहें तो अपने महान् पूर्वजों जैसा हमारा चरित्र हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके लिए हम सब साधना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ या चरित्र निर्माण से लेकर राष्ट्र निर्माण के लिए परम पुरुषार्थ करें। यह सबका दृढ़ संकल्प होना चाहिए। भगवान् श्रीराम को हम मर्यादा पुरुषोत्तम कहते हैं एवं माता सीता को प्रत्येक अग्नि परीक्षा उत्तीर्ण करने वाली परम सत्य की उपासक व पूर्ण पवित्रता का स्वरूप मानते हैं। हम सबके जीवन में आहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वभाव व आचरण की दृष्टि से पूर्ण मर्यादित हों। हम मानव की मर्यादा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माता-पिता की मर्यादा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु-शिष्य की मर्यादा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देश के नागरिक की मर्यादा का पूरा पालन करके जीवन को आदर्श रूप से जीने के लिए संकल्पित होंगे तभी राष्ट्र में रामराज्य आयेगा।</span></h5>]]></content:encoded>
                
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                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category>दिसम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Dec 2019 21:57:20 +0530</pubDate>
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