<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/tag/3920/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B7-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%85%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%9C%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7-%E0%A4%9C%E0%A4%AC-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B6%E0%A4%A8-%E0%A4%B6%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%82-%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>योग संदेश RSS Feed Generator</generator>
                <title>भारतवर्ष में अंग्रेजों के विरुद्ध जब क्रांतिकारियों ने वीरता का प्रदर्शन शुरू किया - योग संदेश</title>
                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/tag/3920/rss</link>
                <description>भारतवर्ष में अंग्रेजों के विरुद्ध जब क्रांतिकारियों ने वीरता का प्रदर्शन शुरू किया RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>आजादी के मायने</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">प्रोफेसर रामेश्वर मिश्र </span>'<span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">पंकज’</span></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ए</span><span lang="hi" xml:lang="hi">क तो इस तथ्य को भली-भाँति स्मरण कर लेना चाहिए कि जिसे हिंदी में स्वाधीनता कहते हैं और उर्दू में आजादी कहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह कोई सार्वभौम मानवीय लक्ष्य नहीं है। केवल दास या गुलाम लोग या समाज ही आजादी का लक्ष्य रखते हैं।  यूरोप में वहाँ की ८५% से 95% तक जनता ईसाइयत के मध्यकाल वाले दौर में हजारों वर्ष तक गुलाम रही थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए स्वाधीनता या मुक्ति (फ्रीडम) या आजादी राजनीतिक अर्थ में वहाँ का एक बड़ा लक्ष्य हो गयी। अब इन दिनों यूरोप के किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र राज्य में आजादी को  लक्ष्य की तरह नहीं देखा जाता और न ही प्रस्तुत किया जात है। अपितु वैभव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विस्तार ही लक्ष्य घोषित हैं। इंग्लैंड में लिखित संविधान नहीं है परंतु परंपरा से वहाँ के राज्य का लक्ष्य इंग्लैंड के बहुसंख्यक समाज के पंथ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रोटेस्टंट ईसाइयत’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की रक्षा और विस्तार है। संयुक्त राज्य अमेरिका के राज्य का लक्ष्य न्याय और सुरक्षा तथा आंतरिक शांति स्थापित रखना और नागरिकों को स्वतन्त्रता मिली रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके लिए प्रभु से आशीर्वाद पूर्वक याचना करते रहने की स्थिति बनाए रखना है। उधर पाकिस्तान के राज्य का लक्ष्य यह है कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">समस्त विश्व में संप्रभुता केवल अल्लाह की है और पाकिस्तान के लोग केवल कुरान के आदेश को ही अधिकार का स्रोत मानेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: इस्लाम के अंतर्गत डेमोके्रसि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय और (परस्पर मुस्लिम समूह में) एक दूसरे को सहन करने की व्यवस्था बनाए रखना।‘</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अफगानिस्तान के राज्य का भी यही लक्ष्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बांग्लादेश में राज्य के लक्ष्य की घोषणा ही </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बिस्मिल्ला अर रहमान अर रहीम’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की घोषणा से शुरू होती है। भारतवर्ष के राज्य का लक्ष्य  राष्ट्रीय एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता और व्यक्ति की गरिमा तथा सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक और राजनैतिक न्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभिव्यक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता तथा  प्रतिष्ठा और अवसर की समता सुनिश्चित करना है और सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न लोकतान्त्रिक गणराज्य बनाए रखना है ।  </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयं भारतवर्ष में अंग्रेजों के विरुद्ध जब क्रांतिकारियों ने वीरता का प्रदर्शन शुरू किया तो उनकी भाषा स्पष्ट रूप से आततायियों के वध की थी। उन्हें अंग्रेज कौम से कोई घृणा नहीं थी। उनके अनुसार अंग्रेज अनधिकृत और अवैध रूप से बाहर से आकर भारत में व्यापार की आड़ में शासन पर कब्जा जमा कर यहाँ पाप करने का प्रयास कर रहे थे और भारत के अपने सनातन धर्म को नष्ट करने का प्रयास कर रहे थे। इसलिए वे यहाँ आततायी हैं और इसलिए उनका वध शास्त्रों के अनुसार धर्म है। इसलिए हम इन आततायियों को  मारते हैं । इसी प्रकार जो शांतिपूर्ण आंदोलन चला उसमें भी आजादी की कोई बात नहीं कही गयी थी। गांधीजी के भाषण में भी 1940 तक केवल सुराज की बात की जाती थी। अंग्रेजों का राज्य बुरा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आततायी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आतंककारी है। इसके स्थान पर हमें सुराज चाहिए। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लोकमान्य तिलक ने घोषणा की कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। वहाँ भी उनका मूल आशय सुराज से था और स्वराज्य से भी था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा अपना राज्य। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">भगवद् गीता रहस्य</span>Ó <span lang="hi" xml:lang="hi">लिखने वाले महान विद्वान् लोकमान्य तिलक का स्पष्ट आशय ऐसे सुराज्य से ही था और शास्त्रों में प्रतिपादित श्रेष्ठ राज्य से था। शासक की नस्ल क्या हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका रंग क्या हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी जाति क्या है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे कोई मतलब लोकमान्य तिलक को नहीं था। अपितु शासन सार्वभौम नियमों और भारतीय ज्ञान परंपरा तथा धर्म परंपरा के अनुसार चले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही स्वराज से स्पष्ट अर्थ था। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लंदन जाकर पढऩे वाले शिक्षित लोगों ने शांतिपूर्ण आंदोलन का नेतृत्व करते हुए </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इंडिपेंडेंस</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द का प्रयोग सीखा।  यानी अनिर्भरता की माँग उठाई। जिसका मूल अर्थ था कि भारत-इंग्लैंड पर निर्भर है अर्थात् भारत की नीतियां इंग्लैंड से नियंत्रित की जाती हैं तो इसकी जगह वे भारत में ही बनें और भारतीय लोगों के द्वारा बनाई जाएँ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बाद में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">फ्रीडम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द चला। यूरोप में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">फ्रीडम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द को बहुत महत्व दिया जाता रहा है क्योंकि वह हजारों वर्ष तक मध्ययुगीन चर्च का गुलाम समाज रहा है और चर्च के आतंक से मुक्ति लोगों के लिए बहुत बड़ा लक्ष्य बन गई थी। इसलिए </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">फ्रीडम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द वहाँ खूब चला। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में तो अधिकांश लोगों को यह पता ही नहीं है कि यह शब्द सबसे पहले वहाँ दंपतियों के निजी जीवन में चर्च के पादरियों के पापपूर्ण हस्तक्षेप से स्वतंत्रता के लिए प्रयुक्त हुआ था। क्योंकि विवाहित दंपति किस रात में आपस में मिले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किस में ना मिलें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कौन सी तिथि किस पादरी के नाम से है अत: उस रात पति-पत्नी का मिलन पाप है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी ईसाई संत के नाम से है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उस दिन मिलना  वर्जित है या कौन सा दिन चर्च द्वारा निषिद्ध घोषित है इसलिए उस दिन पति-पत्नी का मिलना वर्जित है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आदि भीषण नियंत्रण से मुक्ति के लिए लोग छटपटा उठे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: वहाँ फ्रीडम कि माँग उठी । </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पति-पत्नी के मिलने के समय उन दोनों के मन में क्या भाव है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस पर भी पादरियों का नियंत्रण था। चर्च  में जाकर एकांत में स्त्री को कन्फैस करना होता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्म-स्वीकृति करनी होती थी कि हमारे मन में मिलन के समय क्या क्या विचार आए और यह बात अकेले में स्त्रियों को अविवाहित पादरी से बतानी पड़ती थी और   वसन विहीन दशा में बतानी पड़ती थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके बहुत से पापमय परिणाम हुए और इसलिए पादरियों का और चर्च का बड़ा भयंकर बंधन वहाँ के प्रबुद्ध समाज को लगने लगा। इसलिए सबसे पहले इस प्रकार फ्रीडम की माँग तेज हुई जिसका अर्थ स्त्रियों की काम व्यवहार में चर्च के नियंत्रण से आजादी है। दंपति काम संबंध सहज रूप से स्थापित कर सकें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसकी माँग को ही फ्रीडम की माँग कहा गया। स्वाधीनता को उन्होंने पहली बार इसी अर्थ में श्रेष्ठ लक्ष्य घोषित किया उधर बहुत बहुत लड़ाइयाँ इसके लिए लड़ी गईं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बाद में इंग्लैंड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फ्रांस आदि हर जगह व्यापक किसान विद्रोह हुए क्योंकि किसानों को वहाँ के जागीरदारों ने बंधुआ मजदूर बना रखा था और किसी भी किसान का उसके खेतों पर स्वामित्व माना नहीं जाता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जागीरदारों से मुक्ति के लिए फ्रीडम शब्द का प्रयोग किया गया। अन्य परंपराओं का तथा संसार का ज्ञान प्राप्त होने के बाद वहाँ रेनेसां यानी ईसाइयत से पूर्व की प्राचीन संस्कृति के पुनर्जन्म की माँग उठी। ईसाइयत से पहले की अपनी अपनी सभ्यता और संस्कृति में प्रेम बढ़ा और फिर उसको चर्च की मध्यकालीन जकडऩ से बचाने के लिए अनेक आंदोलन चले और नया चर्च उदार होने को विवश हो गया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस बीच मध्यकालीन ईसाइयत के पापमय उत्पीडऩ से पीडि़त अनेक लोगों ने देश से बाहर जाकर दुनिया में वर्चस्व स्थापित करने के लिए तरह-तरह के छल और प्रपंच किए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वासघात और वचन भंग किए और वहाँ वर्चस्व स्थापित किया। फिर जब वे वहाँ ताकतवर हो गए तो विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका में इंग्लैंड व अन्य यूरोपीय देशों से जाकर वहाँ बसे लोगों ने इैंग्लंड से फ्रीडम की माँग की  और फ्रीडम पा ली।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार यूरोप में फ्रीडम का अर्थ एक तो दम्पतियों के काममय जीवन के निजी क्षेत्रों में व्यक्तियों को चर्च से स्वाधीनता से था। दंपतियों को काम संबंधी व्यवहार में चर्च की जकडऩ से फ्रीडम। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">और दूसरा है समाज के बहुसंख्यक लोगों की मुठी भर अल्पसंख्यकों से फ्रीडम। फ्रीडम के ये दो ही मुख्य अर्थ और रूप हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज तक किसी भी मुस्लिम देश में इस्लाम से आजादी की कोई बड़ी माँग नहीं होती है। जबकि सभी पूर्व में ईसाई रह चुके देशों में चर्च से फ्रीडम की प्रचंड आग उठी और उसके बाद से मध्ययुगीन चर्च को बड़ी सीमा तक मर्यादित कर दिया गया है ताकि समाज को भी थोड़ी राहत मिल सके। अन्यथा पहले तो सारे अधिकार केवल पादरियों और राज्यकर्ताओं के पास ही थे। फ्रीडम का विशेष संदर्भ वहाँ इसीलिए था।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ जाकर पढ़े लोगों में से कुछ ने फ्रीडम की माँग भारत में भी बढ़ायी। उर्दू में उसे आजादी कहा जाने लगा। हिंदी में कुछ लोग उसे स्वाधीनता कहने लगे और कुछ लोग मुक्ति कहने लगे। परंतु मुक्ति का पर्याय शब्द अंग्रेजी में है ही नहीं। वहाँ साल्वेशन शब्द है जिसका एक विशेष ईसाई संदर्भ है। साल्वेशन शब्द का अर्थ यह होता है कि मरने के बाद सभी जीवात्मा अपनी-अपनी कब्रों में हजारों साल शांत पड़ी रहेंगी और फिर अंतिम निर्णय का</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">लास्ट जजमेंट’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का एक दिन आएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस दिन गॉड के सेवक तुरही बजाएंगे ।  </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तब कब्रों से उठ-उठकर सभी आत्माएँ गॉड के समक्ष हाजिर होंगी। इस पर चर्च के भीतर बड़ी बहस चली है कि आत्माएँ किन कपड़ों में गॉड के सामने हाजिर होंगी। अंत में बहुमत से यह कहा गया कि जिन कपड़ों में उन्हें कब्र में दफनाया जाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हीं कपड़ों में उस समय हजारों वर्ष बाद हर आत्मा गॉड के सामने जाकर खड़ी होंगी और वहाँ पर गॉड के ठीक बगल में जीसस भी खड़े होंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि वे  सृष्टि के आरंभ से अब तक हुए गॉड के इकलौते बेटे हैं। अत्यंत परिश्रम और अत्यंत मनोयोग से गॉड ने आज तक एक बेटा ही पैदा किया है जो वहाँ उस दिन खड़े होंगे और प्रत्येक जीवात्मा गॉड के सामने आएगी। जीसस जिसके पक्ष में सिर हिलाएँगे कि हाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसने मुझे स्वीकार किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका साल्वेशन हो जाएगा। शेष सब लोगों को अनंत नर्क में भेज दिया जाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भले वे अत्यंत सदाचारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य निष्ठ और धर्मनिष्ठ रहे हों। तो सालवेशन का यह अर्थ है जिसे अनपढ़ हिन्दू मुक्ति कह देते हैं। इस मूल अर्थ को न जानने वाले तथा अंग्रेजों से अभिभूत भारतीय पढऩे लिखने वाले लोग जो हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने ही इसे मुक्ति के अर्थ में स्वीकार कर लिया। क्योंकि प्रारंभ में अंग्रेजी हिंदी या अंग्रेजी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दकोश पादरियों ने रचे थे और उसमें उन्होंने गॉड का अर्थ ब्रह्म या ईश्वर कर दिया</span>,  <span lang="hi" xml:lang="hi">रिलिजन का अर्थ धर्म और साल्वेशन का अर्थ मुक्ति लिख दिया था जो कि ईसाई आस्थाओं से प्रेरित शब्द थे और सम्यक् नहीं थे और अंग्रेजी शिक्षा के प्रभाव से वे ही शब्द स्वीकार कर लिए गए। जबकि इन बातों का कोई भी संबंध और संदर्भ भारत में नहीं रहा है। यहाँ तो मुक्ति का अर्थ है अपने स्वरूप का सच्चा ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्यक ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने ब्रह्म स्वरूप का प्रत्यक्ष और इस प्रकार भारत में वास्तविक आत्मज्ञान ही मुक्ति है। उस मुक्ति का साल्वेशन से कोई लेना-देना नहीं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस सब अंतर को जाने बिना भारत में वैचारिक और बौद्धिक क्षेत्रों में जो अराजकता फैलाई गई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उससे उसके स्वरूप को नहीं समझा जा सकेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत के संविधान में स्वतंत्रता शब्द का प्रयोग किया गया है। संविधान के भाग 3 अनुच्छेद 19 में भारत के नागरिकों को राज्य के द्वारा जो अधिकार दिए गए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके लिए संविधान में लिखा है कि भारत के नागरिकों को वाणी की स्वतंत्रता आदि कतिपय (</span>Certain<span lang="hi" xml:lang="hi">) अधिकार दिए जाते हैं। इनमें वाणी की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शांतिपूर्वक और हथियार के बिना सम्मेलन करने की स्वतंत्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाँति-भाँति के संगठन या संगम या संघ बनाने की स्वतंत्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत राज्य में सर्वत्र आवाजाही की यानी संचरण की स्वतंत्रता और भारत राज्य क्षेत्र के किसी भी भाग में बसने की स्वतंत्रता तथा कोई भी वृत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आजीविका या व्यापार या कारोबार करने की स्वतंत्रता सम्मिलित है। यह स्वतंत्रता राज्य की सुरक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विदेशी राज्य के साथ संबंध बनाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शांति व्यवस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोक व्यवस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिष्टाचार और सदाचार (</span>decency &amp; Morality<span lang="hi" xml:lang="hi">) की मर्यादा के अंतर्गत है और राज्य को इसके लिए आवश्यक कदम उठाने से बाधित नहीं करेगी। भारत की संप्रभुता और अखंडता पर किसी भी प्रकार का आक्षेप करने की कोई स्वतन्त्रता भारत के नागरिकों को भारत के राज्य द्वारा नहीं दी गई है</span>,  <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा भारत के संविधान में स्पष्ट रूप से लिखा गया है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ स्पष्ट करें कि स्वाधीनता का यह प्रावधान अंग्रेजों के इंडिया एक्ट 1935 में किया गया था क्योंकि तब ब्रिटिश राज्य अपने अधीनस्थ क्षेत्र के भारतीयों के जीवन को पूर्ण नियंत्रित कर रहा था। सत्ता हस्तांतरण के लिए अंग्रेजों द्वारा संविधान की रचना की माँग की गयी थी। अत: उस एक्ट (1935-के) को आधार बनाकर शीघ्रता में एक अच्छा संविधान देने का प्रयास विद्वानों की मंडली ने किया और इसलिए स्वाभाविक ही स्वतंत्रता की यह बात इसमें शामिल की गई । </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि भारत के धर्म शास्त्रों में तो स्वतंत्रता शब्द का सामाजिक व्यवहार में अलग ही अर्थ है। वहाँ तो किसी को स्वतंत्र छोड़ देने को बुरा माना गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि उसका अर्थ है अरक्षित छोड़ देना। स्त्रियों और बच्चों को स्वतंत्र न छोड़ा जाए अर्थात् उन्हें अरक्षित न छोड़ा जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी सदा रक्षा की जाये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस स्थिति में वहाँ स्वतंत्र शब्द का अर्थ है अरक्षित छोड़ देना। आप स्वतंत्र हैं अर्थात् आपका कोई धनी धोरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संरक्षक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभिभावक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पालक पोषक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खोज-खबर लेने वाला नहीं है। अपने आप पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने बूते पर रहने को छोड़ देना और उनकी रक्षा का विशेष प्रबंध न करना। परंतु यहाँ स्वतंत्रता राज्य के द्वारा देना इसलिए आवश्यक था कि  इंग्लैंड का राज्य यह बता रहा था कि हर विषय में आपको पूरी तरह नियंत्रित हम नहीं कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ स्वतन्त्रता भी दे रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक मर्यादा के अंतर्गत। और हमारे संविधान में यह अर्थ है कि राज्य के पास संप्रभु सत्ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण ताकत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके पास पूरी शक्ति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका भारत के लोगों के जीवन पर नियंत्रण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसीलिए राज्य अपने नागरिकों के जीवन को कतिपय मामलों में स्वतंत्र घोषित कर रहा है। यह स्वतन्त्रता राज्य की संप्रभुता के अंतर्गत है और उससे मर्यादित है। यही वहाँ स्वतंत्रता या आजादी का अर्थ होता है। व्यवस्था अपनी वैधता और महिमा के लिए अपने लोगों को सीमित स्वतन्त्रता देती है। जो राष्ट्रीय एकता और अखंडता कि सीमा से मर्यादित है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दुर्भाग्यवश भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में एक छोटी सी समाजवादी झुकावों वाली धारा का आधिपत्य होता गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने सोवियत संघ में कम्युनिस्टों के द्वारा चलाए जा रहे राज्य को अपना आदर्श मानकर काम किया और भारत की अपनी चेतना को तथा सनातन ज्ञान परंपरा और न्याय परंपरा को नष्ट करने का एक नियोजित अभियान चलाया और अनेक महत्वपूर्ण पदों पर ऐसे लोगों को नियुक्त किया</span>,  <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसी नियुक्ति को संरक्षण दिया जिनके मन में सनातन धर्म के प्रति और भारत की ज्ञान परंपरा तथा न्याय परंपरा के प्रति वैर और विद्वेष है और इस प्रकार उन्होंने राज्य के स्थान पर हिंदू धर्म को ही व्यवस्था का पर्याय घोषित कर दिया जो सबसे बड़ा झूठ है क्योंकि वर्तमान भारत का शासन ऐसे राज्य के द्वारा संचालित है जिसका हिंदू धर्म से और धर्म शास्त्रों से कोई भी संबंध नहीं है और इसलिए भारत में वर्तमान में व्यवस्था का अर्थ है भारत की राज्य व्यवस्था। परंतु व्यवस्था का अर्थ हिंदू धर्म को बता दिया गया और व्यवस्था के विरोध का अर्थ हिंदू धर्म का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सनातन धर्म का विरोध बताया जाने लगा और यह कार्य अनेक चरणों में योजना पूर्वक किया गया। जिनमें मुख्य है कि भारत की शिक्षा व्यवस्था को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की ज्ञान परंपरा से रहित बना देना।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसका परिणाम यह हुआ कि मुख्यत: हिंदू समाज के बच्चों को शिक्षा के द्वारा सनातन धर्म का या हिंदू धर्म का कोई भी ज्ञान नहीं दिया गया और केवल अल्पसंख्यकों को उनके मजहब या रिलीजन का ज्ञान देने की स्वतंत्रता दी गयी। ऐसी कोई बात मूल संविधान में नहीं थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परंतु शासन और प्रशासन के स्तर पर व्यवहार में ऐसा काम कर  डाला गया। इसके कारण हिन्दू घरों के बच्चों को हिंदू धर्म का कोई ज्ञान सामान्यत: नहीं रहता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिवाय उसके जो भी थोड़ा बहुत घर में जान लेते हैं या संचार माध्यमों से कहीं पढ़ लेते हैं। इस कारण उन्हें मीडिया द्वारा और शिक्षा संस्थानों द्वारा फैलाई गई बातें सत्य लगने लगी। इसलिए इतना बड़ा पाखंड चल पा रहा है कि हिंदू धर्म को ही  व्यवस्था का पर्याय ऐसे समय बता दिया गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब समाज में राज्य ही संपूर्ण जीवन को नियंत्रित और मर्यादित कर रहा है। इस व्यापक पाखंड की ओर अधिकांश लोगों का ध्यान ही नहीं है। इस तरह इस सत्य को छुपा लिया गया कि वर्तमान में जो राज्य हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह हिंदुओं को धर्म की कोई शिक्षा नहीं देता और हिंदू धर्म शास्त्रों की अलग से कोई अधिकृत मान्यता भारत में आज नहीं है। केवल संविधान की मान्यता है और भारत में व्यवस्था का अर्थ वर्तमान राज्य की व्यवस्था है। अत: व्यवस्था के विरुद्ध आंदोलन के नाम पर हिन्दू धर्म पर आघात करना भीषण पाखंड और छल है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि सचमुच भारत में व्यवस्था का अर्थ हिंदू धर्म और हिंदू समाज व्यवस्था होता तो धर्म शास्त्रों के अनुसार जीवन जीने का हिंदुओं को अधिकार प्राप्त होता और तब आतंकियों का वध हिंदुओं का स्वाभाविक कत्र्तव्य होता। क्योंकि यह कर्तव्य सभी धर्म-शास्त्रों में प्रतिपादित है। अत: ऐसे में हिंदू धर्म के विरुद्ध जो उन्मत्त प्रदर्शन होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका दमन हिंदू समाज स्वयं अपने स्तर पर कर देता। परंतु ऐसी कोई व्यवस्था है ही नहीं। इसलिए इन सभी आंदोलनों को भारत के बहुसंख्यक समाज के प्रति भय और विद्वेष से प्रेरित घोषित करना और फिर इनको दंडित करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शमित करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह भारत के वर्तमान राज्य का सर्वोपरि कर्तव्य है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे सभी तथाकथित आंदोलन वस्तुत: राष्ट्रीय संप्रभुता और अखंडता पर आघात के लिए ही होते हैं और यह संसार की  किसी भी परिभाषा के अनुसार आंदोलन नहीं कहे जा सकते। ये तो उपद्रव हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोक शांति को प्रक्षुब्ध और प्रकंपित करने वाले उत्पात है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोक विक्षोभ के उत्पादक अभियान हैं और विध्वंसक योजनाओं के अंतर्गत किए जाने वाले गंभीर अपराध हैं। अत: इन्हें शमित और दमित करना</span>,  <span lang="hi" xml:lang="hi">नियंत्रित और दंडित करना भारत शासन का सर्वोपरि कर्तव्य है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि सभी को आजादी हो तो सबसे पहले तो भारत के बहुसंख्यकों  को आजादी होनी चाहिए कि आततायियों का वध कर सकें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि यह हमारे धर्म-शास्त्रों में प्रतिपादित है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अथवा ऐसे सभी लोगों को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अगर वह हिंदू समाज के हिंदू घरों के बच्चे हैं तो उनके माता-पिता को चेतावनी दे सकें और फिर अगर उपद्रवी तब भी नहीं मानें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उन्हें समाज से निष्कासित और बहिष्कृत कर सकें। परंतु वर्तमान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है और इसकी संभावना भी नहीं है। अत: इन सब लोगों को शमित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दमित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शांत करना भारत राज्य का मूल कर्तव्य है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह जो जगह-जगह आजादी की माँग कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें असामाजिक और आपराधिक तत्व घोषित करके उनका नियंत्रण कर्तव्य है। संविधान में और वर्तमान विधि व्यवस्था मे ऐसे शमन और दमन तथा दंड का स्पष्ट प्रावधान है और यह काम सरलता से किया जा सकता है परंतु मीडिया में तथा अनेक महत्वपूर्ण स्थानों पर इन उपद्रवियों के समर्थक और संचालक लोग मौजूद हैं और इसीलिए भारत के राज्य को अपने कर्तव्यों के पालन में बाधित  किया जाता है। इसके साथ ही भारत के बहुसंख्यकों को भी संविधान मे प्रदत्त अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए ऐसे सभी लोगों को दुष्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आतताई तथा पापी घोषित करना चाहिए। अपने हाथ में कोई भी हथियार नहीं लें और उन पर कोई प्रहार नहीं करें क्योंकि वर्तमान में भारत शासन नागरिकों को ऐसे कोई अधिकार नहीं देता कि आप दूसरे पर चोट कर सकें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पर  आप अपने धर्म शास्त्रों की बात को खुलकर कह सकें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसकी पूरी स्वाधीनता दी गयी है इस संविधान में और इसलिए लोगों को जगह-जगह अपने सम्मेलन कर यह कहना चाहिए कि हमारे धर्म शास्त्रों के अनुसार यह सभी उपद्रवी तत्व धर्म के विनाश के लिए क्रियाशील आतताई समूह हैं और हम इनको इस तरह देखते हैं। इतना खुलकर कहने से भी बहुत कुछ मर्यादित हो जाएगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके साथ ही भारत शासन को तथा राज्य सरकारों को भी देश में उभर रही इस अराजकता और उद्दंडता  को नियंत्रित करने का कर्तव्य तत्परता से निभाना चाहिए। किसी भी संस्था को कुछ उपद्रवियों के आधार पर चिन्हित नहीं किया जा सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: किसी एक संस्था का विरोध करने की कोई आवश्यकता नहीं है अपितु केवल उस संस्था के ऊपर हावी हो चुके अयोग्य और अपराधिक तत्वों को चिन्हित करना और उनका दमन और शमन करना ही आवश्यक है और नागरिकों को भी राज्य से यही माँग करना चाहिए कि असामाजिक और समाज द्रोही तत्वों को नियंत्रित करने का अपना कर्तव्य भली-भाँति  निभाए। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भारत तेरे टुकड़े होंगे</span>Ó- <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसी उद्घोषणा करने का कोई अधिकार एक पल के लिए भी किसी को भी नहीं है। नियम तो यह है कि ऐसा कहने वाले व्यक्ति को तत्काल गोली मार देना चाहिए। जिस क्षण कोई कहता है कि भारत तेरे टुकड़े होंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी क्षण वह भारत द्रोही और भारत राज्य का तथा भारत राष्ट्र का शत्रु घोषित हो जाता है और उसका वध तत्काल पुलिस या सेना के द्वारा किया जाना सर्वोपरि कर्तव्य है। भारत का वर्तमान राज्य ऐसा क्यों नहीं कर पा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे स्पष्ट करना शासन का कर्तव्य है परंतु इस दिशा में भारत के वर्तमान श्रेष्ठ राज्यकत्र्ताओं को विचार अवश्य करना चाहिए। भारत में रहते हुए भारत के राज्य से स्वयं को स्वतंत्र घोषित करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तत्काल नागरिक अधिकारों से वंचित कर दिये जाने योग्य अपराध है और इस अपराध का दमन नहीं करना राज्य की ओर से अपने कर्तव्य के प्रति शिथिलता और प्रमाद है। राज्य को  ऐसे सभी तत्वों का दमन करना ही चाहिए। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय या किसी भी अन्य संस्था में ऐसे उपद्रवों का होना बहुत गंभीर बात है और कुछ समय के लिए ऐसे संस्थानों को बंद करके जाँच आयोग बैठाना चाहिए जो उन कारणों की जाँच करें तथा उन प्रक्रियाओं की भी जाँच करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनके चलते ऐसे लोग पवित्र शिक्षण संस्थानों में अध्यापक प्राध्यापक आदि बन कर आ बैठे हैं और वहाँ रहकर देशद्रोह को बढ़ावा देने का काम अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कर रहे हैं और करवा रहे हैं।  ऐसे सब लोगों को चिह्नित कर तत्काल निलंबित कर दिया जाना चाहिए और देश की संप्रभुता और अखंडता को गंभीर  खतरा देखते हुए ऐसे सब लोगों के आपराधिक संजाल की विस्तार से जाँच के लिए एजेंसी गठित हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके लिए आवश्यक विधिक प्रावधान प्रशासन को तत्काल करना चाहिए।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
                                            <category>2019</category>
                                            <category>दिसम्बर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1890/azadi-ke-mayane</link>
                <guid>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1890/azadi-ke-mayane</guid>
                <pubDate>Sun, 01 Dec 2019 21:41:39 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        