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                <title>समकालीन भारत की मुख्य समस्याएँ और प्रमुख दृष्टियाँ - योग संदेश</title>
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                <description>समकालीन भारत की मुख्य समस्याएँ और प्रमुख दृष्टियाँ RSS Feed</description>
                
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                <title>समकालीन भारत की मुख्य समस्याएँ और प्रमुख दृष्टियाँ</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">प्रोफेसर कुसुमलता केडिया</span></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1894/samkalin-bharat-ki-mukhya-samasyae-aur-pramukh-drishtiyan"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-07/251.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स</span><span lang="hi" xml:lang="hi">मकालीन भारत की प्रमुख समस्याएँ क्या हैं और वर्तमान में कौन-कौन सी प्रमुख दृष्टियाँ यहाँ क्रियाशील है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनको शांत चित्र से सम्यक दृष्टि से देखने की आवश्यकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सबसे पहले यह स्मरण करना आवश्यक है कि वस्तुत: सत्ता का हस्तांतरण शांतिपूर्वक अंग्रेज क्यों करके गए और किन्हें करके गए </span>?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि उसके बाद से ही संपूर्ण भारत में राज्य की वह व्यवस्था थोड़े परिवर्तन के साथ चल रही है जो </span>15<span lang="hi" xml:lang="hi"> अगस्त</span>, 1947<span lang="hi" xml:lang="hi"> तक लगभग आधे से थोड़ी अधिक भारत में थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि शेष भारत में कई जगह सनातन धर्म की परंपरा के अनुसार मान्यता वाले राज्य चल रहे थे और कई जगह मुस्लिम जगीरदार चल रहे थे। उसका सार यह है कि भारत के एक हिस्से में पूर्व पाकिस्तान और पश्चिम पाकिस्तान बना देने के बाद जो बचा हुआ अंश है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस भारत को कॉमनवेल्थ का अंग बनाएंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह निर्णय हुआ । </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">कॉमन वेल्थ</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का अर्थ ही है साझी संपत्ति अर्थात् शेष बचे हुए </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इंडिया देट इज भारत</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की संपत्ति इंग्लैंड के साथ साझा होगी।  यह साझेदारी कैसी होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह भी स्वयं इंग्लैंड के शासकों ने ही तय की थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका सामान्य सार यह है कि भारत के संसाधन बड़ी मात्रा में इंग्लैंड को भेजे जाएंगे तथा इंग्लैंड के मित्र देशों जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका आदि को भेजे जाएंगे और वहाँ से भारत में वह चीजें बुलाई जाएंगी जो कि वे चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि हम। इसे विकास के लिए आवश्यक बताया गया और उन वस्तुओं तथा व्यवस्थाओं की भारत   में प्रधानता को ही विकास बताया जाने लगा । </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तदनुसार सबसे पहले वहाँ से बड़ी मात्रा में कर्ज लिया गया ऐसे कामों के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके लिए कोई आवश्यकता ही नहीं थी और इस कर्ज लेने को विकास की उड़ान के लिए आवश्यक बताया गया और बाद में उसका ब्याज मूलधन से भी ज्यादा जमा किया जाता रहा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस तरह विकास के नाम पर भारत पर कर्ज लाद दिया गया। दूसरी ओर यहाँ के संसाधनों का बड़ा हिस्सा और भी अधिक तेजी से व और भी अधिक मात्रा में यूरोपीय देशों को और संयुक्त राज्य अमेरिका को भेजा जाता रहा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसका सबसे बड़ा प्रमाण है संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा प्रकाशित आँकड़े जो बताते हैं कि </span>1947<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>1990<span lang="hi" xml:lang="hi"> तक भारत से इंग्लैंड तथा अन्य देशों और संयुक्त राज्य अमेरिका को जो संसाधन भेजे गए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे  उससे कहीं बहुत अधिक थे जो </span>1858<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>1947<span lang="hi" xml:lang="hi"> ईस्वी  तक  इंग्लैंड का राज्य भारत से ले गया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज ने </span>2014<span lang="hi" xml:lang="hi"> ईस्वी के चुनाव से पूर्व राष्ट्रव्यापी अभियान में यह मुद्दा पूरी प्रामाणिकता और विस्तार से उठाया था और उसके पीछे तथ्यों और आँकड़ों का बल था। स्वयं अंतर्राष्ट्रीय अर्थशास्त्रियों ने कहा है और अंक्टाड की रिपोर्ट ही है कि इन वर्षों में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इंडिया वाज ब्लीडेड व्हाइट</span>Ó (<span lang="hi" xml:lang="hi">भारत का इतना खून चूसा गया कि राष्ट्र देह मानो रक्तहीनता से सफेद हो चली)। यह पूरी तरह सत्य है कि जितना धन भारत से इंग्लैंड तथा विदेशों को </span>1947<span lang="hi" xml:lang="hi"> ईस्वी तक गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उससे बहुत अधिक संसाधन </span>1947<span lang="hi" xml:lang="hi"> के बाद से विदेशों को जाता रहा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">1947<span lang="hi" xml:lang="hi"> ईस्वी से पहले भी यह काम अंग्रेजों ने घोषित युद्ध के द्वारा या खुली लूट के द्वारा उतना नहीं किया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितना कि योजनापूर्वक भारत में अपना समर्थक एक बहुत बड़ा समूह क्रमश: बढ़ाते रहकर किया जो कि भारत के इस तरह के शोषण और उत्पीडऩ को ही भारत का विकास और भारत की सुख समृद्धि का प्रबंधन बताता रहा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं ऐसे समूह कांग्रेस ने </span>1947<span lang="hi" xml:lang="hi"> ईस्वी के बाद भी तैयार किए जो इस प्रक्रिया को ही बड़े उल्लास से भारत के वैभव और ऐश्वर्य का ही मार्ग बताते रहे और आज भी बता रहे हैं।  जिसमें शोषक के शोषण को भी शोषित का उद्धार और उत्कर्ष बताया जाता है। इसके लिए एक व्यवस्थित शिक्षा तंत्र तथा सूचना तंत्र अपने नियंत्रण में खड़ा किया जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अंग्रेजों के जाने के बाद कांग्रेसी शासन ने  विस्तार से देशभर में इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। सबसे ज्यादा तो इस भयंकर शोषण और दमन के पक्ष में कला और संस्कृति के क्षेत्र में भावना का वातावरण तैयार किया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कथा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कविताओं और फिल्मों तथा नाटकों की विशेष भूमिका रही। ऐसे नाटक रचे गए और ऐसी फिल्में बनाई गई जिसमें भारत के संसाधनों की लूट को ही इसकी प्रगति बताया गया और भारत की जो सनातन शक्तियाँ थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनमें से प्रत्येक पर प्रहार किया गया और भारतीय समाज को सदा से पिछड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्यायी बताकर ग्लानि और आत्महीनता के भाव से भरने का व्यवस्थित अभियान फिल्मों के द्वारा विशेषकर चलाया गया। इसी के लिए इप्टा सहित अनेक संगठन बनाए गए जिनके  प्रमुख सदस्यों को ही  महान् फिल्म निदेशक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महान् कलाकार और उनकी फिल्मों को महान फिल्में बताकर नास्तिकता और कामाचार का उन्माद जगाया गया। वह प्रक्रिया अभी भी चल रही है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसे थोड़ा और भली-भाँति समझने के लिए राज्य की प्रकृति और शक्ति को समझना आवश्यक है । </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राज्य किसी भी समाज का दंडबल है और वह दंडबल समाज के लक्ष्यों के अनुकूल कार्य करता है अथवा शासक समूह के लक्ष्यों के अनुकूल कार्य करता है। अंग्रेजों ने अपना समर्थक एक बड़ा वर्ग जो भारत में तैयार किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका काम था अंग्रेजों द्वारा भारत वर्ष के खून चूसने की प्रक्रिया को इसकी प्रगति और उत्कर्ष बताना और  इंग्लैंड के भारत शोषण के लक्ष्य को गरिमामंडित करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि इंग्लैंड के लक्ष्य प्राप्ति के पथ के कंटक दूर किए जा सकें। यह काम करने को ही कंटक शोधन कहा जाता है।  इंग्लैंड के जो लक्ष्य थे उनकी प्राप्ति में भारत के देशभक्त ही सबसे बड़े कंटक थे और इसलिए उनको दूर करके इंग्लैंड के स्वाभाविक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए योजना पूर्वक शिक्षा संचार फिल्मों और साहित्य के माध्यम से इंग्लैंड ने काम किया और उसमें पूरी तरह सफल होते रहे। उस सफलता का उत्कर्ष है जवाहरलाल नेहरू को भारत का प्रधानमंत्री बनाया जाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने इंग्लैंड से भारत को एकाकार  करने के लिए योजनापूर्वक शिक्षा और साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कला तथा संचार व्यवस्थाओं को नियोजित किया और बड़े-बड़े पदों पर ऐसे लोगों को बैठाया जो भारत से भारतीयता की समाप्ति और धर्मद्रोही लोगों को प्रतिष्ठा दिलाने के कार्य कर रहे थे। विश्वविद्यालयों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाचार पत्रों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मीडिया में और विशेषकर फिल्मों आदि में ऐसे ही लोगों को महिमामंडित किया गया। उन्हीं फिल्मों की चकाचौंध भारत में पैदा की गई जो भारत में भारतीयता के प्रति धिक्कार और तिरस्कार का भाव जगाएँ और भारत के अभारतीयकरण को गरिमामंडित करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे में जो भारत का प्रतिनिधि शासन हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो समाज का स्वाभाविक प्रतिनिधि शासन हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो राष्ट्रभक्त शासन हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका काम होगा भारत राष्ट्र के कंटकों का शोधन करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कंटकों का उन्मूलन करना और उन्हें भारतीय राष्ट्र के मार्ग से हटाना। एक लोकतांत्रिक और परिपक्व  समाज में यह काम कोई मार-काट के द्वारा कभी भी नहीं होता। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयं इंग्लैंड ने यह काम भारत में मार-काट से उतना नहीं किया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितना कि राज्यबल के प्रयोग के द्वारा किया। शिक्षा और फिल्मों सहित विविध सांस्कृतिक माध्यमों से ही भारत का परिवेश क्रमश: बदला । </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अत: राष्ट्रभक्त राज्य भी  सबसे अधिक काम इन्हीं माध्यमों से करेगा।  वह सच्चे इतिहास बोध को फैलाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सनातन धर्म के मूल्यों को सम्यक् रूप में महिमामंडित करने वाली शिक्षा और संचार माध्यमों  को प्रोत्साहित करेगा और ऐसी फिल्मों को तथा ऐसे साहित्य और कलाओं को प्रोत्साहित करेगा जो भारतीय समाज के स्वाभाविक सत्य की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सनातन वैदिक धर्म की प्रतिष्ठा करें और जो किसी भी रूप में भारत की सनातन धारा के किसी भी अंग को लांछित न करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके प्रति निंदा और विद्वेष का प्रसार न करें अपितु विवेक का जागरण करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह भारत के श्रेष्ठ राज्य का सर्वोपरि लक्ष्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि सारे विश्व में प्रतिनिधि राज्य का यही लक्ष्य होता है कि वह समाज के सनातन प्रवाह के मार्ग के कंटकों को दूर करता है। उनको कूटनीति से तथा शिक्षा नीति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति नीति आदि सभी उपायों का अवलंबन करते हुए तथा विधिपूर्वक आवश्यक अनुशासन लाते हुए कंटकों को राष्ट्र के मार्ग से हटाता है और समाज की शक्ति को अपने वैभव के साथ व्यक्त होने देता है। समाज की ज्ञान परंपरा और विद्या परंपरा को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बोध परंपरा और इतिहास बोध को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शौर्य और वीरता की परंपरा को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मंदिरों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थापत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाषाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूषा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भवन और भोजन की अपनी श्रेष्ठ परंपराओं को तथा कला और संस्कृति के सभी क्षेत्रों में अपने श्रेष्ठ सृजनशील रूपों को अभिव्यक्त होने का अवसर देता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके द्वारा ही कोई भी समाज शक्तिशाली और वैभवशाली होता है। इस प्रक्रिया में जो राष्ट्र के कंटक हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे व्याकुल होकर और अधिक उत्पात करते हैं तो उनका विविध कूटनीतिक राजनैतिक और विधिक तथा आर्थिक उपायों से दमन करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शमन  करना और उनकी सच्चाई को राष्ट्र के समक्ष और विश्व के समक्ष प्रस्तुत करना राज्य का कार्य है। वर्तमान शासक दल में जो वर्तमान नेतृत्व है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें कंटकशोधन की सामथ्र्य विद्यमान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह धारा </span>370<span lang="hi" xml:lang="hi"> और </span>35-<span lang="hi" xml:lang="hi">ए की कुशलतापूर्वक समाप्ति से प्रमाणित हो गया है। वर्तमान नेतृत्व कंटक शोधन के कौशल से संपन्न है और ऐसा लगता है कि उसमें इस बात की सजगता भी है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस तरह भारत की सबसे बड़ी और ज्वलंत समस्या भारत की सनातन ज्ञान परंपरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शौर्य परंपरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्यम और व्यवसाय परंपरा तथा कला और संस्कृति की परंपरा को प्रतिष्ठित करना है। इस प्रकार राष्ट्रीय जीवन के सभी क्षेत्रों में इसकी अपनी पुरुषार्थ परंपरा को बाधित करने वाले कंटकों का </span>70<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों में राष्ट्रव्यापी विस्तार भी राज्य के समक्ष सबसे बड़ी समस्या है और सच्चे राष्ट्रभक्त राज्य द्वारा इन कंटकों का दमन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शमन और शोधन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह भारत के राज्य का सर्वोपरि लक्ष्य है। राज्य के इस कार्य में समाज स्वाभाविक उल्लास से सहयोगी बनता रहा है और बनेगा। धारा </span>370<span lang="hi" xml:lang="hi"> और </span>35-<span lang="hi" xml:lang="hi">ए की समाप्ति के समय उमड़े राष्ट्रव्यापी उल्लास से यह प्रमाणित हो गया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रव्यापी कंटको की पहचान राज्य को निश्चित रूप से है और होगी। यह कंटक शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मीडिया और संस्कृति के क्षेत्रों में अपनी पूरी सामथ्र्य से सक्रिय है और सब ओर से भारत की मर्यादा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत के गौरव और भारत के वैभव को बाधित कर रहे हैं तथा भारतीयों के मन में ग्लानि और कुंठा के भाव भर कर यहाँ अकारण और निराधार विक्षोभ जगा रहे हैं और विविध भारतीय समूहों  को परस्पर लड़ाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चारों ओर विग्रह और कलह के बीज बोकर कलह के जंगल फैला रहे हैं। इन विग्रह और कलह के विषबीजों का शमन और दमन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शोधन और उन्मूलन  राज्य का लक्ष्य है और समाज स्वाभाविक रूप से इन कंटकों को पहचानता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन कदमों को राज्य की शक्ति द्वारा किसी भी प्रकार संरक्षण न दिया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके लिए कदम उठाना बहुत आवश्यक है। उसके लिए न्याय परंपरा में और विधि व्यवस्था में भी आवश्यक परिष्कार के विषय में विचार किया जाना चाहिए। साथ ही शिक्षा में सत्य और धर्म को प्रतिष्ठित करना अति आवश्यक है । </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत के जिस सनातन और पुरातन ज्ञान की संपूर्ण विश्व में चर्चा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आदर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आकर्षण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह ज्ञान भारत के विश्वविद्यालयों में ही न पढ़ाया जाए तो फिर वह शिक्षा भारत की प्रतिनिधि शिक्षा कैसे हो सकती है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की शिक्षा भारतीय ज्ञान परंपरा को पूरे वैभव के साथ प्रतिष्ठित करते हुए विश्व की ज्ञान परंपराओं का भी सम्यक् और सत्य परिचय विद्यार्थियों को दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही स्वाभाविक होगा ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषकर जैसा संपूर्ण संसार में होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने पूर्वजों की ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाना ही शिक्षा का सार्वभौम लक्ष्य है। तो भारत में भी शिक्षा का यही स्वाभाविक लक्ष्य होना ही स्वाभाविक है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विदेश से संबंधित विशेष ज्ञान उच्च स्तर के विशेषज्ञों में ही होना चाहिए। छोटे-छोटे बच्चों में उस ज्ञान को राज्य के बल से प्रक्षेपित करना अनुचित है। संचार माध्यमों के आधुनिक युग में वैसे भी प्रत्येक बच्चे को संसार की बहुत सी जानकारियाँ प्राप्त होती रहती हैं और उसमें बाधा करना अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के संदर्भ में संभव नहीं है। अत: विश्व की तरह-तरह की जानकारियाँ तो भारत के बच्चों को भी वैसे ही मिल रही है। ऊपर से राज्य के द्वारा योजनापूर्वक उन जानकारियों को ही देना और भारत की अपनी ज्ञान परंपरा को लगभग पूरी तरह उपेक्षित कर देना अनुचित है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वह भारतीय ज्ञान परंपरा जो समस्त विश्व में समादृत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की शिक्षा में पुन: प्रतिष्ठित हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह समकालीन भारत का लक्ष्य है और यह एक बहुत बड़ा लक्ष्य है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार शांति की समस्त बातें तो दो-दो महायुद्ध के भयंकर विनाश के बाद से शुरू हुई हैं। पहले तो ईसाई और मुसलमान शासक और लड़ाके लोग समस्त विश्व को अपने ही अधीन लाने की  गर्जना करते घूमते थे। जब लगा कि नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व में अन्य समाज भी बहुत वीर हैं और लड़कर तो हम नष्ट हो जाएंगे तब यह जो जीता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे बचाकर रखने के लिए शांति की बातें शुरू की गईं। परंतु शांति की इन समस्त चर्चाओं के और भाषणों के बीच प्रत्येक राष्ट्र राज्य युद्ध की निरंतर तैयारी कर रहा है और करता रहा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि सचमुच केवल शांति ही राष्ट्रों के लक्ष्य होते तो युद्ध की दिन दूनी रात चौगुनी गति से जो तत्परता और शक्ति और सामथ्र्य का विस्तार हो रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह तो कहीं घटित होता दिखता ही नहीं। परंतु यह हो रहा है। युद्ध की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रहारक और संहारक शस्त्रास्त्रों की शक्ति विश्व का प्रत्येक राष्ट्र राज्य निरंतर बढ़ा रहा है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राज्य का काम काल्पनिक जगत में रहना नहीं है। क्योंकि वह अत्यंत व्यावहारिक भाव भूमि पर और सत्य की भूमि पर टिकी हुई शक्ति है। राज्य कोई कविता नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह लौकिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और नैतिक तथा विधिकबल है जिसमे दंडबल की प्रधानता है। वह समाज की और राष्ट्र की प्रतिनिधि संस्था है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समकालीन विश्व का सत्य सम्मुख है। सब निरंतर युद्धबल को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शस्त्रबल को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सैन्यबल को और युवाओं के शौर्यबल को बढ़ा रहे हैं। उस दृष्टि से अपने सैन्यबल का विस्तार और भारत की सुरक्षा की संपूर्ण व्यवस्था तथा इसके लिए सेना को आधुनिकतम  शस्त्रास्त्रों से सम्पन्न बनाना भारत के राज्य का लक्ष्य है। साथ ही युवाओं को सैन्य शिक्षण तथा कम से कम </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ष सेना में सेवाएँ देना अनिवार्य होना चाहिए। जैसा विश्व के अधिकांश आधुनिक राष्ट्रों में है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ये ही समकालीन भारत के मूल लक्ष्य है । इनकी विरोधी दृष्टियाँ भारत के शत्रुओं के लक्ष्यों के लक्ष्य की पूर्ति के लिए कार्यरत कंटक हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका शोधन राजधर्म है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र-चिंतन</category>
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                <pubDate>Sun, 01 Dec 2019 21:32:46 +0530</pubDate>
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