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                <title>संन्यासी की निर्भयता - योग संदेश</title>
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                <description>संन्यासी की निर्भयता RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>संन्यासी की निर्भयता</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:right;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धेय गुरुदेव आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज</span></h5>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/1937/sanyasi-ki-nirbharta"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-08/501.jpg" alt=""></a><br /><table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#E67E23;border-color:#E67E23;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(230,126,35);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(255,255,255);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राचीन</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय परम्परा के अनुसार मानव जीवन के विकास के चार सोपान सुनिश्चित किये गये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनमें से जो अन्तिम सोपान है उसका नाम रखा गया- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">संन्यास</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् सर्वस्व त्याग। त्याग किसका</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">जो किसी भी उपाय से हमारा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्व</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">हो गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी ने हमको दे दिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमने अपने पुरुषार्थ से अर्जित किया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसको हम अपना कह रहे हैं या मान रहे हैं और आगे चलते-चलते जो हमारे व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा बन गया है और अब </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">ही बन गया है।</span></strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">स प्रक्रिया में कुछ चीजें तो ऐसी होती हैं जो जन्म के साथ ही हमें मिलती हैं- माता-पिता व अन्य सम्बन्धी जन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन-बुद्धि-प्राण-इन्द्रियों का संघात यह शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रूप-रंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माता-पिता के द्वारा अर्जित की हुई सम्पत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधन-सामग्री इत्यादि। इन सबके अलावा कुछ ऐसी चीजें भी होती हैं जो समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्यालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथियों और गुरुजनों के सम्पर्क में आने पर हमें प्राप्त होती हैं जैसे मातृ-भाषा के अतिरिक्त दूसरी-दूसरी भाषाओं का ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विविध विद्याओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनेक प्रकार की योग्यताओं व क्षमताओं का विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिल्पकलाओं में प्रवीणता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वक्तृता व लेखनकला में निपुणता इत्यादि। इस विकास क्रम में अनेकानेक नैतिक गुणों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सद्गुणों की भी प्राप्ति होती रहती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा आदि से सामाजिक यश-कीर्ति भी मिलती है। जीवन के उपर्युक्त सभी घटकों का कुलयोग ही हमारा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्तित्व</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">होता है। दूसरों के मन-मस्तिष्क पर हमारे उस व्यक्तित्व की एक-एक छवि बन जाती है। इस छवि के अच्छे-बुरे दोनों रूप हो सकते हैं। उसमें से दूसरों के द्वारा निर्मित हमारी बुरी छवि को तो हम छोड़ देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह हमें पूर्णत: स्वीकार नहीं होती किन्तु अच्छी छवि को हम स्वीकार कर लेते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् हमारे बारे में दूसरों की मान्यता के अनुसार हम भी अपने को वैसा ही मानने लगते हैं। यह हम सबके जीवन का एक सामान्य क्रम है। साधकों की भाषा में इसे हम </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">या योगदर्शन में उपवर्णित पाँच क्लेशों में से एक प्रमुख क्लेश </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अस्मिता</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के रूप में जानते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संन्यास आश्रम में दीक्षित होते समय सर्वस्वत्याग की प्रक्रिया में व्यक्ति को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">एके साधे सब सधे</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इस नियम के अनुसार इस </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की ही आहुति देनी होती है। क्योंकि संन्यास अर्थात् त्याग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर वही प्रश्न कि त्याग किसका</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ऋषियों ने कहा अपने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का अर्थात् अपने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का। हम सांसारिक वस्तुओं को आवश्यकतानुसार प्राप्त तो करें पर उन वस्तुओं में आसक्त न हों। उनके साधन भाव को दृष्टि से ओझल न होने दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सतर्क रहें साधन ही कहीं साध्य न बन जाये। उन वस्तुओं के साथ मेरेपन का घनिष्ठ सम्बन्ध न बना बैठें। जो कुछ प्राप्त हुआ या प्राप्त होता है अथवा जो कुछ प्राप्त किया या प्राप्त करते हैं उस सबका प्रभु के चरणों में समर्पण करते रहें। पदार्थों व क्रियाओं के न्यासी (ट्रस्टी) बनकर रहें न कि उनके मालिक। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अस्मिता</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की अपने अन्दर ग्रन्थी न बनने दें ताकि प्रिय से प्रिय वस्तु भी छूटे तो हमारे हृदय-समुद्र में दु:ख की छोटी सी भी लहर पैदा न होने पाए। किसी वस्तु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति या विचार के साथ सम्बन्धित होने या न होने में एकसम बने रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साक्षी या उदासीन या तटस्थ द्रष्टा बने रहें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अथर्ववेद के एक मन्त्र में कहा गया है- </span><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्तां पावमानी द्विजानाम्। आयु: प्राणं प्रजां पशुं कीर्तिं द्रविणं ब्रह्मवर्चसं मह्यं दत्त्वा व्रजत ब्रह्मलोकम्</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। (१९.७१.१)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस मन्त्र में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मया</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मह्यम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के द्वारा एक ही सत्य का संकेत हुआ है। आयु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पशु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कीर्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्रविण (धन)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मवर्चस (ब्रह्मतेज अर्थात् ब्रह्म का ज्ञान) ये सब व्यक्ति के द्वारा जीवन में पाने की चीजें हैं। वेदमाता ने प्राप्तव्य चीजों की सूची हमारे समक्ष रखी है और साथ में यह भी कह दिया कि ये सब चीजें अपने पास नहीं रखनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ तक कि ब्रह्मवर्चस भी। अपने पास रखने का अर्थ है- अपने अहं को पुष्ट करना। अर्पित कर देने का अर्थ है- निरहं (निरहंकार व निर्मम) हो जाना। इसके अतिरिक्त ब्रह्मलोक में जाने का कोई रास्ता नहीं है। सो संन्यास धर्म में दीक्षित होता हुआ संन्यासी अपने ऊपर ओढ़े हुए सभी लिबासों को उतार रहा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राचीन भाषा में आत्म-साक्षात्कार को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कैवल्य</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इस अन्वर्थ नाम से जो अभिहित किया है वह भी इसी ओर संकेत कर रहा है। कैवल्य अर्थात् अकेला हो जाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समस्त प्रपञ्च से अपने मन को हटा लेना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समस्त दृश्य से अचाह हो जाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देहात्मभाव से रहित हो जाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी या अपने बारे में निर्मित हुई पूर्व छवियों का त्याग कर देना और आगे के लिये अपनी कोई भी छवि न बनाना। जो अकेला हो जाता है वही फिर सर्वगत सत्य के साथ एक हो सकता है। और जो साधक अकेला (केवल) होने की कला सीख लेता है वही निर्भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वथा निर्भय रह सकता है। अकेले को कौन डरा सकता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">डरने के लिए ऐसा कुछ पास में होना चाहिए (मनोवैज्ञानिक रूप से या भौतिक रूप से) जिसके छिन जाने की आशंका हो या फिर कुछ पाने की चाह हो और उसमें कोई बाधा उपस्थित होने की संभावना दिखाई देने लगे तो भी भय हो सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु जिसने वस्तु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार और यहाँ तक कि अपने शरीर से भी तादात्म्य हटा लिया हो तो अब उससे कोई क्या छीनेगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">और वह क्यों किसी से बाधित होगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">बाधा के लिये द्वैत चाहिये क्योंकि द्वैत में ही किसी भी कामना का जन्म होता है और फिर उसे पूरा करने के लिये प्रयास होता है। लौकिक स्तर पर विशेष बनने के लिये किये गये प्रयास को कोई न कोई बाधित कर ही देता है। जो प्रयास अपने द्वारा अपने में किये जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल वे ही किसी अन्य के द्वारा बाधित नहीं किये जा सकते।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी बात को दूसरी तरफ से कहें तो कहना होगा कि जो सर्वभूतात्मभाव रूप ज्ञान की ऐसी दृढ़ स्थिति में रहता है जिसका अपना पराया कुछ बचा ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब वह किससे डरेगा और क्यों डरेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रुति कहती है- द्वितीयाद् वै भयं भवति (बृह. १.४.२) अर्थात् दूसरे से ही भय होता है। मनु के द्वारा दिया गया सर्वभूतात्मभाव का संदेश भी यहाँ द्रष्टव्य है-</span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(224,62,45);" xml:lang="hi">सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(224,62,45);" xml:lang="hi">समं पश्यन्नात्मयाजी स्वाराज्यमधिगच्छति।।१२.९१।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् सब भूतों में आत्मा को और सब भूतों को आत्मा में समान रूप से देखता हुआ आत्मयाजी स्वराज्य अर्थात् अपने आन्तरिक राज्य को प्राप्त कर लेता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य चरक ने भय के कारणों पर विचार करते हुए सूत्ररूप में एक वचन बोला-</span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">असमर्थता भयकराणाम्</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भयदायक जितने भी हेतु हो सकते हैं उनमें </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">असामथ्र्य</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृष्टतम है। जो व्यक्ति ज्ञान में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धन में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जनसमर्थन में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्या में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वक्तृता में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुणों में बढ़ा हुआ है वह किसी से क्यों डरेगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी तरफ जो सर्वथा अकाम हो गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसको किसी से कुछ चाहिए ही नहीं तो निश्चित ही ऐसा व्यक्ति भी क्यों भयभीत होगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि कामना ही अपूर्णता को प्रकट करती है। अकाम व्यक्ति सदा ही अपने अन्दर से भरा-पूरा रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह क्यों किसी से भी किसी चीज की इच्छा करेगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसा कि किसी ने कहा भी है- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">हम को कछु न चाहिए हम हैं शहंशाह</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। सो ऐसा व्यक्ति किसीे से क्यों डरेगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">असमर्थ अवस्था में ही व्यक्ति अपने आपको भयभीत पाता है। डायबेटिक व्यक्ति ही मीठे से डरेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ व्यक्ति क्यों डरेगा। किसी व्यक्ति ने अभी-अभी अपना व्यसन छोड़ा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह व्यसन को जगाने वाले अनुकूल आलम्बन से अवश्य भयभीत होगा। किन्तु जिसके संस्कार दग्ध बीज हो गये वह क्यों भयभीत होगा। कारण उस विषय में उसकी कमजोरी समाप्त हो गयी है। किसी भी विषय में भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कमजोरी को और निर्भयता मजबूती को प्रकट करती है। यदि निर्बल लोगों के समक्ष कोई बलवान् अपनी किसी प्रकार की शक्ति का प्रयोग करे- राजशक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धनशक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पदशक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन्त्रशक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तर्कशक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्याशक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शारीरिक शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन:शक्ति इत्यादि चाहे जो भी हो तो निर्बल व्यक्ति का भयभीत होना स्वाभाविक है कि यह मेरा कुछ छीन लेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा शोषण करेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुझे दबायेगा। पर संन्यासी का कोई क्या छीनेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका अपना कहा जाने योग्य कुछ है ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ बचा ही नहीं। जो समस्त परिग्रह का त्यागकर सर्वथा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अपरिग्रही</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">हो गया है तथा आगे के लिये भी किसी भी वस्तु-व्यक्ति-विचार के संग्रह को स्थान नहीं देना चाहता।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2018</category>
                                            <category>फरवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 01 Feb 2018 21:47:42 +0530</pubDate>
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