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                <title>विदेशी का बहिष्कार - योग संदेश</title>
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                <description>विदेशी का बहिष्कार RSS Feed</description>
                
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                <title>राष्ट्र निर्माण में हमारी भूमिका</title>
                                    <description><![CDATA[<table style="border-collapse:collapse;width:100.026%;border-width:1px;background-color:#CED4D9;border-color:#CED4D9;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8555%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(206,212,217);">
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">          हममें</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से अधिकतर लोग सोचते हैं कि हम भी कुछ ऐसा विशेष कार्य करें जिससे कि हमें इस संसार में जीते हुए और संसार से जाते हुए सन्तुष्टि मिले। लेकिन ऐसा क्या करें</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके विषय में स्वामी जी महाराज प्राय: बोलते हैं कि यदि सभी देशवासी मात्र दो चीजों को जीवन में अपनाने का तथा दो चीजों को त्यागने का संकल्प ग्रहण करें तो हम भारत को </span>2050<span lang="hi" xml:lang="hi"> तक एक दिव्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भव्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक तथा आर्थिक रूप से एक महाशक्ति बनाने में अपना बड़ा योगदान दे सकते हैं।</span></strong></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">      इ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ससे हमारा जीवन व देश ही नहीं अपितु सारी</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2016/rashtra-nirman-me-hamari-bhumika"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-08/022.jpg" alt=""></a><br /><table style="border-collapse:collapse;width:100.026%;border-width:1px;background-color:#CED4D9;border-color:#CED4D9;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8555%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(206,212,217);">
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">     हममें</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से अधिकतर लोग सोचते हैं कि हम भी कुछ ऐसा विशेष कार्य करें जिससे कि हमें इस संसार में जीते हुए और संसार से जाते हुए सन्तुष्टि मिले। लेकिन ऐसा क्या करें</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके विषय में स्वामी जी महाराज प्राय: बोलते हैं कि यदि सभी देशवासी मात्र दो चीजों को जीवन में अपनाने का तथा दो चीजों को त्यागने का संकल्प ग्रहण करें तो हम भारत को </span>2050<span lang="hi" xml:lang="hi"> तक एक दिव्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भव्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक तथा आर्थिक रूप से एक महाशक्ति बनाने में अपना बड़ा योगदान दे सकते हैं।</span></strong></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   इ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ससे हमारा जीवन व देश ही नहीं अपितु सारी दुनियाँ को हम बदल सकते हैं। प्रथम है दो बातों को अपनाने का संकल्प।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(226,12,109);"><strong>(1) <span lang="hi" xml:lang="hi">हम योग और कर्मयोग के मार्ग पर चलें</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुबह-सुबह उठकर यदि सभी देशवासी योग करें तथा दिन भर कर्मयोग की स्थिति में रहने का अभ्यास करें तो एक आश्चर्यजनक परिणाम कुछ ही दिनों में हमारे जीवन में घटित होता दिखाई देगा। आज लाखों नहीं अपितु करोड़ों लोगों का अनुभव है कि वे सुबह-सुबह प्रतिदिन योगासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम व ध्यान करते हैं इससे उनके अनेक रोगों का नाश होकर उनके जीवन को एक नई दिशा व दशा मिली है। रोगों के नाम पर खर्च होने वाला धन अब उनके जीवन की खुशियों के लिए प्रयुक्त हो रहा है। एक नई ऊर्जा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सकारात्मकता व नई सृजनात्मकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसन्नता व उत्साह का अनुभव वे अपने जीवन में कर रहे हैं। सुबह-सुबह योग से मिलने वाली शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मिक व आध्यात्मिक शक्ति को केन्द्र में रखकर जब वे पूर्ण प्रसन्नता व उत्साह के साथ दिन-भर अपने कत्र्तव्यों व दायित्वों का निर्वहन करते हैं तो इससे अब उन्हें थकान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिड़चिड़ापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव आदि से पूर्ण मुक्ति मिल चुकी है। शाम को घर आते समय एक आत्मसन्तुष्टि का भाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफलता का भाव मन में रहता है। आत्मविश्वास बढ़ा है। सम्बन्धों में मधुरता व समरसता बनी है। घर-परिवारों में लड़ाई-झगड़ा वैमनस्य व मनमुटाव आदि समाप्त होकर दूसरों की सहायता व सेवा करने का भाव बढ़ा है और यही कारण है कि आज वे ही आत्मसन्तुष्ट व आत्मविश्वास से भरे कार्यकत्र्ता प्रतिदिन देश में लगभग डेढ़ लाख नि:शुल्क योग कक्षाएं लगाकर लोगों को योग व कर्मयोग से जोडऩे का सफल प्रयास कर रहे हैं। इससे परिणाम यह आया है कि पिछले एक दशक में योग के माध्यम से देश के लाखों करोड़ रूपये जो बिमारियों व बुराइयों</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">(नशादि) में खर्च हो रहा था वह बचा है इससे उनके जीवन में समृद्धि की वृद्धि हुई है और साथ ही यह राष्ट्र की भी समृद्धि मानी जायेगी तथा कर्मयोग के माध्यम से वे ज्यादा पुरुषार्थ कर पाये इससे उत्पादकता में वृद्धि हुई है और साथ ही घर-परिवारों में शान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुरता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परस्पर सहयोग व राष्ट्रसेवा आदि का भाव लोगों के जीवन में जगा है। इस प्रकार इन दो उपायों को यदि हम जीवन में दृढ़ता से अपनाते हैं तो अपने जीवन के साथ-साथ हम सहज रूप से एक दिव्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भव्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्ध व संस्कारवान् भारत बनाने में सहयोग कर सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि यह केवल एक योग का ही फल है जिससे हमारे जीवन में सुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सौभाग्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्ति और जीवन में सब प्रकार के शुभ के अनन्त द्वार खुल जाते हैं। यह भगवान् का शाश्वत विधान है कि जो भी हम करते हैं वह अनन्त गुणा होकर हमें और इस पूरी समष्टि को मिलता है। जब </span>125<span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ भारतवासी योग और कर्मयोग पर चलेंगे तो भारत स्वयं ही ऋषियों का देश बनेगा तथा देश में सब प्रकार से सुख-समृद्धि व शान्ति बढ़ेगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span style="color:rgb(226,12,109);">(2) <span lang="hi" xml:lang="hi">हम स्वदेशी को समग्रता से अपनाने का संकल्प लें</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी वस्तु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी भाषा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी संस्कृति व सभ्यता के प्रति पूर्ण आग्रह और स्वदेशी को अपने जीवन में पूर्णतया आत्मसात् करके हम स्वयं भी सुखी होंगे एवं इस समष्टि में भी सुख-समृद्धि एवं शान्ति को बढ़ायेंगे। स्वदेशी एक बहुत बड़ा दर्शन है और यह दर्शन उतना ही पुराना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितनी पुरानी यह सृष्टि है। लगभग </span>200<span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ वर्ष पुरानी अपनी संस्कृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभ्यता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय जीवन पद्धति को हम लेकर चलें और हम क्षणिक रूप से पूरी दुनियाँ में जो विचारधाराएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्धान्त और मान्यताएं चल रही हैं उनके प्रति किसी भी प्रकार के अज्ञान या अविवेकवश मिथ्याप्रलोभनों से बचें। जिनको वस्त्र पहनना भारत ने सिखाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनको भोजन खाना भारत ने सिखाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हीं की आज हम अज्ञानवश भोजन या वेशभूषा की नकल करके अपने को सभ्य दिखाने का मिथ्याप्रयास कर रहे हैं। इसके विपरीत यदि हम स्वदेशी को पूर्णरूप से आत्मसात् करके आगे बढ़ते हैं तो यह एक प्राकृतिक विधा होगी। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी एक समग्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थायी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विकेन्द्रित और न्यायपूर्ण समृद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्ति व आनन्द का मार्ग है। स्वदेशी एक बहुत ही ऊँचा दर्शन है इसमें किसी की हानि करने का विचार नहीं हैं बल्कि न्यायपूर्ण तरीके से स्वयं के प्रति व पूरी समष्टि के प्रति न्याय करते हुए एक अहिंसक समृद्धि व एक अहिंसक सफलता का मार्ग है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी भाषा के प्रति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेशभूषा के प्रति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भोजन के प्रति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिकित्सा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभ्यता संस्कृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी जीवन पद्धति के प्रति एक गौरव का भाव होगा तो हम अधिक सुखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहज व आनन्दित होंगे क्योंकि वही स्वाभाविक है और बनावटीपन की अपेक्षा वह हमारी आत्मा के ज्यादा नजदीक भी होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे कोई व्यक्ति </span>15-20<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों से किसी दूसरे देश में रह रहा है वहीं की भाषा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेशभूषा व भोजनादि को सम्पूर्ण रूप से अपना चुका है परन्तु अचानक उसे अपने प्रान्त की भाषा बोलने वाला कोई व्यक्ति अपनी प्रान्तीय या राष्ट्रीय वेशभूषा में दिखाई दे जाये तो वह दौड़कर उसके पास आता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उससे अपनी भाषा में बात करके या प्रान्तीय भोजन का रेस्टोरेन्ट दिख जाये तो वही आहार लेना चाहता है और ऐसा करके उसे बहुत खुशी मिलती है क्योंकि यही स्वाभाविक है अत: इस स्वदेशी के भाव को जब हम पूरे गौरव के साथ अपनायेंगे और इसका विस्तार होगा तो पूरे देश में ही नहीं अपितु पूरे विश्व में एक सात्विकता व दिव्यता की प्रतिष्ठा होगी। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिन दो चीजों को(योग-कर्मयोग तथा स्वदेशी) अपनाने का हमें संकल्प लेना है उसी प्रकार दो चीजों को त्यागने का भी संकल्प हमें लेना है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(226,12,109);"><strong>(1<span lang="hi" xml:lang="hi">) विदेशी का बहिष्कार</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विदेशी कम्पनियों की वस्तुएं खरीदने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीने व लगाने से पूर्व यह अवश्य सोचें कि आखिर इसका लाभ क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">जब आप इसके बारे में विचार करेंगे तो पायेंगे कि शारीरिक रूप से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक रूप से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सांस्कृतिक व संस्कारों की दृष्टि से उसका लाभ शून्य और उसकी हानियाँ अनन्त हैं। विदेशी कम्पनियाँ आज भी देश की </span>50<span lang="hi" xml:lang="hi"> लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था पर कब्जा किये बैठी हैं और आप अपने बाथरूम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कीचन व बैडरूम से लेकर अपने आस-पड़ोस में देखेंगे तो गहरा कुचक्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गहरा संस्कार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गहरा षड्यन्त्र धीरे धीरे हमारे अन्दर ऐसा रच-पच गया कि हमने उसको अपना ही मान लिया है अत: इन को बचायें और इस देश को एक आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सांस्कृतिक व वैचारिक आजादी दिलायें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(226,12,109);"><strong>(2<span lang="hi" xml:lang="hi">) अशुभ अभ्यासों का त्याग</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">त्यागने योग्य दूसरी चीज जो है वह है अपने किसी भी एक अशुभ को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुर्गुण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुरी आदत को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुरे अभ्यास को छोडऩे का व्रत लें। क्योंकि जिस प्रकार इन बाह्य विदेशी वस्तुओं का भाषादि का प्रयोग करते-करते हम उन्हें अपनी ही मानने लग गये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी प्रकार अकर्मण्यता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घृणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नाराज होना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वेष करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दु:खी होना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदास होना इत्यादि दोषों को भी हमने स्वाभाविक मान लिया। बस यही बुनियादि भूल हो गई। इसमें हम स्वयं भी दु:खी होते हैं और कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में अपने स्वजनों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवारजनों को भी दु:ख देते हैं। ये सब हमारा मूल स्वभाव नहीं है अपितु विदेशी कम्पनियों की तरह बाहर से आया हुआ व स्वीकार किया हुआ माल है। हमारा अपना मूल स्वभाव तो शान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पवित्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसन्नता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्तिसम्पन्नता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सौहार्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहअस्तित्व आदि हैं। हम अपने मूल स्वभाव का सम्मान व आयातीत का बहिष्कार करें तो एक दोष का त्याग करते हुए दिव्यता की ओर आरोहण करते हुए अपने को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने परिवार को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज को व राष्ट्र को दिव्यता से भर सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span style="color:rgb(226,12,109);"><span lang="hi" xml:lang="hi">"आ नो भद्रा: क्रतवो यन्तु विश्वत:</span>’’</span></strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् सब तरफ से शुभ मेरी तरफ आयें। किसी एक शुभ या अशुभ को अपनाने से उसका बाकि परिवार तो स्वयं ही हमसे जुड़ जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अत: हम उपरोक्त केवल दो चीजों को छोडऩे तथा दो चीजों को अपनाने का संकल्प यदि ले लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह अपने लिए भी और राष्ट्र के लिए भी बहुत बड़ी सेवा होगी और एक दिन हमारा इस देश को ऋषि-ऋषिकाओं का देश आर्यावर्त देश व शहीदों के सपनों का देश बनाने में बहुत बड़ा योगदान सिद्ध होगा और यह देश तो ऐसा बनना ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत को तो दिव्यता में प्रतिष्ठित होना ही है क्योंकि यही भागवत विधान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वरीय दिव्य विधान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और यदि ऐसा होना ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो फिर इस विराट् भागवत कार्य में हम अपनी यथायोग्य भूमिका क्यों न निभायें</span>?</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2018</category>
                                            <category>मई</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 May 2018 21:57:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
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