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                <title>ऋषिग्राम में नूतन संयासियो को शीर्ष संतो का आशीवार्द - योग संदेश</title>
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                <title>ऋषिग्राम में नूतन संयासियो को शीर्ष संतो का आशीवार्द</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="margin-bottom:0.1in;text-align:right;" align="right">-<span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">काष्र्णीपीठाधीश्वर </span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin-bottom:0.1in;text-align:right;" align="right"><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">गुरु शरणानन्द जी महाराज</span></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2019/rishigram-me-nutan-sanyasiyon-ko-shirsh-santon-ka-ashirwad"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/31.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    संन्यास </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दीक्षा के अनुष्ठान की पूर्णाहुति के अवसर पर ऋषिग्राम में नूतन संन्यासियों को देश के शीर्ष संतों ने आशीर्वाद प्रदान किया। इस अवसर पर पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज ने कहा कि ऋषि परम्परा को अतीत का गौरव प्रदान करने वाले शीर्ष संत-महात्माओं का दर्शन पाकर हमारे साथ-साथ नवदीक्षित संन्यासी भी अभिभूत हैं। स्वामी जी ने कहा कि गुरुसत्ता अमूर्त को मूर्त रूप प्रदान करती है। इस अवसर पर हम अपनी गुरुसत्ता को प्रणाम करते हैं जिन्होंने हमें वेदवित्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्रवित्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञानवित् तथा ब्रह्मवित् बनाया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ग्राम की विशाल यज्ञशाला में आयोजित इस आशीर्वाद समारोह में पूज्य स्वामी जी महाराज ने कहा कि संन्यास पूर्णता व अनन्त का मार्ग है। इसमें संन्यासी को तप करके अपने को कुन्दन बनाना पड़ता है। ये </span>92<span lang="hi" xml:lang="hi"> नवदीक्षित संन्यासी देश-विदेश में भारत की प्राचीन ऋषि परम्परा</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय संस्कृति तथा वेदों को आगे ले जाने का कार्य करेंगे जिससे भारत एक आध्यात्मिक शक्ति के रूप में प्रतिष्ठापित होगा। हमारी यह योजना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह तप आगामी </span>30<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों की कठिन तपस्या है। इसी कड़ी में रामनवमी से गुरुपूर्णिमा तक लगभग </span>500<span lang="hi" xml:lang="hi"> नवदीक्षु ब्रह्मचारी व ब्रह्मचारिणियाँ वैदिक गुरुकुलम् में प्रवेश के लिए आ रहे हैं। इन्हें अष्टाध्यायी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्याकरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपनिषद् आदि की शिक्षा देकर अगले चरण के लिए तैयार किया जायेगा। स्वामी जी ने बताया कि ये सभी नवदीक्षित संन्यासी तथा नवागन्तुक ब्रह्मचारी प्रज्ञावान् मस्तिष्क के स्वामी हैं। इनका जीवन ज्ञान की पराकाष्ठा है। यदि ये डॉक्टर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इंजीनियर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आई.आई.एम. के स्कॉलर या किसी भी क्षेत्र में होते तो वहाँ भी टॉप कर सकते थे। इनके माता-पिता ने इन्हें उपहार रूप में राष्ट्र को प्रदान कर बड़ा उपकार किया है। इनका कुल ऋषिकुल है। धन्य हैं इनके माता-पिता जिन्हें गर्व है ऋषि परम्परा में दीक्षित होने वाली अपनी संतानों पर।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/32.jpg" alt="32"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर काष्र्णीपीठाधीश्वर पूज्य गुरु शरणानंद जी महाराज ने कहा कि हमारे गुरु महाराज ने हमें कहा था कि हमारा आचरण श्रेष्ठ होना चाहिए। क्योंकि एक संन्यासी का आचरण ही उसके लिए सब कुछ होता है। संन्यासी कदापि ऐसा आचरण न करे जिससे उसकी गुरु सत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुल व संस्कृति कलंकित हो। उन्होंने कहा कि तुम्हारे नाम के साथ तुम्हारे उज्ज्वल गुरु का नाम जुड़ा है। तुम पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। तुम्हारा गलत आचरण तुम्हारे गुरु पर भी उँगली उठायेगा। स्वाभाविक है तुम्हारे मन में ऐसे विकार आयेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घबराना मत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई भय नहीं करना। सावधान रहोगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सतर्क रहोगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जागरूक रहोगे तो तुम्हें कोई भय नहीं रहेगा। तुम्हें ध्यान रखना है कि तुम किसके शिष्य हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुम्हारे शरीर पर कितनी परम्पराओं का भार है। संन्यास मार्ग कमजोर लोगों के लिए नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह बलिष्ठ लोगों का मार्ग है। उन्होंने कहा कि अपने गुरु से बढ़कर प्रियतम कोई अन्य नहीं होता।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर जूनापीठाधीश्वर आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज ने कहा कि यह सकल प्रयास भारत में वैदिक युग लाने के लिए है। यह सारा पुरुषार्थ भारत माता को परम वैभव की ओर ले जाने के लिए है। </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi">वीं शताब्दी भारत देश तथा आपकी होगी। योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय ऋषि परम्परा तथा संस्कृति को पूरा विश्व स्वीकार करेगा। आज भारत को छोड़ पूरा विश्व मनोरोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनिद्रा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवसाद आदि से भरा पड़ा है। उनमें आनंद का सूत्रपात यदि होगा तो भारत से ही होगा। यहाँ से वैदिक युग प्रारम्भ होगा। भारत का आध्यात्मिक वैभव अब जागृत हो रहा है। यहाँ से आध्यात्मिक राष्ट्रवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की कहानी गढ़ी जा रही है। गुरु चेला नहीं बनाता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु तो गुरु बनाता है। आप गुरु बनाये गयेे हैं। आपके पास नेतृत्व व प्रभुत्व की क्षमता है। आपको देश व विश्व का नेतृत्व करना है तथा उसे सन्मार्ग पर ले जाना है। सामाजिक समरसता यहीं से आयेगी। संन्यास का अर्थ है मुझसे कोई भयभीत न हो और मैं किसी से भयभीत न होऊँ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर वेदमूर्ति पूज्य गोविन्द देव गिरि जी महाराज ने कहा कि मैं बहुत आह्लादित हूँ आपका दर्शन पाकर। आप एक शिखर पर हैं तथा एक नये शिखर की ओर आपको आरोहण करना है। नूतन संन्यासियों को पुराने संन्यासियों के द्वारा आशीर्वचन नहीं दिया जाता उनको प्रणाम किया जाता है। यह प्रणाम इसलिए किया जाता है कि आपने नारायणत्व को स्वीकार किया। इसके पश्चात् हम आपका दर्शन आज पहली बार कर रहे हैं। इसलिए मैं आपको अपने अंत:करण से प्रणाम करता हूँ। संसार में बहुत लोग भाग्यवान् माने जाते हैं लेकिन होते नहीं हैं। आप भाग्यवान् हैं। आपके माता-पिता व परिजनों को अभिवादन जिन्होंने आनन्दपूर्वक आपको संन्यास की अनुमति प्रदान की। आपका अभिनन्दन इसलिए कि आपने ऐसे माता-पिता प्राप्त किये। अमृतत्व की प्राप्ति ही मानव जीवन का मूल उद्देश्य है। हम अमृतत्व की प्राप्ति के लिए जन्मे हैं जो अन्य योनियों में सम्भव नहीं है। उस अमृतत्व को प्राप्त करने के लिए हमारा सम्पूर्ण जीवन निर्बाध हो जाये यह आवश्यक है। जब व्यक्ति वैराग्य की ओर निकल पड़ता है तो वह किसी का ऋणि नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह पुत्र ऋण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु ऋण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देव ऋण आदि सभी ऋणों से मुक्त हो जाता है। आप धन्य हैं कि आप इन ऋणों से मुक्त होकर एक संकल्प के साथ ऋषि परम्परा को आगे ले जाने के लिए निकल पड़े हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर परम श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने कहा कि आज संन्यास दीक्षा का समापन तथा संन्यास जीवन का प्रारम्भ है। परम सौभाग्य है कि परम पूज्य संतों का दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आशीर्वाद तथा उनकी पावन उपस्थिति हम सबको सहज प्राप्त है। उन्होंने गुरु शरणानंद जी के विषय में कहा कि हम संस्कृति से गौरवान्वित होते हैं किन्तु ये ऐसे संत हैं जिनसे हमारी संस्कृति गौरवान्वित होती है। आचार्यश्री ने कहा कि स्वामी रामदेव जी महाराज एक आदर्श पुरुष हैं जिन्होंने अपना कुछ नहीं रखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब कुछ राष्ट्रसेवा व समाजसेवा के लिए अर्पण कर दिया। मेरा मानना है कि नवदीक्षित संन्यासियों के लिए इससे अच्छा वातावरण नहीं हो सकता कि इस देवभूमि पर गंगा के पावन तट पर शीर्ष संतों के मध्य योगऋषि पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज के द्वारा इन्हें संन्यास की दीक्षा प्राप्त हुई है। आचार्यश्री ने कहा कि धन्य हैं नवसंन्यासियों की माताएँ जिनकी कोख से इन दिव्य आत्माओं ने जन्म लिया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर गीता मनीषी श्री ज्ञानानंद जी महाराज ने कहा कि ऋषिग्राम के दिव्य वातावरण में ऋषियों के तप से ऐसे संन्यासी तैयार हुए हैं जो भारत को आध्यात्मिक शक्ति बनाने में सहायक होंगे। उन्होंने कहा कि भारतीय ऋषि परम्परा की स्वीकार्यता पूरे विश्व में बन रही है। युनेस्को ने कुम्भ महापर्व को पूरे विश्व का पर्व मानते हुए विश्वधरोहर स्वीकार किया है। यह जीवन दुर्लभ है किन्तु क्षणभंगुर भी है। यदि हम प्रमाद में रहेंगे तो यह यूँ ही व्यतीत हो जायेगा किन्तु यदि समाज के लिए कुछ करेंगे तो जीवन धन्य हो जायेगा।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/30.jpg" alt="30"></img></span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/28.jpg" alt="28"></img></span></p>
<p style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि सत्ता से आशीर्वाद के पूर्व यज्ञ करते नवसंन्यासी तथा देश के शीर्ष सन्तों का ऋषिग्राम में स्वागत करते पूज्य स्वामी जी महाराज</span></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/29.jpg" alt="29"></img></span></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/321.jpg" alt="32"></img></span></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज को तिलक लगाकर संन्यास दिवस की शुभकामनाएं देते पूज्य गुरु शरणानन्द जी महाराज तथा संतगणों को शॉल ओढ़ाकर स्वागत करते श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज</span></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/311.jpg" alt="31"></img></span></strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषिग्राम में आयोजित आशीर्वाद समारोह में पूज्य महाराजश्री के साथ मंचासीन देश के शीर्ष सन्त </span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>सनातन वैभव</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2018</category>
                                            <category>मई</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 May 2018 21:53:51 +0530</pubDate>
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