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                <title>भगवान् गुरु के द्वारा प्रदत्त अमोघ आश्वासन - योग संदेश</title>
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                <description>भगवान् गुरु के द्वारा प्रदत्त अमोघ आश्वासन RSS Feed</description>
                
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                <title>भगवान् गुरु के द्वारा प्रदत्त अमोघ आश्वासन</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">श्रद्धेय गुरुदेव आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2076/bhagavaan-guru-ke-dvaara-pradatt-amogh-aashvaasan"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/291.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   भगवान् आगे आश्वासन देते हुए कहते हैं जो व्यक्ति साम्यबुद्धि से युक्त है वह अन्त:करण की शुद्धि व ज्ञानप्राप्ति के द्वारा इस लोक में पाप और पुण्य दोनों से ही अलिप्त रहता है। अत: तू समत्वबुद्धिरूप योग का आश्रय ले क्योंकि समत्वबुद्धियोग ही कर्म के विषय में सबसे बड़ी कुशलता (चतुराई) है। इसी के प्रभाव से कर्म बन्धन-स्वभाव वाले होने पर भी व्यक्ति को बांध नहीं पाते। (गीता २.५०)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समत्व बुद्धि से युक्त जो मनीषीजन कर्मफल का त्याग करते हैं वे जन्मरूप बन्धन से मुक्त होकर दु:खविरहित (सर्वोपद्रवरहित = रोग-शोक से रहित) पद को प्राप्त कर लेते हैं। जब तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदल को पार कर जाएगी तब तू शास्त्र के उन सब वचनों के प्रति जो तूने सुने हैं या सुनने शेष हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदासीनता (निर्वेदम्) को प्राप्त हो जाएगा क्योंकि तब तुझे और अधिक सुनने की इच्छा नहीं होगी। (गीता २.५१</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">५२)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नाना प्रकार की परस्पर विरोधी बातें सुनने से अथवा नाना प्रकार के कर्मकाण्डों के ज्ञापक वेदवाक्यों से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब समाधिवृत्ति में द्वन्द्वरहित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिर व निश्चल होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तू साम्यबुद्धि को प्राप्त करेगा। (गीता २.५३)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् कहते हैं- जो व्यक्ति अपने संकल्प बल का प्रयोग करके विषयों से अपने आपको अलग कर लेता है उस व्यक्ति के विषय तो छूट जाते हैं किन्तु विषयों का रस नहीं छूटता। यदि किसी को अपने परम आत्म स्वरूप का दर्शन हो जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुभव हो जाए तो वह विषयों का रस भी छूट जाता है। (गीता २.५९)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अपने अधीन किए हुए अन्त:करण वाला साधक अपने वश में की हुई राग-द्वेष से रहित इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरता हुआ अन्त:करण की निर्मलता को प्राप्त होता है। (गीता २.६४)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्त:करण के निर्मल होने पर साधक के सभी दु:खों का अभाव हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन प्रसन्न रहने लगता है। प्रसन्न चित्त व्यक्ति की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर परम आत्मा में भलीभाँति स्थिर हो जाती है। (गीता २.६५)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो व्यक्ति सब कामनाओं को त्याग कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ममतारहित अहंकार रहित और स्पृहारहित हुआ विचरता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार करता है निश्चित ही उसे शान्ति प्राप्त हो जाती है। (गीता २.७१)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हे पार्थ! यही ब्राह्मी स्थिति (ब्रह्म में अवस्थान) है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस स्थिति को प्राप्त करके व्यक्ति किसी प्रकार के मोह से प्रभावित नहीं होता अर्थात् मोह में नहीं फँसता और अन्तकाल (देह त्याग के समय) में भी इसी स्थिति में रहकर ब्रह्मनिर्वाण अर्थात् मुक्ति को पाता है। (गीता २.७२)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तुम इस यज्ञ से देवताओं को तृप्त करो और देवता तुम्हें तृप्त करते रहें। इस प्रकार एक दूसरे को पुष्ट-सन्तुष्ट करते हुए परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे। (गीता ३.११)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हे अर्जुन! मुझ अन्तर्यामी परम आत्मा में लगे हुए चित्त द्वारा सब कर्मों को मेरे प्रति समर्पित करके किसी भी लौकिक इच्छा से रहित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ममतारहित और दु:ख सन्ताप रहित एवं निश्चित होकर युद्ध कर। जो श्रद्धावान् पुरुष मेरे द्वारा बताई गई बातों में दोषों को नहीं ढूंढते और मेरे द्वारा स्वीकृत मत का अनुष्ठान करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे भी कर्मों के द्वारा छोड़ दिए जाते हैं अर्थात़् कर्म उन्हें बाँधते नहीं हैं। (गीता ३.३०</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">३१)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हे अर्जुन! जो व्यक्ति इस प्रकार मुझ योगेश्वर के दिव्य जन्म और दिव्य कर्मों के महत्त्व एवं रहस्य को जानता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह मृत्यु के पश्चात् पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि मुझ को ही प्राप्त हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् जैसे मैंने स्वेच्छा से इस मानव शरीर में अपनी प्रकृति को अपने वश में कर ऊपर से नीचे अवरोहण किया यह मेरा दिव्य जन्म कहलाया और उसी अपनी दैवी चेतना में रहते हुए जो मेरे द्वारा कर्म किए जा रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे मेरे दिव्य कर्म कहे जाते हैं। उसी प्रकार इस रहस्य को जानने वाले किसी भी साधक का साधना के द्वारा अपनी निम्र प्रकृति से दिव्य प्रकृति में अपराप्रकृति से चिन्मय स्वरूप पराप्रकृति में आरोहण दिव्य जन्म होगा और अपनी उस दिव्य प्रकृति में रहते हुए जो वह कर्म करेगा वह उसका दिव्य कर्म होगा। इस रहस्य को जानकर जो जीने लगता है वह मुक्त हो जाता है। पुन: उसे शरीर धारण नहीं करना पड़ता। (गीता ४.९)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिनके राग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोध चले गये हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे व्यक्ति केवल मुझसे ओत-प्रोत और मेरे ही आश्रित रहने वाले बहुत से पुरुष तत्त्वज्ञान रूप तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो गये है। (गीता ४.१०)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हे अर्जुन! जो जिस फल की अपेक्षा से मेरा आश्रय लेते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं उनको उनकी फलाकाङ्क्षा के अनुसार स्वीकार करते हुए भजता हँू उन्हें फल प्रदान करता हूँ। जो मोक्ष चाहते हैं उन्हें मोक्ष देता हँू और जो लौकिक फल चाहते हैं उन्हें लौकिक फल। (गीता ४.११)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म मुझको लीपते नहीं हैं अर्थात्- वे मुझे शुभाशुभ फल संसर्गरूप मल से दूषित नहीं करते। भाव यह है कि कोई भी कर्म मुझे बाँधते नहीं क्योंकि मेरी किसी कर्मफल के विषय में कोई इच्छा नहीं है। किसी भी प्रकार की कामना के बीच में आने से कर्म बन्धक बनते हैं। जो मुझे इस रूप में जानता है और मेरी तरह ही आचरण करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके कर्म भी बन्धन कारक नहीं होते। (गीता ४.१४)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म व अकर्म में बड़े-बड़े लोग मोहित हो जाते हैं। भगवान् कहते है कि मैं तुम्हें कर्म का वह तत्त्व बताऊँगा कि जिसको जानकर तुम अशुभ से मुक्त हो जाओगे। जो कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही सब मनुष्यों में ज्ञानी और वही योगयुक्त है। वही वस्तुत: सम्पूर्ण रूप से कर्मों को करने वाला है। अर्थात् कर्म करते हुए भी हम अकर्म की स्थिति में रह सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि कत्र्तापन का अभिमान व फल की आशा बीच में न आयें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि मन-बुद्धि-शरीर-इन्द्रियों के साक्षी बन कर कर्म कर सकें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने अन्दर पूरे शान्त स्थिर रहते हुए कर्म कर सकें। दूसरी ओर यदि शरीर-मन-बुद्धि-इन्द्रियों के साथ आत्मा का तादात्म्य बना हुआ है तो प्रकटत: कुछ भी न करते हुए भी कर्म होते ही रहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जैसे </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">करने</span>Ó <span lang="hi" xml:lang="hi">में कर्तृत्व का योग रहता है वैसे ही </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">न करने</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में भी कर्तृत्व बना रह सकता है। इस विषय में अष्टावक्र गीता में बहुत ही सुन्दर कहा है-</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(230,126,35);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">निवृत्तिरपि मूढस्य प्रवृत्तिरुपजायते। प्रवृत्तिरपि धीरस्य निवृत्तिफलभागिनी।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् मूर्खों की निवृत्ति (हठ या मोक्ष से कर्मविमुखता = अकर्म) भी वास्तव में कर्म में प्रवृत्ति है तथा पण्डित विद्वान् लोगों की प्रवृत्ति (कर्म) भी निवृत्ति (अकर्म) रूप में परिणत हो जाती है। (गीता ४</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">१६</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">१७</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">१८)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञानी पुरूष उसी को विद्वान् या पण्डित कहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके सभी समारम्भ (कर्म) कामना व सङ्कल्प से रहित होते हैं और जिसके कर्म ज्ञानाग्रि में भस्म होकर अकर्म बन जाते हैं अर्थात् फल देने की क्षमता खो देते हैं। (गीता ४.१९)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म एवं उसके फल की आसक्ति छोड़कर जो नित्यतृप्त है अर्थात् सदा अपने में विद्यमान आत्मानन्द से पूर्णतया तृप्त है अतएव निराश्रय रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी अन्य बाह्य आश्रय की अपेक्षा नहीं रखता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह व्यक्ति कर्मों में अच्छी प्रकार संलग्न होते हुए भी कुछ नहीं करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह सदा अकत्र्ता ही बना रहता है। (गीता ४.२०)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो फल की इच्छा से रहित है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संयतचित्त व संयत शरीर वाला है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब प्रकार के परिग्रह अर्थात् भोग सामग्री व तद्विषयक आसक्ति एवं अभिमान को त्यागकर केवल शारीर कर्म अर्थात् जीवन निर्वाह मात्र के लिए आवश्यक कर्म करता हुआ भी कर्मकृत बन्धन रूप पाप (कर्मजन्य दु:ख) को प्राप्त नहीं होता। (गीता ४.२१)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदृच्छा (सहजता) से जो प्राप्त हो जाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें ही सन्तुष्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर्ष-शोक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लाभ-हानि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जय-पराजय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निन्दा-प्रशंसा आदि द्वन्द्वों से मुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म की सिद्धि-असिद्धि को समान मानने वाला ईष्र्यारहित पुरुष कर्म करके भी उनके सुख-दु:ख रूप फलों से लिप्त नहीं होता। (गीता ४.२२)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आगे भगवान् एक बहुत बड़ा आश्वासन देते हुए कहते है कि आसक्ति से रहित ज्ञान में जिसका चित्त (बुद्धि) स्थित हो गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा मुक्त पुरुष यज्ञ (लोक संग्रह) के लिए ही अपने कर्तव्य को करता है। उसके सभी कर्म विलीन हो जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अकर्म बन जाते हैं। (गीता ४.२३)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्म ही जिसका सर्वस्व है- अर्पण करने का साधन स्रुवा आदि भी ब्रह्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हवि भी ब्रह्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यज्ञमान भी ब्रह्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्नि भी ब्रह्म और आहुति देना रूप क्रिया भी ब्रह्म है। इस प्रकार ब्रह्माग्नि में मानो ब्रह्म ने ही हवन किया। उस ब्रह्म कर्म में स्थित रहने वाले योगी द्वारा प्राप्त किया जाने वाला (फल) भी ब्रह्म ही है। जिसने अपने अहं को ब्रह्म में लीन कर दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समझना चाहिए वह ब्रह्म ही हो गया। (गीता ४.२४)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">द्रव्यमय यज्ञों से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि हे पार्थ! समस्त कर्म अन्तत: ज्ञान में परिसमाप्त होते है अर्थात् ज्ञानोत्पत्ति के साधन बनते हैं। वह ज्ञान  तत्वदर्शी ज्ञानी पुरुषों से सीखना चाहिए। जिस ज्ञान को पाकर हे अर्जुन! तू इस प्रकार के मोहपाश में फिर नहीं फंसेगा। जिस ज्ञान की युक्ति से तू समस्त प्राणियों को अपने में और फिर मुझ में देखेगा। (गीता ४.३३</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">३४</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">३५)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि तू सब प्राणियों में सबसे बड़ा पापी भी क्यों न हो तो भी उस ज्ञान रूपी नौका से तू सब पापों से तर जायेगा अर्थात् पाप करने में अब तेरी कोई रुचि नहीं रहेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तू साधु स्वभाव वाला हो जायेगा। जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि सब प्रकार के ईंधन को भस्म कर डालती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी प्रकार हे अर्जुन! ज्ञान रूपी अग्नि सभी प्रकार के कर्मो (उनके शुभाशुभ संस्कारों व उनके परिणाम) को जला डालती है। इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाली कोई दूसरी चीज नहीं है। उस ज्ञान को निरन्तर साधना करते हुए योग में सिद्धि को प्राप्त हुआ व्यक्ति कालान्तर में अपने अन्दर ही प्राप्त कर लेता है। (गीता ४.३६</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">३७</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">३८)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो श्रद्धावान् पुरुष इन्द्रिय संयम द्वारा उस ज्ञान के पीछे लगा रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे ज्ञान मिल जाता है। ज्ञान मिलने पर उसे तत्काल शान्ति मिलती है। हे धनञ्जय ! उस आत्मज्ञानी पुरुष को कर्म नहीं बाँधते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने योग के द्वारा अपने समस्त कर्मों का त्याग कर दिया है। अर्थात् जिसने समस्त कर्म एवं कर्मफल ईश्वर को अर्पित कर दिये हैं अथवा त्याग के द्वारा जिसने अपने आपको सब चीजों से असङ्ग कर लिया हैं और ज्ञान से अपने सभी संशयों को नष्ट कर दिया है। (गीता ४.३९</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">४१)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् ने एक के बाद एक आश्वासनों की झड़ी लगा रखी है। भगवान् कहते हैं- जो व्यक्ति किसी से द्वेष नहीं करता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न किसी प्रकार की इच्छा रखता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस व्यक्ति को कर्म करते रहने पर भी नित्य संन्यासी समझना चाहिए। हे महाबाहो! जो सुख-दु:ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लाभ-हानि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जय-पराजय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राग-द्वेष अदि द्वन्द्वों से रहित हो गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह अनायास ही कर्म बंधन से मुक्त हो जाता है। (गीता ५.३)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हे महाबाहो! नासमझ लोग संाख्ययोग और कर्मयोग को भिन्न-भिन्न बताते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर विद्वान् लोग ऐसे नहीं करते। किसी भी एक मार्ग पर सम्यक्तया आरूढ़ व्यक्ति दोनों के फल को प्राप्त कर लेता है। कर्मों का संन्यास करने वाले जहाँ पहुँचते हैं कर्मयोगी भी वहाँ पहुँचते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु बिना कर्मयोग के संन्यास (कर्म से उपरामता) को प्राप्त कर पाना बहुत ही कठिन काम है। हाँ जो मुनि कर्मयोग से युक्त हो गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह तो शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। (गीता ५.४</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">६)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो कर्मयोग से युक्त है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका अन्त:करण शुद्ध है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो जितेन्द्रिय है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब भूतों का आत्मा ही जिसका आत्मा बन गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा कर्मयोग युक्त साधक कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता। (गीता ५.७)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो व्यक्ति फलासक्ति छोड़कर कर्मों को ब्रह्मार्पण करते हुए उनका अनुष्ठान करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आसक्ति विरहित होकर करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह पापों से उसी प्रकार लिप्त नहीं होता जैसे पानी में उत्पन्न होने वाले कमल को पानी नहीं लगता। पानी में रहते हुए भी कमल के पत्ते पानी से अलिप्त रहते हैं। (गीता ५.१०)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो व्यक्ति योगयुक्त हो गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह कर्मफल त्यागकर स्थाई एवं पूर्ण शान्ति को प्राप्त करता है। सभी कर्मों की फलासक्ति को मन से त्यागकर जितेन्द्रिय पुरुष नव द्वारों वाले इस शरीर रूपी नगर में (सब कुछ करते हुए भी) कुछ भी न करते-कराते हुए आनन्द से रहता है। (गीता ५.१३)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2018</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2076/bhagavaan-guru-ke-dvaara-pradatt-amogh-aashvaasan</link>
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                <pubDate>Sun, 01 Jul 2018 21:43:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
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                <title>भगवान् गुरु के द्वारा प्रदत्त अमोघ आश्वासन</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:150%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">श्रद्धेय गुरुदेव आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2047/bhagvan-guru-ke-dwara-pradatt-amogh-ashwasan"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/301.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    यह</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वविदित है कि प्राचीन भारतीय वाङ्मय में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीमद्भगवद्गीता</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का अपना एक अन्यतम स्थान है। इस ग्रन्थ की पृष्ठभूमि है- मनुष्यों में अग्रगण्य  एक अर्जुन जैसे अप्रतिम वीर योद्धा की आध्यात्मिक समस्या। बाहरी तौर पर कोई ऊपर-ऊपर से देखे तो उसे ऐसा लगेगा कि अर्जुन की मात्र एक व्यावहारिक नैतिक समस्या है कि वह अपने चाचा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताऊ व गुरुजनों के साथ कैसे युद्ध करे। पूज्यजनों का तो वाणी से भी तिरस्कार अशोभनीय माना जाता है और उसे युद्ध करना पड़ रहा है। किन्तु समस्या के मूल में जाकर देखा जाए तो उसकी जड़ें संसार की कारणभूत अविद्या और उससे उत्पन्न मोह व शोक में पायेंगे। गीता शास्त्र के अध्येता को सदा यह बोध बना रहना चाहिए कि यह शास्त्र श्रीकृष्णार्जुन संवाद है और यह शास्त्र मात्र अर्जुन की विशिष्ट समस्या का समाधान करने के लिए नहीं बोला गया है बल्कि अर्जुन जैसी ही चेतना के स्तर पर जीने वाले उन सभी साधक-साधिकाओं के लिए है जो अपने को अविद्या और तज्जन्य शोक-मोह से घिरा हुआ अनुभव कर रहे हैं तथा अर्जुन की तरह ही अपने से किसी बड़ी शक्ति के समक्ष शरणागत होकर समाधान पाने के इच्छुक हैं। जैसा कि गीता के २.७ श्लोक में अर्जुन की मन:स्थिति का यथार्थ स्वरूप ज्ञात हो रहा है-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span lang="hi" xml:lang="hi">कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव: पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेता:।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span lang="hi" xml:lang="hi">यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कार्पण्य (दैन्य) रूप दोष से उपहत (नष्ट) स्वभाव वाला अर्थात् दैन्य दोष से जिसका क्षात्र स्वभाव दब चुका है ऐसा मैं तथा धर्म के विषय में सम्मूढ चित्त वाला अर्थात् कर्तव्य-अकर्तव्य विषय में भ्रान्त हुआ मैं तुमसे पूछता हूँ। हे कृष्ण! मैं तुम्हारा शिष्य हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुझे शरणागत समझकर इस परिस्थिति में जो मेरे लिए हितकर हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्तव्य हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह मुझे बतलाओ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">गीता २.४ इत्यादि श्लोकों द्वारा अर्जुन ने पितामह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुपुत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मित्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुहृद्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्बन्धी और बान्धवों के विषय में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहमेषां ममैते</span>’ '<span lang="hi" xml:lang="hi">यह मेरे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं इनका हूँ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार अज्ञान जनित स्नेह और उसके विच्छेद आदि कारणों से होने वाले अपने शोक और मोह दिखाए हैं। अर्थात् उनमें ममता के कारण जो स्नेह है वह </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मोह</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">और इनके साथ स्नेह विच्छेद हो जाने पर अथवा इनके मारे जाने पर जो पातक लगेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे देखकर हृदय में जो भाव उत्पन्न हो रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">शोक</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">नाम से जाना जाता है। तात्पर्य यह है शोक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभिमान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ममत्व आदि दोष से घिरे हुए चित्त वाले सभी प्राणियों के द्वारा स्वभावत: स्वधर्म का परित्याग और निषिद्ध का सेवन होने लगता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वधर्म में प्रवृत्त व्यक्तियों के भी शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन व वाणी की प्रवृत्ति यदि फलाशापूर्वक और अभिमानपूर्वक हो रही हो तो उससे धर्माधर्म की वृद्धि होगी जिससे इष्ट-अनिष्ट जन्म प्राप्त होगा। फिर तो सुख-दु:ख का प्राप्तिरूप संसार चलता रहेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिटेगा नहीं। जो भी अच्छा लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ भी लगाव है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुर समझकर हम जिसकी ओर आकृष्ट होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने हमको बाँध रखा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो हमारे मुक्त-विहार में बाधक बना हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस सबके मूल में मोह होता है और जो कुछ भी वियोग या विछोह के रूप में अथवा किसी पाप या पश्चाताप के रूप में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कड़वाहट की स्मृति के रूप में उपस्थित होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो हमारे हृदय को छीलता रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ शोक उस सब का उपलक्षण है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गीता शास्त्र एक अर्थ में द्वापर युग के श्रेष्ठतम पुरुष नर चोले में नारायण की जीवनी है। इस जीवनी को काव्यमय रूप में प्रस्तुत करने वाले हैं-उन्हीं के युग के श्रेष्ठतम मुनि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान के सागर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पञ्चम वेद भारत संहिता के रचयिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सदा सत्य में स्थित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साक्षात् कृतधर्मा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विदितवेदितव्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधिगतयाथातथ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परापरज्ञ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मसूत्रों के रूप में मानवजाति के लिए अमूल्य धरोहर के प्रदाता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृष्णद्वैपायन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बादरायण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेदव्यास आदि अनेक नामों से विदित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी अखण्ड समाधि में लीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्मनिष्ठ तेजस्वी महापुरुष। किसी भी जीवनी के दो प्रमुख हिस्से होते हैं- एक उसका व्यक्तित्व तथा दूसरा कृतित्व अर्थात् जीवन व कार्य। दूसरे शब्दों में कहें तो दृष्टि व स्थिति। जीवनी लेखक को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी वह जीवनी लिखता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी दृष्टि समझनी होती है कि वह महान् पुरुष इस अस्तित्व को किस रूप में देखता था या देखता है और उनकी स्वयं की स्थिति कैसी थी</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">या कैसी है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् वेदव्यास जी ने भगवान् श्रीकृष्ण के जीवन को अपनी खुली आँखों से देखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय-समय पर आपस में मिलते भी थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चर्चा भी होती थी। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में जब यह समस्या उपस्थित हुई कि इस यज्ञ के श्रेष्ठतम पुरुष के रूप में किसे अघ्र्य दान दिया जाए जिसमें बड़े-बड़े ऋषि-मुनि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भीष्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्रोण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विदुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वासुदेव तथा स्वयं वेदव्यास इत्यादि सभी महापुरुष उपस्थित थे। ऐसे कठिन समय में स्वयं वेदव्यास जी सामने आये और उन्होंने कहा कि हम सबके लिए ही पूज्यतम व्यक्ति के रूप में श्रीगोविन्द उपस्थित हैं। भगवान् श्रीकृष्ण के जीवन को भगवान् वेदव्यास ने मानवीय दैनन्दिन व्यवहार में परम पुरुष का साक्षात् विग्रहस्वरूप ही देखा। इस प्रकार भगवान् वेदव्यास उनकी दृष्टि और स्थिति से भली प्रकार परिचित थे। उनके व्यक्तित्व व उनके कार्यों को तथा इस समस्त प्रपञ्च के बीच उनकी महिमामय उपस्थिति व स्थिति को देखते थे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे वैदिक ऋषि अपौरुषेय वेदज्ञान के केवल माध्यम बने हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके माध्यम से वेदज्ञान धरती पर अवतीर्ण हुआ। उन्होंने अपनी तरफ से उस विशुद्ध ज्ञान में कुछ भी मिलावट नहीं की। इसी प्रकार गीता ज्ञान के संदर्भ में भी यह देखना चाहिए कि अर्जुन की घटना तो केवल निमित्तमात्र है। वह यहाँ मनुष्यमात्र की सभी आध्यात्मिक समस्याओं का प्रतिनिधित्व कर रहा है और उधर भगवान् वेदव्यास भी निमित्त मात्र बने हुए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तुत: तो योगेश्वर भगवान् गुरु ही जीवन की सभी आन्तरिक या आध्यात्मिक समस्याओं का समाधान कर रहे हैं अर्थात् सम्पूर्ण गीताशास्त्र में जो समस्याएँ उठाई गई और उनका जो समाधान किया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें अर्थ (विषय-वस्तु) भगवान् गुरु का है और शब्द भगवान् वेदव्यास के। यहाँ यह बात भी कभी भूलनी नहीं चाहिए कि यद्यपि समस्या कालविशेष या देशविशेष में प्रकट हुई दिखती है और उसका समाधान भी काल विशेष या देश विशेष से जुड़ा है किन्तु ध्यान से देखने पर विदित हो जाता है कि देश व काल का अंश तो यहाँ बहुत ही स्वल्प है। समस्या जीवन्त बन जाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आकारहीन अवस्था में न रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देखने वाले को साक्षात् साकार रूप में दिखाई दे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए घटना विशेष को पकड़ लिया गया है। भगवान् की वाणी में प्रदत्त समाधान तो कभी पुराना हो ही नहीं सकता। जब तक सूर्य और पृथ्वी रहेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य रहेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गीता से उनकी समस्याओं का समाधान मिलता रहेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संसार में तीन तरह के लोग दिखाई देते हैं- एक वे हैं जिन्होंने अपनी समस्याओं का समाधान खोज लिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समस्याओं से पार चले गये हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनके जीवन में कोई भी समस्या शेष नहीं बची। सचमुच ऐसे लोग बहुत थोड़े ही होंगे। उनके लिए गीताशास्त्र नहीं है। दूसरे वे लोग हैं जो अर्जुन जैसी स्थिति में हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अपने आपको समस्याग्रस्त अनुभव कर रहे हैं। जो किंकर्तव्य विमूढ़ हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनके चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा है किन्तु प्रकाश पाने की तीव्र जिज्ञासा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे लोगों के लिए ही गीताशास्त्र है। तीसरे प्रकार के लोगों के लिए भी गीताशास्त्र नहीं है जो अंधकार में होते हुए भी अंधकार का अनुभव नहीं कर पा रहे। पूर्ण रूप से समस्याओं में डूबे हुए हैं किन्तु उन्हें कोई समस्या नहीं दिख रही। बीच-बीच में जीवन के जो सुख मिलते रहते हैं वे उनके लिए इतने आकर्षक होते हैं कि उन्हें इससे ज्यादा और कुछ नहीं चाहिए। कभी-कभी उनके ऊपर दु:खों का पहाड़ जैसा टूट पड़ता है तो भी दु:खों का प्रभाव उनके ऊपर नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बस दु:खी होते रहते हैं। सुख की तरफ ताकते रहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतीक्षारत रहते हैं कि कभी तो हमारे भी अच्छे दिन आयेंगे। दु:ख से पार जाने का विचार उनके मन में नहीं आता। ऐसी स्थिति वाले लोगों को कहते हैं सांसारिक। अर्थात् सुख-दु:ख के भोग में जो रचे-पचे हैं। इन भोगियों के लिए गीताशास्त्र का उपदेश नहीं है। गीता से समाधान पाने के लिए किसी भी व्यक्ति को योग का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भक्ति का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाधान का या तत्त्वज्ञान का जिज्ञासु होना चाहिए। जितनी जिज्ञासा तीव्र होती है उतना ही यहाँ उसका प्रवेश सहज है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिज्ञासा का जागरण उन्हीं लोगों में होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्हें भोगों के बड़े से बड़े सुख भी सारहीन नजर आने लगे हैं। जिनको यह निश्चय हो गया कि केवल भोगों का आरम्भ ही सुखदायक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्त तो सदा ही विचारशील के हृदय को जलाता रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विषयों से मिलने वाली तृप्ति बार-बार अतृप्ति में ले जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति को पराधीन बना देती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विषयों को पाने से पहले जो अभाव की स्थिति होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विषय-तृप्ति के उत्तरकाल में भी वही अभाव आकर खड़ा हो जाता है। संसार के सभी बड़े से बड़े सुखों के प्रति जब साधक की यह दृष्टि विकसित हो जाती है तब उसके भीतर जिज्ञासा पैदा होती है कि क्या जीवन का यही रूप है। कभी सुख-कभी दु:ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी हँसना-कभी रोना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी हर्ष-कभी शोक या इससे अलग भी कोई रू पहो सकता है। तब वह भगवान्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत्यन्त दु:खनिवृत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमृतत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परमशान्ति इत्यादि को पाने के लिए किसी ऐसे आत्मतृप्त गुरु की शरण ग्रहण करता है। गीता के उपदेष्टा जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण ऐसे ही शरण्य हैं जो दु:खहारी बनकर शिष्य के दु:खों को हर लेते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो शिष्य के लिए ज्ञानी गुरु बनकर शिष्य के अज्ञान को मिटाकर ज्ञान से परिपूर्ण कर देते हैं। जो शिष्य को बन्धन मुक्त कर स्वाधीन बना देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो शिष्य के अशान्त मन को शान्त कर देते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब हम सबसे पहले अपने पाठकों से यह निवेदन करना चाहेंगे कि वे इस बात पर विचार करें कि लोक व्यवहार में माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी जैसा व्यक्ति जब किसी राजनेता को अलग से बुलाकर आश्वासन दे देता है कि आप अपना जोर-शोर से काम कीजिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपके लिए अमुक पद सुरक्षित है। इतना सुनते ही वह व्यक्ति उसके पास जो कुछ होता है-तन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय इत्यादि सब को बिना बचाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना आगे-पीछे देखे सारा का सारा झौंक देता है। हम दूर क्यों जाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयं श्री स्वामी रामदेव जी महाराज किसी व्यक्ति को कोई बड़ा आश्वासन दे दें कि आप अमुक विषय में कुछ करके दिखाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम आपको योगपीठ में सम्यक् महत्त्व व पद प्रदान करेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह व्यक्ति अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ेगा। किसी जिज्ञासु को या किसी विद्यार्थी को कोई गुरु-आचार्य आश्वासन दे देता है कि तुम निश्चिन्त रहो-मैं तुम्हारे साथ हूँ तो वह अपने श्रद्धेय की वाणी सुनकर एकदम विश्वस्त हो जाता है। इन सभी उपर्युक्त उदाहरणों में या इसी प्रकार के और भी सभी लौकिक प्रसङ्गों में हम सबका अनुभव है कि आश्वासन देने वाला व्यक्ति यदि शक्तिशाली है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामथ्र्यवान् है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जिसको आश्वासन मिलता है वह व्यक्ति कभी भी उसकी वाणी में संशय या संदेह नहीं करता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अविकल रूप से उसे वैसा ही स्वीकार करता है। शास्त्र के संदर्भ में भी जिज्ञासु की अधिक नहीं तो  कम से कम इतनी निष्ठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वास तो होना ही चाहिए। जितना कि लौकिक जनों को अपने-अपने आश्वासन प्रदाता में होता है। जिज्ञासु के संज्ञान में यह बात बनी रहनी चाहिए कि वेदों में जो कहा गया है ऋषि-मुनियों या आप्त पुरुषों के द्वारा जो कहा गया हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गीता-उपनिषद् में जो कहा गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह पूर्ण अनुभूत सत्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कल्पना में जाकर कुछ भी नहीं कहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं भी उसका अनुभव करके देख सकता हू।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गीता को गीता इसलिए कहते हैं कि वह श्रीभगवान् के द्वारा गायी गई है। जैसे उपनिषद् का प्रत्येक वाक्य वेदान्त कहा जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी प्रकार गीता शास्त्र का प्रत्येक वाक्य श्रीभगवान् गुरु के द्वारा गाया गया है। इसीलिए प्रत्येक अध्याय के अन्त में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ॐ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">तत् सदिति श्रीमद़्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इत्यादि वचन पुष्पिका के रूप में सुनने को मिलता है। यह ब्रह्मविद्या है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह योगशास्त्र है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह उपनिषदों का सार है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यातव्य है इस पुष्पिका में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीमद्भगवद्गीतासु’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इस शब्द को बहुवचन में पढ़ा गया है अर्थात् भगवान् के श्रीमुख से निकले हुए ये वचन हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इनमें संशय या संदेह करने के लिए कहाँ गुंजाइश है। भगवान् कहते ही उसको हैं जो सर्वसमर्थ हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें समग्र ऐश्वर्य हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यश और श्री का साक्षात् विग्रह हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें निरतिशय ज्ञान और वैराग्य हो। जो सबका हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सबमें हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सर्वदा हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सर्वत्र हो। ऐसे भगवान् की तथ्यपूर्ण वाणी है गीता। भगवान् नारायण के ही एक रूप हैं-</span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योगेश्वर श्रीकृष्ण</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गीता के भगवान् गुरु ने शरणागत शिष्य को आदेशात्मक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तत्त्वकथनपरक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चेतावनीपरक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सलाह इत्यादि कई रूपों में अपनी वाणी सुनाई। साथ में बड़े ही शक्तिशाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमोघ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी व्यर्थ न जानने वाले आश्वासन भी दिए हैं। हम अपने पाठकों के साथ मिलकर उदाहरणस्वरूप कुछ ऐसे आश्वासनों का अध्ययन करना चाहेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे इस मार्ग पर चलने वाले साधकों का उत्साह बढ़े।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सबसे पहले भगवान् गुरु ने गीता के दूसरे अध्याय के आरम्भ में ही शिष्य को यह समझाया कि तुम अविनाशी हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अजर-अमर हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर मरता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जन्मता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मा का न तो जन्म होता है न मरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मा को अव्यक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अचिन्त्य और अविकार्य जानकर शोक से पार चले जाओ। अवस्थाएँ देह की होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुम देह की उन सब अवस्थाओं से अतीत हो जो जागरित-स्वप्र-सुषुप्ति के रूप में जानी जाती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रियों और विषयों के संयोग से शीत-उष्ण व सुख-दु:ख आदि मिलता रहता है। वे सब आगमापायी अनित्य हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनको सहन करो अर्थात् उन्हें अपने अधीन रखो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनको अभिभूत करके रखो। भगवान् ने आगे कहा-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span lang="hi" xml:lang="hi">यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ। समदु:खसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते।।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हे नरश्रेष्ठ! सुख-दु:ख को समान मानने वाले जिस धीर (ज्ञानी) पुरुष को ये इन्द्रिय अनुभूतियाँ व्यथित नहीं करती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही अमृतत्व अर्थात् ब्रह्म को पाने में सक्षम होता है। यहाँ भगवान् आश्वासन देते हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुख-दु:ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लाभ-हानि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जय-पराजय को एक जैसा समझकर फिर अपने सहज प्राप्त कत्र्तव्य को पूरा करो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा करने से तुम्हें पाप नहीं लगेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् का कहना है- कर्मबन्धन से मुक्त होने के दो मार्ग हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक का नाम है-ज्ञानमार्ग या सांख्यमार्ग और दूसरा है कर्मयोग।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मा को नित्य स्वीकार करते हुए यदि अपने बुद्धि व मन को आत्मा के साथ मिलाते नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका परस्पर तादात्म्य नहीं करते तो आत्मा असङ्ग निर्लेप बना रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म उसे बाँधता नहीं। कर्मयोग से भी यह स्थिति आ सकती है। कब</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">जब कत्र्तव्यबुद्धि से युक्त होकर कर्म किए जाते हैं तो इस प्रक्रिया से भी साधक का चित्त शुद्ध हो जाता है और वह आत्मस्थ हो जाता है। निष्काम होकर सतत कर्म में लगे रहने से पाप-प्रायश्चित्त के लिए भी कोई अवकाश नहीं रहता क्योंकि पाप का मूल तो कामना है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">è</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> शेष आगामी अंक में</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2018</category>
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                <pubDate>Fri, 01 Jun 2018 21:48:34 +0530</pubDate>
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