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                <title>सर्वोपरि है राष्ट्र और राष्ट्रीय महाभाव - योग संदेश</title>
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                <description>सर्वोपरि है राष्ट्र और राष्ट्रीय महाभाव RSS Feed</description>
                
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                <title>सर्वोपरि है राष्ट्र और राष्ट्रीय महाभाव</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:150%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">प्रो . कुसुमलता केडिया</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2050/sarvopari-hai-rashtra-aur-rashtriya-mahabhav"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/63.jpg" alt=""></a><br /><table style="border-collapse:collapse;width:100.026%;border-width:1px;background-color:#236FA1;border-color:#236FA1;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8555%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(35,111,161);">
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> <span style="color:rgb(255,255,255);"><strong>इन</strong></span></span><span style="color:rgb(255,255,255);"><strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">दिनों राष्ट्रीय वातावरण में भारत के विविध राजनीतिक समूह एक दूसरे के प्रति गहरे विरोध और आक्रोश का परिवेश रचते हैं। यह तो एक अच्छी बात है कि प्रत्येक समूह बात केवल राष्ट्र हित की करता है परंतु इसमें गड़बड़  केवल यही है कि  दूसरे समूह के प्रति मानो  सम्मान का कोई भाव है ही नहीं।</span></strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    वा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">तावरण कुछ ऐसा हो गया है कि अपने पंथ या  दल या  समूह के लक्ष्यों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीतियों और कार्यों को ही राष्ट्र हित के लिए एकमात्र करणीय कार्य प्रचारित करना और अपने ही जैसे दूसरे समूह के लक्ष्यों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीतियों और कार्यों के प्रति घृणा और विरोध का भाव जगाना मानो कोई बहुत बड़ा राष्ट्रीय पुरुषार्थ प्रचारित किया जाता है। परंतु ऐसा करते हुए यह स्पष्ट बात भूल जाती है कि प्रत्येक समूह दूसरे समूह की ऐसी घोर निन्दा कर रहा है और उसे मानो दुर्गुणों और दोषों का पर्याय प्रचारित कर रहा है तो वह दूसरा समूह भी है तो भारतीय और भारत का समर्थ संपन्न वर्ग ही।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार मानो  परस्पर कलह रत और दोषारोपण कर रहे समूह कुल मिलाकर संपूर्ण भारत के प्रत्येक सबल और समर्थ समूह को केवल दोषी और निन्दनीय ही प्रचारित करते सारे देश में घूमते या दौड़ते देखे जाते हैं। यह बहुत ही चिंताजनक स्थिति है और इससे सम्पूर्ण देश की छवि ही मलिन होती है। प्रश्न यह उठता है कि ऐसे में देश के प्रबुद्धजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सचमुच देश भक्त हैं और शांत  चित्त से केवल देश का हित और कल्याण चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे क्या करें</span>?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे समय हमें अपने देश की महान् परम्परा को और अपने शास्त्रों को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म शास्त्रों तथा वेदों और उपनिषदों की महान् परम्पराओं को ध्यान में रखना चाहिए। समस्त भारतीय समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषकर सनातन धर्म के सभी अनुयाई वस्तुत: एक इकाई हैं और उनके बीच हमें केवल सार्वभौम मूल्यों  तथा निकर्षों या कसौटियों के आधार पर ही  गुणदोष निर्धारण करना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज की स्थिति में प्रत्येक राष्ट्रभक्त का यह कर्तव्य है कि वह इस महान देश के महान् गौरव और महान् परम्पराओं का निरन्तर ध्यान रखते हुए किसी व्यक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पार्टी या संगठन के प्रति किसी भी प्रकार का विशेष  मोह या विशेष विद्वेष का  भाव पाले बिना शांत और निष्पक्ष भाव से  सार्वभौम कसौटी पर कस कर ही प्रत्येक का मूल्यांकन करना चाहिए कि उनके कार्य भारत की सनातन धर्म परम्परा और ज्ञान परम्परा के अनुरूप हैं या उनसे  विरुद्ध हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज में समरसता और न्याय तथा सद्भाव को बढ़ाने वाले हैं या इनको बाधित करने वाले हैं तथा राष्ट्रीय समृद्धि और राष्ट्रीय उद्योग व्यापार तथा शिल्प और हुनर को आगे बढ़ाने वाले हैं या कुछ व्यापार रूपों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कतिपय शिल्प रूपों और कतिपय हुनर के पक्ष में तथा अन्य शिल्प और व्यापार रूपों के विरुद्ध हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो राष्ट्र के समस्त श्रेष्ठ व्यापार रूपों और शिल्प तथा सभी प्रकार के श्रेष्ठ हुनर के पक्ष में कार्य करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही प्रशंसनीय हैं और जो कुछ के पक्ष में तथा शेष के विरोध में कार्य करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे निंदनीय हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> इसी प्रकार समाज के किसी एक समूह के प्रति भेदभाव प्रदर्शित करना भी भारत की महान परम्परा के विरुद्ध है और प्रत्येक राष्ट्रभक्त का यह कर्तव्य है कि वह सम्पूर्ण समाज में गहरी आत्मीयता और सद्भाव तथा समरसता के अनुरूप कार्य करने वाले समूहों और नीतियों का ही समर्थन करें तथा भेदभाव और अन्याय के किसी भी रूप का समर्थन करने वालों के विरुद्ध हो। इसी प्रकार राष्ट्र में कंटक शोधन प्रत्येक अच्छे शासन का परम धर्म है और प्रत्येक देशभक्त समूह का कर्तव्य है कि वह राष्ट्र के कंटकों का विरोध करें और  उन्हें दण्डित करने वाली नीतियों तथा शासकीय कदमों का खुला समर्थन करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी का दूसरा पक्ष यह है कि सत्ता में बने रहने या सत्ता पाने के लोभ और आकर्षण से राष्ट्र के कंटकों का अथवा राष्ट्र को तोडऩे की कोशिश कर रहे समूहों और तत्वों का समर्थन कदापि न किया जाए। भले ही ऐसा करने के पक्ष में सम्बन्धित शासन या कोई दल किसी भी प्रकार की दलीलें और युक्तियां क्यों न दे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत जैसे विराट देश में किसी एक समूह के प्रति पक्षपात राष्ट्र को कभी भी समर्थ  नहीं बनाएगा। राष्ट्रहित में जो सर्वमान्य नीतियां हैं और परम्परा के जो सर्वमान्य मूल्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके पक्ष में रहना और कार्य करना ही सच्ची राष्ट्रभक्ति है। किसी पंथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समुदाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संगठन या पार्टी के प्रति प्रदर्शित मोह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमर्यादित अनुराग या विद्वेष  प्रदर्शित करना राष्ट्रभक्ति की कमी का और किन्हीं  व्यक्तियों या समूह के प्रति आसक्ति का सूचक है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सभी प्रबुद्ध व्यक्तियों को इस स्थिति से दूर रहना चाहिए क्योंकि इससे ही वह संतुलित और मूल्य आधारित परिवेश बनेगा जिससे कि कोई भी राष्ट्र  समृद्ध होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र की समृद्धि अत्यंत आवश्यक है और सभी के द्वारा उसके लिए पुरुषार्थ करना अपेक्षित है। इसी प्रकार अगर कोई नीति या कार्य राष्ट्र की समृद्धि में बाधक हो या अभाव और विषमताओं को जन्म दे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो व्यक्तियों या दलों या संगठनों के मोह से उनका समर्थन करना राष्ट्रभक्ति की कमी का लक्षण है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">चाहिए तो यह था कि एक ऐसा राष्ट्रीय परिवेश बनता जिसमें सनातन ज्ञान परम्परा और आदर्श परम्परा के अनुरूप एक सर्वमान्य वातावरण बनता और सर्वमान्य मूल्यों के प्रति राष्ट्रीय सहमति बनती परन्तु सत्ता के लिए स्पर्धा कर रहे राजनीतिक समूहों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संगठनों या पंथों के प्रभाव से ऐसा कोई परिवेश नहीं बन सका है और व्यक्तियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंथों या पार्टियों का बिना किन्ही सर्वमान्य कसौटी  के समर्थन या विरोध करना इन दिनों का चलन बन गया है। परन्तु ऐसा चलना राष्ट्रहित में नहीं है और जो लोग सचमुच राष्ट्रभक्त हैं और राष्ट्र का हित चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें हमारे सनातन आदर्शों और सर्वमान्य मूल्यों के लिए ही निष्ठा रखनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्तियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंथों या  दलों के प्रति नहीं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इससे ही वह राष्ट्रीय परिवेश बनेगा जो भारत की महान् गौरवशाली परम्परा के अनुरूप सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनीतिक और सांस्कृतिक तथा  विद्या सम्बन्धी और आध्यात्मिक परिवेश की रचना में सहायक होगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसा उपनिषद् कहते हैं- <strong>यो वै भूमा तत् सुखं</strong></span>, <span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>नाल्पे सुखमस्ति।</strong> व्यापक और सर्वमान्य  मूल्यों और परम्पराओं के प्रति निष्ठा ही राष्ट्र में सुख शांति और आनन्द का विस्तार कर सकेगी। अलग-अलग समूहों के प्रति ममता वस्तुत: अल्प के प्रति आसक्ति का लक्षण और भेदभाव की जनक और पोषक है। उनके प्रति आसक्ति अल्प सुख ही ला  सकती है और अंतत: दु:ख देगी। जबकि हमें  विराट और व्यापक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सनातन और सार्वभौम मूल्यों के प्रति अपनी निष्ठा रखनी चाहिए और शासन तथा समाज के प्रत्येक कार्य को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्येक नीति और प्रत्येक कदम को इन्हीं सार्वभौम कसौटियों के आधार पर मूल्यांकन करना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्लेषित करना चाहिए और उनके गुण तथा दोष निरूपित किए जाने चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उचित होगा कि एक ऐसा राष्ट्रीय परिवेश  बनाया जाए कि प्रत्येक  दल अथवा विभिन्न व्यक्ति और समूह परस्पर भी मर्यादित व्यवहार करें और बिना किसी संतोषजनक प्रमाण के किसी पर कोई दोषारोपण न करें। किसी भी जातीय समूह या पंथ का उपहास कदापि नहीं उड़ाया जाए और ना ही किसी को अकारण लांछित किया जाए। समाज में और लोक व्यवहार में मर्यादा की तथा सनातन मूल्यों और परम्पराओं की स्थापना हो ताकि अनादिकाल से जो मूल्य और जो नियम इस समाज में सर्वमान्य रहे हैं और इसको टिकाए रखने के आधार सिद्ध हुए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें पुन: हम स्थापित करें और बढाते रहें तथा राजनीतिक मुहावरों को समाज में किसी प्रकार की कटुता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विक्षोभ या विद्वेष भाव फैलाने की अनुमति नहीं दी जाए क्योंकि ऐसे विक्षोभ और विद्वेष भारत में सांस्कृतिक प्रदूषण फैलाते हैं और अपने ही समाज के किसी एक हिस्से को अकारण लांछित करते हैं या दोषी ठहराते हैं। इस प्रक्रिया से कुछ शुभ नहीं निकल सकता।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
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                <pubDate>Fri, 01 Jun 2018 21:42:44 +0530</pubDate>
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