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                <title>ईश्वर की सेवा कर्म योग - योग संदेश</title>
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                <description>ईश्वर की सेवा कर्म योग RSS Feed</description>
                
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                <title>ईश्वर की सेवा कर्म योग</title>
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                        <![CDATA[<h5 align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धेय गुरुदेव आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज</span></h5>]]>
                    </description>
                
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                        <![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2103/ishwar-ki-seva-karm-yog"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/443.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"> <span lang="hi" xml:lang="hi">ह</span><span lang="hi" xml:lang="hi">म इस संसार में आए हैं कुछ काम करने के लिए। काम तो हमें करना ही है। कोई भी बिना काम के जी नहीं सकता। जैसा कि गीता में कहा है-</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषत:। गीता १८.११</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्। गीता ३.५</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन काम किसके लिए</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या यह केवल हमारे लिए है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल अपने लिए</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">हम जीवन भर काम करते हैं और मर जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर से जन्म लेते हैं ताकि दूसरे </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के लिए काम कर सकें। तो फिर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह इस </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">या उस </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के लिए नहीं हो सकता। तो इस सारे काम का प्रयोजन क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इस सारी सक्रिय सृष्टि का प्रयोजन क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर देना आसान नहीं है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य का इस धरती पर आगमन का प्रयोजन यह है कि वह अपने अन्तरतम में स्थित भगवान् को प्रकट करे। जिन ईश्वरीय विभूतियों का शास्त्र में वर्णन मिलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें एक छोटे से छोटे अणु से लेकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की जटिल संरचना में देखा जा सकता है। दो तरह की सृष्टि हमारे समक्ष है- एक ब्रह्माण्डीय सृष्टि और दूसरी जैव सृष्टि। ब्रह्माण्डीय सृष्टि में जो व्यवस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋत-नियम </span>(Universallaws)<span lang="hi" xml:lang="hi"> देखने को मिलते हैं वे देश व काल से अबाधित होकर अनन्त काल से चलते चले आ रहे हैं और इसी प्रकार अनन्त काल तक चलते रहेंगे। भगवती श्रुति ने इस तथ्य या सत्य को शतश: सहस्रश: स्थानों में स्वीकार किया है। जैसे-</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">दिवञ्च पृथिवीञ्चान्तरिक्षमथो स्व:।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य-चन्द्रमा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्युलोक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्तरिक्षलोक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पृथिवीलोक तथा अन्य लोक-लोकान्तर धाता ने यह सब पहले जैसे ही बनाया। </span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">अस्य हि स्वयशस्तरं सवितु: कच्चन प्रियम्। न मिनन्ति स्वराज्यम्।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">ऋग्. ०५.८२.२</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परमेश्वर के नियम जो इस सृष्टि में कार्य कर रहे हैं उनको कोई भी तोड़ नहीं सकता क्योंकि वह परमेश्वर का स्वराज उनके अपने यश से फैला हुआ है। वह सभी के द्वारा प्रीति करने योग्य है।</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">परि विश्वा भुवनान्यायमृतस्य तन्तुं विततं दृशे कम्। अथर्व. २.१.५</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् आनन्दकारक ऋत के व्यापक धागे को देखने के लिए मैंने सब भुवनों में भ्रमण किया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऋत के तन्तु का यह ताना-बाना सर्वत्र फैला हुआ है। विविध जीव-जन्तुओं के शरीरों की संरचना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भू:</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भुव:</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्व:</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मह:</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जन:</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तप:</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्यम् इन सप्त लोकों का निर्माण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पञ्चभूतों के माध्यम से उन विविध शरीरों में चल रहे वृद्धि और ह्रास के नियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य का अपनी धुरी पर घूमना और पृथिवी का सूर्य के चारों तरफ परिभ्रमण जिससे दिन-रात व ऋतुचक्र का प्रवर्तन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चन्द्रमा का पृथिवी के चारों ओर घूमना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन सभी ग्रहों की निश्चित सुव्यवस्थित गति का होना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य किरणों से सम्बद्ध प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के द्वारा पृथिवी पर दिखाई देने वाली वृक्ष-औषधि-वनस्पतियों की हरी पत्तियों से आक्सीजन का निर्माण और उसके ऊपर पशु-पक्षी-मनुष्यादि के जीवन का टिकाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पशु-पक्षी-मनुष्यादि की साँसों के ऊपर पेड़-पौधों की जीवन प्रणाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गायों (पशुओं) का भोजन खेतों से प्राप्त हरा चारा और खेतों का भोजन पशुओं से प्राप्त गोबर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूमि की ऊपरी सतह पर हजारों उपयोगी जीवाणुओं का होना जिससे कृषि या वनस्पति का सम्भव हो पाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकदम खारे समुद्र से वाष्पीकरण की क्रिया के तहत शुद्ध जल का आकाश में पहुँचना और वहाँ से उस अमृत रूप जल का वर्षा के रूप में पुन: प्राप्त होना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके कारण जंगलों का सम्भव हो पाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पहाड़ों पर बर्फ का गिरना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उससे बारहों महीने नदियों का बहना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीरों में अत्यन्त आश्चर्यजनक क्रियाओं का सतत चलते रहना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय का धड़कना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किडनी का शोधन कार्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लीवर का अपना महत्त्वपूर्ण योगदान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पैंक्रियाज से इन्स्यूलिन का प्राप्त होना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छोटी-बड़ी आँतों से आहार द्रव्य में से रसों का निश्च्योतन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मस्तिष्क की जटिल संरचना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रीढ़ की हड्डियों का विचित्र जोड़ और उसके अन्दर से सूक्ष्म तन्तुओं के जाल का सारे शरीर में पहुँचना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर के विभिन्न स्थानों में रक्त का सतत निर्माण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्प्लीन के रूप में रक्त का सुरक्षित स्टोर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर में उत्पन्न होने वाले मलों का बाहर नि:सरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फेफड़ों के माध्यम से आक्सीजन का और कार्बन डाई ऑक्साइड का परस्पर आदान-प्रदान </span>(Exchange)<span lang="hi" xml:lang="hi"> एक अत्यन्त छोटे कोशिका </span>(Cell)<span lang="hi" xml:lang="hi"> में विचित्र आश्चर्यचकित कर देने वाली व्यवस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आँख की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कान की अद्भुत संरचना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हाथ-पैर और उनकी अंगुलियों की विचित्र रचना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितना भी इस दिशा में विचार करते जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आश्चर्य एक से एक आगे बढ़ते चले जाते हैं उनकी कोई सीमा नहीं आती। यह सब ब्रह्माण्डीय सृष्टि का चित्रण है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी है जैवी-सृष्टि। जितना भी जीव जगत् है वह सब इस सृष्टि के अन्तर्गत आता है-उद्भिज्ज (जो धरती का भेदन करके बाहर आते हैं- वृक्ष-औषधि-वनस्पति-लता इत्यादि) स्वेदज (जो मलादि से उत्पन्न होते रहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तरह-तरह के बैक्टीरिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृषि में जो जीवाणु रोग का रूप लिए हुए दिखाई देते हैं) अण्डज (पक्षी आदि जो अण्डे से उत्पन्न होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पहले माता के उदर में अण्डा बनता है और फिर अण्डे में जो तरल द्रव्य होता है उससे इनके विविध शरीरों की रचना होती है) जरायुज (माता के उदर में जरायु एक प्रकार की झिल्ली होती है जो गर्भ की सुरक्षा के लिए ईश्वरीय व्यवस्था के तहत गर्भ के शरीर से चिपकी रहती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गर्भ की नाभि से एक रस्सी जैसी माता के शरीर से सम्बद्ध रहती है जिसके माध्यम से माता के द्वारा जो आहार ग्रहण किया जाता है उसका अंश गर्भ तक पहुँचता है। इस झिल्ली युक्त गर्भ को ढकने वाली एक और झिल्ली होती है जिसमें पानी भरा रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गर्भ उसमें तैरता रहता है) ये चार प्रकार की जैवी सृष्टि है किन्तु ध्यान रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसा कि हमने ऊपर वर्णन किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन सब जीवों के चाहे वह जरायुज कोटि का है अथवा अण्डज या स्वेदज या उद्भिज्ज कोटि का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ तक इनके शरीरों की रचना का सम्बन्ध है वह ईश्वरीय सृष्टि का ही हिस्सा है। जैवी सृष्टि में हम जीवों के ज्ञान व कर्म मात्र को ही ग्रहण कर आगे उसकी चर्चा कर रहे हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जैवी सृष्टि को ज्ञान व कर्म के आधार पर विभाजित करके देखें तो नीचे से ऊपर तक बहुत सारे स्तर होंगे। इन उपर्युक्त चारों विभागों के एक-एक के फिर लाखों-लाखों विभाग हैं। जैसे उद्भिज्ज श्रेणी की अलग-अलग प्रजातियाँ देखें तो उनकी संख्या लाखों हो जाती हैं। इसी प्रकार स्वेदज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अण्डज और जरायुज श्रेणी की प्रजातियों की भी यही स्थिति है। अर्थात् एक स्वेदज कोटि में लाखों प्रकार के जीव हैं। अण्डज कोटि में भी लाखों प्रकार के जीव मिलेंगे और जरायुज के भी इसी तरह लाखों प्रकार हैं। उन सब प्रजातियों की एक-एक प्रजाति के ज्ञान व कर्म का अध्ययन किया जाए तो वह अलग-अलग ही मिलेगा। ज्ञान का काम है पहचानना। पहले हम उद्भिज्ज कोटि के जीवों को लेते हैं। उनकी सब प्रजातियाँ अपने-अपने आहार को पहचानती हैं। किस आहार से उन्हें पोषण मिलता है इसे वे अच्छी तरह जानती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेशक वह जानना मनुष्य जैसा नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर पहचानना तो है। जैसे एक पौधा पानी की कमी से सूखने लगता है तो वह जल को कितने अच्छे से पहचानता है। पानी प्राप्त करते ही उसमें एकदम जीवन आ जाता है। आजकल के परीक्षणों ने तो यहाँ तक सिद्ध कर दिया कि प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सद्भाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सौमनस्य व भक्तिपूर्ण भजन-कीर्तन के वातावरण में कुछ पौधों को रखा गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका विकास उन पौधों की अपेक्षा अधिक हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनको वैसा वातावरण नहीं मिल पाया। कुछ वृक्ष दूसरे प्राणियों के रक्त पर जीवित रहते हैं। जैसे विद्युत दूर से ही किसी को खींच लेती है वैसे ही वे वृक्ष निकट से गुजरने वाले किसी भी प्राणी को खींचकर उसका खून पी जाते हैं। दूसरे जीवों के सापेक्ष जो उनकी उपयोगिता है वह उनका कर्म है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार स्वेदज कोटि के जीवों की प्रजातियों का अध्ययन किया जा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ भी उन प्रजातियों के ज्ञान व कर्म के अनेक स्तर हैं। जैसे गेहूँ में दवा न डाली जाए तो उनमें जो कीट पड़ जाते हैं वे चावल या चने के कीटों से भिन्न प्रकार के होते हैं। कुछ धान्यों में जैसे सरसों और ग्वार में कीट पड़ते ही नहीं। अलग-अलग फसल में जो रोग लगता है उनमें जो कीटाणु या कीड़े होते हैं वे सब- सब जगह या सब काल में नहीं होते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई एक फसल में होता है तो कोई दूसरी में।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अण्डज कोटि के जीवों में ज्ञान व कर्म की भिन्नता बड़ी सहजता से देखी जा सकती है। मधुमक्खी का ज्ञान अपने क्षेत्र में कितना विलक्षण है। वे कितने बड़े अनुशासन में रहती हैं। वहाँ एक जो रानी मक्खी होती है वही अण्डे देती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्य सब मक्खियाँ उसकी सेवा में जुटी रहती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसा रानी मक्खी उन्हें संकेत देती है वैसा ही सबको करना होता है। बैया पक्षी का ज्ञान अपना घोंसला तैयार करने में कितना अद्भुत है। गिद्ध पक्षी की दृष्टि इतनी तीव्र होती है कि पचासों मील दूर तक का देख लेती है। चींटी भी एक अण्डज प्राणी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी घ्राणशक्ति कितनी बेजोड़ है। कुक्कुट में त्यागभाव कितना प्रकर्षता में होता है कि अपने से निर्बल बच्चे जब दाना चुगते हैं तो एक बड़ा मुर्गा होता है वह उनके बीच में जाकर उन्हें भयभीत या त्रस्त नहीं करता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें चुगने देता है। सर्पिणी अपने अण्डों को ही खा जाती है। एक-दो या तीन जो उसकी निगाह से बच जाते हैं वे ही वयस्क बनते हैं। कोयल अपने अण्डों की सुरक्षा और अपने बच्चों का लालन-पालन कौए से करा लेती है। कच्छपी सैकड़ों मील दूर अण्डे देकर आ जाती है और जब वे तैयार हो जाते हैं तो उसी स्थान पर पहुँच जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूलती नहीं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब आते हैं जरायुज पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जरायुज प्राणियों के भी भिन्न-भिन्न लाखों स्तर हैं जिनका ज्ञान व कर्म भिन्न-भिन्न प्रकार का है। गाय तेजी से दौड़ती आ रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं रास्ते में कोई छोटा बच्चा खेल रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसको बचाकर अपना पैर रखेगी। कभी भी वह बच्चे को घायल नहीं कर सकती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु भैंस यदि भाग कर आ रही हैं और ऐसी ही परिस्थिति मिल जाए तो निश्चित रूप से उसका पैर बच्चे के ऊपर ही रखा जाएगा। गाय का दूध मस्तक तक पहुँचता है अर्थात् ज्ञान वृद्धि में सहायक होता है जबकि भैंस का घी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूध कन्धों तक ही रह जाता है। गाय प्रसव के समय अपने बच्चे की रक्षा करने में पूरी शक्ति लगा देती है। कुत्ता प्राय: अपने स्वामी का भक्त होता है और अपनी जाति से द्वेष करता है। घोड़ा सवारी के लिए तैयार किया जाता है जब कि बैल खेत जोतने के लिए या गाड़ी से भार ढ़ोने के लिए। इस प्रकार सभी जरायुज प्राणियों की अलग-अलग प्रजातियों के ज्ञान व उनके कर्मों में भिन्नता देखने को मिलती है। उस भिन्नता के चलते ही तो कोई केवल शाकाहारी है तो दूसरे केवल मांसाहारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कुछ उभयाहारी हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब हम अपने इस अध्ययन की सुविधा के लिए जरायुज प्राणियों को दो वर्गों में बाँट लेते हैं एक मनुष्य और दूसरे मनुष्य से इतर जरायुज प्राणी गो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अश्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अजा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मृग इत्यादि ग्राम्य व आरण्य पशु। इसी को यदि व्यापक करके देखें तो सम्पूर्ण सृष्टि ही दो भागों में बँट जाती है। एक मनुष्य और दूसरा मनुष्येतर जितना भी जीव जगत् है- उद्भिज्ज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वेदज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अण्डज और जरायुज। जैसा कि हमने देखा मनुष्येतर सम्पूर्ण सृष्टि के एक-एक घटक के ज्ञान व कर्म की भिन्नता नहीं है। वहाँ तो सम्पूर्ण प्रजाति का ज्ञान व कर्म दूसरी प्रजाति के ज्ञान व कर्म से भिन्न होता है। जैसे जो एक गाय का ज्ञान व कर्म है वही दूसरी गाय का भी होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही तीसरी गाय का। हाँ! गाय की भी अवान्तर बहुत सारी प्रजातियाँ हैं जैसे-गीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरियाणवी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शाहीवाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काँकरेज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थारपारकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रैड सिन्धी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पहाड़ी इत्यादि सैकड़ों प्रजातियाँ हैं। उनके ज्ञान-कर्म की भिन्नता तो होगी ही। कोई प्रजाति अधिक दूध देती है कोई कम।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हम यह कह सकते हैं कि मनुष्येतर जितनी भी सृष्टि है वह अपने आप में पूर्ण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे जैसा होना चाहिए वैसी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें कुछ फेर-बदल नहीं किया जा सकता और न ही उसकी आवश्यकता है। एक मनुष्य ही है जहाँ शास्त्र व गुरुजनों के द्वारा प्रशिक्षण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयं की अभीप्सा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रयत्न-पुरुषार्थ आदि के द्वारा भिन्न पथ का अनुसरण किया जा सकता है। मनुष्य जन्म से कैसा होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि उसके स्वरूप का अध्ययन किया जाए तो संस्कार रूप में तो बहुत कुछ होता है किन्तु प्रकटत: तो कुछ भी नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसा भी उसे संस्कार-शिक्षा मिलती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसा भी उसको वातावरण अर्थात् माता-पिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज का परिवेश मिलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे साथी मिलते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसा संग मिलता है उसके अनुसार ही उसका जीवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी प्रवृत्तियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी इच्छाएँ निर्मित होती जाती हैं। भारत में एक समय वंश परम्परा से जो ऋषियों की शृंखला चल रही थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका कारण पूर्ववर्तियों की दृष्टि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान व कर्म का सहजरूप से उत्तरवर्तियों को प्राप्त होना ही है। मनुष्य आरम्भ में तो देखकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुनकर ही सीखता है और बाद में जब उसका मस्तिष्क विकसित हो जाता है तो अपने विचार व अपनी भूलों से भी सीखता रहता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य जैवी सृष्टि की श्रेष्ठतम रचना है। विधाता ने इसको अपने ही स्वरूप (रूशस्रद्गद्य) के रूप में रचा है। क्कशह्लद्गठ्ठह्लद्बड्डद्यद्य4 यदि देखा जाए तो जो इसके रचयिता में हैं वह सब इसमें हैं। किन्तु वट वृक्ष के बीज में विशाल वट वृक्ष रहते हुए भी जैसे उसकी सम्पूर्ण अभिव्यक्ति के लिए धूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूमि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुकूल वातावरण आदि सब चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाह्य शक्तियाँ उसे हानि न पहुँचाएँ। उसकी रक्षा का प्रबन्ध भी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्यथा उसकी शैशव अवस्था में कोई भी बकरी आकर उसे खा जाएगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह पुन:-पुन: बढऩा चाहेगा किन्तु पूर्ववत् कोई न कोई उसे अपना आहार बनाता रहेगा या कोई अज्ञानी जो उसके महत्त्व को नहीं जानता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खेल-खेल में यों ही उसे क्षतिग्रस्त करता रहेगा या खरपतवार अथवा कोई शक्तिशाली दूसरा पौधा उसे नहीं बढऩे देगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बीज के विकास के लिए अपेक्षित साधनों में से कहीं कोई कमी रह जाती है तो बीज वृक्ष नहीं बन सकता। जैसे कि वातावरण के अभाव में भी कोई बीज विकसित नहीं हो सकता। इसके कितने ही उदाहरण दिए जा सकते हैं-नारियल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काजू कितना भी प्रयास करें यहाँ हरिद्वार में नहीं होंगे। बीज के अनुरूप उपयुक्त भूमि न हो तो भी बीज कुछ नहीं कर पाता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्य सब कुछ है पर सूर्य की धूप नहीं पहुँचती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बन्द कमरे के भीतर पौधे का विकास कभी नहीं हो सकता। खाद-पानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नुलाई-गुड़ाई तथा सभी पौधों का अलग-अलग निश्चित दूरी पर होना भी उतना ही आवश्यक है जितनी कि अन्य चीजें। ये सम्पूर्ण नियम एक मनुष्य के विकास पर भी वैसे के वैसे लागू होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसा कि हमने ऊपर इस बात की ओर अपने पाठकों का ध्यान दिलाया कि जैसे नाना प्रकार के रत्न धातु से जडि़त भूमि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विविध प्रकार के वट वृक्ष आदि के बीजों में अतिसूक्ष्म रचना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असंख्य हरित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वेत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृष्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्र रूपों से युक्त पत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुष्प</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूल निर्माण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिष्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कटुक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कषाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अम्लादि विविध रस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुगन्धादियुक्त पत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुष्प</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कन्द  मूलादि रचना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनेकानेक करोड़ों भूगोल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य-चन्द्रादि लोक निर्माण धारण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रामण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियमों में रखना आदि ईश्वरीय सृष्टि है वैसे ही मानव शरीर की जो संरचना है पञ्चभूतों का जो एक संघटन है जिसके भीतर हाड़ों का जोड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नाडिय़ों का बन्धन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मांस का लेपन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चमड़ी का ढक्कन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्लीहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यकृत्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फेफड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंखा कला का स्थापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रुधिर शोधन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रुधिर का सम्पूर्ण शरीर में बहना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्युत् का स्थापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आँख की अतीव सूक्ष्म शिरा का तारवत् ग्रन्थन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रियों के मार्गों का प्रकाशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीव के जागरित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वप्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुषुप्ति अवस्था के भोगने के लिए स्थान विशेषों का निर्माण रस-रक्त-मांस-मेद-अस्थि-मज्जा-शुक्र  व ओज के रूप में सभी धातुओं का विभागकरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कौशल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थापनादि अद्भुत सृष्टि भी ईश्वरीय सृष्टि है (सत्यार्थ प्रकाश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अष्टम समुल्लास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महर्षि दयानन्द भी ऐसा ही देखते हैं कि मनुष्यादि प्राणियों के शरीरों की संरचना ईश्वरीय सृष्टि है।)। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु इस शरीर की रचना के बाद जो कुछ जानना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानना या करना आरम्भ करते हैं। ज्ञान के अभाव में अपने आप को सम्पूर्ण से अलग एक सत्ता समझकर वस्तु-व्यक्ति-परिस्थिति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामथ्र्य या पद-पदार्थ के द्वारा सुखी होना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने आपको ही सबसे अधिक महत्त्व देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुख भोग के द्वारा ही अपनी धन्यता का अनुभव करते हैं अर्थात् सत्ता-सम्पत्ति-सम्मान-इन्द्रियसुखों के आधार पर ही जीवन की सफलता और असफलता का अनुभव करते हैं। किन्तु यह सब पाकर भी जब अतृप्ति ही बनी रहती है तो जिज्ञासा करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी खोज करते हैं</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन का सत्य क्या है</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे जानना चाहते हैं। उस प्रभु पर विश्वास करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका चिन्तन करते हैं। अपने में उसकी सोयी हुई स्मृति जगाते हैं। यह सब जैवी सृष्टि का कार्य आरम्भ हो जाता है। जानना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न जानना या अन्यथा जानना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार मानना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न मानना या अन्यथा मानना और करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न करना और अन्यथा करना (कर्तुम्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अकर्तुम्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्यथा कर्तुम्) इन सब रूपों में जीव कार्य चालू हो जाता है। या तो स्वयं को ठीक-ठीक ज्ञान हो जाए कि किस कार्य के करने से अपनी या दूसरों की लाभ-हानि होती है या किसी प्रामाणिक ज्ञान को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लें कि ऐसा करेंगे तो ऐसा होगा। ये दो ही उपाय हैं जिनके द्वारा जीव अपने को सुखी रख सकता है और दु:खों से बचा सकता है। दूसरे के द्वारा सुझाए गए सत्य ज्ञान को मान न सके और अपना ज्ञान हो नहीं तो सुख-भोग की रुचि को लेकर जीव वह सब करता रहता है जिसका परिणाम दु:ख के सिवा कुछ नहीं होता। जो अपनी भूलों पर विचार करने में समर्थ हो पाता है वह तो भूल सुधार करके फिर अपने को सुखी करने के पथ पर आगे बढ़ जाता है किन्तु जो यह नहीं कर पाता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह अनन्त काल तक दु:ख के बाद दु:ख ही भोगता चला जाता है। यह है जीवन की सामान्य स्थिति।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब प्रश्न यह उठता है जब ईश्वर ने मनुष्य को अपना ही प्रतिरूप बनाया और ईश्वर है पूर्ण शुद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण मुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण आनन्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर तरह से पूर्ण। जिसमें थोड़ी सी भी अशुद्धि नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थोड़ा सा भी बन्धन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किञ्चित् भी दु:ख नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें कहीं भी न्यूनता नहीं। जिसमें घृणा का नाम भी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो पूर्ण प्रेम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें किञ्चित् भी मोह-आसक्ति नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सदा निर्मोह व अनासक्त है। ऐसा जब ईश्वर है तो सिद्धान्तत: मनुष्य को भी ऐसा ही होना चाहिए क्योंकि मनुष्य ईश्वर का प्रतिरूप ही है। मनुष्य के जीवन को जब देखते हैं तो सब कुछ विपरीत ही दिखाई देता है। उसका शरीर व इन्द्रियाँ अशुद्ध हैं ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु जिस मन-बुद्धि की उत्कृष्टता के कारण मनुष्य को मनुष्य कहा जाता है वे भी अशुद्ध हैं। यह मनुष्य सदा ही मोह-आसक्ति के बन्धन में बँधा हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम के स्थान में घृणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आनन्द के स्थान में दु:ख ही दु:ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभी प्रकार के अभावों व अपूर्णताओं से आक्रान्त रहता है। और भी ईश्वर परम स्वाधीन व परम उदार है तो यह सदा ही पराधीन व स्वार्थ से घिरा दिखाई देता है। ईश्वर सदा-सर्वदा ईश है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण नियन्त्रक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि यह तो सदा अनीश ही दिखाई देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वर सदा निर्भय है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह तो सदा भयभीत रहता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वर पूर्ण न्यायनिष्ठ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह सदा पक्षपात में डूबा रहता है। ईश्वर को कभी तुच्छ मनोरञ्जनों की आवश्यकता नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि इसके मनोरञ्जनों को देखकर तो शर्म भी शर्मा जाए। ईश्वर की कभी किसी से कोई स्पद्र्धा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका तो स्पद्र्धा के सिवा कोई अस्तित्व ही नहीं। ईश्वर दया का सागर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें तो इतनी क्रूरता है। ईश्वर कितनाा निरभिमान व आग्रहरहित है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका तो अभिमान व आग्रहों से अतिरिक्त कोई जीवन ही नहीं। ईश्वर को कोई कितनी भी गाली दे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसको बुरा-भला कहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी प्रतिशोध का भाव आता ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका तो प्रतिशोध अंगरक्षक ही बना रहता है। ईश्वर त्रिकाल में भी कभी भोगों की इच्छा नहीं करता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसकी तो सुखभोग के सिवा कोई और चाहत ही नहीं। ईश्वर तो सदा-सर्वदा-सर्वत्र निर्लिप्त व असंग रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह तो सर्वत्रलिप्त ही दिखाई देता है। ईश्वर का किसी भी वस्तु-व्यक्ति-पदार्थ या परिस्थिति के साथ कभी तादात्म्य नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि यह तो वस्तु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिस्थिति के साथ तादात्म्य में ही जीता है। ईश्वर को जगत् की उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय रूप अपना कार्य करने में कभी भी आलस्य नहीं आता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे तो आलस्य घेरे ही रहता है। दोनों में इतना विभेद है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी मनुष्य ईश्वर का प्रतिरूप है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सो कैसे</span>?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य को जो ईश्वर का प्रतिरूप बताया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि शास्त्रकारों ने तो प्रतिरूप भी क्या यहाँ तक कह दिया है कि तुम वही हो =तत् त्वमसि (छान्दो.)।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं प्रकट ज्ञानरूप हूँ-प्रज्ञानं ब्रह्म (एतरेय उप.)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं ब्रह्मरूप हूँ-अहं ब्रह्मास्मि (बृहदा.)। एक जगह याजुषी श्रुति में कहा गया-तदपश्यत् तदभवत् तदासीत्। (यजु. ३२) अर्थात् किसी मनुष्य के आत्मा ने उसको (तत् को) देखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जाना या अनुभव किया और वह देखने वाला वही हो गया (तद् अभवत्) क्योंकि वह पहले से ही वही था (तद् आसीत्) तदपश्यत् में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">तत्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">यह शब्द द्वितीया एक वचन है और अगले दोनों वाक्यों में तत् प्रथमा एकवचन है। मनुष्य को ये सभी उपदेश उसके गुह्य स्वरूप को लेकर ही दिए गए हैं। जैसा कि भारत संहिताकार ने भी कहा है-गुह्यं ब्रह्म तदहं ब्रवीमि न हि मानुषाच्छ्रेष्ठतरं हि किञ्चित् अर्थात् इस रचित सृष्टि में मनुष्य से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। इस मनुष्य को  मैं गुह्य ब्रह्म कहता हूँ। अत: यहाँ यह समझना चाहिए कि मनुष्य का प्रतीयमान रूप तो जो है वह अनीश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पराधीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दु:खी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वार्थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुख का भोगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभाव ही जिसकी नियति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुदार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राग-द्वेष-भय-प्रलोभन-काम-क्रोध-मोह-ईष्र्या-द्वेष-अहंकार आदि दोषों या विकारों से ग्रस्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं और मेरा ही जिसका जीवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पर्धा व प्रतिशोध ही जिसका स्वभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोह-आसक्ति व तुच्छ मनोरञ्जन ही जिसका आधार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाह्य परिस्थितियों से परिचालित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सदा अशुद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपवित्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने संस्कार व कर्मों के बन्धन में बंधा हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञान में ही सदा रचा-पचा इत्यादि ही है। किन्तु अपने अन्तरतम में तो वह साक्षाद् ब्रह्म ही है। पर हमने तो ज्ञानियों से सुना है कि जड़-चेतन जगत् है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके भी अन्तर में तो एक ही ब्रह्म का वास है जैसा कि विविध श्रुतियों में कहा है</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वं खल्विदं ब्रह्म</span>’ '<span lang="hi" xml:lang="hi">ओंकार एव इदं सर्वम्</span>’ '<span lang="hi" xml:lang="hi">ईशावास्यमिदं सर्वम्</span>’ '<span lang="hi" xml:lang="hi">स ओत: प्रोतश्च विभू: प्रजासु</span>’ '<span lang="hi" xml:lang="hi">स पर्यगात्</span>’ '<span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुष एवेदं सर्वम्</span>’ '<span lang="hi" xml:lang="hi">हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इत्यादि शतश: श्रुतियाँ उसके सर्वव्यापकत्व का संदेश दे रही हैं। फिर मनुष्य को ही अलग से गुह्य ब्रह्म कहने में क्या तात्पर्य है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सत्य है ब्रह्म अखण्ड रूप से सर्वत्र समान रूप से विद्यमान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु मनुष्येतर अन्य जड़-चेतन जगत् में उसकी सर्वथा आंशिक अभिव्यक्ति है- कहीं सिंहादि प्राणी में पराक्रम व वेग के रूप में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हाथी आदि में बल के रूप में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गौ में पञ्चामृत (दुग्ध-दही-घी-गोमूत्र व गोबर) की सर्वातिशायी उपयोगिता के रूप में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीपल में पवित्र वृक्ष के रूप में या नित्य आक्सीजन रूप जीवन प्रदान के रूप में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीमद्भगवद्गीता के दसवें अध्याय में विभूति वर्णन प्रसंग में उसकी विविध रूपों में अभिव्यक्ति को ही दर्शाया है और अन्त में कह दिया है-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यद् यद् विभूतिमत् सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव। तत्तदेवावगच्छ त्वं मत्तेजोंऽशसम्भवम्।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> जहाँ भी कुछ शुभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐश्वर्य सम्पन्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा से भरा हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस सबको मेरे ही अंश से उत्पन्न जान। लेकिन मनुष्य में ईश्वर की पूर्ण अभिव्यक्ति सम्भव है- सच्चिदानन्द के रूप में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण प्रेम व भ्रान्तिरहित विवेक के रूप में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परम उदारता के रूप में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण निर्भयता के रूप में अपने मन-बुद्धि-इन्द्रियों पर पूर्ण स्वामित्व के रूप में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परम स्वाधीनता के रूप में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असङ्गता या निर्लोभता के रूप में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वभूतात्मभाव के रूप में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परम शान्ति व मुक्ति के रूप में। अन्य योनियों में ईश्वर की ऐसी अभिव्यक्ति नहीं हो सकती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस बात को ध्यान में रखते हुए कह दिया है कि मनुष्य गुह्य ब्रह्म है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य में जब सच्चिदानन्द की अभिव्यक्ति होती है तो वह मनुष्य अपने आप को अखण्ड अविनाशी रूप में अनुभव करने लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे उसका जीवन निर्भय हो जाता है तथा दु:ख का सर्वथा अभाव हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका हर क्षण रसमय व्यतीत होता है। उसके जीवन से संयोग की दासता और वियोग का भय चला जाता है। उसका जीवन किसी भी प्रकार के खिंचाव-तनाव से ऊपर उठकर पूर्ण सहज हो जाता है। वह सब तरफ से अकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अचाह व नि:स्पृह हो कर अपने में ही पूर्ण संतुष्ट हो जाता है। संसार में रहते हुए भी उसका जीवन पद्मपत्रवत् निर्लेप हो जाता है। पुराने संस्कार व कर्म के बन्धन से मुक्त होकर जीवन जीता है। उसके पास जो विद्या-बल-सामथ्र्य-योग्यता आदि होती है उसको ईश्वर के नाते बिना भेदभाव के यथा योग्य सब में बाँटता रहता है। उसके जीवन से समस्त अभावों का अभाव हो जाता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस सम्पूर्ण विवेचन से एक बात स्पष्ट हो जाती है कि सच्चिदानन्द स्वरूप ईश्वर की चरम अभिव्यक्ति ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। अब प्रश्न यह है कि जीवन में उस ईश्वर की अभिव्यक्ति का उपाय क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्रकारों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुभवी सन्तों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महात्माओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन के खोजियों या अन्वेषकों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुओं व महान् आचार्यों ने जिन उपायों को मनुष्य के सामने रखा है वे अनेक नामों से पुकारे जाते हैं। जैसे कि समर्पणयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भक्तियोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञानयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्मयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपासनायोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्तव्यपथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचारपथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेमपथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमानक्षण में ही जीने का अभ्यास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रथम व मध्यम पुरुष से उदासीन होकर उत्तम पुरुष में स्थिति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रसमय जीवन की माँग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रार्थना व ध्यान प्रभु के लिए व्याकुलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीव्र अभीप्सा लक्ष्य की प्राप्ति में अनन्य निष्ठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने प्रभु में पूर्ण श्रद्धा-विश्वास व अनन्य प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुखभोग की रुचि का त्याग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहंकार की माँगें जो विविध कामनाओं के रूप में उदय होती हैं उनका पूर्ण विसर्जन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दु:खमय या क्लेशमय जीवन में पूर्ण असन्तोष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञानमय जीवन में घोर-नरक व कष्ट का अनुभव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पराधीनता में चरमपीड़ा की अनुभूति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विविधभयों से आक्रान्त जीवन की व्यथा का अनुभव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूतकाल में हुई भूलों की वेदना और उस समस्त अशुभ से मुक्ति पाने की तीव्र चाह। ये सब उपाय बनते हैं ईश्वर की चरम व परम अभिव्यक्ति के। इन सब का सार यदि निकाला जाए तो दो बातें सामने आती हैं- चिन्मय अविनाशी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वाधीन रसरूप जीवन की प्यास तथा आहंकारिक जीवन की तुच्छता का अनुभव यदि ये दो बातें हो जाती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और लक्ष्य प्राप्ति के बिना जो रह नहीं सकते तो भागवत जीवन की माँग ही उन साधकों को पथ का दर्शन करायेगी और वह माँग ही उन को पथ पर आगे बढने की आवश्यक शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामथ्र्य व योग्यता भी प्रदान करेगी। तथा उन की वह तीव्र माँग ही उन्हें असत्य जीवन से या आहंकारिक जीवन से उपराम होने के लिए अपेक्षित बल भी प्रदान करेगी। इसलिए महापुरुष सबसे पहले अपने भीतर इस माँग को ही जगाते है। वेदों में इस माँग को अग्नि कहा है। यह अभीप्सा की अग्नि मनुष्य मात्र अपने हृदय में जला सकता है। इस माँग के अनुभव करने में कोई भी मनुष्य पराधीन नहीं है। मनुष्येतर किसी भी प्राणी में इस माँग की अग्नि नहीं जल सकती। उन सभी योनियों को जैसा कि इसी निबन्ध में हमने दर्शाया विवेक का प्रकाश उपलब्ध नहीं है। इसलिए वे सब की सब योनियाँ भोग भोगती हैं और अनजाने में दूसरे प्राणियों के भोगों मे सहयोगी या असहयोगी बनती हैं। अपने भोगों में जो बाधक बनते हैं उनके साथ संघर्ष करती हैं। उस संघर्ष में जो जितने शक्तिशाली होते हैं वे दूसरों पर राज करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् कमजोर शक्तिशालियों के आहार बनते रहते हैं। इस प्रकार सतत संघर्ष के द्वारा जीवित रहते हुए अपनी जाति को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने वंश को आगे बढ़ाते रहते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण रसमय अविनाशी चिन्मय जीवन की माँग रूपी आग मनुष्य अपनी हृदय वेदी पर जला सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य को यह अधिकार प्राप्त है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस बात को हमने असकृद् दोहराया है। कोई पूछ सकता है यह चिन्मय जीवन क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">चिन्मय जीवन है जड़ता से मुक्त जीवन। जैसे मनुष्येतर जितनी भी योनियाँ हैं या पार्थिव जगत् है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर्वत-नदियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेड़-पौधे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अथाह जल का सागर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य-चाँद-सितारे हैं। वे सभी एक दूसरे का उपकार कर रहे हैं। उन सब को यदि अस्तित्व से हटा दिया जाए तो जीवन की यह अविच्छिन्न धारा जो बह रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तत्काल समाप्त हो जाएगी। अत: सृष्टि में परस्पर उपकार्य-उपकारकता तो सतत चल रही है। किन्तु मनुष्य के अलावा किसी में भी यह भावना नहीं होती कि मेरा यह कर्तव्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा जीवन कितना इस सम्पूर्ण अस्तित्व से उपकृत हो रहा है मैं भी अपनी पूरी शक्ति लगाकर इस सृष्टि यज्ञ में अपने को समिधा बना दूँ। भावना पूर्वक मनुष्य ही उदार हो सकता है। मैं भगवान् के लिए अपने जीवन को अर्पित कर दूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह भाव केवल मनुष्य में पैदा होता है। सतत यह अनुभव करना ही चिन्मय जीवन है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विचार के द्वारा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भावना के द्वारा और अपने कर्मों के द्वारा भगवान् की उस प्यास को मनुष्य अपने भीतर जगा सकता हैं और उसे साक्षात् अग्निकुण्ड में बदल सकता है। जैसा कि भगवती श्रुति ने मनुष्य को अपना संदेश सुनाया-</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम्। आस्मिन् हव्या जुहोतन।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सुसमिद्धाय शोचिषे घृतं तीव्रं जुहोतन। अग्नये जातवेदसे।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तं त्वा समिद्भिरङ्गिरो घृतेन वर्धयामसि। बृहच्छोचा यविष्ठ्य।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">घृत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समिधा व हव्य द्रव्य के द्वारा अग्नि बढ़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन साधनों से हम नित्य अग्नि की परिचर्या करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसको उद्बुद्ध करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसको नियमित रूप से शनै:-शनै: बढ़ाएँ। एक साथ सब कुछ गड्ड-मड्ड कर देने से भी अग्नि बढऩे की बजाय बुझ ही जाता है। अर्थात् यह भी मिल जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह भी मिल जाए ऐसे जल्दबाज व्यक्ति निराश होकर मार्ग ही छोड़ बैठता है। अग्नि जैसे-जैसे प्रज्वलित होता जाए वैसे-वैसे उसमें निरन्तर आहुतियों का क्रम यदि सतत चलता रहे तो अग्नि के बुझने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। अन्यत्र भी कहा है- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अग्निरायुष्मान् स समिद्भिरायुष्मान्।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> अग्नि समिधाओं से ही लम्बी उम्र वाला है। अत: अपने भाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार संकल्प को बार-बार यदि साधक दोहराता रहे तो अग्नि कैसे बुझ सकता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं बुझ सकता। जिसका परिणाम होगा अमृतत्व की हमारे लिए दिव्य वर्षा। भौतिक यज्ञ से जैसे वर्षा होती है वैसे इस आध्यात्मिक यज्ञ से भी ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम व अमृतत्व के रूप में दिव्य जल प्राप्त होता है। ये इन उपर्युक्त मन्त्रों का सन्देश है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वर को अपने जीवन में अभिव्यक्त करने के लिए हमने कई सारे साधन गिनाए। उनमें एक सशक्त साधन है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। यदि उचित मनोभाव व उचित दृष्टि के साथ सचेतन होकर इस साधन का उपयोग किया जाए तो तीव्रता के साथ हमारा आन्तरिक विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक विकास हो सकता है। जैसे-जैसे हम बच्चे से बड़े होते हैं वैसे-वैसे समय के साथ-साथ हम अपने को अधिकाधिक सचेतन बनाते जाते हैं। किन्तु हम यह सोचते हैं कि यह हमारे निजी लाभ के लिए है। हम अपनी बुद्धि को उसी दिशा में लगाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी चेतना का उपयोग व्यक्तिगत लाभ के लिए करते हैं। लेकिन अक्सर पाते हैं कि हमारा सारा हिसाब-किताब व्यर्थ ही गया। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि हम ईश्वर को अपने जीवन में अभिव्यक्त करना चाहते हैं तो इस अहंकेन्द्रित या वैयक्तिक दृष्टिकोण को बदलना ही होगा। व्यक्तिगत लाभ के विचार को एक कल्पना समझना होगा। हमें अपनी चेतना में यह बिठाना पड़ेगा कि जो हम करते हैं वह ईश्वर का काम है। असल में तो हम अपनी इच्छा से कुछ नहीं करते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम तो मात्र परिस्थितियों के दबाव व बहाव द्वारा उसे करने को उकसाए जाते हैं। अर्थात् हम भगवान् की </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इच्छा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वारा चलाए जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी के अनुसार काम करने के लिए बने हैं। प्रेरणा-प्रोत्साहन वहीं से आते हैं। यद्यपि हम सोचते हैं कि यह हमारी निपुणता और सामथ्र्य से हुआ है। यह हमारी अपनी मनपसन्द सोच है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधक को इससे बचना होगा। सच पूछो तो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अक्सर हम देखते हैं कि जब हम कोई काम करने का बीड़ा उठाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई बहुत श्रमवाला भी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हमें अप्रत्याशित रूप से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे सम्पन्न करने की शक्ति भी मिलती हैं। कहाँ से आती है आखिर यह शक्ति</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे में से तो नहीं। </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी शक्ति हमारी अपनी नहीं है लेकिन जो खेल खेला जाना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो काम हमें करना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके लिए हमें वह दी गई है। हमारे ऊपर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भीतर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चारों ओर वह सर्वशक्ति व्यापी हुई है और अपने काम के लिए हमें उसी पर निर्भर करना है।</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">यह भगवान् का काम है और हमें आवश्यक शक्ति भगवान् से ही मिलती है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अत: इस वास्तविक सत्य को स्वीकार करके हमें ईश्वर के प्रति अपना विनम्र समर्पण कर देना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब कर्म उन्हीं के हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे नहीं। श्रीअरविन्द आश्रम </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म के द्वारा भगवान् की प्राप्ति</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका एक सुन्दर उदाहरण है। श्रीअरविन्द और श्रीमाँ दोनों ने ही साधक को कर्म किस भाव के साथ करना चाहिए-इसे एक उच्चतम आदर्श के रूप में प्रतिष्ठापित किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों ने ही स्वयं का अपना उदाहरण भी दिया। श्रीमाँ की </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रार्थना व ध्यान</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">पुस्तक में से एक प्रार्थना को हम प्रस्तुत कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे निष्काम कर्म के व्यावहारिक व सैद्धान्तिक स्वरूप के विषय में आवश्यक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण व पर्याप्त प्रकाश हमें मिल जाता हैं । वे लिखती हैं- </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">''<span lang="hi" xml:lang="hi">हे नाथ! मेरी एक ही अभीप्सा है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">तुझे अधिक अच्छी तरह जानूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नित्य प्रति अधिक अच्छी तरह तेरी सेवा कर सकूँ। बाह्म परिस्थितियों का क्या महत्त्व! मुझे ये दिन-प्रतिदिन अधिक व्यर्थ और भ्रान्तिपूर्ण प्रतीत हो रही हैं और मैं इस बात में कम से कम रुचि लेने लगी हूँ कि बाह्य रूप में हमारे साथ क्या घटेगा। किन्तु मुझे अधिकाधिक और तीव्र रूप में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल एक ही तथ्य रुचिकर लगने लगा है और यही मुझे महत्त्वपूर्ण भी प्रतीत होता है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वह है तुझे अधिक अच्छी तरह जानना जिससे कि तेरा कार्य अधिक अच्छी तरह कर सकूँ। सब बाह्म घटनाएँ इसी लक्ष्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल इसी लक्ष्य पर केन्द्रित हों और यह हमारी उस वृत्ति पर निर्भर करता है जो हम इनके प्रति बना लेते हैं। यह है तुझे सदा सब वस्तुओं में खोजना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्येक परिस्थिति में तुझे अधिक अच्छी तरह अभिव्यक्त करने की इच्छा करना। इसी वृत्ति में परमशान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण आत्मप्रसाद और सच्चा सन्तोष प्राप्त होगा। इसमें जीवन खिल उठेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महान् हो जाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इतने गौरवमय ढंग से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इतनी विशाल लहरों के रूप में विस्तृत हो उठेगा कि कोई भी तूफान उसे उद्विग्न नहीं कर सकेगा........।</span>’</h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="right"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">(प्रार्थना और ध्यान 12 मार्च 1914)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">निस्सन्देह हम यह आशा नहीं कर सकते कि इतने उन्नत विचार यकायक सभी के अन्दर एकदम से आ जायेंगे और उनकी दृढबद्ध धारणाओं और आदतों को बदल देंगे। लेकिन कोई भी साधक या साधिका यदि इस मानसिक आदत को बदलने का निश्चय कर ले और इस नए विचार को अपने अन्दर पनपने दे तो धीरे-धीरे यह पक्का होता जाएगा। जैसा कि श्रीअरविन्द ने कहा है- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सबसे पहले व्यक्ति को अपनी इच्छा को ईश्वर की इच्छा के साथ एक कर देना चाहिए। यह समझना चाहिए कि वह साधक या साधिका तो मात्र यन्त्र हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके पीछे ईश्वर की इच्छा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल वही परिणाम ला सकती है- <strong><span style="color:rgb(186,55,42);">ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।। (गीता-१8.61) </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बाद में जब वह साधक अपने अन्दर ईश्वर की शक्ति को पूरी तरह कार्यरत देखता है तो व्यक्तिगत इच्छा का स्थान भागवत इच्छाशक्ति ले लेती है।</span>‘</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह सच है कि साधक जो भी करे वह ईश्वर का कार्य हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस का अपना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि वह विशिष्ट काम पहले से ही उस के द्वारा निर्धारित है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक अर्थ में उसी के लिए वह चुना गया है। ऐसा समझना चाहिए कि हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग काम सौंपा गया है और वह काम वही कर सकता या कर सकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा नहीं। सबके लिए सारे काम प्रत्येक के अपने-अपने कर्म-प्रवाह (प्रारब्ध) के अनुसार ऊपर से ही चुन कर दिए जाते हैं। कभी भी किसी साधक/साधिका को यह नहीं सोचना चाहिए कि ईश्वर के काम का मतलब है कोई विशेष काम जिसका हमारे सामान्य जीवन के कर्मों से कोई सम्बन्ध नहीं है। न ही कोई यह सोचे कि ईश्वर के विशेष काम का उचित यन्त्र बनने के लिए उसे इन साधारण क्रियाकलापों को छोडऩा होगा और इन सबसे बढ़कर कुछ और विशिष्ट काम होगा। ऐसा बिलकुल नहीं है। यदि कोई थोड़ी भी गहराई से सोचे तो जो भी काम वह कर सकता है वह ईश्वर का काम हो सकता है और वह होता भी है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कोई कह सकता है कि हमें तो परिवार के भरण-पोषण के लिए रात-दिन काम में जुटे रहना पड़ता है तो उसे कैसे ईश्वर का काम समझा जाए</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन किसी का परिवार भी तो ईश्वर का ही है। यहाँ जो कुछ भी है उसका अन्तिम मालिक तो ईश्वर ही है ईशा वास्यमिदम् सर्वम् (यजु.०१) </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रो दिव इन्द्र ईशे पृथिव्या:</span>’ (<span lang="hi" xml:lang="hi">ऋग्.10.89.10) अर्थात् इन्द्र ही द्युलोक और पृथिवी लोक का शासन (नियमन) करता है। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">नेन्द्रादृते पवते धाम किञ्चन</span>’ (<span lang="hi" xml:lang="hi">ऋग्.9.69.9) इन्द्र के अतिरिक्त कोई स्थान या लोक पवित्र नहीं होता (गति नहीं करता) </span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहं भुवं वसुन: पूव्र्यस्पतिरहं धनानि सञ्जयामि शश्वत:।</span>’</strong></span> (<span lang="hi" xml:lang="hi">ऋग्10.48.1) हे स्तोताओं! मैं सनातन हूँ-अहं पूव्र्य:। मैं सम्पूर्ण धनों का स्वामी हूँ-<span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>अहं वसुन: पति: भुवम्।</strong></span> इस प्रकार शतश: सहस्रश: मन्त्रों के द्वारा ईश्वर के स्वामित्व को दर्शाया गया है। अत: परिवार को भी ईश्वर का मानने में कोई विप्रतिपत्ति नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह वंश-परम्परा चलाने के लिए एक व्यवस्था है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे ज्ञान के विकास की प्रक्रिया पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रहे</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वर को अभिव्यक्त करने के लिए अन्य-अन्य आत्माओं को मौका मिल सके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: तुम्हें उनकी देखभाल का जिम्मा सौंपा गया है। इस प्रकार अन्तत: हुआ न यह भी ईश्वर का काम</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि कोई इस मनोभाव को अपना ले तो वे थकाने वाले सब विचार कि तुम परिवार के साथ लोह-शृंखला में बंध गए हो और उनका पेट भरने के लिए इतनी जी-तोड़ मेहनत करनी पड़ती है आदि-आदि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक झटके में सब गायब हो जाएँगे। तुम समझने और अनुभव करने लगोगे कि तुम सब कुछ ईश्वर की सेवा के रूप में कर रहे हो। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अथवा जैसे कोई एक वैज्ञानिक या खोजी है। वह सोचता है कि जिस खोज में वह लगा है वह खोज उसकी है। लेकिन एक सजग वैज्ञानिक कभी ऐसा नहीं कह सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह यही कहेगा कि दिमाग में विचार अचानक ही कौंधा। जहाँ वह विचार आया वह मस्तिष्क रूपी यन्त्र भी ईश्वर का ही बनाया हुआ हैं। ठीक ऐसा ही तो होता है। ज्ञान-विकास की प्रक्रिया के रहस्यों का अनावरण करते समय एक नई खोज का समय उपस्थित हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: वैज्ञानिक के दिमाग के माध्यम से एक प्रेरणा सुझायी गई और कोई छिपा हुआ सत्य सामने आ गया। वैज्ञानिक ईश्वर का काम करने के लिए मात्र एक निमित था। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">या जैसे कोई अपने को व्यापारी समझता है। सैकड़ों लोग उसके अधीन काम करते हैं। वह सोचता है कि वही उनका स्वामी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिपालक है। लेकिन सत्य तो यह है कि वे सब सेवक या श्रमिक ईश्वर के ही बच्चे हैं और ईश्वर ने उनका भरण-पोषण करने के लिए तुम्हें चुन लिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुम तो केवल देखभाल के लिए नियुक्त किए गए हो। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि कोई एक राष्ट्रीय नेता है तो वह सोचता है कि देश की जनता के लिए वह बहुत बड़ा बलिदान कर रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी समय शक्ति व ऊर्जा लगा रहा है। लेकिन यहाँ भी सच यही है कि यह काम भी ईश्वर का ही है। ईश्वर को धरती के अलग-अलग स्थानों की यह व्यवस्था चलानी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके लिए उन-उन स्थानों का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देशों का नेतृत्व करने के लिए उन-उन विशिष्ट लोगों को चुन लिया गया है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अगर कोई किसान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जमीन की जुताई करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बीज बोता है और जब अनाज पक जाता है तो वह सोचता है कि फसल उगाने वाला मैं हूँ। लेकिन वास्तव में अपने बच्चों के लिए फसल तैयार करने वाले तो ईश्वर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसान के रूप में तुम तो केवल उनकी सहायता के लिए रखे गए हो। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तुम जो कुछ भी हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक कामकाजी आदमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक क्लर्क</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक इंजीनियर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक डाक्टर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक कारीगर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक संन्यासी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक अध्यापक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक सैनिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हजारों-हजारों लोग अलग-अलग क्षेत्र में अपना-अपना काम करते हुए दिखाई देते हैं। सदा याद रखना चाहिए कि काम का चुनाव ऊपर से ही हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये सब ईश्वर के ही काम हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वर के लिए कोई काम छोटा या बड़ा नहीं है। उनके लिए सब कार्य बराबर महत्त्वपूर्ण हैं। किसी का काम लोक व्यवहार में कितना भी छोटा समझा जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु उस-उस काम के करने वाले को अपना काम नगण्य नहीं समझना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि ईश्वर की नजरों में उसका विशेष महत्त्व है। काम चाहे कितना ही बड़ा या कौशल पूर्ण हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके लिए साधक को कभी भी गर्व नहीं करना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि ईश्वर की नजरों में इसका भी वही महत्त्व है जो औरों के काम का है। कठिनाई तब आती है जब व्यक्ति किसी काम को अपने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>Ó <span lang="hi" xml:lang="hi">के साथ जोड़ देता है। यदि लोग काम को अपना काम कहना बन्द कर दें तो बहुत सी मुसीबतें खतम हो जायेंगी। यह स्वर्णाक्षरों में लिखनेे लायक बात है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पैसा कमाने के बारे में लोग सोचते हैं कि यदि हम आध्यात्मिक जीवन अपनाना चाहते हैं तो पैसे के साथ हमारा कोई सरोकार नहीं। लेकिन ईश्वर की ओर से इस घटना को देखें तो ऐसा सोचने की आवश्यकता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि तुम भगवान् के लिए कमाते हो। साधक के लिए यही उचित दृष्टि है कि वह मात्र इतना ही सोचे कि वह अपने लिए नहीं कमा रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कमा रहा है वह सब भगवान् का है। अत: उसे सारा हिसाब-किताब रखते हुए कभी भी लापरवाही के साथ खर्च नहीं करना चाहिए। हर एक साधक/साधिका अपने आपको ईश्वर का विश्वस्त खजांची समझे। किसी साधक के गीत की सुन्दर पंक्ति है-</span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">हे ईश्वर! मुझे अपना खजांची बना लो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं बे-ईमानी नहीं करूँगा।</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">पैसा कमाएँ और उचित कामों में खर्च करें। यदि पैसा बहुत है तो अच्छे-अच्छे मकान और बगीचे बनाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन कभी यह न समझें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न सोचें कि वे इनके अमीर मालिक हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि सारी धरती ईश्वर की सम्पत्ति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धरती पर सब ऐश्वर्य उन्हीं का है। साधक की बड़ाई इतनी ही है कि सम्पत्ति का सदुपयोग किया और उससे धरती के सौन्दर्य को बढ़ाया। यदि कोई ईश्वर का पुत्र-पुत्री सामथ्र्यवान् है तो साम्राज्य भी स्थापित करे तो वह भी ईश्वर के नाम से होना चाहिए। कहीं भी किसी भी स्तर पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी भी निमित्त से अहं की गन्ध तक न आए। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे राजा रणजीत सिंह ने अपने गुरु नानक के नाम से साम्राज्य स्थापित किया और स्वयं को उसको रखवाला मानते रहे। मराठा नेता शिवा ने भी वही किया। वे अपने समर्थगुरु रामदास के नाम से लड़े और जीते। यही है साधक की समुचित स्थिति। इस विषय में श्रीअरविन्द ने कितना सुन्दर कहा-</span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">काम और उससे मिलने वाली निजी लाभ हानि के साथ अहंभरी आसक्ति से मुक्ति तथा एक शान्त परितोष होना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर इसके साथ होना चाहिए काम में तथा भगवान् के कार्य हेतु अपनी क्षमताओं के उपयोग में अतीव आनन्द।</span>‘</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">असल में तो यह ठीक और गलत दृष्टि की बात है। किसी घटना को कैसे देख रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके बारे में क्या सोच रहे हैं। उचित दृष्टि के अभाव में अज्ञानवश हम ऐसा सोचते हैं कि यह हमारा अपना जीवन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपना परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपना घर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपना काम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब कुछ अपना है। इसके बजाय यदि हम दूसरी तरह से सोचें तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँचेंगे कि कुछ भी हमारा नहीं है। क्योंकि ईश्वर ने यह सृष्टि रची है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम सबको बनाया है और ऐसी व्यवस्था की है कि जिंदा रहने के लिए हमें खाना है और काम करने के लिए जिंदा रहना है और उसके लिए उसने इतने सारे विविध काम हमारे सामने रखे हैं। काम तो हमारे बिना भी चलता रहेगा। केवल दर्प के कारण ही हम ऐसा सोचते हैं कि काम हमारा है और हमारे बिना होगा नहीं। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अपनेपन</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का यह भाव हमारे अन्दर हमारे माता-पिता और परिवेश ने बचपन से ही डाला हुआ है। यदि हमें शुरू से ही यह सिखाया गया होता कि यह अहंभाव गलत है तो हम अलग ढंग से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अलग भाव लेकर बड़े होते। बाल्यकाल में जिन्हें सौभाग्य से अच्छी माँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छे पिता तथा अच्छे गुरु मिल जाते है तो उनकी दृष्टि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका भाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी सोच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका स्वभाव अलग ही होता है। इसीलिए शतपथकार ने कहा है- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् पुरुषो वेद।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु एक कहावत है </span>It is never too late to mend<span lang="hi" xml:lang="hi"> जीवन को स्वस्थ करने के लिए कभी भी देर नहीं होती । हम अपना मनोभाव अभी भी ठीक कर सकते हैं। उसके लिए विवेक करने की </span>(to discriminate)<span lang="hi" xml:lang="hi"> एक नयी आदत डालनी होगी और साथ में ईश्वर का सतत स्मरण। यदि हम सदा इस तरह करते रहें तो परिवर्तन के लिए ईश्वर की शक्ति और पथप्रदर्शन हमारे अन्दर काम करने लगेंगे। जैसा कि श्रीमद्भगवद्गीता के अन्त में कहा गया है- </span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">तत्प्रसादात् परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।। 18.62 </span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् हे भारत (गीता में जहाँ भी अर्जुन को सम्बोधित किया गया है वे हम ही हैं) तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में जा। उस परमात्मा की कृपा से ही तू परमशान्ति को तथा सनातन परम धाम को प्राप्त होगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ परमेश्वर की शरण में जाने का तात्पर्य यह है कि लज्जा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ाई और आसक्ति को त्यागकर और शरीर व संसार में अहंता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ममता से रहित होकर केवल एक परमात्मा को ही परम आश्रय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परम गति और सर्वस्व समझना तथा अनन्यभाव से अतिशय श्रद्धा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भक्ति और प्रेमपूर्वक निरन्तर भगवान् के नाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभाव और स्वरूप का चिन्तन करते रहना एवं भगवान् का भजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्मरण रखते हुए ही उनके आज्ञानुसार अर्थात् आन्तरिक प्रेरणाओं के अनुसार कत्र्तव्य कर्मों का नि:स्वार्थभाव से केवल परमेश्वर के लिए आचरण करना यही है सब प्रकार से परमात्मा के शरण होना। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार ईश्वर की शरण ग्रहण करने पर हमारी ऐसी मन: स्थिति बन जाएगी कि वह यन्त्री है और हम उसके यन्त्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह बाँसुरीवादक है हम हैं उसकी बाँसुरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह खिलाड़ी है हम हैं उसकी गेंद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह हमारा सारथी है और हम हैं योद्धा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार हम अहंप्रेरित उद्देश्यों से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहंजनित कामना और स्वत्वाधिकार से मुक्त हो जाएँगे।   </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतवर्ष के अनेक आश्रमों में पहले से ही यह परम्परा चली आ रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब भी चल रही है कि वहाँ सभी स्त्री-पुरुषों को कुछ न कुछ उनकी योग्यता अनुसार काम करना होता है बिना किसी वेतन के</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">और वहाँ वे बड़े ही खुश रहते हैं। मनुष्य को कोई भी कार्य नहीं थकाता। उसमें जो सफलता-असफलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लाभ-हानि आदि के दूसरे भाव जुड़ जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उससे थकावट आती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">काम की महिमा पर प्रकाश डालने वाला श्रीअरविन्द आश्रम का एक संस्मरण है कि योगानन्द नाम के एक अज्ञात व्यक्ति एक बार पाण्डिचेरी आए। वे लड़कपन से अपने गुरु के संरक्षण में तीव्र जप और कठिन साधना कर रहे थे। वे आश्रम में प्रवेश चाहते थे। श्री अरविन्द ने लिखा</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">उनसे कह दो कि हमारा आश्रम अन्य आश्रमों जैसा नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा लक्ष्य संन्यासी बनना या मोक्ष पाना नहीं है। हमारा सिद्धान्त है-काम के द्वारा सिद्धि पाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी तैयारी के लिए काम करना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही यहाँ का नियम है। वह जैसा अभ्यास कर रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काम उसके लिए उससे बिलकुल भिन्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उबाऊ और अरुचिकर हो सकता है। यदि वह पिछला सब कुछ छोडऩे को तैयार हो और हमारे नियमों के अनुसार काम करने को तैयार हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी वह यहाँ रह सकता है।</span>‘ <span lang="hi" xml:lang="hi">योगानन्द ने यह शर्त मान ली और तब से आश्रम में ही जीवन भर रहे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आश्रम में हो या बाहर काम अपने आप में साधना का प्रभावशाली अंग है। पर हाँ! इस विषय में एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण बात है- काम यदि उचित मनोभाव के साथ नहीं किया जाएगा तो साधना की दृष्टि से कुछ लाभ नहीं होने वाला है। केवल काम करने मात्र से यदि साधना होती तो काम तो सारा संसार कर ही रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब साधक हो जाते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु ऐसा तो देखने में नहीं आता। यदि साधक में पूरी सच्चाई </span>(Sincerity)<span lang="hi" xml:lang="hi"> हो और वह ईश्वर को सतत याद रख सके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी ओर खुल सके तो धीरे-धीरे ईश्वर का काम समझ कर काम करते हुए उसकी चेतना में एक उच्चतर चेतना अवतरित होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो साधक की सम्पूर्ण सत्ता को बदल देगी। साधक की यदि इस सिद्धान्त में पूरी निष्ठा हो कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् के लिए काम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इस साधना प्रणाली से तुझे विशेष लाभ प्राप्त होंगे जो किसी अन्य प्रकार से प्राप्त नहीं हो सकते तो ही उसे लाभ हो पाएगा। चेतना का रूपान्तरण ही तो आध्यात्मिक लाभ है। अहंभावमयी चेतना जो अपने और अपने लोगों के सुखों तक सीमित रहती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह विस्तृत होती जाती है। चेतना के विस्तृत होते-होते उसका शुद्धिकरण भी होता रहता है। चेतना के शुद्ध होने से स्वत: ही साधक की इच्छाएँ बदल जाती हैं। चेतना के परिवर्तन होने पर जो काम और व्यापार के साथ लोभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पर्धा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईष्र्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जलन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुर्भावना और होड़ लगाने की जो भावनाएँ जुड़ी रहती हैं वे सब शान्त हो जाएँगी। क्योंकि अब निजी लाभ-हानि का प्रश्न नहीं रहेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी अच्छी से अच्छी क्षमता के साथ ईश्वर का कार्य कर रहे होंगे तो आपसी झगड़े भी नहीं होंगे। सफलता पाने पर व्यक्ति खुशी से नाचेगा नहीं और असफल होने पर निराश नहीं होगा। दोनों भावों से ही वह अछूता रहेगा। क्योंकि उसे इस बात का सदा अहसास रहेगा कि यह ईश्वर का काम है। और ईश्वर तो अपनी सर्वज्ञता में हमको यथावत् जानते ही हैं कि हमने अपनी तरफ से यथासंभव अच्छे से अच्छा किया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफलता और असफलता उनके हाथ में है। हमें तो केवल मिलेगी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अक्षुब्ध समचित्तता</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वर के लिए जो काम करेगा वह धोखाधड़ी या ठगने या बुरे कामों का सहारा क्यों लेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कि लोग प्राय: लेते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब उन्हें उससे लाभ पाने की आशा होती है। क्योंकि उस ईश्वर-सेवक के सामने जैसे ही कोई लालच का अवसर आयेगा तत्काल वह याद करेगा कि ईश्वर तो इसे पसन्द नहीं करेंगे और वह ऐसे प्रलोभनों से बच निकलेगा। इस प्रकार वह भगवान् के लिए काम करने वाला योग साधक सच्चा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पष्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईमानदार बना रहेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी भी गलत काम नहीं करेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उस योग साधक को अपने जीवन का सच्चा उद्देश्य और अर्थ पता चल जायेगा। साधारण जीवन में हम प्राय: यह सोचते हैं कि दिन-पर-दिन बिना रुके यह फलरहित श्रम करते चले जाने का क्या लाभ है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका अन्तिम परिणाम या लाभ क्या होगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका फायदा कौन उठायेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके लिए कौन आभार व्यक्त करेगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु ईश्वर के लिए काम करने वाले के मन में सब उथल-पुथल कभी पैदा नहीं होती। उसका अपना एक निश्चित लक्ष्य और वहाँ तक पहुँचने के लिए निश्चित पथ होता है। वह स्पष्ट जान रहा होता है कि जिसके कारण तेरा अस्तित्व है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने तुझे पैदा किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी शक्ति से तू देख पाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुन पाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चल पाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार कर पाता है उसी की शक्ति से उसी के लिए सब काम कर रहा है। जैसे कोई गङ्गा जल से गङ्गा पूजन करता है वैसे ही यह योगसाधक भी ईश्वर की दी हुई योग्यता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामथ्र्य और उसके विवेक से उसी का पूजन करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उस साधक के जीवन से मृत्यु का भय जाता रहेगा। उसका ऐसा विश्वास होता है कि जब तक ईश्वर की इच्छा है तब तक तो कोई शक्ति चाहे इस लोक की हो या उस लोक की उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकती। क्योंकि जब साक्षात् ईश्वर को उनके काम के लिए मेरी आवश्यकता है तो वह कौन होता है जो बीच में आकर हस्तक्षेप करे। अत: मृत्यु को लेकर सामान्यत: मनुष्य में जो कमजोरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कंपकंपी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">झुंझलाहट भरे विचार आते रहते हैं वे सब भाग जायेंगे। अत: साधक मृत्यु के बारे में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल ईश्वर के काम के बारे में सोचेगा। साथ में वृद्धावस्था तथा अशक्त कर देने वाली बीमारियों का भय भी बिदा हो जाएगा। क्योंकि वह हर परिस्थिति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुख-दु:ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुकूलता-प्रतिकूलता को अपने प्रिय की ओर से भेजी हुई समझेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन ऐसा मनोभाव आनन-फानन में स्थापित नहीं हो सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लगातार प्रयास करने की आवश्यकता होती है। केवल मानसिक संकल्प या किन्हीं अवसरों पर किए गए अव्यवस्थित प्रयासों से काम नहीं चलेगा। तुम भूल न जाओ इसलिए तुम्हें बार-बार अपने को याद कराना होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि बाधा आ भी जाए तो भी नए सिरे से शुरू करके अपनी गलती सुधारनी होगी। छोटे से छोटे काम को भी ईश्वर को अर्पित करना सीखना होगा। अन्तत: तुम उनकी उपस्थिति व पथप्रदर्शन अनुभव करोगे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तुम्हारी क्षमता सीमित हो या काम छोटा तो भी तुम्हें इस बात की कोई चिन्ता नहीं करनी। यदि तुम छोटे हो और छोटा-मोटा व्यापार कर रहे हो तो भी कोई बात नहीं। यदि तुम अपने काम में सच्चे हो और भरसक अच्छे से अच्छा करते हो तो उतना ही काफी है। जितना तुम दे सकते हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वर उससे ज्यादा नहीं माँगते किन्तु तुम्हारे सामथ्र्य से कम भी नहीं। काम का मूल्य उसके परिणाम या गुण से नहीं आँका जाता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह आँका जाता है समूची चेतना के स्थायी भाव या नियम द्वारा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसी चीज जिसे सूत्रों में व्यक्त नहीं किया जाता लेकिन जिसे जीया जाता है। केवल तभी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचार-व्यवहार के सभी नियम जिनका आधार पूर्ण निस्स्वार्थता और निरासक्ति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपना पूरा मूल्य पाते हैं। किसी लक्ष्य पर पहुँचने के लिए जब हम अपने लिए निर्धारित कर लेते हैं तो संशयरहित होकर निष्ठा से आगे बढऩा होता है। अपने लिए अपने पथ को सर्वोपरि महत्त्व की वस्तु समझनी होती है। अपने को किसी भी प्रकार की हीनभावना या अहंभावना से मुक्त करके श्रद्धा-विश्वासपूर्वक अपने द्वारा स्वीकृत साधन मार्ग पर चलना होता है। जो साधक उस अनन्त को अपना लक्ष्य बनाकर उसकी ओर किसी भी पथ से (वह पथ बहुत सारी चीजों का समुच्चय भी हो सकता है) आगे बढ़ रहे हैं और अपनी प्रगति धीमी या तीव्र जो भी है उससे सन्तुष्ट हैं अर्थात् उन्हें ऐसा लगता है कि दिन-प्रतिदिन हम अपने लक्ष्य के समीप पहुँचते जा रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके लिए कुछ भी सोचने की आवश्यकता नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि पहले ही वे इतने सशक्त हैं। उन्होंने हमारा काम हल्का कर दिया है। जिधर हम जा रहे हैं उधर ही वे भी एक अन्य पथ से जा रहे हैं और अपनी ही रुचि से जा रहे हैं। अत: उनके लिए तो हृदय से बस साधुवाद निकलते रहना चाहिए। तीन चीज होती हैं-लक्ष्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मार्ग और उसकी बाधाएँ। जो लोग लक्ष्य को भी जान रहे हैं और जिन्हें मार्ग भी मिल गया और मार्ग में आने वाली बाधाओं को हटाने के उपाय भी ढूँढ लिए- उनसे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम कुछ नहीं कहना चाहते। वे अपने पथ पर श्रद्धापूर्वक बिना दाएँ-बाएँ देखे निरन्तर बढ़ते रहें। जैसे १६ वर्ष की अल्पायु में ही किसी पूर्व संस्कारवश बालक बेंकट रमन को अपनी आन्तरिक अनुभूति से यह आभास मिल गया कि तू शरीर नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर के जला दिए जाने पर भी तू तो फिर भी है और उसी अनुभूति में जीवनभर बने रहे। बिना किसी बाह्य उपदेश के वे अपने अनुभूत सत्य में स्थित हो गए। ऐसे लोगों को कोई क्या सिखायेगा और वे क्यों सीखना चाहेंगे</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे लोगों का तो सम्पूर्ण जीवन ही दूसरों के लिए शास्त्र बन जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मार्ग बन जाता है। वे किसी के पीछे नहीं चलते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरे लोग ही उनके पीछे चलते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा ही एक उदाहरण केरल के एक सन्त श्री स्वामी रामदास जी का है। वे अपने पिता के द्वारा प्रदत्त </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ॐ’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीराम जयराम जय-जय राम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इस राम मन्त्र का सतत अहर्निश जप करते रहे और इस प्रकार उन्हें सिद्धि प्राप्त हो गई। उनका मन पूर्ण शान्त हो गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवत् तत्त्व की अनुभूति हो गई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसको वे खोज रहे थे वह मिल गया। अब बताओ मार्गदर्शन के लिए वो किसी गुरु की खोज क्यों करना चाहेंगे</span>?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार कोई साधक औपनिषद दर्शन का श्रवण-मनन-निदिध्यासन करते हुए आगे बढ़ रहा है और अपनी प्रगति से सन्तुष्ट है वह दूसरे किसी की तरफ क्यों देखेगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई ऐकान्तिक ध्यान व प्रार्थना से अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर हो रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह भी क्यों अपने पथ में संशय करेगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी प्रगति से असन्तुष्ट ही अपने पथ में संशय कर सकता है। कोई व्यक्ति ज्ञान-कर्म-उपासना तीनों का संतुलित उपयोग करता हुआ आगे बढ़ रहा है और अपनी प्रगति से सन्तुष्ट है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह भी इधर-उधर क्यों देखेगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई व्यक्ति अपने मन को भूत-भविष्यत् से मुक्त करके वर्तमान क्षण में जीता हुआ मन से पार एक शान्त अनन्त चेतना का अनुभव कर रहा है- अब उसे और क्या चाहिए</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्यों किसी गुरु की खोज करेगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु जिनमें रसमय जीवन की माँग जागरित हो गई और उसे प्राप्त किए बिना रह नहीं सकते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् निराश नहीं हुए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने जीवन में ईश्वर को अभिव्यक्त करने का पूर्ण निश्चय है किन्तु अभी मार्ग नहीं मिल रहा या अनेक मार्गों पर चलने के बाद भी सिद्धि प्राप्त नहीं हो पाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म के द्वारा भागवत जीवन की उपलब्धि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इस पथ पर चलने के लिए सादर आमंत्रित हैं। वे इस पथ को चुनकर इस पर चलना आरम्भ कर दें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो अपने जीवन में और जगत् में भगवान् का प्राकट्य चाहते हैं उनकी प्रार्थना व अभीप्सा कैसी होनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब हम इसे प्रस्तुत करना चाहेंगे-</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">हे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभो</span><span lang="hi" xml:lang="hi">! </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आपकी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">जय</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हो</span><span lang="hi" xml:lang="hi">! </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वविघ्रविनाशक</span><span lang="hi" xml:lang="hi">! </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणानिधान</span><span lang="hi" xml:lang="hi">! </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दया</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सागर</span><span lang="hi" xml:lang="hi">! </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पतित</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पावन</span><span lang="hi" xml:lang="hi">! </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पतितोद्धारक</span><span lang="hi" xml:lang="hi">! </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्तर्वासिन्</span><span lang="hi" xml:lang="hi">! </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणनाथ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">! </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आपके</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">काम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इच्छा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संकल्प</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कामना</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">व</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आग्रह</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बाधक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">न</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बने।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभो</span><span lang="hi" xml:lang="hi">! </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सदा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आपके</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आदेश</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">संदेश</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">निर्देश</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्रहण</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">करने</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">लिए</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आपकी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ओर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ही</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्घाटित</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रहें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">वर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्ता</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अंग</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्यंग</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">मस्तिष्क</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आदि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">उच्चतम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षुद्रतम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">एक</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">एक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कोशिका</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">तक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आपकी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ही</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इच्छा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रियान्वित</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हो।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">वर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">चीज</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आपकी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अभिव्यक्ति</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रुकावट</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">न</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बने।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">हे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभो</span><span lang="hi" xml:lang="hi">! </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">समस्त</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बाह्य</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभावों</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अलग</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रहकर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">केवलमात्र</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आपके</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ही</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभाव</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्णरूप</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अधीन</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">जाना</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहते</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">वर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पूर्ण</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्ता</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आपके</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">लिए</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">एक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">तीव्र</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">गहरी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कृतज्ञता</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भरी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रहे।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">वर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षण</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आपकी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इच्छा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रियान्वित</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">करने</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बीते।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">वर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">परिस्थिति</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">विपत्ति</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">आपत्ति</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आपकी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इच्छा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ही</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वोपरि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थान</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">वर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आपके</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वारा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदत्त</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">विवेक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अनादर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">न</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">करें।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग्यता</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">व</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सामथ्र्य</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रूप</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">जो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पास</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">है</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आपकी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ही</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हुई</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">समझें</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">और</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दुरुपयोग</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">न</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">करें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">वर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">जो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">साधन</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">सामग्री</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अद्भुत</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तुएँ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिक्षण</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आपकी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">देन</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रूप</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हमें</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मिलती</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनमें</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अपव्यय</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">न</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">करें।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आप</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वारा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदत्त</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">उपहार</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मानते</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रहें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">वर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सदा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सब</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अवस्थाओं</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">समता</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">धारण</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">करें।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">लाभ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">हानि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जय</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">पराजय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मान</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">अपमान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर्ष</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">शोक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आदि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सभी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वन्द्वों</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">किञ्चिद्</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">विचलन</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">न</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हो।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभो</span><span lang="hi" xml:lang="hi">! </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">एकान्त</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">तेरे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">एकत्व</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रहता</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बीच</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">वह</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">एकत्व</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बना</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रहे।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभो</span><span lang="hi" xml:lang="hi">! </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">तुझको</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">उससे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अधिक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रथम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कोटि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अहंकारी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अहं</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पसन्द</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">होता</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभो</span><span lang="hi" xml:lang="hi">! </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिदिन</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">एक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नये</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">जन्म</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रूप</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">धरती</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रादुर्भाव</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हो।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिदिन</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">एक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नयी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">उषा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शन</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">करूँ।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभो</span><span lang="hi" xml:lang="hi">! </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इस</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रूपी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पर्वत</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सतत</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आरोहण</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">करता</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रहूँ।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभो</span><span lang="hi" xml:lang="hi">! </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आपको</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">न</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भूलें।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आपकी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इच्छा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ही</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">लिए</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वोपरि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थान</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रहे।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभो</span><span lang="hi" xml:lang="hi">! </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सच्चे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">विनम्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभिमानरहित</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">होकर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">जीऊँ।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभो</span><span lang="hi" xml:lang="hi">! </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सदा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वदा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भरा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रहे।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभो</span><span lang="hi" xml:lang="hi">! </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्ता</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अङ्ग</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आपसे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">विमुख</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">न</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हो।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पूर्ण</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्तित्व</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आपकी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ओर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्घाटित</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रहे।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभो</span><span lang="hi" xml:lang="hi">! </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सच्चा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुगामी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बनूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थापना</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नाम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">विध्वंसक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">और</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भञ्जक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">न</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बन</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">जाऊँ।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभो</span><span lang="hi" xml:lang="hi">! </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">असमय</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्राम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">न</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">करूँ।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभो</span><span lang="hi" xml:lang="hi">! </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आपके</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">संरक्षण</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सदा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अभय</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रहूँ।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभो</span><span lang="hi" xml:lang="hi">! </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सदा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">माधुर्य</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भरा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रहूँ।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घटना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिस्थिति</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">या</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">गिला</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">शिकवा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">न</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हो।</span>  </h5>
</li>
</ul>]]>
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                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>सनातन वैभव</category>
                                            <category>2018</category>
                                            <category>अगस्त </category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Aug 2018 21:48:00 +0530</pubDate>
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