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                <title>स्वाभाविक राष्ट्र भारत का गौरवशाली इतिहास - योग संदेश</title>
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                <description>स्वाभाविक राष्ट्र भारत का गौरवशाली इतिहास RSS Feed</description>
                
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                <title>स्वाभाविक राष्ट्र भारत का गौरवशाली इतिहास</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">प्रो. कु सुमलता केडिया</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2268/swabhavik-rashtra-bharat-ka-gauravshali-itihas"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/485.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);"><span lang="hi" xml:lang="hi">  ईसा पूर्व चौथी शताब्दी से 11वीं शताब्दी ईस्वी तक भारत पर आक्रमण का साहस कभी किसी ने नहीं किया। इन 1000 वर्षों में विश्व में अनेक राज्य और क्षेत्र बार-बार विजित व पराजित होते रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिकुड़ते और मिटते रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु भारत पर किसी ने आक्रमण नहीं किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका कारण भारत के बलशाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भव्य और पराक्रमी सम्राट् तथा नरेश की परम्परा थी। इस अवधि में भारत में अनेक महान् साम्राज्य हुए।</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मौर्य साम्राज्य</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय इतिहास ग्रंथों के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य का समय ईसा पूर्व 18वीं शताब्दी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि विलियम जोन्स के शिष्य उनका समय ईसा पूर्व चौथी सदी ही मानते हैं। चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट्् अशोक के शिलालेखों में उनके समकालीन राजाओं का उल्लेख है और जलालाबाद में अशोक के शिलालेख में यवनों को अशोक की प्रजा कहा है। हिमालय से चेन्नई तक अशोक ने राज्य किया लेकिन अशोक ने कहीं भी स्वयं को बौद्ध धर्म का अनुयायी नहीं कहा है। वह स्वयं को केवल धर्म और सद्धर्म का अनुयायी बताता है (डी.आर. भंडारकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोलकाता</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">1899)।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गुप्त साम्राज्य</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा बड़ा साम्राज्य है- महान् गुप्त वंश का साम्राज्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने ईसापूर्व 375 से छठी शताब्दी ईस्वी तक 1000 वर्षों तक शासन किया। आगे चलकर इसी वंश में चंद्रगुप्त विक्रमादित्य तथा कुमारगुप्त प्रथम और स्कंद गुप्त हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने विराट् हूण सेना को पराजित किया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हूण भारतीय क्षत्रिय ही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका प्राचीनतम उल्लेख रामायण और महाभारत में ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्यत्र कहीं नहीं। उन्होंने सम्पूर्ण यूरोप और अरब क्षेत्र पर शासन किया था और एक चौथाई विश्व को अपने अधीन कर लिया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु भारत के अन्य वीर क्षत्रियों ने उन्हें भारत में फैलने नहीं दिया और वह अरब तथा यूरोप के क्षेत्रों में फैलते रहे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सम्राट् समुद्रगुप्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चंद्रगुप्त द्वितीय तथा कुमारगुप्त प्रथम ने वैदिक यज्ञ किए और सनातन धर्म के निष्ठावान् अनुयायी होते हुए उन्होंने स्वाभाविक ही बौद्ध और जैन धर्म को भी संरक्षण दिया। सम्राट् चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के समय में ही महाकवि कालिदास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महान् नाटककार विशाखदत्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महान् कोशकार अमर सिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महान् गणितज्ञ आर्यभट्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वराह मिहिर और ब्रह्मगुप्त हुए। पाटलिपुत्र ही गुप्त साम्राज्य की राजधानी थी। दिल्ली के महरौली तथा बिहार के नालंदा में गुप्त वंश की वास्तुकला के प्रमाण मिले हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सम्राट् कनिष्क का वंश </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सम्राट् कनिष्क का साम्राज्य गांधार और दक्षिण भारत तक तथा उत्तर में चीनी तुर्किस्तान तक था। सम्राट् कनिष्क स्मार्त थे अर्थात् स्मृतियों (धर्मशास्त्रों) को मानने वाले जैसे कि अधिकांश सनातनधर्मी होते हैं। इसीलिए वे बौद्ध धर्म का भी सम्मान करते थे और बौद्धों की संगीति भी आयोजित की थी। उनके सिक्कों पर भगवान् विष्णु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् शिव और भगवान् बुद्ध तथा अन्य देवी-देवताओं के चित्र अंकित हैं। इसमें हुविष्क और वासुदेव भी अत्यंत प्रतापी शासक हुए और वे भगवान् शिव और भगवान् विष्णु दोनों के भक्त थे। (भारतीय इतिहास कोश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पृष्ठ 75</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंदी समिति उत्तर प्रदेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सच्चिदानन्द भट्टाचार्य)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सातवाहन साम्राज्य </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">चौथा है महान् सातवाहन साम्राज्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो ईसा से कई शताब्दियों पहले से प्रारंभ हुआ और पाँचवी शताब्दी के अंत तक पूरे वैभव से चलता रहा। सातवाहनों के वैवाहिक संबंध यवनों से भी हुए। (हिस्ट्री ऑफ  साउथ इंडिया : नीलकंठ शास्त्री अध्याय 1 से 4</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुंबई 1962)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मालव साम्राज्य </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पाँचवां है महान् मालव साम्राज्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो हजारों वर्ष पहले से महान् सम्राट्् कार्तवीर्यार्जुन से लेकर 20वीं शताब्दी ईस्वी तक निरंतर यशस्वी रहा है। मालवों की ही एक शाखा को भोज वंश कहा गया। वैसे तो स्वयं महाभारत काल में भी मालव राज भोज का उल्लेख है। अत: इस क्षेत्र के राजाओं की एक संज्ञा ही मालव एवं भोज थी। बाद में भी भोजराज के नाम से एक अत्यंत प्रतापी सम्राट् हुए। (हिस्ट्री एंड कल्चर ऑफ  इंडियन पीपल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खंड 2</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्याय 11)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महान् सम्राट् विक्रमादित्य </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महाराजा विक्रमादित्य महान् सम्राट् थे और पश्चिमी भारत से मध्य भारत तक फैला विशाल मालव साम्राज्य यूरोप के किसी भी वर्तमान राष्ट्र राज्य से विशालतर था। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उज्जयिनी को केंद्र बनाकर मालवों ने शताब्दियों तक देश के बड़े हिस्से में राज्य किया। मालव वंश में ही प्रतापी सम्राट् यशोधर्मन् छठी शताब्दी ईस्वी में हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने मिहिरगुल को पराजित किया। मध्य प्रदेश के मंदसौर में यशोधर्मा के दो कीर्तिस्तंभ हैं। इनके अनुसार उन्होंने महान् सम्राट् विक्रमादित्य के 600 वर्षों बाद ब्रह्मपुत्र से समुद्र तक और हिमालय से महेंद्र गिरी पर्वत तक राज्य किया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">चोल साम्राज्य </span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महान् चोलों ने ईस्वी के प्रारंभ से 13वीं शताब्दी ईस्वी तक दक्षिण भारत से श्रीलंका तक शासन किया। तंजावुर उनकी राजधानी थी। 11वीं शताब्दी ईस्वी के चोल सम्राट् राजेंद्र प्रथम की अत्यंत शक्तिशाली नौसेना थी। उन्होंने दक्षिण भारत पर तो राज्य किया ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बंगाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उड़ीसा और अंडमान निकोबार तक भी राज्य किया। बाद में विजयनगर साम्राज्य हिंदुओं का एक प्रसिद्ध साम्राज्य बनकर उभरा। (यदावास थ्रू द एज़ेज</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">भाग 1</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खंड 2)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">चालुक्य साम्राज्य </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">चालुक्य लोग अयोध्या के चंद्रवंशी नरेशों के वंशज थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने दक्षिण भारत में अपनी राजधानी वातापी में बनाई। इसी में सम्राट् पुलकेशिन प्रथम हुए जिन्होंने अश्वमेध यज्ञ भी किया। चालुक्यों के शासन के भी अनेक ऐतिहासिक साक्ष्य मिले हैं। इनके कुल देवता भगवान् विष्णु और इष्ट देवता स्वामी कार्तिकेय रहे हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">21 अत्यंत प्रतापी चालुक्य सम्राट् हुए और 13वीं शताब्दी के प्रारंभ तक इन्होंने राज्य किया। इन्हीं की एक पूर्वी शाखा के वंश में 27 अन्य प्रतापी राजा हुए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पांड्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पल्लव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रकूट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चेर (केरल) साम्राज्य </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी के साथ ही पांड्य वंश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चेर वंश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पल्लव वंश और राष्ट्रकूट वंश के प्रतापी सम्राट् होते रहे। ये सब महाराजा ययाति के ही वंश की शाखाएं थीं। सोमवंशी ऐलों के वंश में तुर्वसु की शाखा में चोल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चेर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केरल और राष्ट्रकूट वंश हुए। इसी वंश की एक शाखा से शक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हूण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यवन वंश चले थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनका चीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मंगोलिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यवन प्रांत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रूस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फ्रांस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जर्मनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोम और स्पेन में शताब्दियों शासन रहा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महाराज ययाति के ही वंश में द्रह्यु हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने गांधार राज्य बसाया। बाद में इसके अनेक लोगों ने यूरोप में राज्य किया और ड्र्यूड पुरोहित इसी वंश के हैं। सूर्योपासक ड्र्यूड और केल्ट आदि ने यूरोप में शासन किया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पांड्यों ने ईसा पूर्व छठी सदी से 1378 ईस्वी तक लगभग 2000 वर्ष राज्य किया। चौथी शती ईसा पूर्व में आए यवन यात्रियों ने पांड्यों के राज्य का गौरवमय वर्णन किया है और इसे श्रीकृष्ण के वंशजों का शासन बताया है। यह इस अर्थ में सही है कि तुर्वसु और यदु सगे भाई हैं और इस प्रकार ये एक वंश के हुए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राचीन तमिल संगम साहित्य में पांड्यों के राज्य का वर्णन है। मेगस्थनीज के बाद आए यवन यात्री पेरिप्लस और टाल्मी ने इनके राज्य की संपन्नता का वर्णन किया है। मार्कोपोलो ने भी 13वीं शताब्दी ईस्वी में दो बार पांड्य राज्य की यात्रा की थी और उसकी भरपूर प्रशंसा की है। बाद में यह राज्य विजयनगर साम्राज्य से जुड़ गया और मैसूर राज्य के रूप में 15 अगस्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">1947 तक किसी न किसी रूप में बना रहा। 27 ईस्वी से 233 ईस्वी तक चेरों ने केरल क्षेत्र में राज्य किया। इनके यवनों से व्यापारिक सम्बंध थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका वर्णन टाल्मी ने किया है। चोल वंश ईसा पूर्व 15वीं शताब्दी से प्रारम्भ होकर 13वीं शती ईस्वी तक कुल 2700 वर्षों तक राज्य करता रहा है। सम्राट् अशोक के अभिलेख में भी चोल राज्य को एक स्वतंत्र राज्य बताया गया है। 25 अत्यंत प्रतापी चोल सम्राट् हुए। (द ऐज ऑफ  इम्पीरियल यूनिटी : रमेशचंद्र मजूमदार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्याय 15) </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दक्षिण भारत के अन्य राज्य</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रकूट वंश ने 736 से 973 ईस्वी तक दक्षिण भारत के बड़े हिस्से में प्रतापी शासन किया। इसमें 14 अत्यंत प्रतापी सम्राट् हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें से द्वितीय नरेश कृष्ण प्रथम ने एलोरा का कैलाश मंदिर बनवाया। चौथे राजा ध्रुव ने गुर्जर प्रतिहार शासक वत्सराज को हराया। पाँचवें सम्राट् गोविंद तृतीय ने उत्तर भारत तक सत्ता फैलाई। ऐसा कहा जाता है कि अरब सौदागर सुलेमान भारत आया था। उसने अमोघवर्ष को विश्व के 4 महानतम शासकों में से एक बताया है। आठवें शासक इंद्र तृतीय ने तत्कालीन कन्नौज राज्य भी जीत लिया। राष्ट्रकूटों ने विराट् और भव्य मंदिर बनवाए। (नीलकंठ शास्त्री पूर्व उद्धृत)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महान् कलचुरि साम्राज्य </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कलचुरियों का वंश भी भारतवर्ष का एक अत्यंत प्रतापी राजवंश हुआ जो तीसरी सदी ईस्वी से 12वीं सदी ईस्वी तक भारत के लगभग एक तिहाई हिस्से में राज्य करता था। महाकौशल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विंध्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माहिष्मती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नर्मदा क्षेत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मालवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महाराष्ट्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुजरात और कर्नाटक में कलचुरियों ने लगभग 1000 वर्षों तक शासन किया। उनके अंतिम प्रतापी राजा विज्झाल थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो 12वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुए। उससे पहले परम प्रतापी कलचुरि सम्राट् महाराज गांगेयदेव 11वीं शताब्दी ईस्वी में हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्हें उनके विक्रम के कारण विक्रमादित्य की उपाधि मिली।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महाराज भोज से इनके मैत्री सम्बंध थे। गोरखपुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहराइच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुशीनगर और दक्षिण कौशल यानी छत्तीसगढ़ में भी कलचुरियों का शासन रहा। चंदेलों से युद्ध में उनकी शक्ति क्षीण हुई। (द क्लासिकल ऐज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्याय 13-14</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मजूमदार)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">होयसल साम्राज्य </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कर्नाटक में 11वीं से १४वीं शताब्दी ईस्वी तक लगभग 400 वर्षों तक होयसलों का राज्य रहा। धार के परमार नरेश से इनका टकराव रहता था। मलिक काफूर ने छल पूर्वक होयसल नरेश बल्लाल की हत्या कर डाली और अत्याचार किए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु अधिक समय तक मुगलों का शासन यहाँ नहीं रह पाया और वह क्षेत्र विजयनगर साम्राज्य का अंग बन गया। इस साम्राज्य से लड़ते हुए अलाउद्दीन का मानसिक संतुलन खो गया था। वह बीमार हो गया और उसके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया। वह हर एक पर शंका करने लगा और 3 वर्ष बाद उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार होयसल साम्राज्य से टकराना अलाउद्दीन खिलजी को बहुत महँगा पड़ा। (नीलकंठ शास्त्री पूर्व उद्धृत)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विजय नगर साम्राज्य </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हरिहर और बुक्का के नेतृत्व में विजयनगर साम्राज्य यहाँ फैला। जो 20वीं शताब्दी तक चलता ही रहा। विजयनगर साम्राज्य के प्रेरक महान् स्वामी विद्यारण्य जी थे। यह अत्यंत समृद्ध साम्राज्य था (वही)।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गंग साम्राज्य </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी शताब्दी से 11वीं शताब्दी तक कर्नाटक के एक हिस्से में और उड़ीसा में गंग वंशी राजाओं का शासन रहा। 10वीं शताब्दी में गंग नरेश के मंत्री चामुंड राय ने श्रवणबेलगोला में गोमतेश्वर की 56 फुट ऊँची विशाल प्रतिमा का निर्माण कराया। गंग वंश में 11 से अधिक अत्यंत प्रतापी राजा हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें से सिंघन यादव ने 13वीं शताब्दी में उड़ीसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैसूर और गुजरात के बड़े हिस्से में राज्य किया। इसके एक प्रतापी सम्राट् रामचंद्र देव से युद्ध में अलाउद्दीन खिलजी को बहुत अधिक चोट पहुँची और उसने अंत में यह कहकर संधि कर ली कि आप अपने राज्य में तो राज्य करते रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर हमें साल में एक बार नजराना पहुँचाते रहें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इनसे संधि के बल पर अलाउद्दीन ने काकतीय वंश के प्रताप रुद्रदेव से लडऩे के लिए महाराज रामचंद्र देव को कहा और अंत में महाराज प्रताप रुद्रदेव ने भी अलाउद्दीन से वैसी ही संधि कर ली। इसका अर्थ है कि ये अपने क्षेत्र में राज्य करते रहे और साल में एक बार अलाउद्दीन को नजराना देते रहे। यह एक युक्तिपूर्ण निर्णय था। (वही नीलकंठ शास्त्री)</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
                                            <category>2018</category>
                                            <category>दिसम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Dec 2018 21:46:21 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>स्वाभाविक राष्ट्र भारत का गौरवशाली इतिहास</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">प्रो. कु सुमलता केडिया</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2177/swabhavik-rashtra-bharat-ka-gauravshali-itihas"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/454.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">    भारतवर्ष में स्वाधीनता के बाद इतिहास कुछ इस प्रकार पढ़ाया जाता रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे कि उस पढ़ाए जा रहे इतिहास को पढ़कर भारतीयों के मन में कुण्ठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हताशा और ग्लानि पैदा हो। अगर यह तथाकथित इतिहास सत्य पर आधारित होता तब कुण्ठा और ग्लानि में भी कोई आपत्ति न होती परंतु अभिलेखीय साक्ष्य बताते हैं कि ग्लानि पैदा करने वाला जो इतिहास भारत में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहकर पढ़ाया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह अप्रमाणित है और वास्तविक अभिलेख उससे नितांत विपरीत तथ्यों के उपलब्ध है।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> <span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास का सार्वभौम प्रयोजन</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सामान्यत: विश्व भर में इतिहास को जानने और समझने का एक सुनिश्चित और स्पष्ट प्रयोजन है- अपने देश या समाज के सत्य को और उन दिनों विश्व के साथ जो कुछ घटित हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे सत्य और तथ्य के रूप में जानना। इस ज्ञान के द्वारा स्वयं अपने समाज के स्वभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति तथा कमजोरियों का ज्ञान होता है और अन्य राज्यों व समाजों के मध्य आपसी रिश्तों और टकराव की प्रकृति का ज्ञान होता है तथा अपनी और दूसरों की सैनिक शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दक्षता और क्षमता का ज्ञान होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे कि अपनी शक्ति में निरंतर वृद्धि होती रहे और दूसरों के सम्मुख टिक सकने का सामथ्र्य बना रहे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वाल्मीकि रामायण में बाह्लीक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दरद आदि का वर्णन है। महाभारत एवं रघुवंशम् में पारसीक और यवन प्रान्त को उत्तरापथ के राज्य कहा गया है (वाल्मीकि रामायण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अयोध्या कांड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">68/18-19</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">महाभारत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भीष्म पर्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जम्बुखंड विनिर्माण पर्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्याय 9 एवं 20</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">रघुवंशम्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चतुर्थ सर्ग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्लोक 60-64)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महाभारत में भीष्म पर्व के 20वें अध्याय में कौरव और पाण्डव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों पक्षों की सेनाओं का वर्णन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें कौरव सेना में कृपाचार्य के नियंत्रण में शक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पहलव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यवन आदि देशों के राजाओं और सैनिकों का वर्णन है। मनुस्मृति के अनुसार जो क्षत्रिय जातियाँ यज्ञ आदि संस्कारों के अभाव में पतित हो गयीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनमें यवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाह्लीक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पह्लव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किरात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारद आदि मुख्य हैं। इस प्रकार यवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाह्लीक आदि क्षेत्र सदा से भारत के अंग रहे हैं। यवन और रोम भी शकों का ही क्षेत्र था। जो भारतीय क्षत्रिय ही हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यवन प्रान्त और रोम कभी भी यूरोप का अंग नहीं थे। वे हजारों वर्षों तक भारत और जंबूद्वीप का ही अंग थे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">19वीं शती ईस्वी में यवन प्रान्त को यूरोप प्रचारित किया गया</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब यूरोप के लोगों को विशेषकर उसके पादरियों को संसार के बारे में अपने द्वारा फैलाए गए ज्ञान के झूठ का पता चला और यह प्रमाणित हुआ कि संसार में बड़ी-बड़ी सभ्यताएं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब उनमें से जो प्रबुद्ध लोग थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे बेचैन हो उठे और उन्होंने यूरोप का भी कोई एक प्राचीन गौरवशाली इतिहास ढूंढने की कोशिश की। और जब ढूंढने पर नहीं मिला तो उसे रचने की कोशिश की। इसी क्रम में भूमध्यसागरीय क्षेत्र के यवन और रोम इलाकों को यूरोप बताने लगे। जबकि ये केंद्रीय यूरोप के ठण्डे इलाकों से बिल्कुल अलग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपेक्षाकृत गरम इलाके हैं और सदा भारत से सम्बन्धित रहे हैं। तुर्की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोम तथा यवन भारत के क्षेत्र रहे हैं। (देखें महाभारत भीष्म पर्व अध्याय 20)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अग्रपुर (जिसे बाद में पादरियों ने अपनी आदत के अनुसार तोड़-मरोड़कर नाम रखते हुए अक्रोपोलिस कहा) में अतुला देवी (शक्ति) का भव्य मंदिर था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो करीब डेढ़ हजार वर्षों से अपने वैभव के लिए विख्यात था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ सोने और हाथी दांत के आभूषणों से नित्य देवी की सज्जा और पूजा होती थी। 15वीं सदी में पादरियों ने आक्रमण कर उसे छीन लिया और उसे चर्च घोषित कर दिया। (अ शोर्ट हिस्ट्री ऑफ वल्र्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जाफरी ब्लेनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेंग्विन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नयी दिल्ली 2001</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्याय 6। पृष्ठ 107)। बाद में मुसलमानों ने ईसाइयों से छीनकर उसे मस्जिद बना डाला। 1687 ईस्वी में वेनिस के सैनिकों ने उसे नष्ट कर डाला। वहाँ की भाषा भूषण और भोजन पर गहरा भारतीय प्रभाव अभी कुछ समय पहले तक रहा है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यवन प्रांत में ईसाइयत का उल्लेखनीय विस्तार पहली बार 19वीं सदी ईस्वी में हुआ। बीसवीं सदी ईस्वी के मध्य तक सम्पूर्ण यवन प्रांत में कुल 8000 ईसाई पादरी थे और वह सब यवन परम्परा के अनुसार विवाहित थे। क्योंकि वह परम्परा भारत की ब्राह्मण परम्परा का ही अंग थी। स्वयं महाकवि होमर के काव्य में ऐलों के पुरुषार्थ की गाथा है और वह महाभारत की युद्ध कथा से बहुत अधिक प्रभावित है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सिकन्दर के आक्रमण के आंतरिक साक्ष्य नहीं हैं</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सिकन्दर का भारत पर जो आक्रमण बताया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका कोई भी उल्लेख भारत के किसी भी आन्तरिक साक्ष्य में नहीं मिलता। 19वीं शताब्दी ईस्वी के प्रारम्भ से 7 वर्ष पहले पादरी विलियम जोंस ने मेगस्थनीज की इंडिका का हवाला देते हुए एलेक्जेंडर (सिकन्दर) का किस्सा रचा और उसे पहली बार ग्रेट कहा। महत्वपूर्ण यह है कि जिस इंडिका का हवाला पादरियों ने दिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका एक भी पन्ना आज तक नहीं मिला। भारत के किसी भी काव्य या अभिलेख आदि में एलेक्जेंडर के भारत आने की कोई चर्चा नहीं है। बर्नार्ड के संपादन में छपे इन्साइक्लोपीडिया अमेरिकाना में पृष्ठ 537 से 540 तक यह बताया गया है कि मकदूनिया का राजा एलेक्जेंडर पल्ला (भारतीय नाम) नगर से चला और दजला फरात नदियों के किनारे बढ़ते-बढ़ते पाटल तक पहुंचा और फिर तक्षशिला से मुड़कर मकराना के रास्ते काबुल लौट गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि भारत के सम्राट् पौरव राज की सेना का पराक्रम और शौर्य सुनकर सिकन्दर और उसकी सेना ने भारत की ओर बढऩे का साहस नहीं किया और लौट गए। इन्साइक्लोपीडिया अमेरिकाना के खण्ड 1 में पृष्ठ 540 में कहा गया है कि एलेक्जेंडर की सेना हिंदुकुश से आगे पूर्व की ओर बढऩे के साहस को पागलपना मानती थी और एलेक्जेंडर को यही ज्ञान था कि सिंधु नदी वस्तुत: नदी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समुद्र है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह पूर्व का कोई विराट् समुद्र है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ से आगे धरती है ही नहीं। ऐसे में वह भारत विजय की कल्पना भी करे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह असम्भव है। पर किस्से रचे गये और फैलाये गये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">केवल इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका ने सबसे पहले ब्रिटिश पादरियों की गप्पों को ऐतिहासिक तथ्य की तरह प्रस्तुत किया कि कोई महान् योद्धा एलेक्जेंडर नाम का हुआ था। पहले तो पादरी लोग एलेक्जेंडर को यवन सेनापति कहते रहे। बाद में जाकर उन्हें अपनी भूल का पता चला तो वे उसे मकदूनिया का राजा बताने लगे। पादरियों की प्रचारित इन गप्पों को इतिहास मानने वाले भारतीयों को तो यह तथ्य भी स्मरण नहीं है कि एलेक्जेंडर के समय से 700 वर्ष पहले सम्पूर्ण यवन क्षेत्र नौ अलग-अलग राज्यों में बँटा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें स्पार्टा और अतिका मुख्य थे और मकदूनिया उनमें सबसे छोटा राज्य था। इसकी कुल लम्बाई लगभग 250 किलोमीटर और औसत चौड़ाई लगभग 7 किलोमीटर थी और इस प्रकार वह उत्तर प्रदेश के पुराने गोरखपुर या गाजीपुर जिले से भी आकार में छोटा था तथा उसकी कुल आबादी एक लाख के आसपास थी। वर्तमान में भी मकदूनिया की कुल आबादी 21 लाख है और उसे रिपब्लिका मकदूनिया कहा जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मकदूनिया सहित सम्पूर्ण यवन क्षेत्र को ईसा पूर्व 380 में पारसिक नरेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कि वस्तुत: भारत के ही नरेश थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">को पराजित कर अपने राज्य में मिला लिया था। ऐसा बताया जाता है कि अपने पिता की मृत्यु के बाद एलेक्जेंडर ने थोड़ी तैयारी करके मकदूनिया से सटे क्षेत्र में पारसीक सेना से युद्ध किया। परन्तु इस युद्ध का क्या परिणाम हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह कोई नहीं जानता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि थोड़े ही समय बाद स्वयं उसने पूरा क्षेत्र पारसिक नरेश को लौटा दिया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यद्यपि एलेक्जेंडर कभी भी रोम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यूरोप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अफ्रीका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका और आस्ट्रेलिया नहीं गया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु ईसाई पादरियों ने 19वीं शताब्दी के उषाकाल में अचानक उसे उसके जन्म के 2,200 वर्ष के पश्चात् महान् कहना शुरू कर दिया। अपने समय के किसी भी महत्वपूर्ण साम्राज्य से टकराने का साहस एलेक्जेंडर ने नहीं किया था क्योंकि वह वीर तो था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन मूर्ख नहीं था और उसकी कुल शक्ति बहुत थोड़ी थी। 22 वर्ष की उम्र में गद्दी पर बैठा और 11 वर्ष तक लगातार लड़ते-लड़ते थक कर भटकता हुआ मर गया और थोड़े समय बाद मकदूनिया को शकों ने जीत लिया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हीं दिनों भारत में अत्यंत विशाल राज्य थे। मौर्य वंश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुप्त वंश आदि के विशाल साम्राज्य के रहते हुए किनारे की सीमा में कभी आया भी हो तो भारत के स्पर्श को ही एलेक्जेंडर द्वारा भारत की जीत बता देना कैसी आन्तरिक हीनता और कातरता का प्रमाण है</span>?</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
                                            <category>2018</category>
                                            <category>नवम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 01 Nov 2018 21:47:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>स्वाभाविक राष्ट्र भारत का गौरवशाली इतिहास</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">प्रो. कु सुमलता केडिया</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2151/swabhivik-rashtra-bharat-ka-gauravshali-itihas"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/093.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान भारत अत्यंत प्राचीनकाल से एक स्वाभाविक राष्ट्र है और 1922 ईस्वी तक इसमें अफगानिस्तान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तान और बांग्लादेश के नाम से जाने जा रहे वर्तमान क्षेत्र (देश) शामिल थे तथा श्रीलंका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">म्यांमार और नेपाल को भी एक ही बड़े स्वाभाविक राष्ट्र के अङ्ग माना जाता था।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान भारत अत्यंत प्राचीनकाल से एक स्वाभाविक राष्ट्र है और 1922 ईस्वी तक इसमें अफगानिस्तान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तान और बांग्लादेश के नाम से जाने जा रहे वर्तमान क्षेत्र (देश) शामिल थे तथा श्रीलंका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">म्यांमार और नेपाल को भी एक ही बड़े स्वाभाविक राष्ट्र के अङ्ग माना जाता था।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रत एक स्वाभाविक राष्ट्र है और विश्व के स्वाभाविक राष्ट्रों में सबसे बड़ा है। अपने वर्तमान सिकुड़े हुए रूप में भी भारत अर्थात् 15 अगस्त 1947 के बाद का खण्डित भारत भी दुनियाँ का सबसे बड़ा स्वाभाविक राष्ट्र है। क्षेत्रफल की दृष्टि से इससे बड़े केवल 6 राष्ट्र हैं और जनसंख्या की दृष्टि से केवल चीन इससे बड़ा है। अन्य 5 बड़े राष्ट्र राज्य हैं:- संयुक्त राज्य अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कनाडा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्राजील</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोवियत संघ और ऑस्ट्रेलिया। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ये छहों बड़े राष्ट्र अस्वाभाविक हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">1-    </span><span lang="hi" xml:lang="hi">संयुक्त</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">राज्य</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नाम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ही</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पष्ट</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">है</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">वह</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अनेक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">राज</span><span lang="hi" xml:lang="hi">्यों को मिलाकर बना एक संघ है और स्वाभाविक राष्ट्र नहीं है। वर्तमान संयुक्त राज्य अमेरिका में यूरोप से जाकर रह रहे लोग ही शासन में हैं। वहाँ के स्वाभाविक बाशिंदे और नागरिक आज उस राष्ट्र के मालिक नहीं हैं। यहाँ तक कि इसका नाम भी अस्वाभाविक है। इसका अपना मानो कोई नाम ही वर्तमान में वहाँ रह रहे और शासन कर रहे लोगों की स्मृति में नहीं है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">12२-    </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">राज्य</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">है</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कनाडा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">- </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">यूरोप</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">निकाले</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">गए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगाए गए अथवा सताए गए और सताए जाने पर यहाँ आकर बसे लोगों के द्वारा आबाद है। यह स्वयं में कोई स्वाभाविक राष्ट्र नहीं है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">3-    </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तीसरा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">राज्य</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">है</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्राजील</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो दक्षिणी अमेरिका में स्थित है और दूसरे महायुद्ध के पूर्व तक इसका कोई एक स्वतंत्र और बड़े राष्ट्र के रूप में नाम भी विश्व में विदित नहीं था। यह भी यूरोपीय उपनिवेशवादियों के द्वारा बसाया गया है। अत: यह स्वाभाविक राष्ट्र नहीं है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">4-    </span><span lang="hi" xml:lang="hi">चौथा बड़ा राष्ट्र राज्य है आस्ट्रेलिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो स्वयं वहाँ के मूल निवासियों को भगाकर यूरोप से आए हुए तमाम तरह के लोगों के द्वारा आबाद है। इस प्रकार वह भी कोई स्वाभाविक राष्ट्र नहीं है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">5-   </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पाँचवाँ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">राज्य</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">था</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सोवियत</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">संघ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">जो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अब</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">विखंडित</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ग</span><span lang="hi" xml:lang="hi">या है। रूस का वर्तमान बड़ा रूप भी बीसवीं शताब्दी में एशिया के बड़े भूभाग पर जबरन कब्जे के कारण बना है। इसके अनेक टुकड़े हो चुके हैं। अत: यह स्वयं में एक अस्वाभाविक राष्ट्र राज्य है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">6-  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">चीन</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रूप</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> 1947 </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ईस्वी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">उपरान्त</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बढ़ाया</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">गया</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">है</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">और</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्वाभाविक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">है।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मूल</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> चीन तो प्रशांत महासागर कीमत तट पर पीत सागर से सटा बीजिंग से हेनान तक फैला छोटा सा इलाका था (देखें </span>china : a history by John Keay, page <span lang="hi" xml:lang="hi">8-9</span>, harper, london, <span lang="hi" xml:lang="hi">2008)। प्रशांत महासागर से लगा हुआ यह एक छोटा सा क्षेत्र था। यह द्वितीय महायुद्ध के बाद सोवियत संघ के द्वारा विशेष रूप से बढ़ाया। यद्यपि प्रथम महायुद्ध के बाद ही इसकी शुरुआत कर दी गई थी। इसके अनेक हिस्से ऐसे हैं जो 1947 तक स्वतंत्र और स्वाभाविक राष्ट्र थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे तिब्बत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे जवाहरलाल नेहरू ने चीन को सौंप दिया। इसी प्रकार अक्साई चिन का इलाका या उत्तर के अनेक इलाके चीन के स्वाभाविक अङ्ग नहीं रहे हैं। इस प्रकार वर्तमान चीन एक अस्वाभाविक राष्ट्र है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मंगोलिया और मंचूरिया का बहुत बड़ा हिस्सा कम्युनिस्ट चीन ने सोवियत संघ के सहयोग से दबाया है और इस प्रकार इन पर उसका अवैध कब्जा है और वे चीन राष्ट्र के स्वाभाविक अङ्ग नहीं हैं। इसके स्थान पर वर्तमान भारत अत्यंत प्राचीनकाल से एक स्वाभाविक राष्ट्र है और 1922 ईस्वी तक इसमें अफगानिस्तान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तान और बांग्लादेश के नाम से जाने जा रहे वर्तमान क्षेत्र शामिल थे तथा श्रीलंका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">म्यांमार और नेपाल भी एक ही बड़े स्वाभाविक राष्ट्र के अङ्ग माने जाते थे। इस तरह भारत सदा से एक स्वाभाविक राष्ट्र है। 15 अगस्त 1947 के बाद इसका आकार बहुत सिकुड़ गया। तब भी भारत छठे नंबर का बड़ा राष्ट्र और इन सातों में एकमात्र स्वाभाविक राष्ट्र है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">युवान चुवांग (व्हेन त्सांग) के यात्रा वृतांतों से स्पष्ट है कि चीन का तत्कालीन क्षेत्रफल अभी से बहुत कम था। यहाँ तक कि चीन का </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">चीन’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नाम भी भारतीयों ने रखा है। चीन स्वयं को ह्वांगहो ही कहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका अर्थ होता है मध्यवर्ती राज्य।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शताब्दियों तक चीन भारत का शिष्य देश रहा है और वह कभी भी भारत का पड़ोसी नहीं था। भारत के पड़ोस में तिब्बत और तिब्बत के पड़ोस में चीन था। चीनी यात्रियों के यात्रा वृतांत से भी यह स्पष्ट होता है कि चीनी यात्रियों के लिए भारत सुदूर पश्चिम था।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतवर्ष की सीमाओं के ऐतिहासिक साक्ष्य</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">महाभारत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुराणों और शास्त्रों में तथा स्वयं महाकवि कालिदास द्वारा रघुवंशम् में भारत की सीमायें वर्णित हैं। महाभारत में भीष्म पर्व के जम्बुखंड विनिर्माण पर्व के 9 वें अध्याय में संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि भारत वर्ष में 250 जनपद हैं और उनके नाम भी गिनाते हैं जिनमें यवन प्रान्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाह्लीक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारसीक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गांधार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्रिविष्टप और चीन आते हैं। इस प्रकार वैदिक काल से ब्रिटिश काल तक भारत की सीमाओं की निरंतरता है। इसीलिए भारतवर्ष एक स्वाभाविक राष्ट्र है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर गुरूजी ने भी यह लिखा है (जो कि उनके लेखों और भाषणों के संग्रह विचार नवनीत में अंकित है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देखें-द्वितीय भाग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्याय 9)।उन्होंने कहा है कि भारत का अर्थ है समस्त हिमालय के समस्त उपान्तों और अंतर्गत प्रदेशों सहित हिन्द महोदधि तक फैला समस्त भूखंड जो तीन ओर से समुद्र से घिरा है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इससे स्पष्ट होता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक की दृष्टि में भी तिब्बत से लेकर मंगोलिया तक उत्तर में और समस्त मध्य एशिया पश्चिमोत्तर में हजारों साल से भारत के अङ्ग रहे हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके बाद महाकवि कालिदास का साक्ष्य है। रघुवंशम् के चतुर्थ सर्ग में भारतवर्ष की सीमाओं का वर्णन है जिसके अनुसार 3 दिशाओं में महासमुद्र है और उत्तर में समस्त हिमालय क्षेत्र भारत का अङ्ग है। पश्चिमोत्तर में कांबोज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाह्लीक और उससे भी आगे 7 पर्वतीय जनपद कालिदास के समय भारत के अङ्ग हैं। चीन और मंगोलिया से लेकर हंगरी तक फैले संपूर्ण क्षेत्र को भी सदा से भारत का ही अङ्ग कहा गया है। पश्चिमोत्तर में यवन जनपद सदा भारत का अङ्ग रहा है और पारसीक तो भारत का आंतरिक जनपद है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इतना ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्राट् अशोक और सम्राट् कनिष्क से लेकर महाराजा रणजीतसिंह तक समस्त अफगानिस्तान और बाह्लीक तक का क्षेत्र भारत का अङ्ग रहा है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">उससे पहले समस्त मद्धेशिया (मध्य एशिया) भारत का ही अङ्ग था क्योंकि उस पूरे क्षेत्र में अन्य किसी राष्ट्र का उल्लेख प्राचीनकाल में नहीं मिलता। केवल नगरों और व्यापार केन्द्रों के ही उल्लेख हैं और वह सभी भारतीय व्यापारियों के ही मुख्य केन्द्र हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुनानक देव जब मक्का गए तब तक उन्हें यही ज्ञात था कि वहाँ मक्केश्वर महादेव का एक प्राचीन मंदिर है और वह पूरी तरह स्पष्ट थे कि वह भारत के क्षेत्र में ही घूम रहे हैं अर्थात् मक्का तक भारत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह गुरुनानक देव के समय स्पष्ट था।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक के शिलालेख संख्या-8 से प्रमाणित है कि यवन भारतीय नागरिक (प्रजा) थे। वह शिलालेख यावनी लिपि में है। सम्राट् अशोक के बाद भारतीय सम्राट् कनिष्क हुए जिनकी राजधानी पुरुषपुर थी और चीनी तुर्किस्तान तक उनका राज्य था।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">महान् सम्राट् विक्रमादित्य ने रोम के शक शासक को पराजित किया था और बांधकर भारत लाए थे तथा उज्जैन में घुमाकर फिर छोड़ दिया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके अभिलेख हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार भारत की सीमाएं प्राचीनकाल से ही स्पष्ट निरूपित हैं और इसीलिए भारत एक सनातन स्वाभाविक राष्ट्र है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">वातापी के चालुक्य शासक ब्रह्मदेश यानी म्यांमार तक शासन करते थे। इसके ऐतिहासिक अभिलेखीय साक्ष्य हैं। पुलकेशिन प्रथम एवं पुलकेशिन द्वितीय दोनों ने अश्वमेध यज्ञ किया था।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्वी चालुक्यों ने 12वीं शताब्दी ईस्वी में म्यांमार तक शासन किया। और भी अनेक देशों में शासन किया और वहाँ सभ्यता और संस्कृति का विस्तार किया।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">महाराजा रणजीतसिंह के समय तक अफगानिस्तान भारत का ही अङ्ग था और बीसवीं शताब्दी ईस्वी के आरम्भ में भी भारत राष्ट्र से आशय वर्तमान नेपाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">म्यांमार और श्रीलंका सहित अफगानिस्तान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बांग्लादेश था। 1922 ईस्वी तक अफगानिस्तान भारत ही था। इस समस्त क्षेत्र में भारतीय नरेशों का शताब्दियों शासन रहा और स्वयं अफगान मूलत: भरतवंशी हैं और पाटन के क्षत्रियों तथा अन्य नागरिकों को ही वर्तमान रूप में पठान कहा गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह बात बीसवीं शताब्दी ईस्वी के आरंभ में अनेक ब्रिटिश एवं अन्य यूरोपीय लोगों ने कही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें अलेक्जेंडर डाउ मुख्य है (देखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अलेक्जेंडर डाउ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दि हिस्ट्री ऑफ  हिन्दोस्तान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिल्ली रीप्रिंट 1973</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूल प्रकाशक : एस. बेकार्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लन्दन</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">1770 ईस्वी)।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अत्यंत प्रामाणिक ऐतिहासिक </span></strong></span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">साक्ष्य हैं भारत के पास</span></strong></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। महाभारत के समय से तो भारतीय इतिहास के सभी तथ्य विस्तार से अभिलिखित हैं अर्थात् आज से 5,150 वर्ष पूर्व से भारत का इतिहास विस्तार से अभिलिखित है। महाभारत 3,138 ईसापूर्व में हुआ और 3,102 ईसापूर्व से कलियुग का प्रारंभ हुआ। तब से अब तक के समस्त ऐतिहासिक तथ्यों का विवरण हमारे पुराणों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास ग्रंथों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभिलेखों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐतिहासिक एवं अन्य प्रमाणिक स्रोतों में उपलब्ध हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">पुलकेशिन द्वितीय के ऐहोल अभिलेख में स्पष्ट लिखा है कि अभिलेख के समय तक कलयुग के 3,735 वर्ष बीत चुके हैं। ऐहोल अभिलेख 634 ईस्वी का है। इसी प्रकार 943 ईस्वी में लिखे गए चोल सम्राट् परान्तक प्रथम के अभिलेख में कलियुग के 4,044 वर्ष बीत जाने का उल्लेख है। वैसे तो महाभारत युद्ध के भी 5,00,000 वर्ष पूर्व तक का प्रामाणिक इतिहास भारतीय भाषाओं में उपलब्ध हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">परंतु महाभारत में तो सेनाओं और शस्त्रों का संपूर्ण वैभव विस्तार से वर्णित है और वह स्वयं में इतिहास ग्रंथ ही कहा जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इन लगभग 5,200 वर्षों में 3,000 वर्षों तक भारत वर्ष की केन्द्रीय राजधानी हस्तिनापुर थी। उसके पहले कई हजार वर्षों तक भारत वर्ष के चक्रवर्ती सम्राटों की राजधानी अयोध्या रही। हस्तिनापुर के बाद पाटलिपुत्र भारत की राजधानी रही। शिशुनाग वंश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नंद वंश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मौर्य वंश और शुंग वंश की राजधानी पाटलिपुत्र थी। 1,161 वर्षों तक पाटलिपुत्र भारत के चक्रवर्ती सम्राटों की राजधानी रहा। इसके बाद प्रतिष्ठान या पैठन सातवाहन चक्रवर्ती सम्राटों की राजधानी 506 वर्ष रहा।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">फिर ईसापूर्व 328 में द्वितीय गुप्त सम्राट् समुद्रगुप्त ने सातवाहनों को पराजित किया और तब से लगभग 1,000 वर्षों तक पाटलिपुत्र पुन: भारत के चक्रवर्ती सम्राटों की राजधानी रहा।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पुराणों में वर्णित है </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय राजवंश</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पुराणों में भारतीय राजवंशों का विशद प्रामाणिक विवरण है। ऋषभ पुत्र भरत के द्वारा शासित जंबूद्वीप का खंड भरतखंड और भारतवर्ष कहलाया। एक अन्य मत से मूलत: स्वयं मनु ही भरत हैं क्योंकि प्रलयकाल के बाद उन्होंने इस खण्ड का विशेष पालन पोषण किया। एक अन्य मत से मनु पुत्री इला के वंश में पुरु हुए। उस कुल में विश्वविजयी सम्राट् दुष्यंत के पुत्र तेजस्वी सर्व दमन भरत हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनके कारण यह देश भारतवर्ष कहलाया। वस्तुत: भारतवर्ष का नाम दुष्यंत पुत्र भरत से बहुत पहले से है और इसलिए मनु को ही भरत मानना उचित है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि आधुनिक काल की ही बात लें तो महाभारत के समय से ईसा पूर्व छठी शताब्दी तक तो भारत पर किसी ने भी आक्रमण का साहस नहीं किया। जबकि उसी समय में विश्व के सभी क्षेत्रों में अनेक आक्रमणकारी निरंतर आक्रमण कर रहे थे। इसका अर्थ है कि महाभारत के बाद भी 3,000 वर्षों तक भारत पूर्ण स्वाधीन और अपराजेय रहा। यह कोई सामान्य बात नहीं है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान में यूरोप के राज्य के किसी भी क्षेत्र का कोई इतिहास नहीं हैं और बाद का जो इतिहास मिलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उससे केवल यह पता चलता है कि उस क्षेत्र के राज्य एक दूसरे के पराधीन ही होते रहे हैं।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
                                            <category>2018</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 01 Oct 2018 21:41:33 +0530</pubDate>
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