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                <title>प्रजनन संस्थान व त्वचा रोग निवारक आयुर्वेदिक घटक दारुहल्दी - योग संदेश</title>
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                <description>प्रजनन संस्थान व त्वचा रोग निवारक आयुर्वेदिक घटक दारुहल्दी RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>नेत्र, प्रजनन संस्थान व त्वचा रोग निवारक आयुर्वेदिक घटक दारुहल्दी</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">        दा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">रुहल्दी विश्व में नेपाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूटान एवं श्रीलंका में </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> हजार मीटर की ऊँचाई पर तथा इसके अतिरिक्त शीतोष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय एशिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यूरोप एवं अमेरिका में पाई जाती है। भारत में शीतोष्णकटिबंधीय हिमालय में </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> हजार मी. की ऊँचाई पर एवं नीलगिरी के पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है। दारुहल्दी का प्रयोग प्राचीनकाल से चिकित्सा के लिए किया जा रहा है। वैदिक साहित्य में खालित्य की चिकित्सा में हल्दी के साथ दारुहल्दी का प्रयोग मिलता है। बृहत्त्रयी में कर्णरोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नेत्ररोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्रणशोधन आदि के लिए दारुहल्दी का प्रयोग मिलता है। चरक संहिता के</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2174/netra--prajanan-sansthan-v-tvacha-rog-nivarak-ayurvrdic-ghatak-daruhaldi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/024.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    दा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">रुहल्दी विश्व में नेपाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूटान एवं श्रीलंका में </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> हजार मीटर की ऊँचाई पर तथा इसके अतिरिक्त शीतोष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय एशिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यूरोप एवं अमेरिका में पाई जाती है। भारत में शीतोष्णकटिबंधीय हिमालय में </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> हजार मी. की ऊँचाई पर एवं नीलगिरी के पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है। दारुहल्दी का प्रयोग प्राचीनकाल से चिकित्सा के लिए किया जा रहा है। वैदिक साहित्य में खालित्य की चिकित्सा में हल्दी के साथ दारुहल्दी का प्रयोग मिलता है। बृहत्त्रयी में कर्णरोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नेत्ररोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्रणशोधन आदि के लिए दारुहल्दी का प्रयोग मिलता है। चरक संहिता के अर्शघ्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कण्डुघ्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेखनीय गणों में तथा सुश्रुत संहिता के हल्दीदि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुस्तादि और लाक्षादि गणों में इसकी गणना की गई है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/haldi.jpg" alt="haldi"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दारुहल्दी की तीन प्रजातियों </span>Berberis aristata DC., Berberis lycium Royle,<span lang="hi" xml:lang="hi"> का प्रयोग चिकित्सा के लिए किया जाता है। उनमें से मुख्यत: </span>Berberis aristata DC.<span lang="hi" xml:lang="hi"> (दारुहल्दी) का प्रयोग चिकित्सा के लिए किया जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बाह्यस्वरूप</span></strong></span>    </h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दारुहल्दी </span>Berberis aristata DC. Tree turmeric</strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दारुहल्दी का </span>2-6<span lang="hi" xml:lang="hi"> मी. ऊँचा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सीधा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिकना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुवर्षायु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काँटेदार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विस्तृत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर्णपाती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">झाड़ीदार क्षुप होता है। इसका काण्ड श्वेताभ अथवा पाण्डुर-पीताभ वर्ण का होता है। इसके तने की छाल पाण्डुर भूरे वर्ण की एवं कदाचित् गहरे खाँचयुक्त तथा खुरदरी होती है। काँटे छोटे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीर्ष की ओर एकल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आधार पर </span>2-3<span lang="hi" xml:lang="hi"> भागों में विभाजित होते हैं। इसके पत्र सरल</span>, 3.8-10<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी. लम्बे एवं </span>1.5-3.3<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी. व्यास के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चर्मवत्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूक्ष्म शिरायुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीक्ष्ण काँटों से युक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीचे वाले पृष्ठ पर हल्के हरे रंग के होते हैं। पुष्प बृहत् चमकीले पीत वर्ण के होते हैं। इसके फल </span>7-10<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिमी. लम्बे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मांसल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अण्डाकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बैंगनी अथवा रक्त वर्ण के चमकीले होतेे हैं। इसकी मूल पीताभ-बादामीवर्णी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नलिकाकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्रंथियुक्त तथा लम्बी होती है। एक वर्ष पुरानी मूल पीताभ-भूरे वर्ण की होती है। इसकी मूल को पानी में उबालने के बाद भी इसका पीलापन बना रहता है। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल अगस्त से फरवरी तक होता है।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>Berberis lycium Royle (Boxthorn Barberry)</strong></span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> इसका सीधा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कठोर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सदाहरित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काँटेदार </span>1.8-2.4<span lang="hi" xml:lang="hi"> मी. ऊँचा क्षुप होता है। इसका काण्ड पाण्डुर-पीताभ-अरोमश अथवा सूक्ष्म रोमश होता है। इसके तने की छाल खुरदरी एवं कदाचित् गहरे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खातयुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वेत वर्ण की होती है। इसके पत्र लगभग वृंतहीन</span>, 3.8-6.2<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी. लम्बे</span>, 0.8-1.2<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी. चौड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भालाकार तथा दंतुर होते हैं। पत्रों का ऊपर वाला पृष्ठ चमकीले हरित वर्ण का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीचे वाला पृष्ठ पाण्डुर एवं चमकीला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विरल सिरायुक्त होता है। इसके फल काले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीले अथवा गहरे-नीलाभ वर्ण के सरस होते हैं। इसका पुष्पकाल मार्च से अप्रैल तथा फलकाल मई से जुलाई तक होता है।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span style="color:rgb(22,145,121);"> Berberis asiatica Roxb. ex DC.</span></strong></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;">  <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका सीधा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थूल शाखित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छोटा काँटेदार क्षुप होता है। इसका काण्ड </span>1.2-3.5<span lang="hi" xml:lang="hi"> मी. ऊँचा होता है। इसके तने की छाल खुरदरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खांचयुक्त एवं कदाचित् कागीय होती है। इसके पत्र </span>2.5-7.5<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी. लम्बे एवं </span>1.3-3.8<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी. चौड़े तथा अत्यधिक स्थूल-चर्मिल होते हैं। पत्रों का नीचे वाला पृष्ठ गहरे हरित वर्ण का तथा ऊपर वाला पृष्ठ चमकीला होता है। पुष्प कदाचित् छोटे </span>2.8<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिमी. व्यास के होते हैं। इसके फल </span>7-10<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिमी. लम्बे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अण्डाकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तवर्णी अथवा कृष्ण नील वर्णी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चमकीले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरस होते हैं। इसका पुष्पकाल मार्च से अप्रैल तथा फलकाल मई से जून तक होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">द्यरसांजन (रसौत): दारुहल्दी </span>(Berberis)</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">aristata DC.) <span lang="hi" xml:lang="hi">के मूलभाग तथा उससे संलग्न काण्ड के निम्न भाग से रसक्रिया विधि द्वारा प्राप्त कृष्णाभ भूरे वर्ण का मृदु सार भाग जल तथा मद्य में आसानी से घुलने वाला होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">निर्माण</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">विधि</span><span lang="hi" xml:lang="hi">:</span></strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षा ऋतु के अंत में मूल एवं निचले काण्ड भाग को सोलह गुना जल में चतुर्थांश अवशिष्ट क्वाथ बना कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्वाथ में समभाग बकरी या गाय का दूध मिला कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कम आँच में पकाते हुए गाढ़ा करके प्राप्त घन द्रव्य को रसांजन या रसौत कहते हैं। इसे धूप में सुखा कर संग्रह करते हैं।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेदीय गुण-कर्म एवं प्रभाव</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">दारुहल्दी रस तिक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कषाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कटु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उष्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लघु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रुक्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कफपित्तशामक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्तन्य विशोधक तथा दोषपाचक  होती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यह व्रण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्णरोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुखरोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नेत्ररोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कण्डू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विसर्प</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचा रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विष तथा कफाभिष्यंद नाशक होती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसका क्वाथ तीक्ष्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कटु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रसायन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छेदन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उष्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चक्षुष्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कफशामक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वृष्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तपित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आमातिसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छर्दि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिक्का तथा श्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्तन्यदोष तथा आढ्यवातशामक होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यह सूक्ष्म जीवाणुनाशक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उच्चरक्तदाबरोधी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृद्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्तववर्धक तथा पित्तस्रावक होती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके सरस फल विरेचक तथा स्कर्वी रोधी (्रठ्ठह्लद्ब-ह्यष्शह्म्ड्ढह्वह्लद्बष्) होते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसकी जड़ की छाल त्वचा विकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अतिसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कामला तथा नेत्ररोग शामक होती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यह अल्परक्तशर्कराकारक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वर नाशक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अल्परक्तदाबकारक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शोथहर एवं केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र अवसादक क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसकी छाल का सार परखनलीय एवं जैविकीय परीक्षण में अतिसाररोधी क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसका एल्कोहॉलिक एवं जलीय सार बकरियों में व्रणरोपण क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके फलों का अपरिष्कृत सार पेरॉसिटामॉल एवं कार्बन टेट्राक्लोराइड प्रेरित यकृत् विषाक्तता में यकृत् रक्षात्मक क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसका जलीय एल्कोहॉलिक सार सूक्ष्म जीवाणुरोधी क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके तने का मेथेनॉलिक सार एम.सी.एफ. </span>7<span lang="hi" xml:lang="hi"> स्तन कैंसर कोशिका रेखा के प्रति शक्तिशाली कोशिकाविषी क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यह डिम्बग्रन्थि- उच्छेदित चूहों में अस्थिसुषिरावरोधी प्रभाव प्रदर्शित करता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>Berberis asiatica Roxb. ex DC.</strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसकी काण्ड आमवातरोधी होती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसकी मूल कैंसर रोधी होती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसका पञ्चांग आंत्रजन्य पूय शामक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कटु तथा आमाशयरसवर्धक होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसकी मूल अर्बुदरोधी (Antitumor) क्रियाशीलता प्रदर्शित करती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यह नवोत्पादित गाँठ में गाँठवृद्धिरोधक (Antineoplastic) क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके शुष्क वायवीय भागों का मेथेनॉलिक सार यकृत् रक्षात्मक एवं अनॉक्सीकारक प्रभाव प्रदर्शित करता है। </span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>Berberis lycium Royle-</strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यह जीवाणुनाशक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शोथहर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कटु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आमाशयरसवर्धक तथा गाँठरोधी होती है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें उपस्थित क्षाराभ बर्बेरिन जीवाणुरोधी एवं शोथरोधी क्रियाशीलता प्रदर्शिता करता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">मूल ज्वरघ्न क्रियाशीलता प्रदर्शिता करता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके मूल का मेथेनॉल सार चूहों में प्रभावी व्रणरोपण क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके मूल का ऐथेनॉल एवं जलीय अपरिष्कृत सार सूक्ष्मजीवाणुरोधी क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">रसांजन (रसौत): कटु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिक्त तथा उष्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लघु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीक्ष्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कफवातशामक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्रणरोपण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रसायन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छेदन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चक्षुष्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वृष्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वण्र्य तथा व्रण्य होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यह श्लेष्मरोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विष प्रभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नेत्रविकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तपित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छर्दि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिक्का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास तथा मुखरोगनाशक होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">औषधीय प्रयोग</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नेत्र</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>50<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम दारुहल्दी कल्क का </span>16<span lang="hi" xml:lang="hi"> गुना जल में अष्टमांश शेष क्वाथ बनाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शहद मिला कर नेत्रों का सिंचन करने से नेत्ररोगों का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">दारुहल्दी तथा पुण्डेरिया की त्वचा के क्वाथ को वस्त्र से अच्छी तरह छानकर आँखों में बूँद-बूँद कर डालने से नेत्र रोगों में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">रसांजन को नेत्रों में लगाने से नेत्ररोगों में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसकी जड़ की छाल से प्राप्त सत् को नेत्रों में लगाने से नेत्ररोगों में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">मधु और रसौत से निर्मित अञ्जन का प्रयोग करने से सिराहर्ष नामक नेत्र रोगों में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अर्जुन-</strong> रसौत तथा मधु से निर्मित अञ्जन का प्रयोग करने से अर्जुन रोग में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अंजननामिका- </span></strong>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> भाग रसांजन तथा </span>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> भाग त्रिकटु को मिलाकर </span>250<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिग्रा की गोलियाँ बना कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जल में घिसकर अंजन करने से खुजली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाक आदि लक्षण युक्त अंजननामिका रोग का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>रतौंधी-</strong> रसांजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दारुहल्दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हल्दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चमेली और नीम की पत्तियों को गोमय रस (गोबर का पानी) में पीसकर वर्ति (बाती) बनाकर जल में घिसकर अंजन करने से रतौंधी में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अभिष्यंदादि रोग-</strong> समभाग हरीतकी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेंधानमक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गैरिक तथा रसांजन का लेप बनाकर पलकों पर लेप करने से अभिष्यंद आदि नेत्ररोगों में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कर्ण रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कर्णस्राव</span><span lang="hi" xml:lang="hi">- </span><span lang="hi" xml:lang="hi">रसौत</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">स्त्रीदुग्ध</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">घिसकर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मधु</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मिलाकर</span> 1-2<span lang="hi" xml:lang="hi"> बूंद कान में डालने से करने से बहुत पुराने स्रावयुक्त पूतिकर्ण में भी लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नासा रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span style="color:rgb(22,145,121);"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिश्याय</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> (</span><span lang="hi" xml:lang="hi">जुकाम</span><span lang="hi" xml:lang="hi">)-</span></span></strong></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">दारुहल्दी की छाल के कल्क की वर्ति बना कर यथा विधि धूम्रपान करने से प्रतिश्याय का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">रसौत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अतिविषा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नागरमोथा तथा देवदारु के कल्क से विधिवत् सिद्ध तैल का (</span>1-2<span lang="hi" xml:lang="hi"> बूंद) नस्य लेने से प्रतिश्याय में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मुख रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">दारुहल्दी क्वाथ से रसांजन बना कर मधु के साथ खाने तथा लेप के रूप में प्रयोग करने से मुख रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्त विकार तथा नाड़ी व्रण का शमन होत</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">मुखपाक- चमेली पत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्रिफला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जवासा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दारुहल्दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुडूची तथा द्राक्षा इन औषधियों से निर्मित क्वाथ (</span>10-30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली) में शहद मिलाकर पीने से मुखपाक में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उदर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दाव्र्यादि क्वाथ (</span>10-30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली) में </span>6<span lang="hi" xml:lang="hi"> माशा मधु मिलाकर पान करने से समस्त उदर रोगों में लाभ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">यकृत् व प्लीहा रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कामला- </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम दार्वीघृत (</span>1-5<span lang="hi" xml:lang="hi"> लीटर गोमूत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दारुहल्दी तथा कालीयक कल्क से सिद्ध </span>750<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम भैंस का घृत (घी) का सेवन करने से कामला में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रात:काल दारुहल्दी स्वरस (</span>5-10<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली) या क्वाथ (</span>10-30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली) में मधु मिलाकर सेवन करने से पाण्डु तथा कामला रोग का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यकृत् व प्लीहा वृद्धि- दारुहल्दी की मूल की छाल से निर्मित फाण्ट (</span>10-30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली) को पीने से यकृत् तथा प्लीहा वृद्धि का उपशमन होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वृक्कवस्ति रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>प्रमेह-</strong> 10-30</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली दारुहल्दी क्वाथ को मधु के साथ नियमित सेवन करने से प्रमेह रोग में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>पिष्टमेह</strong>- हल्दी और दारुहल्दी का क्वाथ बनाकर (</span>10-30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली) मात्रा में पीने से पिष्टमेह में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>मूत्रकृ च्छ्र- </strong>दारुहल्दी के चूर्ण को मधु के साथ सेवन करके अनुपान रूप में आँवले का रस पीने से पैत्तिक मूत्रकृ च्छ्र में शीघ्र लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजननसंस्थान रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>वृद्धि</strong>- दारुहल्दी के कल्क (</span>2-4<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम) को गोमूत्र के साथ सेवन करने से कफज वृद्धि रोग का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>उपदंश-</strong> रसौत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिरीष त्वचा तथा हरीतकी के सूक्ष्म चूर्ण (</span>1-4<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम) में मधु मिलाकर उपदंश जनित व्रण पर लेप लगाने से व्रण का शीघ्र रोपण होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>असृग्दर-</strong> दाव्र्यादि क्वाथ (</span>10-30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली) में मधु मिलाकर अथवा रसांजन एवं चौलाई की जड़ के कल्क में मधु मिला कर चावल के धोवन के साथ पीने से सर्वदोषोत्पन्न असृग्दर का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>प्रदर रोग-</strong> दारुहल्दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रसांजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नागरमोथा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वासा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिरायता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भल्लातक तथा काला तिल से निर्मित क्वाथ (</span>10-30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली) में मधु मिलाकर पीने से प्रदर रोग में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">रसौत एवं चौलाई की जड़ से निर्मित कल्क में मधु मिलाकर चावल के धोवन के साथ पीने से सभी दोषों से उत्पन्न प्रदर में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदर रोग तथा सभी उदर रोग-</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">दारुहल्दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रसांजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नागरमोथा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भल्लातक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिल्वमज्जा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वासा पत्र और चिरायता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन द्रव्यों से निर्मित क्वाथ में </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> चम्मच मधु मिलाकर पीने से गर्भाशयिक अन्त:शोथ जन्य प्रदर तथा सभी उदररोगों में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>पूयमेह-</strong>  दारुहल्दी के तने की छाल के क्वाथ में हल्दी मिलाकर लगाने से पूयमेह में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>रक्तप्रदर-</strong> रसौत को बकरी के दूध के साथ सेवन करने से रक्तप्रदर में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>रक्तार्श-</strong> रसौत को रातभर पानी में भिगोकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छानकर घनीभूत करके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें चतुर्थांश छाया में सुखाए हुए नीम के पत्तों का सूक्ष्म चूर्ण मिलाकर </span>250<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिग्रा. की गोलियां बना कर सेवन करने से अर्श में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> दारुहल्दी की छाल के कल्क से सिद्ध तैल को लगाने से व्रण का शोधन तथा रोपण होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">दारुहल्दी के कल्क (</span>2-4<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम) को गोमूत्र के अनुपान के साथ सेवन करने से कुष्ठ में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">दारुहल्दी के क्वाथ से निर्मित रसाञ्जन तथा इससे सिद्ध तेल तथा घृत का लेप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्वर्तन तथा अवचूर्णन की तरह प्रयोग करने से कुष्ठ में अत्यन्त लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">समभाग दारुहल्दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खैर तथा नीम की छाल के क्वाथ (</span>10-30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली.) को नियमित रूप से पीने से सभी प्रकार के कुष्ठ में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">रसौत से सिद्ध तेल तथा घृत का प्रयोग स्नान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रघर्षण तथा अवचूर्णन आदि के लिए करने से कुष्ठ का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>10-12<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम रसौत को </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> मास तक </span>15-20<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली. गोमूत्र में घोल कर पीने से तथा शरीर पर लेप करने से कुष्ठ में शीघ्र लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>नाड़ीव्रण-</strong> रसौत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हल्दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दारुहल्दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मंजीठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीम के पत्ते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निशोथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेजोवती और दन्ती से निर्मित कल्क का लेप करने से नाडीव्रण का शोधन होकर शीघ्र रोपण होता हैै।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>रोमसंजननार्थ-</strong> हाथी दाँत की भस्म तथा शुद्ध रसांजन का लेप करने से रोमसंजनन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>विसर्प- </strong>दारुहल्दी की छाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वायविडंग तथा कम्पिल्लक के क्वाथ तथा कल्क से सिद्ध तेल का प्रयोग दाह एवं दाह युक्त विसर्पजन्य के रोपण के लिए हितकर होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>सिध्म-</strong> दारुहल्दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूलीबीज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरताल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देवदारु तथा पान के पत्ते को समभाग लेकर चौथाई भाग शंखचूर्ण मिलाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जल में पीसकर लेप करने से सिध्म रोग का शमन होने लगता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>व्रण-</strong> दारुहल्दी की मूल छाल को पीसकर लगाने से व्रण का रोपण होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>शोथ (सूजन)-</strong> दारुहल्दी की मूल कल्क में अ</span>$<span lang="hi" xml:lang="hi">फीम तथा सैंधव लवण मिलाकर लेप करने से शोथ का शमन होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वशरीर रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>मोटापा-</strong> मोटापे में रसांजन का प्रयोग करना श्रेष्ठ है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अरणी की छाल के क्वाथ के साथ </span>1-2<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम रसांजन को दीर्घकाल तक सेवन करने से मोटापे का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विषम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वर</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>-</strong> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दारुहल्दी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मूल</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">छाल</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्मित</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">फाण्ट</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> (</span>10-20<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली.) का सेवन करने से विषम ज्वर में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बाल रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली. कूष्माण्ड फ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ल</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वरस</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दारुहल्दी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> (</span><span lang="hi" xml:lang="hi">पुष्य</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नक्षत्र</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">संगृहीत</span><span lang="hi" xml:lang="hi">) </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">छाल</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">महीन</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">घिस</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आँखों</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अंजन</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">करने</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्रहोपद्रव</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्त</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">होते</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>ग्रहबाधा (अहिपूतना)-</strong> पित्त तथा कफ दोष नाशक द्रव्यों से सिद्ध </span>15-25<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली. जल में </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम मधु तथा </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम शुद्ध रसौत मिलाकर धात्री को पिलाने से तथा लेप बना कर शिशु के गुदा प्रदेश एवं व्रण पर लेप करने से शीघ्र रोग का निवारण होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">शिशु को गुदपाक हो तो रसौत को जल या दूध में पीसकर गुदा में लेप करने से शीघ्र लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विष चिकित्सा</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">हल्दी एवं दारुहल्दी का विविध प्रयोग सर्पविष में श्रेष्ठ है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">दारुहल्दी आदि द्रव्यों से निर्मित गौराद्य घृत का प्रयोग लूताविष तथा अन्य कीटविष जन्य व्रणों की चिकित्सा में किया जाता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विषाक्तता</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जलीय सुरा सत् </span>(50%) (Aq.alcoholic (50%) extract) dh 200 mg/kg<span lang="hi" xml:lang="hi"> की </span>200 mg/kg<span lang="hi" xml:lang="hi"> शरीर भार मात्रा का अन्त: प्रयोग चूहों में मारक होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बर्बेरिन सल्फेट </span>(Berberinsulphate)<span lang="hi" xml:lang="hi"> की </span>24.3 mg/kg<span lang="hi" xml:lang="hi"> शरीर भार मात्रा का अन्त: प्रयोग चूहों में मारक होता है।</span></h5>
</li>
</ul>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पोषक उत्पाद</category>
                                            <category>2018</category>
                                            <category>नवम्बर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2174/netra--prajanan-sansthan-v-tvacha-rog-nivarak-ayurvrdic-ghatak-daruhaldi</link>
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                <pubDate>Thu, 01 Nov 2018 21:53:26 +0530</pubDate>
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