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                <title>संन्यासी की उच्चावस्था - योग संदेश</title>
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                <description>संन्यासी की उच्चावस्था RSS Feed</description>
                
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                <title>मत्त: सर्वभूतेभ्योऽभयमस्त</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सन्यास</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आश्रम में दीक्षित होते समय सर्वस्वत्याग की प्रक्रिया में व्यक्ति को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">एकै साधे सब सधे</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इस नियम के अनुसार इस </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की ही आहुति देनी होती है। क्योंकि का आशय है त्याग। तो प्रश्न उठता है कि त्याग किसका</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ऋषियों ने कहा अपने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का अर्थात् अपने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का। दूसरे शब्दों में कि हम सांसारिक वस्तुओं को आवश्यकतानुसार प्राप्त करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर उन वस्तुओं में आसक्त न हों। उनके साधन भाव को दृष्टि से ओझल न होने दें और सतर्क रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कि कहीं</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2298/mattah-sarvbhutebhyobhayamasya"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/447.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सन्यास</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आश्रम में दीक्षित होते समय सर्वस्वत्याग की प्रक्रिया में व्यक्ति को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">एकै साधे सब सधे</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इस नियम के अनुसार इस </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की ही आहुति देनी होती है। क्योंकि का आशय है त्याग। तो प्रश्न उठता है कि त्याग किसका</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ऋषियों ने कहा अपने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का अर्थात् अपने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का। दूसरे शब्दों में कि हम सांसारिक वस्तुओं को आवश्यकतानुसार प्राप्त करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर उन वस्तुओं में आसक्त न हों। उनके साधन भाव को दृष्टि से ओझल न होने दें और सतर्क रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कि कहीं साधन साध्य न बन जाये। जबकि होना यह चाहिए कि उन वस्तुओं को जो कुछ प्राप्त हुआ या प्राप्त होता है अथवा जो कुछ प्राप्त किया या प्राप्त करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम उस सबका प्रभु के चरणों में समर्पण करते रहें। पदार्थों व क्रियाओं के न्यासी (ट्रस्टी) बनकर रहें न कि उनके मालिक। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अस्मिता</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की अपने अन्दर ग्रन्थी न बनने दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि प्रिय वस्तु भी छूटे तो हमारे हृदय-समुद्र में दु:ख की छोटी सी भी लहर पैदा न होने पाए। किसी वस्तु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति या विचार के साथ सम्बन्धित होने या न होने में एकसम बने रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साक्षी (</span>Witness<span lang="hi" xml:lang="hi">) या उदासीन (</span>Indifferent<span lang="hi" xml:lang="hi">) तटस्थ द्रष्टा (</span>Seer<span lang="hi" xml:lang="hi">) बने रहें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज विश्व शांति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व सृजन व विश्व निर्माण के लिए संपूर्ण दिशा में ऐसी ही गूंज की जरूरत है। हम भी समय की पुकार सुनें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सं</span><span lang="hi" xml:lang="hi">न्यास आश्रम में दीक्षित होते समय सर्वस्वत्याग की प्रक्रिया में व्यक्ति को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">एकै साधे सब सधे’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इस नियम के अनुसार इस </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहम्’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की ही आहुति देनी होती है। क्योंकि का आशय है त्याग। तो प्रश्न उठता है कि त्याग किसका</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ऋषियों ने कहा अपने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहम्’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का अर्थात् अपने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का। दूसरे शब्दों में कि हम सांसारिक वस्तुओं को आवश्यकतानुसार प्राप्त करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर उन वस्तुओं में आसक्त न हों। उनके साधन भाव को दृष्टि से ओझल न होने दें और सतर्क रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कि कहीं साधन साध्य न बन जाये। जबकि होना यह चाहिए कि उन वस्तुओं को जो कुछ प्राप्त हुआ या प्राप्त होता है अथवा जो कुछ प्राप्त किया या प्राप्त करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम उस सबका प्रभु के चरणों में समर्पण करते रहें। पदार्थों व क्रियाओं के न्यासी (ट्रस्टी) बनकर रहें न कि उनके मालिक। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अहम्’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अस्मिता’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की अपने अन्दर ग्रन्थी न बनने दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि प्रिय वस्तु भी छूटे तो हमारे हृदय-समुद्र में दु:ख की छोटी सी भी लहर पैदा न होने पाए। किसी वस्तु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति या विचार के साथ सम्बन्धित होने या न होने में एकसम बने रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साक्षी (</span>Witness<span lang="hi" xml:lang="hi">) या उदासीन (</span>Indifferent<span lang="hi" xml:lang="hi">) तटस्थ द्रष्टा (</span>Seer<span lang="hi" xml:lang="hi">) बने रहें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अथर्ववेद के एक मन्त्र में कहा गया है- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्तां पावमानी द्विजानाम्। आयु:</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजां पशुं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कीर्तिं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्रविणं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मवर्चसं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मह्यं दत्त्वा व्रजत ब्रह्मलोकम्’। (१९.७१.१) इस मन्त्र में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मया’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मह्यम्’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के द्वारा एक ही सत्य का संकेत हुआ है। आयु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पशु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कीर्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्रविण (धन)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मवर्चस (ब्रह्मतेज अर्थात् ब्रह्म का ज्ञान) ये सब व्यक्ति के द्वारा जीवन में पाने की चीजें हैं। वेदमाता ने प्राप्तव्य चीजों की सूची हमारे समक्ष रखी है और साथ में यह भी कह दिया कि ये सब चीजें अपने पास नहीं रखनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ तक कि ब्रह्मवर्चस भी। क्योंकि अपने पास रखने का अर्थ है- अपने अहं को पुष्ट करना। अर्पित कर देने का अर्थ है- निरहं (निरहङ्कार व निर्मम) हो जाना। इसके अतिरिक्त ब्रह्मलोक में जाने का कोई रास्ता नहीं है। इसीलिए संन्यास धर्म में दीक्षित होता हुआ संन्यासी अपने ऊपर ओढ़े हुए सभी लिबासों को उतार देता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कोई क्या छीनेगा</span>?</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो अकेला हो जाता है वही फिर सर्वगत सत्य के साथ एक हो सकता है। और जो साधक अकेला (केवल) होने की कला सीख लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही निर्भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वथा निर्भय रह सकता है। क्योंकि अकेले को कौन डरा सकता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">डरने के लिए तो कुछ पाने की चाह होनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके अतिरिक्त उस चाह में कोई बाधा उपस्थित होने की संभावना दिखाई देने लगे तो भी भय हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु जिसने वस्तु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार और यहाँ तक कि अपने शरीर से भी तादात्म्य हटा लिया हो तो अब उससे कोई क्या छीनेगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">और वह क्यों किसी से बाधित होगा</span>?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य चरक ने भय के कारणों पर विचार करते हुए सूत्ररूप में एक वचन बोला- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">असमर्थता भयकराणाम्’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात भयदायक जितने भी हेतु हो सकते हैं उनमें </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">असामथ्र्य’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृष्टतम है। जो व्यक्ति ज्ञान में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धन में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जनसमर्थन में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्या में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वक्तृता में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुणों में बढ़ा हुआ है वह किसी से क्यों डरेगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">असमर्थ अवस्था में ही व्यक्ति अपने आपको भयभीत पाता है। डायबेटिक व्यक्ति ही मीठे से डरेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ व्यक्ति क्यों डरेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कारण उस विषय में उसकी कमजोरी समाप्त हो गयी है किसी भी विषय में भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कमजोरी को और निर्भयता मजबूती को प्रकट करती है। यदि निर्बल लोगों के समक्ष बलवान् अपनी किसी प्रकार की शक्ति का प्रयोग करे- राजशक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धनशक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पदशक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन्त्रशक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तर्कशक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्याशक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शारीरिक शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन:शक्ति इत्यादि चाहे जो भी हो तो निर्बल व्यक्ति का भयभीत होना स्वाभाविक है कि यह मेरा कुछ छीन लेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा शोषण करेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुझे दबायेगा। पर संन्यासी का कोई क्या छीनेगा जिसका अपना कहा जाने योग्य कुछ है ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ बचा ही नहीं। संन्यासी ऐसा व्यक्तित्व है जो समस्त परिग्रह का त्याग कर सर्वथा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अपरिग्रही’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हो गया है तथा आगे के लिये भी वस्तु-व्यक्ति-विचार के संग्रह को स्थान नहीं देना चाहता।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयं समीक्षक बनें:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो व्यक्ति लौकिक स्तर पर कहीं खड़ा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह दूसरे किसी भी अपने से आगे निकल जाने में अपनी हानि देखता है। लोक का व्यवहार भी है कि कोई भी व्यक्ति अपने को पीछे नहीं देखना चाहता है। लोक का यह संघर्ष सर्वजनविदित है और सर्वजनसंवेद्य है। लौकिक व्यक्ति यही चाहता है- कि पुत्र से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिष्य से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धन से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पद से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिष्ठा से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति से मेरे ही नाम का सिक्का चले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं सबसे विशेष समझा जाऊँ। किसी भी उपाय से या शिष्ट सम्मत उपायों से मैं सबसे आगे निकलूँ। सबसे आगे निकलने में उसे सर्वातिशायी प्रसन्नता की अनुभूति होती है। जबकि संन्यासी अपनी इच्छा से संसार की इस दौड़ से अपने आपको अलग कर रहा होता है। वह सबको अभयदान दे रहा होता है कि ऐ संसार के लोगों! मैं अब आप लोगों की किसी प्रकार की हानि नहीं करूँगा। मैं आप लोगों के साथ किसी भी स्पर्धा में भाग नहीं लूँगा। संन्यास (त्याग) एक ऐसी इच्छा मुक्त पूर्ण स्थिति है कि इसमें दूसरों के समक्ष अपने आप को प्रमाणित करना नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल स्वयं ही अपने द्वारा अपना आकलन करते हुए अपने ऊपर कार्य करना होता है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-09/456.jpg" alt="45"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भय रहित हों:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीमद्भगवद्गीता में सदा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अभय’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रहना एक दैवी सम्पत्ति कहा गया है। भगवान् के भक्त के स्वरूप का चित्रण करते हुए कहा गया  कि  </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च य:’। (१२.१५) अर्थात् भगवान् के भक्त का एक प्रमुख लक्षण यह है कि उससे कोई भयभीत नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि दूसरों के जीवन में उसने व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप करना छोड़ दिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरों के साथ उसकी स्पर्धा समाप्त हो गयी है। जैसे किसी प्रसिद्ध खिलाड़ी ने खेल से संन्यास ले लिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब उसके साथी उससे क्यों भयभीत होंगे या एक उच्चकोटि के राजनेता ने राजनीति से अपने को मुक्त कर लिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो प्रतिष्पर्धी उसके साथी उससे तत्काल निर्भय हो जाते हैं। एक उद्योगपति उद्योग जगत् से मुक्त होकर संन्यासी बन जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो पहले जो उसके साथी उससे भयभीत रहते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे सब अब भय मुक्त हो जाते हैं। किसी चुनाव में एक सीट के लिये पाँच उम्मीदवार हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब एक दूसरे से भयभीत रहते हैं। उनमें से अपनी इच्छा से कोई एक या दो अपने को उस दौड़ से वापस कर लेते हैं तो withdraw वाले से अन्य सब निर्भय हो जाते हैं। इसी प्रकार वह स्वयं भी किसी से भयभीत नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि वह किसी भी प्रकार के सुख की अपेक्षा नहीं रखता। सुख की चाह के साथ भय सदा ही अविनाश भाव रूप से सम्बद्ध रहता है। इसके विपरीत मनुष्य के अन्दर जितना-जितना ज्ञान बढ़ता जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके अनुपात में ही उसमें लेने का भाव कम और देने का भाव अधिक होता जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संन्यासी की उच्चावस्था:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि विचार किया जाये कि मनुष्य दूसरों के लिये या अपने ही साथी भाइयों के लिए क्या-क्या दे सकता है तो बहुत सारी चीजें गिनाई जा सकती हैं- धन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके कार्यों का समर्थन (एक प्रकार का प्रोत्साहन)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा-संस्कार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पथ-प्रदर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समयदान और अभयदान। इन सभी को देने का अपना-अपना महत्त्व है। कुछ दानों में पदार्थ दिया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ में ज्ञान और कुछ में भाव। अभयदान एक उच्चकोटि का भाव है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका दान करने के लिए न पदार्थ की आवश्यकता होती है न समय की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल मन का एक विशेष भाव बनाना होता है। संन्यास दीक्षा में इसी उच्च भाव को सब प्राणियों तक फैलाने की बात कही गई है। यही संन्यासी की परम स्थिति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका फल है </span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>''</strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>मत्त: सर्वभूतेभ्योऽभयमस्तु’’</strong></span>। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वास्तम में एक सामान्य व्यक्ति भी जब संकल्पित होता है कि न तो मैं किसी भी विषय में किसी के साथ स्पर्धा के भाव में जीऊँगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न किसी की सत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पत्ति या सम्मान में बाधा डालूँगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्येक विषय में अपने लिए दूसरों से निरपेक्ष रहूँगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अचाह रहूँगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल जिज्ञासुओं की या दु:खियों की अपनी सम्पूर्ण सामथ्र्य से सेवा करता रहूँगा इत्यादि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसका भी यह संन्यास भाव की दिशा में प्रयास ही कहा जायेगा। आज विश्व शांति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व सृजन व विश्व निर्माण के लिए संपूर्ण दिशा में ऐसी ही गूंज की जरूरत है। हम भी समय की पुकार सुनें।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>जनवरी</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Jan 2017 21:42:07 +0530</pubDate>
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