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                <title>अपने दोष छोड़कर दूसरों के दोष ग्रहण करना - योग संदेश</title>
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                <description>अपने दोष छोड़कर दूसरों के दोष ग्रहण करना RSS Feed</description>
                
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                <title>सतां संगो हि भेषजम्</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2346/satam-sango-hi-bheshjam"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/517.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संसार </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में जब दो व्यक्ति साथ-साथ रहते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या परस्पर मिलते रहते हैं तो स्वाभाविक रूप से उनके गुण-दोषों का शनै:-शनै: एक दूसरे पर प्रभाव पडऩे लगता है। उनकी वाणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका आचरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी मान्यताएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिन्तन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभिरुचियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी विशेषताएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वभाव अज्ञातरूप से एक-दूसरे को अपने अनुरूप गढऩे लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभावित करता रहता है। स्पष्ट ही जिसकी योग्यता जितनी अधिक होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका ज्ञान का स्तर जितना उच्च होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी साधना जितनी गहरी होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी शक्ति जितनी अधिक होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो जितना सजग व जागरूक होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो जितना निभ्र्रान्त होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी दृष्टि को जिसने जितना परिष्कृत कर लिया होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो जितना संदेह रहित होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह उसी अनुपात में अपने से कम या अवर को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने से नीचे खड़े हुये को ऊपर खींचता रहता है। श्रेष्ठ आचार्य अपने विद्यार्थियों का इसी पद्धति से निर्माण करते हैं। किन्तु जहाँ ऐसा आदर्श व्यक्तित्व नहीं होता और सामान्य रूप से लगभग समान स्तर के ही दो व्यक्ति मिलते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वे भी एक-दूसरे से प्रभावित होने लगते हैं। ऐसे में चञ्चल के सम्पर्क से शान्त प्रकृति वाला व्यक्ति भी अशान्त हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कभी शान्त के सम्पर्क से चञ्चल भी शान्त रहने लगता है। इसी प्रकार पुरुषार्थी के सम्पर्क से आलसी पुरुषार्थी हो जाता है। दूसरे शब्दों में दोनों में जिसकी शक्ति ज्यादा होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह अपने से कम शक्ति वाले को अपने अनुरूप ढाल ही लेता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">व्य</span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्तित्व विश्लेषकों का मत है कि एक व्यक्ति के दूसरे व्यक्ति के साथ सम्पर्क में आने पर गुणों व दोषों दोनों क्षेत्रों में तीन स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गुणों के सन्दर्भ में: </span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उच्</span><span lang="hi" xml:lang="hi">चतम स्थिति:</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> इसके तहत व्यक्ति अपने गुणों को छोड़ता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर दूसरे के गुणों को ग्रहण कर लेता है। जैसे एक व्यक्ति विद्याप्रेमी तो है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर शरीर से पुरुषार्थी नहीं है। उसे शरीर से श्रम करने में रुचि लेने वाला एक साथी मिल जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके सम्पर्क से वह धीरे-धीरे परिश्रमी भी हो जाता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार कोई व्यक्ति किसी एक महापुरुष या कसी एक ही शास्त्र से बँधा हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर वह किसी ऐसे व्यक्ति के सम्पर्क में आता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सभी शास्त्रों के सत्य का आदर करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो धीरे-धीरे वह भी इसी दृष्टि से सम्पन्न हो जाता है। किसी वैयाकरणी के सम्पर्क से दार्शनिक वैयाकरणी हो जाता है और दार्शनिक के सान्निध्य में वैयाकरणी दार्शनिक हो जाता है। इसी प्रकार कोई विचारक किसी सन्त के संग से सन्त हो जाता है। एक व्यायामशील व्यक्ति किसी स्वाध्यायशील के सम्पर्क में आने से स्वाध्याय करने लगता है। ऐसे ही एक कठोर सत्य बोलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा मधुरभाषी है। कटु सत्य बोलने वाला मधुरभाषी के सम्पर्क से मधुर सत्य अर्थात् सत्य को मधुर बोलना प्रारम्भ कर देता है। एक बहुत परिश्रमी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु समय का पालन करने में बहुत लापरवाह है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा समय पालन में बहुत सावधान (क्कह्वठ्ठष्ह्लह्वड्डद्य) है। परिश्रमी व्यक्ति समय पालक के सम्पर्क में आने से समय पालन के गुण को भी सीख लेता है।</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मध्यम स्थिति:</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> इस स्थिति में व्यक्ति अन्य के गुणों को ग्रहण कर लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु अपने गुणों को छोड़ देता है। जैसे एक व्यक्ति गीता का पाठ करता था। यह एक ऐसे व्यक्ति के सम्पर्क में आया जो अंग्रेजी का विद्वान् था। अब इसने गीता पाठ छोड़ दिया और अंग्रेजी पढऩे लगा। इसी प्रकार- एक व्यक्ति बच्चों को नि:शुल्क पढ़ाता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा व्यक्ति बड़ा दानशील था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कमा-कमा कर दूसरों में खूब साधन-सम्पत्ति बाँटता रहता था। अब पहले व्यक्ति ने अपना नि:शुल्क पढ़ाने का काम छोड़कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धन-दान करना आरम्भ कर दिया। एक व्यक्ति विद्वान् होते हुये भी मौन साधना में लीन रहता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा पढ़ाने में लगा रहता था। पर संपर्क में आने से वह पहला भी अपने मौन को छोड़कर पढ़ाने में ही लग गया।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अधम स्थिति:</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> परस्पर गुण परिवर्तन की इस अवस्था में व्यक्ति दूसरे के गुणों को तो ग्रहण नहीं कर पाता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु अपने गुणों को भी छोड़ देता है। जैसे एक व्यक्ति वार्तालाप में बहुत धीमी संयत वाणी से बोलता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा व्यक्ति ऊँची तेज आवाज में बोलता था और बड़ा पुरुषार्थी भी था। इसके सम्पर्क में आने से साथी ने धीमा बोलना तो छोड़ ही दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु पुरुषार्थ को भी नहीं अपनाया। इसी प्रकार एक व्यक्ति मात्र स्वाध्यायशील था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा मात्र दानशील। सानिध्य में आकर उस स्वाध्यायशील ने दूसरे की दानशीलता को तो अपनाया नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु उसकी देखा देखी अपना स्वाध्याय छोड़ बैठा।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उक्त तीनों स्थितियों में सर्वाधिक जरूरत होती है जागरूकता की। अन्यथा अच्छी संगति भी दोषकारी साबित होती है। इसी क्रम में संगति से दुर्गुणों का भी तेजी से आदान-प्रदान होता है। जो सर्वाधिक खतरनाक है। प्रस्तुत है दोषों के संदर्भ में संगति की तीन स्थितियां:-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दोषों के सन्दर्भ में तीन स्थितियाँ: </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अपने दोषों को छोडऩा:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें व्यक्ति अपने दोषों को छोड़ देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु दूसरों के दोषों को ग्रहण नहीं करता। गुणों के प्रसंग में जैसे उत्तम स्थिति मानी जाती है कि व्यक्ति अपने गुणों को छोड़े नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु दूसरे के गुणों को ग्रहण कर ले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार यदि व्यक्ति किसी के सम्पर्क में आकर अपने दोषों को छोड़ दे तथा दूसरे के दोषों को ग्रहण न करे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह उत्तम स्थिति मानी जायेगी। जैसे एक व्यक्ति विनम्र तो है पर लोभी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा व्यक्ति अहंकारी है किन्तु उदार है। अब विनम्र के सम्पर्क से अहंकारी विनम्र हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु उसके समान लोभी नहीं बनता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा उदार के सम्पर्क से लोभी उदार हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु उसके समान अहंकारी नहीं बनता।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(224,62,45);" xml:lang="hi">अपने दोष छोड़कर दूसरों के दोष ग्रहण करना:</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह कि व्यक्ति अपने दोषों को छोड़ दे किन्तु दूसरे के दोषों को ग्रहण कर ले। जैसे एक व्यक्ति कामी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु क्रोधी नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा व्यक्ति क्रोधी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर कामी नहीं है। अब ये दोनों व्यक्ति जब एक दूसरे के सम्पर्क में आते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो क्रोधी अक्रोधी तो हो गया किन्तु साथ में कामी भी हो गया। इसी प्रकार किसी सरल व्यक्तिके सम्पर्क से कोई जटिल व्यक्ति अपनी जटिलता को छोड़ देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु साथ में सरल व्यक्ति के किसी दोष को भी ग्रहण कर लेता है। किसी उदार व्यक्ति के सम्पर्क से लोभी ने अपना लोभ तो छोड़ दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु उदार व्यक्ति के किसी दोष को भी साथ में ग्रहण कर लिया। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अपने व दूसरे दोनों के दोष ग्रहण कर लेना:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस स्थिति में व्यक्ति अपने दोष को तो त्यागता नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु दूसरे के दोष को भी ग्रहण कर लेता है। जैसे एक व्यक्ति अहंकारी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरे किसी लोभी व्यक्ति के सम्पर्क से वह अहंकारी के साथ-साथ लोभी भी हो गया। इसी प्रकार एक  व्यक्ति बहुत स्वार्थी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा व्यक्ति बड़ा असत्यवादी है। पर परस्पर सम्पर्क से स्वार्थी व्यक्ति असत्यवादी भी हो जाता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वास्तव में मानव जीवन में कोई भी व्यक्ति संग के सुप्रभाव-दुष्प्रभाव को जब चाहे व्यापक रूप से देख सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु यह भी है कि कुछ विशेष व्यक्ति सूर्य-किरणों की तरह अच्छे या बुरे के साथ संश्लिष्ट होने पर भी अप्रभावित बने रहते हैं। इसके विपरीत सामान्य जन तो ठीक वायु की तरह होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिस प्रकार वायु ठण्ड के प्रभाव से शीतल और उष्णता के प्रभाव में गर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी सुगन्धित-कभी दुर्गन्धित होती रहती है। साधु पुरुष खल-संगम से खल नहीं बनते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु उनके सम्पर्क से खल साधु बन जाते हैं या बन सकते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उपर्युक्त विश्लेषकों के बीच सत्संगति की आदर्श स्थिति यह है कि व्यक्ति गुणग्राही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुग्राही बन कर रहे। जहाँ कहीं भी कोई विशेष गुण दिखाई दे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे भौंरे या मधुमक्खी की तरह तत्काल ग्रहण कर ले। साथ ही भ्रमर या मधुमक्खी जैसे गंदगी पर नहीं बैठते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे ही व्यक्ति किसी के दुर्गुण या हीन गुण की ओर न जाये। व्यक्ति को मक्खी जैसे स्वभाव वाला तो कभी नहीं होना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो गंदगी पर बैठती रहती है और मिठाई पर भी। जो व्यक्ति सच्चे अर्थों में गुणग्राही या मधुग्राही बनकर जीवन जीते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे निरन्तर उन्नति करते रहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका जीवन सतत परिष्कृत व उज्जवल होता रहता है। आवश्यक बात यही है कि व्यक्ति में ऊँचा उठने की अभीप्सा रूपी आग सदा प्रज्वलित रहनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर अपने आप रास्ता निकलता रहता है। जहाँ गुण और दोष दोनों दिखाई दे रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ व्यक्ति दोषों की उपेक्षा करके केवल गुणों को ही देखे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही व्यक्तित्व का तकाजा है। गुण ग्राहिता का यह कठिन मार्ग अवश्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर इसे सहजता में पाया जा सकता है। क्योंकि सज्जनों की संगति औषधि के समान रोगों-दोषों-दु:खों व तापों को दूर करने वाली होती है। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>सनातन वैभव</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>मार्च</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Mar 2017 21:47:12 +0530</pubDate>
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