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                <title>स्वभाव के सृजन में विचार का महत्त्व - योग संदेश</title>
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                <description>स्वभाव के सृजन में विचार का महत्त्व RSS Feed</description>
                
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                <title>स्वभाव के सृजन में विचार का महत्त्व</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">        कोई व्यक्ति हमारी उम्र या आयु पूछे तो हम 20-30-40 या 50 वर्ष बता देते हैं। लेकिन इस स्थूल शरीर के अन्दर एक सूक्ष्म शरीर भी है उसकी आयु कोई पूछे तो हम सबकी उस शरीर की आयु लगभग 200 करोड़ वर्ष है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि सृष्टि के आदि में परमात्मा ने एक सूक्ष्म शरीर (मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्त व अहंकार) हमें बनाकर दे दिया वही आज पर्यन्त चला आ रहा है और वही आगे के जन्मों में और सभी योनियों में चलता रहेगा। इस शरीर के अतिरिक्त जो हमारा निजी स्वरूप या आत्म स्वरूप है वह तो अनादिकाल से</span></strong></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2435/swabhav-ke-srijan-me-vichar-ka-mahatva"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/391.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">    कोई व्यक्ति हमारी उम्र या आयु पूछे तो हम 20-30-40 या 50 वर्ष बता देते हैं। लेकिन इस स्थूल शरीर के अन्दर एक सूक्ष्म शरीर भी है उसकी आयु कोई पूछे तो हम सबकी उस शरीर की आयु लगभग 200 करोड़ वर्ष है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि सृष्टि के आदि में परमात्मा ने एक सूक्ष्म शरीर (मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्त व अहंकार) हमें बनाकर दे दिया वही आज पर्यन्त चला आ रहा है और वही आगे के जन्मों में और सभी योनियों में चलता रहेगा। इस शरीर के अतिरिक्त जो हमारा निजी स्वरूप या आत्म स्वरूप है वह तो अनादिकाल से वही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज भी वही है और अनन्तकाल तक वही रहेगा। तब प्रश्न उठता है कि यह जीवन क्या है और क्यों है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धेय स्वामी जी महाराज कहते हैं जीवन दो अनादि और अनन्त छोरों के बीच का एक अल्पकाल खण्ड है और वह सूक्ष्म शरीर के सदुपयोग के लिए या कृतकृत्यता के लिए या उसके चरम उद्देश्य को पाने के लिए प्रभु की अहैतुकी कृपा से प्रदान किया गया एक उत्कृष्ट उपहार है। उसी को सरल शब्दों में कहें तो जीवन स्वभाव परिवर्तन का एक सुअवसर है या फिर अपने निजी स्वरूप या स्वभाव में जीने का अभ्यास करने के लिए एक अवसर है।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भूतभावोद्भवकरो विसर्ग: कर्मसंज्ञित:।। (गीता-8/3)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्तव में हमारा सबका मूल स्वभाव तो अध्यात्म ही है। लेकिन वर्तमान में हमारा जो भी स्वभाव है वह कई घटकों से मिलकर बना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें हमारी श्रद्धा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्ठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्साह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रारब्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संकल्प</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपासना और विचार इन सबका एक सामूहिक रूप हमारा स्वभाव है। प्रत्येक तत्व का अपना महत्व है लेकिन इन सबकी अभिव्यक्ति यदि एक जगह देखना चाहें तो वह बन जाता है हमारा कर्म। मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और शरीर से जैसा हम कर्म करते हैं अभ्यासों का वह समूह हमारा स्वभाव बन जाता है। श्रद्धेय स्वामी जी महाराज जीवन की परिभाषा बताते हुए कहते हैं कि </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन कर्म और कर्म का फल है।</span>’’ <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उस कर्म के भी मूल में यदि हम जायें कि हमनें वैसा ही कर्म क्यों किया</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसका कारण है हमारा विचार।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए स्वभाव में यदि परिवर्तन लाना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो सर्वप्रथम विचार को पकड़ना होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह विचार भी एक बीज का काम करता है जिसके अनन्त फल होते हैं। एक फल में कितने बीज हैं यह तो फिर भी गिन सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन एक बीज में कितने फल लगेंगे यह कहना बहुत मुश्किल है। वह बीज चाहे अच्छाई का हो या बुराई का। आपने बीज बोया- योग का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुभक्ति का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रभक्ति का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वास का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस एक विचार रूपी बीज के कितने सात्विक फल जीवन में मिलेंगे आप कल्पना भी नहीं कर सकते। उसी प्रकार यदि आपने बीज बोया- आलस्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रष्टाचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घृणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नफरत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वेष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निन्दा या बुराई का तो वही फल हमारे समक्ष प्रस्तुत हो जायेंगे। जैसे-मेरे संगठन के साथी सब नालायक हैं- सब मुझसे द्वेष करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा उचित सम्मान नहीं करते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा आदेश भी नहीं मानते यदि यह विचार आपने बीज रूप में अपने चित्त में बोया तो उसके बुरे फल तो अपने आप मिलने लग जायेंगे। प्रश्न उठता है कि ये फल हमें कहाँ से मिलते हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इनका मूल स्रोत क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इनका उत्तर है कि अच्छे या बुरे इन सब फलों का मूल स्रोत है वो शाश्वत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुदरत या भगवान् के ऋत नियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शाश्वत नियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य उसे जो भी नाम दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर देने वाला वही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरे तो केवल माध्यम बन जाते हैं। जैसे हमें पानी की प्राप्ति नल से होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन नल उस पानी का मूल स्रोत नहीं है। पानी का मूल स्रोत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस बिल्डिंग में बनी पानी की टंकी और उस टंकी का मूल स्रोत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुंआ और उस कुएं का भी मूल स्रोत है ईश्वर। इसलिए हम अपने दु:ख या सुख का कारण अपने पारिवारिक जनों को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मित्रों को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बोस को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आस-पास वालों को या गुरु को मान लेते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन वास्तव में वे तो नल की भांति एक माध्यम बने हैं। वास्तव में यह फल हमारे अच्छे या बुरे विचार का या धरणा का ही फल है। हमने विचार का जैसा बीज बोया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुदरत ने वैसे ही अनेक फल हमारे समक्ष प्रस्तुत कर दिये। आम का बीज बोया तो आम के फल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नींबू का बीज बोया तो नींबू फल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीम का बीज बोया तो नीम के फल। यह शाश्वत नियम पूरी सृष्टि में काम कर रहा है जैसा बीज-वैसे अनन्त फल। माली या किसान तो केवल निमित्त बन जाते हैं। इस सृष्टि में प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आनन्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्धि-सुख आदि सब कुछ इतना भरपूर और अनन्त है कि उससे लेते-लेते आपका जीवन पूरा हो जायेगा। लेकिन देते-देते उसका स्रोत कभी खाली नहीं होगा। इसी को वेद में कहा- </span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">''<span lang="hi" xml:lang="hi">ऊँ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।  पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="right"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">(बृहदारण्यक-5/1/1)</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो जमीन का टुकड़ा आपके पास है और फल दे रहा है सृष्टि के आदि से वह टुकड़ा न जाने कितने लोगों को फल दे चुका है और आगे भी देता ही रहेगा। स्वामी जी महाराज कहते हैं कि जैसा हमारा विचार है वैसा ही होता है हमारा संसार।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आप सभी भाई-बहन श्रद्धेय स्वामी जी महाराज से प्राणर्पण मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राण आत्मा से बेहद प्रेम व विश्वास करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धा रखते हैं इसका मुख्य कारण यह है कि स्वामी जी महराज का हृदय आपके प्रति अनन्त प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वात्सल्य और अनुग्रह से भरा हुआ है। अत: जैसा बीज वैसा फल।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब हम यह जान चुके हैं कि अपने सकारात्मक या नकारात्मक विचार के माध्यम से वैसे ही वाणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचरण व कर्म के द्वारा अपने भाग्य विधाता हम स्वयं हैं। जीवन की प्रत्येक उपलब्धि के कारक हम स्वयं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अपने विचार को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि को या मन को और अधिक निर्मल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पवित्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सात्विक या विशारद बनाने के लिए हम क्या उपाय कर सकते हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यह विचारणीय है। योग दर्शन के अनुसार-</span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">अभ्यास वैराग्याभ्यां तन्निरोध:</span>’’ <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि अभ्यास और वैराग्य के द्वारा नकारात्मक विचारों को या क्लिष्ट वृत्तियों को रोका जा सकता है। यह अभ्यास है-चित्त की प्रशान्तवाहिता और वैराग्य है-अनासक्ति। इन दोनों साधनों का प्रतिदिन पूर्ण श्रद्धा व पुरुषार्थ से अधिक से अधिक अभ्यास करना श्रेष्ठ परिणाम के लिए अवश्यक है। योगदर्शन में ही अन्यत्र कहा गया- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">निर्विचार वैशारद्येऽध्यात्मप्रसाद:</span>’’ <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् जब निर्विचार समाधि से चित्त की निर्मलता पराकाष्ठा पर पहुँच जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब योगी को अध्यात्म प्रसाद की प्राप्ति होती है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसे सरल भाषा में इस प्रकार समझ सकते हैं कि जिस भूमि को ज्यादा उपजाऊ बनाना होता है तो एक सीजन उसे खाली छोड़ दिया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें कोई बीज नहीं बोया जाता है। जब शरीर को ज्यादा शक्ति सम्पन्न बनाना होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उपवास किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें भोजन या तो खाया नहीं जाता या फिर फल-जूस आदि सात्विक आहार लिया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी प्रकार मन और बुद्धि को यदि अधिक सबल और शुद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्मल बनाना है तो प्रतिदिन विचार का उपवास करना चाहिये। या तो प्रशान्त चित्त होकर विचार बिल्कुल बन्द करके अपने स्वरूप में स्थित होने का अभ्यास करें या फिर केवल उच्चविचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारमार्थिक विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समष्टि को सुख देने वाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने पूर्वजों के प्रतिनिधि बनने वाले विचार ही उठायें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब थाली में खाना सामने आता है तो हम कितना गौर करते हैं कि यह खाने से मोटापा बढ़ जायेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बी.पी.</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुगर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉलेस्ट्रॉल बढ़ जायेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लहसुन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्याज खाने से बदबू आयेगी इत्यादि। हम अपने घर में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऑफिस में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्कूल में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुकान में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संगठन में या योग कक्षाओं में इतने जागरूक रहते हैं कि उन व्यक्तियों को आने की अनुमति नहीं देते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो किसी भी प्रकार से हमारे लिए हानिकारक हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु अपने अन्दर आने वाले हानिकारक विचारों के प्रति इतने असावधन रहते हैं कि नकारात्मक विचार आकर हमारा सर्वस्व ध्वस्त कर देते हैं। अत: सुबह से शाम तक टी.वी. से अखबार से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मित्रों से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यकर्त्ताओं से जो भी विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिकायतें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक-दूसरे की निन्दा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चुगली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुराई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छाई प्रशंसा आदि हमारे सामने आते हैं उनमें से अपने लिए हितकारी को ही हमें ग्रहण करना चाहिये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाकि को चुपचाप अपने अन्दर ही अन्दर तीन-बार </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">परोऽपेहि मनस्पाप: किमशस्तानि शंससि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे कहकर हटा देना चाहिये। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब स्वामी जी महाराज कहते हैं कि उच्च चेतना से युक्त या दिव्य चेतना से युक्त रहें तो इसका अभिप्राय मुझे तो यही समझ में आया कि सकारात्मक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारमार्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा व समष्टि के लिए सुखदायी विचारों से युक्त रहना। प्रारम्भ में तो लोग आपको नकारात्मक विचार व व्यवहार देंगे मगर जब उन्हें पता चलेगा कि आप उन्हें ग्रहण नहीं करना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब आपको इसे देना भी बन्द कर देंगे। ठीक जिस प्रकार लोगों को पता है कि आप लहसुन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्याज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिर्ची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मसाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शराब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मांस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोल्डड्रिंक्स आदि नहीं लेते तो वे आपको परोसते भी नहीं है। हम भी अपने विचार दूसरों को देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए यह हमारी भी जिम्मेदारी है कि नकारात्मक विचार न दें और न लें। आप देख पायेंगे हमारे सकारात्मक विचार संगठन के माध्यम से जगत में एक क्रान्ति ला सकते हैं और उसी के एक जीवन्त तत्वपरक उदाहरण श्रद्धेय स्वामी जी महाराज व पूज्य आचार्य श्री हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अत: हम जिस तरह की चीजें (फल) अपने जीवन में आकर्षित करना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी तरह के विचारों का इस्तेमाल करना सीखें। नकारात्मक विचार रखने वाले अपना नरक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपना दु:ख और अपना रोग साथ में लेकर घूमते हैं। ऐसे लोग हर व्यक्ति में न सिर्फ गलतियाँ ही देखते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि गलतियों को मैग्निफाइंग ग्लास से देखते हैं। ऐसे लोगों से मिलकर व्यक्ति सोचता है कहाँ फँस गए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इनसे कैसे जल्दी पीछा छूटे</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके विपरीत सकारात्मक सोचने वाले अपना स्वर्ग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपना सुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खुशी और अपना स्वास्थ्य साथ में लेकर घूमते हैं ऐसे लोग हर व्यक्ति में कोई न कोई खूबी ढूंढ ही लेते हैं। सबको अपनी आशावादी सोच से अपनी तरफ आकर्षित कर लेते हैं। उनके पास बैठकर लगता है कि बैठे ही रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि वहाँ से अप्रत्यक्ष रूप में सकारात्मक शक्ति व प्रेरणा मिल रही होती है। हर व्यक्ति चाहता है कि उसके घर-परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऑफिस या आस-पास सकारात्मक सोच वाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम करने वाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेरणा देने वाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षमा करने वाले आाशावादी लोग ही रहें। जब हम अपने लिए ऐसा चाहते हैं तो निश्चित रूप से दूसरे भी हमसे वैसा ही चाहते हैं। अत: हम चुन-चुन कर अच्छे विचारों के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च विचारों के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सकारात्मक विचारों के व प्रेरणादायी विचारों के बीज अपने चित्त में बोकर आनन्द फल के भागी बने तथा अपने स्वभाव को अपने पूर्वजों जैसा निर्मल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साहसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परोपकारी व सेवाभावी बनावें।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र-चिंतन</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>जून</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 01 Jun 2017 21:43:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
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