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                <title>जीवन के प्रारब्ध व पुरुषार्थ में संतुलन - योग संदेश</title>
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                <description>जीवन के प्रारब्ध व पुरुषार्थ में संतुलन RSS Feed</description>
                
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                <title>योगाभ्यास से लायें, जीवन के प्रारब्ध व पुरुषार्थ में संतुलन</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2462/yogabhays-se-laye--jivan-ke-prarabdh-va-purusharth-me-santulan"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/1621.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   अक्सर विचार आता है कि जीवन के निर्माण में प्रारब्ध व पुरुषार्थ का कितना योगदान है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इन दोनों के योगदान को समानरूप से स्वीकार करना है या किसी एक पर केन्द्रित होकर दूसरे की उपेक्षा की जा सकती है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">बलाबल की दृष्टि से देखें तो इन दोनों में से अधिक बलवान् कौन है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रारब्ध व पुरुषार्थ का वास्तविक तात्पर्य क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी का प्रारब्ध हीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशुभ व अवर कोटि का है तो क्या उसे बदला भी जा सकता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा लगता है इन प्रश्नों की मीमांसा में जीवन की मूलभूत आवश्यकता व गहनतम समस्या का समाधान छिपा हुआ है। वस्तुत: प्रारब्ध व पुरुषार्थ का यह प्रश्न मनुष्य जीवन के कर्म के साथ जुड़ा हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे योगाभ्यास द्वारा योगी संतुलित करने का प्रयास करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">श</span><span lang="hi" xml:lang="hi">रीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रियों व मन के द्वारा जो कुछ किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनमें जो परिणाम घटित होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">है। प्राणियों के द्वारा की जाने वाली कुछ क्रियाएँ स्वरसवाही अविदित भाव से होती हैं तथा कुछ इच्छा-अधीन बाह्य-कारणों से दबकर या बाह्य-कारणों के प्रभाववस भी होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे हम कर भी सकते हैं और नहीं भी कर सकते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह पुरुषकार पुरुषार्थ है और जो चेष्टा स्वरसवाही है या जो करनी ही पड़ेगी उसका नाम है आरब्ध कर्म या संस्कारजन्य कर्म। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार मनुष्यों की अनेक मानसिक चेष्टाएँ पुरुषकार रूप हैं एवं पशुओं की अनेक चेष्टाएँ आरब्ध कर्म या भोगरूप हैं। मनुष्य संस्कारजन्य प्रवृत्ति का अतिक्रमण करके जो चेष्टा करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही पुरुषकार है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इच्छा ही प्रधान कर्म है। इच्छा होने के लिए इच्छा के विषय रूप एक ज्ञेय भाव का ज्ञान चाहिए। वह इच्छा पूर्व संस्कार विशेष से जब (या जितनी) हम लोगों के अधीन होकर कार्य करती रहती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब वह अदृष्ट या भोगभूत कर्म कहलाता है और वह इच्छा जब (या जितनी) हम लोगों के अधीन होकर अर्थात् पूर्ववत कर्म संस्कार का अतिक्रम करके कार्य करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब वह पुरुषार्थ रूप कर्म के रूप में जानी जाती है। फलत: इच्छा ही कर्म का उपादान या कर्म का मूलस्वरूप है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार कर्म दो प्रकार के होते हैं- संस्कारजन्य कर्म और पुरुषार्थ रूप कर्म। अभ्यासवश अचेतन होकर पुराने कर्मों को ही किये चले जाते रहने का नाम है संस्कारजन्य कर्म। तथा सचेतन होकर किये जाने वाले कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे वे पुराने कर्म हैं अथवा नवीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनको पुरुषार्थ रूप कर्म कहते हैं। इस प्रकार चाहे संस्कारजन्य कर्म हों या पुरुषार्थ रूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों से ही आगे अच्छा-बुरा कर्माशय बनता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे जाति-आयु-भोगरूप फल होते हैं। स्वप्नावस्था केकर्म भी संस्कारजन्य कर्म की श्रेणी में आते हैं। वह संस्कारजन्य कर्म और जो किया जाता है वह पुरुषार्थ। बाह्य संसार में एक-एक उद्देश्य को सामने रखकर व्यक्ति कर्म करता है। जैसे- इस कर्म से मेरी आजीविका चलती रहेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं अपने से सम्बन्धित पारिवारिक जनों की भौतिक आवश्यकताओं को पूर्ण कर पाउँगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस अमुककर्म से समाज में मैं अपना स्थान बना पाऊँगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरी पहचान बनेगी। मैं संसार में एक विशेष आदर्श स्थापित करना चाहता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं लोगों की सेवा करना चाहता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे पास कोई वस्तु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग्यता या सामर्थ्य है और दूसरों को उसकी आवश्यकता है तो मैं उन्हें देना चाहता </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इत्यादि। कर्म के द्वारा जहाँ बाहरी दुनियां में कुछ परिवर्तन घटित होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ साथ-साथ कर्म कर्त्ता के मन व इन्द्रियों में भी एक विशेष प्रकार का परिवर्तन चल रहा होता है। जिस भाव विशेष के साथ कर्म किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म के द्वारा वह भाव विशेष भी मनुष्य के अन्दर ही अन्दर निर्मित होता रहता है। उदारता या लोभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परमार्थ या स्वार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम या घृणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्यम या अकर्मण्यता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्ति या संघर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दया या क्रूरता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरों का सम्मान या तिरस्कार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय की विशालता या संकोच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये सब भाव कर्म के द्वारा ही मनुष्य के स्वभाव का अङ्ग बनते हैं। इसमें मैत्री</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुदिता के साथ किये गये कर्म मनुष्य के अन्तस् में निर्मलता लाते रहते हैं तो स्वार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईर्ष्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पर्द्धा व अहंकार पूर्ण कर्मों से चित्त अशुद्ध होता जाता है। इस प्रकार कर्म से ही व्यक्ति के स्वभाव विशेष का गठन होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी भी व्यक्ति के स्वभाव के अंग बने हुए कर्मों का नाम ही संस्कारजन्य कर्म है। जिन कर्मों ने भोग देना आरम्भ कर दिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कर्म सहज हो गये हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना प्रयास के होते रहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन कर्मों को व्यक्ति लाभ-हानि का बहुत विचार किये बिना ही करता रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका नाम है संस्कारजन्य कर्म।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लोक में यह कथन अक्सर सुनने में आता है- कि इसकी तो किस्मत ही माड़ी (कमजोर) है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका तो भाग्य ही खराब है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह चीज इसके भाग्य में थी ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका भाग्य बहुत अच्छा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसकी किस्मत बहुत अच्छी है इत्यादि। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वास्तव में जहाँ शुद्ध कर्मों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुभ कर्मों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म युक्त कर्मों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञानयुक्त कर्मों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्र व आचार्योपदेश केअनकूल कर्मों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सह-अस्तित्व या समष्टि के हित के भाव के साथ किये गये कर्मों से उत्तम प्रारब्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान युक्त प्रारब्ध का निर्माण होता है। वहीं अशुद्ध कर्मों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशुभ कर्मों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधर्म युक्त कर्मों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञान युक्त कर्मों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेहोशी में किये गये कर्मों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्र व आचार्यों केद्वारा असमर्थित कर्मों अर्थात् स्वेच्छा चारिता पूर्ण कर्मों से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोभ-मोह-अहंकार-ईर्ष्याद्वेष तथा दूसरों को नीचा और अपने को विशेष सिद्ध करने के भाव के साथ आचरित कर्मों से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पर्द्धा के भाव के साथ किये गये कर्मों से अज्ञान युक्त प्रारब्ध का निर्माण होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार प्रारब्ध का पर्याय </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भाग्य</span>’ '<span lang="hi" xml:lang="hi">भज सेवायाम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">धातु से निष्पन्न </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भाग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द का अर्थ है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका सेवन किया जाए। कर्मों का भी व्यक्ति एक अर्थ में सेवन ही तो करता है। भाग से सम्बद्ध ही भाग्य है। यह शब्द भी अन्तत: व्यक्ति के पूर्वकृत कर्मों की तरफ ही संकेत कर रहा है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस आधार पर एक व्यक्ति को जन्म के साथ जो प्राप्त होता है- उत्तम-मध्यम-सामान्य बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रंग-रूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कण्ठ का स्वर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाक्शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशिष्ट अभिरुचियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर-सौष्ठव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भौतिक ऐश्वर्य- यह सब उसका प्रारब्ध कहा जाता है। पूर्वजन्मों में उसने जो </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ</span><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi"> </span>किया- उस समय वह उसका पुरुषार्थ था। कल का पुरुषार्थ आज का प्रारब्ध है<span style="font-size:1.25rem;">, </span><span lang="hi" style="font-size:1.25rem;" xml:lang="hi">किन्तु आने वाले कल के लिए आज जो कुछ किया जा रहा है वह सचेतनता केअनुपात में उत्तम-मध्यम-निम्न कोटि केपुरुषार्थ का रूप धारण कर लेता है। प्रत्युत प्रारब्ध के साथ ही पुरुषार्थ आगे बढ़ता है। जो कुछ किया जा रहा है वह सचेतनता केअनुपात में उत्तम-मध्यम-निम्न कोटि केपुरुषार्थ का रूप धारण कर लेता है। अर्थात प्रारब्ध की दिशा में ही जब पुरुषार्थ किया जाता है तो प्रारब्ध से सर्वथा अलग हटकर पुरुषार्थ नहीं होता। प्रत्युत प्रारब्ध के साथ ही पुरुषार्थ आगे बढ़ता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रश्न यह उठता है यदि किसी को यह समझ आ जाये कितेरा प्रारब्ध अर्थात् कर्माशय अच्छा नहीं है तो क्या वह अपने प्रारब्ध को बदल सकता है या उसी दिशा में बढ़ता रहेगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यद्यपि पुरुषार्थ (</span>Free-Will<span lang="hi" xml:lang="hi">) का महान् सम्बल सदा व्यक्ति के साथ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु फिर भी वह एकाएक (सहसा) कार्य नहीं करता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शनै:-शनै उसका वेग बढ़ता है।  हाँ! यदि व्यक्ति के द्वारा अपने प्रारब्ध को बदलने के लिए कोई प्रयास ही नहीं किया जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रारब्ध पर बाह्यशक्ति (</span>External-Force<span lang="hi" xml:lang="hi">) का कुछ भी प्रयोग नहीं हो रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तो प्रारब्ध का जो भी रूप उपलब्ध है अच्छा या बुरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही आगे-आगे बढ़ता रहेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्धान्तत: प्रारब्ध का परिवर्तन असम्भव कार्य नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह अवश्य ही बदल सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु गुरूपदेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगाभ्यास शास्त्र श्रवण या अपनी ही विचार शक्ति के प्रयोग से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने जीवन की ठोकरों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्खलन-पतन इत्यादि के द्वारा पहले यह तो समझ में आये किमेरा प्रारब्ध मेरे लिए भी और दूसरों के लिए भी लाभकारी या सुखकारी नहीं है। यह तथ्य सुस्पष्ट होने पर तो मानवीय स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि शीघ्र या देर से परिवर्तित होकर ही रहेगा। चूँकि पुरुषार्थ से अर्थात् कर्म से प्रारब्ध बना है सो उसका परिवर्तन भी पुरुषार्थ से ही होगा। व्यक्ति जिसका परिवर्तन चाहता है उस पर विपरीत क्रिया करनी ही होती है। जैसे लोभ के प्रारब्ध को बदलने के लिए निर्लोभता की प्रचण्ड क्रिया चाहिए। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार प्रारब्ध और पुरुषार्थ में कौन अधिक बलवान् है- इस प्रश्न के उत्तर में तो यही कहा जा सकता है स्वरूपत: न प्रारब्ध अधिक बलवान् है न पुरुषार्थ। जिस समय जिसकी शक्ति (क्रियाशीलता) अधिक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस समय वही अधिक बलवान् है। कभी-कभी शास्त्रकार प्रारब्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाग्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिष्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दैव की महिमा गाते सुनाई पड़ते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यथा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">न दिष्टमभ्यतिव्रछान्तुं शक्यं भूतेन केनचित्। <strong>दिष्टमेव ध्रुवं मन्ये पौरछषं तुनिरर्थकम्ज्।</strong></span><strong>‘ (<span lang="hi" xml:lang="hi">विदु</span>0<span lang="hi" xml:lang="hi"> नी</span>0 8/32)</strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् भाग्य को बदलने में कोई प्राणी समर्थ नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं भाग्य को ही बलवान् समझता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ तो निरर्थक है। ऐसे वचनों का यह अभिप्राय लिया जा सकता है कि निर्बल चित्त</span>,</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मूढ़ात्मा लोगों की ऐसी ही मन:स्थिति होती है। जबकि आत्मज्ञानी बलवान् पुरुष तो इसके विपरीत ही भाषा बोलते हैं जैसी श्रीराम ने रावण विजय के पश्चात् सीता से बोली थी कि </span><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">दैवेन तु यत् सम्प्राप्तं पौरुषेण त्वपाकृतम्।'</span></strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् हे सीते! दैव भाग्य दोष से मैंने जो कष्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अनर्थ प्राप्त किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे मैंने पुरुषार्थ से दूर कर दिया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विशेष तथ्य यह कि जो विशेष व्यक्ति हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनकी सम्पत्ति और विपत्ति में एकरूपता रहती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी बुद्धि में दैव के अनुसार सुख एवं दु:ख के अनुभव के अनुरूप परिवर्तन नहीं होता। ऐसे विरले महापुरुष द्वन्द्वातीत होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे धीर पुरुष अपने पुरुषार्थ (पौरुष) से अपने अन्दर सचेतन होकर किये गये नवीन कर्म से दैव (पुरातन कर्म) को पराजित करने में समर्थ होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वास्तव में भगवान् ने बिना किसी भेदभाव या पक्षपात के हर एक व्यक्ति में अपरिमित ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति व सामर्थ्य की संभावना देकर धरती पर जन्म दिया है। हर मानव में महामानव होने का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देवत्व व ऋषित्व को उपलब्ध होने का सामर्थ्य दिया है। यदि हम दोष पूर्ण आलम्बन एवं दोषपूर्ण अभ्यासों से निरन्तर बचते रहें और दृढ़ संकल्प पूर्वक घनघोर पुरुषार्थ करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हर किसी क्षेत्र में विशेष उन्नति कर सकते हैं और अपने प्रारब्ध  को भी बदल सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2462/yogabhays-se-laye--jivan-ke-prarabdh-va-purusharth-me-santulan</link>
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                <pubDate>Sat, 01 Jul 2017 21:43:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
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