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                <title>सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज - योग संदेश</title>
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                <title>ऋषि चेतना</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ. साध्वी देवप्रिया</span>, </h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्षा-दर्शन विभाग</span></h5>
<h5 style="text-align:right;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि विश्वविद्यालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार</span></h5>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2487/rishi-chetna"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/392.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">युगों-युगों से सन्तों का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुवों का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषियों का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुनियों का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मवेत्ताओं का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मवेत्ताओं का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तत्त्ववेत्ताओं का देश रहा है। सदा-सदा से ये देश ज्ञान का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकाश का उपासक रहा है। ब्रह्मा से लेकर जैमिनी पर्यन्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महर्षि दयानन्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री अरविन्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी विवेकानन्द व वर्तमान में श्रद्धेय स्वामी जी महाराज पर्यन्त ये हमारी पावनी परम्परा रही है। जिस प्राणविद्या का श्रद्धेय स्वामी जी महाराज प्रतिदिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्ममुहूर्त्त में अभ्यास कराते हैं इसी को वेदों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपनिषदों में ब्रह्मविद्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुविद्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यात्मविद्या व सर्वोच्चविद्या कहा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  ह</span><span lang="hi" xml:lang="hi">म सबको जीवन में कोई न कोई अपूर्णता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खालीपन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधूरापन महसूस होता ही रहता है और उसी को पूरा करने के लिए हम जीवन भर व्यक्तियों से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तुओं से नाता जोड़ते रहते हैं। हमें लगता है कि अमुक व्यक्ति तो मेरा अधूरापन दूर नहीं कर पाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर अमुक से जुड़कर मैं पूर्ण या सुखी हो जाऊँगा। इसी आशा से हम माता-पिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुत्री</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पत्नी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मित्र पड़ोसी आदि अनेक सम्बन्ध बनाते हैं। इसी प्रकार अमुक वस्तु और मिल जाये तो बस फिर और कुछ नहीं चाहिये। बस इसी ताने-बाने में सारी उमर गुजर जाती है और हम वर्षों बाद भी वैसे का वैसा खालीपन महसूस करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि संसार की किसी भी वस्तु या व्यक्ति में वह सामर्थ्य ही नहीं है जो हमारे अधूरापन को पूर्ण कर सके। केवल एक ही शक्ति हमारे खालीपन को भर सकती है और वह है-भागवतसत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्यसत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्णसत्ता और भगवान् कोई ऐसी सत्ता नहीं है जो कहीं से लाकर अपने साथ जोड़नी है अपितु वह तो हमारे अन्दर बाहर सर्वत्र व्यापक है मगर इस चीज का अनुभव हमें केवल वही समर्थ गुरुसत्ता ही करा सकती है जिसने स्वयं उस पूर्णब्रह्म को जाना हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुभव किया हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाया हो या जीया हो। यह एक बहुत बड़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अतुलनीय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अद्भुत घटना है जो केवल गुरुसत्ता के माध्यम से घटित होती है और तभी अर्थात् उसी अवस्था में साधक कह उठता है- </span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुच्यते।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण वह परमात्मा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण यह संसार है। यह भी पूर्ण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह भी पूर्ण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं भी पूर्ण हूँ। इस संसार का एक-एक कण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस शरीर का एक-एक सेल अपने-आप में पूर्ण है। यही तो गुरु की महिमा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही तो गुरुसत्ता का माहात्म्य है जो वेदों से लेकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शनों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपनिषदों व सभी सम्प्रदायों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पन्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मजहबों ने पूर्ण हृदय से स्वीकार किया है। भारतीय परम्परा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैदिक संस्कृति एवं आर्ष वाङ्मय सर्वत्र गुरु महिमा से भरा पड़ा है। गुरु की सर्वोच्च महिमा देवों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असुरों से लेकर मनुष्यों तक पहले थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज भी है तथा आगे भी रहेगी। आइये इस गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर पूर्ण गुरुसत्ता से इसी पूर्णता का अहसास व अनुभव हमें भी हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही अभीप्सा रखते समस्त गुरुसत्ता के पावन चरणों में कोटि-कोटि नमन।</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(35,111,161);" xml:lang="hi">ध्यानमूलं गुरोमूर्ति पूजामूलं गुरोर्पदम्।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(35,111,161);" xml:lang="hi">मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोकृपा।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रत्न या स्वर्ण के मणियों की माला तो सबको दिखायी देती है मगर जिस सूत्र में वे सब मणिके पिरोये हुए हैं वह सूत्र सबको नहीं दिखता। यह सुन्दर संसार तो सबको दिखाई देता है मगर जिस सूत्र में यह सारा ब्रह्माण्ड पिरोया हुआ है वह सूत्र है ईश्वर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह किसी बिरले को ही दिखाई देता है सबको दिखाई नहीं देता। लोग कहते हैं आज भारत में सबसे बड़ा कोई संगठन है तो वह पतंजलि का है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सचमुच इस संगठन में हजारों नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लाखों नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ों रत्न जुड़े हुए हैं पर उन सबको जिस एक सूत्र में पिरोया हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बांधा हुआ है वह है- गुरु। गुरु को भगवान् का प्रतिनिधि माना गया है। जिस प्रकार ईश्वर किसी भी परिस्थिति में पूरे ब्रह्माण्ड में कहीं भी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी भी अपनी मर्यादा को नहीं तोड़ता उसी प्रकार एक सच्चा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समर्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु भी कभी मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि यदि गुरु भी मर्यादा लांघने लगे तो लोग आदर्श किसे मानेंगे</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">सभी पन्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्प्रदाय व मजहबों में गुरु को सर्वोच्च स्थान पर माना गया है। गुरु कोई केवल शरीरधारी सत्ता नहीं है इसीलिए गुरु के बारे में कहा है- </span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुर्ब्रह्म गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वर:।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुर्साक्षात परब्रह्म: तस्मै श्री गुरवे नम:।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुर्ब्रह्म अर्थात् गुरु महान् है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुर्विष्णु: अर्थात् गुरु सर्वव्यापक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुर्महेश्वर: अर्थात् महान् आन्तरिक व बाह्य ऐश्वर्य का स्वामी है वह साक्षात् परब्रह्म का प्रतिरूप ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे गुरुदेव को मेरा बारम्बार नमन। यदि गुरुसत्ता व्यापक ना हो तो गुरु कृपा केवल गुरु की शरीर सत्ता के आस-पास रहने वाले </span>2-4<span lang="hi" xml:lang="hi"> लोगों को ही प्राप्त होनी चाहिये मगर हम देखते हैं आज महर्षि दयानन्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री अरविन्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुनानकदेव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विवेकानन्द आदि महान् गुरुवों से (उनका भौतिक शरीर न होने पर भी) उनके ज्ञान से आज भी कितनी जिज्ञासु आत्माएं मार्गदर्शन पाकर आध्यात्म के मार्ग पर आगे बढ़ रही हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्म की त्रिवेणी में तीन शब्द बहुत महत्व रखते हैं- <strong><span style="color:rgb(35,111,161);">भक्ति</span></strong></span><strong><span style="color:rgb(35,111,161);">, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्संग और सेवा।</span></span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इनमें से प्रथम शब्द </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भक्ति</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">तक पहुंचने के लिए या यूं कहें कि भक्त बनने के लिए तीन शब्दों की यात्रा से गुजरना होता है- प्रथम है विद्यार्थी। आज के युग में इसकी परिभाषा करें तो- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">य: विद्यया अर्थं कामयते</span>’’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इति विद्यार्थी कुछ सूचनाएं एकत्रित करके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी परीक्षा देकर कुछ डिग्रियां हासिल करके आजीविका को प्राप्त कर लेना ही विद्यार्थी का लक्ष्य या प्रयोजन है परन्तु जब हमारे अन्दर से विद्यार्थीपना मरता है तो एक जिज्ञासु पैदा होता है। व्यक्ति को लगता है कि यह सब डिग्रियां आदि पाकर भी तृप्त नहीं हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं तो कुछ छुटा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे पहले जानना और फिर पाना चाहिये। जब ऐसी प्यास अन्दर से उठती है तो यह व्यक्ति बनता है-पिपासु या जिज्ञासु। जिज्ञासु जब भटक रहा होता है ज्ञान की तलाश में तो भागवत व्यवस्था से उसे कोई गुरु मिल जाते हैं अब जिज्ञासु की मृत्यु होती है और पैदा होता है एक शिष्य। अब वही व्यक्ति शिष्य बन गया। शिष्य शब्द की निष्पत्ति होती है- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">शासु अनुशिष्टौ</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">धातु से अर्थात् अब वह अपने गुरु के अनुशासन को स्वीकार करके अब उसमें जीना शुरु कर देता है। बाहर से तो सब अनुशासन मानता है लेकिन मन की उछल-कूद अभी भी जारी है। मन अभी भी पूर्ण शान्त पूर्णमौन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्कम्प</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण पवित्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण प्रसन्न नहीं हुआ है। चेतना का स्तर बहुत ऊँचा ना होने से कभी-कभी गुरु पर भी शंका कर लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी सेवा पद्धति को समझ नहीं पाता है फिर भी आगे बढ़ने की अभीप्सा करता है और जब शिष्य का भी अन्त हो जाता है तब पैदा होता है भक्त। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भज सेवायाम</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। भक्त वह है जो बिना किसी शर्त के सर्वस्व समर्पित करके सेवा में तल्लीन हो जाता है। चेतना की इस स्थिति में व्यक्ति मनसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाचा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्मणा जो भी करता है वही असली सेवा है। भक्त या अन्तेवासी के माध्यम से गुरु अभिव्यक्त होते हैं और गुरु तो भगवान् के ही साक्षात् प्रतिरूप होते हैं अत: कहना चाहिये कि भक्त के माध्यम से स्वयं भगवान् अभिव्यक्ति होते हैं अब सब कुछ सहज रूप से पूर्ण मौन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण शान्त रहते हुए गुरु की शक्ति से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु के ही माध्यम से गुरु के लिए या भगवान् की शक्ति से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् के ही माध्यम से भगवान के लिए अभिव्यक्ति हो रही है। इसी को वेदान्त में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अद्वैतवाद</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी को उपनिषदों में </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">अहं ब्रह्मास्मि</span>’’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब बूंद सागर का ही भाग बनकर उसी में समा गई है। इसी को जीवन मुक्त स्थिति भी कहा है। गीता में भगवान् कृष्ण ने सर्वविध अर्जुन को उपदेश देकर मेधा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्मृति सम्पन्न बनाकर गीता के अन्तिम अध्याय में श्लोक-</span>65, 66<span lang="hi" xml:lang="hi"> और </span>67<span lang="hi" xml:lang="hi"> में जो कहा है वह भक्ति की पराकाष्ठा है। भगवान् श्री कृष्ण अपने शिष्य अर्जुन को शिष्य से भक्त बनने का उपदेश दे रहे हैं। क्योंकि गुरु-शिष्य में परस्पर आसक्ति होने का खतरा है और आसक्ति का अन्त सदा ही दु:खदायी होता है लेकिन भक्त बनने में यह खतरा नहीं है क्योंकि अब उसी का भाग बन गए तो दूरी और देरी भी समाप्त हो गई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आसक्ति भी समाप्त हो गई। भक्ति की परिणाम सदा सदा ही आनन्द है। इसलिए कहा- </span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(35,111,161);" xml:lang="hi">मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(35,111,161);" xml:lang="hi">मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे।।१८/६५।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अपने को मुझमें लगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा भक्त बन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा पूजन कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुझे नमस्कार कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा करने से तू मुझ तक पहुँच जायेगा। क्योंकि तू मेरा प्रिय है इसलिए मैं तुझे सचमुच इस बात का वचन देता हूँ ।।</span>18/65<span lang="hi" xml:lang="hi">।। </span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(35,111,161);" xml:lang="hi">सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(35,111,161);" xml:lang="hi">अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:।।१८/६६।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सब धर्मों को छोड़कर तू केवल मेरी शरण में आ जा। तू दु:खी मत हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूँगा ।।</span>18/66<span lang="hi" xml:lang="hi">।।</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(35,111,161);" xml:lang="hi">इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(35,111,161);" xml:lang="hi">न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ।।१८/६७।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्जुन! ये जो दिव्य ज्ञान मैनें तुझे दिया है वह कभी किसी अतपस्वी को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभक्त को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सुनना नहीं चाहता उसे और जो दोषदृष्टि रखता है उसको भी कभी मत कहना। यहाँ एक शब्द आया </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">अभक्ताय</span>’’ <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् जो भक्त नहीं है उसे गुरु की कृपा नसीब नहीं होती। गुरु-शिष्य परम्परा का इतना ऊँचा आदर्श जहाँ मानव अपने सर्वोच्य लक्ष्य को पा लेता है। वास्तव में देखें तो भक्ति और ज्ञान दोनों अलग नहीं अपितु एक ही सिक्के के दो पहलु हैं। जो व्यक्ति अपनी यात्रा शुद्ध ज्ञान से शुरु करता है निश्चित रूप से वह अन्त में भक्त बन ही जाता है जैसे- अर्जुन। उसी प्रकार जो साधक अपनी यात्रा शुद्ध भक्ति से शुरु करता है वह अन्त में शुद्ध ज्ञान पा ही लेता है जैसे मीरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महाप्रभु चौतन्य आदि। भगवान् करे इस गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर से विद्यार्थी से जिज्ञासु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिज्ञासु से शिष्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिष्य से भक्त और भक्त से साक्षात् भगवान् के यन्त्र बनने के पथ पर यथाशक्ति अग्रसर हों। ।।</span>18/67<span lang="hi" xml:lang="hi">।।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्णज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्णश्रद्धा व पूर्ण पुरुषार्थ से युक्त हो जायें योगतत्त्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देवत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषित्व को प्राप्त हो जायें।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>सनातन वैभव</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>अगस्त</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Aug 2017 21:49:18 +0530</pubDate>
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