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                <title>मन को दिशा दें और बनें समृद्धिवान - योग संदेश</title>
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                <description>मन को दिशा दें और बनें समृद्धिवान RSS Feed</description>
                
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                <title>मन को दिशा दें और बनें समृद्धिवान</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2490/man-ko-disha-de-aur-bane-smridhvan"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/1042.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">  बृहदारण्यक उपनिषद् का ऋषि मन के स्वरूप को इस रूप में प्रकट करता है कि काम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संकल्प</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचिकित्सा</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अश्रद्धा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धृति:</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधृति:</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ह्री:</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धी: ये सब मन के ही विविध रूप हैं। मन के बिना काम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संकल्पादि का मानो कोई अस्तित्व ही नहीं है। वे कहते हैं प्रगाढ़ निद्रा में या समाधि में मन नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए वहाँ काम (कामना)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संकल्पादि भी नहीं होते। जबकि शुभ या अशुभ इच्छा के उत्पन्न होने पर व्यक्ति उस इच्छा को पूरा करने के लिए प्रयत्न पूर्वक पुरुषार्थ करने की इच्छा करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">संकल्प’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">है। मन के सम्बन्ध में श्री महाराज सदा मन को मित्र बनाकर रखने की सलाह दिया करते हैं। महाराज का कहना है- जैसे एक सच्चा मित्र कभी भी अपने मित्र का अनिष्ट नहीं करता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार मन यदि हमारा मित्र हो जाता है तो वह सदा हमारा कल्याण करने में भी जुट जाता है।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">सके लिए मन से नित्य प्रार्थना की जाए कि तू एक ही साथ जहाँ ध्यान मग्न योगी की तरह पूर्ण शान्त है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ वीर योद्धा के समान प्रचण्ड वेग से भी भरा हुआ है। जिस काम को तू करना ठान लेता है- त्रिलोकी में भी उसे रोकने का किसी में सामर्थ्य नहीं है। तू मेरा अक्षयपात्र है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे हृदय का पूज्य देव है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">सच्चा सुहृद् है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">सेनापति इन्द्र है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">महान् धन कुबेर है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">कठिनाइयाँ व बाधाएँ तेरे गले का हार हैं। हे मेरे मन! तू मेरा सच्चा हितैषी है। तू एक ही साथ माँ के समान प्रेम का अवतार है और गुरु के समान अनन्त धैर्य का सागर है। मैं कहाँ तक तेरा गुणगान करूँ</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">बस! तुझसे मैं एक ही चीज चाहता हूँ कि तू सदा मुझे अपना प्यारा मित्र समझता रहे और मैं भी तेरे प्रति सदा निश्चल प्रेम से भरा रहूँ। जीवन-यात्रा में आगे बढ़ने के लिए मुझे तेरे सहयोग की अत्यन्त आवश्यकता है। मेरा विश्वास है कि इस प्रार्थना से मन संकल्पनानुसार जगे बिना नहीं रहेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">केवल मन की शक्ति से त्वचा इन्द्रिय में ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सभी ज्ञानेन्द्रियों में भी वही अनुभूति (</span>Sensation<span lang="hi" xml:lang="hi">) उत्पन्न हो जाती है। जैसे कोई गन्ध नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी नासिका उस विशिष्ट गन्ध को ग्रहण करने लगती है। कान शब्द सुनने लगते हैं। आँखें तो रूप देखती ही हैं। रसना बिना किसी पदार्थ के ही विशिष्ट रस को ग्रहण करने में सक्षम हो जाती है। यों तो हम सब को यह एक सामान्य घटना लगती है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु ध्यान दिया जाए तो बड़ा आश्चर्य होता है कि कैसे मन ही उस इन्द्रिय के अन्दर वह संवेदना उत्पन्न कर देता है जो कि जागृत अवस्था में बाह्य विषय के साथ संयोग से ही सम्भव है। यह मन की एकाग्रता की शक्ति के कारण ही हो पाता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार मन जब किसी विषय में पूर्ण विश्वासी हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उस विशेष अवस्था में वह अपरिमित बल से भरा हुआ होता है। और तब सारा शरीर-तन्त्र मन का आज्ञानुवर्ती हो जाता है। दूसरे शब्दों में जो कुछ भी शुभ या अशुभ जैसा भी मन को सिखा दिया या समझा दिया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन की ओर से उसी के अनुसार प्रतिक्रिया होती है। यदि मन को सिखा दिया कि विषयों में सुख है तो ठीक उसी के अनुसार प्रत्युत्तर (</span>Response<span lang="hi" xml:lang="hi">) मिलता है और विषयों मेंं दु:ख देखना सिखा दिया जाता है तो फिर उसे सदा दु:ख ही दिखायी देता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं शान्त हूँ</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">मन के द्वारा यह सोचते ही सब कुछ शान्त हो जाता है। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं आज बड़ा अशान्त हू’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अशान्ति की ही श्रंखला चालू हो जाती है। किसी भी उपाय से यदि हमारे आन्तरिक विश्वास में यह बात अच्छे से बिठा दी जाती है कि मन तो हमारा महाशत्रु है तो वह सदा शत्रु रूप में ही दिखता है। मन को एक घनिष्ठ मित्र के रूप में देखने की दृष्टि विकसित हो जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो फिर वह मित्र ही दिखायी देता है। मन के संदर्भ में यह दो दृष्टियां हैं। आगे जिसको जो पसन्द हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे स्वयं ही चुनाव करना होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य शंकर कहते हैं- </span><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>''<span lang="hi" xml:lang="hi">मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो:।‘’</span></strong></span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात सांसारिक विषयसुख (सत्ता-सम्पत्ति-सम्मान) की इच्छा भी मन से ही होती है और अमृतत्व की इच्छा भी मन से ही। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अथर्ववेद में ये मन्त्र हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो मन के महत्व को दर्शाते हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अयं मे हस्तो भगवानयं मे भगवत्तर:। अयं मे विश्वभेषजोऽयं शिवाभिमर्शन:।।6।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हस्ताभ्यां दशशाखाभ्यां जिह्वा वाच: पुरोगवी।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अनामयित्नुभ्यां हस्ताभ्यां ताभ्यां त्वाभि मृशामसि।।7।। (अथर्व 4/13/6-7)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पाठकों के समक्ष मन की अपरिमित शक्ति का एक उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे प्रसिद्ध दार्शनिक आचार्य उदयवीर शास्त्री ने प्राचीन साङ्खय सन्दर्भ नामक अपने ग्रन्थ में लिखते हैं कि पंजाब प्रान्तीय </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मुकेरियाँ’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नगर के निवासी प्रोफेसर जगदीश मित्र जो सन् 1917 से 1921 तक प्रत्येक वर्ष गुरुकुल महाविद्यालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्वालापुर के वार्षिक महोत्सव पर पधारते रहे। उनके द्वारा मन को लेकर बीसों प्रदर्शन देखने का मुझे अवसर मिला। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो0 जगदीश मित्र मन: शक्ति का उपयोग जीवनपर्यन्त मानसिक रोगों की चिकित्सा के लिए करते रहे। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक दिन कॉलेज से वापसी पर मैं प्रोफेसर के साथ बैठा बातें कर रहा था। उससे पहले दिन प्रोफेसर ने एफ0सी0 कॉलेज (फॉरमन क्रिश्चियन कॉलेज) में प्रदर्शन किया था। मुझे वहाँ बैठे दस-बारह मिनट ही हुए होंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इतने में आवाज सुनाई पड़ी कि प्रोफेसर कहाँ है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यह बड़ा मक्कार आदमी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कल इसने सबको बेवकूफ बनाया। कहाँ है </span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">हम इसे समझेंगे! स्वर बड़ा ऊँचा व तीव्र था। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हम दोनों यह सुन ही रहे थे कि कुछ सेकण्ड में बराण्डे को लाँघते हुए दो नवयुवक धड़धड़ाते हुए तीव्रता के साथ कमरे के दरवाजे तक पहुँच गए। प्रोफेसर ने उनकी ओर देखा और सरलता पूर्वक पर आदेश की मुद्रा में कहा- आप अन्दर नहीं आ सकते। युवकों का जवाब था- हम जरूर अन्दर आएँगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्दर आएँगे। प्रोफेसर के द्वारा दुबारा यह कहते ही कि- आप हर्गिज अन्दर नहीं आ सकते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों युवक धड़ाम से जमीन पर गिर पड़े। जोर से चिल्लाये- पेन! शूटिंग पेन! मैंने सामने देखा- वे दोनों पानी के बाहर मछली की तरह तड़प रहे हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी इस तड़पन की आवाज पर प्रोफेसर ने पूछा- पेन कहाँ है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">स्टमक में प्रोफेसर! शूटिंग पेन! तत्काल प्रोफेसर ने युवकों के कन्धों को स्पर्श किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षण भी नहीं लगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों युवक ऐसे शान्त हो गए जैसे भयंकर कष्ट के बाद आशातीत राहत पाई हो। कुछ ही सेकण्ड में दोनों युवक उठे और प्रोफेसर के पैरों में पड़कर बड़ी विनम्रता के साथ क्षमा-प्रार्थना करने लगे। प्रोफेसर ने हर प्रकार सान्त्वना देकर उन्हें विदा किया। उनकी बेजा हरकत पर उलाहना आदि के रूप में एक भी शब्द प्रोफेसर ने अपने मुँह से नहीं निकाला।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस संदर्भ में श्री महाराज जी की अपनी दृष्टि है कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मन-इन्द्रियाँ-शरीर-हृदय सबको एक हँसते-खेलते परिवार के रूप में देखना चाहिए।</span>‘ <span lang="hi" xml:lang="hi">वे कहते हैं अपने मन को सतत सुझाव (</span>Auto Suggestions<span lang="hi" xml:lang="hi">) देते रहने से मन निश्चित रूप से हमारा मित्र बनकर रहना स्वीकार कर लेता है और वह कभी भी ऐसी बात नहीं सोचता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा संकल्प नहीं करता जिससे हमारा अहित होता हो। मन की मित्रता ज्यों-ज्यों बढ़ती जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी अनुपात में साधक को अनुभव होता जाता है कि बाधाएँ सहज ही निवृत्त होती जा रही हैं । </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मन के सम्बन्ध में यहाँ तक कहा गया है कि जिसने कण को जान लिया वह धनवान् है। जिसने क्षण को पकड़ लिया वह विद्वान् है। जिसने मन को समझ लिया वह भाग्यवान् है । श्री महाराज कहते हैं कि मन को समझने का भाव है- इसकी प्रकृति (</span>Nature<span lang="hi" xml:lang="hi">)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसकी अनन्त शक्तियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके अप्रतिहत ओज व तेज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्त व उग्ररूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साहस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धैर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शौर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल-वीर्य-पराक्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरल व सौम्यरूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दृढ़-इच्छा शक्ति को समझना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही  सदा ही सजग व सावधान चेष्टा से उत्साह के साथ अजित अवस्था में समस्त आपत्तियों-विपत्तियों की या फिर उसकी स्वेच्छाचारिता के समय प्रलयंकारी दृश्यों की कुरूप झाँकियों को देखना-समझना। जो ऐसा कर लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह सफल दिशा पा जाता है और उसके समृद्धि के द्वार खुल जाते हैं।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>सनातन वैभव</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>अगस्त</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Aug 2017 21:45:52 +0530</pubDate>
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