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                <title>भारत के अभिजन - योग संदेश</title>
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                <description>भारत के अभिजन RSS Feed</description>
                
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                <title>भारत के अभिजन</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">प्रो. रामेश्वर मिश्र </span>'</strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">पंकज’</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2542/bharat-ke-abhijan"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/047.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">      किसी </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भी समाज में संस्कृति और विद्या के क्षेत्र में जो प्रवाह चलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी से समाज पहचाना जाता है और परिभाषित होता है। संस्कृति और विद्या का क्षेत्र एक विशाल क्षेत्र है और इसमें विशिष्ट पुरूषार्थ करना विरले लोगों का ही काम होता है। सारे संसार मे ऐसे लोगों को सम्बन्धित समाज के अभिजन या एलीट कहा जाता है। विद्या के विशाल विस्तार में अग्रिम पंक्ति में रहने वाले लोग अभिजनों के विचार-जगत को रचते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शासन के शिखर पर रहने वाले लोग अभिजनों की राजनैतिक मान्यताओं का सृजन करते हैं और राष्ट्र जीवन या समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में प्रभावशाली हैसियत रखने वाले लोग अभिजनों की नीति सम्बन्धी मान्यताओं का निर्धारण करते हैं।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">न दिनों भारत के सन्दर्भ में यूरोप का उदाहरण लेकर ही शिक्षित लोग सरलता से समझ पाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: वही उदाहरण लेना होगा। यूरोप में शताब्दियों तक ख्रीस्तपंथी पादरी ही वहाँ के अभिजन मान्य रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु विश्रीय क्षेत्र में वास्तविक अभिजन केवल यहूदी लोग ही रहे। इन यहूदियों से यूरोप के आर्थिक क्षेत्र में बढ़त की इच्छा वाले ख्रीस्तपंथी लोग प्राय: ईर्ष्या रखते थे और इनको मारने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जलाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लूट लेने और नष्ट कर देने के लिए वे लोग एक विचित्र-सा तर्क रचते थे कि जीसस को सूली पर चढ़ाने वाला राजा यहूदी था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए ये यहूदी महापापी हैं और हमें इन्हें नष्ट कर डालना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब मुश्किल यह है कि यह नितान्त झूठ है। जीसस को सूली पर चढ़ाया था रोमन राजा ने। परन्तु रोमनों का तो ख्रीस्तपंथी कभी कुछ नहीं बिगाड़ सके। उल्टे रोमनों की यशोगाथा ही यूरोप के लोग आज तक गाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: एक झूठ रचकर अपनी ईर्ष्या को अभिव्यक्ति दी गयी है। कई सौ वर्षों तक यूरोप में यहूदियों का भयंकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बर्बर दमन हुआ और उन्हें तरह-तरह से सताया गया। परन्तु तब भी आर्थिक क्षेत्र के अभिजन आज तक यूरोप में यहूदी लोग ही बने हुए हैं। यही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञान और मानविकी के क्षेत्रों में भी अनेक यहूदी अत्यन्त प्रभावशाली हुए और उन्होंने यूरोप के चित्त को गढ़ा। इनमें आंइस्टाइन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्ल मार्क्स और सिगमण्ड फ्रॉयड उल्लेखनीय हैं। अनेक यहूदियों ने प्राणदण्ड के भय से ख्रीस्तपंथ अपनाकर भी अपना काम जारी रखा औरी प्राचीन यूरोपीय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विषेषत: यवन क्षेत्रीय और रोम क्षेत्रीय चित्रों तथा अन्य कलाकृतियों और कतिपय पुस्तकों को ढूढँकर उन्हें धीरे-धीरे यूरोपीय नवजागरण के आधार के रूप में प्रस्तुत किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे लगभग 200 वर्षों में यूरोप से ख्रीस्तपंथ का वर्चस्व मिट गया। नवजागरण की प्रेरणा से यूरोप के लोग दुनिया भर में निकले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने विश्व की अनेक सभ्यताओं की जानकारी प्राप्त की। उन जानकारियों के आधार पर अपने यहाँ वैज्ञानिक प्रगति की और मध्ययुग की अनेक मान्यताओं को पिछड़ी और बर्बर मानकर त्याग दिया। यही लोग नये यूरोप के अभिजन बने।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में ब्रिटिश प्रभाव के प्रसार के साथ यहाँ भी एक छोटा-सा वर्ग ऐसा पनपा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने ख्रीस्तपंथ के प्रभावों को आत्मसात् कर स्वयं को एक नये अभिजन की तरह प्रस्तुत करने का प्रयास किया। स्पष्ट है कि यह वर्ग न केवल छोटा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु इसे भारत की व्यापक जानकारी भी नहीं थी। परन्तु राजनैतिक छल और कूटनीति में यह निपुण होता गया और इसने भारत के देशभक्त वीरों के दबाव का प्रयोग कर अंग्रेज़ों से गुप्त संधियों के द्वारा सत्ता हस्तान्तरण का पथ अपने लिए प्रशस्त किया। इनमें जवाहरलाल नेहरू तथा उनके अन्य साथी सबसे अग्रणी थे। राजनैतिक दृष्टि से सर्वाधिक चतुर श्री जवाहरलाल नेहरू सिद्ध हुए और उन्होंने ब्रिटिश भारत से अंग्रेजों की विदाई के अवसर का लाभ उठाकर तथा देशभर में फैली प्रचण्ड देशभक्ति की भावना का उपयोग करते हुए उसे अपने पक्ष में मोड़ा और साथ ही अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर नयी उभरी शक्ति-सोवियत संघ तथा कम्युनिस्ट आन्दोलन से साठगाँठ कर बल पूर्वक भारत में एक नया अभिजन रचने की पहल की। इसमें ब्रिटिश भारत के वे लोग जो ब्रिटिश शासन के शीर्ष अधिकारी थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अथवा ऐसे लोग जो ब्रिटिश भारतीय शिक्षा में अग्रणी थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने यूरोपीय ज्ञान के प्रति ही प्रमाण-भावना पालने के कारण इस नये अभिजन वर्ग के उन्मेष में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु इसमें अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो गयी। सम्पूर्ण भारत में फैलाये गये ब्रिटिश भारतीय ढाँचे का लाभ उठाकर यह नया अभिजन वर्ग अत्यन्त शक्तिशाली तो होता गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु इसके सामने पहचान का गम्भीर संकट उत्पन्न हो गया। उसका कारण यूरोप के अभिजन थे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यूरोप के अभिजनों की मुख्य विषेषता यह रही कि उन्होंने सदा अपने ही प्राचीन ज्ञान की निरन्तरता में स्वयं को प्रस्तुत करने का प्रयास किया। इसके लिए उन्हें बहुत-से मिथक रचने पड़े और प्राय: अतिरंजनाओं और असत्यों तक का सहारा लेना पड़ा। उन्होंने अपने इतिहास के सभी अंधकारमय पक्षों को ढँक दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिस दौर को ढँकना असम्भव हो गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सात-आठ सौ वर्षों के उस पूरे दौर को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अंधकार युग’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहकर उससे अपना पल्ला झाड़ लिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु दूसरी ओर उसी अवधि के बारे में काल्पनिक गौरव के भाँति-भाँति के किस्से रचते रहे और अपने ज्ञान की जड़ें उसी अवधि में बताते रहे। उन्होंने भारत और चीन से जो कुछ सीखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस सबको वे स्वयं यूरोप के ही अतीत में विद्यमान बताने की कोशिश करते रहे। इसके लिए उन्होंने अपनी भाषाओं में विशाल साहित्य रचा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें गप्पों और अतिरंजनाओं का भी बहुत बड़ा स्थान था। इसके साथ ही विद्वत्-विमर्ष में उन्होंने ऐसी पदावली अपनायी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो केवल यूरोप को अपना सन्दर्भ बनाती है। यूरोप के सभी विद्वत्-विमर्ष यूरोपीय अतीत और यूरोपीय परम्पराओं को ही अपना मूल सन्दर्भ बनाते हैं और उसकी ही नयी-नयी व्याख्या करते हैं। इस क्रम में उन्होंने विगत डेढ़ सौ-दो सौ वर्षों में रचे गये यूरोपीय साहित्य को विश्व-साहित्य की तरह प्रस्तुत करने का प्रयास किया। यह विश्व में बौद्धिक आधिपत्य स्थापित करने की उनकी सुचिन्तित कोशिश है। इसी अर्थ में वे यूरोपीय समाज के अभिजन हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय अभिजनों के नये वर्ग की मुश्किल यहीं से शुरू होती है। वे यूरोपीय अभिजनों की नकल करते हैं। इसके लिए यूरोप में रचित आधुनिक पुस्तकों को ही पढ़ते और पढ़ाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हीं के आधार पर बहसें और चर्चाएँ करते हैं और उन्हीं को ज्ञान के लिए प्रमाण तथा अधिकारी मानते हैं। परन्तु केवल यूरोपीय सभ्यता पर गर्व करने पर वे किसी भी प्रकार भारतीय अभिजन नहीं रह पायेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह तथ्य जानते हुए वे भारतीय सभ्यता के इतिहास को यूरोप की अनुकृति बताने का प्रयास करते हैं। परन्तु इससे कई मुश्किलें पैदा होती हैं। मुख्य मुश्किल तो विचारों के जगत् में ही आती है। यूरोप का अभिजन अपने ही शास्त्रों और अपने ही विद्वानों को अपना सन्दर्भ बनाता है। यह अभिजनों का विश्व-व्यापी लक्षण है। भारत के नये अभिजन इसकी नकल कैसे करें</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">अगर वे भारतीय शास्त्रों को और भारतीय विद्वानों को मूल सन्दर्भ बनाते हैं तो वे एक क्षण बौद्धिक स्तर पर खड़े नहीं रह सकते। अगर वे यूरोपीय शास्त्रों और भारत में यूरोपीय शास्त्रों के अनुवादकों को अपना सन्दर्भ बनाते हैं तो वे स्वत: तरस के पात्र बन जाते हैं। गहरे में उनके भीतर एक कुण्ठा और हीनता भर जाती है। इसके लिए वे राज्याश्रय का सहारा अवश्य लेते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु विचारों और विद्या की दुनिया में राज्याश्रय की भूमिका बहुत सीमित होती है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी समस्या यह है कि वस्तुत: भारत की अपनी विद्या परम्परा कभी भी बहुत क्षीण नहीं हुई और आज भी विषेशत: मानविकी विद्याओं के क्षेत्र में भारत के शास्त्र सम्पूर्ण यूरोप के शास्त्रों से संख्या में बहुत अधिक हैं और गुणवत्ता में भी कुछ कम नहीं हैं। इस विद्या परम्परा के विशेषज्ञ और अग्रणी लोग भी भारत में बड़ी संख्या में हैं। विशेषत: धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यात्म और संस्कृति के क्षेत्र में भारतीय विद्या परम्परा में दक्ष लोगों की विराट संख्या विद्यमान है। ये ही भारत के वास्तविक अभिजन हैं। इनके सामने भारत के वे नये अभिजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो वस्तुत: आधुनिक यूरोप के नियोग से उपजे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काफी बौने और दयनीय नज़र आते हैं। वे भारतीयता की बात करने को मजबूर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु उनकी सारी बात या तो यूरोपीय लेखकों की लिखी पुस्तकों पर आधारित होती हैं या फिर उन पुस्तकों के अनुवाद के रूप में भारतीय भाषाओं में लिखी पुस्तकों पर आधारित होती हैं। स्पष्ट है कि ऐसी स्थिति में वे द्वितीय श्रेणी के बौद्धिक नज़र आते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक समस्या और भी हैै। आधुनिक भारतीय राजनैतिक दलों के नेता भारतीय समाज से ही आते हैं। और कोई रास्ता भी नहीं है। ऐसी स्थिति में भारतीय समाज की अपने धर्माचार्यों पर और अपनी शास्त्र परम्परा पर जो गहरी श्रद्धा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका उपहास उड़ाने की उनकी हैसियत नहीं बनती। इस प्रकार भारत के हिन्दू धर्माचार्य भारत के वास्तविक अभिजन बने रहते हैं और उनकी चमक ज्यों की त्यों बनी रहती है। इसीलिए हम पाते हैं कि प्रशासनिक सेवाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सैनिक सेवाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुलिस सेवाओं और न्यायिक सेवाओं के उच्चतम पदों से मुक्त हुए भारतीय भी किसी न किसी भारतीय धर्माचार्य के प्रति गहरी श्रद्धा अवश्य रखते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह बात जहाँ उनकी भारतीयता का प्रमाण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं इसी प्रक्रिया में भारत के वास्तविक अभिजनों की महिमा और गौरव बढ़ता ही जाता है। इस स्थिति में कई पेचीदगियाँ पैदा हो रही हैं। कांग्रेस वस्तुत: भारत के राजनीति कर्मियों की एक महासभा थी। यह ठीक है कि उसमें श्री नेहरू ने कम्युनिज़्म और ब्रिटिश भारतीय मान्यताओं की एक अजीब-सी खिचड़ी पकाकर एक नकली अभिजात वर्ग रचने के अद्भुत प्रयास किये। परन्तु राष्ट्रव्यापी दल होने के कारण कांग्रेस में सभी प्रकार के भारतीय बने रहे और वह कभी भी वैचारिक एकपंथवाद का शिकार पूरी तरह नहीं हो पायी। परन्तु नेहरू जी ने जो प्रक्रिया चलायी थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके कारण एक ओर कम्युनिज़्म और दूसरी ओर यूरोपीय किस्म का राष्ट्रवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन दो को केन्द्र बनाकर दो प्रचण्ड एकपंथवादी राजनैतिक शक्तियाँ भारत में उभरीं हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एकपंथवाद इस बात का आग्रह करता है कि वह न केवल शासन में अपितु धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कला और संस्कृति के सभी क्षेत्रों में अपने ही पंथ का प्रचार करेगा। इसके लिए वह अपनी पार्टी के नेताओं को ही विचारक और दार्शनिक की तरह प्रस्तुत करता है और मन्दिर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्याकेन्द्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यात्म केन्द्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कलाकेन्द्र आदि सभी को अपने ही पंथ के अनुशासन में लाने का प्रयास करता है। परन्तु हिन्दू समाज तो सदा से बहुपंथवादी रहा हैं। नेहरूपंथियों ने इसमें यह छल किया कि भारत के बहुपंथवाद को वे </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">हिन्दू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुस्लिम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिक्ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईसाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपस में सब भाई-भाई’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के नारे के नीचे इस तरह प्रस्तुत करते रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानो हिन्दू समाज एक पंथ है और तब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुपंथवाद का अर्थ हिन्दुओं को एक पंथ की तरह मानते हुए अन्य पंथों को भी समान महत्त्व देना प्रचारित किया गया। परन्तु हिन्दू समाज तो स्वयं विविधपंथी है। उसमें सदा से सैकड़ों पंथ हैं। इसलिए यदि कोई राजनैतिक दल एक अलग पंथ बनने का प्रयास करेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह उन सैकड़ों पंथों में से ही एक और पंथ बनकर रह जायेगा और इस प्रकार वह गहरे अर्थों में भारत में प्रजातांत्रिक शासन करने के अयोग्य हो जायेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसे सरल भाषा में कुछ इस तरह स्पष्ट किया जा सकता है कि यदि किसी दल के लोग केवल अपने नेता को शीर्षस्थ विचारक और दार्शनिक की तरह प्रस्तुत करेंगे तो यह भारतीय धर्माचार्यों की विशाल और विराट परम्परा का अनजाने ही अनादर हो जायेगा। जबकि ये धर्माचार्य किसी भी भारतीय राजनेता से बहुत अधिक बुद्धिमान और विद्वान् दोनों हैं। उनको अपने अधीन लाने की किसी पार्टी की कोशिश विफल ही रहने वाली हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार यदि कोई राजनैतिक दल भारत के मन्दिरों और धर्म केन्द्रों को अपने अंकुश में लाने का प्रयास करता है और इसके लिए प्रशासनिक अधिकारियों को मन्दिरों का नियंत्रक बनाता है तो स्पष्ट रूप से यह महापाप है और भारत की जनता ऐसा करने वाले दलों को पापी ही मानती है और मानेगी। एकपंथवादी दलों में यह सामान्य रूझान होता है कि वे मन्दिरों तथा धर्मकेन्द्रों को अपने अंकुश में रखें। बातें तो भ्रष्टाचार पर नियंत्रण की होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु वस्तुत: आध्यात्मिक दृष्टि से यह सबसे बड़ा भ्रष्ट आचरण है कि किसी धर्म-परम्परा में विशेष दक्षता जिन व्यक्तियों को प्राप्त नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे उस धर्म-परम्परा के किसी केन्द्र को संचालित करने का प्रयास करें या उस पर नियंत्रण रखने की कोशिश करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार अपने नेता की किसी मान्यता के आधार पर एक नयी संस्कृति रचने का प्रयास भी भारतीय दृष्टि से सब प्रकार से राष्ट्र-विरोधी होगा और यह नेहरू जी द्वारा 1947 ईस्वी के बाद से इसी दिशा में किये गये कामों की तरह ही निन्दनीय होगा। वस्तुत: राजनैतिक दलों के नेता भारत के एक नया अभिजन वर्ग हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अपने चरित्र और संरचना में वर्णसंकर हैं। क्योंकि भारत में एक भी ऐसा बड़ा नेता 1947 ईस्वी के बाद से आज तक नहीं हुआ है जो वेदों का शीर्ष विद्वान् हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपनिषदों और पुराणों का गम्भीर अध्येता हो और भारतीय ज्ञान परम्परा तथा शास्त्र परम्परा में निष्णात हो। ऐसी स्थिति में उसके द्वारा प्रस्तुत किये गये विचार वस्तुत: भारतीय संस्कारों और यूरोप की कुछ द्वितीय श्रेणी की पुस्तकों के अधकचरे सम्मिश्रण की दयनीय प्रस्तुति मात्र होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्हें संगठन बल से अत्यधिक प्रशंसा और प्रचार के द्वारा गौरव प्रदान किया जाता है। परन्तु तत्त्वत: वे काफी कमजोर विचार होते हैं। न तो वे विश्व की कसौटी पर कहीं ठहर पाते और न ही भारतीय शास्त्रों की कसौटी पर। इस प्रकार एक द्वितीय श्रेणी के अथवा वर्णसंकर प्रकार के अभिजनों को सम्पूर्ण समाज पर आरोपित करने का प्रयास भारतीय मनीषा और परम्परा के नितान्त विपरीत है और भारत के अपने शास्त्रीय अभिजन तथा उनके प्रति श्रद्धावान् समाज उन्हें कभी भी इस रूप में स्वीकार नहीं करेगा। वे अच्छे शासक बनें और समाज की शुभ प्रवृत्तियों का संयोजन करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें ही उन्हें प्रशंसा प्राप्त होगी। कुछ अन्य करने पर वे प्रशंसा के पात्र नहीं बन पायेंगे।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Oct 2017 21:48:13 +0530</pubDate>
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