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                <title>त्वचा रोग निवारक आयुर्वेदिक घटक बकुची - योग संदेश</title>
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                <description>त्वचा रोग निवारक आयुर्वेदिक घटक बकुची RSS Feed</description>
                
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                <title>वनौषधियों में स्वास्थ्य</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">      बा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">कुची के छोटे-छोटे पादप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्षा-ऋतु में समस्त भारतवर्ष में अपने आप उगते हैं तथा जगह-जगह इसकी खेती भी की जाती है। साधारणतया बाकुची के पौधे वर्षायु होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु उचित देखभाल करने से </span>4-5<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ष तक जीवित रह जाते हैं। औषधि कर्म में इसके बीज और बीजों से प्राप्त तैल का व्यवहार किया जाता है। इस पर शीतकाल में पुष्प लगते हैं तथा ग्रीष्म ऋतु में वे फलों में बदल जाते हैं। समस्त भारत में विशेषत: राजस्थान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्नाटक तथा पंजाब में कंकरीली भूमियों में एवं जंगली झाड़ियों में प्राप्त होती है या इसकी खेती की जाती</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2565/tvacha-rog-nivarak-ayurvedic-ghatak-bakuchi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-10/295.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   बा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">कुची के छोटे-छोटे पादप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्षा-ऋतु में समस्त भारतवर्ष में अपने आप उगते हैं तथा जगह-जगह इसकी खेती भी की जाती है। साधारणतया बाकुची के पौधे वर्षायु होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु उचित देखभाल करने से </span>4-5<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ष तक जीवित रह जाते हैं। औषधि कर्म में इसके बीज और बीजों से प्राप्त तैल का व्यवहार किया जाता है। इस पर शीतकाल में पुष्प लगते हैं तथा ग्रीष्म ऋतु में वे फलों में बदल जाते हैं। समस्त भारत में विशेषत: राजस्थान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्नाटक तथा पंजाब में कंकरीली भूमियों में एवं जंगली झाड़ियों में प्राप्त होती है या इसकी खेती की जाती है। चरक संहिता के तिक्त स्कन्ध एवं अर्शादि अनेक रोगों की चिकित्सा में इसका प्रयोग मिलता है। सुश्रुत संहिता के कटु वर्ग में अवल्गुज नाम से मेधायुष्यकामीय में बाकुची के नाम से इसका उल्लेख प्राप्त होता है। त्वचा सहित शरीर के विविध रोगों के निवारण में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह सीधा</span>, 60-120<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी. ऊँचा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्षायु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शाकीय पौधा अथवा क्षुप होता है। इसकी काण्ड एवं शाखाएँ झुर्रीदार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोणीय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिरायुक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पष्ट रक्ताभ ग्रंथियुक्त एवं किंचित् श्वेत रोमश होती हैं। इसके पत्र एकांतर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरल</span>, 2.5-7.5<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी. लम्बे एवं </span>2.5<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेमी. चौड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोलाकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों पृष्ठ पर श्वेत रोमश तथा अनेक कृष्ण वर्ण के बिन्दुओं से युक्त होते हैं। इसके पुष्प छोटे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीले एवं हल्के बैंगनी वर्ण के</span>, 10-30<span lang="hi" xml:lang="hi"> की संख्या में लगते हैं। इसकी फली </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिमी लम्बी</span>, 3<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिमी. चौड़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छोटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिकनी तथा एकबीजी होती है। कच्ची अवस्था में यह हरे रंग की तथा पकने पर काले रंग की हो जाती है। इसके बीज मसूर के दानों जैसे कड़े किन्तु कुछ बड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काले या गहरे भूरे रंग के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चपटे तथा आगे की तरफ नुकीले होते हैं। बीजों का ऊपरी छिलका मुलायम होता है तथा फलभित्ति से चिपका रहता है। बीज का भीतरी भाग श्वेत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वाद में तिक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चरपरा तथा गंधयुक्त होता है। इसका फलकाल सितम्बर से मार्च तक होता है।</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">औषधीय प्रयोग </span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मात्रा एवं विधि</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचा रोग</span></strong></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कुष्ठ रोग- बाकुची के बीज चार भाग और तबकिया हरताल एक भाग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों को चूर्ण कर गोमूत्र में घोंटकर श्वेत दागों पर लगाने से सफेद दाग दूर हो जाते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची और पवाड़ को समभाग लेकर सिरके में पीसकर सफेद दागों पर लगाने से दाग में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गंधक व गुड्मार को बराबर मात्रा में लेकर तीनों का चूर्ण कर लें तथा </span>12<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम चूर्ण को रात्रि में जल में भिगो दें। प्रात:काल निथरा हुआ जल सेवन कर लें तथा नीचे के तल में जमा पदार्थ श्वेत दागों पर लगाते रहने से श्वेत कुष्ठ नष्ट हो जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची तेल दो भाग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुवरक तेल दो भाग तथा चंदन तेल एक भाग मिलाकर रख लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस तेल को लगाने से सामान्य त्वक् रोग तथा श्वेत कुष्ठ आदि रोग नष्ट होते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>10-20<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम शुद्ध बाकुची चूर्ण में एक ग्राम आँवला मिलाकर खैर की छाल के </span>10-20<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली क्वाथ के साथ सेवन करने से श्वित्र रोग नष्ट हो जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची को तीन दिन तक दही में भिगोकर फिर सुखाकर रख लें। इसका तेल शीशी में निकाल लें। इस तेल में नौसादर मिलाकर श्वेत दागों पर लेप करें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कलौंजी तथा धतूरे के बीजों को समभाग लेकर आक के पत्तों के रस में पीसकर श्वेत दागों पर लगाने से श्वेत कुष्ठ में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इमली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुहागा और अंजीर मूल की छाल को समभाग लेकर जल में पीसकर सफेद दागों पर लेप करने से श्वित्र रोग में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पवाड़ तथा गेरू को समभाग लेकर कूट पीसकर अदरक के रस में खरल कर सफेद दागों पर लगाकर धूप सेंकने से श्वेत कुष्ठ में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गेरू और गन्धक को समभाग लेकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीसकर अदरक के रस में खरल कर </span>10-10<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम की टिकिया बनाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक टिक्की रात्रि को </span>30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिग्रा. जल में डाल दें। प्रात: ऊपर का स्वच्छ जल पी लें तथा नीचे की बची हुई औषधि को श्वेत दागों पर मालिश कर धूप सेंकने से श्वित्र रोग में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अजमोद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पवाड़ तथा कमल गट्टा को समान भाग लेकर कूट पीसकर मधु मिलाकर गोलियां बना लें। एक से दो गोली तक प्रात: सायं अंजीर मूल की छाल के क्वाथ के साथ सेवन करने से श्वेत कुष्ठ में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम शुद्ध बाकुची तथा </span>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम काले तिल के चूर्ण में </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> चम्मच मधु मिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रात: सायं सेवन करने से श्वित्र रोग में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्ध बाकुची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंजीर मूल की छाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीम छाल तथा पत्र को सम भाग लेकर कूट पीसकर खैर छाल के क्वाथ में खरल करके रख लें। दो से पाँच ग्राम तक की मात्रा को जल के साथ सेवन करने से श्वेत कुष्ठ में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची पाँच ग्राम तथा केसर एक भाग लेकर दोनों को कूट पीसकर गोमूत्र में खरल कर गोली बना लें। इस गोली को जल में घिसकर लगाने से श्वित्र रोग में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>100<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम बाकुची</span>, 25<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम गेरू तथा </span>50<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम पवांड़ के बीज लेकर सबको कूट पीसकर वस्त्रपूत कर (कपड़े से छानकर) भांगरे के रस की </span>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> भावनाएं देकर रख लें। प्रात: सायं गोमूत्र में घिसकर लगाने से श्वित्र रोग में लाभ होगा। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची चूर्ण को अदरक के रस में घिस कर लेप करने से श्वित्र रोग में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची दो भाग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीलाथोथा तथा सुहागा एक-एक भाग लेकर कपड़छन चूर्ण कर एक सप्ताह भांगरे के रस में घोंटकर रख लें। इसको नींबू स्वरस में मिलाकर श्वित्र पर लगाने से श्वेत दाग नष्ट होते हैं। यह प्रयोग तीक्ष्ण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: इसके प्रयोग के फल स्वरूप छाले होने पर यह प्रयोग बन्द कर देें।  </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्ध बाकुची चूर्ण की एक ग्राम मात्रा को बहेड़े की छाल तथा जंगली अंजीर मूल की छाल के क्वाथ में मिलाकर निरन्तर सेवन करते रहने से श्वित्र तथा पुंडरीक में लाभ होता है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हल्दी तथा अर्कमूल की छाल को समान भाग लेकर महीन चूर्ण कर कपड़छन कर लें। इस चूर्ण को गोमूत्र या सिरका में पीसकर श्वित्र के दागों पर लगाने से श्वेत दाग नष्ट हो जाते हैं। यदि लेप उतारने पर जलन हो तो तुबरकादि तेल लगायें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> किग्रा. बाकुची को जल में भिगोकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छिलके रहित करके पीसकर </span>8<span lang="hi" xml:lang="hi"> ली. गोदुग्ध तथा </span>16<span lang="hi" xml:lang="hi"> लीटर जल में पाक करें। दुग्ध मात्र शेष रहने पर उसे जमा दें। मक्खन निकालकर उसका घी बना लें। एक चम्मच घी में </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> चम्मच मधु मिलाकर चाटने से श्वेत कुष्ठ में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची तेल की </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> बूंदों को बताशे में डालकर प्रतिदिन कुछ दिनों तक सेवन करने से श्वित्र रोग में लाभ होता है। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची को गोमूत्र में भिगोकर रखें तथा तीन-तीन दिन बाद गोमूत्र बदलते रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस तरह कम से कम </span>7<span lang="hi" xml:lang="hi"> बार करने के बाद उसको छाया में सुखाकर पीसकर रखें। उसमें से </span>1-1<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम सुबह-शाम ताजे पानी से खाने से एक घंटा पहले सेवन करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे श्वित्र (सफेद दाग) में निश्चित रूप से लाभ होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह अनुभूत प्रयोग है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम बाकुची और </span>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम काले तिल को मिलाकर एक वर्ष तक दिन में दो बार सेवन करने से कुष्ठ रोग में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कर्ण रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बाधिर्य</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>-</strong> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिदिन</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मूसली</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">औैर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">चूर्ण</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को</span> 1-3<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम की मात्र में सेवन करने से बधिरता में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मुख रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>दंतकृमि- </strong>बाकुची की जड़ को पीसकर उसमें अल्प मात्रा में भुनी हुई फिटकरी मिला लें। सुबह-शाम इससे मंजन करने से दाँत के कीड़े नष्ट हो जायेंगे।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>दन्तरोग- </strong>बिजौरा नीम्बू की जड़ तथा बाकुची की जड़ को पीसकर वर्ति बना कर दाँतों के बीच में दबा कर रखने से कृमिदन्त और दंतवेदना का शमन होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दन्तसंक्रमण</span><span lang="hi" xml:lang="hi">- </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मूल</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पीसकर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अल्प</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मात्रा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">शोधित</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">फिटकरी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मिलाकर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्येक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सुबह</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">शाम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मंजन</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रूप</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रयोग</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">करने</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दन्त संक्रमण</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">लाभ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">जाता</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वक्ष रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">श्वास</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">आधा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्राम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बीज</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">चूर्ण</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अदरक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रस</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">थ दिन में </span>2-3<span lang="hi" xml:lang="hi"> बार सेवन करने से श्वास-कास में आराम मिलता है। कफ  ढीला होकर निकल जाता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उदर रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अतिसार</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पत्तों</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">साग</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सुबह</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">शाम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नियमित</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रूप</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हफ्ते</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">खिलाते</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रहने</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अतिसार</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुत</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">लाभ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">होता</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">गुदा रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्श</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-</span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम हरड़</span>, 2<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम सोंठ और </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्राम बाकुची के बीज लेकर पीस लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आधी चम्मच की मात्रा में गुड़ के साथ सुबह-शाम सेवन करने से लाभ मिलेगा।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">यकृत्प्लीहा रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पीलिया-</span></strong>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिली. पुनर्नवा के रस में आधा ग्राम पीसी हुई बाकुची के बीजों का चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम प्रतिदिन सेवन करने से पीलिया रोग में लाभ होता है (बाकुची का अधिक सेवन वमन पैदा करता है)।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजनन संस्थान रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">मासिक धर्म से शुद्ध होने के पश्चात् बाकुची के बीजों को तैल में पीसकर योनि में रखने से गर्भधारण करने की क्षमता समाप्त हो जाती है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">शाखा रोग</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">शलीपद-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची स्वरस का लेप श्लीपद प्रभावित अंग पर करने से लाभ होता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुची तैल तथा कल्क का लेप करने से श्लीपद में लाभ होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">साधारण वनौषधि होने के बावजूद आरोग्य में असाधारण भूमिका निभाने वाली बाकुची को हम सब पहचानें और त्वचा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदर सहित शरीर के अनेक रोगों से मुक्ति हेतु लाभ उठायें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रासायनिक </span><span lang="hi" xml:lang="hi">संघटन</span></strong></span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके बीज में वाष्पशील तैल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिर तैल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाकुचीओल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोरालेन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आईसोरालेन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेरालीडिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आईसोसोरालीडिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉरिलीफोलीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोरालोन</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">आईसोसोगलोन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉरिलीडिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ट्राईएकॉन्टेन</span>, β-<span lang="hi" xml:lang="hi">सिटोस्टीरॉल</span>, β-<span lang="hi" xml:lang="hi">ष्ठ-ग्लुकोसाईड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रेफ्फीनोस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉरीलीफोलीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉरीफोलीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉरीटीफोलीनीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बवाचीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आईसोवाचीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाचीनीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्टीग्मास्टीरॉल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फेनॉल एवं कामेरिन पाया जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके बीज तैल में लीमोनीन</span>, -<span lang="hi" xml:lang="hi">एलीमिन</span>, β-<span lang="hi" xml:lang="hi">केरयोफीलेनोक्साईड</span>, 4-<span lang="hi" xml:lang="hi">टर्पीनीओल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लीनालूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीरेनील एसीटेट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एनजेलीसीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोरालीन एवं बाकुचीओल पाया जाता है। इसके पत्र में रेफिनोस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोरालेन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आइसोसोरालेन एवं एन्जेलीसीन पाया जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके फल में कोरिलिनॉल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोरालिनॉल एवं बावक्रोमानॉल पाया जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसकी मूल में कूमेस्ट्रोल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिटोस्टीरॉल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोरालेन एवं आइसोसोरालेन पाया जाता है।</span></h5>
</li>
</ul>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>पोषक उत्पाद</category>
                                            <category>2017</category>
                                            <category>नवम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Nov 2017 21:53:31 +0530</pubDate>
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