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                <title>यूरोप में राष्ट-राज्य का उदय - योग संदेश</title>
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                <description>यूरोप में राष्ट-राज्य का उदय RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>यूरोप में राष्ट-राज्य का उदय</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">प्रो. कुसुमलता केडिया</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2713/europe-me-rashtra-rajya-ka-uday"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-12/25.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सामान्यत: भारत में अधिकांश शिक्षित जन भी यूरोप में राष्ट्र-राज्य के उदय के तथ्यों के विषय में अनजान हैं। बहुत से ऐसे लोग हैं जो समझते हैं कि भारत की ही तरह यूरोप के भी अधिकांश राज्य सनातन काल से राष्ट्र-राज्य हैं। इसलिए इस विषय में तथ्यों को जानना सर्वाधिक आवश्यक है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तुत: यूरोप में राष्ट्र-राज्य का उदय बहुत हाल की घटना है। स्वयं राज्य के वर्तमान स्वरूप का विचार ही 19वीं शताब्दी ईस्वी में पहली बार सामने आया। यूरोप के विद्वानों का स्वयं का कथन है कि औद्योगीकरण और पूँजीवाद के विकास के सन्दर्भ में राज्य एक महत्त्वपूर्ण संस्था के रूप में सोचा जाने लगा। औद्योगीकरण और पूँजीवाद की वृद्धि में मुख्य भूमिका निभाने वाले प्रबुद्धजनों में से कुछ लोग एक आधुनिक राज्य का गठन इन दोनों के संरक्षण के लिए आवश्यक मानने लगे। </span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(52,73,94);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">खेतीहर ग्रामीण समाज रहा है यूरोप</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ कुछ सामान्य तथ्य तत्कालीन पृष्ठभूमि के विषय में जानना आवश्यक है। 19वीं शताब्दी के अन्तिम चरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ तक कि 20वीं शताब्दी ईस्वी के प्रारम्भ तक यूरोप की 95 से 98 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण थी और इस प्रकार लगभग सम्पूर्ण यूरोप मुख्यत: एक ग्रामीण समाज है। इसे भी विशेष रूप में समझने की आवश्यकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जिस अर्थ में भारत तथा अन्य सघन जनसंख्या वाले एशियाई देशों में गाँवों से आशय लिया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसा कोई भी गाँव यूरोप में कभी नहीं रहा। उनके कुछ तथाकथित शहर अवश्य रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो भारत के बड़े गाँवों के ही आकार के थे। तत्कालीन किसी भी शहर की आबादी केवल कुछ हजारों में ही थी। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार यूरोप 20वीं शताब्दी ईस्वी के प्रारम्भ तक मुख्यत: एक खेतिहर समाज था। इसे भी विशेष रूप से जानने की आवश्यकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि खेतिहर समाज से भारत तथा अन्य एशियाई देशों में जो अर्थ लिया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसा कोई समाज और वैसी कोई खेती यूरोप में 20वीं शताब्दी ईस्वी के प्रारम्भ तक कभी भी नहीं रही। भारत में कृषि प्रधान समाज जब कहा जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब यह माना जाता है कि एक ऐसा समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें पोषण और समृद्धि के मुख्य अंग कृषि से आयेंगे। </span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(52,73,94);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अपना पेट स्वयं भरने  में सक्षम नहीं है कोई भी यूरोपीय राज्य</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यूरोप में स्थिति ऐसी नहीं है। वहाँ किसी भी इलाके में कभी भी (20वीं शताब्दी ईस्वी के प्रारम्भ तक और आज भी) इतनी खेती नहीं हुई कि वह अपने पूरे इलाके का पेट भर सके। थोड़े-से लोगों को ही भोजन की पूर्ति वहाँ की खेती कर पाती थी। शेष लोग किसी प्रकार कुछ भी खाकर और अक्सर भूखे रहकर जीवन बिताते थे। यही कारण है कि जैसे ही यूरोप के देशों का शेष विश्व में कहीं थोड़ा भी प्रभाव बढ़ा तो उन्होंने सबसे पहले अनाज का आयात अपने यहाँ किया। अनाज का यह आयात किसी निर्यात के लिए अथवा किसी व्यापार के लिए नहीं था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु अपना पेट भरने के लिए ही था। अनाजों के साथ-साथ फ़लों और सब्जियों का भी आयात मौका लगते ही यूरोपीय देश अपने यहाँ करने लगे। </span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(52,73,94);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भोजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वस्त्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वाद और उपभोग पर निर्भर है यूरोप</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार यूरोप का खेतिहर समाज एक ऐसा समाज है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो न तो भोजन के लिए पर्याप्त खाद्यान्न पैदा कर पाता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न ही वस्त्रों के लिए पर्याप्त कपास या अन्य धागे उत्पन्न कर पाता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न ही वहाँ कभी भी कपास हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न चीनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न तम्बाकू। सभी प्रकार के उपभोग के लिए यूरोपीय देश सदा बाहर की दुनिया पर निर्भर रहे हैं। बाहर से अनाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फ़लों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब्जियों का आयात वे आज भी कर रहे हैं और इनका बड़ा अंश स्वयं उनके उपभोग के लिए ही है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार जब हम कहते हैं कि यूरोपीय समाज 20वीं शताब्दी ईस्वी के प्रारम्भ तक एक ग्रामीण और कृषि प्रधान समाज था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसका अर्थ वह नहीं होता जो इन शब्दों से भारत में समझा जाता है। </span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(52,73,94);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पहले अनगढ़ सूती वस्त्र ही बना पाया इंग्लैण्ड</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे औद्योगीकरण का युग कहा जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें पहले तो केवल ऊन का उद्योग और थोड़ा-सा लोहे का उद्योग इंग्लैण्ड में पनपा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्य देशों में तो वह भी बहुत बाद में फ़ैला। औद्योगीकरण का केन्द्र और प्रवर्तक इंग्लैण्ड को माना जाता है और वहाँ जब शुरू में सूती कपड़ों की मिलें मेनचेस्टर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लंकाशायर आदि में प्रारम्भ भी हुई तो उनके बने कपड़े खुरदुरे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनगढ़ और असुन्दर होते थे। भारत में उनका खरीददार कोई नहीं था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसीलिए यहाँ कम्पनी के लोगों ने बलपूर्वक उनकी बिक्री के लिए कई हथकण्डे अपनाये। </span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(52,73,94);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मशीनों की सच्चाई</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार औद्योगीकरण में मशीनों के निर्माण की बात की जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु सत्य यह है कि 18वीं शताब्दी ईस्वी तक वहाँ जो मशीनें बनती थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे वहाँ के लुहार और बढ़ई मिलकर एक-एक नग मशीन ही बनाते थे। इससे वहाँ के कुल मशीनीकरण के विषय में सहज ही अनुमान हो सकता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसीलिए कहा गया कि राज्य अर्थात् दण्ड-शक्ति का प्रबल प्रयोग करने वाला राज्य वहाँ औद्योगीकरण और पूँजीवाद की आवश्यकता बन गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि वह पूँजीपतियों और उद्योगपतियों के पक्ष में तथा शेष लोगों के विरुद्ध नियम बना सके और बल प्रयोग करे।</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(52,73,94);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ हजार जनसंख्या</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> वाले राज्य</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु स्वयं यह राज्य कितना शक्तिशाली था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके कुछेक दृष्टान्त ही पर्याप्त होंगे। यों तो 20वीं शताब्दी ईस्वी में यह प्रचार किया गया कि यूरोप में राज्य अत्यन्त प्राचीनकाल से हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चूँकि यवन प्रान्त में नगर राज्य ईसापूर्व काल से थे। यदि आधुनिक यूरोपीय लोगों का यह तर्क स्वीकार कर लिया जाये कि यवन प्रान्त यूरोप का अंग है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कि वस्तुत: वह हजारों साल तक कभी था ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हाल ही में बना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भी उस क्षेत्र के नगर-राज्यों की कुल आबादी 20 से 40 हजार के बीच ही होती थी और ऐसे नगर-राज्य भी 40 या 50 से अधिक कभी नहीं हुए। इस प्रकार भारतीय दृष्टि से ये नगर राज्य सचमुच राज्य तो हैं ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नगर भी नहीं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे भारत के किसी बड़े गाँव के समकक्ष हैं। </span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(52,73,94);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पोप से नाराज राजा</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि आधुनिक काल ही की बात करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो 18वीं शताब्दी ईस्वी में आधुनिक राज्य का जो विचार पहली बार केवल विचार रूप में आया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी शक्ति का स्वरूप समझ लेने की आवश्यकता है। हेनरी अष्टम को कैथोलिक फ़ेथ का रक्षक (डिफ़ेण्डर) पोप ने करार दिया। हेनरी अष्टम ने अपनी पत्नी को तलाक देना चाहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी अनुमति पोप ने नहीं दी। इससे राजा हेनरी अष्टम नाराज हो गया और उसने इंग्लैण्ड में चर्च को भंग कर दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चर्च की समस्त सम्पत्ति छीन कर अपने प्रिय जमींदारों के बीच बाँट दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे सभी जमींदार अत्यन्त प्रसन्न हुए। राजा ने एक नया ही चर्च बना दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो चर्च ऑफ़ इंग्लैण्ड की नींव बना। कैथोलिक चर्चों की मूर्तियाँ क्रॉस तथा अन्य पूजा की वस्तुएँ जप्त कर ली गयीं और उनमें से जो धातु की वस्तुएँ थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे गला दी गयीं। ऐसी तथाकथित मजबूत स्थिति वहाँ के चर्च की थी और ऐसी शक्ति राजा में थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका गुणगान इंग्लैण्ड के सभी प्रशंसक करते हैं। </span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(52,73,94);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बार-बार बदले गए राजकीय चर्च</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हेनरी अष्टम की मृत्यु के बाद एडवर्ड षष्टम गद्दी पर बैठा और उसने इंग्लैण्ड के नये चर्च को संरक्षण जारी रखा। उसके बाद मैरी नामक राजकुमारी रानी बनी और उसने फ़िर कैथोलिक चर्च का संरक्षण किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु 5 साल बाद उसकी बहन एलिजाबेथ रानी बनी और उसने फ़िर से प्रोटेस्टेण्ट चर्च को ही पूरे इंग्लैण्ड में फ़ैलाया तथा संरक्षण दिया। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार पत्नी को तलाक न देने वाले चर्च को नष्ट कर देने की राजा की शक्ति को ही इंग्लैण्ड में शक्तिशाली राज्य का उदय इन दिनों इंग्लैण्ड के इतिहासकार बता देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि राज्य के उदय को 300 साल पहले दर्शाया जा सके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि तथ्य यह है कि 19वीं शताब्दी ईस्वी में पहली बार इंग्लैण्ड तथा जर्मनी और फ्रांस राष्ट्र-राज्य बने हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और यूरोप के ही अनेक अन्य राष्ट्र-राज्य 20वीं शताब्दी ईस्वी में प्रथम महायुद्ध के बाद बनाये गये हैं। </span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(52,73,94);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संयुक्त राज्य अमेरिका का आरम्भिक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> राज्य </span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संयुक्त राज्य अमेरिका का 1789 ईस्वी का संविधान आधुनिक राज्य का मॉडल माना जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु वह आधुनिक राज्य कैसा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसको बताने वाले कुछ तथ्य ही पर्याप्त होंगे:-</span></h5>
<ul style="list-style-type:square;">
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">उक्त संविधान पर 13 राज्यों के कुल 39 पुरुष प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किये थे। यद्यपि उसमें बात सबके लिए स्वतंत्रता और समता की की गयी थी।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जो प्रतिनिधि चुने जाते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे धन तथा पुरुष होने और अभिजात वर्ग के होने की शर्तों के आधार पर ही चुने जाते थे। इस प्रकार विशेषाधिकार सम्पन्न एक अल्पसंख्यक समूह ही वहाँ के आदर्श राज्य का निर्वाचक प्रतिनिधि मण्डल था। </span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">वह राज्य किन आदर्शों पर चले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका निर्णय इसी विशेषाधिकार सम्पन्न अल्पसंख्यक समूह द्वारा किया जाता था और पूरे राज्य का रेलिजन क्या हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् कैथोलिक ईसाइयत हो या प्रोटेस्टेण्ट ईसाइयत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह भी यह अल्पसंख्यक समूह तय करता था। </span></h5>
</li>
</ul>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(52,73,94);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">व्यापारिक नाके</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसा कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पॉलिटिकल ज्यॉग्रफी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नामक पुस्तक के लेखक मार्क ब्लैकसेल (राउटलेज प्रकाशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लंदन) ने स्वयं बताया है- 19वीं शताब्दी ईस्वी के प्रारम्भ तक यूरोप में वर्तमान स्वरूप वाला राट्र-राज्य शायद ही कोई रहा हो। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार जिसे बाद में साम्राज्य कहकर प्रचारित किया गया और जिसे भारत में अंग्रेज-भक्त लोग ब्रिटिश साम्राज्य कहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके विषय में भी मार्क ब्लैकसेल लिखते हैं कि- वस्तुत: ये कोई साम्राज्य थे ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये तो ऐसे व्यापारियों के प्रतिष्ठान थे जो नाममात्र को अपने दूर देश के सम्राट के प्रति निष्ठा का प्रदर्शन करते थे। वस्तुत: ये विश्व के विविध देशों के समुद्र तटों पर फ़ैले व्यापारिक नाके थे। (देखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही पृ. 45)</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(52,73,94);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अंग्रेजों की महिमा कांग्रेसियों ने गाई</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इनमें भी सबसे बड़ा व्यापारिक प्रतिष्ठान अर्थात् तथाकथित साम्राज्य तो केवल इंग्लैण्ड का ही था। शेष राज्य- डेनमार्क</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फ्रांस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुर्तगाल और स्पेन अपेक्षाकृत कुछ समुद्र तटीय नाकों तक ही केन्द्रित थे। इन राज्यों के सम्राटों का इन व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर नियंत्रण नाममात्र को था और इन सभी देशों में वहाँ के स्वदेशी लोग इन व्यापारिक कम्पनियों से अधिकांशत: अप्रभावित थे और वे अपना जीवन पूर्ववत् जी रहे थे। इससे स्पष्ट होता है कि इंग्लैण्ड की महिमा का गायन भारत में 15 अगस्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">1947 ईस्वी के बाद से उन लोगों के द्वारा कई गुना अधिक बढ़ाकर किया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्हें </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ट्रांसफ़र ऑफ़ पावर’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के जरिये ब्रिटिश राज्य का उत्तराधिकार मिला और भारतीयों की प्रचण्ड देशभक्ति की भावना के जरिये जिन्होंने छल-बल से शेष भारतीय राजाओं के राज्य को हथियाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु जिनके साथ किये गये किसी भी करार की रक्षा नहीं की गयी। </span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(52,73,94);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">लूट के माल को औद्योगिक विकास प्रचारित किया</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यूरोपीय इतिहासकारों का कहना है कि औद्योगीकरण और पँूजीवाद के विस्तार के लिए आधुनिक राज्य उनकी एक आवश्यकता बन गया था। परन्तु जैसा कि हमने ऊपर उल्लेख किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे औद्योगीकरण कहा जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह मूलत: भारत सहित विश्व के अनेक देशों की लूट का काल है और उस लूट से जो सम्पदा इंग्लैण्ड को मिली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उससे आयी अवैध समृद्धि को वैधता देने के लिए औद्योगीकरण का शोर किया गया। क्योंकि जिसे वे इंग्लैण्ड का अद्वितीय औद्योगीकरण का दौर बताते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें जिस प्रकार की मशीनें बनीं और जो उत्पादन आदि हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उससे कहीं बहुत श्रेष्ठ मशीनें- कताई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुनाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कढ़ाई आदि की तथा कपड़ों की रंगरेजी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छापा आदि की और जुताई तथा बोवाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस्पात का निर्माण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनेक रसायनों का निर्माण तथा चेचक के टीकों सहित कई प्रकार के उपचारों और शल्य-चिकित्सा का विकास भारत में उससे हजार सालों पहले से हो चुका था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका अर्थ है कि अगर वही औद्योगीकरण है तो भारत उस औद्योगीकरण के दौर में हजारों वर्ष पहले ही आ चुका था और जितनी थोड़ी-सी जमापूँजी के संग्रह को इंग्लैण्ड और यूरोप वाले पूँजीवाद का विकास बताते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उससे हजारों गुना अधिक पूँजी संग्रह और पूँजी का विनिवेश तथा विनिमय और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का स्तर भारत ने हजारों वर्ष पूर्व ही प्राप्त कर लिया था। उस स्तर के लिए भारत को किसी ऐसे तथाकथित आधुनिक राज्य की आवश्यकता का अनुभव नहीं हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो राज्य वस्तुत: लूट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छिनैती और डकैती को वैधता देता हो। </span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(52,73,94);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हजारों वर्षों से भारत में रहे हैं सुदृढ़ राज्य</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">निस्सन्देह भारत में अत्यन्त शक्तिशाली राज्य हजारों वर्ष पूर्व से रहे हैं और यहाँ के अन्तर्राष्ट्रीय समुद्री व्यापार तथा स्थल मार्गीय व्यापार को राज्य और व्यापारियों के मण्डल सैनिक संरक्षण भी देते रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि उसके बिना तो इतने विशाल पैमाने पर व्यापार सम्भव ही नहीं है। परन्तु अपने व्यापार और समृद्धि के हजारों साल तक टिके रहने वाले कौशल के अनुभव के आधार पर भारतीयों ने और उनके द्वारा पोषित राज्य ने कभी भी लूट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डकैती और छिनैती को वैधता देने की कोशिश नहीं की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु उन्हें अपराध मानकर सदा उन पर रोक लगाने का ही काम किया। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इससे स्पष्ट है कि जिस आधुनिक राज्य के विचार और उसके उदय की बात यूरोपीय लेखक करते हैं तथा उनके अनुयायी कई भारतीय लेखक भी करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस राज्य की मुख्य विशेषता औद्योगीकरण और पूँजी का संरक्षण नहीं थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु लूट और डकैती को वैध बनाने के लिए ही उस राज्य की आवश्यकता पड़ी। ऐसा राज्य यूरोप में पहली बार 19वीं शताब्दी ईस्वी में ही उदित हुआ। उसका मुख्य कारण यूरोप की भौगोलिक संरचना है। जंगलों और दलदलों के बीच बिखरी-फ़ैली छोटी-छोटी मानवीय बसाहटों वाले क्षेत्र में किसी सशक्त राज्य की कोई कल्पना ही नहीं थी। बात केवल राज्य तक सीमित नहीं है। </span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(52,73,94);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">थोड़े से लोगों का जाल है चर्च</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो तथ्य अब पूरी तरह स्पष्ट हो चुके हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनसे यह पता चलता है कि जिस रोमन कैथोलिक चर्च का इतना शोर मचाया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह भी केवल छोटी-छोटी मानवीय बसाहटों में बिखरा-फ़ैला एक तंत्र-जाल मात्र था। 100-200 आदमी कहीं एक जगह हैं और 500 या 1000 या 5000 लोग दूसरी जगह हैं तथा उनके बीच 2</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">4 या 6 पादरियों का एक गुट अपनी आस्थाओं का प्रचार कर रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे ही इतना गारिमा मण्डित किया गया। यही कारण है कि पत्नी को तलाक देने की अनुमति न मिलने जैसी तनिक सी बात पर हेनरी अष्टम ने इंग्लैण्ड के रोमन कैथोलिक चर्च को भंग कर दिया और उसकी समस्त सम्पत्तियाँ छीन लीं। इससे उस राजा की मनमानी का उतना पता नहीं चलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितना कि रोमन कैथोलिक चर्च की कमजोरी और असहायता तथा शक्तिहीनता का पता चलता है। इस प्रकार एक सशक्त राज्य के न होने भर की बात नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तुत: ऐसा कोई सशक्त चर्च भी सम्भवत: वहाँ कभी था नहीं। सशक्त चर्च भी सशक्त राज्य के संरक्षण में ही उभरा और उसके अनुग्रह पर ही आश्रित रहा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह तथ्य भी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पॉलिटिकल ज्यॉग्रफी’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के लेखक ने बताया है कि यूरोप में राज्य के उदय से पहले ही एशिया के अनेक क्षेत्रों में ऐसे सशक्त राज्य विद्यमान थे। यूरोपीय देशों को लूट के माल के अपेक्षित ढंग से वितरण के लिए पहली बार एक बड़े राज्य-तंत्र की आवश्यकता का अनुभव हुआ। </span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(52,73,94);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मनमाने नक्शे</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मार्क ब्लैकसेल बताते हैं कि यूरोपीय राज्य के उदय मेें नक्शों और मानचित्रों की भी विशिष्ट भूमिका रही है। वे यह भी बताते हैं कि सुमेर सभ्यता के क्षेत्र से 3 हजार वर्ष पुराने नक्शे मिले हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनसे पता चलता है कि प्राचीन सभ्यताओं में अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र को अंकित करने के लिए नक्शों का चलन बड़े पैमाने पर था। यूरोप में इन नक्शों का उपयोग 18वीं शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्द्ध से बढ़ा। लेखक यह भी बताते हैं कि नक्शे योजनापूर्वक तथा इच्छित रूपों में बनाये और दर्शाये जाते हैं। नक्शा बनाने वाले लोग अपने मालिकों के विचारों और योजनाओं के अनुरूप नक्शे बनाते हैं। किसे किस रूप में दिखाना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह उन्हें निर्दिष्ट रहता है। </span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(52,73,94);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">झूठ का प्रचार</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इंग्लैण्ड में 1841 ईस्वी में भौगोलिक सर्वेक्षण के लिए एक आदेश जारी हुआ। जिसमें एक इंच की दूरी एक मील की द्योतक थी। 1858 ईस्वी में इंग्लैण्ड ने यह निश्चय किया कि जोते गये इलाकों को 2500वें अंश से दिखाया जायेगा और बिना जुते इलाकों को 10,560वें अंश में दिखाया जायेगा। जिसका अर्थ है कि नक्शे में दर्शाये गये इलाके किसी स्थिर अनुपात या स्थिर पैमाने पर नहीं दिखाये जायेंगे। राजनैतिक लक्ष्यों के अनुरूप नक्शों का बनाना और उसमें स्थानों और दूरियों को सुविधा के अनुसार दर्शाना 19वीं शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्द्ध से यूरोप का मुख्य चलन रहा है। इसका उद्देश्य नक्शों के जरिये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विरोधियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शत्रुओं और अन्य लोगों को भरमाना रहा है तथा स्वयं को मजबूत दिखना रहा है। इस तरह नक्शे भी वहाँ झूठे प्रचार का एक अंग रहे हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मार्क मानमोनियर नामक लेखक ने तो इस विषय पर एक पुस्तक ही लिखी है- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">हाउ टू लाय विद मेप्स’</span> (<span lang="hi" xml:lang="hi">नक्शों के जरिये झूठा प्रचार कैसे किया जाये</span>?)<span lang="hi" xml:lang="hi">। यह पुस्तक 1991 ईस्वी में प्रकाशित हुई है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राजनैतिक विषयों पर लेखन का एक बड़ा प्रयोजन राजनैतिक प्रचार होता है। आधुनिक राज्य की महिमा का गायन भी इसी राजनैतिक प्रचार का हिस्सा है। लेकिन उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि भारत में यूरोप के विषय में और वहाँ के राष्ट्र-राज्यों के विषय में जो व्यापक अज्ञान फ़ैला हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह दूर किया जाना आवश्यक है।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2023</category>
                                            <category>राष्ट्र-चिंतन</category>
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                <pubDate>Thu, 01 Jun 2023 21:51:43 +0530</pubDate>
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